चन्द्रकान्ता सन्तति
चौदहवाँ भाग
धन्नूसिंह की बातों ने शिवदत्त और कल्याणसिंह को ऐसा बदहवास कर दिया कि उन्हें बात करना मुश्किल हो गया। शिवदत्त सोच रहा था कि कुछ देर की सच्ची मोहलत मिले तो मनोरमा से उसकी बहिन का हाल पूछे, मगर उसी समय घबराई हुई मनोरमा खुद ही वहाँ आ पहुंची और उसने जो कुछ कहा वह और भी परेशान करने वाली बात थी। आखिर शिवदत्त ने मनोरमा से पूछा, "क्या तुमने अपनी आँखों से भूतनाथ को देखा?"
मनोरमा हाँ,--मैंने स्वयं देखा और उसने वह बात मुझी से कही थी जो मैं आप से कह चुकी हूँ?
शिवदत्त--क्या वह तुम्हारी पालकी के पास आया था?
मनोरमा--हाँ, मैं माधवी से बातें कर रही थी कि वह निडर होकर हम लोगों के पास आ पहुँचा और धमका कर चला गया।
शिवदत्त–-तो तुमने आदमियों को ललकारा क्यों नहीं?
मनोरमा--आप भूतनाथ को नहीं जानते कि वह कैसा भयानक आदमी है? क्या वे तीन-चार आदमी भूतनाथ को गिरफ्तार कर लेते जो मेरी पालकी के पास थे?
शिवदत्त--ठीक है, वह बड़ा ही भयानक ऐयार है, दो-चार क्या, दस-पाँच आदमी भी उसे गिरफ्तार नहीं कर सकते। मैं तो उसके नाम से कांप जाता हूँ। ओफ, वह समय मुझे कदापि नहीं भूल सकता जब उसने 'रूहा' बनकर मुझे अपने चंगुल में फंसा लिया था, अपने चेले को भीमसेन की सूरत में ऐसा बनाया कि मैं भी पहचान ही न सका। मगर बड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज वह असली सूरत में तुम्हें दिखाई पड़ा। उसका इस तरह चले आना मामूली बात नहीं है।
मनोरमा--जितना मैं उसका हाल जानती हूँ आप उसका सोलहवां हिस्सा भी
न जानते होंगे, और यही सबब है कि इस समय डर के मारे मेरा कलेजा काँप रहा है, फिर जहाँ तक मैं खयाल करती हूँ वह अकेला भी नहीं है।
शिवदत्त--नहीं-नहीं, वह अकेला कदापि न होगा। (धन्नूसिंह की तरफ इशारा करके) इसने भी एक ऐसी ही भयानक खबर मुझे सुनाई है।
मनोरमा--(ताज्जुब से) वह क्या?
शिवदत्त--इसका हाल धन्नूसिंह की जुबानी ही सुनना ठीक होगा। (धन्नूतिह से) हाँ, तुम जरा उन बातों को दोहरा तो जाओ!
धन्नूसिंह--बहुत खूब।
इतना कहकर धन्नूसिंह उन वातों को ऐसे ढंग से दोहरा गया कि मनोरमा का कलेजा कांप उठा और शिवदत्त तथा कल्याणसिंह पर पहले से भी ज्यादा असर पड़ा।
शिवदत्त--(मनोरमा से) क्या वास्तव में वह तुम्हारी बहिन है?
मनोरमा--राम-राम, ऐसी भयानक राक्षसी मेरी बहिन हो सकती है? असल वात तो यह है कि मैं अकेली हूँ, मेरी न कोई बहिन है, न भाई।
धन्नूसिंह--तब जरा खड़े-खड़े उसके पास चली चलो और जो कुछ वह पूछे, उसका जवाब दे दो।
मनोरमा--(रंज होकर) मैं क्यों उसके पास जाने लगी! जाकर कह दो कि मनोरमा नहीं आती।
धन्नूसिंह--(खैरखाही दिखाने के ढंग से) मालूम होता है कि तुम अपने साथ ही साथ हमारे मालिक पर भी आफत लाना चाहती हो। (शिवदत्त से) महाराज, राक्षसी ने जितनी बातें मुझसे कहीं मैं अदब के खयाल से अर्ज नहीं कर सकता, तथापि एक बात केवल आप ही से कहने की इच्छा है।
धन्नूसिंह की बात सुनकर मनोरमा को डर के साथ ही साथ क्रोध भी चढ़ आया और वह कड़ी निगाह से धन्नू सिंह की तरफ देखकर बोली, "महाराज के खैरखाह एक तुम्हीं तो दिखाई देते हो! इतनी बड़ी फौज की अफसरी करने के लिए क्यों मरे जाते हो जो एक औरत के सामने जाने की हिम्मत नहीं है?"
धन्नूसिंह--मेरी हिम्मत तो लाखों आदमियों के बीच घुसकर तलवार चलाने की है, मगर केवल तुम्हारे सबब से अपने मालिक पर आफत लाने और अपनी जान देने का हौसला कोई बेवकूफ आदमी भी नहीं कर सकता। (शिवदत्त से)तिस पर भी महाराज जो। आज्ञा दें उसे करने के लिए मैं तैयार हूँ। यदि आग में कूद पड़ने के लिए भी कहें तो क्षणभर देर लगाने पर लानत भेजता हूँ, परन्तु मेरी बात सुनकर तब जो चाहें आज्ञा दें!
इतना सुनकर शिवदत्त उठ खड़ा हुआ और धन्नू सिंह को अपने पीछे आने का इशारा करके दूर चला गया जहाँ से उनकी बातचीत कोई दूसरा नहीं सुन सकता था।
शिवदत्त-–हाँ धन्नूसिंह, अब कहो, क्या कहते हो?
धन्नूसिंह--महाराज क्षमा करें, रंज न हों! मैं सरकार का नमकख्वार गुलाम हूँ इसलिए सिवाय सरकार की भलाई के मुझे और कुछ मैं यह नहीं चाहता मनोरमा के सबब से, जो आपकी कुछ भी भलाई नहीं कर सकती, बल्कि आपके सबब से अपने को फायदा पहुंचा सकती है, आप किसी आफत में फंस जायें। मैं सच कहता हूँ, कि वह भयानक औरत साधारण नहीं मालूम होती। उसने कसम खाकर कहा था कि "मैं केवल एक पहर तक राजा शिवदत्त का मुलाहिजा करूँगी, इसके अन्दर अगर मनोरमा मेरे पास न भेजी जायगी या अलग न कर दी जायगी तो राजा शिवदत को इस दुनिया से उठा दूंगी और अपने कुत्तों को जो आदमी के खून के हरदम प्यासे रहते हैं...!" बस महाराज, अब आगे कहने से अदब जबान रोकती है। (कांपकर) ओफ वे भयानक कुत्ते जो शेर का कलेजा फाड़कर खा जायें! (रुककर) फिर मनोरमा की जुबानी भी आप सुन ही चुके हैं कि भूतनाथ यकायक यहाँ पहुँचकर मनोरमा से क्या कह गया है, इसलिए (हाथ जोड़कर) मैं अर्ज करता हूँ कि किसी भी बहाने मनोरमा को अपने से अलग कर दें। सरकार खूब समझते हैं कि जिस काम के लिए जा रहे हैं उसमें सिवाय कुंअर कल्याणसिंह के और कोई भी मदद नहीं कर सकता, फिर एक मामूली औरत के लिए अपना हर्ज या नुकसान करना उचित नहीं, आगे महाराज मालिक हैं जो चाहें करें।
शिवदत्त--तुम्हारा कहना बहुत ठीक है, मैं भी यही सोच रहा हूँ।
जिस जगह खड़े होकर ये दोनों बातें कर रहे थे, वहाँ एकदम निराला था, कोई आदमी पास न था। शिवदत्त ने अपनी बात पूरी भी न थी कि यकायक भूतनाथ वहाँ आ पहुँचा और कड़ाई के ढंग से शिवदत्त की तरफ देखकर बोला, "इस अँधेरे में शायद तुम मुझे न पहचान सको इसलिए मैं अपना नाम भूतनाथ बताकर तुम्हें होशियार करता हूँ कि घण्टे भर के अन्दर मेरी खूराक मनोरमा को मेरे हवाले करो या अपने साथ से अलग कर दो, नहीं तो जीता न छोड़ें गा! इतना कहकर बिना कुछ जवाब सुने भूतनाथ वहाँ से चला गया और शिवदत्त उसकी तरफ देखता ही रह गया।
शिवदत्त एक दफे भूतनाथ के हाथ में पड़ चुका था और भूतनाथ ने जो सलूक उसके साथ किया था उसे वह कदापि भूल नहीं सकता था बल्कि भूतनाथ के नाम ही से उसका कलेजा काँपता था, इसलिए वहाँ यकायक भूतनाथ के आ पहुंचने से वह कांप उठा और धन्नूसिंह की तरफ देखकर बोला, "निःसन्देह यह बड़ा ही भयानक ऐयार है!"
धन्नूसिंह--इसीलिए मैं अर्ज करता हूँ कि एक साधारण औरत के लिए इस भयानक ऐयार और उस राक्षसी को अपना दुश्मन बना लेना उचित नहीं है।
शिवदत्त--तुम ठीक कहते हो, अच्छा आओ मैं कल्याणसिंह से राय मिलाकर इसका बन्दोबस्त करता हूँ।
धन्नूसिंह को साथ लिए हुए शिवदत्त अपने ठिकाने पहुंचा जहाँ कल्याणसिंह और मनोरमा को छोड़ गया था। मनोरमा को यह कहकर वहाँ से बिदा कर दिया कि--'तुम अपने ठिकाने जाकर बैठो, हम यहाँ से कूच करने का बन्दोबस्त करते हैं और निश्चय हो जाने पर तुमको बुलावेंगे' और जब वह चली गई और वहाँ केवल ये ही तीन आदमी रह गये तव बातचीत होने लगी।
शिवदत्त ने धन्नूसिंह की जुबानी जो कुछ सुना था और धन्नूसिंह की जो कुछ राय हुई थी वह सब तथा बातचीत के समय यकायक भूतनाथ के आ पहुँचने और धमकाकर चले जाने का पूरा हाल कल्याणसिंह से कहा और पूछा कि--अब आपकी क्या राय होती है?' कुंअर कल्याणसिंह ने कहा, "मैं धन्नूसिंह की राय पसन्द करता हूँ। मनोरमा के लिए अपने को आफत में फंसाना बुद्धिमानी का काम नहीं है, अस्तु किसी मुनासिब ढंग से उसे अलग ही कर देना चाहिए।"
शिवदत्त--तिस पर भी अगर जान बचे तो समझें कि ईश्वर की बड़ी कृपा हुई।
कल्याणसिंह--सो क्या?
शिवदत्त--मैं यह सोच रहा हूँ कि भूतनाथ का यहां आना केवल मनोरमा ही के लिए नहीं है। ताज्जुब नहीं कि हम लोगों का कुछ भेद भी उसे मालूम हो और वह हमारे काम में बाधा डाले।
कल्याणसिंह--ठीक है, मगर काम आधा हो चुका है, केवल हमारे और आपके वहां पहुंचने भर की देर है। यदि भूतनाथ हम लोगों का पीछा भी करेगा तो रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर हमारी मर्जी के बिना वह कदापि नहीं जा सकता और जब तक वह मनोरमा को ले जाकर कहीं रखने या अपना कोई काम निकालने का बन्दोबस्त करेगा तब तक तो हम लोग रोहतासगढ़ में पहुँचकर जो कुछ करना है, कर गुजरेंगे।
शिवदत्त--ईश्वर करे ऐसा ही हो, अच्छा अब यह कहिये कि मनोरमा को किस ढंग से अलग करना चाहिए?
कल्याणसिंह--(धन्नूसिंह से) तुम बहुत पुराने और तजुर्बेकार आदमी हो, तुम ही बताओ कि क्या करना चाहिए?
धन्नूसिंह–-मेरी तो यही राय है कि मनोरमा को बुलाकर समझा दिया जाय कि 'अगर तुम हमारे साथ रहोगी तो भूतनाथ तुम्हें कदापि न छोड़ेगा, सो तुम मर्दानी पोशाक पहनकर धन्नूसिंह के (हमारे) साथ शिवदत्तगढ़ की तरफ चली जाओ, वह तुम्हें हिफाजत के साथ वहाँ पहुँचा देगा, जब हम लौटकर तुमसे मिलेंगे तो जैसा होगा, किया जायेगा। अगर तुम अपने आदमियों को साथ ले जाना चाहोगी तो भूतनाथ को मालूम हो जायेगा अतएव तुम्हारा अकेला ही यहाँ से निकल जाना उत्तम है।"
शिवदत्त--ठीक है लेकिन अगर इस बात को मंजूर कर ले तो क्या तुम भी उसी के साथ जाओगे? तब तो हमारा बड़ा हर्ज होगा!
धन्नू--जी नहीं, मैं चार-पांच कोस तंक उसके साथ चला जाऊंगा, इसके बाद भुलावा देकर उसे छोड़ आपसे आ मिलूंगा।
शिवदत्त--(आश्चर्य से)धन्नूसिंह, क्या तुम्हारी अक्ल में कुछ फर्क पड़ गया है या तुम्हें निसयान (भूल जाने) की बीमारी हो गई है अथवा तुम कोई दूसरे धन्नूसिंह हो गए हो? क्या तुम नहीं जानते कि मनोरमा ने मुझे किस तरह से रुपये की मदद की है और उसके पास कितनी दौलत है? तुम्हारी मार्फत मनोरमा से कितने ही रुपये मँगवाये थे? तो क्या इस हीरे की चिड़िया को मैं छोड़ सकता हूँ? अगर मुझे ऐसा ही करना होता तो तरदुद की जरूरत ही क्या थी, इसी समय कह देते कि हमारे यहाँ से निकल जा!
धन्नूसिंह--(कुछ सोचकर) आपका कहना ठीक है, मैं इन बातों को भूल नहीं गया, मैं खूब जानता हूँ कि वह बेइन्तहा खजाने की चाभी है, मगर मैंने यह बात इसलिए कही कि जब उसके सबब से हमारे सरकार ही आफत में फंस जायेंगे, तो वह हीरे की चिड़िया किसके काम आवेगी!
शिवदत्त--नही-नहीं, तुम इसके सिवाय कोई और तरकीब ऐसी सोचो जिसमें मनोरमा इस समय हमारे साथ से अलग तो जरूर हो जाये, मगर हमारी मुट्ठी से न निकल जाये।
धन्नूसिंह--(सोचकर) अच्छा, तो एक काम किया जाये।
शिवदत्त--वह क्या?
धन्नूसिंह--इसे तो आप निश्चय जानिये कि यदि मनोरमा इस लश्कर से साथ रहेगी तो भूतनाथ के हाथ से कदापि न बचेगी और जैसा कि भूतनाथ कह चुका है वह सरकार के साथ भी बेअदबी जरूर करेगा, इसलिए यह तो अवश्य है कि उसे अलग जरूर किया जाये मगर वह रहे अपने कब्जे ही में। तो बेहतर होगा कि वह मेरे साथ की जाये, मैं जंगल-ही-जंगल एक गुप्त पगडण्डी से जिसे मैं बखूबी जानता हूं रोहतासगढ़ तक उसे ले जाऊँ और जहाँ आप या कुंअर साहब आज्ञा दें ठहरकर राह देखू। भूतनाथ को जब मालूम हो जायेगा कि मनोरमा अलग कर दी गई तब वह उसके खोजने की धुन में लगेगा, मगर मुझे नहीं पा सकता। हाँ, एक बात और है, आप भी यहाँ से शीघ्र ही डेरा उठायें और मनोरमा की पालकी इसी जगह छोड़ दें, जिससे मनोरमा को अलग कर देने का विश्वास भूतनाथ को पूरा-पूरा हो जाये।
कल्याण--हाँ, यह राय बहुत अच्छी है, मैं इसे पसन्द करता हूं।
शिवदत्त--मुझे भी पसन्द है, मगर धन्नूसिंह को टिककर राह देखने का ठिकाना बताना आप ही का काम है।
कल्याण--हाँ-हाँ, मैं बताता हूँ, सुनो धन्नूसिंह!
धन्नूसिंह--जी सरकार!
कल्याण--रोहतासगढ़ पहाड़ी के पूरब की तरफ एक बहुत बड़ा कुआँ है और उस पर एक टूटी-फूटी इमारत भी है।
धन्नू सिंह--जी हाँ, मुझे मालूम है!
कल्याण--अच्छा तो अगर तुम उस कुएँ पर खड़े होकर पहाड़ की तरफ देखोगे तो टीले का ढंग का एक खण्ड पर्वत दिखाई देगा, जिसके ऊपर सूखा हुआ पुराना पीपल का पेड़ है और उसी पेड़ के नीचे एक खोह का मुहाना है। उसी जगह तुम हम लोगों का इन्तजार करना क्योंकि उसी खोह की राह से हम लोग रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर घुसेंगे, मगर उस झील तक पहुंचने का रास्ता जब तक हम न बतावें, तुम वहां नहीं जा सकते। (शिवदत्त से) आप मनोरमा को बुलवाकर सब हाल कहिये। अगर वह मंजूर करे तो हम धन्नूसिंह को रास्ते का हाल समझा दें।
शिवदत्त--(धन्नूसिंह से) तुम ही जाकर उसे बुला लाओ।
"बहुत अच्छा" कहकर धन्नू सिंह चला गया और थोड़ी ही देर में मनोरमा को साथ लिये हुआ आ पहुँचा। उसके विषय में जो कुछ राय हो चुकी थी, उसे कल्याणसिंह ने ऐसे ढंग से मनोरमा को समझाया कि उसने कबूल कर लिया और धन्नूसिंह के साथ चले जाना ही अच्छा समझा। कुंअर कल्याणसिंह ने उस ठीले तक पहुँचने का रास्ता धन्नूसिंह को अच्छी तरह समझा दिया। दो घोड़े चुपचुपाते ही तैयार किये गये, मनोरमा ने मर्दानी पोशाक पालकी के अन्दर बैठकर पहनी और घोड़े पर सवार हो धन्नूसिंह से साथ रवाना हो गई। धन्नूसिंह की सवारी का घोड़ा बनिस्बत मनोरमा के घोड़े से तेज और ताकतवर था।
२
मनोरमा और धन्नूसिंह घोड़ों पर सवार होकर तेजी के साथ वहाँ से रवाना हुए और चार कोस तक बिना कुछ बातचीत किए चले आए। जब ये दोनों एक ऐसे मैदान में पहुंचे जहां बीचोंबीच में एक बहुत बड़ा आम का पेड़ और उसके चारों तरफ आधा कोस का मैदान साफ था यहाँ तक कि सरपत, जंगली बेर या पलास का भी कोई पेड़ न था जिसका होना जंगल या जंगल के आसपास आवश्यक समझा जाता है, तब धन्नू सिंह ने अपने घोड़े का मुंह उसी आम के पेड़ की तरफ यह कहके फेरा--'मेरे पेट में कुछ दर्द हो रहा है इसलिए थोड़ी देर तक इस पेड़ के नीचे ठहरने की इच्छा होती है।"
मनोरमा--ठहर तो जाओ, मगर खौफ है कि कहीं भूतनाथ न आ पहुँचे।
धन्नूसिंह--अब भूतनाथ के आने की आशा छोड़ो क्योंकि जिस राह से हम लोग आये हैं वह भूतनाथ को कदापि मालूम न होगी। मगर मनोरमा, तुम तो भूतनाथ से इतना डरती हो कि
मनोरमा--(बात काटकर) भूतनाथ निःसन्देह ऐसा ही भयानक ऐयार है। पर थोड़े ही दिन की बात है कि जिस तरह आज मैं भूतनाथ से डरती हूँ उससे ज्यादा भूतनाथ मुझसे डरता था।
धन्नूसिंह--हाँ, जब तक उसके कागजात तुम्हारे या नागर के कब्जे में थे!
मनोरमा--(चौंककर, ताज्जुब से) क्या यह हाल तुमको मालूम है?
धन्नूसिंह--हाँ, बहुत अच्छी तरह।
मनोरमा--सो कैसे?
इतने ही में वे दोनों उस पेड़ के नीचे पहुँच गये और धन्नूसिंह यह कहकर घोड़े से नीचे उतर गया कि 'अब जरा बैठ जायें तो कहें।'
मनोरमा भी घोड़े से नीचे उतर पड़ी। दोनों घोड़े लम्बी बागडोर के सहारे पेड़ के साथ बांध दिए और जीनपोश बिछाकर दोनों आदमी जमीन पर बैठ गये। रात आधी से ज्यादा जा चुकी थी और चन्द्रमा की विमल चांदनी, जिसका थोड़ी ही देर पहले कहीं नाम-निशान भी न था, बड़ी खूबी के साथ चारों तरफ फैल रही थी।
मनोरमा हाँ, अब बताओ कि भूतनाथ के कागजात का हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ?
धन्नूसिंह--मैंने भूतनाथ की ही जुबानी सुना था।
मनोरमा--हैं! क्या तुमसे और भूतनाथ से जान-पहचान है?
धन्नूसिंह--बहुत अच्छी तरह।
मनोरमा--तो भूतनाथ ने तुमसे यह भी कहा होगा कि उसने अपने कागजात नागर के हाथ से कैसे पाये!
धन्नूसिंह--हाँ, भूतनाथ ने मुझसे वह किस्सा भी बयान किया था, क्या तुमको वह हाल मालूम नहीं हुआ?
मनोरमा–-मुझे वह हाल कैसे मालूम होता? मैं तो मुद्दत तक कमलिनी के कैदखाने में सड़ती रही और जब वहाँ से छूटी तो दूसरे ही फेर में पड़ गई। मगर तुम जब वह सब हाल जानते ही हो तो फिर जान-बूझकर ऐसा सवाल क्यों करते हो?
धन्नूसिंह--ओफ, पेट का दर्द ज्यादा होता जा रहा है! जरा देर ठहरो तो मैं तुम्हारी बातों का जवाब दूं।
इतना कहकर धन्नूसिंह चुप हो गया और घण्टे भर से ज्यादा देर तक बातों का सिलसिला बन्द रहा। धन्नूसिंह यद्यपि इतनी देर तक चुप रहा मगर बैठा ही रहा और मनोरमा की तरफ से इस तरह होशियार और चौकन्ना रहा जैसे किसी दुश्मन की तरफ से होना वाजिब था। साथ ही इसके धन्नूसिंह की निगाह मैदान की तरफ भी इस ढंग से पड़ती रही जैसे किसी के आने की उम्मीद हो। मनोरमा उसके इस ढंग पर आश्चर्य कर रही थी। यकायक उस मैदान में दो आदमी बड़ी तेजी के साथ दौड़ते हुए उसी तरफ आते दिखाई पड़े जिधर मनोरमा और धन्नूसिंह का डेरा जमा हुआ।
मनोरमा--ये दोनों कौन हैं जो इस तरफ आ रहे हैं?
धन्नूसिंह--यही बात मैं तुमसे पूछना चाहता था मगर जब तुमने पूछ ही लिया तो कहना पड़ा कि इन दोनों में एक तो भूतनाथ है।
मनोरमा—क्या तुम मुझसे दिल्लगी कर रहे हो?
धन्नूसिंह--नहीं, कदापि नहीं।
मनोरमा--तो फिर ऐसी बात क्यों कहते हो?
धन्नू सिंह--इसलिए कि मैं वास्तव में धन्नूसिंह नहीं हूँ।
मनोरमा,--(चौंककर) तब तुम कौन हो?
धन्नूसिंह--भूतनाथ का दोस्त और इन्द्रदेव का ऐयार सरयूसिंह।
इतना सुनते ही मनोरमा का रंग बदल गया और उसने बड़ी फुती से अपना दाहिना हाथ सरयू सिंह की तरफ बढ़ाया, मगर सरयूसिंह पहले ही से होशियार और चौकन्ना था, उसने चालाकी से मनोरमा की कलाई पकड़ ली।
मनोरमा की उँगली में उसी तरह के जहरीले नगीने वाली अंगूठी थी, जैसी कि नागर की उँगली में थी और जिसने भूतनाथ को मजबूर कर दिया था तथा जिसका हाल इस उपन्यास के सातवें भाग में हम लिख आये हैं। उसी अंगूठी से मनोरमा ने नकली धन्नूसिंह को मारना चाहा मगर न हो सका, क्योंकि उसने मनोरमा की कलाई पकड़ ली और उसी समय भूतनाथ और सरयूसिंह का शागिर्द भी वहाँ आ पहुंचे। अब मनोरमा ने अपने को काल में मुंह में समझा और वह इतनी डरी कि जो उन ऐयारों ने कहा बेउज करने के लिए तैयार हो गई।
भूतनाथ के हाथ से क्षमा-प्रार्थना की सहायता छूटने की आशा मनोरमा को कुछ भी न थी, इसीलिए जब तक भूतनाथ ने उससे किसी तरह का सवाल न किया वह भी कुछ न बोली और बेउज्र हाथ-पैर बंधवाकर कैदियों की तरह मजबूर हो गई। इसके बाद भूतनाथ तथा सरयू सिंह में यों बातचीत होने लगी-
भूतनाथ--अब क्या करना होगा?
सरयू सिंह--अब यही करना होगा कि तुम इसे अपने घोड़े पर सवार करा के घर ले जाओ और हिफाजत के साथ रखकर शीघ्र लौट जाओ।
भूतनाथ--और उस धन्नूसिंह के बारे में क्या किया जाये जिसे आप गिरफ्तार करने के बाद बेहोश करके डाल आए हैं?
सरयूसिंह--(कुछ सोचकर) अभी उसे अपने कब्जे ही में रखना चाहिए क्योंकि मैं धन्नूसिंह की सुरत में राजा शिवदत्त के साथ रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर जाकर इन दुष्टों की चालबाजियों को जहाँ तक हो सके, बिगाड़ना चाहता हूँ। ऐसी अवस्था में अगर वह छूट जायेगा तो केवल काम ही नहीं बिगड़ेगा, बल्कि मैं खुद आफत में फंस जाऊँगा यदि शिवदत्त के साथ रोहतासगढ़ के तहखाने में जाने का साहस करूँगा।
इसके बाद सरयूसिंह ने भूतनाथ से वे बातें कहीं जो उससे शिवदत्त तथा कल्याणसिंह से हुई थीं और जो हम ऊपर लिख आए हैं। उस समय मनोरमा को मालूम हुआ कि नकली धन्नूसिंह ने जिस भयानक कुत्ते वाली औरत का हाल शिवदत्त से कहा और जिसे मनोरमा की बहिन बताया था, वह सब विलकुल झूठ और बनावटी किस्सा था।
भूतनाथ--(सरयूसिंह से)तब तो आपको दुश्मनों के साथ मिल-जुलकर रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर जाने का बहुत अच्छा मौका मिला है।
सरयूसिंह--हाँ, इसी से मैं कहता हूँ कि उस धन्नूसिंह को अभी अपने कब्जे में ही रखना चाहिए जिसे हम लोगों ने गिरफ्तार किया है।
भूतनाथ-कोई चिन्ता नहीं, मैं लगे हाथ किसी तरह उसे भी अपने घर पहुंचा दूंगा। (शागिर्द की तरफ इशारा करके) इसे तो आप मनोरमा बनाकर अपने साथ ले जाएँगे?
सरयूसिंह--जरूर ले जाऊँगा और कल्याणसिंह के बताये हुए ठिकाने पर पहुँचकर उन लोगों की राह देखूंगा।
भूतनाथ--और मुझको क्या काम सुपुर्द किया जाता है?
सरयूसिंह--मुझे इस बात का पता ठीक-ठीक लग चुका है कि शेरअलीखाँ आजकल रोहतासगढ़ में है और कुंअर कल्याणसिंह उससे मदद लिया चाहता है। ताज्जुब नहीं कि अपने दोस्त का लड़का समझकर शेरअलीखाँ उसकी मदद करे, और अगर ऐसा हुआ तो राजा वीरेन्द्रसिंह को बड़ा नुकसान पहुँचेगा।
भूतनाथ--मैं आपका मतलव समझ गया, अच्छा तो इस काम से छुट्टी पाकर मैं बहुत जल्द रोहतासगढ़ पहुँचंगा और शेरअलीखाँ की हिफाजत करूँगा।(कुछ सोचकर) मगर इस बात का खौफ है कि अगर मेरा वहाँ जाना राजा वीरेन्द्रसिंह पर खुल जायेगा तो कहीं मुझे बलभद्रसिंह का बिना पता लगाये लौट आने के जुर्म में सजा तो न मिलेगी? (इतना कहकर भूतनाथ ने मनोरमा की तरफ देखा)।
सरयूसिंह--नहीं-नहीं, ऐसा न होगा, और अगर हुआ भी तो मैं तुम्हारी मदद करूँगा।
बलभद्रसिंह का नाम सुनकर मनोरमा जो सब बातचीत सुन रही थी चौंक पड़ी और उसके दिल में एक हौल-सा पैदा हो गया। उसने अपने को रोकना चाहा, मगर रोक न सकी और घबराकर भूतनाथ से पूछ बैठी, "बलभद्रसिंह कौन?"
