चन्द्रकान्ता सन्तति
नौवाँ भाग
१
अब वह मौका आ गया है कि हम अपने पाठकों को तिलिस्म के अन्दर ले चलें और वहाँ की सैर करावें, क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा मायारानी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा विराजे हैं जिसे एक तरह तिलिस्म का दरवाजा कहना चाहिए। ऊपर के भाग में यह लिखा जा चुका है कि भैरोंसिंह को रोहतासगढ़ की तरफ और राजा गोपालसिंह और देवीसिंह को काशी की तरफ रवाना करने के बाद इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, तारासिंह, शेरसिंह और लाड़िली को साथ लिए हुए कमलिनी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा पहुँची और उसने राजा गोपालसिंह के कहे अनुसार देवमन्दिर में, जिसका हाल आगे चलकर खुलेगा, डेरा डाला। हमने कमलिनी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह को दारोगा वाले मकान के पास के एक टीले पर ही पहुँचा कर छोड़ दिया था और यह नहीं लिखा कि वे लोग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में किस राह से पहुँचे या वह रास्ता किस प्रकार का था। खैर, हमारे पाठक महाशय ऐयारों के साथ कई दफा उस तिलिस्मी बाग में जायँगे इसलिए वहाँ के रास्ते का हाल उनसे छिपा न रह जायगा।
तिलिस्मी बाग का चौथा दर्जा अद्भुत और भयानक रस का खजाना था। वहाँ का पूरा हाल तो तब मालूम होगा जब तिलिस्म बखूबी टूट जायगा मगर जाहिरा हाल जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों ने वहाँ पहुँचने के साथ ही देखा, हम इस जगह लिख देते हैं।
उस हिस्से में फूल-फल और पत्तों की किस्म में से ऐसा कुछ विशेष न था जिससे हम उसे बाग कहते, हाँ चारों तरफ तरह-तरह की इमारतें जरूर बहुतायत से बनी हुई थीं जिनका हाल हम उस देवमन्दिर को मध्य मान कर लिखते हैं जिसमें इस समय हमारे दोनों कुमार और दोनों नेक दिल खैरख्वाह और मुहब्बत का नायाब नमूना दिखानेवाली नायिकाएँ तथा उनके साथी लोग विराज रहे हैं। जैसा कि नाम से समझा जाता है वह देवमन्दिर वास्तव में कोई मन्दिर या शिवालय नहीं था, वह केवल सुर्ख पत्थर का बना हुआ एक मकान था जिसमें दस हाथ की कुर्सी के ऊपर चालीस खम्भों का केवल एक अपूर्व कमरा था जिसके बीचोंबीच में दस हाथ के घेरे का एक गोल खम्भा था और उस पर तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। बस, इसके अतिरिक्त देवमन्दिर में और कोई बात न थी। उस देवमन्दिर वाले कमरे में जाने के लिए जाहिर में कोई रास्ता न था, इसके सिवाय एक बात यह और थी कि कमरा चारों तरफ से परदेनुमा ऊँची दीवारों से ऐसा घिरा हुआ था कि उसके अन्दर रहने वाले आदमियों को बाहर से कोई देख नहीं सकता था। उस देवमन्दिर के चारों तरफ थोड़ी-सी जमीन में बाग की पक्की क्यारियाँ बनी हुई थीं और उनमें तरह-तरह के पेड़ लगे हुए थे, मगर ये पेड़ भी सच्चे न थे, बल्कि एक प्रकार की धातु के बने थे और असली मालूम होने के लिए उन पर तरह-तरह के रंग चढ़े हुए थे, यदि इस खयाल से उसे हम बाग कहें तो हो सकता है और ताज्जुब नहीं कि इन्हीं पेड़ों की वजह से वह हिस्सा वाग के नाम से पुकारा भी जाता हो। उस नकली बाग में दो-दो आदमियों के बैठने लायक कई कुर्सियाँ भी जगह-जगह बनी हुई थीं।
उन क्यारियों के चारों तरफ छोटी-छोटी कई कोठरियाँ और मकान भी बने थे जिनका अलग-अलग हाल लिखना इस समय आवश्यक नहीं, मगर उन चार मकानों का हाल लिखे बिना काम न चलेगा जो कि देवमन्दिर या यों कहिए कि इस नकली बाग के चारों तरफ एक-दूसरे के मुकाबले में बने हुए थे और जिन चारों ही मकानों के बगल में एक-एक कोठरी और कोठरी से थोड़ी दूर के फासले पर एक-एक कुआँ भी बना हुआ था।
पूरब की तरफ वाले मकान के चारों तरफ पीतल की ऊँँची दीवार थी इसलिए उस मकान का केवल ऊपर वाला हिस्सा दिखाई देता था और कुछ मालूम नहीं होता था कि उसके अन्दर क्या है, हाँ छत के ऊपर एक लोहे का पतला महराबदार खम्भ निकला हुआ जरूर दिखाई दे रहा था जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँँ के अन्दर गया हुआ था। उस मकान के चारों तरफ जो पीतल की दीवार थी उसी में एक बन्द दरवाजा भी दिखाई देता था जिसके दोनों तरफ पीतल के दो-दो आदमी हाथ में नंगी तलवारें लिए खड़े थे।
पश्चिम तरफ वाले मकान के दरवाजे पर हड्डियों का एक बड़ा-सा ढेर था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी थी जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँँ के अन्दर गया था।
उत्तर तरफ वाला मकान गोलाकार स्याह पत्थरों का बना हुआ था और उसके चारों तरफ चखियाँँ और तरह-तरह के कल-पुर्जे लगे हुए थे। इसी मकान के पास वाले कुएँ के अन्दर मायारानी अपने पति का काम तमाम करने के लिए गई थी।
दक्खिन की तरफ वाले मकान के ऊपर चारों कोनों पर चार बुर्जियाँ थीं और उनके ऊपर लोहे का जाल पड़ा था। उन चारों बुर्जियों पर (जाल के अन्दर) चार मोर न मालूम किस चीज के बने हुए थे जो हर वक्त नाचा करते थे।
आज उसी देवमन्दिर के कमरे में दोनों कुमार, कमलिनी, लाड़िली और ऐयार लोग बैठे आपस में कुछ बातें कर रहे हैं। रिक्तगन्थ अर्थात् किसी के खून से लिखी हुई किताब कुँँअर इन्द्रजीतसिंह के हाथों में है और वह बड़े प्रेम से उसकी जिल्द को देख रहे हैं, मगर अभी तक उस किताब को पढ़ने की नौबत नहीं आई है। कमलिनी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रजीतसिंह को देख रही है और उसी तरह लाड़िली भी छिपी निगाहें कुँँअर आनन्दसिंह पर डाल रही है।
कमलिनी―(इन्द्रजीतसिंह से) अब आपको चाहिए कि जहाँ तक जल्द हो सके यह रिक्तगंथ पढ़ जायँ।
इन्द्रजीतसिंह―हाँ, मैं भी यही चाहता हूँ, परन्तु पहले उन कामों से छुट्टी पा लेनी चाहिए जिनके लिए तेजसिंह चाचा को और ऐयारों को हम लोग यहाँ तक साथ लाए हैं।
कमलिनी—मैं इन लोगों को केवल रास्ता दिखाने के लिए यहाँ तक लाई थी सो काम तो हो ही चुका, अब इन लोगों को यहाँ से जाना और कोई नया काम करना चाहिए और आपको भी रिक्तग्रंथ पढ़ने के बाद तिलिस्म तोड़ने में लग जाना चाहिए।
इन्द्रजीतसिंह―राजा गोपालसिंह ने कहा था कि किशोरी और कामिनी को छुड़ा कर जब हम आ जायँ तब तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाना। इसके अतिरिक्त तेजसिंह चाचा से मुझे राजा गोपालसिंह के छुड़ाने का हाल सुनना भी बाकी है।
तेजसिंह―उस बारे में कुछ हाल तो मैं आपसे कह भी चुका हूँ!
आनन्दसिंह―जी हाँ, आप वहाँ तक कह चुके हैं जब (कमलिनी की तरफ देख कर) ये चंडूल की सूरत बनाकर आपके पास आई थीं, मगर हमें यह न मालूम हुआ कि इन्होंने हरनामसिंह, बिंहारीसिंह और मायारानी के कान में क्या कहा जिसे सुन सभी की अवस्था बदल गई थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, शायद इन्होंने राजा गोपालसिंह के ही बारे में कोई इशारा किया होगा।
कमलिनी–जी हाँँ, यही बात है। राजा गोपालसिंह को कैद करने में हरनामसिंह और बिहारीसिंह ने भी मायारानी का साथ दिया था और धनपत इस काम की जड़ है।
इन्द्रजीतसिंह―(हँस कर) धनपत इस काम की जड़ है!
कमलिनी―जी हाँ, मैं बोलने में भूलती नहीं, धनपत वास्तव में औरत नहीं है बल्कि मर्द है। उसकी खूबसूरती ने मायारानी को फँसा लिया और उसी की मुहब्बत में पड़ कर उसने यह अनर्थ किया था। ईश्वर ने धनपत का चेहरा ऐसा बनाया है कि वह मुद्दत तक औरत बन कर रह सकता है। एक तो वह नाटा है। दूसरे अठारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी दाढ़ी-मूँँछ की निशानी नहीं आई। लेकिन जनानी सूरत होने पर भी उसमें ताकत बहुत है।
इन्द्रजीतसिंह―(ताज्जुब से) यह तो एक नई बात तुमने सुनाई। अच्छा तब?
लाड़िली―क्या धनपत मर्द है?
कमलिनी―हाँ, और यह हाल मायारानी, बिहारीसिंह और हरनामसिंह के सिवाय और किसी को मालूम नहीं है। कुछ दिन बाद मुझे मालूम हो गया था, मगर आज के पहले यह हाल मैंने भी किसी से नहीं कहा था। इसी तरह राजा गोपालसिंह का हाल भी उन चारों के सिवाय और कोई नहीं जानता था और जब कोई पाँँचवाँँ आदमी उस भेद को जानेगा तो बेशक हम चारों की जान जायगी और यही सबब उस समय उन लोगों की बदहवासी का था जब मैंने चंडूल बन कर उन तीनों के कानों में पते की बात कही थी, मगर उस समय इसके साथ-साथ ही मैंने यह भी कह दिया था कि राजा गोपालसिंह का हाल हजारों आदमी जान गए हैं और राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में भी यह बात मशहूर हो गई है।
आनन्दसिंह―ठीक है, मगर बिहारीसिंह ने मायारानी से यह हाल क्यों नहीं कहा?
कमलिनी―इसका एक खास सबब है।
इन्द्रजीतसिंह―वह क्या?
कमलिनी―बिहारी और हरनाम ने मायारानी के दो प्रेमी पात्रों का खून किया है जिसका हाल मायारानी को भी मालूम नहीं है, उसका भी इशारा मैंने उन दोनों के कानों में किया था।
इन्द्रजीतसिंह―(हँस कर) तुम्हारी बहिन बड़ी ही शैतान है! मगर देखना चाहिए तुम कैसी निकलती हो, खून का साथ देती हो या नहीं!
कमलिनी―(हाथ जोड़ कर) बस, माफ कीजिए, ऐसा कहना हम दोनों बहिनों (लाड़िली की तरफ इशारा करके) के लिए उचित नहीं! इसका एक सबब भी है।
इन्द्रजीतसिंह―वह क्या?
कमलिनी—मेरे पिता की दो शादियाँँ हुई थीं। मैं और लाड़िली एक माँ के पेट से हुईं और कम्बख्त मायारानी दूसरी माँ के पेट से, इसलिए हम दोनों का खून उसके संग नहीं मिल सकता।
इन्द्रजीतसिंह—(हँस कर) शुक्र है, खैर यह कहो कि चंडूल बनने के बाद तुमने क्या किया?
कमलिनी―चंडूल बनने के बाद मैंने नानक को बाग के बाहर कर दिया और तेजसिंह जी को राजा गोपालसिंह के पास ले जाकर दोनों की मुलाकात कराई, इसके बाद वहाँँ रहने का स्थान, राजा गोपालसिंह के छुड़ाने की तरकीब, और फिर उन्हें साथ लेकर बाग के बाहर हो जाने का रास्ता बताकर मैं तेजसिंह जी से बिदा हुई और आप लोगों को कैद से छुड़ाने का उद्योग करने लगी। इसके बाद जो कुछ हुआ आप जान ही चुके हैं। हाँ, राजा गोपालसिंह को छुड़ाने के समय तेजसिंहजी ने क्या-क्या किया सो आप इन्हीं से पूछिए।
अब पाठक समझ ही गये होंगे कि राजा गोपालसिंह को कैद से छुड़ाने वाले तेजसिंह थे और जब राजा गोपालसिंह को मारने के लिए मायारानी कैदखाने में गई थी तो तेजसिंह ही ने आवाज देकर उसे परेशान कर दिया था। दोनों कुमारों के पूछने पर तेजसिंह ने अपना पूरा-पूरा हाल बयान किया जिसे सुनकर कुमार बहुत प्रसन्न हुए।
ऐयारों को जो कुँँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ थे, बाग के चौथे दर्जे के देवमन्दिर में आने-जाने का रास्ता बताकर कमलिनी ने तेजसिंह को रोहतासगढ़ जाने के लिए कहा और बाकी ऐयारों को अलग-अलग काम सुपुर्द करके दूसरी तरफ बिदा किया।
इस बाग के चौथे दर्जे की इमारत का हाल हम ऊपर लिख आए हैं और यह भी लिख आये हैं कि वहाँ असली फूल-पत्तों का नाम-निशान भी न था। यहाँ की ऐसी अवस्था देखकर कुँँअर इन्द्रजीतसिंह ने कमलिनी से पूछा, “राजा गोपालसिंह ने कहा था कि ‘चौथे दर्जे में मेवे बहुतायत से हैं खाने-पीने की तकलीफ न होगी’, मगर यहाँ तो कुछ भी दिखाई नहीं देता! हम लोगों को यहाँ कई दिनों तक रहना होगा, कैसे काम चलेगा?” इसके जवाब में कमलिनी ने कहा, “आपका कहना ठीक है और राजा गोपालसिंह ने भी गलत नहीं कहा। यहाँ मेवों के पेड़ नहीं हैं मगर (हाथ का इशारा करके) उस तरफ थोड़ी-सी जमीन मजबूत चहारदीवारी से घिरी हुई है जिसे आप मेवों का बाग कह सकते हैं। उसको कोई सींचता या दुरुस्त नहीं करता है, बाहर से एक नहर दीवार तोड़ कर उसके अन्दर पहुँँचाई गई है और उसी की तरावट से वह बाग सूखने नहीं पाता। कई पेड़ पुराने होकर मर जाते है और कई नये पैदा होते रहते हैं। इस तिलिस्मी बाग का राजा दस-पन्द्रह वर्ष पीछे कभी उसकी सफाई करा दिया करता है। मैं वहाँ जाने का रास्ता आपको बता दूँँगी!”
ऐयारों को बिदा करने के बाद ही कमलिनी भी लाड़िली को लेकर दोनों कुमारों से यह कह कर बिदा हुई—“कई जरूरी कामों को पूरा करने के लिए मैं जाती हूँ, परसों यहाँ आऊँगी।”
तीन दिन तक कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह देवमन्दिर में रहे। जब आवश्यकता होती मेवों वाले बाग में चले जाते और पेट भर कर फिर उस देवमन्दिर में चले आते। इस बीच में दोनों भाइयों ने मिल कर 'रिक्तगंथ' (खून से लिखी किताब) भी पढ़ डाली, मगर रिक्तगंथ में जो भी बातें लिखी थीं, वे सब-की-सब बखूबी समझ में न आई क्योंकि उसमें बहुत से शब्द इशारे के तौर पर लिखे थे जिनका भेद जाने बिना असल बात का पता लगाना बहुत ही कठिन था, तथापि तिलिस्म के कई भेदों और रास्तों का पता उन दोनों को मालूम हो गया और बाकी के विषय में निश्चय किया कि कमलिनी से मुलाकात होने पर उन शब्दों का अर्थ पूछेंगे जिनके जाने बिना कोई काम नहीं चलता।
यद्यपि कुँअर इन्द्रजीतसिंह किशोरी के लिए और आनन्दसिंह कामिनी के लिए बेचैन हो रहे थे, मगर कमलिनी और लाड़िली की भोली सूरत के साथ-साथ उनके अहसानों ने भी दोनों कुमारों के दिलों को पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया था फिर भी किशोरी और कामिनी की मुहब्बत के खयाल से दोनों कुमार अपने दिलों को कोशिश के साथ दबाए जाते थे।
दोनों कुमारों को देवमन्दिर में टिके हुए आज तीसरा दिन है। ओढ़ने और बिछाने का कोई सामान न होने पर भी उन दोनों को किसी तरह की तकलीफ नहीं मालूम होती। रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। तिलिस्मी बाग के दूसरे दर्जे से होती और वहाँ के खुशबूदार फूलों से बसी हुई मन्द चलने वाली हवा ने नर्म थपकियाँ लगा-लगाकर दोनों नौजवान, सुन्दर और सुकुमार कुमारों को सुला दिया है। ताज्जुब नहीं कि दिन-रात ध्यान बने रहने के कारण दोनों कुमार इस समय स्वप्न में भी अपनी-अपनी माशूकाओं से लाड़-प्यार की बातें कर रहे हों, और उन्हें इस बात का गुमान भी न हो कि पलक उठते ही रंग बदल जायगा और नर्म कलाइयों का आनन्द लेने वाला हाथ सिर तक पहुँचने का उद्योग करेगा।
यकायक घड़घड़ाहट की आवाज ने दोनों को जगा दिया। वे चौंक कर उठ बैठे और ताज्जुब भरी निगाहों से चारों तरफ देखने और सोचने लगे कि यह आवाज कहाँ से आ रही है। ज्यादा ध्यान देने पर भी यह निश्चय न हो सका कि आवाज किस चीज की है, हाँ, इतनी बात मालूम हो गई कि देवमन्दिर के पूरब तरफ वाले मकान के अन्दर से यह आवाज आ रही है। दोनों राजकुमारों को देवमन्दिर से नीचे उतर कर उस मकान के पास जाना उचित न मालूम न हुआ, इसलिए वे देवमन्दिर की छत पर चढ़ गये और गौर से उस तरफ देखने लगे।
आधे घंटे तक वह आवाज एक रंग से बराबर आती रही और इसके बाद धीरे-धीरे कम होकर बन्द हो गई। उस समय दरवाजा खोलकर अन्दर से आता हुआ एक आदमी उन्हें दिखाई पड़ा। वह आदमी धीरे-धीरे देवमन्दिर के पास आया और थोड़ी देर तक खड़ा रहकर उस कुएँ की तरफ लौटा जो पूरव की तरफ वाले मकान के साथ और उससे थोड़ी ही दूर पर था। कुएँ के पास पहुँचकर थोड़ी देर तक वहाँ भी खड़ा रहा और फिर आगे बढ़ा, यहाँ तक कि घूमता-फिरता छोटे-छोटे मकानों की आड़ में जाकर वह न जाने कहाँ नज़रों से ओझल हो गया और इसके थोड़ी ही देर बाद उस तरफ एक कमसिन औरत के रोने की आवाज आई।
इन्द्रजीतसिंह―जिस तौर से यह आदमी इस चौथे दर्जे में आया है, वह बेशक ताज्जुब की बात है।
आनन्दसिंह―तिस पर इस रोने की आवाज ने और भी ताज्जुब में डाल दिया है। मुझे आज्ञा हो तो जाकर देखूँँ कि क्या मामला है?
इन्द्रजीतसिंह―जाने में कोई हर्ज नहीं है, मगर...खैर, तुम इसी जगह ठहरो, मैं जाता हूँ।
आनन्दसिंह―यदि ऐसा ही है तो चलिये हम दोनों आदमी चलें।
इन्द्रजीतसिंह―नहीं, एक आदमी का यहाँ रहना बहुत जरूरी है। खैर, तुम ही जाओ, कोई हर्ज नहीं, मगर तलवार लेते जाओ।
दोनों भाई छत के नीचे उतर आये। आनन्दसिंह ने खूँँटी से लटकती हुई अपनी तलवार ले ली और कमरे के बीचोंबीच वाले गोल खम्भे के पास पहुँँचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि उस खम्भे में तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। आनन्दसिंह ने एक मूरत पर हाथ रख कर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखाई दी। छोटे कुमार उसी खिड़की की राह उस गोल खम्भे के अन्दर घुस गये, और थोड़ी ही देर बाद उस नकली बाग में दिखाई देने लगे। खम्भे के अन्दर रास्ता कैसा था और वह नकली बाग के पास क्योंकर पहुँँचे, इसका हाल आगे चलकर दूसरी दफे किसी और के आने या जाने के समय बयान करेंगे, यहाँ मुख्तसिर ही में लिखकर मतलब पूरा करते हैं।
आनन्दसिंह भी उस तरफ गये, जिधर वह आदमी गया था या जिधर से किसी औरत के रोने की आवाज आई थी। घूमते-फिरते एक छोटे मकान के आगे पहुँँचे जिस का दरवाजा खुला हुआ था। वहाँ औरत तो कोई दिखाई न दी, मगर उस आदमी को दरवाजे पर खड़े हुए जरूर पाया।
आनन्दसिंह को देखते ही वह आदमी झट मकान के अन्दर घुस गया और कुमार भी तेजी के साथ उसका पीछा किए बेखौफ मकान के अन्दर चले गये। वह मकान दो मंजिल का था, उसके अन्दर छोटी-छोटी कई कोठरियाँ थीं और हर एक कोठरी में दो-दो दरवाजे थे, जिससे आदमी एक कोठरी के अन्दर जाकर कुल कोठरियों की सैर कर सकता था।
यद्यपि कुमार तेजी के साथ पीछा किए हुए चले गये, मगर वह आदमी एक कोठरी के अन्दर जाने के बाद कई कोठरियों में घूम-फिर कर कहीं गायब हो गया। रात का समय था और मकान के अन्दर तथा कोठरियों में बिल्कुल अन्धकार छाया हुआ था, ऐसी अवस्था में कोठरियों के अन्दर घूम-घूम कर उस आदमी का पता लगाना बहुत ही मुश्किल था, दूसरे, इसका भी शक था कि वह कहीं हमारा दुश्मन न हो, लाचार होकर कुमार वहाँ से लौटे, मगर मकान के बाहर न निकल सके, क्योंकि वह दरवाजा बन्द हो गया था जिसकी राह से कुमार मकान अन्दर घुसे थे। कुमार ने दरवाजा उतारने का भी उद्योग किया मगर उसकी मजबूती के आगे कुछ बस न चला। आखिर दुखी होकर फिर मकान के अन्दर घुसे और एक कोठरी के दरवाजे पर जाकर खड़े हो गये। थोड़ी देर के बाद ऊपर की छत पर से फिर किसी औरत के रोने की आवाज आई, गौर करने से कुमार को मालूम हुआ कि यह बेशक उसी औरत की आवाज है जिसे सुनकर यहाँ तक आए थे। उस आवाज की सीध पर कुमार ने ऊपर की दूसरी मंजिल पर जाने का इरादा किया, मगर सीढ़ियों का पता न लगा।
इस समय कुमार का दिल कैसा बेचैन था, यह वही जानते होंगे। हमारे पाठकों में भी जो दिलेर और बहादुर होंगे, वह उनके दिल की हालत कुछ समझ सकेंगे। बेचारे आनन्दसिंह हर तरह से उद्योग करके रह गए, पर कुछ भी न बन पड़ा। न तो वे उस आदमी का पता लगा सकते थे, जिसके पीछे-पीछे मकान के अन्दर घुसे थे, न उस औरत का हाल मालूम कर सकते थे, जिसके रोने की आवाज से दिल बेताब हो रहा था, और न उस मकान ही से बाहर होकर अपने भाई इन्द्रजीतसिंह को इन सब बातों की खबर कर सकते थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि सिवाय चुपचाप खड़े रहने या बैठ जाने के और कुछ भी नहीं कर सकते थे।
जो कुछ रात थी खड़े-खड़े बीत गई। सुबह की सुफेदी ने जिधर से रास्ता पाया मकान के अन्दर घुसकर उजाला कर दिया, जिससे कुंअर आनन्दसिंह को वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यकायक पीछे की तरफ से दरवाजा खुलने की आवाज कुमार के कान में पड़ी। कुमार ने घूमकर देखा तो एक कोठरी का दरवाजा, जो इसके पहले बन्द था, खुला हुआ पाया। वे बेधड़क उसके अन्दर घुस गए और वहां ऊपर की तरफ गई हुई छोटी-छोटी खूबसूरत सीढ़ियाँ देखीं। धडधडाते हए दूसरी मंजिल पर चढ़ गए और हर तरफ गौर करके देखने लगे। इस मंजिल में बारह कोठरियाँ एक ही रंग-ढंग की देखने में आईं। हर एक कोठरी में दो दरवाजे थे। एक दरवाजा कोठरी के अन्दर घुसने के लिए और दूसरा अन्दर की तरफ से दूसरी कोठरी में जाने के लिए था। इस तरह पर किसी एक कोठरी के अन्दर घुसकर कुल कोठरियों में आदमी घूम आ सकता था। धीरे-धीरे अच्छी तरह उजाला हो गया और वहां की हर एक चीज बखूबी देखने का मौका कुमार को मिला। छोटे कुमार एक कोठरी के अन्दर घुसे और देखा कि वहां सिवाय एक चबूतरे के और कुछ भी नहीं है। यह चबूतरा स्याह पत्थर का बना हआ था और उसके ऊपर एक कमान और पाँच तीर रखे हए थे। कूमार ने तीर और कमान पर हाथ रखा, मालूम हुआ कि सब पत्थर का बना हआ है और किसी काम में आने योग्य नहीं है। दूसरे दरवाजे से दूसरी कोठरी में घुसे तो वहाँ एक लाश पड़ी देखी जिसका कटा हुआ सिर पास ही पड़ा हुआ था और वह लाश भी पत्थर ही की थी। उसे अच्छी तरह देखभाल कर तीसरी कोठरी में पहुँचे।
इसके चारों तरफ दीवार में कई खूटियाँ थीं और हर एक खंटी से एक-एक नंगी तलवार लटक रही थी। ये तलवारें नकली न थीं, बल्कि असली लोहे की थीं मगर हर एक पर जंग चढा हआ था। जब चौथा कोठरी में पहुंचे तो वहाँ चाँदी के सिंहासन पर बैठी हई एक मूरत दिखाई पड़ी। वह मूरत किसी प्रकार की धातु की बहुत ही खूबसूरत और ठीक-ठीक बनी हई थी, जिसे देखने के साथ ही कुमार ने पहचान लिया कि यह मायारानी की छोटी बहन लाडिला का मूरत है। कुमार मुहब्बत भरी निगाहें उस मूरत पर डालने लगे। निराली जगह अपन माशूक को देखने का उन्हें अच्छा मौका मिला, यदापि वर माशक असली नहीं, बल्कि कवल उसका एक छवि मात्र थी तथापि इस सबब से कि यहां पर कोई ऐसा आदमी न था जिसका लिहाज या खयाल होता, उन्हें एक निराले ढंग की खुशी हुई और वे देर तक उसक हर एक अंग की खूबसूरती को देखते रहे। इसी बीच बगल वाली कोठरी में से यकायक एक, एक खटके की आवाज आई। कुमार चौंकपड़े और यह सोचते हुए उस कोठारी का तरफ बढ़े कि शायद वर आदमी उसमें मिले जिसके पीछे-पीछे इस मकान के अन्दर आए हैं, मगर इस कोठरी में भी किसी की सूरत दिखाई न दी।
इस कोठरी में, जिसमें कुमार पहुँचे हैं, चाँदी का का केवल एक सन्दूक था, जिसके बीच में हाथ डालने के लायक एक छेद भी बना हुआ था हुआ था और छेद के ऊपर सुनहले हर्को में यह लिखा हुआ था-"इस छेद में हाथ डाल के देखो, क्या अनूठी चीज है।"
कुँवर आनन्दसिंह ने बिना सोचे-विचारे उस छेद में हाथ डाल दिया, मगर फिर हा निकाल न सके। सन्दूक के अन्दर हाथ जाते ही मानो लोहे की हथकड़ी पड़ गई जो किसी तरह हाथ बाहर निकालने की इजाजत नहीं देती थी। कुमार ने झक कर सन्दूक नीचे की तरफ देखा तो मालूम हुआ कि सन्दूक जमीन से अलग नहीं है और इसलिए उसे किसी तरह खिसका भी नहीं सकते थे।
३
कुँवर आनन्दसिंह के जाने के बाद इन्द्रजीतसिंह देर तक उनके आने की राह देखते रहे। जैसे-जैसे देर होती थी, जी बेचैन होता जाता था। यहाँ तक कि तमाम बीत गई, सवेरा हो गया, और पूरब तरफ से सूर्य भगवान दर्शन देकर धीरे-धीरे आसमान पर चढ़ने लगे। जब पहर भर से ज्यादा दिन चढ़ गया, तब इन्द्रजीतसिंह नदी बेताब हुए और उन्हें निश्चय हो गया कि आनन्दसिंह जरूर किसी आफत में फंस गये।
कुँवर इन्द्रजीतसिंह सोच ही रहे थे कि स्वयं चल के आनन्दसिंह का पता लगाना कि इतने ही में लाड़िली को साथ लिए हुए कमलिनी वहाँ आ पहुँची। इन्हें देख की बेचैनी कुछ कम हुई और आशा की सूरत दिखाई देने लगी। कमलिनी ने जब कुमार को उस जगह अकेले और उदास देखा तो उसे ताज्जुब हुआ, मगर वह बुध्दिमान औरत तुरत ही समझ गई कि इनके छोटे भाई आनन्दसिंह इनके साथ नहीं दिखाई देते जरूर वे किसी मुसीबत में पड़ गए हैं, और ऐसा होना कोई ताज्जुब की बात क्योंकि यह तिलिस्म का मौका है, और यहाँ का रहने वाला थोड़ी भूल में तकलीफ उठा सकता है।
कमलिनी ने कुँवर इन्द्रजीतसिंह से उदासी का कारण और कुंअर आनन्दसिंह के का सबब पूछा, जिसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने जो कुछ हुआ था, बयान करके कहा कि "आनन्द को गए हुए नौ घंटे के लगभग हो गये।"
समय कोई लाड़िली की सूरत गौर से देखता तो बेशक समझ जाता कि आनन्दसिंह का हाल सुनकर उसको हद से ज्यादा रंज हुआ है। ताज्जुब नहीं कि कम और इन्द्रजीतसिंह भी उसके दिल की हालत जान गये हों, क्योंकि वह अपनी आंखों को डबडबाने और आंसू के निकलने को बड़े परिश्रमपूर्वक रोक रही थी। यद्यपि उसे निश्चय था कि दोनों कुमार इस तिलिस्म को अवश्य तोड़ेंगे, तथापि उसका दिल दख गया था। कौन ऐसा है जो अपने प्यारे पर आई हुई मुसीबत का हाल सुनकर बेचैन न हो?
