चन्द्रकान्ता सन्तति
उन्नीसवाँ भाग
१
अठारहवें भाग के अन्त में हम इन्द्रानी और आनन्दी का मारा जाना लिख आये हैं और यह भी लिख चुके हैं कि कुमार के सवाल करने पर नानक ने अपना दोष स्वीकार किया और कहा–– "इन दोनों को मैंने ही मारा और इनाम पाने का काम किया है, ये दोनों बड़ी शैतान थीं।"
एक तो इनके मारे जाने ही से दोनों कुमार दुःखी हो रहे थे, दूसरे नानक के इस उद्दण्डता के साथ जवाब देने ने उन्हें अपने आपे से बाहर कर दिया। कुँअर आनन्दसिंह ने तलवार के कब्जे पर हाथ रखकर बड़े भाई की तरफ देखा, अर्थात् इशारे ही में पूछा कि यदि आज्ञा हो तो नानक को दो टुकड़े कर दिया जाय। कुँअर आनन्दसिंह के इस भाव को नानक भी समझ गया और हँसता हुआ बोला, "आश्चर्य है कि आपके दुश्मनों को मारकर भी मैं दोषी ठहराया जाता हूँ।"
इन्द्रजीतसिंह––क्या ये दोनों हमारी दुश्मन थी?
नानक––बेशक।
इन्द्रजीतसिंह––इसका सबूत क्या है?
नानक––केवल ये दोनों लाशें।
इन्द्रजीतसिंह––इसका क्या मतलब?
नानक––यही कि इन दोनों का चेहरा साफ करने पर आपको मालूम हो जायगा कि ये दोनों वास्तव में मायारानी और माधवी थीं।
इन्द्रजीतसिंह––(चौंककर ताज्जुब से) हैं, मायारानी और माधवी!
नानक––(बात पर जोर देकर) जी हाँ, मायारानी और माधवी!
इन्द्रजीतसिंह––(आश्चर्य और क्रोध से बूढ़े दारोगा की तरफ देखकर) आप सुनते हैं, नानक क्या कह रहा है?
दारोगा––नहीं, कदापि नहीं, नानक झूठा है।
नानक––(लापरवाही से) कोई हर्ज नहीं, यदि कुमार चाहेंगे तो बहुत जल्द मालूम हो जायेगा कि झूठा कौन है।
दारोगा––बेशक, कोई हर्ज नहीं मैं अभी बावली से जल लाकर और इनका चेहरा धोकर अपने को सच्चा साबित करता हूँ।
इतना कहकर दारोगा जोश दिखाता हुआ बावली की तरफ चला गया और फिर लौटकर न आया।
पाठक, आप समझ सकते हैं कि नानक की बातों ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के कोमल कलेजों के साथ कैसा बर्ताव किया होगा? आनन्दी और इन्द्रानी वास्तव में मायारानी और माधवी हैं। इस बात ने दोनों कुमारों को हद से ज्यादा बेचैन कर दिया और दोनों अपने किए पर पछताते हुए क्रोध और लज्जा-भरी निगाहों से बराबर एक-दूसरे को देखते हुए मन में सोचने लगे कि "हाय, हम दोनों से कैसी भूल हो गई! यदि कहीं यह हाल कमलिनी और लाड़िली तथा किशोरी और कामिनी को मालूम हो गया तो क्या वे सब की सब मारे तानों के हम लोगों के कलेजों को छलनी न कर डालेंगी! अफसोस, उस बुड्ढे दारोगा ही ने नहीं बल्कि हमारे सच्चे साथी भैरोंसिंह ने भी हमारे साथ दगा की। उसने कहा था कि इन्द्रानी ने मेरी सहायता की थी इत्यादि पर यह कदापि सम्भव नहीं कि मायारानी भैरोंसिंह की सहायता करे। अफसोस, क्या अब यह जमाना आ गया कि सच्चे ऐयार भी अपने मालिकों के साथ दगा करें।"
कुछ देर तक इसी तरह की बातें दोनों कुमार सोचते और दारोगा के आने का इन्तजार करते रहे। आखिर आनन्दसिंह ने अपने बड़े भाई से कहा, "मालूम होता है कि वह कम्बख्तं बुड्ढा दारोगा डर के मारे भाग गया, यदि आज्ञा हो तो मैं जाकर पानी लाने का उद्योग करूँ।" इसके जवाब में कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने पानी लाने का इशारा किया और आनन्दसिंह बावली की तरफ रवाना हुए।
थोड़ी ही देर में कुँअर आनन्दसिंह अपना पटूका पानी से तर कर ले आए और यह कहते हुए इन्द्रजीतसिंह के पास पहुँचे––"बेशक दारोगा भाग गया।"
उसी पटूके के जल से दोनों लाशों का चेहरा साफ किया गया और उसी समय मालूम हो गया कि नानक ने जो कुछ कहा सब सच है, अर्थात् वे दोनों लाशें वास्तव में मायारानी तथा माधवी की ही हैं।
अब दोनों भाइयों के रंज और गम की कोई हद न रही। सकते की हालत में खड़े हुए पत्थर की मूरत की तरह वे उन दोनों लाशों की तरफ देख रहे थे। कुछ देर के बाद कुँअर आनन्दसिंह ने एक लम्बी साँस लेकर कहा, "वाह रे भैरोंसिंह, जब तुम्हारा यह हाल है तब हम लोग किस पर भरोसा कर सकते हैं!"
इसके जवाब में पीछे की तरफ से आवाज आई, "भैरोंसिंह ने क्या कसूर किया है जो आप उस पर आवाज कस रहे हैं!"
दोनों कुमारों ने घूम कर देखा तो भैरोंसिंह पर निगाह पड़ी। भैरोंसिंह ने पुनः कहा, "जिस दिन आप इस बात को सिद्ध कर देंगे कि भैरोंसिंह ने आपके साथ दगा की उस दिन जीते जी भैरोंसिंह को इस दुनिया में कोई भी न देख सकेगा।"
इन्द्रजीतसिंह––आशा तो ऐसी ही थी, मगर आज-कल तुम्हारे मिजाज में कुछ फर्क आ गया है।
भैरोंसिंह––कदापि नहीं।
इन्द्रजीतसिंह––अगर ऐसा न होता तो तुम बहुत-सी बातें मुझसे छिपा कर मुझे आफत में न डालते।
भैरोंसिंह––(कुमार के पास जाकर) मैंने कोई बात आपसे नहीं छिपाई और जो कुछ आप समझे हुए हैं वह आपका भ्रम है।
इन्द्रजीतसिंह––क्या तुमने यह नहीं कहा था कि इन्द्रानी तुम्हें इस तिलिस्म में मिली थी और उसने तुम्हारी सहायता की थी?
भैरीसिंह––कहा था और वेशक कहा था।
इन्द्रजीतसिंह––(उन दोनों लाशों की तरफ इशारा करके) फिर यह क्या मामला है? तुम देख रहे हो कि ये किसकी लाशें हैं?
भैरोंसिंह––मैं जानता हूँ कि ये मायारानी और माधवी की लाशें हैं जो नानक के हाथ से मारी गई हैं, मगर इससे मेरा कोई कसूर सावित नहीं होता और न मेरी बात ही झूठी होती है। सम्भव है कि इन दोनों ने जिस तरह आपको धोखा दिया उसी तरह आपका मित्र और साथी समझ कर मुझे भी धोखा दिया हो।
इन्द्रजीतसिंह––(कुष्ट सोचकर) खैर, एक नहीं मैं और भी कई बातों में तुम्हें झूठा साबित करूँगा।
भैरोंसिंह––दिल्लगी के शब्दों को छोड़कर आप मेरी एक बात भी झूठी साबित नहीं कर सकते।
इन्द्रजीतसिंह––सो अब कुछ नहीं, इन पेचीली बातों को छोड़ कर तुम्हें साफ-साफ मेरी बातों का जवाब देना होगा।
भैरोंसिंह––मैं बहुत साफ-साफ आपकी बातों का जवाब दूँगा, आप को जो कुछ पूछना हो पूछे।
इन्द्रजीतसिंह––तुम हम लोगों से विदा होकर कहाँ गए थे? अब कहाँ से आ रहे हो? और इन लाशों की खबर तुम्हें कैसे मिली?
भैरोंसिंह––आप तो एक साथ बहुत से सवाल कर गए जिनका जवाब मुख्तसिर में हो ही नहीं सकता। बेहतर होगा कि आप यहाँ से चलकर उस कमरे में या और किसी ठिकाने बैठे और जो कुछ मैं जवाब देता हूँ उसे गौर से सुनें। मुझे पूरा यकीन है कि निःसन्देह आप लोगों के दिल का खुटका निकल जायगा और आप लोग मुझे बेकसूर समझेंगे, इतना ही नहीं मैं और भी कई बातें आपसे कहूँगा।
इन्द्रजीतसिंह––इन दोनों लाशों को और नानक को यों ही छोड़ दिया जाय?
भैरोंसिंह––क्या हर्ज है, अगर यों ही छोड़ दिया जाय!
नानक––जब कि मैंने आप लोगों के साथ किसी तरह की बुराई नहीं की है तो फिर मुझे इस बेबसी की हालत में क्यों छोड़े जाते हैं? यदि मुझे कुछ इनाम न मिले तो कम-से-कम कैद से तो छुट्टी मिल जाय!
इन्द्रजीतसिंह––ठीक है, मगर अभी हमें यह मालूम होना चाहिए कि तू इस तिलिस्म के अन्दर क्यों कर और किस नीयत से आया था, क्योंकि अभी उसी बाग में तेरी बदनीयती का हाल मालूम हो चुका है जब दारोगा ने तुझे पकड़ा था।
नानक––मगर आपको दारोगा की बदनीयती का हाल भी तो मालूम हो चुका है।
भैरोंसिंह––इस पचड़े से हमें कोई मतलब नहीं। अभी राजा गोपाल सिंह का आदमी इसको लेने के लिए आता होगा, इसे उसके हवाले कर दीजिएगा।
इन्द्रजीतसिंह––अगर ऐसा हो तो बहुत अच्छी बात है, मगर क्या तुमको ठीक मालूम है कि राजा गोपालसिंह का आदमी आयेगा? क्या इस मामले की खबर उन्हें लग गई है?
भैरोंसिंह––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––क्योंकर?
भैरोंसिंह––सो तो मैं नहीं जानता, मगर कमलिनी की जुबानी जो कुछ सुना है वह कहता हूँ।
इन्द्रजीतसिंह––तो क्या तुमसे और मैं कमलिनी से मुलाकात हुई थी? इस समय वे सब कहाँ हैं?
भैरोंसिंह––जी हाँ, हुई थी, और मैं आपकी मुलाकात उन लोगों से करा सकता हूँ। (हाथ का इशारा कर के) वे सब उस तरफ वाले बाग में हैं, और इस समय मैं उन्हीं के साथ था (रुक कर और सामने की तरफ देखकर) वह देखिए, राजा गोपालसिंह का आदमी आ पहुँचा।
दोनों भाइयों ने ताज्जुब के साथ उस तरफ देखा। वास्तव में एक आदमी आ रहा था जिसने पास पहुँच कर एक चिट्ठी इन्द्रजीतसिंह के हाथ में दी और कहा, "मुझे राजा गोपालसिंह ने आपके पास भेजा है।"
इन्द्रजीतसिंह ने उस चिट्ठी को बड़े गौर से देखा। राजा गोपालसिंह का हस्ताक्षर और खास निशान भी पाया। जब निश्चय हो गया कि यह चिट्ठी राजा गोपालसिंह की ही लिखी है तब पढ़ के आनन्दसिंह को दे दिया। उस पत्र में केवल इतना लिखा हुआ था––
"आप नानक तथा मायारानी और माधवी की लाशों को इस आदमी के हवाले करके अलग हो जायँ और जहाँ तक जल्दी हो सके, तिलिस्म का काम पूरा करें।"
इन्द्रजीतसिंह ने उस आदमी से कहा, "नानक और ये दोनों लाशें तुम्हारे सुपुर्द हैं, तुम जो मुनासिब समझो करो, मगर राजा गोपालसिंह को कह देना कि कल तक वह इस बाग में मुझसे जरूर मिल लें।" इसके जवाब में उस आदमी ने "बहुत अच्छा" कहा और दोनों कुमार तथा भैरोंसिंह वहाँ से रवाना होकर बावली पर आए। तीनों ने उस बावली में स्नान करके अपने कपड़े सूखने के लिए पेड़ों पर फैला दिए और इसके बाद ऊपर वाले चबूतरे पर बैठ कर बातचीत करने लगे।
२
कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने एक लम्बी साँस लेकर भैरोंसिंह से कहा, "भैरोंसिंह, इस बात का तो मुझे गुमान भी नहीं हो सकता कि तुम स्वप्न में भी हम लोगों के साथ बुराई करने का इरादा करोगे मगर तुम्हारे झूठ बोलने ने हम लोगों को दुःखी कर दिया है। अगर तुमने झूठ बोल कर हम लोगों को धोखे न डाला होता तो आज इन्द्रानी और आनन्दी वाले मामले में पड़ कर हमने अपने मुँह पर अपने हाथ से स्याही न मली होती। यद्यपि इन दोनों औरतों के बारे में तरह-तरह के विचार मन में उठते थे, मगर इस बात का गुमान कब हो सकता था कि ये दोनों मायारानी और माधवी होंगी! ईश्वर ने बड़ी कुशल की कि शादी होने के बाद आधी घड़ी के लिए भी उन दोनों कम्बख्तों का साथ न हुआ, अगर होता तो बड़े ही धर्म-संकट में जान फँस जाती। मैं यह समझता हूँ कि राजा गोपालसिंह की आज्ञानुसार आज-कल तुम कमलिनी वगैरह का साथ दे रहे हो, शायद ऐसा करने में भी कोई फायदा ही होगा, मगर इस बात पर हमारा खयाल कभी नहीं जम सकता कि इतनी बढ़ी-चढ़ी दिल्लगी करने की किसी ने तुम्हें इजाजत दी होगी। नहीं-नहीं, इसे दिल्लगी नहीं कहना चाहिए, यह तो इज्जत औ हुर्मत को मिट्टी में मिला देने वाला काम है। भला तुम ही बताओ कि किशोरी और कमलिनी वगैरह तथा और लोगों के सामने अब हम अपना मुँह क्योंकर दिखायेंगे!
भैरोंसिंह––और लोगों की बातें तो जाने दीजिए, क्योंकि इस तिलिस्म के जो कुछ हो रहा है इसकी खबर बाहर वालों को हो ही नहीं सकती, हाँ किशोरी, कामिनी और कमला वगैरह अवश्य ताना मारेंगी क्योंकि उनको इस मामले की पूरी खबर है और वे लोग इसी बगल वाले बाग में मौजूद भी हैं, मगर मैं सच कहता हूँ कि इस मामले में मैं बिल्कुल बेकसूर हूँ! इसमें कोई शक नहीं कि कमलिनी की इच्छानुसार मैं बहुत-सी बातें आप लोगों से छिपा गया हूँ मगर इन्द्रानी के मामले में मैं भी धोखा खा गया। मैंने ही नहीं, बल्कि कमलिनी ने भी यही समझा था कि इन्द्रानी और आनन्दी इस तिलिस्म की रानी हैं। खैर, अब तो जो कुछ होना था वह हो चुका, रंज को दूर कीजिए और चलिए, मैं आपकी कमलिनी वगैरह से मुलाकात कराऊँ।
इन्द्रजीतसिंह––नहीं, अभी मैं उन लोगों से मुलाकात नहीं हाँ करूँगा, बाद देखा जाएगा।
आनन्दसिंह––जी हाँ, मेरी भी यही राय है। अफसोस, माधवी की बनावटी कलाई पर भी उस समय कुछ ध्यान नहीं गया, यद्यपि एक मामूली और छोटी बात थी!
भैरोंसिंह––नहीं-नहीं ऐसा खयाल न कीजिए, जब आप अपना दिल इतना छोटा कर लेंगे तब किसी भारी काम को क्योंकर करेंगे? इसे भी जाने दीजिए, आप यह बताइये कि इसमें किशोरी या कमलिनी वगैरह का क्या कसूर है जो आप उनसे मुलाकात तक भी न करेंगे? शादी-ब्याह का शौक बढ़ा आपको और भूल हुई आपसे, कमलिनी ने भला क्या किया? (चौंक कर) खैर, आप उनके पास न जाइए, वह देखिए कमलिनी खुद ही आपके पास चली आ रही हैं!
कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने अफसोस और रंज से झुका सिर उठा कर देखा तो कमलिनी पर निगाह पड़ी जो धीरे-धीरे चलती और मुस्कराती हुई इन्हीं लोगों की तरफ आ रही थीं।
३
नानक को लिए हुए मायारानी दूसरी तरफ चली गई। मगर जिस जगह जाना चाहती थी, वहाँ पहुँचने के पहले ही उसने पुनः एक गोपालसिंह को अपने से कुछ दूर पर देखा और उसी समय तिलिस्मी तमंचे में गोली भर कर निशाना सर किया। गोली उसके घुटने पर लग कर फूट गई और उसमें से निकला हुआ बेहोशी का धुआँ उसके चारों तरफ फैल गया, मगर उसका असर गोपालसिंह पर कुछ भी न हुआ। गोपालसिंह तेजी के साथ लपक मायारानी के पास चले आये और बोले, "मैं वह नकली गोपालसिंह नहीं हूँ जिस पर इस तमंचे का कुछ असर हो, मैं असली गोपालसिंह हूँ और तुझसे यह पूछने के लिए आया हूँ कि बता अब तेरे साथ क्या सलूक किया जाय?"
यह कैफियत देख कर मायारानी घबरा गई और उसे निश्चय हो गया कि अब उसकी मौत उसके सामने आ खड़ी हुई है जो एक पल के लिए भी उसका मुलाहिजा न करेगी, अतः वह गोपालसिंह की बात का कुछ जवाब न दे सकी और नानक की तरफ देखने लगी। गोपालसिंह ने यह कहकर कि 'नानक की तरफ क्या देख रही है मेरी तरफ देख!' एक तमाचा उसके गाल पर इस जोर से मारा कि वह इस सदमे को बर्दाश्त न कर सकी और चक्कर खाकर जमीन पर बैठ गई। गोपालसिंह ने अपनी जेब में से कुछ निकाल कर उसे जबर्दस्ती सुँघाया, जिससे वह बेहोश होकर जमीन पर लेट गई।
इसके बाद गोपालसिंह ने नानक की तरफ, जो डर के मारे खड़ा काँप रहा था, देखा और कहा––
गोपालसिंह––कहो नानक, तुम यहाँ कैसे आ गये? क्या उस भुवनमोहिनी के प्रेम में कमी तो नहीं हो गई या मनोरमा को खोजते हुए तो नहीं आ गए?
नानक––(डरता हुआ हाथ जोड़कर) जी मैं कमलिनीजी से मिलने के लिए आया था। क्योंकि वे मुझ पर कृपा रखती हैं और जब-जब मुझे ग्रहदशा आकर घेरती है तब-तब सहायता करती हैं। मुझे यह खबर लगी थी कि वे इस बाग में आई हुई हैं।
गोपालसिंह––मगर यहाँ आकर कमलिनी की जगह मायारानी से मदद माँगने की नौबत आ गई। बल्कि क्या ताज्जुब कि इसी के साथ तुम यहाँ आये भी हो।
नानक––जी नहीं, मेरा इसका साथ भला क्योंकर हो सकता है, क्योंकि यह मेरी पुरानी दुश्मन है और इसने धोखा देकर मेरे बाप को ऐसी आफत में डाल दिया है कि अभी तक उसे किसी तरह छुटकारा नहीं मिलता।
गोपालसिंह––वह सब जो कुछ है, मैं खूब जानता हूँ। तुमने अपने बाप के लिए जो कुछ कोशिश की, वह भी किसी से छिपी नहीं है तथा तारासिंह ने तुम्हारे यहाँ जाकर जो कुछ तुम्हारा हाल मालूम किया है, वह भी मुझे मालूम है। अच्छा, अब मैं समझा कि तुम तारासिंह से बदला लेने यहां आये हो। मगर यह तो बताओ कि किस राह से तुम यहां आये?
नानक जी नहीं, यह बात नहीं है, भला मैं तारासिंह से क्या बदला ले सकूँगा? तारासिंह ही से नहीं बल्कि राजा वीरेन्द्रसिंह के किसी भी ऐयार का मुकाबला करने की हिम्मत मेरे में नहीं, मगर तारासिंह ने जो कुछ सलूक मेरे साथ किया है उसका रंज जरूर है और मैं कमलिनी से इसी बात की शिकायत करने यहाँ आया था, क्योंकि मुझे उनका बड़ा भरोसा रहता है और यहाँ आने का रास्ता भी उन्होंने ही उस समय मुझे बताया था जब कम्बख्त मायारानी की बदौलत आप यहाँ कैद थे और पागल बने हुए तेजसिंह यहां आए हुए थे।
गोपालसिंह––हाँ ठीक है, मगर मैं समझता हूँ कि साथ ही इसके तुम उन भेदों के जानने का भी इरादा करके आए होंगे जो गूँगी रामभोली की बदौलत यहाँ आने पर तुमने देखा था...
नानक––जी हाँ, इसमें कोई शक नहीं कि मैं उन भेदों को भी जानना चाहता हूँ, परन्तु यह बात बिना आपकी कृपा के...
गोपालसिंह––नहीं-नहीं, उन भेदों का जानना तुम्हारे लिए बहुत ही मुश्किल है क्योंकि तुम्हारी गिनती ईमानदार ऐयारों में नहीं हो सकती। यद्यपि वह सब हाल मुझे मालूम है, लाड़िली ने तुम्हारा अनूठा हाल पूरा-पूरा बयान किया था और उसी को रामभोली समझ कर तुम यहाँ आए भी थे, मगर जो कुछ तुमने यहाँ आकर देखा उसका सबब बयान करना मैं उचित नहीं समझता, फिर भी इतना जरूर कहूँगा कि वह अनोखी तस्वीर जो दारोगा वाले अजायबघर के बंगले में तुमने देखी थी, वास्तव में कुछ न थी या अगर थी तो केवल तुम्हारी रामभोली की निरी शरारत।
नानक––और वह कुएँ वाला हाथ?
गोपालसिंह––वह तुम्हारे बुजुर्ग धनपत का साया था। (कुछ सोच कर) मगर नानक, मुझे इस बात का अफसोस है कि तुम अपनी जवानी, हिम्मत, लियाकत और ऐयारी तथा बुद्धिमानी का खून बुरी तरह कर रहे हो। इसमें कोई शक नहीं कि अगर तुम इश्क और मुहम्मत के झगड़ों में न पड़े होते तो समय पर अपने बाप की सहायता करने लायक होते। अब भी तुम्हारे लिए उचित यही है कि तुम अपने खयालों को सुधार कर इज्जत पैदा करने की कोशिश करो और किसी के साथ दुश्मनी करने या बदला लेने का खयाल दिल से दूर कर दो। इस थोड़ी-सी जिन्दगी में मामूली ऐशोआराम के लिए अपना परलोक बिगाड़ना पढ़े-लिखे बुद्धिमानों का काम नहीं है। अच्छे लोग मौत और जिन्दगी का फैसला एक अनूठे ढंग पर करते हैं। उनका खयाल है कि दुनिया में वह कभी मरा हुआ तब तक न समझा जायगा जब तक उसका नाम नेकी के साथ सुना या लिया जायगा, और जिसने अपने माथे पर बुराई का टीका लगा लिया, वह मुर्दे से भी बढ़ कर है।
दुष्ट लोग यदि किसी कारण मनुष्य को चींटी समझने लायक हो भी जाये तो भी कोई बात नहीं। मगर ईश्वर की तरफ से वे किसी तरह निश्चिन्त नहीं हो सकते और अपने बुरे कामों का फल अवश्य पाते हैं। क्या इन्हीं राजा वीरेन्द्रसिंह और मेरे किस्से से तुम यह नसीहत नहीं ले सकते? क्या तुम मायारानी, माधवी, अग्निदत्त और शिवदत्त वगैरह से भी अपने को बढ़कर समझते हो और नहीं जानते कि उन लोगों का अन्त किस तरह हुआ और हो रहा है? फिर किस भरोसे पर तुम अपने को बुरी राह चलाना चाहते हो? निःसंदेह तुम्हारा बाप बुद्धिमान है जो एक नामी और अद्भुत शक्ति रखने वाला अमीर ऐयार होने और हर तरह की बेइज्जती सहने पर भी राजा वीरेन्द्रसिंह का कृपा-पात्र बनने का ध्यान अपने दिल से दूर नहीं करता और तुम उसी भूतनाथ के लड़के हो जो अपने दिल को भी काबू में नहीं रख सकते!
इस तरह की बहुत-सी नसीहत-भरी बातें राजा गोपालसिंह ने इस ढंग से नानक को कहीं कि उसके दिल पर असर कर गईं। वह राजा गोपालसिंह के पैरों पर गिर पड़ा और जब उन्होंने उसे दिलासा देकर उठाया तो हाथ जोड़ कर अपनी डबडबाई हुई आँखें नीचे किए हुए बोला, "मेरा अपराध क्षमा कीजिए! यद्यपि मैं क्षमा माँगने योग्य नहीं हूँ। परन्तु आपकी उदारता मुझे क्षमा देने योग्य है। अब मुझे अपनी ताबेदारी में लीजिए और हर तरह से आजमा कर देखिए कि आपकी नसीहत का असर मुझ पर कैसा पड़ा और अब मैं किस तरह आपकी खिदमत करता हूँ।"
इसके जवाब में गोपालसिंह ने कहा, "अच्छा, हम तुम्हारा कसूर माफ करके तुम्हारी दर्खास्त कबूल करते हैं। तुम मेरे साथ आओ और जो कुछ मैं कहूँ, सो करो।"
४
कमलिनी को देख कर दोनों कुमार शरमाए और मन में तरह-तरह की बातें सोचने लगे। देखते-देखते कमलिनी उनके पास आ गई और प्रणाम करके बोली, "आप यहाँ जमीन पर क्यों बैठे हैं? उस कमरे में चलकर बैठिए, जहाँ फर्श बिछा है और सब तरह का आराम है।"
इन्द्रजीतसिंह––मगर वहाँ अँधकार तो जरूर होगा।
कमलिनी––जी नहीं, वहाँ बखूबी रोशनी हो रही होगी, (मुस्करा कर) क्योंकि यहाँ की रानी के मर जाने से यह बाग एक सुघड़ रानी के अधिकार में आ गया है और उसने आपकी खातिर में रोशनी जरूर कर रखी होगी।
इन्द्रजीतसिंह––(कुछ शर्मिन्दगी के साथ) बस, रहने दीजिए, मैं यहां की रानियों का मेहमान नहीं बनता। जो कुछ बनना था, सो बन चुका। अब तो तुम्हारी दिल्लगी का निशाना बनूँगा।
कमलिनी––(हाथ जोड़ कर) मेरी क्या मजाल जो आपसे दिल्लगी करूँ, अच्छा आप मेरे मेहमान बनिए और यहाँ से उठिये।
इन्द्रजीतसिंह––क्या तुम नहीं जानतीं कि यहाँ अपने भी पराए होकर दुःख देने के लिए तैयार हो जाते हैं?