भूतनाथ--(मनोरमा से) लक्ष्मीदेवी का बाप, जिसका पता लगाने के लिए ही हम लोगों ने तुझे गिरफ्तार किया है।
मनोरमा--(घबराकर)मुझसे और उससे भला क्या सम्बन्ध? मैं क्या जानूं, वह कौन है, कहाँ है और लक्ष्मी देवी किसका नाम है!
भूतनाथ--खैर, जब समय आवेगा तो सब कुछ मालूम हो जायेगा। (हँसकर) लक्ष्मीदेवी से मिलने के लिए तो तुम लोग रोहतासगढ़ जाते ही थे, मगर बलभद्रसिंह और इन्दिरा से मिलने का बन्दोबस्त अब मैं करूँगा, घबराती काहे को हो!
मनोरमा--(घबराहट के साथ ही बेचैनी से)इन्दिरा, कैसी इन्दिरा?ओफ!नहींनहीं, मैं क्या जानूं कौन इन्दिरा! क्या तुम लोगों से उसकी मुलाकात हो गई?क्या उसने मेरी शिकायत की थी! कभी नहीं, वह झूठी है, मैं तो उसे प्यार करती थी और अपनी बेटी समझती थी : मगर उसे किसी ने बहका दिया है या बहुत दिनों तक दुःख भोगने के कारण वह पागल हो गई है, या ताज्जुब नहीं कि मेरी सूरत बनाकर किसी ने उसे धोखा दिया हो। नहीं-नहीं, वह मैं न यी कोई दूसरी थी, मैं उसका भी नाम बताऊँगी। (ऊँची साँस लेकर) नहीं-नहीं, इन्दिरा नहीं, मैं तो मथुरा गई हुई थी, वह कोई दूसरी ही थी, भला मैं तेरे साथ क्यों ऐसा करने लगी थी! ओफ! मेरे पेट में दर्द हो रहा है, आह, आह, मैं क्या करूँ!
मनोरमा की अजब हालत हो गई। उसका बोलना और बकना पागलों की तरह मालूम पड़ता था जिसे देख भूतनाथ और सरयूसिंह आश्चर्य करने लगे, मगर दोनों ऐयार इतना तो समझ ही गये कि दर्द का बहाना करके मनोरमा अपने असली दिली दर्द को छिपाना चाहती है जो होना कठिन है।
सरयूसिंह--(भूतनाथ से)खैर अब इसका पाखण्ड कहाँ तक देखोगे, बस, झटपट ले जाओ और अपना काम करो। यह समय अनमोल है और इसे नष्ट न करना चाहिए। (अपने शागिर्द की तरफ इशारा करके) इसे हमारे पास छोड़ जाओ, मैं भी अपने काम की फिक्र में लगूं।
भूतनाथ ने बेहोशी की दवा सुंघाकर मनोरमा को बेहोश किया और जिस घोड़े पर वह आई थी उसी पर उसे लाद आप भी सवार हो पूरब का रास्ता लिया। उधर सरयूसिंह अपने चेले को मनोरमा बनाने की फिक्र में लगा।
हमने ऊपर लिखा है कि शेरअलीखाँ को बड़ी खातिरदारी और इज्जत के साथ रोहतासगढ़ में रखा गया क्योंकि उसने अपने कसूरों की माफी मांगी थी और तेजसिंह ने उसे माफी दे भी दी थी। अब हम उस रात का हाल लिखते हैं जिस रात राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और इन्द्रदेव वगैरह तहखाने के अन्दर गये थे और यकायक आ पड़ने वाली मुसीबत में गिरफ्तार हो गये थे। उन लोगों का किसी काम के लिए तहखाने के अन्दर जाना शेरअलीखाँ को मालूम था मगर उसे इन बातों से कोई मतलब न था, उसे तो सिर्फ इसकी फिक्र थी कि भूतनाथ का मुकदमा खतम हो ले तो वह अपनी राजधानी पटने की तरफ पधारे और इसीलिए वह राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ से रोका भी गया था।
जिस कमरे में शेरअलीखाँ का डेरा था वह बहुत लम्बा-चौड़ा और कीमती असबाब से सजा हुआ था। उसके दोनों तरफ दो कोठरियाँ थीं और बाहर दालान तथा दालान के बाद एक चौखूटा सहन था। उन दोनों कोठरियों में से जो कमरे के दोनों तरफ थों एक में तो सोने के लिए बेशकीमती मसहरी बिछी हुई थी और दूसरी कोठरी में पहनने के कपड़े तथा सजावट का सामान रहता था। इस कोठरी में एक दरवाजा और भी था जो उस मकान के पिछले हिस्से में जाने का काम देता था, मगर इस समय वह बन्द था और उसकी ताली दारोगा के पास थी। जिस कोठरी में सोने की मसहरी थी उसमें सिर्फ एक ही दरवाजा था और दरवाजे वाली दीवार को छोड़ के उसकी बाकी तीनों तरफ की दीवारें आबनूस की लकड़ी की बनी हुई थीं जिन पर बहुत चमकदार पालिश किया हुआ था। वही अवस्था उस कमरे की भी थी जिसमें शेरअलीखाँ रहता था।
रात डेढ़ पहर से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। शेरअली खाँ अपने कमरे में मोटी गद्दी पर लेटा हुआ कोई किताब पढ़ रहा था और सिरहाने की तरफ संगमरमर की छोटी-सी चौकी के ऊपर एक शमादान जल रहा था, इसके अतिरिक्त कमरे में और कोई रोशनी न थी। यकायक सोने वाली कोठरी के अन्दर से एक ऐसी आवाज आई जैसे किसी ने मसहरी के साथ ठोकर खाई हो। शेरअलीखाँ चौंक पड़ा और कुछ देर तक उसी कोठरी की तरफ जिसके आगे पर्दा गिरा हुआ था देखता रहा। जब पर्दे को भी हिलते देखा तो किताब जमीन पर रखकर बैठ गया और उसी समय कल्याणसिंह को पर्दा हटाकर बाहर निकलते देखा। शेरअलीखाँ घबराकर उठ खड़ा हुआ और बड़े गौर से उसे देखकर बोला, "हैं, क्या तुम कुंअर कल्याणसिंह हो?"
कल्याणसिंह--(सलाम करके) जी हां।
शेरअलीखाँ--तुम इस कमरे में कब आये और कब इस कोठरी में गये मुझे कुछ भी नहीं मालूम!
कल्याणसिंह--मैं बाहर से इस कमरे में नहीं आया बल्कि इसी कोठरी में से आ रहा हूँ।
शेरअलीखाँ--सो कैसे? इस कोठरी में तो कोई दूसरा रास्ता नहीं है!
क्योंकि चुनारगढ कल्याणसिंह--जी हाँ, एक रास्ता है जिसे शायद आप नहीं जानते, मगर पहले मैं दरवाजा बन्द कर लूं।
इतना कहकर कल्याणसिंह दरवाजे की तरफ बढ़ गया और इस कमरे के तीनों दरवाजे बन्द करके शेरअलीखां के पास लौट आया।
शेरअलीखाँ–-दरवाजे क्यों बन्द कर दिए? यह क्या करते हो?
कल्याणसिंह--जी हाँ, यदि कोई देख लेगा तो मुश्किल होगी।
शेरअलीखाँ-तो इससे मालूम होता है कि तुम राजा वीरेन्द्र सिंह की मर्जी से नहीं छूटे, बल्कि किसी की मदद और चोरी से निकल भागे हो, में तुम्हारे कैद होने का हाल मैं अच्छी तरह जानता हूँ।
कल्याणसिंह--जी हाँ, ऐसी ही बात है।
शेरअलीखाँ--(बैठकर) अच्छा आओ, मेरे पास बैठ जाओ और कहो कि तुम कैसे छूटे और यहाँ क्योंकर आ पहुँचे?
कल्याणसिंह--(बैठकर) खुलासा हाल कहने का तो इस समय मौका नहीं है। परन्तु इतना कहना जरूरी है कि अपनी मदद के लिए मुझे राजा शिवदत्त ने छुड़ाया है और अब मैं सहायता लेने के लिए आपके पास आया हूँ। यदि आप मदद देंगे तो मैं आज ही राजा वीरेन्द्रसिंह से अपने बाप का बदला ले लूंगा।
शेरअलीखाँ--(हँस कर) यह तुम्हारी नादानी है। तुम अभी लड़के हो, ऐसे मामलों पर गौर नहीं कर सकते। राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ दुश्मनी करना अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मारना है, उनसे लड़कर कोई जीत नहीं सकता और न उनके ऐयारों के सामने किसी की चालाकी ही चल सकती है।
कल्याणसिंह--आपका यह कहना ठीक है, मगर इस समय हम लोगों ने राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयारों को हर तरह से मजबूर कर रखा है।
शेरअलीखाँ--सो कैसे?
कल्याणसिंह-क्या आप नहीं जानते कि वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयार किशोरी, कामिनी इत्यादि को लेकर तहखाने के अन्दर गये हैं?
शेरअलीखाँ--हाँ, सो तो जानते हैं, मगर इससे क्या?
कल्याणसिंह--जिस समय वीरेन्द्रसिंह वगैरह तहखाने में गये हैं, उसके पहले ही हम लोग अपनी छोटी सेना सहित तहखाने में पहुंच चुके थे और गुप्त राह से यकायक इस किले में पहुंचकर अपना दखल जमाना चाहते थे, मगर ईश्वर ने उन लोगों को तहखाने ही में पहुँचा दिया जिससे हम लोगों को बड़ा सुभीता हुआ। शिवदत्तसिंह ने तो सेना सहित दुश्मनों को घेर लिया है और मैं एक सुरंग की राह से जिसका दूसरा मुहाना (सोने वाली कोठरी की तरफ इशारा करके) इस कोठरी में निकला है, आपके पास मदद के लिए आया हूँ, आशा है कि उधर शिवदत्तसिंह ने दुश्मनों को काबू में कर लिया होगा या मार डाला होगा और इधर मैं आपकी मदद से किले में अपना अधिकार जमा लूंगा।
शेरअलीखाँ--(कुछ सोचकर) मैं खूब जानता हूँ कि इस तहखाने का और यहाँ के कई पेचीले रास्तों का हाल तुमसे ज्यादा जानने वाला अब और कोई नहीं है।
इसलिए तुम लोगों का तहखाने में राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को मार डालना तो यद्यपि मुश्किल है। हाँ, घेर लिया हो तो ताज्जुब की बात नहीं है, मगर साथ ही इसके इस बात का भी खयाल करना चाहिए कि यद्यपि राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह इस तहखाने का हाल बखूबी नहीं जानते, परन्तु आज इन्द्रदेव उनके साथ है जिसे हम-तुम अच्छी तरह जानते हैं। क्या तुम्हें उस दिन की बात याद नहीं है जिस दिन तुम्हारे पिता ने हमारे सामने तुमसे कहा था कि यहां के तहखाने का हाल हमसे ज्यादा जानने वाला इस दुनिया में यदि कोई है तो केवल इन्द्रदेव!
कल्याणसिंह--(ताज्जुब से) हाँ, मुझे याद है। मगर क्या इन्द्रदेव राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ तहखाने में गये हैं और क्या वीरेन्द्रसिंह ने उन्हें अपना दोस्त बना लिया?
शेरअलीखाँ--हाँ, अतः यह आशा नहीं हो सकती कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह तुम लोगों के काबू में आ जायेंगे, दूसरी बात यह है कि तुम अकेले या दो-एक मददगारों को लेकर इस किले में कर ही क्या सकते हो?
कल्याणसिंह--मैं आपके पास अकेला नहीं आया हूँ वल्कि सौ सिपाही भी साथ लाया हूँ जिन्हें आप आज्ञा देने के साथ ही इसी कोठरी में से निकलते देख सकते हैं। क्या ऐसी हालत में जब कि मालिकों या अफसरों में से यहाँ कोई भी न हो और यहाँ रहने वाली केवल पाँच-सात सौ की फौज बेफिक्र पड़ी हो, हम और आप सौ बहादुरों को साथ लेकर कुछ नहीं कर सकते? इन्द्रदेव का इस समय वीरेन्द्रसिंह वगैरह के साथ तहखाने में होना बेशक हमारे काम में विघ्न डाल सकता है, मगर मुझे इसकी भी विशेष चिन्ता नहीं है, क्योंकि यदि दुश्मन लोग काबू में न आवेंगे तो हर तरफ से रास्ता बन्द हो जाने के कारण तहखाने के बाहर भी न निकल सकेंगे और भूखे-प्यासे उसी में रहकर मर जायेंगे, और इधर जब आप किले में अपना दखल जमा लेंगे
शेरअलीखाँ--(बात काटकर) ये सब बातें फिजूल की हैं, मैं जानता हूँ कि तुम अपने को बहादुर और होनहार समझते हो, मगर राजा वीरेन्द्रसिंह के प्रबल प्रताप के चमकते हुए सितारे की रोशनी को अपने हाथ की ओट लगाकर नहीं रोक सकते और न उनकी सचाई, सफाई और नेकियों को भूलकर इस किले का रहनेवाला कोई तुम्हारा साथ ही दे सकता है। बुद्धिमानों को तो जाने दो, यहाँ का एक बच्चा भी राजा वीरेन्द्रसिंह का निकल जाना पसन्द न करेगा। अहा, क्या ऐसा जबान का सच्चा, रहमदिल और नेक राजा कोई दूसरा होगा? यह राजा वीरेन्द्रसिंह ही का काम था कि उसने मेरे कसूरों को माफ ही नहीं किया बल्कि इज्जत और आबरू के साथ मुझे अपना मेहमान बनाया। मेरी रग-रग में उनके अहसान का खून भरा है, मेरा बाल-बाल उन्हें दुआ देता है, मेरे दिल में उनकी हिम्मत, मर्दानगी, इन्साफ और रहमदिली का दरिया जोश मार रहा है। ऐसे बहादुर शेरदिल राजा के साथ शेरअली कभी दगाबाजी या बेईमानी नहीं कर सकता, बल्कि ऐसे की ताबेदारी अपनी इज्जत, हुर्मत और नामवरी का वायस समझता है। तुम मेरे दोस्त के लड़के हो, मगर मैं यह जरूर कहूँगा कि तुम्हारे बाप ने वीरेन्द्रसिंह के साथ दगाबाजी की! खैर, जो कुछ हुआ सो हुआ, अब तुम तो ऐसा न करो। मैं तुम्हें पुरानी मोहब्बत और दोस्ती का वास्ता दिलाता हूँ कि तुम ऐसा मत करो। राजा वीरेन्द्रसिंह दुश्मनी करने योग्य राजा नहीं बल्कि दर्शन करने योग्य हैं! मैं वादा करता हूँ कि तुम्हारा भी कसूर माफ करा दूंगा और अगर तुमको रोहतासगढ़ की लालच है तो इसे भी तुम राजा वीरेन्द्रसिंह को दावेदारी करके ले सकते हो। वह बड़ा उदार दाता है, यह राज्य दे देना उसके सामने कोई बात नहीं है।
कल्याणसिंह--अफसोस! मुझे इन शब्दों के सुनने की कदापि आशा न थी जो इस समय आपके मुंह से निकल रहे हैं। मुझे इस बात का ध्यान भी न था कि आज आपको हिम्मत और मर्दानगी से इस तरह खाली देखूगा। मैं किसी के कहने पर भी विश्वास नहीं कर सकता था कि आपकी रगों में बुजदिली का खून पाऊँगा। मुझे स्वप्न में भी विश्वास नहीं हो सकता कि आपको उसी राजा वीरे द्रसिंह की खुशामद करते पाऊँगा जिसके लड़के ने आपकी लड़की को हर तरह से बेइज्जत किया।
शेरअलीखा--ओफ, तुम्हारी जली-कटी बातें मेरे दिल को हिलाकर मुझे बेईमान, दगाबाज या विश्वासघाती की पदवी नहीं दिला सकतीं। उस गौहर की याद मेरे दिल की सच्ची तथा इन्साफपसन्द आँखों को फोड़कर नेकों की दुनिया में मुझको अंधा नहीं बना सकती जो बुजुर्गों की इज्जत को मिट्टी में मिला मेरी बदनामी का झण्डा बनकर जहरीली हवा में उड़ती हुई आसमान की तरफ बढ़ती ही जाती थी, और जिसका गिरफ्तार होकर सजा पाना बल्कि इस दुनिया से उठ जाना मुझे पसन्द है। किसी नालायक के लिए लायक के साथ बुराई करना, किसी अधर्मी के लिए धर्मी का खून करना, किसी बेईमान के लिए ईमान का सत्यानाश करना, और किसी अविश्वासी के लिए विश्वासघात करना शेरअलीखां का काम नहीं। मैं समझता था कि तुम्हारे दिल का प्याला सच्ची बहादुरी की शराब से भरा हुआ होगा और तुम दुनिया में नामवरी पैदा कर सकोगे, इसलिए मैं तुम्हारी सिफारिश करने वाला था, मगर अब निश्चय हो गया कि तुम्हारी किस्मत का जहाज शिवदत्त के तूफान में पड़कर एक भारी पहाड़ से टक्कर खाना चाहता है। अब तुम यहाँ से चले जाओ और मुझसे किसी तरह की उम्मीद मत रखो, अगर मैं तुम्हारे बाप का दोस्त न होता और तुम मेरे दोस्त के लड़के न होते
कल्याणसिंह–-अफसोस, मैं आपकी इस समय यह लम्बी-चौड़ी वक्तृता नहीं सुन सकता क्योंकि समय कम है और काम बहुत करना है, बस आप इतना ही बताइये कि मैं आपसे किसी तरह की आशा रखू या नहीं?
शेरअलीखां--नहीं, बल्कि इस बात की भी आशा मत रखो कि तुम्हें राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ दुश्मनी करते देखकर मैं चुपचाप बैठा रहूँगा।
कल्याणसिंह--(क्रोध में आकर) क्या आप मेरी मदद अगर न करेंगे तो चुपचाप भी न बैठे रहेंगे?
शेरअलीखाँ--हरगिज नहीं!
कल्याणसिंह--तो आप मेरे साथ दुश्मनी करेंगे?
शेरअलीखाँ--अगर ऐसा करें तो हर्ज ही क्या है? जिसकी लोग इज्जत करते हों या जिसे दुनिया मोहब्बत की निगाह से देखती है, उसके साथ दुश्मनी करना बेशक बुरा है। मगर ऐसे के साथ बेमुरौबती करने में कुछ भी हर्ज नहीं है जिसके हृदय की आँख फूट गई हो, जिसे दुनिया में किसी तरह की इज्जत हासिल करने का शौक न हो,
और जिसे लोग हमदर्दी की निगाह से न देखते हों। कल्याणसिंह-(दाँत पीसकर)तो फिर सबसे पहले आप ही का बन्दोबस्त करना पड़ेगा!
इसके पहले कि कल्याणसिंह की बात का शेरअलीखाँ कुछ जवाब दे, बाहर से एक आवाज आई-"हाँ, यदि तेरे किए कुछ हो सके!"
इस आवाज ने दोनों को चौंका दिया, मगर कल्याणसिंह ने ज्यादा देर तक राह देखना मुनासिब न जाना और उस कोठरी की तरफ बढ़कर जोर से ताली बजाई। शेरअलीखाँ समझ गया कि कल्याणसिंह अपने साथियों को बुला रहा है, क्योंकि वह थोड़ी ही देर पहले कह चुका था कि मेरे साथ सौ सिपाही भी आए हैं जो हुक्म देने के साथ ही इस कोठरी में से मेरी ही तरह निकल सकते हैं।
कल्याण सिंह ताली बजाता हुआ कोठरी की तरफ बढ़ा और उसका मतलब समझ कर शेरअलीखाँ ने शीघ्रता से कमरे का दरवाजा अपने मददगारों को बुलाने की नीयत से खोल दिया तथा उसी समय एक नकाबपोश को हाथ में खंजर लिए कमरे के अन्दर पैर रखते देखा। शेरअलीखाँ ने पूछा, "तुम कौन हो?" नकाबपोश ने जवाब दिया, "तुम्हारा मददगार!"
इससे ज्यादा बातचीत करने का मौका न मिला, क्योंकि कोठरी के अन्दर से कई आदमी हाथों में नंगी तलवारें लिए हुए निकलते दिखाई दिए जिन्हें कल्याणसिंह ने अपनी मदद के लिए बुलाया था।
४
अब हम अपने पाठकों को कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तरफ ले चलते हैं जिन्हें जमानिया के तिलिस्म में नहर के किनारे पत्थर की चट्टान पर बैठकर राजा गोपाल सिंह से बातचीत करते छोड़ आए हैं।
दोनों कुमार बड़ी देर तक राजा गोपालसिंह से बातचीत करते रहे। राजा साहब ने बाहर का सब हाल दोनों भाइयों से कहा और यह भी कहा कि किशोरी और कामिनी राजी-खुशी के साथ कमलिनी के तालाब वाले मकान में जा पहुँची हैं, अब उनके लिए चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।
किशोरी और कामिनी का शुभ समाचार सुनकर दोनों भाई बड़े प्रसन्न हुए। राजा गोपालसिंह से इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "हम चाहते हैं कि इस तिलिस्म से बाहर होकर पहले अपने माँ-बाप से मिल आवें, क्योंकि उनका दर्शन किए बहुत दिन हो गये और वे भी हमारे लिए बहुत उदास होंगे।"
गोपालसिंह--मगर यह तो हो नहीं सकता।
इन्द्रजीतसिंह–-सो क्यों?
गोपालसिंह--जब तक आप बाहर जाने के लिए रास्ता न बना लेंगे बाहर कैसे जायेंगे और जब तक इस तिलिस्म को आप तोड़ न लेंगे, तब तक बाहर जाने का रास्ता कैसे मिलेगा?
इन्द्रजीतसिंह--जिस रास्ते से आप यहां आये हैं या आप जायेंगे, उसी रास्ते से आपके साथ अगर हम लोग भी चले जायें तो कौन रोक सकता है?
गोपालसिंह--वह रास्ता केवल मेरे ही आने-जाने के लिए है। आप लोगों के लिए नहीं।
इन्द्रजीतसिंह--(हँसकर) क्योंकि आपसे हम लोग ज्यादा मोटे-ताजे हैं, दरवाजे में अँट न सकेंगे!
गोपालसिंह--(हँसकर) आप भी बड़े मसखरे हैं। मेरा मतलब यह नहीं है कि मैं जानबूझकर आपको नहीं ले जाता बल्कि यहाँ के नियमों का ध्यान करके मैंने ऐसा कहा था, आपने तो तिलिस्मी किताब में पढ़ा ही होगा।
इन्द्रजीतसिंह--हां, हम पढ़ तो चुके हैं और उससे भी मालूम यही होता है कि हम लोग बिना तिलिस्म तोड़े बाहर नहीं जा सकते। मगर अफसोस कि इस किताब का लिखने वाला हमारे सामने मौजूद नहीं। अगर होता तो पूछते कि क्यों नहीं जा सकते? जिस राह से राजा साहब आए उसी राह से उनके साथ जाने में क्या हर्ज है?