कमलिनी-(सब बातें सुनकर) किसी का आना ताज्जुब नहीं है, हाँ, किसी औरत का आना बेशक ताज्जुब है, क्योंकि (इन्द्रजीतसिंह की तरफ इशारा करके) आप कहते हैं कि एक औरत के रोने की आवाज आई थी।
लाड़ली-ठीक है, जहाँ तक मैं समझती हूँ सिवाय तुम्हारे, मायारानी के और मेरे किसी चौथी औरत को यहां आने का रास्ता मालूम नहीं है, हाँ, मर्दो में कई जरूर ऐसे हैं, जो यहाँ आ सकते हैं।
कमलिनी-मगर इस देवमन्दिर के अन्दर हम लोगों के अतिरिक्त राजा गोपालसिंह के सिवाय और कोई भी नहीं आ सकता। खैर, इन सब बातों को जाने दो, अब यहाँ से चलकर कुँवर साहब का पता लगाना बहुत जरूरी है। यद्यपि यहाँ किसी दुश्मन का आना बहुत कठिन है, तथापि खुटका लगा ही रहता है। जब दोनों कुमारों को मायारानी के कैदखाने से छुड़ाकर हम लोग सुरंग ही सुरंग तिलिस्मी बाग से बाहर हो रहे थे, तो उस हरामजादे के आ पहुँचने की कौन उम्मीद थी, जिसने कुमार को जख्मी किया था! इसी तरह कौन ठिकाना यहाँ भी कोई दुष्ट आ पहुँचा हो!
आखिर कुँवर आनन्दसिंह को खोजने के लिए तीनों वहाँ से रवाना हुए और देवमन्दिर के नीचे उतर उसी तरफ चले जिधर आनन्दसिंह गये थे। जब एक मकान के दरवाजे पर पहुँचे तो कमलिनी रुकी और बड़े गौर से उस दरवाजे को जो बन्द था, देखने लगी। इसके बाद फिर आगे बढ़ी, दूसरे मकान के दरवाजे पर पहुँच कर उसे भी गौर से देखा और सिर हिलाती हुई फिर आगे बढ़ी। इसी तरह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और लाड़िली को साथ लिए हए, कमलिनी सात-आठ मकानों के दरवाजे पर गई। हर एक मकान का दरवाजा बन्द था और हर एक दरवाजे को कमलिनी ने गौर से देखा लेकिन कुछ काम न चला, मगर जब उस मकान के दरवाजे पर पहुँची, जिसमें कुँवर आनन्दसिंह गये थे तो रुककर मामूली तौर पर उसके दरवाजे को भी बड़े गौर से देखने लगी और थोड़ी ही देर में बोल उठी, "वेशक कुँवर आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं। (उँगली से दरवाजे के ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) देखिये, यह स्याह पत्थर की तीन खूटियाँ नीचे की तरफ झुक गई हैं।"
कुमार-इन खूटियों से क्या मतलब है?
कमलिनी-इस मकान के अन्दर जितने आदमी जायेंगे, उतनी खूटियाँ नीचे की तरफ झुक जायँगी।
कुमार-(ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) ऊपर कुल बारह खूटियाँ हैं, मान लिया जाय कि बारहों खंटियाँ उस समय झुक जायेंगी, जब बारह आदमी इस मकान के अन्दर जा पहुँचेंगे, मगर जब बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जायेंगे, तब क्या होगा?
कमलिनी-बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जा ही नहीं सकते! तिलिस्मी बातों में किसी की जबर्दस्ती नहीं चल सकती।
कुमार-ठीक है, मगर तुमने यह कैसे जाना कि आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं?
कमलिनी–सिर्फ अन्दाज से समझती हूँ कि आनन्दसिंह इसी मकान में होंगे, क्योंकि इस बाग में एक आदमी का का आना आपने बयान किया था, इसके बाद कहा था किसी औरत के रोने की आवाज आई थी, दो हो तो चुके, तीसरे आनन्दसिंह भी पीछा किये हुए इधर ही आये हैं और इस तरह इस मकान के अन्दर तीन आदमियों का होना साबित होता है। इन्हीं सब बातों से मुझे विश्वास होता है कि वे ही तीन आदमी इस मकान के अन्दर हैं।
कुमार—तुम्हारा सोचना बहुत ठीक है, मगर जहाँ तक जल्द हो सके, इस बात का निश्चय करके आनन्द को छुड़ाना चाहिए, न मालूम वह किस आफत में फंस गया है।
कमलिनी–देखिये, मैं बहुत जल्द इसका बन्दोबस्त करती हूँ।
इसके बाद कमलिनी ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "इस मकान का दरवाजा खोलना तो जरा मुश्किल है, मगर चौखट के ऊपर जो बारह खूटियाँ हैं उनमें से तीन नीचे की तरफ झुक गई हैं, और बाकी नौ ऊपर की तरफ उठी हुई हैं, उनमें से किसी एक को आप उछल कर थाम लीजिए और जोर करके नीचे की तरफ झुकाइए, देखिये, क्या होता है।" कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछल कर एक खूटी को थाम लिया और झटका देकर उसे नीचे की तरफ झुकाया तथा जब वह नीचे को झुक गई तो उसे छोड़कर अलग हो गये। यकायक मकान के अन्दर से इस तरह की आवाज आने लगी, जैसे बड़े-बड़े कल पुर्जे और चरखे घूमते हों, या कई गाड़ियाँ मकान के अन्दर दौड़ रही हों। तीनों आदमी दरवाजे से हटकर खड़े हो गये और राह देखने लगे कि अब क्या होता है।
थोड़ी ही देर बाद मकान की छत पर से एक आवाज आई-"इधर देखो" जिसे सुनते ही तीनों आदमी चौंके और ऊपर की तरफ देखने लगे। एक आदमी, जो अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए था, छत से नीचे की तरफ झाँकता हुआ दिखाई दिया। उसने कमलिनी, लाड़िली और कुँवर इन्द्रजीतसिंह को अपनी तरफ देखते देख एक लपेटा हुआ कागज नीचे गिरा दिया, जिसे झट कमलिनी ने उठा लिया और बढ़कर कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "बस अब जिस तरह हो सके आप इस खूटी को, जिसे झुकाया है, ज्यों-की-त्यों सीधी कर दीजिए।"
इन्द्रजीतसिंह-आखिर इसका क्या सबब है? इस पुर्जे में क्या लिखा हुआ है?
कमलिनी-पहले आप उसे कीजिए, जो मैं कह चुकी हूँ। देर करने में हमारा ही हर्ज होगा।
लाचार कुँवर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछलकर नीचे की तरफ से एक झटका ऐसा दिया कि वह खूटी सीधी हो गई और इसके साथ ही मकान के अन्दर सन्नाटा छा गया, अर्थात् वह जोर-शोर की आवाज, जो खूटी झुकने के साथ ही आने लगी थी, एकदम बन्द हो गई। इसके बाद कमलिनी ने वह कागज का पुर्जा जो मकान की छत पर से गिराया गया था, कुमार के हाथ में दे दिया। कुमार ने उसे देखा, यह लिखा हुआ था-1 · 2 · 3 · 4 · 5 · 6 / एच · मेमचे · काटनो · केआरेयाँ · डेह · नेपो / 7 · 8 · 9 · 10 · 11 · 12 / किमटू · च्वाला · मेम · कुम · नीपो · इच्चो / 13 · लव / 14 · कचीचा / 15 · टेप
इस चिट्ठी का मतलब तो कुमार तुरत समझ गए, क्योंकि यह ऐयारी भाषा में लिखी हुई थी और कुमार ऐयारी भाषा बखूबी जानते थे, मगर यह उनकी समझ में न आया कि चिट्ठी लिखने वाला कौन है, क्योंकि उसने अपना नाम टेप लिखा था। कुमार ने कमलिनी से 'टेप' का अर्थ पूछा, जिसके जवाब में उसने कहा, "थोड़ी देर सब्र कीजिए, आप-से-आप उस आदमी का पता लग जायगा।" कुमार चुप हो रहे और दरवाजे की तरफ देखने लगे। हमारे पाठक महाशय ऐयारी भाषा शायद न जानते होंगे, अस्तु उन्हें समझाने के लिए उस चिट्ठी का अर्थ हम नीच लिखे देते हैं––
1 · 2 · 3 · 4 · 5 · 6 / यहाँ · मैं हूँ · डरो मत · कुमार को · तकलीफ · न होगी / 7 · 8 · 9 · 10 · 11 · 12 / थोड़ी देर · सब्र करो · मैं · स्वयं · नीचे · आता हूँ / 13 · वही / 14 · दिलजला / 15 · टेप
४
मायारानी आज यह विचार कर बहुत खुश है कि आधी रात के समय कमलिनी इस बाग में आयेगी और मैं उसे अवश्य गिरफ्तार करूँगी, मगर इस बात को जानने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा कि उसके सोने वाले कमरे में रात को कौन आया था। वह चारों तरफ खयाल दौड़ाती थी, मगर कुछ समझ में न आता था और आखिर दिल में यही कहती थी कि आने वाला चाहे कोई हो, मगर काम कमलिनी ही का है। आज अगर कमलिनी गिरफ्तार हो जायगी तो सब टण्टा मिट जायगा। जितनी बेफिक्री राजा गोपालसिंह के मरने से मिली है, उतनी ही कमलिनी के भी मारने से मिलेगी, क्योंकि उसके मरने के बाद मेरे साथ दुश्मनी करने का साहस फिर कोई भी नहीं कर सकता।
आधी रात जाने के पहले ही मायारानी धनपत को साथ लिए हुए उस दरवाजे के पास आ पहुँची जिधर से कमलिनी के आने की खबर सुनी थी। मायारानी के कहे मताबिक पहरा देने वाली कई औरतें भी नंगी तलवारें लिए उस चोर दरवाजे के पास पहुँच कर इधर-उधर पेड़ों और झाड़ियों की आड़ में दुबक रही थीं और धनपत भी उस चोरदरवाजे के बगल ही में एक झाड़ी के अन्दर घुस गई थी। मायारानी अपने को हर बला से बचाये रहने की नीयत से कुछ दूर पर छिप कर बैठ रही।
अब वह समय आ गया कि चोर-दरवाजे की राह से कमलिनी बाग के अन्दर आवे, इसलिए धनपत अपने छिपे रहने वाले स्थान से उठ कर चोर दरवाजे के पास आई और यह विचार कर बैठ गई कि बाहर से कोई आदमी दरवाजा खोलने का इशारा करे तो मैं झट से दरवाजा खोल दूं। इस समय धनपत अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए थी और हाथ में खंजर लिए मौका पड़ने पर लड़ने के लिए भी तैयार थी। थोड़ी देर के बाद बाहर से किसी ने चोरदरवाजे पर थपकी मारी। धनपत खुश होकर उठी और झट से दरवाजा खोल कर एक किनारे हो गई। दो आदमी बाग के अन्दर दाखिल हुए। इन दोनों ही का बदन स्याह कपड़ों से ढंका हुआ था और दोनों ही के चेहरों पर नकाब पड़ी हुई थी जिससे रात के समय यह जानना बहुत ही कठिन था कि ये औरतें हैं या मर्द, हाँ लिए उस पर मर्द होने का गुमान हो सकता था।
जब दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर आ गए तो धनपत ने चोर-दरवाजा बन्द कर दिया और उन दोनों को अपने पीछे-पीछे आने का इशारा किया। मालूम होता था कि वे दोनों नकाबपोश बेफिक्र हैं और उन्हें इस बात की जरा भी खबर नहीं कि यहां का रंग बदला हुआ है। उन दोनों को साथ लिए धनपत जब उस जगह पहुंची जहाँ पहरा देने वाली लौंडियाँ नंगी तलवारें लिए हुए छिपी हुई थीं, तो खड़ी हो गई और उन दोनों की तरफ देख कर बोली, "आपकी आज्ञानुसार मैंने अपना काम पूरा कर दिया अब मुझे इनाम मिलना चाहिए!" इसके जवाब में उस नकाबपोश ने, जिसका कद बनिस्बत दूसरे के छोटा था, जवाब दिया, "धनपत को जो मर्द होकर औरत की सूरत में मायारानी के साथ रहता है, किसी से इनाम लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वयं मालदार है, मगर मैं समझता हूँ कि कम्बख्त मायारानी भी लोगों को गिरफ्तार करने की नीयत से इसी जगह आकर कहीं छिपी होगी, उसे जल्द बुला, क्योंकि खास उसी को इनाम देने के लिए हम लोग यहाँ आये हैं।"
धनपत वास्तव में मर्द था, मगर यह हाल किसी को मालूम न था, इसलिए हम भी उसे अभी तक औरत ही लिखते चले आए मगर अब पूरी तरह से निश्चय हो गया कि वह मर्द है और हमारे पाठकों को भी यह बात मालूम हो गई इसलिए अब हम उसके लिए उन्हीं शब्दों का बर्ताव करेंगे, जो मर्दो के लिए उचित हैं।
उस आदमी की बात सुन कर धनपत परेशान हो गया, उसे यह फिक्र पैदा हुई कि अब हमारा भेद खुल गया और इसलिए जान बचना मुश्किल है। केवल धनपत ही नहीं बल्कि मायारानी और उन लौंडियों ने भी उस आदमी की बातें सुन ली जो उसी के आसपास पेड़ों के नीचे छिपी हुई थीं। मायारानी के दिल में भी तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं। उसने पहचानने की नीयत से उस नकाबपोश की आवाज पर ध्यान दिया, मगर कुछ काम न चला क्योंकि उसकी आवाज फंसी हुई थी और इस समय हर एक आदमी जो उसकी बात सुनता कह सकता था कि वह अपनी आवाज को बिगाड़ कर बातें कर रहा है।
धनपत यद्यपि इस फिक्र में था कि दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करना चाहिए मगर इस नकाबपोश की गहरी और भेद से भरी हुई बात ने उसका कलेजा यहाँ तक दहला दिया कि उसके लिए बात का जवाब देना भी कठिन हो गया, मगर वे लौंडियाँ जो उस जगह छिपी हुई थीं चारों तरफ से आकर जरूर वहाँ जुट गईं और उन्होंने दोनों नकाबपोशों को घेर लिया। धनपत सोच रहा था कि मायारानी भी इसी जगह आ पहुँचेगी लेकिन यह आशा उसकी वृथा ही हुई, क्योंकि उस नकाबपोश की आवाज का सबसे ज्यादा असर मायारानी पर ही हुआ। वह घबरा कर वहाँ से भागी और अपने दवानखाने में जाकर बैठ रही, जहाँ कई लौंडियां पहरा दे रही थीं। आते ही उसने एक लौंडी की जुबानी अपने सिपाहियों को जो बाग के पहले दर्जे में रहा में रहा करते थे, कहला भेजा कि 'खास बाग में फलां जगह पर दो दुश्मन घुस आये हैं, उन्हें जाकर फौरन गिरफ्तार करो और उनका सिर काट कर मेरे पास भेजो।" इधर धनपत ने देखा कि बहुत-सी लौंडियाँ हमारी मदद पर आ पहुंची हैं तो उसे भी कुछ हिम्मत हुई और वह उस नकाबपोश की तरफ देख कर बोला
धनपत-तुम लोग यहाँ किस काम के लिए आये हो?
नकाब–इसका जवाब हम तुझ कम्बख्त को क्यों दें? धनपत-मालम होता है कि मौत तम दोनों को यहाँ तक खींच लाई है।
नकाब-(हँस कर) हाँ, मैं भी यही समझता हूँ कि तेरी मौत हम दोनों को यहाँ तक खींच लाई है।
इतना सुनते ही धनपत ने नकाबपोश पर खंजर का वार किया। मगर उसने फुर्ती से पैतरा बदल कर वार खाली कर दिया, मगर दूसरे नकाबपोश ने चालाकी से धनपत के पीछे जाकर एक लात उसकी कमर में ऐसे जोर से मारी कि वह औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा। मगर तुरन्त ही सम्हल कर उठ बैठा और दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए लौंडियों को ललकारा। लौंडियां दोनों नकाबपोशों की अवस्था देख परेशान हो रही थीं। एक तो उन्हें विश्वास हो गया कि ये दोनों नकाबपोश मर्द हैं, दूसरे धनपत की ताकत पर उन सभी को बहुत-कुछ भरोसा था सो उसकी भी दुर्दशा आँखों के सामने देखने में आई। तीसरे, नकाबपोश की जुबानी यह सुनकर कि धनपत मर्द है और उसके जवाब में धनपत को चुप पाकर लौंडियों का खयाल बिल्कुल ही बदल गया था, तिस पर भी, वे सब दोनों नकाबपोशों को घेर कर खड़ी हो गई। धनपत ने फिर ललकार कर कहा, "देखो, ये दोनों चोर हैं, भागने न पावें।"
लम्बे नकाबपोश ने लपक कर बहादुरी के साथ धनपत की दाहिनी कलाई जिसमें खंजर था, पकड़ ली और कहा, "हम लोग भागने के लिए नहीं आये हैं, बल्कि गिरफ्तार होकर एक अनूठा तमाशा दिखाने के लिए आये हैं। मगर तुमको भाग जाने का मौका न देंगे। (लौंडियों की तरफ देख कर) हम लोग स्वयं यहाँ से टलने वाले नहीं हैं और जहाँ कहो चलने के लिए तैयार हैं।"
धनपत को मालूम हो गया कि ये दोनों नकाबपोश कोई साधारण आदमी नहीं हैं और इनके सामने ताकत का घमंड करना वृथा है। वह सोचने लगा--"अफसोस, अब भारी मुसीबत का सामना हुआ चाहता है।"
इतने ही में 'चोर-चोर' का गुल मचा और कई मशालों की रोशनी दिखाई दी। यह रोशनी उन सिपाहियों के साथ थी जो बाग के पहले दर्जे में रहने वाले सिपाहियों में से थे और इस समय वे सब मायारानी की आज्ञानुसार दोनों चोरों को अर्थात् इन नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए यहाँ आये थे। बात की बात में वे सब वहाँ पहुंच गये और उन्होंने देखा कि लौंडियों के घेरे में दो नकाबपोश छाती ऊँची किये खड़े हैं और उनमें से एक धनपत की कलाई पकड़े हुए है।
इसके पहले कि सिपाहियों को दोनों नकाबपोशों के साथ किसी तरह के बर्ताव की नौबत आवे, छोटे नकाबपोश ने ऊंची आवाज में ललकार कर कहा, "भाइयो, तुम लोग यह न समझो कि हम लोग भाग जायेंगे, मैं भागने के लिए नही आया हूँ, मैं तुम लोगों का दुश्मन नहीं हूँ और न तुम लोगों के दुश्मनों का साथी हूँ, बल्कि तुम्हारा सच्चा दोस्त और खैरखाह हूँ। जिस समय सूर्य भगवान के दर्शन होंगे और मैं अपने चेहरे पर से नकाब उठाऊँगा, तुम लोगों को मालूम हो जायगा कि मैं तुम्हारा पुराना साथी हूँ। इस समय मैं तुम लोगों की वह बेवकूफी जाहिर करने आया हूँ, जिसे तुम लोग खुद नहीं जानते हो। हाय, तुम्हारे प्यारे मालिक राजा गोपालसिंह के गले पर छुरी फिर जाय और तुम लोगों को खबर तक न हो? इससे भी बढ़ कर अफसोस की बात तो यह है कि राजा गोपालसिंह को मारने वाला, उनकी उम्मीदों का खून करने वाला, उनकी रिआया के दिल पर सदमा पहुँचाने वाला, उनकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला, उनके धर्म और अर्थ का सत्यानाश करने वाला, दिन-रात तुम्हारे पास रहे, तुम पर हुकूमत करे, तुम्हें बेवकूफ बनावे, और तुम उसका कुछ भी न कर सको! यह मत समझो कि राजा गोपाल सिंह को मरे हुए कई वर्ष हो गये, मैं साबित कर दूंगा कि उनके खून से गीली हुई जमीन भी अभी तक सूखी नहीं है और अगर तुम मुझ से पूछने और यह जानने की इच्छा करोगे कि तुम्हारे राजा गोपालसिंह को किसने मारा या उनका कातिल कौन है तो मैं जरूर उसका भी पता दूंगा और वास्तव में मैं इसी काम के लिए यहां आया भी हूँ।"
छोटे नकाबपोश की इस बात ने सिपाहियों और पहरा देने वाली लौंडियों का दिल हिला दिया। राजा गोपालसिंह की याद ने और इस खबर ने कि-'उन्हें मरे बहुत दिन नहीं हुए और उनका कातिल इसी जगह रह कर उन पर हुकूमत करता है' उनके दिलों को बेचैन कर दिया। सभी की आँखों से आंसू की बूंदें जारी हो गई और हर तरफ से आवाज आने लगी-'कहो-कहो, जल्द कहो, नेक दिल गरीबपरवर और हमारे हितैषी राजा को मारने वाला दुष्ट कौन है और कहाँ है?" इसके जवाब में छोटे नकाबपोश ने पुनः कहा, 'यही कम्बख्त, जिसे इस समय मेरे साथी ने पकड़ रखा है, तुम्हारे राजा का कातिल तथा उसकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला है। इस बात से मत डरो कि इसकी इज्जत मायारानी के दरबार में बहुत है बल्कि आजमाओ और देखो कि यह मर्द है या औरत! मैं सच कहता हूँ कि यह कई वर्ष से तुम लोगों की आँखों में धूल डाल कर अर्थात् औरत बन कर तुम्हारे घर में रहता है और इस राज्य को चौपट कर रहा है, मगर तुम लोगों को इसकी कुछ भी खबर नहीं है। इतना ही नहीं, मैं तुम लोगों से एक बात और कहूँगा, मगर अभी नहीं, जरा ठहरो, घंटे भर और गम खाओ, सवेरा होने दो और हम दोनों को इसी जगह रहने देकर और कहीं ले जाने का उद्योग मत करो!”
