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चन्द्रकान्ता सन्तति अध्याय 20 / 24

विषय-सूची

  1. 1 पहला भाग
  2. 2 दूसरा भाग
  3. 3 तीसरा भाग
  4. 4 चौथा भाग
  5. 5 पाँचवाँ भाग
  6. 6 छठा भाग
  7. 7 सातवाँ भाग
  8. 8 आठवाँ भाग
  9. 9 नौवाँ भाग
  10. 10 दसवाँ भाग
  11. 11 ग्यारहवाँ भाग
  12. 12 बारहवाँ भाग
  13. 13 तेरहवाँ भाग
  14. 14 चौदहवाँ भाग
  15. 15 पन्द्रहवाँ भाग
  16. 16 सोलहवाँ भाग
  17. 17 सत्रहवाँ भाग
  18. 18 अठारहवाँ भाग
  19. 19 उन्नीसवाँ भाग
  20. 20 बीसवाँ भाग
  21. 21 इक्कीसवाँ भाग
  22. 22 बाईसवाँ भाग
  23. 23 तेईसवाँ भाग
  24. 24 चौबीसवाँ भाग

चन्द्रकान्ता सन्तति

बीसवाँ भाग

१

भूतनाथ और देवीसिंह को कई आदमियों ने पीछे से पकड़ कर अपने काबू में कर लिया और उसी समय एक आदमी ने किसी विचित्र भाषा में पुकार कर कुछ कहा, जिसे सुनते ही वे दोनों औरतें अर्थात् चम्पा तथा भूतनाथ की स्त्री चिराग फेंक-फेंककर पीछे की ओर लौट गईं, अंधकार के कारण कुछ मालूम न हुआ कि वे दोनों कहाँ गईं, हाँ भूतनाथ और देवीसिंह को इतना मालूम हो गया कि उन्हें गिरफ्तार करने वाले भी सब नकाबपोश हैं। भूतनाथ की तरह देवीसिंह भी सूरत बदल कर अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए थे।

गिरफ्तार हो जाने के बाद भूतनाथ और देवीसिंह दोनों एक साथ कर दिये गये और दोनों ही को लिए हुए वे सब बीच वाले बंगले की तरफ रवाना हुए। यद्यपि अंधकार के अतिरिक्त सूरत बदलने और नकाब डाले रहने के सबब एक का दूसरे को पहचानना कठिन था तथापि अन्दाज ही से एक को दूसरे ने जान लिया और शरमिन्दगी के साथ धीरे-धीरे उस बँगले की तरफ जाने लगे। जब बंगले के पास पहुँचे तो आगे वाले दालान में जहाँ दो चिरागों की रोशनी थी, तीन आदमियों को हाथ में नंगी तलवारें लिए पहरा देते देखा। वहाँ पहुँचने पर हमारे दोनों ऐयारों को मालूम हुआ कि उन्हें गिरफ्तार करने वाले गिनती में आठ से ज्यादा नहीं हैं। उस समय देवीसिंह और भूतनाथ के दिल में थोड़ी देर के लिए यह बात पैदा हुई कि केवल आठ आदमियों से हमें गिरफ्तार हो जाना उचित न था और अगर हम चाहते तो इन लोगों से अपने को बचा ही लेते, मगर उन दोनों का यह विचार तुरन्त ही जाता रहा, जब उन्होंने कुछ कमोबेश यह सोचा कि अगर हम इन लोगों से अपने को बचा लेते तो क्या होता क्योंकि यहाँ से निकल कर भाग जाना कठिन था और अगर भाग भी जाते तो जिस काम के लिए आये, उससे हाथ धो बैठते, अतः जो होगा देखा जायेगा।

इस दालान में अन्दर जाने के लिए दरवाजा था और उसके आगे लाल रंग का रेशमी पर्दा लटक रहा था। दीवार-छत इत्यादि सब रंगीन बने हुए थे और उन पर बनी हुई तरह-तरह की तस्वीरें अपनी खूबी और खूबसूरती के सबब देखने वालों का दिल खींच लेती थीं, परन्तु इस समय उन पर भरपूर और बारीक निगाह डालना हमारे ऐयारों के लिए कठिन था इसलिए हम भी उनका हाल बयान नहीं कर सकते।

जो लोग दोनों ऐयारों को गिरफ्तार कर लाये थे, बनमें से एक आदमी पर्दा उठा कर बँगले के अन्दर चला गया और चौथाई घड़ी के बाद लौट आकर अपने साथियों से बोला, "इन दोनों महाशयों को सरदार के सामने ले चलो और एक आदमी जाकर इनके लिए हथकड़ी-बेड़ी भी ले आओ, कदाचित हमारे सरदार इन दोनों के लिए कैदखाने का हुक्म दें।"

अतः एक आदमी हथकड़ी-बेड़ी लाने के लिए चला गया और वे सब देवीसिंह और भूतनाथ को लिए हुए बंगले की तरफ रवाना हुए।

यह बँगला बाहर से जैसा सादा और मामूली ढंग का मालूम होता था, वैसा अन्दर से नहीं था। जूता उतार कर चौखट के अन्दर पैर रखते ही हमारे दोनों ऐयार ताज्जुब के साथ चारों तरफ देखने लगे और फौरन ही समझ गये कि इसके अन्दर रहने वाला या इसका मालिक कोई साधारण आदमी नहीं है। देवीसिंह के लिए यह बात सबसे ज्यादा ताज्जुब की थी और इसीलिए उनके दिल में घड़ी-घड़ी यह बात पैदा होती थी कि यह स्थान हमारे इलाके में होने पर भी अफसोस और ताज्जुब की बात है कि इतने दिनों तक हम लोगों को इसका पता न लगा।

पर्दा उठा कर अन्दर जाने पर हमारे दोनों ऐयारों ने अपने को एक गोल कमरे में पाया जिसकी छत भी गोल और गुम्बददार थी और उसमें बहुत-सी बिल्लौरी हाँडियाँ, जिनमें इस समय मोमबत्तियाँ जल रही थीं, कायदे और मौके के साथ लटक रही थीं। दीवारों पर खूबसूरत जंगलों और पहाड़ों की तस्वीरें निहायत खूबी के साथ बनी थीं जो इस जगह की ज्यादा रोशनी के सबब साफ मालूम होती थीं और यही जान पड़ता था कि अभी ताजा बनकर तैयार हुई हैं। इन तस्वीरों में अकस्मात् देवीसिंह और भूतनाथ ने रोहतासगढ़ के पहाड़ और किले की भी तस्वीर देखी जिसके सबब से और तस्वीरों को भी गौर से देखने का शौक इन्हें हुआ मगर ठहरने की मोहलत न मिलने के सबब से लाचार थे। वहाँ की जमीन पर सुर्ख मखमली मुलायम गद्दा बिछा हुआ था और सदर दरवाजे के अतिरिक्त और भी तीन दरवाजे नजर आ रहे थे, जिन पर बेशकीमत किमखाब के पर्दे पड़े हुए थे और उनमें मोतियों की झालरें लटक रही थीं। हमारे दोनों ऐयारों को दाहिने तरफ वाले दरवाजे के अन्दर जाना पड़ा जहाँ गली के ढंग पर रास्ता घूमा हुआ था। इस रास्ते में भी मखमली गद्दा बिछा हुआ था। दोनों तरफ की दीवारें साफ और चिकनी थीं तथा छत के सहारे एक बिल्लौरी कन्दील लटक रही थी जिसकी रोशनी इस सात-आठ हाथ लम्बी गली के लिए काफी थी। इस गली को पार करके ये दोनों एक बहुत बड़े कमरे में पहुँचाए गए जिसकी सजावट और खूबी ने उन्हें ताज्जुब में डाल दिया और वे हैरत की निगाह से चारों तरफ देखने लगे।

जंगल, मैदान, पहाड़, खोह, दरे, झरने, शिकारगाह तथा शहरपनाह, किले, मोरचे आदि और लड़ाई इत्यादि की तस्वीरें चारों तरफ दीवार में इस खूबी और सफाई के साथ बनी हुई थीं कि देखने वाला यह कह सकता था कि बस इससे ज्यादा कारीगरी और सफाई का काम मुसौवर कर ही नहीं सकता। छत पर हर तरह की चिड़ियों और उनके पीछे झपटते हुए बाज-बहरी इत्यादि शिकारी परिन्दों की तस्वीरें बनी हुई थी जो दीवारगीरों और कन्दीलों की तेज रोशनी के सबब बहुत साफ दिखाई दे रही थीं। जमीन पर साफ-सुथरा फर्श बिछा हुआ था और सामने की तरफ हाथ-भर ऊँची गद्दो पर दो काबपोश तथा गद्दी के नीचे और कई आदमी अदब के साथ बैठे हुए थे, मगर उनमें से ऐसा कोई भी न था जिसके चेहरे पर नकाब न हो।

देवीसिंह और भूतनाथ को उम्मीद थी कि हम उन्हीं दोनों नकाबपोशों को उसी ढंग की पोशाक में देखेंगे जिन्हें कई दफा देख चुके हैं मगर यहाँ उसके विपरीत देखने में आया। इस बात का निश्चय तो नहीं हो सकता था कि इस नकाब के अन्दर वही सुरत छिपी हुई है या कोई और लेकिन पोशाक और आवाज यही प्रकट करती थी कि वे दोनों कोई दूसरे ही हैं, मगर इसमें भी कोई शक नहीं कि इन दोनों की पोशाक उन नकाबपोशों से कहीं बढ़-चढ़ के थी जिन्हें भूतनाथ और देवीसिंह देख चुके थे।

जब देवीसिंह और भूतनाथ उन दोनों नकाबपोशों के सामने खड़े हुए तो उन दोनों में से एक ने अपने आदमियों से पूछा, "ये दोनों कौन हैं, जिन्हें गिरफ्तार कर लाए हो?"

एक––जी, इनमें से एक (हाथ का इशारा करके) राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार देवीसिंह हैं और यह वही मशहूर भूतनाथ है जिसका मुकदमा आज-कल राजा वीरेन्द्रसिंह के दरबार में पेश है।

नकाबपोश––(ताज्जुब से) हाँ! अच्छा, तो ये दोनों यहाँ क्यों आये हैं? अपनी मर्जी से आये हैं या तुम लोग जबर्दस्ती गिरफ्तार कर लाए हो?

वही आदमी––इस हाते के अन्दर तो ये दोनों आदमी अपनी मर्जी से आये थे, मगर यहाँ हम लोग गिरफ्तार करके लाये हैं।

नकाबपोश––(कुछ कड़ी आवाज में) गिरफ्तार करने की जरूरत क्यों पड़ी? किस तरह मालूम हुआ कि ये दोनों यहाँ बदनीयती के साथ आये हैं? क्या इन दोनों ने तुम लोगों से कुछ हुज्जत की थी?

वही आदमी––जी, हुज्जत तो किसी से न की मगर छिप-छिपकर आने और पेड़ की आड़ में खड़े होकर ताक-झाँक करने से मालूम हुआ कि इन दोनों की नीयत अच्छी नहीं है, इसीलिए गिरफ्तार कर लिए गये।

नकाबपोश––इतने बड़े प्रतापी राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐसे नामी ऐयार के साथ केवल इतनी बात पर इस तरह का बर्ताव करना तुम लोगों को उचित न था, कदाचित् ये हम लोगों से मिलने के लिए आए हों। हाँ, अगर केवल भूतनाथ के साथ ऐसा बर्ताव होता तो ज्यादा रंज की बात न थी।

यद्यपि नकाबपोश की आखिरी बात भूतनाथ को कुछ बुरी मालूम हुई, मगर कर ही क्या सकता था? साथ ही इसके यह भी देख रहा था कि नकाबपोश भलमनसी और सभ्यता के साथ बातें कर रहा है, जिसकी उम्मीद यहाँ आने के पहले कदापि न थी।

अतः जब नकाबपोश अपनी बात पूरी कर चुका तो इसके पहले कि उसका नौकर कुछ जवाब दे, भूतनाथ बोल उठा––

भूतनाथ––कृपानिधान, हम लोग यहाँ किसी बुरी नीयत से नहीं आये हैं, न तो चोरी करने का इरादा है न किसी को तकलीफ देने का, मैं केवल अपनी स्त्री का पता लगाने के लिए यहाँ आया हूँ, क्योंकि मेरे जासूसों ने मेरी स्त्री के यहाँ होने की मुझे इत्तिला दी थी।

नकाबपोश––(मुस्कुरा कर) शायद ऐसा ही हो, मगर मेरा खयाल कुछ दूसरा ही है। मेरा दिल कह रहा है कि तुम लोग उन दोनों नकाबपोशों का असल हाल जानने के लिए यहाँ आये हो जो राजा साहब के दरबार में जाकर अपने विचित्र कामों से लोगों को ताज्जुब में डाल रहे हैं, मगर साथ ही इसके इस बात को भी समझ लो कि यह मकान उन दोनों नकाबपोशों का नहीं है बल्कि हमारा है। उनके मकान में जाने का रास्ता तुम उस सुरंग के अन्दर ही छोड़ आये जिसे तै करके यहाँ आये हो, अर्थात् हमारे और उनके मकान का रास्ता बाहर से तो एक ही है मगर सुरंग के अन्दर आकर दो हो गया है। खैर, जो कुछ हो हम इस वारे में ज्यादा बातचीत करना उचित नहीं समझते और न तुम लोगों को कुछ तकलीफ ही देना चाहते हैं बल्कि अपना मेहमान समझ कर कहते हैं कि अब आ गये हो तो रात भर कुटिया में आराम करो; सवेरा होने पर जहाँ इच्छा हो चले जाना। (गद्दी के नीचे बैठे हुए एक नकाबपोश की तरफ देख के) यह काम तुम्हारे सुपुर्द किया जाता है, इन्हें खिला-पिलाकर ऊपर वाली मंजिल में सोने की जगह दो और सुबह को इन्हें खोह के बाहर पहुँचा दो।

इतना कहकर वह नकाबपोश उठ खड़ा हुआ और उसका साथी दूसरा नकाबपोश भी जाने के लिए तैयार हो गया। जिस जगह इन नकाबपोशों की गद्दी लगी हुई थी उस (गद्दी) के पीछे दीवार में एक दरवाजा था जिस पर पर्दा लटक रहा था। दोनों नकाबपोश पर्दा उठा कर अन्दर चले गये और यह छोटा-सा दरबार बर्खास्त हुआ। गद्दी के नीचे बैठने वाले मुसाहिब, दरबारी या नौकर जो भी कोई हों उठ खड़े हुए और उस आदमी ने जिसे दोनों ऐयारों की मेहमानी का हुक्म हुआ था देवीसिंह और भूतनाथ की तरफ देख कर कहा––"आप लोग मेहरबानी करके मेरे साथ आइये और ऊपर की मंजिल में चलिए।" भूतनाथ और देवीसिंह भी कुछ उज्र न करके पीछे-पीछे चलने के लिए तैयार हो गये।

नकाबपोश की बातों ने भूतनाथ और देवीसिंह दोनों ही को ताज्जुब में डाल दिया। भूतनाथ ने नकाबपोश से कहा था कि मैं अपनी स्त्री की खोज में यहाँ आया हूँ, मगर बहुत-कुछ कह जाने पर भी नकाबपोश ने भूतनाथ की इस बात का कोई जवाब न दिया और ऐसा करना भूतनाथ के दिल में खुटका पैदा करने के लिए कम नहीं था। भूतनाथ को निश्चय हो गया कि उसकी स्त्री यहाँ है और अवश्य है। उसने सोचा कि जो नकाबपोश राजा वीरेन्द्रसिंह के दरबार में पहुँच कर बड़ी-बड़ी गुप्त बातें इस अनूठे ढंग से खोलते हैं उनके घर में यदि मैं अपनी स्त्री को देखू तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमारे देवीसिंह ने तो एक शब्द भी मुंह से निकालना पसन्द न किया, मालूम इसका सबब क्या था और वे क्या सोच रहे थे, मगर कम-से-कम इस बात की शर्म तो उनको जरूर ही थी कि वे यहाँ आने के साथ गिरफ्तार हो गये। यह तो नकाबपोशों की मेहरबानी थी कि हथकड़ी और बेड़ी से उनकी खातिर न की गई।

वह नकाबपोश कई रास्तों से घुमाता-फिराता भूतनाथ और देवीसिंह को ऊपर वाली मंजिल में ले गया। जो लोग इन दोनों को गिरफ्तार कर लाए थे, वे भी उनके साथ गये।

जिस कमरे में भूतनाथ और देवीसिंह पहुँचाये गये, वह यद्यपि बहुत बड़ा न था मगर जरूरी और मामूली ढंग के सामान से सजाया हुआ था। कन्दील की रोशनी हो रही थी, जमीन पर साफ-सुथरा फर्श बिछा था और कई तकिए भी रक्खे हुए थे, एक संगमरमर की छोटी चौकी बीच में रक्खी हुई थी और किनारे दो सुन्दर पलंग आराम के लिए बिछे हुए थे।

भूतनाथ और देवी सिंह को खाने-पीने के लिए कई दफा कहा गया, मगर उन दोनों ने इनकार किया अत: लाचार होकर नकाबपोशों ने उन दोनों को आराम करने के लिए उसी जगह छोड़ा और स्वयं उन आदमियों को जो दोनों ऐयारों को गिरफ्तार कर लाये थे, साथ लिए हुए वहाँ से चला गया। जाते समय ये लोग बाहर से दरवाजे की जंजीर बन्द करते गये और इस कमरे में भूतनाथ और देवीसिंह अकेले रह गये।

२

जब दोनों ऐयार उस कमरे में अकेले रह गये, तब थोड़ी देर तक अपनी अवस्था और भूल पर गौर करने के बाद आपस में यों बातें करने लगे––

देवीसिंह––यद्यपि तुम मुझसे और मैं तुमसे छिपकर यहाँ आया मगर यहाँ आने पर वह छिपना बिल्कुल व्यर्थ गया। तुम्हारे गिरफ्तार हो जाने का तो ज्यादा रंज न होना चाहिए क्योंकि तुम्हें अपनी जान की फिक्र पड़ी थी, अतएव अपनी भलाई के लिए तुम यहाँ आये थे और जो कोई किसी तरह का फायदा उठाना चाहता है उसे कुछ-न-कुछ तकलीफ भी जरूर ही भोगनी पड़ती है, मगर मैं तो दिल्लगी ही दिल्लगी में बेवकूफ बन गया। न तो मुझे इन लोगों से कोई मतलब ही था और न यहाँ आए बिना मेरा कुछ हर्ज ही होता था।

भूतनाथ––(मुस्कुरा कर) मगर आने पर आपका भी एक काम निकल आया, क्योंकि यहाँ अपनी स्त्री को देखकर अब किसी तरह भी जाँच किए बिना आप नहीं रह सकते।

देवीसिंह––ठीक है! मगर भूतनाथ, तुम बड़े ही निडर और हौसले के ऐयार हो जो ऐसी अवस्था में भी हँसने और मुस्कुराने से बाज नहीं आते!

भूतनाथ––तो क्या आप ऐसा नहीं कर सकते?

देवीसिंह––अगर बनावट के तौर पर हँसने या मुस्कुराने की जरूरत न पड़े तो मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं इस बात को खूब समझता हूँ कि तुम्हारे जीवट और हौसले की इतनी तरक्की क्योंकर हुई मगर वास्तव तुम निराले ढंग के आदमी हो, सच तो यह है कि तुम्हारी ठीक-ठीक अवस्था जानना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव है।

भूतनाथ––आपका कहना बहुत ठीक है, मगर तब तक मेरे जीवट और मर्दानगी का अन्दाजा मिलना कठिन है जब तक कि मैं अपने को मुर्दा समझे हुए हूँ, जिस दिन मैं अपने को जिन्दा समझूँगा उस दिन यह बात न रहेगी।

देवीसिंह––तो क्या तुम अभी तक भी अपने को मुर्दा ही समझे हुए हो?

भूतनाथ––बेशक, क्योंकि अब मैं बेइज्जती और बदनामी के साथ जीने को मरने के बराबर समझता हूँ। जिस दिन मैं राजा वीरेन्द्रसिंह का विश्वासपात्र बनने योग्य हो जाऊँगा उस दिन समझूगा कि जी गया। मैं आपसे इस किस्म की बातें कदापि न करता अगर आपको अपना मेहरबान और मददगार न समझता। आप को जयपाल या नकली बलभद्रसिंह की पहली मुलाकात का दिन याद होगा जब आपने मुझ पर मेहरबानी रखने और मुझे अपनाने का शपथपूर्वक इकरार किया था।

देवीसिंह––बेशक मुझे याद है, जब तुम घबराये हुए और बेबसी की अवस्था में थे तब मैंने तुमसे कहा था कि यदि मुझे यह मालूम हो जायगा कि तुम मेरे पिता के घातक हो, जिन पर मेरा बड़ा स्नेह था तब भी मैं तुम्हें इसी तरह मुहब्बत की निगाह से देखूँगा जैसे कि अब मैं देख रहा हूँ। कहो, है न यही बात?

भूतनाथ––बेशक यही शब्द आपने कहे थे।

देवीसिंह––और अब भी मैं उसी बात का इकरार करता हूँ।

भूतनाथ––(प्रसन्नता से) आपकी सचाई पर भी मुझे उतना ही विश्वास है जितना एक और एक दो होने पर!

देवीसिंह––यह बात तो तुम सच नहीं कहते!

भूतनाथ––(चौंक कर) सो कैसे?

देवीसिंह––इसी से कि तुमने भेद की कोई बात आज तक मुझसे नहीं कही, यहाँ तक कि इस जगह आने की इच्छा भी मुझ पर प्रकट न की।

भूतनाथ––(शर्मिन्दगी से सिर नीचा करके) बेशक यह मेरा कसूर है जिसके लिए (हाथ जोड़ कर) मैं आपसे माफी माँगता हूँ, क्योंकि मैं इस बात को अच्छी तरह देख चुका हूँ कि आपने अपनी बात का निर्वाह पूरा-पूरा किया।

देवीसिंह––खैर, अब भी अगर तुम मुझे अपना विश्वासपात्र समझोगे तो मेरे दिल का रंज निकल जायगा, असल तो यह है कि इस मौके पर तुमसे मिलने के लिए ही मैंने यहाँ आने का इरादा भी किया क्योंकि मुझे विश्वास था कि तुम यहाँ जरूर आओगे। खैर अब तुम अपने कौल और इकरार को याद रक्खो और इस समय इन सब बातों को इसी जगह छोड़कर इस बात पर विचार करो कि अब हम लोगों को क्या करना चाहिए। मैं समझता हूँ कि तुम्हारे पास तिलिस्मी खंजर मौजूद है।

भूतनाथ––जी हाँ, (खंजर की तरफ इशारा करके) यह तैयार है।

देवीसिंह––(अपने खंजर की तरफ बता के) मेरे पास भी है।

भूतनाथ––आपको कहाँ से मिला?

देवीसिंह––तेजसिंह ने दिया था। यह वही खंजर है जो मनोरमा के पास था, कम्बख्त ने इसके जोड़ की अँगूठी अपनी जाँघ के अन्दर छिपा रक्खी थी जिसका पता बड़ी मुश्किल से लगा और तब से इस ढंग को मैंने भी पसन्द किया।

भूतनाथ––अच्छा, तो अब आपकी क्या राय होती है? यहाँ से निकल भागने की कोशिश की जाय या यहाँ रह कर कुछ भेद जानने की?

देवीसिंह––इन दोनों खंजरों की बदौलत शायद हम यहाँ से निकल जा सकें, मगर ऐसा करना न चाहिए। अब जब गिरफ्तार होने की शर्मिन्दगी उठा ही चुके तो बिना कुछ किये चले जाना उचित नहीं है, जिस पर यहाँ आकर मैंने अपनी स्त्री को और तुमने अपनी स्त्री को देख लिया, अब क्या बिना उन दोनों का असल भेद मालूम किये यहाँ चलने की इच्छा हो सकती है!

भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है...

