चन्द्रकान्ता सन्तति
तेईसवाँ भाग
१
सोहागरात के दिन कुंअर इन्द्रजीतसिंह जैसे तरवुद और फेर में पड़ गये थे, ठीक वैसा तो नहीं मगर करीब उसी ढंग का बखेड़ा कुंअर आनन्दसिंह के साथ भी मचा, अर्थात् उसी दिन रात के समय जब आनन्दसिंह और कामिनी का एक कमरे में मेल हुआ तो आनन्दसिंह छेड़छाड़ करके कामिनी की शर्म को तोड़ने और कुछ बातचीत करने के लिए उद्योग करने लगे मगर लज्जा और संकोच के बोझ से कामिनी हर तरह दबी जाती थी। आखिर थोड़ी देर की मेहनत, चालाकी तथा बुद्धिमानी की बदौलत आनन्दसिंह ने अपना मतलब निकाल ही लिया और कामिनी भी, जो बहुत दिनों से दिल के खजाने में आनन्दसिंह की मुहब्बत को हिफाजत के साथ छिपाये हुए थी, लज्जा और डर को बिदाई का बीड़ा दे कुमार से बातचीत करने लगी।
जब रात लगभग दो घण्टे के बाकी रह गई तो कामिनी जाग पड़ी और घबराहट के साथ चारों तरफ देख के सोचने लगी कि कहीं सवेरा तो नहीं हो गया क्यों कि कमरे के सभी दरवाजे बन्द रहने के कारण आसमान दिखाई नहीं देता था। उस समय आनन्दसिंह गहरी नींद में सो रहे थे और उनके खर्राटों की आवाज से मालूम होता था कि वे अभी दो-तीन घंटे तक बिना जगाये नहीं जाग सकते अतः कामिनी अपनी जगह से उठी और कमरे की कई छोटी-छोटी खिड़कियों (छोटे दरवाजों) में से, जो मकान के पिछली तरफ पड़ती थीं, एक खिड़की खोलकर आसमान की तरफ देखने लगी। इस तरफ से पतित-पावनी भगवती जाह्नवी की तरल तरंगों की सुन्दर छटा दिखाई देती थी जो उदास उदास और बुझे दिल को एक दफे प्रसन्न करने की सामर्थ्य रखती थी, परन्तु इस समय अंधकार के कारण कामिनी उस छटा को नहीं देख सकती थी और इस सबब से आसमान की तरफ देखकर भी वह इस बात का पता न लगा सकी कि अब रात कितनी बाकी है, मगर सवेरा होने में अभी देर है इतना जान कर उसके दिल को कुछ भरोसा हुआ। उसी समय सरकारी पहरे वाले ने घंटा बजाया जिसे सुनकर कामिनी ने निश्चय कर लिया कि रात अभी दो घंटे से कम बाकी नहीं है। उसने उसी तरफ की एक और खिड़की खोल दी और तब यह उस जगह चली गई जहाँ चौकी के ऊपर गंगाजमुनी लोटे में जल रक्खा हुआ था। उसी चौकी पर से एक रूमाल उठा लिया और उसे गीला करके अपना मुंह अच्छी तरह पोंछने अथवा धोने के बाद रूमाल खिड़की के बाहर फेंक दिया। और तब उस जगह चली आई जहाँ आनन्दसिंह गहरी नींद में सो रहे थे।
कामिनी ने आँचल के कपड़े से एक मामूली बत्ती बनाई और नाक में डाल कर उसके जरिये से दो-तीन छींके मारी, जिनकी आवाज से आनन्दसिंह की आँख खुल गई और उन्होंने अपने पास कामिनी को बैठे हुए देखकर ताज्जुब से कहा, "हैं, तुम बैठी क्यों हो? खैरियत तो है!"
कामिनी--जी हाँ, मेरी तबीयत तो अच्छी है मगर तरबुद और सोच के मारे नींद नहीं आ रही है। बहुत देर से जाग रही हूँ।
आनन्दसिंह--(उठकर) इस समय भला कौन से तरढुद और सोच ने तुम्हें आ घेरा?
कामिनी--क्या कहूँ, कहते हुए भी शर्म मालूम पड़ती है?
अनान्दसिंह--आखिर कुछ कहो तो सही, शर्म कहाँ तक करोगी?
कामिनी--खैर मैं कहती हूँ, मगर आप बुरा तो न मानेंगे?
आनन्दसिंह--मैं कुछ भी बुरा न मानूंगा, तुम्हें जो कुछ कहना है कहो।
कामिनी-–बात केवल इतनी ही है कि मैं छोटे कुमार से एक दिल्लगी कर बैठी हूँ मगर आज उस दिल्लगी का भेद जरूर खुल गया होगा, इसलिए सोच रही हूँ कि अब क्या करूं? इस समय कामिनी बहिन से भी मुलाकात नहीं हो सकती, जो उनको कुछ समझा-बुझा देती।
आनन्दसिंह--(ताज्जुब में आकर) तुमने कोई भयानक सपना तो नहीं देखा जिसका असर अभी तक तुम्हारे दिमाग में घुसा हुआ है? यह मामला क्या है? तुम कैसी बातें कर रही हो!
कामिनी--नहीं-नहीं, कोई विशेष बात नहीं है और मैंने कोई भयानक सपना भी नहीं देखा, बात केवल इतनी ही है कि मैं हँसी-हँसी में छोटे कुमार से कह चुकी हूँ कि 'मेरी शादी अभी तक नहीं हुई है और मैं प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ कि ब्याह कदापि न करूँगी।' अब आज ताज्जुब नहीं कि कामिनी बहिन ने मेरा सच्चा भेद खोल दिया हो और कह दिया हो कि 'लाड़िली की शादी तो कमलिनी की शादी के साथ-ही-साथ अर्थात् दोनों की एक ही दिन हो चुकी है और आज उसकी भी सोहागरात है।' अगर ऐसा हुआ तो मुझे बड़ी शर्म...
आनन्दसिंह--(ताज्जुब और घबराहट से) तुम तो पागलों की सी बातें कर रही हो। आखिर तुमने अपने को और मुझको समझा ही क्या है? जरा पूंघट हटा कर बातें करो। तुम्हारा मुँह तो दिखाई ही नहीं देता!
कामिनी--नहीं, मुझे इसी तरह बैठे रहने दीजिए। मगर आपने क्या कहा सो मैं कुछ भी नहीं समझी, इसमें पागलपने की भला कौन सी बात है?
आनन्दसिंह--तुमने जरूर कोई सपना देखा है जिसका असर अभी तक तुम्हारे दिमाग में बसा हुआ है और तुम अपने को लाड़िली समझ रही हो, ताज्जुब नहीं कि लाड़िली ने तुमसे वे बातें कही हों जो उसने मुझसे दिल्लगी के ढंग पर की थीं।
कामिनी-मुझे आपकी बातों पर ताज्जुब मालूम पड़ता है। मैं समझती हूँ कि आप ही ने कोई अनूठा स्वप्न देखा है और शायद यह भी देखा है कि कामिनी आपके बगल में पड़ी हुई है जिसका खयाल अभी तक बना हुआ है और मुझे आप कामिनी समझ रहे हैं। भला सोचिए तो सही कि छोटे कुमार (आनन्दसिंह) को छोड़कर कामिनी आपके पास आने ही क्यों लगी? कहीं आप मुझसे दिल्लगी तो नहीं कर रहे हैं?
कामिनी की आखिरी बात को सुनकर आनन्दसिंह बहुते बेचैन हो गये और उन्होंने घबरा कर कामिनी के मुंह से घूघट हटा दिया, मगर शमादान की रोशनी में उसका खूबसूरत चेहरा देखते ही वे चौंक पड़े और बोले-"हैं! यह मामला क्या है? लाड़िली को मेरे पास आने की क्या जरूरत थी? बेशक तुम लाड़िली मालूम पड़ती हो? कहीं तुमने अपना चेहरा रंगा तो नहीं है?"
कामिनी-(घबराहट के ढंग पर) आपकी बातें तो मेरे दिल में हौल पैदा करती हैं! न मालूम आप क्या कह रहे हैं और इस बात को क्यों नहीं सोचते कि कामिनी को आपके पास आने की जरूरत ही क्या थी!
आनन्दसिंह--(बेचैनी के साथ) पहले तुम अपना चेहरा धो डालो तो मैं तुमसे बातें करूँ! तुम मुझे जरूर धोखा दे रही हो और अपनी सूरत लाड़िली की सी बनाकर मेरी जान को सांसत में डाल रही हो! मैं अभी तक तुम्हें कामिनी समझ रहा था और समझता हूँ।
कामिनी--(ताज्जुब से आनन्दसिंह की सूरत देखकर) आपकी बातें तो कुछ विचित्र ढंग की हो रही हैं। जब आप मुझे कामिनी समझते हैं तो अपने को भी जरूर आनन्दसिंह समझते होंगे?
आनन्दसिंह--इसमें शक ही क्या है? क्या मैं आनन्दसिंह नहीं हूँ?
कामिनी--(अफसोस से हाथ मलकर) हे परमेश्वर! आज इनको क्या हो गया है!
आनन्द--बस, अब तुम अपना चेहरा धो डालो तब मुझसे बातें करो, तुम नहीं जानतीं कि इस समय मेरे दिल की कैसी अवस्था है! कामिनी--ठहरिये-ठहरिये, मैं बाहर जाकर सभी को इस बात की खबर कर देती हूँ कि आपको कुछ हो गया है। मुझे आपके पास बैठते डर लगता है! हे परमेश्वर!
आनन्दसिंह--तुम नाहक मेरी जान को दुःख दे रही हो! पास ही तो पानी पड़ा है, अपना चेहरा क्यों नहीं धो डालतीं? मुझे ऐसी दिल्लगी अच्छी नहीं मालूम होती, खैर, अब बहुत हो गया, तुम उठो!
कामिनी—मेरे चेहरे में क्या लगा है जो धो डालूं? आप ही क्यों नहीं अपना चेहरा धो डालते! क्या मुंह में पानी लगाकर मैं लाड़िली से कोई दूसरी ही औरत बन जाऊँगी? या आप मुंह धोकर छोटे कुमार बन जायेंगे?
आनन्द--(बेचैनी से बिगड़कर) बस-बस, अब मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता और न ज्यादे देर तक ऐसी दिल्लगी सह सकता हूँ। मेरा हुक्म है कि तुम तुरत अपना चेहरा धो डालो, नहीं तो तुम्हारे साथ जबर्दस्ती की जायगी, फिर पीछे दोष न देना!
यह सुनते ही कामिनी घबड़ाकर उठ खड़ी हुई और यह कहती हुई कि 'आज भोर-ही-भोर ऐसी दुर्दशा में फंसी हूँ, न मालूम दिन कैसा बीतेगा, उस चौकी के पास चली गई जिस पर जल से भरा गंगाजमनी लोटा हुआ रक्खा था और पास ही में एक बड़ा सा आफताबा भी था। पानी से अपना चेहरा साफ किया और दो-चार कुल्ला भी करने के बाद रूमाल से मुंह पोंछ आनन्दसिंह से बोली, “कहिये, मैं वही हूँ कि बदल गई?"
कामिनी के साथ-ही-साथ आनन्दसिंह भी बिछावन पर से उठकर वहाँ तक चले आये थे जहाँ पानी और आफताबा रक्खा हुआ था। जब कामिनी ने मुंह धोकर उनकी तरफ देखा तो कुमार के ताज्जुब की कोई हद न रही और वह पत्थर की मूरत बनकर एकटक उसकी तरफ देखते खड़े रह गये। इस समय खिड़कियों में से आसमान पर सुबह की सुफेदी फैली हुई दिखाई दे रही थी और कमरे में भी रोशनी की कमी न थी।
कामिनी--(कुछ चिढ़ी हुई आवाज से) कहिये-कहिये, क्या मैं मुंह धोने से कुछ बदल गई? आप बोलते क्यों नहीं?
आनन्दसिंह--(एक लम्बी साँस लेकर) अफसोस! तुम्हारे पूंघट ने मुझे धोखा दिया। अगर मिलाप के पहले तुम्हारी सूरत देख लेता तो धर्म नष्ट क्यों होता!
कामिनी--(जिसे अब हम लाडिली लिखेंगे, क्योंकि यह वास्तव में लाड़िली ही है) फिर भी आप उसी ढंग की बातें कर रहे हैं और अभी तक अपने को छोटे कुमार समझते हैं। इतना हिलने-डोलने पर भी आपके दिमाग से स्वप्न का गुवार न निकला। (कमरे में लटकते हुए एक बड़े आईने की तरफ उँगली से इशारा करके) अब आप उसमें अपना चेहरा देख लीजिये तो मुझसे बातें कीजिये!
कुंअर आनन्दसिंह भी यही चाहते थे, अतः वे उस आईने के सामने चले गये और बड़े गौर से अपनी सूरत देखने लगे। लाडिली भी उनके साथ-ही-साथ उस आईने के पास चली गई और जब वे ताज्जुब के साथ आईने में अपना चेहरा देख रहे थे तो बोली, “कहिये, अब भी आप अपने को छोटे कुमार ही समझते हैं या और कोई?"
क्रोध के साथ-ही-साथ शामिन्दगी ने भी आनन्दसिंह पर अपना कब्जा कर लिया और वे घबड़ा कर अपनी पोशाक पर ध्यान देने लगे, मगर उसमें किसी तरह की खराबी न पाकर उन्होंने पुनः लाडिली की तरफ देखा और कहा, "यह क्या मामला है? मेरी सूरत किसने बदली?"
लाड़िली--(ताज्जुब और घबराहट के ढंग पर) क्या आप अपनी सूरत बदली हुई समझते हैं?
आनन्दसिंह--बेशक!
लाड़िली--(अफसोस के साथ हाथ मलकर) अफसोस! अगर यह बात ठीक है तो बड़ा ही गजब हुआ!
आनन्दसिंह--जरूर ऐसा ही है, मैं अभी अपना चेहरा धोता हूँ।
इतना कहकर कुंअर आनन्दसिंह उस चौकी के पास चले गये जिस पर पानी रक्खा हुआ था और अपना चेहरा धोने लगे। पानी पड़ते ही हाथ पर रंग उतर आया जिस पर निगाह पड़ते ही लाड़िली चौंकी और रंज के साथ बोली, "बेशक चेहरा रंगा हुआ है! हाय बड़ा ही गजब हो गया! मैं बेमौत मारी गई! मेरा धर्म नष्ट हुआ! अब मैं अपने पति के सामने किस मुँह से जाऊँगी और अपनी हमजोलियों की बातों का क्या जवाब दूँगी! औरतों के लिए यह बड़े ही शर्म की बात है, नहीं-नहीं, बल्कि औरतों के लिए यह घोर पातक है कि पराये मर्द का संग करें। सच तो यह है कि पराये मर्द का शरीर छू जाने से भी प्रायश्चित्त लगता है, और बात का तो कहना ही क्या है! हाय, मैं बर्बाद हो गई और कहीं की भी न रही। इसमें कोई शक नहीं कि आपने जानबूझकर मुझे मिट्टी में मिला दिया!
आनन्दसिंह––(अच्छी तरह चेहरा धोने के बाद रूमाल से मुँह पोंछकर) क्या कहा? क्या जानबूझकर मैंने तुम्हारा धर्म नष्ट किया?
लाड़िली––वेशक ऐसा ही है, मैं इस बात की दुहाई दूँगी और लोगों से इन्साफ चाहूँगी।
आनन्दसिंह––क्या मेरा धर्म नष्ट नहीं हुआ?
लाड़िली––मर्दो के धर्म का क्या कहना है और उसका बिगड़ना ही क्या, जो दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह ब्याह से भी ज्यादा कर सकते हैं! बर्बादी तो औरतों के लिए है। इसमें कोई शक नहीं कि आपने जान-बूझकर मेरा धर्म नष्ट किया। जब आप छोटे कुमार ही थे तो आपको मेरे पास से उठ जाना चाहिए था या मेरे पास बैठना ही मुनासिब न था।
आनन्दसिंह––मैं कसम खाकर कह सकता हूँ कि मैंने तुम्हारी सूरत घूँघट के सबब से अच्छी तरह नहीं देखी, एक दफे ऐंचातानी में निगाह पड़ भी गयी थी तो तुम्हें कामिनी ही समझा था, और इसके लिए भी मैं कसम खाता हूँ कि मैंने तुम्हें धोखा देने के लिए जान-बूझकर अपनी सूरत नहीं रंगी है बल्कि मुझे इस बात की खबर भी नहीं कि मेरी सूरत किसने रंगी या क्या हुआ।
लाड़िली––अगर आपका यह कहना ठीक है तो समझ लीजिये कि और भी गजब हो गया! मेरे साथ-ही-साथ कामिनी भी बर्बाद हो गई होगी। जिस धर्मात्मा ने धोखा देकर रा संग आपके साथ करा दिया है, उसने कामिनी को भी, जो आपके साथ ब्याही गई है, जरूर धोखा देकर मेरे पति के पलंग पर सुला दिया होगा!
यह एक ऐसी बात थी जिसे सुनते ही आनन्दसिंह का रंग बदल गया। रंज और अफसोस की जगह क्रोध ने अपना दखल जमा लिया और कुछ सुस्त तथा ठंडी रगों में बेमौके हरारत पैदा हो गई जिससे बदन काँपने लगा और उन्होंने लाल आँखें करके लाड़िली की तरफ देख के कहा––क्या कहा? तुम्हारे पति के पलंग पर कामिनी! यह किसकी मजाल है कि···
लाडिली––ठहरिये-ठहरिये, आप गुस्से में न आ जाइये। जिस तरह आप अपनी और कमलिनी की इज्जत समझते हैं, उसी तरह मेरी और मेरे पति की इज्जत पर भी आपको ध्यान देना चाहिए। मेरी बर्बादी पर तो आपको गुस्सा न आया और कमलिनी का भी मेरा ही सा हाल सुनकर आप जोश में आकर उछल पड़े, अपने आपे से बाहर हो गये और आपको बदला लेने की धुन सवार हो गई! सच है, दुनिया में किसी बिरले ही महात्मा को हमदर्दी और इन्साफ का ध्यान रहता है, दूसरे पर जो कुछ बीती है उसका अन्दाजा किसी को तब तक नहीं लग सकता, जब तक उस पर भी वैसी ही न बीते। जिसने कभी एक उपवास भी नहीं किया है, वह अकाल के मारे भूखे गरीबों पर उचित और सच्ची हमदर्दी नहीं कर सकता, यों उनके उपकार के लिए भले ही बहुत-कुछ जोश दिखाये और कुछ कर भी बैठे। ताज्जुब नहीं कि हमारे बुजुर्ग और बड़े लोग इसी खयाल से बहुत से व्रत चला गये और इससे उनका मतलब यह भी हो कि स्वयं भूखे रहकर देख लो, तब भूखों की कदर कर सकोगे। दूसरे के गले पर छुरी चला देना कोई बड़ी बात नहीं है, मगर अपने गले पर सुई से भी निशान नहीं किया जाता। जो दूसरों की बहू-बेटियों को झाँका करते हैं, वे अपनी बहू-बेटियों का झाँका जाना सहन नहीं कर सकते। बस, इसी से समझ लीजिये कि मेरी बर्बादी पर आपको अगर कुछ खयाल हुआ तो केवल इतना ही कि बस, कसम खाकर अफसोस करने लगे और सोचने लगे कि मेरे दिल से किसी तरह इस बात का रंज निकल जाय, मगर कामिनी का भी मेरे ही ऐसा हाल सुनकर म्यान के बाहर हो गये! क्या यही इन्साफ है और यही हमदर्दी है! इसी दिल को लेकर आप राजा बनेंगे और राज-काज करेंगे!
लाड़िली की जोश-भरी बातें सुनकर आनन्दसिंह सहम गये और शर्म ने उनकी गर्दन झुका दी। वह सोचने लगे कि क्या करूँ और इसकी बातों का क्या जवाब दूँ! इसी समय कमरे का दरवाजा खुला (जो शायद धोखे में खुला रह गया होगा) और इन्द्रदेव की लड़की इन्दिरा को साथ लिए हुए कामिनी आती दिखाई पड़ी।
लाड़िली––लीजिये, कामिनी बहिन भी आ पहुँचीं! कुछ ताज्जुब नहीं कि ये भी अपना हाल कहने के लिए आई हों। (कामिनी से) लो बहिन, आज हम तुम्हारे बराबर हो गये!
कामिनी––बराबर नहीं, बल्कि बढ़ के!
२
रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है। महल के अन्दर एक सजे हुए कमरे में एक तरफ रानी चन्द्रकान्ता, चपला और चम्पा बैठी हुई हैं और उनसे थोड़ी ही दूर पर राजा वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह और भैरोंसिंह बैठे आपस में कुछ बातचीत कर रहे हैं।
चन्द्रकान्ता––(वीरेन्द्रसिंह से) सच्चा-सच्चा हाल मालूम होना तो दूर रहा मुझे इस बात का किसी तरह कुछ गुमान भी न गुआ। इस समय मैं दुल्हिनों की सोहागरात का इन्तजाम देख-सुनकर यहाँ आई और दिन भर की थकावट से सुस्त होकर पड़ रही, जी में आया कि घंटे दो घंटे सो रहूँ, मगर इसी बीच में चपला बहिन आ पहुँची और बोली, "लो बहिन, मैं तुम्हें एक अनूठा हाल सुनाती हूँ जिसकी अब तक हम लोगों को कुछ खबर ही न थी!" बस इतना कहकर बैठ गईं और कहने लगी कि 'कमलिनी और लाड़िली की शादी तिलिस्म के अन्दर ही इन्द्रजीत और आनन्द के साथ भी हो चुकी है जिसके बारे में अब तक हम लोगों को किसी ने कुछ भी नहीं कहा। इसी समय लड़के (भैरोंसिंह) ने मुझसे कहा है।' सुनते ही मैं सन्न हो गई कि हे राम, यह कौन-सी बात थी जिसे अभी तक सब कोई छिपाये बैठे रहे!
चपला––(भैरोंसिंह की तरफ इशारा करके) सामने तो बैठा हुआ है, पूछिये कि इस समय के पहले ही कभी कुछ कहा था। यद्यपि दोनों की शादियाँ इसके सामने ही तिलिस्म के अन्दर हुई थीं।
वीरेन्द्रसिंह––मुझे भी इस विषय में किसी ने कुछ नहीं कहा था, अभी थोड़ी देर हुई कि गोपालसिंह ने यह सब हाल पिताजी से बयान किया तब मालूम हुआ।
चन्द्रकान्ता––यही सुन के तो मैंने आपको तकलीफ दी, क्योंकि आपकी जुबानी सुने बिना मेरी दिलजमई नहीं हो सकती।
वीरेन्द्रसिंह––जो कुछ तुमने सुना, सब ठीक है।
चन्द्रकान्ता––मजा तो यह है कि लड़कों ने भी मुझसे इस बात की कुछ चर्चा नहीं की।
वीरेन्द्रसिंह––लड़कों को तो खुद ही इस बात की खबर नहीं है कि उनकी शादी कमलिनी और लाड़िली के साथ हुई थी।
चन्द्रकान्ता––यह तो आप और भी ताज्जुब की बात कहते हैं। यह भला कैसे हो सकता है कि उनकी शादी हो, उन्हीं को पता न लगे कि हमारी शादी हो गई है? इस पर कौन किश्वास करेगा!
वीरेन्द्रसिंह––बात ही कुछ ऐसी हो गई थी और यह शादी जान-बूझकर किसी मतलब से छिपाई गई थी। (गोपालसिंह की तरफ इशारा करके) अब ये खुलासा हाल तुमसे बयान करेंगे, तब तुम समझ जाओगी कि ऐसा क्यों हुआ।
गोपालसिंह––मैं सब हाल आपसे खुलासा बयान करता हूँ और आशा करता हूँ कि आप मेरा कसूर माफ करेंगी, क्योंकि यह सब मेरी ही करतूत है और मैंने ही यह शादी कराई है।
चन्द्रकान्ता––अगर तुमने ऐसा किया तो छिपाने की क्या जरूरत थी? क्या हम लोग तुमसे रंज हो जाते? या हम लोग इस बात को नहीं समझते कि जो कुछ भी तुम करोगे, अच्छा ही समझ के करोगे!
गोपालसिंह––ठीक है, मगर किया क्या जाय! इस बात को छिपाये बिना काम नहीं चलता था, यही तो सबब हुआ कि खुद दोनों कुमारों को भी इस बात का पता न लगा कि उनकी शादी फलां के साथ हो गई है।
चन्द्रकान्ता––आखिर ऐसा क्यों किया गया, सो तो कहो!
गोपालसिंह––इसका सबब यह है कि एक दिन कमला मेरे पास आई और बोली कि 'मैं आपसे एक जरूरी बात कहती हूँ जिस पर आपको विशेष ध्यान देना होगा।' मैंने पूछा––'क्या?' इस पर उसने जवाब दिया कि 'कमलिनी ने जो कुछ अहसान हम लोगों पर, खास करके दोनों कुमारों तथा किशोरी और कामिनी पर किये हैं, वह किसी से छिपे नहीं हैं। किशोरी का खयाल है कि इसका बदला किसी तरह अदा हो ही नहीं सकता, और बात भी ऐसी ही है, अब किशोरी ने बात-ही-बात में अपने दिल का हाल मुझसे भी कह दिया और इस बारे में जो कुछ उसने सोच रखा था, वह भी बयान किया, किशोरी कहती है कि अगर मैं शादी न करूँ या शादी होने के पहले ही इस दुनिया से उठ जाऊँ तो उसके अहसान और ताने से कुछ बच सकती हूँ। इस विषय पर जब मैंने किशोरी को बहुत-कुछ समझाया तो बोली कि खैर, अगर मेरी शादी के पहले कमलिनी की शादी कुँअर इन्द्रजीतसिंह के साथ हो जायेगी तब मैं सुख से जिंदगी बिता सकूँगी और उसके अहसान से भी हलकी हो जाऊँगी, क्योंकि ऐसा होने से कमलिनी को पटरानी की पदवी मिलेगी और उसी का लड़का गद्दी का मालिक समझा जायेगा। मैं छोटी और कमलिनी की लौंडी होकर रहूँगी; तभी मेरे दिल को तस्कीन होगा और मैं समझूगी कि कमलिनी के अहसान का बोझ मेरे सिर से उतर गया।'
चन्द्रकान्ता––शाबाश! शाबाश!
वीरेन्द्रसिंह––बेशक, किशोरी ने बड़े हौसले की और लासानी बात सोची!