भैरोंसिंह––(कमलिनी से) आपने खयाल किया या नहीं? यह मेरी पूजा हो रही है।
कमलिनी––होनी ही चाहिए, आप इसी के योग्य हैं। (इन्द्रजीतसिंह से) मगर आप मुझ लौंडी पर किसी तरह का शक न करें। यदि आप यह समझते हों कि मैं वास्तव में कमलिनी नहीं हूँ, तो मैं बहुत-सी बातें उस जमाने की आपको याद दिला कर अपने पर विश्वास करा सकती हूँ। जिस जमाने में आप तालाब वाले तिलिस्मी मकान में मेरे साथ रहते थे। (उस समय की दो-तीन गुप्त बातों का इशारा करके) कहिए, अब भी मुझ पर शक है?
इन्द्रजीतसिंह––(बनावटी मुस्कराहट के साथ) नहीं, अब तुम पर शक तो किसी तरह का नहीं है, मगर रंज जरूर है।
कमलिनी––रंज! सो किस बात का?"
इन्द्रजीतसिंह––इस बात का कि यहाँ आने पर तुमने मुझसे जान-बूझ के अपने को छिपाया और मुझे तरद्दुद में डाला!
कमलिनी––(हँसकर और कुमार का हाथ पकड़ के) अच्छा, आप यहाँ से उठिये और उस कमरे में चलिए तो मैं आपकी सब बातों का जवाब दूँगी। आप तो जरा-सी बात में रंज हो जाते हैं। मगर आपके साथ किसी तरह का मसखरापन किया या हम लोगों को आपसे मिलने नहीं दिया गया तो आपकी भावज साहेबा ने, अतः आपकी ऐसी बातों का जवाब भी वे ही देंगी और उनसे भी उसी कमरे में मुलाकात होगी।
इन्द्रजीतसिंह––मेरी भावज साहेबा! सो कौन, क्या लक्ष्मीदेवी?
कमलिनी––जी हाँ, वे उसी कमरे में बैठी आपका इन्तजार कर रही हैं, चलिए।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, हैं तो उनसे मैं जरूर मिलूँगा। जबसे मैंने यह सुना है क तारा वास्तव में लक्ष्मीदेवी हैं तभी से मैं उनसे मिलने के लिए बेताब हो रहा हूँ।
यह कहकर इन्द्रजीतसिंह उठ खड़े हुए और अपने सूखे हुए कपड़े पहनकर कमलिनी के साथ उसी कमरे की तरफ चले जिसमें पहले भी कई दफे आराम कर चुके थे। उनके पीछे-पीछे आनन्दसिंह और भैरोंसिंह गए।
इस समय कमलिनी मामूली ढंग में न थी बल्कि बेशकीमत पोशाक और गहनों से अपने को सजाए हुए थी। एक तो यों ही किशोरी के मुकाबले की खूबसूरत और हसीन थी तिस पर इस समय की बनावट और शृंगार ने उसे और भी उभाड़ रखा था। यद्यपि आज उससे मिलने के पहले कुमार तरह-तरह की बातें सोच रहे थे और इन्द्रानी तथा आनन्दी वाले मामले से शर्मिन्दा होकर जल्दी उससे मिलना नहीं चाहते थे मगर जब सामने आकर खड़ी हो गई तो सब बातें एक तरह पर थोड़ी देर के लिए भूल गये और खुशी-खुशी उसके साथ चलकर उस कमरे में जा पहुँचे।
इस कमरे का दरवाजा मामूली ढंग पर बन्द था, जो कमलिनी के धक्का देने से खुल गया और ज्यादा रोशनी के सबब भीतर के जगमगाते हुए सामान तथा कई औरतों पर दोनों कुमारों की निगाह पड़ी जो उन्हें देखते ही उठ खड़ी हुई और जिनमें से एक को छोड़ बाकी की सभी ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह को और कई ने आनन्दसिंह को भी प्रणाम किया।
वह औरत जिसने कुमार को सलाम नहीं किया, लक्ष्मीदेवी थी और वह राजा गोपालसिंह की जुबानी यह सुन चुकी थी कि दोनों कुमार उनके छोटे भाई हैं, अतः दोनों कुमारों ने स्वयं लक्ष्मीदेवी को सलाम किया और उनकी पिछली अवस्था पर अफसोस करके पुनः जमानिया की रानी बनने पर प्रसन्नता के साथ मुबारकबाद देने के बाद और विषयों में भी देर तक उससे बातें करते रहे। इसके बाद किशोरी, कामिनी इत्यादि से बातचीत तकी नौबत पहुँची। किशोरी और इन्द्रजीतसिंह में तथा कामिनी और आनन्दसिंह में सच्ची और बढ़ी-चढ़ी मुहब्बत थी, परन्तु धर्म, लज्जा और सभ्यता का पल्ला भी उन लोगों ने मजबूती के साथ पकड़ा हुआ था। इसलिए यद्यपि यहाँ पर कोई बड़ी-बूढ़ी औरत मौजूद न थी जिससे विशेष लज्जा करनी पड़ती तथापि इन चारों ने इस समय बनिस्बत जुबान के विशेष करके आँखों के इशारों तथा भावों ही में अपने दुःख-दर्द और जुदाई के सदमे को झलकाकर उपस्थित अवस्था तथा इस अनोखे मेल-मिलाप पर प्रसन्नता प्रकट की। कमलिनी, लाड़िली, कमला, सरयू और इन्दिरा आदि से भी कुशल-क्षेम पूछने के बाद इन लोगों में यों बातें होने लगीं––
इन्द्रजीतसिंह––(लक्ष्मीदेवी से) आपको इस बात की शिकायत तो जरूर होगी कि आपको हद से ज्यादा दुःख भोगना पड़ा, मगर यह जानकर आप अपना दुःख जरूर भूल गई होंगी कि भाई साहब ने कम्बख्त मायारानी की बदौलत जो कुछ कष्ट भोगा उसे भी कोई साधारण मनुष्य सहन नहीं कर सकता।
लक्ष्मीदेवी––निःसन्देह ऐसा ही है, क्योंकि मुझे तो किसी-न-किसी तरह आजादी की हवा मिल भी रही थी मगर उन्हें अंधेरी कोठरी में जिस तरह रहना पड़ा वैसा ईश्वर न करे, किसी दुश्मन को भी नसीब हो।
इन्द्रजीतसिंह––(मुस्कराकर) मगर मैंने तो सुना था कि आप उनसे नाराज हो गई हैं और जमानिया जाने में...
कमलिनी––(हँसकर) ये बनिस्बत उनके जिन्न को ज्यादा पसन्द करती थीं।
लक्ष्मीदेवी––वास्तव में उन्होंने बड़ा भारी धोखा दिया था।
कमला––आपने ठीक कहा, क्योंकि ऐयारी दोनों ही ने की थी।
कमलिनी––ओफ, जब मैं वह समय याद करती हूँ, जब ये तारा बनकर मेरे यहाँ रहतीं और ऐयारी का काम करती थीं, तो मुझे आश्चर्य होता है। वास्तव में इनकी ऐयारी बहुत अच्छी होती थी और ये दुश्मनों का पता खूब लगाती थीं। रोहतासगढ़ पहाड़ी के नीचे जब मायारानी का ऐयार कंचनसिंह को मारकर आपको रथ पर सुला के ले गया था तब भी इन्होंने मुझे वह खबर कुछ ही देर पहले पहुँचाई थी।
इन्द्रजीतसिंह––(ताज्जुब से) हाँ! तब तो इनका बहुत बड़ा अहसान मेरी गर्दन पर भी है! ओफ, वह जमाना भी कैसा भयानक था! मजा तो यह था कि दुश्मन लोग आपस में लड़-मरते थे पर एक की दूसरे को खबर नहीं होती थी। देखो, रोहतासगढ़ में मायारानी की चमेली ने तो माधवी पर वार किया और माधवी को मरते दम तक इस बात का पता न लगा। अगर पता लग जाता तो क्या आज दिन माधवी मायारानी के साथ मिलकर यहाँ के तिलिस्मी बाग में आने की हिम्मत कभी करती?
कमलिनी––कदापि नहीं! (हँसकर) मगर आश्चर्य तो यह है कि जिस माधवी और मायारानी ने इतना ऊधम मचा रखा था, उन्हीं दोनों से आपने शादी कर ली। अफसोस तो यही है कि उनके पापों ने उन्हें बचने न दिया और हम लोगों को मुबारकबाद देने का मौका न मिला!
इन्द्रजीतसिंह––(शरमाकर) तुम तो...!
लक्ष्मीदेवी––(कुमार की बात काटकर कमलिनी से) बहिन, तुम भी कैसी शोख हो! कई दफे तुमसे कह चुकी हूँ कि इस बात का जिक्र न करना, मगर आखिर तुमने न मानी! खैर, अगर कुमार ने शादी की तो फिर तुम्हें क्या? तुम ताना मारने वाली कौन? और फिर भूल-चूक की बात ही क्या है, इन्होंने कुछ जान-बूझके तो शादी की ही नहीं, धोखे में पड़ गय। खबरदार, अब इस बात का जिक्र कोई करने न पाये। (कुमार से) हाँ, तो बताइए कि हम लोगों का हाल आपको कुछ मालूम हुआ या नहीं?
इन्द्रजीतसिंह––मैं तो बहुत दिनों से तिलिस्म के अन्दर हूँ, मगर बाहर का हाल, जिसमें आप लोगों का हाल भी मिला हुआ था, भाईसाहब (गोपालसिंह) बराबर सुना दिया करते थे और जो कुछ नहीं मालूम है वह अब मालूम हो जायेगा, क्योंकि ईश्वर की कृपा से आप लोगों का बहुत अच्छा समागम हुआ है, एक-दूसरे से आप-बीती कहने-सुनने का मौका आज से बढ़कर फिर न मिलेगा। साथ ही इसके मैं यह भी कहूँगा कि आप (कमलिनी की तरफ इशारा करके) इन्हें बात-बात में डाँटने या दबाने की तकलीफ न करें, ये जितना और जो कुछ मुझे कहें कहने दीजिये क्योंकि मैं इनके हाथ बिका हूँ, इन्होंने हम लोगों के साथ जो कुछ सलूक किया है, वह किसी से छिपा नहीं है और न उसका बोझ हम लोगों के सिर से कभी उतर सकता है...।
कमलिनी––बस-बस, ज्यादा तारीफों की भरमार न कीजिए। अगर आप...(सरयू की तरफ देख के) चाची, क्षमा कीजिए, और जरा इस कमरे में जाकर (दोनों कुमारों और भैरोंसिंह की तरफ बताकर) इन लोगों के लिए खाने का इन्तजाम कीजिए।
सरयू कमलिनी का मतलब समझ गई कि उसके सामने हँसी-दिल्लगी की बातें करते इन लोगों को शर्म मालूम होती है और उचित भी यही है कि अतः वह उठकर दूसरे कमरे में चली गई और तब कमलिनी ने पुनः इन्द्रजीतसिंह से कहा, "हाँ, अगर आप मेरे हाथ बिके हुए हैं तो कोई चिन्ता नहीं, मैं आपको बड़ी खातिर के साथ अपने पास रखूगी।"
किशोरी––(मुस्कराती हुई) इनकी ताबीज बना के गले में पहन लेना।
कमलिनी––जी नहीं, गले तो ये तुम्हारे मढ़े जायेंगे, मैं तो इन्हें हाथों पर लिए फिरूँगी।
लक्ष्मीदेवी––बल्कि चुटकियों पर, क्योंकि तुम ऐसी ही शोख और मसखरी हो!
(कुमार से) आज हम लोगों के लिए बड़ी खुशी का दिन है, ईश्वर ने बड़े भागों से यह दिन दिखाया है, अतएव अगर हम लोग हँसी-दिल्लगी में कुछ विशेष कह जायें तो रंज न मानिएगा।
इन्द्रजीतसिंह––ताज्जुब है कि आप रंज होने का जिक्र करती हैं! क्या आप इस बात को नहीं जानतीं कि इन्हीं बातों के लिए हम लोग कब से तरस रहे हैं! (कमलिनी की तरफ देख के और मुस्करा के) मगर आशा है कि अब तरसना न पड़ेगा।
कमलिनी––यह तो (किशोरी की तरफ बता के) इन्हें कहिए, तरसने की बात का जवाब तो यही दे सकेंगी।
किशोरी––ठीक है, क्योंकि आदमी जब किसी के हाथ बिक जाता है तो आजादी की हवा खाने के लिए उसे तरसना ही पड़ता है।
इन्द्रजीतसिंह––(बात का ढंग दूसरी तरफ बदलने की नीयत से कमलिनी की तरफ देखकर) हाँ, यह तो बताओ कि नानक से और तुम लोगों से मुलाकात हुई थी या नहीं?
कमलिनी––जी नहीं, उस पर तो आपको बड़ा रंज होगा!
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, इसलिए कि उसने अपनी चाल-चलन को बहुत बिगाड़ रखा है। (कमला से) तुमने यह तो सुना ही होगा कि नानक भूतनाथ का लड़का है और भूतनाथ तुम्हारा पिता है!
कमला––जी हाँ, मैं सुन चुकी हूँ, मगर वे (लम्बी साँस लेकर) आजकल अपनी भूलों के सबब आप लोगों के मुजरिम बन रहे हैं!
इन्द्रजीतसिंह––चिन्ता मत करो, पिछले जमाने में अगर भूतनाथ से किसी तरह का कसूर हो गया तो क्या हुआ, आजकल वह हम लोगों का काम बड़ी खूबी और नेक-नीयती के साथ कर रहा है और तुम विश्वास रखो कि उसका सब कसूर माफ किया जायेगा।
कमला––यदि आपकी कृपा हो तो सब अच्छा ही होगा। (कमलिनी की तरफ इशारा करके) इन्होंने भी मुझे ऐसी ही आशा दिलाई है।
लक्ष्मीदेवी––इनका तो वह ऐयार ही ठहरा, इन्हीं के दिए हुए तिलिस्मी खंजर की बदौलत उसने बड़े-बड़े काम किए और कर रहा है। हाँ, खूब याद आया, (इन्द्रजीतसिंह से) मैं आपसे एक बात पूछूँगी।
इन्द्रजीतसिंह––पूछिये।
लक्ष्मीदेवी––तालाब वाले तिलिस्मी मकान से थोड़ी दूर पर जंगल में एक खूबसूरत नहर है और वहीं पर किसी योगिराज की समाधि है...।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ-हाँ, मैं उस स्थान का हाल जानता हूँ। यद्यपि मैं वहाँ कभी गया नहीं, मगर 'रिक्तगन्थ' की बदौलत मुझे वहाँ का हाल बखूबी मालूम हो गया है, (कमलिनी की तरफ देखकर) इन्हें भी तो मालूम ही होगा क्योंकि वह 'रिक्तगन्थ' बहुत दिनों तक इनके पास था।
कमलिनी––जी हाँ, उसी रिक्तगन्थ की बदौलत मुझे उसका हाल मालूम हुआ था और उसी जगह से वह तिलिस्मी खंजर और नेजा मैंने निकाला था मगर मैं उस रिक्तगन्थ की लिखावट अच्छी तरह समझ नहीं सकती थी, इसलिए उसका ठीक-ठीक और पूरा हाल मैं न जान सकी।
लक्ष्मीदेवी––इसी सबब से आप मेरी बातों का ठीक जवाब न दे सकी तब मैंने सोचा कि आपसे मुलाकात होने पर पूछूँगी कि क्या वहाँ भी कोई तिलिस्म है?
इन्द्रजीतसिंह––जी नहीं, वहाँ कोई तिलिस्म नहीं है। जिस दार्शनिक महात्मा की वह समाधि है, उन्होंने यह तिलिस्म तथा रोहतासगढ़ का तहखाना, तालाब वाला तिलिस्मी खँडहर, जिसमें मैं मुर्दा बनाकर पहुँचाया गया था, अथवा जिसमें किशोरी, कामिनी और भैरोंसिंह वगैरह फँस गये थे बनवाया है, और चुनारगढ़ वाला तिलिस्म उनके गुरु का बनवाया हुआ है, यहाँ के राजा जिन्होंने यह तिलिस्म बनवाया था, उन्हीं के शिष्य थे। उन महात्मा ने जीते-जी समाधि ले ली थी और उन्होंने अपना योगाश्रम भी उसी स्थान में बनवाया था। कमलिनी ने तिलिस्मी खंजर उसी योगाश्रम से निकाला होगा क्योंकि वहाँ भी बड़ी-बड़ी अनूठी चीजें हैं।
कमलिनी––जी हाँ, और उसी जगह मैंने इस बात की कसम भी खाई थी कि "भूतनाथ और नानक को अपना भाई समझूँगी, अगर ये लोग हम लोगों के साथ दगा न करेंगे।" यद्यपि यह आश्चर्य की बात है कि अभी तक भूतनाथ के भेदों का सही-सही पता नहीं लगता फिर भी चाहे जो हो यह तो मैं जरूर कहूँगी कि भूतनाथ ने हम लोगों के साथ बड़ी नेकियाँ की हैं।
इन्द्रजीतसिंह––इसमें किसी को क्या शक हो सकता है? भूतनाथ वास्तव में बड़ा भारी ऐयार है। हाँ, यह तो बताओ कि नानक यहाँ कैसे आ पहुँचा?
कमलिनी––भला मैं इस बात को क्या जानूँ?
आनन्दसिंह––(मुस्कराते हुए) अपनी रामभोली को खोजता हुआ आया होगा।
लाड़िली––उसे मालूम हो चुका है कि उसकी रामभोली को मरे तो मुद्दत हो गई।
आनन्दसिंह––खैर, उसकी तस्वीर खोजने आया होगा!
लाडिली––या किसी की बारात में आया होगा!
लाड़िली की इस आखिरी बात ने सबको हँसा दिया और कुँअर आनन्दसिंह शरमाकर चुप हो रहे।
इन्द्रजीतसिंह––(कमलिनी से)इस बात का कुछ पता न लगा कि अग्निदत्त को किसने मारा था! (किशोरी से) शायद इसका जवाब तुम दे सकती हो?
किशोरी––अग्निदत्त को मायारानी के ऐयारों ने मारा था और उन्हीं लोगों ने मुझे ले जाकर उस तिलिस्मी खँडहर में कैद किया था।
भैरोंसिंह––(कमलिनी से) हाँ, खूब याद आया, हमने सुना था कि उस समय जब हम लोग शाहदरवाजा बन्द हो जाने के कारण दुःखी हो रहे थे, तब आपने ही विचित्र ढंग से वहाँ पहुँचकर हम लोगों की सहायता की थी। आपको इन बातों की खबर कैसे मिली थी?
कमलिनी––(लक्ष्मीदेवी की तरफ इशारा करके)उन दिनों ये ऐयारी कर रही थीं और इन्होंने ही उन बातों की खबर पहुँचाई थी तथा यह भी कहा था कि "खँडहर वाली बावली साफ हो गई है।" उस बावली में पहुँचने का रास्ता उसी योगिराज की समाधि के पास ही से है। अगर वह बावली खुदकर साफ न हो गई होती तो मैं शाहदरवाजा खोल न सकती क्योंकि ऊपर की तरफ से खँडहर के अन्दर पहुँचना कठिन हो रहा था और भीतर मायारानी के आदमी उस तहखाने में जा पहुँचे थे। वह भी हम लोगों की जिन्दगी का बड़ा कठिन समय था।
कमला––उसी समय राजा शिवदत्त भी वहाँ आकर...
कमलिनी––हाँ, उस समय भी भूतनाथ ने बड़ी मदद दी। रूहा बनकर अगर वह राजा शिवदत्त को पकड़ न लिए होता तो गजब ही हो जाता।
भैरोंसिंह––मैं तो कुमार की जिन्दगी से बिल्कुल ही नाउम्मीद हो गया था।
कमलिनी––(कुमार से) हाँ, यह तो बताइये कि आप वहाँ किस तरह पहुँचाये गये थे? इसमें तो कोई शक नहीं कि आपको मायारानी के आदमियों ने गिरफ्तार किया था मगर इस बात का पता अभी तक न लगा कि उस मकान के अन्दर आप तथा देवीसिंह वगैरह ने क्या देखा कि हँसते-हँसते उसके अन्दर कूद गये और कूदने के बाद क्या हुआ?
इन्द्रजीतसिंह––कूद पड़ने के बाद फिर मुझे तन-बदन की सुध न रही और यही हाल उन सबका भी हुआ जो मेरे पहले उसके अन्दर कूद चुके थे, मगर यह अभी न बताऊँगा कि उसके अन्दर कौन-सी हँसाने वाली चीज थी।
कमलिनी––यही बात हम लोगों ने जब देवीसिंह से पूछी थी तो उन्होंने भी इनकार करके कहा था कि "माफ कीजिए, उस विषय में तब तक कुछ न कहूँगा जब तक इन्द्रजीतसिंह मेरे सामने मौजूद न होंगे, क्योंकि उन्होंने इस बात को छिपाने के लिए मुझे सख्त ताकीद कर दी है। ताज्जुब है कि आपने अपने साथियों को भी इस तरह की ताकीद कर दी और आज स्वयं भी उसको बताने से इनकार करते हैं!
इन्द्रजीतसिंह––उसमें कोई ऐसी बात नहीं थी जिसके बताने से मुझे परहेज हो मगर मैं चाहता हूँ कि वही तमाशा तुम लोगों को तथा और अपने सबको दिखाकर बताऊँ कि उस मकान के अन्दर बस यही था, निःसन्देह तुम लोगों की भी वैसी दशा होगी।
कमलिनी––तो आज ही तमाशा क्यों नहीं दिखाते?
इन्द्रजीतसिंह––आज वह तमाशा मैं नहीं दिखा सकता, हाँ, भाई साहब (गोपालसिंह) अगर चाहें तो दिखा सकते हैं, मगर इसके लिए जल्दी ही क्या है?
लक्ष्मीदेवी––खैर, जाने दीजिये, आखिर एक-न-एक दिन मालूम हो ही जायेगा। अच्छा यह बताइये कि आप जब इस तिलिस्म में या इसके बगल वाले बाग में आये थे तो उस बुड्ढे तिलिस्मी दारोगा से मुलाकात हुई थी या नहीं?
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, हुई थी, बड़ा शैतान है, क्या तुम लोगों से वह नहीं मिला?
लक्ष्मीदेवी––भला वह कभी बिना मिले रह सकता है? उसने तो हम लोगों को भी धोखे में डालना चाहा था, मगर तुम्हारे भाई साहब ने पहले ही उसकी शैतानी से हम लोगों होशियार कर दिया था, इसलिए हम लोगों का वह कुछ बिगाड़ न सका।
कमलिनी––मगर आपने उसकी बात मान ली और इसलिए उसने भी आपसे खुश होकर आपकी शादी करा दी। आपको तो उसका अहसान मानना चाहिए...
लक्ष्मीदेवी––(कमलिनी को झिड़ककर) फिर तुम उसी रास्ते पर चलीं! खामखाह एक आदमी को...
इन्द्रजीतसिंह––अबकी अगर वह मुझे मिले तो उसे बिना मारे कभी न छोड़ चाहे जो हो।
इन्द्रजीतसिंह की इस बात पर सब हँस पड़े और इसके बाद लक्ष्मीदेवी ने कुमार से कहा, "अच्छा, अब यह बताइये कि मेरे चले जाने के बाद आपने तिलिस्म में क्या किया और क्या देखा?"