छोटे नकाबपोश की इस दूसरी बात ने रंग और भी चोखा कर दिया। चारों तरफ सिपाहियों और लौंडियों में गुरचूँ-गुरचूँ और काना-फूसी होने लगी। किसी की आँखों से आँसू जारी था, किसी भी गर्दन शर्म से नीची हो रही थी, किसी ने अफसोस से अपना हाथ अपने कलेजे पर रख लिया, कोई ठुड्डी पकड़ कर सोच रहा था, और कोई दाँत पीस-पीस कर धनपत की तरफ देख रहा था। यद्यपि रात का समय था मगर उन मशालों की रोशनी बखूबी हो रही थी, जो मायारानी के सिपाहियों के हाथ में थे और इस सबब से वहाँ की हर एक चीज साफ दिखाई दे रही थी। सिपाहियों ने धनपत का चेहरा गौर से देखा और उसमें बहुत फर्क पाया। खौफ और तरद्दुद ने धनपत को अधमरा कर दिया था और उसका रंग जर्द हो रहा था। दोनों नकाबपोशों ने जब देखा कि इस समय सिपाहियों के दिलों में जोश बखूबी पैदा हो गया है और वे लोग अब सब्र करना पसन्द न हीं करेंगे तो आपस में कुछ इशारा करने के बाद छोटे नकाबपोश ने धनपत की साड़ी का ऊपरी भाग फुर्ती से खींच लिया और उसकी चोली भी फाड़ डाली, इसके साथ ही दो बनावटी गेंद बाहर गिर पड़े और उसकी सूरत से मर्दानापन झलकने लगा। अब तो मायारानी के सिपाहियों को पूरे दर्जे पर क्रोध चढ़ आया और उन्हें निश्चय हो गया कि उनके मालिक राजा गोपालसिंह इसी कम्बख्त के सबब से मारे गए हैं। पहरा देने वाली जितनी औरतें थीं, सब ताज्जुब में आकर एक-दूसरे की सूरत देखने लगी और उधर सिपाहियों ने पास पहुँच कर धनपत को घेर लिया तथा उसकी दुर्गत करने लगे। ऐसी अवस्था में दोनों नकाबपोश धनपत को छोड़कर अलग जा खड़े हुए। सिपाहियों ने बारी-बारी से धनपत से प्रश्न करना शुरू किया, मगर उसकी अवस्था इस लायक न थी कि किसी के प्रश्न का उत्तर देता। बहुत कुछ सोचने-विचारने के बाद यह राय पक्की हुई कि धनपत को राजदीवान के पास ले चलना चाहिए और इसी के साथ-साथ इन दोनों नकाबपोशों को भी उन्हीं के सामने पेश करना उचित होगा।
सिपाही लोग जिस समय धनपत के विषय में सोच-विचार कर रहे और क्रोध में भरे हुए थे। दोनों नकाबपोशों से जो धनपत को छोड़ अलग हो गये थे, थोड़ी देर के लिए बिल्कुल बेफिक्र और लापरवाह हो गए थे, मगर इस समय जब यह राय पक्की हुई कि धनपत के साथ ही साथ उन दोनों को भी दीवान साहब के पास ले चलना चाहिए तो उन दोनों की खोज करने लगे, मगर वे, दोनों नकाबपोश मौका पाकर ऐसा गायब हुए कि उनकी झलक तक दिखाई न दी। एक बोला, “अभी इसी जगह तो थे!” दूसरे ने कहा, “यह तो हम भी जानते हैं। मगर यह बताओ कि वे चले कहाँ गए?” तीसरे ने कहा, “भाई वे दोनों भागने वाले तो हैं नहीं, इसी जगह कहीं छिप कर हम लोगों का तमाशा देखते होंगे!” इत्यादि तरह-तरह की बातें सब लोग आपस में करने और दोनों नकाबपोशों को चारों तरफ ढूँढ़ने लगे, लेकिन दोनों वहाँ थे कहाँ, जो पता लगता! आखिर खोजते-ढूँढ़ते सुबह हो गई और इतनी ही देर में इस आश्चर्यजनक घटना की खबर जादू की तरह हवा के साथ मिल कर दूर-दूर तक फैल गई। इस समय मायारानी के सिपाही बिल्कुल ही स्वतन्त्र और खुदराय बल्कि बागियों की तरह हो रहे थे खोजने और ढूँढ़ने पर भी उन्हें जब दोनों नकाबपोशों का पता न लगा तब लाचार होकर कम्बख्त धनपत को घसीटते हुए, वे बाग के बाहर की तरफ रवाना हुए।
जब इन बातों की खबर मायारानी को पहुँची तो वह बहुत ही घबराई। अपनी तथा धनपत की जान से नाउम्मीद होकर सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए? इस समय उसकी सुरत से उसके दिल का बहुत-कुछ पता लगता था। उसका चेहरा जर्द और पलकें नीचे की तरफ झुकी हुई थीं। कभी-कभी उसके बदन में कंप हो जाता और कभी आँखें चंचल होकर सुर्ख हो जातीं। मगर थोड़ी ही देर बाद उसके होंठ काँपने लगे और आँखों की सुर्थी बढ़ जाने के साथ ही उसका चेहरा भी लाल हो गया जिसे देखते ही वे लौंडियाँ जो उसके सामने मौजूद थीं समझ गई कि अब उसे हद दर्जे का क्रोध चढ़ आया है। कुछ सोच-विचार कर मायारानी बोल उठी, “इस समय उन कम्बख्तों को समझाने-बुझाने का उद्योग करना वृथा समय नष्ट करना है, दूसरे, मैं तिलिस्म की रानी ही क्या ठहरी, जो इन थोड़े-से कम्बख्तों को काबू में न कर सकी या इन थोड़े सिपाहियों को आज्ञा भंग करने की सजा न दे सकी!” इतना कहते ही मायारानी अपने स्थान से उठी और दीवानखाने में से होती हुई उस कोठरी में जा पहुँची, जहाँ से बाग के तीसरे दर्जे में जाने का वह रास्ता था जिसका जिक्र हम उस समय कर आये हैं जब पागल बने तेजसिंह मायारानी की आज्ञानुसार हरनामसिंह द्वारा बाग के तीसरे दर्जे में पहुँचाए गये थे।
मायारानी कोठरी के अन्दर गई। वहाँ एक दूसरी कोठरी में जाने के लिए दरवाजा था, उस दरवाजे को खोल कर दूसरी कोठरी में गई। वहाँ एक छोटा-सा कुआँ था, जिसमें उतरने के लिए जंजीर लगी हुई थी। वह इस कुएँ के अन्दर उतर गई और एक लम्बे-चौड़े स्थान में पहुँची, जहाँ बिल्कुल ही अंधकार था। मायारानी टटोलती हुई एक कोने की तरफ चली गई और वहाँ उसने कोई पेंच घुमाया, जिसके साथ ही उस स्थान में बखूबी रोशनी हो गई और वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यह रोशनी शीशे के एक गोले में से निकल रही थी, जो छत के साथ लटक रहा था। यह स्थान, जिसे एक लम्बा-चौड़ा दालान या चारों तरफ दीवार होने के कारण कमरा कहना चाहिए, अद्भुत चीजों और तरह-तरह के कल-पुर्जों से भरा हुआ था। बीच में कतार बाँध कर चौबीस खम्भे संगमरमर के खड़े थे और हर दो खम्भों के ऊपर एक-एक महरादार पत्थर चढ़ा हुआ था, जिसे मामूली तौर पर आप बिना दरवाजे का फाटक कह सकते हैं। इन महराबी पत्थरों के बीचोंबीच बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे और हर एक घण्टे के नीचे एक गरारीदार पहिया था।
मायारानी ने हर एक महाराब को, जिस पर मोटे-मोटे अक्षर लिखे थे, गौर से देखना शुरू किया और एक महाराब के नीचे पहुँच कर खड़ी हो गई जिस पर यह लिखा हुआ था- "दूसरे दर्जे का तिलिस्मी दरवाजा।" मायारानी ने उस पहिये, को घुमाना शुरू किया जो उस महराब में लटकते हुए घण्टे के नीचे था। पहिया चारपाँच दफे घूम कर रुक गया, तब मायारानी वहाँ से हटी और यह कहती हुई घूम कर सामने वाली दीवार के पास गई कि 'देखें अब वे कम्बख्त क्योंकर बाग के बाहर जाते हैं!' दीवार में नम्बरवार बिना पल्ले की पाँच गालमारियाँ थीं और हर एक आलमारी में चार दर्जे बने हुए थे। पहिली आलमारी में शीशे की सुराहियाँ थीं, दूसरी में तांबे के बहुत से डिब्बे थे, तीसरी कागज के मुट्ठों से भरी थी, जिन्हें दीमकों ने बर्बाद कर डाला था, चौथी अष्ट धातु की छोटी-छोटी बहुत-सी मूरतें थीं और पांचवीं आलमारी में केवल चार ताम्रपत्र थे जिनमें खूबसुरत उभरे हुए अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।
मायारानी उस आलमारी के पास गई जिसमें शीशे की सुराहियाँ थीं और एक सुराही उठा ली। शायद उसमें किसी तरह का अर्क था, जिसे थोड़ा-सा पीने के बाद सुराही हाथ में लिए हए, वहाँ से हटी और दूसरी आलमारी के पास गई, जिसमें तांबे के डिब्बे थे। एक डिब्बा उठा लिया और वहाँ से रवाना हुई। जिस तरह उसका जाना हम लिख आये हैं, उसी तरह घूमती हई वह अपने दीवानखाने में पहुँची। जिसके आगे तरह-तरह के खुशनुमा पत्तों वाले खूबसूरत गमले सजाये हुए थे। वहाँ पहुँच कर उसने वह डिब्बा खोला। उसके अन्दर एक प्रकार की बुकनी भरी हुई थी। उसमें से आधी बुकनी अपने हाथ से खूबसूरत गमलों में छिड़कने के बाद बची हुई आधी बुकनी डिब्बे में लिए हुए वह दीवानखाने की छत पर चढ़ गई और अपने साथ केवल एक लौंडी को जिसका नाम लीला था और जो उसकी सब लौंडियों की सरदार थी, लेती गई। यह सब काम, जो हम ऊपर लिख आये हैं, मायारानी ने बड़ी फुर्ती से उसके पहले-पहले ही कर लिया जब तक कि उसके बागी सिपाही धनपत को लिए हुए बाग के दूसरे दर्जे के बाहर जायें।
जब मायारानी लीला को साथ लिये हए दीवानखाने की छत पर चढ़ गई तब उसने एक सुराही दिखाकर लीला से कहा, "चल्लू कर, इसमें से थोड़ा सा अर्क तुझे देती हूँ उसे पी जा और आफत से बची रह, जो थोड़ी ही देर में यहाँ के रहने वालों पर आने वाली है।"
लीला—(हाथ फैला कर) मैं खूब जानती हूँ कि आपकी मेहरबानी जितनी मुझ पर रहती है उतनी और किसी पर नहीं।
मायारानी—(लीला की अंजुली में अर्क डाल कर) इसे जल्दी पी जा और जो कुछ मैं कहती हूँ उसे गौर से सुन।
लीला-बेशक मैं पूरा ध्यान देकर सुनंगी, क्योंकि इस समय आपकी अवस्था बिल्कुल ही बदल रही है और यह जानने के लिए मेरा जी बहुत बेचैन है कि अब क्या किया जायगा?
मायारानी—मैं अपने भेद तुझसे छिपा नहीं रखती। जो कुछ मैं कर चुकी हूँ तुझे सब मालूम है। केवल दो भेद मैंने तझसे छिपाए, जिनमें से एक तो आज खुल ही गया और एक का हाल मैं तुझसे फिर किसी समय कहूँगी। इन भेदों के विषय में मेरा विश्वास था कि यदि किसी को मालूम हो जायगा तो मेरी जान आफत में फंस जायगी और आखिर वैसा ही हुआ। तू देख ही चुकी है कि दो कम्बख्त नकाबपोशों ने यहाँ पहुँच कर क्या गजब मचा रखा है। अब जहाँ तक मैं समझती हूं, धनपत का भेद छिपा रहना बहुत मुश्किल है और साथ ही इसके कम्बख्त फौजी सिपाहियों का भी मिजाज बिगड़ गया है। मान लिया जाय कि अगर मैंने किसी तरह की बुराई की भी तो उनको मेरे खिलाफ होना मुनासिब न था। खैर, सिपाही लोग तो उजड्ड हुआ ही करते हैं, मगर मुझसे बुराई करने का नतीजा कदापि अच्छा न होगा। अफसोस, उन लोगों ने इस बात पर ध्यान न दिया कि आखिर मायारानी तिलिस्म की रानी है! देख, मैंने इस बाग के बाहर जाने का रास्ता बन्द कर दिया, अब उन लोगों की मजाल नहीं कि यहां से बाहर जा सकें, बल्कि थोड़ी ही देर में तू देखेगी कि उन लोगों को मैं कैसे हलाल करती हूँ। यह दवा जो मैंने गमलों में छिड़की है, बहुत ही तेज और अपनी महक दूर-दूर तक फैलाने वाली है, इससे बढ़कर बेहोशी की कोई दवा दुनिया में न होगी, और यही उन बदमाशों के साथ जहर का काम करेगी। तू उन सभी के पास जा और उन्हें ऊंच-नीच समझा कर मेरे पास ले आ–या-नहीं, अच्छा देख-खैर जाने दे—मैं तुझसे एक बात और कहती हूँ-यह तो मैं समझ ही चुकी कि अब मेरी जान जाना चाहती है मगर तो भी हजारों को मारे बिना मैं न छोडूंगी। अफसोस, वे दोनों कम्बख्त नकाबपोश न मालूम कहाँ चले गए। खैर, देखा जायगा-ओफ, (अपनी ठुड्डी पकड़ के) मुझे शक है-एक तो उनमें से जरूर–हाँ जरूर-जरूर-बेशक वही है और होगा, दूसरा भी-मैं समझ गई, मगर ओफ, उस चीज का जाना ही बुरा हुआ। अच्छा अब मैं दूसरे काम की फिक्र करती हूँ, अब तो जान पर खेलना ही पड़ा, एक दफे तो मुझे तुझे छोड़ हाँ, तू मेरा मतलब तो समझ गई न? इस समय मेरी तबीयत-अच्छा, तू जा, देख मान जाय तो ठीक है, नहीं तो आज इस बाग को मैं उन्हीं के खून से तर करुँगी!
इस समय मायारानी की बातें यद्यपि बिल्कुल बेढंगी और बेतुकी थों तथापि चालाक और धूर्त लीला उसका मतलब समझ गई और यह कहती हुई वहाँ से रवाना हुई, "आप चिन्ता न कीजिए, मैं अभी जाकर उन सभी को ठीक करती हूँ। जरा आप अपना मिजाज ठिकाने कीजिए और तिलिस्मी कवच को भी झटपट..."
५
मायारानी के सिपाही जो दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने आए थे, धनपत को लिए हुए बाग के पहले दर्जे की तरफ रवाना हुए जहाँ वे रहा करते थे, मगर वे इच्छानुसार अपने ठिकाने न पहुँच सके, क्योंकि बाग के दूसरे दर्जे के बाहर निकलने का रास्ता मायारानी की कारीगरी से बन्द हो गया था। ये दरवाजे तिलिस्मी और बहुत ही मजबूत थे और इनका खोलना या तोड़ना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव था। पाठकों को याद होगा कि बाग के दूसरे दर्जे और पहले दर्जे के बीच में एक बहुत लम्बी-चौड़ी दीवार थी जिस पर कमन्द लगा कर चढ़ना भी असम्भव था और सीढ़ियों के जरिए उस दीवार पर चढ़ और उसे लाँघ कर ही एक दर्जे से दूसरे दर्जे में जाना होता था। इस समय जो दरवाजा मायारानी ने तिलिस्मी रीति से बन्द किया है इसी के बाद वह दीवार पड़ती थी जिसे लाँघ कर सिपाही लोग पहले दर्जे में जाते थे। उस दीवार पर चढ़ने के लिए जो सीढ़ियाँ थीं वे लोहे की थीं और इस समय दोनों तरफ की सीढ़ियाँ दीवार के अन्दर घुस गई थीं इसलिए दीवार पर चढ़ना एकदम असम्भव हो गया था।
दरवाजे को तिलिस्मी रीति से बन्द देखकर सिपाही लोग समझ गए कि यह मायारानी की कार्रवाई है। इसलिए उन लोगों के दिल में डर पैदा हुआ और वे सोचने लगे कि कहीं ऐसा न हो कि मायारानी हम लोगों को इसी बाग में फँसा कर मार डाले, क्योंकि आखिर वह तिलिस्म की रानी है, मगर यह विचार उन लोगों के दिल में ज्यादा देर तक न रहा क्योंकि राजा गोपालसिंह के साथ दगा किये जाने का जो हाल नकाबपोशों की जुबानी सुना था उस पर उन लोगों को पूरा-पूरा विश्वास हो गया था और इसी सबब से गुस्से के मारे उन सब की अवस्था ही बदली हुई थी।
आखिर धनपत को साथ लिए हुए वे सिपाही यह सोच कर पीछे की तरफ लौटे कि उस चोरदरवाजे की राह से बाहर निकल जायँगे जिस राह से दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर घुसे थे, मगर उस ठिकाने पर पहुँचकर भी वे लोग बहुत ही घबराये और ताज्जुब करने लगे क्योंकि उन्हें वह खिड़की कहीं नजर न आई। हाँ एक निशान दीवार में जरूर पाया जाता था, जिससे यह कहा जा सकता था कि शायद इसी जगह वह खिड़की रही होगी। यह निशान भी मामूली न था बल्कि ऐसा मालूम होता था कि दीवार वाले चोरदरवाजे पर फौलादी चादर जड़ दी गई है। अब उन सिपाहियों को पहले से भी ज्यादा तरदुद्द हुआ क्योंकि सिवाय उन दोनों रास्तों के बाहर निकलने का कोई और जरिया न था। एक बार उन सिपाहियों के दिल में यह भी आया कि मायारानी की तरफ चलना चाहिए, मगर खौफ से ऐसा करने की हिम्मत न पड़ी।
उस समय दिन घण्टे भर से कुछ ज्यादा चढ़ चुका था। सिपाही लोग क्रोध की अवस्था में भी तरदुद्द और घबराहट से खाली न थे और खड़े-खड़े सोच ही रहे थे कि किधर जाना और क्या करना चाहिए कि इतने ही में सामने से लीला आती हुई दिखाई पड़ी। जब वह पास पहुंची तो सिपाहियों की तरफ देख कर ऊँची आवाज में बोली, "तुम लोग अपनी जान के दुश्मन क्यों हो रहे हो? क्या तुम जमानिया राज्य के नौकर हो कर भी इस बात को भूल गए कि मायारानी एक भारी तिलिस्म की रानी है और जो चाहे कर सकती है? दो-चार सौ आदमियों को बरबाद कर डालना उसके लिए एक अदना काम है। अफसोस, ऐसे मालिक के खिलाफ होकर तुम अपनी जान बचाना चाहते हो? याद रक्खो कि इस बाग में भूखे-प्यासे मर जाओगे, तुम्हारे किए कुछ भा न होगा। मैं तुम लोगों को समझाती हूँ और कहती हैं कि अपने मालिक के पास चलो और उससे माफी मांग कर अपनी जान बचाओ।"
इसी तरह की ऊँच-नीच की बहुत-सी बातें लीला उन सिपाहियों से देर तक कहती रही और सिपाही लोग भी लीला की बात पर गौर कर ही रहे थे कि यकायक बाईं तरफ से एक शंख के बजने की आवाज आई, घूम कर देखा तो वे ही दोनों नकाबपोश दिखाई पड़े जो हाथ के इशारे से उन सिपाहियों को अपनी तरफ बुला रहे थे। उन्हें देखते ही सिपाहियों की अवस्था बदल गई और उनके दिल के अन्दर उम्मीद, रंज, डर और तरदुद्द का चर्खा तेजी के साथ घूमने लगा। लीला की बातों पर जो कुछ सोच कर रहे थे उसे छोड़ दिया और धनपत को साथ लिए हुए इस तरह दोनों नकाबपोशों की तरफ बढ़े जैसे प्यासे पंसाले (पौसारे) की तरफ लपकते हैं।
जब उन दोनों नकाबपोशों के पास पहुंचे तो एक नकाबपोश ने पुकार कर कहा, "इस बात से मत घबराओ कि मायारानी ने तुम लोगों को मजबूर कर दिया और इस बाग से बाहर जाने लायक नहीं रक्खा। आओ हम तुम सभी को इस बाग से बाहर कर देते हैं मगर इसके पहले तुम्हें एक ऐसा तमाशा दिखाना चाहते हैं जिसे देख कर तुम बहुत ही खुश हो जाओगे और हद से ज्यादा बेफिक्री तुम लोगों के भाग में पड़ेगी, मगर वह तमाशा हम एकदम से सभी को नहीं दिखाना चाहते। मैं एक कोठरी में (हाथ का इशारा करके) जाता हूँ, तुम लोग बारी-बारी से पांच-पाँच आदमी आओ और अद्भुत, अद्वितीय, अनूठा तथा आश्चर्यजनक तमाशा देखो।"
इस समय दोनों नकाबपोश जिस जगह खड़े थे, उसके पीछे की तरफ एक दीवार थी जो बाग के दूसरे और तीसरे दर्जे की हद को अलग कर रही थी और उसी जगह पर एक मामूली कोठरी भी थी। बात पूरी होते ही दोनों नकाबपोश पाँच सिपाहियों को अपने साथ आने के लिए कहकर उस कोठरी के अन्दर घुस गए। इस समय इन सिपाहियों की अवस्था कैसी थी, इसे दिखाना जरा कठिन है। न तो इन लोगों का दिल उन दोनों नकाबपोशों के साथ दुश्मनी करने की आज्ञा देता था और न यही कहता था कि उन दोनों को छोड़ दो और जिधर जाएँ जाने दो।
जब दोनों नकाबपोश कोठरी के अन्दर घुस गए तो उसके बाद पाँच सिपाही जो दिलावर और ताकतवर थे कोठरी में घुसे और चौथाई घड़ी तक उसके अन्दर रहे। इसके बाद जब वे उस कोठरी के बाहर निकले तो उनके साथियों ने देखा कि उन पाँचों के चेहरे से उदासी झलक रही है, आँखों से आँसू की बूंदें टपक रही हैं और वे सिर झुकाए अपने साथियों की तरफ आ रहे हैं। जब पास आए तो उन पाँचों की अवस्था एकदम बदल जाने का सबब सिपाहियों ने पूछा जिसके जवाब में उन पांचों ने कहा, "पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, तुम लोग पाँच-पाँच आदमी बारी-बारी से जाओ और जो कुछ है अपनी आँखों से देख लो, हम लोगों से पूछोगे तो कुछ भी न बतायेंगे, हां इतना अवश्य कहेंगे कि वहाँ जाने में किसी तरह का हर्ज नहीं है।"
आपस में ताज्जुब से भरी बातें करने के बाद और पाँच सिपाही उस कोठरी के अन्दर घुसे जिसमें दोनों नकाबपोश थे और पहले पाँचों की तरह ये पांचों भी चौथाई घड़ी तक उस कोठरी के अन्दर रहे। इसके बाद जब बाहर निकले तो इन पाँचों की भी वही अवस्था थी जैसी उन पाँचों की जो इनके पहले कोठरी के अन्दर से हो कर आए थे। इसके बाद फिर पांच सिपाही कोठरी के अन्दर घुसे और इनकी भी वही अवस्था हुई, यहाँ तक कि जितने सिपाही वहाँ मौजूद थे पाँच-पाँच करके सभी कोठरी के अन्दर से हो आए और सब ही की वही अवस्था हुई जैसी पहले गये हुए पाँचों सिपाहियों की हुई थी। धनपत ताज्जुब-भरी निगाहों से यह तमाशा देख और असल भेद जानने के लिए बेचैन हो रहा था मगर इतनी हिम्मत न पड़ती थी कि किसी से कुछ पूछता, क्योंकि नकाबपोशों की आज्ञानुसार सिपाहियों की तरह वह उस कोठरी के अन्दर जाने नहीं पाया था जिसमें दोनों नकाबपोश थे। अन्त में सब सिपाहियों ने आपस में बातें करके इशारे में इस बात का निश्चय कर लिया कि कोठरी के अन्दर उन सभी ने एक ही रंगढंग का तमाशा देखा था।
थोड़ी देर बाद दोनों नकाबपोश उस कोठरी के बाहर निकल आए और उनमें से नाटे नकाबपोश ने सिपाहियों की तरफ देख कर कहा, "धनपत को मेरे हवाले करो।" सिपाहियों ने कुछ भी उज्र न किया बल्कि बहुत अदब के साथ आगे बढ़कर धनपत को नकाबपोश के हवाले कर दिया। दोनों नकाबपोश उसे साथ लिये हुए फिर उस कोठरी के अन्दर घुस गये और आधे घंटे तक वहाँ रहे, इसके बाद जब कोठरी के बाहर निकले तो नाटे नकाबपोश ने सिपाहियों से कहा, "धनपत को हमने ठिकाने पहुंचा दिया है, अब आओ, तुम लोगों को भी इस बाग के बाहर कर दें।" सिपाहियों ने कुछ भी उज्र न किया और दो-तीन झुण्डों में होकर नकाबपोश के साथ-साथ उस कोठरी के अन्दर गए और गायब हो गए। दोनों नकाबपोश भी उसी कोठरी के अन्दर जाकर गायब हो गये और उस कोठरी का दरवाजा भीतर से बन्द हो गया।
इस पचड़े में दो पहर दिन चढ़ आया, लीला दूर से खड़ी यह तमाशा देख रही थी, जब सन्नाटा हो गया तो वह भी लौटी और उसने इन बातों की खबर मायारानी तक पहुंचाई।
६
लीला की जुबानी दोनों नकाबपोशों, सिपाहियों और धनपत का हाल मनकर मायारानी बहुत ही उदास और परेशान हो गई। वह आशा जो तिलिस्मी दरवाजा बन्द करने और बेहोशी का अद्भुत धूरा छिड़ककर पर उसे बंधी थी, बिल्कूल जाती थी। तिलिस्म में जाकर तिलिस्मी दरवाजे को बन्द करना, तिलिस्मी दवा पीना और लीला को पिलाना, बेहोशी की बुकनी फूलों के गमलों में डालना-सब बिल्कुल ही व्यर्थ हो गया। धनपत दोनों नकाबपोशों के कब्जे में पड़ गया और सब सिपाही भी सहज ही में बाग के बाहर हो गये। इस समय उन दोनों नकाबपोशों की कार्रवाइयों ने से ना बदहवास कर दिया कि वह अपने बचाव की कोई अच्छी सूरत सोच नहीं सकती थी। आखिर वह हर तरह से दुःखी होकर फिर उसी तहखाने के अन्दर गई जिसमें पहली दफा जाकर बाग के दूसरे दर्जे का दरवाजा तिलिस्मी रीति से बन्द किया था। हम ऊपर लिख आये हैं कि वहाँ दीवार में बिना दरवाजे की पाँच आलमारियाँ थीं और एक आलमारी में ताँबे के बहुत से डिब्बे रक्खे थे। इस समय मायारानी ने उन्हीं डिब्बों को खोल-खोल कर देखना शुरू किया। ये डिब्बे छोटे और बड़े हर प्रकार के थे। कई डिब्बे खोल-खोल कर देखने के बाद मायारानी ने एक डिब्बा खोला जिसका पेटा एक हाथ से कम न होगा। उस डिब्बे में एक हाथीदाँत का तमंचा बारह अंगुल का और छोटी-छोटी बहुत-सी गोलियाँ रक्खी हुई थीं। उन गोलियों का रंग लाल था, और उनके अलावा एक ताम्रपत्र भी उस डिब्बे के अन्दर था। मायारानी इस डिब्बे को लेकर वहाँ से रवाना हुई और तहखाने का दरवाजा बन्द करती हुई अपने स्थान पर उस जगह पहुंची जहाँ उसकी लौंडियाँ उसकी राह देख रही थीं। उसने सब लौंडियों के सामने ही उस डिब्बे को खोला और ताम्रपत्र हाथ में लेकर पढ़ने लगी, जब पूरी तरह पढ़ चुकी तो लीला की तरफ देखकर बोली, "तू देखती है कि मैं किस बला में फंस गई हूँ?"
लीला-जी हाँ, मैं बखूबी देख रही हूँ। दोनों नकाबपोशों की तरफ जब ध्यान देती हूँ तो कलेजा काँप जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अब कोई भारी उपद्रव उठने वाला है क्योंकि नकाबपोशों की बदौलत इस बाग के सिपाही भी बागी हो गए हैं।
मायारानी-बेशक ऐसा ही है और ताज्जब नहीं कि वे सिपाही लोग जो इस समय मेरे पंजे से निकल गए हैं मेरे बाकी के फौजी सिपाहियों को भी भड़कावें।
लीला-इसमें कुछ भी सन्देह नहीं, बल्कि इन सिपाहियों की बदौलत आपकी रिआआ भी बागी हो जायगी और तब जान बचाना मुश्किल हो जायगा। अफसोस, आपने व्यर्थ ही अपने दोनों भेद मुझसे छिपा रक्खे, नहीं तो मैं इस विषय में कुछ राय देती!