चपला––बेशक, यह साधारण बात नहीं है, यह बड़े कलेजे वाली औरतों का काम है, और इससे बढ़कर किशोरी कुछ कर ही नहीं सकती थी।
गोपालसिंह––मैंने जब कमला की जुबानी यह बात सुनी तो दंग हो गया और मन में किशोरी की तारीफ करने लगा। सच तो यों है कि यह बात मेरे दिल में भी जम गई। अब मैंने कमला से वादा तो कर दिया कि 'ऐसा ही होगा', मगर तरद्दुद में पड़ गया कि यह काम क्योंकर पूरा होगा, क्योंकि यह बात बड़ी ही कठिन बल्कि असम्भव थी कि इन्द्रजीतसिंह और कमलिनी इस राय को मंजूर करें। इसके अतिरिक्त यह भी मंजूरी नहीं हो सकती थी कि हमारे महाराज इस बात को स्वीकार कर लेंगे।
भैरोंसिंह––बेशक, यह कठिन काम था, इन्द्रजीतसिंह इस बात को कभी मंजूर न करते।
गोपालसिंह––कई दिन के सोच-विचार के बाद मैंने और भैरोंसिंह ने मिलकर एक तरकीब निकाल ली और किसी न किसी तरह कमलिनी और लाड़िली को इन्द्रानी और आनन्दी बनाकर दोनों की शादी इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ करा दी। उन दिनों कमलिनी के पिता बलभद्रसिंहजी, भूतनाथ की मदद से छूटकर यहाँ (अर्थात् बगुले वाले तिलिस्मी मकान में) आ चुके थे। अब मैं तिलिस्म के अन्दर ही अन्दर यहाँ आया और बलभद्रहिंजी को कन्यादान करने के लिए समझा-बुझाकर जमानिया ले गया। उस दिन भूतनाथ बहुत परेशान हुआ था और भैरोंसिंह मेरे साथ था। हम लोग पहले जब इस मकान में आये थे, तो भूतनाथ और बलभद्रसिंहजी के नाम की एक-एक चिट्ठी दोनों की चारपाई पर रख के चले गये थे। बलद्रसिंहजी की चिट्ठी में उनकी दिलजमई के लिए एक अँगूठी भी रखी थी जो उन्होंने ब्याह के पहले मुझे बतौर सगुन के दी थी। इसके बाद दूसरे दिन फिर पहुँचे और भूतनाथ को अपना पूरा-पूरा निश्चय देकर बलभद्रसिंहजी को ले गये। उनके जाने का सबब भूतनाथ को ठीक-ठीक कह दिया था। मगर साथ इसके इस बात की भी ताकीद कर दी थी कि यह हाल किसी को मालूम न होवे। इतना कहते-कहते गोपालसिंह कुछ देर के लिए रुके और फिर इस तरह कहने लगे––
"पहले तो मुझे इस बात की चिन्ता थी कि बलभद्रसिंह मेरा कहना मानेंगे या नहीं, मगर उन्होंने इस बात को बड़ी खुशी से मंजूर कर लिया। अपनी लड़कियों से मिल कर वे बहुत ही प्रसन्न हुए और हम लोगों पर जो कुछ आफतें बीत चुकी थीं, उन्हें सुन-सुनाकर अफसोस करते रहे, फिर अपनी बीती सुनाकर प्रसन्नतापूर्वक हम लोगों के काम में शरीक हुए, अर्थात् हँसी-खुशी के साथ उन्होंने कमलिनी और लाड़िली का कन्यादान कर दिया। इस काम में भैरोंसिंह को भी कम तरद्दुद नहीं उठाना पड़ा, बल्कि दोनों कुमार इनसे रंज भी हो गये थे, क्योंकि इनकी जुबानी असल बातों का पता उन्हें नहीं लगता था, अतः शादी हो जाने के बाद इस बात का बन्दोबस्त किया गया कि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह इस अनूठे ब्याह को भूल जायें तथा इन्द्रानी और आनन्दी से मिलने की उम्मीद न रखें।
इसके बाद राजा गोपालसिंह ने भी बहुत-सा हाल बयान किया जो हम सन्तति के अठारहवें भाग में लिख आये हैं और सब बातें सुनकर अन्त में चन्द्रकान्ता ने कहा, "खैर, जो हुआ अच्छा हुआ, हम लोगों के लिए तो जैसे किशोरी और कामिनी हैं, वैसे ही कमलिनी और लाड़िली हैं। मगर किशोरी के नाना को यदि इस बात का कुछ रंज हो तो ताज्जुब नहीं।"
वीरेन्द्रसिंह––पिताजी भी यही कहते थे। मगर इसमें कोई शक नहीं कि किशोरी ने परले सिरे की हिम्मत दिखलाई!
गोपालसिंह––साथ ही इसके यह भी समझ लीजिए कि कमलिनी ने भी इस बात को सहज ही में स्वीकार नहीं कर लिया, इसके लिए भी हम लोगों को बहुत-कुछ उद्योग करना पड़ा। बात यह है कि कमलिनी भी किशोरी को जान से ज्यादा चाहती है और मानती है।
चन्द्रकान्ता––मगर मुझे इस बात का अफसोस जरूर है कि इन दोनों की शादी में किसी तरह की तैयारी नहीं की गई और न कुछ धूमधाम ही हुई।
इसके बाद बहुत देर तक इन सभी में बातचीत होती रही।
३
अब हम कुँअर इन्द्रजीतसिंह की तरफ चलते और देखते हैं कि उधर क्या हो रहा है।
किशोरी और कमलिनी की बातचीत सुनकर कुंअर इन्द्रजीतसिंह से न रहा गया और उन्होंने बेचैनी के साथ उन दोनों की तरफ देखकर कहा, "क्या तुम लोगों ने मुझे सताने और दुःख देने के लिए कसम ही खा ली है? क्यों मेरे दिल में हौल पैदा कर रही हो? असल बात क्यों नहीं बतातीं?"
किशोरी-–(मुस्कुराती हुई) यद्यपि मुझे आपसे शर्म करनी चाहिए, मगर कमला और कमलिनी बहिन ने मुझे बेहया बना दिया, तिस पर आज की दिल्लगी मुझे हंसातेहँसाते बेहाल कर रही है। आप बिगड़े क्यों जाते हैं। ठहरिये-ठहरिये, जल्दी न कीजिए, और समझ लीजिए कि मेरी शादी आपके साथ नहीं हुई बल्कि कमलिनी की शादी आपके साथ हुई है।
कुमार--सो कैसे हो सकता है! और मैं क्योंकर ऐसी अनहोनी बात मान लूं?
कमलिनी--अब आपकी हालत बहुत ही खराब हो गई! क्या कहूँ, मैं तो आप को अभी और छकाती, मगर दया आती है इसलिए छोड़ देती हूँ। इसमें कोई शक नहीं कि मैंने आपसे दिल्लगी की है, मगर इसके लिए मैं आपसे इजाजत ले चुकी हूँ! अपनी तर्जनी उंगली की अंगूठी दिखाकर) आप इसे पहचानते हैं?
कुमार--हाँ-हाँ, मैं इस अंगूठी को खूब पहचानता हूं। तिलिस्म के अन्दर यह अंगूठी मैंने इन्द्रानी को दो थी, मगर अफसोस!
कमलिनी--अफसोस न कीजिए, आपकी इन्द्रानी मरी नहीं, बल्कि जीती-जागती आपके सामने खड़ी है।
कमलिनी की इस आखिरी बात ने कुमार के दिल से आश्चर्य और दुःख को धोकर साफ कर दिया और उन्होंने खुशी-खुशी कमलिनी और किशोरी का हाथ पकड़कर कहा, "क्या यह सच है?"
किशोरी--जी हाँ, सच है।
कुमार--और जिन दोनों को मैंने मरी हुई देखा था, वे कौन थीं? किशोरी-वे वास्तव में माधवी और मायारानी थीं जो तिलिस्म के अन्दर ही अपनी बदकारियों का फल भोगकर मर चुकी थीं। आपके दिल से उस शादी का खयाल उठा देने के लिए ही उनकी लाशें इन्द्रानी और आनन्दी बनाकर दिखा दी गई थीं, मगर वास्तव में इन्द्रानी यहीं मौजूद हैं और आनन्दी, यही लाड़िली थी जो आनन्दसिंह के साथ ब्याही गई थी-इस समय उधर भी कुछ ऐसा ही रंग मचा हुआ है।
कुमार--तुम्हारी बातों ने इस समय मुझे प्रसन्न कर दिया। विशेष प्रसन्नता तो इस बात से होती है कि तुम खुले दिल से इन बातों को बयान कर रही हो और कमलिनी में तथा तुममें पूरे दर्जे की मुहब्बत मालूम होती है। ईश्वर इस मुहब्बत को बराबर इसी तरह बनाए रहे। (कमलिनी से) मगर तुमने मुझे बड़ा ही धोखा दिया, ऐसी दिल्लगी भी कभी किसी ने नहीं सुनी होगी! आखिर ऐसा किया ही क्यों!
कमलिनी--अब क्या सब बातें खड़े-खड़े ही खतम होंगी और वैठने की इजाजत न दी जायगी?
कुमार--क्यों नहीं, अब बैठकर हँसी-दिल्लगी करने और खुशी मनाने के सिवाय और हम लोगों को करना ही क्या है!
इतना कहकर कुंअर इन्द्रजीतसिंह गद्दी पर बैठ गये और हाथ पकड़कर किशोरी और कमलिनी को अपने दोनों बगल बैठा लिया। कमला आज्ञा पाकर बैठा ही चाहती थी कि दरवाजे पर ताली बजने की आवाज आई जिसे सुनते ही वह बाहर चली गई और तुरन्त लौटकर बोली, "पहरे वाली लौंडी कहती है कि भैरोसिंह खड़े हैं।"
कुमार--(खुश होकर) हां-हो, उन्हें जल्द ले आओ, इन हजरत ने मेरे साथ क्या कम दिल्लगी की है? अब तो मैं सब बातें समझ गया। भला आज उन्हें इत्तिला कराके मेरे पास आने का दिन तो नसीब हुआ।
कुमार की बातें सुनकर कमला पुनः बाहर चली गई और कमलिनी तथा किशोरी, कुमार के बगल से कुछ हटकर बैठ गईं, इतने ही में भैरोंसिंह भी आ पहुँचे।
कुमार--आइए-आइए! आपने भी मुझे बहुत छकाया है। पर क्या चिन्ता है, समय मिलने पर समझ लूंगा।
भैरोंसिंह--(हँसकर)जो कुछ किया (किशोरी की तरफ बताकर) इन्होंने किया, मेरा कोई कसूर नहीं!
कुमार--खैर, जो कुछ हुआ सो हुआ, अब मुझे सच्चा-सच्चा हाल तो सुना दो कि तिलिस्म के अन्दर इस तरह की रूखी-फीकी शादी क्यों कराई गई और इस काम के अगुआ कौन महापुरुष थे?
भैरोंसिंह--(किशोरी की तरफ इशारा करके)जो कुछ किया सब इन्होंने किया, यही सब काम थे। अगुआ थीं और राजा गोपालसिंह इस काम में इनकी मदद कर रहे थे। उन्ही के आज्ञानुसार मुझे भी मजबूर होकर इन लोगों का साथ देना पड़ा था। इसका खुलासा हाल आप कमला से पूछिये, यही ठीक-ठीक बतावेगी।
कुमार--(कमला से) खैर, तुम्हीं बताओ कि क्या हुआ?
कमला--(किशोरी से) कहो बहिन, अब तो मैं साफ-ही-साफ कह दूं?
किशोरी--अब छिपाने की जरूरत ही क्या है?
कमला ने इस तरह से कहना शुरू किया, "किशोरी बहिन ने मुझसे कई दफे कहा कि 'तू इस बात का बन्दोबस्त कर कि किसी तरह मेरी शादी के पहले ही कमलिनी की शादी कुमार के साथ हो जाय।' मगर मेरे किये इसका कुछ भी बन्दोबस्त न हो सका और कमलिनी रानी भी इस बात पर राजी होती दिखाई न दीं, अतः मैं बात टाल कर चुपकी हो बैठी, मगर मुझे इस काम में सुस्त देखकर किशोरी ने फिर मुझसे कहा कि 'देख कमला, तू मेरी बात पर कुछ ध्यान नहीं देती, मगर इसे खूब समझ रखना कि अगर मेरा इरादा पूरा न हुआ अर्थात् मेरी शादी के पहले ही कमलिनी की शादी कुमार के साथ न हो गई तो मैं कदापि ब्याह न करूँगी, बल्कि अपने गले में फांसी लगाकर जान दे दूंगी। कमलिनी ने जो कुछ अहसान मुझ पर किये हैं, उनका बदला मैं किसी तरह चुका नहीं सकती, अगर कुछ चुका सकती हूँ तो इसी तरह कि कमलिनी को पटरानी बनाऊँ और आप उसकी लौंडी होकर रहूँ, मगर अफसोस है कि तू मेरी बातों पर कुछ भी ध्यान नहीं देती जिसका नतीजा यह होगा कि एक दिन तू रोयेगी और पछताएगी।' "किशोरी की इस आखिरी बात से मेरे कलेजे पर एक चोट-सी लगी और मैंने सोचा कि जो कुछ यह कहती हैं, बहुत ठीक है, ऐसा होना ही चाहिए। आखिर मैंने राजा गोपालसिंह से यह सब हाल कहा और उन्हें अपनी तरफ से भी बहुत-कुछ समझाया जिसका नतीजा यह निकला कि वे दिलोजान से इस काम के लिए तैयार हो गये। जब वे खुद तैयार हो गये तो फिर क्या था? सब काम खूबी के साथ होने लगा।
"राजा गोपालसिंह ने इस विषय में कमलिनीजी से कहा और इन्हें बहुत समझाया, मगर ये राजी न हुई और बोली कि 'आपकी आज्ञानुसार मैं कुमार से व्याह कर लेने के लिए तैयार हूँ, मगर यह नहीं हो सकता कि किशोरी से पहले ही अपनी शादी करके उसका हक मार दूं। हाँ, किशोरी की शादी हो जाने के बाद जो कुछ आप आज्ञा देंगे मैं करूंगी।" यह जवाब सुनकर गोपालसिंहजी ने फिर कमलिनी को समझाया और कहा कि 'अगर तुम किशोरी की इच्छा पूरी न करोगी तो वह अपनी जान दे देगी, फिर तुम ही सोच लो कि उसके मर जाने पर कुमार की क्या हालत होगी और तुम्हारी इस जिद का क्या नतीजा निकलेगा?'
"गोपालसिंहजी की इस बात ने इन्हें (कमलिनी की तरफ बता कर) लाजवाब कर दिया और ये लाचार हो शादी करने पर राजी हो गईं। तब राजा साहब ने भैरोंसिंह को मिलाया और ये भी इस बात पर राजी हो गये। इसके बाद यह सोचा गया कि कुमार इस बात को स्वीकार न करेंगे अतः उन्हें धोखा देकर जहाँ तक जल्द हो तिलिस्म के अन्दर ही कमलिनी के साथ उनकी शादी कर देनी चाहिए, क्योंकि तिलिस्म के बाहर हो जाने पर हम लोग स्वाधीन न रहेंगे और अगर बड़े महाराज इस बात को सुनकर अस्वीकार कर देंगे तो फिर हम लोग कुछ भी न कर सकेंगे, इत्यादि।
"बस यही सबब हुआ कि तिलिस्म के अन्दर आपसे तरह-तरह की चालबाजियाँ खेली गईं और भैरोंसिंह ने भी आप से सब भेद छिपा रक्खा। खुद राजा गोपालसिंहजी तिलिस्म के अन्दर आये और बुड्ढे दारोगा बनकर इस काम में उद्योग करने लगे।"
कुमार--(बात रोक कर ताज्जुब के साथ) क्या खुद गोपालसिंह बुड्ढे दारोगा बने थे?
कमला--जी हां, वह बुड्ढी मैं बनी थी, तथा किशोरी और इन्दिरा आदि ने लड़कों का रूप धरा था।
कमला--(हँसकर) यह बुड्ढी भैरोंसिंह की जोरू बनी थी। अब इस बात को सच कर दिखाना चाहिए, अर्थात् इस बुड्ढी को भैरोंसिंह के गले मढ़ना चाहिए।
कुमार--जरूर! (कमला से) तब तो मैं समझता हूँ कि 'मकरन्द' इत्यादि के बारे में जो भैरोंसिंह ने बयान किया था, वह सब झूठ था?
कमलिनी--हां, बेशक उसमें बारह आने से ज्यादा झूठ था।
कुमार--खैर, तब क्या हुआ? तुभ आगे बयान करो।
कमला ने फिर इस तरह बयान करना शुरू किया--
"भैरोंसिंह जान-बूझ कर इसलिए पागल बनाकर आपको दिखाये गये थे जिसमें एक तो आप धोखे में पड़ जायँ और समझें कि हमारे विपक्षी लोग भी वहाँ रहते हैं, दूसरे आपसे मिलाप हो जाने पर यदि भैरोंसिंह से कुछ भूल भी हो जाय तो आप यही समझें कि अभी तक इनके दिमाग में पागलपन का कुछ धुआं बचा हुआ है। जिस समय हम लोग तिलिस्म के अन्दर पहुँचाए गये थे, उस समय राजा गोपालसिंह ने अपनी खास तिलिस्मी किताब कमलिनीजी को दे दी थी जिससे तिलिस्म का बहुत-कुछ हाल मालूम हो गया था और इनकी मदद से हम लोग जो चाहते थे करते थे तथा हमें किसी बात की तकलीफ भी नहीं होती थी और खाने-पीने की सभी चीजें राजा गोपालसिंहजी पहुंचा दिया करते थे।
"भैरोंसिंह जव पागल बनने के बाद आपसे मिले थे तो अपना ऐयारी का बटुआ जान-बूझ कर कमलिनी के पास रख गये थे। फिर जब भैरोंसिंह को बुलाने की इच्छा हुई तो उन्हीं का बटुआ और पीले मकरन्द की लड़ाई दिखा कर वे आपसे अलग कर लिए गये, कमलिनी पीछे मकरन्द की सूरत में थीं और मैं उनका मुकाबला कर रही थी, कही-बदी और मेल की लड़ाई थी इसलिए आपने समझा होगा कि हम दोनों बड़े बहादुर और लड़ाके हैं। अतः इस मामले के बाद जब इन्द्रानी और आनन्दी वाले बाग में भैरोंसिंह आपसे मिले तब भी इन्होंने बहुत-सी झूठी बातें बनाकर आपसे कहीं और जब आप इनसे रंज हुए तो आपका संग छोड़ कर ये फिर हम लोगों की तरफ चले आये। आप दोनों भाई उस शादी करने से इन्कार करते थे, मगर मजबूरी और लाचारी ने आपका पीछा न छोड़ा, इसके अतिरिक्त खुद इन्द्रानी और आनन्दी ने भी आप दोनों को किशोरी और कामिनी की चिट्ठी दिखा कर खुश कर लिया था। यहाँ आकर आपने सुना ही है कि कमलिनीजी के पिता बलभद्रसिंहजी, जिन्हें भूतनाथ छुड़ा लाया था, यकायक गायब हो गए और कई दिनों के बाद लौट कर आये।"
कुमार-–हाँ, सुना था।
कमला--बस, उन्हें राजा गोपालसिंह ही यहाँ आकर ले गये थे और खुद बलभद्रसिंहजी ने ही अपनी दोनों लड़कियों का कन्या-दान किया था।
कुमार--(हंसते हुए) ठीक है, अब मैं सब बातें समझ गया और यह भी मालूम हो गया कि केवल धोखा देने के लिए ही माधवी और मायारानी, जो पहले ही मर चुकी थीं, इन्द्रानी और आनन्दी बनाकर दिखाई गई थीं।
भैरोंसिंह--जी हाँ।
कुमार--मगर नानक वहाँ क्योंकर पहुंचा था? भैरोंसिंह--आप सुन चुके हैं कि तारासिंह ने नानक को कैसा छकाया था, अतः वह हम लोगों से बदला लेने की नीयत करके वहाँ गया और मायारानी से मिल गया था। कमलिनीजी ने वहाँ का रास्ता उसे बता दिया था, उसी का यह नतीजा निकला। जब मायारानी राजा गोपालसिंह के कब्जे में पड़ गई तब राजा साहब ने नानक को बहुत कुछ बुरा-भला कहा, यहाँ तक कि नानक उनके पैरों पर गिर पड़ा और उनसे अपने कसूर की माफी मांगी। उस समय राजा साहब ने उसका कसूर माफ करके उसे अपने साथ रख लिया। तब से वह उन्हीं के कब्जे में रहा और उन्हीं की आज्ञानुसार आपको धोखे में
डालने की नीयत से मायारानी और माधवी की लाश के पास दिखाई दिया था। वे दोनों पहले ही मारी जा चुकी थीं, मगर आपको भुलावा देने की नीयत से उनकी लाश इन्द्रानी और आनन्दी बना कर दिखाई गई थीं। इसके अतिरिक्त और जो कुछ हाल है, वह आपको राजा गोपालसिंहजी की जुबानी मालूम होगा।
कुमार-ठीक है, मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मायारानी और माधवी की लाश को इन्द्रानी और आनन्दी की सुरत में देखकर जो कुछ रंज मुझे हुआ था और आज तक इस घटना का जो कुछ असर मेरे दिल पर था वह जाता रहा अब मैं अपने को खुशनसीब समझने लगा। (कमलिनी से) अच्छा यह बताओ कि रात की दिल्लगी तुमने किस तौर पर की? मेरी समझ में कुछ नहीं आया और न इसी बात का पता लगा कि मेरी सूरत क्योंकर बदल गई?
कमलिनी--इस बात का जवाब आपको कमला से मिलेगा।
कमला--यह तो एक मामूली बात है। समझ लीजिये कि जब आप सो गए तो इन्हीं (कमलिनी) ने आपको बेहोश करके आपकी सूरत बदल दी।
कुमार--ठीक है मगर ऐसा क्यों किया?
कमला--एक तो दिल्लगी के लिए और दूसरे किशोरी के इस खयाल से कि जिसकी शादी पहले हुई है, उसी की सुहागरात भी पहले होनी चाहिए।
कुमार--(हँस कर और किशोरी की तरफ देखकर) अच्छा, तो यह सब आपकी बहादुरी है। खैर, आज आपकी पारी होगी ही, समझ लूंगा!
किशोरी ने शरमाकर सिर नीचा कर लिया और कुमार की बात का कुछ भी जवाब न दिया।
इसके बाद वे लोग कुछ देर तक हंसी-खुशी की बातें करते रहे और तब अपने-अपने ठिकाने चले गये।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की शादी के बाद कई दिनों तक हँसी-खुशी का जलसा बराबर बना रहा क्योंकि इस शादी के आठवें ही दिन कमला की शादी भैरोंसिंह के साथ और तारासिंह की शादी इन्दिरा के साथ हो गई और इस नाते को भूतनाथ तथा इन्द्रदेव ने बड़ी खुशी के साथ मंजूर कर लिया।
इन सब कामों से छुट्टी पाकर महाराज ने निश्चय किया कि अब पुनः उसी बगुले वाले तिलिस्मी मकान में चल कर कैदियों का मुकदमा सुना जाय, अतः आज्ञानुसार बाहर के आये हुए मेहमान लोग हँसी-खुशी के साथ बिदा किए गये और फिर कई दिनों तक तैयारी करने के बाद सभी का डेरा कूच हुआ और पहले की तरह पुनः वह तिलिस्मी मकान हरा-भरा दिखाई देने लगा। कैदी भी उसी मकान के तहखानों में पहुँचाये गये और सब का मुकदमा सुनने की तैयारी होने लगी।
४
अब हम थोड़ा-सा हाल नानक और उसकी मां का बयान करते हैं जो हर तरफ से कसूरवार होने पर भी महाराज की आज्ञानुसार कैद किये जाने से बच गये और उन्हें केवल देश-निकाले का दण्ड दिया गया।
यद्यपि महाराज ने उन दोनों पर दया की और उन्हें छोड़ दिया, मगर यह बात सर्वसाधारण को पसन्द न आई। लोग यही कहते रहे कि 'यह काम महाराज ने अच्छा नहीं किया और इसका नतीजा बहुत बुरा निकलेगा।' आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् नानक ने इस अहसान को भूल कर फसाद करने और लोगों की जान लेने पर ही कमर बांधी।
जब नानक की माँ और नानक को देश-निकाले का हुक्म हो गया और इन्द्रदेव के आदमी इन दोनों को सरहद के पार करके लौट आये तब ये दोनों बहुत ही दुःखी और उदास हो एक पेड़ के नीचे बैठ कर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। उस समय सवेरा हो चुका था और सूर्य की लालिमा पूरब में आसमान पर फैल रही थी।
रामदेई–-कहो, अब क्या इरादा है? हम लोग तो बड़ी मुसीबत में फंस गए!
नानक–बेशक मुसीबत में फंस गए और बिल्कुल कंगाल कर दिये गए। तुम्हारे जेवरों के साथ ही साथ मेरे हर्वे भी छीन लिए गये और हम इस लायक भी न रहे कि किसी ठिकाने पहुंच कर रोजी के लिए कुछ उद्योग कर सकते।
रामदेई-ठीक है, मगर मैं समझती हूँ कि अगर हम लोग किसी तरह नन्हीं के यहां पहुँच जायँगे तो खाने का ठिकाना हो जायेगा और उससे किसी तरह की मदद भी ले सकेंगे।
नानक-नन्हीं के यहां जाने से क्या फायदा होगा? वह तो खुद गिरफ्तार होकर कैद की हवा खा रही होगी! हाँ, उसका भतीजा बेशक बचा हुआ है जिसे उन लोगों ने छोड़ दिया और जो नन्हीं की जायदाद का मालिक बन बैठा होगा, मगर उससे किसी तरह की उम्मीद मुझको नहीं हो सकती।
रामदेई--ठीक है, मगर नन्हीं की लौंडियों में से दो-एक ऐसी हैं जिनसे मुझे मदद मिल सकती है।
नानक--मुझे इस बात की भी उम्मीद नहीं है, इसके अतिरिक्त वहाँ तक पहुंचने के लिए भी तो समय चाहिए, यहाँ तो शाम की भूख बुझाने को पल्ले में कुछ नहीं है।
रामदेई--ठीक है मगर क्या तुम अपने घर भी मुझे नहीं ले जा सकते? वहीं तो तुम्हारे पास रुपये-पैसे की कमी नहीं होगी!
नानक--हाँ, यह हो सकता है, वहां पहुंचने पर फिर मुझे किसी तरह की तकलीफ नहीं हो सकती, मगर इस समय तो वहाँ तक पहुँचना भी कठिन हो रहा है। (लम्बी साँस लेकर) अफसोस, मेरा ऐयारी का बटुआ भी छीन लिया गया और हम लोग इस लायक भी नहीं रह गये कि किसी तरह सूरत बदल कर अपने को लोगों की आँखों से छिपा लेते।
रामदेई--खैर, जो होना था सो हो गया, अब इस समय अफसोस करने से काम नहीं चलेगा। सब जेवर छिन जाने पर भी मेरे पास थोड़ा-सा सोना बचा हुआ है, अगर इससे कुछ काम चले तो
नानक--(चौंक कर) क्या कुछ है?
रामदेई–-हाँ!