इसी समय सरयू भी वहाँ आ पहुँची और बोली, "चलिये पहले खा-पी लीजिए तब बातें कीजिये।"
लक्ष्मीदेवी के जिद करने से दोनों कुमारों को उठना पड़ा और भोजन इत्यादि से छुट्टी पाने के बाद फिर उसी ठिकाने बैठकर गप्पें उड़ने लगीं। कुमार ने अपना कुल हाल बयान किया और वे सब आश्चर्य से यह सब कथा सुनती रहीं। इसके बाद कुमार ने इन्दिरा से उसका बाकी किस्सा पूछा।
५
दूसरे दिन तेजसिंह को उसी तिलिस्मी इमारत में छोड़कर और इन्द्रजीतसिंह को साथ लेकर राजा वीरेन्द्रसिंह अपने पिता से मिलने के लिए चुनार गए। मुलाकात होने पर वीरेन्द्रसिंह ने पिता के पैरों पर सिर रखा और उन्होंने आशीर्वाद देने के बाद बड़े प्यार से उठाकर छाती से लगाया और सफर का हाल पूछने लगे। राजा साहब की इच्छानुसार एकान्त हो जाने पर वीरेन्द्रसिंह ने सब हाल अपने पिता से बयान किया जिसे वे बड़ी दिलचस्पी के साथ सुनते रहे। इसके बाद पिता के साथही-साथ महल में जाकर अपनी माता से मिले और संक्षेप में सब हाल कहकर बिदा हुए तब चन्द्रकान्ता के पास गए और उसी जगह चपला तथा चम्पा से मिलकर देर तक अपने सफर का दिलचस्प हाल कहते रहे।
दूसरे दिन राजा वीरेन्द्रसिंह अपने पिता के पास एकान्त में बैठे हुए बातों में राय ले रहे थे जब जमानिया से आये हुए एक सवार की इत्तिला मिली जो राजा गोपालसिंह की चिट्ठी लाया था। आज्ञानुसार वह हाजिर किया गया, सलाम करके उसने राजा गोपालसिंह की चिट्ठी दी और तब विदा लेकर बाहर चला गया।
यह चिट्ठी जो राजा गोपालसिंह ने भेजी थी नाम ही को चिट्ठी थी। असल में यह एक ग्रंथ ही मालूम होता था, जिसमें राजा गोपालसिंह ने दोनों कुमारों, किशोरी, कामिनी, सरयू, तारा, मायारानी और माधवी इत्यादि का खुला सा किस्सा जो कि हम ऊपर के बयानों में लिख आये हैं और जो राजा वीरेन्द्रसिंह को अभी तक मालूम नहीं हुआ था तथा आपने यहाँ का भी कुछ हाल लिख भेजा था और साथ ही यह भी लिखा था कि "आप लोग खंडहर वाली नई इमारत में रहकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के मिलने का इन्तजार करें" इत्यादि।
राजा सुरेन्द्रसिंह को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि हम और राजा गोपालसिंह असल में एक ही खानदान की यादगार हैं और इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह से भी अब बहुत जल्द मुलाकात हुआ चाहती है, अतः यह बात तय पाई कि सब कोई उसी तिलिस्मी खँडहर वाली नई इमारत में चलकर रहें और उसी जगह भूतनाथ का हाल चाल मालूम करें। आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् राजा सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, महारानी, चन्द्रकान्ता, चपला और चम्पा वगैरह सबकी सवारी वहाँ आ पहुँची और मायारानी, दारोगा तथा कैदियों को भी उसी जगह लाकर रखने का इन्तजाम किया गया।
हम बयान कर चुके हैं कि इस तिलिस्मी खँडहर के चारों तरफ अब बहुत बड़ी इमारत बनकर तैयार हो गई है जिसके बनवाने में इन्द्रजीतसिंह ने अपनी बुद्धिमानी का नमूना बड़ी खूबी के साथ दिखाया है––इत्यादि अतः इस समय इन लोगों को यहाँ ठहरने में तकलीफ किसी तरह की नहीं हो सकती थी बल्कि हर तरह का आराम था।
पश्चिम तरफ वाली इमारत के ऊपर वाले खण्डों में कोठरियों और बालाखानों के अतिरिक्त बड़े-बड़े कमरे थे, जिनमें से चार कमरे इस समय बहुत अच्छी तरह सजाए गये थे और उनमें महाराज सुरेन्द्रसिंह, इन्द्रजीतसिंह, वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह का डेरा था। यहाँ भूतनाथ के डेरे वाला बारह नम्बर का कमरा ठीक सामने पड़ता था और वह तिलिस्मी चबूतरा भी यहाँ से उतना ही साफ दिखाई देता था, जिसका भूतनाथ के डेरे से।
इन कमरों के पिछले हिस्से में बाकी लोगों का डेरा था और बचे हुए ऐयारों को इमारत के बाहरी हिस्से में स्थान मिला था और उस तरफ थोड़े से फौजी सिपाहियों और शागिर्द पेशे वालों को भी जगह दी गई थी।
इस जगह राजा साहब और इन्द्र जीतसिंह तथा तेजसिंह के भी आ जाने से भूतनाथ तरद्दुद में पड़ गया और सोचने लगा कि उस तिलिस्मी चबूतरे के अन्दर से निकलकर मुझसे मुलाकात करने वाले या बलभद्रसिंह को ले जाने वाले आदमियों का हाल कहीं राजा साहब या उनके ऐयारों को मालूम न हो जाये और मैं एक नई आफत में न फँस जाऊँ, क्योंकि उनका पुनः उस चबूतरे के नीचे से निकलकर मुझसे मिलने आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।'
रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। राजा वीरेन्द्र सिंह अपने कमरे के बाहर बरामदे में फर्श पर बैठे अपने मित्र तेजसिंह से धीरे-धीरे कुछ बातें कर रहे हैं। कमरे के अन्दर इस समय एक हल्की रोशनी हो रही है सही, मगर कमरे का दरवाजा घूमा रहने के सबब यह रोशनी वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह तक नहीं पहुँच रही थी जिससे ये दोनों एक प्रकार से अंधकार में बैठे हुए थे और दूर से इन दोनों को कोई देख नहीं सकता था। नीचे बाग में लोहे के बड़े-बड़े खम्भों पर लालटेनें जल रही थीं, फिर भी बाग की घनी सब्जी और लताओं का सहारा उससे छिपकर घूमने वालों के लिए कम न था। उस दालान में कंदील जल रही थी जिसमें तिलिस्मी चबूतरा था और इस समय राजा वीरेन्द्रसिंह की निगाह भी जो तेजसिंह से बात कर रहे थे, उसी तिलिस्मी चबूतरे की तरफ ही थी।
यकायक चबूतरे के निचले हिस्से में रोशनी देखकर राजा वीरेन्द्रसिंह को ताज्जुब हुआ और उन्होंने तेजसिंह का ध्यान भी उसी तरफ दिलाया। उस रोशनी के सबब से साफ मालूम होता था कि चबूतरे का अगला हिस्सा, जो वीरेन्द्रसिंह की तरफ पड़ता था किवाड़ के पल्ले की तरफ जमीन के साथ लग गया है और दो आदमी एक गठरी लटकाये हुए चबूतरे से बाहर की तरफ ला रहे हैं। उन दोनों के बाहर आने के साथ ही चबूतरे के अन्दर वाली रोशनी बन्द हो गई और उन दोनों में से एक ने दूसरे के कंधे पर चढ़कर वह कंदील भी बुझा दी जो उस दालान में जल रही थी।
कंदील बुझ जाने से वहाँ अँधकार हो गया और इसके बाद मालूम न हुआ कि वहाँ क्या हुआ या क्या हो रहा है। तेजसिंह और वीरेन्द्रसिंह उसी समय उठ खड़े हुए और हाथ में नंगी तलवार लिए तथा एक आदमी को लालटेन लेकर वहाँ जाने की आज्ञा देकर उस दालान की तरफ रवाना हुए जिसमें तिलिस्मी चबूतरा था, मगर वहाँ जाकर सिवाय एक गठरी के जो उसी चबूतरे के पास पड़ी हुई थी और कुछ नजर न आया। जब आदमी लालटेन लेकर वहाँ पहुँचा तो तेजसिंह ने अच्छी तरह घूमकर जाँच की मगर नतीजा कुछ भी न निकला, न तो यहाँ कोई आदमी दिखाई दिया और न उस चबूतरे ही में किसी तरह के निशान या दरवाजे का पता लगा।
तेजसिंह ने जब वह गठरी खोली तो एक आदमी पर निगाह पड़ी। लालटेन की रोशनी में बड़े गौर देखने पर भी तेजसिंह या वीरेन्द्रसिंह उसे पहचान न सके अतः तेजसिंह ने उसी समय जफील बजाई जिसे सुनते ही कई सिपाही और खिदमतगार वहाँ इकट्ठे हो गये। इसके बाद वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह उस आदमी को उठवाकर राजा सुरेन्द्रसिंह के पास ले आए जो इस समय का शोरगुल सुनकर जाग चुके थे और इन्द्रजीतसिंह को अपने पास बुलवाकर कुछ बातें कर रहे थे।
उस बेहोश आदमी पर निगाह पड़ते ही इन्द्रजीतसिंह पहचान गये और बोल उठ––"यह तो बलभद्रसिंह हैं!"
वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब से) क्या? यही बलभद्रसिंह हैं जो यहाँ से गायब हो गये थे?
इन्द्रलीतसिंह––हाँ, यही हैं, ताज्जुब नहीं कि जिस अनूठे ढंग से यहाँ पहुँचाए गये हैं उसी ढंग से गायब भी हुए हों।
सुरेन्द्रसिंह––जरूर ऐसा ही हुआ होगा, भूतनाथ पर व्यर्थ का शक किया जाता था। अच्छा, अब इन्हें होश में लाने की फिक्र करो और भूतनाथ को बुलाओ।
तेजसिंह––जो आज्ञा!
सहज ही में बलभद्रसिंह चैतन्य हो गये और तब तक भूतनाथ भी वहाँ आ पहुँचा। राजा सुरेन्द्रसिंह, इन्द्रजीतसिंह और तेजसिंह को सलाम करने के बाद भूतनाथ बैठ गया और बलभद्रसिंह से बोला––
भूतनाथ––कहिये, कृपा-निधान, आप कहाँ छिप गये थे और कैसे प्रकट हो गये? सभी को मुझ पर सन्देह हो रहा है।
पाठक, इसके जवाब में बलभद्रसिंह ने यह नहीं कहा कि 'तुम्हीं ने तो मुझे बेहोश किया था' जिसके सुनने की शायद आप इस समय आशा करते होंगे, बल्कि बलभद्रसिंह ने यह जवाब दिया कि "नहीं, भूतनाथ, तुम पर कोई क्यों शक करेगा? तुमने ही तो मेरी जान बचाई है और तुम्हीं मेरे साथ दुश्मनी करोगे, ऐसा भला कौन कह सकता है?"
तेजसिंह––खैर, यह तो बताइये कि आपको कौन ले गया था और फिर कैसे ले वापस आया?
बलभद्रसिंह––इसका पता तो मुझे भी अभी तक नहीं लगा कि वे कौन थे जिनके पाले में पड़ गया था हाँ, जो कुछ मुझ पर बीती है उसे अर्ज कर सकता हूँ, मगर इस समय नहीं क्योंकि मेरी तबीयत कुछ खराब हो रही है। आशा है कि अगर मैं दो-तीन घण्टे सो सकूँगा तो सुबह तक ठीक हो जाऊँगा।
सुरन्द्रसिंह––कोई चिन्ता नहीं, आप इस समय जाकर आराम कीजिए।
इन्द्रजीतसिंह––यदि इच्छा हो तो अपने उसी पुराने डेरे में भूतनाथ के पास रहिए, नहीं तो कहिए आपके लिए दूसरे डेरे का इन्तजाम कर दिया जाये।
बलभद्रसिंह––जी नहीं, मैं अपने मित्र भूतनाथ के साथ ही रहना पसन्द करता हूँ।
बलभद्रसिंह को साथ लिए भूतनाथ अपने डेरे की तरफ रवाना हुआ, इधर राजा सुरेन्द्र सिंह, इन्द्रजीत, वीरेन्द्र सिंह और तेजसिंह उस तिलिस्मी चबूतरे तथा बलभद्रसिंह के बारे में बातचीत करने लगे तथा अन्त में यह निश्चय किया कि बलभद्रसिंह जो कुछ कहेंगे उस पर भरोसा न करके अपनी तरफ से इस बात का पता लगाना चाहिए कि उस तिलिस्मी चबूतरे की राह से आने-जाने वाले कौन हैं। उस दालान में ऐयारों का गुप्त पहरा मुकर्रर करना चाहिए।
६
कुमार की आज्ञानुसार इन्दिरा ने अपना किस्सा यों बयान किया––
इन्दिरा––मैं कह चुकी हूँ कि ऐयारी का कुछ सामान लेकर जब मैं उस खोह के बाहर निकली और पहाड़ तथा जंगल पार करके मैदान में पहुँची, तो यकायक मेरी निगाह ऐसी चीज पर पड़ी जिसने मुझे चौंका दिया और मैं घबराकर उस तरफ देखने लगी।
जिस चीज को देखकर मैं चौंकी, वह एक कपड़ा था जो मुझसे थोड़ी ही दूर पर ऊँचे पेड़ की डाल के साथ लटक रहा था और उस पेड़ के नीचे मेरी माँ बैठी हुई कुछ सोच रही थी। जब मैं दौड़ती हुई उसके पास पहुँची तो वह ताज्जुब-भरी निगाहों से मेरी तरफ देखने लगी, क्योंकि उस समय ऐयारी से मेरी सूरत बदली हुई थी। मैंने बड़ी खुशी के साथ कहा, "माँ, तू यहाँ कैसे आ गई?" जिसे सुनते ही उसने उठकर मुझे गले से लगा लिया और कहा, "इन्दिरा, यह तेरा क्या हाल है? क्या तूने ऐयारी सीख ली है?" मैंने मुख्तसिर में अपना सब हाल बयान किया मगर उसने अपने विषय में केवल इतना ही कहा कि अपना किस्सा मैं आगे चलकर तुझसे बयान करूँगी, इस समय केवल इतना ही कहूँगी कि दारोगा ने मुझे एक पहाड़ी में कैद किया था जहाँ से एक स्त्री की सहायता पाकर परसों मैं निकल भागी, मगर अपने घर का रास्ता न पाने के कारण इधर-उधर भटक रही हूँ।
अफसोस उस समय मैंने बड़ा ही धोखा खाया और उसके सबब से मैं बड़े संकट में पड़ गई, क्योंकि वह वास्तव में मेरी माँ न थी, बल्कि मनोरमा थी और यह हाल मुझे कई दिनों के बाद मालूम हुआ। मैं मनोरमा को पहचानती न थी। मगर पीछे मालूम हुआ कि वह मायारानी की सखियों में से थी और गौहर के साथ वह वहाँ तक गई थी, मगर इसमें भी कोई शक नहीं कि वह बड़ी शैतान, बेदर्द और दुष्टा थी। मेरी किस्मत में दुःख भोगना बदा हुआ था जो मैं उसे माँ समझकर कई दिनों तक उसके साथ रही और उसने भी नहाने-धोने के समय अपने को मुझसे बहुत बचाया। प्रायः कई दिनों के बाद वह नहाया करती और कहती कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है।
साथ ही इसके यह भी शक हो सकता है कि उसने मुझे जान से क्यों नहीं मार डाला। इसके जवाब में मैं कह सकती हूँ कि वह मुझे जान से मार डालने के लिए तैयार थी। मगर वह भी उसी कम्बख्त दारोगा की तरह मुझसे कुछ लिखवाना चाहती थी। अगर मैं उसकी इच्छानुसार लिख देती तो वह निःसन्देह मुझे मारकर बखेड़ा तय करती मगर ऐसा न हुआ।
जब उसने मुझसे यह कहा कि 'रास्ते का पता न जानने के कारण मैं भटकली फिरती हूँ', तब मुझे एक तरह का तरद्दुद हुआ, मगर मैंने जो कुछ जोश के साथ उसी समय जवाब दिया––"कोई चिन्ता नहीं, मैं अपने मकान का पता लगा लूँगी।"
मनोरमा––मगर साथ ही इसके मुझे एक बात और भी कहनी है।
मैं––वह क्या?
मनोरमा––मुझे ठीक खबर लगी है कि कम्बख्त दारोगा ने तेरे बाप को गिरफ्तार कर लिया है। और इस समय वह काशी में मनोरमा के मकान में कैद है।
मैं––मनोरमा कौन?
मनोरमा––राजा गोपालसिंह की स्त्री लक्ष्मीदेवी (जिसे अब लोग मायारानी के नाम से पुकारते हैं) की सखी...
मैं––असली लक्ष्मीदेवी से तो गोपालसिंह की शादी हुई ही नहीं। वह बेचारी तो...
मनोरमा––(बात काटकर) हाँ-हाँ, यह हाल मुझे भी मालूम है। मगर इस समय जो राजरानी बनी हुई है, लोग तो उसी को लक्ष्मीदेवी समझे हुए हैं, इसी से मैंने उसे लक्ष्मीदेवी कहा।
मैं––(आँखों में आँसू भरकर) तो क्या मेरा बाप भी कैद हो गया?
मनोरमा––बेशक, मैंने उसके छुड़ाने का भी बन्दोबस्त कर लिया है, क्योंकि तुझे तो शायद मालूम ही होगा कि तेरे बाप ने मुझे भी थोड़ी-बहुत ऐयारी सिखा रखी है। अतः वही ऐयारी इस समय मेरे काम आई और आवेगी।
मैं––(ताज्जुब से) मुझे नहीं मालूम कि पिताजी ने तुम्हें ऐयारी कब सिखाई।
मनोरमा––ठीक है, तू उन दोनों बहुत नादान थी, इसलिए आज वे बातें तुझे याद नहीं हैं पर मेरा मतलब यही है कि मैं कुछ ऐयारी भी जानती हूँ और इस समय तेरे बाप को छुड़ा सकती हूँ।
मनोरमा की यह बात ऐसी थी कि मुझे उस पर शक हो सकता था। मगर उसकी मीठी-मीठी बातों ने मुझे धोखे में डाल दिया और सच तो यह है कि मेरी किस्मत में दुःख भोगना बदा था, अब मैंने कुछ सोचकर यही जवाब दिया कि "अच्छा जो उचित समझो सो करो। ऐयारी तो थोड़ी-सी मुझे भी आ गई है और इसका हाल भी मैं तुम्हें कह चुकी हूँ कि चम्पा ने मुझे अपनी चेली बना लिया है।"
मनोरमा––हाँ, ठीक है। तो अब सीधे काशी ही चलना चाहिए और वहाँ चलने का सबसे ज्यादा सुभीता डोंगी है, इसलिए जहाँ तक जल्द हो सके, गंगा किनारे चलना चाहिए, जहाँ कोई न कोई डोंगी मिल ही जायगी।
मैं––बहुत अच्छा, चलो।
उसी समय हम लोग गंगा की तरफ रवाना हो गये और उचित समय पर वहाँ पहुँचकर अपने योग्य डोंगी किराये पर ली। डोंगी किराये पर करने में किसी तरह की तकलीफ न हुई, क्योंकि वास्तव में डोंगी वाले भी उसी दुष्ट मनोरमा के नौकर थे, मगर उस कम्बख्त ने ऐसे ढंग से बातचीत की कि मुझे किसी तरह का शक न हुआ या यों समझिए कि मैं अपनी माँ से मिलकर एक तरह से कुछ निश्चिन्त सी हो रही थी। रास्ते ही में मनोरमा ने मल्लाहों से इस किस्म की बातें भी शुरू कर दी कि 'काशी पहुँचकर तुम्हीं लोग हमारे लिए एक छोटा-सा मकान भी किराए पर तलाश कर देना, इसके बदले मैं तुम्हें बहुत-कुछ इनाम दूँगी।' मुख्तसिर यह कि हम लोग रात के समय काशीजी पहुँचे। मल्लाहों द्वारा मकान का बन्दोबस्त हो गया और हम लोगों ने उसमें जाकर डेरा भी डाल दिया। एक दिन उसमें रहने के बाद मनोरमा ने कहा कि "बेटी, तू इस मकान के अन्दर दरवाजा बन्द करके बैठ तो मैं जाकर मनोरमा का हाल दरियाफ्त कर आऊँ। अगर मौका मिला तो मैं उसे जान से मार डालूँगी और तब स्वयं मनोरमा बनकर उसके मकान, असबाब और नौकरों पर कब्जा करके तुझे लेने के लिए यहाँ आऊँगी, उस समय तू मुझे मनोरमा की सूरत-शक्ल में देखकर ताज्जुब न करना, जब मैं तेरे सामने आकर 'चापगेच' शब्द कहूँ, तब समझ जाना कि यह वास्तव में मेरी माँ है, मनोरमा नहीं। क्योंकि उस समय सब सिपाही-नौकर मुझे मालिक समझकर आज्ञानुसार मेरे साथ होंगे। तेरे बारे में मैं उन लोगों में यही मशहूर करूँगी कि यह मेरी रिश्तेदार है, इसे मैंने गोद लिया है और अपनी लड़की बनाया है। तेरी जरूरत की सब चीजें यहाँ मौजूद हैं, तुझे किसी तरह की तकलीफ न होगी।"
इत्यादि बहुत-सी बातें समझा-बुझाकर मनोरमा मकान के बाहर हो गई और मैंने भीतर से दरवाजा बन्द कर दिया, मगर जहाँ तक मेरा खयाल है, वह मुझे अकेला छोड़कर न गई होगी बल्कि दो-चार आदमी उस मकान के दरवाजे पर या इधर-उधर हिफाजत के लिए जरूर लगा गई होगी।
ओफ ओह, उसने अपनी बातों और तरकीबों का ऐसा मजबूत जाल बिछाया कि मैं कुछ कह नहीं सकती। मुझे उस पर रत्ती-भर भी किसी तरह का शक न हुआ और मैं पूरा धोखा खा गई। इसके दूसरे ही दिन तक वह मनोरमा बनी हुई कई नौकरों को साथ लिए मेरे पास पहुँची और 'चापगेज' शब्द कहकर मुझे अपना परिचय दिया। मैं यह समझकर बहुत प्रसन्न हुई कि माँ ने मनोरमा को मार लिया, अब मेरे पिता भी कैद से छूट जायेंगे। अब जिस रथ पर सवार होकर मुझे लेने के लिए आई थी, उसी पर मुझे अपने साथ बैठाकर वह अपने घर ले गई और उस समय मैं हर तरह से उसके कब्जे में पड़ गई।
मनोरमा के घर पहुँचकर मैं उस सच्ची मुहब्बत को खोजने लगी जो एक माँ को अपने बच्चे के साथ होती है, मगर मनोरमा में वह बात कहाँ से आती? फिर भी मुझे इस बात का गुमान न हुआ कि यहाँ धोखे का जाल बिछा हुआ है जिसमें मैं फँस गई हूँ, बल्कि मैंने यह समझा कि वह मेरे पिता को छुड़ाने की फिक्र में लगी हुई है और इसी से मेरी तरफ ध्यान नहीं देती, और वह मुझसे घड़ी-घड़ी यही बात कहा भी करती कि 'बेटी, मैं तेरे बाप को छुड़ाने की फिक्र में पागल हो रही हूँ।'
जब तक मैं उसके घर में बेटी कला कर रही, तब तक न तो उसने कभी स्नान किया और न अपना शरीर ही देखने का कोई ऐसा मौका मुझे दिया जिसमें मुझको शक होता कि यह मेरी माँ नहीं, बल्कि दूसरी औरत है। और हाँ मुझे भी वह असली सूरत में रहने नहीं देती थी, चेहरे में कुछ फर्क डालने के लिए उसने एक तेल बनाकर मुझे दे दिया था जिसे दिन में एक या दो दफे मैं नित्य लगा लिया करती थी। इससे केवल मेरे रंग में फर्क पड़ गया था और कुछ नहीं।
उसके यहाँ रहने वाले लोग मेरी खूब इज्जत करते और जो कुछ मैं कहती, उसे तुरन्त ही मान लेते, मगर मैं उस मकान के हाते के बाहर जाने का इरादा नहीं कर सकती थी। कभी अगर ऐसा करती तो सभी लोग मना करते और रोकने को तैयार हो जाते।
इसी तरह वहाँ रहते मुझे कई दिन बीत गये। एक दिन जब मनोरमा रथ पर सवार होकर कहीं बाहर गई थी, मैं समझती हूँ कि मायारानी से मिलने गई होगी, संध्या के समय जब थोड़ा-सा दिन बाकी था, मैं धीरे-धीरे बाग में टहल रही थी कि यकायक किसी का फेंका हुआ पत्थर का छोटा-सा टुकड़ा मेरे सामने आकर गिरा था। जब मैंने ताज्जुब से उसे देखा तो उसमें बँधे कागज के एक पुरजे पर मेरी निगाह पड़ी। मैंने झट उठा लिया और पुर्जा खोलकर पढ़ा, उसमें यह लिखा हुआ था––
"अब मुझे निश्चय हो गया कि तू 'इन्दिरा' है, अब तुझे होशियार करे देता हूँ और कहे देता हूँ कि तू वास्तव में मायारानी की सखी मनोरमा के फन्दे में फँसी हुई है। यह तेरी माँ बनकर तुझे फँसा लाई है और राजा गोपालसिंह के दारोगा की इच्छानुसार अपना काम निकालने के बाद तुझे मार डालेगी। मुझे जो कुछ कहना था कह दिया, अब जो तू उचित समझे कर। तुझे धर्म की शपथ है, इस पुर्जे को पढ़कर तुरन्त फाड़ दे।" मैंने उस पुर्जे को पढ़ने के बाद उसी समय टुकड़े-टुकड़े करके वहीं फेंक दिया और घबरा कर चारों तरफ देखने अर्थात् उस आदमी को ढूँढ़ने लगी जिसने वह पत्थर का टुकड़ा फेंका था, मगर कुछ पता न लगा और न कोई मुझे दिखाई ही पड़ा।
उस पुर्जे के पढ़ने से जो कुछ मेरी हालत हुई, मैं बयान नहीं कर सकती। उस समय मैं मनोरमा के विषय में ज्यों-ज्यों पिछली बातों पर ध्यान देने लगी, त्यों-त्यों मुझे निश्चय होता गया कि यह वास्तव में मनोरमा है, मेरी माँ नहीं। और अब अपने किये पर पछताने और अफसोस करने लगी कि क्यों उस खोह के बाहर पैर रखा और आफत में फँसी?
उसी समय से मेरे रहन-सहन का ढंग भी बदल गया और मैं दूसरी ही फिक्र में पड़ गई। सबसे ज्यादा फिक्र मुझे उसी आदमी का पता लगाने की हुई जिसने वह पुर्जा मेरी तरफ फेंका था। मैं उसी समय वहाँ से हटकर मकान में चली गई, इस खयाल से कि जिस आदमी ने मेरी तरफ वह पुर्जा फेंका था और उसे फाड़ डालने के लिए कसम दी थी, वह जरूर मनोरमा से डरता होगा और यह जानने के लिए कि मैंने पुर्जा फाड़कर फेंक दिया या नहीं, उस जगह पर जरूर जायगा जहाँ (बाग में) टहलते समय मुझे पुर्जा मिला था।
जब मैं छत पर चढ़कर और छिपकर उस तरफ देखने लगी जहाँ मुझे वह पुर्जा मिला था तो एक आदमी को धीरे-धीरे टहलकर उस तरफ जाते देखा। जब वह उस ठिकाने पर पहुँच गया तब उसने इधर-उधर देखा और सन्नाटा पाकर पुर्जे के उन टुकड़ों को चुन लिया जो मैंने फेंके थे और उन्हें कमर में छिपाकर उसी तरह धीरे-धीरे टहलता हुआ उस मकान की तरफ चला आया जिसकी छत पर से मैं यह सब तमाशा देख रही थी। जब वह मकान के पास पहुँचा, तब मैंने उसे पहचान लिया। मनोरमा से बातचीत करते समय मैं कई दफे उसका नाम 'नानू' सुन चुकी थी।
इन्दिरा अपना किस्सा यहाँ तक बयान कर चुकी थी कि कमलिनी ने चौंककर इन्दिरा से पूछा, "क्या नाम लिया, नानू?"
इन्दिरा––हाँ, उसका नाम नानू था।"
कमलिनी––वह तो इस लायक नहीं था कि तेरे साथ ऐसी नेकी करता और तुझे आने वाली आफत से होशियार कर देता। वह बड़ा ही शैतान और पाजी आदमी था। ताज्जुब नहीं कि किसी दूसरे ने तेरे पास वह पुर्जा फेंका और नानू ने देख लिया हो और उसके साथ दुश्मनी की नीयत से उन टुकड़ों को बटोरा हो।
इन्दिरा––(बात काटकर) बेशक ऐसा ही था इस बारे में भी मुझे धोखा हुआ जिसके सबब से मेरी तकलीफ बढ़ गई, जैसा कि मैं आगे चलकर बयान करूँगी।
कमलिनी––ठीक है, मैं उस कम्बख्त नानू को खूब जानती हूँ। जब मैं मायारानी यहाँ रहती थी, तब वह मायारानी और मनोरमा की नाक का बाल हो रहा था और उनकी खैरखाही के पीछे प्राण दिए देता था, मगर अन्त में न मालूम क्या सबब हुआ कि मनोरमा या नागर ही ने उसे फाँसी देकर मार डाला। इसका सबब मुझे आज तक मालूम न हुआ और न मालूम होने की आशा ही है, क्योंकि उन लोगों में से इसका सबब कोई भी न बतावेगा। मैं भी उसके हाथ से बहुत तकलीक उठा चुकी हूँ जिसका बदला तो मैं ले न सकी, मगर उसकी लाश पर थूकने का मौका मुझे जरूर मिल गया। (लक्ष्मीदेवी की तरफ देख के) जब मैंने भूतनाथ के कागजात लेने के लिए मनोरमा के मकान पर जाकर नागर को धोखा दिया, तब मैंने अपनी कोठरी केबगल में इसीकी लटकती हुई लाश पर थूका था। उसी कोठरी में मैंने अफसोस के साथ 'बरदेबू' को भी मुर्दा पाया था, उसके मरने का सबब भी मुझे न मालूम हुआ और न होगा। वास्तव में 'बरदेबू' बड़ा ही नेक आदमी था और उसने मेरे साथ बड़ी नेकियाँ की थीं। मुझे यह खबर उसी ने दी थी कि 'अब मायारानी तुम्हें मार डालने का बन्दोबस्त कर रही है।' वह उन दिनों खास बाग के मालियों का दारोगा था।
इन्दिरा––बेशक, बरदेबू बड़ा नेक आदमी था, असल में वह पुर्जा उसी ने मेरी तरफ फेंका था और कम्बख्त नानू ने देख लिया था, मगर मैं धोखा खा गई, मेरी समझ में आया कि वह पुर्जा नानू का फेंका हुआ है और उन टुकड़ों को इस खयाल से उसने चन लिया है कि कोई देखने न पावे या किसी दुश्मन के हाथ में पड़कर मेरा···
कमलिनी––अच्छा फिर आगे क्या हुआ, सो कहो।
इन्दिरा––जब मैंने यह समझ लिया कि यह नेकी नानू ने ही मेरे साथ की है और वह टहलता हुआ मकान के पास आ गया, तो मैं छत पर से उतरकर पुनः बाग में आई और टहलती हुई उसके पास पहुँची।
मैं––(नानू से) आपने मुझ पर बड़ी कृपा की है जो मुझे आने वाली आफत से होशियार कर दिया। मैं अभी तक मनोरमा को अपनी माँ ही समझ रही थी।
नानू––ठीक है, मगर तुम्हें मुझसे ज्यादा बातचीत न करनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि लोगों को मुझ पर शक हो जाय।
मैं––इस समय यहाँ कोई भी नहीं है इसलिए मैं यह प्रार्थना करने आई हूँ कि जिस तरह आपने मुझ पर इतनी कृपा की है, उसी तरह मेरे निकल भागने में भी मदद देकर अनन्त पुण्य के भागी हों।
नानू––अच्छा, मैं इस काम में भी तुम्हारी मदद करूँगा, मगर तुम भागने में जल्दी न करना, नहीं तो सब काम चौपट हो जाएगा, क्योंकि यहाँ के सभी आदमी तुम पर गहरी हिफाजत की निगाह रखते हैं और 'बरदेबू' तो तुम्हारा पूरा दुश्मन है, उससे कभी बातचीत न करना, वह बड़ा ही धोखेबाज ऐयार है। बरदेबू को जानती हो न?