इतना कहते-कहते भूतनाथ यकायक रुक गया, क्योंकि उसके कान में किसी के जोर से हँसने की आवाज आई और यह आवाज कुछ पहचानी हुई सी जान पड़ी। देवीसिंह ने भी इस आवाज पर गौर किया और उन्हें भी इस बात का शक हुआ कि इस आवाज को मैं कई दफा सुन चुका हूँ। मगर इस बात का कोई निश्चय वे दोनों नहीं कर सके कि यह आवाज किसकी है।

देवीसिंह और भूतनाथ दोनों ही आदमी इस बात को गौर से देखने और जाँचने लगे कि यह आवाज किधर से आई या हम उसे किसी तरह देख भी सकते हैं या नहीं जिसकी यह आवाज है। यकायक उन दोनों ने दीवार में ऊपर की तरफ दो सूराख देखे जिनमें आदमी का सिर बखूबी जा सकता था। ये सूराख छत से हाथ भर नीचे हट कर बने हुए थे और हवा आने-जाने के लिए बनाये गये थे। दोनों को खयाल हुआ कि इसी में से आवाज आती है और उसी समय पुन. हँसने की आवाज आने से इस बात का निश्चय हो गया।

फौरन ही दोनों के मन में यह बात पैदा हुई कि किसी तरह उस सूराख तक पहुँच कर देखना चाहिए कि कुछ दिखाई देता है या नहीं, मगर इस ढंग से कि उस दूसरी तरफ वालों को हमारी इस ढिठाई का पता न लगे।

हम लिख चुके हैं कि इस कमरे में दो चारपाइयाँ बिछी हुई थीं। देवीसिंह ने उन्हीं दोनों चारपाइयों को उस सूराख तक पहुँचने का जरिया बनाया, अर्थात् बिछावन हटा देने के बाद एक चारपाई दीवार के सहारे खड़ी करके दूसरी चारपाई उसके ऊपर खड़ी की और कमन्द से दोनों के पाये अच्छी तरह मजबूती के साथ बाँधकर एक प्रकार की सीढ़ी तैयार की। इसके बाद देवीसिंह ने भूतनाथ के कन्धे पर चढ़कर कन्दील की रोशनी बुझा दी और तब उस चारपाई की अनूठी सीढ़ी पर चढ़ने का विचार किया।

उस समय मालूम हुआ कि उस सूराख में से थोड़ी-थोड़ी रोशनी भी आ रही है। भूतनाथ ने नीचे खड़े रहकर चारपाई को मजबूती के साथ थामा और बुनावट के सहारे अँगूठा अड़ाते हुए देवीसिंह ऊपर चढ़ गये। वे सूराख टेढ़े अर्थात् दूसरी तरफ को झुकते हुए थे। एक सुराख में गर्दन डालकर देवीसिंह ने देखना शुरू किया। उधर नीचे की मंजिल में एक बहुत बड़ा कमरा था जिसकी ऊँची छत इस कमरे की छत के बराबर पहुँची हुई थी जिसमें देवीसिंह और भूतनाथ थे। उस कमरे में सजावट की कोई चीज न थी सिर्फ जमीन पर साफ-सफेद फर्श बिछा हुआ और दो शमादान जल रहे थे। वहाँ पर देवीसिंह ने दो नकाबपोशों को ऊँची गद्दी पर और चार को गद्दी के नीचे बैठे हुए पाया और एक तरफ जिधर कोई मर्द न था अपनी और भूतनाथ की स्त्री को भी देखा। ये लोग आपस में धीरे-धीरे बातें कर रहे थे। इनकी बातें साफ समझ में नहीं आती थी, जो कुछ टूटी-फूटी बातें सुनने में आई उनका मतलब यही था कि सुरंग का दरवाजा बन्द करने में भूल हो जाने के सबब से भूतनाथ और देवीसिंह वहाँ आ गये, अतः अब ऐसी भूल न होनी चाहिए जिसमें यहाँ तक कोई आ सके इत्यादि। इसी बीच में एक और भी नकाबपोश वहाँ आ पहुँचा जो इस समय अपने नकाब को उलट कर सिर के ऊपर फेंके हुए था। इस आदमी की सूरत देखते ही देवीसिंह ने पहचान लिया कि भूतनाथ का लड़का और कमला का सगा तथा बड़ा भाई हरनामसिंह है। देवीसिंह ने अपनी जिन्दगी में हरनामसिंह को शायद एक या दो दफे किसी मौके पर देखा होगा, इसलिए उसको पहचान तो लिया मगर ताज्जुब के साथ-ही-साथ शक बना रहा, अस्तु इस शक को मिटाने के लिए देवीसिंह नीचे उतर आये और चारपाई को खुद पकड़ कर भूतनाथ को ऊपर चढ़ने और उस सूराख के अन्दर झाँकने के लिए कहा।

जब भूतनाथ चारपाई की बिनत के साहारे ऊपर चढ़ गया और उस सुराख में झाँककर देखा तो अपने लड़के हरनामसिंह को पहचान कर उसे बड़ा ही ताज्जुब हुआ और वह बड़े गौर से देखने तथा उन लोगों की बातें सुनने लगा।

पाठक, ताज्जुब नहीं कि आप इस हरनामसिंह को एक दम ही भूल गये हों क्यों कि जहाँ तक हमें याद है इसका नाम शायद चन्द्रकान्ता-सन्तति के दूसरे भाग के पाँचवें बयान में आकर रह गया और फिर कहीं इसका जिक्र तक नहीं आया। यह वह हरनामसिंह नहीं है जो मायारानी का ऐयार था, बल्कि यह कमला का बड़ा भाई तथा खास भूतनाथ का पहला और असल लड़का हरनामसिंह है। इसे बहुत दिनों के बाद आज यहाँ देखकर आप निःसन्देह आश्चर्य करेंगे, परन्तु खैर, अब हम यह लिखते हैं कि भूतनाथ ने सुराख के अन्दर झाँक कर क्या देखा।

भूतनाथ ने देखा कि उसका लड़का हरनामसिंह गद्दी के ऊपर बैठे दोनों नकाबपोशों के सामने खड़ा है और सदर दरवाजे की तरफ बड़े गौर से देख रहा है। उसी समय एक आदमी लपेटे हुए मोटे कपड़े का बहुत बड़ा लम्बा पुलिन्दा लिए हुए आ पहुँचा और इस पुलिन्दे को गद्दी पर रख के खड़ा हो हाथ जोड़कर भर्राई हुई आवाज में बोला, "कृपानाथ, बस मैं इसी का दावा भूतनाथ पर करूँगा।"

गद्दी के नीचे बैठे हुए दो आदमियों ने इशारा पाकर लपेटे हुए कपड़े को खोला और तब भूतनाथ ने भी देखा कि वह एक बहुत बड़ी और आदमी के कद के बराबर तस्वीर है।

उस तस्वीर पर निगाह पड़ते ही भूतनाथ की अवस्था बिगड़ गई और वह डर के मारे थरथर काँपने लगा। बहुत कोशिश करने पर भी वह अपने को सम्हाल न सका और उसके मुँह से एक चीख की आवाज निकल ही गई अर्थात् वह चिल्ला उठा। उसी समय उसने यह भी देखा कि आवाज उन लोगों के कानों में पहुँच गई और इस सबब से वे लोग ताज्जुब के साथ ऊपर की तरफ देखने लगे।

भूतनाथ जल्दी के साथ चारपाई से नीचे उधर आया और काँपती हुई आवाज में देवीसिंह से बोला, "ओफ, मैं अपने को सम्हाल नहीं सका और मेरे मुँह से चीख की आवाज निकल ही गई जिसे उन लोगों ने सुन लिया। ताज्जुब नहीं कि उन लोगों में से कोई यहाँ आये, अस्तु आप जो उचित समझिये कीजिये, कुछ देर बाद मैं अपना हाल आपसे कहूँगा।" इतना कह भूतनाथ जमीन पर बैठ गया।

देवीसिंह ने झटपट अपने बटुए में से सामान निकालकर मोमबत्ता जलाई, दो-तीन डपट की बातें कह भूतनाथ को चैतन्य किया और उसके मोढ़े पर चढ़कर कन्दील जलाने के बाद मोमबत्ती बुझाकर बटुए रख ली और इसके बाद दोनों चारपाई उसी तरह दुरुस्त कर दी जिस तरह पहले थीं, इसके बाद एक चारपाई पर भूतनाथ को सुला कर पेट-दर्द का बहाना करने और 'हाय-हाय' करके कराहने के लिए कहकर आप उसी चारपाई के सहारे बैठ गये। उसी समय कमरे का दरवाजा खुला और तीन-चार नकाबपोश अन्दर आते हुए दिखाई पड़े।

उन आदमियों ने पहले तो गौर से कमरे के अन्दर की अवस्था देखी और तब उनमें से एक ने आगे बढ़कर देवीसिंह से पूछा, "क्या अभी तक आप लोग जाग रहे हैं?"

देवीसिंह––हाँ (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनके पेट में यकायक दर्द पैदा हो गया और बड़ी तकलीफ है, अक्सर दर्द की तकलीफ से चिल्ला उठते हैं।

नकाबपोश––(भूतनाथ की तरफ देख के) आज यहाँ कुछ खाने में भी तो नहीं आया।

देवीसिंह––पहले ही की कुछ कसर होगी।

नकाबपोश––फिर कुछ दवा वगैरह का बन्दोबस्त किया जाय?

देवीसिंह––मैंने दो दफे दवा खिलाई है, अब तो कुछ आराम हो रहा है, पहले बड़ी तेजी पर था।

इतना सुनकर वे लोग चले गये और जाते समय पहले की तरह दरवाजा पुनः बन्द करते गये।

अब फिर उस कमरे में सन्नाटा हो गया और भूतनाथ तथा देवीसिंह को धीरे-धीरे बातचीत करने का मौका मिला।

देवीसिंह––हाँ अब बताओ तुमने पिछले कमरे में क्या देखा और तुम्हारे मुँह से चीख की आवाज क्यों निकल गईं?

भूतनाथ––ओफ, मेरे प्यारे दोस्त देवीसिंह, क्योंकि अब मैं आपको खुशी और सच्चे दिल से अपना दोस्त कह सकता हूँ चाहे आप मुझसे हर तरह पर बड़े क्यों न हों, उस कमरे में जो कुछ मैंने देखा, वह मुझे दहला देने के लिए काफी था। पहले तो वहाँ मैंने अपने लड़के को देखा जिसे उम्मीद है कि आपने भी देखा होगा।

देवीसिंह––बेशक उसे मैंने देखा था, मगर शक मिटाने के लिए तुम्हें दिखाना पड़ा, चाहे वह कोई ऐयार ही सूरत बदले क्यों न हो, मगर शक्ल ठीक वैसी ही थी।

भूतसिंह––अगर उसकी सूरत बनावटी नहीं है तो वह मेरा लड़का हरनामसिंह ही है, खैर उसके बारे में तो मुझे कुछ ज्यादा तरद्दुद न हुआ मगर उसके कुछ ही देर बाद मैंने एक ऐसी चीज देखी कि जिससे मुझे हौल हो गया और मेरे मुँह से चीख की आवाज निकल पड़ी।

देवीसिंह––वह क्या चीज थी?

भूतनाथ––एक बहुत बड़ी तस्वीर थी जिसे एक आदमी ने पहुँच कर उन नकाबपोशों के आगे रख दिया जो गद्दी पर बैठे हुए थे और कहा, "बस, मैं इसी का दावा भूतनाथ पर करूँगा।"

देवीसिंह––वह किसकी तस्वीर थी, किसी मर्द की या औरत की?

भूतनाथ––(एक लम्बी साँस लेकर) वह औरत-मर्द, जंगल-पहाड़, बस्ती-उजाड़ सभी की तस्वीर थी, मैं क्या बताऊँ कि किसकी तस्वीर थी। एक यही बात है जिसे मैं अपने मुँह से नहीं निकाल सकता! मगर अब मैं आपसे कोई बात न छिपाऊँगा चाहे कुछ भी क्यों न हो। आप यह अच्छी तरह जानते ही हैं कि मैं उस पीतल की संदूकड़ी से कितना डरता हूँ जो नकली बलभद्रसिंह की दी हुई अभी तक तेजसिंह के पास है।

देवीसिंह––मैं खूब जानाता हूँ और उस दिन भी मेरा खयाल उसी सन्दूकड़ी की तरफ चला गया था जब एक नकाबपोश ने दरबार में खड़े होकर तुम्हारी तारीफ की थी और तुम्हें मुँहमाँगा इनाम देने के लिए कहा था।

भूतनाथ––ठीक है, बलभद्रसिंह ने भी मुझे यही कहा था कि 'ये नकाबपोश तुम्हारे मददगार हैं और तुम्हारा भेद ढके रहने के लिए महाराज से यह सन्दूकड़ी तुम्हें दिलाना चाहते हैं। मैं भी यह सोचकर प्रसन्न था और चाहता था कि मुकदमा फैसल होने के पहले ही इनाम माँगने का मुझे कोई मौका मिला जाय, मगर इस तस्वीर ने जिसे मैं अभी देख चुका हूँ मेरी हिम्मत तोड़ दी और मैं पुनः अपनी जिन्दगी से नाउम्मीद हो गया हूँ।

देवीसिंह––तो उस सन्दूकड़ी से और इस तस्वीर से क्या सम्बन्ध?

भूतसिंह––वह सन्दूकड़ी अपने पेट में जिस भेद को छिपाये हुए है उसी भेद को यह तस्वीर प्रकट करती है। इसके अतिरिक्त मैं सोचे हुए था कि अब उसका कोई दावेदार नहीं है मगर अब मालूम हो गया कि उसका दावेदार भी आ पहुंचा और उसी ने यह तस्वीर नकाबपोश के आगे पेश की!

देवीसिंह––क्या तुम यह नहीं बता सकते कि उस सन्दूकड़ी और इस तस्वीर मे क्या भेद है?

भूतसिंह––(लम्बी साँस लेकर) अब मैं आपसे कोई बात छिपा न रक्खूँगा मगर इतना समझ रखिये कि उस भेद को सुनकर आप अपने ऊपर एक तरद्दुद का बोझा डाल लेंगे।

देवीसिंह––खैर जो कुछ होगा सहना ही पड़ेगा और तुम्हारी मदद भी करनी ही पड़ेगी, मगर सबके पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि उस भेद से हमारे महाराज का भी कुछ सम्बन्ध है या नहीं?

भूतसिंह––अगर कुछ सम्बन्ध है भी तो केवल इतना ही कि उस भेद को सुनकर वे मुझ पर घृणा करेंगे, नहीं तो महाराज से और उस भेद से कुछ सम्बन्ध नहीं। मैंने महाराज के विपक्ष में कोई बुरा काम नहीं किया, जो कुछ बुरा किया है वह सिर्फ अपने और अपने दुश्मनों के साथ।

देवीसिंह––जब महाराज से उस भेद का कोई सम्बन्ध ही नहीं है तो मैं हर तरह पर तुम्हारी मदद कर सकता हूँ, अच्छा तो अब बताओ कि वह कौन सा भेद है?

भूतनाथ––इस समय न पूछिये क्योंकि हम लोग विचित्र स्थान में कैद हैं, ताज्जुब नहीं कि हम दोनों की बातें कोई किसी जगह पर छिपकर सुनता हो। हाँ, मैदान में निकल चलने पर जरूर कहूँगा।

देवीसिंह––अच्छा यह तो बताओ कि उस आदमी की सूरत भी तुमने अच्छी तरह देख ली या नहीं, जिसने यह तस्वीर नकाबपोश के आगे पेश की थी?

भूतनाथ––हाँ, उसकी सूरत मैंने बखूबी देखी थी। मैं खूब पहचानता हूँ, क्यों कि दुनिया में मेरा सबसे बड़ा दुश्मन वही है और उसे अपनी ऐयारी का भी घमंड है।

देवीसिंह––अगर वह तुम्हारे कब्जे में आ जाये तो?

भूतनाथ––जरूर उसे फँसाने बल्कि मार डालने की फिक्र करूँगा! मैं तो उसकी तरफ से बिल्कुल बेफिक्र हो गया था, मुझे इस बात की रत्ती भर उम्मीद न थी कि वह जीता है।

देवीसिंह––खैर कोई चिन्ता नहीं, जैसा होगा देखा जायगा, तुम अभी से हताश क्यों हो रहे हो!

भूतनाथ––अगर वह सन्दूकड़ी मुझे मिल जाती और उसके खुलने की नौबत न आती तो...

देवीसिंह––वह सन्दूकड़ी मैं तुम्हें दिला दूँगा और उसे किसी के सामने खुलने भी न दूँगा, उसकी तरफ से तुम बेफिक्र रहो।

भूतनाथ––(मुहब्बत से देवीसिंह का हाथ पकड़ के) अगर ऐसा करो तो क्या बात है!

देवीसिंह––ऐसा ही होगा। खैर, अब यह सोचना चाहिए कि इस समय हम लोगों को क्या करना उचित है। मैं समझता हूँ कि सुबह होने के साथ ही हम लोग इस हद के बाहर पहुँचा दिये जायेंगे।

भूतनाथ––मेरा खयाल भी यही है। लेकिन अगर ऐसा हुआ तो आपकी और मेरी स्त्री के बारे में किसी बात का पता न लगेगा।

देवीसिंह और भूतनाथ इस विषय पर बहुत देर तक बातचीत और राय पक्की करते रहे, यहाँ तक कि सवेरा हो गया। कई नकाबपोश उस कमरे को खोलकर भूतनाथ तथा देवीसिंह के पास पहुँचे और उन्हें बाहर चलने के लिए कहा।

३

महाराज से जुदा होकर देवीसिंह और बलभद्रसिंह से बिदा होकर भूतनाथ ये दोनों ही नकाबपोशों का पता लगाने के लिए चले गये। बचा हुआ दिन और तमाम रात तो किसी ने इन दोनों की खोज न की मगर दूसरे दिन सवेरा होने के साथ ही इन दोनों की तलबी हुई और थोड़ी ही देर में जवाब मिला कि उन दोनों का पता नहीं है कि कहाँ गये और अभी तक क्यों नहीं आये। हमारे महाराज समझ गये कि देवीसिंह की तरह भूतनाथ भी उन्हीं दोनों नकाबपोशों का पता लगाने चला गया, मगर उन दोनों के न लौटने से एक तरह की चिन्ता पैदा हो गई और लाचार होकर आज दरबार-आम का जलसा बन्द रखना पड़ा।

दरबारे-आम के बन्द होने की खबर वहाँ वालों को तो मिल गई, मगर वे दोनों नकाबपोश अपने मामूली समय पर आ ही गये और उनके आने की इत्तिला तुरंत राजा वीरेन्द्रसिंह से की गई। उस समय राजा वीरेन्द्रसिंह एकान्त में तेजसिंह तथा और भी कई ऐयारों के साथ बैठ हुए देवीसिंह और भूतनाथ के बारे ही में बातें कर रहे थे। उन्होंने ताज्जुब के साथ नकाबपोशों का आना सुना और उसी जगह हाजिर करने का हुक्म दिया।

हाजिर होकर दोनों नकाबपोशों ने बड़े अदब से सलाम किया और आज्ञा पाकर महाराज से थोड़ी दूर पर तेजसिंह के बगल में बैठ गये। इस समय तखलिये का दरबार था तथा गिनती के मामूली आदमी बैठे हुए थे। राजा वीरेन्द्रसिंह को नकाबपोश की बातें सुनने का शौक था, इसलिए तेजसिंह के बगल ही में बैठने की आज्ञा दी और स्वयं बातचीत करने लगे।

वीरेन्द्रसिंह––आज भूतनाथ के न होने से मुकदमे की कार्रवाई रोक देनी पड़ी।

नकाबपोश––(अदब से हाथ जोड़कर)जी हाँ; मैंने यहाँ पहुँचने के साथ ही सुना कि "कल से देवीसिंहजी और भूतनाथ का पता नहीं है, इसलिए आज दरबार न होगा।" मगर ताज्जुब की बात है कि भूतनाथ और देवीसिंहजी एकसाथ कहाँ चले गये। मैं तो यही समझता हूँ कि भूतनाथ हम लोगों का पता लगाने को निकला है और उसका ऐसा करना कोई ताज्जुब की बात भी नहीं, मगर देवीसिंहजी बिना मर्जी के चले गये इस बात का ताज्जुब है।

वीरेन्द्रसिंह––देवीसिंह बिना मर्जी के नहीं चले गये बल्कि हमसे पूछ के गये हैं।

नकाबपोश––तो उन्हें महाराज ने हम लोगों का पीछा करने की आज्ञा क्यों दी? हम लोग तो महाराज के ताबेदार स्वयं ही अपना भेद कहने के लिए तैयार हैं और शीघ्र ही समय पाकर अपने को प्रकट ही करेंगे, केवल मुकदमे की उलझन खोलने और कैदियों को निरुत्तर करने के लिए अपने को छिपाये हुए हैं।

तेजसिंह––आप लोगों को शायद यह मालूम नहीं है कि भूतनाथ ने देवीसिंह को अपना दोस्त बना लिया है। जिस समय भूतनाथ के मुकदमे का बीज रोपा गया था उसके कई घण्टे पहले ही देवीसिंह ने उसकी सहायता करने की प्रतिज्ञा कर दी थी, क्योंकि वह भूतनाथ की चालाकी, ऐयारी तथा उसके अच्छे कामों से प्रसन्न थे।

नकाबपोश––ठीक है, तब तो ऐसा होना ही चाहिए परन्तु कोई चिन्ता नहीं, भूतनाथ वास्तव में अच्छा आदमी है और उसे महाराज की सेवा का उत्साह भी है।

तेजसिंह––इसके अतिरिक्त उसने हमारे कई काम भी बड़ी खूबी के साथ पूरे किये हैं।

नकाबपोश––ठीक है।

तेजसिंह––हाँ, मैं एक बात आपसे पूछना चाहता हूँ।

नकाबपोश––आज्ञा!

तेजसिंह––निःसन्देह भूतनाथ और देवीसिंह आप लोगों का भेद लेने के लिए गये हैं, अत: आश्चर्य नहीं कि वे दोनों उस ठिकाने तक पहुँच गये हों जहाँ आप लोग रहते हैं और आपको उनका कुछ हाल भी मालूम हुआ हो!

नकाबपोश––न तो ये हम लोगों के डेरे तक पहुँचे और न हम लोगों को उनका कुछ हाल ही मालूम है। हम लोगों के विषय में हजारों आदमी बल्कि यों कहना चाहिए कि आजकल यहाँ जितने लोग इकट्ठे हो रहे हैं, सभी आश्चर्य करते हैं और इसलिए जब हम लोग यहाँ आते हैं तो सैकड़ों आदमी चारों तरफ से घेर लेते हैं और जाते समय तो कोसों तक का पीछा करते हैं इसलिए हम लोगों को भी बहुत घूम-फिर तथा लोगों को भुलावा देते हुए अपने डेरे की तरफ जाना पड़ता है।

तेजसिंह––तब तो उन दोनों का न लौटना आश्चर्य है।

नकाबपोश––बेशक, अच्छा तो आज हम लोग कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का कुछ हाल महाराज को सुनाते जायँ, आखिर आ गये हैं तो कुछ काम करना ही चाहिए।

वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब से) उनका कौन-सा हाल?

नकाबपोश––वही तिलिस्म के अन्दर का हाल। जब तक राजा गोपालसिंह वहाँ थे तब तक का हाल तो उनकी जुबानी आपने सुना ही होगा मगर उसके बाद क्या हुआ और तिलिस्म में उन दोनों भाइयों ने क्या किया, सो न सुना होगा। यह सब हाल हम लोग सुना सकते हैं, यदि आज्ञा हो तो...।

वीरेन्द्रसिंह––(ज्यादा ताज्जुब के साथ) कब तक का हाल आप सुना सकते हैं?

नकाबपोश––आज तक का हाल, बल्कि आज के बाद भी रोज-रोज का हाल तब तक बराबर सुना सकते हैं जब तक उनके यहाँ आने में दो घण्टे की देर हो।

वीरेन्द्रसिंह––हम बड़ी प्रसन्नता से उनका हाल सुनने के लिए तैयार हैं, बल्कि हम चाहते हैं कि गोपालसिंह और अपने पिताजी के सामने वह हाल सुनें।

नकाबपोश––जो आज्ञा, मैं सुनाने के लिए तैयार हूँ।

वीरेन्द्रसिंह––मगर वह सब हाल आप लोगों को कैसे मालूम हुआ होता है, और होगा?

नकाबपोश––(हाथ जोड़कर) इसका जवाब देने के लिए मैं अभी तैयार नहीं हूँ, लेकिन यदि महाराज मजबूर करेंगे तो लाचारी है, क्योंकि हम लोग महाराज को अप्रसन्न भी नहीं किया चाहते हैं।

वीरेन्द्रसिंह––(मुस्कराकर) हम तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कोई काम करना भी नहीं चाहते।

इतना कहकर वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखा। तेजसिंह स्वयं उठकर महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास गये और थोड़ी ही देर में लौटकर बोले, "चलिए, महाराज बैठे हैं और आप लोगों का इन्तजार कर रहे हैं।" सुनते ही सब लोग उठ खड़े हुए और राजा सुरेन्द्रसिंह की तरफ चले। उसी समय तेजसिंह ने एक ऐयार राजा गोपालसिंह के पास भेज दिया।

४

महाराजा सुरेन्द्रसिंह का दरबारे-खास लगा हुआ है। जीतसिंह, वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह, गोपालसिंह और भैरोंसिंह वगैरह अपने खास ऐयारों के अतिरिक्त कोई गैर आदमी यहाँ दिखाई नहीं देता। महाराज की आज्ञानुसार एक नकाबपोश ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का हाल इस तरह कहना शुरू किया––

नकाबपोश––जब तक राजा गोपालसिंह वहाँ रहे तब तक का हाल तो इन्होंने आपसे कहा ही होगा, अब मैं उसके बाद का हाल बयान करूँगा।

राजा गोपालसिंह से बिदा हो दोनों कुमार उसी बावली पर पहुँचे। जब राजा गोपालसिंह सबको लिए हुए वहाँ से चले गये उस समय सवेरा हो चुका था, अतएव दोनों भाई जरूरी काम और प्रातःकृत्य से छुट्टी पाकर बावली के अन्दर उतरे। निचली सीढ़ी पर पहुँचकर आनन्दसिंह ने अपने कुल कपड़े उतार दिए और केवल लंगोट पहने हुए जल के अन्दर बीचोंबीच में जा गोता लगाया। वहाँ जल के अन्दर एक छोटा-सा चबूतरा था और उस चबूतरे के बीचोंबीच में लोहे की मोटी कड़ी लगी हुई थी। जल में जाकर उसी को आनन्दसिंह ने उखाड़ लिया और इसके बाद जल के बाहर चले आए। बदन पोंछकर कपड़े पहन लिए, लंगोट सूखने के लिए फैला दिया और दोनों भाई सीढ़ी पर बैठकर जल के सूखने का इन्तजार करने लगे।

जिस समय आनन्दसिंह ने जल में जाकर वह लोहे की कड़ी निकाल ली, उसी समय से बावली का जल तेजी के साथ घटने लगा, यहाँ तक कि दो घण्टे के अन्दर ही बावली खाली हो गई और सिवा कीचड़ के उसमें कुछ न रहा, और वह कीचड़ भी मालूम होत!

था कि बहुत जल्द सूख जायेगा, क्योंकि नीचे की जमीन पक्की और संगीन बनी हुई थी, केवल नाम मात्र को मिट्टी या कीचड़ का हिस्सा उस पर था। इसके अतिरिक्त किसी सुरंग या नाली की राह निकल जाते हुए पानी ने भी बहुत-कुछ सफाई कर दी थी।

बावली के नीचे वाली चारों तरफ की अन्तिम सीढ़ी लगभग तीन हाथ के ऊँची थी और उसकी दीवार में चारों तरफ चार दरवाजों के निशान बने हुए थे जिसमें से पूरब की तरफ वाले निशान को दोनों कुमारों ने तिलिस्मी खंजर से साफ किया। जब उसके आगे वाले पत्थरों को उखाड़कर अलग किया तो अन्दर जाने के लिए रास्ता दिखाई दिया जिसके विषय में कह सकते हैं कि वह एक सुरंग का मुहाना था और इस ढंग से बन्द किया गया था जैसा कि ऊपर बयान कर चुके हैं।

इसी सुरंग के अन्दर कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को जाना था, मगर पहर भर तक उन्होंने इस खयाल से उसके अन्दर जाना मौकूफ रखा था कि उसके अन्दर से पुरानी हवा निकलकर ताजी हवा भर जाये, क्योंकि यह बात उन्हें पहले ही से मालूम थी कि दरवाजा खुलने के बाद थोड़ी ही देर में उसके अन्दर की हवा साफ हो जायेगी।

पहर भर दिन बाकी था जब दोनों कुमार उस सुरंग के अन्दर घुसे और तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए आधे घण्टे तक बराबर चले गये। सुरंग में कई जगह ऐसे सूराख बने हुए थे जिनमें से रोशनी तो नहीं मगर हवा तेजी के साथ आ रही थी और यही सबब था कि उसके अन्दर की हवा थोड़ी देर में साफ हो गई।

आप सुन चुके होंगे कि तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में (जहाँ के देवमन्दिर में दोनों कुमार कई दिन तक रह चुके हैं) देवमन्दिर के अतिरिक्त चारों तरफ चार मकान बने हुए थे और उसमें से उत्तर की तरफ वाला मकान गोलाकार स्याह पत्थर का बना हुआ था तथा उसके चारों तरफ चर्खियाँ और तरह-तरह के कल-पुर्जे लगे हुए थे। उस सुरंग का दूसरा मुहाना उसी मकान के अन्दर था और इसीलिए सुरंग के बाहर होकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने अपने को उसी मकान में पाया। इस मकान के चारों तरफ एक गोलाकार दालान के अतिरिक्त कोई कोठरी या कमरा न था। बीच में एक संगमरमर का चबूतरा था और उस पर स्याह रंग का एक मोटा आदमी बैठा हुआ था जो जाँच करने पर मालूम हुआ कि लोहे का है। उसी आदमी के सामने की तरफ दालान में सुरंग का वह मुहाना था जिसमें से दोनों कुमार निकले थे। उसी सुरंग की बगल में एक और सुरंग थी और उसके अन्दर उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। चारों तरफ देख-भाल करने के बाद दोनों कुमार उसी सुरंग में उतर गये और आठ-दस सीढ़ी नीचे उतर जाने के बाद देखा कि सुरंग खुलासा है तथा बहुत दूर तक चली गई है। लगभग सौ कदम तक दोनों कुमार बे-खटके चले गये और इसके बाद वे एक छोटे से बाग में पहुँचे जिसमें खूबसूरत पेड़-पत्तों का तो कहीं नाम-निशान भी न था हाँ, जंगली बेर, मकोय तथा केले के पेड़ों की कमी भी न थी। दोनों कुमार सोचे हुए थे कि यहाँ भी और जगहों की तरह हम सन्नाटा पाएंगे किसी आदमी की सूरत दिखाई न देगी मगर ऐसा न था। वहां कई आदमियों को इधरउधर घूमते देख दोनों कुमारों को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और वे गौर से उन आदमियों की तरफ देखने लगे जो बिल्कुल जंगली और भयानक मालूम पड़ते थे।

वे आदमी गिनती में पाँच थे और उन लोगों ने भी दोनों कुमारों को देखकर उतना ही ताज्जुब किया जितना कुमारों ने उनको देखकर। वे लोग इकट्ठे होकर कुमार के पास चले आये और उनमें से एक ने आगे बढ़कर कुमार से पूछा, "क्या आप दोनों के साथ भी वही सलूक किया गया जो हम लोगों के साथ किया गया था? मगर ताज्जुब है कि आपके कपड़े और हरबे छीने नहीं गए और आप लोगों के चेहरे पर भी किसी तरह का रंज नहीं मालूम पड़ता!"