इतना कहकर रामदेई ने धोती के अन्दर से छिपी हुई सोने की एक करधनी निकाली और नानक के आगे रख दी।
नानक--(करधनी को हाथ में लेकर) बहुत है, हम लोगों घर तक पहुँचा देने के लिए काफी है, और वहाँ पहुंचने पर किसी तरह की तकलीफ न रहेगी, क्योंकि वहाँ मेरे पास खाने-पीने की कमी नहीं है।
रामदेई--तो क्या वहाँ चलकर इन बातों को भूल
नानक--(बात काट कर) नहीं-नहीं, यह न समझना कि वहाँ पहुँच कर हम इन बातों को भूल जायेंगे और बेकार बैटे टुकड़े तोड़ेंगे, बल्कि वहाँ पहुँच कर इस बात का बन्दोबस्त करेंगे कि अपने दुश्मनों से बदला लिया जाय।
रामदेई–-हां, मेरा भी यही इरादा है, क्योंकि मुझे तुम्हारे बाप की बेमुरौवती का बड़ा रंज है जिसने हम लोगों को दूध की मक्खी की तरह एकदम निकाल कर फेंक दिया और पिछली मुहब्बत का कुछ खयाल न किया। शान्ता और हरनामसिंह को पाकर ऐंठ गया और इस बात का कुछ भी खयाल न किया कि आखिर नानक भी तो उसका ही लड़का है और वह ऐयारी भी जानता है।
नानक–-(जोश के साथ) बेशक यह उसकी बेईमानी और हरामजदगी है! अगर वह चाहता तो हम लोगों को बचा सकता था।
रामदेई--बचा लेना वया, यह जो कुछ किया सब उसी ने तो किया। महाराज ने तो हुक्म दे ही दिया था कि 'भूतनाथ की इच्छानुसार इन दोनों के साथ बर्ताव किया जाय।
नानक--बेशक ऐसा ही है! उसी कम्बख्त ने हम लोगों के साथ ऐसा सलूक किया। मगर क्या चिन्ता है, इसका बदला लिये बिना मैं कभी न छोड़े गा।
रामदेई--(आँसू बहाकर) मगर तेरी बातों पर मुझे विश्वास नहीं होता क्योंकि तेरा जोश थोड़ी ही देर का होता है।
नानक-(क्रोध के साथ रामदेई के पैरों पर हाथ रख के) मैं तुम्हारे चरणों की कसम खाकर कहता हूँ कि इसका बदला लिए बिना कभी न रहूँगा।
रामदेई--भला मैं भी तो सुनूं कि तू क्या बदला लेगा? मेरे खयाल से तो वह जान से मार देने लायक है।
नानक--ऐसा ही होगा, ऐसा ही होगा! जो तुम कहती हो वही करूँगा बल्कि उसके लड़के हरनामसिंह को भी यमलोक पहुँचाऊँगा!
रामदेह--शाबाश! मगर मेरा चित्त तब तक प्रसन्न नहीं होगा जब तक शान्ता का सिर अपने तलवों से न रगड़ने पाऊँगी!
नानक-मैं उसका सिर भी काट कर तुम्हारे सामने लाऊँगा और तब तुमसे आशीर्वाद लूंगा।
रासदेई-शाबाश, ईश्वर तेरा भला करे! मैं समझती हूँ कि इन बातों के लिए तू एक दफा फिर कसम खा जिसमें मेरी पूरी दिलजमई हो जाय।
नानक--(सूर्य की तरफ हाथ उठाकर) मैं त्रिलोकीनाथ के सामने हाथ उठाकर कसम खाता हूँ कि अपनी माँ की इच्छा पूरी करूँगा और जब तक ऐसा न कर लूंगा, अन्न न खाऊँगा।
रामदेई--(नानक की पीठ पर हाथ फेरकर) बस-बस, अब मैं प्रसन्न हो गई और मेरा आधा दुःख जाता रहा।
नानक--अच्छा, तो फिर यहाँ से उठो। (हाथ का इशारा करके) किसी तरह उस गांव में पहुँचना चाहिए, फिर सब बन्दोबस्त होता रहेगा।
दोनों उठे और एक गाँव की तरफ रवाना हुए जो वहां से दिखाई दे रहा था।
५
पाठक, आपने सुना कि नानक ने क्या प्रण किया? अतः अब यहाँ पर हम यह कह देना उचित समझते हैं कि नानक अपनी मां को लिये हुए जब घर पहुंचा तो वहाँ उसने एक दिन के लिए भी आराम न किया। ऐयारी का बटुआ तैयार करने के बाद हर तरह का इन्तजाम करके और चार-पांच शागिर्दो और नौकरों को साथ लेकर वह उसी दिन घर के बाहर निकला और चुनार की तरफ रवाना हुआ। जिस दिन कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की बारात निकलने वाली थी उस दिन वह चुनार की सरहद में मौजूद था। वारात की कैफियत उसने अपनी आँखों से देखी थी और इस बात की फिक्र में भी लगा हुआ था कि किसी तरह दो-चार कैदियों को कैद से छुड़ा कर अपना साथी बना लेना चाहिए और मौका मिलने पर राजा गोपालसिंह को भी इस दुनिया से उठा देना चाहिए।
अब हम कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का हाल बयान करते हैं।
दोपहर दिन का समय है और सब कोई भोजन इत्यादि से निश्चिन्त हो चुके हैं।
एक सजे हुए कमरे में राजा गोपालसिंह, भरतसिंह, कुंअर आन्दसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह बैठे हुए हँसी-खुशी की बातें कर रहे हैं।
गोपालसिंह-(भरतसिंह से) क्या मुझे स्वप्न में भी इस बात की उम्मीद हो सकती थी कि आपसे किसी दिन मुलाकात होगी? कदापि नहीं, क्योंकि लोगों के कहने पर मुझे विश्वास हो गया कि आप जंगल में डाकुओं के हाथ से मारे गए
भरतसिंह--और इसका बहुत बड़ा सबब यह था कि तब तक दारोगा की बेईमानी का आपको पता न लगा था, उसे आप ईमानदार समझते थे और उसी ने मुझे कैद किया था।
गोपालसिंह--बेशक यही बात है मगर खैर, ईश्वर जिसका सहायक रहता है वह किसी के बिगाड़े नहीं बिगड़ सकता। देखिए, मायारानी ने मेरे साथ क्या कुछ नहीं किया, मगर ईश्वर ने मुझे बचा लिया और साथ ही इसके बिछुड़े हुओं को भी मिला दिया!
भरतसिंह--ठीक है, मगर मेरे प्यारे दोस्त, मैं कह नहीं सकता कि कम्बख्त दारोगा ने मुझे कैसी-कैसी तकलीफें दी हैं और मजा तो यह है कि इतना करने पर भी वह बराबर अपने को निर्दोष ही बताता रहा। अतः जब मैं अपना हाल बयान करूंगा तब आपको मालूम होगा कि दुनिया में कैसे-कैसे नमकहराम और संगीन लोग होते हैं और बदों के साथ नेकी करने का नतीजा बहुत बुरा होता है।
गोपालसिंह–ठीक है, ठीक है, इन्हीं बातों को सोचकर तो भैरोंसिंह बार-बार मुझसे कहते हैं कि 'आपने नानक को सूखा छोड़ दिया सो अच्छा नहीं किया, वह बद है और बदों के साथ नेकी करना वैसा ही है जैसा नेकों के साथ बदी करना।'
भरतसिंह--भैरोंसिंह का कहना वाजिब है, मैं उनका समर्थन करता हूँ।
भैरोंसिंह--कृपानिधान, सच तो यह है कि नानक की तरफ से मुझे किसी तरह बेफिक्री होती ही नहीं। मैं अपने दिल को कितना ही समझाता हूँ मगर वह जरा भी नहीं मानता। ताज्जुब नहीं कि भैरोंसिंह इतना कह ही रहा था कि सामने से भूतनाथ आता हुआ दिखाई पड़ा।
गोपालसिंह--अजी वाह जी भूतनाथ, चार-चार दफा बुलाने पर भी हमें आपके दर्शन नहीं होते!
भूतनाथ--(मुस्कुराता हुआ) अभी क्या हुआ है, दो-चार दिन बाद तो मेरे दर्शन और भी दुर्लभ हो जायेंगे!
गोपालसिंह--(ताज्जुब से) सो क्यों?
भूतनाथ--यही कि मेरा सपूत नानक शहर में आ पहुँचा है और मेरी अन्त्येष्टि क्रिया करके बहुत जल्द अपने सिर का बोझ हलका करने की फिक्र में लगा है। (बैठ कर) कृपा कर आप भी जरा होशियार रहियेगा!
गोपालसिंह--तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि वह इस बदनीयती के साथ यहाँ पर आ गया है?
भूतनाथ–-मुझे अच्छी तरह मालूम हो गया है। इसी से तो मुझे यहाँ आने में देर हो गई क्योंकि मैं यह हाल कहने और तीन-चार दिन की छुट्टी लेने के लिए महाराज के पास चला गया था, वहाँ से लौटा हुआ आपके पास आ रहा हूँ।
गोपालसिंह--तो क्या महाराज से छुट्टी ले आये?
भूतनाथ–-जी हाँ, अब आपसे यह पूछना है कि आप अपने लिए क्या बन्दोबस्त करेंगे?
गोपालसिंह--तुम तो इस तरह की बातें करते हो जैसे उसकी तरफ से कोई बहुत बड़ा तरवुद हो गया हो! वह बेचारा कल का लौंडा हम लोगों के साथ क्या कर सकता है?
भूतनाथ--सो तो ठीक है, मगर दुश्मन को कभी छोटा और कमजोर नहीं समझना चाहिए।
गोपालसिंह-तुम्हें ऐसा ही डर है तो कहो बैठे-ही-बैठे चौबीस घण्टे के अन्दर उसे गिरफ्तार कराकर तुम्हारे हवाले कर दूं?
भूतनाथ-यह मुझे विश्वास है और आप ऐसा कर सकते हैं, मगर मुझे यह मंजूर नहीं है, क्योंकि मैं जरा दूसरे ढंग से उसका मुकाबला करना चाहता हूँ। आप जरा बाप-बेटे की लड़ाई देखिए तो! हाँ, अगर वह आपकी तरफ झुके, तो जैसा मौका देखिये, कीजियेगा।
गोपालसिंह-खैर, ऐसा ही सही! मगर तुमने क्या सोचा है, जरा अपना मनसूबा तो सुनाओ!
इसके बाद उन लोगों में देर तक बातें होती रहीं और दो घण्टे के बाद भूतनाथ उठकर अपने डेरे की तरफ चला गया।
६
नानक जब चुनारगढ़ की सरहद पर पहुंचा, तब सोचने लगा कि दुश्मनों से क्यों कर बदला लेना चाहिए। वह पांच आदमियों को अपना शिकार समझे हुए था और उन्हीं पांचों की जान लेने का विचार करता था। एक तो राजा गोपालसिंह, दूसरे इन्द्रदेव, तीसरा भूतनाथ, चौथा हरनाम सिंह और पांचवीं शान्ता। बस, ये ही पाँच उसकी आँखों में खटक रहे थे, मगर इनमें से दो अर्थात् राजा गोपालसिंह और इन्द्रदेव के पास फटकने की तो उसकी हिम्मत नहीं पड़ती थी और वह समझता था कि ये दोनों तिलिस्मी आदमी हैं, इनके काम जादू की तरह हुआ करते हैं और इनमें लोगों के दिल की बात समझ जाने की कुदरत है। मगर बाकी तीनों को वह निरा शिकार ही समझता था और विश्वास करता था कि इन तीनों को किसी न किसी तरह फंसा लेंगे। अतः चुनारगढ़ की सरहद में आ पहुँचने के बाद उसने गोपालसिंह और इन्द्रदेव का खयाल तो छोड़ दिया और भूतनाथ की स्त्री और उसके लड़के हरनामसिंह की जान लेने के फेर में पड़ा। साथ ही इसके यह भी समझ लेना चाहिए कि नानक यहाँ अकेला नहीं आया था, बल्कि समय पर मदद पहुँचाने के लायक सात-आठ आदमी और भी अपने साथ लाया था, जिसमें से चार-पाँच तो उसके शागिर्द ही थे।
दोनों कुमारों की शादी में जिस तरह दूर-दूर के मेहमान और तमाशबीन लोग आये थे, उसी तरह साधु-महात्मा तथा साधु वेषधारी पाखण्डी लोग भी बहुत से इकट्ठे हो गये थे, जिन्हें सरकार की तरफ से खाने-पीने को भरपूर मिलता था और इस लालच में पड़े हुए उन लोगों ने अभी तक चुनारगढ़ का पीछा नहीं छोड़ा था तथा तिलिस्मी मकान के चारों तरफ तथा आस-पास के जंगलों में डेरा डाले हुए पड़े थे। नानक और उसके साथी लोग भी साधुओं ही के वेष में वहाँ पहुंचे और उसी मंडली में मिल-जुलकर रहने लगे।
नानक को यह बात मालूम थी कि भूतनाथ का डेरा तिलिरमी इमारत के अन्दर है और वह वहाँ बड़ी कड़ी हिफाजत के साथ रहता है। इसलिए वह कभी-कभी यह सोचता था कि मेरा काम सहज ही में नहीं हो जायेगा, बल्कि उसके लिए बड़ी भारी मेहनत करनी पड़ेगी। मगर वहाँ पहुँचने के कुछ ही दिन बाद (जब शादी-ब्याह से सब कोई निश्चिन्त होकर तिलिस्मी इमारत में आ गए) उसने सुना और देखा कि महाराज की आज्ञानुसार भूतनाथ ने स्त्री और लड़के सहित तिलिस्मी इमारत के बाहर एक बहुत बड़े और खूबसूरत खेमे में डेरा डाला है, अतएव वह बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसे विश्वास हो गया कि मैं अपना काम शीघ्र और सुभीते के साथ निकाल लूंगा।
नानक ने और भी दो-तीन रोज तक इन्तजार किया और इस बीच में यह भी जान लिया कि भूतनाथ के खेमे की कुछ विशेष हिफाजत नहीं होती और पहरे वगैरह का इन्तजाम भी साधारण-सा ही है तथा उसके शागिर्द लोग भी आजकल मौजूद नहीं हैं।
रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। यद्यपि चन्द्रदेव के दर्शन नहीं होते थे, मगर आसमान साफ होने के कारण टुटपूंजिया तारागण अपनी नामवरी पैदा करने का उद्योग कर रहे और नानक जैसे बुद्धिमान लोगों से पूछ रहे थे कि यदि हम लोग इकट्ठ हो जाये तो क्या चन्द्रमा से चौगुनी और पांचगुनी चमक-दमक नहीं दिखा सकते तथा जवाब में यह भी सुनना चाहते थे कि 'निःसन्देह!' ऐसे समय में एक आदमी स्याह लवादा ओढ़े रहने पर भी लोगों की निगाहों से अपने को बचाता हुआ भूतनाथ के खेमे की तरफ जा रहा है। पाठक समझ ही गए होंगे कि यह नानक है, अतः जब वह खेमे के पास पहुंचा तो अपने मतलव का सन्नाटा देखकर खड़ा हो गया और किसी के आने का इन्तजार करने लगा। थोड़ी ही देर में एक दूसरा आदमी भी उसके पास आया और दो-चार सायत तक बातें करके चला मया। उस समय नानक जमीन पर लेट गया और धीरे-धीरे खिसकता हुआ खेमे की कनात के पास जा पहूँचा, तब उसे धीरे से उठाकर अन्दर चला गया। यहाँ उसने अपने को गुलामगर्दिश में पाया, मगर यहाँ बिल्कुल ही अंधकार था, हाँ यह जरूर मालूम होता था कि आगे वाली कनात के अन्दर अर्थात् खेमे में कुछ रोशनी हो रही है। नानक फिर वहाँ लेट गया और पहले की तरह यह दूसरी कनात भी उठाकर खेमे के अन्दर जाने का विचार कर ही रहा था कि दाहिनी तरफ से कुछ खड़खड़ाहट की आवाज मालूम पड़ी। वह चौंका और उसी अँधेरे में तीन-चार कदम बाईं तरफ हटकर पुनः कोई आवाज सुनने और उसे जाँचने की नीयत से ठहर गया। जब थोड़ी देर तक किसी तरह की आहट नहीं मालूम हुई तो पहले की तरह ही जमीन पर लेट गया और कनात उठाकर अन्दर जाना ही चाहता था कि दाहिनी तरफ फिर किसी के पैर पटक-पटक कर चलने की आहट मालूम हुई। वह खड़ा हो गया और पुनः चार-पाँच कदम पीछे की तरफ (बाईं तरफ) हट गया, मगर इसके बाद फिर किसी तरह की आहट मालूम न हुई। कुछ देर तक इन्तजार करने के बाद वह पुनः जमीन पर लेट गया और कनात के अन्दर सिर डाल कर देखने लगा। कोने की तरफ एक मामूली शमादान जल रहा था, जिसकी मद्धिम रोशनी में दो चारपाई बिछी हुई दिखाई पड़ी। कुछ देर तक गौर करने पर नानक को निश्चय हो गया कि इन दोनों चारपाइयों पर भूतनाथ तथा उसकी स्त्री शान्ता सोई हुई है। परन्तु उनका लड़का हरामसिंह खेमे के अन्दर दिखाई न दिया और उसके लिए नानक को कुछ चिन्ता हुई, तथापि वह साहस करके खेमे के अन्दर चला ही गया।
डरता-काँपता नानक धीरे-धीरे चारपाई के पास पहुंच गया, चाहा कि खंजर से इन दोनों का गला काट डाले, मगर फिर यह सोचने लगा कि पहले किस पर वार करूं, भूतनाथ पर या शान्ता पर? वे दोनों सिर से पैर तक चादर ताने पड़े हुए थे, इससे यह मालूम करने की जरूरत थी कि किस चारपाई पर कौन सो रहा है, साथ ही इसके नानक इस बात पर भी गौर कर रहा था कि रोशनी बुझा दी जाये या नहीं। यद्यपि वह वार करने के लिए खंजर हाथ में ले चुका था, मगर उसकी दिली कमजोरी ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था और उसका हाथ कांप रहा था।
७
किशोरी, कामिनी, कमलिनी और लाड़िली ये चारों बड़ी मुहब्बत के साथ अपना दिन बिताने लगीं। इनकी मुहब्बत दिखावा नहीं थी, बल्कि दिली और सचाई के साथ थी। चारों ही जमाने के ऊँच-नीच को अच्छी तरह समझ चुकी थीं और खूब जानती थीं कि दुनिया में हर एक के साथ दुःख और सुख का चरखा लगा ही रहता है, खुशी तो मुश्किल से मिलती है, मगर रंज और दुःख के लिए किसी तरह का उद्योग नहीं करना पड़ता, यह आप से आप पहुँचता है, और एक साथ दस को लपेट लेने पर भी जल्दो नहीं छोड़ता, इसलिए बुद्धिमान का काम यही है कि जहाँ तक हो सके खुशी का पल्ला न छोड़े और न कोई काम ऐसा करे, जिसमें दिल को किसी तरह का रंज पहुँचे। इन चार औरतों का दिल उन नादान और कमीनी औरतों का सा नहीं था, जो दूसरों को खुण देखते ही जलभुन कर कोयला हो जाती हैं और दिन-रात कुप्पे की तरह मुंह फुलाये आँखों से पाखण्ड के आंसू बहाया करती हैं अथवा घर की औरतों के साथ मिल-जुलकर रहना अपनी बेइज्जती समझती हैं।
इन चारों का दिल आईने की तरह साफ था। नहीं-नहीं, हम भूल गये, हमें दिल के साथ आईने की उपमा देना पसन्द नहीं। न मालूम लोगों ने इस उपमा को किस लिए पसन्द कर रखा है! उपमा में उसी वस्तु का व्यवहार करना चाहिए जिसकी प्रकृति में उपमेय से किसी तरह का फर्क न पड़े, मगर आईने (शीशे) में तो यह बात पाई नहीं जाती, हरएक आईना बेऐब. साफ और बिना धब्बे के नहीं होता और वह हर एक की सूरत एक सी भी नहीं दिखाता बल्कि जिसकी जैसी सूरत होती है, उसके मुकाबले में वैसा ही बन जाता है। इसलिए आईना उन लोगों के दिल को कहना उचित है जो नीतिकुशल हैं या जिन्होंने यह बात ठान ली है कि जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही करना चाहिए, चाहे वह अपना हो या पराया, छोटा हो या बड़ा। मगर इन चारों में यह बात न थी, ये बड़ों की झिड़की को आशीर्वाद और छोटों की ऐंठ को उनकी नादानी समझती थीं। जब कोई हमजोली या आपस वाली क्रोध भरी हुई अपना मुंह बिगाड़े इनके सामने आती तो यदि मौका होता तो ये हँसकर कह देतीं कि 'वाह, ईश्वर ने अच्छी सूरत बनाई है!' या 'बहिन, हमने तो तुम्हारा जो कुछ बिगाड़ा सो बिगाड़ा मगर तुम्हारी सुरत ने तुम्हारा क्या कसूर किया है जो तुन उसे बिगाड़ रही हो?' बस, इतने ही में उसका रंग बदल जाता। इन बातों को विचार कर हम इनके दिल का आईने के साथ मिलान करना पसन्द नहीं करते वल्कि यह कहना मुनासिब समझते हैं कि 'इनका दिल समुद्र की तरह गम्भीर था।'
इन चारों को इस का खयाल ही न था कि हम अमीर हैं, हाथ-पैर हिलाना या घर का कामकाज करना हमारे लिए पाप है। ये खुशी से घर का काम जो इनके लायक होता करतीं औरी खाने-पीने क चीजों पर विशेष ध्यान रखतीं। सबसे बड़ा खयाल इन्हें इस बात का रहता था कि इनके पति इनसे किसी तरह रंज न होने पावें और घर के किसी बड़े बुजुर्ग को इन्हें बेअदब कहने का मौका न मिले। महारानी चन्द्रकान्ता की तो बात ही दूसरी है, ये चपला और चम्पा को भी सास की तरह समझती और इज्जत करती थीं। घर की लौंडियां तक इनसे प्रसन्न रहतीं और जब किसी लौंडी से कोई कसूर हो जाता तो झिड़की और गालियों के बदले नसीहत के साथ समझाकर ये उसे कायल और शर्मिन्दा कर देती और उसके मुंह से कहला देतीं कि 'बेशक मुझसे भूल हुई, आइन्दा कभी ऐसा न होगा!' सबसे विचित्र बात तो यह थी कि इनके चेहरे पर रंज क्रोध या उदासी कभी दिखाई देती ही न थी और जब कभी ऐसा होता तो किसी भारी घटना का अनुमान किया जाता था। हां, उस समय इनके दुःख और चिन्ता कोई ठिकाना नहीं रहता था जब ये अपने पति को किसी कारण दुःखी देखतीं। ऐसी अवस्था में इनकी सच्ची भक्ति के कारण इनके पति को अपनी उदासी छिपानी पड़ती या इन्हें प्रसन्न करने और हंसाने के लिए और किसी तरह का उद्योग करना पड़ता। मतलब यह है कि इन्होंने घ भर का दिल अपने हाथ में कर रखा था और ये घर भर की प्रसन्नता का कारण समझी जाती थीं।
भूतनाथ की स्त्री शान्ता का इन्हें बहुत बड़ा खयाल रहता और ये उसकी पिछली घटनाओं को याद करके उसकी पति-भक्ति की सराहना किया करतीं।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि इन्हें अपनी जिन्दगी में दुःखों के बड़े-बड़े समुद्र पार करने पड़े थे परन्तु ईश्वर की कृपा से जब ये किनारे लगी, तब इन्हें कल्पवृक्ष की छाया मिली और किसी बात की परवाह न रही।
इस समय संध्या होने में घण्टे भर की देर है। सूर्य भगवान् अस्ताचल की तरफ तेजी के साथ झुके चले जा रहे हैं और उनकी लाल-लाल पिछली किरणों से बड़ी-बड़ी अटारियां तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के ऊपरी हिस्सों पर ठहरा हुआ सुनहरा रंग बड़ा ही सुहावना मालूम पड़ता है। ऐसा जान पड़ता है मानो प्रकृति ने प्रसन्न होकर अपना गौरव बढ़ाने के लिए अपनी सहचरियों और सहायकों को सुनहरा ताज पहना दिया है।
ऐसे समय में किशोरी, कामिनी, लाड़िली और कमला अटारी पर एक सजे हुए बंगले के अन्दर बैठी जालीदार खिड़कियों से उस जंगल की शोभा देख रही हैं जो इस तिलिस्मी मकान से थोड़ी दूर पर है और साथ ही इसके मीठी बातें भी करती जाती हैं।
कमलिनी--(किशोरी से) बहिन एक दिन वह था कि हमें अपनी इच्छा के विरुद्ध ऐसे बल्कि इससे भी बढ़कर भयानक जंगलों में घूमना पड़ता था और उस समय यह सोचकर डर मालूम पड़ता था कि कोई शेर इधर-उधर से निकलकर हम पर हमला न करे, और एक आज का दिन है कि इस जंगल की शोभा भली मालूम पड़ती है और इसमें घूमने को जी चाहता है।
किशोरी--ठीक है, जो काम लाचारी के साथ करना पड़ता है वह चाहे अच्छा ही क्यों न हो परन्तु चित्त को बुरा लगता है, फिर भयानक तथा कठिन कामों का तो कहना ही क्या! मुझे तो जंगल में शेर और भेड़ियों का इतना खयाल न होता था जितना दुश्मनों का, मगर वह समय और ही था ईश्वर न करे किसी दुश्मन को दिखे। उस समय हम लोगों की किस्मत बिगड़ी हुई थी और अपने साथी लोग भी दुश्मन बनकर सताने के लिए तैयार हो जाते थे। (कमला की तरफ देखकर) भला तुम्ही बताओ कि उस चमेला छोकरी का मैंने क्या बिगाड़ा था जिसने मुझे हर तरह से तबाह कर दिया? अगर वह मेरी मुहब्बत का हाल मेरे पिता से न कह देती तो मुझ पर वैसी भयानक मुसीबत क्यों आ जाती?
कमला--बेशक ऐसा ही है, मगर उसने जैसी नमकहरामी की, वैसी ही सजा पाई। मेरे हाथ के कोड़े वह जन्म भर न भूलेगी!
किशोरी--मगर इतना होने पर भी उसने मेरे पिता के जी का ठीक-ठीक भेद न बताया।
कमला--बेशक वह बहुत ही जिद्दी निकली, मगर तुमने भी यह बड़ी लायकी दिखाई कि अन्त में उसे छोड़ देने का हुक्म दे दिया। अब भी वह जहाँ जायगी, दुःख ही भोगेगी।
किशोरी--इसके अतिरिक्त उस जमाने में धनपत के भाई ने क्या मुझे कम तकलीफ दी थी जब मैं नागर के यहां कैद थी! उस कम्बख्त की तो सूरत देखने से मेरा खून खुश्क हो जाता था!
लाड़िली-वही जिसे भूतनाथ ने जहन्नुम में पहुंचा दिया? मगर नागर इस मामले को बिल्कुल ही छिपा गई, मायारानी से उसने कुछ भी न कहा और इसी में उसका भला भी था।
किशोरी--(लाड़िली से) बहिन, तुम तो बड़ी नेक हो और तुम्हारा ध्यान भी धर्म-विषयक कामों में विशेष रहता है, मगर उन दिनों तुम्हें क्या हो गया था कि मायारानी के साथ बुरे कामों में अपना दिन बिताती थीं और हम लोगों की जान लेने के लिए तैयार रहती थीं?