मायारानी-(ताज्जुब से) दोनों भेद कौन से? लीला-एक तो यही धनपत वाला। मायारानी–हाँ, ठीक है, और दूसरा कौन?
लीला-(मायारानी के कान की तरफ झुक कर धीरे से) राजा गोपालसिंह वाला, जिन्हें भूतनाथ की मदद से आपने मार डाला!
लीला की बात सुनकर मायारानी चौंक पड़ी, वह अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और लीला का हाथ पकड़ के किनारे ले जाकर धीरे-से बोली, "देख लीला, तू केवल मेरी लौंडियों की सरदार ही नहीं बल्कि बचपन की साथी और मेरी सखी भी है। सच बता, गोपालसिंह वाला भेद तुझे कैसे मालूम हुआ?"
लीला-आप जानती ही हैं कि मुझे कुछ ऐयारी का भी शौक है।
मायारानी-- हाँ, मैं खूब जानती हूँ कि तू ऐयारी भी कर सकती है लेकिन इस किस्म का काम मैंने तुझसे कभी लिया नहीं।
लीला—यह मेरी बदकिस्मती थी, नहीं तो मैं अब तक ऐयारा की पदबी पा चुकी होती।
मायारानी-ठीक है, खैर, तो इससे मालूम हुआ कि तूने ऐयारी से गोपालसिंह वाला भेद मालूम कर लिया?
लीला-जी हाँ, ऐसा ही है। मैंने ऐयारी से और भी बहुत से भेद मालूम कर लिये हैं जिनकी खबर आपको भी नहीं और जिनको इस समय कहना मैं उचित नहीं समझती, मगर शीघ्र ही उस विषय में मैं आपसे बातचीत करुँगी। इस समय तो मुझे केवल इतना ही कहना है कि किसी तरह अपनी जान बचाने की फिक्र कीजिये क्योंकि मुझे भूतनाथ की दोस्ती पर शक है।
मायारानी-क्या तू समझती है कि भूतनाथ ने मुझे धोखा दिया?
लीला-जी हाँ, बल्कि मैं तो यही समझती हूँ कि राजा गोपालसिंह मारे नहीं गये, बल्कि जीते हैं।
मायारानी-अगर ऐसा है तो बड़ा ही गजब हो जायगा। मगर इसका कोई सबूत भी है?
लीला-आज तो नहीं, मगर कल तक मैं इसका सबूत आप को दे सकूँगी।
मायारानी-अफसोस, अफसोस! मैं इस समय किले में जा कर अपने दीवान से राय लेने वाली थी मगर अब तो कुछ और ही सोचना पड़ा।
लीला-(उस डिब्बे की तरफ इशारा करके जो अभी तिलिस्मी तहखाने में से मायारानी लाई थी) पहले यह बताइये कि इस डिब्बे को आप किस नीयत से लाई हैं? यह हाथीदाँत का तमंचा कैसा है और ये गोलियां क्या काम दे सकती हैं?
मायारानी—ये गोलियाँ इसी तमंचे में रख कर चलाई जायँगी। इसके चलाने में किसी तरह की आवाज नहीं होती और गोली भी आध कोस तक जा सकती है। जब यह बोली किसी के बदन पर लगेगी या जमीन पर गिरेगी तो एक आवाज देकर फट जायगी और इसके अन्दर से बहुत-सा जहरीला धुआँ निकलेगा। वह धुआं जिसकी नाक में जायगा वह आदमी फौरन ही बेहोश हो जायगा। अगर हजार आदमियों की भीड़ आ रही हो तो उन सभी को बेहोश करने के लिए केवल दस-पांच गोलियाँ काफी हैं।
लीला-बेशक यह बहुत अच्छी चीज है और ऐसे समय में आपको बड़ा काम दे सकती है, मगर मैं समझती हूँ कि उस डिब्बे में पांच सौ से ज्यादा गोलियाँ न होंगी, इसके बाद कदाचित् वह ताम्रपत्र कुछ काम दे सके जो उस डिब्बे में है और जिसे आपने लोगों के सामने पढ़ा था।
मायारानी-वाह तुम बहुत समझदार हो। बेशक ऐसा ही है। इस ताम्रपत्र में उन गोलियों के बनाने की तरकीब लिखी है। इस तिलिस्म में ऐसी हजारों चीजें हैं मगर लाचार हूँ कि तिलिस्म का पूरा हाल मुझे मालूम नहीं है बल्कि चौथे दर्जे के विषय में तो मैं कुछ भी नहीं जानती। फिर भी जो कुछ मैं जानती हैं या जहाँ तक तिलिस्म में मैं जा सकती हूँ वहाँ ऐसी और भी कितनी ही चीजें हैं जो समय पर मेरे काम आ सकती हैं।
लीला-अब यही समय है कि उन चीजों को लेकर आप यहाँ से चल दीजिये क्योंकि इस बाग तथा आपके राज्य पर अब आफत आना ही चाहती है। मैंने सुना है कि
राजा वीरेन्द्रसिंह की बेशुमार फौज जमानिया की तरफ आ रही है, बल्कि यों कहना चाहिए कि आज-कल में पहुँचना ही चाहती है।
मायारानी---हाँ, यह खबर मैंने भी सुनी है। यदि गोपालसिंह का और धनपत का मामला न बिगड़ा होता तो मैं मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाती, परन्तु इस समय तो मुझे अपनी रिआया में से किसी का भी भरोसा नहीं।
लीला-भरोसे के साथ-ही-साथ आप समझ रखिए कि आप अपने किसी नौकर पर हकूमत की लाल आँख भी अब नहीं दिखा सकतीं। मगर इन बातों में वृथा देर हो रही है। इस विषय को बहुत जल्द तय कर लेना चाहिए कि अब क्या करना और कहाँ जाना मुनासिब होगा।
मायारानी–हाँ, ठीक है मगर इसके भी पहले मैं तुमसे यह पूछती हूँ कि तुम इस मुसीबत में मेरा साथ देने के लिए कब तक तैयार रहोगी?
लीला-जब तक मेरी जिन्दगी है या जब तक आप मुझ पर भरोसा करेंगी।
मायारानी—यह जवाब तो साफ नहीं है, बल्कि टेढ़ा है।
लीला-इस पर आप अच्छी तरह गौर कीजिएगा मगर यहाँ से निकल चलने के बाद।
मायारानी-अच्छा, यह तो बताओ कि मेरी और लौंडियों का क्या हाल है?
लीला-आपकी लौंडियाँ केवल चार-पाँच ऐसी हैं जिन पर मैं भरोसा कर सकती हैं, बाकी लौंडियों के विषय में मैं कुछ भी नहीं कह सकती और न उनके दिल का हाल ही जाना जा सकता है।
मायारानी-(ऊँची साँस लेकर) हाय, यहाँ तक नौबत पहुँच गई! यह सब मेरे पापों का फल है। अच्छा जो होगा देखा जायगा। इस अनूठे तमंचे और गोलियों को मैं सम्हालती हूँ और थोड़ी देर के लिए पुनः तिलिस्मी तहखाने में जाकर देखती हूँ कि मेरे काम की ऐसी कौन-सी चीज है जिसे सफर में अपने साथ ले जा सकूँ। जो कुछ हाथ लगे सो ले आती हूँ और बहुत जल्द तुमको और उन लौंडियों को साथ लेकर निकल भागती हैं जिन पर तुम भरोसा रखती हो। कोई हर्ज नहीं, इस गई-गुजरी हालत में भी मैं एक दफा लाखों दुश्मनों को जहन्नुम पहुंचाने की हिम्मत रखती हैं!
इसके जवाब में पीछे की तरफ से किसी गुप्त मनुष्य ने कहा-"बेशक-बेशक, तुम मरते-मरते भी हजारों घर चौपट करोगी!"
७
ऐयारी भाषा की चिट्ठी को पढ़ने और कमलिनी के ढाढ़स दिलाने पर कुँवर इन्द्रजीतसिंह की दिलजमई तो हो गई परन्तु 'टेप' का परिचय पाने के लिए वे बेचैन हो हो रहे थे अस्तु उससे मिलने की आशा में दरवाजे की तरफ ध्यान लगाकर थोड़ी देर तक खड़े हो गए। यकायक उस मकान का दरवाजा खुला और धनपत की कलाई पकड़े 'टेप' महाशय अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए आते दिखाई दिये। दरवाजे के बाहर निकलते ही 'टेप' ने अपने चेहरे पर से नकाब हटा दी, सूरत देखते ही कुँअर इन्द्रजीतसिंह हँस पड़े और लपक के उनकी कलाई पकड़ कर बोले, "अहा, यह किसे आशा थी कि यहाँ पर राजा गोपालसिंह से मुलाकात होगी? (कमलिनी की तरफ देख कर) तो क्या इन्हीं ने अपना नाम 'टेप' रक्खा है?"
कमलिनी-जी हाँ।। इन्द्रजीतसिंह-(गोपालसिंह से) क्या आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर है?
गोपालसिंह-जी हाँ, आप मकान के अन्दर चलिये और उनसे मिलिये।
इन्द्रजीतसिंह-एक औरत के रोने की आवाज हम लोगों ने सुनी थी, शायद वह भी इसी मकान के अन्दर हो।
गोपालसिंह--जी नहीं, वह कम्बख्त औरत (धनपत की तरफ इशारा कर) यही है! न मालूम ईश्वर ने इस हरामजादे को कैसा मर्द बनाया है कि आवाज से भी कोई इसे मर्द नहीं समझ सकता!
कमलिनी-इसे आपने कब पकड़ा?
गोपालसिंह-यह कल से मेरे कब्जे में है और मैं कल ही इसे इस मकान में कैद कर गया था, बल्कि आज छुड़ाने के लिए आया था।
इन्द्रजीतसिंह-तो आप कल भी इस मकान में आ चुके हैं! मगर मुझसे मिलने के लिए शायद कसम खा चुके थे!
गोपालसिंह-(हँसकर) नहीं-नहीं, मेरा वह समय बड़ा ही अनमोल था, एकएक पल की देर बुरी मालूम होती थी; इसी से आपसे मिलने के लिए मैं रुक न सका। इसका खुलासा हाल आप सुनेंगे तो बहुत ही हँसेंगे और खुश होंगे। मगर पहले मकान के अन्दर चलकर आनन्दसिंह से मिल लीजिए, तब यह अनूठा किस्सा आपसे कहूँगा।
इन्द्रजीतसिंह-क्या आनन्द यहाँ तक नहीं आ सकता?
गोपालसिंह-नहीं, वे यहाँ नहीं आ सकते। वे तिलिस्मी कारखाने में फंस चके हैं, इसलिए छूटने का उद्योग नहीं कर सकते, बल्कि वे तिलिस्म के अन्दर जा सकते हैं और उसे तोड़कर निकल आ सकते हैं। मगर अब उनसे मिलने में देर न कीजिए।
इन्द्रजीतसिंह--आप जिस काम के लिए गये थे वह हुआ?
गोपालसिंह-वह काम भी बखूबी हो गया, उसका खुलासा हाल थोड़ी देर में आपसे कहूँगा।
कमलिनी-भूतनाथ को आपने कहाँ छोड़ा?
गोपालसिंह-वह भी आता ही होगा। वास्तव में वह बड़ा ही चालान धूर्त ऐयार है। उसने जो काम किए हैं तुम सुनोगी तो हँसते-हँसते लोटन काबूतर बन जाओगी। (इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर) आप आनन्दसिंह के फंसने से दु:खी क्योंकि आप दोनों भाइयों के लिए इस तिलिस्म का तोड़ना जरूरी हो चुका है।
इन्द्रजीतसिंह-ठीक है, मगर रिक्तगन्थ का पूरा-पूरा मतलब उसकी सारी नहीं आया है और इसके तिलिस्म के काम में उसे तकलीफ होना सम्भव है। उसमें दस बारह शब्द ऐसे हैं, जिनका अर्थ नहीं लगता और उन शब्दों का अर्थ जाने बिना बहुत-सी बातों का मतलब समझ में नहीं आता।
गोपालसिंह-(हँसकर) आपका यह कहना ठीक है, मगर मैं एक बात आपको ऐसी बताता हूँ कि जिससे आप हर एक तिलिस्मी ग्रन्थ को अच्छी तरह पढ़ और समझ लेंगे और उनमें चाहे कैसे भी टेढ़े शब्द क्यों न हों, मगर मतलब समझने में कठिनता न होगी।
इन्द्रजीतसिंह--वह क्या?
गोपालसिंह केवल एक छोटी-सी बात है।
इन्द्रजीतसिंह-मगर उसके बताने में आप हुज्जत बड़ी कर रहे हैं।
गोपालसिंह ने झुककर इन्द्रजीतसिंह के कान में कुछ कहा, जिसे सुनते ही कुमार हँस पड़े और बोले, "बेशक, बड़ी चतुराई की गई है! जरा-से फेर में मतलब कैसा बिगड़ जाता है! आपका कहना बहुत ठीक है। अब कोई शब्द ऐसा नहीं निकलता जिसका अर्थ मैं न लगा सकूँ! क्यों न हो, आखिर आप तिलिस्म के राजा जो ठहरे।"
कमलिनी से इस समय चुप न रहा गया, वह ताने के तौर पर सिर नीचा करके बोली, "बेशक, राजा ही ठहरे, इसी से तो बेमुरौवती कूट-कूटकर भरी है!" इसके जवाब में गोपालसिंह ने कहा, "नहीं-नहीं, ऐसा मत खयाल करो! तुम्हारा उदास चेहरा कहे देता है कि तुम्हें इस बात का रंज है कि हमने जो कुछ कुमार के कान में कहा, उससे तुमको जानबूझ के वंचित रखा, मगर नहीं (धनपत की तरफ इशारा करके) इस कम्बख्त के खयाल से मैंने ऐसा किया। आखिर वह भेद तुमसे छिपा न रहेगा।"
इस पर कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने एक विचित्र निगाह कमलिनी पर डाली, जिसे देखते ही वह हँस पड़ी और मकान के अन्दर जाने के लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी। कुँवर इन्द्रजीतसिंह, कमलिनी, लाडिली और उनके साथ ही धनपत का हाथ पकड़ हुए राजा गोपालसिंह उस मकान के अन्दर चले।
इस मकान की हालत हम ऊपर लिख आये हैं। इसलिए पुनः नहीं लिखते। गोपालसिंह सभी को साथ लिए हुए उस कोठरी में पहँचे, जिसमें कुँवर आनन्दसिंह फंसे हुए थे, मगर इस समय वहाँ की अवस्था वैसी न थी जैसी कि हम ऊपर लिख आये हैं, अर्थात् वह तिलिस्मी सन्दूक, जिसमें आनन्दसिंह का हाथ फंस गया था, वहाँ न था और न आनन्दसिंह वहाँ थे। हाँ, उस कोठरी की जमीन का वह हिस्सा जिस पर सन्दूक था, जमीन के अन्दर धंस गया था और वहाँ एक कुएँ की शक्ल दिखाई दे रही थी। यह देख राजा गोपालसिंह ताज्जुब में आ गये और उस कुएँ की तरफ देखकर कुछ सोचने लगे, आखिर कुँवर इन्द्रजीतसिंह ने उन्हें टोका और चुप रहने का सबब पूछा।
इन्द्रजीतसिंह-आप अब क्या सोच रहे हैं। शायद आनन्दसिंह को आपने इसी कोठरी में छोड़ा था?
गोपालसिंह-जी हाँ, इस जगह जहाँ आप कुएँ की तरह का गड्ढा देखते हैं, एक सन्दूक था और उसमें एक छेद था, उसी छेद के अन्दर हाथ डालकर कुमार ने अपने को फंसा लिया था। मालूम होता है कि अब वे तिलिस्म के अन्दर चले गये। इसी खयाल से मैंने आपसे कहा था कि कुँवर आनन्दसिंह अपने को छुड़ा नहीं सकते, बल्कि तिलिस्म के अन्दर जा सकते हैं।
इन्द्रजीतसिंह-अफसोस! खैर, मर्जी परमेश्वर की! इस समय मेरा दिमाग परेशान हो रहा है। धनपत को मैं इस अवस्था में क्यों देख रहा हूँ? यकायक आपका इस बाग में आना कैसे हुआ? आप मुझसे मिले बिना सीधे इस मकान में क्यों आये? आनन्द को इस मकान में आपने ठहरने क्यों दिया अथवा उसे बचाने का उद्योग क्यों न किया? इत्यादि बहुत-सी बातें जानने के लिए मैं इस समय परेशान हो रहा है, मगर इसके पहले मैं इस कुएँ की अवस्था जानने का उद्योग करूँगा। (कमलिनी की तरफ देखकर) जरा तिलिस्मी खंजर मुझे दो, उसके जरिये से इस कुएँ में उजाला करके मैं देखूँगा कि इसके अन्दर क्या है?
कमलिनी-(तिलिस्मी खंजर और अंगूठी कुमार के सामने रखकर) लीजिए, शायद इससे कुछ काम चले!
कुँवर इन्द्रजीतसिंह ने अँगूठी पहनकर खंजर हाथ में लिया और धीरे-धीरे उस गड्ढे के किनारे गये जो ठीक कुएँ की तरह का हो रहा था। खंजर वाला हाथ कुमार ने कुएं के अन्दर डाला और उसका कब्जा दबाकर उजाला करने के बाद झाँककर देखा कि उसके अन्दर क्या है। न मालूम कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने कुएँ के अन्दर क्या देखा कि वे यकायक बिना किसी से कुछ कहे तिलिस्मी खंजर हाथ में लिए उस कुएँ के अन्दर कूद पड़े। यह देखते ही कमलिनी और लाड़िली परेशान हो गयीं और राजा गोपालसिंह को भी बहुत ताज्जुब हुआ। इन्द्रजीतसिंह की तरह राजा गोपालसिंह ने भी अपना तिलिस्मी खंजर हाथ में लेकर कुएँ अन्दर किया और उसका कब्जा दबा रोशनी करने के बाद झाँककर देखा कि क्या बात है मगर कुछ दिखाई न पड़ा।
कमलिनी-कुछ मालूम हुआ कि इस गड्ढे में क्या है?
गोपालसिंह--कुछ भी मालूम नहीं होता, न जाने क्या देखकर कुमार इसमें कूद गये।
कमलिनी-खैर, आप यहाँ से हटिये और सोचिये कि अब क्या करना होगा?
गोपालसिंह-यद्यिप मैं जानता हूँ कि यह तिलिस्म कुमार के ही हाथ से टूटेगा, परन्तु इस रीति से दोनों कुमारों का तिलिस्म के अन्दर जाना ठीक न हुआ। देखना चाहिए, ईश्वर क्या करता है? चलो, अब यहाँ रहना उचित नहीं है और न कुमार से मुलाकात होने की ही कोई आशा है।
कमलिनी-(अफसोस के साथ) चलिये।
गोपालसिंह-(बाहर की तरफ चलते हुए) अफसोस! कुमार से कई बातें कहने की आवश्यकता थी, मगर लाचार!
कमलिनी-(धनपत की तरफ इशारा करके) इसे आप कहाँ-कहाँ लिए फिरेंगे और यहाँ क्यों लाए थे?
गोपालसिंह-इसे मैं कल गिरफ्तार करके इसी मकान के अन्दर छोड़ गया था।
मुझे आशा थी कि यह स्वयं इस मकान से बाहर न निकल सकेगा, मगर आज इस मकान में आकर देखा तो बड़ा ही आश्चर्य हुआ। इस मकान के तीन दरवाजे यह खोल चुका था और चौथा दरवाजा खोलना ही चाहता था। न मालूम इस मकान का भेद इसे क्योंकर मालूम हुआ।
कमलिनी-इसे आपने किस रीति से गिरफ्तार किया?
गोपालसिंह-पहले इस कम्बख्त का इन्तजाम कर लूं तो इसका अनूठा किस्सा कहूँ।
कमलिनी और लाडिली के साथ धनपत को पकड़े हुए राजा गोपालसिंह उस मकान के बाहर आये और देवमन्दिर की तरफ रवाना होकर उसके पश्चिम की तरफ वाले मकान के पास पहुँचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि देवमन्दिर के पश्चिम की तरफ वाले मकान के पास दरवाजे पर हड्डियों का एक ढेर था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी हुई थी, जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएँ के अन्दर गया हुआ था।
धनपत को घसीटते हुए राजा गोपालसिंह उसी कुएँ पर गये और उस हरामजादे स्त्री-रूपधारी मर्द को जबर्दस्ती उसी कुएँ के अन्दर धकेल दिया। इसके साथ ही उस कुएँ के अन्दर से धनपत के चिल्लाने की आवाज आने लगी। परन्तु राजा गोपालसिंह, कमलिनी और लाड़िली ने उस पर कुछ ध्यान न दिया। तीनों आदमी देवमन्दिर में आकर बैठ गये और बातचीत करने लगे।
कमलिनी-हां, अब आप पहले यह कहिये कि भूतनाथ ने क्या किया? मैंने उसे आपके पास भेजा था। इसलिए पूछती हूँ कि उसने अपना काम ईमानदारी से किया या नहीं?
गोपालसिंह-बेशक, भूतनाथ ने अपना काम हद से ज्यादा ईमानदारी के साथ किया। वह जाहिर में मायारानी के साथ ऐसा मिला कि उसे भूतनाथ पर विश्वास हो गया और वह यह समझने लगी कि भूतनाथ इनाम की लालच से मेरा काम उद्योग के साथ करेगा।
कमलिनी–हाँ, उसने मायारानी के साथ मेल पैदा करने का हाल मुझसे कहा था। (मुस्कराकर) अजीब ढंग से उसने मायारानी को धोखा दिया। हमारी तरफ की मामूली सच्ची बातें कहकर उसने अपना काम पूरा-पूरा निकाला, मगर मैं उसके बाद का हाल पूझती हूँ, जब मैंने उसे आपके पास काशी में भेजा था, क्योंकि उसके बाद अभी तक वह मुझसे नहीं मिला।
गोपालसिंह-उसके बाद तो भतनाथ ने दो-तीन काम बडे अनठे किये, जिनका खुलासा हाल मैं तुमसे कहूँगा। लेकिन उन कामों में एक काम सबसे बढ़-चढ़ के हुआ।
कमलिनी-वह क्या?
गोपालसिंह-उसने मायारानी से कहा कि मैं गोपालसिंह को गिरफ्तार करके दारोगा वाले मकान में कैद कर देता हूँ, तुम उसे अपने हाथ से मारकर निश्चिन्त हो जाओ। यह सुनकर मायारानी बहुत ही खुश हुई और भूतनाथ ने भी वह काम बड़ी खुशी के साथ किया। बल्कि इसके इनाम में अजायबघर की ताली मायारानी से ले ली!
कममिनी—क्या अजायबघर की ताली भूतनाथ ने ले ली?
गोपालसिंह―हाँ।
कमलिनी—यह बड़ा काम हुआ और इस काम के लिए मैंने उसे सख्त ताकीद की थी। अब वह ताली किसके पास है?
गोपाससिंह―ताली मेरे पास है, मुझे आशा न थी कि भूतनाथ मुझे देगा, मगर उसने कोई उज्र न किया।
कमलिनी―वह आपसे किसी तरह उज्र नहीं कर सकता, क्योंकि मैंने उसे कसम देकर कह दिया था कि जितना मुझे मानते हो, उतना ही राजा गोपालसिंह को मानना। असल बात तो यह है कि भूतनाथ बड़े काम का आदमी है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह राजा वीरेन्द्रसिंह का गुनहगार है और उसने सजा पाने लायक काम किया है, मगर वह कसूर उससे धोखे में हुआ। इश्क का भूत उसके ऊपर सवार था और उसी ने उससे वह काम कराया, पर वास्तव में उसकी नीयत साफ है और उस कसूर का उसे सख्त रंज है, ऐसी अवस्था में जिस तरह हो, उसका कसूर माफ होना ही चाहिए।
गोपालसिंह―बेशक-बेशक, और उसके बाद तुम्हारी बदौलत उसके हाथ से कई ऐसे काम निकले हैं, जिनके आगे वह कसूर कुछ भी नहीं है।
कमलिनी―अच्छा अब खुलासा कहिए कि भूतनाथ ने आपके मारने के विषय में किस तरह महारानी को धोखा दिया और अजायबघर की ताली क्योंकर ली?
राजा गोपालसिंह के विषय में भूतनाथ ने जिस तरह मायारानी को धोखा दिया था, उसका हाल हम ऊपर के बयानों में लिख आये हैं। इस समय वही हाल राजा गोपालसिंह ने अपने तौर पर कमलिनी से बयान किया। ताज्जुब नहीं कि भूतनाथ के विषय में हमारे पाठकों को धोखा हुआ हो और वे समझ बैठे हों कि भूतनाथ वास्तव में मायारानी से मिल गया, मगर नहीं। उन्हें अब मालूम हुआ होगा कि भूतनाथ ने मायारानी से मिलकर केवल अपना काम साधा और मायारानी को हर तरह से नीचा दिखाया।
अहा, ईश्वर की महिमा भी कैसी विचित्र है! बुरे कर्मों का बुरा फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। जो मायारानी अपने सामने किसी को कुछ समझती ही न थी, वही आज किसी के सामने जाने या किसी को मुँह दिखाने का साहस नहीं कर सकती। जो मायारानी कभी किसी से डरती ही न थी, वही आज एक पत्ते के खड़खड़ाने से भी डर कर बदहवास हो जाती है। जो मायारानी दिन-रात हँसी-खुशी में बिताया करती थी, वह आज रो-रोकर अपनी आँखें सुजा रही है। संध्या के समय भयानक जंगल में उदास और दुःखी मायारानी केवल पाँच लौंडियों के साथ सिर झुकाये अपने किये हुए बुरे कर्मों की याद कर करके पछता रही है। रात की अवाई के कारण जैसे-जैसे अँधेरा होता जाता है, तैसे-तैसे उसकी घबराहट भी बढ़ती जाती है। इस समय मायारानी और उसकी लौंडियाँ मर्दाने भेष में हैं। लौंडियों के पास नीमचा तथा तीर-कमान मौजूद हैं। मगर मायारानी केवल तिलिस्मी तमंचा कमर में छिपाये हुए है। वह घबड़ा-घबड़ाकर बारबार पूरब की तरफ देख रही है, जिससे मालूम होता है कि इस समय उधर से कोई उसके पास आने वाला है। थोड़ी ही देर बाद अच्छी तरह अँधेरा हो गया और इसी बीच में पूरब की तरफ से किसी के आने की आहट मालूम हुई। यह लीला थी जो मर्दाने भेष में पीतल की जालदार लालटेन लिए हुए कहीं दूर से चली आ रही थी। जब वह पास आयी, मायारानी ने घबराहट के साथ पूछा, "कहो, क्या हाल है?"
लाली–हाल बहुत ही खराब है, अब तुम्हें जमानिया की गद्दी कदापि नहीं मिल सकती।
मायारानी—यह तो मैं पहले ही से समझे बैठी हूँ। तू दीवान साहब के पास गई थी?
लाली–हाँ, गई थी, उस समय उन सिपाहियों में से कई सिपाही वहां मौजूद जो आपके तिलिस्मी बाग में रहते हैं और जिन्होंने दोनों नकाबपोशों का साथ दिया था। उस समय वे सिपाही दीवान साहब से दोनों नकाबपोशों का हाल बयान कर रहे थे, मगर मुझे देखते ही चुप हो गये।
मायारानी-तब क्या हुआ?