इन्द्रजीतसिंह––तुम लोगों के साथ क्या सलूक किया गया? तुम लोग कौन हो?

आदमी––हम लोग कौन हैं, इसका जवाब देना सहज नहीं है और न आप थोड़ी देर में इसका जवाब सुन ही सकते हैं, मगर आप अपने बारे में सहज में बता सकते हैं कि किस कसूर पर यहाँ पहुँचाए गये?

इन्द्रजीतसिंह––हम दोनों तिलिस्म को तोड़ते और कई कैदियों को छुड़ाते हुए अपनी खुशी से यहाँ तक आये हैं और अगर तुम लोग कैदी हो तो समझ रखो इस कैद की अवधि पूरी हो गई और बहुत जल्द अपने को स्वतन्त्र विचरते हुए देखोगे।

आदमी हमें कैसे विश्वास हो कि जो कुछ आप कह रहे हैं वह सच है?

इन्द्रजीतसिंह––अभी नहीं तो थोड़ी देर में स्वयं विश्वास हो जायेगा।

इतना कहकर कुमार आगे की तरफ बढ़े और वे लोग उन्हें घेरे हुए साथ-साथ जाने लगे। इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को विश्वास हो गया कि सरयू की तरह ये लोग भी इस तिलिस्म में कैद किये गये हैं और दारोगा या मायारानी ने इनके साथ यह सलूक किया है, और वास्तव में बात भी ऐसी ही थी।

इन आदमियों की उम्र यद्यपि बहुत ज्यादा न थी, मगर रंज, गम और तकलीफ की बदौलत सूखकर काटा हो गये थे। सिर और दाढ़ी के बालों ने बढ़ और उलझकर उनकी सूरत डरावनी कर दी थी और चेहरे की जर्दी तथा गड्ढे में घुसी हुई आँखें उनकी बुरी अवस्था का परिचय दे रही थीं।

इस बाग में पानी का एक चश्मा था और वही इन कैदियों की जिन्दगी का सहारा था, मगर इस बात का पता नहीं लग सकता था कि पानी कहाँ से आता है और निकलकर कहाँ चला जाता है। इसी नहर की बदौलत यहाँ की जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा तर हो रहा था और इस सबब से उन कैदियों को केला वगैरह खाकर अपनी जान बचाये रहने का मौका मिलता था।

बाग के बीचोंबीच में बीस या पच्चीस हाथ ऊँचा एक बुर्ज था और उस बुर्ज के चारों तरफ स्याह पत्थर का कमर बराबर ऊँचा चबूतरा बना हुआ था, मगर इस बात का पता नहीं लगता था कि इस बुर्ज पर चढ़ने के लिए कोई रास्ता भी है या नहीं, अगर है तो कहाँ से है। दोनों कुमार उस चबूतरे पर बेधड़क जाकर बैठ गये और तब इन्द्रजीतसिंह ने उन कैदियों की तरफ देखकर कहा, "कहो, अब तुम्हें विश्वास हुआ कि जो कुछ हमने कहा था, वह सच है?"

आदमी––जी हाँ, अब हम लोगों को विश्वास हो गया, क्योंकि हम लोगों ने इस चबूतरे को कई दफे आजमाकर देख लिया है। इस पर बैठना तो दूर रहा, हम इसे छूने के साथ ही बेहोश हो जाते थे, मगर ताज्जुब है कि आप पर इसका असर कुछ भी नहीं होता।

इन्द्रजीतसिंह––इस समय तुम लोग भी इस चबूतरे पर बैठ सकते हो जब तक हम बैठे हैं।

आदमी––(चबूतरा छूने की नीयत से बढ़ता हुआ) क्या ऐसा हो सकता है?

इन्द्रजीतसिंह––आजमा के देख लो।

उस आदमी ने चबूतरा छूआ मगर उस पर कुछ बुरा असर न हुआ और तब कुमार की आज्ञा पा वह चबूतरे पर बैठ गया। उसकी देखा-देखी सभी आदमी उस चबूतरे पर बैठ गये और जब किसी तरह का बुरा असर होते न देखा, तब हाथ जोड़कर कुमार से बोले, "अब हम लोगों को आपकी बात में किसी तरह का शक न रहा, आशा है कि आप कृपा करके अपना परिचय देंगे।"

जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने अपना परिचय दिया, तब सब-के-सब उनके पैरों पर गिर पड़े और डबडबाई आँखों से उनकी तरफ देखकर बोले, "दुहाई है, महाराज की! हमारे मामले पर विचार होकर दुष्टों को दण्ड मिलना चाहिए।"

इतना कहकर नकाबपोश चुप हो गया और कुछ सोचने लगा। इसी समय वीरेन्द्रसिंह ने उससे कहा, "मालूम होता है कि उस चबूतरे में बिजली का असर था और इस सबब से उसे कोई छू नहीं सकता था, मगर दोनों लड़कों के पास बिजली वाला तिलिस्मी खंजर मौजूद था और उसके जोड़ की अँगूठी भी, इसलिए तब तक के लिए उसका असर जाता रहा, जब तक दोनों लड़के उस पर बैठे रहे।"

नकाबपोश––(हाथ जोड़कर) जी, बेशक यही बात है।

वीरेन्द्रसिंह––अच्छा, तब क्या हुआ?

नकाबपोश––इसके बाद कुमार ने उन सबका हाल पूछा और उन सबने रो-रोकर अपना हाल बयान किया।

वीरेन्द्रसिंह––उन लोगों ने अपना हाल क्या कहा?

नकाबपोश––मैं यही सोच रहा था कि उन लोगों ने जो कुछ अपना हाल बयान किया वह मैं इस समय कहूँ या न कहूँ।

तेजसिंह––क्या उन लोगों का हाल कहने में कोई हर्ज है? आखिर हम लोगों को मालूम तो होगा ही।

नकाबपोश––जरूर मालूम होगा और मेरी ही जुबानी मालूम होगा। मैं जो कहने से रुकता हूँ, वह केवल एक ही दो दिन के लिए, हमेशा के लिए नहीं।

तेजसिंह––यही बात है तो हमें एक दिन के लिए कोई जल्दी भी नहीं।

नकाबपोश––(हाथ जोड़कर) अतः अब आज्ञा हो तो हम लोग डेरे पर जायें।

कल पुनः सभा में उपस्थित होकर यदि देवीसिंह और भूतनाथ न आये, तो कुमार का हाल सुनावेंगे।

सुरेन्द्रसिंह––(इशारे से जाने की आज्ञा देकर) तुम दोनों ने इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का हाल सुनाकर अपने विषय में हम लोगों आश्चर्य को और भी बढ़ा दिया।

दोनों नकाबपोश उठ खड़े हुए और अदब के साथ सलाम करके वहाँ से रवाना हुए।

५

देवीसिंह और भूतनाथ की यह इच्छा न थी कि आज सवेरा होते ही हम लोग यहाँ से चले जायें और अपनी स्त्रियों के किसी तरह की जाँच न करें, मगर लाचारी थी, क्योंकि नकाबपोशों की इच्छा के विरुद्ध वे यहाँ नहीं रह सकते थे, साथ ही इसके मकान-मालिक की मेहरबानी और मीठे बर्ताव का भी उन्हें वैसा ही खयाल था, जैसाकि इस मजबूरी की अवस्था में होना चाहिए। सवेरा होने पर जब कई नकाबपोश उनके सामने आये और उन्हें बाहर निकलने के लिए कहा तो देवीसिंह और भूतनाथ उठ खड़े हुए और कमरे के बाहर निकल उनके पीछे-पीछे रवाना हुए। जब मकान के नीचे उतरकर मैदान में पहुँचे तो देवीसिंह का इशारा पाकर भूतनाथ ने नकाबपोश से कहा, "हम तुम्हारे मकान-मालिक से एक दफे और मिलना चाहते हैं।

नकाबपोश––इस समय उनसे मुलाकात नहीं हो सकती।

भूतनाथ––अगर घण्टे या दो घण्टे में मुलाकात हो सके तो हम लोग ठहर जायें।

नकाबपोश––नहीं, अब मुलाकात हो ही नहीं सकती। उन्होंने रात ही को जो हुक्म दे रखा था. हम लोग उसको पूरा कर रहे हैं।

भूतनाथ––हम लोगों को कोई जरूरी बात पूछनी हो तो?

नकाबपोश––एक चिट्ठी लिखकर रख जाओ, उसका जवाब तुम्हारे पास पहुँच जायेगा।

भूतनाथ––अच्छा, यह बताओ कि यहाँ हम लोगों ने गिरफ्तार होने के पहले जिन दो औरतों को देखा था, उनसे भी मुलाकात हो सकती है या नहीं?

नकाबपोश––नहीं, क्या उन लोगों को आपने खानदानी समझ रखा है?

दूसरा नकाबपोश––इन सब फिजूल बातों से कोई मतलब नहीं और न हम लोगों को इतनी फुरसत ही है। आप लोग नाहक हम लोगों को रंज करते हैं और हमारे मालिक की उस मेहरबानी को एकदम भूल जाते हैं जिसकी बदौलत आप लोग कैदखाने की हवा खाने से बच गये।

भूतनाथ––(कुछ क्रोध-भरी आवाज में) अगर हम लोग यहाँ से न जायें तो तुम क्या करोगे?

नकाबपोश––(रंज के साथ) जबरदस्ती निकाल बाहर करेंगे। आप लोग अपने तिलिस्मी खंजर के भरोसे न भूलियेगा, ऐसे-ऐसे तुच्छ खंजरों का काम हम लोग अपने नाखूनों से लेते हैं। बस, सीधी तरह कदम उठाइये और इस जमीन को अपनी मिलकियत न समझिये।

नकाबपोशों की बातें यद्यपि भूतनाथ और देवीसिंह को बुरी मालूम हुईं, मगर बहुत-सी बातों को सोच-विचारकर चुप ही रहे और तकरार करना उचित न जाना। सब नकाबपोशों ने मिलकर उन्हें खोह के बाहर किया और लौटते समय भूतनाथ और देवीसिंह से एक नकाबपोश ने कहा, "बस, अब इसके अन्दर आने का खयाल न कीजियेगा, कल दरवाजा खुला रह जाने के कारण आप लोग चले आये, मगर अब ऐसा मौका न मिलेगा।"

नकाबपोशों के चले जाने के बाद भूतनाथ और देवीसिंह वहाँ से रवाना हुए और कुछ दूर जाकर जंगल में एक घने पेड़ की छाया देखकर बैठ गये और यों बातचीत करने लगे––

भूतनाथ––कहिये, अब क्या इरादा है?

देवीसिंह बात तो यह है कि हम लोग नकाबपोशों के घर जाकर बेइज्जत हो गये। चाहे ये दोनों नकाबपोश कुछ भी कहें मगर मुझे निश्चय है कि दरबार में आने वाले दोनों नकाबपोश वही हैं जिनके हम मेहमान हुए थे। मुझे तो शर्म आयेगी जब दरबार में मैं उन्हें अपने सामने देखूँगा। इसके अतिरिक्त यदि यहाँ से जाकर अपनी स्त्री को घर में न देखूँगा, आर्श्चय रंज और क्रोध की कोई हद न रहेगी।

भूतनाथ––यद्यपि मैं एक तौर पर बेहया हो गया हूँ, परन्तु आज की बेइज्जती दिल को फाड़े डालती है। बहुत ऐयारी की, मगर ऐसा जिक्र कभी नहीं उठा था, मेरी तो यहाँ से हटने की इच्छा नहीं होती, यही जी में आता है कि इनमें से एक-न-एक को अवश्य पकड़ना चाहिए और अपनी स्त्री के विषय में इतना कहना काफी है कि यदि अपने घर जाकर अपनी स्त्री को पा लिया तो मैं भी अपनी स्त्री की तरफ से बेफिक्र हो जाऊँगा।

देवीसिंह––करने के लिए तो हम लोग बहुत कुछ कर सकते हैं, मगर जब मैं उनके बर्ताव पर ध्यान देता हूँ, तव लाचारी आकर पल्ला पकड़ लेती है। जब एक बार उन्होंने हम लोगों को गिरफ्तार किया तो हर तरह का सलूक कर सकते थे, परन्तु किसी तरह की बुराई हमारे साथ नहीं की। दूसरे वे लोग स्वयं हमारे महाराज के दरबार में हाजिर हुआ करते हैं और समय पर अपने को प्रकट कर देने का वादा भी कर चुके हैं, ऐसी अवस्था में उनके साथ खोटा बर्ताव करते डर लगता है। कहीं ऐसा न हो कि वे लोग रंज हो जायें और दरबार में आना छोड़ दें, अगर ऐसा हुआ तो बड़ी बदनामी होगी और कैदियों का मामला भी आजकल के ढंग से अधूरा ही रह जायेगा!

भूतनाथ––आप बात तो ठीक कहते हैं, परन्तु···

देवीसिंह––नहीं, अब इस समय तरह देना ही उचित है। जिस तरह मैं अपनी बदनामी का खयाल करता हूँ, उसी तरह तुमको भी तो खयाल होगा!

भूतनाथ––जरूर! यदि नकाबपोशों का कोई अकेला आदमी कब्जे में आ जाये तो शायद काम निकल जाये और किसी को इस बात की खबर भी न हो।

इस तरह की बातें हो रही थीं कि उनके कानों में घोड़े के टापों की आवाज आई और दोनों ने घूमकर पीछे की तरफ देखा। एक नकाबपोश सवार आता हुआ दिखाई पड़ा जिस पर निगाह पड़ते ही भूतनाथ ने देवीसिंह से कहा, "यह भी जरूर उन्हीं में से है, भला एक दफे तो और कोशिश कीजिए और जिस तरह हो सके, इसे गिरफ्तार कीजिए, फिर जैसा होगा देखा जायेगा। बस, अब इस समय सोचने-विचारने का मौका नहीं है।"

वह सवार बिल्कुल बेफिक्री के साथ धीरे-धीरे आ रहा था, अतः ये दोनों भी उसके रास्ते के दोनों तरफ पेड़ों की आड़ देकर उसे गिरफ्तार करने को नीयत से खड़े हो गये। जब वह नकाबपोश सवार इन दोनों की सीध पर पहुँचा और आगे बढ़ना ही चाहता था, तभी भूतनाथ के हाथ की फेंकी हुई कमन्द उसके घोड़े के गले में जा पड़ी। घोड़ा भड़ककर उछलने-कूदने लगा और तब दोनों ने लपककर घोड़े की लगाम थाम ली। उस सवार ने खंजर खींचकर वार करना चाहा, मगर कुछ सोचकर रुक गया और साथ ही इसके इन दोनों को भी उसने लड़ने के लिए तैयार देखा।

नकाबपोश––(भूतनाथ से) तुम मुझे व्यर्थ क्यों रोकते हो? मुझसे क्या चाहते हो?

भूतनाथ––हम लोग तुम्हें किसी तरह की तकलीफ देना नहीं चाहते, बस, थोड़ी देर के लिए घोड़े से नीचे उतरो, और हमारी दो-चार बातों का जवाब देकर जहाँ जी में आवे, चले जाओ।

नकाबपोश––बहुत अच्छा, मगर नकाब हटाने के लिए जिद न करना।

इतना कहकर नकाबपोश घोड़े के नीचे उतर पड़ा और भूतनाथ ने उससे कहा, "लेकिन तुम्हें अपने चेहरे से नकाब हटाना पड़ेगा, और यह काम सबसे पहले होगा।" यह कहते-कहते भूतनाथ ने अपने हाथ से उसके चेहरे की नकाब उलट दी, मगर उसके चेहरे पर निगाह पड़ते ही चौंककर बोल बैठा, "हैं, यह तो मेरी स्त्री है जो नकाबपोशों के घर में दिखाई पड़ी थी!"

६

अपनी स्त्री की सूरत देखकर जितना ताज्जुब भूतनाथ को हुआ उतना ही आश्चर्य देवीसिंह को भी हुआ। यह विचारकर रंज-गम और गुस्से से देवीसिंह का सिर घूमने लगा कि इसी तरह मेरी स्त्री भी अवश्य नकाबपोशों के यहाँ होगी और हम लोगों को उसकी सुरत देखने में किसी तरह का भ्रम नहीं हुआ। यदि सोचा जाये, कि जिन दोनों औरतों को हम लोगों ने देखा था, वे वास्तव में हम लोगों की औरतें न थीं, बल्कि वे औरतों की सूरत में ऐयार थे तो इसका निश्चय भी इसी समय हो सकता है। वह औरत सामने मौजूद ही है, देख लिया जाये कि कोई ऐयार है या वास्तव में भूतनाथ की स्त्री है।

उस स्त्री ने भूतनाथ के मुँह यह से सुनकर कि 'यह तो मेरी स्त्री है', क्रोध-भरी आँखों से भूतनाथ की तरफ देखा और कहा, "एक तो तुमने जबरदस्ती मेरी नकाब उल दी, दूसरे बिना कुछ सोचे-विचारे आवारा लोगों की तरह यह कह दिया कि 'यह मेरी स्त्री है।' क्या सभ्यता इसी को कहते हैं? (देवी सिंह की तरफ देखकर) आप ऐसे सज्जन और प्रतापी राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार होकर क्या इस बात को पसन्द करते हैं?"

देवीसिंह––अगर तुम भूतनाथ की स्त्री नहीं हो तो मैं जरूर इस बर्ताव को बुरा समझता हूँ, जो भूतनाथ ने तुम्हारे साथ किया है।

औरत––(भूतनाथ से) क्यों साहब, आपने मेरी ऐसी बेइज्जती क्यों की? अगर मेरा मालिक या कोई वारिस इस समय यहाँ होता तो अपने दिल में क्या कहता?

भूतनाथ––(ताज्जुब से उसका मुँह देखता हुआ) क्या मैं भ्रम में पड़ा हुआ हूँ, या मेरी आँखें मेरे साथ दगा कर रही हैं?

औरत––सो तो आप ही जानें, क्योंकि दिमाग आपका है और आँखें भी आपकी हैं, हाँ, इतना मुझे अवश्य कहना पड़ेगा कि आप अपनी सभ्यता का परिचय देकर पुरानी बदनामी को चरितार्थ करते हैं। कौन-सी बात आपने मुझमें ऐसी देखी जिससे इतना कहने का साहस आपको हुआ?

भूतनाथ––मालूम होता है कि या तो तू कोई ऐयार है और या फिर किसी दूसरे ने तेरी सूरत मेरी स्त्री के ढंग की बना दी है, जिसे शायद तूने कभी देखा नहीं।

भूतनाथ ने उस औरत की बातों का जवाब तो दिया मगर वास्तव में वह खुद बहुत घबरा गया था। अपनी स्त्री की ढिठाई और चपलता पर उसे तरह-तरह के शक होने लगे और वह बड़ी बेचैनी के साथ सोच रहा था कि अब क्या करना चाहिए कि इसी बीच में उस स्त्री ने भूतनाथ की बात का यों जवाब दिया––

स्त्री––यों आप जिस तरह चाहें सोच-समझकर अपनी तबीयत खुश कर लें, मगर इस बात को खूब समझ रखें कि मैं भी लावारिस नहीं हूँ, और आप अगर मेरे साथ कोई बेअदबी का बर्ताव करेंगे तो उसका बदला भी अवश्य पायेंगे। साथ ही इस बात को भी अवश्य समझ लें, कि आपके इतना कहने पर कि तू कोई ऐयार है, आपके सामने अपना चेहरा धोने की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकती।

भूतनाथ––अफसोस है कि मैं बिना जाँच किए तुम्हें छोड़ भी नहीं सकता।

स्त्री––(देवीसिंह की तरफ देखकर) बहादुरी तो तब थी, जब आप लोग किसी मर्द के साथ इस ढिठाई का बर्ताव करते। एक कमजोर औरत को इस तरह मजबूर करके फजीहत करना, ऐयारों और बहादुरों का काम नहीं है। हाय, इस जगह अगर मेरा कोई होता तो यह दुःख न भोगना पड़ता। (यह कहकर वह आँसू बहाने लगी।)

उस औरत की बातचीत कुछ ऐसे ढंग की थी, कि सुनने वालों को उस पर दया आ सकती थी और यही मालूम होता था कि यह जो कुछ कह रही है, उसमें नहीं है, यहाँ तक कि स्वयं भूतनाथ को भी उसकी बातों पर सहम जाना पड़ा और वह ताज्जुब के साथ उस औरत का मुँह देखने लगा, खास करके इस खयाल से भी कि देखें आँसू बहने के सबब से उसके चेहरे का रंग कुछ बदलता है या नहीं। उधर देवीसिंह तो उसकी बातों से बहुत ही हैरान हो गये और उनके जी में रह-रहकर यह बात पैदा होने लगी कि जरूर भूतनाथ इसके पहचानने में धोखा खा गया और वास्तव यह भूतनाथ की स्त्री नहीं है। अक्सर लोगों ने एक ही रूप-रंग के दो आदमी देखे हैं, ताज्जुब नहीं कि यहाँ भी वैसा ही कुछ मामला आ पड़ा हो।

देवीसिंह––(स्त्री से) तो तू इस भूतनाथ की स्त्री नहीं है?

स्त्री––जी नहीं।

देवीसिंह––आखिर इसका फैसला क्योंकर हो?

स्त्री––आप लोग जरा तकलीफ करके मेरे घर तक चलें, वहाँ मेरे बच्चों को देखने और मेरे मालिक से बातचीत करने पर आपको मालूम हो जायेगा कि मेरा कहना सच है या झूठ।

देवीसिंह––(औरत की बात पसन्द करके) तुम्हारा घर यहाँ से कितनी दूर है?

स्त्री––(हाथ का इशारा करके) इसी तरफ है, सो यहाँ से थोड़ी दूर पर। इन घने पेड़ों के पार ही आपको वह झोंपड़ी दिखाई देगी, जिसमें आजकल हम लोग रहते हैं।

देवीसिंह––क्या तुम झोंपड़ी में रहती हो? मगर तुम्हारी सुरत-शक्ल तो किसी झोपड़ी में रहने योग्य नहीं है।

स्त्री––जी, मेरे दो लड़के बीमार हैं, उनकी तन्दुरुस्ती का खयाल करके हवा-पानी बदलने की नीयत से आजकल हम लोग यहाँ आ टिके हैं। (हाथ जोड़कर) आप कृपा करके शीघ्र उठिये, और मेरे डेरे पर चलकर इस बखेड़े को तय कीजिये, विलम्ब होने से मैं मुफ्त में सताई जाऊँगी।

देवीसिंह––(भूतनाथ से) क्या हर्ज है, अगर इसके डेरे पर चलकर शक मिटा लिया जाये?

भूतनाथ––जो कुछ आपकी राय हो, मैं करने को तैयार हूँ, मगर यह तो मुझे अजीब ढंग से अन्धा बना रही है।

देवीसिंह––अच्छा, फिर उठो, अब देर करना उचित नहीं!

उस औरत की अनूठी बातचीत ने इन दोनों को इस बात पर मजबूर किया कि उसके साथ-साथ डेरे तक या जहाँ वह ले जाये, चुपचाप चले जायें, और देखें, कि जो कुछ वह कहती है, कहाँ तक सच है, और आखिर ऐसा ही हुआ।

इशारा पाते ही औरत उठ खड़ी हुई। देवीसिंह और भूतनाथ उसके पीछे-पीछे रवाना हुए। उस औरत को घोड़े पर सवार होने की आज्ञा न मिली, इसलिए वह घोड़े की लगाम थामे हुए धीरे-धीरे इन दोनों के साथ चली।

लगभग आध कोस के गए होंगे कि दूर से एक छोटा-सा कच्चा मकान दिखाई पड़ा जिसे एक तौर पर झोंपड़ी कहना उचित है। यह मकान ऊपर से खपड़े की जगह केवल पत्तों ही से छाया हुआ था।

जब ये लोग झोंपड़ी के दरवाजे पर पहुँचे तब उस औरत ने अपने घोड़े को खूटे के साथ बाँध कर थोड़ी-सी घास उसके आगे डाल दी जो उसी जगह एक पेड़ के नीचे पड़ी हुई थी और जिसे देखने से मालूम होता था कि रोज इसी जगह घोड़ा बाँधा जाता है। इसके बाद उसने देवीसिंह और भूतनाथ से कहा, "आप लोग जरा सा इसी जगह ठहर जायँ, मैं अन्दर जाकर आप लोगों के लिए चारपाई ले आती हूँ और अपने मालिक तथा लड़कों को भी बुला लाती हूँ!"

