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चन्द्रकान्ता सन्तति अध्याय 5 / 24

विषय-सूची

  1. 1 पहला भाग
  2. 2 दूसरा भाग
  3. 3 तीसरा भाग
  4. 4 चौथा भाग
  5. 5 पाँचवाँ भाग
  6. 6 छठा भाग
  7. 7 सातवाँ भाग
  8. 8 आठवाँ भाग
  9. 9 नौवाँ भाग
  10. 10 दसवाँ भाग
  11. 11 ग्यारहवाँ भाग
  12. 12 बारहवाँ भाग
  13. 13 तेरहवाँ भाग
  14. 14 चौदहवाँ भाग
  15. 15 पन्द्रहवाँ भाग
  16. 16 सोलहवाँ भाग
  17. 17 सत्रहवाँ भाग
  18. 18 अठारहवाँ भाग
  19. 19 उन्नीसवाँ भाग
  20. 20 बीसवाँ भाग
  21. 21 इक्कीसवाँ भाग
  22. 22 बाईसवाँ भाग
  23. 23 तेईसवाँ भाग
  24. 24 चौबीसवाँ भाग

चन्द्रकान्ता सन्तति

पाँचवाँ भाग

१

बेचारी किशोरी को चिता पर बैठाकर जिस समय दुष्टा धनपति ने आग लगाई, उसी समय बहुत-से आदमी, जो उसी जंगल में किसी जगह छिपे हुए थे, हाथों में नंगी तलवारें लिये 'मारो! मारो!' कहते हुए उन लोगों पर आ टूटे। उन लोगों ने सबसे पहले किशोरी को चिता पर से खींच लिया और इसके बाद धनपति के साथियों को पकड़ने लगे।

पाठक समझते होंगे कि ऐसे समय में इन लोगों के आ पहुँचने और जान बचने से किशोरी खुश हुई होगी और इन्द्रजीतसिंह से मिलने की कुछ उम्मीद भी उसे हो गई होगी। मगर नहीं, अपने बचानेवालों को देखते ही किशोरी चिल्ला उठी और उसके दिल का दर्द पहले से भी ज्यादा बढ़ गया। किशोरी ने आसमान की तरफ देखकर कहा, "मुझे तो विश्वास हो गया था कि इस चिता में जलकर ठंडे-ठंडे बैकुण्ठ चली जाऊँगी, क्योंकि इसकी आँच कुँअर इन्द्रजीतसिंह की जुदाई की आँच से ज्यादा गर्म न होगी, मगर हाय, इस बात का गुमान भी न था कि यह दुष्ट आ पहुँचेगा और मैं एक सचमुच की तपती हुई भट्ठी में झोंक दी जाऊँगी। मौत, तू कहाँ है? तू कोई वस्तु है भी या नहीं, मुझे तो इसी में शक है!"

वह आदमी, जिसने ऐसे समय में पहुँचकर किशोरी को बचाया, माधवी का दीवान अग्निदत्त था, जिसके चंगुल में फँसकर किशोरी ने राजगृह में बहुत दुःख उठाया था और कामिनी की मदद से, जिसका नाम कुछ दिनों तक किन्नरी था, छुट्टी मिली थी। किशोरी को अपने मरने की कुछ भी परवाह न थी और वह अग्निदत्त की सूरत देखने की बनिस्बत मौत को लाख दर्जे उत्तम समझती थी, यही सबब था कि इस समय उसे अपनी जान बचने का रंज हुआ।

अग्निदत्त और उसके आदमियों ने किशोरी को तो बचा लिया, मगर जब उसके दुश्मनों को, अर्थात् धनपति और उसके साथियों को, पकड़ने का इरादा किया तो लड़ाई गहरी हो पड़ी। मौका पाकर धनपति भाग गई और गहन वन में किसी झाड़ी के अन्दर छिपकर उसने अपनी जान बचाई। उसके साथियों में से एक भी न बचा, सब मारे गये। अग्निदत्त के भी केवल दो ही आदमी जीवित बचे। उस संगदिल ने रोती और चिल्लाती हुई बेचारी किशोरी को जबर्दस्ती उठा लिया और एक तरफ का रास्ता लिया।

पाठक आश्चर्य करते होंगे कि अग्निदत्त को तो राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने राजगृह में गिरफ्तार करके चुनार भेज दिया था, वह यकायक यहाँ कैसे आ पहुँचा? इसलिए अग्निदत्त का थोड़ा-सा हाल इस जगह लिख देना हम मुनासिब समझते हैं।

राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने दीवान अग्निदत्त को गिरफ्तार करके अपने बीस सवारों के पहरे में चुनारगढ़ रवाना कर दिया और एक चिट्ठी भी सब हाल की महाराज सुरेन्द्रसिंह को लिखकर उन्हीं लोगों की मार्फत भेजी। अग्निदत्त को हथकड़ी डाल घोड़े पर सवार कराया गया और उसके पैर रस्सी से घोड़े की जीन के साथ बाँध दिये गए। घोड़े की लम्बी बागडोर दोनों तरफ से दो सवारों ने पकड़ ली और सफर शुरू किया। तीसरे दिन जब वे लोग सोन नदी के पास पहुँचे, अर्थात् जब वह नदी दो कोस दूर रह गई, तब उन लोगों पर डाका पड़ा। पचास आदमियों ने चारों तरफ से घेर लिया। घण्टे भर की लड़ाई में राजा वीरेन्द्रसिंह के सब आदमी मारे गये। खबर पहुँचाने के लिए भी एक आदमी न बचा और अग्निदत्त को उन लोगों के हाथों से छुट्टी मिली। वे डाकू सब अग्निदत्त के तरफदार और उन लोगों में से थे जो गयाजी में फसाद मचाया करते और उन लोगों की जानें लेते और घर लूटते थे जो दीवान अग्निदत्त के विरुद्ध जाने जाते। इस तरह अग्निदत्त को छुट्टी मिली और बहुत दिन तक इस डाके की खबर राजा वीरेन्द्रसिंह या उनके आदमियों को न मिली।

यद्यपि दीवान अग्निदत्त के हाथ से गया की दीवानी जाती रही और वह एक साधारण आदमी की तरह मारा-मारा फिरने लगा, तथापि वह अपने साथी डाकुओं में मालदार गिना जाता था क्योंकि उसके पास जुल्म की कमाई हुई दौलत बहुत थी और वह उस दौलत को राजगृह से थोड़ी दूर पर एक मढ़ी में, जो पहाड़ी के ऊपर थी, रखता था। इस मढ़ी का हाल दस-बारह आदमियों के सिवाय और किसी को भी मालूम न था। उस दौलत को निकालने में अग्निदत्त ने विलम्ब न किया और उसे अपने कब्जे में लेकर साथी डाकुओं के साथ अपनी धुन में चारों तरफ घूमने तथा इस बात की टोह लेने लगा कि राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ क्या होता है।

थोड़े ही दिन बाद मौका समझकर वह रोहतासगढ़ के चारों तरफ घूमने लगा और जिस तरह किशोरी से मिला, उसका हाल आप ऊपर पढ़ चुके हैं।

जिस जगह अग्निदत्त किशोरी से मिला था, उससे थोड़ी ही दूर पर एक पहाड़ी थी जिसमें कई खोह और गार थे। वह किशोरी को उठाकर उसी पहाड़ी पर ले गया। रोते और चिल्लाते-चिल्लाते किशोरी बेहोश हो गई थी। अग्निदत्त ने उसे खोह के अन्दर ले जाकर लिटा दिया और आप बाहर चला आया।

पहर रात जाते-जाते जब किशोरी होश में आई, तो उसने अपने को अजब हालत में पाया। ऊपर-नीचे चारों तरफ पत्थर देखकर वह समझ गई कि मैं किसी खोह में हूँ। एक तरफ चिराग जल रहा था। गुलाब की फूल-सी नाजुक किशोरी की अवस्था इस समय बहुत ही नाजुक थी। अग्निदत्त की याद से उसे घड़ी-घड़ी में रोमांच होता था। उसके धड़कते हुए कलेजे में अजब तरह का दर्द था। और इस सोच ने उसे बिल्कुल ही निकम्मा कर रखा था कि देखें चाण्डाल अग्निदत्त के पहुँचने पर मेरी क्या दुर्दशा होती है। घण्टों की मेहनत में बड़ी कोशिश करके उसने अपने होश-हवास दुरुस्त किए और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। उसने इस इरादे को तो पक्का कर ही लिया था कि अगर अग्निदत्त मेरे पास आवेगा, तो पत्थर पर सिर पटक कर अपनी जान दे दूँगी, मगर यह भी सोचती थी कि पत्थर पर सिर पटकने से जान नहीं जा सकती, किसी तरह खोह के बाहर निकल कर ऐसा मौका ढूँढ़ना चाहिए कि अपने को इस पहाड़ के नीचे गिराकर बखेड़ा खत्म कर दिया जाय, जिसमें हमेशा के लिए इस खिंचाखिंची से छुट्टी मिले।

किशोरी चिराग बुझाने के लिए उठी ही थी कि सामने से किसी के पैरों की चाप मालूम हुई। वह डर कर उसी तरफ देखने लगी कि यकायक अग्निदत्त पर नजर पड़ी। देखते ही वह काँप गई, ऐसा मालूम हुआ कि रगों में खून की जगह पारा भर गया। वह अपने को किसी तरह सम्हाल न सकी और जमीन पर बैठ कर रोने लगी। अग्निदत्त सामने आकर खड़ा हो गया और बोला––

अग्निदत्त––तुमने मुझको बड़ा ही धोखा दिया। अपने साथ मेरी लड़की को भी मुझसे जुदा कर दिया। अभी तक मुझे इस बात का पता न लगा कि मेरी स्त्री पर क्या बीती और वीरेन्द्रसिंह ने उसके साथ क्या सलूक किया, और यह सब तुम्हारी बदौलत हुआ।

किशोरी––फिर भी मैं कहती हूँ कि यदि मुझे छोड़ दोगे, तो मैं राजा वीरेन्द्रसिंह से कहकर तुम्हारा कसूर माफ करा दूँगी और तुम्हारी जीविका-निर्वाह के लिए भी बन्दोबस्त हो जायगा। नहीं तो याद रखना, तुम्हारी स्त्री भी...

अग्निदत्त––जो तुम कहोगी, सो मैं समझ गया। मेरी स्त्री पर चाहे जो बीते इसकी परवाह नहीं, न मुझे वीरेन्द्रसिंह का डर है। मुझे दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई चीज नहीं दिखाई देती। देखो, तुम्हारे लिए मैंने कितना दुख भोगा और भोगने को तैयार हूँ, क्या अब भी तुमको मुझ पर तरस नहीं आता! मैं कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हें अपनी जान से ज्यादा प्यार करूँगा, यदि मेरी होकर रहोगी।

किशोरी––अरे दुष्ट चाण्डाल, खबरदार, फिर ऐसी बात मुँह से न निकालना!

अग्निदत्त––चाहे जो हो, मैं तुम्हें किसी तरह नहीं छोड़ सकता!

किशोरी––जान जाय तो जाय, मगर तेरी हवा अपने बदन से नहीं लगने दूँगी।

अग्निदत्त––(हँस कर) देखूँ, तू अपने को मुझसे कैसे बचाती है!

इतना कहकर अग्निदत्त किशोरी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। किशोरी घबराकर उठ खड़ी हुई और दूर हट गई। थोड़ी देर तक तो इस तंग जगह में दौड़-धूप कर किशोरी ने अपने को बचाया, मगर कहाँ तक? आखिर मर्द के सामने औरत की क्या पेश आ सकती थी! अग्निदत्त को क्रोध आ गया। उसने किशोरी को पकड़ लिया और जमीन पर पटक दिया।

२

पाठक अभी भूले न होंगे कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह कहाँ हैं। हम ऊपर लिख आए हैं कि उस मकान में जो तालाब के अन्दर बना हुआ था, कुँअर इन्द्रजीतसिंह दो औरतों को देखकर ताज्जुब में आ गए। कुमार उन औरतों का नाम नहीं जानते थे मगर पहचानते जरूर थे, क्योंकि उन्हें राजगृह में माधवी के यहाँ देख चुके थे और जानते थे कि ये दोनों माधवी की लौंडियाँ हैं। परन्तु यह जानने के लिए कुमार व्याकुल हो रहे थे कि ये दोनों यहाँ कैसे आई। क्या इस औरत से, जो इस मकान की मालिक है, और उस माधवी से कोई सम्बन्ध है? इसी समय उन दोनों औरतों के पीछे-पीछे वह औरत भी आ पहुँची जिसने इन्द्रजीतसिंह के ऊपर अहसान किया था और जो उस मकान की मालिक थी। अभी तक इस औरत का नाम मालूम नहीं हुआ, मगर आगे इससे काम बहुत पड़ेगा, इसलिए जब तक इसका असल नाम मालूम न हो कोई बनावटी नाम रख दिया जाय तो उत्तम होगा, मेरी समझ में तो कमलिनी नाम कुछ बुरा न होगा।

जिस समय कुँअर इन्द्रजीतसिंह की निगाह उन दोनों औरतों पर पड़ी, वे हैरान होकर उनकी तरफ देखने लगे। उसी समय दौड़ती हुई कमलिनी भी आई और दूर ही से बोली––

कमलिनी––कुमार, इन दोनों हरामजादियों का कोई मुलाहिजा न कीजिएगा और न किसी तरह की जुबान ही दीजिएगा। अपनी जान बचाने के लिए ही दोनों आपके पास आई हैं।

इन्द्रजीतसिंह––क्या मामला है? ये दोनों कौन हैं?

कमलिनी––ये दोनों माधवी की लौंडियाँ हैं और आपकी जान लेने आई थीं। मेरे आदमियों के हाथ गिरफ्तार हो गईं।

इन्द्रजीतसिंह––तुम्हारे आदमी कहाँ हैं? मैंने तो इस मकान में सिवाय तुम्हारे किसी को भी नहीं देखा!

कमलिनी––बाहर निकलकर देखिये, मेरे वे सिपाही यहीं मौजूद हैं जिन्होंने इन्हें गिरफ्तार किया।

इन्द्रजीतसिंह––अगर ये गिरफ्तार होकर आई हैं तो इनके हाथ-पैर खुले क्यों हैं?

कमलिनी––इसके लिए कोई हर्ज नहीं। ये मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, जब तक कि मैं जागती हूँ या अपने होश में हूँ।

इन्द्रजीतसिंह––(उन दोनों की तरफ देखकर) तुम क्या कहती हो?

एक––(कमलिनी की तरफ इशारा करके) ये जो कुछ कहती हैं, ठीक है। परन्तु आप वीर पुरुष हैं, आशा है कि हम लोगों का अपराध क्षमा करेंगे!

कुँअर इन्द्रजीतसिंह इन बातों को सुनकर सोच में पड़ गये। उन्हें उन दोनों औरतों की और कमलिनी की बातों का विश्वास न हुआ, बल्कि यकीन हो गया कि ये लोग किसी तरह का धोखा देना चाहती हैं। आधी घड़ी तक सोचने के बाद कुमार बँगले के बाहर निकले तो देखा कि तालाब के बाहर लगभग बीस सिपाही खड़े आपस में कुछ बातें कर रहे और घड़ी-घड़ी इसी तरफ देख रहे हैं। कुमार वहाँ से लौट आये और कमलिनी की तरफ देखकर बोले––

इन्द्रजीतसिंह––खैर, जो तुम्हारे जी में आये करो, हम इस बारे में कुछ नहीं कह सकते।

कमलिनी––करना क्या है, इन दोनों का सिर काटा जायगा।

इन्द्रजीतसिंह––खुशी तुम्हारी। मैं जरा इस तालाब के बाहर जाना चाहता। हूँ।

कमलिनी––क्यों?

इन्द्रजीतसिंह––यह समय मजेदार है। जरा मैदान की हवा खाऊँगा और उस घोड़े की भी खबर लूँगा जिस पर सवार होकर आया था।

कमलिनी––इस मकान की छत पर चढ़ने से अच्छी और साफ हवा आपको मिल सकती है। घोड़े के लिए चिन्ता न करें, या फिर ऐसा ही है तो सवेरे जाइयेगा!

न मालूम, क्या सोचकर इन्द्रजीतसिंह चुप हो रहे। कमलिनी ने उन दोनों औरतों का हाथ पकड़ा और धमकाती हुई न जाने कहाँ ले गई, इसका हाल कुमार को न मालूम हुआ और न उन्होंने जानने का उद्योग ही किया।

यद्यपि इस औरत अर्थात् कमलिनी ने कुमार की जान बचाई थी, तथापि उन्हें विश्वास हो गया कि कमलिनी ने दोस्ती की राह पर यह काम नहीं किया, बल्कि किसी मतलब से किया है। उस मकान में गुलदस्ते के नीचे से जो चिट्ठी कुमार ने पाई थी, उसके पढ़ने से कुमार होशियार हो गये थे तथा समझ गये थे कि यह मुझे किसी फरेब में फँसाना चाहती है और किशोरी के साथ भी किसी तरह की बुराई किया चाहती है। इसमें कोई शक नहीं कि कुमार इसे चाहने लगे थे और जान बचाने का बदला चुकाने की फिक्र में थे, मगर उस चिट्ठी के पढ़ते ही उनका रंग बदल गया और वे किसी दूसरी ही धुन में लग गए।

कुमार चाहते तो शायद यहाँ से निकल भागते, क्योंकि उस औरत की तरफ से होशियार हो चुके थे, मगर इस काम में उन्होंने यह समझकर जल्दी न की कि इस औरत का कुछ हाल मालूम करना चाहिए और जानना चाहिए कि यह कौन है। पर कमलिनी को कुमार के दिल की क्या खबर थी, उसने तो सोच रखा था कि मैंने कुमार पर अहसान किया है और वे किसी तौर पर मुझसे बदगुमान न होंगे।

कुमार के पास इस समय सिवाय कपड़ों के कोई चीज ऐसी न थी जिससे वे अपनी हिफाजत करते या समय पड़ने पर मतलब निकाल सकते।

कुछ दिन बाकी था जब कुमार उस मकान की छत पर चढ़ गए और चारों तरफ के पहाड़, जंगल तथा मैदान के बाहर देखने लगे। कुमार को यह जगह बहुत ही पसन्द आई और उन्होंने दिल में कहा कि यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो सब बखेड़ों से छुट्टी पा कर किशोरी के साथ कुछ दिनों तक इस मकान में जरूर रहेंगे। थोड़ी देर तक प्रकृति की शोभा देखकर दिल बहलाते रहे, जब सूर्य अस्त हो गया तो कमलिनी भी वहाँ पहुँची और कुमार के पास खड़ी होकर बातचीत करने लगी।

कमलिनी––यहाँ से अच्छी बहार दिखाई देती है।

कुमार––ठीक है मगर यह छटा मेरे दिल को किसी तरह नहीं बहला सकती।

कमलिनी––सो क्यों?

कुमार––तरह-तरह की फिक्रों और तरद्दुदों ने मुझे दुखी कर रखा है, बल्कि यहाँ आने और तुम्हारे मिलने से तरद्दुद और भी ज्यादा हो गया।

कमलिनी––यहाँ आकर कौन सी फिक्र बढ़ गई?

कुमार––यह तो तब कह सकता हूँ जब कुछ तुम्हारा हाल मुझे मालूम हो। अभी तो मैं यह भी नहीं जानता कि तुम कौन हो और कहाँ की रहने वाली हो और इस मकान में आके रहने का सबब क्या है।

कमलिनी––कुमार, मुझे आपसे बहुत बातें कहनी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मेरे बारे में आप तरह-तरह की बातें सोचते होंगे, कभी मुझे खैर-ख्वाह तो कभी बदख्वाह समझते होंगे, बल्कि बदख्वाह समझने का मौका ही ज्यादा मिलता होगा। अक्सर उन लोगों ने जो मुझे जानते हैं, मुझे शैतान और खूनी समझ रखा है, और इसमें उनका कोई कसूर भी नहीं। मैं उन लोगों का जिक्र इस समय केवल इसीलिए करती हूँ कि शायद उन लोगों ने, जो केवल दो-तीन ऐयार लोग हैं, कुछ चर्चा आपसे की हो।

कुमार––नहीं, मैंने किसी से कभी तुम्हारा जिक्र नहीं सुना।

कमलिनी––खैर, ऐसा मौका न पड़ा होगा। पर मेरा मतलब यह है कि जब तक मैं अपने मुँह से कुछ न कहूँगी, मेरे बारे में कोई भी अपनी राय ठीक नहीं कह सकता और...

इतने ही में सीढ़ियों पर किसी के पैरों की आवाज मालूम हुई जिसे सुनकर दोनों चौंके और उसी तरफ देखने लगे।

कुमार––इस मकान में तो केवल तुम्हीं रहती हो?

कमलिनी––नहीं, और भी कई आदमी रहते हैं, मगर वे लोग उस समय नहीं थे जब आप आए थे।

दो लौंडियाँ आती हुई दिखाई पड़ीं। एक के हाथ में छोटा-सा गलोचा था, दूसरी के हाथ में शमादान और तीसरी पानदान लिये हुए थी। गलीचा बिछा दिया गया, शमादान और पानदान रखकर लौंडियाँ हाथ जोड़े सामने खड़ी हो गई। कमलिनी के कहने से कुमार गलीचे पर बैठ गए और कमलिनी भी पास बैठ गई। इस समय इन तीनों लौंडियों का वहाँ पहुँचकर बातचीत में बाधा डालना कुमार को बहुत बुरा मालूम हुआ, क्योंकि वे बड़े ही गौर से कमलिनी की बातें सुन रहे थे और इस बीच में उनके दिल की अजीब हालत थी। कुमार ने कमलिनी की तरफ देख के कहा, "हाँ, तुम अपनी बातों का सिलसिला मत तोड़ो।"

कमलिनी––(लौंडियों की तरफ देखकर) अच्छा, तुम लोग जाओ! बहुत जल्दी खाने का बन्दोबस्त करो।

कुमार––अभी खाने के लिए जल्दी न करो।

कमलिनी––खैर, ये लोग अपना काम पूरा कर रखें, आप जब चाहें, भोजन करें।

कुमार––अच्छा हाँ, तब?

कमलिनी––(डिब्बे से पान निकालकर) लीजिए, पान खाइए।

कुमार ने पान हाथ में रख लिया और पूछा, "हाँ, तब?"

कमलिनी––पान खाइए, आप डरिए मत, इसमें बेहोशी की दवा नहीं मिली है। हाँ, अगर आप ऐसा खयाल करें भी तो कोई बेमौका नहीं!

कुमार––(हँस कर) इसमें कोई शक नहीं कि इतनी खैरख्वाही करने पर भी मैं तुम्हारी तरफ से बदगुमान हूँ। मगर तुम्हारी बातें अजब ढंग पर चल रही हैं। (पान खाकर) अब जो हो, जब तुमने मेरी जान बचाई है तो कब हो सकता है कि तुम अपने हाथ से मुझे जहर दो।

कमलिनी––(हँसकर) कुमार, यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि आप मुझ पर शक करें। माधवी की दोनों लौंडियों का मामला, जो अभी थोड़ी देर हुआ, आप देख चुके हैं, मुझ पर शक करने का मौका आपको देगा। मगर नहीं, आप पूरा विश्वास रखिए कि मैं आपके साथ कभी बुराई न करूँगी। कई आदमी मेरी शिकायत आपसे करेंगे, आप ही के कई ऐयार असल हाल न जानने के कारण मेरे दुश्मन हो जायँगे, मगर सिवाय कसम खाकर कहने के और किस तरह आपको विश्वास दिलाऊँ कि मैं आपकी खैरख्वाह हूँ। आप यह भी सोच सकते हैं कि मैं आपके साथ इतनी खैरख्वाह क्यों हो रही हूँ! दुनिया का कायदा है कि बिना मतलब कोई किसी का काम नहीं करता और मैं भी दुनिया के बाहर नहीं हूँ, अस्तु मैं भी आपसे बहुत-कुछ उम्मीद करती हूँ मगर उसे जुवान से कह नहीं सकती। अभी आपको मुझसे वर्षों तक काम पड़ेगा, जब आप हर तरह से निश्चिन्त हो जायँगे, आपकी किशोरी, जो इस समय रोहतासगढ़ में कैद है, आपको मिल जायगी। इसके अतिरिक्त एक और भी भारी काम आपके हाथ से हो लेगा, तब कहीं मेरी मुराद पूरी होगी, अर्थात् उस समय मुझे जो कुछ आपसे माँगना होगा, माँगूंगी। आप मेरी बात याद रखिएगा कि आप ही के ऐयार मेरे दुश्मन होंगे और अन्त में झख मार के मुझ ही से दोस्ती के तौर पर सलाह लेनी पड़ेगी। आप यह भी न समझिए कि मैं आज या कल से आपकी तरफदार बनी हूँ, नहीं, बल्कि मैं महीनों से आपका काम कर रही हूँ और इस सबब से सैकड़ों आदमी मेरे दुश्मन हो रहे हैं। दुश्मनों ही के डर से मैं इस तालाब में छिपकर बैठी रहती हूँ क्योंकि जिन्हें इसका भेद मालूम नहीं है वे इस मकान के अन्दर पैर नहीं रख सकते। आप मुझे अकेली समझते होंगे, मगर मैं अकेली नहीं हूँ, लौंडियाँ, सिपाही और ऐयार मिलाकर इस गई-गुजरी हालत में भी पचास आदमी मेरी तावेदारी कर रहे हैं।

कुमार––वे लोग कहाँ हैं?