गोपालसिंह--किसी तरह का हर्ज होगा तभी तो बुजुर्गों ने ऐसा लिखा है! कौन ठिकाना, किसी तरह की आफत आ जाए तो जीवन-भर के लिए मैं बदनाम हो जाऊँगा। अस्तु, आपको भी इसके लिए जिद न करनी चाहिए, हाँ यदि अपने उद्योग से आप बाहर जाने का रास्ता बना लें तो बेशक चले जायँ।
इन्द्रजीत--(मुस्कुराकर) बहुत अच्छा, आप जाइए, हम अपने लिए रास्ता ढूंढ़ लेंगे।
गोपालसिंह--(हँसकर) मेरे पीछे-पीछे चलकर! अच्छा आइए।
यह कहकर गोपालसिंह उठ खड़े हुए और उसी कुएं पर चले गए जिसमें पहले दफे उस वक्त कूद कर गायब हो गए थे जब बुड्ढे की सूरत बनाकर आए थे। दोनों कुमार भी मुस्कुराते हुए उनके पीछे-पीछे गए और पास पहुँचने के पहले ही उन्होंने राजा गोपालसिंह को कुएँ के अन्दर कूद पड़ते देखा। यह कुआँ यद्यपि बहुत चौड़ा था तथापि नीचे के हिस्से में सिवाय अन्धकार के और कुछ भी दिखाई न देता था। दोनों कुमार भी जल्दी से उसी कुएँ पर गए और बारी-बारी से कुछ विलम्ब करके कुएँ के अन्दर कूद पड़े।
हम पहले आनन्दसिंह का हाल लिखते हैं जो इन्द्रजीतसिंह के बाद उस कुएँ में कूदे थे। आनन्दसिंह सोचे हुए थे कि कुएँ में कूदने के बाद अपने भाई से मिलेंगे, मगर ऐसा न हुआ। जब उनका पैर जमीन पर लगा तो उन्होंने अपने को नरम-नरम घास पर पाया जिसकी ऊँचाई या तौल का अन्दाजा नहीं कर सकते थे और उसीके सबब से उन्हें चोट की तकलीफ भी बिलकुल न उठानी पड़ी। अन्धकार के सबब से कुछ मालूम न पड़ता था इसलिए दोनों हाथ आगे बढ़ाकर कुंअर आनन्दसिंह उस कुएँ में घूमने लगे। तब मालूम हुआ कि नीचे से यह कुआँ बहुत चौड़ा है और उसकी दीवार चिकनी तथा संगीन है। टटोलते और घूमते हुए एक छोटे-से बन्द दरवाजे पर इनका हाथ पड़ा, वहाँ वह ठहर गए और कुछ सोचकर आगे बढ़े। तीन-चार कदम के बाद फिर एक बन्द दरवाजा मिला, उसे भी छोड़ और आगे बढ़े। इसी तरह घूमते हुए इन्हें चार दरवाजे मिले जिनमें दो तो खुले हुए थे और दो बन्द। आनन्दसिंह ने सोचा कि बेशक इन्हीं दोनों दरवाजों में से जो खुले हुए हैं किसी एक दरवाजे में कुंअर इन्द्रजीतसिंह गए होंगे। बहुत सोचनेविचारने के बाद आनन्दसिंह ने भी एक दरवाजे के अन्दर पैर रक्खा मगर दो ही चार कदम आगे गए होंगे कि पीछे से दरवाजा बन्द होने की आवाज आई। उस समय उन्हें विश्वास हो गया कि हमने धोखा खाया, कुंअर इन्द्रजीतसिंह किसी दूसरे दरवाजे अन्दर गये होंगे और वह दरवाजा भी उनके जाने के बाद इसी तरह बन्द हो गया होगा। अफसोस करते हुए आगे की तरफ बढ़े मगर दो ही चार कदम जाने के बाद अन्धकार के सबब से जी घबड़ा गया। उन्होंने कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल उसका कब्जा दबाया जिससे बहुत तेज रोशनी हो गई और वहाँ की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। कुमार ने अपने को एक कोठरी में पाया जिसमें चारों तरफ दरवाजे बने थे। उनमें एक दरवाजा तो वही था जिससे कुमार आए थे और बाकी के तीन दरवाजे बन्द थे और उनकी कुण्डियों में ताला लगा हुआ था, मगर उस दरवाजे में कोई ताला या ताले का निशान या जंजीर न थी जिससे कुमार आये थे। चारों तरफ की संगीन दीवारों में कई बड़े-बड़े सूराख थे जिनमें से हवा आती और निकल जाती थी। जिस दरवाजे से कुमार आए थे उसके पास जाकर उसे खोलना चाहा मगर किसी तरह से वह दरवाजा न खुला, तब दूसरे दरवाजे के पास आए, तिलिस्मी खंजर से उसकी जंजीर काटकर दरवाजा खोला और उसके अन्दर गए। यह कोठरी बनिस्बत पहले के तिगुनी लम्बी थी। जमीन और दीवार संगमरमर की बनी हुई थी और हवा आने-जाने के लिए दीवारों में सुराख भी थे। इस कमरे के बीचोंबीच में एक ऊँचा चबूतरा था और उस पर एक बड़ा संदूक, जो असल में बाजा था, रक्खा हुआ था। कुमार के अन्दर आते ही वह बाजा बजने लगा और उसकी सुरीली आवाज ने कुमार का दिल अपनी तरफ खींच लिया। चारों तरफ दीवारों में बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं जिनमें एक तस्वीर बहुत ही बड़ी और जड़ाऊ चौखटे के अन्दर थी। इस तस्वीर में किसी तरह की चमक देखकर कुमार ने अपने खंजर की रोशनी बन्द कर दी। उस समय मालूम हुआ कि यहाँ की सब तस्वीरें इस तरह चमक रही हैं कि उनके देखने के लिए किसी तरह की रोशनी की दरकार नहीं। कुमार उस बड़ी तस्वीर को गौर से देखने लगे। देखा कि जड़ाऊ सिंहासन पर एक बूढ़े महाराज बैठे हैं। उम्र अस्सी वर्ष से कम न होगी, सफेद लम्बी दाढ़ी नाभि तक लटक रही है, जड़ाऊ मुकुट माथे पर चमक रहा है, कपड़ों पर काढ़ी बेलों में मोती और जवाहरात के फूल और बेल-बूटे बने हुए हैं। सामने सोने की चौकी पर एक ग्रन्थ रक्खा हुआ है और पास ही
एक सिंहासन पर मृगछाला बिछाए एक बहुत ही वृद्ध साधु महाशय बैठे हुए हैं जिनके भाव से साफ मालूम होता है कि महात्माजी ग्रन्थ का मतलब महाराज को समझा रहे हैं और महाराज बड़े गौर से सुन रहे हैं। उस तस्वीर के नीचे यह लिखा हुआ था-
"महाराज सूर्यकान्त और उनके गुरु सोमदत्त जिन्होंने इस तिलिस्म को बनाया और इसके कई हिस्से किये। महाराज के दो लड़के थे-एक का नाम धीरसिंह, दूसरे का नाम जयदेवसिंह। जब इस हिस्से की उम्र समाप्त होने पर आवेगी, तब धीरसिंह के खानदान में गोपालसिंह और जयदेवसिंह के खानदान में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह होंगे और नाते में वे तीनों भाई होंगे। इसलिए इस तिलिस्म के दो हिस्से किये गए जिनमें से आधे का मालिक गोपालसिंह होगा और आधे के मालिक इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह होंगे, लेकिन यदि उन तीनों में मेल न होगा तो इस तिलिस्म से सिवाय हानि के किसी को भी फायदा न होगा अतएव चाहिए कि वे तीनों भाई आपस में मेल रक्खें और इस तिलिस्म से फायदा उठावें। इन तीनों के हाथ से इस तिलिस्म के कुल बारह दों में से सिर्फ तीन टूटेंगे और बाकी के नौ दों के मालिक उन्हीं के खानदान में कोई दूसरे होंगे। इसी तिलिस्म में से कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को एक ग्रन्थ प्राप्त होगा जिसकी बदौलत वे दोनों भाई चरणाद्रि (चुनारगढ़) के तिलिस्म को तोड़ेंगे।"
इसके बाद कुछ और भी लिखा हुआ था मगर अक्षर इतने बारीक थे कि पढ़ा नहीं जाता था। यद्यपि उनके पढ़ने का शौक आनन्द सिंह को बहुत हुआ मगर लाचार : होकर रह गए। उस तस्वीर के बाईं तरफ जो तस्वीर थी उसके नीचे केवल 'धीरसिंह' लिखा हुआ था और दाहिनी तरफ वाली तस्वीर के नीचे 'जयदेवसिंह' लिखा हुआ था। उन दोनों की तस्वीरें नौजवानी के समय की थीं। उसके बाद क्रमशः और भी तस्वीरें थीं और सभी के नीचे नाम लिखा हुआ था। कुँअर आनन्दसिंह बाजे की सुरीली आवाज सुनते जाते थे और तस्वीरों को भी देखते जाते थे। जब इन तस्वीरों को देख चुके तो अन्त में राजा गोपालसिंह, अपनी और अपने भाई की तस्वीर भी देखी और इस काम में उन्हें कई घंटे लग गए।
इस कमरे में जिस दरवाजे से कुँअर आनन्दसिंह गये थे उसी के ठीक सामने एक दरवाजा और था जो बन्द था और उसकी जंजीर में ताला लगा हुआ था। जब वे घूमते हुए उस दरवाजे के पास गए तब मालूम हुआ कि इसकी दूसरी तरफ से कोई आदमी उस दरवाजे को ठोकर दे रहा है या खोलना चाहता है। कुमार को इन्द्रजीतसिंह का खयाल हुआ और सोचने लगे कि ताज्जुब नहीं कि किसी राह से घूमते-फिरते भाई साहब यहाँ तक आ गए हों। यह खयाल उनके दिल में बैठ गया और उन्होंने तिलिस्मी खंजर से उस दरवाजे की जंजीर काट डाली। दरवाजा खुल गया और एक औरत कमरे के अन्दर आती हुई दिखाई दी जिसके हाथ में एक लालटेन थी और उसमें तीन मोमबत्तियां जल रही थीं। यह नौजवान और हसीन औरत इस लायक थी कि अपनी सुघराई, खूबसुरती, नजाकत, सादगी और बाँकपन की बदौलत जिसका दिल चाहे मुट्ठी में कर ले। यद्यपि उसकी उम्र सत्रह-अट्ठारह वर्ष से कम न होगी मगर बुद्धिमानों और विद्वानों की बारीक निगाह जांच कर कह सकती थी कि इसने अभी तक मदनमहीप की पंचरंगी बाटिका में पैर नहीं रक्खा और इसकी रसीली कली को समीर के सत्संग से गुदगुदा कर खिल जाने का अवसर नहीं मिला, इसके सतीत्व की अनमोल गठरी पर किसी ने लालच में पड़कर मालिकाना दखल जमाने की नीयत से हाथ नहीं डाला और न इसने अपनी अनमोल अवस्था का किसी के हाथ सट्टा, ठीका या बीमा किया। इसके रूप के खजाने की चौकसी करने वाली बड़ी-बड़ी आँखों के निचले हिस्से में अभी तक ऊदी डोरी नहीं पड़ने पाई थी, और न उसकी गर्दन में स्वर-घंटिका का उभार ही दिखाई देता था। इस गोरी नायिका को देखकर कुंअर आनन्दसिंह भौचक्के से रह गए और ललचाही निगाह से इसे देखने लगे। इस औरत ने भी इन्हें एक दफे तो नजर भरकर देखा मगर साथ ही गर्दन नीची कर ली और पीछे की तरफ हटने लगी तथा धीरे-धीरे कुछ दूर जाकर किसी दीवार या दरवाजे के ओट में हो गई जिससे उस जगह फिर अँधेरा हो गया। आनन्दसिंह आश्चर्य, लालच और उत्कंठा के फेर में पड़े रहे, इसलिए खंजर की रोशनी की सहायता से दरवाजा लाँघ कर वे भी उसी तरफ गए जिधर वह नाजनीन गई थी। अब जिस कमरे में कुंअर आनन्दसिंह ने पैर रक्खा वह बनिस्बत तस्वीरों वाले कमरे के कुछ बड़ा था और उसके दूसरे सिरे पर भी वैसा ही एक दूसरा दरवाजा था जैसा तस्वीर वाले कमरे में था। कुंअर साहब बिना इधर-उधर देखे उस दरवाजे तक चले गये मगर जब उस पर हाथ रखा तो बन्द पाया। उस दरवाजे में भी कोई जंजीर या ताला दिखाई न दिया जिसे खोलकर या तोड़कर वे दूसरी तरफ जाते। इससे मालूम हुआ कि इस दरवाजे का खोलना या बन्द करना उस दूसरी तरफ वाले के आधीन है। बड़ी देर तक आनन्दसिंह उस दरवाजे के पास खड़े होकर सोचते रहे, मगर इसके बाद जब पीछे की तरफ हटने लगे तो उस दरवाजे के खोलने की आहट सुनाई दी। आनन्दसिंह रुके और गौर से देखने लगे। इतने ही में एक और आवाज इस ढंग की आई जिसने आनन्दसिंह को विश्वास दिला दिया कि उस तरफ की जंजीर किसी ने तलवार या खंजर से काटी है। थोड़ी ही देर बाद दरवाजा खुला और कुंअर इन्द्रजीतसिंह दिखाई पड़े। आनन्दसिंह को उस औरत के देखने की लालसा हद से ज्यादा थी और कुछ-कुछ विश्वास हो गया था कि अबकी दफे पुनः उसी औरत को देखेंगे, मगर उसके बदले में अपने बड़े भाई को देखा और देखते ही खुश होकर बोले, "मैंने तो समझा था कि आपसे जल्द मुलाकात न होगी परन्तु ईश्वर ने बड़ी कृपा की!"
इन्द्रजीतसिंह--मैं भी यही सोचे हुए था, क्योंकि कुएँ के अन्दर कूदने के बाद जब मैंने एक दरवाजे में पैर रक्खा दो-चार कदम जाने के बाद वह बन्द हो गया, तभी मैंने सोचा कि अब आनन्द से मुलाकात होना कठिन है।
आनन्दसिंह--मेरा भी यही हाल हुआ, जिस दरवाजे के अन्दर मैंने पैर रक्खा था वह भी दो ही चार कदम जाने के बाद बन्द हो गया था।
इसके बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह उस कमरे में चले आये जिसमें आनन्दसिंह थे। दोनों भाई एक-दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुए और यों बातचीत करने लगे-
आनन्दसिंह--इस कोठरी में आपने किसी को देखा था?
इन्द्रजीतसिंह--(ताज्जुब से) नहीं तो!
आनन्दसिंह--बड़े आश्चर्य की बात है! (कोठरी के अन्दर झांककर) कोठरी तो बहुत बड़ी नहीं है।
इन्द्रजीतसिंह--तुम किसे पूछ रहे हो सो कहो?
आनन्दसिंह--अभी-अभी एक औरत हाथ में लालटेन लिए मुझे दिखाई दी थी जो इसी कोठरी में घुस गई और इसके थोड़ी ही देर बाद आप आये हैं।
इन्द्रजीतसिंह--जब से मैं कुएँ में कूदा तब से इस समय तक मैंने किसी दूसरे की सूरत नहीं देखी।
आनन्दसिंह--अच्छा यह कहिए कि आप जब कुएं में कूदे तब क्या हुआ और यहाँ क्योंकर पहुँचे?
इन्द्रजीतसिंह--कुएँ की तह में पहुँचकर जब मैं टटोलता हुआ दीवार के पास पहुंचा तो एक छोटे से दरवाजे पर हाथ पड़ा। मैं उसके अन्दर चला गया। दो ही चार कदम गया था कि पीछे से दरवाजा बन्द हो जाने की आवाज आई। मैंने तिलिस्मी खंजर हाथ में ले लिया और कब्जा दबाकर रोशनी करने के बाद चारों तरफ देखा तो मालूम हुआ कि कोठरी बहुत छोटी है और सामने की तरफ एक दरवाजा और है। खंजर से जंजीर काटकर दरवाजा खोला तो एक कमरा और नजर आया जिसकी लम्बाई पचीस हाथ से कुछ ज्यादा थी। मगर उस कमरे में जो कुछ मैंने देखा कहने योग्य नहीं है बल्कि इस योग्य है कि तुम्हें अपने साथ जाकर दिखाऊँ। वह कमरा बहुत दूर भी नहीं है। (जिस कोठरी में से आये थे, उसे बताकर) इस कोठरी के बाद ही वह कमरा है, चलो तो वहाँ का विचित्र तमाशा तुम्हें दिखावें।
आनन्दसिंह--पहले इस कमरे को देख लीजिये जिसकी सैर मैं कर चुका हूँ।
इन्द्रजीतसिंह--मैं समझ गया, जरूर तुमने भी कोई अनूठा तमाशा देखा होगा। (रुककर) अच्छा चलो, पहले इसी को देख लें।
इतना कहकर आनन्दसिंह के पीछे-पीछे इन्द्रजीतसिंह उस कमरे में गए और जो कुछ उनके छोटे भाई ने देखा था उन्होंने भी बड़े गौर और ताज्जुब के साथ देखा।
इन्द्रजीतसिंह--मुझे यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि राजा गोपालसिंह नाते में हमारे भाई होते हैं। (कुछ सोचकर) मगर इस बात की सचाई का कोई और सबूत भी होना चाहिए।
आनन्दसिंह--जब इतना मालूम हुआ है तब और भी कोई-न-कोई सबूत मिल ही जायगा।
इन्द्रजीतसिंह--अच्छा अब हमारे साथ आकर उस कमरे का तमाशा देखो जिसका जिक्र हम कर चुके हैं और इसके बाद सोचो कि हम लोग यहाँ से क्योंकर निकल सकेंगे क्योंकि जिस राह से यहाँ आये हैं वह तो बन्द ही हो गई।
आनन्दसिंह--जी हाँ, हम दोनों भाइयों को धोखा हुआ, गोपालसिंहजी के साथ कोई भी न जा सका।
इन्द्रजीतसिंह--यह कैसे निश्चय हो कि हम लोगों ने धोखा खाया? कदाचित् गोपालसिंह जी इसी राह से आते-जाते हों या यहाँ से बाहर होने के लिए कोई दूसरा ही रास्ता हो?
आनन्दसिंह--यह भी हो सकता है, मगर बड़े आश्चर्य की बात है कि खून से लिखी किताब में, जिसे हम लोग अच्छी तरह पढ़ चुके हैं, इस जगह का तथा इन तस्वीरों का हाल कुछ भी नहीं लिखा है।
इन्द्रजीतसिंह इसका कुछ जवाब न देकर यहाँ से रवाना हुआ ही चाहते थे कि बाजे की सुरीली आवाज (जो इस कमरे में बोल रहा था) बन्द हो गई और दो-चार पल तक बन्द रहने बाद पुनः इस ढंग से बोलने लगी जैसे कोई मनुष्य बोलता हो। दोनों कुमारों ने चौंककर उस पर ध्यान दिया तो 'सुनो सुनो सुनो' की आवाज सुनाई पड़ी अर्थात् उस बाजे में से 'सुनो सुनो' की आवाज आ रही थी। दोनों कुमार उत्कंठा के साथ उसके पास गए और ध्यान देकर सुनने लगे। 'सुनो सुनो' की आवाज बहुत देर तक निकलती रही, जिस पर इन्द्रजीतसिंह ने यह कहकर कि 'निःसन्देह यह कोई मतलब की बात कहेगा'--अपनी जेब से एक सादी किताब और जस्ते की कलम निकाली और लिखने के लिए तैयार हो गए। अपना खंजर कमर में रख लिया और आनन्दसिंह को अपने खंजर का कब्जा दबाकर रोशनी करने के लिए कहा। थोडी देर तक और 'सुनो सुनो' की आवाज आती रही और फिर सन्नाटा हो गया। कई पल के बाद फिर धीरे-धीरे आवाज आने लगी और इन्द्रजीतसिंह लिखने लगे। वह आवाज यह थी––
साकरा खति गलि घस्मङ तो चड़ छनेज काझ खञ या लठ नड कढ रोण औत रथ इद सध तिन लिप स्मफ कीब ताभ लीम किय सीर चल लब तीश फिष रस तीह से कप्रा खप्तग कघ रोङ इच सछ बाज जेझ में अवेट सठ बड बाढ तेंण भत रीथ हैंद जिघ नन कोप तुफ म्हेंव जभ रूम रथ तर हैल ताब लीश लष गास याह कक रोख औग रघ सुङ नाच कछ रोज अझ गा रट एठ कड हीढ दण फेत सुथ न द नेध सेन सप मफ झब में भन म आय वेर तोल दोव हश राष कस रह के क भीख सुग नघ सङ कच तेछ हौज इझ सञ कीट तठ कीड बढ औण रत ताथ लीद इघ सीन कष मफ रेब में भहै मढूंय ढोर।
इसके बाद बाजे का बोलना बन्द हो गया और फिर किसी तरह की आवाज न आई। कंअर इन्द्रजीतसिंह जो कुछ लिख चुके थे उस पर गौर करने लगे। यद्यपि वे बातें बेसिर-पैर की मालूम हो रही थीं मगर थोड़ी ही देर में उनका मतलब इन्द्रजीतसिंह समझ गए, जब आनन्दसिंह को समझाया तो वे भी बहुत खुश हुए और बोले, “अब कोई हर्ज नहीं, हम लोगों का कोई काम अटका न रहेगा, मगर वाह रे कारीगरी!"
इन्द्रजीतसिंह--निःसन्देह ऐसी ही बात है, मगर जब तक हम लोग उस ताली को न पा लें, इस कमरे के बाहर नहीं होना चाहिए, कौन ठिकाना अगर किसी तरह दरवाजा बन्द हो गया और यहाँ न आ सके तो बड़ी मुश्किल होगी।
आनन्दसिंह--मैं भी यही मुनासिब समझता हूँ।
इन्द्रजीतसिंह--अच्छा, तब इस तरफ आओ।
इतना कहकर कुंअर इन्द्रजीतसिंह उस बड़ी तस्वीर की तरफ बढ़े और आनन्दसिंह उनके पीछे चले।
उस आवाज का मतलब जो बाजे में से सुनाई दी थी, इस जगह लिखने की कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती क्योंकि हमारे पाठक यदि उन शब्दों पर जरा भी गौर करेंगे तो मतलब समझ जायेंगे, कोई कठिन बात नहीं है।
५
कल्याणसिंह के ताली बजाने के साथ ही बहुत से आदमी हाथों में नंगी तलवारें लिए हुए उसी कोठरी में से निकल आये जिसमें से कल्याणसिंह निकला था, मगर शेरअली खाँ की मदद के लिए केवल एक वही नकाबपोश उस कमरे में था, जो दरवाजा खोलने के साथ ही उन्हें दिखाई दिया था। विशेष बातचीत का समय तो नहीं मिला मगर नकाबपोश ने शेरअलीखाँ से इतना अवश्य कहदिया कि "आप अपनी मदद के लिए अभी किसी को भी न बुलाइए, इन लोगों के लिए अकेला मैं ही बहुत हूँ, यदि मेरी बात पर आपको विश्वास न हो तो जल्दी से इस कमरे के बाहर हो जाइए
यद्यपि सैकड़ों आदमियों के मुकाबले में केवल एक नकाबपोश का इतना बड़ा हौसला दिखाना विश्वास करने योग्य न था, मगर शेरअली खाँ खुद भी जवांमर्द और दिलेर आदमी था, इस सबब से या शायद और किसी सबब से उसने नकाबपोश की बातों पर विश्वास कर लिया और किसी को बुलाने के लिए उद्योग न करके अपने बिछौने के नीचे से तलवार निकालकर लड़ने के लिए स्वयं भी तैयार हो गया।
यह नकाबपोश असल में भूतनाथ था जो सरयूसिंह के कहे मुताबिक शेरअली खाँ के पास आया था। उसे विश्वास था कि शेरअली खाँ कल्याणसिंह की मदद के लिए तैयार हो जायगा मगर जब उसने कमरे के बाहर से उन दोनों की बातें सुनीं और शेरअली खाँ को नेक, ईमानदार, इन्साफपसन्द और सच्चा बहादुर पाया तो बहुत प्रसन्न हुआ और जी-जान से उसकी मदद करने के लिए तैयार हो गया। हमारे पाठक यह तो जानते ही हैं कि भूतनाथ के पास भी कमलिनी का दिया हुआ एक तिलिस्मी खंजर है जिसे भूतनाथ पर कई तरह का शक और मुकदमा कायम होने पर भी कमलिनी ने अपनी बात को याद करके अभी तक नहीं लिया था। आज उसी खंजर की बदौलत भूतनाथ ने इतना बड़ा हौसला किया और बेईमानों के हाथ से शेरअली खाँ को बचा लिया।
जिस समय कल्याणसिंह ने भूतनाथ का मुकाबला करना चाहा, उस समय भूतनाथ ने फुर्ती से अपने चेहरे की नकाब उलट दी और ललकार कर कहा, "आज बहुत दिनों पर तुम लोग भूतनाथ के सामने आये हो, जरा समझ कर लड़ना।"
इतना कहकर भूतनाथ ने तिलिस्मी खंजर से दुश्मनों पर हमला किया, इस नीयत से कि किसी की जान भी न जाय और सब के सब गिरफ्तार कर लिए जायें।
सबसे पहले उसने खंजर का एक साधारण हाथ कल्याणसिंह पर लगाया जिससे उसकी दाहिनी कलाई जिसमें नंगी तलवार का कब्जा था, कटकर जमीन पर गिर पड़ी, साथ ही इसके तिलिस्मी खंजर की तासीर ने उसके बदन में बिजली पैदा कर दी और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।
जिस समय कल्याणसिंह और उसके साथियों ने भूतनाथ का नाम सुना, उसी समय उनकी हिम्मत का बँटवारा हो गया। आधी हिम्मत तो लाचारी के हिस्से में पड़कर उनके पास रह गई और आधी हिम्मत उनके उत्साह के साथ निकलकर वायुमण्डल की तरफ पधार गई। भूतनाथ चाहे परले सिरे का बहादुर हो या न हो मगर उसके कर्मों ने उसका नाम बहादुरी और ऐयारी की दुनिया में बड़े रौब और दाब के साथ मशहूर कर रक्खा था। कोई चाहे कैसा ही बहादुर और दिलेर आदमी क्यों न हो, मगर अपने मुकाबले में भूतनाथ का नाम सुनते ही उसकी हिम्मत टूट जाती थी। यहाँ वही मामला हुआ और दुश्मनों की पस्तहिम्मती ने उनकी कस्मत का फैसला भी शीघ्र ही कर दिया।
जिस समय कल्याणसिंह बेहोश होकर जमीन पर गिरा उसी समय एक सिपाही ने भूतनाथ पर तलवार का वार किया। भूतनाथ ने उसे तिलिस्मी खंजर पर रोका और इसके बाद खंजर उसके बदन से छुआ दिया जिसका नतीजा यह निकला कि दुश्मन की तलवार दो टूक हो गई और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। इसी बीच में बहादुर शेरअली खाँ ने दो सिपाहियों को जान से मार गिराया जिन्होंने उस पर हमला किया था। निःसन्देह कल्याणसिंह के साथी इतने ज्यादा थे कि शेरअलीखाँ को मार देते या गिरफ्तार कर लेते, मगर भूतनाथ की मुस्तैदी ने ऐसा न होने दिया। उस कमरे में खुलकर लड़ने की जगह न थी और इस सबब से भी भूतनाथ को फायदा ही पहुँचा। जितनी देर में शेरअली खां ने अपनी हिम्मत और मर्दानगी से चार आदमियों को बेकाम किया उतनी देर में भूतनाथ की चालाकी और फुर्ती की बदौलत तीस आदमी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। भूतनाथ बदन पर भी हलके दो-चार जख्म लगे, साथ ही इसके भूतनाथ को इस बात का भी विश्वास हो गया कि शेरअली खाँ जो कई जख्म खा चुका था ज्यादा देर तक इन लोगों के मुकाबले में ठहर न सकेगा अतएव उसने सोचा कि जहाँ तक हो सके, इस लड़ाई का फैसला जल्द ही कर देना चाहिए। ताज्जुब नहीं कि अपने साथियों को गिरते देखकर दुश्मनों का जोश बढ़ जाय, मगर उधर तो मामला ही दूसरा हो गया। अपने साथियों को बिना जख्म खाये गिरते और बेहोश होते देख दुश्मनों को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और उन्होंने सोचा कि भूतनाथ केवल ऐयार, बहादुर और लड़ाका ही नहीं है बल्कि वह किसी देवता का प्रबल इष्ट भी रखता है जिससे ऐसा हो रहा है। इस खयाल के साथ ही उन लोगों ने भागने का इरादा किया मगर ताज्जुब की बात थी कि वह रास्ता, जिधर से वे लोग आये थे, एकदम बन्द हो गया था। इस सबब से पीठ दिखाकर भागने वालों की जान पर भी आफत आई। इधर तो शेरअली खाँ की तलवार ने कई सिपाहियों का फैसला किया और उधर भूतनाथ ने तिलिस्मी खंजर का कब्जा दबाया जिससे बिजली की तरह चमक पैदा हुई और भागने वालों की आँखें एकदम बन्द हो गईं। फिर क्या था, भूतनाथ ने थोड़ी ही देर में तिलिस्मी खंजर की बदौलत बाकी बचे हुओं को भी बेहोश कर दिया और उस समय गिनती करने पर मालूम हुआ कि दुश्मन के सिर्फ पैंतालीस आदमी थे, कल्याणसिंह ने यह बात झूठ कही थी कि मेर साथ सौ सिपाही इस मकान में मौजूद हैं या आना ही चाहते हैं।
इतनी बड़ी लड़ाई और कोलाहल का चुपचाप निपटारा होना असम्भव था। शोरगुल, मारकाट और धरो-पकड़ो की आवाज ने मकान के बाहर तक खबर पहुँचा दी। पहरेवाले सिपाहियों में से एक सिपाही ऊपर चढ़ आया और यहाँ का हाल देख घबराकर नीचे उतर गया और अपने साथियों को खबर की। उसी समय यह बात चारों तरफ फैल गई और थोड़ी ही देर में राजा वीरेन्द्रसिंह के बहुत से सिपाही शेरअलीखाँ के कमरे में आ मौजूद हुए। उस समय लड़ाई खत्म हो चुकी थी और शेरअलीखां तथा भूतनाथ, जिसने पुनः अपने चेहरे पर नकाब चढ़ा ली थी, बेहोश, जख्मी और मरे हुए दुश्मनों को खुशी की निगाहों से देख रहे थे। शेरअलीखाँ ने राजा वीरेन्द्रसिंह आदमियों को देख कर कहा, "तहखाने की एक गुप्त राह से राजा वीरेन्द्रसिंह का दुश्मन कल्याणसिंह इतने आदमियों को लेकर बुरी नीयत से यहाँ आया था मगर (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इस बहादुर की मदद से मेरी जान बच गई और राजा वीरेन्द्रसिंह का भी कुछ नुकसान न हुआ। अब तुम लोग जहाँ तक जल्द हो सके, जिनमें जान है, उन्हें कैदखाने भिजवाने का और मुर्दो के जलवा देने का बन्दोबस्त करो और इस कमरे को भी साफ करा दो।"
इसके बाद उस कोठरी में जिसमें से कल्याणसिंह और उसके साथी लोग निकले थे, ताला बन्द करके शेरअलीखाँ भूतनाथ का हाथ पकड़े हुए कमरे के बाहर सहन में निकल आया और एक किनारे खड़ा होकर बातचीत करने लगा।
शेरअली--इस समय आपके आ जाने से केवल मेरी जान ही नहीं बची बल्कि राजा वीरेन्द्रसिंह का भी बहुतकुछ फायदा हुआ, हाँ, यह तो कहिए आप यहाँ कैसे आ पहुंचे? किसी ने आपको रोका नहीं?