देवीसिंह और भूतनाथ ने इस बात को कबूल किया और कहा, "क्या हर्ज है, जाओ मगर जल्दी आना, क्योंकि हम लोग ज्यादा देर तक यहां नहीं ठहर सकते।"

वह औरत मकान के अन्दर चली गई और वे दोनों देर तक बाहर खड़े रह कर उसका इन्तजार करते रहे, यहाँ तक कि घण्टे भर से ज्यादा बीत गया और वह औरत मकान के बाहर न निकली। आखिर भूतनाथ ने उसे पुकारना और चिल्लाना शुरू किया, मगर इसका भी कोई नतीजा न निकला अर्थात् किसी ने भी उसे किसी तरह का जवाब न दिया। तब लाचार होकर वे दोनों मकान के अन्दर घुस गए, फिर भी किसी आदमी की यहाँ तक कि उस औरत की भी सूरत दिखाई न पड़ी। उस छोटी झोंपड़ी में किसी को ढूँढ़ना या पता लगाना कौन कठिन था तो भी दोनों ने बित्ता-बित्ता जमीन देख डाली मगर सिवाय एक सुरंग के और कुछ भी दिखाई न पड़ा। न तो मकान में किसी तरह का असबाब ही था और न चारपाई, बिछौना, कपड़ा-लत्ता या अन्न और बर्तन इत्यादि ही दिखाई पड़ा, अतः लाचार होकर भूतनाथ ने कहा, "बस-बस, हम हम लोगों को उल्लू बनाकर वह इसी सुरंग की राह निकल गई!"

बेवकूफ बनाकर इस तरह उस उस औरत के निकल जाने से दोनों ऐयारों को बड़ा ही अफसोस हुआ। भूतनाथ ने सुरंग के अन्दर घुस कर उस औरत को ढूँढने का इरादा किया। पहले तो इस बात खयाल हुआ कि कहीं उस सुरंग में दो-चार आदमी घुस कर बैठे न हों जो हम लोगों पर बेमौके वार करें, मगर जब अपने तिलिस्मी खंजर का ध्यान आया तो यह खयाल जाता रहा और बेफिक्री के साथ में तिलिस्मी खंजर लिये हुए भूतनाथ उस सुरंग के अन्दर घुसा, पीछे-पीछे देवीसिंह ने भी उसके अन्दर पैर रक्खा।

वह सुरंग लगभग पाँच सौ कदम के लम्बी होगी। उसका दूसरा सिरा घने जंगल अन्दर निकला था। देवीसिंह और भूतनाथ भी उसी सुरंग के अन्दर ही अंदर वहाँ तक चले गये और इन्हें विश्वास हो गया कि अब उस औरत का पता किसी तरह नहीं लग सकता।

इस समय इन दोनों के दिल की क्या कैफियत थी सो वे ही ठीक जानते होंगे, अतः लाचार होकर देवीसिंह ने घर लौट चलने का विचार किया, मगर भूतनाथ ने इस बात को स्वीकार न करके कहा, "इस तरह तकलीफ उठाने और बेइज्जत होने पर भी बिना कुछ काम किए घर लौट चलना मेरे खयाल से उचित नहीं है।"

देवीसिंह––आखिर फिर किया ही क्या जायगा? मुझे इतनी फुरसत नहीं है कि कई दिनों तक बेफिक्री के साथ इन लोगों का पीछा किया करूँ। उधर दरबार की जो कुछ कैफियत है तुम जानते ही हो! ऐसी अवस्था में मालिक की प्रसन्नता का खयाल न करके एक साधारण काम में दूसरी तरफ उलझ रहना मेरे लिए उचित नहीं है।

भूतनाथ––आपका कहना ठीक है मगर इस समय मेरी तबीयत का क्या हाल है, सो भी आप अच्छी तरह समझते होंगे।

देवीसिंह––मेरे खयाल से तुम्हारे लिए कोई ज्यादा तरद्दुद की बात नहीं है।

इसके अतिरिक्त घर लौट चलने पर मैं अपनी औरत को देखूँगा, अगर वह मिल गई तो तुम भी अपनी स्त्री की तरफ से बेफिक्र हो जाओगे।

भूतनाथ––अगर आपकी स्त्री घर पर मिल जाय तो भी मेरे दिल का खुटका न जायगा।

देवीसिंह––अपनी स्त्री का हाल लेने के लिए तुम भी अपने आदमियों को भेज सकते हो।

भूतनाथ––यह सब कुछ ठीक है मगर क्या करूँ, इस समय मेरे पेट में अजीब तरह की खिचड़ी पक रही है और क्रोध क्षण-क्षण में बढ़ा ही चला आता है।

देवीसिंह––अगर ऐसा ही है तो जो कुछ तुम्हें उचित जान पड़े सो करो। मैं अकेला ही घर की तरफ लौट जाऊँगा।

भूतनाथ––अगर ऐसा ही कीजिये तो मुझ पर बड़ी कृपा होगी, मगर जब महाराज मेरे बारे में पूछेगे तब क्या जवाब···

देवीसिंह––(बात काट कर) महाराज की तरफ से तुम बेफिक्र रहो, मैं जैसा मुनासिब समझूगा कह-सुन लूँगा, मगर इस बात का वादा कर जाओ कि कितने दिन पर तुम वापस आमोगे या तुम्हारा हाल मुझे कब और क्योंकर मिलेगा?

भूतनाथ––मैं आपसे सिर्फ तीन दिन की छुट्टी लेता हूँ। अगर इससे ज्यादा दिन तक अटकने की नौबत आई तो किसी तरह अपने हाल-चाल की खबर आप तक पहुँचा दूँगा।

देवीसिंह––बहुत अच्छा! (मुस्कुराते हुए) अब आप जाइये और पुनः लात खाने का बन्दोबस्त कीजिए, मैं तो घर की तरफ रवाना होता हूँ, जय माया की!

भूतनाथ––जय माया की!

भूतनाथ को उसी जगह छोड़कर देवीसिंह रवाना हुए और संध्या होने के पहले ही तिलिस्मी इमारत के पास आ पहुँचे।

७

डेरे पर पहुँच कर स्नान करने और पोशाक बदलने के बाद देवीसिंह सबसे पहले राजा वीरेन्द्रसिंह के पास गये और उसी जगह तेजसिंह से भी मुलाकात की। पूछने पर देवीसिंह ने अपना और भूतनाथ का कुल हाल बयान किया जो कि हम ऊपर के बयानों में लिख आये हैं। उस हाल को सुनकर वीरेन्द्र सिंह और तेजसिंह को कई दफा हँसने और ताज्जुब करने का मौका मिला और अन्त में वीरेन्द्रसिंह ने कहा, "अच्छा किया जो तुम भूतनाथ को छोड़कर यहाँ चले आये। तुम्हारे न रहने के कारण नकाबपोशों के आगे हम लोगों को मिन्दा होना पड़ा।"

देवीसिंह––(ताज्जुब से) क्या वे लोग वहाँ आये थे?

वीरेन्द्रसिंह––हाँ, वे दोनों अपने मामूली वक्त पर यहाँ आये थे और तुम दोनों का पीछा करने पर ताज्जुब और अफसोस करते थे, साथ ही इसके उन्होंने यह भी कहा था कि वे दोनों ऐयार हमारे मकान तक नहीं पहुँचे।

देवीसिंह––वे लोग जो चाहें सो कहें, मगर मेरा खयाल यही है कि हम दोनों उन्हीं के मकान में गए थे।

वीरेन्द्रसिंह––खैर, जो हो मगर उन नकाबपोशों का यह कहना बहुत ठीक है कि जब हम लोग समय पर अपना हाल आप ही कहने के लिए तैयार हैं, तो आपको हमारा भेद जानने के लिए उद्योग नहीं करना चाहिए!

देवीसिंह––बेशक उनका कहना ठीक है मगर क्या किया जाय, ऐयारों की तबीयत ही ऐसी चंचल होती है कि किसी भेद को जानने के लिए वे देर तक या कई दिनों तक सब नहीं कर सकते। यद्यपि भूतनाथ इस बात को खूब जानता है कि वे दोनों नकाबपोश उसके पक्षपाती हैं और पीछा करके उनका दिल दुखाने का नतीजा शायद अच्छा न निकले मगर फिर भी उसकी तबीयत नहीं मानती, तिस पर कल की बेइज्जती और अपनी स्त्री को वहाँ न देखता तो निःसन्देह मेरे साथ वापस चला आता और उन लोगों का पीछा करने का खयाल अपने दिल से निकाल देता।

तेजसिंह––खैर, कोई चिन्ता नहीं, वे नकाबपोश खुशदिल नेक और हमारे प्रेमी मालूम होते हैं, इसलिए आशा है कि भूतनाथ को अथवा तुम्हारे किसी आदमी को कोई तकलीफ पहुँचाने का खयाल न करेंगे।

वीरेन्द्रसिंह––हमारा भी यही खयाल है। (देवीसिंह से मुस्कुराकर) तुम्हारा दिल भी तो अपनी बीवी साहेबा को देखने के लिए बेताब हो रहा होगा?

देवोसिंह––बेशक मेरे दिल में धुक-धुकी सी लगी हुई है और मैं चाहता हूँ कि किसी तरह आपकी बात पूरी हो तो महल में जाऊँ।

वीरेन्द्रसिंह––मगर हमसे तो तुमने पूछा ही नहीं कि तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी बीवी महल में थी या नहीं

देवीसिंह––(हँसकर) जी आपसे पूछने की मुझे कोई जरूरत नहीं और न मुझे विश्वास ही है कि आप इस बारे में मुझसे सच बोलेंगे।

वीरेन्द्रसिंह––(हँसकर) खैर, मेरी बातों पर भले विश्वास न करो और महल में जाकर अपनी रानी को देखो। मैं भी उसी जगह पहुँचकर तुम्हें इस बेऐतवारी का मजा चखाता हूँ!

इतना कहकर राजा वीरेन्द्रसिंह उठ खड़े हुए और देवीसिंह भी हँसते हुए वहाँ से चले गये।

महल के अन्दर अपने कमरे में एक कुर्सी पर बैठी चम्पा रोहतासगढ़ की पहाड़ी और किले की तस्वीर दीवार के ऊपर बना रही है और उसकी दो लौंडियाँ हाथ में मोमी शमादान लिए हुए रोशनी दिखा कर इस काम में उसकी मदद कर रही हैं। चम्पा का मुँह दीवार की तरफ और पीठ सदर दरवाजे की तरफ है। दोनों लौंडियाँ भी उसी की तरह दीवार की तरफ देख रही हैं इसलिए चम्पा तथा उसकी लौंडियों को इस बात की कुछ भी खबर नहीं कि देवीसिंह धीरे-धीरे पैर दबाते हुए इस कमरे में आकर दूर से और कुछ देर से उनकी कार्रवाई देखते हुए ताज्जुब कर रहे हैं। चम्पा तस्वीर बनाने के काम में बहुत ही निपुण और शीघ्र काम करने वाली थी तथा उसे तस्वीरों के बनाने का शौक भी हद से ज्यादा था। देवीसिंह ने उसके हाथ की बनाई हुई सैकड़ों तस्वीरें देखी थीं, मगर आज की तरह ताज्जुब करने का मौका उन्हें आज के पहले नहीं मिला था। ताज्जुब इसलिए कि इस समय जिस ढंग की तस्वीरें चम्पा बना रही थी ठीक उठी ढंग की तस्वीरें देवीसिंह ने भूतनाथ के साथ जाकर नकाबपोशों के मकान में दीवार के ऊपर बनी हुई देखी थीं। कह सकते हैं कि एक स्थान या इमारत की तस्वीर अगर दो कारीगर बनावें तो सम्भव है कि एक ढंग की तैयार हो जायें मगर यहाँ यही बात न थी। नकाबपोशों के मकान में रोहतासगढ़ पहाड़ी की जो तस्वीर देवीसिंह ने देखी थी, उसमें दो नकाबपोश सवार पहाड़ी के ऊपर चढ़ते हुए दिखलाये गये थे जिनमें से एक का घोड़ा मुश्की और दूसरे का सब्जा था। इस समय जो तस्वीर चम्पा बना रही थी, उसमें भी उसी ठिकाने उसी ढंग के दो सवार इसने बनाये थे और उसी तरह इन दोनों सवारों में से भी एक का घोड़ा मुश्की और दूसरे का सब्जा था। देवीसिंह का खयाल है कि यह बात इत्तिफाक से नहीं हो सकती।

ताज्जुब के साथ उस तस्वीर को देखते हुए देवी सिंह सोचने लगे, 'क्या यह तस्वीर इसने यों ही अन्दाज से तैयार की है? नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। अगर यह तस्वीर इसने अन्दाज से बनाई होती तो दोनों सवार और घोड़े ठीक उसी रंग के न बनते जैसा कि मैं उन नकाबपोशों के यहाँ देख आया हूँ। तो क्या यह वास्तव में उन नकाबपोशों के यहां गई थी? बेशक गई होगी, क्योंकि उस तस्वीर के देखे बिना उसके जोड़ की तस्वीर यह बना नहीं सकती, मगर इस तस्वीर के बनाने से साफ जाहिर होता है कि यह अपनी उन नकाबपोशों के यहाँ जाने वाली बात गुप्त रखना भी नहीं चाहती, मगर ताज्जुब है कि जब इसका ऐसा खयाल है तो वहाँ (नकाबपोशों के घर पर) मुझे देखकर छिप क्यों गई थी? खैर, अब बातचीत करने पर जो कुछ भेद है सब मालूम हो जायगा।

यह सोचकर देवीसिंह दो कदम आगे बढ़े ही थे कि पैरों की आहट पाकर चम्पा चौंकी और घूमकर पीछे देखने लगी। देवीसिंह पर निगाह पड़ते ही कूची और रंग की प्याली जमीन पर रख कर उठ खड़ी हुई और हाथ जोड़कर प्रणाम करने के बाद बोली, "आप सफर से लौट कर कब आये?"

देवीसिंह––(मुस्कुराते हुए) चार-पाँच घण्टे हुए होंगे, मगर यहाँ भी मैं आधी घड़ी से तमाशा देख रहा हूँ।

चम्पा––(मुस्कुराती हुई) क्या खूब! इस तरह चोरी से ताक-झाँक करने की क्या जरूरत थी?

देवीसिंह––इस तस्वीर और इसकी बनावट को देखकर मैं ताज्जुब कर रहा था और तुम्हारे काम में हर्ज डालने का इरादा नहीं होता था।

चम्पा––(हँसकर) बहुत ठीक, खैर, आइये और बैठिये।

देवीसिंह––पहले मैं तुम्हारी इस कुर्सी पर बैठ के इस तस्वीर को गौर से देखूँगा।

इतना कह कर देवीसिंह उस कुर्सी पर बैठ गये जिस पर थोड़ी ही देर पहले चम्पा बैठी हुई तस्वीर बना रही थी और बड़े गौर से उस तस्वीर को देखने लगे, चम्पा भी कुर्सी की पिछवाई पकड़ कर खड़ी हो गई और देखने लगी। देखते-देखते देवीसिंह ने झट हलके जर्द रंग की प्याली और कूची उठा ली और उस तस्वीर में रोहतासगढ़ किले के ऊपर एक बुर्ज और उसके साथ सटे हुए पताके का साधारण निशान बनाया अर्थात् जमीन बाँधी जिसे देखते ही चम्पा चौंकी और बोली, "हाँ-हाँ ठीक है, यह बनाना तो मैं भूल ही गई थी। बस अब आप रहने दीजिये, इसे भी मैं ही अपने हाथ से बनाऊँगी, आप देखकर कहियेगा कि तस्वीर कैसी बनी और इसमें कौन सी बात छूट गई थी।"

चम्पा की इस बात को सुन देवीसिंह चौक पड़े। अब उन्हें पूरा-पूरा विश्वास हो गया कि चम्पा उन नकाबपोशों के मकान जरूर गई थी और मैंने निःसन्देह इसी को देखा था अतः देवीसिंह ने घूमकर चम्पा की तरफ देखा और कहा, "मगर पहले यह तो बताओ कि वहाँ मुझे देखकर तुम भाग क्यों गई थीं?"

चम्पा––(ताज्जुब की सूरत बना के) कहाँ? कब?

देवीसिंह––उन्हीं नकाबपोशों के यहाँ!

चम्पा––मुझे बिल्कुल याद नहीं पड़ता कि आप कब की बात कर रहे हैं।

देवीसिंह––अब लगीं न नखरा करके परेशान करने!

चम्पा––मैं आपके चरणों की कसम खाकर कहती हूँ कि मुझे कुछ याद नहीं कि आप कब की बात कर रहे हैं।

अब तो देवीसिंह के ताज्जुब की कोई हद न रही, क्योंकि वे खूब जानते थे कि चम्पा जितनी खूबसूरत और ऐयारी के फन में तेज है, उतनी ही नेक और पतिव्रता भी है। वह उनके चरणों की कसम खाकर झूठ कदापि नहीं बोल सकती। अतः कुछ देर तक ताज्जुब के साथ गौर करने के बाद पुनः देवीसिंह ने कहा, "आखिर कल या परसों तुम कहां गई थीं?"

चम्पा––मैं तो कहीं नहीं गई! आप महारानी चन्द्रकान्ता से पूछ लें क्योंकि मेरा उनका तो दिन-रात का संग है, अगर मैं कहीं जाती तो किसी काम से ही जाती और ऐसी अवस्था में आपसे छिपाने की जरूरत ही क्या थी?

देवीसिंह––फिर यह तस्वीर तुमने कहाँ देखी?

चम्पा––यह तस्वीर? मैं···

इतना कह चम्पा कपड़े का एक लपेटा हुआ पुलिन्दा उठा लाई और देवीसिंह के हाथ में दिया। देवीसिंह ने उसे खोलकर देखा और चौंक कर चम्पा से पूछा, "यह नक्शा तुम्हें कहाँ से मिला?"

चम्पा––यह नक्शा मुझे कहाँ से मिला, सो मैं पीछे कहूँगी, पहले आप यह बतावें कि इस नक्शे को देखकर आप क्यों चौंके और यह नक्शा वास्तव में कहाँ का है? क्योंकि मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं जानती।

देवीसिंह––यह नक्शा उन्हीं नकाबपोशों के मकान का है जिनके बारे में मैं अभी तुमसे पूछ रहा था।

चम्पा––कौन नकाबपोश? वे ही जो दरबार में आया करते हैं?

देवीसिंह––हाँ वे ही, और उन्हीं के यहाँ मैंने तुमको देखा था।

चम्पा––(ताज्जुब के साथ) यों मैं कुछ भी नहीं समझ सकती, पहले आप अपने सफर का हाल सुनावें और यह बतावें कि आप कहाँ गये थे और क्या-क्या देखा?

इसके जवाब में देवीसिंह ने अपने और भूतनाथ के सफर का हाल बयान किया और इसके बाद उस कपड़े वाले नक्शे की तरफ बता के कहा, "यह उसी स्थान का नक्शा है। उस बँगले के अन्दर दीवारों पर तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई हैं, जिन्हें कारीगर दिखा नहीं सकता, इसलिए नमूने के तौर पर बाहर की तरफ यही रोहतासगढ़ की एक तस्वीर बनाकर उसने नीचे लिख दिया है कि इस बंगले में इसी तरह की बहुत सी तस्वीरें बनी हुई हैं। वास्तव में यह नक्शा बहुत ही अच्छा, साफ और बेशकीमत बना हुआ है।"

चम्पा––अब मैं समझी कि असल मामला क्या है, मैं उस मकान में नहीं गई थी।

देवीसिंह––तब यह तस्वीर तुमने कहाँ से पाई?

चम्पा––यह तस्वीर मुझे लड़के (तारासिंह) ने दी थी।

देवीसिंह––तुमने पूछा तो होगा कि यह तस्वीर उसे कहाँ से मिला?

चम्पा––नहीं, उसने बहुत तारीफ करके यह तस्वीर मुझे दी और मैंने ले ली।

देवीसिंह––कितने दिन?

चम्पा––आज पाँच-छ: दिन हुए होंगे।

इसके बाद देवीसिंह बहुत देर तक चम्पा के पास बैठे रहे और वहाँ से जाने लगे तब वह कपड़े वाली तस्वीर अपने साथ बाहर लेते गये।

८

महल के बाहर आने पर भी देवीसिंह के दिल को किसी तरह चैन न पड़ा। यद्यपि रात बहुत बीत चुकी थी तथापि राजा वीरेन्द्रसिंह से मिल कर उस तस्वीर के विषय में बातचीत करने की नीयत से वह राजा साहब के कमरे में चले गए, मगर वहाँ जाने पर मालूम हुआ कि वीरेन्द्रसिंह महल में गए हैं, लाचार होकर वे लौटना ही चाहते थे कि राजा वीरेन्द्रसिंह भी आ पहुँचे और अपने पलंग के पास देवीसिंह को देखकर बोले, "रात को भी तुम्हें चैन नहीं पड़ती! (मुस्कुरा कर) मगर ताज्जुब यह है कि चम्पा ने तुम्हें इतने जल्दी बाहर आने की छुट्टी क्यों दे दी!"

देवीसिंह––इस हिसाब से तो मुझे भी आप पर ताज्जुब करना चाहिए मगर नहीं, असल तो यह है कि मैं एक ताज्जुब की बात आपको सुनाने के लिए यहाँ चला आया हूँ।

वीरेन्द्रसिंह––वह कौन-सी बात है, और तुम्हारे हाथ में यह कपड़े का पुलिन्दा कैसा है?

देवीसिंह––इसी कम्बख्त ने तो मुझे इस आनन्द के समय में आपसे मिलने पर मजबूर किया।

वीरेन्द्रसिंह––सो क्या? (चारपाई पर बैठकर) बैठ के बात करो।

देवीसिंह ने महल में चम्पा के पास जाकर जो कुछ देखा और सुना था सब बयान किया, इसके बाद वह कपड़े वाली तस्वीर खोलकर दिखाई तथा उस नक्शे को भी अच्छी तरह समझाने के बाद कहा, "न मालूम यह नक्शा तारा को क्योंकर और कहाँ से मिला और उसने इसे अपनी माँ को क्यों दे दिया!"

वीरेन्द्रसिंह––तारासिंह से तुमने क्यों नहीं पूछा?

देवीसिंह––अभी तो मैं सीघा यहाँ आप ही के पास चला आया हूँ। अब जो कुछ मुनासिब हो सो किया जाय। कहिए तो लड़के को इसी जगह बुलाऊँ?

वीरेन्द्रसिंह––क्या हर्ज है, किसी को कहो बुला लावे।

देवीसिंह कमरे के बाहर निकले और पहरे के एक सिपाही को तारासिंह को बुलाने की आज्ञा देकर पुनः कमरे में चले गये और राजा साहब से बातचीत करने लगे। थोड़ी देर में पहरे वाले ने वापस आकर अर्ज किया कि "तारासिंह से मुलाकात नहीं हुई और इसका भी पता न लगा कि वे कब और कहाँ गये हैं, उनका खिदमतगार कहता है कि संध्या होने के पहले ही से उनका पता नहीं है।"

बेशक यह बात ताज्जुब की थी। रात के समय बिना आज्ञा लिए तारासिंह का गैरहाजिर रहना सभी को ताज्जुब में डाल सकता था, मगर राजा वीरेन्द्रसिंह ने यह सोचा कि आखिर तारासिंह ऐयार है, शायद किसी काम की जरूरत समझकर कहीं चला गया हो, अतः राजा साहब ने भैरोंसिंह को तलब किया और थोड़ी ही देर में भैरोंसिंह ने हाजिर होकर सलाम किया।

वीरेन्द्रसिंह––(भैरोंसिंह से) क्या तुम जानते हो कि तारासिंह क्यों और कहाँ गया है?

भैरोंसिंह––तारा तो आज संध्या होने के पहले ही से गायब है, पहर भर दिन बाकी था जब वह मुझसे मिला था। उसे तरद्दुद में देखकर मैंने पूछा भी था कि आज तुम तरद्दुद में क्यों मालूम पड़ते हो, मगर इसका उसने कोई जवाब नहीं दिया।

वीरेन्द्रसिंह––ताज्जुब की बात है! हमें उम्मीद थी कि तुम्हें उसका हाल मालूम होगा।

भैरोंसिंह––क्या मैं सुन सकता हूँ कि इस समय उसे याद करने की जरूरत क्यों पड़ी?

वीरेन्द्रसिंह––जरूर सुन सकते हो।

इतना कहकर वीरेन्द्रसिंह ने देवीसिंह की तरफ देखा और देवीसिंह ने कुछ कमवेश अपना और भूतनाथ का किस्सा बयान करने के बाद उस तस्वीर का हाल कहा और तस्वीर भी दिखाई। अन्त में भैरोंसिंह ने कहा, "मुझे कुछ भी मालूम नहीं कि तारासिंह को यह तस्वीर कब और कहाँ से मिली, मगर अब इसका हाल जानने की कोशिश जरूर करूँगा।"

हुक्म पाकर भैरोंसिंह विदा हुआ और थोड़ी देर तक बातचीत करने के बाद देवीसिंह भी चले गये।

दूसरे दिन मामूली कामों से छुट्टी पाकर राजा वीरेन्द्रसिंह जब दरबार खास में बैठे तो पुनः तारासिंह के विषय में बातचीत शुरू हुई और इसी बीच में नकाबपोशों का भी जिक्र छिड़ा। उस समय वहाँ राजा वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, तेजसिंह तथा देवीसिंह वगैरह अपने ऐयारों के अतिरिक्त कोई गैर आदमी न था। जितने थे सभी ताज्जुब के साथ तारासिंह के विषय में तरह-तरह की बातें कर रहे थे और मौके पर भूतनाथ तथा नकाबपोशों का भी जिक्र आता था। दोनों नकाबपोश वहाँ आ के इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का किस्सा सुना गये थे। उसे आज तीन दिन का जमाना गुजर गया। इस बीच में न तो दोनों नकाबपोश आये और न उनके विषय में कोई बात ही सुनी गई। साथ ही इसके अभी तक भूतनाथ का कोई हाल-चाल मालूम न हुआ। खुलासा यह कि इस समय के दरबार में इन्हीं सब बातों की चर्चा थी और तरह-तरह के खयाल दौड़ाये जा रहे थे। इसी समय चोबदार ने दोनों नकाबपोशों के आने की इत्तिला की। हुक्म पाकर वे दोनों हाजिर हुए और सलाम करके आज्ञानुसार उचित स्थान पर ही बैठ गये।

एक नकाबपोश––(हाथ जोड़ के राजा वीरेन्द्रसिंह से) महाराज ताज्जुब करते होंगे कि ताबेदारों ने हाजिर होने में दो-तीन दिन का नागा किया।

वीरेन्द्रसिंह––बेशक, ऐसा ही है, क्योंकि हम लोग इन्द्रजीत और आनन्द का तिलिस्मी किस्सा सुनने के लिए बेचैन हो रहे थे।

नकाबपोश––ठीक है, हम लोग हाजिर न हुए, इसके भी कई सबब हैं। एक तो इसका पता हम लोगों को लग चुका था कि भूतनाथ जो हम लोगों की फिक्र में गया था, अभी तक लौटकर नहीं आया और इस सबब से कैदियों के मुकदमे में दिलचस्पी नहीं आ सकती थी। दूसरे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के किस्से में कई बातें ऐसी थीं जिनका हाल दरियाफ्त करना बहुत जरूरी था और इस काम के लिए हम लोग तिलिस्म के अन्दर गये हुए थे।

वीरेन्द्रसिंह––क्या आप लोग जब चाहे तब उस तिलिस्म के अन्दर जा सकते हैं जिसे वे दोनों लड़के फतह कर रहे हैं?