कमलिनी––उनमें से कई आदमियों को तो आप इसी जगह बैठे देखेंगे, बाकी सब को मैंने काम पर भेजा है। जब मैं आपकी खैरख्वाह हूँ तो किशोरी की मदद भी जरूर ही करनी पड़ेगी, इसलिए मेरी एक ऐयार रोहतासगढ़ किले के अन्दर भी घुस कर बैठी है और किशोरी के हाल-चाल की खबर दिया करती है। अभी कल ही उसने एक चिट्ठी भेजी थी, (कमर से चिट्ठी निकाल कर और कुमार के हाथ में देकर) लीजिए यही चिट्ठी है, पहले आप इसे पढ़ लीजिए फिर और कुछ कहूँगी।

कुमार हाथ में चिट्ठी लेकर गौर से पढ़ने लगे। यह वही चिट्ठी थी जिस पर पहले कुमार की निगाह पड़ चुकी थी और जिसे एक गुलदस्ते के नीचे से निकाल कर कुमार पढ़ चुके थे। कुमार ने चोरी से उस चिट्ठी को पढ़ने का हाल कमलिनी से कहना मुनासिब न समझा और उसे इस तौर पर पढ़ गए जैसे पहली दफे वह चिट्ठी उनके हाथ में पड़ी हो। परन्तु इस समय इस तरह कमलिनी उनकी दुश्मन नहीं है इस बात को वे अच्छी तरह समझ गए। मगर साथ-ही-साथ उनके दिल में एक दूसरी ही तरह की उत्कण्ठा बढ़ गई और वे यह जानने के लिए व्याकुल हो गए कि कमलिनी और इसकी ऐयारा ने रोहतासगढ़ किले में पहुँच कर क्या किया!

पाठक, शायद आप इस चिट्ठी का मजमून भूल गए होंगे, मगर आप उसे याद करें या पुनः पढ़ जायँ, क्योंकि उसके एक-एक शब्द का मतलब इस समय कमलिनी से कुमार पूछना चाहते हैं।

कुमार––मैं नहीं कह सकता और न मुझे मालूम ही है कि तुम इतनी भलाई मेरे साथ क्यों कर रही हो, तो भी मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम इस समय मुझे चिन्ता में डाल कर दुःख न दोगी, बल्कि जो मैं पूछूँगा उसका ठीक-ठीक जवाब दोगी।

कमलिनी––आप मेरी तरफ से किसी तरह का बुरा खयाल न रक्खें। आज मैं इस बात पर मुस्तैद हूँ कि अगर आपको कष्ट न हो तो रात भर जाग के बहुत कुछ हाल जो अब तक आपको मालूम नहीं है और आपके मतलब का है, आपसे कहूँ और जो-जो सवाल आप करें, उसका जवाब दूँ।

कुमार––मुझे तुम्हारे इस कहने से बड़ी खुशी हुई। अच्छा पहले इस बात का जवाब दो कि तुम्हारी वह ऐयारा, जो रोहतासगढ़ में है और इस चिट्ठी के पढ़ने से जिसका नाम तारा मालूम होता है, रोहतासगढ़ में किस तौर पर है? जहाँ तक मैं सोचता हूँ वह भेष बदल कर नौकरी करती होगी?

कमलिनी––नहीं, उसने नौकरी नहीं, बल्कि वहाँ इस तरह छिपकर रहती है कि वहाँ के किसी आदमी को उसका पता लग जाना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव है।

कुमार––अच्छा, तो उसने यह क्या लिखा है कि––'किशोरी का आशिक भी यहाँ मौजूद है!'

कमलिनी––यह कटाक्ष माधवी के दीवान अग्निदत्त पर है, क्योंकि हम लोगों के हिसाब से वह किशोरी पर आशिक है! वह आपकी तरह सच्चा आशिक नहीं है, मगर बेईमान ऐयारों की तरह जरूर आशिक है।

कुमार––नहीं-नहीं, उसे तो हमारे आदमियों ने गिरफ्तार करके चुनार भेज दिया है!

कमलिनी––आपका यह खयाल गलत है। वह चुनार नही पहुँचा, न मालूम किस तरह उसने अपनी जान बचा ली है। इसका हाल आपको लश्कर में जाने या किसी को चुनारगढ़ भेजने से मालूम होगा।

कुमार––तो क्या वह भी रोहतासगढ़ पहुँच गया?

कमलिनी––पहुँच ही गया तभी तो तारा ने लिखा है।

कुमार––अच्छा, तो ये लाली और कुन्दन कौन हैं?

कमलिनी––आपकी और मेरी दुश्मन, इन दोनों को मामूली दुश्मन न समझिएगा।

कुमार––इसमें किशोरी के आशिक के बारे में लिखा है कि 'उसे किशोरी से बहुत-कुछ उम्मीद भी है'––इसका मतलब क्या है?

कमलिनी––सो ठीक अभी मालूम नहीं हुआ।

कुमार––यह जवाब तुमने बड़े खुटके का दिया।

कमलिनी––(हँसकर) आप चिन्ता न करें। किशोरी तन-मन-धन आपको समर्पण कर चुकी है, वह किसी दूसरे की न होगी।

कुमार––खैर, जब खुलासा हाल मालूम ही नहीं है तो जो कुछ सोचा जाय, मुनासिब है। इसमें लिखा है कि 'किशोरी ने भी पूरा धोखा खाया'––सो क्या?

कमलिनी––इसका भी हाल अभी नहीं मालूम हुआ। शायद आज-कल में कोई दूसरी चिट्ठी आवेगी तो मालूम होगा। बल्कि और भी जो कुछ लिखा है, इशारा ही भर है, असल क्या बात है सो मैं नहीं कह सकती।

कुमार––अच्छा, अब मैं तुम्हारा पूरा हाल जानना चाहता हूँ और इसी के साथ रोहतासगढ़ में रहने वाली लाली और कुन्दन का वृत्तान्त भी तुम्हारी जुबानी सुनना चाहता हूँ।

कमलिनी––मैं सब हाल आपसे कहूँगी और इसके अलावा एक ऐसे भेद की खबर भी आपको दूँगी कि आप खुश हो जायँगे, मगर इसके लिए आपको तीन-चार तक दिन और सब्र करना चाहिए। इसी बीच में तारा भी रोहतासगढ़ से आ जायेगी या मैं खुद उसे बुलवा लूँगी।

कुमार––इन सब बातों को जानने के लिए मैं बहुत बेचैन हो रहा हूँ, कृपा करके जो कुछ तुम्हें कहना हो, अभी कहो।

कमलिनी––नहीं-नहीं, आप जल्दी न करें, मेरा दो-चार दिन के लिए टालना भी आप ही के फायदे के लिए है। आप यह न समझें कि मैं आपको जानबूझ कर यहाँ अटकाना चाहती हूँ। आप यदि मुझ पर भरोसा रक्खें और मुझे अपना दुश्मन न समझें तो यहाँ रहें। मैं लौंडियों की तरह आपकी ताबेदारी करने को तैयार हूँ, और यदि मुझ पर एतबार न हो तो अपने लश्कर चले जायें, चार-पाँच दिन के बाद मैं स्वयं आपसे मिलकर सब हाल कहूँगी।

कुमार––बेशक मैं तुम्हारे बारे में तरह-तरह की बातें सोचता था और तुम पर विश्वास करना मुनासिब नहीं समझता था, मगर अब तुम्हारी तरफ से मुझे किसी तरह का खुटका नहीं है। तुम्हारी बातों का मेरे दिल पर बड़ा ही असर हुआ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुम सिवाय भलाई के मेरे साथ बुराई कभी न करोगी। मैं जरूर यहाँ रहूँगा और जब तक अपने दिल का शक अच्छी तरह न मिटा लूँगा, न जाऊँगा।

कमलिनी––अहोभाग्य! (हँसकर) मगर ताज्जुब नहीं कि इसी बीच में आपके ऐयार लोग यहाँ पहुँचकर मुझे गिरफ्तार कर लें।

कुमार––क्या मजाल है!

३

कुमार कई दिनों तक कमलिनी के यहाँ मेहमान रहे। उसने बड़ी खातिरदारी और नेकनीयती के साथ इन्हें रक्खा। इस मकान में कई लौंडियाँ भी थीं जो दिलोजान से कुमार की खिदमत किया करती थीं, मगर कभी-कभी वे सब दो-दो पहर के लिए न मालूम कहाँ चली जाया करती थीं।

एक दिन शाम के वक्त उस मकान की छत पर कमलिनी और कुमार बैठे बात कर रहे थे, इसी बीच में कुमार ने पूछा––

कुमार––कमलिनी, अगर किसी तरह का हर्ज न हो तो इस मकान के बारे में कुछ कहो। इन पुतलियों की तरफ, जो इस मकान के चारों कोनों में तथा इस छत के बीचोंबीच में हैं, जब मेरी निगाह पड़ती है तो ताज्जुब से अजब हालत हो जाती है।

कमलिनी––बेशक इन्हें देख आप ताज्जुब करते होंगे। यह मकान एक तरह का छोटा-सा तिलिस्म है जो इस समय बिल्कुल मेरे अधीन है। मगर यहाँ का हाल बिना मेरे कहे थोड़े ही दिनों में आपको पूरा-पूरा मालूम हो जायगा।

कुमार––उन दोनों औरतों के साथ, जो माधवी की लौंडियाँ थीं, तुमने क्या सलूक किया?

कमलिनी––अभी तो वे दोनों कैद हैं।

कुमार––माधवी का भी कुछ हाल मालूम हुआ है?

कमलिनी––उसे आपके लश्कर और रोहतासगढ़ के चारों तरफ घूमते कई दफे मेरे आदमियों ने देखा है। जहाँ तक मैं समझती हूँ वह इस धुन में लगी है कि किसी तरह आप दोनों भाई और किशोरी उसके हाथ लगें और वह अपना बदला ले।

कुमार––अभी तक रोहतासगढ़ का कुछ हाल नहीं मालूम हुआ, न लश्कर का कोई समाचार मिला।

कमलिनी––मुझे भी इस बात का ताज्जुब है कि मेरे आदमी किस काम में फँसे हुए हैं। क्योंकि अभी तक एक ने भी लौटकर खबर न दी। (चौंककर और मैदान की तरफ देख के) मालूम होता है, इस समय कोई नया समाचार मिलेगा। मैदान की तरफ देखिए, दो आदमी एक बोझ लिये इसी तरफ आते दिखाई दे रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि ये मेरे ही आदमियों में से हों।

कुमार––(मैदान की तरफ देख कर) हाँ ठीक है, इसी तरफ आ रहे हैं। उस गट्ठर में शायद कोई आदमी है।

कमलिनी––बेशक ऐसा ही है, (हँसकर) नहीं तो क्या मेरे आदमी मालअसबाब चुराकर लावेंगे! देखिए, वे दोनों कितनी तेजी के साथ आ रहे हैं। (कुछ अटक कर) अब मैंने पहचाना, बेशक इस गठरी में माधवी होगी।

थोड़ी देर तक दोनों आदमी चुपचाप उसी तरफ देखते रहे। जब वे लोग इस मकान के पास पहुँचे तो कमलिनी ने कुमार से कहा––

कमलिनी––मुझे आज्ञा दीजिए तो जाकर इन लोगों को यहाँ लाऊँ।

कुमार––क्या बिना तुम्हारे गये वे लोग यहाँ नहीं आ सकते?

कमलिनी––जी नहीं, जब तक मैं खुद उन्हें किश्ती पर चढ़ा कर यहाँ न लाऊँ वे लोग नहीं आ सकते। वे क्या, कोई भी नहीं आ सकता।

कुमार––क्या हरएक के लिए जब वह इस मकान में आना या जाना चाहे तुम्हीं को तकलीफ करनी पड़ती है? मैं समझता हूँ कि जिस आदमी को तुम एक दफे भी किश्ती पर चढ़ाकर ले जाओगी, उसे रास्ता मालूम हो जाएगा।

कमलिनी––अगर ऐसा ही होता तो मैं इस मकान में बेखटके कैसे रह सकती थी? आप जरा नीचे चलें, मैं इसका सबब आपको बतला देती हूँ।

कुमार खुशी-खुशी उठ खड़े हुए और कमलिनी के साथ नीचे उतर गए। कमलिनी उन्हें उस कोठरी में ले गई जो नहाने के काम में लाई जाती थी और जिसे कुमार देख चुके थे। उस कोठरी में दीवार के साथ एक आलमारी थी जिसे कमलिनी ने खोला। कुमार ने देखा कि उस दीवार के साथ चाँदी का एक मुट्ठा, जो हाथ भर से छोटा न होगा, लगा हुआ है। इसके सिवाय और कोई चीज उसमें नहीं थी।

कमलिनी––मैं पहले ही आपसे कह चुकी हूँ कि इस तालाब में चारों ओर लोहे का जाल पड़ा हुआ है।

कुमार––हाँ, ठीक है। मगर उस रास्ते में जाल न होगा, जिधर से तुम किश्ती लेकर आती-जाती हो।

कमलिनी––ऐसा खयाल न कीजिए। उस रास्ते में भी जाल है, मगर उसे यहाँ आने का दरवाजा कहना चाहिए, जिसकी ताली यह है। देखिये, अब आप अच्छी तरह समझ जायेंगे। (उस चाँदी के मुट्ठे को कई दफे घुमाकर) अब उतनी दूर का या उस रास्ते का जाल, जिधर से किश्ती लेकर मैं आती-जाती हूँ हट गया, मानो दरवाजा खुल गया। अब मैं क्या, कोई भी जिसको आने-जाने का रास्ता मालूम है, किश्ती पर चढ़ के आ-जा सकता है। जब मैं इसको उलटा घुमाऊँगी तो वह रास्ता बन्द हो जायगा अर्थात् वहाँ भी जाल फैल जायगा, फिर किश्ती नहीं आ सकती।

कुमार––(हँसकर) बेशक यह एक अच्छी बात है।

इसके बाद कमलिनी किश्ती पर सवार होकर तालाब के बाहर गई और उन दोनों आदमियों को गठरी सहित सवार कराके मकान में से आई तथा तालाब में आने का रास्ता उसी रीति से, जैसे कि हम ऊपर लिख चुके हैं, बन्द कर दिया। इस समय यहाँ कई लौंडियाँ भी मौजूद थीं। उन्होंने कमलिनी के इशारे से छत के ऊपर रोशनी का बन्दोबस्त कर दिया और सब कोई छत के ऊपर चले गए। कुमार के पास ही कमलिनी गलीचे पर बैठ गई और वे दोनों आदमी भी गठरी सामने रखकर बैठ गये। इस छत की जमीन चिकने पत्थर की बहुत साफ और सुथरी बनी हुई थी, अगर नजाकत की तरफ खयाल न किया जाय तो फर्श या बिछाबन बिछाकर वहाँ बैठने की कोई जरूरत न थी।

कमलिनी––कुमार, देखिए, इन दोनों आदमियों को मैंने माधवी को गिरफ्तार करने को भेजा था। मालूम होता है कि ये लोग अपना काम पूरा कर आए हैं और इस गठरी में शायद माधवी को ही लाए हैं। (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) क्यों जी, माधवी ही है या किसी दूसरे को लाए हो?

एक––जी, माधवी को ही लाए हैं।

कमलिनी––गठरी खोलो, जरा इसकी सूरत देखू।

उन दोनों ने गठरी खोली, कमलिनी और कुमार ने बड़े चाव से माधवी की सूरत देखी, परन्तु यकायक कमलिनी चौंकी और बोली, "क्या यह जख्मी है?"

एक––जी हाँ, मुझे उम्मीद नहीं कि इसकी जान बचेगी क्योंकि चोट भारी है।

एक––इसे किसने जख्मी किया है?

एक––किसी औरत ने रोहतासगढ़ के तिलिस्मी तहखाने में इसे चोट पहुँचाई है।

कुमार––(कमलिनी की तरफ देखकर) क्या रोहतासगढ़ में कोई तिलिस्मी तहखाना भी है?

कमलिनी––जी हाँ, पर उसका भेद बहुत आदमियों को मालूम नहीं है, बल्कि जहाँ तक मैं समझती हूँ, वहाँ का राजा दिग्विजयसिंह भी उसका पूरा-पूरा हाल न जानता होगा। वहाँ का मामला भी बड़ा ही विचित्र है, किसी समय मैं आपसे उसका हाल कहूँगी।

एक––मगर अब उस तहखाने की रंगत बदल गई।

कमलिनी––सो क्यों?

एक––(कुमार की तरफ इशारा करके) आपके ऐयारों ने उसमें अपना दखल कर लिया, बल्कि ऐसा कहना चाहिए कि रोहतासगढ़ ही ले लिया।

कमलिनी––(कुमार की तरफ देखकर) मुबारक हो, अच्छी खबर आई है।

कुमार––बेशक इस खबर ने मुझे खुश कर दिया। ईश्वर करे, तुम्हारी तारा भी जल्द आ जाय और किशोरी का कुछ हल मालूम हो। (माधवी को गौर से देख और चौंककर) यह क्या? माधवी की दाहिनी कलाई दिखाई नहीं देती।

कमलिनी––(हँसकर) इसका हाल आपको नहीं मालूम?

कुमार––कुछ नहीं।

कमलिनी––पूरा हाल तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर इतना सुना है कि कहीं गयाजी में इसकी और इसके दीवान अग्निदत्त की लड़की कामिनी से लड़ाई हो गई थी। उसी लड़ाई में यह अपनी दाहिनी कलाई खो बैठी। यह भी सुनने में आया है कि यह लड़ाई उसी मकान में हुई थी जिसमें आप लोग रहते थे और इसमें कमला भी शामिल थी।

कमलिनी की यह बात सुन कर कुमार को वे ताज्जुब की बातें याद आ गई जो बीमारी की हालत में गयाजी में महल के अन्दर कई दफे रात के समय देखने में आई थीं और जब कि अन्त में कोठरी के अन्दर एक लाश और औरत की कलाई पाई गई थी।

कुमार––हाँ, अब याद आया। वह मामला भी बड़ा ही विचित्र हुआ था अभी तक उसका ठीक-ठीक पता न लगा।

कमलिनी––क्या हुआ था, जरा मैं भी सुनूँ।

कुमार ने वह सब हाल कहा और जो कुछ देखने और सुनने में आया था, वह भी बताया।

कमलिनी––कमला से मुलाकात हो तो कुछ और सुनने में आवे (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) पहले माधवी को यहाँ से ले जाओ, लौंडियों के हवाले करो और कह दो, इसे कैदखाने में रक्खें और होश में लाकर इसका इलाज करें। इसके बाद आओ तो तुम्हारी जुबानी वहाँ का सब हाल सुनें। शाबाश, तुम लोगों ने बेशक अपना काम पूरा किया, जिससे मैं बहुत ही खुश हूँ।

'बहुत अच्छा' कहकर दोनों आदमी माधवी को वहाँ से उठाकर नीचे ले गए और इधर कमलिनी और कुमार में बातचीत होने लगी।

कमलिनी––(मुस्कराकर) लीजिए आपकी मुराद पूरी होना चाहती है, पहले-पहले यह खुशखबरी मेरे ही सबब से आपको मिली है, सो सबसे भारी इनाम मुझी को मिलना चाहिए।

कुमार––बेशक ऐसी ही बात है, मेरे पास इस वक्त कोई ऐसी चीज नहीं जो तुम्हारी नजर के लायक हो, खैर इसके बदले में मैं खुद अपने को तुम्हारे हाथ में देता हूँ।

कमलिनी––वाह, क्या खूब!

कुमार––सो क्यों?

कमलिनी––आपको अपने बदन पर अख्तियार ही क्या है! यह तो किशोरी की मिलकियत है!

कुमार लाजवाब हो गए और हँसकर चुप हो रहे। कमलिनी बड़ी ही खूबसूरत थी, इसके साथ-ही-साथ उसकी अच्छी चालचलन, मुरौवत, अहसान और नेकियों ने कुमार को अपना ताबेदार बना लिया। उसकी एक-एक बात पर कुमार प्रसन्न होते थे और दिल में बराबर उसकी तारीफ करते थे।

कुमार––कमलिनी, मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, मगर ईश्वर के लिए सच-सच जवाब देना, बात बनाकर टालने की कोशिश न करना।

कमलिनी––कहिए तो सही, क्या बात है? रंग बेढंग मालूम होता है!

कुमार––अगर सच जवाब देने का वादा करो तो पूछूँ, नहीं तो व्यर्थ मुँह क्यों दुखाऊँ।

कमलिनी––आपकी नजाकत तो औरतों से भी बढ़ गई। जरा सी बात कहने में मुँह दुखा जाता है, दम फूलने लगता है। खैर पूछिये, मैं वादा करती हूँ कि सच्चा जवाब दूँगी, अगर कहिए तो कागज पर लिख दूँ!

कुमार––(मुस्कुराकर) यह तो तुम वादा कर ही चुकी हो कि अपना हाल पूरा पूरा मुझसे कहोगी, मगर इस समय मैं तुमसे केवल इतना ही पूछता हूँ कि तुम्हारा कोई वली-वारिस भी है या नहीं? तुम्हारे व्यवहार से स्वतन्त्रता मालूम होती है और यह भी जाना जाता है कि तुम कुँआरी हो।

कमलिनी––यह सवाल जवाब देने योग्य है। (मुस्कराकर) परन्तु क्या किया जाय, वादा करके चुप रहना भी मुनासिब नहीं। वास्तव में मैं स्वतन्त्र हूँ। कुँआरी तो हूँ परन्तु शीघ्र ही मेरी शादी होने वाली है।

कुमार––कब और कहाँ?

कमलिनी––यह दूसरा सवाल है, इसका सच्चा जवाब देने के लिए मैंने वादा नहीं किया है, इसलिए आप इसका उत्तर न पा सकेंगे।

कुमार––अगर इसका भी जवाब दो, तो क्या कोई हर्ज है?

कमलिनी––हाँ हर्ज है, बल्कि नुकसान है।

कुमार चुप हो रहे और जिद करना मुनासिब न जाना। मगर यह सुनकर कि 'शीघ्र ही मेरी शादी होने वाली है' कुमार को रंज हुआ। क्यों रंज हुआ? इसमें कुमार की हानि ही क्या थी? क्या कुछ दूसरा इरादा था? नहीं, नहीं, कुमार यह नहीं चाहते थे कि हम ही इससे शादी करें, वे किशोरी के सच्चे प्रेमी थे, खूबसूरती के अतिरिक्त कमलिनी के अहसानों ने कुमार को ताबेदार बना लिया था और अभी उन्हें कमलिनी से बहुत-कुछ उम्मीद थी तथा यह भी सोचते थे कि ऐसी तरकीब निकल आवे जिससे इस अहसान का बदला चुक जाय। मगर इन बातों से कुमार के रंज होने का मतलब नहीं खुला। खैर, जो हो, पहले यह तो मालूम हो कि कमलिनी है कौन!

वे दोनों आदमी भी, जो माधवी को लाये थे, छत पर आ पहुँचे और हाथ जोड़ कर सामने बैठ गये। कमलिनी ने उनसे खुलासा हाल कहने के लिए कहा और उन दोनों में से एक ने इस तरह कहना सुरू किया।

दोनों––हम दोनों हुक्म के मुताबिक यहाँ से जाकर माधवी को खोजने लगे, मगर उसका पता गयाजी और राजगृह के इलाकों में कहीं भी न लगा। लाचार होकर रोहतासगढ़ किले के पास पहुँचे और पहाड़ी के चारों तरफ घूमने लगे। कभी-कभी रोहतासगढ़ की पहाड़ी के ऊपर भी जाते और घूम-घूमकर पता लगाते कि वहाँ क्या हो रहा है। एक दिन रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर घूमते-फिरते यकायक हम दोनों एक खोह के मुहाने पर जा पहुँचे और वहाँ कई आदमियों के धीरे-धीरे बातचीत करने की आवाज सुनकर एक झाड़ी में, जहाँ से उन लोगों की आवाज साफ सुनाई देती थी, छिपे रहे। अन्दाज से यह मालूम हुआ कि वे लोग कई आदमी हैं और उन्हीं के साथ एक औरत भी हैं। नीचे लिखी बातें हम लोगों ने सुनीं––

एक––न मालूम हम लोगों को कब तक यहाँ अटकना और राह देखना पड़ेगा।

दूसरा––अब हम लोगों को यहाँ ज्यादा दिन न रहना पड़ेगा। या तो काम हो जायेगा या खाली ही लौटकर चले जाने की नौबत आवेगी।

तीसरा––रंग तो ऐसा ही नजर आता है, भाई, जो हो, हमें तो यही विश्वास होता है कि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग तहखाने में घुस गये क्योंकि पहले कभी एक आदमी तहखाने में आता-जाता दिखाई नहीं देता था, बल्कि मैं तो यहाँ तक कह सकता हूँ कि कल उस कब्रिस्तान में हम लोगों ने जिसे देखा था, वह कोई ऐयार ही था।

चौथा––खैर, और दो-तीन दिन में सब मालूम हो जाएगा।

औरत––तुम लोगों का काम चाहे जब हो, मगर मेरा काम तो आज हुआ ही चाहता है। माधवी और तिलोत्तमा को मैंने खूब ही धोखा दिया है। आज उसी कब्रिस्तान की राह से मैं उन दोनों को तहखाने में ले जाऊँगी।

एक––अब तुम्हें वहाँ जाना चाहिए, शायद माधवी वहाँ पहुँच गयी हो।

औरत––हाँ, अब जाती हूँ, पर अभी समय नहीं हुआ।

दूसरा––दम-भर पहले ही पहुँचना अच्छा है।

ये बातें सुनकर मैं उन लोगों को पहचान गया। वे रामू वगैरह धनपतिजी के सिपाही लोग थे और औरत चमेली थी।

इतना सुनते ही कमलिनी ने रोका और पूछा, "जिस खोह के मुहाने पर वे लोग बैठे थे, वहाँ कोई सलई का पेड़ भी है?"