भूतनाथ--मुझे कोई भी नहीं रोक सकता। तेजसिंह ने मुझे एक ऐसी चीज दे रक्खी है जिसकी बदौलत मैं राजा वीरेन्द्रसिंह की हुकूमत के अन्दर महल छोड़ कर जहाँ चाहे वहाँ जा सकता हूँ, कोई रोकने वाला नहीं। यहाँ मेरा आना कैसे हुआ इसका जवाब भी देता हूँ। मुझे और इन्द्रदेव के ऐयार सरयूसिंह को किसी तरह इस बात की खबर लग गई कि राजा शिवदत्त और कल्याणसिंह कैद से छूट गये हैं और बहुत से लड़ाकों को लेकर तहखाने के रास्ते से रोहतासगढ़ में पहुँच फसाद मचाना चाहते हैं। इस खबर ने हम दोनों को होशियार कर दिया। सरयूसिंह तो दुश्मनों के साथ भेष बदले हुए तहखाने में जा घुसा और मैं बाहर से इन्तजार करने के लिए आया था। यह न समझियेगा कि मैं सीधा आप के पास चला आया, नहीं, मैं हर तरह का इंतजाम करने के बाद यहां आया हूँ। इस समय इस किले के अन्दर वाली फौज लड़ने के लिए तैयार और मुस्तैद है, बहादुर लोग चौकन्ने और महल के सब दरवाजों पर मुस्तैद हैं, तोपें गोले उगलने के लिए तैयार हैं, और ऐयारों के जाल भी हर तरफ फैले हुए हैं। मगर इस बात की खबर मुझे कुछ भी नहीं है कि तहखाने के अन्दर क्या हो रहा है या क्या हुआ।
शेरअलीखां--बेशक तहखाने के अन्दर दुश्मनों ने जरूर गहरा उत्पात मचाया होगा। अफसोस! आज ही के दिन राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को तहखाने के अन्दर जाना था।
भूतनाथ--इस खबर ने तो मुझे और भी बदहवास कर रक्खा है। क्या करूं, तहखाने का कुछ भी भेद मुझे मालूम नहीं है और न उसके पेचीले तथा मकड़ी के जाले की तरह उलझन डालने वाले रास्तों की ही मुझे अच्छी तरह खबर है, नहीं तो इस समय मैं अवश्य तहखाने के अन्दर पहुंच जाता और अपनी बहादुरी तथा ऐयारी का तमाशा दिखलाता!
शेरअली–-बेशक ऐसा ही है। इस समय मेरा दिल भी इस खयाल से बेचैन हो रहा है कि तहखाने के अन्दर जाकर राजा साहब की कुछ भी मदद नहीं कर सकता। अभी थोड़ी ही देर हुई जब मेरे दिल में यह बात पैदा हुई कि जिस राह से कल्याणसिंह और उसके मददगार इस कमरे में आये हैं उसी राह से हम लोग भी तहखाने के अन्दर जाकर कोई काम करें, मगर बड़े ताज्जुब की बात है कि वह रास्ता भी बन्द हो गया। जहाँ तकमैं खयाल करता हूँ यह काम कल्याणसिंह के किसी पक्षपाती का नहीं है।
भूतनाथ--मैं भी ऐसा ही समझता हूँ। (कुछ सोच कर) हाँ एक बात और भी मेरे ध्यान में आती है।
शेरअली--वह क्या?
भूतनाथ--यह तो निश्चय हो ही गया कि हम लोग किसी तरह तहखाने के अन्दर जाकर मदद नहीं कर सकते और न इस किले में रहने में ही किसी तरह का फायदा है। शेरअली बेशक ऐसा ही है।
भूतनाथ--तब हमको खोह के उस मुहाने पर पहुंचना चाहिए जिस राह से दुश्मन लोग इस तहखाने में आये हैं। ताज्जुब नहीं कि दुश्मन लोग अपना काम करके या भाग के उसी राह से तहखाने के बाहर निकलें। यदि ऐसा हुआ तो निःसन्देह हम लोग कोई अच्छा काम कर सकेंगे।
शेरअली—(खुश होकर) ठीक है, बेशक ऐसा ही होगा, तो अब विलम्ब करना उचित नहीं है, चलिए और जल्दी चलिए।
भूतनाथ--चलिए, मैं तैयार हूँ।
इतना कहकर भूतनाथ और शेरअलीखां ने राजा वीरेन्द्रसिंह के आदमियों की लाशों को उठवाने और जिन्दों को कैद करने के विषय में पुनः समझा-बुझा कर तथा और भी कुछ कह-सुनकर किले के बाहर का रास्ता लिया और बहुत जल्द उस ठिकाने जा पहुंचे जहां के लिए इरादा कर चुके थे।
६
कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह फिर उस बड़ी तस्वीर के पास आये जिसके नीचे महाराज सूर्यकान्त का नाम लिखा हुआ था। दोनों कुमार उस तस्वीर पर फिर से गौर करने और उस लिखावट को पढ़ने लगे जिसे पहले पढ़ चुके थे। हम ऊपर लिख आए हैं कि इस तस्वीर में कुछ लेख ऐसा भी था जो बहुत बारीक हर्मों में लिखा होने के कारण कुमार से पढ़ा नहीं गया। अब दोनों कुमार उसी को पढ़ने के लिए उद्योग करने लगे क्योंकि उसका पढ़ना उन दोनों ने बहुत ही आवश्यक समझा।
इस कमरे में जितनी तस्वीरें थीं वे सब दीवार में बहुत ऊँचे पर न थीं बल्कि इतनी नीचे थीं कि देखने वाला उनके मुकाबले में खड़ा हो सकता था। यही सबब था कि महाराज सूर्यकान्त की तस्वीर में जो कुछ लिखा था उसे दोनों कुमारों ने बखूबी पढ़ लिया था मगर कुछ लेख वास्तव में बहुत ही बारीक अक्षरों में लिखा हुआ था, इसी से ये दोनों भाई उसे पढ़ न सके। दोनों भाइयों ने तस्वीर की बनावट और उसके चौखटे (फ्रेम) पर अच्छी तरह ध्यान दिया तो चारों कोनों में छोटे-छोटे चार गोल शीशे जड़े हुए दिखाई पड़े जिनमें तीन शीशे तो पतले और एक ही रंग-ढंग के थे, मगर चौथा शीशा मोटा दलदार और बहुत साफ था। इन्द्रजीतसिंह ने उस मोटे शीशे पर उँगली रक्खी तो वह हिलता हुआ मालूम पड़ा और जब कुमार ने दूसरा हाथ उसके नीचे रख कर उँगली से दबाया तो चौखटे से अलग होकर हाथ में आ रहा। इस समय आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर हाथ में लिए हुए रोशनी कर रहे थे। उन्होंने इन्द्रजीतसिंह से कहा, "मेरा दिल गवाही देता है कि यह शीशा उन अक्षरों के पढ़ने में अवश्य कुछ सहायता देगा जो बहुत बारीक होने के सबब से पढ़े नहीं जाते।"
इन्द्रजीतसिंह--मेरा भी यही खयाल है और इसी सबब से मैंने इसे निकाला भी है।
आनन्दसिंह--इसीलिए यह मजबूती के साथ जड़ा हुआ भी नहीं था।
इन्द्रजीतसिंह--देखो, अब सब मालूम ही हुआ जाता है।
इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने उस शीशे को उन बारीक अक्षरों के ऊपर रक्खा और वे अक्षर बड़े-बड़े मालूम होने लगे। अब दोनों भाई बड़ी प्रसन्नता से उस लेख को पढ़ने लगे। यह लिखा हुआ था––
स्व गिवर नर्ग दै कै पै / (खूब समझ के तब आगे पैर रक्खो) / 6 · –– · 3 · –– · अ · 5 · –– · 3 · –– · ए / 3 · –– · 3 · –– · ए · 8 · –– · 4 · –– · ० / 7 · –– · 4 · –– · अ · 8 · –– · 3 · –– · ए / 7 · –– · 3 · –– · ए · 1 · –– · 1 · –– · ० / 3 · –– · 1 · –– · औ · 7 · –– · 3 · –– · ० / 5 · –– · 1 · –– · ० · 2 · –– · 3 · –– · ० / 7 · –– · 2 · –– · ए · 6 · –– · 5 · –– · ० / 6 · –– · 5 · –– · ए · 5 · –– · 1 · –– · ० / 5 · –– · 1 · –– · अ · 2 · –– · 1 · –– · ० / 7 · –– · 3 · –– · ई · 7 · –– · 2 · –– · ओ / 2 · –– · 2 · –– · ओ · 5 · –– · 5 · –– · ० / 3 · –– · 3 · –– · ओ · 8 · –– · 4 · –– · ई / 5 · –– · 1 · –– · इ · 5 · –– · 1 · –– · ओ / 7 · –– · 3 · –– · ० · 3 · –– · 3 · –– · अ / 8 · –– · 3 · –– · ० · 5 · –– · 5 · –– · ० / 6 · –– · 5 · –– · ई · 6 · –– · 1 · –– · ० / 2 · –– · 2 · –– · अ · 7 · –– · 2 · –– · ० / 3 · –– · 3 · –– · ० · 1 · –– · 1 · –– · आ / 7 · –– · 2 · –– · ० · 6 · –– · 8 · –– · ० / 1 · –– · 1 · –– · ० · 5 · –– · 5 · –– · ए / 6 · –– · 1 · –– · ० · 2 · –– · 3 · –– · ई / 5 · –– · 5 · –– · ए · –– · ––
थोड़ी देर तक तो इस लेख का मतलब समझ में न आया लेकिन बहुत सोचने पर आखिर दोनों कुमार उसका मतलब समझ गए और प्रसन्न होकर आनन्दसिंह बोले––
आनन्दसिंह––देखिये, तिलिस्म के सम्बन्ध में कितनी कठिनाइयाँ रक्खी हुई हैं!
इन्द्रजीतसिंह––यदि ऐसा न हो तो हर एक आदमी तिलिस्म के भेद को समझ जाय।
आनन्दसिंह––अच्छा तो अब क्या करना चाहिए?
इन्द्रजीतसिंह--सबसे पहले बाजे की ताली खोजनी चाहिए, इसके बाद बाजे की आज्ञानुसार काम करना होगा।
दोनों भाई बाजे वाले चबूतरे के पास गये और घूम-घूमकर अच्छी तरह देखने लगे। उसी समय पीछे की तरफ से आवाज आई, "हम भी आ पहुँचे!" दोनों भाइयों ने ताज्जुब के साथ घूमकर देखा तो राजा गोपालसिंह पर निगाह पड़ी।
यद्यपि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को राजा गोपालसिंह के साथ पहले ही मोहब्बत हो गई थी, मगर जब से यह मालूम हुआ कि रिश्ते में वे इनके भाई हैं तब से मुहब्बत ज्यादा हो गई थी और इसीलिए इस समय उन्हें देखते ही इन्द्रजीतसिंह दौड़कर उनके गले से लिपट गये तथा उन्होंने भी बड़े प्रेम से दबाया। इसके बाद आनंदसिंह भी अपने भाई की तरह गले मिले और जब अलग हुए तो गोपालसिंह ने कहा, “मालूम होता है कि महाराज सूर्यकान्त की तस्वीर के नीचे जो कुछ लिखा है उसे आप दोनों भाई पढ़ चुके हैं।"
इन्द्रजीत--जी हाँ, और यह मालूम करके हमें बड़ी खुशी हुई कि आप हमारे भाई हैं! मगर मैं समझता हूँ कि आप इस बात को पहले ही से जानते थे।
गोपालसिंह--बेशक इस बात को मैं बहुत दिनों से जानता हूँ क्योंकि इस जगह कई दफे आ चुका हूँ, लेकिन इसके अतिरिक्त तिलिस्म-सम्बन्धी एक ग्रन्थ, जो मेरे पास है, उसमें भी यह बात लिखी हुई है।
आनन्दसिंह--तो इतने दिनों तक आपने हम लोगों से कहा क्यों नहीं?
गोपालसिंह--उस किताब में जो मेरे पास है ऐसा करने की मनाही थी, मगर अब मैं कोई बात आप लोगों से नहीं छिपा सकता और न आप ही मुझसे छिपा सकते हैं।
इन्द्रजीतसिंह--क्या आप इसी राह से आते-जाते हैं और आज भी इसी राह से हम लोगों को छोड़ कर निकल गये थे?
गोपाल--नहीं-नहीं, मेरे आने-जाने का रास्ता दूसरा ही है। उस कुएँ में आपने कई दरवाजे देखे होंगे, उनमें जो सबसे छोटा दरवाजा है मैं उसी राह से आता-जाता हूँ; यहां दूसरे ही काम के लिए मुझे कभी-कभी आना पड़ता है।
इन्द्रजीतसिंह--यहाँ आने की आपको क्या जरूरत पड़ा करती है?
गोपालसिंह--इधर तो मुद्दत से मैं आफत में फंसा हुआ था, आप ही ने मेरी जान बचाई है, इसलिए दो-दफे से ज्यादा आने की नौबत नहीं आई, हाँ इसके पहले महीने में एक दफे अवश्य आना होता था और इन कमरों की सफाई मुझे ही करनी पड़ती थी। जो किताब मेरे पास है और जिसका जिक्र मैंने अभी किया उसके पढ़ने से इस तिलिस्म का कुछ हाल और जमानिया की गद्दी पर बैठने वालों के लिए जो-जो आज्ञा और नियम बड़े लोग लिख गए हैं, आपको मालूम होगा। उसी नियमानुसार हर महीने की अमावस्या को मैं यहाँ आया करता था। आपकी, आनन्दसिंह की और अपनी तस्वीरें मैंने ही नियमानुसार इस कमरे में लगाई हैं और इसी तरह बड़े लोग अपने-अपने समय में अपनी और अपने भाइयों की तस्वीरें गुप्त रीति से तैयार कराके इस कमरे में रखते चले आए हैं। नियमानुसार यह एक आवश्यक बात थी कि जब तक आप लोग स्वयं इस कमरे में न आ जायें मैं हरएक बात आप लोगों से छिपाऊँ और इसीलिए मैं इस तिलिस्म के बाहर भी आपको नहीं ले गया जब कि आपने बाहर जाने की इच्छा प्रकट की थी, मगर अब कोई बात छिपाने की आवश्यकता न रही।
इन्द्रजीतसिंह--इस बाजे का हाल भी आपको मालूम होगा?
गोपालसिंह–-केवल इतना ही कि इसमें तिलिस्म के बहुत से भेद भरे हुए हैं, मगर इसकी ताली कहां है सो मैं नहीं जानता।
इन्द्रजीतसिंह--क्या आपके सामने यह बाजा कभी बोला?
गोपालसिंह--इस बाजे की आवाज कई दफे मैंने सुनी है। (जमीन में गड़े एक पत्थर की तरफ इशारा करके) इस पर पैर पड़ने के साथ ही बाजा बजने लगता है, दो तीन गत के बाद कुछ बातें कहता और फिर चुप हो जाता है, अगर इस पत्थर पर पैर न पड़े तो कुछ भी नहीं बोलता।
इन्द्रजीतसिंह--(वह किताब दिखाकर जिस पर बाजे की आवाज लिखी थी) यह आवाज भी आपने सुनी होगी?
गोपालसिंह--हां, सुन चुका हूं मगर इसके लिए उद्योग करना सबसे पहले आप का काम है।
आनन्दसिंह--महाराज सूर्यकान्त की तस्वीर के नीचे बारीक अक्षरों में जो कुछ लिखा है उसे भी आप पढ़ चुके हैं?
गोपालसिंह--नहीं, क्योंकि अक्षर बहुत बारीक हैं अतः पढ़े नहीं जाते।
इन्द्रजीतसिंह--हम लोग इसे पढ़ चुके हैं।
गोपालसिंह--(ताज्जुब से) सो कैसे? कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने शीशे वाला हाल गोपालसिंह से कहा और जिस तरह स्वयं उन बारीक अक्षरों को पढ़ चुके थे उसी तरह उन्हें भी पढ़वाया।
गोपालसिंह--समय ने इस काम को आप लोगों के लिए ही रख छोड़ा था।
इन्द्रजीतसिंह--इसका मतलब आप समझ गये?
गोपालसिंह--जी हाँ, समझ गया।
इन्द्रजीतसिंह--अब आप हम लोगों को बड़ाई के शब्दों से सम्बोधन न किया कीजिए क्योंकि आप बड़े हैं और हम लोग छोटे हैं, इस बात का पता लग चुका है।
गोपालसिंह--(हँसकर) ठीक है, अब ऐसा ही होगा, अच्छा तो बाजेवाले चबूतरे में से ताली निकालनी चाहिए। इन्द्रजीतसिंह जी हां, हम लोग इसी फिक्र में थे कि आप आ पहुँचे, लेकिन मुझे तो और भी बहुत सी बातें आपसे पूछनी हैं।
गोपालसिंह--खैर, पूछ लेना, पहले ताली के काम से छुट्टी पा लो।
आनन्दसिंह--मैंने इस कमरे में एक औरत को आते हुए देखा था मगर वह मुझ पर निगाह पड़ने के साथ ही पिछले पैर लौट गई और दूसरी कोठरी में जाकर गायब हो गई। इस बात का पता न लगा कि वह कौन थी या यहाँ क्योंकर आई।
गोपालसिंह--औरत! यहाँ पर!
आनन्दसिंह--जी हाँ।
गोपालसिंह--यह तो एक आश्चर्य की बात तुमने कही! अच्छा खुलासा कह जाओ। आनन्दसिंह अपना हाल खुलासा बयान कर गये, जिसे सुनकर गोपालसिंह को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और वे बोले, "खैर थोड़ी देर के बाद इस पर गौर करेंगे। किसी औरत का यहाँ आना निःसन्देह आश्चर्य की बात है।"
इन्द्रजीतसिंह--(खून से लिखी किताब दिखा कर) मेरी राय है कि आप इस किताब को पढ़ जायें और जो तिलिस्मी किताब आपके पास है उसे पढ़ने के लिए मुझे दे दें।
गोपालसिंह--निःसन्देह वह किताब आपके पढ़ने के लायक है, उससे आपको बहुत फायदा पहुंचेगा और खाने-पीने तथा समय पड़ने पर इस तिलिस्म से बाहर निकल जाने में कोई अड़चन न पड़ेगी और यहाँ के कई गुप्त भेद भी आप लोगों को मालूम हो जायेंगे। आप इस बाजे की ताली निकालने का उद्योग कीजिए, तब तक मैं जाकर वह किताब ले आता हूँ।
इन्द्रजीतसिंह--बहुत अच्छी बात है, मगर बाजे की ताली निकालने के समय आप यहां मौजूद क्यों नहीं रहते? आपसे बहुत-कुछ मदद हम लोगों को मिलेगी।
गोपालसिंह--क्या हर्ज है, ऐसा ही सही, आप लोग उद्योग करें।
यह तो मालूम ही हो चुका था कि बाजे की ताली उसी चबूतरे में है जिस पर बाजा रक्खा या जड़ा हुआ है। अस्तु, तीनों भाई उसी चबूतरे की तरफ बढ़े। राजा गोपालसिंह के पास भी तिलिस्मी खंजर मौजूद था जिसे उन्होंने हाथ में ले लिया और कब्जा दवा कर रोशनी करने के बाद कहा, "आप दोनों आदमी उद्योग करें, मैं रोशनी दिखाता हूँ।"
आनन्दसिंह--(आश्चर्य से)आप भी अपने पास तिलिस्मी खंजर रखते हैं?
गोपालसिंह--हां, इसे प्रायः अपने पास रखता हूँ और जब तिलिस्म के अन्दर आने की आवश्यकता पड़ती है तब तो अवश्य ही रखना पड़ता है क्योंकि बड़े लोग ऐसा करने के लिए लिख गये हैं।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह दोनों भाई बाजे वाले चबूतरे के चारों तरफ घूमने और उसे ध्यान देकर देखने लगे। वह चबूतरा किसी प्रकार की धातु का और चौखूटा बना हुआ था। उसके दो तरफ तो कुछ भी न था, मगर बाकी दो तरफ मुट्ठ लगे हुए थे जिन्हें देख इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, "मालूम होता है कि ये दोनों मुळे पकड़ कर खींचने के लिए बने हुए हैं।"
आनन्दसिंह--मैं भी यही समझता हूँ।
इन्द्रजीतसिंह--अच्छा खींचो तो सही।
आनन्दसिंह--(मुठे को अपनी तरफ खींच और घुमाकर)यह तो अपनी जगह से हिलता नहीं! मालूम होता है कि हम दोनों को एक साथ उद्योग करना पड़ेगा और इसी लिए इसमें दो मुट्ठे बने हुए हैं।
इन्द्रजीतसिंह--बेशक ऐसा ही है, अच्छा हम भी दूसरे मुठे को खींचते हैं। दोनों आदमियों का जोर एक साथ ही लगना चाहिए।
दोनों भाइयों ने आमने-सामने खड़े होकर दोनों मुट्ठों को खूब मजबूती से पकड़ा और बाएँ-दाहिने दोनों तरफ को उमेठा, मगर वह बिलकुल न घूमा। इसके बाद दोनों ने उन्हें अपनी तरफ खींचा और कुछ खिंचते देखकर दोनों भाइयों ने समझा कि हमें इसमें अपनी पूरी ताकत खर्च करनी पड़ेगी। आखिर ऐसा ही हुआ, अर्थात् दोनों भाइयों के खूब जोर करने पर वे दोनों मुठे खिच कर बाहर निकल आये और इसके साथ ही उस चबूतरे की एक तरफ की दीवार (जिधर मुट्ठा नहीं था) पल्ले की तरह खुल गई। राजा गोपालसिंह ने झुक कर उसके अन्दर तिलिस्मी खंजर की रोशनी दिखाई और तीनों भाई बड़े गौर से अन्दर देखने लगे। एक छोटी सी चौकी नजर आई जिस पर छोटी सी तांबे की तख्ती के ऊपर एक चाबी रक्खी हुई थी। इन्द्रजीतसिंह ने अन्दर की तरफ हाथ बढ़ा कर चौकी खींचनी चाही मगर वह अपनी जगह से न हिली, तब उन्होंने ताँबे की तख्ती और ताली उठा ली और पीछे की तरफ हटकर उस खुले हुए पल्ले को बन्द करना चाहा मगर वह भी बन्द न हुआ, लाचार उसे उसी तरह छोड़ दिया। तांबे की तख्ती पर दोनों भाइयों ने निगाह डाली तो मालूम हुआ कि उस पर बाजे में ताली लगाने की तरकीव लिखी हुई है और ताली वही है जो उस तख्ती के साथ थी।
गोपालसिंह–-(इन्द्रजीतसिंह से) ताली तो अब आपको मिल ही गई, मैं उचित समझता हूँ कि थोड़ी देर के लिए आप लोग यहां से चल कर बाहर की हवा खाएँ और सुस्ताने के बाद फिर जो कुछ मुनासिब समझें करें।
इन्द्रजीतसिंह--हाँ, मेरी भी यही इच्छा है, इस बन्द जगह में बहुत देर तक रहने से तबीयत घबरा गई है और सिर में चक्कर आ रहा है।
आनन्दसिंह--मेरी भी यही हालत है और प्यास बड़े जोर की मालूम होती है।
गोपालसिंह--बस तो इस समय यहाँ से चले चलना ही बेहतर है। हम आप लोगों को एक बाग में ले चलते हैं जहाँ हर तरह का आराम मिलेगा और खाने-पीने का भी सुभीता होगा!
इन्द्रजीतसिंह--बहुत अच्छा। चलिये, किस रास्ते से चलना होगा?
गोपालसिंह--इसी राह से जिससे आप आये हैं।
इन्द्रजीतसिंह--तब तो वह कमरा भी आनन्द के देखने में आ जायगा जिसे मैं स्वयं इन्हें दिखाना चाहता था, अच्छा चलिये।
राजा गोपाल सिंह अपने दोनों भाइयों को साथ लिए हुए वहाँ से रवाना हुए और उस कोठरी में गये जिसमें से आनन्दसिंह ने अपने भाई इन्द्रजीतसिंह को आते देखा था। उस जगह इन्द्रजीतसिंह ने राजा गोपालसिंह से कहा, "क्या आप इसी राह से यहाँ आते थे? मुझे तो इस दरवाजे की जंजीर खंजर से काटनी पड़ी थी!"
गोपालसिंह--ठीक है, मगर हम इस ताले को हाथ लगाकर एक मामूली इशारे से खोल लिया करते थे।
आनन्दसिंह–--इस तिलिस्म में जितने ताले हैं क्या वे सब इशारे ही से खुला करते हैं या किसी खटके पर हैं?
गोपालसिंह---सब तो नहीं मगर कई ऐसे ताले हैं जिनका हाल हमें मालूम है।
इतना कहकर गोपालसिंह आगे बढ़े और उस विचित्र कमरे में पहुँचे जिसके बारे में इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा था कि उस कमरे में जो कुछ मैंने देखा सो कहने योग्य नहीं बल्कि इस योग्य है कि तुम्हें अपने साथ ले चलकर दिखाऊँ।
वास्तव में वह कमरा ऐसा ही था। उसके देखने से आनन्दसिंह को भी बड़ा ही आश्चर्य हुआ। मगर अवश्य ही वह राजा गोपालसिंह के लिए कोई नई बात न थी क्योंकि वे कई दफा उस कमरे को देख चुके थे। तिलिस्मी खंजर की तेज रोशनी के कारण वहाँ की कोई चीज ऐसी न थी जो साफ-साफ दिखाई न देती हो और इसीलिए वहाँ की सब चीजों को दोनों भाइयों ने खूब ध्यान देकर देखा।
इस कमरे की लम्बाई लगभग पच्चीस हाथ के होगी और यह इतना ही चौड़ा भी होगा। चारों कोनों में चार जड़ाऊ सिंहासन रक्खे हुए थे, और उन पर बड़े-बड़े चमकदार हीरे, मानिक, पन्ने और मोतियों के ढेर लगे हुए थे। उनके नीचे सोने की थालियों में कई प्रकार के जड़ाऊ जेवर रक्खे हुए थे जो औरतों और मर्दो के काम में आ सकते थे। चारों सिंहासनों के बगल से लोहे के महराबदार खम्भे निकले हुए थे जो कमरे के बीचोंबीच में आकर डेढ़ पुर्से की ऊँचाई पर मिल गये थे और उनके सहारे एक आदमी लटक रहा था जिसके गले में लोहे की जंजीर फाँसी के ढंग पर लगी हुई थी। देखने से यही मालूम होता था कि यह आदमी इस तौर फाँसी पर लटकाया गया है। उस आदमी के नीचे एक हसीन औरत सिर के बाल खोले इस ढंग से बैठी हुई थी जैसे उस लटकते हुए आदमी का मातम कर रही हो, तथा उसके पास ही एक दूसरी औरत हाथ में लालटेन लिए खड़ी थी जिसे देखने के साथ ही आनन्दसिंह बोल उठे, "यह वही औरत है जिसे मैंने उस कमरे में देखा था और जिसका हाल आप लोगों से कहा था, फर्क केवल इतना ही है कि इस समय इसके हाथ वाली लालटेन बुझी हुई है।"
गोपालसिंह---तुम भी तो अनोखी बात कहते हो, भला ऐसा कभी हो सकता है?
आनन्दसिंह---हो सके चाहे न हो सके, मगर यह औरत निःसन्देह वही है जिसे मैं देख चुका हूँ। अगर आपको विश्वास न हो तो इससे पूछ कर देखिये।
गोपालसिंह---(हँसकर) क्या तुम इसे सजीव समझते हो?
आनन्दसिंह---तो क्या यह निर्जीव है?
गोपालसिंह---बेशक ऐसा ही है। तुम इसके पास जाओ और जरा हिला-डुला कर देखो।
आनन्दसिंह उस औरत के पास गए और कुछ देर तक खड़े होकर देखते रहे मगर बड़ों के लिहाज से यह सोच कर हाथ नहीं लगाते थे कि कहीं यह सजीव न हो। राजा गोपालसिंह उनका मतलब समझ गये और स्वयं उस पुतली के पास जाकर बोले, "खाली देखने से पता न लगेगा, इसे हिला-डुला और ठोंक कर देखो!"
इतना कहकर उन्होंने उस पुतली के सिर पर दो-तीन चपतें जमाईं, जिससे एक प्रकार की आवाज पैदा हुई जैसे किसी धातु की पोली चीज को ठोंकने से निकलती है। उस समय आनन्दसिंह का शक दूर हुआ और वे बोले, "निःसन्देह यह निर्जीव है, मगर वह औरत भी ठीक वैसी ही थी, डील-डौल, रंग-ढंग, कपड़ा-लत्ता किसी भी बात में फर्क नहीं है! ईश्वर जाने क्या मामला है!"