नकाबपोश––जी, सब जगह तो नहीं। मगर खास-खास ठिकाने कभी-कभी जा सकते हैं जहाँ तक कि हमारे गुरु महाराज जाया करते थे, मगर उसकी खबर एक-एक घड़ी की हम लोगों मिला करती है।

वीरेन्द्रसिंह––आप लोगों के गुरु कौन हैं और कहाँ हैं?

नकाबपोश––अब तो वे परमधाम को चले गये।

वीरेन्द्रसिंह––खैर, तो जब आप लोग तिलिस्म में गये थे तो क्या दोनों लड़कों से मुलाकात हुई थी?

नकाबपोश––मुलाकात तो नहीं हुई, मगर जिन बातों का शक था मिट गया और जो बातें मालूम न थीं, वे मालूम हो गई जिससे इस समय हम लोग पुनः उनका किस्सा कहने के लिए तैयार हैं। (देवीसिंह की तरफ देखकर) आपने भूतनाथ को अकेला ही छोड़ दिया!

देवीसिंह––हाँ, क्योंकि मुझे आप लोगों का भेद जानने का उतना शौक न था जितना भूतनाथ को है। मैं तो उस दिन केवल इतना ही जानने के लिए गया था कि देखें भूतनाथ कहाँ जाता है और क्या करता है। मगर मेरी तबीयत इतने ही में भर गई।

नकाबपोश––मगर भूतनाथ की तबीयत अभी नहीं भरी।

तेजसिंह––वह भी विचित्र ढंग का ऐयार है। साफ-साफ देखता है कि आप लोग उसके पक्षपाती हैं, मगर फिर भी आप लोगों का असल हाल जानने के लिए बेताब हो रहा है। यह उसकी भूल है, तथापि आशा है कि आप लोगों की तरफ से उसे किसी तरह की तकलीक न पहुँचेगी।

नकाबपोश––नहीं-नहीं, कदापि नहीं। (वीरेन्द्रसिंह की तरफ देख के और हाथ जोड़ के) हम लोगों को अपना लड़का ही समझिये और विश्वास रखिये कि आपके किसी ऐयार को हम लोगों की तरफ से किसी तरह की तकलीफ नहीं पहुँच सकती चाहे वे लोग हमें जिसी तरह का रंज पहुँचायें। वीरेन्द्रसिंह-आशा तो ऐसी ही है, और हमारे ऐयार भी बड़े ही नालायक होंगे, अगर आप लोगों को किसी तरह की तकलीफ पहुँचाने का इरादा करेंगे।

देवीसिंह––मैं कल से एक और तरद्दुद में पड़ गया हूँ।

नकाबपोश––वह क्या?

देवीसिंह––कल से मेरे लड़के तारासिंह का पता नहीं है, न मालूम वह क्यों और कहाँ चला गया।

नकाबपोश––तारासिंह के लिए आपको तरवुद न करना चाहिए, आशा है कि घण्टे भर के अन्दर ही यहाँ आ पहुँचेगा।

देवीसिंह––आपके इस कहने से तो मालूम होता है कि आपको उसका हाल भी मालूम है।

नकाबपोश––बेशक मालूम है। मगर मैं अपनी जुबान से कुछ भी न कहूँगा, आप स्वयं उससे जो कुछ पूछना होगा पूछ लेंगे। (वीरेन्द्रसिंह से) आज जिस समय हम लोग घर से यहाँ की तरफ रवाना हो रहे थे, उसी समय एक चिट्ठी कुँअर इन्द्रजीतसिंह की मुझे मिली जिसमें उन्होंने लिखा था कि तुम महाराज के पास जाकर मेरी तरफ से अर्ज करो कि महाराज भैरोंसिंह और तारासिंह को मेरे पास भेज दें, क्योंकि उनके बिना हम लोगों को कई बातों की तकलीफ हो रही है, साथ ही इसके एक चिट्ठी महाराज के नाम की भी उन्होंने भेजी है। इतना कहके नकाबपोश ने अपनी जेब में से एक बंद लिफाफा निकालकर वीरेन्द्रसिंह के हाथ में दिया।

वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब के साथ लिफाफा लेकर)सीधे मेरे पास क्यों नहीं भेजा?

नकाबपोश––वे न तो खुद तिलिस्म के बाहर आ सकते हैं और न किसी को भेज सकते हैं, हम लोगों का आदमी हरदम तिलिस्म के अन्दर मौजूद रहता है और उनके हालचाल की खबर लिया करता है, इसलिए उसी मार्फत पत्र भेज सकते हैं।

इतना सुनकर वीरेन्द्रसिंह चुप हो रहे और लिफाफा खोलकर पढ़ने लगे। प्रणाम इन्यादि के बाद यह लिखा था––

"हम दोनों भाई कुशलपूर्वक तिलिस्म की कार्रवाई कर रहे हैं। परन्तु कोई ऐयार या मददगार न रहने के कारण कभी-कभी तकलीफ हो जाती है, इसलिए आशा है कि भैरोंसिंह और तारासिंह को शीघ्र भेज देंगे। यहाँ तिलिस्म में ईश्वर ने हमें दो मददगार बहुत अच्छे पहुँचा दिये हैं जिनका नाम रामसिंह और लक्ष्मणसिंह है। ये दोनों मायारानी और तिलिस्मी दारोगा इत्यादि के भेदों से खूब वाकिफ हैं। यदि इन लोगों के सामने दुष्टों के मुकदमे का फैसला करेंगे तो आशा है कि देखने-सुनने वालों को एक अपूर्व आनन्द मिलेगा। इन्हीं दोनों की जुबानी हम दोनों भाइयों का हाल पूरा-पूरा मिला करेगा और ये ही दोनों भैरोंसिंह को भी हम लोगों के पास पहुँचा देंगे। भाई गोपालसिंह से कह दीजियेगा कि उनके दोस्त भरतसिंहजी भी इस तिलिस्म में मुझे मिले हैं। उन्हें कम्बख्त दारोगा ने कैद किया था, ईश्वर की कृपा से उनकी जान बच गई। भाई गोपालसिंहजी मुझसे बिदा होते समय तालाब वाली नहर के विषय में गुप्त रीति से जो कुछ कह गये थे वह ठीक निकला, चाँद वाला पताका भी हम लोगों को मिल गया।

इस चिट्ठी को पढ़ कर वीरेन्द्रसिंह बहुत ही प्रसन्न हुए, मगर साथ ही इसके उन्हें ताज्जुब भी हद से ज्यादा हुआ। इन्द्रजीतसिंह के हाथ के अक्षर पहचानने में किसी तरह की भूल नहीं हो सकती थी, तथापि शक मिटाने के लिए वीरेन्द्रसिंह ने वह चिट्ठी राजा गोपालसिंह के हाथ में दे दी, क्योंकि उनके विषय में भी दो-एक गुप्त बातों का ऐसा इशारा था जिसके पढ़ने से इस बात का रत्ती भर भी शक नहीं हो सकता था कि यह चिट्ठी कुमार के हाथ की लिखी हुई नहीं है या ये नकाबपोश जाल करते हैं।

चिट्ठी पढ़ने के साथ ही राजा गोपालसिंह हद से ज्यादा खुश होकर चौंक पड़े और राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर बोले, "निःसन्देह यह पत्र इन्द्रजीतसिंह के हाथ का लिखा हुआ है। विदा होते समय जो गुप्त बातें मैं उनसे कह आया था, इस चिट्ठी में उनका जिक्र एक अपूर्व आनन्द दे रहा है, तिस पर अपने मित्र भरतसिंह के पास जाने का हाल पढ़कर मुझे जो प्रसन्नता हुई, उसे मैं शब्दों द्वारा प्रकट नहीं कर सकता। (नकाबपोशों की तरफ देख के) अब मालूम हुआ कि आप लोगों के नाम रामसिंह और लक्ष्मणसिंह हैं, जरूर आप लोग बहुत सी बातों को छिपा रहे हैं, परन्तु जिस समय भेदों को खोलेंगे, उस समय निःसन्देह एक अद्भुत आनन्द मिलेगा।"

इतना कहकर राजा गोपालसिंह ने वह चिट्ठी तेजसिंह के हाथ में दे दी और उन्होंने पढ़कर देवीसिंह को और देवीसिंह ने पढ़कर और ऐयारों को भी दिखाई जिसके सबब से इस समय सब ही के चेहरे पर प्रसन्नता दिखाई देने लगी। इसी समय तारासिंह भी वहाँ आ पहुँचा।

नकाबपोश ने जो कुछ कहा था वही हुआ, अर्थात् थोड़ी देर में तारासिंह ने भी वहाँ पहुँचकर सभी के दिल से खुटका दूर किया, मगर हमारे राजा साहब और ऐयारों को इस बात का ताज्जुब जरूर था कि नकाबपोश को तारासिंह का हाल क्योंकर मालूम हुआ और उसने किस जानकारी पर कहा कि वह घण्टे भर के अन्दर आ जायगा। खैर, इस समय तारासिंह के आ जाने से सभी को प्रसन्नता ही हुई और देवीसिंह को भी उस तस्वीर के विषय में कुछ खुलासा हाल पूछने का मौका मिला। मगर नकाबपोशों के सामने उस विषय में बातचीत करना उचित न जाना।

नकाबपोश––(वीरेन्द्रसिंह से) देखिए, तारासिंह आ गये, जो मैंने कहा था वही हुआ। अब इन दोनों के विषय में क्या हुक्म होता है? क्या आज ये दोनों ऐयार कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के पास जाने के लिए तैयार हो सकते हैं?

तेजसिंह––हाँ, तैयार हो सकते हैं और आप लोगों के साथ जा सकते हैं, मगर दो-एक जरूरी कामों की तरफ ध्यान देने से यही उचित जान पड़ता है कि आज नहीं, बल्कि कल इन दोनों भाइयों को आपके साथ विदा किया जाय।

नकाबपोश––जैसी मर्जी, अव आज्ञा तो हम लोग बिदा हों?

तेजसिंह––क्या आज इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का किस्सा आप न सुनावेंगे?

नकाबपोश––देर तो हो गई, मगर फिर भी कुछ थोड़ा सा हाल सुनाने के लिए हम लोग तैयार हैं, आप दरियाफ्त करावें, यदि बड़े महाराज निश्चिन्त हों तो...

इशारा पाते ही भैरोंसिंह बड़े महाराज अर्थात् महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास चले गये और थोड़ी ही देर में लौट आकर बोले, "महाराज आप लोगों का इन्तजार कर रहे हैं।

इतना सुनते ही वीरेन्द्रसिंह के साथ ही साथ सब कोई उठ खड़े हुए और बात की बात में यह दरबारे-खास महाराज सुरेन्द्रसिंह का दरबारे-खास हो गया।

९

महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह तथा उनके ऐयारों के सामने एक नकाबपोश ने दोनों कुमारों का हाल इस तरह बयान करना शुरू किया––

नकाबपोश––कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने भी उन पाँचों कैदियों के साथ रात को उसी बाग में गुजारा किया। सवेरा होने पर सब मामूली कामों से छुट्टी पाकर दोनों भाई उसी बीच वाले बुर्ज के पास गये और चबूतरे वाले पत्थरों को गौर से देखने लगे। उन पत्थरों में कहीं-कहीं अंक और अक्षर भी खुदे हुए थे, उन्हीं अंकों को देखते-देखते इन्द्रजीतसिंह ने एक चौखूटे पत्थर पर हाथ रखा और आनन्दसिंह की तरफ देखकर कहा, "बस इसी पत्थर को हमें उखाड़ना चाहिए।" इसके जबाव में आनन्दसिंह ने "जी हाँ" कहा और तिलिस्मी खंजर की नोक से टुकड़े को उखाड़ डाला।

पत्थर के नीचे एक छोटा-सा चौखूटा कुण्ड बना हुआ था और उस कुंड के बीचोंबीच में लोहे की एक गोल कड़ी लगी थी जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने खींचना शुरू किया। उस कड़ी के साथ लोहे की पच्चीस-तीस हाथ लम्बी जंजीर लगी हुई थी जो बराबर खिंचती हुई चली आई और जब वह रुक गई अर्थात् अपनी हद तक खिंच कर बाहर निकल आई, तब उस चबूतरे के चारों तरफ का निचला पत्थर आप से आप उखड़कर जमीन के साथ लग गया और उसके अन्दर जाने के लिए दो रास्ते दिखाई देने लगे। इनमें से एक रास्ता नीचे तहखाने में उतर जाने के लिए था और दूसरा बुर्ज के ऊपर चढ़ने के लिए।

दोनों कुमार पहले बुर्ज के ऊपर चढ़ गये और वहाँ से चारों तरफ की बहार देखने लगे। खास बाग के कुछ हिस्से और उनके कई तरफ की मजबूत दीवारें तथा कुछ इमारतें और पेड़-पत्ते इत्यादि दिखाई दे रहे थे। उन सभी को गौर से देखने के बाद कुमार नीचे उतर आये और उन पाँचों कैदियों को यह कहकर कि "तुम लोग इसी बाग में रहो, खबरदार नीचे न उतरना" दोनों भाई तहखाने में उतर गये।

नीचे उतरने के लिए चक्करदार ग्यारह सीढ़ियाँ थीं जिन्हें तै करने के बाद वे दोनों एक लम्बे-चौड़े कमरे में पहुँचे। वहाँ बिल्कुल अन्धकार था, मगर तिलिस्मी खंजर की रोशनी करने पर वहाँ की सब चीजें साफ दिखाई देने लगीं। वह कमरा लम्बाई में बीस हाथ और चौड़ाई में पन्द्रह हाथ से ज्यादा न होगा। उसके बीचोंबीच में लोहे का एक चबूतरा था और उसके ऊपर लोहे की एक शेर बैठा हुआ था जिसकी चमकदार आँखें उसके भयानक चेहरे के साथ ही साथ देखने वालों के दिल पर खौफ पैदा कर सकती थीं। उसके सामने जमीन पर लोहे का एक हथौड़ा पड़ा हुआ था। बस इसके अतिरिक्त उस कमरे में और कुछ भी न था। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने उस शेर के सिर को अच्छी तरह टटोलना शुरू किया।

उस शेर के दाहिने कान की तरफ केवल एक उँगली जाने लायक छोटा-सा गढ़ा था। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने अपनी जेब में से एक चमकदार चीज निकाल कर उस गड़हे में फँसाने के बाद शेर के सामने वाला हथौड़ा जमीन से उठाकर उसी से वह चमकदार चीज (कील) एक ही चोट में ठोंक दी और इसके बाद तुरन्त ही दोनों भाई उस तहखाने के बाहर निकल आये।

वह चमकदार चीज, जो शेर के सिर में ठोंकी गई, क्या थी इसे आप लोग जानते होंगे। यह वही चमकदार चीज थी जो कुँअर इन्द्रजीतसिंह को बाग के उस तहखाने में एक पुतले के पेट में से मिली थी, जिसमें वे कुँअर आनन्दसिंह को खोजते हुए गये थे।

जब दोनों कुमार तहखाने के बाहर निकल आये, उसके थोड़ी ही देर बाद जमीन के अन्दर से धमधमाहट और घड़घड़ाहट की आवाज आने लगी, जिससे वे पाँचों कैदी बहुत ही ताज्जुब और घबराहट में आ गये। मगर कुमार ने उन्हें समझा कर शान्त किया और कुछ खाने-पीने की फिक्र में लगे। पहर भर बाद वह आवाज बन्द हुई और तब तक कुमार भी हर तरह से निश्चिन्त हो गये। दोपहर दिन ढलने बाद पाँचों कैदियों को साथ लिए हुए दोनों कुमार पुनः तहखाने के अन्दर उतरे। जब उस कमरे मे वहाँ शेर और चबूतरे का नाम-निशान भी न पाया, हाँ, उसके बदले में उस जगह एक गड़हा देखा जिसमें उतरने के लिए छ:-सात सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। कैदियों को भी साथ लिए और तिलिस्मी खंजर की रोशनी किए हुए दोनों कुमार इस सुरंग में घुसे और लगभग पचास कदम जाने के बाद पुनः एक कमरे में पहुँचे। यह कमरा भी पहले कमरे के बराबर था और इसके सामने की दीवार में पुनः आगे जाने के लिए एक सुरंग का मुहाना नजर आ रहा था अर्थात् इस कमरे को लाँघ कर पुनः आगे बढ़ जाने के लिए भी सामने की तरफ सुरंग दिखाई दे रही थी।

यह कमरा पहले की तरह खाली या सुनसान न था। इसमें तरह-तरह की बेशकीमत चीजों––हब, जवाहिरात और अशफियों––के जगह-जगह ढेर लगे हुए थे जिन्हें देखकर उन पाँचों कैदियों में से एक ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह से पूछा, "यह इतनी बड़ी रकम यहाँ किसके लिए रखी हुई है?"

इन्द्रजीतसिंह––यह सब दौलत हमारे लिए रखी हुई है, केवल इतनी ही नहीं, बल्कि इसी तरह और भी कई जगह इससे भी बढ़कर अच्छी-अच्छी और कीमती चीजें दिखाई देंगी।

कैदी––इन चीजों को आप क्योंकर बाहर निकालेंगे?

इन्द्रजीतसिंह––जब हम लोग तिलिस्म तोड़ते हुए चुनारगढ़ पहुँचेंगे, तब ये सब चीजें निकलवा ली जायेंगी।

कैदी––तब तक इसी तरह ज्यों-की-त्यों पड़ी रहेंगी?

इन्द्रजीतसिंह––हाँ।

इस कमरे में चारों तरफ की दीवारों के साथ तरह-तरह के बेशकीमत हर्बे लटक रहे थे, जिन पर इस खयाल से कि जंग इत्यादि लगकर खराब न हो जायें, का मोमी रोगन लगाया हुआ था। नीचे दो सन्दूक जड़ाऊ जेवरों से भरे हुए थे, जिनमें ताले लगे हुए न थे। इसके अतिरिक्त सोने के बहुत से जड़ाऊ खुशनुमा और नाजुक बर्तन भी दिखाई दे रहे थे।

इन चीजों को देख-भाल कर कुमार आगे बढ़े और सुरंग के दूसरे मुहाने में घुस कर दूर तक चले गये। अबकी दफे का सफर सीधा न था बल्कि घूमघुमौवा था। लगभग डेढ़ या दो कोस जाने के बाद पुनः एक कमरे में पहुँचे। पहले कमरे की तरह इसमें भी आमने-सामने दोनों तरफ सुरंगें बनी हुई थीं।

इस कमरे में सोने-चाँदी या जवाहरात की कोई चीज न थी, हाँ, दीवारों पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें लटक रही थी, जो एक किस्म के रोगनी कपड़े पर जिस पर सर्दी-गर्मी का असर नहीं पहुँच सकता था बनी हुई थीं। इन तस्वीरों में रोहतासगढ़ और चुनार की तस्वीरें ज्यादा थीं और तरह-तरह नक्शे भी जगह-जगह लटक रहे थे, जिन्हें बड़े गौर से दोनों कुमार देर तक देखते रहे।

इस कमरे की कैफियत को देखकर इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, "मालूम होता है, 'ब्रह्म-मण्डल' यही है, इसी जगह हम लोगों को बराबर आना पड़ेगा तथा चुनारगढ़ के तिलिस्म की चाबी भी इसी जगह से हमें मिलेगी।"

आनन्दसिंह––बेशक यही बात है, इस जगह के 'ब्रह्म-मण्डल' होने में कुछ भी सन्देह नहीं हो सकता।

इन्द्रजीतसिंह––फिर अब तुम्हारी क्या राय है? इस समय यहाँ कुछ काम किया जाय या नहीं? क्योंकि इस काम को हम लोग अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं।

आनन्दसिंह––मेरी राय में तो इस समय यहाँ कोई काम न करना चाहिए, क्यों कि (कैदियों की तरफ इशारा करके) इन लोगों को तकलीफ होगी, पहले इन लोगों को तिलिस्म के बाहर कर देना उचित होगा, फिर हम लोग यहाँ आकर अपना काम किया करेंगे।

इन्द्रजीतसिंह––मैं भी यही उचित समझता हूँ, इसके अतिरिक्त हम लोगों को यहाँ कई दफे आने की जरूरत पड़ेगी, अतः इस समय अगर यहाँ अटक कर कोई काम करेंगे तो बाहर निकलने में बहुत देर हो जायेगी और हम भी परेशान और दुःखी हो जायेंगे।

इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह आगे की तरफ बढ़े और सभी को लिए सामने वाली सुरंग में घुसे। अबकी दफे दोनों कुमारों और कैदियों को बहुत ज्यादा चलना पड़ा और साथ ही इसके भूख-प्यास की भी तकलीफ उठानी पड़ी। कई कोस का सफर करने के बाद जब वे लोग सुरंग के बाहर निकले, तो सुबह की सफेदी आसमान पर फैल चुकी थी, इसलिए दोनों कुमारों ने अन्दाज से समझा कि अबकी दफे हम लोग चौदह या पन्द्रह घंटे तक बराबर चलते रहे और जमानिया को बहुत दूर छोड़ आये।

सुरंग के बाहर निकलकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने जिस सरजमीन पर अपने को पाया वह बहुत ही दिलचस्प और सुहावनी घाटी थी। चारों तरफ कम ऊँची, सुन्दर और हरी-भरी पहाड़ियों के बीच में सरसब्ज मैदान था, जिसके बीच में बरसाती पानी से बचने के लिए एक स्थान भी बना हुआ था। इस सरजमीन को इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिह ने बहुत ही पसन्द किया और इन्द्रजीतसिंह ने उन कैदियों की तरफ देखकर कहा, "अब तुम लोग अपने को आजाद और तिलिस्मी कैदखाने से बाहर निकला हुआ समझो, थोड़ी देर में हम लोग तुम्हें इस घाटी से बाहर पहुँचा देंगे फिर जहाँ तुम लोगों की इच्छा हो, चले जाना।"

इसके जवाब में इन कैदियों ने हाथ जोड़कर कहा––"अब हम लोग इन चरणों को छोड़ नहीं सकते! यद्यपि अपने दुश्मनों से बदला लेने के लिए हम लोग बेताब हो रहे हैं परन्तु हमारी यह अभिलाषा भी आपकी कृपा के बिना पूरी नहीं हो सकती, अतः हम लोग आपके साथ-ही-साथ राजा वीरेन्द्रसिंह के दरबार में चलने की इच्छा रखते हैं।"

दोनों कुमारों ने उनकी प्रार्थना मंजूर कर ली और इसके बाद जो कुछ अनूठी कार्रवाई उन लोगों ने की, दूसरे दिन बयान करूँगा।

इतना कहकर नकाबपोश चुप हो गया और अपने घर जाने की इच्छा से राजा साहब का मुँह देखने लगा। यद्यपि महाराज इसके आगे भी इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का हाल सुनना चाहते थे, परन्तु इस समय नकाबपोशों को छुट्टी दे देना ही उचित जान कर घर जाने की इजाजत दे दी और दरबार बर्खास्त किया।

१०

अब देखना चाहिए कि देवीसिंह का साथ छोड़ के भूतनाथ ने क्या किया। भूतनाथ भी वास्तव में एक विचित्र ऐयार है। जिस तरह वह ऐयारी के फन में बड़ा ही तेज और होशियार है और जिस काम के पीछे पड़ जाता है उसे कुछ-न-कुछ सीधा किये बिना नहीं रहता, उसी तरह वह निडर भी परले सिरे का कहा जा सकता है। यद्यपि आज-कल उसे इस बात की धुन चढ़ी हुई है कि उसके दो-एक पुराने ऐब, जिनके सबब से उसकी ऐयारी में धब्बा लगता है, छिपे रह जायें और वह किसी-न-किसी तरह राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार बन जाय, मगर फिर भी ऐयारी के समय अपना काम निकालने की धुन में वह जान तक की परवाह नहीं करता। इस मौके पर भी उसने नकाबपोशों का पीछा करके जो कुछ किया उसके विषय में भी यही कहने की इच्छा होती है कि उसने अपनी जान को हथेली पर लेकर वह काम किया, जिसका हाल अब हम लिखते हैं।

संध्या होने में अभी घण्टे भर की देर है। उसी खोह के मुहाने पर जिसके अन्दर नकाबपोशों का मकान है या जिसमें भूतनाथ और देवीसिंह नकाबपोशों का पता लगाते हुए गए थे, हम दो नकाबपोशों को ढाल-तलवार लगाये, हाथ में हाथ दिये टहलते हुए देखते हैं। इन दोनों नकाबपोशों की पोशाक और नकाव साधारण थी और हाथ-पैर से भी ये दोनों दुबले-पतले और कमजोर मालूम पड़ते थे। हम नहीं कह सकते कि ये दोनों यहाँ कितनी देर से और किस फिक्र में घूम रहे हैं तथा आपस में किस ढंग की बातें कर रहे हैं, हाँ, इनके हाव-भाव से इस बात का पता जरूर लगता है कि ये दोनों किसी के आने का इन्तजार कर रहे हैं। ऐसे ही समय में अचानक एक आदमी इनके पास आकर खड़ा हो गया जो सुरत-शक्ल आदि से बिल्कुल उजड्ड और देहाती मालूम पड़ता था तथा जिसके हाथ-पैर तथा चेहरे पर गर्द रहने से यह भी जान पड़ता था कि यह कुछ दूर से सफर करता हुआ आ रहा है।

दोनों नकाबपोशों ने उसकी सूरत गौर से देखी और एक ने पूछा, "तू कौन है और क्या चाहता है?"

उस देहाती ने नकाबपोश की बात का कुछ जवाब न दिया और इशारे से बताया कि यहाँ से थोड़ी दूर पर कोई किसी को मार रहा है।

पुनः एक नकाबपोश ने पूछा, "क्या तू गूँगा है?"