इसके जवाब में उन दोनों ने कहा, "हाँ-ह, दो पेड़ सलई के वहाँ थे, पर उनके सिवाय और दूर-दूर तक कहीं सलई का पेड़ दिखाई नहीं दिया।"

कमलिनी––बस मैं समझ गयी। वह खोह का मुहाना भी तहखाने से निकलने का एक रास्ता है, शायद धनपति ने अपने आदमियों को कह रखा होगा कि मैं किशोरी को लिए हुए इसी राह से निकलूँगी तुम लोग मुस्तैद रहना, इसी से वे लोग वहाँ बैठे थे।

एक––शायद ऐसा ही हो।

कुमार––धनपति कौन है?

कमलिनी––उसे आप नहीं जानते। ठहरिए, पहले इन लोगों का हाल सुन लूँ तो कहूँगी। (उन दोनों की तरफ देखकर) हाँ, तब क्या हुआ?

उसने फिर यों कहना शुरू किया––

"थोड़ी ही देर में चमेली वहाँ से उठी और एक तरफ को रवाना हुई, हम दोनों भी उसके पीछे-पीछे चले और सुबह की सफेदी निकलना ही चाहती थी कि उस कब्रिस्तान के पास पहुँच गये जो तहखाने में जाने का दरवाजा है। हम दोनों एक आड़ की जगह में छिप रहे और तमाशा देखने लगे। उसी समय माधवी और तिलोत्तमा भी वहाँ आ पहुँचीं। तीनों में धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगी जिसे दूर होने के सबब मैं बिलकुल न सुन सका। आखिर वे तीनों तहखाने में घुस गयीं और पहरों गुजर जाने पर भी बाहर न निकलीं। हम दोनों यह निश्चय कर चुके थे कि जब तक वे तहखाने से न निकलेंगी, यहाँ से न टलेंगे। सवेरा हो गया बल्कि धीरे-धीरे तीन पहर दिन भी बीत गया। आखिर हम दोनों तहखाने में घुसने के इरादे से कब्रिस्तान में गये। वहाँ पहुँचकर हमारे साथी ने कहा, "आखिर हम लोग दिन-भर परेशान हो ही चुके हैं, अब शाम हो लेने दो, तो तहखाने में चलें।" मैंने भी यही मुनासिब समझा और हम दोनों आदमी वहाँ से लौटना ही चाहते थे कि तहखाने का दरवाजा खुला और चमेली दिखाई पड़ी, हम दोनों को भी चमेली ने देखा और पहचाना, मगर उसको ठहरने या कुछ कहने का साहस न हुआ। वह कुछ परेशान मालूम होती थी और खुन से भरा हुआ एक छुरा उसके हाथ में था। हम दोनों ने भी उसको कुछ टोकना मुनासिब न समझा और यह विचार कर कि शायद कोई और भी इस तहखाने से निकले, एक कब्र की आड़ में छिपकर बीच वाली कब्र, अर्थात् तहखाने के दरवाजे की तरफ देखने लगे। चमेली हम लोगों को देखते-देखते भाग गयी और थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा।

"थोड़ी देर बाद हम लोगों ने दूर से राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार पण्डित बद्रीनाथ को आते देखा। वह तहखाने के दरवाजे पर पहुँचे ही थे कि अन्दर से तिलोत्तमा निकली और पण्डित बद्रीनाथ ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ही एक बूढ़ा आदमी तहखाने से निकला और पण्डित बद्रीनाथ से बातें करने लगा। हम लोगों को कुछ-कुछ वे बातें सुनाई देती थीं। इतना मालूम हो गया कि तहखाने के अन्दर खून हुआ है और इन दोनों ने तिलोत्तमा को दोषी ठहराया है, मगर हम लोगों ने खून से भरा हुआ छुरा हाथ में लिए चमेली को देखा था, इसलिए विश्वास था कि अगर तहखाने में कोई खून हुआ है तो जरूर चमेली के ही हाथ से हुआ, तिलोत्तमा निर्दोष है।

"पण्डित बद्रीनाथ और वह बूढ़ा आदमी तिलोत्तमा को लेकर फिर तहखाने में घुस गये। हम लोगों ने भी वहाँ अटकना मनासिब न समझा और थोड़ी ही देर बाद हम लोग भी तहखाने में घुस गये तथा तहखाने की पचासों कोठरियों में घूमने और देखने लगे कि कहाँ क्या होता है। बद्रीनाथ थोड़ी ही देर बाद तहखाने के बाहर निकल गये और हम लोगों ने तिलोत्तमा को एक खम्भे से साथ बँधे हुए पाया। हम्माम वाली कोठरी में माधवी को पड़े हुए पाकर हम लोग बड़े खुश हुए और उसे उठाकर ले भागे, फिर न मालूम, पीछे क्या हुआ और किस पर क्या गुजरी

कमलिनी––ताज्जुब नहीं कि वहाँ के दस्तूर के मुताबिक तिलोत्तमा की बलि दे दी गयी हो!

एक––जो भी हो।

इतने ही में नीचे से एक लौंडी दौड़ी हुई आयी और हाथ जोड़कर कमलिनी से बोली, "तारा आ गयी, तालाब के बाहर खड़ी है!"

तारा के आने की खबर सुनकर कमलिनी बहुत खुश हुई और खुशी के मारे कुँअर इन्द्रजीतसिंह की घबराहट का तो ठिकाना ही न रहा, क्योंकि तारा ही की जुबानी रोहतासगढ़ का हाल और बेचारी किशोरी की खबर सुनने वाले थे और इसी के बाद कमलिनी का असल भेद उन्हें मालूम होने को था।

कमलिनी––(कुमार की तरफ देखकर) जिस तरह इन दोनों आदमियों को मैं तालाब के बाहर लायी हूँ उसी तरह तारा को भी लाना पड़ेगा।

कुमार––हाँ-हाँ, उसे बहुत जल्द लाओ। मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।

कमलिनी––आप क्यों तकलीफ करते हैं। बैठिए, मैं उसे अभी लाती हूँ। (दोनों आदमियों की तरफ देखकर) चलो, तुम दोनों को भी तालाब के बाहर पहुँचा दूँ।

लाचार कुमार उसी जगह बैठे रहे। उन दोनों आदमियों को साथ लेकर कमलिनी वहाँ से चली गयी तथा थोड़ी देर में तारा को लेकर आ पहुँची। कुँअर इन्द्रजीत सिंह को देखकर तारा चौंकी और बोली––

तारा––क्या कुमार यहाँ विराज रहे हैं?

कमलिनी––हाँ, कई दिनों से यहाँ हैं और तुम्हारी राह देख रहे हैं। तुम्हारी जुबानी रोहतासगढ़ और किशोरी तथा लाली और कुन्दन का असल भेद और हाल सुनने के लिए बड़े बेचैन हो रहे हैं। आओ, मेरे पास बैठ जाओ और कहो, क्या हाल है?

तारा––(ऊँची साँस लेकर) अफसोस, मैं इस समय यहाँ बैठ नहीं सकती और न कुछ वहाँ का हाल ही कह सकती हूँ, क्योंकि हम लोगों का यह समय बड़ा ही अमूल्य है। कुमार को यहाँ देख मैं बहुत खुश हुई, अब वह काम बखूबी निकल जायगा! कुमार की तरफ देखकर) बेचारी किशोरी इस समय बड़े ही संकट में पड़ी हुई है। अगर आप उनकी जान बचाना चाहते हैं तो इस समय मुझसे कुछ न पूछिये, बस तुरन्त खड़े होइए और जहाँ मैं चलती हूँ, चले चलिये, हाँ, यदि बन बड़ा तो रास्ते में मैं वहाँ का हाल आपसे कहूँगी। (कमलिनी की तरफ देखकर) आप भी चलिए और कुछ आदमी अपने साथ लेती चलिए, मगर सब कोई घोड़े पर सवार और लड़ाई के सामान से दुरुस्त रहें।

कमलिनी––ऐसा ही होगा।

कुमार––(खड़े होकर) मैं तैयार हूँ।

तीनों आदमी छत के नीचे उतरे और तारा के कहे मुताबिक कार्रवाई की गयी।

सुबह की सफेदी आसमान पर निकलना ही चाहती है। आओ, देखो, हमारा बहादुर नौजवान कुँअर इन्द्रजीतसिंह किस ठाठ से मुश्की घोड़े पर सवार मैदान की तरफ घोड़ा फेंके चला जा रहा है और उसकी पेटी से लटकती हुई जड़ाऊ नयाम (म्यान) की तलवार किस तरह उछल-उछलकर घोड़े के पेट में थपकियाँ मार रही है, मानो उसकी चाल की तेजी पर शाबाशी दे रही है। कुमार के आगे-आगे घोड़े पर सवार तारा जा रही है, कुमार के पीछे सब्ज घोड़े पर कमलिनी सवार है और घोड़े की तेजी को बढ़ाकर कुमार के बराबर होना चाहती है। उसके पीछे दस दिलावर और बहादुर सवार घोड़ा फेंके चले जा रहे हैं और इस जंगली मैदान के सन्नाटे को घोड़ों के टापों की आवाज से तोड़ रहे हैं।

४

हम ऊपर लिख आये हैं कि देवीसिंह को साथ लेकर शेरसिंह कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए रोहतासगढ़ से रवाना हुए। शेरसिंह इस बात को तो जानते थे कि भी खबर कुँअर इन्द्रजीतसिंह फलाँ जगह हैं परन्तु उन्हें तालाब के गुप्त भेदों की न थी। राह में आपस में बातचीत होने लगी।

देवीसिंह––लाली का भेद कुछ मालूम हुआ?

शेरसिंह––अफसोस, उसके और कुन्दन के बारे में मुझसे बड़ी भारी भूल हुई। ऐसा धोखा खाया कि शर्म के मारे कुछ कह नहीं सकता।

देवीसिंह––इसमें शर्म की क्या बात है। ऐसा कोई ऐयार दुनिया में न होगा जिसने कभी धोखा न खाया हो। हम लोग कभी धोखा देते हैं, कभी स्वयं धोखे में आ जाते हैं, फिर इसका अफसोस कहाँ तक किया जाय!

शेरसिंह––आपका कहना बहुत ठीक है, खैर, इस बारे में मैंने जो-कुछ मालूम किया है उसे कहता हूँ! यद्यपि थोड़े दिनों तक मैंने रोहतासगढ़ से अपना सम्बन्ध छोड़ दिया था, तथापि मैं कभी-कभी वहाँ जाया करता और गुप्त राहों से महल के अन्दर जाकर वहाँ की खबर भी लिया करता था। जब किशोरी वहाँ फँस गयी तो अपनी भतीजी कमला के कहने से मैं वहाँ दूसरे-तीसरे बराबर जाने लगा। लाली और कुन्दन को मैंने महल में देखा। यह न मालूम हुआ कि ये दोनों कौन हैं। बहुत-कुछ पता लगाया मगर कुछ काम न चला। परन्तु कुन्दन के चेहरे पर जब मैं गौर करता तो मुझे शक होता कि वह सरला है।

देवीसिंह––सरला कौन?

शेरसिंह––वही, सरला जिसे तुम्हारी चम्पा ने चेली बनाकर रखा था और जो उस समय चम्पा के साथ थी जब उसने एक खोह के अन्दर माधवी के ऐयार की लाश काटी थी।

देवीसिंह––हाँ वह छोकरी, मुझे अब याद आया। मालूम नहीं कि आजकल वह कहाँ है। खैर, तब क्या हुआ? तुमने समझा कि वह सरला है मगर उस खोह का और लाश काटने का हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ?

शेरसिंह––वह हाल स्वयं सरला ने कहा था। वह मेरे आपस वालों में से है। इत्तिफाक से एक दिन मुझसे मिलने के लिए रोहतासगढ़ आयी थी, तब सब हाल मैंने सुना था। मगर मुझे यह नहीं मालूम कि आजकल वह कहाँ है।

शेरसिंह––एक यही भेद खोलने की नीयत से मैं रात के समय रोहतासगढ़ महल के अन्दर गया और छिपकर सरला के सामने जाकर बोला, "मैं पहचान गया कि तू सरला है, फिर अपना भेद मुझसे क्यों छिपाती है?" इसके जवाब में कुन्दन से पूछा, "तुम कौन हो?"

मैं––शेरसिंह।

सरला––मुझे जब तक निश्चय न हो कि तुम शेरसिंह ही हो, मैं अपना भेद कैसे कहूँ?

मैं––क्या तू मुझे नहीं पहचानती?

सरला––क्या जाने, कोई ऐयार सूरत बदल के आया हो। अगर तुम पहचान गए कि मैं सरला हूँ तो कोई ऐसी छिपी हुई बात कहो जो मैंने तुमसे कही हो।

इसके जवाब में मैं वही खोह वाला अर्थात् लाश काटने वाला किस्सा कह गया और अन्त में मैं बोला कि यह हाल स्वयं तूने मुझसे बयान किया था।

उस किस्से को सुनकर कुन्दन हँसी और बोली, "हाँ, अब मैं समझ गयी। मैं चम्पा के हुक्म से यहाँ का हाल-चाल लेने आयी थी और अब किशोरी को छुड़ाने की फिक्र में हूँ। मगर लाली मेरे काम में बाधा डालती है। कोई ऐसी तरकीब बताइये जिसमें लाली मुझसे दबे और डरे।"

मैं उस समय यह कहकर वहाँ से चला आया कि अच्छा, मैं सोच कर इसका जवाब दूँगा।

देवीसिंह––तब क्या हुआ?

शेरसिंह––मैं वहाँ से रवाना हुआ और पहाड़ी के नीचे उतरते समय एक विचित्र बात मेरे देखने और सुनने में आई।

देवीसिंह––वह क्या?

शेरसिंह––जब मैं अँधेरी रात में पहाड़ी के नीचे उतर रहा था तो जंगल में मालूम हुआ कि दो-तीन आदमी जो पगडण्डी के पास ही थे, आपस बातें कर रहे हैं। मैं पैर दवाता हुआ उनके पास गया और छिपकर बातें सुनने लगा, मगर उस समय उनकी बातें समाप्त हो चुकी थीं, केवल एक आखिरी बात सुनने में आई।

देवीसिंह––वह क्या थी?

शेरसिंह––एक ने कहा––'भरसक तो लाली और कुन्दन दोनों उन्हीं में से हैं, नहीं तो लाली तो जरूर इन्द्रजीतसिंह की दुश्मन है! मगर इसकी पहचान तो सहज ही में हो सकती है। केवल 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' और 'आँचल पर गुलामी की दस्तावेज' इन दोनों जुमलों से अगर वह डर जाय, तो हम समझ जायँगे कि वीरेन्द्रसिंह की दुश्मन है। खैर, बूझा जायगा, पहले महल में जाने का मौका भी तो मिले। इसके बाद और कुछ सुनने में न आया और वे लोग वहाँ से न मालूम कहाँ चले गए। दूसरे दिन मैं फिर कुन्दन के पास गया और उससे बोला कि "तू लाली के सामने 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' और 'आँचल पर गुलामी की दस्तावेज' का जिक्र करके देख, क्या होता है!"

देवीसिंह––फिर क्या हुआ?

शेरसिंह––तीन-चार दिन बाद मैं कुन्दन के पास गया तो उसकी जुबानी मालूम हुआ कि कुन्दन के मुँह से वे बातें सुनकर लाली बहुत डरी और उसने कुन्दन का मुकाबला करना छोड़ दिया। मगर मुझे थोड़े ही दिनों में मालूम हो गया कि कुन्दन सरला न थी, उसने मुझे धोखा दिया और चालाकी से मेरी जुबानी भेद मालूम करके अपना काम निकाल लिया। मुझे इस बात की बड़ी शर्म है कि मैंने अपने दुश्मन को दोस्त समझा और धोखा खाया।

देवीसिंह––अक्सर ऐसा धोखा हो जाता है। खैर, लाली तो अभी हम लोगों के कैद ही में है, कहीं जाती नहीं, रही कुन्दन, सो इन्द्रजीतसिंह को लेकर लौटने पर कोई तरकीब ऐसी जरूर निकाली जायगी, जिसमें बाकी लोगों का असल हाल मालूम हो।

इसी तरह की बातें करते हुए दोनों ऐयार चलते गये। रात को एक जगह दो-तीन घण्टे आराम किया और फिर चल पड़े। सवेरा होते-होते एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ एक छोटा-सा टीला ऐसा था जिस पर चढ़ने से दूर-दूर तक की जमीन दिखाई देती थी तथा वहाँ से कमलिनी का तालाब वाला मकान भी बहुत दूर न था। दोनों ऐयार उस टीले पर चढ़ गये और मैदान की तरफ देखने लगे। यकायक शेरसिंह ने चौंक कर कहा, "अहा, हम लोग क्या अच्छे मौके पर आये हैं! देखो, वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और वह औरत, जिसने उन्हें फँसा रक्खा है, घोड़े पर सवार इसी तरफ चले आ रहे हैं!"

देवीसिंह––हाँ, ठीक तो है, उनके साथ और भी कई सवार हैं।

शेरसिंह––मालूम होता है, उस औरत ने उन्हें अच्छी तरह अपने वश में कर लिया है। बेचारे इन्द्रजीतसिंह क्या जानें कि यह उनकी दुश्मन है। चाहे जो हो, इस समय इन लोगों को आगे न बढ़ने देना चाहिए।

देवीसिंह––सबके आगे एक औरत घोड़े पर सवार आ रही है। मालूम होता है कि उन लोगों को रास्ता दिखाने वाली यही है।

शेरसिंह––बेशक ऐसा ही है, तभी तो सब कोई उसके पीछे-पीछे चल रहे हैं। पहले उसी को रोकना चाहिए, मगर घोड़ों की चाल बहुत तेज है।

देवीसिंह––कोई हर्ज नहीं, हम दोनों आदमी घोड़े की राह पर अड़कर खड़े हो जायँ और अपने को घोड़े से बचाने के लिए मुस्तैद रहें। अच्छी नसल का घोड़ा यकायक आदमी के ऊपर टाप न रक्खेगा, वह लोगों को राह में देख जरूर अड़ेगा या झिककेगा, बस, उसी समय घोड़े की बाग थाम लेंगे।

दोनों ऐयारों ने बहुत जल्द अपनी राय ठीक कर ली और दोनों आदमी एक साथ घोड़ों की राह में अड़ के खड़े हो गये। बात-की-बात में वे लोग भी आ पहुँचे। तारा का घोड़ा रास्ते में आदमियों को खड़ा देख कर झिझका और आड़ देकर बगल की तरफ घूमना चाहा, उसी समय देवीसिंह ने फुर्ती से लंगाम पकड़ ली। इस समय तारा का घोड़ा लाचार रुक गया और उसके पीछे आने वालों को भी रुकना पड़ा। कुँअर इन्द्रजीत सिंह शेरसिंह को तो नहीं जानते थे, मगर देवीसिंह को उन्होंने पहचान लिया और समझ गये कि ये लोग मेरी ही खोज में घूम रहे हैं। आखिर वे देवीसिंह के पास आये और बोले––

कुमार––यद्यपि आप सब काम मेरी भलाई ही के लिए करते होंगे, परन्तु इस समय हम लोगों को रोका सो अच्छा न किया।

देवीसिंह––क्या मामला है, कुछ कहिए तो!

कुमार––(जल्दी में घबराए हुए ढंग से) बेचारी किशोरी एक आफत में फँसी हुई है उसी को बचाने जा रहे हैं।

देवीसिंह––किस आफत में फँसी है?

कुमार––इतना कहने का मौका नहीं है।

देवीसिंह––यह औरत आपको अवश्य धोखा देगी जिसके साथ आप जा रहे हैं।

कुमार––ऐसा नहीं हो सकता, यह बड़ी ही नेक और मेरी हमदर्द है।

इतना सुनते ही कमलिनी आगे बढ़ आई और देवीसिंह से बोली––

कमलिनी––मैं खूब जानती हूँ कि आप लोगों को मेरी तरफ से शक है, तथापि मुझे कहना ही पड़ता है कि इस समय आप हम लोगों को न रोकें, नहीं तो पछताना पड़ेगा। यदि आप लोगों को मेरी और कुमार की बात का विश्वास न हो तो मेरे सवारों में से दो आदमी घोड़ों पर से उतर पड़ते हैं, उनके बदले में आप दोनों आदमी घोड़ों पर सवार होकर साथ चलें और देख लें कि हम आपके खैरख्वाह हैं या बदख्वाह।

देवीसिंह––बेशक यह अच्छी बात है और मैं इसे मंजूर करता हूँ।

कमलिनी के इशारा करते ही दो सवारों ने घोड़ों की पीठ खाली कर दी। उनके बदले में देवीसिंह और शेरसिंह सवार हो गए और फिर उसी तरह सफर शुरू हुआ। इस समय कुछ-कुछ सूरज निकल चुका था और सुनहरी धूप ऊँचे पेड़ों के ऊपर वाले हिस्सों पर फैल चुकी थी।

आधे घण्टे और सफर करने के बाद वे लोग उस जगह पहुँचे जहाँ धनपति ने किशोरी को जलाकर खाक कर डालने के लिए चिता तैयार की थी और जहाँ से दीवान अग्निदत्त लड़-भिड़कर किशोरी को ले गया था। इस समय भी वह चिता कुछ बिगड़ी हुई सूरत में तैयार थी और इधर-उधर बहुत-सी लाशें पड़ी हुई थीं। उस जगह पहुँचकर तारा ने घोड़ा रोका और इसके साथ ही सब लोग रुक गये। तारा ने कमलिनी की तरफ देखकर कहा––

तारा––बस, इसी जगह मैं आप लोगों को लाने वाली थी, क्योंकि इसी जगह धनपति के बहुत से आदमी मौजूद थे और यहीं वह किशोरी को लेकर आने वाली थी। (लाशों की तरफ देखकर) मालूम होता है, यहाँ बहुत खून-खराबा हुआ है!

कमलिनी––तूने कैसे जाना कि किशोरी को लेकर धनपति इसी जगह आने वाली थी और धनपति को तूने कहाँ छोड़ा था?

तारा––रात के समय खूब छिपकर धनपति के आदमियों की बात मैंने सुनी थी जिससे बहुत-कुछ हाल मालूम हुआ था और धनपति को मैंने उसी खोह के मुहाने पर छोड़ा था जो रोहतासगढ़ तहखाने से बाहर निकलने का रास्ता है और जहाँ सलई के दो पेड़ लगे हैं। उस समय बेहोश किशोरी धनपति के कब्जे में थी और धनपति के कई आदमी वहाँ मौजूद थे। उन लोगों की बातें सुनने से मुझे विश्वास हो गया था कि वे लोग किशोरी को लिए हुए इसी जगह आवेंगे। (एक लाश की तरफ देख के और चौंक के) देखिए, पहिचानिए।

कमलिनी––बेशक यह धनपति का नौकर है। (और लाशों को भी अच्छी तरह देखकर) बेशक धनपति यहाँ तक आई थी, पर किसी से लड़ाई हो गई जो इन लाशों को देखने से जाना जाता है। मगर इनमें बहुत-सी लाशें ऐसी हैं जिन्हें मैं नहीं पहचानती। न मालूम इस लड़ाई का क्या नतीजा हुआ, धनपति गिरफ्तार हो गई या भाग गई, और किशोरी किसके कब्जे में पड़ गई! (कुमार की तरफ देखकर) शायद आपके सिपाही या ऐयार लोग यहाँ आए हों?

कुमार––नहीं। (देवीसिंह की तरफ देखकर) आप क्या खयाल करते हैं?