गोपालसिंह--ईश्वर जाने, क्या भेद है! परन्तु जब से तुमने यह बात कही है हमारे दिल को एक खुटका-सा लग गया है, जब तक उसका ठीक-ठीक पता न लगेगा, जी को चैन न पड़ेगा। खैर, इस समय तो यहाँ से चलना चाहिए।
राजा गोपालसिंह उस लटकते हुए आदमी के पास गए और उसका एक पैर पकड़ कर नीचे की तरफ दो-तीन बार झटका दिया, तब वहाँ से हट कर इन्द्रजीतसिंह के पास चले आये। झटका देने के साथ ही वह आदमी जोर-जोर से झोंके खाने लगा और कमरे में किसी तरह की भयानक आवाज आने लगी। मगर यह नहीं मालूम होता था कि आवाज किधर से आ रही है, हर तरफ वह भयानक आवाज गूंज रही थी। यह हालत चौथाई घड़ी तक रही, इसके बाद जोर की आवाज हुई और सामने की तरफ एक छोटा-सा दरवाजा खुला हुआ दिखाई दिया। उस समय कमरे में किसी तरह की आवाज सुनाई न देती थी, हर तरह से सन्नाटा हो गया था।
दोनों भाइयों को साथ लिए राजा गोपाल सिंह दरवाजे के अन्दर गए जो अभी खुला था। उसके अन्दर ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं जिस राह से तीनों भाई ऊपर चढ़ गए और अपने को एक छोटे-से नजरबाग में पाया। यह बाग यद्यपि छोटा था मगर बहुत ही खूबसूरत और सूफियाने किते का बना हुआ था। संगमर्मर की बारीक नालियों में नहर का जल चकाबू के नक्शे की तरह घूम-फिर कर वाग की खूबसूरती को बढ़ा रहा था। खुशबूदार फूलों की महक हवा के हलके-हलके झपेटों के साथ आ रही थी। सूर्य अस्त हो चुका था, रात के समय खिलने वाली कलियों चन्द्रदेव की आशा लग रही थी। कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह बहुत देर तक अंधेरे में रहने तथा भूख-प्यास के कारण बहुत परेशान हो रहे थे, नहर के किनारे साफ पत्थर पर बैठ गए, कपड़े उतार दिये और मोती सरीखे साफ जल से हाथ-मुंह धोने के बाद दो-तीन चुल्लू जल पीकर हरारत मिटाई।
गोपालसिंह--अब आप लोग इस बाग में बेफिक्री के साथ अपना काम करें। मैदान जायें और स्नान-संध्या-पूजा से छुट्टी पाकर बाग की सैर करें, तब तक मैं खास बाग में जाकर कुछ खाने का सामान और तिलिस्मी किताब जो मेरे पास है ले आता हूँ। इस बाग में मेवे के पेड़ भी बहुतायत से हैं, यदि इच्छा हो तो आप उनके फल खाने के काम में ला सकते हैं।
इन्द्रजीतसिंह--बहुत अच्छी बात है, आप जाइये, मगर जहाँ तक हो सके, जल्दी ही आइएगा।
आनन्दसिंह--क्या हम लोग आपके साथ खास बाग में नहीं चल सकते?
गोपालसिंह--क्यों नहीं चल सकते? मगर मैं इस समय आप लोगों को तिलिस्म के बाहर ले जाना पसन्द नहीं कर सकता और तिलिस्मी किताब में भी ऐसा करने की मनाही है।
इन्द्रजीतसिंह--खैर, कोई चिन्ता नहीं, आप जाइए और जल्द लौट कर आइए। जब वह तिलिस्मी किताब जो आपके पास है हम लोग पढ़ लेंगे और आप भी इस 'रिक्तगंथ' को जो मेरे पास है पढ़ लेंगे तब जैसी राय होगी किया जायगा।
गोपालसिंह--ठीक है, अच्छा तो अब मैं जाता हूँ।
इतना कहकर राजा गोपालसिंह एक तरफ चले गये और कुंअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह जरूरी कामों से छुट्टी पाने की फिक्र में लगे।
७
राह पहर भर से ज्यादा जा चुकी है। चन्द्रदेव उदय हो चुके हैं मगर अभी इतने ऊंचे नहीं उठे हैं कि बाग के पूरे हिस्से पर चांदनी फैली हुई दिखाई देती, हाँ, बाग के उस हिस्से पर चाँदनी का फर्श जरूर बिछ चुका था जिधर कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह एक चट्टान पर बैठे हुए बातें कर रहे थे। ये दोनों भाई अपने जरूरी कामों से छुट्टी पा चुके थे और संध्या-वंदन करके दो-चार फलों से आत्मा को सन्तोष देकर आराम से बैठे बातें करते हुए राजा गोपालसिंह के आने का इन्तजार कर रहे थे। यकायक बाग के उस कोने में, जिधर चाँदनी न होने तथा पेड़ों के झुरमुट के कारण अंधेरा था, दीये की चमक दिखाई पड़ी। दोनों भाई चौकन्ने होकर उस तरफ देखने लगे और दोनों को गुमान हुआ कि राजा गोपालसिंह आते होंगे, मगर उनका शक थोड़ी ही देर बाद जाता रहा जब एक औरत को हाथ में लालटेन लिए अपनी तरफ आते देखा।
इन्द्रजीतसिंह--यह औरत इस बाग में क्योंकर आ पहुँची?
आनन्दसिंह--ताज्जुब की बात है। मगर मैं समझता हूँ कि इसे हम दोनों भाइयों के यहाँ होने की खबर नहीं है, अगर होती तो इस तरह बेफिक्री के साथ कदम बढ़ाती हुई न आती।
इन्द्रजीतसिंह--मैं भी यही समझता हूँ, अच्छा हम दोनों को छिप कर देखना चाहिए कि यह कहाँ जाती और क्या करती है।
आनन्दसिंह--मेरी भी यही राय है।
दोनों भाई वहाँ से उठे और धीरे-धीरे चलकर एक पेड़ की आड़ में छिप रहे, जिसे चारों तरफ से लताओं ने अच्छी तरह घेर रक्खा था और जहाँ से उन दोनों की निगाह बाग के हर एक हिस्से और कोने में भी बखूबी पहुँच सकती थी। जब वह औरत घूमती हुई उस पेड़ के पास से होकर निकली, तब आनन्दसिंह ने धीरे से कहा,"यह वही औरत है।"
इन्द्रजीतसिंह--कौन?
आनन्दसिंह--जिसे तिलिस्म के अन्दर बाजे वाले कमरे में मैंने देखा था और जिसका हाल आपसे तथा गोपाल भाई से कहा था।
इन्द्रजीतसिंह--अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर इसे गिरफ्तार करना चाहिए।
आनन्दसिंह--जरूर गिरफ्तार करना चाहिए।
दोनों भाई सलाह करके उस पेड़ की आड़ में से निकले और उस औरत को घेर कर गिरफ्तार करने का उद्योग करने लगे। थोड़ी ही देर के बाद नजदीक होने पर इन्द्रजीतसिंह ने भी देख कर निश्चय कर लिया कि हाथ में लालटेन लिए हुए यह वही औरत है जिसे तिलिस्म में फाँसी लटकते हुए आदमी के साथ-साथ निर्जीव खड़े देखा था।
उस औरत को भी मालूम हो गया कि दो आदमी उसे गिरफ्तार करना चाहते हैं अतएव वह चैतन्य हो गई और चमेली की टट्टियों में घूम-फिर कर कहीं गायब हो गई। दोनों भाइयों ने बहुत उद्योग और पीछा किया मगर नतीजा कुछ भी न निकला। वह औरत ऐसी गायब हुई कि कोई निशान भी न छोड़ गई, न मालूम वह चमेली की टट्टियों में लीन हो गई या जमीन के अन्दर समा गई। दोनों भाई लज्जा के साथ-हीसाथ निराश होकर अपनी जगह लौट आये और उसी समय राजा गोपालसिंह को भी एक हाथ में चंगेर और दूसरे हाथ में तेज रोशनी की अद्भुत लालटेन लिए हुए आते देखा। गोपालसिंह दोनों भाइयों के पास आए और लालटेन तथा चंगेर जिसमें खाने की चीजें थीं जमीन पर रन कर इस तरह बैठ गये जैसे बहुत दूर से चलकर आता हुआ मुसाफिर परेशानी और बदहवासी की हालत में आगे सफर करने से निराश होकर पृथ्वी की शरण लेता है, या कोई-कोई धनी अपनी भारी रकम खो देने के बाद चोरों की तलाश से निराश और हताश होकर बैठ जाता है। इस समय राजा गोपाल सिंह के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था और वे बहुत ही परेशान और बदहवास मालूम होते थे। कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने घबराकर पूछा, "कहिए कुशल तो है?"
गोपालसिंह--(घबराहट के साथ) कुशल नहीं है। इन्द्रजीतसिंह-सो क्यों?
गोपालसिंह--मालूम होता है कि हमारे घर में किसी जबर्दस्त दुश्मन ने पैर रक्खा है और वह हमारे यहाँ से उस चीज को ले गया जिसके भरोसे पर हम अपने को तिलिस्म का राजा समझते थे और तिलिस्म तोड़ने के समय आपको काफी मदद देने का हौसला रखते थे।
आनन्दसिंह--वह कौन-सी चीज थी?
गोपालसिंह---वही तिलिस्मी किताब, जिसका जिक्र आप लोगों से कर चुके हैं और जिसे लाने के लिए हम इस समय गए थे।
इन्द्रजीतसिंह--(रंज के साथ) अफसोस! आप उसे छिपाकर नहीं रखते थे?
गोपालसिंह--छिपाकर तो ऐसा रखते थे कि हमें वर्षों तक कैदखाने में सड़ाने और मूर्दा बनाने पर भी मुन्दर, जिसने अपने को मायारानी बना रक्खा था, उस किताब को न पा सकी।
इन्द्रजीतसिंह--तो आज वह यकायक गायब कैसे हो गई?
गोपालसिंह--न मालूम क्योंकर गायब हो गई, मगर इतना जरूर कह सकते हैं कि जिसने यह किताब चुराई है वह तिलिस्म के भेदों से कुछ जानकार अवश्य हो गया है। इसे आप लोग साधारण बात न समझिए! इस चोरी से हमारा उत्साह भंग हो गया और हिम्मत जाती रही, हम आप लोगों को इस तिलिस्म में किसी तरह की मदद देने लायक न रहे, और हमें अपनी जान जाने का भी खौफ हो गया। इतना ही नहीं, सबसे ज्यादा तरदुद की बात तो यह है कि वह चोर आश्चर्य नहीं कि अब आप लोगों को भी दुःख दे।
इन्द्रजीतसिंह--यह तो बहुत बुरा हुआ।
गोपालसिंह--बेशक बुरा हुआ। हाँ, यह तो बताइये, इस बाग में लालटेन लिए कौन घूम रहा था?
आनन्दसिंह--वही औरत जिसे मैंने तिलिस्म के अन्दर बाजे वाले कमरे में देखा था और जो फाँसी लटकते हुए मनुष्य के पास निर्जीव अवस्था में खड़ी थी। (इन्द्रजीतसिंह की तरफ इशारा करके) आप भाईजी से पूछ लीजिए कि मैं सच्चा हूँ या नहीं।
इन्द्रजीतसिंह--बेशक उसी रंग-रूप और चाल-ढाल की औरत थी!
गोपालसिंह--बड़े आश्चर्य की बात है! कुछ अक्ल काम नहीं करती!
इन्द्रजीतसिंह--हम दोनों ने उसे गिरफ्तार करने के लिए बहुत उद्योग किया, मगर कुछ बन न पड़ा। इन्हीं चमेली की टट्टियों में वह खुशबू की तरह हवा के साथ मिल गई, कुछ मालूम न हुआ कि कहाँ चली गई!
गोपालसिंह--(घबराकर) इन्हीं चमेली की टट्टियों में? वहाँ से तो देवमन्दिर में जाने का रास्ता है जो बाग के चौथे दर्जे में है!
इन्द्रजीतसिंह--(चौंक कर) देखिए-देखिए, वह फिर निकली!
८
इस जगह हमें भूतनाथ के सपूत लड़के तथा खुदगर्ज और मतलबी ऐयार नानक का हाल पुनः लिखना पड़ा।
हम ऊपर के किसी बयान में लिख आये हैं कि जिस समय नानक अपने मित्र की ज्याफत में तन, मन, धन और आधे शरीर से लौलीन हो रहा था, उसी समय उस पर वज्रपात हुआ, अर्थात् एक नकाबपोश उसके बाप की दुर्दशा का हाल बताकर उसे अंधे कुएँ में धकेल गया। लोग कहते हैं कि उसे अपने बाप से कुछ भी मुहब्बत न थी, हाँ अपनी माँ को कुछ-कुछ जरूर चाहता था, जिस पर उसकी नई-नवेली दुलहिन ने उसे कुछ ऐसा मुट्ठी में कर लिया था कि उसी को सब-कुछ तथा इष्टदेव समझ बैठा था और उसकी उपासना से विमुख होना हराम समझता था। यद्यपि वह अपने बाप की कुछ परवाह नहीं करता था और न उसको उससे कुछ प्रेम ही था, मगर वह अपने बाप से डरता उतना ही था, जितना लम्पट लोग काल से डरते हैं। जिस समय वह लौटकर घर आया, उसकी अनोखी स्त्री थकावट और सुस्ती के कारण चारपाई का सहारा ले चुकी थी! उसने नानक से पूछा, "कहो क्या मामला है? तुम कहाँ गये थे?"
नानक--(धीरे से) अपने नापाक बाप के आफत में फंसने की खबर सुनने गया था। अच्छा होता, जो मुझे उसके मौत की खबर सुनने में आती और मैं सदैव के लिए निश्चिन्त हो जाता।
स्त्री--(आश्चर्य से) अपने प्यारे ससुर के बारे में ऐसी बात तो आज तक तुम्हारी जबान से कभी सुनने में न आई थी!
नानक--क्योंकर सुनने में आती, जबकि अपने इस सच्चे भाव को मैं आज तक मंत्र की तरह छिपाए हुए था! आज यकायक मेरे मुंह से ऐसी बात तुम्हारे सामने निकल गई, इसके बाद फिर कभी कोई शब्द ऐसा मेरे मुंह से न निकलेगा जिससे कोई समझ जाये कि मैं अपने बाप को नहीं चाहता। तुम्हें मैं अपनी जान समझता हूँ और आशा है कि इस बात की, जो यकायक मेरे मुंह से निकल गई है तुम भी जान ही की तरह हिफाजत करोगी जिसमें कोई सुनने न पावे। अगर कोई सुन लेगा तो मेरी बड़ी खराबी होगी क्योंकि मैं अपने बाप को यद्यपि मानता तो कुछ नहीं हूँ, मगर उससे डरता बहुत हूँ, क्या कि वह बड़ा ही शैतान और भयानक आदमी है। यदि वह जान जायेगा कि मैं उसके साथ खुदगर्जी का बरताव करता हूँ, तो वह मुझे जान से ही मार डालेगा।
स्त्री--नहीं-नहीं, मैं ऐसी बात कभी किसी के सामने नहीं कह सकती, जिससे तम पर मुसीबत आये। (हँसकर) हाँ, अगर तुम मुझे कभी रंज करोगे, तो जरूर प्रकट कर दूंगी।
नानक--उस समय मैं भी लोगों से कह दूंगा कि मेरी स्त्री व्यभिचारिणी हो गई है, मुझ पर तूफान जोड़ती है। भला दुनिया में कोई भी ऐसा आदमी है, जो अपने बाप को न चाहता हो? यदि ऐसा होता तो क्या मैं चुपचाप बैठा रह जाता! मगर नहीं, मैं अपने बाप को छुड़ाने के लिए इसी वक्त जाऊँगा और इस उद्योग में अपनी जान तक लड़ा दूंगा।
स्त्री--(मन में) ईश्वर करे, तुम किसी तरह इस शहर से बाहर तो निकलो या किसी दूसरी दुनिया में चले जाओ। (प्रकट) जब वह फँस ही चुका है तो चुपचाप बैठे रहो, समय पड़ने पर कह देना कि मुझे खबर ही नहीं थी!
नानक--नहीं, मैं ऐसा कदापि नहीं कह सकता क्योंकि गोपीकृष्ण (नकाबपोश) जिससे इस बात की मुझे खबर मिली है बड़ा दुष्ट आदमी है, समय पड़ने पर वह अवश्य कह देगा कि मैंने इस बात की इत्तिला नानक को दे दी थी!
स्त्री--अच्छा, तुम खुलासा कह जाओ कि क्या-क्या खबर सुनने में आई है?
नानक ने नकाबपोश की जबानी जो कुछ सुना था, अपनी प्यारी स्त्री से कहा। इसके बाद उसे बहुत कुछ समझा-बुझाकर सफर की पूरी तैयारी करके अपने बाप को छुड़ाने की फिक्र में वहाँ से रवाना हो गया।
भूतनाथ के संगी-साथी लोग मामूली न थे, वल्कि बड़े ही बदमाश लड़ाके शैतान और फसादी लोग थे तथा चारों तरफ ऐसे ढंग से घूमा करते थे कि समय पड़ने पर जब भूतनाथ उन लोगों की खोज करता, तो विशेष परिश्रम किए बिना ही उनमें से कोई न कोई मिल ही जाता था, इसके अतिरिक्त भूतनाथ ने अपने लिए कई अड्डे भी मुकर्रर कर लिए थे, जहाँ उसके संग-साथियों में से कोई न कोई अवश्य रहा करता था और उन अड्डों में कई अड्डे ऐसे थे जिनका ठिकाना नानक को मालूम था। ऐसा ही एक अड्डा गयाजी से थोड़ी दूर पर बराबर की पहाड़ी के ऊपर था, जहाँ अपने बाप का पता लगाता हुआ नानक जा पहुँचा। उस समय भूतनाथ के साथियों में से तीन आदमी वहां मौजूद थे।
नानक ने उन लोगों से अपने बाप का हाल पूछा और जो कुछ उन लोगों को मालूम था उन्होंने कहा। इत्तिफाक से उसी समय मनोरमा को लिए हुए भूतनाथ भी वहाँ आ पहुंचा और अपने सपूत लड़के को देखकर बहुत खुश हुआ। भूतनाथ ने मनोरमा को तो अपने आदमियों के हवाले किया और नानक का हाथ पकड़ के एक किनारे ले जाने के बाद जो कुछ उस पर बीता था, सब ब्यौरेवार कह सुनाया।
नानक--(अफसोस के साथ मुंह बनाकर) अफसोस! आपने इन बातों की मुझे कुछ भी खबर न दी! अगर गोपीकृष्ण आपकी परेशानी का कुछ हाल मुझसे न कहते तो मुझे गुमान भी न होता।
भूतनाथ--खैर, जो कुछ होना था वह हो गया, अब तुम मनोरमा को लेकर वहाँ जाओ, जहाँ तुम्हारी माँ रहती है और जिस तरह हो सके, मनोरमा से पूछ कर बलभद्रसिंह का पता लगाओ, मगर एक आदमी को साथ जरूर लिए जाओ, क्योकि आज कल तुम्हारी माँ जिस ठिकाने रहती है यद्यपि वहाँ का हाल तुमसे हमने कह दिया मगर रास्ता इतना खराब है कि बिना आदमी साथ लिए तुम्हें कुछ भी पता न लगेगा।
नानक--जो आज्ञा, तो क्या इस समय आप सीधे रोहतासगढ़ जायेंगे?
भूतनाथ--हाँ जरूर जायेंगे, क्योंकि ऐसे समय में शेरअलीखाँ से मिलना आवश्यक है, मगर जब तक हम न आवें, तुम अपनी माँ के पास रहना और जिस तरह हो सके, बलभद्रसिंह का पता लगाना।
इसके बाद नानक को लिए हुए भूतनाथ फिर अपने आदमियों के पास चला आया और एक आदमी को धन्नू सिंह का पता बताकर (जिसे कैद करके कहीं रख आया था, कहा कि तुम धन्नूसिंह को यहाँ से लाकर हमारे घर पहुंचा दो और फिर इसी ठिकाने आकर रहो।
इन कामों से छुट्टी पाने के बाद भूतनाथ रोहतासगढ़ में शेरअलीखां के पास गया और वहाँ जो कुछ हुआ, सो हमारे प्रेमी पाठक पढ़ चुके हैं।
९
दोपहर का समय है। हवा खूब तेज चल रही है। मैदान में चारों तरफ बगूले उड़ते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे समय में एक बहुत फैले हुए और गुंजान आम के पेड़ के नीचे नानक और भूतनाथ का सिपाही, जिसने अपना नाम दाऊबाबा रखा हुआ था बैठे हुए सफर की हरारत मिटा रहे हैं। पास ही में मनोरमा भी बैठी है जिसके हाथ-पैर कमन्द से बँधे हुए हैं। थोड़ी ही दूर पर एक घोड़ी चर रही थी, जिसकी लम्बी बागडोर एक डाल के साथ बँधी हुई थी और जिस पर मनोरमा को लाद के वे लोग लाए थे। इस समय सफर की हरारत मिटाने और धूप का समय टाल देने के लिए वे लोग इस पेड़ के नीचे बैठे हुए बात कर रहे हैं।
नानक--(मनोरमा से) मुझे तुम्हारी शक्ल-सूरत पर रहम आता है, तुम नाहक ही एक बदकार और नकली मायारानी के लिए अपनी जान दे रही हो।
मनोरमा--(लम्बी साँस लेकर) बात तो ठीक है, मगर अब जान बचने की कोई उम्मीद भी तो नहीं है। सच कहती हूँ कि इस जिन्दगी का मजा मैंने कुछ भी नहीं पाया। मेरे पास करोड़ों रुपये की जमा मौजूद है, मगर वह इस समय मेरे किसी अर्थ की नहीं, न मालम उस पर किसका कब्जा होगा और उसे पाकर कौन आदमी अपने को भाग्यवान मानेगा, या शायद लावारिसी माल समझ राजा ही...
नानक--तुम रोती क्यों हो, आँखें पोंछो, तुम्हारा रोना मुझे अच्छा नहीं मालूम होता। मैं सच कहता हूँ कि तुम्हारी जान बच सकती है और तुम अपनी दौलत का आनन्द अच्छी तरह भोग सकती हो यदि बलभद्रसिंह और इन्दिरा का पता बता दो!
मनोरमा--मैं बलभद्रसिंह और इन्दिरा का पता भी बता सकती हैं और अपनी कुछ दौलत भी तुमको दे सकती हूँ, यदि मेरी जान बच जाये यदि तुम एक सल्क मेरे साथ करो।
नानक--वह कौन सा सलूक है जो तुम्हारे साथ करना होगा? हाय मुझे तुम्हारी सूरत पर दया आती है। मैं नहीं चाहता कि एक ऐसी खूबसूरत परी दुनिया से उठ जाये।
मनोरमा--वह बात बहुत गुप्त है, इसीलिए मैं नहीं चाहती कि उसे सिवाय तुम्हारे कोई और सुने।
दाऊबाबा--लो, हम आप ही अलग हो जाते हैं, तुम लोग अपना मजे में बातें करो, हमें इन सब बखेड़ों से कोई मतलब नहीं, हमें तो मालिक का काम होने से मतलब है, तब तक दो-एक चिलम गाँजा उड़ा के सफर की थकावट मिटाते हैं।
इतना कहकर दाऊ बाबा जो वास्तव में एक मस्त आदमी था, उठकर कुछ दूर चला गया और अपने सफरी बटुए मेंसे चकमक निकालकर आग सुलगाने के बाद आनन्द के साथ गांजा मलने लगा, इधर नानक उठकर मनोरमा के पास जा बैठा।
नानक--लो कहो, अब क्या कहती हो! मनोरमा--यह तो तुम जानते हो कि मेरे पास बड़ी दौलत है!
नानक--हाँ, सो मैं खूब जानता हूँ कि तुम्हारे पास करोड़ों रुपये की जमा मौजूद है!
मनोरमा--और यह भी जानते हो कि तुम्हारी प्यारी रामभोली भी मेरे ही कब्जे में है!
नानक--(चौंक कर) नहीं, सो तो मैं नहीं जानता! क्या वास्तव में रामभोली भी तुम्हारे ही कब्जे में है? हाय, यद्यपि वह गूंगी और बहरी औरत है, मगर मैं उसे दिल से प्यार करता हूँ। यदि वह मुझे मिल जाये, तो मैं अपने को बड़ा ही भाग्यवान समझूं।
मनोरमा--हाँ, वह मेरे ही कब्जे में है और तुम्हें मिल सकती है। मैं अपनी तमाम दौलत भी तुम्हें देने को तैयार हूँ और बलभद्रसिंह तथा इन्दिरा का पता भी बता सकती हैं यदि इन सब कामों के बदले में तुम एक उपकार मेरे साथ करो!
नानक--(खुश होकर) वह क्या?
मनोरमा--तुम मेरे साथ शादी कर लो, क्योंकि मैं तम्हें जी-जान से प्यार करती हूँ और तुम पर मरती हूँ।
नानक--यद्यपि तुम्हारी उम्र मेरे बराबर है, मगर मैं तुम्हें अभी तक नई-नवेली ही समझता हूँ और तुम्हें प्यार भी करता हूँ क्योंकि तुम खूबसूरत हो, लेकिन तुम्हारे साथ शादी मैं कैसे कर सकता हूं, यह बात मेरा बाप कब मंजूर करेगा!
मनोरमा--इस बात से अगर तुम्हारा बाप रंज हो तो वह बड़ा ही बेवकूफ है। बलभद्रसिंह के मिलने से उसकी जान बचती है और इन्दिरा के मिलने से वह इन्द्रदेव का प्रेम-पात्र बनकर आनन्द के साथ अपनी जिन्दगी बितायेगा। तम्हारे अमीर होने से भी उसको फायदा ही पहुँचेगा। इसके अतिरिक्त तुम्हारी रामभोली तुम्हें मिलेगी और मैं तुम्हारी होकर जिन्दगी भर तुम्हारी सेवा करूँगी। तुम खूब जानते हो कि मायारानी के फेर में पड़े रहने के कारण अभी तक मेरी शादी नहीं हुई।
नानक--(मुस्कुरा कर) मगर दो-चार प्रेमियों से प्रेम जरूर कर चुकी हो!
मनोरमा--हाँ इस बात से मैं इनकार नहीं कर सकती, मगर क्या तुम इसी से हिचकते हो? बड़े बेवकूफ हो! इस बात से भला कौन बचा है? क्या तुम्हारी अनोखी स्त्री ही जो आज कल तुम्हारे सिर चढ़ी हुई है बची है? तुम इस बारे में कसम खा सकते हो? क्या तुम दुनिया भर के भेद जानते हो और अन्तर्यामी हो? ये सब बातें तुम्हारे ऐसे खुशदिल आदमियों के सोचने के लायक नहीं। हां इतना मैं प्रतिज्ञापूर्वक कह सकती है कि इस काम से तुम्हरा बाप कभी नाखुश न होगा। जरा ध्यान देकर देखो तो सही कि तुम्हारे बाप ने इस जिन्दगी में कैसे-कैसे काम किए हैं। उसका मुंह नहीं कि तुम्हें कुछ कह सके, और फिर दुनिया में मेरा तुम्हारा साथ और करोड़ों रुपये की जमा क्या यह मामूली बात है? हमसे तुमसे बढ़कर भाग्यवान कौन दिखाई दे सकता है! हाँ इस बात की भी मैं कसम खाती हूँ कि तुम्हारी आजकल वाली स्त्री और रामभोली से सच्चा प्रेम करूंगी और चाहे ये दोनों मुझसे कितना ही लड़ें, मगर मैं उनकी खातिरदारी ही करूँगी।
मनोरमा की मीठी-मीठी और दिल लुभा लेने वाली बातों ने नानक को ऐसा वेकाबू कर दिया कि वह स्वर्ग-सुख का अनुभव करने लगा। थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद उसने कहा, "मगर इस बात का विश्वास कैसे हो कि जितनी बात तुम कह गई हो उसे अवश्य पूरा करोगी?"
इसके जवाब में मनोरमा ने हजारों कसमें खाईं और नानक के मन में अपनी बात का विश्वास पैदा कर दिया। इसके बाद उसने अपना हाथ-पैर खोल देने के लिए नानक से कहा, नानक ने उसके हाथ-पैर खोल दिये और मनोरमा ने अपनी उँगली से वह जहरीली अंगूठी, जिसको निकाल लेना भूतनाथ भूल गया था, उतार कर नानक की उँगली में पहना देने के बाद नानक का मुंह चूमकर कहा, "इसी समय से मैंने तुम्हें अपना पति मान लिया। अब तुम मेरे घर चलो, बलभद्रसिह और इन्दिरा को लेकर अपने बाप के पास भेज दो, मेरे घरबार के मालिक बनो और इसके बाद जो कुछ मुझे कहो, मैं करने को तैयार हूँ। अब इससे बढ़कर सन्तोष दिलाने वाली बात मैं क्या कह सकती हूँ!"