लाड़िली--(लज्जा और उदासी के साथ) फिर तुमने वही चर्चा छेड़ी! मैं कई दफे हाथ जोड़कर तुमसे कह चुकी हूँ कि अब उन बातों की याद दिलाकर मुझे शर्मिन्दा
करो, दुःख न दो, मेरे मुंह में बार-बार स्याही न लगाओ। उन दिनों मैं पराधीन थी मेरा कोई सहायक न था, मेरे लिए कोई और ठिकाना न था, और उस दुष्टा का साथ छोड़कर मैं अपने को कहीं छिपा भी नहीं सकती थी और डरती थी कि वहां से निकल भागने पर कहीं मेरी इज्जत पर न आ बने! मगर बहिन, तुम जान-बूझकर बार-बार उन बातों की याद दिलाकर मुझे सताती हो, कहो बैलूं या यहां से उठ जाऊँ?
किशोरी--अच्छा-अच्छा जाने दो, माफ करो, मुझसे भूल गई, मगर मेरा मतलब वह न था जो तुमने समझा है, मैं दो-चार बातें नानक के विषय में पूछना चाहती थी जिसका पता अभी तक नहीं लगा और जो भेद की तरह हम लोगों
लाड़िली--(बात काटकर) वे बातें भी तो मेरे लिए वैसी ही दुःखदायी हैं।
किशोरी--नहीं-नहीं, मैं यह न पूडूंगी कि तुमने नानक के साथ रामभोली बनकर क्या-क्या किया, बल्कि यह पूडूंगी कि उस टोन के डिब्बे में क्या था जो नानक ने चुरा लाकर तुम्हें बजरे में दिया था? कुएं में से हाथ कैसे निकला था? नहर के किनारे वाले बंगले में पहुंचकर वह क्योंकर फंसा लिया गया? उस बंगले में वह तस्वीरें कैसी थों? असली रामभोली कहाँ गई और क्या हुई? रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर तुम्हारी तस्वीर किसने लटकाई और तुम्हें वहाँ का भेद कैसे मालूम हुआ था इत्यादि बातें मैं कई दफे कई तरह से सुन चुकी हूँ मगर उनका असल भेअभी तक कुछ मालूम न हुआ।
लाड़िली--हां, इन सब बातों का जवाब देने के लिए मैं तैयार हूँ। तुम जानती हो और अच्छी तरह सुन और समझ भी चुकी हो कि वह तिलिस्मी बाग तरह-तरह के अजायबातों से भरा हुआ है, विशेष नहीं तो भी वहाँ का बहुत-कुछ हाल मायारानी और दारोगा को मालूम था। वहां या उसकी सरहद में ले जाकर किसी को हराने, धमकाने या तकलीफ देने के लिए कोई ताज्जुब का तमाशा दिखाना कौन बड़ी बात थी!
किशोरी--हां, सो तो ठीक ही है।
लाड़िली--और फिर नानक जान-बूझकर काम निकालने के लिए ही तो गिरफ्तार किया गया था। इसके अतिरिक्त तुम पहले यह भी सुन चुकी हो कि दारोगा के बँगले या अजायबघर से खास बाग तक नीचे-नीचे रास्ता बना हुआ है, ऐसी अवस्था में नानक के साथ वैसा बर्ताव करना कौन-सी बड़ी बात थी!
किशोरी--बेशक ऐसा ही है, अच्छा उस डिब्बे वगैरह का भेद तो बताओ!
लाड़िली--उस गठरी में जो कलमदान था, वह तो हमारे विशेष काम का न था मगर उस डिब्बे में वही इन्दिरा वाला कलमदान था जिसके लिए दारोगा साहब बेताब हो रहे थे और चाहते थे कि वह किसी तरह पुनः उनके कब्जे में आ जाय। असल में उसी कलमदान के लिए मुझे रामभोली बनना पड़ा था। दारोगा ने असली रामभोली को तो गिरफ्तार करवा के इस तरह मरवा डाला कि किसी को कानों-कान खबर भी न हुई और मुझे रामभोली बनकर यह काम निकालने की आज्ञा दी। लाचार मैं रामभोली बनकर नानक से मिली और उसे अपने वश में करने के बाद इन्द्रदेव जी के मकान में से वह कलमदान तथा उसके साथ और भी कई तरह के कागज नानक की मार्फत चुरा
मंगवाये। मुझे तो उस कलमदान की सूरत देखने से भी डर मालूम होता था क्योंकि म जानती थी कि वह कलमदान हम लोगों के खून का प्यासा और दारोगा के बड़े-बड़े भेदों से भरा हुआ है। इसके अतिरिक्त उस पर इन्दिरा की बचपन की तस्वीर भी बनी हुई थी और सुन्दर अक्षरों में इन्दिरा का नाम लिखा हुआ था. जिसके विषय में मैं उन दिनों जानती थी कि वे माँ-बेटी बड़ी बेदर्दी के साथ मारी गई। यही सबब था कि उस कलमदान की सूरत देखते ही मुझे तरह-तरह की बातें याद आ गईं, मेरा कलेजा दहल गया और मैं डर के मारे काँपने लगी। खैर, जब मैं नानक को लिए हुए जमानिया की सरहद में पहुंची तो उसे धनपत के हवाले करके खास बाग में चली गई, अपना दुपट्टा नहर में फेंकती गई। दूसरी राह से उस तिलिस्मी कुएं के नीचे पहुँच कर पानी का प्याला और बनावटी हाथ निकालने के बाद मायारानी से जा मिली और फिर बचा हुआ काम धनपत और दारोगा ने पूरा किया। दारोगा वाले बंगले में जो तस्वीर रक्खी हुई थी वह केवल नानक को धोखा देने के लिए थी, उसका और कोई मतलब न था, और रोहतासगढ़ के तहखाने में जो मेरी तस्वीर आप लोगों ने देखी थी, वह वास्तव में दिग्विजयसिंह की बुआ ने मेरे सुभीते के लिए लटकाई थी और तहखाने की बहुत-सी बातें समझाकर बता दिया था कि 'जहाँ तू अपनी तस्वीर देखना समझ लेना कि उसके फला तरफ फलां बात है' इत्यादि। बस, वह तस्वीर इतने ही काम के लिए लटकाई गई, थी। वह बुढ़िया बड़ी नेक थी, और उस तहखाने का हाल बनिस्बत दिग्विजयसिंह के बहुत ज्यादा जानती थी, मैं पहले भी महाराज के सामने बयान कर चुकी हूं कि उसने मेरी मदद की थी। वह कई दफे मेरे डेरे पर आई थी और तरह-तरह की बातें समझा गई थी। मगर न तो दिग्विजयसिंह उसकी कदर करता था और न वही दिग्विजयसिंह को चाहती थी। इसके अतिरिक्त यह भी कह देना आवश्यक है कि मैं तो उस बुढ़िया की मदद से तहखाने के अन्दर चली गई थी मगर कुन्दन अर्थात् धनपत ने वहां जो कुछ किया वह मायारानी के दारोगा की बदौलत था। घर लौटने पर मुझे मालूम हुआ कि दारोगा वहाँ कई दफे छिपकर गया और कुन्दन से मिला था मगर उसे मेरे बारे में कुछ खबर न थी, अगर खबर होती तो मेरे और कुन्दन के बीच जुदाई न रहती। मगर मुझे इस बात का ताज्जुब जरूर है कि वापस घर पहुंचने पर भी धनपत ने वहां की बहुतसी बातें मुझसे छिपा रक्खीं।
किशोरी--अच्छा, यह तो बताओ कि रोहतासगढ़ में जो तस्वीर तुमने कुन्दन को दिखाने के लिए मुझे दी थी, वह तुम्हें कहाँ से मिली थी और तुम्हें तथा कुन्दन को उसका असली हाल क्योंकर मालूम हुआ था?
लाड़िली--उन दिनों मैं यह जानने के लिए बेताब हो रही थी कि कुन्दन असल में कौन हैं। मुझे इस बात का भी शक हुआ था कि वह राजा साहब (वीरेन्द्रसिंह) की कोई ऐयारा होगी और यही शक मिटाने के लिए मैंने वह तस्वीर खुद बनाकर उसे दिखाने के लिए तुम्हें दी थी। असल में उस तस्वीर का भेद हम लोगों को मनोरमा की
जुबानी मालूम हुआ था और मनोरमा ने इन्दिरा से उस समय सुना था जब मनोरमा को माँ समझ के वह उसके फेर में पेड़ गई थी।
किशोरी–-ठीक है मगर इसमें भी कोई शक नहीं कि इन सब बखेड़ों की जड़ वही कम्बख्त दारोगा है। यदि जमानिया के राज्य में दारोगा न होता तो इन सब बाटों में से एक भी न सुनाई देती और न हम लोगों की दुःखमय कहानी का कोई अंश लोगों के कहने सुनने के लिए पैदा होता। (कमलिनी से) मगर बहिन, यह तो बताओ कि इस हरामी के पिल्ले (दारोगा) का कोई वारिस या रिश्तेदार भी दुनिया में है या नहीं?
कमलिनी--सिवाय एक के और कोई नहीं! दुनिया का कायदा है कि जब आदमी भलाई या बुराई कुछ सीखता है तो पहले अपने घर ही से उसे आरम्भ करता है। मां-बाप के अनुचित लाड़-प्यार और उनकी असावधानी से बुरी राह पर चलने वाले लड़के घर ही में श्रीगणेश करते हैं और तब कुछ दिन के बाद वे दुनिया में मशहूर होने योग्य होते हैं। यही बात इस हरामखोर की भी थी, इसने पहले अपने नाते-रिश्तेदार ही पर सफाई का हाथ फेरा और उन्हें जहन्नुम पहुँचाकर समय के पहले घर का मालिक बन बैठा। साधु का भेष धरना इसने लड़कपन ही से सीखा है और विशेष करके इसके इसी भेष की बदौलत लोग धोखे में भी पड़े। हमारे राजा गोपालसिंह ने भी (मुस्कुराती हुई) इसे वशिष्ठ मुनि ही समझकर अपने यहाँ रक्खा था। हाँ, इसका एक चचेरा भाई जरूर बच गया था जो इसके हत्थे नहीं चढ़ा था, क्योंकि वह खुद भी परले सिरे का बदमाश था और इसकी करतूतों को खूब समझता था जिससे लाचार होकर इसे उसकी खुशामद करनी ही पड़ी और उसे अपना साथी बनाना ही पड़ा।
किशोरी--क्या वह मर गया? उसका क्या नाम था?
कमलिनी--नहीं वह मरा नहीं, मगर मरने के ही बराबर है, क्योंकि वह हमारे यहां कैद है। उसने अपना नाम शिखण्डी रख लिया था। तुम जानती ही हो कि जब मैं जमानिया के खास बाग के तहखाने और सुरंग की राह से दोनों कुमारों तथा बाकी कैदियों को लेकर बाहर निकल रही थी तो हाथी वाले दरवाजे पर उसने इनके (इन्द्रजीतसिंह) के ऊपर वार किया था।
किशोरी-–हाँ-हाँ, तो क्या वह वही कम्बख्त था?
कमलिनी–-हाँ वही था। उसे मैं अपना पक्षपाती समझती थी मगर बेईमान ने मुझे धोखा दिया। ईश्वर की कृपा थी कि पहले ही वार में वह उसी जगह गिरफ्तार हो गया, नहीं तो शायद मुझे धोखे में पड़कर बहुत तकलीफें उठानी पड़ती और
कमलिनी ने इतना कहा ही था कि उसका ध्यान सामने के जंगल की तरफ जा पड़ा। उसने देखा कि कुंअर आनन्दसिंह एक सब्ज घोड़े पर सवार सामने की तरफ से आ रहे हैं, साथ में केवल तारासिंह एक छोटे टटू पर सवार बातें करते आ रहे हैं, और दूसरा कोई आदमी नहीं है। साथ ही इसके कमलिनी को एक और अद्भुत दृश्य दिखाई दिया जिससे वह यकायक चौंक पड़ी और इसलिए उसका तथा और सभी का
ध्यान भी उसी तरफ जा पड़ा।
उसने देखा कि आनन्दसिंह और तारासिंह जंगल में से निकलकर कुछ ही दूर मैदान में आये थे कि यकायक एक बार पुनः पीछे की तरफ घूमे और गौर के साथ कुछ देखने लगे। कुछ ही देर बाद और भी दस-बारह नकाबपोश आदमी हाथ में तीर-कमान लिए दिखाई पड़े जो जंगल से बाहर निकलते ही इन दोनों पर फुर्ती के साथ तीर चलाने लगे। ये दोनों भी म्यान से तलवार निकालकर उन लोगों की तरफ झपटे और देखते ही देखते सब लड़ते-भिड़ते पुनः जंगल में घुसकर देखने वालों की नजरों से गायब हो गए।कमलिनी, किशोरी और कामिनी वगैरह इस घटना को देखकर घबरा गयीं, सभी की इच्छानुसार कमला दौड़ी हुई गई और एक लौंडी को इस मामले की खबर करने के लिए नीचे कुंअर इन्द्रजीतसिंह के पास भेजा।
८
नानक इस बात को सोच रहा था कि मैं पहले किस पर वार करूं? अगर पहले शान्ता पर वार करूं तो आहट पाकर भूतनाथ जाग जायगा और मुझे गिरफ्तार कर लेगा क्योंकि मैं अकेला किसी तरह उसका मुकाबला नहीं कर सकता अतएव पहले भूतनाथ ही का काम तमाम करना चाहिए। अगर इसकी आहट पाकर शान्ता जाग भी जायगी तो कोई चिन्ता नहीं, मैं उसे साँस लेने की भी मोहलत न दूंगा, वह औरत की जात मेरे मुकाबले में क्या कर सकती है। मगर ऐसा करने के लिए यह जानने की जरूरत है कि इन दोनों में शान्ता कौन है और भूतनाथ कौन।
थोड़ी ही देर के अन्दर ऐसी बहुत-सी बातें नानक के दिमाग में दौड़ गई और उन दोनों में भूतनाथ कौन है इसका पता न लगा सकने के कारण लाचार होकर उसने यह निश्चय किया कि इन दोनों ही को बेहोश करके यहाँ से घर ले चलना चाहिए। ऐसा करने से मेरी मां बहुत ही प्रसन्न होगी।
नानक ने अपने बटुए में से बहुत ही तेज बेहोशी की दवा निकाली और उन दोनों के मुंह पर चादर के ऊपर ही छिड़ककर उनके बेहोश होने का इन्तजार करने लगा।
थोड़ी ही देर में उन दोनों ने हाथ-पैर हिलाये जिससे नानक समझ गया कि अब इन पर बेहोशी का असर हो गया, अतः उसने दोनों के ऊपर से चादर हटा दी और तभी देखा कि इन दोनों में भूतनाथ नहीं है बल्कि ये दोनों औरतें ही हैं जिनमें एक भूतनाथ की स्त्री शान्ता है। उस दूसरी औरत को नानक पहचानता न था।
नानक ने फिर एक दफे बेहोशी की दवा सुंघा कर शान्ता को अच्छी तरह बेहोश किया और चारपाई पर से उठाकर बहुत हिफाजत और होशियारी के साथ खेमे के बाहर निकाल लाया जहाँ उसने अपने एक साथी को मौजूद पाया। दो ने मिलकर उसकी गठरी बांधी और फुर्ती से लश्कर के बाहर निकाल ले गये।
शान्ता को पा जाने से नानक बहुत ही खुश था और सोचता जाता था कि इसे पाकर मां बहुत ही प्रसन्न होगी और हद से ज्यादा मेरी तारीफ करेगी, मैं इसे सीधे अपने घर ले जाऊँगा और जब दूसरी दफे लौटूंगा तो भूतनाथ पर कब्जा करूँगा। इसी तरह धीरे-धीरे अपने सब दुश्मनों को जहन्नुम भेज दूंगा।
कोस-भर निकल जाने के बाद जब नानक एक संकेत पर पहुँचा तो उसके और साथियों से भी मुलाकात हुई जो कसे-कसाये कई घोड़ों के साथ उसका इन्तजार कर रहे थे।
एक घोड़े पर सवार होने के बाद नानक ने शान्ता को अपने आगे रख लिया, उसके साथी लोग भी घोड़ों पर सवार हुए, और सभी ने पूरब का रास्ता लिया।
दूसरे दिन संध्या के समय नानक अपने घर पहुंचा। रास्ते में उसने और उसके साथियों ने कई दफे भोजन किया मगर शान्ता की कुछ खबर न ली, बल्कि जब इस बात का खयाल हुआ कि अब उसकी बेहोशी उतारना चाहती है तब पुनः दवा सुंघाकर उसकी बेहोशी मजबूत कर दी गई।
नानक को देखकर उसकी माँ बहुत प्रसन्न हुई और जब उसे यह मालूम हुआ कि उसका सपूत शान्ता को गिरफ्तार कर लाया है तब तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना ही न रहा। उसने नानक की बहुत ही आवभगत की और बहुत तारीफ करने के बाद बोली, "इससे बदला लेने में अब क्षण-भर की भी देर न करनी चाहिए, इसे तुरन्त खम्भे के साथ बाँधकर होश में ले आओ और पहले जूतियों से खूब अच्छी तरह खबर लो, फिर जो कुछ होगा देखा जायगा। मगर इसके मुंह में खूब अच्छी तरह कपड़ा ढूंस दो जिससे कुछ बोल न सके और हम लोगों को गालियाँ न दे।"
नानक को भी यह बात पसन्द आई और उसने ऐसा ही किया। शान्ता के मुंह में कपड़ा लूंस दिया गया और वह दालान में एक खम्भे के साथ बांधकर होश में लाई गई। होश में आते ही अपने को ऐसी अवस्था में देखकर वह बहुत ही घबराई और जब उद्योग करने पर भी कुछ बोल न सकी तो आँखों से आंसू की धारा बहाने लगी।
नानक ने उसकी दशा पर कुछ भी ध्यान न दिया। अपनी मां की आज्ञा पाकर उसने शान्ता को जूते से मारना शुरू किया और यहाँ तक मारा कि अन्त में वह बेहोश होकर झुक गई। उस समय नानक की मां कागज का एक लपेटा हुआ पुर्जा नानक के आगे फेंककर यह कहती हुई घर के बाहर निकल गई कि इसे अच्छी तरह पढ़ ले, तब तक मैं लौटकर आती हूँ।"
उसकी कार्रवाई ने नानक को ताज्जुब में डाल दिया। उसने जमीन पर से पुर्जा वह उठा लिया और चिराग के सामने ले जाकर पढ़ा, यह लिखा हुआ था-
"भूतनाथ के साथ ऐयारी करना या उसका मुकाबला करना नानक ऐसे नौसिखे लौंडों का काम नहीं है। तू समझता होगा कि मैंने शान्ता को गिरफ्तार कर लिया, मगर खूब समझ रख कि वह कभी तेरे पंजे में नहीं आ सकती। जिस औरत को तू जूतियों से मार रहा है, वह शान्ता नहीं। पानी से इसका चेहरा धो डाल और भूतनाथ की कारीगरी का तमाशा देख! अब अगर अपनी जान तुझे प्यारी हो तो खबरदार! भूतनाथ का पीछा कभी न करना।"
पुर्जा पढ़ने ही नानक के होश उड़ गये। झटपट पानी का लोटा उठा लिया और मुंह में लूंसा हुआ कपड़ा निकालकर शान्ता का चेहरा धोने लगा, तब तक वह भी होश में आ गई। चेहरा साफ होने पर नानक ने देखा कि यह तो उसकी असली मां 'रामदेई' है। उसने होश में आते ही नानक से कहा, "क्यों बेटा, तुमने मेरे ही साथ ऐसा सलूक किया!"
नानक के ताज्जुब की कोई हद न रही। वह घबराहट के साथ अपनी माँ का मुंह देखने लगा और ऐसा परेशान हुआ कि आधी घड़ी तक उसमें कुछ बोलने की शक्ति न रही। इस बीच में रामदेई ने उसे तरह-तरह की बातें सुनाई जिन्हें वह सिर नीचा कि हुए चुपचाप सुनता रहा। जब उसकी तबीयत कुछ ठिकाने हुई तब उसने सोचा कि पहले उस रामदेई को पकड़ना चाहिए जो मेरे सामने चिट्ठी फेंककर मकान के बाहर निकल गई है, परन्तु यह उसकी सामर्थ्य के बाहर था, क्योंकि उसे घर से बाहर गए हुए देर हो चुकी थी, अतः उसने सोचा कि अब वह किसी तरह नहीं पकड़ी जा सकती।
नानक ने अपनी माँ के हाथ-पैर खोल डाले और कहा, "मेरी समझ में कुछ नहीं आता कि यह क्या हुआ, तुम वहाँ कैसे जा पहुँची, और तुम्हारी शक्ल में यहां रहने वाली कोन थी या क्योंकर आई!"
रामदेई--मैं इसका जवाब कुछ भी नहीं दे सकती और न मुझे कुछ मालूम ही है। मैं तुम्हारे चले जाने के बाद इसी घर में थी, इसी घर में बेहोश हुई और होश आने पर अपने को इसी घर में देखती हूँ, अब तुम्हीं बयान करो कि क्या हुआ और तुमने मेरे साथ ऐसा सलूक क्यों किया?
नानक ने ताज्जुब के साथ अपना किस्सा पूरा-पूरा बयान किया और अन्त में कहा, "अब तुम ही बताओ कि मैंने इसमें क्या भूल की?"
९
दिन का समय है और दोपहर ढल चुकी है। महाराज सुरेन्द्रसिंह अभी-अभी भोजन करके आये हैं और अपने कमरे में पलंग पर लेटे कर पान चबाते हुए अपने दोस्तों तथा लड़कों से हँसी-खुशी की बातें कर रहे हैं जोकि महाराज से घण्टे-भर पहले ही भोजन इत्यादि से छुट्टी पा चुके हैं।
महाराज के अतिरिक्त इस समय इस कमरे में राजा वीरेन्द्रसिंह, कुंअर इन्द्रजीत-सिंह, आनन्दसिंह, राजा गोपालसिंह, जीतसिंह, देवीसिंह, पन्नालाल, रामनारायण,पण्डित बद्रीनाथ, चुन्नीलाल, जगन्नाथ ज्योतिषी, भैरोंसिंह, इन्द्रदेव और गोपालसिंह के दोस्त भरतसिंह भी बैठे हुए हैं।
वीरेन्द्रसिंह--इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो तिलिस्म मैंने तोड़ा था, वह इस तिलिस्म के सामने रुपये में एक पैसा भी नहीं है। साथ ही इसके जमानिया राज्य में जैसे-जैसे महापुरुष (दारोगा की तरह)रह चुके हैं तथा वहां जैसी-जैसी घटनाएं हो गई हैं उनकी नजीर भी कभी सुनने में न आयेगी।
गोपालसिंह--बखेड़ों का सबब भी उसी तिलिस्म को समझना चाहिए, उसी का आनन्द लूटने के लिए लोगों ने ऐसे बखेड़े मचाए और उसी की बदौलत लोगों की ताकत और हैसियत भी बढ़ी।
जीतसिंह-—बेशक, यही बात है। जैसे-जैसे तिलिस्म के भेद खुलते गये तैसे-तैसे पाप और लोगों की बदकिस्मती का जमाना भी तरक्की करता गया।
सुरेन्द्रसिंह--हमें तो कम्बख्त दारोगा के कामों पर आश्चर्य होता है, न मालूम किस सुख के लिए उस कम्बख्त ने ऐसे-ऐसे कुकर्म किए!
भरतसिंह--(हाथ जोड़कर) मैं तो समझता हूँ कि दारोगा के कुकर्मों का हाल महाराज ने अभी बिल्कुल नहीं सुना। उसकी कुछ पूर्ति तब होगी, जब हम लोग अपना किस्सा बयान कर चुकेंगे।
सुरेन्द्रसिंह-–ठीक है, हमने भी आज आप ही का किस्सा सुनने की नीयत से आराम नहीं किया।
भरतसिंह--मैं अपनी दुर्दशा बयान करने के लिए तैयार हूँ।
जीतसिंह--अच्छा,तो अब आप शुरू करें।
भरतसिंह--जो आज्ञा।
इतना कहकर भरतसिंह ने इस तरह अपना हाल बयान करना शुरू किया।
भरतसिंह-मैं जमानिया का रहने वाला और एक जमींदार का लड़का हूँ। मुझे इस बात का सौभाग्य प्राप्त था कि राजा गोपालसिंह मुझे अपना मित्र समझते थे, यहाँ तक कि भरी मजलिस में भी मित्र कहकर मुझे सम्बोधन करते थे, और घर में भी किसी तरह का पर्दा नहीं रखते थे। यही सबब था कि वहाँ के कर्मचारी लोग तथा अच्छे-अच्छे रईस मुझसे डरते और मेरी इज्जत करते थे परन्तु दारोगा को यह बात पसन्द न थी।
केवल राजा गोपालसिंह ही नहीं इनके पिता भी मुझे अपने लड़के की तरह ही मानते और प्यार करते थे, विशेष करके इसलिए कि हम दोनों मित्रों की चाल-चलन में किसी तरह की बुराई दिखाई नहीं देती थी।
जमानिया में जो बेईमान और दुष्ट लोगों की एक गुप्त कमेटी थी उसका हाल आप लोग जान ही चुके हैं अतएव उसके विषय में विस्तार के साथ कुछ कहना वृथा ही है, हाँ, जरूरत पड़ने पर उसके विषय में इशारा मात्र कर देने से काम चल जायेगा।
रियासतों में मामूली तौर पर तरह-तरह की घटनाएं हुआ ही करती हैं, इसलिए राजा गोपालसिंह को गद्दी मिलने के पहले जो कुछ मुझ पर बीत चुकी है, उसे मामूली समझकर मैं छोड़ देता हूँ और उस समय से अपना हाल बयान करता हूँ जब इनकी शादी हो चुकी थी। इस शादी में जो कुछ चालबाजी हुई थी उसका हाल आप सुन ही चुके हैं।
जमानिया की वह गुप्त कमेटी यद्यपि भूतनाथ की बदौलत टूट चुकी थी, मगर उसकी जड़ नहीं कटी थी, क्योंकि कम्बख्त दारोगा हर तरह से साफ बच रहा था और कमेटी का कमजोर दफ्तर अभी भी उसके कब्जे में था।
गोपालसिंह की शादी हो जाने के बहुत दिन बाद एक दिन मेरे एक नौकर ने रात के समय जब वह मेरे पैरों में तेल लगा रहा था मुझसे कहा कि "राजा गोपालसिंह की शादी असली लक्ष्मीदेवी के साथ नहीं बल्कि किसी दूसरी ही औरत के साथ हुई है। यह काम दारोगा ने रिश्वत लेकर किया है और इस काम में सुविधा करने के लिए गोपालसिंहजी के पिता को भी उसी ने मारा है।"
सुनने के साथ ही मैं चौंक पड़ा, मेरे ताज्जुब का कोई ठिकाना न रहा, मैंने उससे तरह-तरह के सवाल किए जिनका जवाब उसने ऐसा तो न दिया जिससे मेरी दिलजमई हो जाती, मगर इस बात पर बहुत जोर दिया कि "जो कुछ मैं कह चुका हूँ, वह बहुत ठीक है।"
मेरे जी में तो यही आया कि इसी समय उठकर राजा गोपालसिंह के पास जाऊँ,और सब हाल कह दूं, परन्तु यह सोचकर कि किसी काम में जल्दी न करनी चाहिए मैं चुप रह गया और सोचने लगा कि यह कार्रवाई क्योंकर हुई और इसका ठीक-ठीक पता किस तरह लग सकता है?