देवीसिंह––खयाल तो मैं बहुत-कुछ करता हूँ, इसका हाल कहाँ तक पूछिएगा, मगर इन लाशों में हमारी तरफ वालों की कोई लाश नहीं है जिससे यह मालूम हो कि वे लोग यहाँ आये होंगे।

सब लोग इधर-उधर घूमकर उन लाशों को देखने लगे। यकायक देवीसिंह एक ऐसी लाश के पास पहुँचे जिसमें जान बाकी थी और वह धीरे-धीरे कराह रहा था। उसके बदन में कई जगह जख्म लगे हुए थे और कपड़े खून से तर थे। देवीसिंह ने कुमार की तरफ देख के कहा, "इसमें जान बाकी है, अगर बच जाय और कुछ बातचीत कर सके, तो बहुत-कुछ हाल मालूम होगा।"

कई आदमी उस लाश के पास जा मौजूद हुए और उसे होश में लाने की फिक्र करने लगे। उसके जख्मों पर पट्टी बाँधी गई और ताकत देने वाली दवा भी पिलाई गई। घोड़े नंगी पीठ करके दम लेने, हरारत मिटाने और चरने के लिए लम्बी बागडोरों से बाँध कर छोड़ दिए गए।

आधे घण्टे बाद उस आदमी को होश आया और उसने कुछ बोलने का इरादा किया, मगर जैसे ही उसकी निगाह कमलिनी पर पड़ी, वह काँप उठा और उसके चेहरे पर मुर्दनी छा गई। उसके दिल का हाल कमलिनी समझ गई और उसके पास जाकर मुलायम आवाज में बोली, "बाँकेसिंह, डरो मत, मैं वादा करती हूँ कि तुम्हें किसी तरह की तकलीफ न दूँगी। हाँ, होश में आओ और मेरी बात का जवाब दो।"

कमलिनी की बात सुनकर उसके चेहरे की रंगत बदल गई, डर की निशानी जाती रही, और यह भी जाना गया कि वह कमलिनी की बातों का जवाब देने के लिए तैयार है।

कमलिनी––किशोरी को लेकर धनपति यहाँ आई थी?

बाँकेसिंह––(सिर हिलाकर धीरे से) हाँ, मगर...

कमलिनी––मगर क्या?

बाँकेसिंह––उसने किशोरी को जला देना चाहा था, मगर एकाएक अग्निदत्त और उसके साथी लोग आ पहुँचे और लड़-भिड़ कर किशोरी को ले गये। हम लोग उन्हीं के हाथ से जख्मी...

बाँकेसिंह ने इतनी बातें धीरे-धीरे और रुक-रुककर कहीं क्योंकि जख्मों से ज्यादे खून निकल जाने के कारण वह बहुत ही कमजोर हो रहा था, यहाँ तक कि बात पूरी न कर सका और गश में आ गया। इन लोगों ने उसे होश में लाने के लिए बहुत-कुछ उद्योग किया मगर दो घण्टे तक होश न आया। इस बीच में देवीसिंह ने उसे कई दफे दवा पिलाई।

देवीसिंह––इसमें कोई शक नहीं कि यह बच जायगा।

शेरसिंह––(देवीसिंह की तरफ देखकर) हमने (कमलिनी की तरफ इशारा करके) इनके बारे में भी धोखा खाया, वास्तव में यह कुमार के साथ नेकी कर रही हैं।

देवीसिंह––बेशक यह कुमार की दोस्त हैं, मगर तुमने इनके बारे में कई बातें ऐसी कही थीं कि अब भी

कुमार––नहीं-नहीं देवीसिंह जी, मैं इन्हें अच्छी तरह आजमा चुका हूँ; सच तो यह है कि इन्हीं की बदौलत आज आप लोगों ने मेरी सूरत देखी।

इसके बाद कुमार ने शुरू से अपना पूरा किस्सा देवीसिंह से कह सुनाया और कमलिनी की बड़ी तारीफ की।

कमलिनी––आप लोगों ने मेरे बारे में बहुत-सी बातें सुनी होंगी और वास्तव में मैंने जैसे काम किये हैं वे ऐसे नहीं कि कोई मुझ पर विश्वास कर सके। हाँ, जब आप लोग मेरा असल भेद जान जायेंगे तो अवश्य कहेंगे कि तुम्हारे हाथ से कभी कोई बुरा काम नहीं हुआ। अभी कुमार को भी मेरा कुछ हाल मालूम नहीं। समय मिलने पर मैं अपना विचित्र हाल आप लोगों से कहूँगी और उस समय आप लोग भी कहेंगे कि बेशक शेरसिंह और उनकी भतीजी कमला ने मेरे बारे में धोखा खाया।

शेरसिंह––(ताज्जुब में आकर) आप मुझे और मेरी भतीजी कमला को कैसे जानती हैं?

कमलिनी––मैं आप लोगों को बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ। हाँ, आप लोग मुझे नहीं जानते और जब तक मैं स्वयं अपना हाल न कहूँ, जान भी नहीं सकते।

इसके बाद कुमार ने देवीसिंह से शेरसिंह का हाल पूछा और उन्होंने सब हाल कहा। इसी समय उस जख्मी ने फिर आँखें खोलीं और पीने के लिए पानी माँगा जिसका इलाज ये लोग कर रहे थे।

अबकी दफे बाँकेसिंह अच्छी तरह होश में आ गया और कमलिनी के पूछने पर उसने इस तरह बयान किया––

"इसमें कोई सन्देह नहीं कि अग्निदत्त किशोरी को ले गया क्योंकि मैं उसे बखूबी पहचानता हूँ। मगर यह नहीं मालूम कि किशोरी की तरह धनपति भी उसके पंजे में फँस गई या निकल भागी, क्योंकि लड़ाई खतम होने के पहले ही मैं जख्मी होकर गिर पड़ा था। मैं जानता था कि अग्निदत्त बहुत-से बदमाशों और लुटेरों के साथ यहाँ से थोड़ी दूर एक पहाड़ी पर रहता है और इसी सबब से धनपति को मैंने कहा भी था कि इस जगह आपका अटकना मुनासिब नहीं, मगर होनहार को क्या किया जाय! (हाथ जोड़कर) महारानी, न मालूम क्यों आपने हम लोगों को त्याग दिया? आज तक इसका ठीक पता हम लोगों को न लगा।"

बाँकेसिंह की आखिरी बात का जवाब कमलिनी ने कुछ न दिया और उससे उस पहाड़ी का पूरा पता पूछा जहाँ अग्निदत्त रहता था। बाँकेसिंह ने अच्छी तरह वहाँ का पता दिया। कमलिनी ने अपने सवारों में से एक को बाँकेसिंह के पास छोड़ा और बाकी सब को साथ ले वहाँ से रवाना हुई। इस समय कुँअर इन्द्रजीतसिंह की क्या अवस्था थी इसे अच्छी तरह समझना जरा कठिन था। कमलिनी की नेकी, किशोरी की दशा, इश्क की खिंचाखिंची और अग्निदत्त की कार्रवाई के सोच-विचार में ऐसे मग्न हुए कि थोड़ी देर के लिए तन-बदन की सुध भुला दी। केवल इतना जानते रहे कि कमलिनी के पीछे-पीछे किसी काम के लिए कहीं जा रहे हैं। सूर्य अस्त होने के बाद ये लोग उस पहाड़ी के नीचे पहुँचे जिस पर अग्निदत्त रहता था और जहाँ खोह वे अन्दर किशोरी की अन्तिम अवस्था ऊपर के बयान में लिख आये हैं।

इन लोगों का दिल इस समय ऐसा न था कि इस पहाड़ी के नीचे पहुँच कर किसी जरूरी काम के लिए भी कुछ देर तक अटकते। घोड़ों को पेड़ों से बाँध तुरंत चढ़ने लगे और बात-की-बात में पहाड़ी के ऊपर जा पहुँचे। सबसे पहले जिस चीज पर इन लोगों की निगाह पड़ी वह एक लाश थी जिसे इन लोगों में से कोई भी नहीं पहचानता था और इसके बाद भी बहुस-सी लाशें देखने में आई, जिससे इन लोगों का दिल छोटा हो गया और सोचने लगे कि देखें, किशोरी से मुलाकात होती है या नहीं।

इस पहाड़ी के ऊपर एक छोटी-सी मढ़ी बनी हुई थी जिसमें बीस-पच्चीस आदमी रह सकते थे और इसी की बगल में एक गुफा थी जो बहुत लम्बी और अँधेरी थी। पाठक, यह वही गुफा थी जिसमें बेचारी किशोरी दुष्ट अग्निदत्त के हाथ से बेबस होकर जमीन पर गिर पड़ी थी।

इस पहाड़ी के ऊपर बहुत-सी लाशें पड़ी हुई थीं, किसी का सिर कटा हुआ था, किसी को तलवार ने जनेवा काट गिराया था, कोई कमर से दो टुकड़े था, किसी का हाथ कटकर अलग हो गया था, किसी के पेट को खंजर ने फाड़ डाला था और आँत बाहर निकल पड़ी थी, मगर किसी जीते आदमी का नाम-निशान वहाँ न था। ऐसी अवस्था देखकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह बहुत घबराये और उन्हें किसी के मिलने से नाउम्मीदी हो गई। ऐयारों ने बटुए से सामान निकालकर बत्ती जलाई और खोह के अन्दर घुसकर देखा तो वहाँ भी एक लाश के सिवाय और कुछ न दिखाई पड़ा। निगाह पड़ते ही देवीसिंह ने पहचान लिया कि यह अग्निदत्त की लाश है। एक खंजर उसके कलेजे में अभी तक चुभा हुआ मौजूद था, केवल उसका कब्जा बाहर दिखाई दे रहा था, उसके पास ही एक लपेटा हुआ कागज पड़ा था। देवीसिंह ने वह कागज उठा लिया और दोनों ऐयार उस लाश को बाहर लाये।

सभी ने अग्निदत्त की लाश को देखा और ताज्जुब किया।

शेरसिंह––इस हरामजादे को इसके कुकर्मों की सजा न मालूम किसने दी!

कमलिनी––हाय, इस कम्बख्त की बदौलत बेचारी किशोरी पर न मालूम क्या-क्या आफतें आईं और अब वह कहाँ या किस अवस्था में है!

देवीसिंह––(चिट्ठी दिखाकर) इसकी लाश के पास से यह चिट्ठी भी मिली है, शायद इससे कुछ पता चले।

कमलिनी––हाँ-हाँ, इसे पढ़ो तो सही, देखें, क्या लिखा है।

सभी का ध्यान उस चिट्ठी पर गया। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने वह चिट्ठी देवीसिंह के हाथ से ले ली और पढ़कर सभी को सुनायी। यह लिखा था–– "आखिर हरामजादी किशोरी मेरे हाथ लगो! इसमें कोई शक नहीं कि अब यह अपने किये का फल भोगेगी। इसकी शैतानी ने मुझे जीते-जी मार ही डाला था मगर मैंने भी पीछा न छोड़ा। कम्बख्त अग्निदत्त की क्या हकीकत थी जो मेरे हाथ से अपनी जान बचा ले जाता। मैं उन लोगों को ललकारता हूँ जो अपने को बहादुर, दिलेर और राजा मानते हैं! कहाँ हैं वीरेन्द्रसिंह, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह, जो अपनी बहादुरी का दावा रखते हैं? आवें और मेरा चरण छू कर माफी माँगें। कहाँ हैं उनके ऐयार, जो अपने को विधाता ही समझ बैठे हैं? आवें और मेरे ऐयारों के सामने सिर झुकावें। मुझे विश्वास है कि उन लोगों में से कोई-न-कोई किशोरी को खोजता यहाँ जरूर आवेगा और इसलिए मैं यह चिट्ठी लिखकर यहाँ रक्खे जाता हूँ कि ऊपर लिखे व्यक्ति या उनके साथी और मददगार लोग, चाहे जो कोई भी हों, अपनी-अपनी जान बचावें, क्योंकि उनकी मौत आ चुकी है और अब वे लोग मेरे हाथ से किसी तरह बच नहीं सकते। कोई यह न कहे कि मैं छिपकर अपना काम करता हूँ और किसी को अपनी सूरत नहीं दिखाता। जिसको मेरी सूरत देखनी हो मेरे घर चला आवे, मगर होशियार रहे क्योंकि मेरे सामने आनेवाले की भी वही दशा होगी जो यहाँ वालों की हुई। लो, मैं अपना पता भी बताये देता हूँ, जिसको आना हो, मेरे पास चला आवे। यहाँ से पाँच कोस पूरब एक नाला है उसी के किनारे दक्खिन रुख दो कोस तक चले जाने के बाद मेरा मकान दिखाई पड़ेगा।

इस चिट्ठी ने सब को अपने आपे से बाहर कर दिया। मारे क्रोध के कुँअर इन्द्रजीतसिंह की आँखें कबूतर के खून की तरह सुर्ख हो गईं। देवीसिंह और शेरसिंह दाँत पीसने लगें।

कुमार––चाहे जो हो, मगर इस हरामजादे से मुकाबला किये बिना मैं किसी तरह आराम नहीं कर सकता।

देवीसिंह––बेशक इसको इस ढिठाई की सजा दी जायगी।

कुमार––अब यहाँ ठहरना व्यर्थ है, चलकर उसे ढूँढ़ना चाहिए।

कमलिनी––बेशक उसने बड़ी वेअदबी की है, उसे जरूर सजा देनी चाहिए। मगर आप लोग बुद्धिमान हैं, मुझे विश्वास है कि बिना समझे-बूझे किसी काम में जल्दी न करेंगे।

कुमार––ऐसे समय में विलम्ब करना अपनी बहादुरी में बट्टा लगाना है।

कमलिनी––आप इस समय क्रोध में हैं इसलिए ऐसा कहते हैं, नहीं तो आप स्वयं पहले किसी ऐयार को भेजना मुनासिब समझते। इतनी बड़ी शेखी के साथ पत्र लिखने वाले को मैं सच्चा नहीं समझ सकती। खुल्लमखुल्ला आप लोगों का का मुकाबला करना हँसी-खेल है? क्या यह केवल उन्हीं आदमियों का काम है जो दगाबाज नहीं, बल्कि सच्चे बहादुर हैं? कभी नहीं, कभी नहीं, बेशक यह कोई पूरा बेईमान और हरामजादा आदमी है। इसके अतिरिक्त आप जरा इस रात के समय और अपने घोड़ों की हालत पर तो ध्यान दीजिये कि अब वे एक कदम भी चलने लायक नहीं रहे।

यद्यपि कुमार और उनके ऐयार इस समय बड़े क्रोध में थे परन्तु कमलिनी की सच्ची हमदर्दी के साथ मीठी-मीठी बातों ने उन्हें ठंडा किया और इस लायक बनाया कि वे नेक और बद को सोच सकें। कमलिनी के आदमियों के साथ और ऐयारों के बटुए में बहुत-कुछ खाने का सामान था। पहाड़ी के नीचे एक छोटा-सा चश्मा बह रहा था, वहाँ से जल मँगवाया गया और सभी ने कुछ खाकर जल पीया, इसके बाद फिर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

देवीसिंह––जिस मकान का इस चिट्ठी में पता दिया गया है यदि वहाँ न जाना चाहिए तो यहाँ रहना भी मुनासिब नहीं, क्योंकि वे दगाबाज लोग इस जगह से भी बेफिक्र न होंगे। मेरी राय तो यही है कि शेरसिंह के साथ कुमार विजयगढ़ जायँ और मैं उस मकान की खोज में जाकर देखूँ कि वहाँ क्या है।

कमलिनी––आपका कहना बहुत ठीक है, मैं भी यही मुनासिब समझती हूँ, इस बीच में मुझे भी दो-एक दुश्मनों का पता लगा लेने का मौका मिलेगा, क्योंकि जहाँ तक मैं समझती हूँ, यह एक ऐसे आदमी का काम है जिसे सिवाय मेरे आप लोग नहीं जानते और न इस समय उसका नाम आप लोगों के सामने लेना ही मैं मुनासिब समझती हूँ।

कुमार––क्या नाम बताने में कोई हर्ज है?

कमलिनी––बेशक हर्ज है। हाँ, यदि मेरा अन्दाज ठीक निकला तो अवश्य उन लोगों का नाम बताऊँगी और पता भी दूँगी।

कुमार––खैर, मगर जो कुछ राय आप लोगों ने दी है उसके अनुसार चलने में तो कई दिन व्यर्थ लग जायँगे, इसलिए मेरी राय कुछ दूसरी ही है।

देवीसिंह––वह क्या?

कुमार––मैं खुद आपके साथ उस मकान की तरफ चलता हूँ जिसका पता इस चिट्ठी में दिया गया है। यदि केवल उस मकान के अन्दर रहने वाले हमारे दुश्मन हैं तो हिम्मत हारने की कोई जरूरत नहीं। इसी समय उन्हें जीत कर किशोरी को छुड़ा लाऊँगा। और यदि उन लोगों के पास फौज होगी तो जरूर मकान के बाहर टिकी हुई होगी जिसका पता लगाना कुछ कठिन न होगा। उस समय जो कुछ आप लोग राय देंगे, किया जायगा।

इसी तरह की बातचीत करने में पहर रात बीत गई। आखिर वही निश्चय ठहरा जो कुमार ने सोचा था, अर्थात् इसी समय सब कोई उस मकान की तरफ जाने के लिए मुस्तैद हुए और पहाड़ी के नीचे उतर आये। पेड़ों के साथ बागडोर से बँधे हुए घोड़े वहीं पर चर रहे थे जो अपने सवारों को देखकर हिनहिनाने लगे, जिससे जाना गया कि वे इस समय फिर सफर को तैयार हैं और पहर भर चरने और आराम करने से उनकी थकावट कम हो चुकी है। सब लोग घोड़ों पर सवार होकर वहाँ से रवाना हुए।

जो कुछ उस चिट्ठी में लिखा था, वह ठीक मालूम होने लगा, अर्थात् पूरब पाँच कोस चले जाने के बाद एक नाला मिला और उसी के किनारे-किनारे दो कोस दक्खिन जाने के बाद एक मकान की सफेदी दिखाई पड़ी। साफ मालूम होता था कि यह मकान अभी नया बना है या आज ही कल में इसके ऊपर चूना फेरा गया है। रात दो ज्यादा जा चुकी थी, चन्द्रमा अपनी पूर्ण कला से आकाश के बीच में दिखाई दे रहे थे, शीतल किरणें चारों तरफ फैली हुई थीं और मालूम होता था कि जमीन पर चाँदी का पत्र जड़ा हुआ है। ये लोग घना जंगल पीछे छोड़ आये थे और इस जगह पेड़ बहुत कम और छोटे-छोटे थे, उस मकान के चारो तरफ दो सौ बीघे के लगभग साफ मैदान था।

अच्छी तरह जाँच करने और खयाल दौड़ाने से मालूम हो गया कि इस जगह पर फौज नहीं है और न लड़ाई का कुछ सामान ही है, अगर कुछ है तो उसी मकान के अन्दर होगा। आखिर थोड़ी देर तक सोच-विचार कर ये लोग मकान के पास पहुँचे।

यह मकान बहुत बड़ा न था, लगभग पचास गज के लम्बा और इसी कदर चौड़ा होगा। इसकी ऊँचाई भी पैंतीस गज से ज्यादा न होगी। चारों तरफ की दीवारें साफ थीं, न तो किसी तरफ कोई दरवाजा था और न कोई खिड़की। ये लोग चारों तरफ घूमे, मगर अन्दर जाने का रास्ता न मिला, आखिर सब लोग घोड़ों पर से उतरकर एक तरफ खड़े हो गये। देवीसिंह ने कमन्द फेंका और उसके सहारे से दीवार पर चढ़ कर देखना चाहा कि अन्दर क्या है।

ऊपर की दीवार बहुत चौड़ी थी। सभी ने देखा कि देवीसिंह दीवार पर खड़े होकर अन्दर की तरफ बड़े गौर से देख रहे हैं। यकायक देवीसिंह खिलखिला कर हँसे और बिना कुछ कहे उस मकान के अन्दर कूद पड़े।

यह देख सभी को ताज्जुब हुआ। कमलिनी ने तारा के कान में कुछ कहा जिसके जवाब में उसने सिर हिला दिया। थोड़ी देर तक देवीसिंह की राह देखी गई, आखिर उसी कमन्द के सहारे शेरसिंह चढ़ गये और उनकी भी वही अवस्था देखने में आई अर्थात् कुछ देर तक गौर से देखने के बाद देवीसिंह की तरह हँस कर शेरसिंह भी उस मकान के अन्दर कूद गए।

अब तो कुमार के आश्चर्य की कोई हद न रही। वे ताज्जुब में आकर सोचने लगे कि यह क्या मामला है और इस मकान के अन्दर क्या है जिसे देख दोनों ऐयारों ने ऐसा किया? "जो हो, अब मैं भी ऊपर चढूँगा और देखूँगा कि क्या है!" कहकर कुमार भी उसी कमन्द के सहारे ऊपर चढ़ने को तैयार हुए, मगर कमलिनी ने हाथ पकड़ लिया और कहा, "ऐसा नहीं हो सकता, अभी हमारे कई आदमी मौजूद हैं, पहले इन्हें जा लेने दीजिए।" लाचार कुमार को रुकना पड़ा। कमलिनी ने अपने उन सवारों की तरफ देखा जो उसके साथ आये थे और कहा, "तुम लोगों में से एक आदमी ऊपर जाकर देखो कि क्या है?"

हुक्म पाकर उसी कमन्द के सहारे एक आदमी ऊपर गया और उसकी भी वही दशा हुई, दूसरा गया वह भी कूद पड़ा, फिर तीसरा गया वह भी न लौटा, यहाँ तक कि कमलिनी के कुल आदमी इसी तरह उस मकान के अन्दर जा दाखिल हुए। कमलिनी ने बहुत रोका और मना किया मगर कुमार ने उसकी बात पर ध्यान न दिया। वे भी उसी कमन्द के सहारे ऊपर चढ़ गये और अपने साथियों की तरह गौर से थोड़ी देर तक देखने के बाद हँसते हुए मकान के अन्दर कूद पड़े।

अब सवेरा हो गया, आसमान पर पूरब तरफ सूर्य की लालिमा दिखाई लेने लगी, कमलिनी ने हँसकर अपनी ऐयारा तारा की तरफ देखा, वह गर्दन हिलाकर हँसी और बोली, "चलिए, अब देर करने की कोई जरूरत नहीं।"

बाकी घोड़े उसी तरह उसी जगह छोड़ दिये गये। दो घोड़ों पर कमलिनी और तारा सवार हुईं और हँसती हुई एक तरफ को चली गईं।

५

अब हम फिर रोहतासगढ़ की तरफ मुड़ते हैं और वहाँ राजा वीरेन्द्रसिंह के ऊपर जो-जो आफतें आईं, उन्हें लिखकर इस किस्से के बहुत से भेद, जो अभी तक छिपे पड़े हैं, खोलते हैं। हम ऊपर लिख आये हैं कि रोहतासगढ़ फतह करने के बाद राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह उसी किले में जाकर मेहमान हुए। वहीं एक छोटी-सी कमेटी की गई तथा उसी समय कुँअर इन्द्रजीतसिंह का पता लगाने और उन्हें ले आने के लिए शेरसिंह और देवीसिंह रवाना किए गए।

उन दोनों के चले जाने के बाद यह राय ठहरी कि यहाँ का हाल-चाल और रोहतासगढ़ के फतह होने का समाचार महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास चुनारगढ़ भेजना चाहिए। यद्यपि यह खबर उन्हें पहुँच गई होगी, तथापि किसी ऐयार को वहाँ भेजना मुनासिब है और इस काम के लिए भैरोंसिंह चुने गए। राजा वीरेन्द्रसिंह ने अपने हाथ से पिता को पत्र लिखा और भैरोंसिंह को तलब करके चुनारगढ़ जाने के लिए कहा।

भैरोंसिंह––मैं चुनारगढ़ जाने के लिए तो तैयार हूँ परन्तु दो बातों की हविस जी में रह जायेगी।

वीरेन्द्रसिंह––वह क्या?

भैरोंसिंह––एक तो फतह की खुशी का इनाम बँटने के समय मैं नहीं रहूँगा, इसका...

वीरेन्द्रसिंह––यह हविस तो अभी पूरी हो जायेगी, दूसरी क्या है?

तेजसिंह––यह लड़का बहुत ही लालची है। यह नहीं सोचता कि यदि मैं न रहूँगा तो मेरे बदले का इनाम मेरे पिता तो पावेंगे!

भैरोंसिंह––(हाथ जोड़ कर और तेजसिंह की तरफ देखकर) यह उम्मीद तो है ही, परन्तु इस समय मैं आपसे भी कुछ इनाम लेना चाहता हूँ।

वीरेन्द्रसिंह––अवश्य ऐसा होना चाहिए, क्योंकि तुम्हारे लिए हम और ये एक समान हैं।

तेजसिंह––आप और भी शह दीजिए जिसमें यदि और कुछ न मिल सके तो मेरा ऐयारी का बटुआ ही ले ले।

भैरोंसिंह––मेरे लिए वही बहुत है।

वीरेन्द्रसिंह––दो। अब सस्ते में छूटते हो, बटुआ देने में उज्र न करो।

तेजसिंह––जब आप ही इसकी मदद पर हैं तो लाचार होकर देना ही पड़ेगा।

राजा वीरेन्द्र सिंह ने अपना खास सन्दूक मँगाया और उसमें से एक जड़ाऊ डिब्बा, जिसके अन्दर न मालूम क्या चीज थी, निकाले बिना खोले भैरोंसिंह को दे दिया। भैरोंसिंह ने इनाम पाकर सलाम किया और अपने पिता तेजसिंह की तरफ देखा। उन्हें भी लाचार होकर ऐयारी का बटुआ, जिसे वे हरदम अपने पास रखते थे, भैरोंसिंह के हवाले करना ही पड़ा।

राजा वीरेन्द्रसिंह ने भैरोंसिंह से कहा, "इनाम तो तुम पा चुके। अब बताओ, तुम्हारी दूसरी हविस क्या है जो पूरी की जाये?"