इसका भी उसने कुछ जवाब न देकर फिर पहले की तरह इशारे से कुछ समझाया और अपने साथ आने के लिए कहा।

दोनों नकाबपोशों को विश्वास हो गया कि यह गूँगा-बहरा और साथ ही इसके उजड्ड तथा बेवकूफ भी है, अतः एक नकाबपोश ने अपने साथी से कहा, "इसके साथ जाकर देखो तो सही, क्या कहता है।"

दोनों नकाबपोश उसके साथ चलने के लिए तैयार हो गये और वह भी यह इशारा करके कि तुम्हें थोड़ी ही दूर चलना पड़ेगा, उन्हें अपने साथ लिए हुए पूरब की तरफ रवाना हुआ।

थोड़ी दूर जाने के बाद उस देहाती ने जमीन पर गिरे कई रुपये और दो-तीन जनाने जेवर नकाबपोशों को दिखाए जिससे इन्हें ताज्जुब हुआ और उन्होंने उस देहाती को जेवर और रुपये उठा लेने के लिए कहा, मगर उस देहाती ने ऐसा करने से इनकार किया और आगे चलने के लिए इशारा किया।

दोनों नकाबपोश भी जेवरों और रुपयो को उसी तरह छोड़ उस देहाती के पीछे-पीछे चलकर और आगे बढ़े तथा कुछ दूर चलने पर पुनः दो-तीन जेवर और एक कटा हुआ हाथ जमीन पर पड़ा देखा। ताज्जुब में आकर एक नकाबपोश ने दूसरे से कहा, "यह क्या मामला है? हमारे पड़ोस ही में कोई बुरी घटना हुई जान पड़ती है?"

दूसरा––रंग तो ऐसा ही मालूम पड़ता है!

पहला––यह कटा हाथ और जेवर भी किसी औरत के जान पड़ते हैं।

दूसरा––बेशक ये जेवर उसी के होंगे, इस बात का पता लगा कर अपने सरदार को इत्तिला देनी चाहिए।

ये बातें हो ही रही थीं कि आगे से किसी औरत के रोने की आवाज इन दोनों नकाबपोशों ने सुनी, जिससे ताज्जुब में आकर ये और आगे की तरफ बढ़े।

इसी तरह चलकर वे दोनों अपने स्थान से काफी दूर निकल गये और अन्त में एक औरत को जोर-जोर से रोते-चिल्लाते देखा। यह औरत साधारण न थी बल्कि किसी अमीर घर की मालूम पड़ती थी। इसके बदन में खूशबूदार फूलों के जेवर पड़े हुए थे और यह दोनों हाथ से अपना सिर पीट कर रो रही थी। इसके सामने एक दूसरी औरत की लाश पड़ी हुई थी और उसके बदन में भी खुशबूदार फूलों के जेवर पड़े हुए थे। उस लाश के बदन से खून बह रहा था और उसका एक हाथ कटा हुआ था।

थोड़ी देर तक ताज्जुब के साथ देखने के बाद एक नकाबपोश ने उस औरत से पूछा, "इसे किसने मारा और यह तेरी कौन है?" इसके जवाब में उस औरत ने अपने आँचल से आँसू पोंछ कर कहा, "मैं क्या बताऊँ कि किसने मारा! तुम्हारे किसी साथी ने मारा है, अब तुम मुझे भी मारकर छुट्टी करो जिससे बखेड़ा ही तय हो जाये।"

एक नकाबपोश––(ताज्जुब और क्रोध के साथ) क्या हम लोग ऐसे नामर्द और पतित हैं जो औरतों के खून से अपना हाथ रँगेंगे?

औरत––मैं तो यही सोचती हूँ, जब खुद मुझी पर बीत चुकी और वीत रही है, तब मैं और क्या कहूँ? शायद आप न हों, मगर आप ही की तरह पर्दे में मुँह छिपाने वालों ने इसे मारा है। चाहे वह मर्द हो या औरत मगर याद रहे कि इसका बदला लिए बिना न रहूँगी या इसके साथ अपनी भी जान दे दूँगी।

नकाबपोश––मगर यह तू कह किससे रही है और तुझे क्योंकर यकीन हो गया कि इसे हमारे साथियों ने मारा है?

औरत––तुम्हीं लोगों से कह रही हूँ और मुझे यह अच्छी तरह यकीन है कि इसे तुम्हारे साथियों ने मारा है!

नकाबपोश––(क्रोध से) क्या कहूँ, तू औरत है, तुझ पर हाथ छोड़ नहीं सकता, अगर कोई मर्द ऐसा बातें करता तो उसे ऐसी कहने का मजा चखा देता!

औरत––शायद मुझे धोखा हुआ हो मगर इसमें कोई शक नहीं कि जिसने इसे मारा है वह तुम्हारी ही तरह का था।

नकाबपोश––तू अपना और इसका हाल तो कह, शायद उससे कुछ पता लगे।

औरत––मैं इस जगह कुछ भी नहीं कहने की, अगर तुम उन लोगों में से नहीं हो जिन्होंने मुझे सताया है और असल मर्द हो, तो मुझे अपने सरदार के पास ले चलो, उसी जगह मैं सब हाल कहूँगी।

नकाबपोश––हमारे सरदार के पास तू नहीं जा सकती।

औरत––तो अब मुझे विश्वास हो गया जो कुछ किया सब तुम लोगों ने किया।

इसी तरह की बातें देर तक होती रहीं। यद्यपि वे दोनों नकाबपोश उस औरत को अपने सरदार के पास ले चलना या उसे अपना पता देना नहीं चाहते थे, मगर उस औरत ने ऐसी तीखी-तीखी बातें कहीं कि वे दोनों जोश में आ गए और उसे तथा उस लाश को उठाकर अपने खोह के मुहाने पर चलने के लिए तैयार हो गये। उन्होंने लाश उठाकर ले चलने में मदद करने के लिए उस गूँगे देहाती को इशारे में कहा, मगर उसने ऐसा करने से साफ इनकार किया बल्कि जब उन दोनों नकाबपोशों ने उसे डांटा तब वह डरकर वहाँ से भागा और कुछ दूर पर जाकर खड़ा हो गया।

फिर उन दोनों नकाबपोशों ने उस गूँगे से कुछ कहना उचित न जाना और जोश में आकर खुद लाश को उठाकर ले चलने के लिए तैयार हो गये, क्योंकि उन्हें इस बात का पूरा विश्वास था कि इस औरत की जुबानी जरूर कोई अनूठी बात सुनेंगे।

हम ऊपर बयान कर चुके हैं कि उस औरत की लाश भी फूलों के गहनों से भरी हुई थी, अब इतना और कह देना है कि उन फूलों पर बेहोशी की दवा इस ढंग पर छिड़की हुई थी कि कुछ मालूम नहीं होता था और खुशबू के सबब नकाबपोशों पर उसका कुछ असर हो चुका था मगर उन्हें इस बात का खयाल कुछ भी न था।

जब उन दोनों ने उस लाश को उठा लिया और फूलों की खुशबू को तेजी के साथ दिमाग में घुसने का मौका मिला, तब उन दोनों नकाबपोशों ने समझा कि हमारे साथ ऐयारी की गई। मगर अब कर ही क्या सकते थे? तुरत सिर में चक्कर आने लगा जिसके सबब से वे दोनों बैठ गये और साथ ही इसके बेहोश होकर जमीन पर लम्बे हो गये। उसी समय औरत की लाश भी चैतन्य हो गई और वह देहाती गूँगा भी उनकी खोपड़ी पर आ मौजूद हुआ। उस औरत ने देहाती गूँगे से कहा, "अब क्या करना चाहिए?"

देहाती––बस अब हमारा काम हो गया, अब इन्हें मालूम हो जायगा कि भूतनाथ कोई साधारण ऐयार नहीं है।

औरत––मगर अब भी आपको इस बात के सोचने का मौका है कि नकाबपोश लोग आपसे रंज न हो जायं और इस बखेड़े का नतीजा बुरा न निकले।

देहाती––इन बातों को मैं खूब सोच चुका हूँ। उन दोनों नकाबपोशों को जो हमारे राजा साहब के दरबार में जाया करते है मैं रंज होने का मौका नही दूँगा और इन दोनों में से केवल एक ही को उठा जाकर और उसी से अपना काम निकालूँगा।

इतना कह उस देहाती ने दोनों नकाबपोशों के चेहरे पर से नकाब उलट दी मगर असली सूरत पर निगाह पड़ते ही चौंक के उस औरत की तरफ देखकर कहा, "ओफ ओह, ये सूरतें तो वे ही हैं जिन्होंने दरबारे-आम में दारोगा और जैपाल को बदहवास कर दिया था। पहले दिन जब एक नकाबपोश ने अपने चेहरे पर से नकाब हटाई थी तो दारोगा के सिर में चक्कर आ गया था, और दूसरे दिन जब दूसरे नकाबपोश ने सूरत दिखाई तो जयपाल की जान शरीर से निकलने की तैयारी करने लगी थी।

इसी बीच में वह औरत भी उठकर हर तरह से दुरुस्त हो गई थी जिसे थोड़ी देर पहले दोनों नकाबपोश मुर्दा समझ कर उठा ले चले थे। असल में उसका हाथ कटा हुआ हाथ लगाकर दिखा दिया गया था।

ऊपर की बातचीत से हमारे पाठक समझ गये होंगे कि ये देहाती महाशय असल में भूतनाथ हैं और दोनों औरतें उसके नौजवान शागिर्द तथा मर्द हैं।

भूतनाथ की आखिरी बात सुनकर उसके एक शागिर्द, ने जो औरत की सूरत में था कहा, "क्या ये ही दोनों हमारे महाराज के दरबार में जाया करते हैं?"

भूतनाथ––दरबार में जब नकाबपोशों ने सूरत दिखाई थी तब दो दफे इन्हीं दोनों की सूरतें देखने में आई थीं, मगर मैं नहीं कह सकता कि वहाँ जाने वाले दोनौं नकाबपोश यही हैं। मेरा दिल तो यही गवाही देता है कि दोनों नकाबपोश कोई दूसरे हैं और जब दरबार में जाते हैं तो केवल नकाब ही डालकर नहीं बल्कि अपनी सूरतें भी बदल कर जाते हैं और उस दिन इन्हीं की सी सूरत बनाकर गये।

शागिर्द––बेशक ऐसा ही है।

भूतनाथ––खैर अब मैं इन दोनों में से एक को छोड़ न जाऊँगा जैसा कि पहले इरादा कर चुका था, बल्कि दोनों ही को उठकर ले जाऊँगा और असली भेद मालूम करके ही छोडूँगा।

इतना कह के भूतनाथ ने ऐयारी ढंग पर उन दोनों नकाबपोशों की गठरी बाँधी और तीनों आदमी मिलजुल कर उन्हें उठा ले गये।

११

नकाबपोशों के चले जाने के बाद जब केवल घर वाले ही वहाँ रह गये तब राजा वीरेन्द्रसिंह ने अपने पिता से तारासिंह की बाबत जो कुछ हाल हम ऊपर लिख आये हैं कुछ घटा-बढ़ाकर बयान किया और इसके बाद कहा, "तारासिंह नकाबपोशों के सामने ही लौटकर आ गया था जिससे अभी तक यह पूछने का मौका न मिला कि वह कहाँ गया था और वह तस्वीर उसे कहाँ से मिली थी जो उसने अपनी माँ को दी थी।

इतना कहकर वीरेन्द्रसिंह चुप हो गये और देवीसिंह ने वह कपड़े वाली तस्वीर (जो चम्पा ने दी थी) महाराज सुरेन्द्रसिंह के सामने रख दी। सुरेन्द्रसिंह ने बड़े गौर से उस तस्वीर को देखा और इसके बाद तारासिंह से पूछा––

सुरेन्द्रसिंह––निःसन्देह यह तस्वीर किसी अच्छे कारीगर के हाथ की बनी हुई है, यह तुम्हें कहाँ से मिली?

तारासिंह––मैं स्वयम् इस तस्वीर का हाल अर्ज करने वाला था, परन्तु इसके सम्बन्ध की कई ऐसी बातों को जानना आवश्यक था जिनके बिना इसका पूरा भेद मालूम नहीं हो सकता, अतएव मैं उन्हीं बातों के जानने की फिक्र में पड़ा हुआ था और इसी सबब से अभी तक कुछ अर्ज करने की नौबत नहीं आई।

तेजसिंह––तो क्या तुम्हें इसका पूरा-पूरा भेद मालूम हो गया?

तारासिंह––जी नहीं, मगर कुछ-कुछ जरूर मालूम हुआ है।

तेजसिंह––तो इस काम में तुमने अपने साथियों से मदद क्यों नहीं ली?

तारासिंह––अभी तक मदद की जरूरत नहीं पड़ी थी, मगर हाँ, अब उनकी मदद लेनी पड़ेगी!

वीरेन्द्रसिंह––खैर बताओ कि इस तस्वीर को तुमने क्योंकर पाया?

तारासिंह––(इधर-उधर देखकर) भूतनाथ की स्त्री से।

तारासिंह की इस बात को सुनकर सब कोई चौंक पड़े, खास कर देवीसिंह को तो बड़ा ही ताज्जुब हुआ और उसने हैरत की निगाह से अपने लड़के तारासिंह की तरफ देखकर पूछा––

देवीसिंह––भूतनाथ की स्त्री तुम्हें कहाँ मिली?

तारा––उसी जंगल में जिसमें आपने और भूतनाथ ने उसे देखा था, बल्कि उसी झोपड़ी में जिसमें भूतनाथ और आप उसके साथ गये थे और लाचार होकर लौट आये थे। आपको यह सुनकर ताज्जुब होगा कि वह वास्तव में भूतनाथ की स्त्री ही थी।

देवीसिंह––(आश्चर्य से) हैं, क्या वह वारतव में भूतनाथ की स्त्री थी?

तारासिंह––जी हाँ, आप और भूतनाथ नकाबपोशों के फेर में यद्यपि कई दिनों तक परेशान हुए परन्तु उतना हाल मालूम न कर सके जितना मैं जान आया हूँ।

इस समय दरबार में आपस वालों के सिवाय कोई गैर आदमी ऐसा न था जिसके सामने इस तरह की बातों के कहने-सुनने में किसी तरह का खयाल होता, अतएव बड़ी उत्कण्ठा के साथ सब कोई तारासिंह की बातें सुनने के लिए तैयार हो गये और देवीसिंह का तो कहना ही क्या जिनका दिल तूफान में पड़े हुए जहाज की तरह हिचकोले खा रहा था, उन्हें यकायक यह खयाल पैदा हुआ कि अगर वह वास्तव में भूतनाथ की स्त्री थी तो दूसरी औरत भी जरूर चम्पा ही रही होगी, जिसे नकाबपोशों के मकान में देखा गया था, अतः बड़े ताज्जुब के साथ अपने लड़के तारासिंह से पूछा, "क्या तुम बता सकते होकि जिन दो औरतों को हमने नकाबपोशों के मकान में देखा था वे कौन थीं?"

तारासिंह––उनमें से एक तो जरूर भूतनाथ की स्त्री थी मगर दूसरी के बारे में अभी तक कुछ पता नहीं लगा।

देवीसिंह––(कुछ सोच कर) दूसरी तुम्हारी माँ होगी?

तारासिंह––शायद ऐसा ही हो मगर विश्वास नहीं होता।

तेजसिंह––तुम्हें यह कैसे निश्चय हुआ कि वह वास्तव में भूतनाथ की स्त्री थी?

तारासिंह––उसने स्वयं भूतनाथ की स्त्री होना स्वीकार किया बल्कि और भी बहुत-सी बातें ऐसी कहीं जिससे किसी तरह का शक नहीं रहा।

देवीसिंह––और तुम्हें यह कैसे मालूम हुआ कि नकाबपोशों के घर में जाकर हम लोगों ने किसे देखा या जंगल में भूतनाथ की स्त्री हम लोगों को मिली थी और हमलोग उसके पीछे-पीछे एक झोंपड़ी में जाकर सूखे हाथ लौट आये थे?

तारासिंह––यह सब हाल मुझे बखूबी मालूम है क्योंकि उस समय मैं भी उसी जंगल में था जिस समय आपने भूतनाथ की स्त्री को देखा और उसके पीछे-पीछे गये थे। इस समय आप यह सुनकर और ताज्जुब करेंगे कि आपसे अलग होकर भूतनाथ ने उसी दिन अर्थात् कल संध्या के समय उन दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार कर लिया जिनकी सूरत यहाँ दरबार में देखकर दारोगा और जयपाल बदहवास हो गये थे। की

वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब से) हैं! मगर वे दोनों नकाबपोश तो आज भी यहाँ आये थे जिनका जिक्र तुम कर रहे हो।

तारासिंह––जी हाँ उन्हें तो मैं अपनी आँखों ही से देख चुका हूँ, मगर मेरे कहने का मतलब यह है कि भूतनाथ ने कल जिन दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार किया है उनकी सूरतें ठीक वैसी ही हैं जैसी दारोगा और जयपाल ने यहाँ देखी थीं, चाहे ये लोग हों कोई भी।

तेजसिंह––और भूतनाथ ने उन्हें गिरफ्तार कहाँ पर किया?

तारासिंह––उसी खोह के मुहाने पर उसने उन्हें धोखा दिया जिसमें नकाबपोश लोग रहते थे।

देवीसिंह––मालूम होता है कि हम लोगों की तरह तुम भी कई दिनों से नकाबपोशों की खोज में पड़े हो?

तारासिंह––खोज में नहीं, बल्कि फेर में।

वीरेन्द्रसिंह––खैर, तुम खुलासा तौर पर सब हाल बयान कर जाओ, इस तरह पूछने और कहने से काम नहीं चलेगा।

तारासिंह––जो आज्ञा, मगर मेरा हाल कुछ बहुत लम्बा-चौड़ा नहीं। केवल इलना ही कहना है कि मैं भी पाँच-सात दिन से उन दोनों नकाबपोशों के फैसले में पड़ा हूँ और इत्तिफाक से मैं भी उसी खोह के अन्दर जा पहुँचा था जिसमें वे लोग रहते हैं। (कुछ सोच और जीतसिंह की तरफ देखकर) अगर के अगर कोई हर्ज न हो ती दो घण्टे के बाद मुझसे मेरा हाल पूछा जाय।

जीतसिंह––(महाराज की तरफ देखकर और कुछ इशारा पाकर) खर कोई चिन्ता नहीं, मगर यह बताओ कि इस दो घण्टे के अन्दर तुम क्या काम करोगे?

तारासिंह––कुछ भी नहीं, मैं केवल अपनी माँ से मिल लूँगा और स्नान-ध्यान से छुट्टी पा लूँगा।

देवीसिंह––(धीरे से) आज-कल के लड़के भी कुछ विचित्र ही पैदा होते हैं, खास कर ऐयारों के।

इसके जवाब में तारासिंह ने अपने पिता की तरफ देखा और मुस्कुराकर सिर झुका लिया। यह बात देवीसिंह को कुछ बुरी मालूम हुई मगर बोलने का मौका न देखकर चुप रह गये।

तेजसिंह––(तारासिंह से) आज जब हम लोग तुम्हारे न मिलने से परेशान थे तो हमारी परेशानी को देखकर नकाबपोशों ने कहा था कि तारासिंह के लिए आपको तरद्दुद नहीं करना चाहिए, आशा है कि वह घण्टे-भर के अन्दर ही यहाँ आ पहुँचेगा। और वास्तव में हुआ भी ऐसा ही, तो क्या नकाबपोशों को तुम्हारा हाल मालूम था? यह बात नकाबपोशों से भी पूछी गई थी मगर उन्होंने कुछ जवाब न दिया और कहा कि 'इसका जवाब तारा ही देगा।'

तारासिंह––नकाबपोशों की सभी बातें ताज्जुब की होती हैं। मैं नहीं जानता कि उन्हें मेरा हाल क्योंकर मालूम हुआ।

तेजसिंह––क्या तुम्हें इस बात की खबर है कि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने तुम्हें और भैरोंसिंह को बुलाया है?

तारासिंह––जी नहीं।

तेजसिंह––(कुमार की चिट्ठी तारासिंह को दिखाकर) लो, इसे पढ़ो।

तारासिंह––(चिट्ठी पढ़कर) नकाबपोशों ही के हाथ यह चिट्ठी आई होगी?

तेजसिंह––हाँ, और उन्हीं नकाबपोशों के साथ तुम दोनों को जाना भी पड़ेगा।

तारासिंह––जब मर्जी होगी, हम दोनों चले जायेंगे।

इसके बाद महाराज की आज्ञानुसार दरबार बर्खास्त हुआ और सब कोई अपने-अपने ठिकाने चले गये। तारासिंह भी महल में अपनी माँ से मिलने के लिए चला गया और घण्टे भर से ज्यादा देर तक उसके पास बैठा बातचीत करता रहा, इसके बाद जब महल से बाहर आया तो सीधे जीतसिंह के डेरे में चला गया और जब मालूम हुआ कि वे महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास गये हुए हैं तो खुद भी महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास महल में ही चला गया।

हम नहीं कह सकते कि महाराज सुरेन्द्रसिंह, जीतसिंह और तारासिंह में देर तक क्या-क्या बातें होती रहीं, हाँ इसका नतीजा यह जरूर निकला कि तारासिंह को पुनः अपना हाल किसी से न कहना पड़ा, अर्थात् महाराज ने उसे अपना हाल बयान करने से माफी दे दी और तारसिंह को भी जो कुछ कहना-सुनना था, महाराज से ही कह-सुनकर छुट्टी पा ली। औरों को तो इस बात का ऐसा खयाल न हुआ, मगर देवीसिंह को यह चालाकी बुरी मालूम हुई और उन्हें निश्चय हो गया कि तारासिंह और चम्पा दोनों माँ-बेटे मिले हुए हैं और साथ ही इसके बड़े महाराज भी इस भेद को जानते हैं, मगर ताज्जुब है कि ऐयारों पर प्रकट नहीं करते। इसका कोई-न-कोई सबब जरूर है, और तब देवीसिंह की हिम्मत न पड़ी कि अपने लड़के को कुछ कहें या डाटें।

दो घण्टे रात जा चुकी थी जब महाराज सुरेन्द्रसिंह ने वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह को अपने पास बुलवाया। उस समय जीतसिंह पहले ही से महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास बैठे हुए थे, अतः जब दोनों आदमी वहाँ आ गये तो दो घण्टे तक तारासिंह के बारे में बातचीत होती रही और इसके बाद महाराज आराम करने के लिए पलंग पर चले गये। वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह अपने-अपने कमरे में चले आये।

१२

दूसरे दिन अपने मामूली समय पर पुनः दोनों नकाबपोशों के आने की इत्तिला मिली। उस समय जीतसिंह, वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह, राजा गोपालसिंह, बलभद्रसिंह, इन्द्रदेव और बद्रीनाथ वगैरह अपने यहाँ के कुछ ऐयार लोग भी महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास बैठे हुए थे और उन्हीं नकावपोशों के बारे में तरह-तरह की बातें हो रही थीं। आज्ञानुसार दोनों नकाबपोश हाजिर किए गए और फिर इस तरह बातचीत होने लगी––

तेजसिंह—(नकाबपोशों की तरफ देखकर) तारासिंह की जुबानी सुनने में आया कि भूतनाथ ने आपके दो आदमियों को ऐयारी करके गिरफ्तार कर लिया है।

एक नकाबपोश––जी हाँ, हम लोगों को भी इस बात की खबर लग चुकी है मगर कोई चिन्ता की बात नहीं है। गिरफ्तार होने और बेइज्जती उठाने पर भी वे दोनों भूतनाथ को किसी भी तरह की कोई नहीं तकलीफ न देंगे और न भूतनाथ ही उन्हें किसी तरह की तकलीफ दे सकेगा। यद्यपि उस समय भूतनाथ ने उन दोनों को नहीं पहचाना मगर जब उनका परिचय पायेगा और पहचानेगा तो उसे बड़ा ही ताज्जुब होगा। जो हो मगर भूतनाथ को ऐसा करने की जरूरत न थी। ताज्जुब है कि ऐसे फजूल के कामों में भूतनाथ का जी क्योंकर लगता है। ऐयारी करके जिस समय भूतनाथ ने दोनों को गिरफ्तार किया था उस समय उन दोनों की सूरत देखने के साथ ही छोड़ देना चाहिए था क्योंकि एक दफे भूतनाथ इस दरबार में उन दोनों सूरतों को देख चुका था और जानता था कि आखिर इन दोनों का हाल मालूम होगा ही। अब दोनों को गिरफ्तार करके ले जाने से भूतनाथ की बेचैनी कम न होगी बल्कि और ज्यादा बढ़ जायगी।

तेजसिंह––हाँ हम लोगों ने भी यही सुना था कि जिन सूरतों को देखकर मायारानी का दारोगा और जयपाल बदहवास हो गए थे उन्हीं दोनों को भूतनाथ ने गिरफ्तार किया है।

नकाबपोश––जी हाँ, ऐसा ही है।

तेजसिंह––तो क्या वे दोनों स्वयं इस दरबार में आये थे या आप लोगों ने उन दोनों के जैसी सूरत बनाई थी?

नकाबपोश––वे लोग स्वयं यहाँ नहीं आये थे, बल्कि हम ही दोनों उन दोनों की तरह सूरत बनाए हुए थे। दारोगा और जयपाल इस बात को समझ न सके।

तेजसिंह––असल में वे दोनों कौन हैं जिन्हें भूतनाथ ने गिरफ्तार किया है?

नकाबपोश––(कुछ सोचकर) आज नहीं अगर हो सकेगा तो दो-एक दिन में मैं आपकी इस बात का जवाब दूँगा क्योंकि इस समय हम लोग ज्यादा देर तक यहाँ ठहरना नहीं चाहते। इसके अतिरिक्त सम्भव है कि कल तक भूतनाथ भी उन दोनों को लिए हुए यहीं आ जाय। अगर वह अकेला ही आवे तो हुक्म दीजिएगा कि उन दोनों को भी यहाँ ले आवे, उस समय कम्बख्त दारोगा और जयपाल के सामने उन दोनों का हाल सुनने से आप लोगों को विशेष आनन्द मिलेगा। मैं भी...(कुछ रुककर) मौजूद ही रहूँगा, जो बात समझ में न आवेगी समझा दूंगा। (कुछ रुककर) हाँ, भैरोंसिंह और तारासिंह के विषय में क्या आज्ञा होती है? क्या आज वे दोनों हमारे साथ भेजे जायेंगे? क्योंकि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को उन दोनों के बिना सख्त तकलीफ है।

सुरेन्द्रसिंह––हाँ, भैरों और तारासिंह तुम दोनों के साथ जाने के लिए तैयार हैं।

इतना कहकर महाराज ने भैरोंसिंह और तारासिंह की तरफ देखा जो उसी दरबार में बैठे हुए नकाबपोशों की बातें सुन रहे थे। महाराज को अपनी तरफ देखते देख दोनों भाई उठ खड़े हुए और महाराज को सलाम करने के बाद दोनों नकाबपोशों के पास आकर बैठ गये।

नकाबपोश––(महाराज से) तो अब हम लोगों का आज्ञा मिलनी चाहिए।

सुरेन्द्रसिंह––क्या आज दोनों लड़कों का हाल हम लोगों को न सुनाओगे!

