चन्द्रकान्ता सन्तति
अठारहवाँ भाग
१
कह सकते हैं कि तारासिंह के हाथ में नानक का मुकदमा दे ही दिया गया। राजा वीरेन्द्रसिंह ने तारासिंह को इस काम पर मुकर्रर किया था कि वह नानक के घर जाय और उसकी चालचलन तथा उसके घर के सच्चे-सच्चे हाल की तहकीकात करके लौट आवे मगर इसके पहले कि तारासिंह नानक की चालचलन और उसकी नीयत का हाल जाने, उसने नानक के घर ही की तहकीकात शुरू कर दी और उसकी स्त्री का भेद जानने के लिए उद्योग किया। जब नानक की स्त्री सहज ही में तारासिंह के पास आ गई तो उसे उसकी बदचलनी का विश्वास हो गया और उसने चाहा कि किसी तरह नानक की स्त्री को टाल दे और इसके बाद नानक की नीयत का अन्दाजा करे मगर उसकी कार्रवाई में उस समय विघ्न पड़ गया जब नानक की स्त्री तारासिंह के सामने जा बैठी और उसी समय बाहर से किसी के चिल्लाने की आवाज आई।
हम कह चुके हैं कि नानक के यहाँ एक मजदूरनी थी। वह नानक के काम की चाहे न हो मगर उसकी स्त्री के लिए उपयुक्त पात्र थी और उसके द्वारा नानक की स्त्री का सब काम चलता था। मगर इस तारासिंह वाले मामले में नानक की स्त्री श्यामा की बातचीत हनुमान छोकरे की मार्फत हुई थी, इसलिए बीच वाले मुनाफे की रकम में उस मजदूरनी के हाथ झंझी कौड़ी भी न लगी थी जिसका उसे बहुत रंज हुआ और वह दोस्ती के बदले में दुश्मनी करने पर उतारू हो गई। इसलिए कि श्यामारानी को उससे किसी तरह का पर्दा तो था ही नहीं, उसने मजदूरनी से अपना भेद तो सब कह दिया मगर उसके हानि-लाभ पर ध्यान न दिया। इसलिए वह मजदूरनी चुपचाप सब कार्रवाई देखती-सुनती और समझती रही, मगर जब श्यामारानी तारासिंह के यहाँ चली गई और कुछ देर बाद नानक घर में आया तो उसने अपना नाम प्रकट न करने का वादा कराके सब हाल नानक से कह दिया और तारासिंह का मकान दिखा देने के लिए भी तैयार हो गई क्योंकि उसे पता-ठिकाना तो मालूम हो ही चुका था।
नानक ने जब सुना कि उसकी स्त्री किसी परदेशी के घर गई है, तब उसे बड़ा ही क्रोध आया और उसने ऐयारी के सामान से लैस होकर अकेले ही अपनी स्त्री का पीछा किया।
नानक ने यद्यपि किसी कारण से लोकलाज को तिलांजलि दे दी थी मगर ऐयारी को नहीं। उसे अपनी ऐयारी पर बहुत भरोसा था और वह दस-पाँच आदमियों में अकेला घुस कर लड़ने की हिम्मत भी रखता था। यही सबब था कि उसने किसी संगी-साथी का खयाल न करके अकेले ही श्यामारानी का पीछा किया, हाँ यदि उसे यह मालूम होता कि श्यामारानी का उपपति तारासिंह है तो कदापि अकेला न जाता।
नानक औरत के वेष में घर से बाहर निकला और जब उस मकान के पास पहुँचा जिसमें तारासिंह ने डेरा डाला था, तो कमन्द लगा कर मकान के ऊपर चढ़ गया और धीरे-धीरे उस कोठरी के पास जा पहुँचा जिसके अन्दर तारासिंह और श्यामारानी थी और बाहर तारासिंह का चेला और नानक का नौकर हनुमान हिफाजत कर रहा था। वहाँ पहुँचते ही उसने एक लात अपने नौकर की कमर में ऐसी जमाई कि वह तिलमिला गया और जब वह चिल्लाया तो उसे चिढ़ाने की नीयत से नानक स्वयं भी औरतों ही की तरह चिल्ला उठा।
यही वह चिल्लाने की आवाज थी जिसे कोठरी के अन्दर बैठे हुए तारासिंह और श्यामा ने सुना था। चिल्लाने की आवाज सुनते ही तारासिंह उठ खड़ा हुआ और हाथ में खंजर लिए कोठरी के बाहर निकला। वहाँ अपने चेले और हनुमान के अतिरिक्त एक औरत को खड़ा देख वह ताज्जुब करने लगा और उसने औरत अर्थात् नानक से पूछा, "तू कौन है?"
नानक––पहले तू ही बता कि तू कौन है जिसमें तुझे मार डालने के बाद यह तो मालूम रहे कि मैंने फलाने को मारा था।
तारासिंह––तेरी ढिठाई पर मुझे ताज्जुब ही नहीं होता, बल्कि यह भी मालूम होता है कि तू औरत नहीं, कोई ऐयार है!
नानक––(गम्भीरता के साथ) बेशक मैं ऐयार हूँ तभी तो अकेले तेरे घर में घुस आया हूँ! शैतान, तू नहीं जानता कि बुरे कर्मों का फल क्योंकर मिलता है और वह कितना बड़ा ऐयार है जिसकी स्त्री को तूने धोखा देकर बुला लिया है!
तारासिंह––(जोर से हँस कर) अ ह ह ह! अब मुझे पूरा विश्वास हो गया कि बेहया नानक तू ही है और शायद अपनी पतिव्रता की आमदनी गिनने के लिए यहाँ आ पहुँचा है। अच्छा तो अब तुझे यह भी जान लेना चाहिए कि जिसका तू मुकाबला कर रहा है उसका नाम तारासिंह है और वह राजा वीरेन्द्रसिंह की आज्ञानुसार तेरे चालचलन की तहकीकात करने आया है।
तारासिंह और राजा वीरेन्द्रसिंह का नाम सुनते ही नानक सन्न हो गया। उधर उसकी स्त्री ने जब यह जाना कि इस कोठरी के बाहर उसका पति खड़ा है, तो वह नखरे से रोने और पीटने लगी तथा यह कहती हुई कोठरी के बाहर निकल कर नानक के पैरों पर गिर पड़ी कि मुझे तो तुम्हारा नाम लेकर हनुमान यहाँ ले आया है।
नानक थोड़ी देर तक तो सन्नाटे में रहा, इसके बाद तारासिंह की तरफ देख के बोला।
नानक––क्या ऐयारों का यही धर्म है कि दूसरों की औरतों को खराब करें और बदकारी का धब्बा अपने नाम के साथ लगावें!
तारासिंह––नहीं-नहीं, ऐयारों का यह काम नहीं है, और ऐयारों को यह भी उचित नहीं है कि सब तरफ का खयाल छोड़ केवल औरत की कमाई पर गुजारा करें। मैंने तेरी औरत को किसी बुरी नीयत से नहीं बुलाया बल्कि चालचलन का हाल जानने के लिए ऐसा किया है। जो बातें तेरे बारे में सुनी गई हैं और जो कुछ यहाँ आने पर मैंने मालूम की हैं उनसे जाना जाता है कि तू बड़ा ही कमीना और नमकहराम है। नमकहराम इसलिए कि मालिक के काम की तुझे कुछ भी फिक्र नहीं है और इसका सबूत केवल मनोरमा ही बहुत है जिसके साथ तू शादी किया चाहता था और जिसने जूतियों से तेरी पूजा ही नहीं की बल्कि तिलिस्मी खंजर भी तुझसे ले लिया।
नानक––यह कोई आवश्यक नहीं है कि ऐयारों का काम सदैव पूरा ही उतरा करे, कभी धोखा खाने में न आवे! यदि मनोरमा की ऐयारी मुझ पर चल गई तो इसके बदले में कमीना और नमकहराम कहे जाने लायक मैं नहीं हो सकता। क्या तुमने और तुम्हारे बाप ने कभी धोखा नहीं खाया? और मेरी स्त्री को जो तुम बदनाम कर रहे हो, वह तुम्हारी भूल है। वह तो खुद कह रही है कि 'मुझे तो तुम्हारा नाम लेकर हनुमान यहाँ ले आया है।' मेरी स्त्री बदकार नहीं है बल्कि वह साध्वी और सती है, असल में बदमाश तू है जो इस तरह धोखा देकर पराई स्त्री को अपने घर में बुलाता है और मुझे यहाँ पर अकेला जान कर गालियाँ देता है, नहीं तो मैं तुझसे किसी बात में कम नहीं हूँ।
तारासिंह––नहीं-नहीं, तू बहुत बातों में मुझसे बढ़ के है, और मैं भी अकेला समझ तुझे गालियाँ नहीं देता बल्कि दोषी जान कर गालियाँ देता हूँ। तू अपनी स्त्री को साध्वी सती छोड़ के चाहे माता से भी बढ़ कर समझ ले, मेरी कोई हानि नहीं है। मैं वास्तव में जिस काम के लिए आया था उसे कर चुका, अब यहाँ से जाकर मालिक से सब कह दूँगा और तेरे गम्भीर स्वभाव की प्रशंसा भी करूँगा, जिसे सुनकर तेरा बाप बहुत ही प्रसन्न होगा जो अपनी एक भूल के कारण हद से ज्यादे पछता रहा है और बदनामी का टीका मिटाने के लिए जी-जान से उद्योग कर रहा है मगर तुझ कपूत के मारे कुछ भी करने नहीं पाता। (हँस कर) ऐसी कुलटा स्त्री को सती और साध्वी समझने वाला अपने को ऐयार कहे, यही आश्चर्य है।
नानक––मेरे ऐयार होने में तुम्हें कुछ शक है?
तारासिंह––कुछ? अजी, बिल्कुल शक है!
नानक––यदि तुम ऐसा समझ भी लो तो इसमें मेरी कुछ हानि नहीं है, इससे ज्यादा तुम और कुछ भी नहीं कर सकते कि यहाँ से जाकर राजा वीरेन्द्रसिंह से मेरी झूठी शिकायतें करो मगर इस बात को भी समझ लो कि मैं किसी का ताबेदार नहीं हूँ।
तारासिंह––(क्रोध से) तू किसी का ताबेदार नहीं है?
तारासिंह को क्रोधित देखकर नानक डर गया, केवल इसलिए कि इस जगह वह अकेला था और अकेले ही इस मकान में तारासिंह का मुकाबला करना अपनी ताकत से बाहर समझता था जिसके दो चेले भी यहाँ मौजूद थे, अस्तु, समय पर ध्यान देकर वह चुप हो गया मगर दिल में वह तारासिंह का जानी दुश्मन हो गया। उसने मन में निश्चय कर लिया कि तारासिंह को किसी-न-किसी ढंग से अवश्य नीचा दिखाना बल्कि मार डालना चाहिए।
नानक ने और भी न मालूम क्या सोचकर अपनी जुबान को रोका और सिर नीचा करके चुपचाप खड़ा रह गया। तारासिंह ने कहा, "बस, अब तू जा और अपनी सती-साध्वी स्त्री तथा नौकर को भी अपने साथ लेता जा!"