भैरोंसिंह––मेरे जाने के बाद आप यहाँ के तहखाने की सैर करेंगे। अफसोस यही है कि इसका आनन्द मुझे कुछ भी न मिलेगा।

वीरेन्द्रसिंह––खैर, इसके लिए भी हम वादा करते हैं कि जब तुम चुनारगढ़ से लौट आओगे, तब यहाँ के तहखाने की सैर करेंगे, मगर जहाँ तक हो सके, तुम जल्द लौटना।

भैरोंसिंह सलाम करके बिदा हुए, मगर दो ही चार कदम आगे बढ़े थे कि तेजसिंह ने पुकारा और कहा, "सुनो-सुनो! बटुए में से एक चीज मुझे ले लेने दो, क्योंकि वह मेरे ही काम की है।"

भैरोंसिंह––(लौटकर और बटुआ तेजसिंह के सामने रखकर) बस, अब मैं यह बटुआ न लूँगा। जिसके लोभ से मैंने बटुआ लिया, जब वही आप निकाल लेंगे तो इसमें रही क्या जायेगा?

वीरेन्द्रसिंह––नहीं जी, ले जाओ, अब तेजसिंह उसमें से कोई चीज न निकालने पायेंगे। जो चीज यह निकालना चाहते हैं तुम भी उस चीज को रखने योग्य पात्र हो!

भैरोंसिंह ने खुश होकर बटुआ उठा लिया और सलाम करने के बाद तेजी के साथ वहाँ से रवाना हो गये।

पाठक तो समझ ही गए होंगे कि इस बटुए में कौन-सी ऐसी चीज थी जिसके लिए इतनी खिंचा-खिंची हुई! खैर, शक मिटाने के लिए हम उस भेद को खोल ही देना मुनासिब समझते हैं। इस बटुए में वे ही तिलिस्मी फूल थे जो चुनारगढ़ के इलाके में तिलिस्म के अन्दर से तेजसिंह के हाथ लगे थे और जिन्हें किसी प्राचीन वैद्य ने बड़ी मेहनत से तैयार किया था।

अब हम भैरोंसिंह के चले जाने के बाद तीसरे दिन का हाल लिखते हैं। दिग्विजयसिंह अपने कमरे में मसहरी पर लेटा-लेटा न मालूम क्या-क्या सोच रहा है। रात आधी से ज्यादा जा चुकी है मगर अभी तक उसकी आँखों में नींद नहीं है, दरवाजे की तरफ मुँह किए हुए मालूम होता है कि वह किसी के आने की राह देख रहा है क्योंकि किसी तरह की जरा-सी भी आहट आने पर चौंक जाता है और चैतन्य होकर दरवाजे की तरफ देखने लगता है। यकायक चौखट के अन्दर पैर रखते हुए एक वृद्ध बाबाजी की सूरत दिखाई पड़ी। उनकी अवस्था अस्सी वर्ष से ज्यादा होगी, नाभि तक लम्बी दाढ़ी और सिर के फैले हुए बाल रूई की तरह सफेद हो रहे थे! कमर में केवल एक कौपीन पहने और शेर की खाल ओढ़े वे कमरे के अन्दर आ पहुँचे। उन्हें देखते ही राजा दिग्विजयसिंह उठ खड़े हुए और मुस्कुराते हुए दण्डवत करके बोले, "आज बहुत दिनों के बाद दर्शन हुए हैं, समय टल जाने पर सोचता था कि शायद आज आना न हो!"

बाबाजी ने आशीर्वाद देकर कहा––"राह में एक आदमी से मुलाकात हो गई, इसी से विलम्ब हुआ।"

इस समय कमरे में एक सिंहासन मौजूद था। दिग्विजयसिंह ने उसी सिंहासन पर साधु को बिठाया और स्वयं नीचे फर्श पर बैठ गया। इसके बाद यों बातचीत होने लगी––

साधु––कहो, क्या निश्चय किया?

दिग्विजयसिंह––(हाथ जोड़ कर) किस विषय में?

साधु––यहाँ, वीरेन्द्रसिंह के विषय में।

दिग्विजयसिंह––सिवाय ताबेदारी कबूल करने के और कर ही क्या सकता हूँ?

साधु––सुना है, तुम उन्हें तहखाने की सैर कराना चाहते हो? क्या यह बात सच है?

दिग्विजयसिंह––मैं उन्हें रोक ही कैसे सकता हूँ?

साधु––ऐसा कभी नहीं होना चाहिए। तुम्हें मेरी बातों का कुछ विश्वास है कि नहीं?

दिग्विजयसिंह––विश्वास क्यों न होगा? आपको मैं गुरु के समान मानता हूँ और आज तक जो कुछ मैंने किया, आप ही की सलाह से किया।

साधु––केवल यही आखिरी काम बिना मुझसे राय लिये किया सो उसमें यहाँ तक धोखा खाया कि राज्य से हाथ धो बैठे!

दिग्विजयसिंह––बेशक ऐसा ही हुआ। खैर, अब जो आज्ञा हो, किया जाये।

साधु––मैं नहीं चाहता कि तुम वीरेन्द्रसिंह के ताबेदार बनो। इस समय वे तुम्हारे कब्जे में हैं और तुम उन्हें हर तरह से कैद कर सकते हो।

दिग्विजयसिंह––(कुछ सोच कर) जैसी आज्ञा! परन्तु मेरा लड़का अभी तक उनके कब्जे में है।

साधु––उसे यहाँ लाने के लिए वीरेन्द्रसिंह का आदमी जा ही चुका है, वीरेन्द्र सिंह वगैरह के गिरफ्तार होने की खबर जब तक चुनार पहुँचेगी उसके पहले ही कुमार वहाँ से रवाना हो जायगा। फिर वह उन लोगों के कब्जे में नही फँस सकता, उसको ले आना मेरा जिम्मा।

दिग्विजयसिंह––हरएक बात का विचार कर लीजिए। मैं आपकी अज्ञानुसार चलने को तैयार हूँ।

इसके बाद घण्टे भर तक साधु महाराज और राजा दिग्विजयसिंह में बातें होती रहीं जिन्हें यहाँ लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है। पहर रात रहे बाबाजी वहाँ से बिदा हुए।

उसके दूसरे ही दिन राजा वीरेन्द्रसिंह को खबर मिली कि लाली का पता नहीं लगता। न मालूम वह किस तरह कैद से निकल कर भाग गई। उसका पता लगाने के लिए कई जासूस चारों तरफ रवाना किये गये।

अब महाराज दिग्विजयसिंह की नीयत खराब हो गई और वे इस बात पर उतारू हो गए कि राजा वीरेन्द्रसिंह, उनके लड़के और दोस्तों को गिरफ्तार कर लेन चाहिए, खाली गिरफ्तार नहीं, मार डालना चाहिए।

राजा वीरेन्द्रसिंह तहखाने में जाकर वहाँ का हाल देखना और जानना चाहते थे मगर दिग्विजयसिंह हीले-हवाले में दिन काटने लगा। आखिर यह निश्चय हुआ कि कल तहखाने में अवश्य चलना चाहिए। उसी दिन रात को दिग्विजयसिंह ने राजा वीरेन्द्रसिंह की फिर ज्याफत की और खाने की चीजों में बेहोशी की दवा मिलाने का हुक्म अपने ऐयार रामानन्द को दिया। बेचारे राजा वीरेन्द्रसिंह इन बातों से बिल्कुल बेखबर थे और उनके ऐयारों को भी ऐसी उम्मीद न थी, आखिर नतीजा यह हुआ कि रात को भोजन करने के बाद सभी पर दवा ने असर किया। उस समय तेजसिंह चौंके और समझ गये कि दिग्विजयसिंह ने दगा की, मगर अब क्या हो सकता था? थोड़ी देर बाद राजा वीरेन्द्रसिंह, कुँअर आनन्दसिंह, तेजसिंह, पण्डित बद्रीनाथ, ज्योतिषीजी और तारासिंह वगैरह बेहोश होकर जमीन पर लेट गये और बात-की-बात में हथकड़ियों और बेड़ियों से बेबस कर उसी तिलिस्मी तहखाने में कैद कर दिए गये। उस तहखाने से बाहर निकलने के लिए जो दो रास्ते थे, उनका हाल पाठक जान ही गये हैं क्योंकि ऊपर उसका बहुत-कुछ हाल लिखा जा चुका है। उन दोनों रास्तों में से एक रास्ता, जिससे हमारे ऐयार लोग और कुँअर आनन्दसिंह गये थे, बखूबी बन्द कर दिया गया। मगर दूसरा रास्ता, जिधर से कुन्दन (धनपति) किशोरी को लेकर निकल गई थी, ज्यों का त्यों रहा क्योंकि उसकी खबर राजा दिग्विजयसिंह को न थी। उस रास्ते का हाल वह कुछ भी न जानता था।

राजा वीरेन्द्रसिंह, उनके लड़के और साथी लोग जब कैदखाने में भेज दिये, उस समय राजा वीरेन्द्रसिंह के थोड़े से फौजी आदमी, जो उनके साथ किले में आ चुके थे, यह दगाबाजी देखकर जान देने के लिए तैयार हो गये। उन्होंने राजा दिग्विजयसिंह के बहुत से आदमियों को मार दिया और जब तक जीते रहे, मालिक के नमक का ध्यान उनके दिल में बना रहा। पर आखिर कहाँ तक लड़ सकते थे! अन्त में सब-के-सब बहादुरी के साथ लड़कर वैकुण्ठ चले गये। राजा दिग्विजयसिंह ने किले का फाटक बन्द करवा दिया, सफीलों पर तोपें चढ़वा दीं और राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर से, जो पहाड़ के नीचे था, लड़ाई करने का हुक्म दे दिया। राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में दो सरदार मौजूद थे जो अभी तक रोहतासगढ़ में नहीं आये थे, एक नाहरसिंह और दूसरे फतहसिंह, ये दोनों सेनापति थे।

पाटक, देखिए, जमाने ने कैसा पलटा खाया! किशोरी की धुन में कुँअर इन्द्रजीतसिंह अपने दो ऐयारों के साथ ऐसी जगह जा फँसे कि उनका पता लगना भी मुश्किल है, इधर राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह की यह दशा हुई, अगर भैरोसिंह चिट्ठी लेकर चुनार न भेज दिये गये होते, तो वह भी फँस जाते। आप भूले न होंगे कि रामनारायण और चुन्नीलाल चुनारगढ़ में है और पन्नालाल को राजा वीरेन्द्रसिंह गयाजी में छोड़ आये हैं, राजगृह भी उन्हीं के सुपुर्द है, वे किसी तरह वहाँ से टल नहीं सकते, क्योंकि वह शहर नया फतह हुआ है और वहाँ एक सरदार का हर दम बने रहना बहुत ही मुनासिव है।

जिस समय रोहतासगढ़ किले से तोप की आवाज आयी, दोनों सेनापति बहुत घबराये और पता लगाने के लिए जासूसों को किले में भेजा। मगर उनके लौट आने पर दिग्विजयसिंह की दगाबाजी का हाल दोनों सेनापतियों को मालूम हो गया। उन्होंने उसी समय इस हाल की चिट्ठी लिख सवार के हाथ चुनारगढ़ रवाना की, और इसके बाद सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

६

आज बहुत दिनों के बाद हम कमला को आधी रात के समय रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर पूरब तरफ वाले जंगल में घूमते देख रहे हैं। यहाँ से किले की दीवार बहुत दूर और ऊँचे पर है। कमला न मालूम किस फिक्र में है या क्या ढूँढ़ रही है। यद्यपि रात चाँदनी थी परन्तु ऊँचे-ऊँचे और घने पेड़ों के कारण जंगल में एक प्रकार से अन्धकार ही था। घूमते-घूमते कमला के कानों में किसी के पैर की आहट मालूम हुई। वह रुकी और एक पेड़ की आड़ में खड़ी होकर दाहिनी तरफ देखने लगी, जिधर से आहट मिली थी। दस-पन्द्रह कदम की दूरी से दो आदमी जाते हुए दिखाई पड़े। बात और चाल से दोनों औरतें मालूम पड़ीं। कमला भी पैर दबाए और अपने को हर तरफ से छिपाये उन्हीं दोनों के पीछे-पीछे धीरे-धीरे रवाना हुई। लगभग आध कोस जाने के बाद ऐसी जगह पहुँची जहाँ पेड़ बहुत कम थे बल्कि उसे एक प्रकार से मैदान ही कहना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी दूर पर पत्थर के बड़े-बड़े अनगढ़ ढोंके पड़े हुए थे जिनकी आड़ में कई आदमी छिप सकते थे। सघन पेड़ों की आड़ में से निकल कर मैदान में कई कदम जाने के बाद वे दोनों अपने ऊपर से स्याह चादर उतार कर एक पत्थर की चट्टान पर बैठ गई। कमला ने भी अपने को बड़ी चालाकी से उन दोनों के करीब पहुँचाया और एक पत्थर की आड़ में छिपकर उन दोनों की बातचीत सुनना चाहा। चन्द्रमा अपनी पूर्ण किरणों से उदय हो रहे थे और निर्मल चाँदनी इस समय अपना पूरा जोबन दिखा रही थी। हर एक चीज अच्छी तरह और साफ नजर आती थी। जब वे दोनों औरतें चादर उतार कर पत्थर की चट्टान पर बैठ गईं, तब कमला ने उनकी सूरत देखी। बेशक वे दोनों नौजवान औरतें थीं जिनमें से एक तो बहुत ही हसीन थी और दूसरी के विषय में कह सकते हैं कि शायद उसकी लौंडी या ऐयारा हो।

कमला बड़े गौर में उन दोनों औरतों की तरफ देख रही थी कि इतने ही में सामने से एक लम्बे कद का आदमी आता हुआ दिखाई पड़ा जिसे देख कमला चौंकी और उस समय तो कमला का कलेजा बेहिसाब धड़कने लगा जब वह आदमी उन दोनों औरतों के पास आकर खड़ा हो गया और उनसे डपट कर बोला, "तुम दोनों कौन हो?" उस आदमी का चेहरा चन्द्रमा के सामने था, विमल चाँदनी उसके नक्शे को अच्छी तरह दिखा रही थी, इसीलिए कमला ने उसे तुरन्त पहचान लिया और उसे विश्वास हो गया कि वह लम्बे कद का आदमी वही है जो खँडहर वाले तहखाने के अन्दर शेरसिंह से मिलने गया था और जिसे देख उनकी अजब हालत हो गई थी तथा जिद करने पर भी उन्होंने न बताया कि यह आदमी कौन है।

कमला ने अपने धड़कते हुए कलेजे को बाएँ हाथ से दबाया और गौर से देखने लगी कि अब क्या होता है। यद्यपि कमला उन दोनों औरतों से बहुत दूर न थी और इस रात के सन्नाटे में उनकी बातचीत बखूबी सुन सकती थी, तथापि उसने अपने को बड़ी सावधानी से उस तरफ लगाया और सुनना चाहा कि दोनों औरतों और लम्बे व्यक्ति में क्या बातचीत होती है।

उस आदमी के डपटते ही ये दोनों औरतें चैतन्य होकर खड़ी हो गई और उनमें से एक ने, जो सरदार मालूम होती थी, जवाब दिया––

औरत––(अपनी कमर से खंजर निकलकर) हम लोग अपना परिचय नहीं दे सकतीं और न हमें यही पूछने से मतलब है कि तुम कौन हो?

आदमी––(हँसकर) क्या तू समझती है कि मैं तुझे नहीं पहचानता? मुझे खूब मालूम है कि तेरा नाम गौहर है। मैं तेरी सात पुश्त को जानता हूँ, मगर आजमाने के लिए पूछता था कि देखू, तू अपना सच्चा हाल मुझे कहती है या नहीं! क्या कोई अपने को भूतनाथ से छिपा सकता है?

'भूतनाथ' नाम सुनते ही वह और घबरा गई, डर से बदन काँपने लगा और खंजर उसके हाथ से गिर पड़ा। उसने मुश्किल से अपने को सम्हाला और हाथ जोड़कर बोली, "बेशक मेरा नाम गौहर है, मगर..."

भूत––तू यहाँ क्यों घूम रही है? शायद इस फिक्र में है कि इस किले में पहुँच कर आनन्दसिंह से अपना बदला ले!

गौहर––(डरी हुई आवाज से) जी हाँ।

भूत––पहले भी तो तू उन्हें फँसा चुकी थी, मगर उनका ऐयार देवीसिंह उन्हें छुड़ा ले गया। हाँ, तेरी छोटी बहिन कहाँ है?

गौहर––वह तो गया की रानी माधवी के हाथ से मारी गई।

भूत––कब?

गौहर––जब वह इन्द्रजीतसिंह को फँसाने के लिए चुनारगढ़ के जंगल में गई थी तो मैं भी अपनी छोटी बहिन को साथ लेकर आनन्दसिंह की धुन में उसी जंगल में गई हुई थी। दुष्टा माधवी ने व्यर्थ ही मेरी बहिन को मार डाला। जब वह जंगल काटा गया तो वीरेन्द्रसिंह के आदमी उसकी लाश उठाकर चुनार ले गए थे, मगर (अपनी साथिन की तरफ इशारा करके) बड़ी चालाकी से यह ऐयारा उस लाश को वहाँ से उठा लाई थी।

भूत––हाँ ठीक है, अच्छा तो तू इस किले में घुसना चाहती है और आनन्दसिंह की जान लेना चाहती है?

गौहर––यदि आप अप्रसन्न न हों तो।

भूत––मैं क्यों अप्रसन्न होने लगा? मुझे क्या गरज पड़ी है कि मना करूँ। जो तेरा जी चाहे वह कर। अच्छा, मैं जाता हूँ लेकिन एक दफे फिर तुझसे मिलूँगा।

वह आदमी तुरन्त चला गया और देखते-देखते नजरों से गायब हो गया। इसके बाद उन दोनों औरतों में बातचीत होने लगी।

गौहर––गिल्लन, इसकी सूरत देखते ही मेरी जान निकल गई थी। न मालूम, यह कम्बख्त इस वक्त कहाँ से आ गया।

गिल्लन––तुम्हारी तो बात ही दूसरी है, मैं ऐयारा होकर अपने को सम्हाल न सकी। देखो, अभी तक कलेजा धड़-धड़ करता है।

गौहर––मुझको तो यही डर लगा हुआ था कि कहीं यह मुझे आनन्दसिंह से बदला लेने के बारे में मना न करे।

गिल्लन––सो तो उसने न किया, मगर एक दफे मिलने के लिए कह गया है। अच्छा, अब यहाँ ठहरना मुनासिब नहीं।

वे दोनों औरतें, अर्थात् गौहर तथा गिल्लन, वहाँ से चली गईं और कमला ने भी एक तरफ का रास्ता लिया। दो घण्टे के बाद कमला उस कब्रिस्तान में पहुँची जो रोहतासगढ़ के तहखाने में आने-जाने का रास्ता था। इस समय चन्द्रमा अस्त हो चुका था। और कब्रिस्तान में भी सन्नाटा था। कमला बीच वाली कब्र के पास गई और तहखाने में जाने के लिए दरवाजा खोलने लगी, मगर खुल न सका। आधे घंटे तक वह इसी फिक्र में लगी रही, पर कोई काम न चला, लाचार उठ खड़ी हुई और कब्रिस्तान के बाहर की तरफ चली। फाटक के पास पहुँचते ही वह अटकी क्योंकि सामने की तरफ थोड़ी ही दूर पर कोई चमकती हुई चीज उसे दिखाई पड़ी जो इसी तरफ बढ़ी आ रही थी। आगे जाने पर मालूम हुआ कि यह बिजली की तरह चमकने वाली चीज एक नेजा है जो किसी औरत के हाथ में है। वह नेजा कभी-कभी तेजी के साथ चमकता है और इस सबब से दूर-दूर तक चीजें दिखाई देती हैं और कभी उसकी चमक बिल्कुल ही जाती रहती है और यह भी नहीं मालूम होता है कि नेजा या नेजे को हाथ में रखने वाली औरत कहाँ है। थोड़ी देर में वह औरत इस कब्रिस्तान के बहुत पास आ गई और नेजे की चमक ने कमला को उस औरत की सूरत-शक्ल अच्छी तरह दिखा दी। उस औरत का रंग स्याह था, सूरत डरावनी और बड़े-बड़े दो-तीन दाँत मुँह बाहर निकले हुए थे। काली साड़ी पहने हुए वह औरत पूरी राक्षसी मालूम होती थी। यद्यपि कमला ऐयारा और बहुत दिलेर थी मगर इसकी सूरत देखते ही थर-थर काँपने लगी। उसने चाहा कि कब्रिस्तान के बाहर निकलकर भाग जाय मगर वह इतना डर गई थी कि पैर न उठा सकी। देखते-ही देखते वह भयंकर मूर्ति कमला के सामने आकर खड़ी हो गयी और कमला को डर के मारे काँपते देखकर बोली, "डर मत, होश ठिकाने कर और जो कुछ मैं कहती हूँ, उसे ध्यान देकर सुन!"

७

रोहतासगढ़ फतह होने की खबर लेकर भैरोंसिंह चुनार पहुँचे और उसके दो ही तीन दिन बाद राजा दिग्विजयसिंह की बेईमानी की खबर लेकर कई सवार भी जा पहुँचे। इस समाचार के पहुँचते ही चुनारगढ़ में खलबली पड़ गई। फौज के साथ ही साथ रिआया भी राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान को दिल से चाहती थी, क्योंकि उनके जमाने में अमीर-गरीब सभी खुश रहते थे! आलिमों और कारीगरों की कदर की जाती थी, अदना से अदना भी अपनी फरियाद राजा के कान तक पहुँचा सकता था, उद्योगियों और व्यापारियों को दरबार से मदद मिलती थी, ऐयार और जासूस लोग छिपे-छिपे रिआया के दुःख-सुख का हाल मालूम करते और राजा को हर तरह की खबर पहुँचाते थे। शादी-ब्याह में इज्जत के माफिक हर एक को मदद मिलती थी और इसी से रिआया भी तन-मन-धन से राजा की मदद के लिए तैयार रहती थी। राजा वीरेन्द्रसिंह कैद हो गये, इस खबर को सुनते ही रिआया जोश में आ गई और इस फिक्र में हुई कि जिस तरह हो, राजा को छुड़ाना चाहिए।

रोहतासगढ़ के बारे में क्या करना चाहिए और दुश्मनों पर कैसे फतह पानी चाहिए, यह सब सोचने-विचारने के पहले महाराज सुरेन्द्रसिंह और जीतसिंह ने भैरोंसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल को हुक्म दिया कि तुम लोग तुरन्त रोहतासगढ़ जाओ और जिस तरह हो सके अपने को किले के अंदर पहुँचाकर राजा वीरेन्द्रसिंह को रिहा करो, हम दोनों में से भी कोई आदमी मदद लेकर शीघ्र पहुँचेगा।

हुक्म पाते ही तीनों ऐयार तेज और मजबूत घोड़ों पर सवार होकर रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए और दूसरे दिन शाम को अपनी फौज में पहुँचे। राजा वीरेन्द्रसिंह की आधी, अर्थात् पच्चीस हजार फौज तो पहाड़ी के नीचे किले के दरवाजे की तरफ खड़ी हुई थी और बाकी आधी फौज पहाड़ी के चारों तरफ इसलिए फैला दी गयी थी कि राजा दिग्विजयसिंह को बाहर से किसी तरह की मदद न पहुँचने पाये। पाँच-पाँच, सात-सात सौ बहादुरों को लेकर नाहरसिंह कई दफे उस पहाड़ी पर चढ़ा और किले के दरवाजे तक पहुँचना चाहा, मगर किले के बुर्जों पर से आए हुए तोप के गोलों ने उसे वहाँ तक न पहुँचने दिया और हर दफे लौटना पड़ा। जाहिर में तो वे लोग सामने की तरफ अड़े हुए थे और घड़ी-घड़ी हमला करते थे, मगर नाहरसिंह के हुक्म से पाँच-पाँच, सात-सात करके बहुत से सिपाही, जासूस और सुरंग खोदने वाले जंगल-ही-जंगल रात के समय छिपे हुए रास्तों से पहाड़ पर चढ़ गये थे तथा बराबर चढ़े चले जाते थे और उम्मीद पाई जाती थी कि दो-ही-तीन दिन में हजार आदमी पहाड़ के ऊपर हो जायेंगे। तब नाहरसिंह छिपकर अकेला पहाड़ पर चढ़ जायगा और अपने आदमियों को बटोर कर किले के दरवाजे पर हमला करेगा। पहाड़ के ऊपर पहुँचकर सुरंग खोदनेवाले सुरंग खोद कर बारूद के जोर से किले का फाटक तोड़ने की धुन में लगे हुए थे और इन बातों की खबर राजा दिग्विजयसिंह को बिल्कुल न थी।

भैरोंसिंह ने फौज में पहुँचकर यह सब हाल सुना और खुश होकर सेनापतियों की तारीफ की तथा कहा कि "यद्यपि पहाड़ के ऊपर का घना जंगल ऐसा बेढब है कि मुसाफिरों को जल्दी रास्ता नहीं मिल सकता, तथापि हमारे आदमी यदि ऊँचाई की तरफ ध्यान न देकर चढ़ना शुरू करेंगे तो लुढ़कते-पुढ़कते किले के पास पहुँच ही जायेंगे। खैर, आप लोग जिस काम में लगे हैं, उसी में लगे रहिए। हम तीनों ऐयार अब पहाड़ पर जाते हैं और किसी तरह किले के अन्दर पहुँचने का बन्दोबस्त करते हैं।

पहर रात बीत गई थी जब भैरोंसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगे। भैरोंसिंह कई दफे उस पहाड़ी पर जा चुके थे और उस जंगल में अच्छी तरह घूम चुके थे, इसलिए इन्हें भूलने और धोखा खाने का डर न था। ये लोग बेधड़क पहाड़ पर चले गए और रोहतासगढ़ के रास्ते वाले कब्रिस्तान में ठीक उस समय पहुँचे, जिस समय कमला धड़कते हुए कलेजे के साथ उस राक्षसी के सामने खड़ी थी जिसके हाथ मे बिजली की तरह चमकता हुआ नेजा था। जिस समय वह नेजा चमकता था, देखने वाले की आँखें चौंधिया जाती थीं। भैरोंसिंह ने भी दूर से इस चमकते हुए नेजे को देखा जिसे देखकर दोनों साथी ऐयार भी डर कर खड़े हो गए। भैरोंसिंह चाहते थे कि जब वह औरत वहाँ से चली जाय, तो कब्रिस्तान में जायँ, मगर वे ऐसा न कर सके, क्योंकि नेजे की चमक में उन्होंने कमला की सूरत देखी जो इस समय जान से हाथ धोकर उस राक्षसी के सामने खड़ी थी।

हम ऊपर कई जगह इशारा कर आए हैं कि भैरोंसिंह कमला को चाहते थे और वह भी इनसे मुहब्बत रखती थी। इस समय कमला को एक राक्षसी के सामने देख उसकी मदद न करना भैरोंसिंह से कब हो सकता था? वे लपक कर कमला के पास पहुँचे। दो ऐयारों को साथ लिये भैरोंसिंह को अपने पास मौजूद देख कर कमला का जी ठिकाने हुआ और उसने जल्दी से भैरोंसिंह का हाथ पकड़ के कहा––"खूब पहुँचे!"