रात-भर मुझे नींद न आई और इन्हीं बातों को सोचता रह गया। सवेरा होने पर स्नान-संध्या इत्यादि से छुट्टी पाकर मैं राजा साहब से मिलने के लिए गया, मालूम हुआ कि राजा साहब अभी महल से बाहर नहीं निकले हैं। मैं सीधे महल में चला गया। उस समय गोपालसिंहजी संध्या कर रहे थे और इनसे थोड़ी दूर पर सामने बैठी मायारानी फूलों का गजरा तैयार कर रही थी। उसने मुझे देखते ही कहा, "अहा, आज क्या बात है! मालूम होता है मेरे लिए आप कोई अनूठी चीज लाए हैं।"
इसके जवाब में मैं हँसकर चुप हो गया और इशारा पाकर गोपालसिंहजी के पास एक आसन पर बैठ गया। जब वे संध्योपासना से छुट्टी पा चुके तब मुझसे बातचीत होने लगी। मैं चाहता था कि मायारानी वहाँ से उठ जाये तब मैं अपना मतलब बयान करूँ,पर वह वहाँ से उठती न थी और चाहती थी कि मैं जो कुछ बयान करूँ, उसे वह भी सुन ले। यह सम्भव था कि मैं मामूली बातें करके मौका टाल देता और वहाँ से उठ खड़ा होता मगर वह हो न सका, क्योंकि उन दोनों ही को इस बात का विश्वास हो गया था कि मैं जरूर कोई अनूठी बात कहने के लिए आया हूँ। लाचार गोपालसिंहजी से इशारे में कह देना पड़ा कि 'मैं एकान्त में केवल आप ही से कुछ कहना चाहता हूँ।' जब गोपालसिंह ने किसी काम के बहाने से उसे अपने सामने से उठाया तब वह भी मेरा मतलब समझ गई और मुंह बनाकर उठ खड़ी हुई।
हम दोनों यही समझते थे कि मायारानी वहाँ से चली गई, मगर उस कम्बख्त ने हम दोनों की बातें सुन लीं, क्योंकि उसी दिन से मेरी कम्बख्ती का जमाना शुरू हो गया। मैं ठीक नहीं कह सकता कि किस ढंग से उसने हमारी बातें सुनीं। जिस जगह हम दोनों बैठे थे, उसके पास ही दीवार में एक छोटी-सी खिड़की पड़ती थी, शायद उसी जगह पिछवाड़े की तरफ खड़ी होकर उसने मेरी बातें सुन ली हों तो कोई ताज्जुब नहीं।
मैंने जो कुछ अपने नौकर से सुना था, सब तो नहीं कहा, केवल इतना कहा कि"आपके पिता को दारोगा ने ही मारा है और लक्ष्मीदेवी की इस शादी में भी उसने कुछ गड़बड़ किया है, गुप्त रीति पर इसकी जांच करनी चाहिए।" मगर अपने नौकर का नाम नहीं बताया, क्योंकि मैं उसे बहुत चाहता था और वैसा ही उसकी हिफाजत का भी खयाल रखता था। इसमें कोई शक नहीं कि मेरा वह नौकर बहुत ही होशियार और बुद्धिमान था, बल्कि इस योग्य था कि राज्य का कोई भारी काम उसके सुपुर्द किया जाता, परन्तु वह जाति का कहार था, इसलिए किसी बड़े मर्तवे पर न पहुँच सका।
गोपालसिंहजी ने मेरी बातें ध्यान देकर सुनीं, मगर इन्हें उन बातों का विश्वास न हुआ, क्योंकि ये मायारानी को पतिव्रताओं की नाक और दारोगा को सच्चाई तथा ईमानदारी का पुतला समझते थे। मैंने इन्हें अपनी तरफ से बहुत-कुछ समझाया और कहा कि “यह बात चाहे झूठ हो, मगर आप दारोगा से हरदम होशियार रहा कीजिए, और उसके कामों की जाँच की निगाह से देखा कीजिए, मगर अफसोस, इन्होंने मेरी बातों पर कुछ ध्यान न दिया और इसी से मेरे साथ ही अपने को भी बर्बाद कर लिया।
उसके बाद भी कई दिनों तक मैं इन्हें समझाता रहा और ये भी हाँ में हाँ मिलाते रहे जिससे यह विश्वास होता था कि कुछ उद्योग करने से ये समझ जायेंगे, मगर ऐसा कुछ न हुआ। एक दिन मेरे उसी नौकर ने जिसका नाम हरदीन था मुझसे फिर एकान्त में कहा कि “अब आप राजा साहब को समझाना-बुझाना छोड़ दीजिए, मुझे निश्चय हो गया कि उनकी बदकिस्मती के दिन आ गये हैं और वे आपकी बातों पर भी कुछ ध्यान न देंगे। उन्होंने वहुत बुरा किया कि आपकी बातें मायारानी और दारोगा पर प्रकट कर दीं। उनको समझाने के बदले अब आप अपनी जान बचाने की फिक्र कीजिए और अपने को हर वक्त आफत से घिरा हुआ समझिए। शुक्र है कि आपने सब बातें नहीं कह दीं, नहीं तो और भी गजब हो जाता।"
औरों को चाहे कैसा ही कुछ खयाल हो, मगर मैं अपने खिदमतगार हरदीन की बातों पर विश्वास करता था और उसे अपना खैरख्वाह समझता था। उसकी बातें सुनकर मुझे गोपालसिंह पर बे-हिसाब क्रोध चढ़ आया और उसी दिन से मैंने इन्हें समझानाबुझाना छोड़ दिया, मगर इनकी मुहब्बत ने मेरा साथ न छोड़ा।
मैंने हरदीन से पूछा कि “ये सब बातें तुझे क्योंकर मालूम हुईं? और होती हैं?" मगर उसने ठीक-ठीक न बताया, बहुत जिद करने पर कहा कि कुछ दिन और सब कीजिए मैं इसका भेद भी आपको बता दूंगा।
दूसरे दिन, जब सूरज अस्त होने में दो घण्टे की देर थी, मैं अकेला अपने नजरबाग में टहल रहा था और इस सोच में पड़ा हुआ था कि राजा गोपालसिंह का भ्रम मिटाने के लिए अब क्या बन्दोबस्त करना चाहिए। उसी समय रघुबरसिंह मेरे पास आया और साहब-सलामत के बाद इधर-उधर की बातें करने लगा। बात-ही-बात में उसने कहा कि "आज मैंने एक घोड़ा निहायत उम्दा खरीद लिया है, मगर अभी तक उसका दाम नहीं दिया है, आप उस पर सवारी करके देखिए, अगर आप भी पसन्द करें, तो मैं उसका दाम चुका हूँ। इस समय मैं उसे अपने साथ लेता आया हूँ। आप उस पर सवार हो लें और मैं अपने पुराने घोड़े पर सवार होकर आपके साथ चलता हूँ, चलिये दो-चार कोस का चक्कर लगा आयें...।" मुझे घोड़े का बहुत ही शौक था। रघुबरसिंह की बातें सुनकर मैं खुश हो गया और यह सोचकर कि अगर जानवर उम्दा होगा तो मैं खुद उसका दाम देकर अपने यहा रख लूंगा मैंने जवाब दिया “चलो देखें, कैसा घोड़ा है, घुबरसिंह ने कहा, चलिये, अगर आपको पसन्द आ जाये तो आप ही रख लीजियेगा।"
उन दिनों मैं रघुबरसिंह को भला आदमी अशरीफ और अपना दोस्त समझता था,मुझे इस बात की कुछ भी खबर न थी कि यह परले सिरे का वेईमान और शैतान का भाई है, उसी तरह दारोगा को भी मैं इतना बुरा नहीं समझता था और राजा गोपालसिंह की तरह मुझे भी विश्वास था कि जमानिया की उस गुप्त कमेटी से इन दोनों का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। मगर हरदीन ने मेरी आँखें खोल दी और साबित कर दिया कि जो कुछ हम लोग सोचे हुए थे वह हमारी भूल थी।
खैर, मैं रघुबरसिंह के साथ ही बाग के बाहर निकला और दरवाजे पर आया,कसे-कसाये दो घोड़े दिखे, जिनमें एक तो खास रघुबरसिंह का घोड़ा था और दूसरा एक नया और बहुत ही शानदार वही घोड़ा था, जिसकी रघुबरसिंह ने तारीफ की थी।
मैं उस घोड़े पर सवार होने वाला ही था कि हरदीन दौड़ा-दौड़ा बद-हवास मेरे पास आया और बोला, “घर में बहूजी (मेरी स्त्री) को न मालूम क्या हो गया कि गिरकर बेहोश हो गई हैं और उनके मुंह से खून निकल रहा है।जरा चलकर देख लीजिए।"
हरदीन की बात सुनकर मैं तरदुद में पड़ गया और उसे साथ लेकर घर के अन्दर गया, क्योंकि हरदीन बराबर जनाने में आया-जाया करता था और उसके लिए किसी तरह का पर्दा न था। जब घर की दूसरी ड्योढ़ी मैंने लांघी तब वहाँ एकान्त में हरदीन ने मुझे रोका और कहा, “जो कुछ मैंने आपको खबर दी वह बिल्कुल झूठ है,बहूजी बहुत अच्छी तरह हैं।"
मैं--तो तुमने ऐसा क्यों किया?
हरदीन--इसीलिए कि रघुवरसिंह के साथ जाने से आपको रोकू।
मैं--सो क्यों?
हरदीन--इसीलिए कि वह आपको धोखा देकर ले जा रहा है और आपकी जान लेना चाहता है। मैं उसके सामने आपको रोक नहीं सकता था, अगर रोकता तो उसे मेरी तरफदारी मालूम हो जाती और मैं जान से मारा जाता और फिर आपको इन दुष्टों की चालबाजियों से बचाने वाला कोई न रहता। यद्यपि मुझे अपनी जान आपसे बढ़कर प्यारी नहीं है, तथापि आपकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है और यह बात आपके आधीन है, यदि आप मेरा भेद खोल देंगे, तो फिर मेरा इस दुनिया में रहना मुश्किल है।
मैं--(ताज्जुब के साथ) तुम आज यह क्या कह रहे हो? रघुबरसिंह तो हमारा गहरा दोस्त है!
हरदीन--इस दोस्ती पर आप भरोसा न करें, और इस समय इस मौके को टाल जायें, रात को मैं सब बातें आपको अच्छी तरह समझा दूंगा, या यदि आपको मेरी बातों पर विश्वास न हो तो जाइए, मगर एक तमंचा कमर में छिपाकर लेते जाइए, और पश्चिम की तरफ कदापि न जाकर पूरब की तरफ को जाइए-साथ ही हर तरह से होशियार रहिए। इतनी होशियारी करने पर आपको मालूम हो जायेगा कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह सच है या झूठ।
हरदीन की बातों ने मुझे चक्कर में डाल दिया। कुछ सोचने के बाद मैंने कहा, 'शाबाश हरदीन, तुमने बेशक इस समय मेरी जान बचाई, मगर खैर, तुम चिन्ता न करो और मुझे इस दुष्ट के साथ जाने दो, अब मैं इसके पंजे में न फँसूंगा और जैसा तुमने कहा वैसा ही करूँगा।"
इसके बाद मैं चुपचाप अपने कमरे में चला गया और एक छोटा-सा दोनाली तमंचा भरकर अपनी कमर में छिपा लेने के बाद बाहर निकला। मुझे देखते ही रघुबरसिंह ने पूछा, "कहिए, क्या हाल है?" मैंने जवाब दिया, "अब तो होश में आ गई हैं, वैद्यजी को बुला लाने के लिए कह दिया है, तब तक हम लोग भी घूम आयेंगे।"
इतना कहकर मैं उस घोड़े पर सवार हो गया, रघुवरसिंह भी अपने घोड़े पर सवार हुआ और मेरे साथ चला। शहर के बाहर निकलने के बाद मैंने पूरब की तरफ घोड़े को घुमाया, उसी समय रघुबरसिंह ने टोका और कहा, "उधर नहीं पश्चिम की तरफ चलिए, इधर का मैदान बहुत अच्छा और सुहावना है।"
मैं––इधर पूरब की तरफ भी तो कुछ बुरा नहीं है, मैं इधर ही चलूँगा।
रघुबरसिंह––नहीं-नहीं, आप पश्चिम ही की तरफ चलिए, उधर एक काम और निकलेगा। दारोगा साहब भी इस घोड़े की चाल देखना चाहते थे, मैंने कह दिया था कि आप लोग अपने घोड़े पर सवार होकर जाइये और फलाँ जगह ठहरियेगा, हम लोग घूमते हुए उसी तरफ आयेंगे, वे जरूर वहाँ गये होंगे और हम लोगों का इन्तजार कर रहे होंगे।
मैं––ऐसा ही शौक था तो दारोगा साहब भी हमारे यहाँ आ जाते और हम लोगों के साथ चलते!
रघुबरसिंह––खैर, अब तो जो हो गया सो हो गया, अब उनका खयाल जरूर करना चाहिए।
मैं––मुझे भी पूरब की तरफ जाना बहुत जरूरी है, क्योंकि एक आदमी से मिलने का वादा कर चुका हूँ।
इसी तौर पर मेरे और उसके बीच बहुत देर तक हुज्जत होती रही। मैं पूरब की तरफ जाना चाहता था और वह पश्चिम की तरफ जाने के लिए जोर देता रहा, नतीजा यह निकला कि न पूरब ही गये, न पश्चिम ही गये, बल्कि लौटकर सीधे घर चले आये और यह बात रघुबरसिंह को बहुत ही बुरी मालूम हुई, उसने मुझसे मुँह फुला लिया और कुढ़ता हुआ अपने घर चला गया।
मेरा रहा-सहा शक भी जाता रहा और हरदीन की बातों पर मुझे पूरा-पूरा विश्वास हो गया, मगर मेरे दिल में इस बात की उलझन हद से ज्यादा पैदा हुई कि हरदीन को इन सब बातों की खबर क्योंकर लग जाती है। आखिर रात के समय जब एकान्त हुआ तब मुझसे और हरदीन से इस तरह की बातें होने लगी––
मैं––हरदीन, तुम्हारी बात ठीक निकली, उसने पश्चिम तरफ ले जाने के लिए बहुत जोर मारा, मगर मैंने उसकी एक न सुनी।
हरदीन––आपने यह बहुत अच्छा किया, नहीं तो इस समय बड़ा ही अन्धेर हो गया होता।
मैं––खैर, यह तो बताओ कि यकायक वह मेरी जान का दुश्मन क्यों बन बैठा? वह तो मेरी दोस्ती का दम भरता था!
हरदीन––इसका सबब वही लक्ष्मीदेवी वाला भेद है। मैं अपनी भूलपर अफसोस करता हूँ कि मुझसे चूक हो गई जो मैंने वह भेद आपसे खोल दिया। मैंने तो राजा गोपालसिंहजी का भला करना चाहा था मगर उन्होंने नादानी करके मामला ही बिगाड़ दिया। उन्होंने जो कुछ आपसे सुना था लक्ष्मीदेवी से कहकर दारोगा और रघुबर को आपका दुश्मन बना दिया, क्योंकि इन्हीं दोनों की बदौलत वह इस दर्जे को पहुँची, इन्हीं दोनों की बदौलत हमारे महाराज (गोपालसिंह के पिता) मारे गये और इन्हीं दोनों ने लक्ष्मीदेवी को ही नहीं बल्कि उसके घर भर को बर्दाद कर दिया।
मैं––इस समय तो तुम बड़े ही ताज्जुब की बातें सुना रहे हो!
हरदीन––मगर इन बातों को आप अपने ही दिल में रखकर जमाने की चाल के साथ काम करें नहीं तो आपको पछताना पड़ेगा, यद्यपि मैं यह कदापि न कहूँगा कि आप राजा गोपालसिंह का ध्यान छोड़ दें और उन्हें डूबने दें क्योंकि वह आपके दोस्त हैं।
मैं––जैसा तुम चाहते हो, मैं वैसा ही करूँगा। अच्छा, पहले यह बताओ कि लक्ष्मीदेवी और बलभद्रसिंह पर क्या बीती?
हरदीन––उन दोनों को दारोगा ने अपने पंजे में फँसा कर कहीं कैद कर दिया है इतना तो मुझे मालूम है मगर इसके बाद का हाल मैं कुछ भी नहीं जानता, न मालूम वे मार डाले गये या अभी तक कहीं कैद हैं। हाँ, उस गदाधरसिंह को इसका हाल शायद मालूम होगा जो रणधीरसिंहजी का ऐयार है और जिसने नानक की माँ को धोखा देने के लिए कुछ दिन तक अपना नाम रघुबरसिंह रख लिया था तथा जिसकी बदौलत यहाँ की गुप्त कुमेटी का भण्डा फूटा है। उसने इस रघुबीरसिंह और दारोगा को खूब ही छकाया है। लक्ष्मीदेवी की जगह मुन्दर की शादी करा देने की बाबत इनके और हेलासिंह के बीच में जो पत्र-व्यवहार हुआ, उसकी नकल भी गदाधरसिंह (रणधीरसिंह के ऐयार) के पास मौजूद है जो कि उसने समय पर काम देने के लिए असल चिट्ठियों से अपने हाथ से नकल की थी। अफसोस, उसने रुपये की लालच में पड़ कर रघुबरसिंह और दारोगा को छोड़ दिया और इस बात को छिपा रक्खा कि यही दोनों उस गुप्त कमेटी के मुखिया हैं। इस पाप का फल गदाधरसिंह को जरूर भोगना पड़ेगा, ताज्जुउ नहीं कि एक दिन उन चिट्ठियों की नकल से उसी को दुःख उठाना पड़े और वे चिट्ठियाँ उसी के लिए काल बन जायें।
इस समय मुझे हरदीन की वे बातें अच्छी तरह याद पड़ रही हैं। मैं देखता हूँ कि जो कुछ उसने कहा था सच उतरा। उन चिट्ठियों की नकल ने खुद भूतनाथ का गला दबा दिया जो उन दिनों गदाधरसिंह के नाम से मशहूर हो रहा था! भूतनाथ का हाल मुझे अच्छी तरह मालूम है और इधर जो कुछ हो चुका है वह सब भी मैं सुन चुका हूँ मगर इतना मैं जरूर कहूँगा कि भूतनाथ के मुकदमे में तेजसिंहजी ने बहुत बड़ी गलती की गलती तो सभी ने की मगर तेजसिंहजी को ऐयारों का सरताज मानकर मैं सबके पहले इन्हीं का नाम लूँगा। इन्होंने जब लक्ष्मीदेवी कमलिनी और लाड़िली इत्यादि के सामने वह कागज का मुट्ठा खोला था और चिट्ठियों को पढ़कर भूतनाथ पर इलजाम लगाया था कि "बेशक ये चिट्ठियाँ भूतनाथ के हाथ की लिखी हुई हैं।" तब इतना क्यों नहीं सोचा कि भूतनाथ की चिट्ठियों के जवाब में हेलासिंह ने जो चिट्ठियाँ भेजी हैं, वे भी तो भूतनाथ ही के हाथों की लिखी हुई मालूम पड़ती हैं, तो क्या अपनी चिट्ठियों का जवाब भी भूतनाथ अपने ही हाथ से लिखा करता था?"
यहाँ तक कहकर भरतसिंह चुप हो रहे और तेजसिंह की तरफ देखने लगे। तेजसिंह ने कहा, "आपका कहना बहुत ही ठीक है, बेशक उस समय मुझसे यह बड़ी भूल हो गई। उनमें की एक ही चिट्ठी पढ़कर क्रोध के मारे हम लोग ऐसे पागल हो गए कि इस बात पर कुछ भी ध्यान न दे सके। बहुत दिनों के बाद जब देवीसिंह ने यह बात सुझाई, तब हम लोगों को बहुत अफसोस ही हुआ और तब से हम लोगों का खयाल भी बदल गया।"
भरतसिंह ने कहा, "तेजसिंहजी, इस दुनिया में बड़े-बड़े चालाकों और होशियारों से यहाँ तक कि स्वयं विधाता ही से भूल हो गई है तो फिर हम लोगों की क्या बात है? मगर मजा तो यह कि बड़ों की भूल कहने-सुनने में नहीं आती, इसीलिए आपकी भूल पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। किसी कवि ने ठीक ही कहा है––
को कहि सके बड़ेन सों लखे बड़े की भूल। दीन्हें दई गुलाब के, इन डारन ये फूल॥
अतः अब मैं पुनः अपनी कहानी शुरू करता हूँ।
इसके बाद भरतसिंह ने फिर इस तरह कहना शुरू किया––
भरतसिंह––मैंने हरदीन से कहा कि अगर यह बात है तो गदाधरसिंह से मुलाकात करनी चाहिए, मगर वह मुझसे अपने भेद की बातें क्यों कहने लगा? इसके अतिरिक्त वह यहाँ रहता भी नहीं है कभी-कभी आ जाता है। साथ ही इसके यह जानना भी कठिन है कि वह कब आया और कब चला गया।
हरदीन––ठीक है, मगर मैं आपसे उनकी मुलाकात करा सकता हूँ। आशा है कि वे मेरी बात मान लेंगे और आपको असल हाल भी बता देंगे। कल वह जमानिया में आने वाले हैं।
मैं––मगर मुझसे और उससे तो किसी तरह की मुलाकात नहीं है। वह मुझ पर क्यों भरोसा करेगा?
हरदीन––कोई चिन्ता नहीं, मैं आपसे उनकी मुलाकात करा दूँगा।
हरदीन की इस बात ने मुझे और भी ताज्जुब में डाल दिया। मैं सोचने लगा कि इसमें और गदाधरसिंह (भूतनाथ) में ऐसी गहरी जान-पहचान क्यों कर हो गई और वह इस पर क्यों भरोसा करता है?
भरतसिंह ने अपना किस्सा यहाँ तक बयान किया था कि उनके काम में विघ्न पड़ गया अर्थात् उसी समय एक चोबदार ने आकर इत्तिला दी कि 'भूतनाथ हाजिर हैं।'इस खबर को सुनते ही सब कोई खुश हो गये और भरतसिंह ने भी कहा, "अब मेरे किस्से में विशेष आनन्द आवेगा।"
महाराज ने भूतनाथ को हाजिर करने की आज्ञा दी और भूतनाथ ने कमरे के अन्दर पहुँचकर सभी को सलाम किया।
तेजसिंह--(भूतनाथ से) कहो भूतनाथ, कुशल तो है? आज कई तो दिनों पर तुम्हारी सूरत दिखाई दी!
भूतनाथ--जी हां ईश्वर की कृपा से सब कुशल है, जितने दिन की छुट्टी लेकर गया था, उसके पहले ही हाजिर हो गया हूँ
तेजसिंह–-सो तो ठीक है मगर अपने सपूत लडके का तो कुछ हाल कहो, कैसी निपटी?
भूतनाथ-निपटी क्या आपकी आज्ञा पालन की, नानक को मैंने किसी तरह की तकलीफ नहीं दी मगर सजा बहुत ही मजेदार और चटपटी दे दी गई!
देवीसिंह--(हंसते हुए) सो क्या?
भूतनाथ--मैंने उससे एक ऐसी दिल्लगी की कि वह भी खुश हो गया होगा। अगर बिल्कुल जानवर न होगा तो अब हम लोगों की तरफ कभी मुंह न करेगा बात बिल्कुल मामूली थी, जब वह यहाँ आकर मेरी फिक्र में डूबा तो घर की हिफाजत का बन्दोबस्त करके बाद कुछ शागिर्दो को साथ लेकर मैं उसके मकान पर पहुंच उसकी माँ को उड़ा लाया मगर उसकी जगह अपने एक शागिर्द को रामदेई बनाकर छोड़ आया।यहाँ उसे शान्ता बनाकर अपने खेमे में जो इसी काम के लिए खड़ा किया गया था, एक लौंडी के साथ सुला दिया और खुद तमाशा देखने लगा। आखिर नानक उसी को शान्ता समझ के उठा ले गया और खुशी-खुशी अपनी नकली शान्ता को खम्भे के साथ बांधकर जूते से पूजा करने लगा। जब खूब दुर्गति कर चुका तब नकली रामदेई उसके सामने एक पुर्जा फेंक करके बाहर निकल गई। उस पुर्जे के पढ़ने से जब उसे मालूम हुआ कि मैंने जो कुछ किया है, अपनी ही मां के साथ किया तब वह बहुत ही शर्मिन्दा हुआ। उस समय उनके दोनों की जैसी कैफियत हुई मैं क्या बयान करूं, आप लोग खुद सोच समझ लीजिये।
भूतनाथ की बात सुनकर सब लोग हँस पड़े। महाराज ने उसे अपने पास बुलाकर बैठाया और कहा, "भूतनाथ, जरा एक दफे तुम इस किस्से को फिर बयान कर जाओ मगर जरा खुलासा तौर पर कहो।"
भूतनाथ ने इस हाल को विस्तार के साथ ऐसे ढंग पर दोहराया कि हंसते-हँसते सभी का दम फूलने लगा। इसके बाद जब भूतनाथ को मालूम हुआ कि भरतसिंह अपना किस्सा बयान कर रहे हैं तब उसने भरतसिंह की तरफ देखा और कहा, "मुझसे भी तो आप के किस्से से कुछ सम्बन्ध है!"
भरतसिंह--बेशक,और वही हाल मैं इस समय बयान कर रहा था!