मैं––हाँ, मैं बरदेबू को जानती हूँ।
नानू––बस, तो तुम यहाँ से जल्दी चली जाओ, मैं फिर किसी समय किसी बहाने से तुम्हारे पास आऊँगा तब बातें करूँगा।
मैं खुशी-खुशी वहाँ से हटी और बाग के दूसरे हिस्से में जाकर टहलने लगी जहाँ से पहरे वाले बखूबी देख सकते थे।
जैसे-जैसे अंधकार बढ़ता जाता था, मुझ पर हिफाजत की निगाह भी बढ़ती जाती थी, यहाँ तक कि आधी घड़ी रात जाने पर लौंडियों और खिदमतगारों ने मुझे मकान के अन्दर जाने पर मजबूर किया और मैं भी लाचार होकर अपने कमरे में आ बिस्तर पर लेट गई। सभी ने खाने-पीने के लिए कहा, मगर इस समय मुझे खाना-पीना कहाँ सूझता, सो बहाना करके टाल दिया और लेटे-लेटे सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए!
मैं समझे हुए थी कि नानू मेरे पास आकर मुझे यहाँ से निकल जाने के विषय में राय देगा जैसा कि वह वादा कर चुका था, मगर मेरा खयाल गलत था, आधी रात तक इन्तजार करने पर भी वह मेरे पास न आया। इसके अतिरिक्त रोज मेरी हिफाजत के लिए रात को दो लौंडियाँ मेरे कमरे में रहती थीं। मगर आज चार लौंडियों को रोज से ज्यादा मुस्तैदी के साथ पहरा देते देखा। उस समय मुझे खुटका हुआ, मैं सोचने लगी कि निःसदेह इन लोगों को मेरे बारे कुछ सन्देह हो गया है। मैं नींद न पड़ने और सिर में दर्द होने से बेचैनी दिखाकर उठी और कमरे में टहलने लगी, यहाँ तक कि दरवाजे के बाहर निकलकर सहन में पहुँची तब देखा कि आज तो बाहर भी पहरे का इन्तजाम बहुत सख्त हो रहा है। मैंने प्रकट में किसी तरह का आश्चर्य नहीं किया और पुनः अपने बिस्तरे पर आकर लेट रही और तरह-तरह की बातें सोचने लगी। उसी समय मुझे निश्चय हो गया कि उस पुर्जे को फेंकने वाला नानू नहीं कोई दूसरा है, अगर नानू होता तो इस बात की खबर फैल न जाती, क्योंकि उन टुकड़ों को तो नानू ने मेरे सामने ही बटोर लिया था। अफसोस, मैंने बहुत बुरा किया, अगर वे थोड़े से शब्द, मैं न कहती तो नानू सहज में ही उन टुकड़ों से कोई मतलब नहीं निकाल सकता था, मगर अब तो असल भेद खुल गया और मेरे पैरों में दोहरी जंजीर पड़ गई, अतः अब क्या करना चाहिए!
रात भर मुझे नींद न आई और सुबह को जैसे ही मैं बिछावन पर से उठी तो सुना कि मनोरमा आ गई है। कमरे के बाहर निकलकर सहन में गई जहाँ मनोरमा एक कुर्सी पर बैठी नानू से बात कर रही थी। दो लौंडियाँ उसके पीछे खड़ी थीं और उसक बगल में दो-तीन खाली कुर्सियाँ भी पड़ी हुई थीं। मनोरमा ने अपने पास एक कुर्सी खींच कर मुझे बड़े प्यार से उस पर बैठने के लिए कहा और जब मैं बैठ गई तो बातें भी होने लगीं!
मनोरमा––(मुझसे) बेटी, तू जानती है कि यह (नानू की तरफ बताकर) आदमी हमारा कितना बड़ा खैरखाह है!
मैं––माँ, शायद यह तुम्हारा खैरखाह होगा, मगर मेरा तो पूरा दुश्मन है।
मनोरमा––(चौंककर) क्यों-क्यों, सो क्यों?
मैं––सैकड़ों मुसीबतें झेल कर तो मैं तुम्हारे पास पहुँची और तुमने भी मुझे अपनी लड़की बनाकर मेरे साथ जो सलूक किया, वह प्रायः यहाँ के रहने वाले सभी कोई जानते होंगे, मगर यह नानू नहीं चाहता कि मैं अब भी किसी तरह सुख की नींद सो सकूँ। कल शाम को जब मैं बाग में टहल रही थी तो यह मेरे पास आया और एक पुर्जा मेरे हाथ में देकर बोला कि 'इसे पढ़ और होशियार हो जा, मगर खबरदार, मेरा नाम न लेना।'
नानू––(मेरी बात काटकर क्रोध से) क्यों मुझ पर तूफान बाँध रही हो! क्या यह बात मैंने तुमसे कही थी:
मैं––(रंग बदलकर) बेशक, तूने पुर्जा देकर यह बात कही थी और मुझे भाग जाने के लिए भी ताकीद की! आँखें क्यों दिखाता है! जो बातें तूने···
मनोरमा––(बात काटकर) अच्छा-अच्छा, तू क्रोध मत कर, जो कुछ होगा, मैं समझ लूँगी। तू जो कहती थी उसे पूरा कर। (नानू से) बस, तुम चुपचाप बैठे रहो, जब यह अपनी बात पूरी कर ले तब जो कुछ कहना हो कहना।
मैं––मैंने उस पुर्जे को खोलकर पढ़ा तो उसमें यह लिखा हुआ पाया––"जिसे तू अपनी आँ समझती है, वह मनोरमा है। तुझे अपना काम निकालने के लिए यहाँ ले आई है, काम निकल जाने पर तुझे जान से मार डालेगी, अब जहाँ तक जल्द हो सके, निकल भागने की फिक्र कर।" इत्यादि और भी कई बातें उसमें लिखी हुई थीं, जिन्हें पढ़कर मैं चौंकी और बात बनाने के तौर तर नानू से बोली, "आपने बड़ी मेहरबानी की जो मुझे होशियार कर दिया, अब भागने में भी आप ही मेरी मदद करेंगे तो जान बचेगी।" इसके जवाब में इसने खुश होकर कहा कि तुम्हें मुझसे ज्यादा बातचीत न करनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि लोगों को मुझ पर शक हो जाय। मैं भागने में भी तुम्हारी मदद करूँगा, मगर इस बात को बहुत छिपाये रखना क्योंकि यहाँ बरदेबू नाम का आदमी तुम्हारा दुश्मन है।" इत्यादि––
नानू––(बात काट कर) हाँ, बेशक यह बात मैंने तुमसे जरूर कही थी कि···
मैं धीरे-धीरे तुम सभी बात कबूल करोगे, मगर ताज्जुब यह है कि मना करने पर भी तुम टोके बिना नहीं रहते।
मनोरमा––(क्रोध से) क्या तुम चुप न रहोगे?
इसका जवाब नानू ने कुछ न दिया और चुप हो रहा। इसके बाद मनोरमा की इच्छानुसार मैंने यों कहना शुरू किया––
मैं––मैंने इस पुर्जे को पढ़कर टुकड़े-टुकड़े कर डाला और फेंक दिया। इसके बाद नानू भी चला गया और मैं भी यहाँ आकर छत के ऊपर चढ़ गई और छिपकर उसी तरफ देखने लगी, जहाँ उस पुर्जे को फाड़ कर फेंक आई थी। थोड़ी देर बाद पुनः इसको (नानू को) उसी जगह पहुँचकर कागज के उन टुकड़ों को चुनते और बटोरते देखा। जब यह उन टुकड़ों को बटोर कर कमर में रख चुका और इस मकान की तरफ आया तो मैं भी तुरन्त छत पर से उतर कर इसके पास चली आई और बोली, "कहिए, अब मुझे कब यहाँ से बाहर कीजिएगा?" इसके जवाब में इसने कहा कि 'मैं रात को एकान्त में तुम्हारे पास आऊँगा, तो बातें करूँगा।" इतना कहकर यह चला गया और पुनः मैं बाग में टहलने लगी। जब अन्धकार हुआ, तो मैं घूमती हुई (हाथ का इशारा करके) उस झाड़ी की तरफ से निकली और किसी के बात की आहट पा पैर दबाती हुई आगे बढ़ी, यहाँ तक कि थोड़ी ही दूर पर दो आदमियों के बात करने की आवाज साफ-साफ सुनाई देने लगी। मैंने आवाज से नानू को तो पहचान लिया, मगर दूसरे को न पहचान सकी कि वह कौन था, हाँ पीछे मालूम हुआ कि वह बरदेबू था।
मनोरमा––अच्छा, खैर यह बता कि इन दोनों में क्या बातें हो रही थीं?
मैं––सब बातें तो मैं सुन न सकी, हाँ, जो कुछ सुनने और समझने में आया सो कहती हूँ। इस नानू ने दूसरे से कहा कि 'नहीं-नहीं, अब मैं अपना इरादा पक्का कर चुका हूँ और उस छोकरी को भी मेरी बातों पर पूरा विश्वास हो चुका है, निःसन्देह उसे ले जाकर मैं बहुत रुपये उसके बदले में पा सकूँगा, अगर तुम इस काम में मेरी मदद करोगे, तो मैं उसमें से आधी रकम तुम्हें दूँगा।' इसके जवाब में दूसरे ने कहा कि 'देखो नानू यह काम तुम्हारे योग्य नहीं है, मालिक के साथ दगा करने वाला कभी सुख नहीं भोग सकता, बेहतर है कि तुम मेरी बात मान जाओ नहीं तो तुम्हारे लिए अच्छा न होगा और मैं तुम्हारा दुश्मन बन जाऊँगा।' यह जवाब सुनते ही नानू क्रोध में आकर उसे बुरा-भला कहने और धमकाने लगा। उसी समय इसके सम्बोधन करने पर मुझे मालूम हुआ कि उस दूसरे का नाम बरदेबू है। खैर, जब मैंने जाना कि अब ये दोनों अलग होते हैं तो मैं चुपके से वहां से चल पड़ी और अपने कमरे में लेट रही। थोड़ी ही देर में यह मेरे पास पहुँचा और बोला, "बस अब जल्दी से उठ खड़ी हो और मेरे पीछे चली आओ क्योंकि अब वह मौका आ गया कि मैं तुम्हें इस आफत से बचाकर बाहर निकाल दूँ।" इसके जवाब मैं मैंने कहा कि 'बस रहने दीजिए, आपकी कलई खुल गई, मैं आपकी और बरदेबू की बातें छिपकर सुन चुकी हूँ, मां को आने दीजिए तो मैं आपकी खबर लेती हूँ।" इतना सुनते ही यह लाल-पीला होकर बोला कि 'खैर, देख लेना कि मैं तेरी खबर लेता हूँ या तू मेरी खबर लेती है।" बस, यह कहकर चला गया और थोड़ी देर में मैंने अपने को सख्त पहरे में पाया।
मनोरमा––ठीक है, अब मुझे असल बातों का पता लग गया।
नानू––(क्रोध के साथ) ऐसी तेज और धूर्त लड़की तो आज तक मैंने देखी ही नहीं! मेरे सामने ही मुझे झूठा और दोषी बना रही है और अपने सहायक बरदेबू को निर्दोष बनाना चाहती है!
इतना कहकर इन्दिरा कुछ देर के लिए रुक गई और थोड़ा-सा जल पीने के बाद बोली––
"जो कुछ मैंने कहा था उस पर मनोरमा को विश्वास हो गया।"
इन्द्रजीतसिंह––विश्वास होना ही चाहिए, इसमें कोई शक नहीं कि तूने जो कुछ मनोरमा से कहा उसका एक-एक अक्षर चालाकी और होशियारी से भरा हुआ था।
कमला––निःसन्देह, अच्छा तब क्या हुआ?
इन्दिरा––नानू ने मुझे झूठा बनाने के लिए बहुत जोर मारा, मगर कुछ कर न सका क्योंकि मनोरमा के दिल पर मेरी बातों का पूरा असर पड़ चुका था। उस पुर्जे के टुकड़ों ने उसी को दोषी ठहराया जो उसने बरदेबू को दोषी ठहराने के लिए चुन रखे थे, क्योंकि बरदेबू ने यह पुर्जा अक्षर बिगाड़ कर ऐसे ढंग से लिखा था कि उसकी कलम का लिखा हुआ कोई कह नहीं सकता था। मनोरमा ने इशारे से मुझे हट जाने के लिए कहा और मैं उठकर कमरे के अन्दर चली गई। थोड़ी देर के बाद जब मैं उसके बुलाने पर पुनः बाहर गई तो वहाँ मनोरमा को अकेले बैठे हुए पाया। उसके पास वाली कुर्सी पर बैठकर मैंने पूछा कि 'माँ, नानू कहाँ गया?' इसके जवाब में मनोरमा ने कहा कि 'बेटी, नानू को मैंने कैदखाने में भेज दिया। ये लोग उस कम्बख्त दारोगा के साथी और बड़े ही शैतान हैं इसलिए किसी-न-किसी तरह इन लोगों को दोषी ठहराकर जहन्नुम को भेज देना ही उचित है। अब मैं उस दारोगा से बदला लेने की धुन में लगी हुई हूँ, इसी काम के लिए मैं बाहर गयी थी और इस समय पुनः जाने के लिए तैयार हूँ, केवल तुझे देखने के लिए चली आयी थी, तू बेफिक्र होकर यहाँ रह, आशा है कि कल शाम तक मैं अवश्य लौट आऊँगी। जब तक मैं उस कम्बख्त से बदला न ले लूँ और तेरे बाप को कैद से छुड़ा न लूँ, तब तक एक घड़ी के लिए भी अपना समय नष्ट करना नहीं चाहती। बरदेबू को अच्छी तरह समझा जाऊँगी, वह तुझे किसी तरह की तकलीफ न होने देगा।"
इन बातों को सुनकर मैं बहुत खुश हुई और सोचने लगी कि यह कम्बख्त यहाँ से जितना शीघ्र चली जाये, उत्तम है, क्योंकि मुझे हर तरह से निश्चय हो चुका था कि यह मेरी माँ नहीं है और यहाँ से यकायक निकल जाना भी कठिन है। साथ ही इसके मेरा दिल कह रहा था कि मेरा बाप कैद नहीं हुआ, यह सब मनोरमा की बनावट है जो मेरे बाप का कैद होना बता रही है।
मनोरमा चली गई, मगर उसने शायद ठीक मुझको यह न बताया कि नानू के साथ क्या सलूक किया या अब वह कहाँ है, फिर भी मनोरमा के चले जाने के बाद मैंने नानू को न देखा और न किसी लौंडी या नौकर ही ने उसके बारे में मुझसे कुछ कहा।
अबकी बार मनोरमा के चले जाने के बाद मुझ पर उतना सख्त पहरा नहीं रहा जितना नानू ने बढ़ा दिया था, मगर कोई आदमी मेरी तरफ से गाफिल भी न था।
उसी दिन आधी रात के समय जब मैं कमरे में चारपाई पर पड़ी हुई नींद नहीं आने के कारण तरह-तरह के मनसूबे बाँध रही थी, यकायक बरदेबू मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला, "शाबाश, तूने बड़ी चालाकी से मुझे बचा लिया और ऐसी बात गढ़ी कि मनोरमा को नानू पर ही पूरा शक हो गया और मैं इस आफत से बच गया नहीं तो नानू ने मुझे पूरी तरह फाँस लिया था, क्योंकि वह पुर्जा तो मेरा ही लिखा हुआ था, मैं तुझसे बहुत खुश हूँ और तुझे इस योग्य समझता हूँ कि तेरी सहायता करूँ।
मैं––आपको मेरी बातों का हाल क्यों कर मालूम हुआ?
वरदेबू––एक लौंडी की जबानी मालूम हुआ जो उस समय मनोरमा के पास खड़ी थी।
मैं––ठीक है, मुझे विश्वास है कि आप मेरी सहायता करेंगे और किसी तरह इस आफत से बाहर कर देंगे, मनोरमा के न रहने से अब मौका भी बहुत अच्छा है।
बरदेबू––बेशक मैं तुझे आफत से छुड़ाऊँगा, मगर आज ऐसा करने का मौका नहीं है, मनोरमा की मौजूदगी में यह काम अच्छी तरह हो जायेगा और मुझ पर किसी तरह का शक भी न होगा क्योंकि जाते समय मनोरमा तुझे मेरी हिफाजत में छोड़ गई है। इस समय मैं केवल इसलिए आया हूँ कि तुझे हर तरह की बातें समझा-बुझाकर यहाँ से निकल भागने की तर्कीव बता दूँ और साथ ही इसके यह भी कह दूँ कि तेरी माँ दारोगा की बदौलत जमानिया में तिलिस्म के अन्दर कैद है और इस बात की खबर गोपालसिंह को नहीं है। मगर मैं उनसे मिलने की तरकीब तुझे अच्छी तरह बता दूँगा।
वरदेबू घंटे भर तक मेरे पास बैठा रहा और उसने वहाँ की बहुत-सी बातें मुझे समझाईं और निकल भागने के लिए जो तरकीब सोची थी, वह भी कही जिसका हाल आगे चलकर मालूम होगा––साथ ही इसके बरदेबू ने मुझे यह भी समझा दिया कि मनोरमा की उँगली में एक अँगूठी रहती है, जिसका नोकीला नगीना बहुत ही जहरीला है, किसी के बदन में कहीं भी रगड़ देने से बात की बात में उसका तेज जहर तमाम बदन में फैल जाता है और तब सिवाय मनोरमा की मदद के वह किसी तरह नहीं बच सकता। वह जहर की दवाइयों को (जिन्हें मनोरमा ही जानती है) घोड़े का पेट चीरकर और उसकी ताजी आँतों में उनको रखकर तैयार करती है···
इतना सुनते ही कमलिनी ने रोक कर कहा, "हाँ-हाँ, यह बात मुझे भी मालूम है। जब मैं भूतनाथ के कागजात लेने वहाँ गई थी तो उसी कोठरी में एक घोड़े की दुर्दशा भी देखी थी, जिसमें नानू और बरदेबू की लाश देखी, अच्छा, तब क्या हुआ?" इसके जवाब में इन्दिरा ने फिर कहना शुरू किया।
इंदिरा बरदेबू मुझे समझा-बुझाकर और बेहोशी की दवा की दो पुड़िया देकर गया और उसी समय से मैं भी मनोरमा के आने का इन्तजार करने लगी। दो दिन तक वह न आई और इस बीच में पुनः दो दफे बरदेबू से बातचीत करने का मौका मिला। और सब बातें तो नहीं, मगर यह मैं इसी जगह कह देना उचित समझती हूँ कि बरदेबू ने वह दवा की पुड़ियाएँ मुझे क्यों दी थीं। उनमें से एक तो बेहोशी की दवा थी और दूसरी होश में लाने की। मनोरमा के यहाँ एक ब्राह्मणी थी, जो उसकी रसोई बनाती थी और उस मकान में रहने तथा पहरा देने वाली ग्यारह लौंड़ियों को भी उसी रसोई में से खाना मिलता था। इसके अतिरिक्त एक ठकुरानी और थी जो मांस बनाया करती थी। मनोरमा को मांस खाने का शौक था और प्रायः नित्य खाया करती थी। मांस ज्यादा बना करता और जो बच जाता वह सब लौंडियों नौकरों और मालियों को बाँट दिया जाता था। कभी-कभी मैं भी रसोई बनाने वाली मिसरानी या ठकुरानी के पास बैठकर उसके काम में सहायता कर दिया करती थी और वह बेहोशी की दवा बरदेबू ने इसीलिए दी थी कि समय आने पर खाने की चीजों तथा मांस इत्यादि में जहाँ तक हो सके मिला दी जाये।
आखिर मुझे अपने काम में सफलता प्राप्त हुई, अर्थात् चौथे या पाँचवें दिन संध्या के समय मनोरमा आ पहुँची और मांस के बटुए में बेहोशी की दवा मिला देने का भी मौका मुझे मिल गया।
रात के समय जब भोजन इत्यादि से छुट्टी पाकर मनोरमा अपने कमरे में बैठी तो उसने मुझे भी अपने पास बुलाकर बैठा लिया और बातें करने लगी। उस समय सिवाय हम दोनों के वहाँ और कोई भी न था।
मनोरमा––अबकी बार मेरा सफर बहुत अच्छा हुआ और मुझे बहुत-सी बातें नई मालूम हो गई जिससे तेरे बाप छुड़ाने में अब किसी तरह की कठिनाई नहीं रही। आशा है कि दो ही तीन दिन में वह कैद से छूट जायेंगे और हम लोग भी इस अनूठे भेष को छोड़कर अपने घर जा पहुँचेंगे।
मैं––तुम कहाँ गई थीं और क्या करके आई?
मनोरमा––मैं जमानिया गई थी। वहाँ के राजा गोपालसिंह की मायारानी तथा दारोगा से भी मुलाकात की। मायारानी ने वहाँ अपना पूरा दखल जमा लिया है और वहाँ की तथा तिलिस्म की बहुत-सी बातें उसे मालूम हो गई हैं। इसीलिए अब वह राजा गोपालसिंह को भी मार डालने का बन्दोबस्त कर रही है।
मैं––तिलिस्म कैसा?
मनोरमा––(ताज्जुब के हाथ) क्या तू नहीं जानती कि जमानिया का खास बाग एक बड़ा भारी तिलिस्म है?
मैं––नहीं, मुझे तो यह बात नहीं मालूम और तुमने भी कभी मुझे कुछ नहीं बताया।
यद्यपि मुझे जमानिया के तिलिस्म का हाल मालूम था और इस विषय की बहुत सी बातें अपनी माँ से सुन चुकी थी, मगर इस समय मनोरमा से यही कह दिया कि 'नहीं यह बात भी मालूम नहीं है और तुमने भी इस विषय में कभी कुछ नहीं कहा।' इसके जवाब में मनोरमा ने कहा, "हाँ ठीक है, मैंने नादान समझ कर तुझे वे बातें नहीं कही थीं।"
मैं––अच्छा तो यह बताओ कि मायारानी को थोड़े ही दिनों में वहां का सब हाल कैसे मालूम हो गया?
मनोरमा––ये सब बातें मुझे भी मालूम न थी, मगर दारोगा ने मुझको असली मनोरमा समझकर बता दिया, अतः जो कुछ उसकी जबानी सुनने में आया है सो तुझे कहती हूँ। मायारानी को वहाँ का हाल यकायक थोड़े ही दिनों में मालूम न हो जाता और दारोगा भी इतनी जल्दी उसे होशियार न कर देता मगर उसके (मायारानी के) बाप ने उसे हर तरह से होशियार कर दिया है क्योंकि उसके बड़े लोग दीवान के तौर पर वहाँ की हुकूमत कर चुके हैं और इसीलिए उसके बाप को भी न मालूम किस तरह पर वहाँ की बहुत-सी बातें मालूम हैं।
मैं––खैर, इन सब बातों से मुझे कोई मतलब नहीं, यह बताओ कि मेरे पिता कहाँ हैं और उन्हें छुड़ाने के लिए तुमने क्या बन्दोबस्त किया! वह छूट जायें तो राजा गोपालसिंह को मायारानी के फन्दे से बचा लें। हम लोगों के किये इस बारे में कुछ न हो सकेगा।
मनोरमा––उन्हें छुड़ाने के लिए भी मैं सब बन्दोबस्त कर चुकी हूँ, देर बस इतनी ही है कि तू एक चिट्ठी गोपालसिंह के नाम की उसी मजमून की लिख दे, जिस मजमून की लिखने के लिए दारोगा तुझे कहता था। अफसोस इसी बात का है कि दारोगा को तेरा हाल मालूम हो गया है। वह तो मुझे नहीं पहचान सका, मगर इतना कहता था कि 'इन्दिरा को तूने अपनी लड़की बनाकर घर में रख लिया है, सो खैर तेरे मुलाहिजे से मै उसे छोड़ देता हूँ, मगर उसके हाथ से इस मजमून की चिट्ठी लिखाकर जरूर भेजनी होगा।' (कुछ रुककर) न मालूम क्यों मेरा सिर घूमता है।
मैं––खाने को ज्यादा खा गई होगी।
मनोरमा––नहीं, मगर···
इतना कहते-कहते मनोरमा ने गौर की निगाह से मुझे देखा और मैं अपने को बचाने की नीयत से उठ खड़ी हुई। उसने यह देखकर मुझे पकड़ने की नीयत से उठना चाहा मगर उठ न सकी और उस बेहोशी की दवा का पूरा-पूरा असर उस पर हो गया अर्थात् वह बेहोश होकर गिर पड़ी। उसी समय मैं उसके पास से चली आई और कमरे के बाहर निकली। चारों तरफ देखने से मालूम हुआ कि सब लौंडी, नौकर मिसरानी और माली वगैरह जहाँ-तहाँ बेहोश पड़े हैं, किसी को तन-बदन की सुध नहीं है। मैं एक जानी हुई जगह से मजबूत रस्सी लेकर पुनः मनोरमा के पास पहुँची और उसी से बूब जकड़ कर दूसरी पुड़िया सुँघा उसे होश में लाई। चैतन्य होने पर उसने हाथ में खंजर लिए मुझे अपने सामने खड़े पाया। वह उसी का खंजर था जो मैंने ले लिया था।
मनोरमा––हैं, यह क्या? तूने मेरी ऐसी दुर्दशा क्यों कर रक्खी है?