नानक ने इस आज्ञा को गनीमत समझा और चुपचाप वहाँ से रवाना हो गया। उसकी स्त्री और नौकर भी उसके पीछे चल पड़े।
उसी समय तारासिंह ने भी अपना डेरा कूच कर दिया और शहर के बाहर हो चुनार का रास्ता लिया, मगर दिल में सोच लिया कि कम्बख्त नानक अवश्य मेरा पीछा करेगा, बल्कि ताज्जुब नहीं कि धोखा देकर जान लेने की फिक्र भी करे।
२
संध्या होना ही चाहती है। पटने की बहुत बड़ी सराय के दरवाजे पर मुसाफिरों की भीड़ हो रही है। कई भटियारे भी मौजूद हैं जो तरह-तरह के आराम की लालच दे अपनी-अपनी तरफ मुसाफिरों को ले जाने का उद्योग कर रहे हैं, और मुसाफिर लोग भी अपनी-अपनी इच्छानुसार उनके साथ जाकर डेरा डाल रहे हैं। मुसाफिरों को भटियारी के सुपुर्द करके भटियारे पुनः सराय के फाटक पर लौट आते और नये मुसाफिरों को अपनी तरफ ले जाने का उद्योग करते हैं।
यह सराय बहुत बड़ी और इसका फाटक मजबूत तथा बड़ा था। फाटक के दोनों तरफ (मगर दरवाजे के अन्दर) बारह सिपाही और एक जमादार का डेरा था जो इस सराय में रहने वाले मुसाफिरों की हिफाजत के लिए राजा की तरफ से मुकर्रर थे, उनकी तनखाह सराय के भटियारों से वसूल की जाती थी। ये ही सिपाही बारी-बारी से घूमकर सराय के अन्दर पहरा दिया करते थे और जब मुसाफिरों को किसी तरह की तकलीफ होती तो सीधे राजदीवान के पास जाकर रपट किया करते थे।
थोड़ी देर बाद जब सब मुसाफिरों के टिकने का बन्दोबस्त हो गया और सराय के फाटक पर कुछ सन्नाटा हुआ तो उन सिपाहियों का जमादार अपनी जगह से उठकर सराय के अन्दर इसलिए घूमने लगा कि देखें सब मुसाफिरों का ठीक-ठीक बन्दोबस्त हो गया या नहीं। वह जमादार केवल घूमता ही न था, बल्कि भटियारों से भी तरह-तरह के सवाल करके मुसाफिरों का हाल दरियाफ्त करता जाता था।
जमादार घूमता हुआ जब उत्तर की तरफ वाले उस कमरे के पास पहुँचा जो इस सराय में सबसे अच्छा, ऊँचा, दो-मंजिला और अमीरों के रहने लायक बना और सजा हुआ था तो कुछ देर के लिए अटक गया और उस कमरे तथा उसमें रहने वालों की तरफ ध्यान देकर देखने लगा, क्योंकि उसमें एक जौहरी का डेरा पड़ा हुआ था जो बहुत मालदार मालूम होता था। वह जवहरी भी जमादार को देखकर कमर के बाहर निकल आया और इशारे से जमादार को अपने पास बुलाया।
पास पहुँचने पर जमादार ने उस जौहरी को एक रोआबदार और अमीर आदमी पाकर सलाम किया और सलाम का जवाब पाने के बाद बोला, "कहिए, क्या है?"
जौहरी––मालूम होता है किस इस सराय की हिफाजत महाराज की तरफ से तुम्हारे सुपुर्द है और वे फाटक पर रहने वाले सिपाही सब तुम्हारे ही अधीन हैं।
जमादार––जी हाँ।
जौहरी––तो पहरे का इन्तजाम क्या है? किस ढंग से पहरा दिया जाता है?
जमादार––मेरे पास बारह सिपाही हैं जिनके तीन हिस्से कर देता हूँ, चार-चार आदमी एक-एक दफे घूमकर पहरा देते हैं।
जौहरी––एक साथ रहकर?
जमादार––जी नहीं, चारों अलग-अलग रहते हैं, घूमते समय थोड़ी-थोड़ी देर में मुलाकात हुआ करती है।
जौहरी––मगर ऐसा तो···(कुछ रुककर) यों खड़े-खड़े बातें करना मुनासिब न होगा, आओ, कमरे में जरा बैठ जाओ, हमें तुमसे कई जरूरी बातें करनी हैं।
इतना कहकर जौहरी कमरे के अन्दर चला गया और उसके पीछे-पीछे जमादार भी यह कहता हुआ चला गया कि "कुछ देर तक आपके पास ठहरने में हर्ज नहीं है मगर ज्यादा देर तक···"
वह कमरा कुछ तो पहले ही से दुरुस्त था और कुछ जोहरी साहब ने अपने सामान से उसे रौनक दे दी थी। फर्श के एक तरफ बड़ा-सा ऊनी गलीचा बिछा हुआ था, उसी पर जाकर जौहरी साहब बैठ गये और जमादार भी उन्हीं के पास, मगर गलीचे के नीचे बैठ गया। बैठने के साथ ही जौहरी साहब ने जेब में से पाँच अशफियाँ निकाली और जमादार की तरफ बढ़ा के कहा, "अपने फायदे के लिए मैं तुम्हारा समय नष्ट कर रहा हूँ और करूँगा तब उसका हर्जाना पहले ही दे देना उचित है।"
जमादार––नहीं-नहीं, इसकी क्या जरूरत है। इतने समय में मेरा कोई हर्ज न होगा!
जौहरी––समय का व्यर्थ नष्ट होना ही हर्ज कहलाता है, मैं जिस तरह अपने समय की प्रतिष्ठा करता हूँ, उसी तरह दूसरे के समय की भी।
जमादार––हाँ, ठीक है। मगर···मैं तो···आपका···
जौहरी––नहीं-नहीं, इसे अवश्य लेना होगा।
यों तो जमादार ऊपर के मन से चाहे जो कहे, मगर अशर्फी देखकर उसके मुँह में पानी भर आया था। उसने सोचा कि यह जौहरी एक मामूली बात के लिए जब पाँच अशर्फियाँ देता है तो अगर मैं इसका काम करूँगा तो बेशक बहुत बड़ी रकम मुझे देगा। ऐसा देने वाला तो आज तक मैंने देखा ही नहीं। अब इस रकम को हाथ से न जाने देना चाहिए।
जमादार––(अशर्फियाँ लेकर) कहिये, क्या आज्ञा होती है?
जौहरी––हाँ, तो चार आदमी का पहरा बँधा है?
जमादार––जी हाँ।
जौहरी––तो तुम्हें तो न घूमना पड़ता होगा?
जमादार––जी नहीं, मैं अपने ठिकाने उसी फाटक पर बैठा रहता हूँ और बाकी के आठ आदमी भी मेरे पास ही सोये रहते हैं। जब पहरा बदलने का समय होता है तो घण्टे की आवाज से होशियार करके दूसरे चार को पहरे पर भेज देता हूँ और उन चारों को बुलाकर आराम करने की आज्ञा देता हूँ। आप अपना मतलब तो कहिए!
जौहरी––मेरा मतलब केवल इतना ही है कि मैं आज चार दिन का जागा हुआ हूँ, सफर में आराम करने की नौबत नहीं आई, मगर आज सब दिन की कसर मिटाना अर्थात् अच्छी तरह सोना चाहता हूँ।
जमादार––तो आप आराम से सोइये, कोई हर्ज नहीं।
जौहरी––मैं क्योंकर बेफिक्री के साथ सो सकता हूँ! मेरे साथ बहुत बड़ी रकम है। (कमरे में रखे हुए सन्दूकों की तरफ इशारा करके) इन सभी में जवाहरात की चीजें भरी हुई हैं। जब तक मेरे मन के माफिक इनकी हिफाजत का बन्दोबस्त न हो जायगा, तब तक मुझे नींद आ ही नहीं सकती।
जमादार––आप इन्हें बहुत बड़ी हिफाजत के अन्दर समझिए, क्योंकि इस सराय के अन्दर से चोरी करके कोई बाहर नहीं निकल सकता, इसलिए कि फाटक बन्द करके ताली मैं अपने पास रखता हूँ और सिवाय फाटक के दूसरे किसी तरफ से किसी के निकल जाने का रास्ता ही नहीं है।
जौहरी––ठीक है, मगर आखिर बहुत सवेरे फाटक खुलता ही होगा। कौन ठिकाना मैं कई दिनों का जागा हुआ गहरी नींद में सो जाऊँ और मेरे आदमी भी मुझे बेफिक्र देख खुर्राटे लेने लगें और दिन चढ़े तक किसी की आँख ही न खुले, तो ऐसी हालत में कोई चोरी करेगा भी तो प्रातः समय में फाटक खुलने पर उसका निकल जाना कोई बड़ी बात न होगी।
जमादार––ठीक है, मगर मैं वादा करता हूँ कि सुबह मैं आपसे पूछकर फाटक खोलूँगा।
जौहरी हो सकता है, परन्तु कदाचित चोरी हो ही जाय और चोर पकड़ा भी जाय तो मुझे राजा या किसी राजकर्मचारी के पास सबूत देने के लिए जाना पड़ेगा और ऐसा होने से मेरा बहुत बड़ा हर्ज होगा, ताज्जुब नहीं कि राजा साहब या राजकर्मचारी मुझे ठहरने की आज्ञा दें, मगर मैं एक दिन भी नहीं रुक सकता, इत्यादि बहुत-सी बातों को सोचकर मैं चाहता हूँ कि चोरी होने का शक ही न रहे और मैं आराम के साथ टाँगें फैलाकर सोऊँ और यह बात यदि तुम चाहो तो सहज ही में हो सकती है, इसके बदले में मैं तुम्हें अच्छी तरह खुश कर दूँगा।
जमादार––कोई चिन्ता नहीं मैं अपने सिपाहियों को हुक्म दे दूँगा कि चार में से एक आदमी सिर्फ आपके दरवाजे पर और तीन आदमी तमाम सराय में घूम-घूमकर पहरा दिया करें।
जौहरी––बस-बस, इतने ही से मैं बेफिक्र हो जाऊँगा। अपने सिपाहियों को यह भी ताकीद कर देना कि मेरे सिपाहियों को सोने न दें! यद्यपि मैं भी अपने आदमियों को जागने के लिए सख्त ताकीद कर दूँगा, मगर वे कई दिन के जागे हुए हैं, नींद आ जाय तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है। हाँ, एक तरकीब मुझे और मालूम है जो इससे भी सहज में हो सकती है। अर्थात् तुम स्वयं अकेले भी यदि यहाँ अपने सोने का बन्दोबस्त रखोगे तो तमाम रात यहाँ अमन-चैन बना रहेगा, पहरा बदलने के समय···
जमादार––मैं आपका मतलब समझ गया, मगर नहीं, ऐसा करने से मेरी बदनामी हो जायगी, मुझे हरदम फाटक पर मौजूद ही रहना चाहिए, क्योंकि रात भर में पचासों दफे लोग फाटक पर मेरे पास तरह-तरह की फरियाद करने आया करते हैं। खैर, आप इस बारे में चिन्ता न कीजिए, मैं आपके माल-असबाब की निगहबानी का पूरा इन्तजाम कर दूँगा, अगर आपका कुछ नुकसान हो तो मेरा जिम्मा।
कुछ और बातचीत करने के बाद जमादार अपने स्थान पर चला गया और थोड़ी देर बाद प्रतिज्ञानुसार उसने पहरे का बन्दोबस्त भी कर दिया।
पाठक, यह सौदागर महाराज हमारे उपन्यास का कोई नवीन पात्र नहीं है, बल्कि बहुत प्राचीन पात्र तारासिंह है जो नानक की चालचलन का पता लगाके चुनारगढ़ लौट जा रहा है। इसे इस बात का विश्वास हो गया कि नानक मेरा पीछा करेगा और ऐयारी के कायदे को छप्पर पर रख के जहाँ तक हो सकेगा, मुझे नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगा, इसलिए वह इस ढंग से सफर कर रहा है। हकीकत में तारासिंह का खयाल बहुत ठीक था। नानक, तारासिंह को नुकसान पहुँचाने, बल्कि जान से मार डालने की कसम खा चुका था। केवल इतना ही नहीं, बल्कि वह अपने बाप का तथा राजा वीरेन्द्रसिंह का भी विपक्षी बन गया था, क्योंकि अब उसे किसी तरफ से किसी तरह की उम्मीद न रही थी। अब वह (नानक) भी अपने शागिर्दो को साथ लिए हुए तारासिंह के पीछे-पीछे सफर कर रहा है और आज उसका भी डेरा इसी सराय में पड़ा है क्योंकि पहले ही से पता लगाए रहने के कारण वह तारासिंह की पूरी खबर रखता है और जानता है कि तारासिंह सौदागर बनकर इसी सराय में उतरा हुआ है। नानक यद्यपि तारासिंह को फँसाने का उद्योग कर रहा है, मगर उसे इस बात की खबर कुछ भी नहीं है कि तारासिंह भी मेरी तरफ से गाफिल नहीं है और उसे मेरा रत्ती-रत्ती हाल मालूम है। अब देखना चाहिए, कि किसकी चालाकी कहाँ तक चलती है।
रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। सराय के अन्दर बिल्कुल सन्नाटा तो नहीं है, मगर पहरा देने वालों के अतिरिक्त बहुत कम आदमी ऐसे हैं जिन्हें अपनी कोठरी के बाहर की खबर हो। सराय का बड़ा फाटक बन्द है, पहरे के सिपाहियों में से एक तो तारासिंह (सौदागर) के दरवाजे पर टहल रहा है और बाकी के तीन घूम-घूमकर इस बहुत बड़ी सराय के अन्दर पहरा दे रहे हैं।
तारासिंह के साथ दो आदमी तो इसके शागिर्द ही हैं और दो नौकर ऐसे भी हैं जिन्हें तारासिंह ने रास्ते ही में तनख्वाह मुकर्रर करके रख लिया था, मगर ये दोनों नौकर तारासिंह के सच्चे हाल को कुछ भी नहीं जानते, इन्हें केवल इतना ही मालूम है कि तारासिंह एक अमीर सौदागर है। इस समय ये दोनों नौकर कमरे के बाहर दालान में पड़े खुर्राटे ले रहे हैं और तारासिंह तथा उसके शागिर्द कमरे के अन्दर बैठे आपस में कुछ बातचीत कर रहे हैं। कमरे का दरवाजा भिड़काया हुआ है।
तारासिंह का एक शागिर्द कमरे के बाहर निकला और उसने चारों तरफ निगाह दौड़ाने के बाद पहरे वाले सिपाही से कहा, "तुम्हें सौदागर साहब बुला रहे हैं। जाओ सुन आओ, तब तक तुम्हारे बदले मैं पहरा देता हूँ। अन्दर जाकर दरवाजा भिड़का देना, खुला मत रखना।"
हुक्म पाते ही लालची सिपाही, जिसे विश्वास था कि हमारे जमादार को कुछ मिल चुका है और मुझे भी अवश्य मिलेगा, कमरे के अन्दर घुस गया और बहुत देर तक तारासिंह का शागिर्द इधर-उधर टहलता रहा। इसी बीच में उसने देखा कि एक आदमी कई दफे इस तरफ आया, मगर किसी को टहलता देखकर लौट गया।
बहुत देर के बाद कमरे के अन्दर से दो आदमी बाहर निकले, एक तो तारासिंह का दूसरा शागिर्द और दूसरा स्वयं सौदागर-भेषधारी तारासिंह। तारासिंह के हाथ में सिपाही का ओढ़ना मौजूद था जिसे अपने शागिर्द को, जो पहरा दे रहा था, देखकर उसने कहा, "इसे ओढ़कर तुम एक किनारे सो जाओ, अगर कोई तुम्हारे पास आकर बेहोशी की दवा भी सुँघावे तो बेखटके सूँघ लेना और मुझको अपने से दूर न समझना।"
तारासिंह के शागिर्द ने ओढ़ना ले लिया और कहा––"जब से मैं टहल रहा हूँ तब से दो-तीन दफे दुश्मन आया, मगर मुझे होशियार देखकर लौट गया।"
तारासिंह––हाँ, काम में कुछ देर जरूर हो गई है। मैं उस सिपाही को बेहोश करके अपनी जगह सुला आया हूँ और चिराग गुल कर आया हूँ। (हाथ से इशारा करके) अब तुम इस खम्भे के पास लेट जाओ (दूसरे शागिर्द से) और तुम उस दरवाजे के पास जा लेटो। मैं भी किसी ठिकाने छिपकर तमाशा देखूंगा।" तारासिंह की आज्ञानुसार उसके दोनों शागिर्द बताए हुए ठिकाने पर जाकर लेट गये और तारासिंह अपने दरवाजे से कुछ दूर एक मुसाफिर की कोठरी के आगे जाकर लेट रहा, मगर इस ढंग से कि अपनी तरफ की सब कार्रवाई अच्छी तरह देख सके।
आधे घण्टे के बाद तारासिंह ने देखा कि दो आदमी उसके दरवाजे पर आकर खड़े हो गए हैं जिनकी सूरत अँधेरे के सबब दिखाई नहीं देती और यह भी नहीं जान पड़ता कि वे दोनों अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए हैं या नहीं। कुछ अटककर उन दोनों आदमियों ने तारासिंह के आदमियों को देखा-भाला, इसके बाद एक आदमी कमरे का दरवाजा खोलकर अन्दर घुस गया और आधी घड़ी के बाद जब वह कमरे के बाहर निकला तो उसकी पीठ पर एक बड़ी-सी गठरी भी दिखाई पड़ी। गठरी पीठ पर लादे हुए अपने साथी को लेकर वह आदमी सराय के दूसरे भाग की तरफ चला गया। जब वह दूर निकल गया तो तारासिंह अपने दरवाजे पर आया और शागिर्दो को चैतन्य पाने पर समझ गया कि दुश्मन ने उसके आदमी को बेहोशी की दवा नहीं सुँघाई थी। तारासिंह के दोनों शागिर्द उठे, मगर तारासिंह उन्हें उसी तरह लेटे रहने की आज्ञा देकर अपने कमरे के अन्दर चला गया और भीतर से दरवाजा बन्द कर लिया। रोशनी करने के बाद तारासिंह ने देखा कि दुश्मन ने उसकी कोई चीज नहीं चुराई है, वह केवल उस सिपाही को उठाकर ले गया है जिसे तारासिंह अपनी सूरत का सौदागर बनाकर अपनी जगह लिटा आया था। तारासिंह अपनी कार्रवाई पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने कमरे के बाहर निकलकर अपने शागिर्दो को उठाया और कहा, 'हमारा मतलब सिद्ध हो गया, अब इसमें कोई सन्देह नहीं कि कम्बख्त नानक अपनी मुराद पूरी हो गई समझ के इसी समय सराय का फाटक खुलवाकर निकल जायगा और मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ, अस्तु अब उचित है कि तुम दोनों में से एक आदमी तो यहाँ पहरा दे और एक आदमी सराय के फाटक की तरफ जाय और छिपकर मालूम करे कि नानक कब सराय के बाहर निकलता है। जिस समय वह सराय के बाहर हो उसी समय मुझे इत्तिला मिले।"
इतना कहकर तारासिंह कमरे के अन्दर चला गया और भीतर से दरवाजा बन्द कर लेने के बाद कमरे की छत पर चढ़ गया, इसलिए कि वह कमरे के ऊपर से अपने मतलब की बात बहुत-कुछ देख सकता था।
इस समय नानक की खुशी का कोई ठिकाना न था। वह समझे हुए था कि हमने तारासिंह को गिरफ्तार कर लिया, अस्तु जहाँ तक जल्द हो सके सराय के बाहर निकल जाना चाहिए। इसी खयाल से उसने अपना डेरा कूच कर दिया और सराय के फाटक पर आकर जमादार को बहुत-कुछ कह-सुनकर याद दिला के दरवाजा खुलवाया और बाहर हो गया।
तारासिंह को जब मालूम हुआ कि नानक सराय के बाहर निकल गया तब उसने यहाँ चोरी हो जाने की खबर मशहूर करने का बन्दोबस्त किया। उसके पास जो सन्दुक थे, जिनमें कीमती माल होने का लोगों या जमादार को गुमान था, उनका ताला तोड़कर खोल दिया क्योंकि वास्तव में सन्दूक विल्कुल खाली केवल दिखाने के लिए थे। इसके बाद अपने नौकरों को होशियार किया और खूब रोशनी करके 'चोर'-'चोर' का हल्ला मचाया और जाहिर किया कि हमारी लाखों रुपये की चीज (जवाहिरात) चोरी हो गई।
चोरी की खबर सुन बेचारा जमादार दौड़ा हुआ तारासिंह के पास आया जिसे देखते ही तारासिंह ने रोनी सूरत बनाकर कहा, "देखो जमादार, मैं पहले ही कहता था कि मेरे असवाब की खूब हिजाजत होनी चाहिए! आखिर मेरे यहाँ चोरी हो ही गयी! मालूम होता है कि तुम्हारे सिपाही ने मिल कर चोरी करवा दी क्योंकि तुम्हारा सिपाही दिखायी नहीं देता। कहो, अब हम अपने लाखों रुपये के माल का दावा किस पर करें?"
तारासिंह की बात सुनते ही जमादार के तो होश उड़ गए। उसने टूटे हुए सन्दूकों को भी अपनी आँखों से देख लिया और खोज करने पर उस सिपाही को भी न पाया जिसका इस समय पहरे पर मौजूद रहना वाजिब था। यद्यपि जमादार ने उसी समय सिपाहियों को फाटक पर होशियार रहने का हुक्म दे दिया मगर इस बात का उसे बहुत रंज हुआ कि उसने थोड़ी ही देर पहले एक आदमी को डेरा उठाकर सराय के बाहर चले जाने दिया था। उसने तुरन्त ही कई सिपाहियों को उसकी गिरफ्तारी के लिए रवाना किया और तारासिंह से कहा, "मैं इसी समय इस मामले की इत्तिला करने राज-दीवान के पास जाता हूँ।"
तारासिंह––तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ मगर हमारा तो नुकसान हो ही गया। अस्तु, हम भी अपने मालिक के पास इस बात की इत्तिला करने जाते हैं।
जमादार––(ताज्जुब से) तो क्या आप स्वयं मालिक नहीं हैं?
तारासिंह––नहीं, हम मालिक नहीं हैं, बल्कि मालिक के गुमाश्ते हैं। हमें इस बात का बहुत रंज है कि तुमने हमसे पूछे बिना सराय का फाटक खोल दिया और चोर को सराय के बाहर निकल जाने की इजाजत दे दी, यद्यपि तुम मुझसे कह चुके थे कि आपसे पूछे बिना सराय का फाटक न खोलेंगे और इसी हिफाजत के लिए हमने अपनी जेब की अशफियाँ तुम्हारी जेब में डाल दी थीं, मगर अफसोस, मुझे बात की बिल्कुल खबर न थी कि तुम हद से ज्यादा लालची हो, हमारा माल चोरी करवा दोगे और चोर से गहरी रकम रिश्वत लेकर उसे फाटक के बाहर निकल जाने की आज्ञा दे दोगे, और मैं यह भी नहीं जानता था कि इस सराय की हिफाजत करन वाले इस किस्म का रोजगार करते हैं, अगर जानता तो ऐसी सराय में कभी थूकने भी न आता।
तारासिंह ने धमकी के ढंग पर ऐसी-ऐसी बातें जमादार से कहीं कि वह डर गया और सोचने लगा कि नाहक मैंने इनसे पूछे बिना सराय का फाटक खोलकर किसी को जाने दिया, अगर किसी को जाने न देता तो बेशक इनका माल सराय के अन्दर से ही निकल आता, अब बेशक मैं दोषी ठहरता हूँ, ताज्जुब नहीं कि सौदागर की बातों पर दीवान साहब को भी यह शक हो जाय कि जमादार ने रिश्वत ली है। अगर ऐसा हुआ तो मैं कहीं का भी न रहूँगा, मेरी बड़ी दुर्गति की जायगी। चोरी भी ऐसी नहीं है कि जिसे मैं अपने से पूरी कर सकूँ––इत्यादि बातें सोचता हुआ जमादार बहुत ही घबरा गया और बड़ी नर्मी और आजिजी के साथ तारासिंह से माफी माँगकर बोला, "निःसंदेह मुझसे बड़ी भूल हो गई, मगर मैं आपसे वादा करता हूँ कि उस चोर को जो मुझे धोखा देकर और फाटक खुलवाकर चला गया है, अभी गिरफ्तार कर लूँगा, परन्तु मेरी जिन्दगी आपके हाथ में है, अगर आप मुझ पर दया करके फाटक खोल देने वाले मेरे कसूर को छिपावेंगे तो मेरी जान बच जायगी, नहीं तो राजा साहब मेरा सिर कटवा डालेंगे और इससे आपका कुछ लाभ न होगा। मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने उससे एक कौड़ी भी रिश्वत में नहीं ली है! मुझे उस कम्बख्त ने पूरा धोखा दिया है, मगर मैं उसे निःसन्देह गिरफ्तार करूँगा और आपकी रकम को जाने न दूँगा। यदि आपको मुझ पर शक हो और आप समझते हों कि मैंने रिश्वत ली है तो फाटक पर चलकर मेरी कोठरी की तलाशी ले लीजिए और जो कुछ निकले, चाहे वह आपका दिया हो या मेरा खास हो, वह सब आप ले लीजिए मगर आप मेरी जान बचाइये!"