लीला-दीवान साहब ने मुझे एक तरफ बैठने का इशारा किया और पूछा कि 'तू यहाँ क्यों आई है?' इसके जवाब मैं मैंने कहा कि 'मायारानी हम लोगों को छोड़कर न मालूम कहाँ चली गई। जब चारों तरफ ढूंढ़ने पर भी पता न लगा तो इत्तिला के लिए आपके पास आई हूँ।' यह सुनकर दीवान साहब ने कहा कि 'अच्छा ठहर, मैं इन सिपाहियों से बातें कर लूँ, तब तुझसे करूँ।'
मायारानी-अच्छा, तब तूने उन सिपाहियों की बातें सुनीं?
लीला-जी नहीं, सिपाहियों ने मेरे सामने बात करने से इनकार किया और कहा कि "हम लोगों को लीला पर विश्वास नहीं है!" आखिर दीवान साहब ने मुझे बाहर जाने का हुक्म दिया। उस समय मुझे अंदाज से मालूम हुआ कि मामला बेढब हो गया और ताज्जुब नहीं कि मैं गिरफ्तार कर ली जाऊँ, इसलिए पहरे वालों से बात बनाकर मैंने अपना पीछा छुड़ाया और भाग कर मैदान का रास्ता लिया।
मायारानी--संक्षेप में कह कि उन दोनों नकाबपोशों का कुछ भेद मालूम हुआ कि नहीं?
लीला-दोनों नकाबपोशों का असल भेद कुछ भी मालूम न हुआ, हाँ उस आदमी का पता लग गया, जिसने बाग से निकल भागने का विचार करते समय गुप्त रीति से कहा था कि 'बेशक-बेशक, तुम मरते-मरते भी हजारों घर चौपट करोगी!'
मायारानी–हाँ, कैसे पता लगा? वह कौन था?
लीला-वह भूतनाथ था। जब मैं दीवान साहब के यहाँ से भागकर शहर के बाहर हो रही थी, यकायक उससे मुलाकात हुई। उसने स्वयं मुझसे कहा कि 'फला बात का कहने वाला मैं हूँ, तू मायारानी से कह दीजियो कि अब तेरे दिन खोटे आए हैं, अपने किए का फल भोगने के लिए तैयार हो रहे, हाँ, यदि मुझे कुछ देने की सामर्थ्य हो तो मैं उसका साथ दे सकता हूँ।'
मायारानी-(ऊँची साँस लेकर हाय! अच्छा और क्या-क्या मालम हआ?
लीला-और क्या कहूँ? राजा वीरेन्द्रसिंह की बीस हजार फौज आ गई है, जिसकी सरदारी नाहरसिंह कर रहा है। दीवान साहब ने एक सरदार को पत्र देकर नाहरसिंह के पास भेजा था, मालूम नहीं उस पत्र में क्या लिखा था, मगर नाहरसिंह ने उसका यह जवाब जबानी कहला भेजा कि हम केवल मायारानी को गिरफ्तार करने के लिए आए हैं। इसके बाद पता चला कि दीवान साहब ने आपकी खोज में कई जासूस रवाना किए हैं।
मायारानी-तो इससे निश्चित होता है कि कम्बख्त दीवान भी मेरा दुश्मन हो गया!
लीला-क्या इस बात में अब भी शक है?
मायारानी-(लम्बी साँस लेकर) अच्छा और क्या मालूम हुआ? लीला-एक बात सबसे ज्यादा ताज्जुब की मालूम हुई।
मायारानी वह क्या?
लीला-रात के समय भेष बदल कर मैं राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में गई थी। घूमते-फिरते ऐसी जगह पहुंची, जहाँ से नाहरसिंह का खेमा सामने दिखाई दे रहा था और उस खेमे के दरवाजे पर मशाल हाथ में लिए हुए पहरा देने वाले सिपाहियों की चाल साफ-साफ दिखाई दे रही थी। मैंने देखा कि खेमे के अन्दर से दो नकाबपोश निकले और जहाँ मैं खड़ी थी उसी तरफ आने लगे।
मैं किनारे हट गयी। जब वे मेरे पास से होकर निकले तो उनकी चाल और उनके कद से मुझे निश्चय हो गया कि वे दोनों नकाबपोश वही हैं जो हमारे बाग में आये थे और जिन्होंने धनपत को पकड़ा था। मायारानी–हाँ! लीला-जी हां!
मायारानी–अफसोस, इसका पता कुछ भी न लगा कि वे दोनों आखिर हैं कौन मगर इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे खास बाग के तिलिस्मी भेदों को जानते हैं और इस समय तेरी जबानी सुनने से यह जाना जाता है कि वे दोनों राजा वीरेन्द्रसिंह के पक्षपाती भी हैं।
लीला-इसका निश्चय नहीं हो सकता कि वे दोनों नकाबपोश राजा वीरेन्द्रसिंह के पक्षपाती हैं, शायद वे नाहरसिंह से मदद लेने गये हों।
मायारानी-ठीक है, यह भी हो सकता है। लेकिन बात तो यह है कि मैं सिवाय गोपालसिंह के और किसी से नहीं डरती, न मुझे रिआया के बिगड़ने का कोई डर है न सिपाहियों या फौज के बागी होने का खौफ न दीवान-मुत्सद्दियों के बिगड़ने का अन्देशा और न कमलिनी और लाडिली की बेबफाई का रंज-क्योंकि मैं इन सभी को अपनी करामात से नीचा दिखा सकती हैं, हाँ, यदि गोपालसिंह के बारे में कम्बख्त भूतनाथ ने मुझे धोखा दिया है जैसा कि तू कह चुकी है तो बेशक खौफ की बात है। अगर वह जीता है तो मुझे बुरी तरह हलाल करेगा। वह इस बात से कदापि नहीं डरेगा कि मेरा भेद खुलने से उसकी बदनामी होगी, क्योंकि मैंने उसके साथ बहुत बुरा सलूक किया है। जिस समय कम्बख्त कमलिनी और वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने गोपालसिंह को कैद से छुड़ाया था, यदि गोपालसिंह चाहती तो उसी समय मुझे जहन्नुम को भेज सकता था। मगर उसका ऐसा न करना मेरा कलेजा और भी दहला रहा है, शायद मौत से भी बढ़कर कोई सजा उसने मेरे लिए सोच ली है, हाय अफसोस! मैंने तिलिस्मी भेद जानने के लिए उसे क्यों इतने दिनों तक कैद में रख छोड़ा! उसी समय उसे मार डाला होता तो यह बुरा दिन क्यों देखना पड़ता? हाय, अब तो मौत से भी कोई भारी सजा मुझे मिलने वाली है। (रोती है)
लीला-अब रोने का समय नहीं है, किसी तरह जान बचाने की फिक्र करनी चाहिए।
मायारानी-(हिचकी लेकर) क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? किससे मदद माँगू? ऐसी अवस्था में कौन मेरी सहायता करेगा? हाय, आज तक मैंने किसी के साथ किसी तरह की नेकी नहीं की, किसी को अपना दोस्त न बनाया और किसी पर अहसान का बोझ न डाला। फिर किसी को क्या गरज पड़ी है, जो ऐसी अवस्था में मेरी मदद करे। वीरेन्द्रसिंह के लड़कों के दुश्मनी करना मेरे लिए और भी जहर हो गया।
लीला-खैर, जो हो गया सो हो गया, अव इस समय इन सब बातों का सोचविचार करना और भी बुरा है। मैं इस मुसीबत में हर तरह तुम्हारा साथ देने के लिए तैयार हूँ और अब भी तुम्हारे पास ऐसी-ऐसी चीजें हैं कि उनसे कठिन से कठिन काम निकल सकता है रुपये-पैसे की तरफ से भी कुछ तकलीफ नहीं हो सकती, क्योंकि सेरों जवाहिरात पास में मौजूद हैं फिर इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो?
मायारानी- चिन्ता क्यों न की जाये? एक मनोरमा का मकान छिपकर रहने योग्य था सो वहाँ भी वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों के चरण जा पहुँचे। तू ही कह चुकी है कि किशोरी और कामिनी को ऐयार लोग छुड़ाकर ले गये। नागर को भी उन लोगों ने फंसा लिया होगा। अब सबसे पहला काम तो यह है कि छिपकर रहने के लिए कोई जगह खोजी जाये इसके बाद जो कुछ करना होगा किया जायेगा। हाय, अगर गोपालसिंह की मौत हो गई होती तो न मुझे रिआया के बागी होने का डर था और न राजा वीरेन्द्रसिंह की दुश्मनी का।
लीला---छिपकर रहने के लिए मैं जगह का बन्दोबस्त कर चूकी हूँ। यहाँ से थोड़ी ही दूर पर....
लीला इससे ज्यादा कुछ कहने न पाई थी कि पीछे की तरफ से कई आदमियों के दौड़ते हुए आने की आहट मालूम हुई। बात-की-बात में वे लोग, जो वास्तव में चोर थे, चोरी का माल लिए हुए उस जगह आ पहुंचे जहाँ मायारानी और उसकी लौंडियाँ बैठी बातें कर रही थीं। ये चोर गिनती में पाँच थे और उनके पीछे-पीछे कई सवार भी उनकी गिरफ्तारी के लिए चले आ रहे थे, जिनके घोड़ों की टापों की आवाज बखूबी आ रही थी। जब वे चोर मायारानी के पास पहुंचे, तो यह सोचकर कि पीछा करने वाले सवारों के हाथ से बचना मुश्किल है, वे चोरी का माल उसी जगह पटक कर आगे की तरफ भाग गये और इसके थोड़ी ही देर बाद वे कई सवार भी उसी जगह पर, जहाँ मायारानी थी, आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि कई आदमी बैठे हुए हैं, बीच में एक लालटेन जल रही है, और चोरी का माल भी उसी जगह पड़ा हुआ है। उन्हें निश्चय हो गया कि ये चोर हैं अतः उन्होंने मायारानी तथा उसकी लौंडियों को चारों तरफ से घेर लिया।
९
आधी रात का समय है, चाँदनी खिली हुई है। मौसम में पूरा-पूरा फर्क पड़ गया है। रात की ठंडी-ठंडी हवा अब प्यारी मालम होती है। ऐसे समय में उस सड़क पर जो काशी से जमानिया की तरफ गई है दो मुसाफिर धीरे-धीरे काशी की तरफ जा रहे हैं। ये दोनों मुसाफिर साधारण नहीं हैं, बल्कि अमीर बहादुर और दिलावर मालूम पड़ते हैं। दोनों की पोशाक बेशकीमत और सिपाहियाना ठाठ की है, तथा दोनों ही की चाल में दिलेरी और लापरवाही मालूम होती है। खंजर, कटार, तलवार, तीर-कमान और कमन्द से दोनों ही सजे हुए हैं और इस समय मस्तानी चाल से धीरे-धीरे टहलत हुए जा रहे हैं। इनके पीछे-पीछे दो आदमी दो घोड़ों की बागडोर थामे हुए जा रहे है। मगर ये दोनों साईस नहीं हैं बल्कि सिपाही और सवार मालूम होते हैं। दोनों मुसाफिर जाते-जाते ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ सड़क से कुछ हटकर पांचसात पेड़ों का एक झुण्ड था। दोनों वहाँ खड़े हो गए और उनमें से एक ने जोर से सीटी बजाई जिसकी आवाज सुनते ही पेड़ों की आड़ में से दस आदमी निकल आए और दूसरी सीटी की आवाज के साथ ही वे उन दोनों आदमियों के पास पहुँच हाथ जोडकर खड़े हो गए। उन सभी की पोशाक उस समय के डाकुओं की-सी थी। जांघिया पहने हुए, बदन में केबल एक मोटे कपड़े की नीमास्तीन, ढाल-तलवार लगाए और हाथों में एकएक गड़ासा लिए हुए थे, और सभी की बगल में एक-एक छोटा बटुआ भी लटक रहा था। इन दसों के आ जाने पर उन दो बहादुरों में से एक ने उनकी तरफ देखा और पूछा, "उसका कुछ पता लगा?"
एक डाकू-(हाथ जोड़ कर) जी हाँ, बल्कि वह काम भी बखूबी कर आये हैं,
जो हम लोगों के सुपुर्द किया गया था और जिसका होना कठिन था।
जवान-उसके साथ और कौन-कौन है?
डाकू--लाली के अतिरिक्त केवल पांच लौंडियां और थीं।
जवान–उसे तुमने किस इलाके में पाया और क्या किया, सो खुलासा कहो।
डाकू-उसने जमानिया की सरहद को छोड़ दिया और काशी रहने का विचार करके उसी तरफ का रास्ता लिया। जब काशी जी की सरहद में पहुंची, तो गंगापुर नामक एक स्थान के पास वाले जंगल में एक दिन तक उसे अटकना पड़ा क्यों कि वह लीला को हालचाल लेने और कई भेदों का पता लगाने के लिए पीछे छोड़ आई थी। हम लोगों को उसी समय अपना काम करने का मौका मिला। मैं कई आदमियों को साथ लेकर काशीराज की तहसील में जो गंगापुर में है घुस गया और कुछ असबाब चुराकर इस तरह भागा कि पहरे वालों को पता लग गया और कई सवारों ने हम लोगों का पीछा किया। आखिर हम लोग उन सवारों को धोखा देकर घुमाते हुए उसी जंगल में ले गए, जिसमें मायारानी थी। जब हम लोग मायारानी के पास पहुंचे, तो चोरी का माल उसी के पास पटक कर भाग गये और सवारों ने वहाँ पहुँच और चोरी का माल मायारानी के पास देखकर उन्हीं लोगों को चोर या चोरों का साथी समझा और उन्हें चारों तरफ से घेर लिया।
जवान-बहुत अच्छा हुआ! शाबाश, तुम लोगों ने अपना काम खूबी के साथ पूरा किया। अच्छा इसके बाद क्या हुआ?
डाकू-इसके बाद की हम लोगों को कुछ भी खबर नहीं है क्योंकि आज्ञानुसार आपके पास हाजिर होने का समय बहुत कम बच गया था इसीलिए फिर उन लोगों का पीछा न किया।
जवान-कोई हर्ज नहीं, हमें इतने ही से मतलब था। अच्छा, अब तुम जाओ, जमानिया के पास गंगा के किनारे जो झाडी है उसी में परसों रात को किसी समय हम तुम लोगों से मिलेंगे, कदाचित् कोई काम पड़े। (अपने साथी की तरफ देखकर) कहिए देवीसिंह जी, अब इन दोनों सवारों के लिए क्या आज्ञा होती है जो हम लोगों के साथ आये हैं?
देवीसिंह---अगर ये लोग जासूसी का काम अंजाम दे सकें, तो इन्हें काशी भेजना चाहिए।
जवान-ठीक है, और इसके बाद जहाँ तक जल्द हो सके, कमलिनीजी से मिलना चाहिए, ताज्जुब नहीं वे कहती हों कि भूतनाथ बड़ा ही बेफिकरा है।
पाठक तो समझ ही गये होंगे कि ये दोनों बहादुर देवीसिंह और भूतनाथ हैं। डाकुओं और दोनों सवारों को विदा करने के बाद दोनों ऐयार लौटे और तेजी के साथ जमानिया की तरफ रवाना हुए। इस जगह से जमानिया केवल चार कोस की दूरी पर था इसलिए ये दोनों ऐयार सवेरा होने के पहले ही उस टीले पर जा पहुंचे, जो दारोगा वाले बंगले के पीछे की तरफ था और जहाँ से दोनों ऐयारों और कुमारों को साथ लिए हुए कमलिनी मायारानी के तिलिस्मी बाग वाले देवमंदिर में गई थी। हम पहले लिख आये हैं कि इस टीले पर एक कोठरी थी जिसमें पत्थर के चबूतरे पर पत्थर ही का एक शेर बैठा हुआ था। वह चबूतरा और शेर देखने में तो पत्थर का मालूम होता था, मगर वास्तव में किसी मसाले का बना हुआ था। दोनों ऐयार उस शेर के पास जाकर खड़े हो गये और बातचीत करने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह को इस समय इस बात का गुमान भी न था कि उनके पीछे-पीछे दो औरतें कुछ दूर से आ रही हैं और इस समय भी कोठरी के बाहर छिपकर खड़ी उन दोनों की बातें सुनने के लिए तैयार हैं। इन दोनों औरतों में से एक तो मायारानी और दूसरी नागर है। पाठकों को शायद ताज्ज़ब हो कि मायारानी को तो चोरी की इल्जाम में काशिराज के सवारों ने गिरफ्तार कर लिया था, फिर वह यहाँ क्योंकर आई? इसलिए थोड़ा हाल मायारानी का इस जगह लिख देना उचित जान पड़ता है।
जब उन सवारों ने चारों तरफ से मायारानी को घेर लिया तब एक दफे तो वह बहुत ही परेशान हुई मगर तुरन्त ही सम्हल बैठी और फुर्ती के साथ उसने अपने तिलिस्मी तमंचे से काम लिया। उसने तमंचे में तिलिस्मी गोली भर कर उसी जगह जमीन पर मारी जहाँ आप बैठी हुई थी। एक आवाज हुई और गोली में से बहुत-सा धुआँ निकलकर धीरे-धीरे फैलने लगा मगर सवारों ने इस बात पर कुछ ध्यान न दिया और मायारानी तथा उसकी लौंडियों को गिरफ्तार कर लिया। मायारानी के तमंचा चलाने पर सवारों को क्रोध आ गया था इसलिए कई सवारों ने मायारानी की जूतों और लातों से खातिरदारी भी की, यहाँ तक कि वह बेहाल होकर जमीन पर गिर पड़ी, उसके साथही-साथ लीला तथा और लौंडियों ने भी खूब मार खाई, मगर इस बीच में तिलिस्मी गोली का धुआँ हल्का होकर चारों तरफ फैल गया और सभी के आँख-नाक में घुसकर अपना काम कर गया। मायारानी और लीला को छोड़ बाकी जितने वहाँ थे सबके सब बेहोश हो गये थे। न सवारों को दीन-दुनिया की खबर रही और न मायारानी की लौंडियों को तन-बदन की सुध रही। पाठकों को याद होगा कि बेहोशी का असर न होने के लिए मायारानी ने तिलिस्मी अर्क पी लिया था और वही अर्क लीला को पिलाया था। अभी तक इस अर्क का असर बाकी था जिसने मायारानी और लीला को बेहोश होने से बचाया।
मार के सदमे से आधी घड़ी तक तो मायारानी में उठने की सामर्थ्य न रही, इसके बाद जान के खौफ से वह किसी तरह उठी और लीला को साथ लेकर वहाँ से भागी। बेचारी लौंडियों को, जिन्होंने ऐसे दुःख के समय में भी मायारानी का साथ दिया था, मायारानी ने कुछ भी न पूछा, हाँ लीला का ध्यान उस तरफ जा पड़ा। उसने अपने ऐयारी के बटुए में से लखलखा निकाला और लौंडियों को सुंघाकर होश में लाने के बाद सभी को भाग चलने के लिए कहा।
लौंडियों को साथ लिए हुए लीला और मायारानी वहाँ से भागी मगर घबराहट के मारे इस बात को न सोच सकीं कि कहाँ छिपकर अपनी जान बचानी चाहिए, अस्तु वे सब सीधे दारोगा वाले बँगले की तरफ रवाना हुई। उस समय सवेरा होने में कुछ विलम्ब था, वे खौफ के मारे छिपाती-छिपती दिन-भर बराबर चलती गईं और रात को भी कहीं ठहरने की नौबत न आई। आधी रात से कुछ ज्यादा जा चुकी थी जब वे सब दारोगा वाले बंगले पर जा पहुंचीं। इत्तिफाक से नागर भी रास्ते ही में इन लोगों से मिली जो मायारानी से मिलने के लिए मुश्की घोड़ी पर सवार खास बाग की तरफ जा रही थी। इस नागर ने मायारानी को न पहचाना, मगर लीला ने नागर को पहचान कर आवाज दी। नागर जब मायारानी के पास आई तो उसे ऐसी अवस्था में देखकर ताज्जुब करने लगी। मायारानी ने संक्षेप में अपना हाल नागर से कहा जिसे सुन वह अफसोस करने लगी और बोली, "मुझको भी भूतनाथ पर कुछ-कुछ शक होता है, ताज्जुब नहीं कि उसने धोखा दिया हो, खैर, कोई हर्ज नहीं है मैं बहुत जल्द इस बात का पता लगा लूंगी। आप काशीजी चलकर मेरे मकान में रहिये और देखिये कि मैं भूतनाथ को क्योंकर फंसाती हूँ।"
मायारानी और नागर की बातें पूरी न होने पाई थीं कि सामने से दो आदमियों के आने की आहट मालूम हुई। वे दोनों देवीसिंह और भूतनाथ थे। यद्यपि अँधेरे के कारण मायारानी ने उन दोनों को न पहचाना और पहचानने की उसे कोई आवश्यकता भी न थी, मगर जब वे दोनों टीले की तरफ मुड़े, तब मायारानी को शक पैदा हुआ और उसने धीरे से नागर के कान में कहा—'दोनों टीले पर जा रहे हैं इससे मालूम होता है कि कमलिनी के साथी हैं, क्योंकि उस टीले पर बिना जानकार आदमी के और कोई इस समय कदापि न जायगा।
नागर हाँ, मुझे भी यही शक होता हैं कि ये दोनों कमलिनी के साथी या वीरेन्द्रसिंह के ऐयार हैं और ताज्जुब नहीं कि आपके तिलिस्मी बाग में जाने की नीयत से उस टीले पर जा रहे हों, क्योंकि बावाजी की जुबानी मैं कई दफे सुन चुकी हूँ कि तिलिस्मी बाग में जाने के लिए इस टीले पर से भी एक रास्ता है।
मायारानी–हाँ, यह तो मैं भी जानती हैं कि इस टीले पर से मेरे तिलिस्मी बाग में जाने का रास्ता है मगर इस राह से क्योंकर जाया जा सकता है, इसकी मुझे खबर नहीं है। ताज्जुब नहीं कि खून से लिखी किताब की बदौलत कमलिनी को इन सब रास्तों का हाल मालूम हो गया हो, क्योंकि वह किताब नानक और भूतनाथ की बदौलत कमलिनी के हाथ पहुँची ही होगी।
नागर बेशक ऐसा ही है। खैर, चलिए इन दोनों के पीछे-पीछे चलें। ताज्जुब नहीं कि बहुत-सी बातों का पता लग जाय।
इसके बाद मायारानी केवल नागर को साथ लिए भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे छिपकर टीले पर गई और जब वे दोनों ऐयार कोठरी के अन्दर घुसे तो बाहर छिपकर भूतनाथ तथा देवीसिंह आपस में जो बातें करने लगे, उन्हें सुनने लगी जैसा कि हम ऊपर लिख आए हैं।
उस चबूतरे पर बैठे हुए शेर के पास खड़े होकर भूतनाथ और देवीसिंह नीचे लिखी बातें करने लगे।
भूतनाथ-(शेर के सिर पर हाथ रखकर) तिलिस्म के चौथे दर्जे में जो देवमन्दिर है उसमें जाने का यही रास्ता है।
देवीसिंह-क्या राजा गोपालसिंह से वहाँ मुलाकात होगी?
भूतनाथ-अवश्य, बल्कि कमलिनी, लाड़िली और दोनों कुमार भी वहाँ मौजद होंगे।
देवीसिंह-इस दरवाजे के खोलने की तरकीब राजा गोपालसिंह ने आपको बता दी?
भूतनाथ–हाँ, राजा गोपालसिंह और कमलिनी ने भी दरवाजे के खोलने की तरकीब बताई थी, मगर यह रास्ता बड़ा ही खतरनाक है। अच्छा, अब मैं दरवाजा खोलता हूँ।
इतना कहकर भूतनाथ ने शेर की बाईं आँख में उँगली डाली। आँख अन्दर की तरफ घस गई और इसके साथ ही शेर ने मुँह खोल दिया। भूतनाथ ने दूसरा हाथ शेर शेर के मुँह में डाला और कोई पेंच घुमाया जिससे उस चबूतरे के आगेवाला पत्थर हटकर जमीन के साथ सट गया जिस पर शेर बैठा हुआ था और नीचे उतरने के लिए रास्ता मालूम पड़ने लगा। देवीसिंह ने बत्ती जलाने का इरादा किया मगर भूतनाथ ने मना किया और कहा कि नहीं, तुम चुपचाप मेरे पीछे-पीछे चले आओ, नीचे उतर जाने के बाद बत्ती जलावेंगे। आगे-आगे भूतनाथ और पीछे-पीछे देवीसिंह, दोनों ऐयार नीचे उतरे और वहाँ बटए में से सामान निकालकर भूतनाथ ने मोमबत्ती जलाई। वह एक कोठरी थी जिसमें तीन तरफ तो दीवार थी और एक तरफ की दीवार सुरंग के रास्ते के तौर पर थी अर्थात् उधर से किसी सरंग में जाने का रास्ता था। कोठरी के बीचोंबीच में लोहे का एक-एक खम्भा था और खम्भे के ऊपर एक गरारीदार पहिया था जिसे भूतनाथ ने घुमाया और देवीसिंह के कहा, "जिस राह से हम आये हैं उसे यहाँ से बन्द करने की यही तरकीब है और (हाथ का इशारा करके) यही सुरंग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में गई है!" इसके बाद भूतनाथ और देवीसिंह सुरंग में घुसकर आगे की तरफ बढ़े।
इस सुरंग की चौड़ाई चार हाथ से ज्यादा न होगी। यहां की जमीन स्याह और सफेद पत्थरों से बनी हुई थी अर्थात् एक पत्थर सफेद तो दूसरा स्याह, इसके बाद सफेद और फिर स्याह, इसी तरह दोनों रंग के पत्थर सिलसिलेवार लगे हुए थे। सुरंग के दोनों तरफ की दीवारें लोहे की थीं और थोड़ी-थोड़ी दूर पर लोहे के बनावटी आदमी दीवार के साथ खड़े थे जो अपने लम्बे हाथ फैलाए हुए थे। भूतनाथ ने देवीसिंह की तरफ देखकर कहा, "इस राह से जाना और अपनी जान पर खेलना एक बराबर है। देखिए बहुत सम्हल कर मेरे पीछे चले आइए और इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखिए कि स्याह पत्थर पर पैर न पड़ने पावे नहीं तो जान न बचेगी। कमलिनी ने मुझे अच्छी तरह समझा कर कहा था कि सुरंग की दीवार के साथ जो लोहे के आदमी हाथ फैलाये खड़े हैं वे उस समय काम करते हैं जब कोई स्याह पत्थर पर पैर रखता है। स्याह पत्थर पर पैर रखते ही वे उसको अपने दोनों हाथों से ऐसा पकड़ लेते हैं कि फिर किसी तरह उनके कब्जे से निकल नहीं सकता। मैं समझता हूं कि इस सुरंग में कई आदमी धोखे में पड़कर मारे गये होंगे, इसलिए उचित है कि मेरे और तुम्हारे दोनों के हाथ में एक-एक मोमबत्ती रहे।
भूतनाथ की बातें सुनकर देवीसिंह ताज्जुब करने लगे, आखिर लाचार हो कर एक मोमबत्ती और जलाई और तब बड़ी होशियारी से सफेद पत्थरों पर पैर रखते हुए आगे बढ़े। यह सुरंग एकदम सीधी बनी हुई थी और इसकी जमीन हर तरह से साफ थी, जिसका सबब शायद यह हो कि यहाँ कहीं से गर्द-गबार के आने की जगह नहीं थी। फिर इस सुरंग में ऐसी कारीगरी भी की गई थी कि किसी-किसी जगह दीवार में में से साफ छनी हुई हवा आती और दूसरी राह से निकल जाती थी जिससे सुरंग की हवा हरदम साफ बनी रहती थी और उसमें जहर का असर पैदा नहीं होने पाता था।
लगभग दो सौ कदम जाने के बाद देखा कि दाहिनी तरफ दीवार के साथ वाले लोहे के एक आदमी के दोनों हाथ सिमटे हए हैं और उनके बीच में हडडी का एक ढाँचा फंसा हआ है। वह ढाँचा मनुष्य के शरीर का था जिसे देखते ही भूतनाथ ने देवीसिंह से कहा, "देखिये यह धोखा खाने का नमूना है। कोई अनजान आदमी सुरंग में आकर जान दे बैठा है, अनजान कसे कहें क्योकि यहां तक तो आ हो चुका था शाय धोखा खा गया हो।" दोनों ऐयार ताज्जुब से उस पंजर को देखने लगे, पर इसी समय यकायक देवीसिंह की निगाह पीछे की तरफ (जिधर से ये दोनों आये थे) जा पड़ी और एक रोशनी देख देवीसिंह ने ताज्जब के साथ भतनाथ से कहा, "देखिये तो वह रोशनी कैसी है?"