मैं––इसलिए कि तू वास्तव में मेरी माँ नहीं है और मुझे धोखा देकर यहाँ ले आई है।
मनोरमा––यह तुझे किसने कहा?
मैं––तेरी बातों और करतूतों ने।
मनोरमा––नहीं-नहीं, यह सब तेरा भ्रम है।
मैं––अगर यह सब मेरा भ्रम है और तू वास्तव में मेरी माँ है तो बता मेरे नाना ने अपने अन्तिम समय में क्या-क्या कहा था?
मनोरमा––(कुछ सोच कर) मेरे पास आ तो बताऊँ।
मैं––मैं तेरे पास भी आ सकती हूँ मगर तू इतना समझ ले कि अब वह जहरीली अँगूठी तेरी उँगली में नहीं है।
इतना सुनते ही वह चौंक पड़ी। इसके बाद और भी खूब बातें उससे हुई जिससे निश्चय हो गया कि मेरी ही करनी से वह बेहोश हुई थी और अब मैं उसके फेर में नहीं पड़ सकती। मैं उसे निःसन्देह जान से मार डालती, मगर बरदेबू ने ऐसा करने से मुझे मना कर दिया था। वह कह चुका था कि मैं तुझे इस कैद से छुड़ा तो देता हूँ, मगर मनोरमा की जान पर किसी तरह की आफत नहीं ला सकता, क्योंकि उसका नमक खा चुका हूँ।"
यही सबब था कि उस समय मैंने उसे केवल बातों की ही धमकी देकर छोड़ दिया। बची हुई बेहोशी की दवा जबर्दस्ती उसे सुँघा कर बेहोश करने के बाद मैं कमरे के बाहर निकली और बाग में चली आई जहाँ प्रतिज्ञानुसार बरदेबू खड़ा मेरी राह देख रहा था। उसने मेरे लिए एक खंजर और ऐयारी का बटुआ भी तैयार कर रक्खा था जो मुझे देकर उसके अन्दर की सब चीजों के बारे में अच्छी तरह समझा दिया और इसके बाद जिधर मालियों के रहने का मकान था उधर ले गया। माली तो सब बेहोश थे ही अतः कमन्द के सहारे मुझे बाग की दीवार के बाहर कर दिया और फिर मुझे मालूम न हुआ कि बरदेवू ने क्या कार्रवाइयाँ की और उस पर तथा मनोरमा इत्यादि पर क्या बीती।
मनोरमा के घर से बाहर निकलते ही मैं सीधे जमानिया की तरफ भागी क्योंकि एक तो अपनी माँ को छुड़ाने की फिक्र लगी हुई थी, जिसके लिए बरदेबू ने कुछ रास्ता भी बता दिया था, मगर इसके अलावा मेरी किस्मत में भी यही लिखा था कि बनिस्बत घर जाने के जमानिया को जाना पसन्द करूँ और वहाँ अपनी माँ की तरह खुद भी फँस जाऊँ। अगर मैं घर जाकर अपने पिता से मिलती और यह सब हाल कहती तो दुश्मनों का सत्यानश भी होता और मेरी माँ भी छूट जाती मगर सो न तो मुझको सूझा और न हुआ। इस सम्बन्ध में उस समय मुझको घड़ी-घड़ी इस बात का भी खयाल होता था मनोरमा मेरा पीछा जरूर करेगी, अगर मैं घर की तरफ जाऊँगी तो निःसन्देह गिरफ्तार हो जाऊँगी।
खैर, मुख्तसिर यह है कि बरदेबू के बताए हुए रास्ते से ही मैं इस तिलिस्म के अन्दर आ पहुँची। आप तो यहाँ की सब बात का भेद जान ही गए होंगे इसलिए विस्तार के साथ कहने की कोई जरूरत नहीं, केवल इतना ही कहना काफी होगा कि गंगा-किनारे वाले स्मशान पर जो महादेव का लिंग एक चबूतरे से ऊपर है वही रास्ता आने के लिए बरदेबू ने मुझे बताया था।
इन्दिरा ने अपना हाल यहाँ तक बयान किया था कि कमलिनी ने रोका और कहा, "हाँ-हाँ, उस रास्ते का हाल मुझे मालूम है। (कुमार से) जिस रास्ते से मैं आप लोगों को निकाल कर तिलिस्म के बाहर ले गई थी, वही!"
इन्द्रजीतसिंह––ठीक है, (इन्दिरा से) अच्छा तब क्या हुआ?
इन्दिरा––मैं इस तिलिस्म के अन्दर आ पहुँची और घूमती-फिरती उसी कमरे में पहुँच गई जिसमें आपने उस दिन मुझे मेरे पिता और और राजा गोपालसिंह को देखा था, जिस दिन आप उस बाग में पहुँचे थे जिसमें मेरी माँ कैद थी।
इन्द्रजीतसिंह––अच्छा ठीक है, तो उसी खिड़की में से तूने भी अपनी माँ को देखा होगा?
इन्दिरा––जी हाँ, दूर ही से उसने मुझे देखा और मैंने उसे देखा, मगर उसके पास न पहुँच सकी। उस समय हम दोनों की क्या अवस्था हुई होगी, इसे आप स्वयं समझ सकते हैं, मुझमें कहने की सामर्थ्य नहीं है। (एक लम्बी साँस लेकर) कई दिनों तक व्यर्थ उद्योग करने पर जब मुझे यह निश्चय हो गया कि मैं किसी तरह उसके पास नहीं पहुँच सकती और न उसके छुड़ाने का कुछ बन्दोबस्त ही कर सकती हूँ तब मैंने चाहा कि अपने पिता को इन सब बातों की इत्तिला दूँ। मगर अफसोस, कि यह काम भी मेरे किए न हो सका। मैं किसी तरह इस तिलिस्म के बाहर न जा सकी और मुद्दत तक यहाँ रह कर ग्रहदशा के दिन काटती रही।
इन्द्रजीतसिंह––अच्छा, यह बता कि राजा गोपालसिंह वाली तिलिस्मी किताब तुझे क्योंकर मिली?
इन्दिर––यह हाल भी आपसे कहती हूँ।
इतना कहकर इन्दिरा थोड़ी देर के लिए चुप हो गयी और उसके बाद फिर अपना किस्सा शुरू करना ही चाहती थी कि कमरे का दरवाजा, जो कुछ घूमा हुआ था, यकायक जोर से खुला और राजा गोपालसिंह आते हुए दिखाई पड़े।
७
राजा गोपालसिंह को देखते ही सब कोई उठ खड़े हुए और बारी-बारी से सलाम की रस्म अदा की। इस समय भैरोंसिंह ने लक्ष्मीदेवी की आँखों से मिलती हुई राजा गोपालसिंह की उस मुहब्बत, मेहरबानी और हमदर्दी की निगाह पर गौर किया जिसे आज के थोड़े दिन पहले लक्ष्मीदेवी बेताबी के साथ ढूँढ़ती थी या जिसके न पाने से वह तथा उसकी बहिनें तरह-तरह का इलजाम गोपालसिंह पर लगाने का खयाल कर रही थीं।
सभी की इच्छानुसार राजा गोपालसिंह भी दोनों कुमारों के पास ही बैठ गए और सभी की कुशल-मंगल पूछने के बाद कुमार से बोले, "क्या आपको उस बड़े इजलास की फिक्र नहीं है जो चुनार में होने वाला है, और जिसमें भूतनाथ के दिलचस्प मुकदमे का फैसला किया आयेगा जिसमें उसका तथा और भी कई कैदियों के सम्बन्ध में एक से एक बढ़कर अनूठा हाल खुलेगा? साथ ही इसके मुझे यह भी सन्देह होता है कि आप उनकी तरफ से भी कुछ बेफिक्र हो रहे हैं जिनके लिए···
इन्द्रजीतसिंह––नहीं-नहीं, मैं न तो बेफिक्र हूँ, और न अपने काम में सुस्ती ही करना चाहता हूँ!
गोपालसिंह––क्या हम लोग नहीं जानते कि इधर के कई दिन आपने कस तरह व्यर्थ नष्ट किए हैं और इस समय भी किस बेफिक्री के साथ बैठे गप्पें उड़ा रहे हैं?
इन्द्रजीतसिंह––(कुछ कहते-कहते रुक कर) जी नहीं, इस समय तो हम लोग इन्दिरा का किस्सा सुन रहे थे।
गोपालसिंह––इन्दिरा कहीं भागी नहीं जाती थी, यहाँ नहीं तो चुनार में हर तरह से बेफिक्र होकर आप इसका किस्सा सुन सकते थे जहाँ और भी कई अनूठे किस्से आप सुनेंगे। खैर, बताइए कि आप इन्दिरा का किस्सा सुन चुके या नहीं?
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, और सब किस्सा तो सुन चुका, केवल इतना सुनना बाकी है कि आपकी वह तिलिस्मी किताब क्योंकर इसके हाथ लगी और यह उस पुतली की सूरत में क्यों वहाँ रहा करती थी।
गोपालसिंह––इतना किस्सा आप तिलिस्मी कार्रवाई से छुट्टी पाकर सुन लीजिएगा और अगर इस पर आपका ऐसा ही जी लगा हुआ है तो मैं मुख्तसिर में आपको समझाये देता हूँ क्योंकि मैं यह सब हाल इन्दिरा से सुन चुका हूँ। सचाई यह है कि मेरे यहाँ दो ऐयार हरनामसिंह और बिहारीसिंह रहते थे। वे रुपये की लालच में पड़ कर कम्बख्त मायारानी से मिल गए थे और मुझे कैदखाने में पहुँचाने के बाद वे लोग उसी की इच्छानुसार काम करते थे, मगर बुरी राह चलने वालों को या बुरों का संग करने वालों को जो कुछ फल मिला है वही उन्हें भी मिला, अर्थात् एक दिन मायारानी ने धोखा देकर उन्हें खास बाग के एक गुप्त कुएँ में ढकेल दिया जिसके बारे में वह केवल इतना ही जानती थी कि वह तिलिस्मी ढंग का कुआँ लोगों को मार डालने के लिए बना हुआ है, मगर वास्तव में ऐसा नहीं है। वह कुआँ उन लोगों के लिए बना है जिन्हें तिलिस्म में कैद करना मंजूर होता है। मायारानी को चाहे यह निश्चय हो गया कि दोनों ऐयार मर गए, लेकिन वास्तव में वे मरे नहीं बल्कि तिलिस्म में कैद हो गये थे। इस बात को मायारानी बहुत दिनों तक छिपाये रही लेकिन आखिर एक दिन उसने अपनी लौंडी लीला से कह दिया और लीला से यह बात हरनाम सिंह की लड़की ने सुन ली
जब आपने मुझे कैद से छुड़ाया और मैं खुल्लमखुल्ला पुनः जमानिया का राजा बना, तब हरनामसिंह की लड़की फरियाद करने के लिए मेरे पास पहुँची और मुझसे वह हाल कहा। मैंने जवाब में कहा कि वे दोनों ऐयार उस कुएँ में धकेल देने से मरे नहीं हैं बल्कि तिलिस्म में कैद हो गए हैं जिन्हें मैं छुड़ा तो सकता हूँ, मगर उन दोनों ने मेरे साथ दगा की है इसलिए छुड़ाने योग्य नहीं हैं और न मैं उन्हें छुड़ाऊँगा ही। इतना सुन वह चली गई मगर छिपे-छिपे उसने ऐसा भेद लगाया और चालाकी की जिसे सुनेंगे तो दंग हो जायेंगे। मुख्तसिर यह कि अपने बाप को कैद से छुड़ाने की नीयत से उस लड़की ने मेरी तिलिस्मी किताब चुराई और उसकी मदद से तिलिस्म के अन्दर पहुँची, मगर उस किताब का मतलब ठीक-ठीक न समझने के सबब वह न तो अपने बाप को छुड़ा सकी और न खुद ही तिलिस्म के बाहर निकल सकी। हाँ, उसी जगह अकस्मात् इन्दिरा से उसकी मुलाकात हो गई। इन्दिरा को भी अपनी तरह दुःखी जान कर उसने सब हाल इससे कहा और इन्दिरा ने चालाकी से वह किताब अपने कब्जे में कर ली तथा उससे बहुत-कुछ फायदा भी उठाया। तिलिस्म में आने-जाने वालों से अपने को बचाने के लिए इन्दिरा उस पुतली की सूरत बनकर रहने लगी, क्योंकि उसी ढंग के कपड़े इन्दिरा को उस पुतली वाले घर से मिल गए थे। जब मैंने इन्दिरा से यह हाल सुना तो बिहारीसिंह और हरनामसिंह तथा उसकी लड़की को बाहर निकाला। वे सब भी चुनारगढ़ पहुँचाए जा चुके हैं। अब जब आप चुनारगढ़ पहुंचेंगे तो औरों के साथ-साथ उन लोगों का भी तमाशा देखेंगे, तथा···
लक्ष्मीदेवी––(गोपालसिंह से) मगर आप इन बातों को इतनी जल्दी-जल्दी और संक्षेप में कहकर कुमारों को भगाना क्यों चाहते हैं? इन्हें यहाँ अगर एक दिन और देर ही हो जायगी तो क्या हर्ज है?
कमलिनी––मेहमानदारी के खयाल से जल्द छूटना चाहते हैं!
गोपालसिंह––औरतों का काम तो आवाज कसने का ही है, मगर मैं किसी और ही सबब से जल्दी मचा रहा हूँ। महाराज (वीरेन्द्रसिंह) के पत्र बराबर आ रहे हैं कि दोनों कुमारों को शीघ्र भेज दो, इसके अतिरिक्त वहाँ कैदियों का जमाव हो रहा है और नित्य एक नया रंग खिलता है। वहां जितनी आफतें थीं वह सब जाती हीं···
लक्ष्मीदेवी––(बात काट कर) तो कुमार को और हम लोगों को आप तिलिस्म के बाहर क्यों नहीं ले चलते? वहां से कुमार बहुत जल्दी चुनार पहुँच सकते हैं।
गोपालसिंह––(कुमार से) आप इस समय मेरे साथ तिलिस्म के बाहर जा सकते हैं मगर ऐसा होना न चाहिए। आप लोगों के हाथ से जो कुछ तिलिस्म टूटने वाला है उसे तोड़कर फिर इस तिलिस्म के अन्दर ही अन्दर से चुनार पहुँचना उचित होगा। जब आपकी शादी हो जाएगी तब मैं आपको यहाँ लाकर अच्छी तरह इस तिलिस्म की सैर कराऊँगा। इस समय मैं (किशोरी, कामिनी, इन्दिरा वगैरह की तरफ बता कर) इन सभी को लेकर खास बाग में जाता हूँ क्योंकि अब वहाँ सब तरह से शान्ति हो चुकी है और किसी तरह का अन्देशा नहीं वहाँ आठ-दस दिन रहकर फिर सभी को साथ ले मैं चुनार चला जाऊंगा और तब उसी जगह आपसे हम लोगों की मुलाकात होगी।
इन्द्रजीतसिंह––जो कुछ आप कहते हैं वही होगा, मगर यहाँ की अद्भुत बातें देखकर मेरे दिल में कई तरह का खुटका बना है...
गोपालसिंह––वह सब चुनार में निकल जायगा, यहाँ मैं आपको कुछ न बताऊँगा। देखिए, अब रात बीतना चाहती है, सवेरा होने के पहले ही आपको अपने काम में हाथ लगा देना चाहिए।
लक्ष्मीदेवी––(हँस कर) आप क्या आये, मानो भूचाल आ गया! अच्छी जल्दी मचाई, बात तक नहीं करने देते! (कुमार से) जरा इन्हें अच्छी तरह जाँच तो लीजिए, कहीं कोई ऐयार रूप बदलकर न आया हो।
गोपालसिंह––(इन्द्रजीतसिंह के कान में कुछ कहकर) बस, अब आप विलम्ब न कीजिए।
इन्द्रजीतसिंह––(उठकर) अच्छा, तो फिर मैं प्रणाम करता हूँ और भैरोंसिंह को भी आपके ही सुपुर्द किये जाता हूँ। (लक्ष्मीदेवी से) आप किसी तरह की चिन्ता न करें, ये (गोपालसिंह) वास्तव में हमारे भाई साहब ही हैं, अतः अब चुनार में पुनः मुलाकात की उम्मीद करता हुआ मैं आप लोगों से बिदा होता हूँ।
इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने मुस्कुराते हुए सभी की तरफ देखा और आनन्दसिंह ने भी बड़े भाई का अनुसरण किया। राजा गोपालसिंह दोनों कुमारों को लिए कमरे के बाहर चले गये और कुछ देर तक बातचीत करने तथा समझा कर बिदा करने के बाद पुनः कमरे में चले आये।
८
यद्यपि चुनारगढ़ वाले तिलिस्मी खँडहर की अवस्था ही जीतसिंह ने बदल दी और अब वह आला दर्जे की इमारत बन गई है मगर उसके चारों तरफ दूर-दूर तक जो जंगलों की शोभा थी उसमें किसी तरह की कमी उन्होंने न होने दी।
सुबह का सुहावना समय है और राजा सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह तथा तेजसिंह वगैरह धुर ऊपर वाले कमरे में बैठे जंगल की शोभा देखने के साथ-ही-साथ आपस में धीरे-धीरे बात भी करते जाते हैं। जंगलीं पेड़ों के पत्तों से छनी और फूलों की महक से सुगन्धित हुई दक्षिणी हवा के झपेटे आ रहे हैं और रात-भर की चुप बैठी हुई तरह-तरह की चिड़ियाएँ सवेरा होने की खुशी में अपनी सुरीली आवाजों से लोगों का जी लुभा रही हैं। स्याह-तीतर अपनी मस्त और बँधी हुई आवाज़ से हिन्दू-मुसलमान कुँजड़ों और कस्साबों में झगड़ा पैदा कर रहे हैं। मुसलमान कहते हैं कि तीतर साफ आवाज में यही कह रहा है कि 'सुब्हान तेरी कुदरत' मगर हिन्दू इस बात को स्वीकार नहीं करते और कहते हैं कि यह स्याह तीतर 'राम लक्ष्मण दशरथ' कहकर अपनी भक्ति का परिचय दे रहा है। कुँजड़े इसे भी नहीं मानते और उसकी बोली का मतलब 'मूली, प्याज अदरक' समझकर अपना दिल खुश कर रहे हैं, परन्तु कस्साबों को सिवाय इसके और कुछ नहीं सूझता कि यह तीतर 'कर जबह और ढक रख' का उपदेश दे रहा है।
इसी समय देवीसिंह भी वहाँ आ पहुँचे और भूतनाथ और बलभद्रसिंह के हाजिर होने की इत्तिला दी। इच्छानुसार दोनों ने सामने आकर सलाम किया और फर्श पर बैठने के बाद इशारा पाकर भूतनाथ ने तेजसिंह से कहा––
भूतनाथ––(बलभद्रसिंह की तरफ इशारा करके) इनका हाल सुनने के लिए जी बेचैन हो रहा है, मैं इनसे कई दफे चुका हूँ मगर ये कुछ कहते नहीं।
तेजसिंह––(बलभद्रसिंह से) अब तो आपकी तबीयत ठिकाने हो गई होगी?
बलभद्रसिंह––जी हाँ, अब मैं बहुत अच्छा हूँ और अपना हाल कहने के लिए तैयार हूँ।
तेजसिंह––अच्छी बात है, हम लोग भी सुनने के लिए तैयार हैं और आप ही का इन्तजार कर रहे थे।
सभी का ध्यान बलभद्रसिंह की तरफ खिच गया और बलभद्रसिंह ने अपने गायब होने का हाल इस तरह कहना शुरू किया––
"इस बात की तो मुझे कुछ भी खबर नहीं कि मुझे कौन ले गया और क्यों कर ले गया। उस दिन मैं भूतनाथ के पास ही एक चारपाई पर सो रहा था और जब मेरी आँख खुली तो मैंने अपने को एक हरे-भरे और खूबसूरत बाग में पाया। उस समय मैं बिल्कुल मजबूर था अर्थात् मेरे हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी पड़ी हुई थी और एक औरत नंगी तलवार लिए मेरे सामने खड़ी थी। मैंने सोचा कि अब मेरी जान नहीं बचती और मेरे भाग्य में कैदी बनकर जान देना ही बदा है। बहुत-सी बातें सोच-विचार के मैंने उस औरत से पूछा कि 'तू कौन है और मैं यहाँ क्योंकर पहुँचा हूँ?" जिसके जवाब में उस औरत ने कहा कि 'तुझे मैं यहाँ ले आई हूँ और इस समय तू मेरा कैदी है। मैं जिस मुसीबत में फँसी हुई हूँ उससे छुटकारा पाने के लिए इसके सिवाय और कोई तरकीब न सूझी कि तुझे अपने कब्जे में करके अपने छुटकारे की सूरत निकालूँ, क्योंकि मेरा दुश्मन तेरे ही कब्जे में है। अगर तू उसे समझा-बुझाकर राह पर ले आवेगा तो मेरे साथ-साथ तेरी जान भी बच जायगी।'
उस औरत की बातें सुनकर मुझे बड़ा ही ताज्जुब हुआ और मैंने उससे पूछा, "वह कौन है जो तेरा दुश्मन है और है और मेरे कब्जे में है?"
औरत––तेरी बेटी कमलिनी मेरे साथ दुश्मनी कर रही है।
मैं––क्यों?
औरत––उसकी खुशी, मैंने तो उसका कुछ नुकसान नहीं किया।
मैं––आखिर दुश्मनी का कोई सबब भी तो होगा?
औरत––अगर कोई सबब है तो केवल इतना ही कि वह भूतनाथ का पक्ष करती है और मुझे भूतनाथ का दुश्मन समझती है। मगर मैं कसम खाकर कहती हूँ कि मुझे भूतनाथ से जरा भी रंज नहीं है बल्कि मैं भूतनाथ को अपना मददगार और भाई समझती हूँ। और मुझे भूतनाथ से किसी तरह का रंज होता तो मैं तुझे गिरफ्तार करके न लाती बल्कि भूतनाथ ही को ले आती, क्योंकि जिस तरह मैं तुझे उठा लाई हूँ उसी तरह भूतनाथ को भी उठा ला सकता थी। खैर, अब मैं चाहती हूँ कि तू एक चिट्ठी कमलिनी के नाम की लिख दे कि वह मेरे साथ दुश्मनी का बर्ताव न करे। अगर तू अपनी कसम दे के यह बात कमलिनी को लिख देगा तो वह जरूर मान जायगी।
मैंने कई तरह से, उलट-फेर के, कई तरह की बातें उस औरत पूछी मगर साफ-साफ न मालूम हुआ कि कमलिनी उसके साथ दुश्मनी क्यों करती है। इसके अतिरिक्त मुझे इस बात का भी निश्चय हो गया कि जब तक मैं कमलिनी के नाम की चिट्ठी न लिख दूँगा तब तक मेरी जान को छुट्टी न मिलेगी। चिट्ठी लिखने से इनकार करने के कारण कई दिनों तक मैं उसका कैदी बना रहा, आखिर लाचार हो मैंने उसकी इच्छानुसार पत्र लिख दिया, तब उसने बेहोशी की दवा सुँघाकर मुझे बेहोश किया और उसके बाद जब मेरी आँख खुली तो मैंने अपने को आपके सामने पाया।
भूतनाथ––आपको यह नहीं मालूम हुआ कि उस औरत का नाम क्या था?
बलभद्रसिंह––मैंने कई दफे नाम पूछा मगर उसने न बताया।
मालूम होता है कि बलभद्रसिंह ने अपना जो कुछ बयान किया उस पर हमारे राजा साहब या ऐयारों को विश्वास न हुआ मगर उसकी खातिर से तेजसिंह ने कह दिया कि "ठीक है, ऐसा ही होगा।"
बलभद्रसिंह और भूतनाथ को राजा साहब बिदा किया ही चाहते थे कि उसी समय इन्द्रदेव के आने की इत्तिला मिली। आज्ञानुसार इन्द्रदेव हाजिर हुए और सभी को सलाम करने के बाद इशारा पाकर तेजसिंह की बगल में बैठ गए।
इन्द्रदेव के आने से हमारे राजा साहब और ऐयारों को खुशी हुई और इसीलिए पन्नालाल, रामनारायण और पं॰ बद्रीनाथ वगैरह हमारे बाकी के ऐयार लोग भी जो इस समय यहाँ हाजिर और इस इमारत के बाहरी तरफ टिके हुए थे, इन्द्रदेव के साथ-ही-साथ राजा साहब के पास आ पहुँचे क्योंकि इन्द्रदेव, बलभद्रसिंह और भूतनाथ का अनूठा हाल जानने के लिए सभी बेचैन हो रहे थे और खास करके भूतनाथ के मुकदमे से तो सभी को दिलचस्पी थी। इसके अतिरितत इन्द्रदेव अपने साथ दो कैदी अर्थात् नकली बलभद्रसिंह और नागर को भी लाए थे और बोले थे कि "काशिराज के भेजे हुए और भी कई कैदी थोड़ी देर में हाजिर होना चाहते हैं" जिस कारण हमारे ऐयारों की दिलचस्पी और भी बढ़ रही थी।
सुरेन्द्रसिंह––तुम्हारे आने से हम लोगों को बड़ी प्रसन्नता हुई। इन्द्रजीत और गोपालसिंह तुम्हारी बड़ी प्रशंसा करते हैं और वास्तव में तुमने जो कुछ किया है, वह प्रशंसा के योग्य भी है।
इन्द्रदेव––(हाथ जोड़कर) मैं तो किसी योग्य भी नहीं हूँ और न कोई काम हीं मेरे हाथ में ऐसा निकला जिससे महाराज के गुलाम के बराबर भी अपने को समझने की प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकूँ––हाँ दुर्दैव ने जो कुछ मेरे साथ बर्ताव किया उसके सबब से मुझ अभागे को जो कष्ट भोगने, पड़े उन्हें सुनकर दयालु महाराज को मुझ पर दया आवश्य आई होगी।
सुरेन्द्रसिंह––हम लोग ईश्वर को धन्यवाद देते हैं जिसकी कृपा से एक विचित्र और अनूठी घटना के साथ तुम्हारी स्त्री और लड़की का पता लग गया और तुमने उन दोनों को जीती-जागती देखा।
इन्द्रदेव––यह सब-कुछ आपके और कुमारों के चरणों की बदौलत हुआ। वास्तव में तो मैं भाड़े की जिन्दगी बिताता हुआ दुनिया से विरक्त ही हो चुका था। अब भी वे दोनों आप लोगों के चरणों की धूल आँखों में लगा लेंगी, तभी मेरी प्रसन्नता का कारण होंगी। आशा है कि आज ही या कल तक राजा गोपाल सिंह भी उन दोनों तथा किशोरी, कामिनी लक्ष्मीदेवी, कमलिनी, लाड़िली और कमला इत्यादि को लेकर यहाँ आवें और महाराज के चरणों का दर्शन करेंगे।
सुरेन्द्रसिंह––(आश्चर्य और प्रसन्नता के साथ) हाँ! क्या गोपाल ने तुम्हें कुछ लिखा है?