जमादार ने तारासिंह की हद से ज्यादा खुशामद की और यहाँ तक गिड़गिड़ाया कि तारासिंह का दिल हिल गया मगर अपना काम निकालना भी बहुत जरूरी था इसलिए चालबाजी के साथ उसने जमादार का कसूर माफ करके कहा, "अच्छा मैं कसूर तो तुम्हारा माफ कर देता हूँ मगर इस समय जो कुछ मैं तुमसे कहता हूँ उसे बड़ी होशियारी के साथ करना होगा, अगर कसर करोगे तो तुम्हारे हक में अच्छा न होगा।"
जमादार––नहीं-नहीं, मैं जरा भी कसर न करूँगा, जो कुछ आप हुक्म देंगे, वही करूँगा, कहिये क्या आज्ञा होती है?
तारासिंह––एक तो मैं अपनी जुबान से झूठ कदापि न बोलूँगा।
जमादार--(काँपकर) तब मेरी जान कैसे बचेगी?
तारासिंह––तुम मेरी बात पूरी हो लेने दो––दूसरे यहाँ से तुरन्त चले जाने की जरूरत भी है, इसलिए मैं अपने इन (अपने शागिर्दो की तरफ इशारा करके) दोनों साथियों को यहाँ छोड़ जाता हूँ, तुम जब चोर को गिरफ्तार करके अपने राजदीवान या राजा के पास जाना तो इन्हीं दोनों को ले जाना, ये दोनों आदमी अपने को मेरा नौकर कहकर चोरी गई हुई चीजों को बखूबी पहचान लेंगे और ये चोरी के समय मेरा यहाँ मौजूद रहना तथा तुम्हारा कसुर कुछ भी जाहिर न करेंगे और तुम भी इस बात को जाहिर मत करना कि सौदागर का गुमाश्ता भी यहाँ मौजूद था। ये दोनों आदमी अपने काम को पूरी तरह से अंजाम दे लेंगे। हाँ एक बात कहना तो भूल गया, इस सराय के अन्दर जितने आदमी हैं उन सभी की भी तलाशी ले लेना।
जमादार––(दिल में खुश होकर) जरूर उन सभी की तलाशी ले ली जायगी और जो कुछ आपने आज्ञा दी है वह सब किया जायगा। आप अपना हर्ज न कीजिए और जाइए, यहाँ मैं किसी तरह का नुकसान होने न दूँगा।
सौदागर––(तारासिंह) चला जायगा, यह जानकर जमादार अपने दिल में बहुत प्रसन्न हुआ क्योंकि इनके रहने से उसे अपना कसूर प्रकट हो जाने का डर भी था।
जमादार से और भी कुछ बातें करने के बाद तारासिंह अपने दोनों शागिर्दो को एकान्त में ले गया और हर तरह की बातें समझाने के बाद यह भी कहा, "तुम लोग मेरे चले जाने के बाद किसी तरह घबराना नहीं और मुझे हर वक्त अपने पास मौजूद समझना।"
इन सब बातों से छुट्टी पाकर तारासिंह अकेले ही वहाँ से रवाना हो गया।
३
तारासिंह के चले जाने बाद सराय में चोरी की खबर बड़ी तेजी के साथ फैल गई। जितने मुसाफिर उसमें उतरे हुए थे, सब रोके गये। राजदीवान को भी खबर हो गई, वह भी बहुत से सिपाहियों को साथ लेकर सराय में आ मौजूद हुआ। खूब होहल्ला मचा, चारों तरफ तरफ तलाशी और तहकीकात की कार्रवाई होने लगी, मगर सभी को निश्चय इसी बात का था कि चोर सिवाय उसके और कोई नहीं है जो रात रहते ही फाटक खुलवाकर सराय के बाहर निकल गया है। पहरे वाले सिपाही के गायब हो जाने से और भी परेशानी हो रही थी। चोर की गिरफ्तारी में कई सिपाही तो जा ही चुके थे मगर दीवान साहब के हुक्म से और भी बहुत से सिपाही भेजे गये, आखिर नतीजा यह निकला कि दोपहर के पहले ही हजरत नानक प्रसाद गिरफ्तार होकर सराय के अन्दर आ पहुँचे जो अपने खयाल में तारासिंह को गिरफ्तार कर ले गये थे और अभी तक सौदागर का चेहरा धोकर देखने भी न पाये थे, मगर उन कृपानिधान को ताज्जुब था तो इस बात का कि वे चोरी के कसूर में गिरफ्तार किए गये थे।
अभी तक दीवान साहब सराय के अन्दर मौजूद थे। नानक के आते ही चारों तरफ से मुसाफिरों की भीड़ आ जुटी और हर तरफ से नानक पर गालियों की बौछार होने लगी। जिस कमरे में तारासिंह उतरा हुआ था, उसी के आगे वाले दालान में सुन्दर फर्श के ऊपर दीवान साहब विराज रहे थे और उनके पास ही तारासिंह के दोनों शागिर्द भी अपनी असली सूरत में बैठे हुए थे। सामने आते ही दीवान साहब ने क्रोधन्भरी आवाज में नानक से कहा, "क्यों बे! तेरा इतना बड़ा हौसला हो गया कि तू हमारी सराय में आकर इतनी बड़ी चोरी करे!"
नानक––(अपने को बेतरह फँसा हुआ देख हाथ जोड़ के) मुझ पर चोरी का इलजाम किसी तरह नहीं लग सकता। मुझे यह मालूम होना चाहिए कि यहाँ किसकी चोरी हुई है और मुझ पर चोरी का इलजाम कौन लगा रहा है?
दीवान––(तारासिंह के दोनों शागिर्दो की तरफ इशारा करके) इनका माल चोरी गया है और यहाँ के सभी आदमी तुझे चोर कहते हैं।
नानक––झूठ, बिल्कुल झूठ।
तारासिंह का एक शागिर्द––(दीवान से) यदि हर्ज न हो तो पहले इसका चेहरा धुलवा दिया जाय।
दीवान––क्या तुम्हें कुछ दूसरे ढंग का भी शक है? अच्छा (जमादार से) पानी मँगा कर इस चोर का चेहरा धुलवाओ।
जमादार––जो हुक्म।
नानक––चेहरा धुलवा कर क्या कीजिएगा? हम ऐयारों की सूरत हरदम बदली ही रहती है, खास कर सफर में।
दीवान––तू ऐयार है! ऐयार लोग भी कहीं चोरी करते हैं?
नानक––जी मैं कह चुका हूँ कि चोरी का इलजाम मुझ पर नहीं लग सकता।
तारा का एक शागिर्द––चोरी तो अच्छी तरह साबित हो जायगी, जरा अपने माल-असबाब की तलाशी तो होने दो! (दीवान से) लीजिए, पानी भी आ गया, अब इसका चेहरा धुलवाइये।
जमादार––(पानी की गगरी नानक के सामने धर कर) लो, अब पहले अपना चेहरा साफ कर डालो।
नानक––मैं अभी अपना चेहरा साफ कर डालता हूँ। चेहरा धोने में मुझे कोई उज्र नहीं है, क्योंकि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि ऐयारों की सूरत प्रायः बदली रहती है और मैं भी एक ऐयार हूँ।
इतना कह कर नानक ने अपना चेहरा साफ कर डाला और दीवान साहब से कहा, "कहिए, अब क्या हुक्म होता है?"
दीवान––अब तुम्हारी तलाशी ली जायगी।
नानक––तलाशी देने में भी मुझे कुछ उज्र न होगा, मगर मुझे पहले उन चीजों की फेहरिस्त मिल जानी चाहिए जो चोरी गई हैं। कहीं ऐसा न हो कि मेरी कुछ चीजों को ये नकली सौदागर साहब अपनी ही चीज बतावें, उस समय ताज्जुब नहीं कि मैं अपनी ही चीजों का चोर बन जाऊँ।
दीवान––चीजों की फेहरिस्त जमादार के पास मौजूद है, तुम्हारी चीजों का तुम्हें कोई चोर नहीं बना सकता। हाँ, तुमने इन्हें नकली
नानक––इसलिए कि ये दोनों भी मेरी तरह से ऐयार हैं और इसके मालिक तारासिंह को मैंने गिरफ्तार कर लिया है, दुश्मनी से नहीं बल्कि आपस की दिल्लगी से, क्योंकि हम दोनों एक ही मालिक अर्थात् राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार हैं, धोखा देने की शर्त लग गई थी।
राजा वीरेन्द्रसिंह का नाम सुनते ही दीवान साहब के कान खड़े हो गए और वे ताज्जुब के साथ तारासिंह के दोनों शागिर्दो की तरफ देखने लगे। तारासिंह एक शागिर्द ने कहा, "इसने तो झूठ बोलने पर कमर बाँध रखी है! यह चाहे राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार हो, मगर हम लोगों को उनसे कोई सरोकार नहीं है। हम लोग न तो ऐयार हैं और न हम लोगों का कोई मालिक ही हमारे साथ था, जिसे इसने गिरफ्तार कर लिया हो। यह तो अपने को ऐयार बताता ही है फिर अगर झूठ बोल कर आपको धोखा देने का उद्योग करे तो ताज्जुब ही क्या है? इसकी झुठाई-सचाई का हाल तो इतने ही से खुल जायगा कि एक तो इसकी तलाशी ले ली जाय, दूसरे इससे ऐयारी की सनद माँगी जाय जो राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ से नियमानुसार इसे मिली होगी।
दीवान––तुम्हारा कहना बहुत ठीक है, ऐयारों के पास उनके मालिक की सनद जरूर हुआ करती है। अगर यह प्रतापी महाराज वीरेन्द्रसिंह का ऐयार होगा तो इसके पास सनद जरूर होगी और तलाशी लेने पर यह भी मालूम हो जायगा कि इसने जिसे गिरफ्तार किया है, वह कौन है। (नानक से) अगर तुम राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार हो तो उनकी सनद हमको दिखाओ। हाँ, और यह भी बताओ कि अगर तुम ऐयार हो तो इतनी जल्दी गिरफ्तार क्यों हो गए क्योंकि ऐयार लोग जहाँ कब्जे के बाहर हुए तहाँ उनका गिरफ्तार होना कठिन हो जाता है।
नानक––मैं गिरफ्तार कदापि न होता मगर अफसोस, मुझे यह बात बिल्कुल मालूम न थी कि तारासिंह को मेरी पूरी खबर है और वह मेरी तरफ से होशियार है तथा उसने पहले ही से मुझे गिरफ्तार करा देने का बन्दोबस्त कर रखा है।
दीवान––खैर, तुम ऐयारी की सनद दिखाओ।
तानक––(कुछ लाजवाब-सा होकर) सनद मुझे अभी नहीं मिली है।
तारासिंह का शागिर्द––(दीवान से) देखिए, मैं कहता था न कि यह झूठा है!