भैरोंसिंह––तुम यहाँ क्यों खड़ी हो और तुम्हारे सामने यह औरत कौन है?

कमला––मैं इसे नहीं पहचानती।

राक्षसी––मेरा हाल कमला से क्यों पूछते हो? मुझसे पूछो। इस समय तुम्हें देखकर मैं बहुत खुश हुई, मैं भी इसी फिक्र में थी कि किसी तरह भैरोंसिंह से मुलाकात हो।

भैरोंसिंह––तुमने मुझे कैसे पहचाना? क्योंकि आज तक मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा!

इतना सुनकर वह औरत बड़ी जोर से हँसी और उसने नेजे को हिलाया। हिलाने के साथ ही नेजे में चमक पैदा हुई और उसकी डरावनी हँसी से कब्रिस्तान गूँज उठा, इसके बाद उस औरत ने कहा––

राक्षसी––ऐसा कौन है जिसे मैं नहीं पहचानती होऊँ? खैर, इन बातों से कोई मतलब नहीं। यह कहो कि अपने मालिकों के छुड़ाने की तुम क्या फिक्र कर रहे हो? दिग्विजयसिंह दो ही तीन दिन में तुम्हारे मालिक को मार कर निश्चिन्त होना चाहता है।

भैरोंसिंह उस राक्षसी से बातें करने को तैयार थे, परन्तु यह नहीं जानते थे कि वह इनकी दोस्त है या दुश्मन, और उससे अपने भेदों को छिपाना चाहिए कि नहीं। यह सोच ही रहे थे कि इसकी बातों का क्या जवाब दिया जाय कि इतने में कई आदमियों के आने की आहट मालूम हुई। उस औरत ने घूमकर देखा तो चार आदमियों को इसी तरफ आते पाया। उन पर निगाह पड़ते ही वह क्रोध में आकर गरजी और नेजे को हिलाती हुई उसी तरफ लपकी। नेजे की चमक ने उन चारों की आँखें बन्द कर दीं। औरत ने बड़ी फुर्ती से उन चारों को नेजे से घायल कर दिया। हिलाने के साथ-ही-साथ उस नेजे में गजब की चमक पैदा होती थी, मालूम होता था कि आँखों के आगे बिजली दौड़ गई। वे बेचारे देख भी न सके कि उनको मारने वाला कौन है या कहाँ पर है। मालूम होता है कि वह नेजा जहर में बुझाया हुआ था क्योंकि वे चारों जख्मी होकर तुरंत जमीन पर ऐसे गिरे कि फिर उठने की नौबत न आई।

इस तमाशे को देखकर भैरोंसिंह डरे और सोचने लगे कि इस औरत के हाथ में तो बड़ा विचित्र नेजा है। इससे तो यह बात-की-बात में सैकड़ों आदमियों का नाश कर सकती है। कहीं ऐसा न हो कि हम लोगों को भी सतावे।

उन चारों को जख्मी करने के बाद वह औरत फिर भैरोंसिंह की तरफ लौटी। अब उसने अपने नेजे को आड़ा किया अर्थात् उसे इस तरह थामा कि उसका एक सिरा बाईं तरफ और दूसरा दाहिनी तरफ रहे, तब तीनों ऐयारों और कमला को नेजे का धक्का देकर एक साथ पीछे की तरफ हटाना चाहा। यह नेजा एक साथ चारों के बदन में लगा। उसके छूते ही बदन में एक तरह की झनझनाहट पैदा हुई और सब आदमी बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़े।

जब उन चारों––अर्थात् भैरोंसिंह, रामनारायण, चुन्नीलाल और कमला––की आँखें खुलीं, तो उन्होंने अपने को किले के अन्दर राजमहल के पिछवाड़े की तरफ एक दीवार की आड़ में पड़े पाया। उस समय सुबह की सफेदी आसमान पर धीरे-धीरे अपना दखल जमा रही थी।

८

बहुत दिनों से कामिनी का हाल कुछ भी मालूम न हुआ। आज उसकी सुध लेना भी मुनासिब है। आपको याद होगा कि जब कामिनी को साथ लेकर कमला अपने चाचा शेरसिंह से मिलने के लिए उजाड़ खँडहर और तहखाने में गई थी तो वहाँ से बिदा होते समय शेरसिंह ने कमला से कहा था कि "कामिनी को मैं ले जाता हूँ। अपने एक दोस्त के यहाँ रख दूँगा, जब सब तरह का फसाद मिट जायगा तब यह भी अपनी मुराद को पहुँच जायगी।" अब हम उसी जगह से कामिनी का हाल लिखना शुरू करते हैं।

गयाजी से थोड़ी दूर पर लालगंज नाम से मशहूर एक गाँव फलगू नदी के किनारे पर ही है। उसी जगह के एक नामी जमींदार के यहाँ, जो शेरसिंह का दोस्त था, कामिनी रक्खी गई थी। वह जमींदार बहुत ही नेक और रहमदिल था तथा उसने कामिनी को बड़ी हिफाजत से अपनी लड़को के समान खातिर करके रक्खा, मगर उस जमींदार का एक नौजवान और खूबसूरत लड़का भी था जो कामिनी पर आशिक हो गया। उसके हाव-भाव और कटाक्ष को देखकर कामिनी को उसकी नीयत का हाल मालूम हो गया। वह कुँअर आनन्दसिंह के प्रेम में अच्छी तरह रँगी हुई थी इसलिए उसे इस लड़के की चाल-ढाल बहुत ही बुरी मालूम हुई। ऐसी अवस्था में उसने अपने दिल का हाल किसी से कहना मुनासिब न समझा बल्कि इरादा कर लिया कि जहाँ तक हो सके, जल्द इस मकान को छोड़ ही देना मुनासिब है और अन्त में लाचार होकर उसने ऐसा ही किया।

एक दिन मौका पाकर आधी रात के समय कामिनी उस घर से बाहर निकली और सीधे रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुई। इस समय वह तरह-तरह की बातें सोच रही थी। एक दफे उसके दिल में आया कि बिना कुछ सोचे-विचारे वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में चले चलना ठीक होगा, मगर साथ ही यह भी सोचा कि यदि कोई सुनेगा तो मुझे अवश्य ही निर्लज्ज कहेगा और आनन्दसिंह की आँखों में मेरी कुछ इज्जत न रहेगी।

इसके बाद उसने सोचा कि जिस तरह हो, कमला से मुलाकात करनी चाहिए। मगर कमला से मुलाकात क्योंकर हो सकती है? न मालूम अपने काम की धुन में वह कहाँ-कहाँ घूम रही होगी? हाँ, अब याद आया, जब मैं कमला के साथ शेरसिंह से मिलने के लिए उस तहखाने में गई थी, तो शेरसिंह ने उससे कहा था कि मुझसे मिलने की जब जरूरत हो तो इसी तहखाने में आना। अब मुझे भी उसी तहखाने में चलना चाहिए, वहाँ कमला या शेरसिंह से जरूर मुलाकात होगी और वहाँ दुश्मनों के हाथ से भी निश्चिन्त रहूँगी। जब तक कमला से मुलाकात न हो वहाँ टिके रहने में भी कोई हर्ज नहीं है, वहाँ खाने के लिए जंगली फल और पीने के लिए पानी की भी कोई कमी नहीं।

इन सब बातों को सोचती हुई बेचारी कामिनी उसी तहखाने की तरफ रवाना हुई और अपने को छिपाती हुई, जंगल-ही-जंगल चल कर, तीसरे दिन पहर रात जाते-जाते वहाँ पहुँची। रास्ते में जंगली फल और चश्मे के पानी के सिवाय और कुछ उसे मिला और न उसे किसी चीज की इच्छा ही थी।

वह खँडहर कैसा था और उसके अन्दर तहखाने में जाने के लिए छिपा हुआ रास्ता किस ढंग का बना हुआ था, यह पहले लिखा जा चुका है, पुनः यहाँ लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है। कमला या शेरसिंह से मिलने की उम्मीद में उसी खँडहर और तहखाने को कामिनी ने अपना घर बनाया और तपस्विनियों की तरह कुँअर आनन्दसिंह के नाम की माला जपती हुई दिन बिताने लगी। बहुत-सी जरूरी चीजों के अतिरिक्त ऐयारी के सामान से भरा हुआ एक बाँस का पिटारा शेरसिंह का रक्खा हुआ उस तहखाने में मौजूद था जो कामिनी के हाथ लगा। यद्यपि कामिनी कुछ ऐयारी भी जानती थी परन्तु इस समय उसे ऐयारी के सामान की विशेष जरूरत न थी, हाँ, शेरसिंह की जायदाद में से एक कुप्पी तेल कामिनी ने बेशक खर्च किया, क्योंकि चिराग जलाने की नित्य ही आवश्यकता पड़ती थी।

कमला और शेरसिंह से मिलने की उम्मीद में कामिनी ने उस तहखाने में रहना स्वीकार किया, परन्तु कई दिन बीत जाने पर भी किसी से मुलाकात न हुई। एक दिन सूरत बदलकर कामिनी तहखाने से निकली और खँडहर के बाहर ही सोचने लगी कि किधर जाये और क्या करे। एकाएक कई आदमियों की बातचीत की आवाज उसके कानों में पड़ी और मालूम हुआ कि वे लोग आपस में बातचीत करते हुए इसी खँडहर की तरफ आ रहे हैं। थोड़ी ही देर में चार आदमी भी दिखाई पड़े। उस समय कामिनी अपने को बचाने के लिए खँडहर के अन्दर घुस गई और राह देखने लगी कि वे लोग आगे बढ़ जायँ तो फिर निकलूँ, मगर ऐसा न हुआ, क्योंकि बात-की-बात में वे चारों आदमी एक लाश उठाए हुए इसी खँडहर के अन्दर आ पहुँचे।

इस खँडहर में अभी तक कई कोठरियाँ मौजूद थीं। यद्यपि उनकी अवस्था बहुत ही खराब थी, किवाड़ के पल्ले तक उनमें न थे, जगह-जगह पर कंकड़-पत्थर-कतवार के ढेर लगे हुए थे, परन्तु मसाले की मजबूती पर ध्यान दे आँधी-पानी अथवा तूफान में भी बहुत आदमी उन कोठरियों में रहकर अपनी जान की हिफाजत कर सकते थे। खँडहर के चारों तरफ की दीवार यद्यपि कहीं-कहीं से टूटी हुई थी, तथापि बहुत ही मजबूत और चौड़ी थी। कामिनी एक कोठरी में घुस गई और छिप कर देखने लगी कि वे चारों आदमी उस खँडहर में आकर क्या करते और उस लाश को कहाँ रखते हैं।

लाश उठाये हुए चारों आदमी इस खँडहर में जाकर इस तरह घूमने लगे, जैसे हरएक कोठरी, दालान बल्कि यहाँ की बित्ता-बित्ता भर जमीन उन लोगों की देखी हुई हो। चूनेपत्थर के ढेरों में घूमते और रास्ता निकालते हुए वे लोग एक कोठरी के अन्दर घुस गए जो उस खँडहर भर में सब कोठरियों से छोटी थी और दो घण्टे तक बाहर न निकले। इसके बाद जब वे लोग बाहर आये तो खाली हाथ थे अर्थात् लाश न थी, शायद उस कोठरी में गाड़ या रख आये हों।

जब वे आदमी खँडहर से बाहर ही मैदान की तरफ चले गये, बल्कि बहुत दूर निकल गये तब कामिनी भी कोठरी से बाहर निकली और चारों तरफ देखने लगी। उसे आज तक यही विश्वास था कि इस खँडहर का हाल शेरसिंह, कमला, मेरे और उसे लम्बे आदमी के सिवाय, जो शेरसिंह से मिलने के लिए यहाँ आया था, किसी पाँचवें को मालूम नहीं है। मगर आज की कैफियत देखकर उसका खयाल बदल गया और वह तरह-तरह के सोच-विचार में पड़ गई। थोड़ी देर बाद वह उसी कोठरी की तरफ बढ़ी जिसमें वे लोग लाश छोड़ गये थे मगर उस कोठरी में ऐसा अंधकार था कि अन्दर जाने का साहस न पड़ा। आखिर अपने तहखाने में गई और शेरसिंह के पिटारे में से एक मोमबत्ती निकाल कर और बाल कर बाहर निकली। पहले उसने रोशनी के आगे हाथ की आड़ देकर चारों तरफ देखा और फिर उस कोठरी की तरफ रवाना हुई। जब कोठरी के दरवाजे पर पहुँची तो उसकी निगाह एक आदमी पर पड़ी जिसे देखते ही चौंकी और डर कर दो कदम पीछे हट गई, मगर उसकी होशियार आँखों ने तुरन्त पहचान लिया कि वह आदमी असल में मुर्दे से भी बढ़कर है अर्थात् पत्थर की एक खड़ी मूरत है जो सामने की दीवार के साथ चिपकी हुई है। आज के पहले इस कोठरी के अन्दर कामिनी नहीं आई थी, इसलिए वह हरएक तरफ अच्छी तरह गौर से देखने लगी परन्तु उसे इस बात का खटका बराबर लगा रहा कि कहीं वे चारों आदमी फिर न आ जायँ।

कामिनी को उम्मीद थी कि इस कोठरी से अन्दर वह लाश दिखाई देगी जिसे चारों आदमी उठा कर लाये थे, मगर कोई लाश दिखाई न पड़ी। आखिर उसने खयाल किया कि शायद लोग लाश की जगह मूरत को लाये हों जो सामने दीवार के साथ खड़ी है। कामिनी उस कोठरी के अन्दर घुस कर मूरत के पास जा खड़ी हुई और उसे अच्छी तरह देखने लगी। उसे बड़ा ताज्जुब हुआ जब उसने अच्छी तरह जाँच करने पर निश्चय कर लिया कि वह मूरत दीवार के साथ है, अर्थात् इस तरह से जुड़ी हुई है कि बिना टुकड़े-टुकड़े हुए किसी तरह दीवार से अलग नहीं हो सकती। कामिनी की चिन्ता और बढ़ गई। अब उसे इसमें किसी तरह का शक न रहा कि वे चारों आदमी जरूर किसी की लाश को उठा लाये थे, इस मूरत को नहीं, मगर वह लाश गई कहाँ? क्या जमीन खा गई या किसी चूने के ढेर के नीचे दबा दी गई! नहीं, मिट्टी या चूने के नीचे वह लाश दाबी नहीं गई, अगर ऐसा होता तो जरूर देखने में आता। उन लोगों ने जो कुछ किया, इसी कोठरी के अन्दर किया।

कामिनी उस मूरत के पास खड़ी देर तक सोचती रही, आखिर वहाँ से लौटी और धीरे-धीरे अपने तहखाने में आकर बैठ गई, वहाँ एक ताक (आले) पर चिराग जल रहा था इसलिए मोमबत्ती बुझाकर बिछौने पर जा लेटी और फिर सोचने लगी।

इसमें कोई शक नहीं कि वे लोग कोई लाश उठाकर लाए थे, मगर वह लाश कहाँ गई। खैर, इससे कोई मतलब नहीं, मगर अब यहाँ रहना भी कठिन हो गया, क्योंकि यहाँ कई आदमियों की आमद-रफ्त शुरू हो गई। शायद कोई मुझे देख ले, तो मुश्किल होगी। अब होशियार हो जाना चाहिए क्योंकि मुझे बहुत-कुछ काम करना है। कमला या शेरसिंह भी अभी तक न आए, अब उनसे भी मुलाकात होने की कोई उम्मीद न रही। अच्छा, दो-तीन दिन और यहाँ रहकर देखना चाहिए कि वे लोग फिर आते हैं या नहीं।

कामिनी इन सब बातों को सोच ही रही थी कि एक आवाज उसके कान में आई। उसे मालूम हुआ कि किसी औरत ने दर्दनाक आवाज में यह कहा, "क्या दुःख ही भोगने के लिए मेरा जन्म हुआ था!" यह आवाज ऐसी दर्दनाक थी कि कामिनी का कलेजा काँप गया। इस छोटी ही उम्र में वह भी बहुत तरह के दुःख भोग चुकी थी और उसका कलेजा जख्मी हो चुका था, इसलिए बर्दाश्त न कर सकी, आँखें भर आईं और आँसू की बूँदें टपाटप गिरने लगीं। फिर आवाज आई, "हाय, मौत को भी मौत आ गई!" अबकी दफे कामिनी बेतरह चौंकी और यकायक बोल उठी, "इस आवाज को तो मैं पहचानती हूँ, जरूर उसी को आवाज है!"

कामिनी उठ खड़ी हुई और सोचने लगी कि यह आवाज किधर से आई? बन्द कोठरी में आवाज आना असम्भव है, किसी खिड़की, सूराख या दीवार में दरार हुए बिना आवाज किसी तरह नहीं आ सकती। वह कोठरी में हर तरफ घूमने और देखने लगी। यकायक उसकी निगाह एक तरफ की दीवार के ऊपरी हिस्से पर जा पड़ी और वहाँ एक सूराख, जिसमें आदमी का हाथ बखूबी जा सकता था, दिखाई पड़ा। कामिनी ने सोचा कि बेशक इसी सूराख में से आवाज आई है। वह सूराख की तरफ गौर से देखने लगी, फिर आवाज आई––"हाय, न मालूम मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है!"

अब कामिनी को विश्वास हो गया कि यह आवाज उसी सूराख में से आई है। वह बहुत ही बेचैन हुई और धीरे-धीरे कहने लगी, "बेशक यह उसी की आवाज है। हाय मेरी प्यारी बहिन किशोरी, मैं तुझे क्योंकर देखूँ और किस तरह मदद करूँ? इस कोठरी के बगल में जरूर कोई दूसरी कोठरी है जिसमें तू कैद है, मगर न मालूम उसका रास्ता किधर से है? मैं कैसे तुझ तक पहुँचूँ और इस आफत से तुझे छुड़ाऊँ? इस कोठरी की कम्बख्त संगीन दीवारें भी ऐसी मजबूत है कि मेरे उद्योग से सेंध भी नहीं लग सकती। हाय, अब मैं क्या करूँ? भला पुकार के देखूँ तो सही कि आवाज भी उसके कानों तक पहुँचती है या नहीं?"

कामिनी ने मोखे (सूराख) की तरफ मुँह करके कहा, "क्या मेरी प्यारी बहिन किशोरी की आवाज आ रही है?"

जवाब––हाँ, क्या तू कामिनी है? बहिन कामिनी, क्या तू भी मेरी ही तरह इस मकान में कैद है?

कामिनी––नहीं बहिन, मैं कैद नहीं हूँ, मगर...

कामिनी और कुछ कहा ही चाहती थी कि धमधमाहट की आवाज सुनकर रुक गई और डर कर सीढ़ी की तरफ देखने लगी। उसे मालूम हुआ कि कोई यहाँ आ रहा है।

९

गिल्लन को साथ लिये हुए बीबी गौहर रोहतासगढ़ किले के अन्दर जा पहुँची। किले के अन्दर जाने में किसी तरह का जाल न फैलाना पड़ा और न किसी तरह की कठिनाई हुई। वह बेधड़ के किले के उस फाटक पर चली आई जो शिवालय के पीछे की तरफ था और छोटी खिड़की के पास खड़ी होकर खिड़की (छोटा दरवाजा) खोलने के लिए दरबान को पुकारा जब दरबान ने पूछा, "तू कौन है?" तो उसने जवाब दिया कि "मैं शेरअलीखाँ की लड़की गौहर हूँ।"

उन दिनों शेरअलीखाँ पटने का नामी सूबेदार था। यह शख्स बड़ा ही दिलेर, जमाँमर्द और बुद्धिमान था, साथ ही इसके कुछ-कुछ दगाबाज भी था, मगर इसे वह राजनीति का एक अंग मानता था। उसके इलाके भर में जो कुछ उसका रुआब था उसे कहाँ तक कहा जाये, दूर-दूर तक के आदमी उसका नाम सुनकर काँप जाते थे। उसके पास फौज तो केवल पाँच ही हजार थी मगर वह उससे पचीस हजार फौज का काम लेता था क्योंकि उसने अपने ढंग के आदमी चुन-चुन कर अपनी फौज में भरती किए थे। गौहर इसी शेरअलीखाँ की लड़की थी और वह गौहर की मौसेरी बहिन थी जो चुनारगढ़ के पास वाले जंगल में माधवी के हाथ से मारी गई थी।

शेरअलीखाँ अपनी जोरू को बहुत चाहता था और उसी तरह अपनी लड़की गौहर को भी हद से ज्यादा प्यार करता था। गौहर को दस वर्ष की छोड़कर उसकी माँ मर गई थी। माँ के ग़म में गौहर दीवानी-सी हो गई। लाचार दिल बहलाने के लिए शेरअलीखाँ ने गौहर को आजाद कर दिया और वह थोड़े से आदमियों को साथ लेकर दूर-दूर तक सैर करती फिरती थी। पाँच वर्ष तक वह इसी अवस्था में रही, इसी बीच में आजादी मिलने के कारण उसकी चाल-चलन में भी फर्क पड़ गया था। इस समय गौहर की उम्र पन्द्रह वर्ष की है। शेरअलीखाँ दिग्विजयसिंह का दिली दोस्त था और दिग्विजयसिंह भी उसका बहुत भरोसा रखता था।

गौहर का नाम सुनते ही दरबान चौंका और उसने उस अफसर को इत्तिला दी जो कई सिपाहियों को साथ लेकर फाटक की हिफाजत पर मुस्तैद था। अफसर तुरन्त फाटक पर आया और उसने पुकार कर पूछा, "आप कौन हैं?"

गौहर––मैं शेरअलीखाँ की लड़की गौहर हूँ।

अफसर––इस समय आपको संकेत बताना चाहिए।

गौहर––हाँ बताती हूँ––"जोगिया।"

'जोगिया' सुनते ही अफसर ने दरवाजा खोलने का हुक्म दे दिया और गिल्लन को साथ लिए हुए गौहर किले के अन्दर पहुँच गई। मगर गौहर बिल्कुल नहीं जानती थी कि थोड़ी ही दूर पर एक लम्बे कद का आदमी दीवार के साथ चिपका खड़ा है और उसकी बातें, जो दरबान के साथ हो रही थीं, सुन रहा है।

जब गौहर किले के अन्दर चली गई, उसके आधे घण्टे बाद एक लम्बे कद का आदमी, अिसे अब भूतनाथ कहना उचित है, उसी फाटक पर पहुँचा और दरवाजा खोलने के लिए उसने दरबान को पुकारा।

दरबान––तुम कौन हो?