भूतनार--(गोपालसिंह) से क्षमा कीजियेगा, मैंने आपसे उस समय, जब आप कृष्ण जिन्न बने हुए थे, यह झूठ बयान किया था कि 'राजा गोपालसिंह के छूटने के बाद मैंने उन कागजों का पता लगाया है जो इस समय मेरे ही साथ दुश्मनी कर रहे हैं। इत्यादि। असल में वे कागज मेरे पास उसी समय भी मौजूद थे, जब जमनिया में मुझसे और भरतसिंह से मुलाकात हुई थी। आप यह हाल इनकी जुबानी सुन चुके होंगे।
भरतसिंह-हां भूतनाथ, इस समय मैं वही हाल बयान कर रहा हूँ, अभी कह नहीं चुका।
भूतनाथ-खैर, तो अभी श्रीगणेश है। अच्छा, आप बयान कीजिए।
भरतसिंह ने फिर इस तरह बयान किया-
भरतसिंह-दूसरे दिन आधी रात के समय जब मैं गहरी नींद में सोया हुआ था हरदीन ने आकर मुझे जगाया और कहा, "लीजिये, मैं गदाधरसिंहजी को ले आया हूँ, उठिये और इनसे मुलाकात कीजिए, ये बड़े ही लायक और बात के धनी आदमी हैं!" मैं खुशी-खुशी उठ बैठा और बड़ी नर्मी के साथ भूतनाथ से मिला। इसके बाद मुझसे और भूतनाथ (गदाधर) से इस तरह बातचीत होने लगी-
भूतनाथ–साहब, आपका यह हरदीन बड़ा ही नेक और दिलावर है, ऐसा जीवट का आदमी दुनिया में कम ही दिखाई देगा। मैं तो इसे अपना परम हितैषी और मित्र समझता हूँ, इसने मेरे साथ जो कुछ भलाइयां की हैं उनका बदला मैं किसी तरह चुका ही नहीं सकता। मुझसे कभी की जान, पहचान नहीं, मुलाकात नहीं-ऐसी अवस्था में मैं पहले-पहल बिना मतलब के आपके घर कदापि न आता परन्तु, इनकी इच्छा के विरुद्ध मैं नहीं चल सका, इन्होंने यहां आने के लिए कहा और मैं बेधड़क चला आया। इनकी जुबानी मैं सुन भी चुका हूँ कि आज कल आप किस विकट फेर में पड़े हुए हैं और मुझसे मिलने की जरूरत आपको क्यों पड़ी अस्तु हरदीन की आज्ञानुसार मैं वह कागज का मुट्ठा भी दिखाने के लिए लेता आया हूँ जिससे आप को दारोगा और रघुबरसिंह की हरामजदगी और राजा गोपालसिंह की शादी का पूरा-पूरा हाल मालूम हो जायेगा, मगर खूब याद रखिये कि इस कागज को पढ़कर आप बेताब हो जायेंगे, आपको बेहिसाब गुस्सा चढ़ आवेगा और आपका दिल बेचैनी के साथ तमाम भण्डा फोड़ देने के लिए तैयार हो जायगा, मगर नहीं, आपको ये सब-कुछ बर्दाश्त करना ही पड़ेगा, दिल को सम्हालना और इन बातों को हर तरह से छिपाना पड़ेगा। मुझे हरदीन ने आपका बहुत ज्यादा विश्वास दिलाया है तभी मैं यहाँ आया हूँ, और यह अनूठी चीज भी दिखाने के लिए तैयार हूँ नहीं तो कदापि न आता।
मैं--आपनी बड़ी मेहरबानी की जो मुझ पर भरोसा किया और यहां तक चले आये, मेरी जुबान से आपका रत्ती भर भेद भी किसी को नहीं मालूम हो सकता, इसका आप विश्वास रखिये। यद्यपि मैं इस बात का निश्चय कर चुका हूँ कि गोपालसिंह के मामले में मैं अब कुछ भी दखल न दूंगा मगर इस बात का अफसोस जरूर है कि वह मेरे मित्र हैं और दुष्टों ने उन्हें बेतरह फंसा रक्खा है।
भूतनाथ--केवल आप ही को नहीं, इस बात का अफसोस मुझको भी है और मैं खुद गोपालसिंह को इस आफत से छुड़ाने का इरादा कर रहा हूँ। मगर लाचार हूँ कि बलभद्रसिंह और लक्ष्मीदेवी का कुछ भी पता नहीं लगता और जब तक उन दोनों का पता न लग जाय तब तक इस मामले को उठाना बड़ी भारी भूल है।
मैं-मगर यह तो आपको निश्चय है कि इन सब बातोंका कर्ता-धर्ता यह कम्बख्त दारोगा ही है?
भूतनाथ-भला इसमें भी अब कुछ शक है? लीजिए इस कागज के मुट्ठ का पढ़ जाइये तब आपको भी विश्वास हो जायगा।
इतना कहकर भूतनाथ ने कागज का एक मुट्ठा, निकाला और मेरे आगे रख दिया तथा मैंने भी उसे पढ़ना शुरू किया। मैं आपसे नहीं कह सकता कि उन कागजों को पढ़कर मेरे दिल की कैसी अवस्था हो गई और दारोगा तथा रघुबरसिंह पर मुझे कितना क्रोध चढ़ आया। आप लोग तो उसे पढ़-सुन चुके हैं अतएव इस बात को खुद समझ सकते हैं। मैंने भूतनाथ से कहा कि “यदि तुम मेरा साथ दो तो मैं आज ही दारोगा और रघुबरसिंह को इस दुनिया से उठा दूं।"
भूतनाथ -इससे फायदा ही क्या होगा? और काम ही कितना बड़ा है? मुझे खुद इस बात का खयाल है और मैं लक्ष्मीदेवी का पता लगाने के लिए दिल से कोशिश कर रहा हूँ, तथा आपका हरदीन भी उसका पता लगा रहा है। इस तरह समय के पहले छेड़छाड़ करने से खुद अपने को झूठा बनना पड़ेगा और लक्ष्मीदेवी भी जहां की तहाँ पड़ी सड़ेगी या मर जायगी।
मैं हाँ ठीक है, अच्छा यह तो बताइये कि आप हरदीन की इतनी इज्जत क्यों करते हैं?
भूतनाथ-इसलिए मेरी कि यह सब जानकारी इन्हीं की बदौलत है। इन्होंने ही मुझे उस कमेटी का पता बताया और उसका भेद समझाया और इन्हीं की मदद से मैंने उस कमेटी का सत्यानाश किया।
मैं-(हरदीन से) और तुम्हें उस कमेटी का भेद क्योंकर मालूम हुआ?
हरदीन-(हाथ जोड़कर) माफ कीजियेगा, मैं उस कमेटी का मेम्बर था और अभी तक उन लोगों के खयाल से उन सभी का पक्षपाती बना हुआ हूँ, मगर मैं ईमानदार मेम्बर था, इसलिए ऐसी बातें मुझे पसन्द न आई और मैं गुप्त रीति से उन लोगों का दुश्मन बन बैठा, मगर इतना करने पर भी अभी तक मेरी जान इसलिए बची हुई है कि आपके घर में मेरे सिवाय और कोई इन लोगों का साथी नहीं है।
मैं--तो क्या अभी तक तुम उन लोगों के साथी बने हुए हो और वे लोग अपने दिल का हाल तुमसे कहते हैं?
हरदीन--जी हां, तभी तो मैंने आपको रघुबरसिंह के पंजे से बचाया था, जब वह आपको घोड़े पर सवार कराके ले चला था!
मैं-अगर ऐसा हो तो तुम्हें यह भी मालूम हो गया होगा कि उस दिन घात न लगने के कारण रघुबरसिंह ने अब कौन-सी कार्रवाई सोची है।
हरदीन--जी हां, पहले तो उसने मुझसे पूछा था कि 'भरतसिंह ने ऐसा क्यों किया, क्या उसको मेरी नीयत का कुछ पता लग गया है?' जिसके जवाब में मैंने कहा कि 'नहीं, किसी दूसरे सबब से ऐसा हुआ होगा। इसके बाद दारोगा साहब ने मुझ पर हुक्म लगाया कि 'तू भरतसिंह को जिस तरह हो सके, जहर दे दे।' मैंने कहा, "बहुत अच्छा ऐसा ही करूंगा, मगर इस काम में पांच-सात दिन जरूर लग जायेंगे।"
इतना कहकर हरदीन ने भूतनाथ से पूछा कि 'कहिए अब क्या करना चाहिए?' इसके जवाब में भूतनाथ ने कहा कि 'अब पांच-सात दिन के बाद भरतसिंह को झूठ-मूठ हल्ला मचा देना चाहिए कि मुझको किसी ने जहर दे दिया, बल्कि कुछ बीमारी की सी नकल भी करके दिखा देनी चाहिए।'
इसके बाद थोड़ी देर तक और भी भूतनाथ से बातचीत होती रही और किसी दिन फिर मिलने का वादा करके भूतनाथ बिदा हुआ।
इस घटना के बाद कई दफे भूतनाथ से मुलाकात हुई बल्कि कहना चाहिए कि इनके और मेरे बीच में एक प्रकार की मित्रता सी हो गई और इन्होंने कई कामों में मेरी सहायता भी की।
जैसा कि आपस में सलाह हो चुकी थी, मुझे यह मशहूर करना पड़ा कि 'मुझे किसी ने जहर दे दिया। साथ ही इसके कुछ बीमारी की नकल भी की गई, जिसमें मेरे नौकर पर कम्बख्त दारोगा को शक न हो जायें, मगर इसका कोई अच्छा नतीजा न निकला अर्थात् दारोगा को मालूम हो गया कि हरदीन उसका सच्चा साथी और भेदिया नहीं है।
एक दिन रात के समय एकान्त में हरदीन ने मुझसे कहा, "लीजिए अब दारोगा साहब को निश्चय हो गया कि मैं उनका सच्चा साथी नहीं हूँ। आज उसने मुझे अपने पास बुलाया था, मगर मैं गया नहीं क्योंकि मुझे यह निश्चय हो गया कि जाने के साथ ही मैं उसके कब्जे में आ जाऊँगा और फिर किसी तरह जान न बचेगी, यों तो छिटके रहने पर लड़ते-झगड़ते जैसा होगा देखा जायेगा। अतः इस समय मुझे आपसे यह कहना है कि आज से मैं आपके यहां रहना छोड़ दूंगा और तब तक आपके पास न आऊँगा, जब तक मैं दारोगा की तरफ से बेफिक्र न होऊंगा, देखना चाहिए मेरे उससे क्योंकर निपटती है, वह मुझे मारकर निश्चिन्त होता है या मैं उसे जहन्नुम में पहुंचा कर कलेजा ठंडा करता हूँ। मुझे अपने मरने का रंज कुछ भी नहीं है मगर इस बात का अणसोस जरूर है कि मेरे जाने के बाद आपका मददगार यहाँ कोई भी नहीं है और कम्बख्त दारोगा आपको फंसाने में किसी तरह की कसर न करेगा,खैर लाचारी है क्योंकि मेरे यहां रहने से भी आपका कोई कल्याण नहीं हो सकता, यों तो मैं छिप-छिपे कुछ-न-कुछ मदद जरूर करूंगा परन्तु आप जहाँ तक हो सके, खूब होशियारी के साथ काम कीजियेगा।"
मैं-अगर यही बात है तो तुम्हारे भागने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती। हम लोग दारोगा के भेदों को खोलकर खुल्लमखुल्ला उसका मुकाबला कर सकते हैं!
हरनामसिंह--इससे कोई फायदा नहीं हो सकता, क्योंकि हम लोगों के पास दारोगा के खिलाफ कोई सबूत नहीं है और न उसके बराबर ताकत ही है।
मैं--क्या इन भेदों को हम गोपाल सिंह से नहीं खोल सकते और ऐसा करने से भी कोई काम नहीं चलेगा?
हरनामसिंह-नहीं, ऐसा करने से जो कुछ बरस दो बरस गोपालसिंह की जिंदगी है वह भी न रहेगी अर्थात् हम लोगों के साथ ही साथ वे भी मार डाले जायेंगे। आप नही समझ सकते और नहीं जानते कि दारोगा की असली सूरत क्या है, उसकी ताकत कैसी है और उसके मजबूत जाल किस कारीगरी के साथ फैले हुए हैं। गोपालसिंह अपने को राजा और शक्तिमान समझते होंगे, मगर मैं सच कहता हूँ कि दारोगा के सामने उनकी कुछ भी हकीकत नहीं है, हाँ यदि राजा गोपालसिंह किसी को किसी तरह की खबर किए बिना एकाएक दारोगा को गिरफ्तार करके मार डालें तो बेशक वे राजा कहला सकते हैं, मगर ऐसी अवस्था में मायारानी उन्हें जीता न छोड़गी और लक्ष्मीदेवी वाला भेद भी ज्यों-का-त्यों बन्द रह जायेगा और वह भी किसी तहखाने में पड़ी-पड़ी भूखी-प्यासी मर जाएगी।
इसी तरह पर हमारे और हरदीन के बीच में देर तक बातें होती रहीं और वह मेरी हर एक बात का जवाब देता रहा। अन्त में वह मुझे समझा-बुझाकर घर से बाहर निकल गया और उसका पता न लगा।
रात भर मुझे नींद न आई और मैं तरह-तरह की बातें सोचता रह गया। सुबह को चारपाई से उठा, हाथ मुंह धोने के बाद दरबारी कपड़े पहने, हर्के लगाए और राजा साहब की तरफ रवाना हुआ। जब मैं उस तिमुहानी पर पहुंचा, जहां से एक रास्ता राजा साहब के दीवानखाने की तरफ और दूसरा खास बाग की तरफ गया है, तब उस जगह पर दारोगा साहब से मुलाकात हुई थी जो दीवानखाने की तरफ से लौटे चले आ रहे थे।
प्रकट में मुझसे और दारोगा साहब से बहुत अच्छी तरह साहब-सलामत हुई और उन्होंने उदासीनता के साथ मुझसे कहा, "आप दीवानखाने की तरफ कहीं जा रहे हैं, राजा साहब तो खास बाग में चले गये, मेरे साथ चलिए, मैं भी उन्हीं से मिलने के लिए जा रहा हूँ, सुना है कि रात से उनकी तबीयत खराब हो रही है।
मैं-(ताज्जुब के साथ) क्यों-क्यों, कुशल तो है?
दारोगा--अभी-अभी पता लगा है कि आधी रात के बाद से उन्हें बेहिसाब दस्त और उल्टी आ रहे हैं, आप कृपा करके यदि मोहनजी वैद्य को अपने साथ लेते आवें, तो बड़ा काम हो, मैं खुद उनकी तरफ जाने का इरादा कर रहा था।
दारोगा की बातें सुनकर मैं घबड़ा गया, राजा साहबकी बीमारी का हाल सुनते ही मेरी तबीयत उदास हो गई और मैं 'अच्छा' कह उल्टे पैर लौटा और मोहनजी बैद्य की तरफ रवाना हुआ।
यहाँ तक अपना हाल कह कुछ देर के लिए भरतसिंह चुप हो गये और दम लेने लगे। इस समय जीतसिंह ने महाराज की तरफ देखा और कहा, "भरतसिंहजी का किस्सा भी आम-दरबार में कैदियों के सामने ही सुनने लायक है।"
महाराज--बेशक ऐसा ही है। (गोपालसिंह से) तुम्हारी क्या राय है?
गोपालसिंह-महाराज की इच्छा के विरुद्ध मैं कुछ बोल न सका नहीं तो मैं भी यही चाहता था कि और नकाबपोशों की तरह इनका किस्सा भी कैदियों के सामने ही सुना जाये।
और सभी ने भी यही राय दी, आखिर महाराज हुक्म दिया कि 'कल दरबारे आम किया जाये और कैदी लोग दरबार में लाये जायें।'
दिन पहर भर से कुछ कम बाकी था, जब यह छोटा-सा दरबार बर्खास्त हुआ और सब कोई अपने ठिकाने चले गये, कुंअर आनन्दसिंह शिकारी कपड़े पहनकर तारासिंह को साथ लिए महल के बाहर आए और दोनों दोस्त घोड़ों पर सवार हो जंगल की तरफ रवाना हो गये।
१०
घोड़े पर सवार तारासिंह को साथ लिए हुए कुंअर आनन्दसिंह जंगल ही जंगल घूमते और साधारण ढंग पर शिकार खेलते हुए बहुत दूर निकल गये और जब दिन बहुत कम बाकी रह गया, तब धीरे-धीरे घर की तरफ लौटे।
हम ऊपर के किसी बयान में लिख आये हैं कि 'अटारी पर एक सजे हुए बँगले में बैठी हुई किशोरी, कामिनी और कमलिनी वगैरह ने जंगल से निकलकर घर की तरफ आते हुए कुंअर आनन्दसिंह और तारासिंह को देखा तथा यह भी देखा कि दस-बारह नकाबपोशों ने जंगल में से निकल इन दोनों पर तीर चलाये और ये दोनों उनका पीछा करते हुए पुनः जंगल के अन्दर घुस गए' – इत्यादि।
यह वही मौका है जिसका हम जिक्र कर रहे हैं। उस समय कमला ने एक लौंडी की जबानी इन्द्रजीतसिंह को इस बात की खबर दिलवा दी थी, और खबर पाते ही कुंअर इन्द्रजीतसिंह, भैरोंसिंह तथा और भी बहुत से आदमी आनन्दसिंह की मदद के लिए रवाना हो गए थे।
असल बात यह थी कि भूतनाथ की चालाकी से शर्मिन्दगी उठाकर भी नानक ने सब नहीं किया, बल्कि पुनः इन लोगों का पीछा किया और अबकी दफे इस ढंग से जाहिर हुआ था कि मौका मिले तो आनन्दसिंह को तीर का निशाना बनावे और इसी तरह बारी-बारी से अपने दुश्मनों की जान लेकर कलेजा ठंडा करे। मगर उसका यह इरादा भी काम न आया; आनन्दसिंह और तारासिंह की चालाकी और उनके घोड़ों की चपलता के कारण उसका निशाना कारगर न हुआ और उन्होंने तेजी के साथ उसके सिर पर पहुंच कर सभी को हर तरह से मजबूर कर दिया। तब तक मदद लिए हुए कुंअर इन्द्रजीतसिंह भी जा पहुंचे और आठ साथियों के सहित बेईमान नानक को गिरफ्तार कर लिया। यद्यपि उसी समय यह भी मालूम हो गया कि इसके साथियों में से कई आदमी निकल गए, मगर इस बात की कुछ परवाह न की गई और जो कुछ गिरफ्तार हो गए थे, उन्हीं को लेकर सब कोई घर की तरफ रवाना हो गए।
कम्बख्त नानक पर हर तरह की रिआयत की गई, बहुत कड़ी सजा पाने के योग्य होने पर भी उसे किसी तरह की सजा न दी गई, और बह इस खयाल से बिल्कुल साफ छोड़ दिया गया कि फिर भी सुधर जाय मगर नहीं-
भूयोपि सिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति
अर्थात् "नीम न मीठो होय जो सींचो गुड़ घीउ से।"
आखिर नानक को वह दुःख भोगना ही पड़ा जो उसकी किस्मत में बदा हुआ था। जिस समय नानक गिरफ्तार करके लाया गया और लोगों ने उसका हाल सुना उस समय सभी को उसकी नालायकी पर बहुत ही रंज हुआ। महाराज की आज्ञानुसार वह कैदखाने में पहुँचाया गया और सभी को निश्चय हो गया कि अब इसे किसी तरह छुटकारा नहीं मिल सकता।
दूसरे दिन दरबारे-आम का बन्दोबस्त किया गया और कैदियों का मुकदमा सुनने के लिए बड़े शौक से लोग इकट्ठा होने लगे। हथकड़ियों-बेड़ियों से जकड़े हुए कैदी लोग हाजिर किए गए और आपस वालों तथा ऐयारों को साथ लिए हुए महाराज भी दरबार में आकर एक ऊँची गद्दी पर बैठ गये। आज के दरबार में भीड़ मामूली से बहुत ज्यादा थी और कैदियों का मुकदमा सुनने के लिए सभी उतावले हो रहे थे। भरतसिंह, दलीपशाह, अर्जुनसिंह तथा उनके और भी दो साथी, जो तिलिस्म के बाहर होने के बाद अपने घर चले गए थे और अब लौट आये हैं, अपने-अपने चेहरों पर नकाब डाल कर दरबार में राजा गोपालसिंह के पास बैठ गये और महाराज के हुक्म का इन्तजार करने लगे।
महाराज का इशारा पाकर भरतसिंह खड़े हो गए और उन्होंने दारोगा तथा जयपाल की तरफ देखकर कहा-
"दारोगा साहब, जरा मेरी तरफ देखिए और पहचानिए कि मैं कौन हूँ। जयपाल, तू भी इधर निगाह कर!"
इतना कहकर भरतसिंह ने अपने चेहरे पर से नकाब उलट दी और एक दफा चारों तरफ देखकर सभी का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। सूरत देखते ही दारोगा और जयपाल थर-थर कांपने लगे। दारोगा ने लड़खड़ाई हुई आवाज से कहा, "कौन? ओफ, भरतसिंह! नहीं-नहीं, भरतसिंह कहाँ? उसे मरे बहुत दिन हो गए, यह तो कोई ऐयार है!"
भरतसिंह-नहीं-नहीं, दारोगा साहब! मैं ऐयार नहीं हूं, मैं वही भरतसिंह हूँ जिसे आपने हद से ज्यादा सताया था, मैं वही भरतसिंह हूँ जिसके मुंह पर आपने मिर्च का तोबड़ा चढ़ाया था और मैं वही भरतसिंह हूँ जिसे आपने अंधेरे कुएं में लटका दिया था। सुनिये मैं अपना किस्सा बयान करता हूँ और यह भी कहता हूँ कि आखिर में मेरी जान क्योंकर बची। जयपालसिंह, आप भी सुनिए और हुंकारी भरते चलिए।
इतना कहकर भरतसिंह ने अपना किस्सा आदि से कहना आरम्भ किया जैसा कि हम ऊपर बयान कर आये हैं और इसके बाद यों कहने लगे-
भरतसिंह--दारोगा की बातों ने मुझे घबरा दिया और मैं उलटे पैर मोहनजी वैद्य को बुलाने के लिए रवाना हुआ। मुझे इस बात का रत्ती भर भी शक न था कि मोहनजी और दारोगा साहब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं अथवा इन दोनों में हमारे लिए कुछ बातें तय पा चुकी हैं। मैं बेधड़क उनके मकान पर गया और इत्तिला कराने के बाद उनके एकान्त वाले कमरे में जा पहुंचा जहां उन्होंने मुझे बुलवा भेजा था। उस समय वे अकेले बैठे माला जप रहे थे। नौकर मुझे वहाँ तक पहुंचा कर बिदा हो गया और मैंने उनके पास बैठकर राजा साहब का हाल बयान करके खास बाग में चलने के लिए कहा। जवाब में वैद्यजी यह कर कि 'मैं दवाओं का बन्दोबस्त करके अभी आपके साथ चलया हूँ' खड़े हुए और आलमारी में से कई तरह की शीशियां निकाल-निकाल कर जमीन पर रखने लगे। उसी बीच में उन्होंने एक छोटी शीशी निकाल कर मेरे हाथ में दी और कहा, "देखिए यह मैंने एक नये ढंग की ताकत की दवा तैयार की है, खाना तो दूर रहा इसके सूंघने ही से तुरन्त मालूम होता है कि बदन में एक तरह की ताकत आ रही है! लीजिए, जरा सूंघ के अन्दाज तो कीजिए।"
मैं वैद्यजी के फेर में पड़ गया और शीशी का मुंह खोलकर सूंघने लगा। इतना तो मालूम हुआ कि इसमें कोई खुशबूदार चीज है मगर फिर तन-बदन की सुध न रही। जब मैं होश में आया तो अपने को हथकड़ी-बेड़ी से मजबूर एक अँधेरी कोठरी में कैद पाया। नहीं कह सकता कि वह दिन का समय था या रात का। कोठरी के एक कोने में चिराग जल रहा था और दारोगा तथा जयपाल हाथ में नंगी तलवार लिए सामने बैठे हुए थे।
मैं-(दारोगा से) अब मालूम हुआ कि आपने इसी काम के लिए मुझे वैद्यजी के पास भेजा था।
दारोगा–बेशक इसीलिए, क्योंकि तुम मेरी जड़ काटने के लिए तैयार हो चुके थे।
मैं तो फिर मुझे कैद कर रखने से क्या फायदा? मार कर बखेड़ा निपटाइए और बेखटके आनन्द कीजिए।
दारोगा-हां, अगर तुम मेरी बात नहीं मानोगे, तो बेशक मुझे ऐसा ही करना पड़ेगा।
मैं-मानने की कौन-सी बात है? मैंने तो अभी तक कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे आपको किसी तरह का नुकसान पहुंचे।
दारोगा—ये सब बातें तो रहने दो, क्योंकि तुम और हरदीन मिलकर जो कुछ कर चुके थे और जो करना चाहते थे, उसे मैं खूब जानता हूँ मगर बात यह है कि अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें इस कैद से छुट्टी दे सकता हूँ, नहीं तो मौत तुम्हारे लिए तय हुई रक्खी है।
मैं-खैर बताइये तो सही कि वह कौन-सा काम है जिसके करने से छुट्टी मिल सकती है।
दारोगा-यही कि तुम एक चिट्ठी इन रघुबरमिह अर्थात् जयपाल के नाम की लिख दो जिसमें यह बात हो कि 'लक्ष्मीदेवी के बदले में मुन्दर को मायारानी बना देने में जो कुछ मेहनत की है वह हम तुम दोनों ने मिल कर की है अतएव उचित है कि इस काम में जो कुछ तुमने फायदा उठाया है उसमें से आधा मुझे बाँट दो, नहीं तो तुम्हारे लिए अच्छा न होगा।"
मैं--ठीक है, आपका मतलब मैं समझ गया, खैर आज तो नहीं मगर कल जैसा आप कहते हैं, वैसा ही कर दूंगा।
दारोगा--आखिर एक दिन की देर करने में तुमने क्या फायदा सोचा है?
मैं--सो भी कल ही बताऊँगा।
दारोगा--अच्छा क्या हर्ज है, कल ही सही।
इतना कहकर दारोगा चला गया और मैं भूखा-प्यासा उसी कोठरी में पड़ा हुआ तरह-तरह की बातें सोचने लगा क्योंकि उस दिन दारोगा ने मेरे खाने-पीने के लिए कुछ भी प्रबन्ध न किया। मुझे निश्चय हो गया कि इस ढंग की चिट्ठी लिखाने के बाद दारोगा मुझे जान से मार डालेगा और मेरे मरने के बाद यही चिट्ठी मेरी बदनामी का सबब बनेगी। मेरे दोस्त गोपालसिंह मुझको बेईमान समझेंगे और तमाम दुनिया मुझे कमीना खयाल करेगी। अतः मैंने दिल में ठान ली कि चाहे जान जाय या रहे, मगर इस तरह की चिट्ठी मैं कदापि न लिखूगा। आखिर मरना तो जरूरी है फिर कलंक का टीका जानबूझ कर अपने माथे क्यों लगाऊँ?
दूसरे दिन रघुबरसिंह को साथ लिए हुए दारोगा पुनः मेरे पास आया।
भरतसिंह ने अपना हाल यहां ही तक बयान किया था कि राजा गोपालसिंह ने बीच ही में टोका और पूछा, "क्या रघुबरसिंह भी इसी जयपाल का नाम है?"
भरतसिंह--जी हां, इसका नाम रघुबरसिंह था और कुछ दिन के लिए इसने अपना नाम 'भूतनाय' रख लिया था।
गोपालसिंह--ठीक है, मुझे इस बारे में धोखा हुआ नहीं, बल्कि मेरे खजांची ही ने मुझे धोखा दिया। खैर तब क्या हुआ?
भरतसिंह--हां, तो दूसरे दिन जयपाल को साथ लिए हुए दारोगा पुनः मेरे पास आया और बोला, "कहो, चिट्ठी लिख देने के लिए तैयार हो या नहीं?" इसके जवाब में मैंने कहा कि "मर जाना मंजूर है मगर झूठे कलंक का टीका अपने माथे पर लगाना मंजूर नहीं!"