भूतनाथ-(बत्ती के आगे हाथ रखकर और गौर से रोशनी की तरफ देखकर) कोई आ रहा है!
देवीसिंह-दो औरतें मालूम पड़ती हैं।
भूतनाथ--ठीक है, शायद लाड़िली और कमलिनीजी हों, क्योंकि सिवाय जानकार के और कोई तो इस सुरंग में आ नहीं सकता।
देवीसिंह-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि वे कमलिनी और लाड़िली होंगी। भूतनाथ-शक तो मुझे भी होता है, खैर, चलकर देख ही क्यों न लें।
भतनाथ और देवीसिंह दोनों फिर पीछे की तरफ लौटे अर्थात उस रोशनी की तरफ बढ़े जो यकायक दिखाई दी थी। दो ही कदम बढ़े होंगे कि कोई चीज उनके सामने जमीन पर आकर गिरी और पटाके की सी आवाज हुई, इसके साथ ही उसमें से बेहोशी पैदा करने वाला जहरीला धुआँ निकला। वह तिलिस्मी गोली थी जो मायारानी ने तिलिस्मी तमंचे में भर कर भूतनाथ और देवीसिंह की तरफ चलाई थी। भूतनाथ और देवीसिंह इस गुमान में पीछे की तरफ हटे थे कि शायद वह रोशनी कमलिनी और लाडिली के साथ हो, मगर वास्तव में ये दोनों मायारानी और नागर थीं जिन्होंने छिप कर भूतनाथ और देवीसिंह की बातें सुनी थीं। जब दोनों ऐयार शेर वाला दरवाजा खोलकर तहखाने में उतर गए थे तो चर्खा चलाकर दरवाजा बन्द करने के पहले ही ये दोनों भी दरवाजे के अन्दर घुस कर दो-चार सीढ़ी नीचे उतर आई थीं और इन्होंने वे बातें भी सुन ली थीं जो नीचे उतर जाने के बाद देवीसिंह और भूतनाथ में हुई।
१०
राजा गोपालसिंह तथा कमलिनी और लाडिली को हम देवमन्दिर में छोड़ आये हैं। वे तीनों भूतनाथ के आने की उम्मीद में देर तक देवमन्दिर में रहे, मगर जब भूतनाथ न आया तो लाचार होकर कमलिनी ने गोपालसिंह से कहा--
कमलिनी-मालूम होता है कि भूतनाथ किसी काम में फंस गया। खैर, अब हम लोगों को यहाँ व्यर्थ रुकना उचित नहीं क्योंकि अभी बहुत-कुछ काम करना बाकी है।
गोपालसिंह-ठीक है, मगर जहाँ तक मैं समझता हूँ, तुम्हारे करने योग्य इस समय कोई काम नहीं है क्योंकि दोनों कुमार तिलिस्म के अन्दर जा ही चुके हैं, और बिना तिलिस्म तोड़े अब उनका बाहर निकलना कठिन है, हाँ, कम्बख्त मायारानी के विषय में बहुत कुछ करना है सो उसके लिए मैं अकेला काफी है, इसके अतिरिक्त और जो कुछ काम है उसे ऐयार लोग बखूबी कर सकते हैं।
कमलिनी-आपकी बातों से पाया जाता है तो कि मेरे यहाँ रहने की अब कोई आवश्यकता नहीं। गोपालसिंह-बेशक मेरे कहने का यही मतलब है।
कमलिनी-अच्छा तो मैं लाड़िली को साथ लेकर अपने घर जाती हूँ, उधर ही से रोहतासगढ़ पर ध्यान रक्लूंगी।
गोपालसिंह- हाँ तुम्हें वहाँ अवश्य जाना चाहिए क्योंकि किशोरी और कामिनी भी उसी मकान में पहुँचा दी गई हैं, उनसे जब तक न मिलोगी तब तक वे बेचैन रहेंगी, इसके अतिरिक्त कई कैदियों को भी तुमने वहाँ भिजवाया है, उनकी भी खबर लेनी चाहिए।
कमलिनी अच्छा, थोड़ी-देर तक भूतनाथ की राह और देख लीजिए।
आधी रात बीत जाने के बाद तीनों आदमी वहां से रवाना हुए। वे पहले उस गोल खम्भे के पास आये जो कमरे के बीचोंबीच में था और जिस पर तरह-तरह की मूरतें बनी हुई थीं। राजा गोपालसिह न एक मूरत पर हाथ रख कर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखाई दी। दोनों सालियों को साथ लिए हुए गोपालसिंह उस खिड़की के अन्दर घुस गये; जहाँ नीचे उतरने के लिए सीढियाँ बनी हई थीं। यद्यपि उसके अन्दर एक दम अँधेरा था. मगर तीनों आदमी अन्दाज से उतरते चले गए, जब नीचे एक कोठरी में पहुँचे तो गोपालसिंह ने मोमबत्ती जलाई। मोमबत्ती जलाने का सामान उसी कोठरी में एक आले पर रक्खा हआ था जिसे अँधेरे में ही गोपालसिंह ने खोज लिया था। वह कोठरी लगभग दस हाथ के चौड़ी और इतनी लम्बी होगी। चारों तरफ दीवार में चार दरवाजे बने हुए थे और छत में जंजीरें लटक रही थीं। गोपालसिंह ने एक जजीर हाथ से पकड़कर खींची जिससे गोल
खम्भे वाला वह दरवाजा बन्द हो गया जिस राह से तीनों नीचे उतरे थे। इसके बाद गोपालसिंह उत्तर तरफ वाली दीवार के पास गये और दरवाजा खोलने का उद्योग करने लगे। उस दरवाजे में ताँबे की सैकड़ों कीलें गड़ी हुई थीं और हर कील के मुंह पर उभड़ा हुआ एक-एक अक्षर बना हुआ था। यह दरवाजा उसी सुरंग में जाने के लिए था जो दारोगा वाले बँगले के पीछे वाले टीले तक पहँची हुई थी या जिस सुरंग के अन्दर भूतनाथ और देवीसिंह का जाना ऊपर के बयान में हम लिख आये हैं। गोपालसिंह ने दरवाजे में लगी हुई कीलों को दबाना शुरू किया। पहले उस कील को दबाया जिसके सिरे पर 'हे' अक्षर बना हुआ था, इसके बाद 'र' अक्षर की कील को दबाया, फिर 'म' और 'ब' अक्षर की कील को दबाया ही था कि दरवाजा खुल गया और दोनों सालियों को साथ लिए हुए गोपालसिंह उसके अन्दर चले गये तथा भीतर जाकर हाथ के जोर से दरवाजा बन्द कर दिया। इस दरवाजे के पिछली तरफ भी वे ही बातें थीं जो बाहर थों अर्थात् भीतर से भी उसमें वैसी ही कीलें जड़ी हुई थीं। भीतर चार-पाँच कदम जाने के बाद सुरंग की जमीन स्याह और सफेद पत्थरों से बनी हई मिली और उसी जगह पहुँचे जहाँ भूतनाथ और देवी सिंह खड़े थे। ये लोग भी ठीक उसी समय वहाँ पहुँचे जब मायारानी की चलाई हुई गोली में से जहरीला धुआँ निकलकर सुरंग में फैल चुका था और दोनों ऐयार बेहोशी के असर से झूम रहे थे। कमलिनी, लाड़िली तथा राजा गोपालसिंह इस धुएँ से बिल्कुल बेखबर थे और उन्हें इस बात का गुमान भी न था कि मायारानी ने इस सुरंग में पहुँच कर तिलिस्मी गोली चलाई है क्योंकि गोली चलाने के बाद तुरन्त ही मायारानी ने अपने हाथ की मोमबत्ती बुझा दी थी।
राजा गोपालसिंह ने वहाँ पहुँचकर भूतनाथ और देवीसिंह को देखा। कमलिनी ने भूतनाथ को पुकारा, मगर बेहोशी का असर हो जाने के कारण उसने कमलिनी की बात का जवाब न दिया बल्कि देखते-देखते भूतनाथ और देवीसिंह वेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। कमलिनी, लाड़िली और गोपालसिंह के भी नाक और मुँह में वह धुआँ गया मगर ये उसे पहचान न सके और भूतनाथ तथा देवीसिंह के बेहोश हो जाने के बाद ही ये तीनों भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े।
आधी घड़ी तक राह देखने के बाद मायारानी और नागर ने मोमबत्ती जलाई। खुशी-खुशी उन दोनों औरतों ने बेहोशी से बचाने वाली दवा अपने मुँह में रक्खी और स्याह पत्थरों से अपने को बचाती हुई वहाँ पहुँची जहाँ कमलिनी, लाड़िली, गोपालसिंह, भूतनाथ और देवीसिंह बेहोश पड़े हुए थे।
अहा, इस समय मायारानी की खुशी का कोई ठिकाना है! इस समय उसकी किस्मत का सितारा फिर से चमक उठा। उसने हँस कर नागर की तरफ देखा और कहा
माया-क्या अब भी मुझे किसी का डर है?
नागर—आज मालूम हुआ कि आपकी किस्मत बड़ी जबरदस्त है। अब दुनिया में कोई भी आपका मुकाबला नहीं कर सकता। (भूतनाथ की तरफ देखकर) देखिए, इस बेईमान की कमर में वही तिलिस्मी खंजर है जो कमलिनी ने इसे दिया था। अहा, इससे बढ़कर दुनिया में और क्या अनूठी चीज होगी!
मायारानी-इस कम्बख्त ने मुझसे कहा था कि कमलिनी ने गोपालसिंह को भी एक तिलिस्मी खंजर दिया है। (गोपालसिंह को अच्छी तरह देखकर) हाँ, हाँ, इसकी कमर में भी वही खंजर है! ताज्जुब नहीं कि कमलिनी और लाडिली की कमर में भी इसका जोड़ा हो। (कमलिनी, लाड़िली और देवसिंह की तरफ ध्यान देकर) नहीं नहीं, और किसी के पास नहीं है। खैर दो खंजर तो मिले, एक मैं रक्खूगी और एक तुझे दूँगी। इसमें जो-जो गुण हैं भूतनाथ की जुबानी सुन ही चुकी हूँ, अच्छा भूतनाथ का खंजर तू ले-ले और इसका मैं लेती हूँ।
खुशी-खुशी मायारानी ने पहले गोपालसिंह की उँगली से वह अंगूठी उतारी जो तिलिस्मी खंजर के जोड़ की थी और इसके बाद कमर से खंजर निकालकर अपने कब्जे में किया। नागर ने भी पहले भूतनाथ के हाथ से अंगूठी उतार कर पहन ली और तब खंजर पर कब्जा किया। मायारानी ने हँसकर नागर की तरफ देखा और कहा, "अब इसी खंजर से इन पाँचों दुष्टों को इस दुनिया से उठाकर हमेशा के लिए निश्चिन्त होती हूँ!"
११
मायारानी ने गोपालसिंह को मारने के लिए जैसे ही खंजर उठाया, वैसे ही नागर ने फुर्ती से उसकी कलाई पकड़ ली और कहा--
नागर-ठहरो-ठहरो! जल्दी न करो, आखिर ये लोग तुम्हारे कब्जे में तो आ ही चुके हैं और अब किसी तरह छूटकर जा नहीं सकते। फिर बिना अच्छी तरह विचार किए जल्दी करने की क्या आवश्यकता है। क्या जाने, सोचने-विचारने से कुछ विशेष लाभ की सूरत ध्यान में आवे।
मायारानी-(रुक कर) तुम्हारा कहना ठीक है, परन्तु यदि दुश्मन कब्जे में आ जाय तो उसके मारने में विलम्ब करना कदापि उचित नहीं है। इसी (गोपालसिंह) को जब मैंने कैद किया था तो इसके मारने के विषय में सोच-विचार करते-करते वर्षों बिताए और अन्त में इस विलम्ब का क्या नतीजा निकला सो देख ही रही हो उस विलम्ब ही के कारण आज मैं फकीरिन होकर भी (गला भर आने के कारण रुक कर) आज ईश्वर ने मुझ पर कृपा की है और दुश्मनों को मेरे कब्जे में कर दिया है। ताज्जुब नहीं कि इनके मारने में देर तथा सोच-विचार करने का वही नतीजा हो जो पहले हो चुका है।
नागर-ठीक है और मैं भी इसी में प्रसन्न हूँ कि जहाँ तक हो सके ये लोग शीघ्र मार डाले जायँ। अहा, कमलिनी के सहित गोपालसिंह का फँस जाना क्या कम खुशी की बात है, और फिर इन दोनों के साथ ही वेईमान भूतनाथ का भी... मायारानी--(बात काट कर)—आ फंसना, जिसने मेरे साथ सख्त दगा की थी, कम खुशी की बात नहीं है।
नागर–बेशक, परन्तु मैं इन कम्बख्तों की जान ले लेने में विशेष विलम्ब करने के लिए नहीं कहती, हाँ इतनी देर तक रुक जाने के लिए अवश्य कहती हूँ जितनी देर में हम लोग इस बात को बखूबी सोच लें कि इन दुष्टों को मारने के बाद इस सुरंग का भेद मालूम न होने पर भी हम लोग यहाँ से निकल जा सकेंगे या नहीं?
मायारानी-क्यों, क्या हम लोगों को यहाँ से निकल जाने में किसी तरह की रुकावट हो सकती है? क्या हम लोगों ने भूतनाथ और देवीसिंह की बातें उस समय अच्छी तरह नहीं सुनीं जिस समय दोनों ऐयार सुरंग में उतर चुके थे? क्या उसी रीति से सुरंग का दरवाजा न खुल सकेगा जिस रीति से बन्द किया गया है?
नागर-इन बातों का ठीक-ठीक जवाब मैं नहीं दे सकती, बल्कि इन्हीं बातों पर विचार करने के लिए कुछ देर तक ठहरने को कहती हूँ।
मायारानी-(खंजर म्यान में रखकर और कुछ सोचकर) अच्छा-अच्छा, कुछ देर ठहर जाने में कोई हर्ज नहीं है, इन सभी की बेहोशी यकायक दूर नहीं हो सकती, चलो, पहले उस दरवाजे को खोलकर देखें कि वह खुलता है या नहीं। इतना कहकर नागर को साथ लिए हुए मायारानी सुरंग के दरवाजे की तरफ बढ़ी। जब उस लोहे के खम्भे के पास पहुँची जिस पर वह गरारीदार पहिया था जिसे घुमाकर भूतनाथ ने सुरंग का दरवाजा बन्द किया था तो रुकी और नागर की तरफ देखकर बोली, "इसी पहिए को घुमाकर भूतनाथ ने दरवाजा बन्द किया था।"
नागर-जी हाँ, अब इसी पहिये को उल्टा घुमाकर देखना चाहिए कि दरवाजा खुलता है या नहीं।
मायारानी -अच्छा, तुम्हीं इस पहिये को घुमाओ।
नागर ने उस पहिये को कई दफे उल्टा घुमाया और वह बखूबी घूम गया, इसके बाद दोनों औरतें यह देखने के लिए सीढ़ी पर चढ़ीं कि दरवाजा खुला या नहीं, मगर दरवाजा ज्यों-का-त्यों बन्द था। मायारानी को बहुत ताज्जुब हुआ और वह घबरायी सी होकर नीचे उतर आई और नागर की तरफ देखकर बोली, "तुम्हारा सोचना ठीक निकला।"
नागर-इसी से मैंने आपको रोका था, यदि आप जोश में आकर इन सभी को मार डालतीं तो फिर हम लोग भी इसी सुरंग में मर मिटते।
मायारानी–बेशक-बेशक। (कुछ सोचकर) अच्छा, एक बार उधर चलकर देखना चाहिए जिधर से यह (गोपालसिंह) आया है, शायद उधर का दरवाजा खुला हो। चलिए देखिए, शायद कुछ काम निकले। मगर ताज्जुब नहीं कि लौटने तक इन लोगों की बेहोशी जाती रहे।
मायारानी–हाँ, ऐसा हो सकता है। अच्छा, तो इन लोगों के हाथ-पैर कसकर बाँध देने चाहिए जिसमें यदि बेहोशी जाती भी रहे तो कुछ न कर सकें।
नागर ने उन सभी को अच्छी तरह गौर से देखा जो उस जगह बेहोश पड़े थे। भूतनाथ और देवीसिंह की कमर में कमन्द मौजूद थे, उन्हें खोल लिया और दोनों ने मिलकर उन्हीं कमन्दों से भूतनाथ, देवीसिंह, कमलिनी, लाड़िली और गोपालसिंह के हाथ-पैर बेरहमी के साथ खूब कसकर बाँध दिए और इसके बाद दोनों औरतें उसी तरफ चलीं जिधर से कमलिनी और लाड़िली को साथ लिए हए राजा गोपालसिंह आये थे।
मायारानी और नाग़र मोमबत्ती की रोशनी में स्याह पत्थरों को बचाती हुई उस दरवाजे के पास पहुँची जिसे खोलकर राजा गोपाल सिंह आए थे। यह वही दरवाजा था जिसमें अक्षरों वाले कील जड़े हुए थे और किसी अनजान आदमी से इसका खुलना बिल्कुल ही असम्भव था। मायारानी ने इसको खोलने का बहुत-कुछ उद्योग किया, मगर कुछ काम न चला। लाचार होकर उसने तरद और घबराहट की निगाह नागर पर डाली।
नागर-मेरा सोचना बहत ठीक निकला। यदि वे लोग मार डाले जाते तो निःसन्देह हम दोनों की मौत भी इसी सुरंग में हो जाती।
मायारानी-सच है, मगर अब क्या करना चाहिए? जहाँ तक मैं सोचती हूँ, इसके जवाब में तुम यही कहोगी कि इनमें से किसी को होश में लाकर जिस तरह बन पड़े, दरवाजा खोलने की तरकीब मालूम करनी चाहिए।
नागर-जी हाँ, क्योंकि सिवाय इसके कोई दूसरी बात ध्यान में नहीं आती।
मायारानी–खैर, यदि ऐसा हो भी जाय अर्थात् इन पाँचों में से किसी को होश में लाने और डराने-धमकाने से दरवाजा खुलने का भेद मालूम हो जाय तो फिर क्या किया जायगा? मैं समझती हूँ कि तुम यही कहोगी कि दरवाजे का भेद मालूम होने के बाद इन पांचों को कत्ल कर देना चाहिए।
नागर-नहीं, मेरी यह राय नहीं है, बल्कि मैं इन लोगों को उस समय तक कैद में रखना मुनासिब समझती हूँ जब तक कि रिक्तगन्थ और अजायबघर की ताली, जो तुमने भूतनाथ को दे दी है, अपने कब्जे में न आ जाय।
मायारानी-ओफ! मैं वास्तव में सैकड़ों आफतों में घिरी हुई हूँ। (कुछ सोच कर) खैर, कोई चिन्ता नहीं है। देखो तो, क्या होता है। मैं इन लोगों को जीता कदापि न छोड़गी। (रुककर) हाँ, जरा ठहरो, इन पाँचों में से किसी को होश में लाने के पहले सभी की तलाशी अच्छी तरह ले लेनी चाहिए। ताज्जुब नहीं कि रिक्तगन्थ और अजायबघर की ताली भी इन लोगों में से किसी के पास हो।
नागर-हाँ, मुमकिन है कि वे दोनों चीजें इन लोगों के पास हों। अच्छा, चलो, सबसे पहले यही काम किया जाय।
नागर को साथ लिए हुए मायारानी फिर उस जगह पहुंची जहाँ गोपालसिंह और भूतनाथ वगैरह बेहोश पड़े थे। हम ऊपर लिख आये हैं कि राजा गोपालसिंह और भूतनाथ के पास जो तिलिस्मी खंजर था, वह मायारानी ले चुकी है। एक खंजर उसने अपने पास रखा और दूसरा नागर को दे दिया। फिर उसने सबसे पहले भूतनाथ के बटुए की तलाशी ली, मगर उसमें कोई ऐसी चीज न निकली जो मायारानी के काम की होती। यद्यपि तरह-तरह की दवाओं और मसालों से भरी हुई कई खूबसूरत डिबियाएँ नजर आईं, मगर उनका गुण न मालूम होने के कारण मायारानी के लिए वे बिल्कुल ही बेकार थीं। जब वटुए में से अपने मतलब की कोई चीज न पाई तो कमर और कपड़ों की जेबें आदि भी अच्छी तरह टटोलीं, मगर उससे भी कुछ काम न चला। अन्त में उदास होकर वह राजा गोपालसिंह की तरफ लौटी और उनकी तलाशी लेने लगी।
ऊपर का बयान पढ़ने से पाठकों को मालूम हो ही चुका होगा कि अजायबघर की ताली, जो मायारानी ने भूतनाथ को दी थी, वह राजा गोपालसिंह ने भूतनाथ से ले ली थी। इस समय वही अजायबघर की ताली राजा गोपालसिंह के पास थी जो तलाशी लेने के समय मायारानी के हाथ लगी। ताली पाकर वह बहुत खुश हुई और नागर की तरफ देखकर बोली
मायारानी-लीजिए, अजायबघर की ताली तो मिल गई। अब कोई परवाह नहीं। यद्यपि मुझे मालूम हो चुका है कि मेरी फौज मुझसे बिगड़ गई, मेरा दीवान मुझसे दुश्मनी करने को तैयार है, तुम्हारे मकान का भेद वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों को मालूम हो चुका है और इस सबब से मुझे रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं है, मगर अब अजायबघर की ताली मिल जाने से मुझे बहुत-कुछ भरोसा हो गया। मैं अब खुशी से दारोगा वाले बँगले में रहकर अपने दुश्मनों से बदला ले सकती हूँ, फौजी सिपाहियों के दिल से शक दूर करके अपना रुआब जमा सकती हूँ और उन्हें ठीक करके अपने ढर्रे पर ला सकती हूँ। कम्बख्त दीवान को भी सजा देना कोई बड़ी बात नहीं है। इसके सिवाय तिलिस्मी खंजर की बदौलत मुश्किल से मुश्किल काम सहज ही में कर सकूँगी!
नागर-ठीक है, अच्छा देखिये, शायद रिक्तगंथ भी इन लोगों में से किसी के पास हो। मायारानी ने फिर तलाशी लेना शुरू किया। गोपालसिंह के बाद कमलिनी, लाड़िली और देवीसिंह की भी तलाशी ली, मगर रिक्तगन्थ (खून से लिखी किताब) का पता न लगा और न कोई ऐसी चीज ही मिली जो मायारानी के मतलब की होती। आखिर लाचार होकर यह निश्चय किया कि भूतनाथ को होश में लाकर और डरा-धमका कर दरवाजा खोलने की तरकीब जाननी चाहिए। मायारानी की आज्ञानुसार नागर ने अपने बटए में से लखलखा निकाला और भूतनाथ को सुंघाने के लिए आगे बढ़ी ही थी सुरंग के सिरे पर (जिधर से भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे मायारानी और नागर आई थीं) रोशनी दिखाई दी। नागर ने भूतनाथ को लखलखा सुंघाने के लिए जो हाथ बढ़ाया था रोक किया, लखलखे की डिबिया जमीन पर रखकर तिलिस्मी खंजर म्यान से निकाल लिया, और अपने हाथ की मोमबत्ती बुझाकर मायारानी से बोली, "देखिये मैंने मोमबत्ती बुझाकर अँधेरा कर दिया, अब आप इधर-उधर मत हटिये, कहीं ऐसा न हो कि स्याह पत्थर पर पैर पड़ जाय। और आप भी तिलिस्मी खंजर अपने हाथ में ले लीजिए, ताज्जुब नहीं कि यह आने वाला हम लोगों का दुश्मन और वीरेन्द्रसिंह का कोई ऐयार हो।"
मायारानी—(तिलिस्मी खंजर के कब्जे पर हाथ रख के) यद्यपि तुमने मोमबत्ती बुझा दी है, मगर उस आने वाले की नजर पहले ही इस रोशनी पड़ चुकी होगी। (गौर से देखकर) मगर मुझे तो मालूम होता है कि यह हमारे दारोगा साहब हैं, जिन्हें हम लोग बाबाजी भी कहते हैं।
नागर-शक तो मुझे भी होता है। (रुककर) हाँ, अब वे कई कदम आगे बढ़ आये हैं। इससे उनकी दाढ़ी और जटा साफ दिखाई दे रही है। ठीक है निःसन्देह यह दारोगा साहब ही हैं! न मालूम राजा वीरेन्द्रसिंह की कैद से ये क्योंकर निकल आये! इनका छूट आना हम लोगों के लिए बहुत अच्छा हुआ!