इतना कहकर मनोरमा ने नानक के गले में हाथ डाल दिया और पुनः उसका मुंह चूमकर कहा, "प्यारे, मैं तुम्हारी हो चुकी, अब तुम जो चाहो सो करो!"
अहा, स्त्री भी दुनिया में क्या चीज है! बड़े-बड़े होशियारों, चालाकों, ऐयारों, अमीरों, पहलवानों और बहादुरों को बेवकूफ बनाकर मटियामेट कर देने की शक्ति जितनी स्त्री में है उतनी किसी में नहीं। इस दुनिया में वह बड़ा ही भाग्यवान है जिसके गले में दुष्टा और धूर्त स्त्री की फांसी नहीं लगी। देखिए, दुर्दैव के मारे कम्बख्त नानक ने क्या मुंह की खाई है और धूर्ता मनोरमा ने कैसा उसका मुंह काला किया। मजा तो यह है कि स्त्री-रत्न पाने के साथ ही दौलत भी पाने की खुशी ने उसे और भी अन्धा बना दिया और जिस समय मनोरमा ने जहरीली अँगूठी नानक की उँगली में पहनाकर उसके गुण की प्रशंसा की उस समय तो नानक को निश्चय हो गया कि बस यह हमारी हो चुकी। उसने सोचा कि इसे अपनाने में अगर भूतनाथ रंज भी हो जाय तो कोई परवाह की बात नहीं है और रंज होने का सबब ही क्या है बल्कि उसे तो खुश होना चाहिए क्योंकि मेरे ही सबब से उसकी जान बचेगी।
नानक ने भी मनोरमा के गले में हाथ डाल के उससे कुछ ज्यादा ही प्रेम का बरताव किया जो मनोरमा ने नानक के साथ किया था और तब कहा, "अच्छा तो अब मैं भी तुम्हारा हो चुका, तुम भी जहाँ तक जल्द हो सके अपना वायदा पूरा करो।"
मनोरमा--मैं तैयार हूँ, अपने साथी लण्ठाधिराज को बिदा करो और मेरे साथ जमानिया के तिलिस्मी बाग की तरफ चलो।
नानक--वहाँ क्या है?
मपोरमा--बलभद्रसिंह और इन्दिरा उसी में कैद हैं। पहले उन्हीं को छुड़ाकर तुम्हारे बाप को खुश करना उचित समझती हूँ।
नानक--हाँ यह राय बहुत अच्छी है, मैं अभी अपने साथी को समझा-बुझाकर बिदा करता हूं।
इतना कहकर नानक अपने साथी के पास चला जो गाँजे का दम लगा रहा था। गनोरमा का हाल नमक-मिर्च लगाकर उससे कहा और समझा-बुझाकर उसी अड्डे पर जहाँ से आया था चले जाने के लिए राजी किया बल्कि उसे बिदा करके पूनः मनोरमा के पास चला आया।
मनोरमा--तुम्हारा साथी तो सहज ही में चला गया।
नानक--आखिर वह मेरे बाप का नौकर ही तो है, अतः जो कुछ मैं कहूँगा उसे मानना ही पड़ेगा। हाँ, तो अब तुम भी चलने के लिए तैयार हो जाओ।
मनोरमा--(खड़ी होकर) मैं तैयार हूँ, आओ।
नानक--ऐसे नहीं, मेरे बटुए में कुछ खाने की चीजें मौजूद हैं, लोटा-डोरी भी तैयार है, वह देखो सामने कुआँ भी है, अस्तु, कुछ खा-पीकर आत्मा को हरा कर लेना चाहिए, जिसमें सफर की तकलीफ मालूम न पड़े।
मनोरमा--जो आज्ञा।
नानक ने बटुए में से कुछ खाने को निकाला और कुएँ में से जल खींचकर मनोरमा के सामने रक्खा।
मनोरमा--पहले तुम खा लो, फिर तुम्हारा जूठा जो बचेगा उसे मैं खाऊँगी। नानक-नहीं-नहीं, ऐसा क्या, तुम भी खाओ और मैं भी खाऊँ।
मनोरमा--ऐसा कदापि न होगा, अब मैं तुम्हारी स्त्री हो चुकी और सच्चे दिल से हो चुकी, फिर जैसा मेरा धर्म है वैसा ही करूंगी। नानक ने बहुत कहा मगर मनोरमा ने कुछ भी न सुना। आखिर नानक को पहले खाना पड़ा। थोड़ा-सा खाकर नानक ने जो कुछ छोड़ दिया, मनोरमा उसी को खाकर चलने के लिए तैयार हो गई। नानक ने घोड़ा कसा और दोनों आदमी उसी पर सवार होकर जंगल ही जंगल पूरब की तरफ चल निकले। इस समय जिस राह से मनोरमा कहती थी नानक उसी राह से जाता था। शाम होते-होते ये दोनों उसी खंडहर के पास पहुँचे जिसमें हम पहले भूतनाथ और शेरसिंह का हाल लिख आए हैं, जहाँ राजा वीरेन्द्रसिंह को शिवदत्त ने घेर लिया था, जहाँ से शिवदत्त को रूहा ने चकमा देकर फंसाया था, या जिसका हाल ऊपर कई दफे लिखा जा चुका है।
मनोरमा--अब यहाँ ठहर जाना चाहिए!
नानक--क्यों?
मनोरमा--यह तो आपको मालूम हो ही चुका होगा कि इस खंडहर में से एक सुरंग जमानिया के तिलिस्मी बाग तक गई हुई है।
नानक--हाँ, इसका हाल मुझे अच्छी तरह मालूम हो चुका है। इसी सुरंग की राह से मायारानी या उसके मददगारों ने पहुंचकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ और भी कई आदमियों को गिरफ्तार कर लिया था।
मनोरमातो--तो अब मैं चाहती हूँ कि उसी राह से जमानिया वाले तिलिस्मी बाग के दूसरे दर्जे में पहुँचूं और दोनों कैदियों को इस तरह निकाल बाहर करूँ कि किसी को किसी तरह का गुमान न होने पावे। मैं इस सुरंग का हाल अच्छी तरह जानती हूँ, इस राह से कई दफे आई और गई हूँ। इतना ही नहीं बल्कि इस सुरंग की राह से जाने में और भी एक बात का सुभीता है।
नानक--वह क्या?
मनोरमा--इस सुरंग में बहुत-सी चीजें ऐसी हैं जिन्हें हम लोग हजारों रुपये खर्चने और वर्षों परेशान होने पर भी नहीं पा सकते और वे चीजें हम लोगों के बड़े काम की हैं, जैसे ऐयारी के काम में आने लायक तरह-तरह की रोगनी पोशाकें जो न तो पानी में भीगें और न आग में जलें, एक से एक बढ़ के मजबूत और हलके कमन्द, पचासों तरह के नकाब, तरह-तरह की दवाइयाँ, पचासों किस्म के अनमोल इत्र जो अब मयस्सर नहीं हो सकते, इनके अतिरिक्त ऐश व आराम की भी सैकड़ों चीजें तुमको दिखाई देंगी जिन्हें अपने साथ लेते चलेंगे, (धीरे से) और मायारानी का एक 'जवाहिरखाना' भी इस सुरंग में है।
नानक--वाह-वाह! तब तो जरूर इसी सुरंग की राह चलना चाहिए। इससे बढ़कर 'एक पन्थ दो काज' हो ही नहीं सकता!
मनोरमा--और इन सब चीजों की बदौलत हम लोग अपनी सूरत भी अच्छी तरह बदल लेंगे और दो-चार हरबे भी ले लेंगे।
नानक--ठीक है, मैं इस राह से जाने के फायदों को अच्छी तरह समझ गया, मगर हरवों की हमें कुछ भी जरूरत नहीं है क्योंकि कमलिनी का दिया हुआ एक खंजर ही मेरे पास ऐसा है जिसके सामने हजारों लाखों बल्कि करोड़ों हरबे झख मारें!
मनोरमा--(आश्चर्य से) सो क्या? वह कैसा खंजर है और कहाँ है?
नानक--(खंजर दिखाकर) यह मेरे पास मौजूद है। जिस समय तुम इसके गुण सुनोगी तो आश्चर्य करोगी।
इतना कहकर नानक घोड़े से नीचे उतर पड़ा और सहारा देकर मनोरमा को भी नीचे उतारा। मनोरमा ने एक पेड़ के नीचे बैठ जाने की इच्छा प्रकट की और कहा कि घोड़े को छोड़ देना चाहिए क्योंकि इसकी अब हम लोगों को जरूरत नहीं रही।
नानक ने मनोरमा की बात मंजूर की अर्थात घोड़े को छोड़ दिया और कुछ देर तक आराम लेने की नीयत से दोनों आदमी एक पेड़ के नीचे बैठ गये। मनोरमा ने तिलिस्मी खंजर का गुण पूछा और नानक ने शेखी के साथ बखान करना शुरू किया और अन्त में खंजर का कब्जा दबाकर बिजली की रोशनी भी पैदा कर मनोरमा को दिखाया। चमक से मनोरमा की आँखें चौंधिया गईं और उसने दोनों हाथों से अपना मुंह ढाँप लिया। जब वह चमक बन्द हो गई तो नानक के कहने से मनोरमा ने आँखें खोली और खंजर की तारीफ करने लगी।
थोड़ी देर तक आराम करने के बाद दोनों आदमी खंडहर के अन्दर गये और उसी मामूली रास्ते से जिसका हाल कई दफे लिखा जा चुका है उसी तहखाने के अन्दर गए जिसमें शेरसिंह रहा करते थे या जिसमें से इन्द्रजीत और आनन्दसिंह गायब हुए थे। यह तो पाठकों को मालूम ही है कि राजा वीरेन्द्रसिंह की सवारी आने के कारण खंडहर की अवस्था बहुत-कुछ बदल गई थी और अभी तक बदली हुई है मगर इस तहखाने की हालत में किसी तरह का फर्क नहीं पड़ा था।
हमारे पाठक भूले न होंगे कि इस तहखाने में उतरने के लिए जो सीढ़ियाँ थीं उनके नीचे एक छोटी-सी कोठरी थी जिसमें शेरसिंह अपना असबाब रक्खा करते थे और जिसमें से आनन्दसिंह, कमला और तारासिंह गायब हुए थे। मनोरमा की आज्ञानुसार नानक ने अपने ऐयारी के बटुए में से मोमबत्ती निकलकर जलाई और मनोरमा के पीछेपीछे उसी कोठरी में गया। यह कोठरी बहुत ही छोटी थी और इसके चारों तरफ दीवार बहुत साफ और संगीन थी। मनोरमा ने एक तरफ की दीवार पर हाथ रखकर कोई खटका या किसी पत्थर को दबाया जिसका हाल नानक को कुछ भी मालूम न हुआ मगर एक पत्थर की चट्टान भीतर की तरफ हटकर बगल में हो गई और अन्दर जाने के लिए रास्ता निकल आया। मनोरमा के पीछे-पीछे नानक उस कोठरी के अन्दर चला गया और इसके साथ ही वह पत्थर की सिल्ली बिना हाथ लगाये अपने ठिकाने चली गई तथा दरवाजा बन्द हो गया। मनोरमा से नानक ने उस दरवाजे को खोलने और बन्द करने की तरकीब पूछी और मनोरमा ने उसका भेद बता दिया बल्कि उस दरवाजे को एक दफे खोल के और बन्द करके भी दिखा दिया। इसके बाद दोनों आगे की तरफ बढ़े। इस समय जिस जगह ये दोनों थे, वह एक लम्बा-चौड़ा कमरा था, मगर उसमें किसी तरफ जाने के लिए कोई दरवाजा दिखाई नहीं देता था, हाँ एक तरफ दीवार में एक बहुतबड़ी आलमारी जरूर बनी हुई थी और उसका पल्ला किसी खटके के दबाने से खुला करता था। मनोरमा ने उसके खोलने की तरकीब भी नानक को बताई और नानक ही के हाथ से उसका पल्ला भी खुलवाया। पल्ला खुलने पर मालूम हुआ कि यह भी एक दरवाजा है और इसी जगह से सुरंग में घुसना होता है। दोनों आदमी सुरंग के अन्दर रवाना हुए। यह सुरंग इस लायक थी कि तीन आदमी एक साथ मिलकर जा सकें।
लगभग पचास कदम जाने के बाद फिर एक कोठरी मिली जो पहली कोठरियों की बनिस्बत ज्यादा लम्बी-चौड़ी थी। इसमें चारों तरफ कई खुली आलमारियाँ थीं जो पचासों किस्म की चीजों से भरी हुई थीं। किसी में तरह-तरह के हरबे थे, किसी में ऐयारी का सामान, किसी में रंग-बिरंग की बनावटी मूंछे और नकाबें इत्यादि थीं और कई आलमारियाँ बोतलों और शीशियों से भरी हुई थीं। इन सामानों को देखकर नानक ने मनोरमा से कहा, "यह सब तो है, मगर उस जवाहिरखाने का भी कहीं पता-निशान है जिसका होना तुमने बयान किया था!"
मनोरमा--मैंने आपसे झूठ नहीं कहा था, वह जवाहिरखाना भी इसी सुरंग में मौजूद है।
नानक--मगर कहाँ है?
मनोरमा--इस सुरंग में और थोड़ी दूर जाने के बाद इसी तरह का एक कमरा पुनः मिलेगा, उसी कमरे में आप उन सब चीजों को देखेंगे। इस सुरंग में जमानिया पहँचने तक इस तरह के ग्यारह अड्डे या कमरे मिलेंगे जिनमें करोड़ों रुपये की सम्पत्ति देखने में आवेगी।
नानक--(लालच के साथ) जबकि तुम्हें यहाँ का रास्ता मालूम है और ऐसीऐसी नादिर चीजें तुम्हारी जानी हुई हैं तो इन सभी को उठाकर अपने घर में क्यों नहीं ले जाती?
मनोरमा--मायारानी की बदौलत मुझे किसी चीज की कमी नहीं है। रुपये-पैसे गहने जवाहिरात और दौलत से मेरी तबीयत भरी हुई है। इन सब चीजों की मैं कोई हकीकत नहीं समझती।
नानक--बेशक ऐसा ही है!
मनोरमा--(बोतल और शीशियों से भरी हुई एक आलमारी की तरफ इशारा करके) देखो, ये बोतलें ऐशोआराम की जान खुशबूदार चीजों से भरी हुई हैं।
इतना कह मनोरमा फुर्ती के साथ उस आलमारी के पास चली गई और एक बोतल उठाकर उसका मुंह खोल और खूब सूंघकर बोली, "अहा, सिवाय मायारानी के और तिलिस्म के राजा के ऐसी खुशबूदार चीजें और किसे मिल सकती हैं?"
इतना कहकर वह बोतल उसी जगह मुँह बन्द करके रख दी और दूसरी बोतल उठाकर नानक के पास ले चली, मगर वह बोतल उसके हाथ से छूटकर जमीन पर गिर पड़ी या शायद उसने जान-बूझकर ही गिरा दी। बोतल गिरने के साथ ही टूट गई और उसमें का खुशबूदार तेल चारों तरफ जमीन पर फैल गया। मनोरमा बहुत रंज और अफसोस करने लगी और उसकी मुरौवत से नानक ने भी रंज दिखाया। उस बोतल में जो तेल था वह बहुत ही खुशबूदार और इतना तेज था कि गिरने के साथ ही उसकी खुशबू तमाम कमरे में फैल गई गई और नानक उस खुशबू की तारीफ करने लगा।
निःसन्देह मनोरमा ने नानक को पूरा उल्लू बनाया। पहले जो बोतल खोल के मनोरमा ने संघी थी उसमें भी एक प्रकार की खूशबूदार चीज थी मगर उसमें यह असर था कि उसके सूंघने के बाद दो घण्टे तक किसी तरह की बेहोशी का असर संघने वाले पर नहीं हो सकता था, और जो दूसरी बोतल उसने हाथ से गिरा दी थी उसमें बहुत तेज बेहोशी का असर था जिसने नानक को तो चौपट ही कर दिया। वह उस खुशबू की तारीफ करता-करता ही जमीन पर लम्बा हो गया, मगर मनोरमा पर उस दवा का कुछ भी असर न हुआ क्योंकि वह पहले ही से एक दूसरी दवा सूंघकर अपने दिमाग का बन्दोबस्त कर चुकी थी। नानक के हाथ से मनोरमा ने मोमबत्ती ले ली और एक किनार जमीन पर जमा दी।
जब नानक अच्छी तरह बेहोश हो गया तो मनोरमा ने उसके हाथ से अपनी अँगूठी उतार ली और फिर तिलिस्मी खंजर के जोड़ की अंगूठी भी उतार लेने के बाद तिलिस्मी खंजर भी अपने कब्जे में कर लिया और इसके बाद एक लम्बी साँस लेकर कहा, "अब कोई हर्ज की बात नहीं है!"
थोड़ी देर तक कुछ सोचने-विचारने के बाद मनोरमा ने एक हाथ में मोमबत्ती ली और दूसरे हाथ से नानक का पैर पकड़ घसीटती हुई बाहर वाली कोठरी में ले आई। जिसमें से निकली थी उस कोठरी का दरवाजा बन्द कर दिया और साथ ही इसके एक तरकीब ऐसी और भी कर दी कि नानक पुनः उस दरवाजे को खोल न सके।
इन कामों से छुट्टी पाने के बाद मनोरमा ने नानक की मुश्कें बाँधीं और हर तरह से बेकाबू करने के बाद लखलखा सुंघाकर होश में लाने का उद्योग करने लगी। थोड़ी ही देर बाद नानक होश में आ गया और अपने को हर तरह से मजबूर और सामने हाथ में उसी का जूता लिए मनोरमा को मौजूद पाया!
नानक--(आश्चर्य से) यह क्या! तुमने मुझे धोखा दिया!
मनोरमा--(हँसकर) जी नहीं, यह तो दिल्लगी की जा रही है! क्या तम नहीं जानते कि ब्याह-शादी में लोग दिल्लगी करते हैं? मेरा कोई ऐसा नातेदार तो है नहीं जो तुमसे दिल्लगी करके ब्याह की रस्म पूरी करे। इसलिए मैं स्वयं ही इस रस्म को मुझ पूरा करना चाहती हूँ।
इतना कहकर मनोरमा तेजी के साथ ब्याह की रस्में पूरी करने लगी। जब नानक सिर की खुजलाहट से दुखी हो गया तो हाथ जोड़कर बोला, "ईश्वर के लिए अब पर दया करो, मैं ऐसी शादी से बाज आया, मुझसे बड़ी भूल हुई।"
मनोरमा--(रुककर) नहीं, घबराने की कोई बात नहीं है। मैं तुम्हारे साथ किसी तरह की बुराई न करूंगी, बल्कि भलाई करूंगी। मैं देखती हूँ कि तुम्हारे हमजोली लोग सच्ची दिल्लगी से तुम्हें बड़ा दुख देते हैं और तुम्हारी स्त्री भी यद्यपि तुम्हारे ही नातेदारों और मित्रों को प्रसन्न करके गहने, कपड़े तथा सौगात से तुम्हारा घर भरती है, मगर तुम्हारी नाक का कुछ भी मुलाहिजा नहीं करती, अतएव तुम्हारी नाक पर हरदम शामत आती ही रहती है, इसलिए मैं दया करके तुम्हारी नाक ही को जड़ से उड़ा देना पसन्द करती हूँ जिसमें आइंदा के लिए तुम्हें कोई कुछ कह न सके। हां, इतना ही नहीं, बल्कि तुम्हारे साथ मैं एक नेकी और भी करना चाहती हूँ जिसका ब्यौरा अभी कह देना उचित नहीं समझते।
नानक--क्षमा करो, क्षमा करो, मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि मुझे माफ करो। मैं कसम खाकर कहता हूँ कि आज से मैं अपने को तुम्हारा गुलाम समझूगा और जो कुछ तुम कहोगी वही करूँगा।
मनोरमा--(हँसकर) अच्छा तो आज से तू मेरा गुलाम हुआ!
नानक--बेशक मैं आज तुम्हारा गुलाम हुआ, असली क्षत्री होऊँगा तो तुम्हारे हुक्म से मुंह न मोडूंगा।
मनोरमा--(हँसती हुई) इसी में तो मुझको शक है कि तेरी जात क्या है। अतः कोई चिन्ता नहीं, मैं तुझे हुक्म देती हूँ कि दो महीने तक अपने घर मत जाना और इस बीच में अपने बाप या किसी दोस्त, नातेदार से भी न मिलना, इसके बाद जो इच्छा हो करना, मैं कुछ न बोलूंगी, मगर मुझसे और मेरे पक्षपातियों से दुश्मनी का इरादा कभी न करना। नानक-ऐसा ही होगा।
मनोरमा--अगर मेरी आज्ञा के विरुद्ध कोई काम करेगा तो तुझे जान से मार डालूंगी, इसे खूब याद रखना।
नानक--मैं खूब याद रखूगा और तुम्हारी आज्ञा के विरुद्ध कोई काम न करूंगा, परन्तु कृपा करके मेरा खंजर तो मुझे दे दो!
मनोरमा--(क्रोध से) अब यह खंजर तुझे नहीं मिल सकता। खबरदार, इसके मांगने या लेने की इच्छो न करना! अच्छा अब मैंजाती हूँ।
इतना कहकर मनोरमा ने तिलिस्मी खंजर नानक के बदन से लगा दिया और जब वह बेहोश हो गया तो उसके हाथ-पैर खोल दिये, जलती हुई मोमबत्ती एक कोने में खड़ी कर दी और वहां से रवाना होकर खंडहर के बाहर निकल आई। घोड़े को अभी तक खंडहर के पास चरते देखा, उसके पास चली गयी, अयाल पर हाथ फेरा, दो-चार दफे थपथपाया और फिर सवार होकर पश्चिम की तरफ रवाना हो गई।
इधर नानक भी थोड़ी देर बाद होश में आया। मोमबत्ती एक किनारे जल रही थी, उसे उठा लिया और अपनी किस्मत को धिक्कार देता हुआ खंडहर के बाहर होकर डरता और कांपता हुआ एक तरफ को चला गया।
१०
कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और राजा गोपालसिंह बात कर ही रहे थे कि वही औरत चमेली की टट्टियों में फिर दिखाई दी और इन्द्रजीतसिंह ने चौंककर कहा, "देखिए, वह फिर निकली!"
राजा गोपालसिंह ने बड़े गौर से उस तरफ देखा और यह कहते हुए उस तरफ रवाना हुए कि "आप दोनों भाई इसी जगह बैठे रहिये, मैं इसकी खबर लेने जाता हूं।"
जब तक राजा गोपालसिंह चमेली की टट्टी के पास पहुँचे, तब तक वह औरत पुनः अन्तर्धान हो गयी। गोपालसिंह थोड़ी देर तक उन्हीं पेड़ों में घूमते-फिरते रहे इसक बाद इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के पास लौट आए।
इन्द्रजीतसिंह--कहिये, क्या हुआ?
गोपालासिंह--हमारे पहुँचने के पहले ही वह गायब हो गई, गायब क्या हो गई बस, उसी दर्जे में चली गई जिसमें देवमन्दिर है। मेरा इरादा तो हुआ कि उसका पीछा करूं, मगर यह सोचकर लौट आया कि उसका पीछा करके उसे गिरफ्तार करना घण्ट दो घण्टे का काम नहीं है बल्कि दो-चार पहर या दो-एक दिन का काम है, क्योंकि देवमन्दिर वाले दर्जे का बहुत बड़ा विस्तार है तथा छिप रहने योग्य स्थानों की भी वहा कमी नहीं है, और मुझे इस समय इतनी फुरसत नहीं है। इसका खुलासा हाल तो इस समय में आप लोगों से न कहूँगा। हाँ, इतना जरूर कहूँगा कि जिस समय मैं अपना तिलिस्मी किताब लेने गया था और उसके न मिलने से दुःखी होकर लौटना चाहता था, उसी समय एक और भी दुःखदाई खबर सुनने में आई जिसके सबब से मुझे कुछ दिन के लिए जमानिया तथा आप दोनों भाइयों का साथ छोड़ना आवश्यक हो गया है और दा घण्टे के लिए भी यहाँ रहना मैं पसन्द नहीं करता। फिर भी कोई चिन्ता की बात नहीं है. आप लोग शौक से इस तिलिस्म के जिस हिस्से को तोड़ सकें तोड़ें, मगर इस औरत का. जो अभी दिखाई दी थी, बहुत ध्यान रखें। मेरा दिल यही कहता है कि मेरी तिलिस्मी किताब इसी औरत ने चुराई है। क्योंकि यदि ऐसा न होता तो यह यहाँ तक कदापि न पहुँच सकती।
इन्द्रजीतसिंह--यदि ऐसा है तो कह सकते हैं कि वह हम लोगों के साथ भी दगा करना चाहती है।
गोपालसिंह--निःसन्देह ऐसा ही है, परन्तु यदि आप लोग उसकी तरफ से सावधान रहेंगे तो वह आप लोगों का कुछ भी न बिगाड़ सकेगी, साथ ही इसके यदि आप उद्योग में लगे रहेंगे तो वह किताब भी जो उसने चुराई है, हाथ लग जायगी।
इन्द्रजीत सिंह--जो कुछ आपने आज्ञा दी है मैं उस पर विशेष ध्यान रखूगा मगर मालूम होता है कि आपने कोई बहुत दुःखदाई खबर सुनी है, क्योंकि यदि ऐसा न होता तो इस अवस्था में और अपनी तिलिस्मी किताब खो जाने की तरफ ध्यान न देकर आप यहाँ से जाने का इरादा न करते!
आनन्दसिंह--और जब आप कह ही चुके हैं कि उसका खुलासा हाल न कहेंगे तो हम लोग पूछ भी नहीं सकते।
गोपालसिंह--निःसन्देह ऐसा ही है, मगर कोई चिन्ता की बात नहीं, आप लोग बुद्धिमान हैं और जैसा उचित समझें करें, हाँ, एक बात मुझे और भी कहनी है!
इन्द्रजीतसिंह--वह क्या?
गोपालसिंह--(एक लपेटा हुआ कागज लालटेन के सामने रखकर) जब मैं उस औरत के पीछे चमेली की टट्टियों में गया तो वह औरत तो गायब हो गई, मगर उसी जगह यह लपेटा हुआ कागज ठीक दरवाजे के ऊपर ही पड़ा हुआ मुझे मिला। पढ़ो तो सही, इसमें क्या लिखा है।
इन्द्रजीतसिंह ने उस कागज को खोलकर पढ़ा, यह लिखा हुआ था--
"यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि न तो आप लोग मुझे जानते हैं और न मैं आप लोगों को जानती हूँ, इसके अतिरिक्त जब तक मुझे इस बात का निश्चय न हो जाय कि आप लोग मेरे साथ किसी तरह की बुराई न करेंगे, तब तक मैं आप लोगों को अपना परिचय भी नहीं दे सकती। हाँ, इतना अवश्य कह सकती हैं कि मैं बहुत दिनों से कैदियों की तरह इस तिलिस्म में पड़ी हूँ। यदि आप लोग दयावान और सज्जन हैं तो मुझे इस कैद से अवश्य छुड़ावेंगे।
गोपालसिंह--(आश्चर्य से) यह तो एक दूसरी ही बात निकली!
इन्द्रजीतसिंह--ठीक है, मगर इसके लिखने पर हम लोग विश्वास ही क्यों कर सकते हैं!