दीवान––(क्रोध से) बेशक झूठा है और चोर भी है। (जमादार से) हाँ, अब इसकी तलाशी ली जाय।
जमादार––जो आज्ञा।
नानक की तलाशी ली गई और दो ही तीन गठरियों बाद वह बड़ी गठरी खोली गई, जिसमें सराय का सिपाही बेचारा बँधा हुआ था।
नानक ने उस बेहोश सिपाही की तरफ इशारा करके कहा, "देखिए यही तारासिंह है जो सौदागर बना हुआ सफर कर रहा था।"
तारासिंह का शागिर्द––(दीवान से) यह बात भी इसकी झूठ निकलेगी, आप पहले इस बेहोश का चेहरा धुलवाइए।
दीवान––हाँ, मेरा भी यही इरादा है। (जमादार से) इसका चेहरा तो धोकर साफ करो।
नानक––मैं खुद इसका चेहरा धोकर साफ किये देता हूँ और तब आपको मालूम हो जायगा कि मैं झूठा हूँ या सच्चा।
नानक ने उस सिपाही का चेहरा धोकर साफ किया। मगर अफसोस, नानक की मुराद पूरी न हुई और वह सिर से पैर तक झूठा साबित हो गया। अपने यहाँ के सिपाही को ऐसी अवस्था में देख कर जमादार और दीवान साहब को क्रोध चढ़ आया। जमादार ने किसी तरह का खयाल न करके एक लात नानक की कमर पर ऐसी जमाई कि वह लुढ़क गया। मगर बहुत जल्दी सम्हल कर जमादार को मारने के लिए तैयार हुआ। नानक का हर्वा पहले ही ले लिया गया था और अगर इस समय उसके पास कोई हर्वा मौजूद होता तो वेशक वह जमादार की जान ले लेता। मगर वह कुछ भी न कर सका, उल्टा उसे जोश में आया हुआ देख सभी को क्रोध चढ़ आया। सराय में उतरे हुए मुसाफिर भी उसकी तरफ से चिढ़े हुए थे। क्योंकि वे बेनारे बेकसूर रोके गये थे और उन पर शक भी किया गया था, अतएव एकदम से बहुत से आदमी नानक पर टूट पड़े और मनमानी पूजा करने के बाद उसे हर तरह से बेकार कर दिया। इसके बाद दीवान साहब की आज्ञानुसार उसकी और उसके साथियों की मुश्के कस दी गईं।
दीवान साहब ने जमादार को आज्ञा दी कि––यह शैतान (नानक) बेशक झूठा और चोर है, इसने बहुत ही बुरा किया कि सरकारी नौकर को गिरपतार कर लिया। तुम कह चुके हो कि उस समय यही सिपाही सौदागर के दरवाजे पर पहरा दे रहा था। बेशक चोरी करने के लिए ही इस सिपाही को इसने गिरफ्तार किया होगा। अब इसका मुकदमा थोड़ी देर में निपटने वाला नहीं है और इस समय बहुत देर भी हो गई है। अस्तु, तुम इसे और इसके साथियों को कैदखाने में भेज दो तथा इसका माल-असबाब इसी सराय की किसी कोठरी में बन्द करके ताली मुझे दे दो और सराय के सब मुसाफिरों को छोड़ दो। (तारासिंह के शागिर्दो की तरफ देख कर) क्यों साहब, अब मुसाफिरों को रोकने की तो कोई जरूरत नहीं है?
तारासिंह का शागिर्द––बेशक बेचारे मुसाफिरों को छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उनका कोई कसूर नहीं। मेरा माल इसी ने चुराया है। अगर इसके असबाब में से कुछ भी न निकलेगा तो भी हम यही समझेंगे कि सराय से बाहर दूर जाकर इसने किसी ठिकाने चोरी का माल गाड़ दिया है।
दीवान––बेशक, ऐसा ही है! (जमादार से) अच्छा जो कुछ हुक्म दिया गया है उसे जल्द पूरा करो।
जमादार––जो आज्ञा।
बात की बात में वह सराय मुसाफिरों से खाली हो गई। नानक हवालात में भेज दिया गया और उसका असबाब एक कोठरी में रखकर ताली दीवान साहब को दे दी गई। उस समय तारासिंह के दोनों शागिर्दो ने दीवान साहब से कहा––"इस शैतान का मामला दो-एक दिन में निपटता नजर नहीं आता, इसलिए हम लोग भी चाहते हैं कि यहाँ से जाकर अपने मालिक को इस मामले की खबर दें और उन्हें भी सरकार के पास ले आवें, अगर ऐसा न करेंगे तो मालिक की तरफ से हम लोगों पर बड़ा दोष लगाया जायगा। यदि आप चाहें तो जमामत में हमारा माल-असबाब रख सकते हैं।"
दीवान––तुम्हारा कहना बहुत ठीक है। हम खुशी से इजाजत देते हैं कि तुम लोग जाओ और अपने मालिक को ले आओ, जमानत में तुम लोगों का माल-असबाब रखना हम मुनासिब नहीं समझते, इसे तुम लोग साथ ही ले जाओ
तारासिंह के दोनों शागिर्द––(दीवान साहब को सलाम करके) आपने बड़ी कृपा की जो हम लोगों को जाने का आज्ञा दे दी। हम लोग बहुत ही जल्द अपने मालिक को लेकर हाजिर होंगे।
तारासिंह के दोनों शागिर्दो ने भी डेरा कूच कर दिया और बेचारे नानक को खटाई में डाल गए। देखना चाहिए अब उस पर क्या गुजरती है। वह भी इन लोगों से बदला लिए बिना रहता नजर नहीं आता।
४
भैरोंसिंह के चले जाने के बाद दरवाजा बन्द हो जाने से दोनों कुमारों को ताज्जुब ही नहीं हुआ बल्कि उन्हें भैरोंसिंह की तरफ से एक प्रकार की फिक्र लग गई। आनन्दसिंह ने अपने बड़े भाई की तरफ देखकर कहा, "अब इस रात के समय भैरोंसिंह के लिए हम लोग क्या कर सकते हैं?"
इन्द्रजीतसिंह––कुछ भी नहीं। मगर भैरोंसिंह के हाथ में तिलिस्मी खंजर है, वह यकायक किसी के कब्जे में न आ सकेगा।
आनन्दसिंह––पहले भी तो उनके पास तिलिस्मी खंजर था, बल्कि ऐयारी का बटुआ भी मौजूद था, तब उन्होंने क्या कर लिया था?
इन्द्रजीतसिंह––सो तो ठीक कहते हो, तिलिस्म के अन्दर हर तरह से बचे रहना मामूली काम नहीं है, मगर रात के समय अब हो ही क्या सकता है?
आनन्दसिंह––मेरी राय है कि तिलिस्मी खंजर से इस छोटे से दरवाजे को काटने का उद्योग किया जाये, शायद...
इन्द्रजीतसिंह––अच्छी बात है, कोशिश करो।
आनन्दसिंह ने तिलिस्मी खंजर का वार उस छोटे से दरवाजे पर किया; मगर कोई नतीजा न निकला, आखिर दोनों भाई लाचार होकर वहाँ से हटे और किसी दालान में एक किनारे बैठकर बातचीत में रात बिताने का उद्योग करने लगे।
रात के साथ-ही-साथ दोनों कुमारों को उदासी भी कुछ-कुछ जाती रही और फूलों की महक से बसी हुई सुबह की ठण्डी हवा ने उद्योग और उत्साह का संचार किया। दोनों के पराधीन और चुटीले दिलों में किसी की याद ने गुदगुदी पैदा कर दी और बारह पर्दे के अन्दर से भी खुशबू फैलाने वाली, मगर कुछ दिनों तक नाउम्मीदी के पाले से गन्धहीन हो गई कलियों पर आशारूपी वायु के झपेटे से बहक कर आए हुए शृंगाररूपी भ्रमर इस समय पुनः गुंजार करने लग गये।
क्या आज दिन भर की मेहनत से भी अपने प्रेमी का पता न लगा सकेंगे? क्या आज दिन भर के उद्योग को सहायता से भी इस छोटी-सी मगर अनूठी रंगशाला के नेपथ्य में से किसी की खोज निकालने में सफल मनोरथ न होंगे? क्या आज दिन भर की कार्रवाई भी हमें विश्वास न दिला सकेगी कि इस जानोदिल का मालिक इसी स्थान में आ पहुँचा है जैसा कि सुन चुके हैं और क्या आज दिन भर की उपासना का फल भी जुदाई की उस काली घटा को दूर न कर सकेगा, जिसने इन चकोरों को जीवन-दान देने वाले पूर्णचन्द्र को छिपा रखा है? नहीं-नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता, आज दिन भर में हम बहुत-कुछ कर सकेंगे और उनका पता अवश्य लगावेंगे, जिन पर अपनी जिन्दगी का भरोसा समझते हैं और जिनके मिलाप से बढ़कर इस दुनिया में और किसी चीज को नहीं मानते।
इसी तरह की बातें सोचते हुए दोनों कुमारखड़े हो गये। नहर के किनारे आकर हाथ-मुँह धोने के बाद घड़ी भर के अन्दर ही जरूरी कामों से छुट्टी पाकर वे बाग में घूमने और वहाँ की हर एक चीज को गौर से देखने लगे और थोड़ी ही देर में बारहदरी के सामने वाली उस दोमंजिली इमारत के नीचे जा पहुंचे, जिसके ऊपर वाली मंजिल में रात को कोई काम करते हुए भैरोंसिंह ने कई आदमियों को देखा था।
इस इमारत के नीचे वाला भाग ऊपर वाले हिस्से के विपरीत दरवाजे बल्कि दरवाजे के किसी नामोनिशान तक से भी खाली था। बाग की तरफ वाली नीचे की दीवार साफ तथा चिकने संगमर्मर की बनी हुई थी और बीचोंबीच चार हाथ ऊँचा और दो हाथ चौड़ा स्याह पत्थर का एक टुकड़ा लगा हुआ था। उसमें नीचे लिखे मोटे छत्तीस अक्षर खुदे हुए थे, जिन्हें दोनों कुमार बड़े गौर से देखने और उनका मतलब जानने के लिए उद्योग करने लगे।
वे अक्षर ये थे––
ने · ए · ती · के · स्म · स्सों / हि · को · ड़ · की · उ · ति / स्से · का · स · लि · हि · न / या · से · न · न · टू · र / य · क · ल · सै · जो · गे / रो · ख · हाँ · टें · क · रो
दो घड़ी तक गौर करने पर कुँअर इन्द्रजीतसिंह उनका मतलब समझ गये और अपने छोटे भाई कुँअर आनन्दसिंह को भी समझाया। इसके बाद दोनों भाइयों ने जोर करके उस पत्थर को दबाया, तो वह अन्दर की तरफ घुसकर जमीन के बराबर हो गया और अन्दर जाने लायक एक खासा दरवाजा दिखाई देने लगा, साथ ही इसके भीतर की तरफ अन्धकार भी मालूम हुआ। इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर की रोशनी करके आगे चलने के लिए आनन्दसिंह से कहा।
तिलिस्मी खंजर की रोशनी के सहारे दोनों भाई उस दरवाजे के अन्दर चले गये और एक छोटे से कमरे में पहुँचे जिसके बीचोंबीच से ऊपर की मंजिल में जाने के लिए छोटी-छोटी चक्करदार सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। उन्हीं सीढ़ियों की राह से दोनों कुमार ऊपर वाली मंजिल पर चढ़ गए और एक ऐसी कोठरी में पहुँचे, जिसकी बनावट अर्धचन्द्र के ढंग की थी और तीन दरवाजे बाग की तरफ उस बारहदरी के ठीक सामने थे, जिसमें रात को दोनों कुमारों ने आराम किया था।
बाग की तरफ वाले तीनों दरवाजे खोल देने से उस कोठरी के अन्दर अच्छी तरह उजाला हो गया, उस समय आनन्दसिंह ने तिलिस्मी खंजर की रोशनी बन्द की और उसे कमर में रखने के बाद अपने भाई से कहा
आनन्दसिंह––इसी कोठरी में रात को भैरोंसिंह ने कई आदमियों को चलतेफिरते तथा काम करते देखा था, और मालूम होता है कि इसके दोनों तरफ की कोठरियों का सिलसिला एक-दूसरे से लगा हुआ है और सभी का एक-दूसरे से सम्बन्ध है।
इन्द्रजीतसिंह––मैं भी ऐसा ही विश्वास करता हूँ, इस दाहिने बगल वाली दूसरी कोठरी का दरवाजा खोलो और देखो कि उसके अन्दर क्या है।
बड़े कुमार की आज्ञानुसार आनन्दसिंह ने बगल वाली दूसरी कोठरी का दरवाजा खोला, उसी समय दोनों कुमारों को ऐसा मालूम हुआ कि कोई आदमी तेजी के साथ कोठरी में से निकलकर इसके बाद वाली दूसरी कोठरी में चला गया। दोनों कुमारों ने तेजी के साथ उसका पीछा किया और उस दूसरी कोठरी में गए, जिसका दरवाजा मजबूती के साथ बन्द न था तो नानक पर निगाह पड़ी। यद्यपि उस कोठरी के वे दरवाजे जो बाग की तरफ पड़ते थे, बन्द थे, मगर दिन का समय होने के कारण झिलमिलियों की दरारों में से पड़ने वाली रोशनी ने उसमें इतना उजाला जरूर कर रखा था कि आदमी की सूरत-शक्ल बखूबी दिखाई दे जाये, यही सबब था कि निगाह पड़ते ही दोनों कुमारों ने नानक को पहचान लिया, इसी तरह नानक ने भी दोनों कुमारों को पहचान कर प्रणाम किया और कहा, "मैं किसी दुश्मन का होना अनुमान करके भागा था, मगर जब आवाज सुनी, तो पहचान कर रुक गया। मैं कल से आप दोनों भाइयों को खोज रहा हूँ, मगर पता न लगा सका क्योंकि तिलिस्मी खारखाने में बिना समझे-बूझे दखल देना उचित न जानकर अपनी बुद्धिमानी या जबर्दस्ती से किसी दरवाजे को खोल न सका और इसीलिए बाग में भी पहुँचने की नौबत न आई। कहिए, आप लोग कुशल से तो हैं!"