मायारानी—बेशक, इनके छूटकर चले आने से मुझे खुशी होती, अगर वे इस समय यहाँ न आते, क्योंकि गोपालसिंह के बारे में मैंने लोगों को जो कुछ धोखा दिया है, इनकी खबर इन्हें भी नहीं है, इसलिए ताज्जुब नहीं कि गोपालसिंह को यहाँ देखकर दारोगा साहब जोश में आ जायें और मुझसे थुक्काफजीती करने के लिए तैयार हो जायें, क्योंकि इनके दिल में राजा को बहुत मुहब्बत थी। ओह, इस समय इनका यहाँ आना बहुत ही बुरा हुआ। खैर, तू होशियार रहना। इस तिलीस्मी खंजर का गुण इन्हें मालूम न होने पाये और न गोपालसिंह के बारे में कुछ
नागर-बहुत अच्छा, मैं कुछ भी न बोलूंगी। लीजिये, अब वे बहुत पास आ गए। बेशक, दारोगा साहब ही हैं। अब अगर हम भी मोमबत्ती जला लें तो कोई हर्ज नहीं।
मायारानी-कोई हर्ज नहीं।
ऊपर लिखी बातें मायारानी और नागर में बहुत चुपके और जल्दी के साथ हुई। नागर ने मोमबत्ती जलाई और इसके बाद दोनों औरतें आगे अर्थात् दारोगा की तरफ बढ़ीं। दारोगा ने भी इन दोनों को पहचाना और जब वह मायारानी के पास पहुंचा तो हँसकर बोला, "ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि मैं राजा वीरेन्द्रसिंह के कब्जे से निकलकर चला आया और तुमको राजी खुशी अपने सामने देख रहा हूँ।"
मायारानी-(बनावटी हँसी के साथ) आपके छूट आने की मुझे हद से ज्यादा खुशी हुई। इधर थोड़े दिनों से मैं तरह-तरह की मुसीबतों में पड़ी हूँ, जिसकी कुछ भी आशा न थी और यह सब आपके न रहने से ही हुआ।
दारोगा-हाँ, मुझे भी बहुत-सी बातों का पता लगा है। इस समय जब मैं अपने बँगले में पहुँचा तो वहाँ लीला और कई लौंडियों को पाया। बहुत-सा हाल तो वहाँ लीला की जुबानी मालूम हुआ, यह भी उसी से सुना कि टीले पर दो आदमियों को आते देखकर मायारानी और नागर भी उसी तरफ गई हैं। यही सुनकर मैं भी इस सुरंग में आया हूं, नहीं तो मुझे यहाँ आने की कोई जरूरत न थी।
मायारानी-जी हाँ, मैं वीरेन्द्रसिंह के ऐयार भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे यहाँ आई। इस सुरंग का भेद मुझे कुछ भी मालूम न था। और आपने भी इस विषय में आज तक कुछ नहीं कहा था, भूतनाथ ने सुरंग का दरवाजा खोला और उसके पीछेपीछे छिपकर मैं यहाँ तक चली तो आई, मगर यहाँ से किसी तरह निकल नहीं सकती हूँ। क्योंकि भूतनाथ ने सुरंग के अन्दर आकर दरवाजा बन्द कर दिया था और अब मुझसे वह दरवाजा किसी तरह नहीं खुल रहा है। ईश्वर ने बड़ी कृपा की जो इस समय आपको यहाँ भेज दिया, चलिए पीछे हटिये, पहले मुझे दरवाजा खोलने की तरकीब बता दीजिए, और कुछ बातचीत पीछे होगी?
दारोगा—(हँसकर) अब तो मैं आ ही चुका हूँ, तुम क्यों घबराती हो? पहले यह तो वताओ कि वे दोनों ऐयार कहाँ हैं, जिनके पीछे-पीछे तुम यहाँ आई थी?
इस समय मायारानी की विचित्र अवस्था थी। वह मुँह से बातें तो कर रही थी मगर दिल में यही सोच रही थी कि किसी तरह राजा गोपालसिंह का भेद छिपाना चाहिए, जिसमें बाबाजी (दारोगा) को यह न मालूम हो कि मैंने वर्षों से गोपालसिंह को कैद कर रखा था, मगर इसके बचाव की कोई सूरत ध्यान में नहीं आती थी। वह अपने उछलते हुए कलेजे को दबाने की कोशिश कर रही थी, मगर वह किसी तरह दम नहीं लेता था। उसके चेहरे पर भी खौफ और तरद्दुद की निशानी पाई जाती थी। जो उस समय और भी ज्यादा हो गयी, जब बाबाजी ने यह कहा-"वे दोनों ऐयार कहाँ हैं जिनके पीछे-पीछे तुम यहाँ आई थीं?" आखिर लाचार होकर मायारानी ने बातें बना कर अपना काम निकालना चाहा और अपने को अच्छी तरह संभालकर बातचीत करने लगी।
मायारानी-(पीछे की तरफ इशारा करके) वे दोनों ऐयार उधर पड़े हुए हैं। मैंने अपनी हिकमत से उन्हें बेहोश करके छोड़ दिया है। केवल वे दोनों ही नहीं, बल्कि कमलिनी और लाड़िली भी मय एक ऐयार के मेरे फन्दे में आ पड़ी हैं जिनसे यकायक इसी सुरंग में मुलाकात हो गई थी।
बाबाजी-(चौंककर) कमलिनी और लाड़िली!
मायारानी-जी हां, शायद आपने अभी तक सुना नहीं कि लाड़िली भी कमलिनी से मिल गई।
बाबाजी-ओफ! यह खबर मुझे वहाँ क्योंकर मिल सकती थी, क्योंकि मैं ऐसे तहखाने में कैद था, जहाँ हवा का भी जाना मुश्किल से हो सकता था। खैर चलो, मैं जरा उन ऐयारों की सूरत तो देखूँ।
अब बाबाजी उधर बढ़े जहाँ राजा गोपालसिंह, कमलिनी, लाडिली और दोनों ऐयार बेहोश पड़े थे। बाबाजी के पीछे-पीछे मायारानी और नागर भी स्याह पत्थरों को बचाती हुई उसी तरफ बढ़ीं। वहाँ की जमीन में बनस्बित सफेद पत्थरों के स्याह पत्थर की पटरियां (सिल्ली) बहुत कम चौड़ी थीं। यद्यपि बाबाजी से मायारानी डरती-दबती और साथ ही इसके उनकी इज्जत और कदर भी करती, परन्तु इस समय उसकी अवस्था में फर्क पड़ गया था। वह धड़कते हुए कलेजे के साथ चुपचाप बाबाजी के पीछे जा रही थी। मगर अपना दाहिना हाथ तिलिस्मी खंजर के कब्जे पर, जो अब उसकी कमर में था, इस तरह रखे हुए थी, जैसे उसे म्यान से निकालकर काम में लाने के लिए तैयार। शायद इसका सबब यह हो कि वह बाबाजी पर वार करने का इरादा रखती थी क्योंकि उसे निश्चय था कि राजा गोपालसिंह को देखते ही बाबाजी बिगड़ खड़े होंगे और एक गुप्त भेद का, जिसकी उन्हें खबर तक न थी, पता लग जाने के कारण उसकी लानत और मलामत करेंगे। साथ ही इसके बाबाजी की चाल भी वेफिक्री की न थी, वह भी कनखियों से पीछे अगल-बगल देखते जाते थे और हर तरह से चौकन्ने मालूम पड़ते थे।
जब बाबाजी उन लोगों के पास आ पहुँचे, तो मोमबत्ती की रोशनी में एक-एक को अच्छी तरह देखने लगे। जब उनकी निगाह राजा गोपालसिंह पर पड़ी तो वे चौंके और मायारानी की तरफ देखकर बोले, "हैं, यह क्या मामला है! मैं अपनी आँखों के सामने किसे बेहोश पड़ा देख रहा हूँ!"
मायारानी-(लड़खड़ाई आवाज से) इसी के बारे में मैंने तो कहा था कि एक ऐयार भी आ फंसा है।
बाबाजी--ओफ, ये तो राजा गोपालसिंह हैं, जिन्हें मरे कई वर्ष हो गये, नहीं नहीं, मरा हुआ आदमी कभी लौटकर नहीं आता। (कुछ रुककर) यद्यपि दुःख या रंज के सबब से इनकी सूरत में फर्क पड़ गया है, परन्तु मेरे पहचानने में फर्क नहीं है। बेशक यह हमारे मालिक राजा गोपालसिंह ही हैं जिनकी नेकियों ने लोगों को अपना ताबेदार बना लिया था, जिनकी बुद्धिमानी और मिलनसारी प्रसिद्ध थीं, और जिसके सबब से इनकी ताबेदारी में रहना लोग अपनी इज्जत समझते थे। ओफ, तुमने इनके बारे में हम लोगों को धोखा दिया! यद्यपि तुम्हारी बुरी चाल-चलन को मैं खूब जानता था और जानबूझकर कई कारणों से तरह दिये जाता था, मगर मुझे यह खबर न थी कि उस चालचलन की हद यहाँ तक पहुँच चुकी है! (गोपालसिंह की नब्ज देखकर) शुक्र है कि मैं अपने मालिक को जीता पाता हूँ।
मायारानी-बाबाजी, आप जल्दी न कीजिए और बिना समझे-बूझे अपनी बातों से मुझे दुःख न दीजिए। जो मैं कहती हैं, उसे मानिये और विश्वास कीजिए कि यह वीरेन्द्रसिंह का ऐयार है और राजा की सूरत बनाकर कई दिनों से रिआया को भड़का रहा है। इसकी खबर मुझको बहुत पहले लग चुकी थी और मैंने मुनादी भी करा दी थी कि एक ऐयार राजा की सूरत बनाकर लोगों को भड़काने के लिए आया है, जो कोई उसका सिर काटकर मेरे पास लावेगा, उसे एक लाख रुपया इनाम दूँगी। आज इत्तिफाक ही से यह कम्बख्त मेरे पास हाथ आ फंसा है।
बाबाजी-(कुछ सोचकर) शायद ऐसा ही हो, मगर तुमने तो कहा था कि मैं भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे इस सुरंग में आई हूँ, फिर ये लोग तुम्हें कैसे मिले? क्या ये लोग पहले ही से सुरंग में मौजूद थे?
मायारानी–हाँ, जब मैं सुरंग में आ चुकी और भूतनाथ तथा देवीसिंह को बेहोश कर चुकी, उसके बाद शायद ये लोग (हाथ का इशारा करके) इस तरफ से यहाँ आ पहुँचे। उस समय बेहोशी वाली बारूद से निकला धुआँ यहाँ भरा हुआ था, जिसके सबब से ये लोग भी बेहोश होकर लेट गये।
बाबाजी-बेहोशी वाली बारूद से निकला हुआ धुआँ! क्या तुमने इन लोगों को किसी नई रीति से बेहोश किया है?
मायारानी-जब मैं दुःखी होकर अपने घर से भागी तो (तिलिस्मी तमंचा और
गोली दिखाकर) यह तिलिस्मी तमंचा और गोली निकालकर लेती आई थी। इसी के जरिए से चलाई हुई तिलिस्मी गोली ने अपना काम किया। आप तो इसका हाल जानते ही हैं।
बाबाजी-ठीक है, (राजा गोपालसिंह की तरफ देखकर) मगर मैं कैसे कहूँ कि यह वीरेन्द्रसिंह का ऐयार है! अच्छा, देखो मैं अभी इसका पता लगाये लेता हूँ।
बाबाजी ने अपने झोले में से एक शीशी निकाली, जिसमें किसी तरह का अर्क था, उस अर्क से अपनी उँगली तर करके राजा गोपालसिंह के गाल में जहाँ एक तिल का दाग था लगाया और कुछ ठहरकर कपड़े से पोंछ डाला तथा फिर गौर करने के बाद बोले
बाबाजी-नहीं-नहीं, यह वीरेन्द्रसिंह के ऐयार नहीं हैं, इन्होंने अपने चेहरे को रंगा नहीं है और न नकली तिल का दाग ही बनाया है! अगर ऐसा होता तो इस दवा के लगाने से छूट जाता। ये बेशक राजा गोपालसिंह हैं और तुमने इनके बारे में निःसंदेह हम लोगों को धोखा दिया!
मायारानी-ऐसा न समझिए, वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग अपने चेहरे पर कच्चा रंग नहीं लगाते। अभी हाल ही में तेजसिंह ने मेरे ऐयार बिहारीसिंह को धोखा दिया, उसने उसका चेहरा एसा रंग दिया था कि हजार उद्योग करने पर भी बिहारी सिंह उसे साफ न कर सका। इसका खुलासा हाल आप सुनेंगे तो ताज्जुब करेंगे। वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग बड़े धूर्त और चालाक हैं।
बाबाजी-मगर नहीं, मेरी दवा बेकार जाने वाली नहीं है। हाँ, एक बात हो सकती है।
मायारानी-वह क्या?
बाबाजी-शायद तुमने राजा गोपालसिंह के बारे में हम लोगों को धोखा न दिया हो और खुद ये ही हम लोगों को धोखा देकर कही चले गये हों।
मायारानी-नहीं, यह भी नहीं हो सकता।
बाबाजी–बेशक नहीं हो सकता। अच्छा, मैं इन्हें होश में लाता हूँ, जो कुछ है इनकी बातचीत से आप ही मालूम हो जायगा।
मायारानी-नहीं-नहीं, ऐसा न कीजिए, पहले इन सबों को इसी तरह बेहोश ले जाकर अपने बँगले में कैद कीजिए, फिर जो होगा, देखा जायगा।
बाबाजी-मैं यह बात नहीं मान सकता!
मायारानी-(जोर देकर) जो मैं कहती हूँ वही करना होगा!
बाबाजी-कदापि नहीं, मुझे इस विषय में बहुत-कुछ शक है और राजा साहब के साथ ही साथ मैं कमलिनी और लाड़िली को भी होश में लाऊँगा।
इसे सुनते ही मायारानी की हालत बदल गयी, क्रोध के मारे उसके होंठ कांपने लगे, उसकी आँखें लाल हो गयी और वह तिलिस्मी खंजर म्यान से निकालकर क्रोध-भरी आवाज में बाबाजी से बोली, "क्या तुम्हें किसी तरह की शेखी हो गई है? क्या तुम मेरा हुक्म काट सकते हो? क्या तुम अपने को मुझसे बढ़कर समझते हो? क्या तुम नहीं जानते कि मैं तिलिस्म की रानी हूँ, जो चाहूँ सो कर सकती हूँ और तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते? लो, मैं साफ-साफ कहे देती हूँ कि बेशक यह गोपालसिंह हैं। धनपत के साथ सुख भोगने और इनको सताकर तिलिस्म का भेद जानने के लिए मैंने इन्हें कैद कर रखा था, मगर कम्बख्त कमलिनी ने इन्हें कैद से छुड़ा दिया। अब मैं तुम्हारे सामने इन सभी का सिर काटकर अपना गुस्सा मिटाऊँगी और तुम मेरा कुछ भी नहीं कर सकते, अगर ज्यादा सिर उठाओगे तो (खंजर दिखाकर) इसी खंजर से पहले तुम्हारा काम तमाम करूँगी!"
बाबाजी-(हँसकर) बस-बस, बहुत उछल-कूद न करो। यद्यपि मैं बुड्ढा हूँ। तथापि तुम दो औरतों से किसी तरह हार नहीं सकता। मैं वही करूँगा, जो मेरे जी में आवेगा। यदि तुम इस तिलिस्म की रानी हो तो मैं भी तिलिस्म का दारोगा हूँ, मेरे पास भी अनूठी चीजें हैं, इसके अतिरिक्त तुम मुझसे बिगाड़ करके कुछ फायदा भी नहीं उठा सकती और अब तो तुमने साफ कबूल ही लिया कि...
मायारानी-(बात काटकर) हां-हाँ, कबूल लिया और फिर भी कहती हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा कुछ हर्ज नहीं हो सकता। तुम्हें अपने दारोगापन की शेखी है तो देखो, मैं अपनी ताकत तुमको दिखाती हूँ।
इतना कह कर मायारानी ने तिलिस्मी खञ्जर का कब्जा दबाया। उसमें से बिजली की तरह चमक पैदा हुई और जब कब्जा ढीला किया तो चमक बन्द हो गई, मगर बाबाजी पर इसका कुछ असर न हुआ जिससे मायारानी को बड़ा ताज्जुब हुआ। आखिर उसने बेहोश करने की नीयत से तिलिस्मी खञ्जर बाबाजी के बदन से लगाया मगर इससे भी कुछ नतीजा न निकला, बाबाजी ज्यों के त्यों खड़े रह गए। अब तो मायारानी के ताज्जुब का कोई ठिकाना न रहा और वह घबराकर बाबाजी का मुँह देखने लगी। अगर तिलिस्मी खंजर में से चमक न पैदा होती तो उसे शक होता कि यह तिलिस्मी खंजर शायद वह नहीं है जिसकी तारीफ भूतनाथ ने की थी मगर अब वह इस खंजर पर किसी तरह का शक भी नहीं कर सकती थी।
बाबाजी--(हँसकर) कहो मेरा घमण्ड वाजिब है या नहीं?
मायारानी-(तिलिस्मी खंजर की तरफ देखकर) शायद इसमें कुछ...
बाबाजी--(बात काटकर) नहीं-नहीं, इस खंजर के गुण में किसी तरह का फर्क नहीं पड़ा। मैं इस खंजर को खूब जानता हूँ। यद्यपि तुम्हारे लिए यह एक नई चीज है परन्तु मैं अपने (राजा गोपालसिंह की तरफ इशारा करके) इस मालिक की बदौलत इसी प्रकार और गुण के कई खंजर, कटार, तलवार और नेजे देख चुका हूँ और उनसे काम भी ले चुका हूँ, मगर जब मैं तिलिस्मी कामों में सिद्ध के बराबर हो गया तब मेरे दिल से ऐसी तुच्छ चीजों की कदर और इज्जत जाती रही। तुम देखती हो कि इस खंजर का मुझ पर कुछ भी असर नहीं होता। असल तो यह है कि तुम मेरी ताकत को नहीं जानती हो, तुम्हें नहीं मालूम है कि खाली हाथ रहने पर भी मैं क्या-क्या कर सकता हूँ! बस मैं अपनी ताकत का हाल खोलना उचित नहीं समझता, परन्तु अफसोस, तुम मुझी को मारने के लिए तैयार हो गई! खैर, कोई चिन्ता नहीं, आज तक मैं तुम्हारी इज्जत करता रहा, और तुमने जो कुछ भला-बुरा किया उसे देखकर भी तरह देता गया, मगर अब देखता हूँ तो तुम
मायानानी-(बात काटकर) सुनिए-सुनिए, आप जो कुछ कहेंगे मैं समझ गई। मेरी यह नीयत न थी और न है कि आपकी जान लूँ क्योंकि केवल आप ही के भरोसे पर मैं कूद रही हूँ, और आप ही की मदद से बड़े-बड़े बहादुरों को मैं कुछ नहीं समझती। यह तो साफ जाहिर है कि थोड़े ही दिन आप मुझसे अलग रहे और इसी बीच में मेरी सब दुर्दशा हो गयी। मैं आपको पिता के समान मानती हूँ इसलिए आशा है कि (हाथ जोड़ कर) इस समय जो कुछ मुझसे भूल हो गई उसे आप बाल-बच्चों की भूल के समान मानकर क्षमा करेंगे, मगर इस कसूर से मेरा असल मतलब सिर्फ इतना ही था कि किसी तरह राजा गोपालसिंह के मारने पर आपको राजी करूँ।
बाबाजी पर तिलिस्मी खंजर का कुछ भी असर न होते देख मायारानी का कलेजा धड़कने लगा, वह बहुत डरी और उसे विश्वास हो गया कि तिलिस्मी कारखाने में जितना बाबाजी का दखल और जानकारी है उसका सोलहवां हिस्सा भी उसकी नहीं है और उसी के साथ तिलिस्मी चीजों से बाबाजी ने बहुत कुछ फायदा भी उठाया है। यह भी उसी फायदा का असर है कि राजा वीरेन्द्रसिंह की कैद से सहज ही में छूट आए और ऐसे अद्भुत तिलिस्मी खंजर को तुच्छ समझते हैं तथा इसका असर इन पर कुछ भी नहीं होता। अब वह इस बात को सोचने लगी कि ऐसे बाबाजी से बिगाड़ करना उचित नहीं बल्कि जिस तरह हो सके उन्हें राजी करना चाहिए, फिर मौका मिलने पर जैसा होगा देखा जाएगा।
ऐसी-ऐसी बहुत-सी बातें मायारानी तेजी के साथ सोच गई और उसी सबब से वह अधीनता के साथ बाबाजी से बात करने लगी। जब वह अपनी बात खत्म करके चुप हो गई तो बाबाजी ने मुस्कुरा दिया और कुछ सोचकर कहा, खैर मैं तुम्हारे इस कसूर को माफ करता हूँ मगर यह नहीं चाहता कि राजा गोपालसिंह को किसी तरह की तकलीफ हो जिन्हें मुद्दत के बाद आज मैं इस अवस्था में देख रहा हूँ।"
मायारानी-तब आपने माफ ही क्या किया? यद्यपि आपको इस बात का रंज है कि मैंने गोपालसिंह के साथ दगा की और यह भेद आपसे छिपा रक्खा मगर आप भी तो जरा पुरानी बातों को याद कीजिए! खास करके उस अंधेरी रात की बात जिसमें मेरी शादी और पुतले की बदलौअल हुई थी! वह सब कर्म तो आप ही का है! आप ही ने मुझे यहाँ पहुँचाया। अब अगर मेरी दुर्दशा होगी तो क्या आप बच जाएँगे? फिर मान लिया जाय कि आप गोपालसिंह को बचा भी लें तो क्या 'लक्ष्मीदेवी' का बच के निकल जाना आपके लिए दुःखदायी न होगा? और जब इस बात की खबर गोपालसिंह को होगी तो क्या वे आपको छोड़ देंगे? बेशक जो कुछ आज तक मैंने किया है सब आप ही का कसूर समझा जायगा। मैंने, इस बात का पता न लग जाय कि दरोगा की करतूत ने लक्ष्मीदेवी की जगह
इतना कहकर मायारानी चुप हो गई और बड़े गौर से बाबाजी की सूरत देखने लगी, मानो इस बात का पता लगाना चाहती है कि बाबाजी के दिल पर उसकी बातों का क्या असर हुआ। दरोगा साहब भी मायारानी की बातें सुनकर तरद्दुद में पड़ गए और न मालम क्या सोचने लगे। थोड़ी देर बाद दरोगा ने सिर उठाया और मायारानी की तरफ देख कर कहा, "अच्छा, अब विशेष बातों की कोई जरूरत नहीं है। मैं वादा करता हूँ कि गोपालसिंह के बारे में तुम पर किसी तरह का दबाव न डालूँगा और इससे न करूँगा कि इनके मारने का विचार न करके थोड़े दिनों तक इन्हें कैद ही ज्यादा कु में रखना आवश्यक है, बल्कि कमलिनी, लाडिली, भूतनाथ और देवीसिंह को भी कैद ही में रखना चाहिए। हाँ जब मैं उन आफतों को दूर कर लूँ जिनके कारण तुम्हें अपना जोड़ना पड़ा और तुम्हें फिर उसी दर्जे पर पहुँचा दूँ तब जो तुम्हारे जी में आवे करना। बस-बस, इसमें दखल मत दो और जो मैंने कहा है उसे करो नहीं तो तुम्हें पूरा सुख कदापि न मिलेगा!"
मायारानी–खैर ऐसा ही सही, मगर यह तो कहिए कि इन लोगों को कैद कहाँ कीजिएगा?
बाबाजी-इसके लिए मेरा बँगला बहुत मुनासिब है। मायारानी और मेरे रहने के लिए कौन-सा ठिकाना सोच रक्खा है?
बाबाजी-वाह, क्या तुम समझती हो कि तुम्हें बहुत दिनों तक अपने राज्य से अलग रहना पड़ेगा? नहीं, दो ही तीन दिन में मैं उन सभी का मुँह काला करूँगा जो तम्हारे नौकर होकर तमसे खिलाफ हो रहे हैं और तम्हें फिर उसी दर्जे पर बिठाऊँगा जिस पर मेरे सामने तुम थीं, हाँ, एक चीज के बिना हर्ज जरूर होगा।
मायारानी-वह क्या? शायद आपका मतलब अजायबघर की ताली से है!
बाबाजी-हाँ, मेरा मतलब अजायबघर की ताली से ही है, क्या तुम उसे अपने महल ही में छोड़ आई हो?
मायारानी-जी नहीं, यह मेरे पास है, जब मैं लाचार होकर अपने घर से भागी तो एक यही चीज थी जिसे मैं अपने साथ ला सकी।
बाबाजी-वाह-वाह, यह बड़ी खुशी की बात तुमने कही। अच्छा वह ताली मेरे हवाले करो तो और कुछ बातें होंगी।
मायारानी-(अजायबघर की ताली बाबाजी को देकर) लीजिए तैयार है, अब जहाँ तक जल्द हो सके यहाँ से निकल चलना चाहिए।
बाबाजीहाँ-हाँ, मैं भी यही चाहता हूं, भला यह तो कहो कि यह तिलिस्मी खंजर तुमने कहाँ से पाया? मायारानी—यह तिलिस्मी खंजर कमलिनी ने भूतनाथ और गोपालसिंह को दिया था जो इस समय इन सभी के बेहोश हो जाने पर मुझे मिला। एक तो मैंने ले लिया और दूसरा नागर को दे दिया है। मैंने सुना है कि इसी तरह के और भी कई खंजर कमलिनी ने अपने साथियों को बांटे हैं मगर मालूम नहीं इस समय वे कहाँ हैं।
बाबाजी-ठीक है, खैर यह काम तुमने बहुत ही अच्छा किया कि अजायबघर की ताली अपने साथ लेती आईं, नहीं तो बड़ा हर्ज होता।
मायारानी-जी हाँ। मायारानी अजायबघर की ताली के बारे में भी दरोगा से झूठ बोली। यद्यपि उसने यह ताली भूतनाथ को दे दी और इस समय गोपालसिंह के पास से पाई थी परन्तु भूतनाथ का नाम लेना उसने उचित न जाना क्योंकि उसने यह ताली भूतनाथ को राजा गोपालसिंह की जान लेने के बदले में दी थी और यह बात बाबाजी से कहना उसे मंजूर न था इसीसे वह इस समय बहाना कर गई।
मायारानी और नागर को साथ लिए हुए बाबाजी वहाँ से रवाना हुए और उस खम्भे के पास पहुँचे जिस पर गरारीदार पहिया लगा हुआ था। अब मायारानी बड़ी उत्कण्ठा से देखने लगी कि बाबाजी किस तरह से दरवाजा खोलते हैं और इसलिए जब बाबाजी ने गरारीदार पहिये को घुमा कर सुरंग का दरवाजा खोला तो मायारानी को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि इसी पहिये को वह कई दफे उलट फेर कर घुमा चुकी थी मगर दरवाजा नहीं खुला था। मायारानी ने अब बड़े आग्रह से इसका सबब बाबाजी से पूछा और कहा कि “इसी पहिये को मैं पहले कई दफे घुमा चुकी थी मगर दरवाजा न खुला, इस समय क्योंकर खुल गया?” इसके जवाब में बाबाजी हँसकर बोले, “इसका सबब किसी दूसरे वक्त तुमसे कहूँगा क्योंकि समझाने में बहुत देर लगेगी और पहले उन कामों को बहुत जल्द कर लेना चाहिए जिनका करना आवश्यक है!”