गोपालसिंह--आप सच कहते हैं, हम लोगों को इसके लिखने वाले पर यकायक विश्वास न करना चाहिए। खैर, मैं जाता हूँ, आप जो उचित समझेंगे करेंगे। आइये, इस समय हम लोग एक साथ बैठ के भोजन तो कर लें, फिर क्या जाने कब और क्योंकर मुलाकात हो।
इतना कहकर राजा गोपालसिंह ने वह चंगेर जो अपने साथ लाये थे और जिसमें खाने की अच्छी-अच्छी चीजें थीं, आगे रखी और तीनों भाई एक साथ भोजन और बीच-बीच में वातचीत भी करने लगे। जब खाने से छुट्टी मिली तो तीनों भाइयों ने नहर में से जल पीया और हाथ-मुंह धोकर निश्चिन्त हुए, इसके बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को बहुत-कुछ समझा-बुझाकर और वहाँ से देवमन्दिर में जाने का रास्ता बताकर राजा गोपालसिंह वहाँ से रवाना हो गये।
११
राजा गोपालसिंह के चले जाने के बाद दोनों कुमारों ने बातचीत करते-करते ही रात बिता दी और सुबह को दोनों भाई जरूरी कामों से छुट्टी पाकर फिर उसी बाजे वाले कमरे की तरफ रवाना हुए। जिस राह से इस बाग में आये थे, वह दरवाजा अभी तक खुला हुआ था, उसी राह से होते हुए दोनों तिलिस्मी बाजे के पास पहुंचे। इस समय आनन्दसिंह अपने तिलिस्मी खंजर से रोशनी कर रहे थे।
दोनों भाइयों की राय हुई कि इस बाजे में जो भी कुछ बातें भरी हुई हैं, उन्हें एक दफे अच्छी तरह सुनकर याद कर लेना चाहिए, फिर जैसा होगा देखा जायगा, आखिर ऐसा ही किया गया। बाजे की ताली उनके हाथ लग ही चुकी थी और ताली लगाने की तरकीब भी उस तख्ती पर लिखी हुई थी जो ताली के साथ मिली थी। अब इन्द्रजीतसिंह ने बाजे में ताली लगाई और दोनों भाई उसकी आवाज गौर से सूनने लगे। जब बाजे का बोलना बन्द हुआ तो इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, "मैं बाजे में ताली लगाता हूँ और तिलिस्मी खंजर से रोशनी भी करता हूँ और तुम इस बाजे में से जो कुछ आवाज निकले, उसे संक्षेप में लिखते चले जाओ।" आनन्दसिंह ने इसे कबूल किया और उसी किताब में जिसमें पहले इन्द्रजीतसिंह इस बाजे की कुछ आवाज लिख चके थे लिखने लगे। पहले वह आवाज लिख गये जो अभी बाजे में से निकली थी। इसके बाद इन्द्रजीतसिंह ने इस बाजे का एक खटका दबाया और फिर ताली देकर आवाज सुनने लगे तथा आनन्दसिंह उसे लिखने लगे।
इस बाजे में जितनी आवाजें भरी हुई थीं, उनका सुनना और लिखना दो-चार घण्टे का काम न था, बल्कि कई दिन काम था, क्योंकि बाजा बहुत धीरे-धीरे चल कर आवाज देता था और जो बात कुमार की समझ में न आती थी, उसे दोहरा कर सुनना पडता था, अतः आज चार घण्टे तक दोनों कुमार उस बाजे की आवाज सुनने और लिखने में लगे रहे, इसके बाद फिर उसी बाग में चले आये जिसका जिक्र ऊपर आ चका है। बाकी का दिन और रात उसी बाग में बिताया और दूसरे दिन सवेरे जरूरी कामों से छटी पाकर फिर तहखाने में घुसे तथा बाजे वाले कमरे में आकर फिर बाजे की आवाज मनने और लिखने के काम में लगे। इसी तरह दोनों कुमारों को बाजे की आवाज सुनने और लिखने के काम में कई दिन लग गये और इस बीच दोनों कुमारों ने तीन दफे उस औरत को देखा, जिसका हाल पहले लिखा जा चुका है और जिसकी लिखी एक चिट्ठी राजा गोपालसिंह के हाथ लगी थी। उस औरत के विषय में जो बातें लिखने योग्य हई हैं, उन्हें हम यहाँ पर लिखते हैं।
राजा गोपाल सिंह के जाने के बाद पहली दफे जब वह औरत दिखाई दी, उस समय दोनों भाई नहर के किनारे बैठे बातचीत कर रहे थे। समय संध्या का था और बाग की हरएक चीज साफ-साफ दिखाई दे रही थी। यकायक वह औरत उसी चमेली की झाड़ी में से निकलती दिखाई दी। वह दोनों कुमारों की तरफ तो नहीं आई। मगर उन्हें दिखाकर एक कपड़े का टुकड़ा जमीन पर रखने के बाद पुनः चमेली की झाड़ी में घुसकर गाय हो गयी।
इन्द्रजीतसिंह की आज्ञा पाकर आनन्दसिंह वहाँ गये और उस टुकड़े को उठा लाए, उस पर किसी तरह के रंग से यह लिखा हुआ था--
"सत्पुरुषों के आगमन से दीन-दुखिया प्रसन्न होते हैं और सोचते हैं कि अब हमारा भी कुछ न कुछ भला होगा! मुझ दुखिया को भी इस तिलिस्म में सत्पुरुषों की बाट जोहते और ईश्वर से प्रार्थना करते बहुत दिन बीत गये, परन्तु अब आप लोगों के आने से भलाई की आशा जान पड़ने लगी है। यद्यपि मेरा दिल गवाही देता है कि आप लोगों के हाथ से सिवाय भलाई के मेरी बुराई नहीं हो सकती, तथापि इस कारण से कि बिना समझे दोस्त-दुश्मन का निश्चय कर लेना नीति के विरुद्ध है, मैं आपकी सेवा में उपस्थित न हई। अब आशा है कि आप अनुग्रहपूर्वक अपना परिचय देकर मेरा भ्रम दूर करेंगे।
इस पत्र के पढ़ने से दोनों कुमारों को बड़ा ताज्जुब हुआ और इन्द्रजीतसिंह की आज्ञानुसार आनन्दसिंह ने उसके पत्र का यह उत्तर लिखा--
"हम लोगों की तरफ से किसी तरह का खुटका न रखो। हमलोग राजा वीरेन्द्रसिंह के लड़के हैं और इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए यहाँ आये हैं। तुम बेखटके अपना हाल हमसे कहो, हम लोग निःसन्देह तुम्हारा दुःख दूर करेंगे।"
यह चिट्ठी चमेली की झाड़ी में उसी जगह हिफाजत के साथ रख दी गई जहाँ से उस औरत की चिट्ठी मिली थी। दो दिन तक वह औरत दिखाई न दी, मगर तीसरे दिन जब दोनों कुमार बाजे वाले तहखाने में से लौटे और उस चमेली की टट्टी के पासी गये तो ढंढने पर आनन्द सिंह को अपनी लिखी चिट्ठी का जवाब मिला। यह जवाब भ एक छोटे से कपड़े के टुकड़े पर लिखा हुआ था, जिसे आनन्दसिंह ने पढ़ा। मतलब यह था--
“यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई कि आप राजा वीरेन्द्रसिंह के लड़के हैं, जिन्हें मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूँ, इसलिए आपकी सेवा में बेखटके उपस्थित हो सकती हूँ। मगर राजा गोपालसिंह से डरती हूँ जो आपके पास आया करते हैं।
पुनः कुंअर इन्द्रजीतसिंह की तरफ से यह जवाब लिखा गया--
"हम प्रतिज्ञा करते हैं कि राजा गोपालसिंह भी तुम्हें किसी तरह का कष्ट न देंगे।"
यह चिट्ठी भी उसी मामूली ठिकाने पर रख दी गई और फिर दो रोज तक इन्दिरा का कुछ हाल मालूम न हुआ। तीसरे दिन संध्या होने से पहले जब कुछ-कुछ दिन बाकी था और दोनों कुमार उसी बाग में नहर के किनारे बैठे बातचीत कर रहे थे यकायक उसी चमेली की झाड़ी में से हाथ में लालटेन लिए निकलती हुई इन्दिरा दिखाई पड़ी। वह सीधे उस तरफ रवाना हुई जहाँ दोनों कुमार नहर के किनारे बैठे हुए थे। जब उनके पास पहुंची तो लालटेन जमीन पर रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर सामने खड़ी हा गई। इसकी सूरत-शक्ल के बारे में हमें जो कुछ लिखना था ऊपर लिख चुके हैं, यहाँ पर पुनः लिखने की आवश्यकता नहीं है, हां, इतना जरूर कहेंगे कि इस समय इसकी पोशाक में फर्क था। इन्द्रजीतसिंह ने बड़े गौर से इसे देखा और कहा, "बैठ जाओ और निडर होकर अपना हाल कहो।"
इन्दिरा--(बैठकर) इसीलिए तो मैं सेवा में उपस्थित हुई हैं कि अपना आश्चर्यजनक हाल आपसे कहूँ। आप प्रतापी राजा वीरेन्द्रसिंह के लड़के हैं और इस योग्य हैं कि हमारा मुकद्दमा सुनें, इन्साफ करें, दुष्टों को उचित दण्ड दें, और हम लोगों को दुःख के समुद्र से निकालकर बाहर करें।
इन्द्रजीतसिंह--(आश्चर्य से) 'हम लोगों'! क्या तुम यहाँ अकेली नहीं हो? क्या तुम्हारे साथ कोई और भी इस तिलिस्म में दुःख भोग रहा है?
इन्दिरा--जी हाँ, मेरी माँ भी इस तिलिस्म के अन्दर बुरी अवस्था में पड़ी है मैं तो चलने-फिरने योग्य भी हूँ परन्तु वह बेचारी तो हर तरह से लाचार है। आ मेरा किस्सा सुनेंगे तो आश्चर्य करेंगे और निःसन्देह आपको हम लोगों पर दया आयेगी।
इन्द्रजीतसिंह--हाँ-हाँ, हम सुनने के लिए तैयार हैं, कहो और शीघ्र कहो।
इन्दिरा अपना किस्सा शुरू किया ही चाहती थी कि उसकी निगाह यकायक राजा गोपालसिंह पर जा पड़ी जो उसके सामने और दोनों कुमारों के पीछे की तरफ से हाथ में लालटेन लिए चले आ रहे थे। वह चौंककर उठ खड़ी हुई और उसी समय कंअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह ने भी घूमकर राजा गोपालसिंह को देखा। जब राजा साहब दोनों कुमारों के पास पहुँचे तो इन्दिरा ने प्रणाम किया और हाथ जोडकर खड़ी हो गई। कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का चेहरा खुशी से दमक रहा था और वे हर तरह से प्रसन्न मालूम होते थे।
इन्द्रजीतसिंह--(गोपालसिंह से) आपने तो कई दिन लगा दिए।
गोपालसिंह--हाँ, एक ऐसा ही मामला आ पड़ा था कि जिसका पूरा पता लगाये बिना यहाँ पर न आ सका, पर आज मैं अपने पेट में ऐसी-ऐसी खबरें भर के लाया हूँ कि जिन्हें सुनकर आप लोग बहुत ही प्रसन्न होंगे और साथ ही इसके आश्चर्य भी करेंगे। मैं सब हाल आपसे कहूँगा मगर (इन्दिरा की तरफ इशारा करके) इस लड़की का हाल सून लेने के बाद। (अच्छी तरह देखकर) निःसन्देह इसकी सूरत-शक्ल उस पुतली की ही तरह है।
आनन्दसिंह--कहिए भाईजी, अब तो मैं सच्चा ठहरा न!
गोपालसिंह--बेशक, तो क्या इसने अपना हाल आप लोगों से कहा?
इन्द्रजीतसिंह--जी, यह अपना हाल कहा ही चाहती थी कि आप दिखाई पड़ गये। यह यकायक हम लोगों के पास नहीं आई, बल्कि पत्र द्वारा इसने पहले मुझसे प्रतिज्ञा करा ली कि हम लोग इसका दु:ख दूर करेंगे और आप (राजा गोपालसिंह)भी इस पर खफा न होंगे।
गोपालसिंह--(ताज्जुब से)मैं इस पर क्यों खफा होने लगा! (इन्दिरा से)क्यों जी, तुम्हें मुझसे डर क्यों पैदा हुआ?
इन्दिरा--इसलिए कि मेरा किस्सा आपके किस्से से बहुत सम्बन्ध रखता है, और हाँ इतना भी मैं इसी समय कह देना उचित समझती हूं कि मेरा चेहरा जिसे आप लोग देख रहे हैं असली नहीं है बल्कि बनावटी है। यदि आज्ञा हो तो इसी नहर के जल से मैं मुँह धो लूं, तब आश्चर्य नहीं कि आप मुझे पहचान लें।
गोपालसिंह--(ताज्जुब से) क्या मैं तुम्हें पहचान लूंगा?
इन्दिरा--यदि ऐसा हो तो आश्चर्य नहीं।
गोपालसिंह--अच्छा, तुम अपना मुंह धो डालो।
इतना कहकर राजा गोपालसिंह लालटेन जमीन पर रखकर बैठ गए और कुंअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह को भी बैठने के लिए कहा। जब इन्दिरा अपना चेहरा साफ करने के लिए नहर के किनारे चलकर कुछ आगे बढ़ गई, तब इन तीनों में यों बातचीत होने लगी
इन्द्रजीतसिंह--हाँ, यह तो कहिए, आप क्या खबर लाए हैं?
गोपालसिंह--वह किस्सा बहुत बड़ा है, पहले इस लड़की का हाल सुन ले तब कहें। हाँ, इसने अपना नाम क्या बताया था?
इन्द्रजीतसिंह--इन्दिरा।
गोपालसिंह--(चौंककर) इन्दिरा! इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ।
गोपालसिंह--(सोचते हुए, धीरे से) कौन-सी इन्दिरा? वह इन्दिरा तो नहीं मालूम पड़ती, कोई दूसरी होगी, मगर शायद वही हो, हाँ वह तो कह चुकी है कि मेरी सूरत बनावटी है, आश्चर्य नहीं कि चेहरा साफ करने पर वही निकले, अगर वही हो तो बहुत अच्छा है।
इन्द्रजीतसिंह--खैर, वह आती ही है, सब हाल मालूम हो जायेगा जब तक अपनी अनूठी खबरों में से दो-एक सुनाइये।
गोपालसिंह--यहाँ से जाने के बाद मुझे रोहतासगढ़ का पूरा-पूरा हाल मालूम हुआ है क्योंकि आजकल राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, भैरोंसिंह, तारासिंह, किशोरी, कामिनी, कमलिनी, लाड़िली और मेरी स्त्री लक्ष्मीदेवी इत्यादि सब कोई वहाँ ही जुटे हुए हैं और अजीबोगरीब मुकदमा पेश है।
इन्द्रजीतसिंह--(चौंककर) लक्ष्मीदेवी! क्या उनका पता लग गया?
गोपालसिंह--हाँ, लक्ष्मीदेवी वही तारा निकली जो कमलिनी के यहां उसकी सखी बनके रहती थी और जिसे आप भी जानते हैं।
इन्द्रजीतसिंह--(आश्चर्य से) वह लक्ष्मीदेवी थीं?
गोपालसिंह--हाँ, वह लक्ष्मीदेवी ही थी जो बहुत दिनों से अपने को छिपाये हुए दुश्मनों से बदला लेने का मौका ढूंढ़ रही थी और समय पाकर अनूठे ढंग से यकायक प्रकट हो गई। उसका किस्सा भी बड़ा ही अनूठा है।
आनन्दसिंह--तो क्या आप रोहतासगढ़ गये थे?
गोपालसिंह--नहीं।
इन्द्रजीतसिंह--सो क्यों? इतना सब हाल सुनने पर भी आप लक्ष्मीदेवी को देखने के लिए वहाँ क्यों नहीं गये?
गोपालसिंह--वहाँ न जाने का सबब भी बतावेंगे।
इन्द्रदेजीतसिंह--खैर, यह बताइये कि लक्ष्मीदेवी यकायक किस अनूठे ढंग से प्रकट हो गईं और रोहतासगढ़ में कौन-सा अजीबोगरीब मुकदमा पेश है?
गोपालसिंह--मैं सब हाल आपसे कहंगा, देखिए वह इन्दिरा आ रही है, पर कोई चिन्ता नहीं, अगर यह वही इन्दिरा है जो मैं सोचे हुए हैं, तो उसके सामने भी सब हाल बेखटके कह दूंगा।
इतने ही में अपना चेहरा साफ करके इन्दिरा भी वहां आ पहुंची। चेहरा धान और साफ करने से उसकी खूबसूरती में किसी तरह की कमी नहीं आई थी बल्कि वह पहले से ज्यादा खूबसूरत मालूम पड़ती थी, हाँ अगर कुछ फर्क पड़ा था तो केवल इतना ही कि बनिस्बत पहले के अब वह कम उम्र की मालूम होती थी।
इन्दिरा के पास आते ही और उसकी सुरत देखते ही गोपालसिंह झट उठ खड़ हुए और उसका हाथ पकड़कर बोले, "हैं इन्दिरा! बेशक तू वही इन्दिरा है जिसके होने का मैं आशा करता था। यद्यपि कई वर्षों के बाद आज किस्मत ने तेरी सूरत दिखाई है आर जब मैंने आखिरी मर्तबे तेरी सूरत देखी थी तब तू निरी लड़की थी, मगर फिर भी आज मैं तझे पहचाने बिना नहीं रह सकता। तू मुझसे डर मत और अपने दिल में किसी तरह खुटका भी मत ला, मुझे खूब मालूम हो गया है कि मेरे मामले में तू बिलकूल बेकसूर है। मैं तुझे धर्म की लड़की समझता हूँ और समझंगा, अब तू मेरे सामने बैठ जा और अपना अनूठा किस्सा कह! हाँ, पहले यह तो बता कि तेरी माँ कहाँ है? कैद से छूटने पर मैंने उसकी बहुत खोज की मगर कुछ भी पता न लगा। निःसन्देह तेरा किस्सा बड़ा ही अनूठा होगा।
इन्दिरा--(बैठने के बाद आँसू से भरी हुई आँखों को आँचल से पोंछती हुई) मेरी मां बेचारी भी इसी तिलिस्म में कैद है!
गोपालसिंह--(ताज्जुब से) इसी तिलिस्म में कैद है?
इन्दिरा--जी हाँ, इसी तिलिस्म में कैद है। बड़ी कठिनाइयों से उसका पता लगाती हई मैं यहाँ तक पहुँची। अगर मैं यहाँ तक पहुँचकर उससे न सिलती तो निःसन्देह वह अब तक मर गई होती। मगर न तो मैं उसे कैद से छुड़ा सकती हूं और न स्वयं इस तिलिस्म के बाहर ही निकल सकती हूँ। लगभग दस-पन्द्रह दिन हुए होंगे कि अकस्मात् एक किताब मेरे हाथ लग गई जिसके पढ़ने से इस तिलिस्म का कुछ-कुछ हाल मुझे मालूम हो गया हैं और मैं यहाँ घूमने-फिरने लायक भी हो गई हूँ, मगर इस तिलिस्म के बाहर नहीं निकल सकती। क्या कहूँ, उस किताब का मतलब पूरा-पूरा समझ में नहीं आता, यदि मैं उसे अच्छी तरह समझ सकती तो निःसन्देह यहाँ से बाहर जा सकती और आश्चर्य नहीं कि अपनी माँ को छुड़ा लेती।
गोपालसिंह--यह किताब कौन-सी है और कहाँ है?
इन्दिरा--(कपड़े के अन्दर से एक छोटी-सी किताब निकालकर और गोपालसिंह के हाथ में देकर)लीजिए, यही है।
यह किताब लम्बाई-चौड़ाई में बहुत छोटी थी और उसके अक्षर भी बड़े ही महीन थे, मगर इसे देखते ही गोपालसिंह का चेहरा खुशी से दमक उठा और उन्होंने इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तरफ देखकर कहा, “यही मेरी वह किताब है जो खो गई थी। (किताब चूमकर) आह, इसके खो जाने से तो मैं अधमरा-सा हो गया था! (इन्दिरा से) यह तेरे हाथ कैसे लग गई?"
इन्दिरा--इसका हाल भी बड़ा विचित्र है, अपना किस्सा जब मैं कहूँगी तो उसी के बीच में वह भी आ जायेगा।
इन्द्रजीतसिंह--(गोपालसिंह से)मालूम होता है कि इन्दिरा का किस्सा बहुत बड़ा है, इसलिए आप पहले रोहतासगढ़ का हाल सुना दीजिये तो एक तरफ से दिलजमई हो जाये।
कमलिनी के मकान की तबाही, किशोरी, कामिनी और तारा की तकलीफ, नकली बलभद्रसिंह के कारण भूतनाथ की परेशानी, लक्ष्मीदेवी, दारोगा और शेरअलीखाँ का रोहतासगढ़ में गिरफ्तार होना, राजा वीरेन्द्रसिंह का वहाँ पहुँचना, भूतनाथ के मुकदमे की पेशी, कृष्णजिन्न का पहुँचकर इन्दिरा वाले कलमदान का पेश करना और असली बलभद्रसिंह का पता लगाने के लिए भूतनाथ को छुट्टी दिला देने इत्यादि जो कुछ बातें हम ऊपर लिख आए हैं, वह सब हाल राजा गोपालसिंह ने इन्दिरा के सामने ही दोनों कुमारों से बयान किया और सभी ने बड़े गौर से सुना।
इन्दिरा--बड़े आश्चर्य की बात है कि वह कलमदान जिस पर मेरा नाम लिखा हुआ था कृष्ण जिन्न के हाथ क्योंकर लगा! हाँ, उस कलमदान का हमारे कब्जे से निकल जाना बहुत ही बुरा हुआ। यदि आज वह मेरे पास होता तो मैं बात-की-बात में भूतनाथ के मुकद्दमे का फैसला कर देती, मगर अब क्या हो सकता है!
गोपालसिंह--इस समय वह कलमदान राजा वीरेन्द्रसिंह के कब्जे में है इसलिए उसका तुम्हारे हाथ लगना कोई बड़ी बात नहीं है।
इन्दिरा--ठीक है, मगर उन चीजों का मिलना तो अब कठिन होगा जो उसके अन्दर थीं और उन्हीं चीजों का मिलना सबसे ज्यादा जरूरी था।
गोपालसिंह--ताज्जुब नहीं कि वे चीजें भी कृष्ण जिन्न के पास ही हों और वह महाराज के कहने से तुम्हें दे दें।
इन्द्रजीतसिंह--या उन चीजों से स्वयं कृष्ण जिन्न वह काम निकालें जो तुम कर सकती हो।
इन्दिरा--“नहीं, उन चीजों का मतलब जितना मैं बता सकती हूँ, उतना कोई दूसरा नहीं बता सकता!
गोपालसिंह--खैर, जो कुछ होगा, देखा जायेगा।
आनन्दसिंह--(गोपालसिंह से) यह सब हाल आपको कैसे मालूम हुआ? क्या आपने कोई आदमी रोहतासगढ़ भेजा था? या खुद पिताजी ने यह सब हाल कहला भेजा है?
गोपालसिंह--भूतनाथ स्वयं मेरे पास मदद लेने के लिए आया था मगर मैंने मदद देने से इनकार कर दिया।
इन्द्रजीतसिंह--(ताज्जुब से) ऐसा क्यों किया?
गोपालसिंह--(ऊँची साँस लेकर) विधाता के हाथों से मैं बहुत सताया गया हूँ। सच तो यह है कि अभी तक मेरे होशहवास ठिकाने नहीं हैं, इसलिए मैं कुछ मदद करने लायक नहीं हैं। इसके अतिरिक्त मैं खुद अपनी तिलिस्मी किताब खो जाने के गम में पड़ा हुआ था, मुझे किसी की बात कब अच्छी लगती?
इन्द्रजीतसिंह--(मुस्कराकर)जी नहीं, ऐसा करने का सबब कुछ दूसरा ही है, मैं कुछ-कुछ समझ गया, खैर, देखा जायेगा, अब इन्दिरा का किस्सा सुनना चाहिए।
गोपालसिंह--(इन्दिरा से) अब तुम अपना हाल कहो, यद्यपि तुम्हारा और तुम्हारी मां का हाल मैं बहुत-कुछ जानता हूं मगर इन दोनों भाइयों को उसकी कुछ भा खबर नहीं है बल्कि तुम दोनों का नाम भी शायद इन्होंने न सुना होगा।
इन्द्रजीतसिंह--बेशक ऐसा ही है।
गोपालसिंह--इसलिए तुम्हें चाहिए कि अपना और अपनी माँ का हाल शुरू से कह सुनाओ, मैं समझता हूँ कि तुम्हें अपनी माँ का कुल हाल मालूम होगा।
इन्दिरा--जी हाँ, मैं अपनी मां का हाल खुद उसकी जुबानी और कुछ इधरउधर से भी पूरी तरह सुन चुकी हूँ।
गोपालसिंह--अच्छा, तो अब कहना आरम्भ करो।
इस.समय रात घण्टे भर से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। इन्दिरा ने पहले अपनी मां का और फिर अपना हाल इस तरह बयान किया--
इन्दिरा--मेरी माँ का नाम सरयू और पिता का नाम इन्द्रदेव है।
इन्द्रजीतसिंह--(ताज्जुब से) कौन इन्द्रदेव?
गोपालसिंह--वही इन्द्रदेव, जो दारोगा का गुरुभाई है, जिसने लक्ष्मीदेवी की जान बचाई थी, और जिसका जिक्र मैं अभी कर चुका हूं।
इन्द्रजीतसिंह--अच्छा तब?
इन्दिरा--मेरे नाना बहुत अमीर आदमी थे। लाखों रुपयों की मौरूसी जायदाद उनके हाथ लगी थी और वह खुद भी बहुत पैदा करते थे, मगर सिवाय मेरी माँ के जनको और कोई औलाद न थी, इसलिए वह मेरी माँ को बहुत प्यार करते थे और धनदौलत भी बहुत ज्यादा दिया करते थे। इसी कारण मेरी माँ का रहना भी बनिस्बित ससुराल के नैहर में ज्यादा होता था। जिस जमाने का मैं जिक्र करती हूँ उस जमाने में मेरी उम्र लगभग सात-आठ वर्ष के होगी मगर मैं बातचीत और समझ-बूझ में होशियार थी और उस समय की बातें आज भी मुझे इस तरह याद हैं जैसे कल ही की बातें हों।
जाड़े का मौसम था जब से मेरा किस्सा शुरू होता है। मैं अपनी ननिहाल में थी। आधी रात का समय था, मैं अपनी माँ के पास पलंग पर सोई हुई थी। यकायक दरवाजा खुलने की आवाज आई और किसी आदमी को कमरे में आते देख मेरी माँ उठ बैठी, साथ ही इससे मेरी नींद भी टूट गई। कमरे के अन्दर इस तरह यकायक आने वाले मेरे नाना थे जिन्हें देख मेरी माँ को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और वह पलंग से नीचे उतरकर खड़ी हो गई।
आनन्दसिंह--तुम्हारे नाना का क्या नाम था?
इन्दिरा--मेरे नाना का नाम दामोदरसिंह था और वे इसी शहर जमानिया में रहा करते थे।
आनन्दसिंह--अच्छा, तब क्या हुआ?
इन्दिरा--मेरी माँ को घबराई हुई देखकर नाना साहब ने कहा, "सरयू बेटी, इस समय यकायक मेरे आने से तुझे ताज्जुब होगा और निःसन्देह यह ताज्जुब की बात है भी मगर क्या करूँ किस्मत और लाचारी मुझसे ऐसा कराती है। सरयू, इस बात को मैं खूब जानता हूँ कि लड़की को अपनी मर्जी से ससुराल की तरफ बिदा कर देना सभ्यता के विरुद्ध और लज्जा की बात है मगर क्या करूं, आज ईश्वर ही ने ऐसा करने के लिए मुझे मजबूर किया है। बेटी, आज मैं जबरदस्ती अपने हाथ से अपने कलेजे को निकालकर बाहर फेंकता हूँ अर्थात् अपनी एकमात्र औलाद को (तुझको), जिसे देखे बिना कल नहीं पड़ती थी, जबरदस्ती उसके ससुराल की तरफ बिदा करता हूँ। मैंने सबकी चोरी-चोरी बालाजी को बुलवा भेजा है और खबर लगी है कि दो घण्टे के अन्दर ही वह आना चाहते हैं। इस समय तुझे यह इत्तिला देने आया हूँ कि इसी घण्टे-दो-घण्टे के अन्दर तू भी अपने जाने की तैयारी कर ले!" इतना कहते-कहते नाना साहब का जी उमड़ आया, गला भर गया और उसकी आँखों से टपाटप आँसू की बूंदें गिरने लगीं।
इन्द्रजीतसिंह--बालाजी किसका नाम है?