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, हम लोग बहुत अच्छी तरह हैं। तुम बताओ कि यहाँ कब, कैसे, क्यों और किस तरह से आये?
नानक––कमलिनीजी से मिलने के लिए घर से निकला था, मगर जब मालूम हुआ कि वे राजा गोपालसिंह के साथ जमानिया गईं, तब मैं राजा गोपालसिंह के पास आया और उन्हीं की आज्ञानुसार यहाँ आपके पास आया हूँ।
इन्द्रजीतसिंह––किनकी आज्ञानुसार? राजा गोपालसिंह की या कमलिनी की?
नानक––कमलिनीजी की आज्ञानुसार।
नानक की बात सुनकर आनन्दसिंह ने एक भेद की निगाह इन्द्रजीतसिंह पर डाली और इन्द्रजीतसिंह ने कुछ मुस्कुराहट के साथ आनन्दसिंह की तरफ देखकर कहा––"बाग की तरफ जो दरवाजे पड़ते हैं, उन्हें खोल दो, चाँदनी हो जाये।"
आनन्दसिंह ने दरवाजे खोल दिए और फिर नानक के पास आकर पूछा, "हाँ, तो कमलिनीजी की आज्ञानुसार तुम यहाँ आए?"
नानक––जी हाँ।
आनन्दसिंह––कमलिनी को कहाँ छोड़ा?
नानक––राजा गोपालसिंह के तिलिस्मी बाग में।
इन्द्रजीतसिंह––वह अच्छी तरह से तो हैं न?
नानक––जी हाँ, बहुत अच्छी तरह से हैं।
आनन्दसिंह––घोड़े पर से गिरने के कारण उनकी टाँग जो टूट गई थी, वह अच्छी
नानक––यह खबर आपको कैसे मालूम हुई?
आनन्दसिंह––अजी वाह, मेरे सामने ही तो घोड़े पर से गिरी थीं, भैरोंसिंह ने उनका इलाज किया, अच्छी हो गई थीं, मगर कुछ दर्द बाकी था, जब मैं इधर चला आया।
नानक––जी हाँ, अब तो वह बहुत अच्छी हैं।
आनन्दसिंह––(हँस कर) अच्छा, यह तो बताओ कि तुम किस रास्ते से यहाँ आये हो?
नानक––उसी बुर्ज वाले रास्ते से आया हूँ।
आनन्दसिंह––मुझे अपने साथ ले चलकर वह रास्ता बता तो दो।
नानक––बहुत अच्छा, चलिए मैं बता देता हूँ, मगर मुझसे कमलिनीजी ने कहा था कि जब तुम बाग में जाओगे, तो लौटने का रास्ता बन्द हो जाएगा।
आनन्दसिंह––यह तो उन्होंने ठीक कहा था। हम दोनों भाइयों को भी उन्होंने यही कहला भेजा था कि मैं नानक को तुम्हारे पास भेजूँगी, तुम उसकी जुबानी सब हाल सुनकर हिफाजत के साथ उसे तिलिस्म के बाहर कर देना।
नानक––(कुछ शर्मीला-सा होकर) जी ई ई ई, आप तो दिल्लगी करते हैं, मालूम होता है आपको मुझ पर कुछ शक है और आप समझते हैं कि मैं आपके दुश्मन का ऐयार हूँ और नानक की सूरत बनाकर आया हूँ, अतः आप जिस तरह चाहें मेरी आजमाइश कर सकते हैं।
इतने में ही एक तरफ से आवाज आई, "जब तुम कमलिनीजी के भेजे हुए आए हो, तो आजमाइश करने की जरूरत ही क्या है? थोड़ी देर में कमलिनी का सामना आप ही हो जायेगा!"
इस आवाज ने दोनों कुमारों को तो कम, मगर नानक को हद से ज्यादा परेशान कर दिया। उसके चेहरे पर हवाई-सी उड़ने लगी और वह घबड़ाकर पीछे की तरफ देखने लगा। इस कोठरी में से दूसरी कोठरी में जाने के लिए जो दरवाजा था, वह इस समय मामूली तौर पर बन्द था, इसलिए किसी गैर पर उसकी निगाह न पड़ी, अतएव उस दरवाजे को खोलकर नानक अपनी कोठरी में चला गया, मगर साथ ही आनन्दसिंह ने भी वहाँ पहुँच कर उसकी कलाई पकड़ ली और कहा, "बस इतने ही में घबड़ा गए! इसी हौसले पर तिलिस्म के अन्दर आये थे! आओ-आओ, हम तुम्हें बाग में ले चलते हैं जहाँ निश्चिन्ती से बैठकर अच्छी तरह बातें कर सकेंगे।"
इसी समय दो दरवाजे खुले और स्याह लबादा ओढ़े हुए चार-पाँच आदमी उसके अन्दर से निकल आए, जो नानक को जबर्दस्ती घसीट कर ले गए, साथ ही वे दरवाजे भी उसी तरह बन्द हो गए, जैसे पहले थे। दोनों कुमारों ने भी कुछ सोचकर आपत्ति न की और उसे ले जाने दिया।
और कोठरियों की बनिस्बत इस कोठरी में दरवाजे ज्यादा थे, अर्थात् दो दरवाजे दोनों तरफ तो थे ही, मगर बाग की तरफ चार और पिछली तरफ दो दरवाजे और थे तथा उसी पिछली तरफ वाले दोनों दरवाजों में से वे लोग आये थे, जो नानक को घसीट कर ले गए थे। नानक को ले जाने के बाद आनन्दसिंह ने उन्हीं पिछली तरफवाले दरवाजों में से एक दरवाजा खोला और अन्दर की तरफ झाँक कर देखा। भीतर बहुत लम्बा-चौड़ा एक कमरा नजर आया, जिसमें अन्धकार का नाम-निशान भी न था, बल्कि अच्छी तरह उजाला था। दोनों कुमार उस कमरे में चले गए और तब मालूम हुआ कि वे दरवाजे एक ही कमरे में जाने के लिए हैं। इस कमरे में दोनों कुमारों ने एक बहुत बूढ़े आदमी को देखा, जो चारपाई के ऊपर लेटा हुआ कोई किताब पढ़ रहा था। कुमारों को देखते ही वह चारपाई के नीचे उतर कर खड़ा हो गया और सलाम करके बोला, "आज कई दिनों से मैं आप दोनों भाइयों के आने का इन्तजार कर रहा हूँ।"
इन्द्रजीतसिंह––तुम कौन हो?
बुड्ढा––जी, मैं इस बाग का दारोगा हूँ।
इन्द्रजीतसिंह––तुम हम लोगों का इन्तजार क्यों कर रहे थे?
दारोगा––इसलिए कि आप लोगों को यहाँ की इमारतों और अजायबातों की सैर करा के अपने सिर से एक भारी बोझ उतार दूँ।
इन्द्रजीतसिंह––क्या इधर दो-तीन दिन के बीच में कोई और भी इस बाग में आया है?
दारोगा––जी हाँ, दो मर्द और कई आरतें आई हैं।
इन्द्रजीतसिंह––क्या उन लोगों के नाम बता सकते हो?
दारोगा––नानक और भैरोंसिंह के सिवाय मैं और किसी का नाम नहीं जानता (कुछ सोचकर) हाँ, एक औरत का भी नाम जानता हूँ, शायद उसका नाम कमलिनी है, क्योंकि वह दो-एक दफे इसी नाम से पुकारी गई थी, बड़ी ही धूर्त और चालाक है, अपनी अक्ल के सामने किसी को कुछ समझती ही नहीं, बिना धोखा खाये नहीं रह सकती।
इन्द्रजीतसिंह––क्या यह बता सकते हो कि वे सब इस समय कहाँ हैं और उनसे मुलाकात क्योंकर हो सकती है?
दारोगा––जी मुझे उन लोगों का पता मालूम नहीं, क्योंकि कमलिनी ने उन सभी को मेरी बात मानने न दी और अपनी इच्छानुसार उन सभी को लिए हुए चारों तरफ घूमती रहीं, इसी से मुझे रंज हुआ और मैंने उनकी खबरगीरी छोड़ दी।
इन्द्रजीतसिंह––अगर तुम यहाँ के दारोगा हो, तो खबरदारी न रखने पर भी यह तो जरूर जानते ही होगे कि वे सब कहाँ हैं!
दारोगा––मुझे यहाँ का दारोगा समझने और न समझने का तो आपको अख्तियार है, मगर मैं यह जरूर कहूँगा कि मुझे उन सभी का पता नहीं मालूम है।
आनन्दसिंह––(हँस कर) यही हाल है तो यहाँ की हिफाजत क्या करते हो?
दारोगा––इसका हाल तो तभी मालूम होगा जब आप मेरे साथ चलकर यहाँ की सैर करेंगे।
आनन्दसिंह––अच्छा, यह बताओ कि अभी हमारे देखते-ही-देखते जो लोग नानक को ले गए, वे कौन थे?
दारोगा––वे सब मेरे ही नौकर थे। वह झूठा और शैतान है, तथा आपको नुकसान पहुँचाने की नीयत से धोखा देकर यहाँ घुस आया है, सिर्फ इसीलिए मैंने उसे गिरफ्तार करने का हुक्म दिया।
आनन्दसिंह––तुम्हारे आदमी लोग कहाँ रहते हैं? यहाँ तो मैं तुमको अकेला ही देखता हूँ।
दारोगा––यह कमरा तो मेरा एकान्त स्थान है, जब पढ़ने या किसी विषय पर गौर करने की जरूरत पड़ती है तब मैं इस कमरे में आकर बैठता या लेटता हूँ। मगर यहाँ खड़े-खड़े बातें करने में तो आपको तकलीफ होगी। आप मेरे स्थान पर चलें, तो उत्तम हो, या बाग ही में चलिए जहाँ और भी कई...
इन्द्रजीतसिंह––खैर, यह सब तो होता रहेगा, पहले हम लोगों को यह मालूम होना चाहिए कि तुम हमारे दोस्त हो, दुश्मन नहीं और तुम्हारी ग्रह सूरत असली है बनावटी नहीं। इसके बाद मैं तुससे दिल खोल कर बातें कर सकूँगा।
दारोगा––इस बात का पता तो आपको मेरी कार्रवाई से ही लग सकेगा, मेरे कहने का आपको ऐतबार कब होगा, मगर इस बात को खूब समझ...
दारोगा की बात पूरी न होने पाई थी, कि एक तरफ से आवाज आई, "अजी, तुम्हें कुछ खाने-पीने की भी सुध है या यों ही बकवाद किया करोगे!"
दोनों कुमार ताज्जुब के साथ उस तरफ देखने लगे जिधर से आवाज आई थी। उसी समय एक बुढ़िया उसी तरफ से कमरे के अन्दर आती दिखाई पड़ी और वह दारोगा के पास आकर फिर बोली, "मैं बड़ी ही बदकिस्मत थी जो तुम्हारे साथ व्याही गई! मैंने जो कहा, तुमने कुछ सुना या नहीं?"
दारोगा––(क्रोध से) आ गई शैतान की नानी!