यह जवाब सुनकर मायारानी चुप हो गई और यह सोच लिया कि खैर किसी दूसरे समय इसका पता लग जाएगा क्योंकि इस समय वह बाबाजी से बहुत ही दबी हुई थी और किसी बात में जिद करना उचित नहीं समझती थी। उधर बाबाजी ने दरवाजा खोलने का भेद जानबूझ कर मायारानी से छिपा रखा था, क्योंकि उसका भेद खोलना उन्हें मँजूर न था। यद्यपि मायारानी को उसका भेद मालूम न हुआ मगर हम अपने पाठकों को दरवाजा खोलने का भेद बताए देते हैं। लोहे के खम्भे पर जो गरारीदार पहिया था उसके घूमने से दरवाजा बन्द हो जाता था। परन्तु खोलने के समय उसे एक बँधे हुए अन्दाज से घुमाना पड़ता था। उस पहिये की इक्कीस दफे बाईं तरफ, इसके बाद बारह दफे दाहिनी तरफ और नौ दफे बाईं तरफ घुमाने से दरवाजा खुलता था। अगर इससे कुछ भी कम या ज्यादा पहिया घूम जाय तो दरवाजा नहीं खुलता था। दरवाजा खोलते समय बाबाजी ने बड़ी तेजी के साथ गिन कर पहिया घुमाया किन्तु मायारानी का उसकी गिनती की तरफ कुछ भी ध्यान न था, इसीलिए वह इस बात को समझ न सकी।
मायारानी और नागर को साथ लिये हुए जब बाबाजी सुरंग के बाहर निकले तो सवेरा हो चुका था, मगर सूर्य अभी नहीं निकला था। टीले पर से देखा तो चारों तरफ मैदान में सन्नाटा था इसलिए राय हुई कि इसी समय गोपालसिंह, भूतनाथ, देवीसिंह, कमलिनी और लाड़िली को निकाल कर बँगले में पहुँचा देना चाहिए। नागर दौड़ी हुई चली गई और लीला तथा लौंडियों को बुला लाई और इसके बाद सभी ने मिलकर पाँचों कैदियों को सुरंग से निकाल कर दारोगा वाले बँगले में पहुँचाया।
अब यह विचार होने लगा कि पाँचों कैदियों को फिस जगह कैद करना चाहिए, बाबाजी की राय हुई कि पांचों कैदियों को अजायबघर की ड्योढ़ी में बन्द करना चाहिए मगर मायारानी ने कुछ सोच-विचार कर कहा कि इन सब लोगों को मैगजीन के बगल वाले तहखाने में कैद करना चाहिए। मायारानी की बात सुनकर बाबाजी के होठ फड़कने लगे और माथे पर दो एक बल पड़ गये, जिससे मालूम होता था कि उनको क्रोध चढ़ आया है मगर उन्होंने बहाने के साथ दूसरी तरफ देखकर बहुत जल्द अपने को सम्हाला जिसमें सूरत देखकर मायारानी को उनके दिल का हाल कुछ मालूम न हो। बाबाजी को चप देखकर मायारानी ने फिर टोका और कहा कि कैदियों को मैगजीन के बगल वाले तहखाने में बन्द करना उचित होगा, जिस पर बाबाजी ने हंसकर जवाब दिया, "बहुत अच्छा, जो तुम कहती हो वही होगा।"
हम ऊपर लिख आये हैं कि इस मकान के चारों कोनों में चार कोठरियाँ और चारों तरफ चार दालान हैं। बंगले में जाने के लिए जो सदर दरवाजा है, उसके बाईं तरफ वाली कोठरी के नीचे दो तहखाने हैं। एक तो मैगजीन के नाम से पुकारा जाता हैं और उसमें बारूद तथा छोटी-छोटी कई तोपें रखी हुई हैं, और उसी के साथ सटा हुआ जो दूसरा तहखाना है उसमें बाबाजी का खजाना रहता है। उसी खजाने वाले तहखाने में कैदियों को कैद करने की राय मायारानी ने दी थी और बाबाजी ने भी यह बात मंजूर कर ली।
बाबाजी उस कोठरी के अन्दर गये। वहाँ दोनों तरफ की दीवारों में लोहे के दो दरवाजे थे जिन्हें दोनों तहखानों का दरवाजा कहना चाहिए। दाहिनी तरफ के दरवाजे को किसी गुप्त रीति से बाबाजी ने खोला और नागर, लीला तथा लौंडियों की मदद से पांचों कैदियों को उनके ऐयारी के बटुए सहित तहखाने में पहुँचा कर बाहर निकल आये और दरवाजा बन्द कर दिया। बाहर निकलते समय तहखाने से ताँबे का एक घड़ा भी लेते आये और मायारानी की तरफ देखकर बोले, "अब कैदियों के लिए कुछ खाने-पीने का सामान भी कर देना चाहिए, इसी घड़े में भरकर जल और थोड़े से जंगली फल वहाँ रखवा देता हूँ, जो तीन दिन के लिए काफी होगा, फिर देखा जायेगा।" (लौंडियों की तरफ देखकर) "जाओ तुम लोग थोड़े से फल बहुत जल्द तोड़ लाओ।" आज्ञानुसार लौंडियां चारों तरफ चली गईं और बात-की-बात में बहुत से फल तोड़ कर ले आई। एक कपडे में बांध कर वही फल और जल से भरा हुआ घड़ा हाथ में लिए हए बाबाजी फिर उसी तहखाने में उतरे मगर अबकी दफे किसी को साथ न ले गये, बल्कि अन्दर जाती दफे दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया और आधी घड़ी से ज्यादा देर के बाद तहखाने से बाहर निकले। मायारानी ने ताज्जुब में आकर पूछा कि 'आपको तहखाने में इतनी देर क्यों लगीं?" इसके जवाब में बाबाजी ने कहा- "कैदियों के बटुओं की तलाशी
ले रहा था मगर कोई चीज मेरे मतलब की न निकली।"
इस समय मायारानी का चेहरा फतहमन्दी की खुशी से दमक रहा था। उसे केवल इसी बात की खुशी न थी कि उसने राजा गोपालसिंह और अपनी दोनों बहिनों तथा ऐयारों को कैद कर लिया था बल्कि उसकी खुशी का सबब कुछ और भी था। थोड़ी ही देर पहले उसे इस बात का रंज था कि कम्बख्त दारोगा ने यकायक पहुँच कर हमारे काम में विघ्न डाल दिया नहीं तो गोपालसिंह तथा कमलिनी और लाड़िली को मारकर मैं हमेशा के लिए निश्चिन्त हो जाती मगर अब उसे इन बातों का रंज नहीं है और यह उसकी मुस्कुराहट से साफ जाहिर हो रहा है।
१२
शाम होने में कुछ भी बिलम्ब नहीं है। सूर्य भगवान अस्त हो गये केवल उनकी लालिमा आसमान के पश्चिम तरफ दिखाई दे रही है। दारोगा वाले बंगले में रहने वालों के लिए यह अच्छा समय है परन्तु आज उस बँगले में जितने आदमी दिखाई दे रहे हैं वे सब इस योग्य नहीं हैं कि बेफिक्री के साथ इधर-उधर घूमें और इस अनूठे समय का आनन्द लें। यद्यपि राजा गोपालसिंह, कमलिनी और लाड़िली की तरफ से मायारानी निश्चिन्त हो गई बल्कि उनके साथ ही साथ दो ऐयारों को भी उसने गिरफ्तार कर लिया है मगर अभी तक उसका जी ठिकाने नहीं हुआ। वह नहर के किनारे बैठी हुई बाबाजी से बातें कर रही है और इस फिक्र में है कि कोई ऐसी तरकीब निकल आवे कि जमानिया की गद्दी पर बैठ कर उसी शान के साथ हुकूमत करे, जैसा कि आज के कुछ दिन पहले कर रही थी। उसके पास केवल नागर बैठी हुई दोनों की बातें सुन रही है।
मायारानी—जिस दिन से आपको वीरेन्द्रसिंह ने गिरफ्तार कर लिया उसी दिन से मेरी किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि जिसका कोई हदहिसाब नहीं, मानो मेरे लिए जमाना ही और हो गया। एक दिन भी सुख के साथ सोना नसीब न हुआ। मुझ पर मसीबतें आई और तिलिस्मी बाग के अन्दर जो-जो अनहोनी बातें हुईं उनका खुलासा हाल आज मैं आपसे कह चुकी हूँ। इस समय यद्यपि राजा गोपालसिंह, कमलिनी और लाड़िली की तरफ से निश्चिन्त हूँ मगर फिर भी अपनी अमलदारी में या तिलिस्मी बाग के अन्दर जाकर रहने का हौसला नहीं पड़ता, क्योंकि तिलिस्मी बाग के अन्दर दोनों नकाबपोशों के आने और धनतपत का भेद खुल जाने से हमारे सिपाहियों की हालत बिल्कुल ही बदल गई है और मुझे उनके हाथों से दुःख भोगने के सिवाय और किसी तरह की उम्मीद नहीं है। यह भी सुनने में आया है कि दीवान साहब मुझे गिरफ्तार करने की फिक्र में पड़े हुए हैं।
बाबा-दीवान जो कुछ कर रहा है उससे मालूम होता है कि या तो उसे राजा गोपालसिंह का असल-असल हाल मालूम हो गया है और वह उन्हें फिर जमानिया की गद्दी पर बैठाना चाहता है, या वह स्वयं राजा साहब के बारे में धोखा खा रहा है और चाहता है कि तुम्हें गिरफ्तार कर राजा वीरेन्द्रसिंह के हवाले करे और उनकी मेहरबानी के भरोसे पर स्वयं जमानिया का राजा बन बैठे। तुम कह चुकी हो कि राजा वीरेन्द्रसिंह की बीस हजार फौज मुकाबले में आ चुकी है जिसका अफसर नाहरसिंह है। अब सोचना चाहिए कि नाहरसिंह के मुकाबले में आ जाने पर भी चुपचाप बैठे रहना बेसबब नहीं है और..
मायारानी-शायद इसका सबब यह हो कि दीवान ने मुझको गिरफ्तार करके वीरेन्द्रसिंह के हवाले कर देने की शर्त पर उनसे सुलह कर ली हो?
बाबा-ताज्जुब नहीं, ऐसा ही हो, मगर घबराओ नहीं मैं दीवान के पास जाऊँगा और देखूँगा कि वह किस ढंग पर चलने का इरादा करता है। अगर बदमाशी करने पर उतारू है तो मैं उसे ठीक करूँगा। हाँ यह तो बताओ कि दीवान को तुम्हारी तिलिस्मी बातों या तिलिस्मी कारखाने का भेद तो किसी ने नहीं दिया?
मायारानी-जहाँ तक मैं समझती हूँ उसे तिलिस्मी कारखाने में कुछ दखल नहीं है, मगर इस बात को मैं जोर देकर नहीं कह सकती क्योंकि वे दोनों नकाबपोश हमारे तिलिस्मी बाग के भेदों से बखूबी वाफिक हैं जिनका हाल मैं आपसे कह चुकी हूँ, बल्कि ऐसा कहना चाहिए कि बनिस्बत मेरे वे ज्यादा जानकार हैं क्योंकि अगर ऐसा न होता तो वे मेरी उन तरकीबों को रद्द न कर सकते, जो उनके फंसाने के लिए की गई थीं। ताज्जुब नहीं कि उन दोनों ने दीवान से मिलकर तिलिस्म का कुछ हाल भी उससे कहा हो।
बाबा-खैर कोई हर्ज नहीं, देखा जायेगा। मैं कल जरूर वहाँ जाऊँगा और दीवान से मिलूँगा।
मायारानी-नहीं, बल्कि आप आज ही जाइये और जहाँ तक जल्दी हो सके, कुछ बन्दोबस्त कीजिये, क्योंकि अगर दीवान के भेजे हुए सौ-पचास आदमी मुझे ढूंढते हुए यहाँ आ जायेंगे, तो सख्त मुश्किल होगी। यद्यपि यह तिलिस्मी खंजर मुझे मिल गया है और तिलिस्मी गोली से भी मैं सैकड़ों की जान ले सकती हूँ मगर उस समय मेरे किए कुछ भी न होगा जब किसी ऐसे से मुकाबला हो जाये जिसके पास कमलिनी का दिया हुआ इसी प्रकार का खंजर मौजूद होगा।
बाबा-तथापि इस बँगले में आकर तुम्हें कोई सता नहीं सकता।
मायारानी--ठीक है मगर मैं कब तक इसके अन्दर छिप कर बैठी रहूँगी? आखिर भूख-प्यास भी तो कोई चीज है!
बाबा-मगर ऐसा होना बहुत मुश्किल है!
मायारानी-तो हर्ज ही क्या है अगर आप इसी समय दीवान के पास जायें? मैं खूब जानती हूँ कि वह आपकी सूरत देखते ही डर जायेगा।
बाबा-क्या तुम्हारी यही मर्जी है कि मैं इसी समय जाऊँ?
मायारानी- हाँ, जाइए और अवश्य जाइए।
बाबा-अच्छा यही सही, मैं जाता हूँ।
बाबाजी उसी समय उठ खड़े हुए और जमानिया की तरफ रवाना हो गए। मायारानी तब तक बराबर देखती रही जब तक कि वे पेड़ों की आड़ में होकर नजरों से गायब न हो गये। इसके बाद हँसकर नागर की तरफ देखा और कहा
मायारानी-तुम समझती हो कि बाबाजी को मैंने जिद करके इसी समय यहाँ से क्यों धता बतायी?
नागर-जाहिर में जो कुछ तुमने बाबाजी से कहा है और जिस काम के लिए उन्हें भेजा है यदि उसके सिवाय और कोई मतलब है तो मैं कह सकती हूँ कि मेरी समझ में कुछ न आया।
मायारानी-(हँस कर) अच्छा तो अब मैं समझा देती हूँ। बाबाजी के सामने मैंने अपने को जितना बताया वास्तव में मेरे दिल में उतना दुःख और रंज नहीं है, क्योंकि जिसका डर था, जिसके निकल जाने से मैं परेशान थी, जिसका प्रकट होना मेरे लिए मौत का सबब था और जो मुझसे बदला लिए बिना मानने वाला न था, अर्थात् गोपालसिंह, वह मेरे कब्जे में आ चुका। अब अगर दुःख है तो इतना ही कि कम्बख्त दारोगा ने उसे मारने न दिया। मगर मैं बिना उसकी जान लिए कब मानने वाली हूँ, इसलिए मैंने किसी तरह बाबाजी को यहाँ से धता बतायी।
नागर–तो क्या तुम्हारा मतलब यह था कि बाबाजी यहाँ से बिदा हो जायें तो अपने कैदियों को मार डालो?
मायारानी-बेशक इसी मतलब से मैंने बाबाजी को यहाँ से निकाल बाहर किया क्योंकि अगर वह रहता तो कैदियों को मारने न देता और उसमें जो कुछ करामात है सो तुम देख ही चुकी हो। अगर ऐसा न होता तो मैं सुरंग ही में उन सभी को मारकर निश्चिन्त हो जाती।
नागर-मगर बाबाजी ने उस कोठरी की ताली तो तुम्हें दी नहीं जिसमें कैदियों को रखा है।
मायारानी–ठीक है बाबाजी इस एक बात में चालाकी कर गए। कैदखाने की कोठरी क्योंकर खुलती है सो मुझे नहीं बताया और न कोई ताली वहाँ की मुझे दी, मगर यह मैं पहले ही समझे हुई थी कि बाबाजी कैदियों को जरूर किसी ऐसी जगह रखेंगे, जहाँ मैं जा नहीं सकती, इसलिए तो बाबाजी से मैंने कहा कि कैदियों को मैगजीन के बगल वाली कोठरी में कैद करो। बाबाबाजी मेरा मतलब नहीं समझ सके और धोखे में आ गये।
नागर-इस से तो यही जाहिर होता है कि उस कोठरी में तुम जा सकती हो।
मायारानी- नहीं, उस कोठरी में मैं नहीं जा सकती, मगर मैगजीन की कोठरी तक जा सकती हूँ।
नागर-(जोर से हँसकर) अहा हा, अब मैं समझी! तुम्हारा मतलब यह कि मैगजीन में जहाँ बारूद रखा है वहाँ जाओ और उसमें आग लगाकर इस..
मायारानी-बस-बस यही है, कैदी और कैदखाने की क्या बात इस बंगले का ही सत्यानाश कर दूँगी। कैदियों की हड्डी तक का तो पता लगेगा ही नहीं! अच्छा अब इस काम में विलम्ब न करना चाहिए, उठो और मेरे साथ चलकर उस कोठरी में अर्थात् मैगजीन में कोई ऐसी चीज रखो जो उस वक्त बारूद में आग लगावे, जब हम लोग यहाँ से निकल कर कुछ दूर चली जायें।
नागर-ऐसा ही होगा, यह कोई मुश्किल बात नहीं है।
१३
कल शाम को बाबाजी जमानिया गए थे और आज शाम होने के दो घंटे पहले ही लौट आये। दूर ही से अपने बँगले की हालत देख सिर हिलाकर बोले, "मैं उसी समय समझ गया था जब मायारानी ने कहा था कि कैदियों को मैगजीन के बगल वाले तहखाने में कैद करना चाहिए।"
बाबाजी का बँगला जो बहुत ही खूबसूरत और शौकीनों के रहने के लायक था, बिल्कुल बर्बाद हो गया था, बल्कि यों कहना चाहिए कि उसकी एक-एक ईंट अलग हो गई थी। बाबाजी धीरे-धीरे उसके पास पहुंचे और कुछ देर तक गौर से देखने के बाद यह कहते हुए घूम पड़े कि "जो हो मगर अजायबघर किसी तरह बर्बाद नहीं हो सकता"
बाबाजी के बँगले के बर्बाद होने का सबब पाठक समझ ही गये होंगे, क्योंकि ऊपर के बयान में मायारानी और नागर की बातचीत से वह भेद साफ-साफ खल चुका है। अब बाबाजी इस विचार में पड़े कि मायारानी को ढूंढकर उससे दो-दो बातें करनी चाहिए।
ऐसा करने में बाबाजी को विशेष तकलीफ नहीं उठानी पड़ी, क्योंकि थोड़ी ही दूर पर उन्हें उन लौंडियों में से एक लौंडी मिली जो उस समय मायारानी के साथ थी, जब बाबाजी कैदियों को तहखाने में बन्द करके दीवान से मिलने के लिए जमानिया की तरफ रवाना हुए थे। बाबाजी ने उस लौंडी से केवल इतना ही पूछा, "मायारानी कहाँ हैं?"
लौंडी-जब आप जमानिया की तरफ चले गये तो मायारानी हम लोगों को साथ लेकर दिल बहलाने के लिए इस जंगल में टहलने लगीं और धीरे-धीरे यहाँ से कुछ दूर चली गईं। ईश्वर ने बड़ी कृपा की कि रानी साहिबा के दिल में यह बात पैदा हुई नहीं तो हम लोग भी टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ गए होते, क्योंकि थोड़ी ही देर बाद भयानक आवाज सुनने में आई, और जब हम लोग इस बँगले के पास आये तो मिट्टी और गर्द के सबब अन्धकार हो रहा था। हम लोग डर कर पीछे की तरफ हट गये और अन्त में इस बँगले की ऐसी अवस्था देखने में आई जो आप देख रहे हैं। लाचार मायारानी ने यहाँ ठहरना उचित न समझा और नागर के साथ काशीजी की तरफ रवाना हो गईं।
बाबा-और तुझे इसलिए यहाँ छोड़ गई कि जब मैं आऊँ तो बातें बनाकर मेरे क्रोध को बढ़ावे!
लौंडी-जी ई ई ई...
बाबा-जी ई ई ई क्या? बेशक यही बात है! खैर, अब तू भी यहाँ से वहीं चली जा और कम्बख्त मायारानी से जाकर कह दे कि जो कुछ तूने किया, बहुत अच्छा किया, मगर इस बात को खूब याद रखना कि नेकी का नतीजा नेक है और बद को कभी सुख की नींद सोना नसीब नहीं होता। अच्छा ठहर, मैं एक चिट्ठी लिख देता हूँ सो लेती जा और जहां तक जल्द हो सके, मिलकर मायारानी के हाथ दे दे।
इतना कहकर बाबाजी बैठ गए और अपने बटुए से सामान निकालकर चिट्ठी लिखने लगे, जब चिट्ठी लिख चुके तो उसे लौंडी के हाथ में दे दिया और आप उत्तर तरफ रवाना हो गये।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह लौंडी बाबाजी की चिट्ठी लिए हुए काशीजी जायेगी और मायारानी से मिलकर चिट्ठी उसके हाथ में देगी मगर हम आपको अपने साथ लिए हुए पहले ही काशीजी पहुँचते हैं और देखते हैं कि मायारानी किस धुन में कहाँ बैठी है या क्या कर रही है।
रात पहर से ज्यादा जा चुकी है। काशी में मनोरमा वाले मकान के अन्दर एक सजे हुए कमरे में मायारानी नागर के साथ बैठी हुई कुछ बात कर रही है। इस समय कमरे में सिवाय नागर और मायारानी के और कोई नहीं है। कमरे में यद्यपि बहुत से बेशकीमती शीशे करीने के साथ लगे हुए हैं, मगर रोशनी दो दीवारगीरों में और एक सब्ज कंवल वाले शमादान में, जो मायारानी के सामने गद्दी के नीचे रखा हुआ है, हो रही है। मायारानी सब्ज मखमल की गद्दी पर गाव-तकिये के सहारे बैठी है। इस समय उसका खूबसूरत चेहरा, जो आज से तीन-चार दिन पहले उदासी और बदहवासी के कारण बेरौनक हो रहा था, खुशी और फतहमन्दी की निशानियों के साथ दमक रहा है और वह किसी सवाल का इच्छानुसार जवाब पाने की आशा में मुस्कुराती हुई नागर की तरफ देख रही है।
नागर-इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि एक भारी बला आपके सिर से टली है, परन्तु यह न समझना चाहिए कि अब आपको किसी आफत का सामना न करना पड़ेगा।
मायारानी-इस बात को मैं जानती हूँ कि जमानिया की गद्दी पर बैठने के लिए अब भी बहुत-कुछ उद्योग करना पड़ेगा, मगर मैं यह कह रही हैं कि सबसे भारी बला जो थी, वह टल गई। कम्बख्त कमलिनी ने भी बड़ा ही ऊधम मचा रखा था, अगर वह वीरेन्द्रसिंह की पक्षपाती न होती, तो मैं कभी का दोनों कमारों को मौत की नींद सुला चुकी होती।
नागर-बेशक! बेशक!
मायारानी-और भूतनाथ का मारा जाना भी बहुत अच्छा हुआ, क्योंकि उसे इस मकान का बहुत-कुछ भेद मालूम हो चुका था और इस सबब से इस मकान के रहने वाले भी बेफिक्र नहीं रह सकते थे। मगर देखो तो सही रामजादे दीवान को क्या हो गया जो मुझसे एकदम ही फिर गया, बल्कि मुझको गिरफ्तार करने का उद्योग भी करने लगा।
नागर-जरूर यह बात भी उन्हीं नकाबपोशों की बदौलत हई है।
मायारानी–ठीक है, पहले तो मैं बेशक ताज्जुब में थी कि न मालूम वे दोनों नकाबपोश कौन थे और कहाँ से आये थे और आज दीवान तथा सिपाहियों के बिगड़ने का सबब केवल यही ध्यान में आता है कि धनपत का भेद खुल जाने से उन लोगों ने मुझे बदकार समझ लिया, मगर अब मुझे निश्चय हो गया कि उन दोनों नकाबपोशों में से एक तो गोपालसिंह था।
नागर-मेरा भी यही निश्चय है, बल्कि मैं अभी यही बात अपने मुँह से निकालने वाली थी। उसके सिवाय और कोई ऐसा नहीं हो सकता कि केवल सुरत दिखाकर लोगों को अपने वश में कर ले। सिपाहियों और दीवान को जरूर इस बात का निश्चय हो गया कि गोपालसिंह को तुमने कैद कर रखा था। खैर, जो होना था सो हो गया। अब तो राजा गोपालसिंह का नाम-निशान ही न रहा, जो फिर जाकर अपना मुँह उन लोगों को दिखावेंगे, अब थोड़े ही दिनों में उन लोगों को निश्चय करा दिया जायेगा कि वह राजा वीरेन्द्रसिंह का कोई ऐयार था।
मायारानी—तुम्हारा कहना बहुत ठीक है और मेरे नजदीक अब यह कोई बड़ी बात नहीं है कि बेईमान दीवान को गिरफ्तार कर लूँ या मार डालूँ, मगर एक बात का खुटका जरूर है।
नागर-वह क्या?
मायारानी–केवल इतना ही कि दीवान को मारने या गिरफ्तार करने के साथ ही साथ राजा वीरेन्द्रसिंह की उस फौज का भी मुकाबला करना पड़ेगा जो सरहद पर आ चुकी है।
नागर-इसमें तो कुछ भी सन्देह नहीं है और इस बात का भी विश्वास नहीं हो सकता कि तुम्हारी फौज तुम्हारा पक्ष लेकर लड़ने के लिए तैयार हो जायगी। फौजी सिपाहियों के दिल से गोपालसिंह का ध्यान दूर होना दो-एक दिन का काम नहीं है!
मायारानी-(कुछ सोचकर) तो क्या मैं अकेली राजा वीरेन्द्रसिंह की फौज को नहीं हटा सकती?
नागर-सो तो तुम्हीं जानो। मायारानी—बेशक मैं ऐसा बड़ा काम कर सकती हूँ मगर अफसोस, मेरा प्यारा धनपत..
धनपत का नाम लेते ही मायारानी की आँखें डबडबा आई। नागर ने अपने आँचल से उसकी आँखें पोंछी और बहुत-कुछ धीरज दिया। इसी समय दरवाजे के बाहर से चुटकी बजाने की आवाज आई, जिसे सुनकर नागर समझ गई कि कोई लौंडी यहाँ आना चाहती है। नागर ने पुकार कर कहा, "कौन है, चले आओ!"
वही लौंडी भीतर आती हुई दिखाई पड़ी जो बर्बाद हुए बँगले के पास बाबा जी से मिली थी और जिसके हाथ बाबाजी ने मायारानी के पास चिट्ठी भेजी थी।
उसको देखते ही मायारानी चैतन्य हो बैठी और बोली, "कहो, दारोगा से मुलाकात हुई थी?"
लौंडी-जी हाँ।
मायारानी-(मुस्कुरा कर) वह तो बहुत ही बिगड़ा होगा।
लौंडी-हाँ, बहुत झुंझलाये और उछले-कूदे, आपकी शान में कड़ी-कड़ी बातें कहने लगे, मगर मैं चुपचाप खड़ी सुनती रही। अन्त में बोले, "अच्छा, मैं एक चिट्ठी लिखकर देता हूँ, इसे ले जाकर अपनी मायारानी को दे देना।"
मायारानी तो क्या उसने चिट्ठी लिखकर दी है?
लौंडी--जी हाँ, यह मौजूद है, लीजिए।
लौंडी ने चिट्ठी मायारानी के हाथ में दे दी और मायारानी ने यह कहकर चिटठी ले ली कि "देखना चाहिए इसमें दारोगा साहब क्या रंग लाये हैं!" इसके बाद वह चिटठी नागर के हाथ में देकर बोली, "लो, इसे तुम ही पढ़ो!"
नागर चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगी। उस समय मायारानी की निगाह नागर के चेहरे पर थी। आधी चिट्ठी पढ़ने के बाद नागर के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी और डर के मारे उसका हाथ काँपने लगा। मायारानी ने घबराकर पूछा, 'क्यों क्या हाल है। कुछ कहो तो!"
इसके जवाब में नागर ने लम्बी साँस लेकर चिट्ठी मायारानी के सामने रख दी और बोली, "ओह, मेरी सामर्थ्य नहीं कि इस चिट्ठी को आखीर तक पढ़ सकूँ। हाय, निःसन्देह वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का मुकाबला करना पूरा-पूरा पागलपन है।"
मायारानी ने घबराकर चिट्ठी उठा ली और स्वयं पढ़ने लगी, पर वह भी उस चिट्ठी को आधे से ज्यादा न पढ़ सकी। पसीना छूटने लगा, शरीर काँपने लगा, दिमाग में चनकर आने लगे, यहाँ तक कि अपने को किसी तरह सँभाल न सकी और बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ी।