इन्द्रदेव––जी हाँ, उन्होंने मुझे लिखा है कि "मैं शीघ्र ही उन सभी को लेकर महाराज की सेवा में उपस्थित होना चाहता हूँ, तुम भी अपने दोनों कैदी नकली बलभद्रसिंह और नागर को लेकर काशिराज से मिलते हुए चुनार जाओ और काशिराज ने हम पर कृपा करके हमारे जिन दुश्मनों को कैद कर रक्खा है अर्थात् बेगम, जमालो और नौरतन वगैरह को भी अपने साथ लेते जाओ। अतः इस समय उन्हीं के लिखे अनुसार मैं सेवा में उपस्थित हुआ हूँ!
सुरेन्द्रसिंह––(उत्कण्ठा के साथ) तो क्या तुम उन लोगों को भी अपने साथ लेते आए हो?
इन्द्रदेव––जी हाँ और उन सभी को बाहर सरकारी सिपाहियों की सुपुर्दगी में छोड़ आया हूँ। बेगम वगैरह का हाल तो काशिराज ने महाराज को लिखा होगा!
सुरेन्द्रसिंह––हाँ, काशिराज ने गोपालसिंह को यह लिखा था कि "तुम्हारे ऐयार भूतनाथ के निशान देने के मुताबिक बलभद्रसिंह के दुश्मन गिरफ्तार कर लिए गए हैं और मनोरमा का मकान भी जब्त कर लिया गया है।" गोपालसिंह ने यह समाचार मुझको लिखा था। इन्द्रदेव ठीक है तो अब उन कैदियों के लिए भी उचित प्रबन्ध कर देना चाहिए जिन्हें मैं अपने साथ लाया हूँ।
सुरेन्द्रसिंह––उसका प्रबन्ध बद्रीनाथ कर चुके होंगे क्योंकि कैदियों का इन्तजाम उन्हीं के सुपुर्द है।
बद्रीनाथ––(इन्द्रदेव से) उनके लिए आप तरद्दुद न करें क्योंकि वे लोग अपने उचित स्थान पर पहुँचा दिए गए।
पन्नालाल––(सुरेन्द्र से भूतनाथ और बलभद्रसिंह की तरफ बताकर) मगर इन दोनों महाशयों में से जिनकी खातिरदारी मेरे सुपुर्द की गई, यह बलभद्रसिंह जी कहते हैं कि मैं महाराज का अन्न न खाऊँगा बल्कि अपने आराम की कोई चीज भी यहाँ से न लूँगा क्योंकि अब यह बात मालूम हो चुकी है कि राजा गोपालसिंह महाराज के पोते हैं और...
सुरेन्द्रसिंह––ठीक है, ठीक है, वास्तव में ऐसा ही होना चाहिए। (बलभद्रसिंह से) मगर आप बहुत ही मुसीबत और कैद से छूटकर आए हैं इसलिए आपके पास रुपये पैसे की जरूर कमी होगी, फिर आप क्योंकर अपने लिए हर तरह का सामान जुटा सकेंगे?
बलभद्रसिंह––मैं भी इसी फिक्र में डूबा हुआ था मगर ईश्वर ने बड़ी कृपा की जो मेरे प्यारे मित्र इन्द्रदेव को यहाँ भेज दिया। अब मुझे किसी तरह की तकलीफ न होगी, जो कुछ जरूरत पड़ेगी मैं इनसे ले लूँगा। फिर इसके बाद मुझे यह भी आशा है कि दुष्टों का मुकदमा हो जाने पर बेगम के कब्जे से निकली हुई मेरी दौलत भी मुझे मिल जायगी।
इन्द्रदेव––(हाथ जोड़कर महाराज सुरेन्द्रसिंह से) मेरे मित्र बलभद्रसिंह जो कुछ कह रहे हैं ठीक है और आशा है कि महाराज भी इस बात को स्वीकार कर लेंगे।
सुरेन्द्रसिंह––(पन्नालाल से) खैर ऐसा ही किया जाय, इन्द्रदेव का डेरा बलभद्रसिंह के साथ ही करा दो जिसमें ये दोनों मित्र प्रसन्नता से आपस में बातें करते रहें।
इन्द्रदेव––(हाथ जोड़कर) मैं भी यही अर्ज किया चाहता था। आज न मालूम किस तरह, कितने दिनों के बाद मुझे ईश्वर ने मित्र-दर्शन का सुख दिया है, सो भी ऐसे मित्र का दर्शन जिसके मिलने की आशा कर ही नहीं सकते थे और इसके लिए हम लोग भूतनाथ के बड़े ही कृतज्ञ हैं।
भूतनाथ––यह सब महाराज के चरणों का प्रताप है जिनके सदैव दर्शन के लोभ से महाराज का कुछ न बिगाड़ने पर भी मैं अपने को दोषी बनाए और भगवती की कृपा पर भरोसा किए बैठा हुआ हूँ।
इन्द्रदेव––(महाराज की तरफ देख के) वास्तव में ऐसा ही है। अभी तक जो कुछ मालूम हुआ है उससे तो यही जाना जाता है कि भूतनाथ ने महाराज के यहाँ एक दफे चोरी करने के अतिरिक्त और कोई काम ऐसा नहीं किया जिससे महाराज या महाराज के सम्बन्धियों को दुःख हो––
भूतनाथ––(लज्जा से नीची गर्दन करके) और सो भी बदनीयती के साथ नहीं!
इन्द्रदेव––आगे चलकर और कोई बात जानी जाय तो मैं नहीं कह सकता, मगर––
भूतनाथ––ईश्वर न करे, ऐसा हो।
वीरेन्द्रसिंह––भूतनाथ ने अगर हम लोगों का कोई कसूर किया भी हो तो अब हम लोग उस पर ध्यान नहीं दे सकते, क्योंकि रोहतासगढ़ के तहखाने में मैं भूतनाथ का कसूर माफ कर चुका हूँ।
भूतनाथ––ईश्वर आपका सहायक रहे!
इन्द्रदेव––लेकिन अगर भूतनाथ ने किसी ऐसे के साथ बुरा बर्ताव किया हो जिससे आज के पहले महाराज का कोई सम्बन्ध न था तो उस पर भी महाराज को विशेष ध्यान न देना चाहिए। तेजसिंह जी हाँ, मगर इसमें कोई शक नहीं कि भूतनाथ की रहस्यमय जीवनी अनेक अद्भुत अनूठी और दुःखद घटनाओं से भरी हुई है। मैं समझता हूँ कि भूतनाथ ने लोगों के दिल पर अपना भयानक प्रभाव तो पैदा किया, परन्तु अपने कामों की बदौलत अपने को सुखी न बना सका, उलटा इसने जमाने को दिखा दिया कि प्रतिष्ठा और सभ्यता का पल्ला छोड़कर केवल लक्ष्मी काक्षकृपा-पात्र बनने के लिए उद्योग और उत्साह दिखाने वाले का परिणाम कैसा होता है।
इन्द्रदेव––निःसन्देह ऐसा ही है। अगर भूतनाथ उसके साथ-ही-साथ प्रतिष्ठा का पल्ला भी मजबूती के साथ पकड़े होता और इस बात पर ध्यान रखता कि जो कुछ करे वह इसकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध न होने पावे तो आज दुनिया में भूतनाथ तीसरे दर्जे का ऐयार कहा जाता।
जीतसिंह––(मुस्कुराकर) मगर सुना जाता है कि अब भूतनाथ इज्जत और हुर्मत की मीनार पर चढ़कर दुनिया की सैर किया चाहता है और यह बात देवताओं को भी वश में कर लेने वाले मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर नहीं।
इन्द्रदेव––अगर सिफारिश न समझी जाय तो मैं यह कहने का हौसला कर सकता हूँ कि दुनिया में इज्जत और हुर्मत उसी को मिल सकती है, जो इज्जत और हुर्मत का उचित बर्ताव करता हुआ किसी बड़े इज्जत और हुर्मत वाले का कृपापात्र बने।
देवीसिंह––भूतनाथ का खयाल भी आजकल इन्हीं बातों पर है। मैंने बहुत दिनों तक छिपे-छिपे भूतनाथ का पीछा करके जान लिया है कि भूतनाथ को होशियारी, चालाकी और ऐयारी की विद्या के साथ-ही-साथ दौलत की भी कमी नहीं है। अगर यह चाहे तो बेफिक्री के साथ अमीराना ढंग पर अपनी जिन्दगी बिता सकता है, मगर भूतनाथ इसे पसन्द नहीं करता और खूब समझता है कि वह सच्चा सुख जो प्रतिष्ठा, सभ्यता और सज्जनता के साथ सज्जन और मित्र-मण्डली में बैठ कर हँसने-बोलने से प्राप्त होता है और ही कोई वस्तु है और उसके बिना मनुष्य का जीवन वृथा है।
बलभद्रसिंह––बेशक, यही सबब है कि आजकल भूतनाथ अपना समय ऐसे ही कामों और विचारों में बिता रहा है और चाहता है कि आईने में अपना चेहरा बेदाग उसी तरह देख सके जिस तरह हीरा निर्मल जल में, मगर इसके लिए भूतनाथ को अपने पुराने मालिक से भी मदद लेनी चाहिए।
इन्द्रदेव––(कुछ चौंक कर) हाँ, मैं यह निवेदन करना तो भूल ही गया कि आज ही कल में यहाँ रणधीरसिंह भी आने वाले हैं, अस्तु, उनके लिए महाराज को प्रबन्ध कर देना चाहिए।
यह एक ऐसी बात थी जिसने भूतनाथ को चौंका दिया और वह थोड़ी देर के लिए किसी गम्भीर चिन्ता में निमग्न हो गया, मगर उद्योग करके उसने शीघ्र ही अपने दिल को सम्हाला और कहा––
भूतनाथ––क्योंकि वे महाराज के मेहमान बनकर इस मकान में रहना कदाचित कार न करेंगे।
जीतसिंह––ठीक है, तो उनके लिए दूसरा प्रबन्ध किया किया जायगा।
इन्द्रजीतसिंह––उनका आदमी उनके लिए खेमा वगैरह सामान लेकर आता ही होगा।
जीतसिंह––(इन्द्रदेव से) हमारे पास कोई इत्तिला तो नहीं आई!
इन्द्रदेव––जी, यह काम भी मेरे ही सुपुर्द किया गया था।
जीतसिंह––तो क्या तुम्हारे पास उनका कोई आदमी या पत्र आया था?
इन्द्रजीतसिंह––जी नहीं, वे स्वयं राजा गोपालसिंह के पास यह सुनकर गये थे कि माधवी उन्हीं के यहाँ कैद है, क्योंकि उन्होंने अपने हाथ से माधवी को मार डालने का प्रण किया था...
सुरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब से) तो क्या उन्होंने माधवी को अपने हाथों से मारा?
इन्द्रजीतसिंह––जी नहीं, अपने खानदान की एक लड़की को मार कर हाथ रंगने की बनिस्बत उन्होंने प्रतिज्ञा भंग करना उत्तम समझा, उस समय मैं भी वहाँ था।
भूतनाथ––(सुरेन्द्रसिंह से हाथ जोड़कर) यदि मुझे आज्ञा हो तो खेमा वगैरह खड़ा करने का इन्तजाम मैं करूँ और समय पर अगवानी के लिए कुछ दूर जाकर अपना कलंकित मुख उनको दिखाऊँ! यद्यपि मैं इस योग्य नहीं हूँ और न वे मेरी सूरत देखना पसन्द ही करेंगे। मगर उनके नमक से पला हुआ यह शरीर उनसे दुरदुराया जाकर भी अपनी प्रतिष्ठा ही समझेगा।
सुरेन्द्रसिंह––ठीक है, मगर उनकी इच्छा के विरुद्ध ऐसा करने की आज्ञा हम नहीं दे सकते। हाँ, यदि तुम अपनी इच्छा से ऐसा करो तो हम रोकना भी उचित नहीं समझेंगे।
ये बातें हो ही रही थी कि जमानिया से राजा गोपालसिंह के कूच करने की इत्तिला मिली, इस तौर पर कि––"किशोरी, कामिनी और लक्ष्मीदेवी वगैरह को लिए राजा गोपालसिंह चले आ रहे हैं।"
९
चुनारगढ़ वाली तिलिस्मी इमारत के चारों तरफ छोटे-बड़े सैकड़ों खेमों, डेरों रावटियों और शामियानों की बहार दिखाई दे रही है, जिनमें से बहुतों में लोगों के डेरे पड़ चुके हैं और बहुत अभी तक खाली पड़े हैं। मगर वे भी धीरे-धीरे भर रहे हैं। किशोरी के नाना रणधीरसिंह और किशोरी, कामिनी वगैरह को लिए हुए राजा गोपालसिंह भी आ गए हैं और इन लोगों के साथ कुछ फौजी सिपाही भी आ पहुँचे हैं जो कायदे के साथ रावटियों में डेरा डाले हुए हैं। किशोरी इत्यादि महल में पहुँचा दी गई हैं जिसके सबब से अन्दर तरह-तरह की खुशियाँ मनाई जा रही हैं। राजा गोपालसिंह का डेरा भी तिलिस्मी इमारत के अन्दर ही पड़ा है। राजा वीरेन्द्रसिंह ने उनके लिए अपने कमरे के पास ही एक सुन्दर और सजा हुआ कमरा मुकर्रर कर दिया है, और उनके (गोपालसिंह के) साथी लोग इमारत के बाहर वाले खेमों में उतरे हुए हैं। इसी तरह रणधीरसिंह का भी डेरा इमारत के बाहर उन्हीं के भेजे हुए खेमे में पड़ा है और वे यहाँ पहुँच कर राजा सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह तथा और लोगों से मुलाकात करने के बाद किशोरी और कमला से मिल कर खुश हो चुके हैं और साथ ही इसके भूतनाथ की नजर भी कबूल कर चुके हैं जिसकी उम्मीद भूतनाथ को कुछ भी न थी।
इसी तरह राजा वीरेन्द्रसिंह के बचे हुए ऐयार लोग भी जो यहाँ मौजूद न थे, अब आ गए हैं। यहाँ तक कि रोहतासगढ़ से ज्योतिषीजी का डेरा भी आ गया है और वे भी तिलिस्मी इमारत के बाहर एक खेमे में टिके हुए हैं।
इनके अतिरिक्त कई बड़े-बड़े, रईस जमींदार और महाजन लोग भी गया, रोहतासगढ़, जमानिया और चुनार वगैरह से राजा वीरेन्द्रसिंह को नजर और मुबारकबाद देने की नीयत से आये हुए हैं, जिनके सबब से यहाँ खूब अमन-चमन हो रहा है और सभी को यह भी विश्वास है कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी तिलिस्म फतह करते हुए शीघ्र आना चाहते हैं और उनके आने के साथ ही ब्याह-शादी के जलसे शुरू हो जायेंगे। साथ ही इसके भूतनाथ वगैरह के मुकदमे से भी सभी को दिलचस्पी हो रही है, यहाँ तक कि बहुत से लोग तो केवल इसी कैफियत को देखने-सुनने की नीयत से आए हुए हैं।
तिलिस्मी इमारत के बाहर एक छोटा-सा बाजार लग गया है जिसमें जरूरी चीजें तथा खाने का कच्चा गल्ला तथा सब तरह का सामान मेहमानों के लिए मौजूद है और राजा साहब की आज्ञा है कि जिसको जिस चीज की जरूरत हो दी जाय और उसकी कीमत किसी से भी न ली जाय। इस काम की निगरानी के लिए कई नेक और ईमानदार मुंशी मुकर्रर हैं जो अपना काम बड़ा खूबी और नेकनीयती के साथ कर रहे हैं। यह बात तो हुई है, मगर लोगों को आश्चर्य के साथ उस समय और भी आनन्द मिलता है जब एक बहुत बड़े खेमे या पण्डाल के अन्दर कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की शादी का सामान इकट्ठा होते देखते हैं।
कैदियों को किसी खेमे में जगह नहीं मिली है। बल्कि वे सब तिलिस्मी इमारत के अन्दर एक ऐसे स्थान में रखे गये हैं जो उन्हीं के योग्य है, मगर भूतनाथ बिल्कुल आजाद है और आश्चर्य के साथ लोगों की उँगलियाँ उठवाता हुआ इस समय चारों तरफ घूम रहा है और मेहमानों की खातिरदारी का खयाल भी करता रहता है।
राजा साहब की आज्ञानुसार तिलिस्मी इमारत के अन्दर पहले खण्ड में एक बहुत बड़ा दालान उस आलीशान दरबार के लिए सजाया जा रहा है जिसमें पहले तो भूतनाथ तथा अन्य कैदियों का मुकदमा फैसल किया जाएगा और बाद में दोनों कुमारों के ब्याह की महफिल का आनन्द लोगों को मिलेगा और इसे लोग 'दरबारे-आम' के नाम से सम्बोधन करते हैं। इसके अतिरिक्त 'दरबारे-खास' के नाम से दूसरी मंजिल पर एक और कमरा सजा कर तैयार हुआ है। उसमें नित्य पहर दिन चढ़े तक दरबार हुआ करेगा और उसमें खास-खास तथा ऐयारी पेशे वाले लोग बैठ कर जरूरी कामों पर विचार किया करेंगे। इस समय हम अपने पाठकों को भी इसी दरबारे-खास में ले चल कर बैठाते हैं।
एक ऊँची गद्दी पर महाराज सुरेन्द्रसिंह और उनके बाईं तरफ वीरेन्द्रसिंह बैठे हुए हैं। सुरेन्द्रसिंह के दाहिने तरफ जीतसिंह और वीरेन्द्रसिंह के बाईं तरफ तेजसिंह बैठे हैं और उनके बगल में क्रमशः देवीसिंह, पण्डित बद्रीनाथ, रामनारायण, जगन्नाथ ज्योतिषीजी, पन्नालाल और भूतनाथ वगैरह बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं और भूतनाथ के बगल में चुन्नीलाल हाथ में नंगी तलवार लिए खड़ा है। उधर जीतसिंह के बगल में राजा गोपालसिंह और फिर क्रमशः बलभद्र सिंह, इन्द्रदेव, भैरोंसिंह वगैरह बैठे हैं और उनके बगल में नाहरसिंह नंगी तलवार लिए खड़ा है और इस बात पर विचार हो रहा है कि कि कैदियों का मुकदमा कब से शुरू किया जाय तथा उस सम्बन्ध में किन-किन बातों या चीजों की जरूरत है।
इसी समय चोबदार ने आकर अदब से अर्ज किया––"महल के दरबाजे पर एक नकाबपोश हाजिर हुआ है। उसने पूछने पर भी अपना परिचय नहीं दिया परन्तु दरबार में हाजिर होने की आज्ञा माँगता है।"
इस खबर को सुन कर तेजसिंह ने राजा साहब की तरफ देखा और इशारा पाकर उस सवार को हाजिर करने के लिए चोबदार को हुक्म दिया।
वह नौजवान नकाबपोश सवार जो सिपाहियाना ठाठ के बेशकीमत कपड़ों से अपने को सजाए हुए था, हाजिर होने की आज्ञा पाकर घोड़े से उतर पड़ा। अपना नेजा जमीन में गाड़ कर उसी के सहारे घोड़े की लगाम अटका कर वह इमारत के अन्दर गया और चोबदार के साथ घूमता-फिरता दरबारे-खास में हाजिर हुआ। महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह और तेजसिंह को अदब से सलाम करने के बाद उसने अपना दाहिना हाथ जिसमें एक चिट्ठी थी दरबार की तरफ बढ़ाया और देवीसिंह ने उसके हाथ से पत्र लेकर तेजसिंह के हाथ में दे दिया। तेजसिंह ने राजा सुरेन्द्रसिंह को दिया, उन्होंने उसे पढ़ कर जीतसिंह के हवाले किया और इसके बाद वीरेन्द्र सिंह और तेनसिंह ने भी वह पत्र पढ़ा।
जीतसिंह––(नकाबपोश से) इस पत्र के पढ़ने से जाना जाता है कि खुलासा हाल तुम्हारी जुबानी मालूम होगा!
नकाबपोश––(हाथ जोड़ कर) जी हाँ। मेरे मालिकों ने यह अर्ज करने के लिए मुझे यहाँ भेजा है कि "हम दोनों भूतनाथ तथा और कैदियों का मुकदमा सुनने के समय उपस्थित रहने की इच्छा रखते हैं और आशा करते हैं कि इसके लिए महाराज प्रसन्नता के साथ हम लोगों को आज्ञा देंगे। हम लोग यह प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि हम लोगों के हाजिर होने का नतीजा देखकर महाराज प्रसन्न होंगे।
जीतसिंह––मगर पहले यह तो बताओ कि तुम्हारे मालिक कौन हैं, और कहाँ रहते हैं?
नकाबपोश––इसके लिए आप क्षमा करें, क्योंकि हमारे मालिक लोग अभी अपने को प्रकट नहीं करना चाहते और इसलिए जब यहाँ उपस्थित होंगे तो अपने चेहरे पर नकाब डाले होंगे। हाँ, मुकदमा खत्म हो जाने के बाद वे अपने को प्रसन्नता के साथ प्रकट कर देंगे। आप देखेंगे कि उनकी मौजूदगी में मुकदमा सुनने के समय कैसे-कैसे गुल खिलते हैं। हमें आशा है कि इससे महाराज भी बहुत प्रसन्न होंगे।
जीतसिंह––कदाचित तुम्हारा कहना ठीक हो। मगर ऐसे मुकदमों में, जिन्हें घरेलू मुकदमे भी कह सकते हैं, अपरिचित लोगों को शरीक होने और बोलने की आज्ञा महाराज कैसे दे सकते हैं?
नकाबपोश––ठीक है, महाराज मालिक हैं जो उचित समझें करें। मगर इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि अगर उस समय हमारे मालिक लोग (केवल दो आदमी) उपस्थित न होंगे तो मुकदमे की बारीक गुत्थी सुलझ न सकेगी, और यदि वे पहले ही से अपने को प्रकट कर देंगे तो...
जीतसिंह––(तेजसिंह से) इस विषय में उचित यही है कि एकान्त में इस नकाबपोश से बातचीत की जाय।
तेजसिंह––(हाथ जोड़ कर) जो आज्ञा!
इतना कहकर तेजसिंह उठे और उस नकाबपोश को साथ लिए हुए एकान्त में चले गए।
इस नकाबपोश को देख कर सभी हैरान थे। इसकी सिपाहियाना, चुस्त और बेशकीमत पोशाक, इसका बहादुराना ढंग और इसकी अनूठी बातों ने सभी के दिल में खलबली पैदा कर दी थी, खास करके भूतनाथ के पेट में तो चूहे दौड़ने लग गये और उसने इस नकाबपोश की असलियत जानने का खयाल अपने दिल में मजबूती के साथ बाँध लिया था। यही कारण था कि जब थोड़ी देर बाद तेजसिंह उस नकाबपोश से बातें करके और उसको साथ लिए हुए वापस आए, तब सभी का ध्यान उसी तरफ चला गया और सभी यह जानने के लिए व्यग्र होने लगे कि देखें तेजसिंह क्या कहते हैं।
तेजसिंह ने अपने बाप जीतसिंह की तरफ देखकर कहा, "मेरे खयाल से इनकी प्रार्थना स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है। यदि मान लिया जाय कि वे लोग हमारे साथ दुश्मनी भी रखते हों तो भी इसकी कुछ परवाह नहीं हो सकती और न वे लोग हमारा कुछ बिगाड़ ही सकते हैं।"
तेजसिंह की बात सुनकर जीतसिंह ने महाराज की तरफ देखा और कुछ इशारा पाकर नकाबपोश से कहा, "खैर, तुम्हारे मालिकों की प्रार्थना स्वीकार की जाती है। उनसे कह देना कि कल से नित्य एक पहर दिन चढ़ने के बाद इस दरगारे-खास में हाजिर हुआ करें।"
१०
नकाबपोश ने झुक कर सलाम किया और जिधर से आया था उसी तरफ लौट गया। थोड़ी देर तक और कुछ बातचीत होती रही। जिसके बाद सब कोई अपने-अपने ठिकाने चले गए। केवल महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, तेजसिंह और गोपालसिंह रह गए और इन लोगों में कुछ देर तक उसी नकाबपोश के विषय में बातचीत होती रही। क्या-क्या बातें हुई, इसे हम इस जगह खोलना उचित नहीं समझते और न इसकी जरूरत देखते हैं। दूसरे दिन फिर उसी तरह का दरबारे-खास लगा जैसा पहले दिन लगा था और जिसका खुलासा हाल हम ऊपर के बयान में लिख आये हैं। आज के दरबार में वे दोनों नकाबपोश हाजिर होने वाले थे, जिनकी तरफ से कल एक नकाबपोश आया था। अतः राजा साहब की तरफ से कल ही सिपाहियों और चोबदारों को हुक्म मिल गया था कि जिस समय दोनों दोनों नकाबपोश आवें उसी समय बिना इत्तिला किए ही दरबार में पहुँचा दिए जायें। यही सबब था कि आज दरबार लगने के कुछ ही देर बाद एक चोबदार के पीछे-पीछे वे दोनों नकाबपोश हाजिर हुए।
इन दोनों नकाबपोशों की पोशाक बहुत ही बेशकीमत थी। सिर पर बेलदार शमला था, जिसके आगे हीरे का जगमगाता हुआ सरपेंच था। भद्दी, मगर कीमती नकाब में बड़े-बड़े मोतियों की झालर लगी हुई थी। चपकन और पायजामे में भी सलमे-सितारे की जगह हीरे और मोतियों की भरमार थी तथा परतले के बेशकीमत हीरे ने तो सभी को ताज्जुब ही में डाल दिया था जिसके सहारे जड़ाऊ कब्जे की एक तलवार लटक रही थी। दोनों नकाबपोशों की पोशाक एक ही ढंग की थी और दोनों एक ही उम्र के मालूम पड़ते थे।
यद्यपि देखने से तो यही मालूम होता था कि ये दोनों नकाबपोश राजाओं से भी ज्यादा दौलत रखने वाले और किसी अमीर खानदान के होनहार बहादुर हैं। मगर इन दोनों ने बड़े अदब के साथ महाराज सुरेन्द्र सिंह, वीरेन्द्रसिंह और जीतसिंह को सलाम किया और इन तीनों के सिवाय और किसी की तरफ ध्यान भी न दिया। महाराज की आज्ञानुसार राजा गोपालसिंह के बगल में इन दोनों को जगह मिली। जीतसिंह ने सभ्यतानुसार कुशल-मंगल का प्रश्न किया।
दुष्टों के सिरताज, पतितों के महाराजाधिराज, नमकहरामों के किबलेगाह और दोजखियों के जहाँनाह मायारानी के तिलिस्मी दारोगा साहब तलब किये गए और जब हाजिर हुए तो बिना किसी को सलाम किए, जहाँ चोबदार ने बैठाया, बैठ गए। इस समय इनके हाथों में हथकड़ी और पैरों में ढीली बेड़ी पड़ी हुई थी। जब से इन्हें कैदखाने की हवा नसीब हुई तब से बाहर की कोई खबर इनके कानों तक पहुँची न थी। इन्हीं के लिए नहीं बल्कि तमाम कैदियों के लिए इस बात का इन्तजाम किया गया था कि किसी तरह की अच्छी या बुरी खबर उनके कानों तक न पहुँचे और न कोई उनकी बातों का जवाब ही दे।
महाराज का इशारा पाकर पहले राजा गोपालसिंह ने बात शुरू की और दारोगा की तरफ देखकर कहा––
गोपालसिंह––कहिए दारोगा साहब, मिजाज तो अच्छा है! अब आपको अपनी बेकसूरी साबित करने के लिए किन-किन चीजों की जरूरत है?