दोनों कुमारों ने देखते ही उस बुढ़िया को पहचान लिया कि यह वही बुढ़िया है, जो भैरोंसिंह की जोरू उस समय बनी हुई थी, जब भैरोंसिंह पागल हुआ इसी बाग में हम लोगों को दिखाई दिया था।
इन्द्रजीतसिंह ने ताज्जुब और दिल्लगी की निगाह से उस बुढ़िया की तरफ देखा और कहा, "अभी कल की बात है कि तू भैरोंसिंह पागल की जोरू बनी हुई थी और आज इस दारोगा को अपना मालिक बता रही है।"
५
कुँअर इन्द्रजीतसिंह की बात सुनकर वह बुढ़िया चमक उठी और नाक-भौं चढ़ा कर बोली, "बुड्ढी औरतों से दिल्लगी करते तुम्हें शर्म नहीं मालूम होती।"
इन्द्रजीतसिंह––क्या मैं झूठ कहता हूँ?
बुढ़िया––इससे बढ़कर झूठ और क्या हो सकता है? लोग किसी के पीछे झूठ बोलते हैं, मगर आप मुँह पर झूठ बोल कर अपने को सच्चा बनाने का उद्योग करते हैं! भला इस तिलिस्म में दूसरा आ ही कौन सकता है? और वह भैरोंसिंह कौन है जिसका नाम आपने लिया?
इन्द्रजीतसिंह––बस-बस, मालूम हो गया। मैं अपने को तुम्हारी जबान से...
बुड्ढा––(इन्द्रजीतसिंह को रोक कर) अजी आप किससे बातें कर रहे हैं? यह तो पागल है। इसकी बातों पर ध्यान देना आप ऐसे बुद्धिमानों का काम नहीं है। (बुढ़िया से) तुझे यहाँ किसने बुलाया जो चली आई? तेरे ही दुःख से तो भाग कर मैं यहाँ एकांत में आ बैठा हूँ, मगर तू ऐसी शैतान की नानी है कि यहाँ भी आए बिना नहीं रहती। सवेरा हुआ नहीं और खाने की रट लग गई!
बुड्ढी––अजी तो क्या तुम खाओ, पीओगे नहीं?
वुड्ढा––जब मेरी इच्छा होगी, तब खा लूँगा, तुम्हें इससे मतलब? (दोनों कुमारों से) आप इस कम्बख्त का खयाल छोड़िए और मेरे साथ चले आइए। मैं आपको ऐसी जगह ले चलता हूँ, जहाँ इसकी आत्मा भी न जा सके। उसी जगह हम लोग बातचीत करेंगे, फिर आप जैसी मुनासिब समझिएगा, आज्ञा दीजिएगा।
यह बात उस बुड्ढे ने ऐसे ढंग से कही और इस तरह पलटा खाकर चल पड़ा कि दोनों कुमारों को उसकी बातों का जवाब देने या उस पर शक करने का मौका न मिला और वे दोनों भी उसके पीछे-पीछे रवाना हो गए
उस कमरे के बगल ही में एक कोठरी थी और उस कोठरी में ऊपर छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। वह बुड्ढा दोनों कुमारों को साथ-साथ लिए हुए उस कोठरी में और वहाँ से सीढ़ियों की राह चढ़कर उसके ऊपर वाली छत पर ले गया। उस मंजिल में भी छोटी-छोटी कई कोठरियाँ और कमरे थे। बुड्ढे के कहे मुताबिक दोनों ने एक कमरे की जालीदार खिड़की में से झाँक कर देखा तो इस इमारत के पिछले हिस्से में एक और छोटा-सा बाग दिखाई दिया, जो बनिस्वत इस बाग के जिसमें कुमार एक दिन और रात रह चुके थे, ज्यादा खूबसूरत और सरसब्ज नजर आता था। उसमें फूलों के पेड़ बहुतायत से थे और पानी का एक छोटा-सा साफ झरना भी बह रहा था, जो मकान की दीवार से दूर और उस बाग के पिछले हिस्से की दीवार के पास था, और उसी चश्मे के किनारे पर कई औरतों को भी बैठे हुए दोनों कुमारों ने देखा।
पहले तो कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को यही गुमान हुआ कि ये औरतें किशोरी, कामिनी और कमलिनी इत्यादि होंगी, मगर जब उनकी सूरत पर गौर किया, तो दूसरी ही औरतें मालूम हुईं जिन्हें आज के पहले दोनों कुमारों ने कभी नहीं देखा था।
इन्द्रजीतसिंह––(बुड्ढे से) क्या ये वे ही औरतें हैं, जिनका जिक्र तुमने किया था और जिनमें से एक औरत का नाम तुमने कमलिनी बताया था?
बुड्ढा––जी नहीं, उनकी तो मुझे कुछ भी खबर नहीं कि वे कहाँ गई और क्या हुई।
आनन्दसिंह––फिर ये सब कौन हैं?
बुड्ढा––इन सभी के बारे में इससे ज्यादा और मैं कुछ नहीं जानता कि ये सब राजा गोपाल सिंह की रिश्तेदार हैं और किसी खास सबब से राजा गोपालसिंह ने इन लोगों को यहाँ रख छोड़ा है।
इन्द्रजीतसिंह––ये सब यहाँ कब से रहती हैं?
बुड्ढा––सात वर्ष से।
इन्द्रजीतसिंह––इनकी खबरगीरी कौन करता है और खाने-पीने तथा कपड़े-लत्ते का इन्तजाम क्योंकर होता है?
बुड्ढा––इसकी मुझे भी खबर नहीं। यदि मैं इन सभी से कुछ बातचीत करता या इनके पास जाता तो कदाचित् कुछ मालूम हो जाता, मगर राजा साहब ने मुझे सख्त ताकीद कर दी है कि इन सभी से कुछ बातचीत न करूँ बल्कि इनके पास भी न जाऊँ।
इन्द्रजीतसिंह––खैर, यह बताओ कि हम लोग इनके पास जा सकते हैं या नहीं?
बुड्ढा––इन सभी के पास जाना न जाना आपकी इच्छा पर है-मैं किसी तरह की रुकावट नहीं डाल सकता और न कुछ राय ही दे सकता हूँ
इन्द्रजीतसिंह––अच्छा दस बाग में जाने का रास्ता तो बता सकते हो?
बुड्ढा––हाँ, मैं खुशी से आपको रास्ता बता सकता हूँ, मगर स्वयं आपके साथ वहाँ तक नहीं जा सकता, इसके अतिरिक्त यह कह देना भी उचित जान पड़ता है कि यहाँ से उस बाग में जाने का रास्ता बहुत पेचीदा और खराब है, इसलिए वहाँ जाने में कम-से कम एक पहर तो जरूर लगेगा। इससे यही बेहतर होगा कि यदि आप उस बाग में या उन सभी के पास जाना चाहते हैं, तो कमन्द लगाकर इस खिड़की की राह से नीचे उतर जायें। ऐसा आप करना चाहें तो आज्ञा दें मैं एक कमन्द आपको ला दूँ।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ यह बात मुझे पसन्द है, यदि एक कमन्द ला दो, तो हम दोनों भाई उसी के सहारे नीचे उतर जायें।
वह बुड्ढा दोनों कुमारों को उसी तरह उसी जगह छोड़ कर कहीं चला गया और थोड़ी ही देर में बहुत बड़ी कमन्द हाथ में लिए हुए आकर बोला, "लीजिए, यह कमन्द हाजिर है।"
इन्द्रजीतसिंह––(कमन्द लेकर) अच्छा, तो अब हम दोनों इस कमन्द के सहारे उस बाग में उतर जाते हैं।
बुड्ढा––जाइये, मगर यह बताते जाइए कि आप लोग वहाँ से लौटकर कब आवेंगे और मुझे आपको यहाँ की सैर कराने का मौका कब मिलेगा?
इन्द्रजीतसिंह––सो तो मैं ठीक नहीं कह सकता, मगर तुम यह बता दो कि अगर हम लौटें तो यहाँ किस राह से आवें!
बुड्ढा––इसी कमन्द के जरिये इसी राह से आ जाइयेगा, मैं यह खिड़की आपके लिए खुली छोड़ दूँगा।
आनन्दसिंह––अच्छा यह बताओ कि भैरोंसिंह की भी कुछ खबर है?
बुड्ढा––कुछ नहीं।
इसके बाद दोनों कुमारों ने उस बुड्ढे से कुछ भी न पूछा और खिड़की खोलने के बाद कमन्द लगाकर उसी के सहारे दोनों नीचे उतर गये।
दोनों कुमारों ने यद्यपि उन औरतों को ऊपर से बखूबी देख लिया था, क्योंकि वह बहुत दूर नहीं पड़ती थीं, मगर इस बात का गुमान न हुआ कि उन औरतों ने भी उन्हें उस समय या कमन्द के सहारे नीचे उतरते समय देखा या नहीं।
जब दोनों कुमार नीचे उतर गये तो कमन्द को भी खींच कर साथ ले लिया और टहलते हुए उस तरफ रवाना हुए जिधर चश्मे के किनारे बैठी हुई वे औरतें कुमार ने देखी थीं। थोड़ी देर में कुमार उस चश्मे के पास जा पहुँचे और उन औरतों को उसी तरह बैठे हुए पाया। कुमार चश्मे के इस पार थे और वे सब औरतें जो गिनती में सात थीं, चश्मे के उस पार सब्ज घास के ऊपर बैठी हुई थीं।
किसी गैर को अपनी तरफ आते देख वे सब औरतें चौकन्नी होकर उठ खड़ी हुई और बड़े गौर के साथ मगर क्रोध-भरी निगाहों से कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तरफ देखने लगीं।
जिस जगह वे औरतें बैठी थीं, उससे थोड़ी ही दूर पर दक्खिन तरफ बाग की दीवार के साथ ही एक छोटा-सा मकान बना हुआ था जो पेड़ों की आड़ में होने के कारण दोनों कुमारों को ऊपर से दिखाई नहीं दिया था मगर अब नहर के किनारे आ जाने पर बखूबी दिखाई दे रहा था।
वे औरतें जिन्हें नहर के किनारे कुमार ने देखा था, सबकी-सब नौजवान और हसीन थीं। यद्यपि इस समय से वे सब बनाव-शृंगार और जेवरों के ढकोसलों से खाली थीं मगर उनका कुदरती हुस्न ऐसा न था जो किसी तरह की खूबसूरती को अपने सामने ठहरने देता। यहाँ पर यदि ऐसी एक औरत होती तो हम उसकी खूबसूरती के बारे में कुछ लिखते भी मगर एकदम से सात ऐसी औरतों की तारीफ में कलम चलाना हमारी ताकत के बाहर है जिन्हें प्रकृति ने खूबसूरत बनाने के समय हर तरह पर अपनी उदारता का नमूना दिखाया हो।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने जब उन औरतों को अपनी तरफ क्रोध-भरी निगाहों से देखते देखा तो एक औरत से मुलायम और गम्भीर शब्दों में कहा, "हम लोग तुम्हारे पास किसी तरह की तकलीफ देने की नीयत से नहीं आए हैं, बल्कि यह कहने के लिए आए हैं कि किस्मत ने हम लोगों को अकस्मात् यहाँ पहुँचाकर तुम लोगों का मेहमान बनाया है। हम लोग लाचार और राह भूले हुए मुसाफिर हैं और तुम लोग यहाँ की रहने वाली और दयावान् हो, क्योंकि जिस ईश्वर ने तुम्हें इतना सुन्दर बनाकर अपनी कारीगरी का नमूना दिखाया है उसने तुम्हारे दिल को कठोर बनाकर अपनी भूल का परिचय कदापि न दिया होगा, अतएव उचित है कि तुम लोग ऐसे समय में हमारी सहायता करो और बताओ कि अब हम दोनों भाई क्या करें और कहाँ जायें?"