नकाबपोश––(हाथ जोड़कर) जी नहीं, क्योंकि देर हो जाने से आज भैरोंसिंह और तारासिंह को इन्द्रजीतसिंह के पास हम लोग पहुँचा न सकेंगे।

सुरेन्द्रसिंह––खैर, क्या हर्ज है, कल तो तुम लोगों का आना होगा ही?

नकाबपोश––अवश्य।

इतना कहकर दोनों नकाबपोश उठ खड़े हुए और सलाम करके बिदा हुए। भैरोंसिंह और तारासिंह भी उनके साथ रवाना हुए।

१३

रात घण्टे भर से कुछ ज्यादा जा चुकी है। पहाड़ के एक सुनसान दर्रे में जहाँ किसी आदमी का जाना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव जान पड़ता है, सात आदमी बैठे हुए किसी के आने का इन्तजार कर रहे हैं और उन लोगों के पास ही एक लालटेन जल रही है। यह स्थान चुनारगढ़ के तिलिस्मी मकान से लगभग छः-सात कोस की दूरी पर होगा। यह दो पहाड़ों के बीच वाला दर्रा बहुत बड़ा, पेचीला, ऊँचा-नीचा और ऐसा भयानक था कि साधारण मनुष्य एक सायत के लिए भी यहाँ खड़ा रहकर अपने उछलते और काँपते हुए कलेजे को सम्हाल नहीं सकता था। इस दर्रे में बहुत-सी गुफाएँ ऐसी हैं जिनमें सैकड़ों आदमी आराम से रह कर दुनियादारों की आँखों से, बल्कि वहम और गुमान से भी, अपने को छिपा सकते हैं, और इसी से समझ लेना चाहिए कि यहाँ ठहरने या बैठने वाला आदमी साधारण नहीं बल्कि जीवट और कड़े दिल का होगा।

ये सातों आदमी, जिन्हें हम बेफिक्री के साथ बैठे देखते हैं, भूतनाथ के साथी हैं और उसी की आज्ञानुसार ऐसे स्थान में अपना घर बनाये हुए पड़े हैं। इस समय भूतनाथ यहाँ आने वाला है, अतः ये लोग भी उसी का इन्तजार कर रहे हैं।

इसी समय भूतनाथ भी उन दोनों नकाबपोशों को, जिन्हें आज ही धोखा देकर गिरफ्तार किया था, लिये हुए आ पहुँचा। भूतनाथ को देखते ही वे लोग उठ खड़े हुए और बेहोश नकाबपोशों की गठरी उतारने में सहायता दी।

दोनों बेहोश जमीन पर सुला दिए गये और इसके बाद भूतनाथ ने अपने एक साथी की तरफ देखकर कहा, "थोड़ा पानी ले जाओ, मैं इन दोनों के चेहरे धोकर देखना चाहता हूँ।"

इतना सुनते ही एक आदमी दौड़ता हुआ चला गया और थोड़ी ही दूर पर एक गुफा के अन्दर घुसकर पानी का भरा हुआ लोटा लेकर चला आया। भूतनाथ ने बड़ी होशियारी से (जिसमें उनका कपड़ा भीगने न पावे) दोनों नकाबपोशों का चेहरा धोकर लालटेन की रोशनी में गौर से देखा मगर किसी तरह का फर्क न पाकर धीरे से कहा, "इन लोगों का चेहरा रँगा हुआ नहीं है।"

इसके बाद भूतनाथ ने उन दोनों को लखलखा सुँघाया जिससे वे तुरत ही होश में आकर उठ बैठे और घबराहट के साथ चारों तरफ देखने लगे। लालटेन की रोशनी में भूतनाथ के चेहरे पर निगाह पड़ते ही उन दोनों ने भूतनाथ को पहचान लिया और हँसकर उससे कहा, "बहुत खासे! तो ये सब जाल आप ही के रचे हुए थे?"

भूतनाथ––जी हाँ, मगर आप इस बात का खयाल भी अपने दिल में न लाइयेगा कि मैं आपको दुश्मनी की नीयत से पकड़ लाया हूँ।

एक नकाबपोश––(हँसकर) नहीं-नहीं, यह बात हम लोगों के दिल में नहीं आ सकती और न तुम हमें किसी तरह का नुकसान पहुँचा ही सकते हो, मगर मैं यह पूछता हूँ कि तुम्हें इस कार्रवाई के करने से फायदा क्या होगा?

भूतनाथ––आप लोगों से किसी तरह का फायदा उठाने की भी मेरी नीयत नहीं है। मैं तो केवल दो-चार बातों का जवाब पाकर ही अपनी दिलजमई कर लूँगा और इसके बाद आप लोगों को उसी ठिकाने पर पहुँचा दूँगा जहाँ से ले आया हूँ।

नकाबपोश––मगर तुम्हारा यह खयाल भी ठीक नहीं है क्योंकि तुम खुद समझ गये होगे कि हम लोग थोड़े ही दिनों के लिए अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए हैं और अपना भेद प्रकट होने नहीं देते, इसके बाद हम लोगों का भेद छिपा नहीं रहेगा, अतः इस बात को जानकर भी तुम्हें इतनी जल्दी क्यों पड़ी है और क्यों तुम्हारे पेट में चूहे कूद रहे हैं? क्या तुम नहीं जानते कि स्वयं महाराज सुरेन्द्रसिंह और राजा वीरेन्द्रसिंह हम लोगों का भेद जानने के लिए बेताब हो रहे थे, मगर कई बातों पर ध्यान देकर हम लोगों ने अपना भेद खोलने से इनकार कर दिया और कह दिया कि कुछ दिन सन्न कीजिए फिर आपसे आप हम लोगों का भेद खुल जायगा, फिर तुम क्या चीज हो जो तुम्हारे कहने से हम लोग अपना भेद खोल देंगे?

नकाबपोश की बेरुखी मिली हुई बातें सुनकर यद्यपि भूतनाथ को क्रोध चढ़ आया, मगर क्रोध करने का मौका न देख वह चुप रह गया और नरमी के साथ फि बातचीत करने लगा।

भूतनाथ––आपका कहना ठीक है, मैं इस बात को खूब जानता हूँ, मगर मैं उन भेदों को खुलवाना नहीं चाहता जिन्हें हमारे महाराज जानना चाहते है, मैं तो केवल दो-चार मामूली बातें आप लोगों से पूछना चाहता हूँ जिनका उत्तर देने में न तो आप लोगों का भेद ही खुलता है और न आप लोगों का कोई हर्ज ही होगा। इसके अतिरिक्त मैं वादा करता हूँ कि मेरी बातों का जो कुछ आप जवाब देंगे, उसे मैं किसी दूसरे पर तब तक प्रकट न करूँगा जब तक आप लोग अपना भेद न खोलेंगे।

नकाबपोश––(कुछ सोचकर) अच्छा पूछो, क्या पूछते हो?

भूतनाथ––पहली बात मैं यह पूछता हूँ कि देवीसिंह के साथ मैं आप लोगों के मकान में गया था, यह बात आपको मालूम है या नहीं?

नकाबपोश––हाँ, मालूम है।

भूतनाथ––खैर, और दूसरी बात यह है कि वहाँ मैंने अपने लड़के हरनामसिंह को देखा, क्या वह वास्तव में हरनामसिंह ही था।

नकाबपोश––(कुछ क्रोध की निगाह से भूतनाथ को देखकर) हाँ, था तो सही, फिर?

भूतनाथ––(लापरवाही के साथ) कुछ नहीं, मैं केवल अपना शक ही मिटाना चाहता था। अच्छा अब तीसरी बात यह जानना चाहता हूँ कि वहाँ देवीसिंह ने और मैंने अपनीअपनी स्त्रियों को देखा था, क्या वे दोनों वास्तव में हम दोनों की स्त्रियाँ थीं या कोई और?

नकाबपोश––चम्पा के बारे में पूछने वाले तुम कौन हो? हाँ अपनी स्त्री के बारे में पूछ सकते हो, सो मैं साफ कह देता हूँ कि वह बेशक तुम्हारी स्त्री 'रामदेई' थी।

यह जवाब सुनते ही भूतनाथ चौंका और उसके चेहरे पर क्रोध और ताज्जुब की निशानी दिखाई देने लगी। भूतनाथ को निश्चय था कि उसकी स्त्री का असली नाम 'रामदेई' किसी को मालूम नहीं है, मगर इस समय एक अनजान आदमी के मुँह से उसका नाम सुनकर भूतनाथ को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और इस बात पर उसे क्रोध भी चढ़ आया कि मेरी स्त्री इन लोगों के पास क्यों आई, क्योंकि वह एक ऐसे स्थान पर थी जहाँ उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई जा नहीं सकता था, ऐसी अवस्था में निश्चय है कि वह अपनी खुशी से बाहर निकली और इन लोगों के पास आई। केवल इतना ही नहीं, उसे इस बात के खयाल से और भी रंज हुआ कि मुलाकात होने पर भी उसकी स्त्री ने उससे अपने को छिपाया बल्कि एक तौर पर धोखा देकर बेवकूफ बनाया-आदि इसी तरह की बातों को परेशानी और रंज के साथ भूतनाथ सोचने लगा।

नकाबपोश––अब जो कुछ पूछना था पूछ चुके या अभी कुछ बाकी है?

भूतनाथ––हाँ, अभी कुछ और पूछना है।

नकाबपोश––तो जल्दी से पूछते क्यों नहीं, सोचने क्या लग गये?

भूतनाथ––अब यह पूछना है कि मेरी स्त्री आप लोगों के पास कैसे आई और वह खुद आप लोगों के पास आई या उसके साथ जबर्दस्ती की गई?

नकाबपोश––अब तुम दूसरी राह चले, इस बात का जवाब हम लोग नहीं दे सकते।

भूतनाथ––आखिर इसका जवाब देने में हर्ज ही क्या है?

नकाबपोश––हो या न हो, मगर हमारी खुशी भी तो कोई चीज है।

भूतनाथ––(क्रोध में आकर) ऐसी खुशी से काम नहीं चलेगा, आपको मेरी बातों का जवाब देना ही पड़ेगा?

नकाबपोश––(हँसकर) मानो आप हम लोगों पर हुकूमत कर रहे हैं और जबर्दस्ती पूछ लेने का दावा रखते हैं?

भूतनाथ––क्यों नहीं, आखिर आप लोग इस समय मेरे कब्जे में हैं।

इतना सुनते ही नकाबपोश को भी क्रोध चढ़ आया और उसने तीखी आवाज में कहा, "इस भरोसे न रहना कि हम लोग तुम्हारे कब्जे में हैं, अगर अब तक नहीं समझते थे तो अब समझ रक्खो कि उस आदमी का तुम कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते जो अपने हाथों से तुम्हारे छिपे हुए ऐबों की तस्वीर बनाने वाला है। हाँ-हाँ, बेशक तुमने वह तस्वीर भी हमारे मकान में देखी होगी, अगर सचमुच अपने लड़के हरनामसिंह को उस दिन देख लिया है तो।"

यह एक ऐसी बात थी जिसने भूतनाथ के होशहवास दुरुस्त कर दिये। अब तक जिस जोश और दिमाग के साथ वह बैठा बातें कर रहा था वह बिल्कुल जाता रहा और घबराहट तथा परेशानी ने उसे अपना शिकार बना लिया। वह उठकर खड़ा हो गया और बेचैनी के साथ इधर-उधर टहलने लगा। बड़ी मुश्किल से कुछ देर में उसने अपने को सम्हाला और तब नकाबपोश की तरफ देखकर पूछा, "क्या वह तस्वीर आपके हाथ की बनाई हुई थी?"

नकाबपोश––बेशक!

भूतनाथ––तो आप ही ने उस आदमी को वह तस्वीर दी भी होगी जो मुझ उस तस्वीर की बाबत दावा करने के लिए कहता था!

नकाबपोश––इस बात का जबाब नहीं दिया जायगा।

भूतनाथ––तो क्या आप मेरे उन भेदों को दरबार में खोलना चाहते हैं?

नकाबपोश––अभी तक तो ऐसा करने का इरादा नहीं था मगर अब जैसा मुनासिब समझा जायगा, वैसा किया जायगा।

भूतनाथ––उन भेदों को आपके अतिरिक्त आपकी मण्डली में और भी कोई जानता है?

नकाबपोश––इसका जवाब देना भी उचित नहीं जान पड़ता।

भूतनाथ––आप बड़ी जबर्दस्ती करते हैं!

नकाबपोश––जबर्दस्ती करने वाले तो तुम थे, मगर अब क्या हो गया?

भूतनाथ––(तेजी के साथ) मुमकिन है कि मैं अब भी जबर्दस्ती का बर्ताव करूँ। कोई क्या जान सकता है कि तुम लोगों को कौन उठा ले गया?

नकाबपोश––(हँसकर) ठीक है, तुम समझते हो कि यह बात किसी को मालूम न होगी कि हम लोगों को भूतनाथ उठा ले गया है।

भूतनाथ––(जोर देकर) ऐसा ही है, इसके विपरीत भी क्या कोई समझा सकता?

इतने ही में थोड़ी दूर पर से यह आवाज आई, "हाँ, समझा सकता है वौर विश्वास दिला सकता है कि यह बात छिपी हुई नहीं है।"

अब तो भूतनाथ की कुछ विचित्र ही हालत हो गई। वह घबराकर उस तरफ देखने लगा जिधर से एक आवाज आई थी और फुर्ती के साथ अपने आदमियों से बोला, "पकड़ो! जाने न पाये!"

भूतनाथ के आदमी तेजी के साथ उस बोलने वाले की खोज में दौड़ गये, मगर नतीजा कुछ भी न निकला अर्थात् वह आदमी गिरफ्तार न हुआ और भागकर निकल गया। यह हाल देख दोनों नकाबपोशों ने खिलखिला कर हँस दिया और कहा, "क्यों, अब तुम अपनी क्या राय कायम करते हो?"

भूतनाथ––हाँ, मुझे विश्वास हो गया कि आपका यहाँ रहना छिपा नहीं रहा, अथवा हमारे पीछे आपका कोई आदमी यहाँ तक जरूर आया है। इसमें कोई शक नहीं कि आप लोग अपने काम में पक्के हैं कच्चे नहीं। मगर ऐयारी के फन में मैंने आपको दवा लिया।

नकाबपोश––यह दूसरी बात है, तुम ऐयार हो और हम लोग ऐयारी नहीं जानते, मगर इतना होने पर भी तुम हमारे लिए दिन-रात परेशान रहते हो और कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ता। मगर भूतनाथ, हम तुमसे फिर भी यही कहते हैं कि हम लोगों के फेर में न पड़ो और कुछ दिन सब तो करो, फिर आप से आप तुम्हें हम लोगों का हाल मालूम हो जायगा। ताज्जुब है कि तुम इतने बड़े ऐयार होकर जल्दबाजी के साथ ऐसी ओछी कार्रवाई करके खुदबखुद अपना काम बिगाड़ने की कोशिश करते हो! उस दिन दरबार में तुम देख चुके हो और जान भी चुके हो कि हम लोग तुम्हारी तरफदारी करते हैं, तुम्हारे ऐबों को छिपाते हैं, और तुम्हें एक विचित्र ढंग से माफी दिलाकर खास महाराज का कृपापात्र बनाना चाहते हैं, फिर क्या सबब है कि तुम हम लोगों का पीछा करके खामखाह हमारा क्रोध बढ़ा रहे हो?

भूतनाथ––(गुस्से को दबाकर नर्मी के साथ) नहीं-नहीं, आप इस बात का गुमान भी न कीजिए कि मैं आप लोगों को दुःख देना चाहता हूँ और···

नकाबपोश––(बात काट के लापरवाही के साथ) दुःख देने की बात मैं नहीं कहता क्योंकि तुम हम लोगों को दुःख दे ही नहीं सकते।

भूतनाथ––खैर, न सही। मगर मैं अपने दिल की बात कहता हूँ कि किसी बुरे इरादे से मैं आप लोगों का पीछा नहीं करता, क्योंकि मुझे इस बात का निश्चय हो चुका है कि आप लोग मेरे सहायक है। मगर क्या करूँ, अपनी स्त्री को आपके मकान में देखकर हैरान हूँ और मेरे दिल के अन्दर तरह-तरह की बातें पैदा हो रही हैं। आज मैं इसी इरादे से आप लोगों को यहाँ ले आया था कि जिस तरह हो सके, अपनी स्त्री का असल भेद मालूम कर लूँ।

नकाबपोश––'जिस तरह हो सके' के क्या मानी? हम कह चुके हैं कि तुम हमें किसी तरह की तकलीफ नहीं पहुंचा सकते और न डरा-धमका कर ही कुछ पूछ सकते हो, क्योंकि हम लोग बड़े ही जबर्दस्त हैं।

भूतनाथ––अब इतनी ज्यादा शेखी तो न बघारिये, क्या आप ऐसे मजबूत हो गये कि हमारा हाथ कोई काम कर ही नहीं सकता!

नकाबपोश––हमारे कहने का मतलब यह नहीं है, बल्कि यह है कि ऐसा करने से तुम्हें कोई फायदा नहीं हो सकता, क्योंकि हमारे संगी-साथी सभी कोई तुम्हारे भेदों को जानते हैं, मगर तुम्हें नुकसान पहुँचाना नहीं चाहते। हमारी ही तरफ ध्यान देकर देख लो कि तुम्हारे हाथों दुःखी होकर भी तुम्हें दुःख देना नहीं चाहते और जो कुछ तुम कर चुके हो, उसे सहकर बैठे हैं!

भूतनाथ––हमने आपको क्या दुःख दिया है?

नकाबपोश––अगर हम इस बात का कुछ जवाब देंगे तो तुम औरों को तो नहीं, मगर हमें पहचान जाओगे।

भूतनाथ––अगर आपको पहचान भी जाऊँगा तो क्या हर्ज है? मैं फिर प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ जब तक आप स्वयं अपना भेद न खोलेंगे, तब तक मैं अपने मुँह से कुछ भी किसी के सामने न कहूँगा, आप इसका निश्चय रखिये।

नकाबपोश––(कुछ सोचकर) मगर हमारा जवाब सुनकर तुम्हें गुस्सा और चढ़ आवेगा और ताज्जुब नहीं कि खंजर का वार कर बैठो।

भूतनाथ––नहीं-नहीं, कदापि नहीं, क्योंकि मुझे अब निश्चय हो गया कि आपका यहाँ आना छिपा नहीं है, अगर मैं आपके साथ कोई बुरा बर्ताव करूँगा तो किसी लायक न रहूँगा।

नकाबपोश––हाँ, यह ठीक है और बेशक बात भी ऐसी ही है।(कुछ सोचकर) अच्छा तो अब तुम्हारी उस बात का जवाब देते हैं, सुनो और अपने कलेजे को अच्छी तरह सम्हालो।

भूतनाथ––कहिये, मैं हर तरह से सुनने के लिए तैयार हूँ।

नकाबपोश––उस पीतल वाली सन्दूकड़ी में, जिसके खुलने से तुम डरते हो, जो कुछ है, वह हमारे ही शरीर का खून है, उसे तुम हमारे ही सामने से उठा ले गये थे, और हमारा ही नाम 'दलीपशाह' है।

यह एक ऐसी बात थी कि जिसके सुनने की उम्मीद भूतनाथ को नहीं हो सकती थी और न भूतनाथ में इतनी ताकत थी कि ये बातें सुनकर भी अपने को सम्हाले रहता, उसका चेहरा एकदम जर्द पड़ गया, कलेजा भी धड़कने लगा, हाथ-पैर में कंपकँपी होने लगी, और वह सकते की सी हालत में ताज्जुब के साथ नकाबपोश के चेहरे पर गौर करने लगा।

नकाबपोश––तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास हुआ या नहीं?

भूतनाथ––नहीं, तुम दलीपशाह कदापि नहीं हो सकते! यद्यपि मैंने दलीपशाह की सूरत नहीं देखी है, मगर मैं उसके पहचानने में गलती नहीं कर सकता और न इसी बात की उम्मीद हो सकती है कि दलीपशाह मुझे माफ कर देगा या मेरे साथ दोस्ती का बर्ताव करेगा।

नकाबपोश––तो मुझे दलीपशाह होने के लिए कुछ और भी सबूत देना पड़ेगा और उस भयानक रात की ओर इशारा करना पड़ेगा जिस रात को तुमने वह कार्रवाई की थी, जिस रात को घटाटोप अँधेरी छाई हुई थी, बादल गरज रहे थे, तो बार-बार बिजली चमककर औरतों के कलेजों को दहला रही थी, बल्कि उसी समय एक दफे बिजली तेजी के साथ चमक कर पास ही वाले खजूर के पेड़ पर गिरी थी, और तुम स्याह कम्बल की धोंघी लगाये आम की बारी में घुसकर यकायक गायब हो गये थे। कहो, कुछ और भी परिचय दूँ या बस!

भूयनाथ––(काँपती हुई आवाज में) बस-बस, मैं ऐसी बातें सुनना नहीं चाहता। (कुछ रुककर) मगर मेरा दिल यही कह रहा है कि तुम दलीपशाह नहीं हो।

नकाबपोश––हाँ! तब तो मुझे कुछ और भी कहना पड़ेगा। जिस समय तुम घर के अन्दर घुसे थे, तुम्हारे हाथ में स्याह कपड़े का एक बहुत बड़ा लिफाफा था, जब मैंने तुम पर खंजर का वार किया, तब वह लिफाफा तुम्हारे हाथ से गिर पड़ा और मैंने उठा लिया, जो अभी तक मेरे पास मौजूद है, अगर तुम चाहो तो मैं दिखा सकता हूँ।

भूतनाथ––(जिसका बदन डर के मारे काँप रहा था) बस-बस-बस, मैं तुम्हें कह चुका हूँ और फिर कहता हूँ कि ऐसी बातें सुनना नहीं चाहता और न इसके सुनने से मुझे विश्वास ही हो सकता है कि तुम दलीपशाह हो। मुझ पर दया करो और अपनी चलती-फिरती जुबान रोको!

नकाबपोश––अगर विश्वास नहीं हो सका हो तो मैं कुछ और भी कहूँगा और अगर तुम न सुनोगे तो अपने साथी को सुनाऊँगा। (अपने साथी नकाबपोश की तरफ देख के) मैं उस समय अपनी चारपाई के पास बैठा कुछ लिख रहा था जब यह भूतनाथ मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। कम्बल की घोंघी एक क्षण के लिए इसके आगे की तरफ हट गई थी और इसके कपड़े पर पड़े हुए खून के छींटे दिखाई दे रहे थे। यद्यपि मेरी तरह इसके चेहरे पर भी नकाब पड़ी हुई थी, मगर मैं ख ब समझता था कि यह भूतनाथ है। मैं उठ खड़ा हुआ और फुरती के साथ इसके चेहरे पर से नकाब हटाकर इसकी सूरत देख ली। उस समय इसके चेहरे पर भी खून के छींटे पड़े हुए दिखाई दिए। भूतनाथ ने मुझे डाटकर कहा कि 'तुम हट जाओ और मुझे अपना काम करने दो'। तब तक मुझे इस बात की कुछ भी खबर न थी कि यह मेरे पास क्यों आया है और क्या चाहता है। जब मैंने पूछा कि 'तुम क्या करना चाहते हो और मैं यहाँ से क्यों हट जाऊँ तब इसने मुझ पर खंजर का वार किया, क्योंकि यह उस समय बिल्कुल पागल हो रहा था और मालूम होता था कि इस समय अपने-पराये को पहचान नहीं सकता···

भूतनाथ––(बात काटकर) ओफ, बस करो। वास्तव में उस समय मुझमें अपने पराये को पहचानने की ताकत न थी, मैं अपनी गरज में मतवाला और साथ ही इसके अन्धा भी हो रहा था!

नकाबपोश––हाँ-हाँ, सो तो मैं खुद ही कह रहा हूँ, क्योंकि तुमने उस समय अपने प्यारे लड़के को कुछ भी नहीं पहचाना और रुपये के लालच ने तुम्हें मायारानी के तिलिस्मी दारोगा का हुक्म मानने पर मजबूर किया। (अपने साथी नकाबपोश की तरफ देखकर) उस समय इसकी स्त्री अर्थात् कमला की माँ इससे रंज होकर मेरे ही घर में आई और छिपी हुई थी और जिस चारपाई के पास मैं बैठा हुआ लिख रहा था, उसी पर उसका छोटा बच्चा अर्थात् कमला का छोटा भाई सो रहा था, उसकी माँ अन्दर के दालान में भोजन कर रही थी और उसके पास उसकी बहिन अर्थात् भूतनाथ की साली भी बैठी हुई अपने दुःख-दर्द की कहानी के साथ ही इसकी शिकायत भी कर रही थी, उसका छोटा बच्चा उसकी गोद में था, मगर भूतनाथ···

भूतनाथ––(बात काटता हुआ) ओफ-ओफ! बस करो, मैं सुनना नहीं चाहता, तु-तु-तु तुम में···

इतना कहता हुआ भूतनाथ पागलों की तरह इधर-उधर घूमने लगा और फिर एक चक्कर खाकर जमीन पर गिरने के साथ ही बेहोश हो गया।

१४

भूतनाथ के बेहोश हो जाने पर दोनों नकाबपोशों ने भूतनाथ के साथियों में से एक को पानी लाने के लिए कहा और जब वह पानी ले आया तो उस नकाबपोश ने जिसने अपने को दलीपशाह बताया था, अपने हाथ से भूतनाथ को होश में लाने का उद्योग किया। थोड़ी ही देर में भूतनाथ चैतन्य हो गया और नकाबपोश की तरफ देखकर बोला, "मुझसे बड़ी भारी भूल हुई जो आप दोनों को फंसाकर यहाँ ले आया हूँ! आज मेरी हिम्मत बिलकुल टूट गई और मुझे निश्चय हो गया कि अब मेरी मुराद पूरी नहीं हो सकती और मुझे लाचार होकर अपनी जान देनी पड़ेगी।"

नकाबपोश––नहीं-नहीं भूतनाथ, तुम ऐसा मत सोचो, देखो हम कह चुके हैं और तुम्हें मालूम भी हो चुका है कि हम लोग तुम्हारे ऐबों को खोलना नहीं चाहते, बल्कि राजा वीरेन्द्रसिंह से तुम्हें माफो दिलाने का बन्दोबस्त कर रहे हैं। फिर तुम इस तरह हताश क्यों होते हो? होश करो और अपने को सम्हालो।

भूतनाथ––ठीक है, मुझे इस बात की आशा हो चली थी कि मेरे ऐब छिपे रह जायेंगे और मैं इसका बन्दोबस्त भी कर चुका था कि वह पीतल वाली सन्दूकड़ी खोली न जाय, मगर अब वह उम्मीद कायम नहीं रह सकती, क्योंकि मैं अपने दुश्मन को अपने सामने मौजूद पाता हूँ।

नकाबपोश––बड़े ताज्जुब की बात है कि दरबार में हम लोगों को कैफियत देख सुनकर भी तुम हमें अपना दुश्मन समझते हो! यदि तुम्हें मेरी बातों का विश्वास न हो तो मैं तुम्हें इजाजत देता हूँ कि खुशी से मेरा सिर काटकर पूरी दिलजमई कर लो और अपना शक भी मिटा लो। तब तो तुम्हें अपने भेदों के खुलने का भय न रहेगा?