दारोगा––मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है और मैं उम्मीद करता हूँ कि आपको भी इस बात का कोई सबूत न मिला होगा कि मैंने आपके साथ किसी तरह की बुराई की थी या मुझे इस बात की खबर भी थी कि आपको महारानी ने कैद कर रक्खा है।
गोपालसिंह––(मुस्कुराते हुए) नहीं-नहीं, आप मेरे बारे में किसी तरह का कोई तरदुद न करें। मैं आपसे अपने मामले में बातचीत करना नहीं चाहता और न यही पूछना चाहता हूँ कि शुरू-शुरू में आपने मेरी शादी में कैसे-कैसे नोंक-झोंक के काम किए और बहुत सी मंड़वे की बातों को तै करते हुए अन्त में किस मायारानी को लेकर अपने किस मेहरबान गुरु-भाई के पास किस तरह की मदद लेने गये थे या फिर जमाने ने क्या रंग दिखाये, इत्यादि। मेरे साथ तो जो कुछ आपने किया, उसे याद करने का ध्यान भी मैं अपने दिल में लाना पसन्द नहीं करता मगर मेरे पुराने दोस्त इन्द्रदेव आपसे कुछ पूछे बिना भी न रहेंगे। उन्हें चाहिए था कि अब भी अपने गुरुभाई का नाता निबाहें, मगर अफसोस, किसी बेविश्वासे ने उन्हें यह कहकर रंज कर दिया है कि "इन्दिरा और सरयू की किस्मतों का फैसला भी इन्हीं दारोगा साहब के हाथ से हुआ है!"
राजा गोपालसिंह के जुबानी थपेड़ों ने दारोगा का मुँह नीचा कर दिया। पुरानी बातों और करतूतों ने आँखों के आगे ऐसी भयानक मूरतें पैदा कर दी जिनके देखने की ताकत इस समय उसमें न थी। उसके दिल में एक तरह का दर्द सा मालूम होने लगा और उसका दिमाग चक्कर खाने लगा। यद्यपि उसकी बदकिस्मती और उसके पापों ने भयानक अन्धकार का रूप धारण करके उसे चारों तरफ से घेर लिया था, परन्तु इस अन्धकार में भी उसे सुबह के झिलमिलाते हुए तारे की तरह उम्मीद की एक बारीक और हलकी रोशनी बहुत दूर पर दिखाई दे रही थी जिसका सबब इन्द्रदेव था, क्योंकि इसे (दारोगा को) इन्दिरा और सरयू के प्रकट होने का हाल कुछ भी मालूम न था और वह यही समझ रहा था कि इन्द्रदेव पहले की तरह अभी तक इन बातों से बेखबर होगा और इन्दिरा तथा सरयू भी तिलिस्म के अन्दर मर-खप कर अपने बारे में मेरी बदकारियों का सबूत अपने साथ ही लेती गई होंगी। अस्तु, ताज्जुब नहीं कि आज भी इन्द्रदेव मुझे अपना गुरुभाई समझ कर मदद करे। इसी सबब से उसने मुश्किल से अपने दिल को सम्हाला और इन्द्रदेव की तरफ देख के कहा––
"राम-राम, भला इस अनर्थ का भी कुछ ठिकाना है! क्या आप भी इस बात को सच मान सकते हैं?"
इन्द्रदेव––अगर इन्दिरा मर गई होती और यह कलमदान नष्ट हो गया होता तो इस बात को मानने के लिए मुझे जरूर कुछ उद्योग करना पड़ता।
इतना कहकर इन्द्रदेव ने इन्दिरा की तस्वीर वाला वह कलमदान निकालकर सामने रख दिया।
इन्द्रदेव की बातें सुन और इस कलमदान की सूरत पुनः देख कर दारोगा की बची-बचाई उम्मीद भी जाती रही। उसने भय और लज्जा से सिर झुका लिया और बदन में पैदा हुई भई कँपकँपी को रोकने का उद्योग करने लगा। इसी बीच में भूतनाथ बोल उठा––
"दारोगा साहब, इन्दिरा को आपके पंजे से बार-बार छुड़ाने वाला भूतनाथ भी तो आपके सामने ही मौजूद है और अगर आप चाहें तो उस कम्बख्त औरत से भी मिल सकते हैं जिसने उस बाग में आपको कुएँ के अन्दर धकेला था और बेचारी इन्दिरा को दुःख के अथाह समुद्र से बाहर किया था।"
भूतनाथ की बात सुनते ही दारोगा काँप गया और घबड़ाकर उन नये आये हुए दोनों नकाबपोशों की तरफ देखने लगा। उसी समय उनमें से एक नकाबपोश ने नकाब हटा कर रूमाल से अपने चेहरे को इस तरह पोंछा जैसे पसीना आने पर कोई अपने चेहरे को साफ करता है लेकिन इससे उसका असल मतलब केवल इतना ही था कि दारोगा उसकी सूरत देख ले।
दारोगा के साथ-ही-साथ और कई आदमियों की निगाह उस नकाबपोश के चेहरे पर गई मगर उनमें से किसी ने भी आज के पहले उसकी सूरत नहीं देखी थी इसलिए कोई कुछ अनुमान न कर सका, हाँ दारोगा उसकी सूरत देखते ही भय और दुःख से पागल हो गया। वह घबड़ा कर उठ खड़ा हुआ और उसी समय चक्कर खाकर जमीन पर गिरने के साथ ही बेहोश हो गया।
यह कैफियत देख लोगों को बड़ा ही ताज्जुब हुआ। राजा सुरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह और राजा गोपालसिंह ने भी उस नकाबपोश की सूरत देख ली थी, मगर इनमें से न तो किसी ने उसे पहचाना और न उससे कुछ पूछना ही उचित जाना अतः आज्ञानुसार दरबार बर्खास्त किया गया और वह कम्बख्त नकटा दारोगा पुनः कैदखाने की अंधेरी कोठरी में डाल दिया गया। उन दोनों नकाबपोशों में से एक ने तेजसिंह से पूछा, "कल किसका मुकदमा होगा?" जवाब में तेजसिंह ने बलभद्रसिंह का नाम लिया और दोनों नकाबपोश वहां से रवाना हो गये।
११
दूसरे दिन नियत समय पर फिर दरबार लगा और वे दोनों नकाबपोश भी आ मौजूद हुए। आज के दरबार में बलभद्रसिंह भी अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए थे। आज्ञानुसार पुनः वह नकटा दारोगा और नकली बलभद्रसिंह हाजिर किए गए और सबके पहले इन्द्रदेव ने नकली बलभद्रसिंह से इस तरह पूछना शुरू किया––
इन्द्रदेव––क्यों जी, क्या तुम असली बलभद्रसिंह का ठीक-ठीक पता नहीं बताओगे?
नकली बलभद्रसिंह (लम्बी सांस लेकर और महाराजा साहब की तरफ देखकर) कैसा बुरा जमाना हो रहा है। हजार बार पहचाने जाने पर भी अभी तक मुझे नकली बलभद्रसिंह ही कहा जाता है और गुनाहों की टोकरी सिर पर लादने वाले भूतनाथ को मूंछों पर ताव देता हुआ देखता हूँ। (इन्द्रदेव की तरफ देखकर) मालूम होता है कि आपको जमानिया के दारोगा वाला रोजनामचा नहीं मिला, अगर मिलता तो आपको मुझ पर किसी तरह का शक न रहता
भूतनाथ––(जैपाल अर्थात् नकली बलभद्रसिंह से) तुझे अभी तक हौसला बना ही हुआ है? (तेजसिंह से) कृपानिधान, अभी कल की बात है, आप उन बातों को कदापि न भूले होंगे जो मैंने कमलिनीजी के तालाब वाले तिलिस्मी मकान में इस दुष्ट के सामने आप लोगों से उस समय कही थीं जब आप लोग इसे सच्चा मानकर मुझे कैदखाने की हवा खिलाने का बन्दोबस्त कर चुके थे। क्या मैंने नहीं कहा था कि महाराज के सामने मेरा मुकदमा एक अनूठा रंग पैदा करके मेरे बदले में किसी दूसरे ही को कोठरी का मेहमान बनावेगा? देखिये आज वह दिन आपकी आँखों के सामने है, आपके साथ वे लोग भी हर तरह से मेरी बातों को सुन रहे हैं जिन्होंने उस दिन इसे असली बलभद्रसिंह मान लिया और मुझे घृणा की दृष्टि से भी देखना पसन्द नहीं करते थे। आशा है आप लोग उस समय की भूल पर अफसोस करेंगे और इस समय मैं बड़े अनूठे रहस्यों को खोलकर जो तमाशा दिखाने वाला हूँ, उसे ध्यान देकर देखेंगे।
तेजसिंह––बेशक ऐसा ही है, औरों के दिल की तो मैं नहीं कह सकता, मगर मैं अपनी उस समय की भूल पर जरूर अफसोस करता हूँ।
इस कमरे में जिसमें दरबार लगा हुआ था, ऊपर की तरफ कई खिड़कियाँ थीं जिनमें दोहरी चिकें पड़ी हुई थीं जहाँ बैठी लक्ष्मीदेवी, कमलिनी वगैरह इन बातों को बड़े गौर से सुन रही थीं। भूतनाथ ने पुनः जैपाल की तरफ देखा और कहा––
भूतनाथ––अब मैं उन बातों को भी जान चुका हूँ जिन्हें उस समय न जानने के कराण मैं सचाई के साथ अपनी बेकसूरी साबित नहीं कर सकता था। हाँ कहो, अब तुम अपने बारे में क्या कहते हो?
जैपालसिंह––मालूम होता है कि आज तू अपने हाथ की लिखी हुई उन चिट्ठियों से इनकार किया चाहता है जो तेरी बुराइयों के खजाने को खोलने के काम में आ चुकी हैं और आवेंगी। क्या लक्ष्मीदेवी की गद्दी पर मायारानी को बैठाने की कार्रवाई में तूने सबसे बड़ा हिस्सा नहीं लिया था और क्या वे सब चिट्ठियाँ तेरे हाथ की लिखी हुई नहीं हैं?
भूतनाथ––नहीं-नहीं, मैं इस बात से इनकार नहीं करूँगा कि वे चिट्ठियाँ मेरे हाथ की लिखी हुई नहीं हैं, बल्कि इस बात को साबित करूँगा कि लक्ष्मीदेवी के बारे में मैं बिल्कुल बेकसूर हूँ और चिट्ठियाँ, जिन्हें मैंने अपने फायदे के लिए लिख रक्खा था मुझे नुकसान पहुँचाने का सबब हुईं, तथा इस बात को भी साबित करूँगा कि मैं वास्तव में वह रघुबरसिंह नहीं हूँ जिसने लक्ष्मीदेवी के बारे में कार्रवाई की थी। इसके साथ ही तुझे और इस नकटे दारोगा को भी यह सुनकर अपने उछलते हुए कलेजे को रोकने के लिए तैयार हो जाना चाहिए कि केवल असली बलभद्र सिंह ही नहीं, बल्कि इन्दिरा तथा सरयू भी दम भर में तुम लोगों की कलई खोलने के लिए यहाँ आ चुकी हैं!
जैपाल––(बेहयाई के साथ) मालूम होता है कि तुम लोगों ने किसी को जाली बलभद्रसिंह बनाकर राजा साहब के सामने पेश कर दिया है।
इतना सुनते ही बलभद्र सिंह ने अपने चेहरे से नकाब हटाकर जैपाल की तरफ देखा और कहा, "नहीं-नहीं, जाली बलभद्रसिंह नहीं बनाया गया बल्कि मैं स्वयं असली बलभसिंह यहाँ बैठा हुआ तेरी बातें सुन रहा हूँ।"
बलभद्रसिंह की सूरत देखकर एक दफे तो जयपाल हिचका। मगर तुरन्त ही उसने अपने को सम्हाला और परले सिरे की बेहयाई को काम में लाकर कहा, "आहा, हेलासिंह भी यहाँ आ गए! मुझे तुमसे मिलने की कुछ भी आशा न थी, क्योंकि मेरे मुलाकातियों ने जोर देकर कहा था कि हेलासिंह मर गया और अब तुम उसे कदापि नहीं देख सकते।"
बलभद्रसिंह––(मुस्कराता हुआ तेजसिंह की तरफ देख कर) ऐसे बेहया की सूरत भी आज के पहले आप लोगों ने न देखी होगी! (जयपाल से) मालूम होता है कि तू अपने दोस्त हेलासिंह की मौत का सबब भी किसी दूसरे को ही बताना चाहता है। मगर ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मेरे दोस्त भूतनाथ मेरे साथ हेलासिंह के मामले का सबूत भी बेगम के मकान से लेते आये हैं।
भूतनाथ––हाँ-हाँ, वह सबूत भी मेरे पास मौजूद है जो सबसे ज्यादा मेरे खास मामले में काम देगा।
इतना कहकर भूतनाथ ने दो-चार कागज, दस-बारह पन्ने की एक किताब और हीरे की अँगूठी जिसके साथ छोटा-सा पुरजा बँधा हुआ था, अपने बटुए में से निकाल कर राजा गोपालसिंह के सामने रख दिया और कहा, "बेगम नौरतन और जमालो को भी तलब करना चाहिए।"
इन चीजों को गौर से देख कर राजा गोपालसिंह ताज्जुब और भूतनाथ का मुँह देखने लगे।
भूतनाथ––(गोपालसिंह से) आप जिस समय कृष्ण जिन्न की सूरत में थे, उस समय मैंने आपसे अर्ज किया था कि अपनी बेकसूरी का बहुत अच्छा सबूत किसी समय आपके सामने ला रखूँगा, सो यह सबूत मौजूद है, इसी से दोनों का काम चलेगा।
गोपालसिंह––(ताज्जुब के साथ) हाँ ठीक है, (वीरेन्द्रसिंह से) ये बड़े काम की चीजें भूतनाथ ने पेश की हैं। बेगम नौरतन और जमालो के हाजिर होने पर मैं इनका मतलब बयान करूँगा।
वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखा और तेजसिंह ने बेगम नौरतन और जमालो के हाजिर होने का हुक्म दिया। इस समय जयपाल का कलेजा उछल रहा था। वह उन चीजों को अच्छी तरह देख नहीं सकता था और न उसे इसी बात का गुमान था कि बेगम के यहाँ से भूतनाथ फलाँ चीजें ले आया है।
कैदियों की सूरत में बेगम नौरतन और जमालो हाजिर हुई। उस समय एक नकाबपोश ने, जिसने भूतनाथ की पेश की हुई चीजों को अच्छी तरह देख लिया था, गोपालसिंह से कहा, "मैं उम्मीद करता हूँ कि भूतनाथ की पेश की हुई इन चीजों का मतलब बनिस्बत आपके मैं ज्यादा अच्छी तरह बयान कर सकूँगा। यदि आप मेरी बातों पर विश्वास करके ये चीजें मेरे हवाले करें तो उत्तम हो।"
नकाबपोश की बातें सभी ने ताज्जुब के साथ सुनी, खास करके जयपाल ने, जिसकी विचित्र अवस्था हो रही थी। यद्यपि वह अपनी जान से हाथ धो बैठा था, मगर साथ ही इसके यह भी सोचे हुए था कि मेरी चालबाजियों में उलझे हुए भूतनाथ को कोई कदापि बचा नहीं सकता और इस समय भूतनाथ के मददगार जो आदमी हैं, वे लोग तभी भूतनाथ को बचा सकेंगे जब मेरी बातों पर पर्दा डालेंगे या मेरे कसूरों की माफी दिला देंगे, तथा जब तक ऐसा न होगा मैं कभी भूतनाथ को अपने पंजे से निकलने न दूँगा। यही सबब था कि ऐसी अवस्था में भी वह बोलने और बातें बनाने से बाज नहीं आता था।
नकाबपोश की बात सुनकर राजा गोपालसिंह ने मुस्करा दिया और भूतनाथ की दी हुई चीजें उसके सामने रख कर कहा, "अच्छी बात है, यदि आप मुझसे ज्यादा जानते हैं तो आप ही इस गुत्थी को साफ करें।"
नकाबपोश––अच्छा होता यदि इन चीजों को पहले बड़े महाराज और जीतसिंह भी देख लेते।
गोपालसिंह––मैं भी यही चाहता हूँ।
इतना कह कर राजा गोपालसिंह ने उन चीजों को हाथ में उठा लिया और तेजसिंह की तरफ देखा। तेजसिंह का इशारा पाकर देवीसिंह राजा गोपालसिंह के पास गए और वे चीजें लेकर जीतसिंह के हाथ में दे आए।
महाराज सुरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, राजा वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह ने भी उन चीजों को अच्छी तरह देखा और इसके बाद महाराज की आज्ञानुसार जीतसिंह ने कहा, "महाराज हुक्म देते हैं कि आज की कार्रवाई यहीं खत्म की जाय और इसके बाद की कार्रवाई कल दरबारे-आम में हो और इन पुर्जो का मतलब भी कल ही के दरबार में नकाबपोश साहब बयान करें।"
इस बात को सभी ने पसन्द किया, खासकर दोनों नकाबपोशों की और भूतनाथ की भी यही इच्छा थी, अस्तु, दरबार बर्खास्त हुआ और कल के लिए दरबार-आम की मुनादी की गई।
१२
आज के दरवारे-आम की बैठक भी उसी ढंग की है जैसा कि हम दरबारे-आम के बारे में बयान कर चुके हैं, अगर फर्क है तो सिर्फ इतना ही कि दरबारे-खास में बैठनेवाले लोगों के बाद उन रईसों-अमीरों और अफसरों तथा ऐयारों को दर्जे-बदर्जे जगह मिली है जो आज के दरबार में शरीक हुए हैं और आदमी भी बहुत ज्यादा इकट्ठे हुए मगर आवाज के खयाल से पूरा-पूरा सन्नाटा छाया हुआ है। शोरगुल की तो दूर रही किसी की मजाल नहीं कि बिना मर्जी के चुटकी भी बजा सके। इसके अतिरिक्त नंगी तलवार लिए रुआबदार फौजी सिपाहियों के पहरे का इन्तजाम भी बहुत ही मुनासिब और खूबसूरती के साथ किया गया है और बाहर के आये हुए मेहमान भी बड़ी दिलचस्पी के साथ बलभद्रसिंह और भूतनाथ का मुकदमा सुनने के लिए तैयार हैं।
नकटा दारोगा, जैपाल, बेगम, नौरतन और जमालो के हाजिर होने के बाद तेजसिंह ने कल के दरबार में भूतनाथ की पेश की हुई चिट्ठियाँ, अँगूठी और छोटी किताब राजा गोपालसिंह को दे दी और राजा गोपालसिंह ने इस खयाल से कि कल के और परसों के मामले से भी सभी को आगाही हो जानी चाहिए, जो कुछ पिछले दो दिन के दरबार-खास में हुआ था, रणधीरसिंह की तरफ देखकर बयान किया और इसके बाद "आज भी वे दोनों नकाबपोश इस दरबार में हाजिर हैं जिन्हें हम लोग ताज्जुब की निगाहों से देख रहे हैं और नहीं जानते कि कौन हैं, कहाँ के रहने वाले हैं, या इन मामलों से इन्हें क्या सम्बन्ध है जिसके लिए इन दोनों ने यहाँ आने और मुकदमे में शरीक होने का कष्ट स्वीकार किया है। फिर भी जब तक ये दोनों अपने को प्रकट न करें हम लोगों को इनका हाल जानने के लिए उद्योग न करना चाहिए और देखना चाहिए कि इनकी कार्रवाइयों और बात का असर कम्बख्त मुजरिमों पर कैसा पड़ता है।"
यह कहकर गोपालसिंह ने वह अँगूठी, चिट्ठियाँ और छोटी किताब नकाबपोश के आगे रख दी।
इस दरबार-आम वाले मकान में भी ऐसी जगह बनी हुई थी जहाँ से रानी चन्द्रकान्ता और किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी, कमलिनी वगैरह भी यहाँ की कैफियत देख-सुन सकती थी, इसलिए समझ रखना चाहिए कि वे सब भी दरबार के मामले को देख-सुन रही हैं।
उन दोनों में से एक नकाबपोश ने भूतनाथ के पेश किए हुए कागजों में से एक कागज उठा लिया और खड़े होकर इस तरह कहना शुरू किया––
"निःसन्देह आप लोग हम दोनों को ताज्जुब की निगाह से देखते होंगे और यह भी जानने की इच्छा रखते होंगे कि हम लोग कौन हैं, और कहाँ के रहनेवाले हैं, मगर अफसोस है कि इस समय इस बारे में हम इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकते कि हम लोग ईश्वर के दूत हैं और इन दुष्टों के अच्छे-बुरे कर्मों को अच्छी तरह जानते हैं। यह जैपाल अर्थात् नकली बलभद्रसिंह चाहता है कि अपने साथ भूतनाथ को भी ले डूबे, मगर इसे समझ रखना चाहिए कि भूतनाथ हजार बुरा होने पर भी इज्जत और कदर की निगाह से देखे जाने के लायक है। अगर भूतनाथ न होता तो यह जैपाल इस समय असली बलभद्रसिंह बनकर न मालूम और भी कैसे-कैसे अनर्थ करता और असली बलभद्रसिंह की जान न जाने किस तकलीफ के साथ निकलती। अगर भूतनाथ न होता तो आज का यह आलीशान दरबार भी हम लोगों के लिए न होता और राजा गोपालसिंह भी इस तरह बैठे हुए दिखाई न देते, क्योंकि भूतनाथ की ही बदौलत दारोगा की गुप्त कमेटी का अन्त हुआ और इसी की बदौलत कमलिनी भी मायारानी के साथ मुकाबला करने लायक हुई। अगर भूतनाथ ने दो काम बुरे किये हैं तो दस काम अच्छे भी किए हैं, जो आप लोगों से छिपे नहीं हैं। भूतनाथ के अनूठे कामों का बदला यह नहीं हो सकता कि उसे किसी तरह की सजा मिले बल्कि यही हो सकता है कि उसे मुंहमांगा इनाम मिले, आशा है कि मेरी इस बात को महाराज खुले दिल से स्वीकार भी करेंगे।"
इतना कहकर नकाबपोश चुप हो गया और महाराज की तरफ देखने लगा। महाराज का इशारा पाकर तेजसिंह ने कहा, "महाराज आपकी इस बात को प्रसन्नता के साथ स्वीकार करते हैं।"
इतना सुनते ही भूतनाथ ने खड़े होकर सलाम किया और नकाबपोश ने भी सलाम करके पुनः इस तरह कहना शुरू किया––
"बहुतों को ताज्जुब होगा कि जैपाल जब बलभद्रसिंह बन ही चुका था तो इतने दिनों तक कहाँ और क्योंकर छिपा रहा, लक्ष्मीदेवी या कमलिनी से मिला क्यों नहीं? और इसी तरह से भूतनाथ भी जब जानता था कि बलभद्रसिंह कौन और कहाँ है तो उसने इस बात को इतने दिनों तक छिपा क्यों रक्खा? इसका जवाब मैं इस तरह देता हूँ कि अगर भूतनाथ कमलिनी का ऐयार बना हुआ न होता तो यह नकली बलभद्रसिंह अर्थात् जैपाल, जिसे भूतनाथ मरा हुआ समझे बैठा था, कभी का प्रकट हो चुका होता, मगर भूतनाथ का डर इसे हद से ज्यादा था और यह चाहता था कि कोई ऐसा जरिया हाथ लग जाय जिससे भूतनाथ इसके सामने कभी भी सिर उठाने लायक न रहे, और तब यह प्रकट होकर अपने को बलभद्रसिंह के नाम से मशहूर करे। आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् वह छोटी सन्दूकड़ी, जिसकी तरफ देखने की भी ताकत भूतनाथ में नहीं है, इसके हाथ लग गई और वह कागज का मुट्ठा भी इसे मिल गया जो भूतनाथ के हाथ का लिखा हुआ था। अपनी इस बात के सबूत में मैं इस (हाथ की चिट्ठी दिखाकर) चिट्ठी को, जो आज के बहुत दिन पहले की लिखी हुई है, पढ़कर सुनाऊँगा!"
इतना कहकर उसने चिट्ठी पढ़ना शुरू किया जिसमें यह लिखा हुआ था––"प्यारी बेगम,
वह सन्दूकड़ी तो मेरे हाथ लग गई जो भूतनाथ को बस में करने के लिए जादू का असर रखती है, मगर भूतनाथ तथा उसके आदमी बेतरह मेरे पीछे पड़े हुए हैं। ताज्जुब नहीं कि मैं गिरफ्तार हो जाऊँ, इसलिए यह सन्दूकड़ी तुम्हारे पास भेजता हूँ। तुम इसे हिफाजत के साथ रखना। मैं भूतनाथ को धोखा देने का बन्दोबस्त कर रहा हूँ। अगर मैं अपना काम पूरा कर सका तो निःसन्देह भूतनाथ को विश्वास हो जायगा कि जयपालसिंह मर गया। उस समय मैं तुम्हारे पास आकर अपनी खुशी का तमाशा दिखाऊँगा। मुझे इस बात का पता भी लग चुका है कि वह कागज की गठरी उसकी स्त्री के सन्दूक में है जिसका जिक्र मैं कई दफे तुमसे कर चुका हूँ और जिसके मिले बिना मैं अपने को बलभद्रसिंह बनाकर प्रकट नहीं कर सकता।
पढ़ने के बाद नकाबपोश ने वह चिट्ठी गोपालसिंह के आगे फेंक दी और बेगम की तरफ देख के पूछा, "तुझे याद है कि यह चिट्ठी किस महीने में जयपाल ने तेरे पास भेजी थी?"
बेगम––बहुत दिन की बात हो गई। इसलिए मुझे महीना और दिन तो याद नहीं है।
नकाबपोश––(जयपाल से) क्या तुझे याद है कि यह चिट्ठी तूने किस महीने में लिखी थी?
जयपालसिंह––यह चिट्ठी मेरे हाथ की लिखी हुई होती तो मैं तेरी बात का जवाब देता।
नकाबपोश––तो यह बेगम क्या कह रही है?