दारोगा ने मुझे कई तरह से समझाया-बुझाया और धोखे में डालना चाहा, मगर मैंने उसकी एक न सुनी। आखिर दोनों ने मिलकर मुझे मारना शुरू किया, यहाँ तक मारा कि मैं वेहोश हो गया। जब होश में आया तो फिर उसी तरह अपने को कैद पाया। भूख और प्यास के मारे मेरा बुरा हाल हो गया था और मार के सबब से तमाम बदन चूर-चूर हो रहा था। तीसरे दिन दोनों शैतान पुनः मेरे पास आये और जब उस दिन भी मैंने दारोगा की बात न मानी तो उसने घोड़ों के दाना खाने वाले तोबड़े में चूरा किया हुआ मिरचा रख कर मेरे मुंह पर चढ़ा दिया। हाय-हाय! उस तकलीफ को मैं कभी नहीं भूल सकता!
यहाँ तक कहकर भरतसिंह चुप हो गये और दारोगा तथा जयपाल को तरफ देखने लगे। वे दोनों सिर नीचा किए हुए जमीन की तरफ देख रहे थे और डर के मारे दोनों का बदन काँप रहा था। भरतसिंह ने पुकार कर कहा, "कहिए दारोगा साहब, जो कुछ मैं कह रहा हूँ वह सच है या झूठ?" मगर दारोगा ने इसका कुछ भी जवाब न दिया। मगर उस समय दरबार में जितने आदमी बैठे थे, क्रोध के मारे सभी का बुरा हाल था और सब कोई दारोगा की तरफ जलती हुई निगाह से देख रहे थे। भरतसिंह ने फिर इस तरह कहना शुरू किया-
भरतसिंह--दारोगा के सम्बन्ध में मेरा किस्सा वैसा दिलचस्प नहीं है जैसा दलीपशाह और अर्जुनसिंह का आप लोग सुनेंगे, क्योंकि उनके साथ बड़ी-बड़ी विचित्र घटनाएं हो चुकी हैं, बल्कि यों कहना चाहिए कि मेरा तमाम किस्सा उनकी एक दिन की घटना का मुकाबला भी नहीं कर सकता, परन्तु साथ ही इसके यह बात भी जरूर है कि मैंने न तो कभी किसी के साथ किसी तरह की बुराई की और न किसी से विशेष मेलजोल या हँसी-दिल्लगी ही रखता था, फिर भी उन दिनों जमानिया की वह दशा थी कि सादे ढंग पर जिन्दगी बिताने वाला मैं भी सुख की नींद न सो सका और राजा साहब की दोस्ती की बदौलत मुझे हर तरह का दुःख भोगना पड़ा। इस हरामखोर दारोगा ने ऐसे-ऐसे कुकर्म किए हैं कि जिनका पूरा-पूरा बयान हो ही नहीं सकता और न यही मेरी समझ में आता है कि दुनिया में कौन-सी ऐसी सजा है जो इसके योग्य समझी जाय।अतः अब मैं संक्षेप में अपना हाल समाप्त करता हूँ।
अपने मन के माफिक चिट्ठी लिखाने की नीयत से आठ दिन तक कम्बख्त दारोगा ने मुझे बेहिसाब सकलीफें दीं। मिर्च का तोबड़ा मेरे मुंह पर चढ़ाया, जहरीली राई का लेप मेरे बदन पर किया, कुएँ में लटकाया, गन्दी कोठरी में बन्द किया, जो-जो सूझा सब कुछ किया और इतने दिनों तक बराबर ही मुझे भूखा भी रखा, मगर न मालूम क्या सबब था कि मेरी जान नहीं निकली। मैं बराबर ईश्वर से प्रार्थना करता था कि किसी तरह मुझे मौत दे जिससे इस दुःख से छुट्टी मिले। आखिरी दिन मैं इतना कमजोर हो गया था कि मुझमें बात करने की ताकत न थी।
उस दिन आधी रात के समय मैं उसी कोठरी में पड़ा-पड़ा मौत का इन्तजार कर रहा था कि यकायक कोठरी का दरवाजा खुला और एक नकाबपोश दाहिने हाथ में नंगी तलवार और बाएँ हाथ में एक छोटी-सी गठरी लिए हुए कोठरी के अन्दर आता हुआ दिखाई पड़ा। हाथ में वह जो तलवार लिए था, उसके अतिरिक्त उसकी कमर में एक तलवार और भी थी। कोठरी के अन्दर आते ही उसने भीतर से दरवाजा बन्द कर दिया और मेरे पास चला आया, हाथ की गठरी और तलवार जमीन पर रख मुझसे चिपट गया और रोने लगा। उसकी ऐसी मुहब्बत देख मैं चौंक पड़ा और मुझे तुरन्त मालूम हो गया कि यह मेरा पुराना खैरख्वाह हरदीन है। उसके चेहरे से नकाब हटाकर मैंने उसकी सूरत देखी और तब रोने में उसका साथ दिया।
थोड़ी ही देर बाद हरदीन भुझसे अलग हुआ और बोला, "मैं किसी न किसी तरह यहां तो पहुँच गया मगर यहां से निकल भागना जरा कठिन है, तथापि आप घबरायें नहीं, मैं एक दफा तो दुश्मन को सताए बिना नहीं रहता। अब आप शीघ्र उठे और जो कुछ मैं खाने-पीने के लिए लाया हूँ उसे खा कर चैतन्य हो जायें।"
जो गठरी हरदीन लाया था उसमें खाने-पीने का सामान था। उसने मुझे भोजन कराया, पानी पिलाया और इसके बाद मेरे हाथ में एक तलवार देकर बोला, "बस, अब आप उठिये और मेरे पीछे-पीछे चले आइए। इतना समय नहीं है कि मैं यहाँ आपसे विशेष बातें करूं, इसके अतिरिक्त जिस जगह पर आप कैद हैं, यह तिलिस्म का एक हिस्सा है, यहाँ से निकलने के लिए भी बहुत उद्योग करना होगा।"
भोजन करने से कुछ ताकत तो मुझमें हो ही गई थी, मगर कैद से छुटकारा मिलने की उम्मीद ने उससे भी ताकत पैदा कर दी। मैं उठ खड़ा हुआ और हरदीन के पीछे-पीछे रवाना हुआ। कोठरी का दरवाजा खोलने के बाद जब बाहर निकला तब मुझे मालूम हुआ कि मैं खास बाग के तीसरे दर्जे में हूँ जिसमें कई दफा राजा गोपालसिंह के साथ आ चुका था, मगर इस बात से मुझको बहुत ही ताज्जुब हुआ और मैं सोचने लगा कि देखो राजा साहब के खास बाग ही में यह दारोगा लोगों पर इतना जुल्म करता है और राजा साहब को खबर तक नहीं होती! क्या यहाँ कई ऐसे स्थान हैं जिनका हाल दारोगा जानता है और राजा साहब नहीं जानते?
खैर, मैं कोठरी से बाहर निकलकर बरामदे में पहुंचा जहाँ से बायें और दाहिने सिर्फ दो ही तरफ जाने का रास्ता था। दाहिनी तरफ को इशारा करके हरदीन ने मुझसे कहा, "इसी तरफ से मैं आया हूँ, दारोगा, जयपाल तथा बहुत से आदमी इसी तरफ बैठे हैं इसलिए इधर तो अब जा नहीं सकते, हाँ बाईं तरफ चलिए, कहीं-न-कहीं से तो रास्ता मिल ही जायगा।"
रात चांदनी थी और ऊपर से खुला रहने के सबब उधर की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देती थी। हम दोनों आदमी बाईं तरफ रवाना हुए। लगभग पच्चीस कदम जाने के बाद नीचे उतरने के लिए दस-बारह सीढ़ियां मिलीं जिन्हें तय करने के बाद हम दालान में पहुँचे जो बहुत लम्बा-चौड़ा तो न था मगर निहायत खूबसूरत और स्याह पत्थर का बना हुआ था। उस दालान में पहुंचे ही थे कि पीछे से दारोगा और जयपाल तेजी के साथ आते हुए दिखाई पड़े, मगर हरदीन ने इनकी कुछ भी परवाह न की और कहा, “इन दोनों के लिए तो मैं अकेला ही काफी हूँ।"
हरदीन मुझे अपने पीछे करने के बाद अकड़कर खड़ा हो गया। उसने दारोगा को सैकड़ों गालियाँ दी और मुकाबला करने के लिए ललकारा, मगर उन दोनों की हिम्मत न पड़ी कि आगे बढ़ें और हरदीन का मुकाबला करें। कुछ देर तक खड़े-खड़े देखने और सोचने के बाद दारोगा ने अपनी जेब से एक छोटा सा गोला निकाला और हम दोनों की तरफ फेंका। हरदीन समझ गया कि जमीन पर गिरने के साथ ही इसमें से बेहोशी का धुआँ निकलेगा। उसने अपने हाथ से मुझे इशारा किया। गोला जमीन पर गिरकर फटा और उसमें से बहुत-सा धुआं निकला, मगर हम दोनों वहाँ से हर गये थे। इसलिए उसका कुछ असर न हुआ। उसी समय दारोगा ने हम लोगों की तरफ फेंकने के लिए दूसरा गोला निकाला।
इस दालान के बीचोंबीच में एक छोटा-सा चबूतरा लाल पत्थर का बना हुआ था, मगर हम दोनों यह नहीं जानते थे कि इसमें क्या गुण है। दारोगा को दूसरा गोला निकालते देख हम दोनों उस चबूतरे पर चढ़ गये, मगर उस से उतरकर भाग न सके, क्योंकि चढ़ने के साथ ही चबूतरा हिला, तथा हम दोनों को लिए हुए जमीन के अन्दर धंस गया और साथ ही न मालूम किस चीज के असर से हम दोनों बेहोश हो गये। जब होश में आये तो चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार दिखाई दिया, नहीं कह सकते कि हम दोनों कितनी देर तक बेहोश रहे।
कुछ देर तक चुपचाप बैठे रहने के बाद सामने की तरफ कुछ उजाला मालूम हुआ और वह उजाला धीरे-धीरे बढ़ने लगा जिससे हमने समझा कि सामने कोई दरवाजा है और उसमें से सुबह की सफेदी दिखाई दे रही है। हम दोनों उठकर खड़े हुए और उसी उजाले की तरफ बढ़े। वास्तव में वैसा ही था जैसा हम लोगों ने सोचा था। कई कदम चलने के बाद एक दरवाजा मिला जिसे लांघकर हम दोनों उसी बुर्ज वाले बाग में जा पहुंचे जहां दोनों कुमारों से मुलाकात हुई थी। इसके बाद बाहर का हाल बहुत दिनों तक कुछ भी मालूम न हुआ कि क्या हो रहा है और क्या हुआ।बहुत दिनों तक वहाँ से बाहर निकलने के लिए उद्योग करते रहे, परन्तु सब कुछ ध्यर्थ हुआ और वहां से छुट्टी तभी मिली जब दोनों कुमारों के दर्शन हुए! कुछ दिनों बाद दलीपशाह से भी उसी बाग मुलाकात हुई जिसका हाल उनका किस्सा सुनने से आप लोगों को मालूम होगा। बस,इतना ही तो मेरा किस्सा है। हाँ, जब आप दलीपशाह की कहानी सुनेंगे तब बेशक कुछ आनन्द मिलेगा। (एक नकाबपोश की तरफ बताकर) मेरा पुराना खैरखाह हरदीन यही है जो इतने दिनों तक मेरे दुःख-सुख का साथी बना रहा और अन्त में मेरे साथ ही कैद से छूटा।
भरतसिंह की कथा समाप्त होने के बाद दरबार बर्खास्त किया गया और महाराज ने हुक्म दिया कि "कल के दरबार में दलीपशाह अपना किस्सा बयान करेंगे।"
११
दूसरे दिन पुनः उसी ढंग का दरबार लगा और सब लोग अपने-अपने ठिकाने पर बैठ गये।
इशारा पाकर दलीपशाह उठ खड़ा हुआ और उसने अपने चेहरे पर नकाब हटाकर दारोगा, जयपाल, बेगम और नागर वगैरह की तरफ देखकर कहा-
दलीपशाह-आप लोगों की खुशकिस्मती का जमाना तो बीत गया, अब वह जमाना आ गया है कि आप लोग अपने किये का फल भोगें और देखें कि आपने जिन लोगों को जहन्नुम में पहुँचाने का बीड़ा उठाया था आज ईश्वर की कृपा से वे ही लोग आपको हँसते-खेलते दिखाई देते हैं। खैर, मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं, इसका निपटारा तो महाराज की आज्ञा से होगा, मुझे अपना किस्सा बयान करने का हुक्म हुआ है सो बयान
करता हूँ। (और लोगों की तरफ देखकर) मेरे किस्से से भूतनाथ का भी बहुत ही बड़ा सम्बन्ध है, मगर इस खयाल से कि महाराज ने भूतनाथ का कसूर माफ करके उसे अपना ऐयार बना लिया है, मैं अपने किस्से में उन बातों का जिक्र छोड़ता जाऊँगा जिनसे भूतनाथ की बदनामी होती है, इसके अतिरिक्त भूतनाथ प्रतिज्ञानुसार महाराज के आगे पेश करने लिए स्वयं अपनी जीवनी लिख रहा है जिससे महाराज को पूरा-पूरा हाल मालूम हो जायगा, अतः अब मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
मैं मिर्जापुर के रहने वाले दीनदयालसिंह ऐयार का लड़का हूँ। मेरे पिता महाराज धौलपुर के यहां रहते थे और वहाँ उनकी बहुत इज्जत और कदर थी। उन्होंने मुझे ऐयारी सिखाने में किसी तरह की त्रुटि नहीं की। जहाँ तक हो सका, दिल लगाकर मुझे ऐयारी सिखाई और मैं भी इस फन में खूब हो शियार हो गया, परन्तु पिता के मरने के बाद मैंने किसी रियासत में नौकरी नहीं की। मुझे अपने पिता की जगह मिलती थी और महाराज मुझे बहुत चाहते थे, मगर मैंने पिता के मरने के साथ ही रियासत छोड़ दी और अपने जन्म-स्थान मिर्जापुर में चला आया क्योंकि मेरे पिता मेरे लिए बहुत दौलत छोड़ गये थे और मुझे खाने-पीने की कुछ परवाह न थी। पिता के देहान्त के साल भर पहले ही मेरी माँ मर चुकी थी, अतएव केवल मैं और मेरी स्त्री दो आदमी अपने घर के मालिक थे।
जमानिया की रियासत से मुझे किसी तरह का सम्बन्ध नहीं था, परन्तु इसलिए कि मैं एक नामी ऐयार का लड़का और खुद भी ऐयार था तथा बहुत से ऐयारों से गहरी जान-पहचान रखता था, मुझे चारों तरफ की खबरें बराबर मिला करती थीं, इसी तरह जामानिया में जो कुछ चालवाजियाँ हुआ करती थीं, वे भी मुझसे छिपी हुई न थीं। भूतनाथ की और मेरी स्त्री आपस में मौसेरी बहिनें होती हैं और भूतनाथ का जमानिया से बहुत घना संबंध हो गया था, इसलिए जमानिया का हाल जानने के लिए मैं उद्योग भी किया करता था, मगर उसमें किसी तरह का दखल नहीं देता था। (दारोगा की तरफ इशारा करके)इस हरामखोर दारोगा ने रियासत पर अपना दबाव डालने की नीयत से विचित्र ढोंग रच लिया था, शादी नहीं की थी और बाबाजी तथा ब्रह्मचारी के नाम से अपने को प्रसिद्ध कर रखा था, बल्कि मौके मौके पर लोगों को कहा करता था कि मैं तो साधू आदमी हूँ, मुझे रुपये-पैसे की जरूरत ही क्या है, मैं तो रियासत की भलाई और परोपकार में अपना समय बिताना चाहता हूँ, इत्यादि। परन्तु वास्तव में यह परले सिरे का ऐयाश, बदमाश और लालची था जिसके विषय में कुछ विशेष कहना मैं पसन्द नहीं करता।
मेरे पिता और इन्द्रदेव के पिता दोनों दिली दोस्त और ऐयारी में एक ही गुरु के शिष्य थे, अत एव मुझमें और इन्द्रदेव में भी उसी प्रकार की दोस्ती और मुहब्बत थी। इसलिए मैं प्रायः इन्द्रदेव से मिलने के लिए उनके घर जाया करता और कभी-कभी वे भी मेरे घर आया करते थे। जरूरत पड़ने पर इन्द्रदेव की इच्छानुसार मैं उनका कुछ काम कर दिया करता और उन्हीं के यहाँ कभी-कभी इस कम्बख्त दारोगा से भी मुलाकात हो जाया करती थी, बल्कि कहना चाहिए कि इन्द्रदेव ही के सबब से दारोगा, जयपाल राजा गोपालसिंह और भरतसिंह तथा जमानिया के और भी कई नामी आदमियों में मेरी मुलाकात ओर साहब-सलामत हो गई थी।
जब भूतनाथ के हाथ से बेचारा दयाराम मारा गया, तब से मुझमें और भूतनाथ में एक प्रकार की खिचाखिची हो गई थी और वह खिचाखिंची दिनों-दिन बढ़ती ही गई यहाँ तक कि कुछ दिनों बाद हम दोनों की साहब-सलामत भी छूट गई।
एक दिन मैं इन्द्रदेव के यहाँ बैठा हुआ भूतनाथ के विषय में बातचीत कर रहा था, क्योंकि उन दिनों यह खबर बड़ी तेजी के साथ मशहूर हो रही थी कि 'गदाधरसिंह (भूतनाथ)मर गया।" परन्तु उस समय इन्द्रदेव इस बात पर जोर दे रहे थे कि भूतनाथ मरा नहीं, कहीं छिपकर बैठ गया है, कभी न कभी यकायक प्रकट हो जायगा। इसी समय दारोगा के आने की इत्तिला मिली जो बड़ी शान-शौकत के साथ इन्द्रदेव से मिलने के लिए आया था। इन्द्रदेव बाहर निकल कर बड़ी खातिर के साथ इसे घर के अन्दर ले गये और अपने आदमियों को हुक्म दे गये कि दारोगा के साथ जो आदमी आये हैं उनके खाने-पीने और रहने का उचित प्रबन्ध किया जाय।
दारोगा को साथ लिए हुए इन्द्रदेव उसी कमरे में आये जिसमें मैं पहले ही से बैठा हुआ था, क्योंकि इन्द्रदेव की तरह मैं दारोगा को लेने के लिए मकान के बाहर नहीं गया था और न दारोगा के आ पहुँचने पर मैंने उठकर इसकी इज्जत ही बढ़ाई, हाँ, साहब-सलामत जरूर हुई। यह बात दारोगा को बहुत ही बुरी मालूम हुई, मगर इन्द्रदेव को नहीं, क्योंकि इन्द्रदेव गुरुभाई का सिर्फ नाता निबाहते थे, दिल से दारोगा की खातिर नहीं करते थे।
इन्द्रदेव से और दारोगा से देर तक तरह-तरह की बातें होती रहीं, जिसमें मौके-मौके पर दारोगा अपनी होशियारी और बुद्धिमानी की तस्वीर खींचता रहा। जब ऐयारों की कहानी छिड़ी तो वह यकायक मेरी तरफ पलट पड़ा और बोला, "आप इतने बड़े ऐयार के लड़के होकर घर में बेकार क्यों बैठे हैं? और नहीं तो मेरी ही रियासत में काम कीजिए, यहां आपको बहुत आराम मिलेगा, देखिये बिहारीसिंह और हरनामसिंह कैसी इज्जत और खुशी के साथ रहते हैं, आप तो उनसे ज्यादा इज्जत के लायक हैं।"
मैं--मैं बेकार तो बैठा रहता हूँ, मगर अभी तक अपने को महाराज धौलपुर का नौकर समझता हूँ, क्योंकि रियासत का काम छोड़ देने पर भी वहाँ से मुझे खाने को बराबर मिल रहा है।
दारोगा--(मुंह बनाकर)अजी, मिलता भी होगा तो आखिर क्या, एक छोटी-सी रकम से आपका क्या काम चल सकता है? आखिर अपने पल्ले की जमा तो खर्च करते ही होंगे।
मैं--यह भी तो महाराज का ही दिया हुआ है!
दारोगा--नहीं, वह आपके पिता का दिया हुआ है। खैर, मेरा मतलब यह है कि वहाँ से अगर कुछ मिलता है तो उसे भी ऑप रखिये और मेरी रियासत से भी फायदा उठाइए।
मैं--ऐसा करना बेईमानी और नमकहरामी कहा जायगा और यह मुझसे न हो सकेगा।
दारोगा--(हँसकर) वाह याह! ऐयार लोग दिन-रात ईमानदारी की हँडिया ही तो चढ़ाए रहते हैं!
मैं--(तेजी के साथ) बेशक! अगर ऐसा नहीं तो वह ऐयार नहीं, रियासत का कोई ओहदेदार कहा जायगा!
दारोगा--(तनकर) ठीक है! गदाधरसिंह आप ही का नातेदार तो है, जरा उसकी तस्वीर तो खींचिये!
मैं--गदाधरसिंह किसी रियासत का ऐयार नहीं है और न मैं उसे ऐयार समझता हूँ इतना होने पर भी आप यह नहीं साबित कर सकते कि उसने अपने मालिक के साथ किसी तरह की बेईमानी की।
दारीगा—(और भी तुनक के) बस-बस-बस, रहने दीजिये। हमारे यहां भी बिहारीसिंह और हरनामसिंह ऐयार ही तो हैं।
मैं—इसी से तो मैं आपकी रियासत में जाना बेइज्जती समझता हूं।
दारोगा--(भौंह सिकोड़कर) तो इसका यह मतलब कि हम लोग बेईमान और नमकहराम हैं!
मैं-(मुस्कराकर) इस बात को तो आप ही सोचिये!
दारोगा--देखिये, जुबान संभालकर बात कीजिए, नहीं तो समझ लीजिए कि मैं मामूली आदमी नहीं हूँ।
मैं--(क्रोध से) यह तो मैं खुद कहता हूँ कि आप मामूली आदमी नहीं हैं क्योंकि आदमी में शर्म होती है और वह जानता है कि ईश्वर भी कोई चीज है।
दारोगा--(क्रोध-भरी आँखें दिखाकर) फिर वही बात!
मैं--हाँ वही बात! गोपालसिंह के पिता वाली बात! गुप्त कमेटी वाली बात, गदाधरसिंह की दोस्ती वाली बात! लक्ष्मीदेवी की शादी वाली बात और जो बात कि आपके गुरुभाई साहब को नहीं मालूम है वह बात!
दारोगा--(दांत पीसकर और कुछ देर मेरी तरफ देखकर) खैर, अब इस बहुतसी बात का जवाब लात ही से दिया जायगा।
मैं--बेशक, और साथ ही इसके यह भी समझ रखिए कि जवाब देने वाले भी एक-दो नहीं हैं, लातों की गिनती भी आप न सम्हाल सकेंगे। दारोगा साहब, जरा होश में आइए और सोच-विचार कर बातें कीजिए। अपने को आप ईश्वर न समझिए, बल्कि यह समझकर बातें कीजिए कि आप आदमी हैं और रियासत धौलपुर के किसी ऐयार से बातें कर रहे हैं।
दारोगा--(इन्द्रदेव की तरफ आँखें तरेरकर)क्या आप चुपचाप बैठे तमाशा देखेंगे और अपने मकान में मुझे बेइज्जत करावेंगे?
इन्द्रदेव--आप तो खुद ही अपनी अनोखी मिलनसारी से अपने को बेइज्जत करा रहे हैं, इनसे बात बढ़ाने की आपको जरूरत ही क्या थी? मैं आप दोनों के बीच में नहीं क्योंकि दलीपशाह को भी अपना भाई समझता और इज्जत की निगाह से बोल सकता, देखता हूँ।
दारोगा तो फिर जैसे बने, हम इनसे निपट लें! इन्द्रदेव--हाँ-हाँ!
दारोगा--पीछे उलाहना न देना, क्योंकि आप इन्हें अपना भाई समझते हैं!
इन्द्रदेव--मैं कभी उलाहना न दूंगा।
दारोगा--अच्छा तो अब मैं जाता हूँ, फिर कभी मिलूंगा तो बातें करूंगा!
इन्द्रदेव ने इस बात का कुछ भी जवाब न दिया। हां, जब दारोगा साहब वहाँ से बिदा हुए तो उन्हें दरवाजे तक पहुंचा आये। जब लौटकर कमरे में मेरे पास आये तो मुस्कुराते हुए बोले, “आज तो तुमने इसकी खूब खबर ली। 'जो बात तुम्हारे गुरुभाई साहब को नहीं मालूम है, वही बात' इन शब्दों ने तो उसका कलेजा छेद दिया होगा। मगर तुमसे बेहतर रंज होकर गया है, इस बात का खूब खयाल रखना।"
मैं--आप इस बात की चिन्ता न कीजिए, देखिए मैं इन्हें कैसे छकाता हूँ। मगर वाह रे आपका कलेजा! इतना कुछ हो जाने पर भी आपने अपनी जुबान से कुछ न कहा, बल्कि पुराने बर्ताव में बल तक न पड़ने दिया!