भूतनाथ––(ताज्जुब से नकाबपोश की सूरत देखकर) दलीपशाह, वास्तव में तुम बड़े ही दिलावर, शेर-मर्द, रहमदिल और नेक आदमी हो। क्या सचमुच तुम मेरे कुसूरों को माफ करते हो?

नकाबपोश––हाँ-हाँ, मैं सच कहता हूँ कि मैंने तुम्हारे कसूरों को माफ कर दिया, बल्कि दो रईसों के सामने इस बात की कसम खा चुका हूँ।

भूतनाथ––वे दोनों रईस कौन हैं?

नकाबपोश––जिनके कब्जे में इस समय हम लोग हैं और जो नित्य महाराज साहब के दरबार में जाया करते हैं।

भूतनाथ––क्या राजा साहब के दरबार में जाने वाले नकाबपोश कोई दूसरे हैं आप नहीं, या उस दिन दरबार में आप नहीं थे जिस दिन आपकी सूरत देखकर जयपाल घबराया था?

नकाबपोश––हाँ, बेशक वे नकाबपोश दूसरे हैं और समय-समय पर नकाब डालने के अतिरिक्त सूरतें भी बदलकर जाया करते हैं। उस दिन वे हमारी सूरत बनकर दरबार में गये थे।

भूतनाथ––वे दोनों कौन हैं?

नकाबपोश––यही तो एक बात है जिसे हम लोग खोल नहीं सकते, मगर तुम घबराते क्यों हो? जिस दिन उनकी असली सूरत देखोगे खुश हो जाओगे। तुम ही नहीं, ल्कि कुल दरबारियों को और महाराजा साहब को भी खुशी होगी, क्योंकि वे दोनों नकाबपोश कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं।

भूतनाथ––मेरे इस भेद को वे दोनों जानते हैं या नहीं?

नकाबपोश––फिर तुम उसी तरह की बातें पूछने लगे।

भूतनाथ––अच्छा अब न पूछूँगा, मगर अंदाज से मालूम होता है कि जब आप उनके सामने भेद छिपाने की कसम खा चुके हैं तो वे इस भेद को जानते जरूर होंगे। खैर, जब आप कहते ही हैं कि मेरा भेद छिपा रह जायगा तो मुझे घबराना न चाहिए। मगर मैं फिर भी यही कहूंगा कि आप दलीपशाह नहीं हैं।

नकाबपोश––(खिलखिलाकर हँसने के बाद)तब तो फिर मुझे कुछ और कहना पड़ेगा। वाह, तुम्हारी स्त्री बड़ी ही नेक थी, जो कुछ तुमने उसके सामने किया

भूतनाथ––(नकाबपोश के मुँह पर हाथ रखकर) बस-बस-बस, मैं कुछ भी नहीं सुनना चाहता! यह कैसी माफी है कि आप अपनी जुबान नहीं रोकते! इतने ही में पत्थरों की आड़ में से एक आदमी निकलकर बाहर आया और यह कहता हुआ भूतनाथ के सामने खड़ा हो गया, "तुम उन्हें भले ही रोक दो। मगर मैं उन बातों की वाद दिलाये बिना नहीं रह सकता!"

हम नहीं कह सकते कि इस नये आदमी को यहाँ पर आये कितनी देर हुई या यह कब से पत्थरों की आड़ में छिपा हुआ इन दोनों की बातें सुन रहा था, मगर भूतनाथ उसे यकायक अपने सामने देखकर चौंक पड़ा और घबराहट तथा परेशानी के साथ उसकी सूरत देखने लगा। यह देखकर उस आदमी ने जानबूझकर रोशनी के सामने अपनी सूरत कर दी जिसमें पहचानने के लिए भूतनाथ को तकलीफ न करनी पड़े।

यह वही आदमी था जिसे भूतनाथ ने नकाबपोशों के मकान में सूराख के अन्दर से झाँक कर देखा था और जिसने नकाबपोशों के सामने एक बड़ी-सी तस्वीर पेश करके कहा था कि "कृपानाथ, बस मैं इसी का दावा भूतनाथ पर करूँगा।"

इस आदमी को देख कर भूतनाथ पहले से भी ज्यादा घबरा गया। उसके बदन का खून बर्फ की तरह जम गया और उसमें हाथ-पैर हिलाने की ताकत बिल्कुल न रही। उस आदमी ने पुनः कड़क कर भूतनाथ से कहा, "ये नकाबपोश साहब तुम्हारी बात मान कर चाहे चुप रह जायँ, मगर मैं उन बातों को अच्छी तरह याद दिलाए बिना न रहूँगा जिन्हें सुनने की ताकत तुममें नहीं है। अगर तुम इनको दलीपशाह नहीं मानते हो तो मुझे दलीपशाह मानने में तुम्हें कोई उज्र भी न होगा।"

भूतनाथ यद्यपि आश्चर्यमय घटनाओं का शिकार हो रहा था और एक तौर पर खौफ, तरद्दुद, परेशानी और नाउम्मीदी ने उसे चारों तरफ से आकर घेर लिया था, मगर फिर भी उसने कोशिश करके अपने होश-हवास दुरुस्त किये और उस नए आये दलीपशाह की तरफ देख कर कहा, "बहुत खासे! एक दलीपशाह ने तो परेशान कर ही रखा था, अब आप दूसरे दलीपशाह भी आ पहुँचे, थोड़ी देर में कोई तीसरे दलीपशाह भी आ जायेंगे, फिर मैं काहे को किसी से दो बातें कर सकूँगा। (पुराने दलीपशाह की तरफ देख कर) अब बताइये, दलीपशाह आप हैं या ये?"

पुराना दलीपशाह––तुम इतने ही में घबरा गये! हमारे यहाँ जितने भी नकाबपोश हैं, सभी अपना नाम दलीपशाह बताने के लिए तैयार होंगे, मगर तुम्हें अपनी अक्ल से पहचानना चाहिए कि वास्तव में दलीपशाह कौन है।

भूतनाथ––इस कहने का मतलब तो यही है कि आप लोग सच नहीं बोलते?

पुराना दलीपशाह––जो बातें हमने तुमसे कहीं, क्या वे झूठ हैं?

नया दलीपशाह––या मैं जो कुछ कहूँगा वह झूठ होगा! अच्छा सुनो, मैं एक दिन का जिक्र करता हूँ। जब तुम ठीक दोपहर के समय उसी पीतल वाली सन्दूकड़ी को बगल में छिपाये रोहतासगढ़ की तरफ भागे जा रहे थे। जब तुम्हें प्यास लगी तब तुम एक ऊँची जगत वाले कुएँ पर पानी पीने के लिए ठहर गये जिस पर एक पुराने नीम के पेड़ की सुन्दर छाया पड़ रही थी। कुएँ की जगत में नीचे की तरफ एक खुली कोठरी थी और उसमें एक मुसाफिर गर्मी की तकलीफ मिटाने की नीयत से लेटा हुआ तुम्हारे ही बारे में तरह-तरह की बातें सोच रहा था। तुम्हें उस आदमी के वहाँ मौजूद रहने का गुमान भी न था। मगर उसने तुम्हें कुएँ पर जाते हुए देख लिया, अस्तु, वह इस फिक्र में पड़ गया कि तुम्हारी छोटी-सी गठरी में क्या चीज है इसे मालूम करे और अगर उसमें कोई चीज उसके मतलब की हो तो उसे निकाल ले। उस समय उस आदमी की सूरत ऐसी न थी कि तुम उसे पहचान सकते, बल्कि वह ठीक एक देहाती पंडित की सूरत में था क्योंकि वह वास्तव में एक ऐयार था, अस्तु, वह हाथ में लोटा लिए हुए कोठरी के बाहर निकला और उस ठिकाने पर गया, जहाँ तुम झुक कर पानी खींच रहे थे। तुम्हें इस बात का गुमान भी न था कि वह तुम्हारे साथ दगा करेगा। मगर उसने पीछे से तुम्हें ऐसा धक्का दिया कि तुम कुएँ के अन्दर जा रहे और उसने तुम्हारे ऐयारी के बटुए पर कब्जा करके जो कुछ अन्दर था, उसे अच्छी तरह देख और समझ लिया, बल्कि कुछ ले भी लिया। क्या तुम्हें आज तक भी मालूम हुआ कि वह कौन था!

भूतनाथ––(ताज्जुब से) नहीं, मैं अभी तक न जान सका कि वह कौन था, मगर इन बातों के कहने से तुम्हारा मतलब ही क्या है?

नया दलीपशाह––मतलब यही है कि तुम जान जाओ कि इस समय वह आदमी तुम्हारे सामने खड़ा है।

भूतनाथ––(क्रोध से खंजर निकाल कर) क्या वह तुम ही थे?

नया दलीपशाह––(खंजर का जवाब खंजर ही से देने के लिए तैयार होकर) बेशक मैं ही था और मैंने तुम्हारे बटुए में क्या-क्या देखा सो भी इस समय बयान करूँगा।

पहला दलीपशाह––(भूतनाथ को डपट कर) बस खबरदार! होश में आओ और अपनी करतूतों पर ध्यान दो। हमने पहले ही कह दिया था कि तुम क्रोध में आकर अपने को बर्बाद कर दोगे। बेशक तुम बर्बाद हो जाओगे और कौड़ी काम के न रहोगे, साथ ही इसके यह भी समझ रखना कि तुम दलीपशाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते और न उसे तुम्हारे तिलिस्मी खंजर की परवाह है।

भूतनाथ––मैं आपसे किसी तरह तकरार नहीं करता, मगर इसको सजा दिए बिना भी न रहूँगा। क्योंकि इसने मेरे साथ दगा करके मुझे बड़ा नुकसान पहुँचाया है और यही वह शख्स है, जो मुझ पर दावा करने वाला है, अत: हमारे इसके बीच में इसी जगह सफाई हो जाय तो बेहतर है।

पहला दलीपशाह––खैर, जब तुम्हारी बदकिस्मती आ ही गई है तो हम कुछ नहीं कह सकते, तुम लड़ कर देख लो और जो कुछ बदा है भोगो, मगर साथ ही इसके यह भी सोच लो कि तुम्हारी तरह इसके और मेरे हाथ में भी तिलिस्मी खंजर हैं और इन खंजरों की चमक में तुम्हारे आदमी तुम्हें कुछ भी मदद नहीं पहुँचा सकते।

भूतनाथ––(कुछ सोचकर और फिर रुक कर) तो क्या आप इसकी मदद करेंगे?

पहला दलीपशाह––बेशक!

भूतनाथ––आप तो मेरे सहायक हैं?

पहला दलीपशाह––मगर इतने नहीं कि अपने साथियों को नुकसान पहुँचावें।

भूतनाथ––आखिर ये जब मुझे नुकसान पहुँचाने के लिए तैयार हैं तो क्या किया जाए?

पहला दलीपशाह––इनसे भी तुम माफी को उम्मीद करो क्योंकि हम लोगों के सरदार तुम्हारे पक्षपाती हैं।

भूतनाथ––(खंजर म्यान में रख कर) अच्छा, अब हम आपकी मेहरबानी पर भरोसा करते हैं, जो चाहे कीजिये।

पहला दलीपशाह––(नये दलीप से) आओ जी, तुम मेरे पास बैठ जाओ।

नया दलीपशाह––मैं तो इससे लड़ता ही नहीं मुझे क्या कहते हो? लो, मैं तुम्हारे पास बैठ जाता हूँ। मगर यह तो बताओ कि अब इसी भूतनाथ के कब्जे में पड़े रहोगे या यहाँ से चलोगे भी?

पहला दलीपशाह––(भूतनाथ से) कहो अब मेरे साथ क्या सलूक करना चाहते हो? तुम्हें मुनासिब तो यही है कि हमें कैद करके दरवार में ले चलो।

भूतनाथ––नहीं, मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है, बल्कि आप मुझे माफी की उम्मीद दिलाइये तो मैं यहाँ से चला जाऊँ।

पहला दलीपशाह––हाँ, तुम माफी की उम्मीद कर सकते हो, मगर इस शर्त पर कि अब हम लोगों का पीछा न करोगे!

भूतनाथ––नहीं, अब ऐसा न करूँगा। चलिए मैं अब आपको ठिकाने पहुँचा दूँ।

नया दलीपशाह––हमें अपना रास्ता मालूम है, किसी मदद की जरूरत नहीं।

इतना कहकर नया दलीपशाह उठ खड़ा हुआ और साथ ही वे दोनों नकाबपोश भी जिन्हें भूतनाथ बेहोश करके लाया था उठे और अपने मकान की तरफ चल पड़े।

१५

महाराज सुरेन्द्रसिंह के दरबार में दोनों नकाबपोश दूसरे दिन नहीं आये, बल्कि तीसरे दिन आये और आज्ञानुसार बैठ जाने पर अपनी गैरहाजिरी का सबब एक नकाबपोश ने इस तरह बयान किया––

"भैरोंसिंह और तारासिंह को साथ लेकर, यद्यपि हम लोग इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के पास गये थे। मगर रास्ते में कई तरह की तकलीफ हो जाने के कारण जुकाम (सर्दी) और बुखार के शिकार बन गये, गले में दर्द और रेजिश के सबब से साफ बोला नहीं जाता था। बल्कि अभी तक आवाज साफ नहीं हुई, इसीलिए कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने जोर देकर हम लोगों को रोक लिया और दो-तीन अपने पास से हटने न दिया, लाचार हम लोग हाजिर न हो सके। उन्होंने एक चिट्ठी भी महाराज के नाम की दी है।"

यह कहकर नकाबपोश ने एक चिट्ठी जेब से निकाली और उठ कर महाराज के हाथ में दी। महाराज ने बड़ी प्रसन्नता से वह चिट्ठी जो खास इन्द्रजीतसिंह के हाथ की लिखी हुई थी, पढ़ी और इसके साथ बारी-बारी से सभी के हाथ में वह चिट्ठी घूमी। उसमें प्रणाम इत्यादि के बाद यह लिखा हुआ था––

"आपके आशीर्वाद से हम लोग प्रसन्न हैं। दोनों ऐयारों के न होने से जो तकलीफ थी, अब वह भी जाती रही। रामसिंह और लक्ष्मणसिंह ने हम लोगों की बड़ी मदद की, इसमें कोई सन्देह नहीं। हम लोग तिलिस्म का बहुत ज्यादा काम खत्म कर चुके हैं। आशा है कि आज के तीसरे दिन हम दोनों भाई आपकी सेवा में उपस्थित होंगे और इसके बाद जो कुछ तिलिस्म का काम बचा हुआ है, उसे आपकी सेवा में रहकर ही पूरा करेंगे। हम दोनों की इच्छा है कि तब तक आप कैदियों का मुकदमा भी बन्द रखें क्योंकि उसके देखने और सुनने के लिए हम दोनों बेचैन हो रहे हैं। उपस्थित होने पर हम दोनों अपना अनूठा हाल भी अर्ज करेंगे।"

इस चिट्ठी को पढ़कर और यह जान कर सभी प्रसन्न हुए कि अब कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह आना ही चाहते हैं। इसी तरह इस उपन्यास के प्रेमी पाठक भी यह जानकर प्रसन्न होंगे कि अब यह उपन्यास भी शीघ्र ही समाप्त होना चाहता है। अस्तु, कुछ देर तक खुशी के चर्चे होते रहे और इसके बाद पुनः नकाबपोशों से बात-चीत होने लगी––

एक नकाबपोश––भूतनाथ लौट कर आया या नहीं?

तेजसिंह––ताज्जुब है कि अभी तक भूतनाथ नहीं आया। शायद आपके साथियों ने उसे···

नकाबपोश––नहीं-नहीं, हमारे साथी लोग उसे दुःख नहीं देंगे। मुझे तो विश्वास था कि भूतनाथ आ गया होगा, क्योंकि वे दोनों नकाबपोश लौटकर हमारे यहाँ पहुँच गये जिन्हें भूतनाथ गिरफ्तार करके ले गया था। मगर अब शक होता है कि भूतनाथ पुनः किसी फेर में तो नहीं पड़ गया या उसे पुनः हमारे किसी साथी को पकड़ने का शौक तो नहीं हुआ!

तेजसिंह––आपके साथी ने लौटकर अपना हाल तो कहा होगा?

नकाबपोश––जी हाँ, कुछ हाल कहा था, जिससे मालूम हुआ कि उन दोनों को गिरफ्तार करके ले जाने पर भूतनाथ को पछताना पड़ा।

तेजसिंह––क्या आप बता सकते हैं कि क्या-क्या हुआ?

नकाबपोश––बता सकते हैं, मगर यह बात भूतनाथ को नापसन्द होगी, क्योंकि भूतनाथ को उन लोगों ने उसके पुराने ऐबों को बताकर डरा दिया था और इसी सबब से वह उन नकाबपोशों का कुछ बिगाड़ न सका। हाँ, हम लोग उन दोनों नकाबपोशों को अपने साथ यहाँ ले आये हैं यह सोचकर कि भूतनाथ यहाँ आ गया होगा, अतः उनका मुकाबला हुजूर के सामने करा दिया जायेगा।

तेजसिंह––हाँ! वे दोनों नकाबपोश कहाँ हैं?

नकाबपोश––बाहर फाटक पर उन्हें छोड़ आया हूँ। किसी को हुक्म दिया जाये, उन्हें भीतर बुला लाये।

इशारा पाते ही एक चोबदार उन्हें बुलाने के लिए चला गया, और उसी समय भूतनाथ भी दरबार में हाजिर होता दिखाई दिया। कौतुक की निगाह से सबने भूतनाथ को देखा भूतनाथ ने राबको सलाम किया और आज्ञानुसार देवीसिंह के बगल में बैठ गया।

जिस समय भूतनाथ इस इमारत की ड्योढ़ी पर आया था उसी समय उन दोनों नकाबपोशों को फाटक पर टहलता हुआ देखकर चौंक पड़ा था। यद्यपि उन दोनों के चेहरे नकाब से खाली न थे, मगर फिर भी भूतनाथ ने उन्हें पहचान लिया कि ये दोनों वही नकाबपोश हैं, जिन्हें हम फँसा ले गये थे। अपने धड़कते कलेजे और परेशान दिमाग को लिए हुए भूतनाथ फाटक के अन्दर चला गया और दरबार में हाजिर होकर उसने दोनों सरदार नकाबपोशों को देखा।

एक नकाबपोश––कहो भूतनाथ, अच्छे तो हो?

भूतनाथ––हुजूर लोगों के इकबाल से जिन्दा हूँ, मगर दिन-रात इसी सोच में पड़ा रहता हूँ कि प्रायश्चित्त करने या क्षमा माँगने से ईश्वर भी अपने भक्तों के पापों को भुलाकर क्षमा कर देता है परन्तु मनुष्यों में वह बात क्यों नहीं पाई जाती!

नकाबपोश––जो लोग ईश्वर के सच्चे भक्त हैं, और जो निर्गुण और सगुण सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर का भरोसा रखते हैं, वे जीवमात्र के साथ वैसा ही बर्ताव करते हैं, जैसा ईश्वर चाहता है या जैसीकि हरि-इच्छा समझी जाती है। अगर तुमने सच्चे दिल से परमात्मा से क्षमा माँग ली और अब तुम्हारी नीयत साफ है तो तुम्हें किसी तरह का दुःख नहीं मिल सकता। अगर कुछ मिलता है तो इसका कारण तुम्हारे चित्त का विकार है। तुम्हारे चित्त में अभी तक शान्ति नहीं हुई और तुम एकाग्र होकर उचित कार्यों की तरफ ध्यान नहीं देते, इसलिए तुम्हें सुख प्राप्त नहीं होता। अब हमारा कहना इतना ही है कि तुम शान्ति के स्वरूप बनो और ज्यादा खोज-बीन के फेर में न पड़ो। यदि तुम इस बात को मानोगे, तो निःसन्देह अच्छे रहोगे, और तुम्हें किसी तरह का कष्ट न होगा।

भूतनाथ––निःसन्देह आप उचित कहते हैं।

देवीसिंह––भूतनाथ, तुम्हें यह सुनकर प्रसन्न होना चाहिए कि दो ही तीन दिन में कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह आने वाले हैं।

भूतनाथ––(ताज्जुब से) यह कैसे मालूम हुआ?

देवीसिंह––उनकी चिट्ठी आई।

भूतनाथ––कौन लाया है?

देवीसिंह––(नकाबपोशों की तरफ बताकर) ये ही लाये हैं।

भूतनाथ––क्या मैं उस चिट्ठी को देख सकता हूँ?

देवीसिंह––अवश्य।

इतना कहकर देवीसिंह ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह की चिट्ठी भूतनाथ के हाथ में दे दी, और भूतनाथ ने प्रसन्नता के साथ पढ़कर कहा, "अब सब बखेड़ा तय हो जायेगा!"

जीतसिंह––(महाराज का इशारा पाकर भूतनाथ से) भूतनाथ, तुम्हें महाराज की तरफ से किसी तरह का खौफ नहीं करना चाहिए, क्योंकि महाराज आज्ञा दे चुके हैं कि तुम्हारे ऐबों पर ध्यान न देंगे और देवीसिंह, जिन्हें महाराज अपना अंग समझते हैं, तुम्हें अपने भाई के बराबर मानते है। अच्छा, अब यह बताओ कि तुम्हारे लौट आने में इतना विलम्ब क्यों हुआ, क्योंकि जिन दो नकाबपोशों को तुम गिरफ्तार करके ले गये थे उन्हें अपने घर लौटे दो दिन हो गए।

भूतनाथ कुछ जवाब देना ही चाहता था कि वे दोनों नकाबपोश भी हाजिर हुए जिन्हें बुलाने के लिए चोबदार गया था। जब वे दोनों सबको सलाम करके आज्ञानुसार बैठ गये तब भूतनाथ ने जवाब दिया––

भूतनाथ––(दोनों नकाबपोशों की तरफ बताकर) जहाँ तक मैं खयाल करता हूँ, ये दोनों नकाबपोश वे ही हैं, जिन्हें मैं गिरफ्तार करके ले गया था। (नकाबपोशों से) क्यों साहबो?

एक नकाबपोश––ठीक है, मगर हम लोगों को ले जाकर तुमने क्या किया, सो महाराज को मालूम नहीं है।

भूतनाथ––हम लोग एक साथ ही अपने-अपने स्थान की तरफ रवाना हुए थे, ये दोनों तो बे-खटके अपने घर पर पहुँच गए होंगे, मगर मैं एक विचित्र तमाशे के फेर में पड़ गया था।

जीतसिंह––वह क्या?

भूतनाथ––(कुछ संकोच के साथ) क्या कहूँ, कहते हुए शर्म मालूम होती है!

देवीसिंह––ऐयारों को किसी घटना के कहने में शर्म न होनी चाहिए, चाहे उन्हें अपनी दुर्गति का हाल ही क्यों न कहना पड़े, और यहाँ कोई गैर-शख्स भी बठा हुआ नहीं है। ये नकाबपोश साहब भी अपने ही हैं, तुम खुद देख चुके हो कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने इनके बारे में क्या लिखा है।

भूतनाथ––ठीक है, मगर खैर, जो होगा देखा जायेगा। मैं बयान करता हूँ, सुनिये। इन नकाबपोशों को बिदा करने के बाद जिस समय मैं वहाँ से रवाना हुआ, रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। जब मैं 'पिपलिया' वाले जंगल में पहुँचा, जो यहाँ से दो-ढाई कोस होगा, तो गाने की मधुर आवाज मेरे कानों में पड़ी और मैं ताज्जुब से चारों तरफ गौर करने लगा। मालूम हुआ कि दाहिनी तरफ से आवाज आ रही है, अतः मैं रास्ता छोड़ धीरे-धीरे दाहिनी तरफ चला और गौर से उस आवाज को सुनने लगा। जैसे-जैसे आगे बढ़ता था, आवाज साफ होती जाती थी और यह भी जान पड़ता था कि मैं इस स्वर से अपरिचित नहीं, बल्कि कई दफे सुन चुका हूँ, अतः उत्कण्ठा के साथ कदम बढ़ाकर चलने लगा। कुछ और आगे जाने के बाद मालूम हुआ कि दो औरतें मिलकर बारी-बारी से गा रही हैं, जिनमें से एक की आवाज पहचानी हुई है। जब उस ठिकाने पहुँच गया जहाँ से आवाज आ रही थी तो देखा कि बड़ के एक बड़े और पुराने पेड़ के ऊपर कई औरतें गा रही हैं। वहाँ बहत ठाधिकार हो रहा था, इसलिए इस बात का पता नहीं लग सकता था कि वे औरतें कौनम्ह कैसी और किस रंग-ढंग की हैं तथा उनका पहनावा कैसा है।

मैं भले-बुरे का कुछ ख़याल न करके उस पेड़ के नीचे चला गया और तिलिस्मी खंजर अपने हाथ में लेकर रोशनी के लिए उसका कब्जा दबाया। उसकी तेज रोशनी से चारों तरफ उजाला हो गया और पेड़ पर चढ़ी हुई वे औरतें साफ दिखाई देने लगीं। मैं उनके पहचानने की कोशिश कर ही रहा था कि यकायक उस पेड़ के चारों तरफ चक्र की तरह आग भभक यो और तुरन्त ही वह बुझ गई। जैसे किसी ने बारूद की ढेर में आग दी हो और वह भक कर उड़ जाने के बाद वहाँ केवल धुआँ-ही-धुआँ रह जाये, ठीक वैसा ही मालूम हुआ। आग बुझ जाने के साथ ही ऐसा जहरीला और कडुआ धुआँ फैला कि मेरी तबीयत घबरा गई और मैं समझ गया कि इसमें बेहोशी का असर जरूर है और मेरे साथ ऐयारी की गई। बहुत कोशिश की, मगर मैं अपने को सम्हाल न सका और बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।

मैं नहीं कह सकता कि बेहोश होने के बाद मेरे साथ कैसा सलूक किया गया। हाँ, जब मैं होश में आया और मेरी आँखें खुलीं; तो मैंने एक सुन्दर सजे हुए कमरे में अपने को हथकड़ी-बेड़ी से मजबूर पाया। उस समय कमरे में रोशनी बखूबी हो रही थी, और मेरे सामने साफ फर्श के ऊपर कई औरतें बैठी हुई थीं, जिनमें मेरी औरत ऊँची गद्दी पर बैठी हुई उन सबकी सरदार मालूम पड़ती थी।