जयपालसिंह––तू ही जाने कि तेरी बेगम क्या कह रही है? मैं तो उसे पहचानता भी नहीं।
इतना सुनते ही नकाबपोश को गुस्सा चढ़ आया। उसने अपने चेहरे से नकाब हटाकर गुस्से-भरी निगाहों से जयपाल की तरफ देखा, जिसकी ताज्जुब-भरी निगाहें पहले ही से उसकी तरफ जम रहीं, और इसके बाद तुरन्त अपना चेहरा ढाँप लिया।
न मालूम उस नकाबपोश की सूरत में क्या बात थी कि उसे देखते ही जयपाल की सूरत बिगड़ गई और काँपता तथा नकाबपोश की तरफ देखता हुआ अपने हथकड़ी सहित हाथों को जोड़कर बोला, "बस-बस, माफ कीजिए, बेशक यह चिट्ठी मेरे हाथ की लिखी हुई है! ओफ, मैं नहीं जानता था कि तुम अभी जीते हो? मैं तुम्हारी तरफ देखना नहीं चाहता हूँ!"
इतना कहकर जयपाल ने दोनों हाथों से अपनी आँखें ढक लीं और लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा।
इस नकाबपोश की सूरत पर सभी की तो नहीं, मगर बहुतों की निगाह पड़ी। हमारे राजा साहब, ऐयार लोग, गोपालसिंह, इन्द्रदेव और भूतनाथ वगैरह ने भी इसे देखा, मगर पहचाना किसी ने भी नहीं, क्योंकि इन लोगों में से किसी ने भी आज के पहले इसे देखा न था। इसके अतिरिक्त पहले दिन दरबार में नकाबपोश की जो सूरत दिखाई दी थी, उसमें और आज की सूरत में जमीन-आसमान का फर्क था। इस विषय में लोगों ने यह खयाल कर लिया कि पहले दिन एक नकाबपोश ने सूरत दिखाई थी और आज दूसरे ने, क्योंकि नकाब और पोशाक इत्यादि के खयाल से जाहिर में दोनों नकाबपोश एक ही रंग-ढंग के थे।
इन नकाबपोशों की तरफ से भूतनाथ का दिल तरद्दुद और खुटके से खाली न था। पहले दिन उस नकाबपोश की जो सूरत भूतनाथ ने देखी, उसे उसने अपने दिल में अच्छी तरह नक्श कर लिया था––बल्कि एक कागज पर उसकी सूरत (तस्वीर) भी बना कर तैयार कर ली थी और आज भी इसी नीयत से उसी सुरत के विषय में बारीक निगाह से भूतनाथ ने काम लिया, मगर ताज्जुब कर रहा था कि ये दोनों कौन हैं जो बेवजह मेरी मदद कर रहे हैं और ये गुप्त बातें इन दोनों को कैसे मालूम हुईं।
थोड़ी देर तक वह नकाबपोश चुप रहा और इसके बाद उसने राजा साहब की तरफ देख के कहा, "महाराज देखते हैं कि मैं इस मुकदमे की गुत्थी को किस तरह सुलझा रहा हूँ और इस जयपाल के दिल पर मेरी सूरत का क्या असर पड़ा, अब मैं इसी जगह एक और भी गुप्त बात की तरफ इशारा करना चाहता हूँ जिसका हाल शायद अभी तक भूतनाथ को भी मालूम न होगा। वह यह है कि मनोरमा इस (बेगम की तरफ बताकर) बेगम की एक मौसेरी बहिन है और भूतनाथ की गुप्त सहेली नन्हों से गहरी मुहब्बत रखती है। यही सबब है कि भूतनाथ के घर से यह गठरी गायब हुई और जयपाल ने भी यह प्रकट होने के साथ ही लामाघाटी की तरफ इशारा करके भूतनाथ को काबू में कर लिया। इस बात को महाराज तो न जानते होंगे, मगर भूतनाथ को इनकार करने की जगह अब नहीं तो दो दिन बाद न रहेगी।
नकाबपोश की इस बात ने भूतनाथ को चौंका दिया और उसने घबराकर नकाबपोश से कहा, "क्या यह बात आप पूरी तरह से समझ-बूझकर कह रहे हैं?"
नकाबपोश––हाँ, और यह बात तुम्हारे ही सबब से पैदा हुई थी जिसके सबूत में मैं यह पुर्जा पेश करता हूँ।
इतना कहकर नकाबपोश ने अपनी जेब में से एक पुर्जा निकालकर पढ़ा और फिर राजा गोपालसिंह के सामने फेंक दिया। उसमें लिखा हुआ था––
"प्यारी नन्हों,
अब तो उन्होंने अपना नाम भी बदल दिया। तुम्हें पता लगाना हो तो 'भूतनाथ' के नाम से पता लगा लेना और मुझे भी चाँद वाले दिन गौहर के यहाँ देखना जो शेर की लड़की है।
इस चिट्ठी ने भूतनाथ को परेशान कर दिया और उसने खड़े होकर कहा, "बस बस, मुझे आपके कहने का विश्वास हो गया और बहुत-सी पुरानी बातों का पता भी लग गया।"
नकाबपोश––मैं इस बारे में और भी बहुत-सी बातें कहूँगा, मगर अभी नहीं। जब समय तथा बातों का सिलसिला आ जायगा। मैं यह तो ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि तुम्हारी स्त्री तुमसे दुश्मनी रखती है या वह इस बात को जानती है कि नन्हों और बेगम की मुहब्बत है, मगर इतना जरूर कहूँगा कि तुमने अपनी स्त्री को गौहर के यहाँ जाने की इजाजत देकर अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मार ली। मुझे इन बातों के कहने की कोई जरूरत नहीं थी, मगर इस खयाल से बात निकल आई कि तुम भी अपनी गठरी के चोरी जाने का सबब जान जाओ। (तेजसिंह की तरफ देखकर) औरों को क्या कहा जाय, भूतनाथ ऐसे चालाक और ऐयार लोग भी औरतों के मामले में चूक ही जाते हैं।
इसी समय बेगम उद्योग करके उठ खड़ी हुई और महाराज की तरफ देखकर जोर से बोली, "दोहाई महाराज की! इस नकाबपोश का यह कहना कि नन्हों नाम की किसी औरत से मुझसे दोस्ती है। बिल्कुल झूठ है। इसका कोई सबूत नकाबपोश साहब नहीं दे सकते। मैं तो जानती भी नहीं कि नन्हों किस चिड़िया का नाम है। असल तो यह है कि यह केवल भूतनाथ की मदद करने को आये हैं और झूठ-सच बोलकर अपना काम निकालना चाहते हैं। अगर सरकार उस सन्दूकड़ी को खोलें तो सारी कलई खुल जाय।" बेगम की बात सुनकर दोनों नकाबपोश गुस्से में आ गये। दूसरा नकाबपोश जो बैठा था, उठ खड़ा हुआ और अपने चेहरे की एक झलक लापरवाही के साथ बेगम को दिखाकर क्रोध-भरी आवाज में बोला, "क्या ये सब बातें झूठ हैं?"
इस दूसरे नकाबपोश ने अपनी सुरत दिखाने की नीयत से अपनी नकाब को दम भर के लिए इस तरह हटाया जिससे लोगों को गुमान हो सकता था कि धोखे में नकाब खसक गई, मगर होशियार और ऐयार लोग समझ गये कि इसने जानबुझ के अपनी सूरत दिखाई है। यद्यपि इसके चेहरे पर केवल तेजसिंह, देवीसिंह, गोपालसिंह, भूतनाथ, जयपाल और बेगम की निगाह पड़ी थी, मगर इस दूसरे नकाबपोश के चेहरे पर निगाह पड़ते ही बेगम यह कहकर चिल्ला उठी––आह, तू कहाँ! क्या नन्हों भी गई!"
बस इससे ज्यादा और कुछ न कह सकी, एक दफे काँपकर बेहोश हो गई और जयपाल भी जमीन पर गिरकर बेहोश हो गया, अतएव मुकदमे की कार्रवाई रोक देनी पड़ी।
भूतनाथ तथा हमारे ऐयारों को विश्वास था कि यह दूसरा नकाबपोश वही होगा जिसने पहले दिन सूरत दिखलाई थी, मगर ऐसा न था। उस सूरत और इस सूरत में जमीन-आसमान का फर्क था, अतएव सभी ने निश्चय कर लिया कि वह कोई दूसरा था और यह कोई और है।
इस सूरत को भी भूतनाथ पहचानता न था। उसके ताज्जुब की हद न रही और उसने निश्चय कर लिया कि आज इनकी खबर जरूर ली जायगी। और यही कैफियत हमारे ऐयारों की भी थी।
कैदी पुनः कैदखाने में भेज दिये गये, दोनों नकाबपोश बिदा हुए और दरबार बर्खास्त किया गया।
१३
दरबार बर्खास्त होने के बाद जब महाराज सुरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह, गोपालसिंह और देवीसिंह एकान्त में बैठे तो यों बातचीत होने लगी।
सुरेन्द्रसिंह––ये दोनों नकाबपोश तो विचित्र तमाशा कर रहे हैं। मालूम होता है कि इन सब मामलों की सबसे ज्यादा खबर इन्हीं लोगों को है।
जीतसिंह––बेशक ऐसा ही है।
वीरेन्द्रसिंह––जिस तरह इन दोनों ने तीन दफे में तीन तरह की सूरतें दिखाई इसी से मालूम होता है और भी कई दफे कई तरह की सूरतें दिखायेंगे।
गोपालसिंह––निःसन्देह ऐसा ही होगा। मैं समझता हूँ कि या तो ये अपनी सूरत बदलकर आया करते हैं या दोनों केवल दो ही नहीं हैं और भी कई आदमी हैं जो पारी-पारी से आकर लोगों को ताज्जुब में डालते हैं और डालेंगे।
तेजसिंह––मेरा भी यही खयाल है। भूतनाथ के दिल में भी खलबली पैदा हो रही है। उसके चेहरे से मालूम होता था कि वह इन लोगों का पता लगाने के लिए परेशान हो रहा है।
देवीसिंह––भूतनाथ का ऐसा विचार कोई ताज्जुब को बात नहीं। जब हम लोग उनका हाल जानने के लिए व्याकुल हो रहे हैं, तब भूतनाथ का क्या कहना है।
सुरेन्द्रसिंह––इन लोगों ने मुकदमे की उलझन खोजने का ढंग तो अच्छा निकाला है, मगर यह मालूम करना चाहिए कि इन मामलों से इन्हें क्या सम्बन्ध है?
देवीसिंह––अगर आज्ञा हो तो मैं उनका हाल जानने के लिए उद्योग करूँ?
वीरेन्द्रसिंह––कहीं ऐसा न हो कि पीछा करने से ये लोग बिगड़ जायें और फिर यहाँ आने का इरादा न करें।
गोपालसिंह––मेरे खयाल से तो उन लोगों को इस बात का रंज न होगा कि लोग उनका हाल जानने के लिए पीछा कर रहे हैं, क्योंकि उन लोगों ने काम ही ऐसा उठाया है कि सैकड़ों आदमियों को ताज्जुब हो और सैकड़ों ही उनका पीछा भी करें। इस बात को वे लोग खूब ही समझते होंगे और इस बात का भी उन्हें विश्वास होगा कि भूतनाथ उनका हाल जानने के लिए सबसे ज्यादा कोशिश करेगा।
वीरेन्द्रसिंह––ठीक है और इसी खयाल से वे लोग हर वक्त चौकन्ने भी रहते हों तो कोई ताज्जुब नहीं।
जीतसिंह––जरूर चौकन्ने रहते होंगे और ऐसी अवस्था में पता लगाना भी कठिन होगा।
गोपालसिंह––जो हो, मगर मेरी इच्छा तो यही है कि स्वयं उनका हाल जानने के लिए उद्योग करूँ
सुरेन्द्रसिंह––अगर उनके मामले में पता लगाने की इच्छा ही है तो क्या तुम्हारे यहाँ ऐयारों की कमी है जो तुम स्वयं कष्ट करोगे? तेजसिंह, देवीसिंह, पण्डित बद्रीनाथ या और जिसे चाहो इस काम पर मुकर्रर करो।
गोपालसिंह––जो आज्ञा, देवीसिंह कहते ही हैं तो इन्हींको यह काम सुपुर्द किया जाय।
सुरेन्द्रसिंह––(देवीसिंह से) जाओ तुम, तुम ही इस काम में उद्योग करो, देखें क्या खबर लाते हो।
देवीसिंह––(सलाम करके) जो आज्ञा।
गोपालसिंह––और इस बात का भी पता लगाना कि भूतनाथ उनका पीछा करता है या नहीं।
देवीसिंह––जरूर पता लगाऊँगा।
इस बात से छुट्टी पाने के बाद थोड़ी देर तक और बातें हुईं, इसके बाद महाराज आराम करने चले गये तथा और लोग भी अपने ठिकाने पधारे।
१४
सबसे ज्यादा फिक्र भूतनाथ को इस बात के जानने की थी कि वे दोनों नकाबपोश कौन हैं और दारोगा, जयपाल तथा बेगम का उन सूरतों से क्या संबंध है जो समय-समय पर नकाबपोशों ने दिखाई थीं या हमारे तथा राजा गोपालसिंह और लक्ष्मीदेवी इत्यादि के सम्बन्ध में हम लोगों से भी ज्यादा जानकारी इन नकाबपोशों को क्योंकर हुई तथा ये दोनों वास्तव में दो ही हैं या कई।
इन्हीं बातों के सोच-विचार में भूतनाथ का दिमाग चक्कर खा रहा था। यों तो उस दरबार में जितने भी आदमी थे, सभी उन दोनों नकाबपोशों का हाल जानने के लिए बेताब हो रहे थे और दरबार बर्खास्त होने तथा अपने डेरे पर जाने बाद भी हर एक आदमी इन्हीं दोनों नकाबपोशों का खयाल और फिक्र करता था, मगर किसी की हिम्मत यह न होती थी कि उनके पीछे-पीछे जाय। हाँ, ऐयार और जासूस लोग जिनकी प्रकृति ही ऐसी होती है कि खामख्वाह भी लोगों के भेद जानने की कोशिश किया करते हैं, उन दोनों नकाबपोशों का हाल जानने के फेर में पड़े हुए थे।
भूतनाथ का डेरा यद्यपि तिलिस्मी इमारत के अन्दर बलभद्रसिंह के साथ था, मगर वास्तव में वह अकेला न था। भूतनाथ के पिछले किस्से से पाठकों को मालूम हो चुका होगा कि उसके साथी नौकर, सिपाही या जासुस लोग कम न थे जिनसे वह समय-समय पर काम लिया करता था और जो उसके हाल-चाल की खबर बराबर रखा करते थे। अब यह कह देना आवश्यक है कि यहां भी भूतनाथ के बहुत-से आदमी धीरे-धीरे आ गये हैं जो सूरत बदलकर चारों तरफ घूमते और उसकी जरूरतों को पूरा करते हैं और उनमें से दो आदमी खास तिलिस्मी इमारत के अन्दर उसके साथ ही रहते हैं जिन्हें भूतनाथ ने अपने खिदमतगार कहकर अपने पास रख लिया है और इस बात को बलभद्रसिंह भी जानते हैं।
दरबार बर्खास्त होने के बाद भूतनाथ और बलभद्रसिंह अपने डेरे पर गये और कुछ जलपान इत्यादि से छुट्टी पाकर यों बातचीत करने लगे––
बलभद्रसिंह––ये दोनों नकाबपोश तो बड़े ही विचित्र मालूम पड़ते हैं।
भूतनाथ––क्या कहें अक्ल कुछ काम ही नहीं करती। मजा तो यह है कि वे हमी लोगों की बातों को हम लोगों से भी ज्यादा जानते और समझते हैं।
बलभद्रसिंह––बेशक, ऐसा ही है।
भूतनाथ––यद्यपि अभी तक इन नकाबपोशों ने मेरे साथ बुरा बर्ताव नहीं किया, बल्कि एक तौर पर मेरा पक्ष ही करते रहे हैं तथापि मेरा कलेजा डर के मारे सूखा जाता है, यह सोचकर कि जिस तरह आज मेरी स्त्री की एक गुप्त बात इन्होंने प्रकट कर दी, जिसे मैं भी नहीं जानता था, उसी तरह कहीं मेरी उस सन्दूकड़ी का भेद भी न खोल दें, जो जयपाल की दी हुई अभी तक राजा साहब के पास अमानत रखी है और जिसके खयाल ही से मेरा कलेजा हरदम काँपा करता है।
बलभद्रसिंह––ठीक है, मगर मेरा खयाल है कि नकाबपोश तुम्हारी उस सन्दूकड़ी का भेद न तो खुद ही खोलेंगे और न खुलने ही देंगे।
भूतनाथ––सो कैसे?
बलभद्रसिंह––क्या तुम उन बातों को भूल गये जो एक नकाबपोश ने भरे दरबार तुम्हारे लिए कही थीं? क्या उसने नहीं कहा था कि भूतनाथ ने जैसे-जैसे काम किए हैं उनके बदले में उसे मुँहमांगा इनाम देना चाहिए और क्या इस बात को महाराज ने भी स्वीकार नहीं किया था?
भूतनाथ––ठीक है, तो इसके कहने से शायद आपका मतलब यह है कि मुँहमांगे इनाम के बदले में मैं उस सन्दूकड़ी को भी पा सकता हूँ?
बलभद्रसिंह––बेशक ऐसा ही है और उन नकाबपोशों ने भी इसी खयाल से वह बात कही थीं, मगर अब यह सोचना चाहिए कि मुकदमा तय होने के पहले माँगने का मौका क्योंकर मिल सकता है।
भूतनाथ––मेरे दिल ने भी उस समय यही कहा था, मगर दो बातों के ख्याल से मुझे प्रसन्न होने का समय नहीं मिलता।
बलभद्रसिंह––वह क्या?
भूतनाथ––एक तो यही कि मुकदमा होने के पहले इनाम में उस सन्दूकड़ी के माँगने का मौका मुझे मिलेगा या नहीं, और दूसरे यह कि नकाबपोश ने इस समय यह बात सच्चे दिल से कही थी या केवल जयपाल को सुनाने की नीयत से। साथ ही इसके एक बात और भी है।
बलभद्रसिंह––वह भी कह डालो।
भूतनाथ––आज आखिरी मर्तबे दूसरे नकाबपोश ने जो सूरत दिखाई थी उसके बारे में मुझे कुछ भ्रम-सा होता है। शायद मैंने उसे कभी देखा है, मगर कहाँ और कब, सो नहीं कह सकता।
बलभद्रसिंह––हाँ, उस सूरत के बारे में तो अभी तक मैं भी गौर कर रहा हूँ, मगर अक्ल तब तक कुछ ठीक काम नहीं कर सकती, जब तक उन नकाबपोशों का कुछ हाल मालूम न हो जाये।
भूतनाथ––मेरी तो यही इच्छा होती है कि उनका असल हाल जानने के लिए उद्योग करूँ, बल्कि कल मैं अपने आदमियों को इस काम के लिए मुस्तैद भी कर चुका हूँ।
बलभद्रसिंह––अगर कुछ पता लगा सको तो बहुत ही अच्छी बात है, सच तो यही है कि मेरा दिल भी खुटके से खाली नहीं है।
भूतनाथ––इस समय से संध्या तक और इसके बाद रात भर मुझे छुट्टी है, यदि आप आज्ञा दें तो मैं जवाब दे लूँगा।
बलभद्रसिंह––कोई चिन्ता नहीं, तुम जाओ! अगर महाराज का कोई आदमी खोजने आवेगा, तो मैं इस फिक्र में जाऊँ।
भूतनाथ––बहुत अच्छा। इतना कहकर भूतनाथ उठा और अपने दोनों आदमियों में से एक को साथ लेकर मकान के बाहर हो गया।
१५
तिलिस्मी इमारत से लगभग दो कोस दूरी पर जंगल में पेड़ों की घनी झुरमुट के अन्दर बैठा हुआ भूतनाथ अपने दो आदमियों से बातें कर रहा है।
भूतनाथ––तो क्या तुम उनके पीछे-पीछे उस खोह के मुहाने तक चले गये थे?
एक आदमी––जी नहीं, थोड़ी देर तक तो मैं उन नकाबपोशों के पीछे-पीछे चला गया, मगर जब देखा कि वे दोनों बेफिक्र नहीं हैं बल्कि चौकन्ने होकर चारों तरफ खास करके मुझे गौर से देखते जाते हैं, तब मैं भी तरह देकर हट गया। दूसरे दिन हम लोग कई आदमी एक-दूसरे से अलग दूर-दूर बैठ गये और आखिर मेरे साथी ने उन्हें ठिकाने तक पहुँचा कर पता लगा ही लिया कि ये दोनों इस खोह के अन्दर रहते हैं। उसके बाद हम लोगों ने निश्चय कर लिया और उसी खोह के पास छिपकर मैंने स्वयं कई दफे उन लोगों को उसी के अन्दर आते-जाते देखा और यह भी जान लिया कि वे लोग दस-बारह आदमी से कम नहीं हैं।
भूतनाथ––मेरा भी यही खयाल था कि वे लोग दस-बारह से कम न होंगे, खैर जो होगा देखा जायेगा, अब मैं संध्या हो जाने पर उस खोह के अन्दर जाऊँगा, तुम लोग हमारी हिफाजत का खयाल रखना और इसके अतिरिक्त इस बात का भी पता लगाना कि जिस तरह मैं उनकी टोह में लगा हुआ हूँ, उसी तरह और कोई भी उनका पीछा करता है या नहीं।
आदमी––जो आज्ञा।
भूतनाथ––हाँ, एक बात और पूछना है। तुम लोगों ने जिन दस-बारह आदमियों को खोह के अन्दर आते-जाते देखा है वे सभी अपने चेहरे पर नकाब रखते हैं या सिर्फ दो-चार?
आदमी––जी, हम लोगों ने जितने भी आदमियों को देखा सभी को नकाबपोश पाया।
भूतनाथ––अच्छा, तो तुम अब जाओ और अपने साथियों को मेरा हुक्म सुना कर होशियार कर दो।
इतना कहकर भूतनाथ खड़ा हो गया और अपने दोनों आदमियों को बिदा करने के बाद पश्चिम की तरफ रवाना हुआ। इस समय भूतनाथ अपनी असली सुरत में न था बल्कि सूरत बदल कर अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए था।
यहाँ से लगभग कोस भर की दूरी पर उस खोह का मुहाना था, जिसका पता भूतनाथ के आदमियों ने दिया था। संध्या होने तक भूतनाथ इधर-उधर जंगल में घूमता रहा और जब अँधेरा हो गया, तब उस खोह के मुहाने पर पहुँचकर चारों तरफ देखने लगा।
यह स्थान एक घने और भयानक जंगल में था। छोटे पहाड़ के निचले हिस्से में दो-तीन आदमियों के बैठने लायक एक गुफा थी और आगे से पत्थरों के बड़े-बड़े ढोकों ने उसका रास्ता रोक रखा था। उसके नीचे की तरफ पानी का एक छोटा-सा नाला बहता जिसमें इस समय कम, मगर साफ पानी बह रहा था और उस नाले के दोनों तरफ भी पेड़ों की बहुतायत थी। भूतनाथ ने सन्नाटा पाकर उस गुफा के अन्दर पैर रखा और सुरंग की तरह रास्ता पाकर टटोलता हुआ थोड़ी दूर तक बेखटके चला गया। आगे जाकर जब रास्ता खराब मालूम हुआ, तब उसने बटुए में से मोमबत्ती निकाल कर जलाई और चारों तरफ देखने लगा। सामने का रास्ता बिल्कुल बन्द पाया अर्थात् सामने की तरफ पत्थर की दीवार थी, जो एक चबूतरे की तरह मालूम पड़ती थी, मगर वहाँ की छत इतनी ऊँची जरूर थी कि आदमी उस चबूतरे के ऊपर चढ़-कर बखूबी खड़ा हो सकता था, अतः भूतनाथ उस चबूतरे के ऊपर चढ़ गया और जब आगे की तरफ देखा तो नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ नजर आईं।
भूतनाथ सीढ़ियों की राह नीचे उतर गया और अन्त में उसने एक छोटे से दरवाजे का निशान देखा, जिसमें किवाड़-पल्ले इत्यादि की कोई जगह न थी, केवल बाएँ दाहिने और नीचे की तरफ चौखट का निशान था। दरवाजे के अन्दर पैर रखने के बाद सुरंग की तरह रास्ता दिखाई दिया, जिसे गौर से अच्छी तरह देखने के बाद भूतनाथ ने मोमबत्ती बुझा दी और टटोलता हुआ आगे की तरफ बढ़ा। थोड़ी दूर जाने के बाद सुरंग खतम हुई और रोशनी दिखाई दी। यह हल्की और नाम मात्र की रोशनी किसी चिराग या मशाल की न थी बल्कि आसमान पर चमकते हुए तारों की थी क्योंकि वहाँ से आसमान तथा सामने की तरफ मैदान का एक छोटा-सा टुकड़ा दिखाई दे रहा था।
यह मैदान आठ या दस बीघे से ज्यादा न होगा। बीच में एक छोटा-सा बंगला था, उसके आगे वाले दालान में कई आदमी बैठे हुए दिखाई देते थे तथा चारों तरफ बड़े-बड़े जंगली पेड़ों की भी कमी न थी। सन्नाटा देखकर भूतनाथ सुरंग के पार निकल गया और एक पेड़ की आड़ देकर इस खयाल में खड़ा हो गया कि मौका मिलने पर आगे की तरफ बढ़ेंगे। थोड़े ही देर में भूतनाथ को मालूम हो गया कि उसके पास ही एक पेड़ की आड़ में कोई दूसरा आदमी भी खड़ा है। यह दूसरा आदमी वास्तव में देवीसिंह था जो भूतनाथ के पीछे ही पीछे थोड़ी देर बाद यहां आकर पेड़ की आड़ में खड़ा हो गया था और वह भी सूरत बदलने के बाद अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए था इसलिए एक को दूसरे का पहचानना कठिन था।
थोड़ी ही देर बाद दो औरतें अपने-अपने हाथों में चिराग लिए बँगले के अन्दर से निकली और उसी तरफ रवाना हुई जिधर पेड़ की आड़ में भूतनाथ और देवीसिंह खड़े हुए थे। एक तो भूतनाथ और देवीसिंह का दिल इस खयाल से खुटके में था ही कि मेरे पास ही एक पेड़ की आड़ में कोई दूसरा भी खड़ा है, दूसरे इन दो औरतों को अपनी तरफ आते देख और भी घबड़ाये, मगर कर ही क्या सकते थे, क्योंकि इस समय जो कुछ ताज्जुब की बात उन दोनों ने देखी उसे देखकर भी चुप रह जाना उन दोनों की सामर्थ्य से बाहर था अर्थात् कुछ पास आने पर मालूम हो गया कि उन दोनों ही औरतों में से एक तो भूतनाथ की स्त्री है जिसे वह लामाघाटी में छोड़ आया था और दूसरी चम्पा।
भूतनाथ आगे बढ़ना ही चाहता था कि पीछे से कई आदमियों ने आकर उसे पकड़ लिया और उसी की तरह देवीसिंह भी बेकाबू कर दिये गये।