इन्द्रदेव--मैंने तो अपना मामला ईश्वर के हवाले कर दिया है।
मैं-खैर, ईश्वर अवश्य इन्साफ करेगा। अच्छा तो अब मुझे भी बिदा कीजिए, क्योंकि अब इसके मुकाबले का बन्दोबस्त शीघ्र करना पड़ेगा।
इन्द्रदेव--यह तो मैं फिर कहूँगा कि आप बेफिक्र न रहिए। थोड़ी देर तक और बातचीत करने के बाद मैं इन्द्रदेव से बिदा होकर अपने घर आया और उसी समय से दारोगा के मुकाबले का ध्यान मेरे दिमाग में चक्कर लगाने लगा।
घर पहुँचकर मैंने सब हाल अपनी स्त्री से बयान किया और ताकीद की कि हरदम होशियार रहा करना। उन दिनों मेरे यहाँ कई शागिर्द भी रहा करते थे, जिन्हें मैं ऐयारी सिखाता था। उनसे भी यह सब हाल कहा और होशियार रहने की ताकीद की। उन शागिर्दो में गिरिजाकुमार नाम का एक लड़का बड़ा ही तेज और चंचल था, लोगों को धोखे में डाल देना तो उसके लिए मामूली बात थी। बातचीत के समय वह अपना चेहरा ऐसा बना लेता था कि अच्छे-अच्छे उसकी बातों में फंसकर बेवकूफ बन जाते थे। यह गुण उसे ईश्वर का दिया हुआ था जो बहुत कम ऐयारों में पाया जाता है। अतः गिरिजाकुमार ने मुझसे कहा कि "गुरुजी, यदि दारोगा वाला मामला आप मेरे सुपुर्द कर दीजिए, तो मैं बहुत ही प्रसन्न होऊँगा और उसे ऐसा छकाऊँगा कि वह भी याद करे। जमानिया में मुझे कोई पहचानता भी नहीं है, अतएव मैं अपना काम बड़े मजे में निकाल लूंगा।"
मैंने उसे समझाया और कहा कि "कुछ दिन सब्र करो, जल्दी क्यों करते हो, फिर जैसा मौका होगा किया जायेगा।" मगर उसने एक न मानी। हाथ जोड़कर और खुशामद करके, गिड़गिड़ा करके, जिस तरह हो सका, उसने आज्ञा ले ही ली और उसी दिन सब सामान दुरुस्त करके मेरे यहां से चला गया।
अब मैं थोड़ा-सा हाल गिरिजाकुमार का बयान करूंगा कि इसने दारोगा के साथ क्या किया।
आप लोगों को यह बात सुनकर ताज्जुब होगा कि मनोरमा असल में दारोगा साहब की रण्डी है। इन्हीं की बदौलत मायारानी के दरबार में उसकी इज्जत बढ़ी और इन्हीं की बदौलत उसने मायारानी को अपने फन्दे में फंसाकर बे-हिसाब दौलत पैदा की। पहले-पहल गिरिजाकुमार ने मनोरमा के मकान पर ही दारोगा से मुलाकात की थी।
दारोगा साहब मनोरमा से प्रेम रखते थे सही, मगर इसमें कोई शक नहीं कि इस प्रेम और ऐयाशी को इन्होंने बहुत अच्छे ढंग से छिपाया और बहुत आदमियों को मालूम न होने दिया तथा लोगों की निगाहों में साधु और ब्रह्मचारी ही बने रहे। स्वयं तो जमानिया में रहते थे, मगर मनोरमा के लिए इन्होंने काशी में एक मकान भी बनवा दिया था, दसवें-बारहवें दिन अथवा जब कभी समय मिलता, तेज घोड़े पर या रथ पर सवार होकर काशी चले जाते और दस-बारह घण्टे मनोरमा के मेहमान रहकर लौट जाते।
एक दिन दारोगा साहब आधी रात के समय मनोरमा के खास कमरे में बैठे हुए उसके साथ शराब पी रहे थे और साथ-ही-साथ हँसी-दिल्लगी का आनन्द भी लूट रहे थे। उन समय इन दोनों में इस तरह की बातें हो रही थीं-
दारोगा-जो कुछ मेरे पास है, सब तुम्हारा है। रुपये-पैसे के बारे में तुम्हें कभी तकलीफ न होने दूंगा! तुम बेशक अमीराना ठाठ के साथ रहो और खुशी से जिन्दगी विताओ, गोपालसिंह अगर तिलिस्म का राजा है तो क्या हुआ, मैं भी तिलिस्म का दारोगा हूँ, उसमें दो-चार स्थान ऐसे हैं कि जिनकी खबर राजा साहब को भी नहीं, मगर मैं वहाँ बखूबी जा सकता हूँ और वहाँ की दौलत को अपनी मिल्कियत समझता हूँ। इसके अतिरिक्त मायारानी से भी मैंने तुम्हारी मुलाकात करा दी है और वह भी हर तरह से तुम्हारी खातिर करती ही है, फिर तुम्हें परवाह किस बात की है?
मनोरमा--बेशक मुझे किसी बात की परवाह नहीं है और आपकी बदौलत मैं बहुत खुश रहती हूँ, मगर मैं यह चाहती हूँ कि मायाराती के पास खुल्लम-खुल्ला मेरी आमद-रफ्त हो जाये। अभी गोपालसिंह के डर से बहुत लुक-छिपकर और नखरे-तिल्ले के साथ जाना पड़ता है।
दारोगा--फिर यह तो जरा मुश्किल बात है।
मनोरमा--मुश्किल क्या है? लक्ष्मीदेवी की जगह दूसरी औरत को राजरानी बना देना क्या साधारण काम था? सो तो आपने सहज ही में कर दिखाया और इस एक सहज काम के लिए कहते हैं कि मुश्किल है!
दारोगा--(मुस्कराकर) सो तो ठीक है, गोपालसिंह को मैं सहज में वैकुण्ठ पहुंचा सकता हूँ, मगर यह काम मेरे करने पर भी न हो सकेगा, उसके ऊपर मेरा हाथ सहज ही न उठेगा।
मनोरमा--(तिनककर)अब इतनी रहम-दिली से तो काम नहीं चलेगा! उसके मौजूद रहने से बहुत बड़ा हर्ज हो रहा है। अगर वह न रहें, तो बेशक आप खुद ही जमानिया और तिलिस्म का राज्य कर सकते हैं, मायारानी तो अपने को आपका तावेदार समझती है।
दारोगा--बेशक ऐसा ही है, मगर मनोरमा--और इसमें आपको कुछ करना भी न पड़ेगा, सब काम मायारानी ठीक कर लेंगी।
दारोगा-(चौंककर) क्या मायारानी का भी ऐसा इरादा है?
मनोरमा—जी हाँ, वह इस काम के लिए तैयार हैं, मगर आपसे डरती हैं, आप आज्ञा दें, तो सब-कुछ ठीक हो जाये।
दारोगा--तो तुम उसी की तरफ से इस बात की कोशिश कर रही हो?
मनोरमा--बेशक! साथ ही इसमें आपका और अपना भी फायदा समझती हूँ, तब ऐसा कहती हूँ। (दारोगा के गले में हाथ डालकर) बस, आप आज्ञा दे दीजिए।
दारोगा--(मुस्कराकर) खैर, तुम्हारी खातिर मुझे मंजूर है, मगर एक काम करना कि मायारानी से और मुझसे इस बारे में बातचीत न कराना, जिसमें मौका पड़े तो मैं यह कहने के लायक रह जाऊँ कि मुझे इसकी कुछ भी खबर नहीं। तुम मायारानी की दिलजमई करा दो कि दारोगा साहब इस बारे में कुछ भी न बोलेंगे, तुम जो कुछ चाहो कर गुजरो, मगर साथ ही इसके इस बात का खयाल रखो कि सर्वसाधारण को किसी तरह का शक न होने पाये और लोग ये समझें कि गोपालसिंह अपनी मौत ही मरा है। मैं भी जहां तक हो सकेगा, छिपाने की कोशिश करूँगा।
मनोरमा--(खुश होकर) बस, अब मुझे पूरा विश्वास हो गया कि तुम मुझसे सच्चा प्रेम रखते हो।
इसके बाद दोनों में बहुत ही धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगीं, जिन्हें गिरिजाकुमार सुन न सका। गिरिजाकुमार चोरों की तरह उस मकान में घुस गया था और छिपकर ये बातें सुन रहा था। जब मनोरमा ने कमरे का दरवाजा बन्द कर लिया, तब वह कमन्द लगाकर मकान के पीछे की तरफ उतर गया और धीरे-धीरे मनोरमा के अस्तबल में जा पहुँचा। अबकी दफे दारोगा यहाँ रथ पर सवार होकर आया था, वह रथ अस्तबल में था, घोड़े बंधे हुए थे और सारथी रथ के अन्दर सो रहा था। इससे कुछ दूर पर मनोरमा के और सब साईस तथा घसियारे वगैरह पड़े खर्राटे ले रहे थे।
बहुत होशियारी से गिरिजाकुमार ने दारोगा के सारथी को बेहोशी की दवा सुंघाकर बेहोश किया और उठाकर बाग के एक कोने में घनी झाड़ी के अन्दर छिपाकर रख आया, उसके कपड़े पहन लिए और चुपचाप रथ के अन्दर घुसकर सो रहा।
जब रात घण्टा--भर के लगभग बाकी रह गई, तब दारोगा साहब जमानिया जाने के लिए बिदा हुए और एक लौंडी ने अस्तबल में आकर रथ जोतने की आज्ञा सुनाई। नये सारथी अर्थात् गिरिजाकुमार ने रथ जोतकर तैयार किया और फाटक पर लाकर दारोगा साहब का इन्तजार करने लगा। शराब के नशे में चूर झूमते हुए एक लौंडी का हाथ थामे हुए दारोगा साहब भी आ पहुंचे। उनके रथ पर सवार होने के साथ ही रथ तेजी के साथ रवाना हुआ। सुबह की ठण्ठी हवा ने दारोगा साहब के दिमाग में खुनकी पैदा कर दी और वे रथ के अन्दर लेटकर बेखबर सो गये। गिरिजाकुमार ने जिधर चाहा, घोड़ों का मुंह फेर दिया और दारोगा साहब को लेकर रवाना हो गया। इस तौर पर उसे सूरत बदलने की भी जरूरत न पड़ी।
नहीं कह सकते कि मनोरमा के बाग में दारोगा का असली सारथी जब होश में आया होगा तो वहाँ कैसी खलबली मची होगी, मगर गिरिजाकुमार को इस बात की कुछ भी परवाह न थी, उसने रथ को रोहतासगढ़ की सड़क पर रवाना किया और चलते-चलते अपने बटुए में से मसाला निकालकर अपनी सूरत साधारण ढंग पर बदल ली, जिसमें होश आने पर दारोगा उसकी सूरत से जानकार न हो सके। इसके बाद उसने तेज दवा सुंघाकर दारोगा को और भी बेहोश कर दिया।
जब रथ एक घने जंगल में पहुंचा और सुबह की सफेदी भी निकल आई, तब गिरिजाकुमार रथ को सड़क पर से हटाकर जंगल में ले आया, जहां सड़क पर चलने वाले मुसाफिरों की निगाह न पड़े। घोड़ों को खोल लम्बी बागडोर के सहारे एक पेड़ के साथ बाँध दिया और दारोगा को पीठ पर लाद वहाँ से थोड़ी दूर पर एक घनी झाड़ी के अन्दर ले गया, जिसके पास ही एक पानी का झरना भी बह रहा था। घोड़े की रास से दारोगा साहब को एक पेड़ के साथ बांध दिया और बेहोशी दूर करने की दवा सुंघाने के बाद थोड़ा पानी भी चेहरे पर डाला, जिसमें शराब का नशा ठण्डा हो जाये और तब हाथ में कोड़ा लेक र सामने खड़ा हो गया।
दारोगा साहब जब होश में आये तो बड़ी परेशानी के साथ चारों तरफ निगाह दौड़ाने लगे। अपने को मजबूर और एक अनजान आदमी को हाथ में कोड़ा लिए सामने खड़ा देख काँप उठे और बोले, "भाई, तुम कौन हो और मुझे इस तरह क्यों सता रखा है? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?"
गिरिजाकुमार--क्या करूँ, लाचार हूँ। मालिक का हुक्म ही ऐसा है।
दारोगा--तुम्हारा मालिक कौन है और उसने ऐसी आज्ञा तुम्हें क्यों दी?
गिरिजाकुमार--मैं मनोरमाजी का नौकर हूँ, और उन्होंने अपना काम ठीक करने के लिए मुझे ऐसी आज्ञा दी है।
दारोगा--(ताज्जुब से) तुम मनोरमा के नौकर हो! नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, मैं उसके सब नौकरों को अच्छी तरह पहचानता हूँ।
गिरिजाकुमार--मगर आप मुझे नहीं पहचानते, क्योंकि मैं गुप्त रीति पर उनका काम किया करता हूँ और उनके मकान पर बराबर नहीं रहता!
दारोगा--शायद ऐसा ही हो, मगर विश्वास नहीं होता। खैर, यह बताओ कि उन्होंने किस काम के लिए ऐसा करने को कहा है?
गिरिजाकुमार--आपको विश्वास हो चाहे न हो, इसके लिए मैं लाचार हूँ, हाँ, उनके हुक्म की तामील किए बिना नहीं रह सकता। उन्होंने मुझे यह कहा है कि "दारोगा साहब मायारानी के लिए इस बात की इजाजत दे गये हैं कि वह जिस तरह हो सके, राजा गोपालसिंह को मार डाले, हम इस मामले में कुछ दखल न देंगे, मगर यह बात वह नशे में कह गये हैं, कहीं ऐसा न हो कि भूल जायें। अतः जिस तरह हो सके, तुम इस बात की एक चिट्ठी उनसे लिखाकर मेरे पास आओ, जिसमें उन्हें अपना वादा अच्छी तरह याद रहे।" अब आप कृपाकर इस मजमून की एक चिट्ठी लिख दीजिये कि मैं गोपालसिंह को मार डालने के लिए मायारानी को इजाजत देता हूँ।
दारोगा--(ताज्जुब का चेहरा बनाकर) न मालूम तुम क्या कह रहे हो! मैंने मनोरमा से ऐसा कोई वादा नहीं किया!
गिरिजाकुमार--तो शायद मनोरमाजी ने मुझसे झूठ कहा होगा। मैं इस बात को तो नहीं जानता, हाँ, उन्होंने जो आज्ञा दी है सो आपसे कह रहा हूँ।
इतना सुनकर दारोगा कुछ सोच में पड़ गया। मालूम होता था कि उसे गिरिजाकुमार की बातों पर विश्वास हो रहा है, मगर फिर भी बात को टालना चाहता है।
दारोगा--मगर ताज्जुब है कि मनोरमा ने मेरे साथ बुरा ऐसा बर्ताव क्यों किय और उसे जो कुछ कहना था वह स्वयं मुझसे क्यों नहीं कहा?
गिरिजाकुमा--मैं इस बात का जवाब क्योंकर दे सकता हूँ?
दारोगा--अगर मैं तुम्हारे कहे मुताबिक चिट्ठी लिखकर न दूं तो?
गिरिजाकुमार--तब इस कोड़े से आपकी खबर ली जायेगी और जिस तरह हो सकेगा, आपसे चिट्ठी लिखाई जायेगी। आप खुद समझ सकते हैं कि यहाँ आपका कोई मददगार नहीं पहुंच सकता।
दारोगा--क्या तुमको या मनोरमा को इस बात का कुछ भी खयाल नहीं है कि चिट्ठी लिखकर भी छूट जाने के बाद मैं क्या कर सकता हूँ?
गिरिजाकुमार--अब ये सब बातें तो आप उन्हीं से पूछियेगा! मुझे जवाब देने की कोई जरूरत नहीं। मैं सिर्फ उनके हुक्म की तामील करना जानता हूँ। बताइए आप जल्दी चिट्ठी लिख देते हैं या नहीं, मैं ज्यादा देर तक इन्तजार नहीं कर सकता।
दारोगा--(झुंझलाकर और यह समझकर कि यह मुझ पर हाथ नहीं उठायेगा, केवल धमकाता है)अबे, मैं चिट्ठी किस बात की लिख दूं!तूनेयहव्यर्थ की बकवक लगा रखी है!
इतना सुनते ही गिरिजाकुमार ने कोड़े जमाने शुरू किए। पाँच-सात ही कोड़े खाकर दारोगा बिलबिला उठा और हाथ जोड़कर बोला, "बस-बस, माफ करो, जो कुछ कहो, मैं लिख देने को तैयार हूं!"
गिरिजाकुमार ने झट कलम-दवात और कागज अपने बटुए में से निकालकर दारोगा के सामने रख दिया और उसके हाथ की रस्सी ढीली कर दी। दारोगा ने उसकी इच्छानुसार चिट्ठी लिख दी। चिट्ठी को अपने कब्जे में कर लेने के बाद उसने दारोगा की तलाशी ली, कमर में खंजर और कुछ अशर्फियाँ निकलीं, वह भी ले लेने के बाद दारोगा के हाथ-पैर खोल दिए और बता दिया कि फलां जगह आपके रथ और घोड़े खड़े हैं, जाइए, सीधे कस-कसाकर अपने घर का रास्ता लीजिए।
इतना कहकर गिरिजाकुमार चला गया और फिर दारोगा को मालूम न हुआ कि वह कहाँ गया और क्या हुआ।
१२
इतना किस्सा कहकर दिलीपशाह ने दम लिया और फिर इस तरह कहना शुरू किया-
"गिरिजाकुमार ने अपना काम करके दारोगा का पीछा नहीं छोड़ा, बल्कि उसे यह जानने का शौक पैदा हुआ कि देखें, अब दारोगा साहब क्या करते हैं। जमानिया की तरफ विदा होते हैं, या पुनः मनोरमा के घर जाते हैं, या अगर मनोरमा के घर जाते हैं तो देखना चाहिए कि किस ढंग की बातें होती हैं और कैसी रंगत निकलती है।"
यद्यपि दारोगा का चित्त दुविधा में पड़ा हुआ था, परन्तु उसे इस बात का कुछ-कुछ विश्वास जरूर हो गया था कि मेरे साथ ऐसा खोटा बर्ताव मनोरमा ने ही किया है, दूसरे किसी को क्या मालूम है कि मुझमें उसमें किस समय क्या बातें हुई! मगर साथ ही इसके वह इस बात को भी जरूर सोचता था कि मनोरमा ने ऐसा क्यों किया? मैं तो कभी उसकी बात से किसी तरह इनकार नहीं करता था। जो कुछ भी उसने कहा, उस बात की इजाजत तुरन्त दे दी, अगर वह चिट्ठी लिख देने के लिए कहती तो चिट्ठी भी लिख देता, फिर उसने ऐसा क्यों किया ..?
खैर, जो कुछ भी हो, दारोगा साहब अपने हाथ से रथ जोतकर सवार हुए और भनोरमा के पास न जाकर सीधे जमानिया की तरफ रवाना हो गये। यह देखकर गिरिजाकुमार ने उस समय उनका पीछा छोड़ दिया और मेरे पास चला आया। जो कुछ मामला हुआ था, खुलासा बयान करने के बाद दारोगा साहब की लिखी हुई चिट्ठी दी और फिर मुझसे विदा होकर जमानिया की तरफ चला गया।
मुझे यह जानकर हौल-सी पैदा हो गई कि बेचारे गोपालसिंह की जान मुफ्त ही जाना चाहती है। मैं सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए, जिसमें गोपालसिंह की जान बचे। एक दिन और रात तो इसी सोच में पड़ा रह गया और अन्त में यह निश्चय किया कि इन्द्रदेव से मिलकर यह सब हाल कहना चाहिए। दूसरा दिन मुझे घर का इन्तजाम करने में लग गया, क्योंकि दारोगा की दुश्मनी के खयाल से मुझे घर की हिफाजत का पूरा-पूरा इन्तजाम करके ही तब बाहर जाना जरूरी था, अतः मैंने अपनी स्त्री और बच्चे को गुप्त रीति से अपनी ससुराल अर्थात् स्त्री के माँ-धाप के घर पहुंचा दिया और उन लोगों को जो कुछ समझाना था, सो भी समया दिया। इसके बाद घर का इन्तजाम करके इन्द्रदेव की तरफ रवाना हुआ।
जब इन्द्रदेव के मकान पर पहुंचा तो देखा कि वे सफर की तैयारी कर रहे हैं। पूछने पर जवाब मिला कि गोपालसिंह बीमार हो गये हैं, उन्हें देखने के लिए ही जाते हैं। सुनने के साथ ही मेरा दिल धड़क उठा और मेरे मुंह से ये शब्द निकल पड़े-"हाय, अफसोस! कम्बख्त दुश्मन लोग अपना काम कर गये!"
मेरी बात सुनकर इन्द्रदेव चौंक पड़े और उन्होंने पूछा, "आपने 'यह क्या कहा?" दो-चार खिदमतगार वहां मौजूद थे। उन्हें बिदा करके मैंने गिरिजाकुमार का सब हाल इन्द्रदेव से बयान किया और दारोगा साहब की लिखी हुई वह चिट्ठी उनके हाथ पर रख दी। उसे देखकर और सब हाल सुनकर इन्द्रदेव बेचैन हो गए, आधे घण्टे तक तो ऐसा मालूम होता था कि उन्हें तन-बदन की सुध नहीं है इसके बाद उन्होंने अपने को सम्हाला और मुझसे कहा-"बेशक, दुश्मन लोग अपना काम कर गए, मगर तुमने भी बहुत बड़ी भूल की, कि दो दिन की देर कर दी और आज मेरे पास खबर करने के लिए आये! अभी दो ही घड़ी बीती हैं कि मुझे उनके बीमार होने की खबर मिली है, ईश्वर ही कुशल करें!"
इसके जवाब में चुप रह जाने के सिवाय मैं कुछ भी न बोल सका और अपनी भूल स्वीकार कर ली। कुछ और बातचीत होने के बाद इन्द्रदेव ने मुझसे कहा, "खैर, जो कुछ होना था सो हो गया, अब तुम भी मेरे साथ जमानिया चलो, वहाँ पहुँचने तक अगर ईश्वर कुशल रखी तो जिस तरह बन पड़ेगा, उनकी जान बचायेंगे!"
अतः हम दोनों आदमी तेज घोड़ों पर सवार होकर जमानिया की तरफ रवाना हो गये और साथियों को पीछे से आने की ताकीद कर गए।
जब हम लोग जमानिया के करीब पहुँचे और जमानिया सिर्फ दो कोस की दूरी पर रह गया तो सामने से कई देहाती आदमी रोते और चिल्लाते हुए आते दिखाई पड़े। हम लोगों ने घबराकर रोने का सबब पूछा तो उन्होंने हिचकियाँ लेकर कहा कि हमारे राजा गोपालसिंह हम लोगों को छोड़कर बैकुण्ठ चले गये।
सुनने के बाद हम लोगों का कलेजा धक् हो गया। आगे बढ़ने की हिम्मत न पड़ी और सड़क के किनारे एक घने पेड़ के नीचे जाकर घोड़ों पर से उतर पड़े। दोनों घोड़ों को पेड़ के साथ बांध दिया और जीनपोश बिछाकर बैठ गये, आँखों से आंसू की धारा बहने लगी। घण्टे भर तक हम दोनों में किसी तरह की बातचीत न हुई, क्योंकि चित्त बड़ा ही दुःखी हो गया था। उस समय दिन अनुमान तीन घण्टे के करीब बाकी था। हम दोनों आदमी पेड़ के नीचे बैठे आंसू बहा रहे थे कि यकायक जमानिया से लौटता हुआ गिरिजाकुमार भी उसी जगह आ पहुँचा। उस समय उसकी सूरत बदली हुई थी, इसलिए हम लोगों ने तो नहीं पहचाना, परन्तु वह हम लोगों को देखकर स्वयं पास चला आया और अपना गुप्त परिचय देकर बोला, "मैं गिरिजाकुमारहूँ।"
इन्द्रदेव--(आँसू पोंछकर) अच्छे मौके परतुम आ पहुँचे। यह बताओ कि क्या वास्तव में राजा गोपालसिंह मर गये?
गिरिजाकुमार--जी हाँ, उनकी चिता मेरे सामने लगाई गई और देखते-हीदेखते उनकी लाश पंचतत्व में मिल गई, परन्तु अभी तक मेरे दिल को विश्वास नहीं होता कि राजा साहब मर गये।
इन्द्रदेव--(चौंककर) सो क्यों? यह कैसी बात?
गिरिजाकुमार--जी हाँ, हर तरह का रंग-ढंग देखकर मेरा दिल यह कबूल नहीं करता कि वे मर गये।
-क्या तुम्हारी तरह वहाँ और भी किसी को इस बात का शक है?
गिरिजाकुमार--नहीं, ऐसा तो नहीं मालूम होता, बल्कि मैं तो समझता हूँ कि खास दारोगा साहब को भी उनके मरने का विश्वास है, मगर क्या किया जाये. मुझे विश्वास नहीं होता और दिल बार-बार यही कहता है कि राजा साहब मरे नहीं।
इन्द्रदेव--आखिर, तुम क्या सोचते हो और इस बात का तुम्हारे पास क्या सबूत है? तुमने कौन-सी ऐसी बात देखी, जिससे तुम्हारे दिल को अभी तक उनके मरने का विश्वास नहीं होता?
गिरिजाकुमार--और बातों के अतिरिक्त दो बातें तो बहुत ही ज्यादा शक पैदा करती हैं। एक तो यह है कि कल दो घण्टे रात रहते मैंने हरनामसिंह और बिहारीसिंह को एक कॅगले की लाश उठाये हुए चोर दरवाजे की राह से महल के अन्दर जाते हुए देखा, फिर बहुत टोह लेने पर भी लाश का कुछ पता न लगा और न वह लाश लौटाकर महल के बाहर ही निकाली गई, तो क्या वह महल ही में हजम हो गई? उसके बाद केवल राजा साहब की लाश बाहर निकली।
इन्द्रदेव--जरूर, यह शक करने की जगह है।
गिरिजाकुमार--इसके अतिरिक्त राजा गोपालसिंह की लाश को बाहर निकालने और जलाने में हद दर्जे की फुर्ती और जल्दबाजी की गई, यहाँ तक कि रियासत के उमरा लोगों के भी इकट्ठा होने का इन्तजार नहीं किया गया। एक साधारण आदमी के लिए भी इतनी जल्दी नहीं की जाती, वे तो राजा ही ठहरे! हां, एक बात और भी सोचने लायक है। चिता पर नियम के विरुद्ध लाश का मुंह खोले बिना ही क्रिया कर दी गई और इस बारे में बिहारीसिंह और हरनामसिंह तथा लौंडियों ने यह बहाना किया कि "राजा साहब की सूरत देख मायारानी बहुत बेहाल हो जायेंगी, इसलिए मुर्दे का मुंह खोलने की कोई जरूरत नहीं।" और लोगों ने इन बातों पर खयाल किया हो चाहे न किया हो, मगर मेरे दिल पर तो इन वातों ने बहुत बड़ा असर किया और यही सबब है कि मुझे राजा साहब के मरने का विश्वास नहीं होता।
इन्द्रदेव--(कुछ सोचकर) शक तो तुम्हारा बहुत ठीक है, अच्छा यह बताओ कि तुम इस समय कहाँ जा रहे थे?
गिरिजाकुमार--(मेरी तरफ इशारा करके) गुरुजी के पास यही सब हाल कहने के लिए जा रहा था।
मैं--इस समय मनोरमा कहाँ है सो बताओ!
गिरिजाकुमार--जमानिया में मायारानी के पास है। मैं तुम्हारे हाथ से छूटने के बाद दारोगा और मनोरमा में कैसी निपटी इसका कुछ हाल मालूम हुआ?
गिरिजाकुरार--जी हाँ, मालूम हुआ। उस बारे में बहुत बड़ी दिल्लगी हुई जो मैं निश्चिन्ती के साथ बयान करूंगा।
इन्द्रदेव--अच्छा, यह तो बताओ कि गोपालसिंह के बारे में तुम्हारी क्या राय है और अब हम लोगों को क्या करना चाहिए?
गिरिजाकुमार--इस बारे में मैं एक अदना और नादान आदमी आपको क्या राय दे सकता हूँ! हाँ, मुझे जो कुछ आज्ञा हो सो करने के लिए जरूर तैयार हूँ।
इतनी बातें हो ही रही थी कि सामने जमानिया की तरफ से दारोगा और जयपाल घोड़ों पर सवार आते हुए दिखाई पड़े, जिन्हें देखते ही गिरिजाकुमार ने कहा, "देखिए, ये दोनों शैतान कहीं जा रहे हैं, इसमें भी कोई भेद जरूर है, यदि आज्ञा हो तो मैं इनके पीछे जाऊँ।"
दारोगा और जयपाल को देखकर हम दोनों पेड़ की तरफ घूम गये, जिसमें वे हमें पहचान न सकें। जब वे आगे निकल गए, तब मैंने अपना घोड़ा गिरिजाकुमार को देकर कहा, "तुम जल्द सवार होकर इन दोनों का पीछा करो।" और गिरिजाकुमारने ऐसा ही किया।