चन्द्रकान्ता सन्तति
देवकीनन्दन खत्री
देवकीनन्दन खत्री का तिलिस्मी उपन्यास, पूरे 24 भाग
- मुफ़्त
- मुफ़्त
- सिर्फ़ पढ़ने के लिए
- अध्याय
- 24
- अध्याय
- मिनट
- ~3501
- मिनट
- पहली बार छपी
- 1896
- हिंदी
इस किताब के बारे में
ऐयारों, तिलिस्म, गुप्त सुरंगों और भेस बदलने की हैरतअंगेज़ दुनिया। चन्द्रकान्ता की अगली पीढ़ी, कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की यह कहानी पढ़ने के लिए कभी लोगों ने हिन्दी सीखी थी। सभी 24 भाग, शुरू से अंत तक।
लेखक: देवकीनन्दन खत्री (1861–1913)
विषय-सूची
- 1 पहला भाग
- 2 दूसरा भाग
- 3 तीसरा भाग
- 4 चौथा भाग
- 5 पाँचवाँ भाग
- 6 छठा भाग
- 7 सातवाँ भाग
- 8 आठवाँ भाग
- 9 नौवाँ भाग
- 10 दसवाँ भाग
- 11 ग्यारहवाँ भाग
- 12 बारहवाँ भाग
- 13 तेरहवाँ भाग
- 14 चौदहवाँ भाग
- 15 पन्द्रहवाँ भाग
- 16 सोलहवाँ भाग
- 17 सत्रहवाँ भाग
- 18 अठारहवाँ भाग
- 19 उन्नीसवाँ भाग
- 20 बीसवाँ भाग
- 21 इक्कीसवाँ भाग
- 22 बाईसवाँ भाग
- 23 तेईसवाँ भाग
- 24 चौबीसवाँ भाग
यह किताब मुफ़्त क्यों है
- लेखक का निधन 1913 में हुआ; भारत में लेखक की मृत्यु के 60 साल बाद (1974 से) कॉपीराइट ख़त्म।
- Published in 24 parts in the 1890s (the author founded his own Lahari Press in September 1898, after he had written all of Chandrakanta and Chandrakanta Santati, according to the biography in the scanned edition), so public domain in the United States. The year shown is the year the series was completed; the exact dates of the individual parts are not stated in the scan.
- स्रोत: हिन्दी विकिस्रोत (Hindi Wikisource) — भारती भाषा प्रकाशन, दिल्ली (1995) का छह खंडों वाला स्कैन
- सभी 24 भाग पूरे हैं। संपादक की भूमिका, जीवनी और पन्नों के नीचे की टिप्पणियाँ (पिछले भागों के हवाले) शामिल नहीं की गईं। पाठ स्कैन से टाइप किया गया है, इसलिए कहीं-कहीं वर्तनी की छोटी गलतियाँ हो सकती हैं।