भूत––मैं शेरअलीखाँ का जासूस हूँ।

दरबान––संकेत बताओ।

भूत––'जोगिया।'

दरवाजा तुरन्त खोल दिया गया और भूतनाथ भी किले के अन्दर जा पहुँचा। गौहर वही परिचय देती हुई राजमहल तक चली गई। जब उसके आने की खबर राजा दिग्विजयसिंह को दी गई, उस समय रात बहुत कम बाकी थी और दिग्विजयसिंह मसहरी पर बैठा हुआ राजकीय मामलों की तरह-तरह की बातें सोच रहा था। गौहर के आने की खबर सुनते ही दिग्विजयसिंह ताज्जुब में आकर उठ खड़ा हुआ, उसे अन्दर आने की आज्ञा दी, बल्कि खुद भी दरवाजे तक इस्तकबाल के लिए आया और बड़ी खातिरदारी से उसे अपने कमरे में ले गया! आज पाँच वर्ष बाद दिग्विजयसिंह ने गौहर को देखा, इस समय इसकी खूबसूरती और उठती हुई जवानी गजब करती थी। उसे देखते ही दिग्विजयसिंह की तबीयत डोल गई, मगर शेरअलीखाँ के डर से रंग न बदल सका।

दिग्विजयसिंह––इस समय आपका आना क्योंकर हुआ और यह दूसरी औरत आपके साथ कौन है?

गौहर––यह मेरी ऐयारा है। कई दिन हुए, केवल आपसे मिलने के लिए सौ सिपाहियों को साथ लेकर मैं यहाँ आ रही थी। इतिफाक से वीरेन्द्रसिंह के जालिम आदमियों ने मुझे गिरफ्तार कर लिया। मेरे साथियों में से कई मारे गए और कई कैद हो गये। मैं भी चार दिन तक कैद रही। आखिर इस चालाक ऐयारा ने, जो कैद होने से बच गई थी, मुझे छुड़ाया। इस समय सिवाय इसके कि मैं इस किले में आ घुसूँ और कोई तदबीर जान बचाने की न सुझी। सुना है कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह आजकल आपके यहाँ कैद हैं?

दिग्विजयसिंह––हाँ, वे लोग आज-कल यहाँ कैद हैं। मैंने यह खबर आपके पिता को भी लिखी है।

गौहर––हाँ, मुझे मालूम है। वे भी आपकी मदद को आने वाले हैं। उनका इरादा है कि वीरेन्द्रसिंह के लश्कर पर, जो इस पहाड़ी के नीचे है, छापा मारें।

दिग्विजयसिंह––हाँ, मुझे तो एक उन्हीं का भरोसा है।

यद्यपि शेरअलीखाँ के डर से दिग्विजयसिंह गौहर के साथ अदब का बर्ताव करता रहा, मगर कम्बख्त गौहर को यह मंजूर न था। उसने यहाँ तक हाव-भाव और चुलबुलापन दिखाया कि दिग्विजयसिंह की नीयत आखिर बदल गई और वह एकान्त खोजने लगा।

गौहर तीन दिन से ज्यादा अपने को न बचा सकी। इस बीच में उसने अपना मुँह काला करके दिग्विजयसिंह को काबू में कर लिया और दिग्विजयसिंह से इस बात की प्रतिज्ञा करा ली कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह जितने आदमी यहाँ कैद हैं, सभी का सिर काट कर किले के कँगूरों पर लटका दिया जाएगा और इसका बन्दोबस्त भी होने लगा। मगर इसी बीच में भैरोंसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल ने, जो किले के अन्दर पहुँच गए थे, वह धूम मचाई कि लोगों की नाक में दम कर दिया और मजा तो यह कि किसी को कुछ पता न लगता था कि यह कार्रवाई कौन कर रहा है।

१०

वीरेन्द्रसिंह के तीनों ऐयारों ने रोहतासगढ़ के किले के अन्दर पहुँच कर अंधेर मचाना शुरू किया। उन लोगों ने निश्चय कर लिया कि अगर दिग्विजयसिंह हमारे मालिकों को नहीं छोड़ेगा तो ऐयारी के कायदे के बाहर काम करेंगे और रोहतासगढ़ का सत्यानाश करके छोड़ेंगे।

जिस दिन दिग्विजयसिंह की मुलाकात गौहर से हुई थी, उसके दूसरे ही दिन दरबार के समय दिग्विजयसिंह को खबर पहुँची कि शहर में कई जगह हाथ के लिखे हुए कागज दीवारों पर चिपके हुए दिखाई देते हैं जिनमें लिखा है––"वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग इस किले में आ पहुँचे। यदि दिग्विजयसिंह अपनी भलाई चाहें तो चौबीस घण्टे के अन्दर राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को छोड़ दें, नहीं तो देखते-देखते रोहतासगढ़ का सत्यानाश हो जायगा और यहाँ का एक आदमी जीता न बचेगा।"

राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का हाल दिग्विजयसिंह अच्छी तरह जानता था। उसे विश्वास था कि उन लोगों का मुकाबला करने वाला दुनिया भर में कोई नहीं है। विज्ञापन का हाल सुनते ही वह काँप उठा और सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए। इन विज्ञापन की बात शहर भर में तुरंत फैल गई। मारे डर के वहाँ की रियाआ का दम निकला जाता था। सब कोई अपने राजा दिग्विजयसिंह की शिकायत करते थे और कहते थे कि कम्बख्त ने बेफायदा राजा वीरेन्द्रसिंह से वैर बाँध कर हम लोगों की जान ली।

तीनों ऐयारों ने तीन काम बाँट लिए। रामनारायण ने इस बात का जिम्मा लिया कि किसी लोहार के यहाँ चोरी करके बहुत-सी कीलें इकट्ठी करेंगे और रोहतागसढ़ में जितनी तोपें है सभी में कीलें ठोंक देंगे, चुन्नीलाल ने वादा किया कि तीन दिन के अन्दर रामानन्द ऐयार का सिर काट शहर के चौमुहाने पर रक्खेंगे, और भैरोंसिंह ने तो रोहतासगढ़ ही को चौपट करने का प्रण किया था।

हम ऊपर लिख आए हैं कि जिस समय कुन्दन (धनपति) ने तहखाने में से किशोरी को निकाल ले जाने का इरादा किया था तो बारह नम्बर की कोठरी में पहुँचने के पहले तहखाने के दरवाजे में ताला लगा दिया था। मगर रोहतासगढ़ दखल होने के बाद तहखाने वाली किताब की मदद से, जो दारोगा के पास रहा करती थी, वे दरवाजे पुनः खोल दिए गए थे और इसलिए दीवानखाने की राह से तहखाने में फिर आमद-रफ्त शुरू हो गई थी।

एक दिन आधी रात के बाद राजा दिग्विजयसिंह के पलंग पर बैठी हुई गौहर ने इच्छा प्रकट की कि मैं तहखाने में चलकर राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को देखना चाहती हूँ। राजा दिग्विजयसिंह उसकी मुहब्बत में चूर हो रहे थे, दीन-दुनिया की खबर भूले हुए थे, तहखाने के कायदे पर ध्यान न देकर गौहर को तहखाने में ले चले।

अभी पहला दरवाजा भी न खोला था कि यकायक एक भयानक आवाज आई। मालूम हुआ कि मानों हजारों तोपें एक साथ छूटी हैं। तमाम किला हिल उठा। गौहर बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ी, दिग्विजयसिंह भी खड़ा न रह सका।

जब दिग्विजयसिंह को होश आया, छत पर चढ़ गया और शहर की तरफ देखने लगा। शहर में बेहिसाब आग लगी हुई थी, सैकड़ों घर जल रहे थे, अग्निदेव ने अपना पूरा दखल जमा लिया था, आग के बड़े-बड़े शोले आसमान की तरफ उठ रहे थे। यह हाल देखते ही दिग्विजयसिंह ने सिर पीटा और कहा, "यह सब फसाद वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का है! बेशक उन लोगों ने मैगजीन में आग लगा दी और वह भयंकर आवाज मैगजीन के उड़ने की ही थी। हाय, आज सैकड़ों घर तबाह हो गये होंगे! इस समय वह कम्बख्त साधू अगर मेरे सामने होता तो मैं उसकी दाढ़ी नोंच लेता, जिसके बहकाने से वीरेन्द्रसिंह वगैरह को कैद किया!"

दिग्विजयसिंह घबरा कर राजमहल के बाहर निकला और तब उसे निश्चय हो गया कि जो कुछ उसने सोचा था, ठीक निकला। नौकरों ने खबर दी कि न मालूम किसने मैगजीन में आग लगा दी, जिसके सबब से सैकड़ों घर तबाह हो गए। उसी समय शहर में ऐसी आग लग गई जो अभी तक बुझाए नहीं बुझती। खबर के सुनते ही दिग्विजयसिंह अपने कमरे में लौट गया और बदहवास होकर गद्दी पर गिर पड़ा।

बेशक यह सब काम वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का ही था। इस आग-लगी में रामनारायण को भी तोपों में कीलें ठोंकने का खूब मौका हाथ लगा। रामानन्द दीवान घबरा कर घर से बाहर निकला और तहकीकात करने के लिए अकेला ही शहर की तरफ चला। रास्ते में चुन्नीलाल ने हाथ पकड़ लिया और कहा, "दीवानजी, बन्दगी!" बेमौके की बन्दगी से रामानन्द कुढ़ उठा और उसने चुन्नीलाल पर तलवार चलाई। चुन्नीलाल उछल कर दूर जा खड़ा हुआ और उस वार को बचा गया, मगर चुन्नीलाल के वार ने रामानन्द का काम तमाम कर दिया। उसकी भुजाली रामानन्द की गर्दन पर ऐसी बैठी कि सिर कट कर दूर जा गिरा।

अब हमको यह भी लिखना चाहिए कि भैरोंसिंह ने किस तरह मैगजीन में आग लगाई। भैरोंसिंह ने एक मोमबत्ती ऐसी तैयार की जो केवल दो घण्टे तक जल सकती थी अर्थात् उसमें दो घण्टे से ज्यादे देर तक जलने लायक मोम न था, और उस मोमबत्ती के बीचों-बीच में आतिशबाजी का एक अनार बनाया जिसमें आधी मोमबत्ती जब जल जाय तो आप से आप अनार में आग लगे। जब इस तरह की मोमबत्ती तैयार हो गई तो उसने अपने दोनों साथियों से कहा कि "मैं मैगजीन में आग लगाने जाता हूँ, अपनी फिक्र आप कर लूँगा। तुम लोग किसी ऐसी जगह जाकर छिपो जहाँ मैदान या किले की मजबूत दीवार हो, मगर इसके पहले शहर में आग लगा दो।" इसके बाद भैरोंसिंह मैगजीन के पास पहुँचे और इस फिक्र में लगे कि मौका मिले तो कमन्द लगा कर उसके अन्दर जायँ।

यह इमारत बहुत बड़ी तो न थी, मगर मजबूत थी। दीवार बहुत चौड़ी और ऊँची थी। फाटक बहुत बड़ा और लोहे का था। पहरे पर पचास आदमी नंगी तलवारें लिये हर वक्त मुस्तैद रहते थे। इस मैगजीन के चारों तरफ से कोई आदमी आग लेकर नहीं जाने पाता था।

चन्द्रमा अस्त हो गया और पिछली रात की अँधेरी चारों तरफ फैल गई। निद्रादेवी की हुकूमत में सभी पड़े हुए थे यहाँ तक कि पहरे वालों की आँखें भी झिपी पडती थीं। उसी समय मौका पाकर भैरोंसिंह ने मैगजीन के पिछली तरफ कमन्द लगाई। दीवार के ऊपर चढ़ जाने के बाद कमन्द खींच ली और फिर उसी के सहारे उतर गए। मैगजीन के अन्दर हजारों थैले बारूद के गँजे हुए पड़े थे, तोप के गोलों का ढेर लगा हुआ था, बहुत-सी तोपें भी पड़ी हुई थीं। भैरोंसिंह ने यह मोमबत्ती जलाई और बारूद के थैलों के पास जमीन पर लगाकर खड़ी कर दी, इसके बाद फुर्ती से मैगजीन के बाहर हो गए और जहाँ तक दूर निकल जाते बना, निकल गए। उसी के घण्टे भर बाद (जब मोमबत्ती का अनार छूटा होगा) बारूद में आग लगी और मैगजीन की इमारत जड़ बुनियाद से नष्ट हो गई। हजारों आदमी मरे और सैकड़ों मकान गिर पड़े, बल्कि यों कहना चाहिए कि उसकी आवाज से रोहतासढ़ का किला दहल उठा, जरूर कई कोस तक इसकी भयानक आवाज गई होगी। पहाड़ी के नीचे वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में जब यह आवाज पहुँची तो दोनों सेनापति समझ गए कि मैगजीन में आग लगी, क्योंकि ऐसी भयानक आवाज सिवाय मैगजीन उड़ने के और किसी तरह से नहीं हो सकती। बेशक यह काम भैरोंसिंह का है।

मैगजीन उड़ने का विश्वास होते ही दोनों सेनापति बहुत प्रसन्न हुए और समझ गए कि अब रोहतासगढ़ का किला फतह कर लिया, क्योंकि जब बारूद का खजाना ही उड़ गया तो किले वाले तोपों के जरिये से हमें कैसे रोक सकते हैं। दोनों सेनापतियों ने यह सोचकर, कि अब विलम्ब करना मुनासिब नहीं है, किले पर चढ़ाई कर दी और दो हजार आदमियों को साथ ले नाहरसिंह पहाड़ पर चढ़ने लगा। यद्यपि दोनों सेनापति इस बात को समझते थे कि मैगजीन उड़ गई है, तो भी कुछ बारूद तोपखाने में जरूर होगी, मगर यह खयाल उनके बढ़े हुए हौसले को किसी तरह रोक न सका।

इधर दिग्विजयसिंह अपनी जिन्दगी से बिल्कुल नाउम्मीद हो बैठा। जब उसे यह खबर पहुँची कि रामानन्द दीवान (या ऐयार) भी मारा गया और बहुत-सी तोपें भी कील ठुक जाने के कारण बर्बाद हो गईं, तब वह और बेचैन हो गया और मालूम होने लगा कि मौत नंगी तलवार लिए सामने खड़ी है। वह पहर दिन चढ़े तक पागलों की तरह चारों तरफ दौड़ता रहा और तब एकान्त में बैठकर सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए। जब उसे जान बचाने की कोई तरकीब न सूझी और यह निश्चय हो गया कि अब रोहतासगढ़ का किला किसी तरह नहीं रह सकता और दुश्मन लोग भी मुझे किसी तरह जीता नहीं छोड़ सकते, तब वह हाथ में नंगी तलवार लेकर उठा और तहखाने की ताली निकाल कर यह कहता हुआ तहखाने की तरफ चला कि "जब मेरी जान बच ही नहीं सकती तो वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों वगैरह को क्यों जीता छोडूँ?

आज मैं अपने हाथ से उन लोगों के सिर काटूँगा!"

दिग्विजयसिंह हाथ में नंगी तलवार लिए हुए अकेला ही तहखाने में गया, मगर जब उस दालान में पहुँचा जिसमें हथकड़ियों और बेड़ियों से कसे हुए वीरेन्द्रसिंह वगैरह रखे गए थे, तो उसको खाली पाया। वह ताज्जुब में आकर चारों तरफ देखने और सोचने लगा कि कैदी लोग कहाँ गायब हो गए। मालूम होता है कि यहाँ भी ऐयार लोग आ पहुँचे, मगर देखना चाहिए कि किस राह से पहुँचे?

दिग्विजयसिंह उस सुरंग में गया जो कब्रिस्तान की तरफ निकल गई थी। वहाँ का दरवाजा उसी तरह बन्द पाया जैसा कि उसने अपने हाथ से बन्द किया था। आखिर लाचार सिर पीटता हुआ लौट आया और दीवानखाने में बदहवास होकर गद्दी पर गिर पड़ा।

११

इस जगह मुख्तसिर ही में यह भी लिख देना मुनासिब मालूम होता है कि रोहतासगढ़ तहखाने में से राजा वीरेन्द्रसिंह, कुँअर आनन्दसिंह और उनके ऐयार लोग क्यों कर छूटे और कहाँ गए।

हम ऊपर लिख आए हैं कि जिस समय गौहर 'जोगिया' का संकेत देकर रोहतासगढ़ किले में दाखिल हुई उसके थोड़ी ही देर बाद एक लम्बे कद का आदमी भी, जो असल में भूतनाथ था, 'जोगिया' का संकेत देकर किले के अन्दर चला गया। न मालूम उसने वहाँ क्या-क्या कार्रवाई की, मगर जिस समय मैगजीन उड़ाई गई थी, उस समय वह एक चोबदार की सूरत बना राजमहल के आस-पास घूम रहा था। जब राजा दिग्विजयसिंह घबरा कर महल के बाहर निकला था और चारों तरफ कोलाहल मचा हुआ था, वह इस तरह महल के अन्दर घुस गया कि किसी को गुमान भी न हुआ। इसके पास ठीक वैसी ही ताली मौजूद थी जैसी तहखाने की ताली राजा दिग्विजयसिंह के पास थी। भूतनाथ जल्दी-जल्दी उस घर में पहुँचा जिसमें तहखाने के अन्दर जाने का रास्ता था। उसने तुरन्त दरवाजा खोला और अन्दर जाकर उसी ताली से फिर बन्द कर दिया। उस दरवाजे में एक ही ताली बाहर-भीतर दोनों तरफ से लगती थी। कई दरवाजों को खोलता हुआ वह उस दालान में पहुँचा जिसमें वीरेन्द्रसिंह वगैरह कैद थे और राजा वीरेन्द्रसिंह के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। राजा वीरेन्द्रसिंह उस समय बड़ी चिन्ता में थे। मैगजीन उड़ने की आवाज उनके कान तक भी पहुँची थी, बल्कि मालूम रहे कि उस आवाज के सदमे से समूचा तहखाना हिल गया। वे भी यही सोच रहे थे कि शायद हमारे ऐयार लोग किले के अन्दर पहुँच गए। जिस समय भूतनाथ हाथ जोड़ कर उनके सामने जा खड़ा हुआ, वे चौंके और भुतनाथ की तरफ देखकर बोले "तू कौन है और यहाँ क्यों आया?"

भूतनाथ––यद्यपि मैं इस समय एक चोबदार की सूरत में हूँ, मगर मैं हूँ कोई दूसरा ही, मेरा नाम भूतनाथ है मैं आप लोगों को इस कैद से छुड़ाने आया हूँ और इसका इनाम पहले ही ले लिया चाहता हूँ।

वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब में आकर) इस समय मेरे पास क्या है जो मैं इनाम में दूँ?

भूतनाथ––जो मैं चाहता हूँ वह इस समय भी आपके पास मौजूद है।

वीरेन्द्रसिंह––यदि मेरे पास मौजूद है तो मैं उसे देने को तैयार हूँ। माँग, क्या माँगता है?

भूतनाथ––बस, मैं यही माँगता हूँ कि आप मेरा कसूर माफ कर दें! और कुछ नहीं चाहता।

वीरेन्द्रसिंह––मगर मैं कुछ नहीं जानता कि तू कौन है और तूने क्या अपराध किया है जिसे मैं माफ कर दूँ।

भूतनाथ––इसका जवाब मैं इस समय नहीं दे सकता। बस, आप देर न करें, मेरा कसूर माफ कर दें जिससे आप लोगों को यहाँ से जल्द छुड़ाऊँ। समय बहुत कम है, बिलम्ब करने से पछताना पड़ेगा।

तेजसिंह––पहले तुम्हें कसूर साफ-साफ कह देना चाहिए।

भूतनाथ––ऐसा नहीं हो सकता!

भूतनाथ की बातें सुनकर सभी हैरान थे और सोचते थे कि यह विचित्र आदमी है जौ जबर्दस्ती अपना कसूर माफ करा रहा है और यह भी नहीं कहता कि उसने क्या किया है। इसमें शक नहीं कि यदि हम लोगों को यहाँ से छुड़ा देगा तो भारी अहसान करेगा, मगर इसके बदले में यह केवल इतना ही माँगता है कि इसका कसूर माफ कर दिया जाय। तो यह मामला क्या है! आखिर बहुत-कुछ सोच-समझकर राजा वीरेन्द्रसिंह ने भूतनाथ से कहा, "खैर जो हो, मैंने तेरा कसूर माफ किया।"

इतना सुनते ही भूतनाथ हँसा और बारह नम्बर की कोठरी के पास जाकर उसी ताली से, जो उसके पास थी, कोठरी का दरवाजा खोला। पाठक महाशय भूले न होंगे, उन्हें याद होगा कि इसी कोठरी किशोरी को दिग्विजयसिंह ने डाल दिया था और इसी कोठरी में से उसे कुन्दन ले भागी थी।

कोठरी का दरवाजा खुलते ही हाथ में नेजा लिए वही राक्षसी दिखाई पड़ी जिसका हाल ऊपर लिख चुके हैं और जिसके सबब से कमला, भैरोंसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल किले के अन्दर पहुँचे थे। इस समय तहखाने में केवल एक चिराग जल रहा था जिसकी कुछ रोशनी चारों तरफ फैली हुई थी। मगर जब वह राक्षसी कोठरी के बाहर निकली तो उसके नेजे की चमक से तहखाने में दिन की तरह उजाला हो गया। भयानक सूरत के साथ उसके नेजे ने सभी को ताज्जुब में डाल दिया। उस औरत ने भूतनाथ से पूछा, "तुम्हारा काम हो गया?" इसके जवाब में भूतनाथ ने से कहा––"हाँ!"

उस राक्षसी ने राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर कहा, "सभी को लेकर आप इस कोठरी में आवें और तहखाने के बाहर निकल चलें, मैं इसी राह से आप लोगों को तहखाने के बाहर कर देती हूँ।" यह बात सभी को मालूम ही थी इसी बारह नम्बर की कोठरी में से किशोरी गायब हो गई थी, इसलिए सभी को विश्वास था कि इस कोठरी में से कोई रास्ता बाहर निकल जाने के लिए जरूर है।

सभी की हथकड़ी-बेड़ी खोल दी गई। इसके बाद सब कोई उस कोठरी में घुसे और उस राक्षसी की मदद से तहखाने के बाहर हो गये। जाते समय राक्षसी ने उस कोठरी को बन्द कर दिया। बाहर होते ही राक्षसी और भूतनाथ राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह से बिना कुछ कहे चले गए और जंगल में घुसकर देखते-ही-देखते नजरों से गायब हो गए। उन दोनों के बारे में सभी को शक बना ही रहा।

१२

दो पहर दिन चढ़ने के पहले ही फौज लेकर नाहरसिंह रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर चढ़ गया। उस समय दुश्मनों ने लाचार होकर फाटक खोल दिया और लड़-भिड़ कर जान देने पर तैयार हो गये। किले की कुल फौज फाटक पर उमड़ आई और फाटक के बाहर मैदान में घोर युद्ध होने लगा। नाहरसिंह की बहादुरी देखने योग्य थी। वह हाथ में तलवार लिए जिस तरफ को निकल जाता था, पूरा सफाया कर देता था। उसकी बहादुरी देखकर उसकी मातहत फौज की भी हिम्मत दूनी हो गई और वह ककड़ी की तरह दुश्मनों को काटने लगी। उसी समय पाँच सौ बहादुरों को साथ लिए राजा वीरेन्द्रसिंह, कुँअर आनन्दसिंह और तेजसिंह बगैरह भी आ पहुँचे और उस फौज में मिल गये जो नाहरसिंह की मातहती में लड़ रही थी। ये पाँच सौ आदमी उन्हीं की फौज के थे जो दो-दो, चार-चार करके पहाड़ के ऊपर चढ़ाये गए थे। तहखाने से बाहर निकलने पर राजा वीरेन्द्रसिंह से मुलाकात हुई थी और सब एक जगह हो गये थे।

जिस समय किले वालों को यह मालूम हुआ कि राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह भी उस फौज में आ मिले, उस समय उनकी हिम्मत बिल्कुल जाती रही। बिना दिल का हौसला निकाले ही उन लोगों ने हथियार रख दिए और सुलह का डंका बजा दिया। पहाड़ी के नीचे से और फौज भी पहुँच गई और रोहतासगढ़ में राजा वीरेन्द्रसिंह की अमलदारी हो गई। जिस समय राजा वीरेन्द्र सिंह दीवानखाने में पहुँचे वहाँ राजा दिग्विजयसिंह की लाश पाई गई। मालूम हुआ कि उसने आत्मघात कर लिया। उसकी हालत पर राजा वीरेन्द्रसिंह देर तक अफसोस करते रहे।

राजा वीरेन्द्रसिंह ने कुँअर आनन्दसिंह को गद्दी पर बैठाया। सभी ने नजरें दीं। उसी समय कमला भी आ पहुँची। उसने किले में पहुँच कर कोई ऐसा काम नहीं किया था जो लिखने लायक हो। हाँ, गिल्लन के सहित गौहर को जरूर गिरफ्तार कर लिया था। दिग्विजय सिंह की रानी अपने पति के साथ सती हुई। रामानन्द की स्त्री भी अपने पति के साथ जल मरी। शहर में कुमार के नाम की मुनादी करा दी गई और यह कहला दिया गया कि जो रोहतासगढ़ से निकल जाना चाहे वह खुशी से चला जाय! दिग्विजयसिंह के मरने से जिसे कष्ट हुआ हो वह यदि हमारे भरोसे पर यहाँ रहेगा तो उसे किसी तरह का दुःख न होगा। हर एक की मदद की जायगी और जो जिस लायक है उसकी खातिर की जायगी। इन सब कामों के बाद राजा वीरेन्द्रसिंह ने कुल हाल की चिट्ठी लिखकर अपने पिता के पास रवाना की।

दूसरे दिन राजा वीरेन्द्रसिंह ने एकान्त में कमला को बुलाया। उस समय उनके पास कुँअर आनन्दसिंह, तेजसिंह, भैरोंसिंह, तारासिंह वगैरह ऐयार लोग ही बैठे थे, अर्थात् सिवाय आपस वालों के कोई भी बाहरी आदमी नहीं था। राजा वीरेन्द्रसिंह ने कमला से पूछा, "कमला, तू इतने दिनों तक कहाँ रही? तेरे ऊपर क्या-क्या मुसीबतें आई, और तू किशोरी का क्या-क्या हाल जानती है, सो मैं सुनना चाहता हूँ।"

कमला––(हाथ जोड़कर) जो कुछ मुसीबतें मुझ पर आईं और जो कुछ किशोरी का हाल मैं जानती हूँ सब अर्ज करती हूँ। अपनी प्यारी किशोरी से छूटने के बाद मैं बहुत ही परेशान हुई। अग्निदत्त की लड़की कामिनी ने जब किशोरी को अपने बाप के पंजे से छुड़ाया और खुद भी निकल खड़ी हुई तो पुन: मैं उन लोगों से जा मिली और बहुत दिनों तक गयाजी में रही और वहीं बहुत सी विचित्र बातें हुईं।

वीरेन्द्रसिंह––हाँ, गयाजी का बहुत-कुछ हाल तुम लोगों के बारे में देवीसिंह की जुबानी मुझे मालूम हुआ था और यह भी जाना गया कि जिन दिनों इन्द्रजीतसिंह बीमार था, उसके कमरे में जो-जो अद्भुत बातें देखने-सुनने में आईं, सब कामिनी ही की कार्रवाइयाँ थीं, मगर उनमें से कई बातों का भेद अभी तक मालूम नहीं हुआ।

कमला––वह क्या?