इन्दिरा--मेरे पिता को मेरी ननिहाल में मब कोई 'बालाजी' कहकर पुकारा करते थे।
इन्द्रजीतसिंह--अच्छा फिर?
इन्दिरा--उस समय अपने पिता की ऐसी अवस्था देखकर मेरी माँ बदहवास हो गई और उखड़ी हुई आवाज में बोली, "पिताजी यह क्या? आपकी ऐसी अवस्था क्यों हो रही है? मैं यह बात क्यों देख रही हैं? जो बात मैंने आज तक नहीं सुनी थी वह क्यों सुन रही हूँ? मैंने ऐसा क्या कसुर किया है जो आज इस घर से मैं निकाली जाती हूँ?"
दामोदरसिंह ने कहा, "बेटी, तूने कुछ कसूर नहीं किया, सब कसुर मेरा है। जो कुछ मैंने किया है उसी का फल भोग रहा हूँ बस, इससे ज्यादा और मैं कुछ नहीं कहना चाहता। हाँ, तुझसे मैं एक बात की अभिलाषा रखता हूँ, आशा है कि तू अपने बाप की बात कभी न टालेगी। तू खूब जानती है कि इस दुनिया में तुझसे बढ़कर मैं किसी को नहीं मानता हूँ और न तुझसे बढ़कर किसी पर मेरा स्नेह है, अतएव इसके बदले में केवल इतना ही चाहता हूँ कि इस अन्तिम समय में जो कुछ तुझे कहता हूँ उसे तू अवश्य पूरा करे और मेरी याद अपने दिल में बनाये रहे
इतना कहते-कहते मेरे नाना की बुरी हालत हो गई। आँसुओं ने उनके रोआबदार चेहरे को तर कर दिया और गला ऐसा भर गया कि कुछ कहना कठिन हो गया। मेरी मां भी अपने पिता की विचित्र बातें सुनकर अधमरी-सी हो गई। पितृस्नेह ने उसका कलेजा हिला दिया, न रुकने वाले आँसुओं को पोंछकर और मुश्किल से अपने दिल को सम्हालकर बोली, "पिताजी, कहो, शीघ्र कहो कि आप मुझसे क्या चाहते हैं? मैं आपके चरणों पर जान देने के लिए तैयार हूँ।"
इसके जवाब में दामोदरसिंह ने यह कहकर कि "मैं भी तुझसे यही आशा रखता हूँ", अपने कपड़ों के अन्दर से एक कलमदान निकाला और मेरी माँ को देकर कहा, "इसे अपने पास हिफाजत से रखना और जब तक मैं इस दुनिया में कायम रहूँ, इसे मत खोलना। देख इस कलमदान के ऊपर तीन तस्वीरें बनी हुई हैं। बिचली तस्वीर के नीचे इन्दिरा का नाम लिखा हआ है। जब तेरा पति इस कलमदान के अन्दर का हाल पूछे तो तु कह देना कि मेरे पिता ने यह कलमदान इन्दिरा को दिया है और इस पर उसका नाम भी लिख दिया है तथा ताकीद कर दी है कि जब तक इन्दिरा की शादी न हो जाये यह कलमदान खोला न जाये, अस्तु जिस तरह हो यह कलमदान खुलने न पावे। यह तकलीफ तुझे ज्यादा दिन तक भोगनी न पड़ेगी क्योंकि मेरी जिन्दगी का अब कोई ठिकाना न रहा। मैं इस समय खूखार दुश्मनों से घिरा हुआ हूँ, नहीं कह सकता कि आज मरूँ या कल, मगर बेटी, तू मेरे जब मरने का अच्छी तरह से निश्चय कर ले तभी इस कलमदान को खोलना। इसकी ताली मैं तुझे नहीं देता, जब इसके खुलने का समय आवे तब जिस तरह हो सके खोल डालना।" इतना कहकर मेरे नाना वहाँ से चले गए और रोती हई मेरी माँ को उसी तरह छोड़ गए।
इन्द्रजीतसिंह--मैं समझता हूँ यह वही कलमदान था जो कृष्ण जिन्न ने महाराज के सामने पेश किया था और जिसका हाल अभी तुम्हारे सामने भाई साहब ने बयान किया है!
इन्दिरा--जी हाँ। इन्द्रजीतसिंह-निःसन्देह यह अनूठा किस्सा है, अच्छा, तब क्या हआ?
इन्दिरा--घण्टे भर तक मेरी माँ तरह-तरह की बातें सोचती और रोती रही. इसके बाद दामोदरसिंह पुनः उस कमरे में आये और मेरी माँ को रोती हुई देखकर बोले "सरयू, तू अभी तक बैठी रो रही है। अरी बेटी, तुझे तो अब अपने प्यारे बाप के लिए जन्म भर रोना है, इस समय तू अपने दिल को सम्हाल और जाने की शीघ्र तैयारी कर अगर तू विलम्ब करेगी तो मुझे बड़ा कष्ट होगा और पुनः तुझसे पूछता हूँ कि उस कलमदान के विषय में जो कुछ मैंने कहा तू वैसा ही करेगी न?" इसके जवाब में मेरी माँ ने सिसककर कहा, "जो कुछ आपने आज्ञा की है मैं उसका पालन करूँगी, परन्त मेरे पिता, यह बताओ कि तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?' मेरी मां ने बहुत-कुछ मिन्नत और आजिजी की मगर नाना साहब ने अपनी बदहवासी का सबब कुछ भी बयान न किया और बाहर चले गये। थोड़ी ही देर बाद एक लौंडी ने आकर खबर दी कि बालाजी (मेरे पिता)इन्द्रदेव आ गये। उस समय मेरी माँ को नाना साहब की बातों का निश्चय हो गया और वह समझ गई कि अब इसी समय यहां से रवाना हो जाना पड़ेगा।
थोड़ी देर बाद मेरे पिता घर में आये। माँ ने उनसे आने का सबब पूछा जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि "तुम्हारे पिता ने एक विश्वासी आदमी के हाथ मुझे पत्र भेजा जिसमें केवल इतना ही लिखा था कि इस पत्र को देखते ही चल पड़ो और जितनी जल्दी हो सके हमारे पास पहुँचो।" मैं पत्र पढ़ते ही घबरा गया, उस आदमी से पूछा कि घर में कुशल तो है? उसने कहा कि “सब कुशल है, मैं बहुत तेज ड़ेि पर सवार करा के तुम्हारे पास भेजा गया हूँ। अब मेरा घोड़ा लौट जाने लायक नहीं है। मगर तुम बहुत जल्द उनके पास जाओ।" मैं घबराया हुआ एक घोड़े पर सवार हो के उसी वक्त चल पड़ा मगर इस समय यहां पहुंचने पर उनसे ऐसा करने का सबब पूछा तो कोई भी जवाब न मिला, उन्होंने एक कागज मेरे हाथ में देकर कहा कि इसे हिफाजत से रखना, इस कागज में मैंने अपनी कुल जायदाद इन्दिरा के नाम लिख दी है। मेरी जिन्दगी का अब कोई ठिकाना नहीं। तुम इस कागज को अपने पास रखो और अपनी स्त्री तथा लड़की को लेकर इसी समय यहाँ से चले जाओ, क्योंकि अब जमानिया में बड़ा भारी उपद्रव उठना चाहता है? बस, इससे ज्यादा और कुछ न कहेंगे। तुम्हारी बिदाई का सब बन्दोबस्त हो चुका है, सवारी इत्यादि तैयार है।"
इतना कहकर मेरे पिता चुप हो गये और दम भर के बाद उन्होंने मेरी मां से पूछा कि इन सब बातों का सबब यदि तुम्हें कुछ मालूम हो तो कहो। मेरी माँ ने भी थोड़ी देर पहले जो कुछ हो चुका था, कह सुनाया। मगर कलमदान के बारे में केवल इतना ही कहा कि पिताजी यह कलमदान इन्दिरा के लिए दे गये हैं और कह गये हैं कि कोई इसे खोलने न पावे, जब इन्दिरा की शादी हो जाये तो वह अपने हाथ से इसे खोलें।
इसके बाद मेरे पिता मिलने के लिए मेरी नानी के पास गये और देखा कि रोतेरोते उसकी अजीब हालत हो गई है। मेरे पिता को देखकर वह और भी रोने लगी मगर इसका सबब कुछ भी न बता सकी कि उसके मालिक को आज क्या हो गया है, वे इतने बदहवास क्यों हैं, और अपनी लड़की को इसी समय यहाँ से बिदा करने पर क्यों मजबूर हो रहे हैं क्यवेकि उस बेचारी को भी इसकी बाबत कुछ मालूम न था।
यह सब बातें जो मैं ऊपर कह आई हैं सिवाय हम पांच आदमियों के और किसी को मालम न थीं। उस घर का और कोई भी यह नहीं जानता था कि आज दामोदरसिंह बदहवास हो रहे हैं और अपनी लड़की को किसी लाचारी से इसी समय बिदा कर रहे हैं।
थोड़ी देर बाद हम लोग बिदा कर दिये गये। मेरी मां रोती हुई मुझे साथ लेकर रथ में रवाना हुई जिसमें दो मजबूत घोड़े जुते हुए थे, और इसी तरह के दूसरे रथ पर बहुत-सा सामान लेकर मेरे पिता सवार हुए और हम लोग वहाँ से रवाना हुए। हिफाजत के लिए कई हथियारबन्द सवार भी हम लोगों के साथ थे।
जमानिया से मेरे पिता का मकान केवल तीस-पैंतीस कोस की दूरी पर होगा। जिस वक्त हम लोग घर से रवाना हुए, उस वक्त दो घण्टे रात बाकी थी और जिस समय हम लोग घर पहुँचे उस समय पहर भर से भी ज्यादा दिन बाकी था। मेरी माँ तमाम रास्ते रोती गई और घर पहुँचने पर भी कई दिनों तक उसका रोना बन्द न हुआ। मेरे पिता के रहने का स्थान बड़ा ही सुन्दर और रमणीक है, मगर उसके अन्दर जाने का रास्ता बहुत ही गुप्त रखा गया है।
इस जगह इन्दिरा ने इन्द्रदेव के मकान और रास्ते का थोड़ा-सा हाल वयान किया और उसके बाद फिर अपना किस्सा कहने लगी--
इन्दिरा--मेरे पिता तिलिस्म के दारोगा हैं और यद्यपि खुद भी बड़े भारी ऐयार हैं तथापि उनके यहां कई ऐयार नौकर हैं। उन्होंने अपने दो ऐयारों को इसलिए जमानिया भेजा कि वे एकसाथ मिलकर या अलग-अलग होकर दामोदरसिंहजी की बदहवासी और परेशानी का पता गुप्त रीति से लगावें और यह मालूम करें कि वह कौन से दुश्मनों की चालबाजियों के शिकार हो रहे हैं। इस बीच मेरे पिता ने पुनः मेरी माँ से कलमदान का हाल पूछा जो उसके पिता ने उसे दिया था और मेरी माँ ने उसका हाल साफ-साफ कह दिया अर्थात् जो कुछ उस कलमदान के विषय में दामोदरसिंहजी ने नसीहत इत्यादि की थी, वह साफ-साफ कह सुनायी।
जिस दिन मैं अपनी माँ के साथ पिता के घर गई उसके ठीक पन्द्रहवें दिन संध्या के समय मेरे पिता के एक ऐयार ने यह खबर पहुँचाई कि जमानिया में प्रातःकाल सरकारी महल के पास वाले चौमुहाने पर दामोदरसिंहजी की लाश पाई गई जो लहू से भरी हुई थी और सिर का पता न था। महाराज ने उस लाश को अपने पास उठवा मँगाया और तहकीकात हो रही है। इस खबर को सुनते ही मेरी मां जोर-जोर से रोने और अपना माथा पीटने लगी। थोड़ी ही देर बाद ननिहाल का भी एक दूत आ पहँचा और उसने भी वही खबर सुनाई। पिताजी ने मेरी माँ को बहुत समझाया और कहा कि कलमदान देत समय तम्हारे पिता ने तुमसे कहा था कि मेरे मरने के बाद इस कलमदान को खोलना मगर को मारने का अच्छी तरह निश्चय कर लेना। उनका ऐसा कहना बेसबब न था। 'मरने का निश्चय कर लेना' यह बात उन्होंने निःसन्देह इसीलिए कही होगी कि उनके मरने के विषय में लोग हम सभी को धोखा देंगे, यह बात उन्हें अच्छी तरह मालूम थी। अस्तु तुम अभी रो-रोकर अपने को हलकान मत करो और पहले मुझे जमानिया जाकर उनके मरने के विषय में निश्चय कर लेने दो। यह जरूर बड़े ताज्जुब और शक की बात है कि उन्हें मारकर कोई उनका सिर ले जाये और धड़ उसी तरह रहने दे। इसके अतिरिक्त तुम्हारी माँ का भी बन्दोबस्त करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि वह किसी दूसरे ही की लाश के साथ सती हो जाये।
मेरी माँ ने भी जमानिया जाने की इच्छा प्रकट की, परन्तु पिता ने स्वीकार न करके कहा कि यह बात तुम्हारे पिता को भी स्वीकार न थी, नहीं तो अपनी जिन्दगी ही में तुम्हें यहाँ बिदा न कर देते, इत्यादि बहुत-कुछ समझा-बुझाकर उसे शान्त किया और स्वयं उसी समय दो-तीन ऐयारों को साथ लेकर जमानिया की तरफ रवाना हो गए।
इतना कहकर इन्दिरा रुक गई और लम्बी साँग लेकर फिर बोली-
इन्दिरा--उस समय मेरे पिता पर जो कुछ मुसीबत बीती थी उसका हाल उन्हीं की जुबानी सुनना अच्छा मालूम होगा तथापि जो कुछ मुझे मालूम है मैं बयान करती हूँ। मेरे पिता जब जमानिया पहुँचे तो सीधे घर चले गए। वहाँ पर देखा तो मेरी नानी को अपने पति की लाश के साथ सती होने की तैयारी करते पाया क्योंकि देखभाल करने के बाद राजा साहब ने उनकी लाश उनके घर भिजवा दी थी। मेरे पिता ने मेरी नानी को बहुत-कुछ समझाया और कहा कि इस लाश के साथ तुम्हारा सती होना उचित नहीं है, कौन ठिकाना यह कार्रवाई धोखा देने के लिए की गई हो, और यदि यह दूसरे की लाश निकली तो तुम स्वयं विचार सकती हो कि तुम्हारा सती होना कितना बुरा होगा। अतः तुम इसकी दाह-क्रिया होने दो और बीच में मैं इस मामले का असल पता लगा लूंगा, अगर यह लाश वास्तव में उन्हीं की होगी तो खूनी का या उसके सिर का पता लगाना कोई कठिन न होगा! इत्यादि बहुत-सी बातें समझाकर उनको सती होने से रोका और स्वयं खूनियों का पता लगाने का उद्योग करने लगे।
आधी रात का समय था, सर्दी खूब पड़ रही थी। लोग लिहाफों के अन्दर मुंह छिपाये अपने-अपने घरों में सो रहे थे। मेरे पिता सूरत बदले और चेहरे पर नकाब डाले घूमते-फिरते उसी चौमुहाने पर जा पहुंचे जहाँ मेरे नाना की लाश पाई गई थी। उस समय चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। वे एक दुकान की आड़ में खड़े होकर कुछ सोच रहे थे कि दाहिनी तरफ से एक आदमी को आते देखा। वह आदमी भी अपने चेहरे को नकाब से छिपाए हुए था। मेरे पिता के देखते-ही-देखते वह उस चौमुहाने पर कुछ रखकर पीछे की तरफ मुड़ गया। मेरे पिता ने जाकर देखा तो एक लिफाफे पर नजर पड़ी, उसे उठा लिया और घर लौट आये। शमादान के सामने लिफाफा खोला, उसके अन्दर एक चिट्ठी थी और उसमें यह लिखा था--
"दामोदरसिंह के खूनी का जो कोई पता लगाना चाहे उसे अपनी तरफ से भी होशियार रहना चाहिए। ताज्जुब नहीं कि उसकी भी वही दशा हो जो दामोदरसिंह की हुई।"
इस पत्र को पढ़कर मेरे पिता तरदुद में पड़ गये और सवेरा होने तक तरह-तरह कीबातें सोचते-विचारते रहे। उन्हें आशा थी कि सवेरा होने पर उनके ऐयार लोग घर लौट आयेंगे और रात भर में जो कुछ उन्होंने किया है उसका हाल कहेंगे, क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने ऐयारों को ताकीद कर दी थी मगर उनका विचार ठीक न निकला अर्थात् उनके वे भेजे हुए ऐयार लौटकर न आये। दूसरा दिन भी बीत गया और तीसरे दिन भी दोपहर रात जाते-जाते तक मेरे पिता ने उन लोगों का इन्तजार किया मगर सब व्यर्थ था, उन ऐयारों का हाल कुछ भी मालूम न हुआ। आखिर लाचार होकर स्वयं उनकी खोज में जाने के लिए तैयार हो गये और घर से बाहर निकलना ही चाहते थे कि कमरे का दरवाजा खुला और महाराज के एक चोबदार को साथ लिए हुए नाना साहब का एक सिपाही कमरे के अन्दर दाखिल हुआ। पिता को बड़ा ताज्जुब हुआ और उन्होंने चोबदार से वहाँ आने का सबब पूछा। चोबदार ने जवाब दिया कि आपको कुंअर साहब (गोपालसिंह) ने शीघ्र ही बुलाया है और अपने साथ लाने के लिए मुझे सख्त ताकीद की है।
गोपालसिंह--हाँ, ठीक है, मैंने उन्हें अपनी मदद के लिए बुलवाया था, क्योंकि मेरे और इन्द्रदेव के बीच दोस्ती थी और उस समय मैं दिली तकलीफों से बहुत बेचैन था। इन्द्रदेव से और मुझसे अब भी वैसी ही दोस्ती है, वह मेरा बहुत सच्चा दोस्त है, चाहे वर्षों हम दोनों में पत्र-व्यवहार न हो मगर दोस्ती में किसी तरह की कमी नहीं आ सकती।
इन्दिरा–-बेशक ऐसा ही है! तो उस समय का हाल और उसके बाद मेरे पिता से और आपसे जो-जो बातें हुई थीं सो आप अच्छी तरह बयान कर सकते हैं।
गोपालसिंह--नहीं-नहीं, जिस तरह तुम और हाल कह रही हो उसी तरह वह भी कह जाओ, मैं समझता हूँ कि इन्द्रदेव ने यह सब हाल तुमसे कहा होगा।
इन्दिरा--जी हाँ, इस घटना के कई वर्ष बाद पिताजी ने मुझसे सब हाल कहा था जो अभी तक मुझे अच्छी तरह याद है, मगर मैं उन बातों को मुख्तसिर ही में बयान करती हूँ।
गोपालसिंह--क्या हर्ज है तुम मुख्तसिर में बयान कर जाओ, जहाँ भूलोगी मैं बता दूंगा, यदि वह हाल मुझे भी मालूम होगा।
इन्दिरा जो आज्ञा! मेरे पिता जब चोबदार के साथ राजमहल में गये, तो मालूम हुआ कि कुँअर साहब घर में नहीं हैं कहीं बाहर गये हैं। आश्चर्य में आकर उन्होंने कुँअर साहब के खास खिदमतगार से दरियाफ्त किया तो उसने जवाब दिया कि आपके पास चोबदार भेजने के बाद बहुत देर तक अकेले बैठकर आपका इन्तजार करते रहे मगर जब आपके आने में देर हुई तो घबराकर खुद आपके मकान की तरफ चले गये। यह सुनते ही मेरे पिता घबराकर वहां से लौटे और फौरन ही घर पहुँचे मगर कुँअर साहब से मुलाकात न हई। दरियाफ्त करने पर पहरेदार ने कहा कि कुँअर साहब यहाँ नहीं आए हैं। वे पुनः लौटकर राजमहल में गये, परन्तु कुँअर साहब का पता न लगना था और न लगा। मेरे पिता की वह तमाम रात परेशानी में बीती, और उस समय उन्हें नाना साहब की बात याद आई जो उन्होंने मेरे पिता से कही थी कि अब जमानिया में बड़ा भारी उपद्रव उठना चाहता है।
तमाम रात बीत गई, दूसरा दिन चला गया, तीसरा दिन चला गया, मगर कुँअर माजका पता न लगा। सैकड़ों आदमी खोज में निकले, तमाम शहर में कोलाहल मच गया जिसे देखिए वह इन्हीं के विषय में तरह-तरह की बातें कहता और आश्चर्य करता था। उन दिनों कुंअर साहब (गोपालसिंह) की शादी लक्ष्मीदेवी से लगी हई थी और तिलिस्मी दारोगा साहब शादी के विरुद्ध बातें किया करते थे, इस बात की चर्चा भी शहर में फैली हुई थी।
चौथे दिन आधी रात के समय मेरे पिता नाना साहब वाले मकान में फाटक के ऊपर वाले कमरे के अन्दर पलँग पर लेटे हुए कुँअर साहब के विषय में कुछ सोच रहे थे कि यकायक कमरे का दरवाजा खुला और आप (गोपालसिंह) कमरे के अन्दर आते हुए दिखाई पड़े। मुहब्बत और दोस्ती में बड़ाई-छुटाई का दर्जा कायम नहीं रहता। कुंअर साहब को देखते ही मेरे पिता उठ खड़े हुए और दौड़कर इनके गले से चिपटकर बोले, "क्यों साहब, आप इतने दिनों तक कहाँ थे?"
उस समय कुँअर साहब की आँखों से आंसू की बूंदें टपटपाकर गिर रही थीं; चेहरे पर उदासी और तकलीफ की निशानी पाई जाती थी, और उन दिनों में ही उनके बदन सायद हालत हो गई थी कि महीनों के बीमार मालूम पड़ते थे। मेरे पिता ने हाथ-मुँह धलवाया तथा अपने पलंग पर बैठाकर हाल-चाल पूछा और कुअर साहब ने इस तरह अपना हाल बयान किया--
"उस दिन मैंने तुमको बुलाने के लिए चोबदार भेजा, जब तक चोवदार तुम्हारे यहाँ से लौटकर आये उसके पहले ही एक खिदमतगार ने मुझे इत्तिला दी कि इन्द्रदेव ने आपको अपने घर अकेले ही बुलाया है। मैं उसी समय उठ खड़ा हुआ और अकेले तुम्हारे मकान की तरफ रवाना हुआ। जब आधे रास्ते में पहुँचा तो तुम्हारे यहां का अर्थात् दामोदरसिंह का खिदमतगार, जिसका नाम प्यारे है, मुझे मिला और उसने कहा कि इन्द्रदेव गंगा-किनारे की तरफ गये हैं और आपको उसी जगह बुलाबा है। मैं क्या जानता था कि एक अदना खिदमतगार मुझसे दगा करेगा। मैं बेधड़क उसके साथ गंगा के किनारे की तरफ रवाना हुआ। आधी रात से ज्यादा तो जा ही चुकी थी अतएव गंगा किनारे बिल्कुल सन्नाटा छाया हुआ था। मैंने वहाँ पहुँचकर किसी को न पाया तो उस नौकर से पूछा कि इन्द्रदेव कहाँ हैं? उसने जवाब दिया कि ठहरिये आते होंगे। उस घाट पर केवल एक डोंगी बँधी हुई थी, मैं कुछ विचारता हुआ उस डोंगी की तरफ देख रहा था कि यकायक दोनों तरफ से दस-बारह आदमी चेहरों पर नकाबें डाले हए आ पहुंचे और उन सभी ने फर्ती के साथ मुझे गिरफ्तार कर लिया। वे सब बड़े मजबूत और ताकतवर थे और सबके सब एक साथ मुझसे लिपट गये। एक ने मेरे मुंह पर एक मोटा कपड़ा डालकर ऐसा कस दिया कि न तो मैं बोल सकता था और न कुछ देख सकता था, बात-की-बात में मेरी मुश्क बाँध दी गई और जबरदस्ती उसी डोंगी पर बैठा दिया गया जो घाट के किनारे बंधी हुई थी। डोंगी किनारे से खोल दी गई और बड़ी तेजी से चलाई गई। मैं नहीं कह सकता कि वे लोग कितने आदमी थे और दो ही घण्टे में जब तक कि मैं उस पर सवार था, डोंगी को लेकर कितनी दूर तक गये। लगभग दो घण्टे के करीब बीत गये, तब डोंगी किनारे लगी और मुझे उतारकर एक घोड़े पर चढ़ाया गया! मेरे दोनों पैर घोड़े के नीचे की तरफ मजबूती के साथ बाँध दिए गए, हाथ की रस्सी ढीली कर दी, जिसमें मैं घोड़े की काठी पकड़ सकं और घोड़ा तेजी के साथ एक तरफ को दौड़ाया गया। मैं दोनों हाथों से घोड़ की काठी पकड़े हए था। यद्यपि मैं देखने और बोलने से लाचार कर दिया गया था मगर अन्दाज से और घोड़ों की टापों की आवाज से मालम हो गया कि मुझे कई सवार घेरे हुए चल रहे हैं और मेरे घोड़े की भी लगाम किसी सवार के हाथ में है। कभी तेजी से और कभी धीरे-धीरे चलते दो पहर से ज्यादा बीत गए, पैरों में दर्द होने लगा और थकावट ऐसी जान पड़ने लगी कि मानो तमाम बदन चूर-चूर हो गया है। इसके बाद वे घोड़े रोके गए और मैं नीचे उतारकर एक पेड़ के साथ कस के बाँध दिया गया और उस समय मेरे मुँह का कपड़ा खोल दिया गया। मैंने चारों तरफ निगाह दौड़ाई तो अपने को एक घने जंगल में पाया। दस आदमी मोटे मुस्टंडे और उनकी सवारी के दस घोड़े सामने खड़े थे। पास ही में पानी का एक चश्मा बह रहा था। कई आदमी जीन खोलकर घोड़ों को ठण्डा करने और चराने की फिक्र में लगे और बाकी के शैतान हाथ में नंगी तलवार लेकर मेरे चारों तरफ खड़े हो गए। मैं चुपचाप सभी की तरफ देखता था और मुंह से कुछ भी न बोलता था और न वे लोग ही मुझसे कुछ बातें करते थे। (लम्बी साँस लेकर) यदि गर्मी का दिन होता तो शायद मेरी जान निकल जाती क्योंकि उन कम्बख्तों ने मुझे पानी तक के लिए नहीं पूछा और स्वयं खा-पीकर ठीक हो गए। अस्तु पहर भर के बाद फिर मेरी वही दुर्दशा की गई अर्थात् देखने और बोलने से लाचार करके घोड़े पर उसी तरह बैठाया गया और फिर सफर शुरू हुआ। पुनः दोपहर से ज्यादा देर तक सफर करना पड़ा और इसके बाद मैं घोड़े से नीचे उतारकर पैदल चलाया गया। मेरे पैर दर्द और तकलीफ से बेकार हो रहे थे, मगर लाचारी ने फिर भी चौथाई कोस तक चलाया और इसके बाद चौखट लांघने की नौबत आई, तब मैंने समझा कि अब किसी मकान में जा रह चार दफे चौखट लाँघनी पड़ी जिसके बाद मैं एक खम्भे के साथ बांध दिया गया तब मेरे मुंह पर से कपड़ा हटाया गया।
। चौदहवाँ भाग समाप्त!
तिलिस्मी लेख
बाजे से निकली आवाज का मतलब यह है--
"सारा तिलिस्म तोड़ने का खयाल न करो और इस तिलिस्म की ताली किसी चलती-फिरती से प्राप्त करो। इस बाजे में वे सब बातें भरी हैं जिनकी तुम्हें जरूरत है. ताली लगाया करो, सुना करो। अगर एक ही दफे सुनने से समझ में न आवे तो दोहरा करके भी सुन सकते हो। इसका तरकीब और ताली इसी कमरे में है। ढूंढ़ो।
महाराज सूर्यकान्त की तस्वीर के नीचे लिखे हुए बारीक अक्षरों वाले मजमून
("स्वर दै गिन के वर्ग पै") का अर्थ यह है--
खूब समझ के तब आगे पैर रक्खो।
बाजे वाले चौतरे में खोजो, तिलिस्मी खंजर अपनी देह से अलग मत करो, नहीं तो जान पर आ बनेगी।