वीरेन्द्रसिंह––एक तो यह कि तुम लोग उस कोठरी में किस रास्ते से आती जाती थीं? दूसरे, लड़ाई किससे हुई थी? वह कटा हाथ जो कोठरी में पाया गया, किसका था, और बिना सिर की लाश किसकी थी?

कमला––वह भेद भी मैं आपसे कहती हूँ। गयाजी में फलगू नदी के किनारे एक मन्दिर श्री राधाकृष्णजी का है। उसी मन्दिर में से एक रास्ता महल में जाने का है जो उस कोठरी में निकला है जिसका हाल माधवी, अग्निदत्त और कामिनी के सिवाय किसी को मालूम नहीं। कामिनी की बदौलत मुझे और किशोरी को मालूम हुआ। उसी रास्ते हम लोग आते-जाते थे। वह रास्ता बड़ा ही विचित्र है, उसका हाल मैं जुबानी नहीं समझा सकती। गयाजी चलने के बाद जब मौका मिलेगा तो ले चलकर उसे दिखाऊँगी, हम लोगों का उस मकान में आना-जाना नेकनीयती के साथ होता था। मगर जब माधवी गयाजी में पहुँची तो बदला लेने की नीयत से एक आदमी और अपनी ऐयारा को साथ ले उसी राह से महल की तरफ रवाना हुई। उसे उस समय तक शायद हम लोगों का हाल मालूम न था। इत्तिफाक से हम तीनों आदमी भी उसी समय सुरंग में घुसे, आखिर नतीजा यह हुआ कि उस कोठरी में पहुँच कर लड़ाई हो गई। माधवी के साथ का आदमी मारा गया। वह कलाई माधवी की थी और मेरे हाथ से कटी थी। अन्त में उसकी ऐयारा उस आदमी का सिर और माधवी को लेकर चली गई। हम लोगों ने उस समय रोकना मुनासिब न समझा।

वीरेन्द्रसिंह––हाँ ठीक है, ऐसा ही हुआ है। यह हाल मुझे मालूम था, मगर शक मिटाने के लिए तुमसे पूछा था।

कमला––(ताज्जुब में आकर) आपको कैसे मालूम हुआ?

वीरेन्द्रसिंह––मुझसे देवीसिंह ने कहा था और देवीसिंह को उस साधु ने कहा था जो रामशिला पहाड़ी के सामने फलगू नदी के बीच वाले भयानक टीले पर रहता था। देवीसिंह की जुबानी बाबाजी ने मुझे एक सन्देशा भी कहला भेजा था, मौका मिलने पर मैं जरूर उनके हुक्म की तामील करूँगा।

कमला––वह सन्देशा क्या था?

वीरेन्द्रसिंह––सो इस समय न कहूँगा। हाँ, यह तो बता कि कामिनी का और उन डाकुओं का साथ क्योंकर हुआ जो गयाजी की रिआया को दुःख देते थे?

कमला––कामिनी का उन डाकुओं से मिलना केवल उन लोगों को धोखा देने के लिए था। वे डाकू सब अग्निदत्त की तरफ से तनख्वाह और लूट के माल में कुछ हिस्सा भी पाते थे। वे लोग कामिनी को पहचानते थे और उसकी इज्जत करते थे। उस समय उन लोगों को यह नहीं मालूम था कि कामिनी अपने बाप से रंज होकर घर से निकली है उससे डरते थे और जो वह कहती थी करते थे। आखिर कामिनी ने धोखा देकर उन लोगों को मरवा डाला और मेरे ही हाथ से उन डाकुओं की जानें गईं। वे डाकू लोग जहाँ रहते थे, आपको मालूम हुआ ही होगा।

वीरेन्द्रसिंह––हाँ, मालूम हुआ है। जो कुछ मेरा शक था, मिट गया, अब उस विषय में विशेष कुछ मालूम करने की कोई जरूरत नहीं है। अब मैं यह पूछता हूँ कि इस रोहतासगढ़ वाले आदमी जब किशोरी को ले भागे, तब तेरा और कामिनी का क्या हाल हुआ?

कमला––कामिनी को साथ लेकर मैं उस खँडहर से, जिसमें नाहरसिंह और कुँअर इन्द्रजीतसिंह की लड़ाई हुई थी, बाहर निकली और किशोरी को छुड़ाने की धुन में रवाना हुई, मगर कुछ कर न सकी, बल्कि यों कहना चाहिए कि अभी तक मारी फिरती हूँ। यद्यपि इस रोहतासगढ़ के महल तक पहुँच चुकी थी, मगर मेरे हाथ से कोई काम न निकला।

वीरेन्द्रसिंह––खैर, कोई हर्ज नहीं। अच्छा, यह बता कि अब कामिनी कहाँ है!

कमला––कामिनी को मेरे चाचा शेरसिंह ने अपने एक दोस्त के घर में रक्खा है मगर मुझे यह नहीं मालूम कि वह कौन है ओर कहाँ रहता है।

वीरेन्द्रसिंह––शेरसिंह से कामिनी क्योंकर मिली?

कमला––यहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक खँडहर है। शेरसिंह से मिलने के लिए कामिनी को साथ लेकर मैं उसी खँडहर में गई थी। मगर अब सुनने में आया है कि शेर सिंह ने आपकी ताबेदारी कबूल कर ली और आपने उन्हें कहीं भेजा है।

वीरेन्द्रसिंह––हाँ, वह देवीसिंह को साथ लेकर इन्द्रजीत को छुड़ाने के लिए गये हैं मगर न मालूम, क्या हुआ कि अभी तक नहीं लौटे।

कमला––कुँअर इन्द्रजीतसिंह तो यहाँ से दूर न थे और चाचा को वह जगह मालूम थी, अब तक उन्हें लौट आना चाहिए था।

वीरेन्द्रसिंह––क्या तुझे भी वह जगह मालूम है?

कमला––जी हाँ, आप जब चाहें चलें, मुझे रास्ता बखूबी मालूम है।

इस समय कुँअर आनन्दसिंह ने, जो सिर झुकाए सब बातें सुन रहे थे, अपने पिता की तरफ देखा और कहा, "यदि आज्ञा हो तो मैं कमला के साथ भाई की खोज में जाऊँ?" इसके जवाब में राजा वीरेन्द्र सिंह ने सिर हिलाया अर्थात् उनकी अर्जी मंजूर नहीं की।

राजा वीरेन्द्रसिंह और कमला में जो कुछ बातें हो रही थीं, सब कोई गौर से सुन रहे थे। यह कहना जरा मुश्किल है कि उस समय कुँअर आनन्दसिंह की क्या दशा थी। कामिनी के वे सच्चे आशिक थे, मगर वाह रे दिल, इस इश्क को उन्होंने जैसा छिपाया उन्हीं का काम था। इस समय वे कमला की बातें बड़े गौर से सुन रहे थे। उन्हें निश्चय था कि जिस जगह शेरसिंह ने कामिनी को रक्खा है, वह जगह कमला को मालूम है मगर किसी कारण से बताती नहीं, इसलिए कमला के साथ भाई की खोज में जाने के के लिए पिता से आज्ञा माँगी। इसके सिवाय कामिनी के विषय में और भी बहुत-सी बातें कमला से पूछना चाहते थे। मगर क्या करें, लाचार कि उनकी अर्जी नामंजूर की गई और वे कलेजा मसोस कर रह गए।

इसके बाद आनन्दसिंह फिर अपने पिता के सामने गए और हाथ जोड़कर बोले, "मैं एक बात और अर्ज किया चाहता हूँ।"

वीरेन्द्रसिंह––वह क्या?

आनन्दसिंह––इस रोहतासगढ़ की गद्दी पर मैं बैठाया गया हूँ परन्तु मेरी इच्छा है कि बतौर सूबेदार के यहाँ का राज्य किसी के सुपुर्द कर दिया जाय।

आनन्दसिंह की बात सुन राजा वीरेन्द्रसिंह गौर में पड़ गए और कुछ देर तक सोचने के बाद बोले, "हाँ, मैं तुम्हारी इस राय को पसन्द करता हूँ और इसका बन्दोबस्त तुम्हारे ही ऊपर छोड़ता हूँ। तुम जिसे चाहो, इस काम के लिए चुन लो।"

आनन्दसिंह ने झुक कर सलाम किया और उन लोगों की तरफ देखा जो वहाँ मौजूद थे। इस समय सभी के दिल में खुटका पैदा हुआ और सभी इस बात से डरने लगे कि कहीं ऐसा न हो कि यहाँ का बन्दोबस्त मेरे सुपुर्द किया जाय, क्योंकि उन लोगों में से कोई भी ऐसा न था जो अपने मालिक का साथ छोड़ना पसन्द करता। आखिर आनन्द सिंह ने सोच-समझ कर अर्ज किया––

आनन्दसिंह––मैं इस काम के लिए पण्डित जगन्नाथ ज्योतिषी को पसन्द करता हूँ।

वीरेन्द्रसिंह––अच्छी बात है, कोई हर्ज नहीं।

ज्योतिषीजी ने बहुत-कुछ उज्र किया, बावेला मचाया, मगर कुछ सुना नहीं गया। उसी दिन से मुद्दत तक रोहतासगढ़ ब्राह्मणों की हुकूमत में रहा और यह हुकूमत हुमायूँ के जमाने में 944 हिजरी तक कायम रही। इसके बाद 945 में दगाबाज शेरखाँ ने (यह दूसरा शेरखाँ था) रोहतासगढ़ के राजा चिन्तामन ब्राह्मण को धोखा देकर किले पर अपना कब्जा कर लिया।

१३

तहखाने में बैठी हुई कामिनी को जब किसी के आने की आहट मालूम हुई तब वह सीढ़ी की तरफ देखने लगी मगर आने वाले अभी छत ही पर थे। उसने समझा कि कमला या शेरसिंह आते होंगे, मगर जब उसे कई आदमियों के पैरों की धमधमाहट मालूम हुई तब वह घबराई। उसका खयाल दुश्मनों की तरफ गया और वह अपने बचाव का ढंग करने लगी।

ऊपर के कमरे से तहखाने में उतरने के लिए जो सीढ़ियाँ थीं, उनके नीचे एक छोटी कोठरी बनी हुई थी। इसी कोठरी में शेरसिंह का असबाब रहा करता था और इस समय भी उनका असबाव इसी के अन्दर था। इसके अन्दर जाने के लिए एक छोटा सा दरवाजा था और लोहे का मजबूत मगर हलका पल्ला लगा हुआ था। दरवाजा बन्द करने के लिए बाहर की तरफ कोई जंजीर या कुण्डी न थी, मगर भीतर की तरफ एक अड़ानी लगी हुई थी जो दरवाज़ा बन्द करने के लिए काफी थी। दरवाजे के पल्ले में एक सूराख था जिस पर गौर करने से मालूम होता था कि वह ताली लगाने की जगह है।

कामिनी ने तुरन्त चिराग बुझा दिया और अपने बिछावन को बगल में दबा कर उसी कोठरी के अन्दर चले जाने के बाद भीतर से दरवाजा बन्द कर लिया। यह काम कामिनी ने बड़ी जल्दी और दबे-पैर किया। थोड़ी ही देर में कामिनी को मालूम हुआ कि आने वाले अब सीढ़ी उतर रहे हैं और साथ ही इसके ताली लगाने वाले छेद में से मशाल की रोशनी भी उस कोठरी के अन्दर पहुँची जिसमें कामिनी छिपी हुई थी। वह छेद में आँख लगाकर देखने लगी कि कौन आया है और क्या करता है।

सिपाहियाना ठाठ के पाँच आदमी ढाल-तलवार लगाये हुए दिखाई पड़े। एक के हाथ में मशाल थी और चार आदमी एक सन्दूक को उठा कर लाये थे। जमीन पर सन्दूक रख देने के बाद पाँचों आदमी बैठ कर दम लेने और आपस में यों बातचीत करने लगे––

मशालची––जहन्नुम में जाय ऐसी नौकरी, दौड़ते-दौड़ते हैरान हो गये, ओफ!

दूसरा––खैर, दौड़ना और हैरान होना भी सुफल होता अगर कोई नेक काम हम लोगों के सुपुर्द होता।

तीसरा––भाई, चाहे जो हो, मगर बेगुनाहों का खून नाहक मुझसे तो नहीं किया जाता!

चौथा––मुश्किल तो यह है कि हम लोग इनकार भी नहीं कर सकते और भाग भी नहीं सकते।

पाँचवाँ––परसों जो हुक्म हुआ है सो तुमने सुना या नहीं!

मशालची––हाँ, मुझे मालूम है।

तीसरा––मैंने नहीं सुना, क्योंकि मैं नानक का पता लगाने गया था।

पाँचवाँ––परसों यह हुक्म दिया गया है कि जो कोई कामिनी को पकड़ लायेगा या पता लगा देगा उसे मुँहमाँगी चीज इनाम में दी जायगी।

तीसरा––हम लोगों की ऐसी किस्मत कहाँ कि कामिनी हाथ लगे!

दूसरा––(चौंक कर) चुप रहो, देखो, किसी की आवाज आ रही है!

किशोरी से बात करते-करते जब किसी के आने की आहट मालूम हुई तो कामिनी चुप हो गई थी। किशोरी को ताज्जुब मालूम हुआ कि यकायक कामिनी चुप क्यों हो गई? थोड़ी देर तक राह देखती रही कि शायद अब बोले, मगर जब देर हो गई तो उसने खुद पुकारा और कहा, "क्यों बहिन, चुप क्यों हो गई?" यही आवाज उन पाँचों आदमियों ने सुनी थी। उन लोगों ने बातें करना छोड़ दिया और आवाज की तरफ ध्यान लगाया। फिर आवाज आई––"बहिन कामिनी, कुछ कहो तो सही, तुम चुप क्यों हो गईं? क्या ऐसे समय में तुमने भी मुझे छोड़ दिया! बात करना भी बुरा मालूम होता है!"

किशोरी की बातें सुनकर पाँचों आदमी ताज्जुब में आ गये और उन लोगों को एक प्रकार की खुशी हुई।

एक––उसी किशोरी की आवाज है, मगर वह कामिनी को क्यों पुकार रही है? क्या कामिनी उसके पास पहुँच गई?

दूसरा––क्या पागलपन की बातें कर रहे हो? कामिनी अगर किशोरी के पास पहुँच जाती तो वह पुकारती क्यों? धीरे-धीरे आपस में बात करती या इस तरह उसे लानत देती?

तीसरा––अजी, यह तो वही है, मैं समझता हूँ कि कामिनी इस कोठरी में जरूर आई थी।

दूसरा––आई थी तो गई कहाँ?

चौथा––हम लोगों के आने के पहले ही कहीं चली गई होगी।

दूसरा––(हँस कर) क्या खूब! अजी किशोरी का यह कहना––"क्यों बहिन, चुप क्यों हो गईं!" इस बात को साबित करता है कि वह अभी-अभी इस कोठरी में मौजूद थी।

पाँचवाँ––तुम्हारा कहना ठीक है मगर यहाँ तो कामिनी की बू तक नहीं आती।

दूसरा––(चारों तरफ देख और उस कोठरी की तरफ इशारा करके) इसी में होगी।

पाँचों ही यह कहने लगे कि 'कामिनी जरूर इसी कोठरी में होगी, हम लोगों के आने की आहट पाकर छिप गई है।' आखिर सब उस कोठरी के पास गए, एक ने दरवाजे में धक्का मारा और किवाड़ बन्द पाकर कहा, "है––है, जरूर इसी में है!"

कोठरी के अन्दर छिपकर बैठी बेचारी कामिनी सब बातें सुन रही थी और ताली के छेद में से सभी को देख भी रही थी। ऊपर लिखी बातों ने उसका कलेजा दहला दिया, यहाँ तक कि वह अपनी जिन्दगी से नाउम्मीद हो गई और उसे निश्चय हो गया कि अब ये लोग मुझे गिरफ्तार कर लेंगे।

पाँचों आदमी इस फिक्र में लगे कि किस तरह दरवाजा खुले और कामिनी को गिरफ्तार कर लें। एक ने कहा, "दरवाजा तोड़ दो!" दूसरे ने हँस कर जवाब दिया, "शायद यह तुम्हारे किए हो सकेगा।"

उन पाँचों ने बहुत कुछ जोर कामिनी को पुकारा, दिलासा दिया, धमकी दी, जान बचा देने का वादा किया और समझाया मगर कुछ काम न चला। कामिनी बोली तक नहीं। आखिर उनमें से एक ने जो सबसे चालाक और होशियार था कहा, "अगर इस दरवाजे को हम पहले कभी बन्द देखते तो जरूर समझते कि किसी जानकार ने बाहर ताला लगाकर बन्द किया है, मगर अभी थोड़े ही दिन हुए इस कोठरी को मैंने खुला देखा था, इसमें किसी का असबाब पड़ा हुआ था। जो हो यह तो निश्चय हो गया कि कामिनी इस कोठरी के अन्दर घुस कर बैठी है, अब बाबाजी आवें तो इस कोठरी का दरवाजा खुले। (कुछ सोचकर) अब तो यही मुनासिब है कि हम लोगों में से एक आदमी जाय और बाकी चार आदमी बारी-बारी से यहाँ पहरा दें, जिससे कामिनी निकलकर भाग न जाय। आखिर इस कोठरी में कब तक छिप कर बैठी रहेगी या अपनी भूख-प्यास का क्या बन्दोबस्त करेगी?"

सभी ने इस राय को पसन्द किया। एक आदमी अपने मालिक को खबर करने चला गया, एक तहखाने में उसी जगह बैठा रहा और तीन आदमी बाहर खँडहर में निकल आए और इधर-उधर टहलने लगे। सवेरा हो गया और पूरब तरफ सूर्य की लालिमा दिखाई देने लगी।

बेचारी कामिनी की जान आफत में फँस गई, देखना चाहिए क्या होता है, मगर उसने निश्चय कर लिया कि भूख और प्यास से चाहे जान निकल जाय, मगर कोठरी के बाहर न निकलूँगी।

उस बेचारी को कोठरी के अन्दर घुस कर बैठे तीन दिन हो गए। भूख और प्यास से उस बेचारी की क्या अवस्था हो गई होगी, यह पाठक स्वयं समझ सकते हैं। लिखने की कोई आवश्यकता नहीं।

हम ऊपर लिख आए हैं कि उन पाँचों में से एक आदमी अपने मालिक को खबर करने चला गया और बाकी चार इसलिए रह गए कि बारी-बारी से पहरा दें, जिससे कामिनी निकलकर भाग न जाय।

तीसरे दिन इनमें से तीन आदमी आपस में बातें करते और घूमते-फिरते खँडहर के बाहर निकले और फाटक पर खड़े होकर बातें करने लगे।

एक––इसमें कोई शक नहीं कि हम लोगों का नसीब जाग गया।

दूसरा––नसीब जागा तो हम नहीं कह सकते, हाँ इतनी बात है कि रकम गहरी हाथ लगेगी।

तीसरा––मुँहमाँगा इनाम क्या हम नहीं पा सकते?

दूसरा––नहीं।

तीसरा––सो क्यों?

दूसरा––हम लोग कामिनी को अगर पकड़ ले जाते तो मुँहमाँगा इनाम पाते, सो तो हुआ नहीं, कामिनी कोठरी के अन्दर घुस बैठी और हम लोग दरवाजा खोलकर उसे निकाल न सके, लाचार हो बाबाजी को बुलाना पड़ा, ऐसी अवस्था में जो कुछ इनाम मिल जाय वही बहुत है।

पहिला––इतना तो कहला भेजा कि हम लोगों ने कामिनी को इस तहखाने में फँसा रखा है।

दूसरा––खैर जो होगा, देखा जायगा, इस समय तो हम लोगों की जीत-ही-जीत मालूम होती है। कामिनी और किशोरी दोनों को ही हमारे मालिक की किस्मत ने इस तहखाने में कैद कर रखा है।

तीसरा––(चौंककर) जरा इधर तो देखो ये लोग कौन हैं, मालूम होता है कि इन लोगों ने हमारी बातें लीं।

खँडहर के बाहर बाएँ तरफ कुछ हट कर एक नीम का पेड़ था और उस पेड़ के नीचे एक कुआँ था। इस समय दो साधु उस कुएँ पर बैठे इन तीनों की बातें सुन रहे थे। जब उन तीनों को यह बात मालूम हुई तो डरे और उन साधुओं के पास जाकर बातचीत करने लगे––

एक आदमी––तुम दोनों यहाँ क्यों बैठे हो?

एक साधु––हमारी खुशी!

एक आदमी––अच्छा, अब हम कहते हैं कि उठो और यहाँ से चले जाओ।

एक साधु––तू है कौन, जो तेरी बात मानें?

एक आदमी––(तलवार खींचकर) यह न जानना कि साधु समझ के छोड़ दूँगा, नाहक गुस्सा मत दिलाओ।

साधु––(हँसकर) वाह रे बन्दर-घुड़की! अबे, क्या तू हम लोगों को साधु समझ रहा है?

इतना सुनते ही तीनों आदमियों ने गौर करके साधुओं को देखा और यकायक यह कहते हुए कि 'हाय, गजब हो गया, यहाँ से भागो, यहाँ से भागो' वहाँ से भागे। जहाँ तक हो सका, उन लोगों ने भागने में कसर न की। दोनों साधुओं ने उन लोगों को रोकना मुनासिब न समझा, और भागने दिया।

अब वे दोनों साधु वहाँ से उठे, और बातें करते हुए खँडहर के अन्दर घुसे। घूमते-फिरते दालान में पहुँचे और दरवाजा खोलते हुए उस तहखाने में उतर गए जिसमें कामिनी थी। इस तहखाने और दरवाजे का हाल हम ऊपर लिख आए हैं, पुनः लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती। हाँ, इतना जरूर कहेंगे कि रंग-ढंग से मालूम होता था कि ये दोनों साधु तहखाने और उसके रास्ते को बखूबी जानते हैं, नहीं तो ऐसा आदमी, जो दरवाजे का भेद न जानता हो, उस तहखाने में किसी तरह नहीं पहुँच सकता था।

जब दोनों साधु तहखाने में पहुँचे तो वहाँ एक सिपाही को पाया और सन्दूक पर भी नजर पड़ी। एक मोमबत्ती आले पर जल रही थी। वह सिपाही इन दोनों को देख चौंका, और तलवार खींचकर सामना करने पर मुस्तैद हुआ। एक साधु ने झपटकर उसकी कलाई पकड़ ली, और दूसरे ने उसकी गर्दन में एक ऐसा घूँसा जमाया कि वह चक्कर खाकर गिर पड़ा। उसकी तलवार छीन ली गई और बेहोश कर चादर से, जो कमर में लपेटी हुई थी, उसकी मुश्कें बाँध दी गई। इसके बाद दोनों साधु उस सन्दूक की तरफ बढ़े। सन्दूक में ताला लगा हुआ न था, बल्कि एक रस्सी उसके चारों तरफ लपेटी हुई थी। रस्सी खोली गई और उस सन्दूक का पल्ला उठाया गया, एक साधु ने मोमबत्ती हाथ में ली और झाँक कर सन्दूक के अन्दर देखा, देखते ही "हाय!" कह कर जमीन पर गिर पड़ा। इसके बाद दूसरे ने देखा, और उसकी भी यही अवस्था हुई।