औरतें खुशामद-पसन्द तो होती ही हैं! कुँअर इन्द्रजीतसिंह की मीठी और खुशामद भरी बातें सुनकर उन सभी की चढ़ी हुई त्यौरियाँ उतर गईं और होंठों पर कुछ मुस्कराहट दिखाई देने लगी। एक ने जो सबसे चतुर चंचल और चालाक जान पड़ती थी, आगे बढ़कर कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "जब आप हमारे मेहमान बनते हैं और इस बात का विश्वास दिलाते हैं कि हमारे साथ दगा न करेंगे तो हम लोग भी निःसन्देह आपको अपना मेहमार स्वीकार करके जहाँ तक हो सकेगा आपकी सहायता करेंगी, अच्छा ठहरिए हम लोग जरा आपस में सलाह कर लें!"
इतना कहकर वह चुप हो गईं। उन लोगों ने आपस में धीरे-धीरे कुछ बातें की, और इसके बाद फिर उसी औरत ने इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर कहा––
औरत––(हाथ का इशारा करके) उस तरफ एक छोटा-सा पुल बना हुआ है, उसी पर से होकर आप इस पार चले आइए।
इन्द्रजीतसिंह––क्या इस नहर में पानी बहुत ज्यादा है?
औरत––पानी तो ज्यादा नहीं है, मगर इसमें लोहे के तेज नोक वाले गोखरू बहुत पड़े हैं इसलिए इस राह से आपका आना सम्भव नहीं है।
इन्द्रजीतसिंह––अच्छा, तो हम पुल पर से होकर आयेंगे।
इतना कह कुमार उस तरफ रवाना हुए जिधर उस औरत ने हाथ के इशारे से पुल को बताया था। थोड़ी दूर जाने के बाद एक गूंजान और खुशनुमा झाड़ी के अन्दर वह छोटा-सा पुल दिखाई दिया। इस जगह नहर के दोनों तरफ पारिजात के कई पेड़ थे जिनकी डालियाँ ऊपर से मिली हुई थीं कि उनकी सुन्दर छाया में छिपा हुआ वह छोटा सा पुल बहुत खूबसूरत और स्थान बड़ा रमणीक मालूम होता था। इस जगह से न तो दोनों कुमार उन औरतों को देख सकते थे और न उन औरतों की निगाह इन पर पड़ सकती थी।
जब दोनों कुमार पुल की राह पार उतरकर और घूम-फिरकर उस जगह पहुँचे जहाँ उन औरतों को छोड़ आये थे, केवल दो औरतों को मौजूद पाया, जिनमें से एक तो वही थी जिससे कुँअर इन्द्रजीतसिंह से बातचीत हुई थी और दूसरी उससे उम्र में कुछ कम मगर खूबसूरती में कुछ ज्यादा थी। बाकी औरतों का पता न था कि क्या हुई और कहाँ गई। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने ताज्जुब में आकर उस औरत से, जिसने पुल की राह इधर आने का उपदेश किया था पूछा "यहाँ तुम दोनों के सिवाय और कोई नहीं दिखाई देता, सब कहाँ चली गईं?"
औरत––आपको उन औरतों से क्या मतलब?
इन्द्रजीतसिंह––कुछ नहीं, यों ही पूछता हूँ।
औरत––(मुस्कराती हुई) वे सब आप दोनों भाइयोंकी मेहमानदारी का इन्तजाम करने चली गईं, अब आप मेरे साथ चलिए।
इन्द्रजीतसिंह––कहाँ ले चलोगी?
औरत––जहाँ मेरी इच्छा होगी। जब आपने मेरी मेहमानी कबूल ही कर ली तब···।"
इन्द्रजीतसिंह––खैर, अब इस किस्म की बातें न पूछूँगा और जहाँ ले चलोगी चला चलूँगा।
औरत––(मुस्कराकर) अच्छा तो आइए।
दोनों कुमार उन दोनों औरतों के पीछे-पीछे रवाना हुए। हम कह चुके हैं कि जहाँ ये औरतें बैठी थीं वहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक छोटा-सा मकान बना हुआ था। वे दोनों औरतें कुमारों को लिए उसी मकान के दरवाजे पर पहुँचीं जो इस समय बन्द था मगर कोई जंजीर कुण्डा या ताला उसमें दिखाई नहीं देता था। कुमारों को यह भी मालूम न हुआ कि किस खटके को दबाकर या क्योंकर उसने वह दरवाजा खोला। दरवाजा खुलने पर उस औरत ने पहले दोनों कुमारों को उसके अन्दर जाने के लिए कहा, जब दोनों कुमार उसके अन्दर चले गए तब उन दोनों ने भी दरवाजे के अन्दर पैर रखा और इसके बाद हलकी आवाज के साथ वह दरवाजा आप-से-आप बन्द हो गया। इस समय दोनों कुमारों ने अपने को एक सुरंग में पाया जिसमें अन्धकार के सिवाय और कुछ दिखाई नहीं देता था और जिसकी चौड़ाई तीन हाथ और ऊँचाई चार हाथ से किसी तरह ज्यादा न थी। इस जगह कुमार को इस बात का खयाल हुआ कि कहीं इन औरतों ने मुझे धोखा तो नहीं दिया मगर यह सोचकर चुप रह गये कि अब तो जो कुछ होना था हो ही गया और ये औरतें भी तो आखिर हमारे साथ ही हैं जिनके पास किसी तरह का हर्बा देखने में नहीं आया था।
दोनों कुमारों ने अपना हाथ पसारकर दीवार को टटोला और मालूम किया कि यह सुरंग है, उसी समय पीछे से उस औरत की यह आवाज आई, "आप दोनों भाई किसी तरह का अन्देशा न कीजिए और सीधे चले चलिए। इस सुरंग में बहुत दूर तक जाने की तकलीफ आप लोगों को न होगी!"
वास्तव में यह सुरंग बहुत बड़ी न थी, चालीस-पचास कदम से ज्यादा कुमार न गए होंगे कि सुरंग का दूसरा दरवाजा मिला और उसे लाँघकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने अपने को एक-दूसरे ही बाग में पाया जिसकी जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा मकान कमरा बारहदरियों तथा और इमारतों के काम में लगा हुआ था और थोड़े हिस्से में मामूली ढंग का एक छोटा-सा बाग था। हाँ, उस बाग के बीचोंबीच में एक छोटी-सी खूबसूरत बावली जरूर थी जिसकी चार अंगुल ऊँची सीढ़ियाँ सफेद लहरदार पत्थरों से बनी हुई थीं। इसके चारों कोनों पर कदम्ब के चार पेड़ लगे हुए थे और एक पेड़ के नीचे एक चबूतरा संगमरमर का इस लायक था कि बीस-पच्चीस आदमी खुले तौर पर बैठ सकें। इमारत का हिस्सा जो कुछ बाग में था वह सब बाहर से तो देखने में बहुत ही खूबसूरत था मगर अन्दर से वह कैसा और किस लायक था सो नहीं कह सकते।
बावली से पास पहुँचकर उस औरत ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, समय धूप बहुत तेज हो रही है मगर इस पेड़ (कदम्ब)की घनी छाया में इस संगमरमर के चबूतरे पर थोड़ी देर तक बैठने में आपको किसी तरह की तकलीफ न होगी, मैं बहुत जल्द (सामने की तरफ इशारा करके) इस कमरे को खुलवाकर आपके आराम करने का इन्तजाम करूंगी, केवल आधी घड़ी के लिए आप मुझे विदा करें।
इन्द्रजीतसिंह––खैर, जाओ मगर इतना बताती जाओ कि तुम दोनों का नाम क्या है जिसमें यदि कोई आवे और कुछ पूछे तो कह सकें कि हम लोग फलाँ लोगों के मेहमान हैं।
औरत––(हँसकर) जरूर जानना चाहिए, केवल इसलिए नहीं बल्कि कई कामों के लिए हम दोनों बहिनों का नाम जान लेना आपके लिए आवश्यक है! मेरा नाम 'इन्द्रानी' (दूसरी की तरफ इशारा करके) और इसका नाम 'आनन्दी' है। यह मेरी सगी छोटी बहिन है।
इतना कहकर वे औरतें तेजी के साथ एक तरफ चली गई और इस बात का कुछ भी इन्तजार न किया कि कुमार कुछ जवाब देंगे या और कोई बात पूछेगे। उन दोनों औरतों के चले जाने के बाद कुँअर आनन्दसिंह ने अपने भाई से कहा, "इन दोनों औरतों के नाम पर आपने कुछ ध्यान दिया?"
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, यदि इनका नाम इनके बुजुर्गों का रखा हुआ है। और इनके शरीर का सबसे पहला साथी नहीं है तो कह सकते हैं कि हम दोनों ने धोखा खाया।
आनन्दसिंह––जी, मेरा भी यही खयाल है, मगर साथ ही इसके मैं यह भी खयाल करता हूँ कि अब हम लोगों को चालाक बनना···।
इन्द्रजीतसिंह––(जल्दी से) नहीं-नहीं, अब हम लोगों को जब तक छुटकारे की साफ सूरत दिखाई न दे जाये प्रकट में नादान बने रहना ही लाभदायक होगा।
आनन्दसिंह––निःसन्देह मगर इतना तो मेरा दिल अब भी कह रहा है कि ये सब हमारी जिन्दगी के धागे में किसी तरह का खिंचाव पैदा न करेंगी।
इन्द्रजीतसिंह––मगर उसमें लंगर की तरह लटकने के लिए इतना बड़ा बोझ जरूर लाद देंगी कि जिसका सहन करना सम्भव नहीं तो असह्य अवश्य होगा।
आनन्दसिंह––हाँ, अब यदि हम लोगों को कुछ सोचना तो है इसी विषय में···
इन्द्रजीतसिंह––अफसोस ऐसे समय में भैरोंसिंह को भी इत्तिफाक ने हम लोगों से अलग कर दिया। ऐसे मौकों पर उसकी बुद्धि अनूठा काम किया करती है। (कुछ रुककर) देखो तो, सामने से वह कौन आ रहा है!
आनन्दसिंह––(खुशी-भरी आवाज में ताज्जुब के साथ) यह तो भैरोंसिंह ही है! अब कोई परवाह की बात नहीं है अगर यह वास्तव में भैरोंसिंह ही है।
अपने से थोड़ी ही दूर पर दोनों कुमारों ने भैरोंसिंह को देखा जो एक कोठरी के अन्दर से निकलकर इन्हीं की तरफ आ रहा था। दोनों कुमार उठ खड़े हुए और मिलने के लिए खुशी-खुशी भैरोंसिंह की तरफ रवाना हुए। भैरोंसिंह ने भी इन्हें दूर से देखा और तेजी के साथ चलकर इन दोनों भाइयों के पास आया। दोनों भाइयों ने खुशी-खुशी भैरोंसिंह को गले लगाया और उसे साथ लिए हुए उसी चबूतरे पर आए जिस पर इन्द्रानी उनको बैठा गई थी।
इन्द्रजीतसिंह––(चबूतरे पर बैठकर) भैरोंसिंह भाई, यह तिलिस्म का कारखाना है, यहाँ फूंक-फूंक के कदम रखना चाहिए, अतः यदि मैं तुम पर शक करके तुम्हें जाँचने का उद्योग करूं तो तुम्हें खफा न होना चाहिए।
भैरोंसिंह––नहीं-नहीं, मैं ऐसा बेवकूफ नहीं हूँ कि आप लोगों की चालाकी और बुद्धिमानी की बातों से खफा हो जाऊँ, तिलिस्म और दुश्मन के घर में दोस्तों की जाँच बहुत जरूरी है। बगल वाला लसा और कमर का दाग दिखलाने के अतिरिक्त बहुत-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें सिवाय मेरे और आपके दूसरा कोई भी नहीं जानता जैसे 'लड़कपन वाला मजनूँ।'
इन्द्रजीतसिंह––(हँसकर)बस-बस, मुझे जाँच करने की कोई जरूरत नहीं रही, अब यह बताओ कि तुम्हारा बटुआ तुम्हें मिला या नहीं?
भैरोंसिंह––(ऐयारी का बटुआ कुमार के आगे रखकर) आपके तिलिस्मी खंजर की बदौलत मेरा यह बटुआ मुझे मिल गया। शुक्र है कि इसमें की कोई चीज नुकसान में नहीं गई सब ज्यों-की-त्यों मौजूद हैं। (तिलिस्मी खंजर और उसके जोड़ की अँगूठी देकर) लीजिए अपना तिलिस्मी खंजर, अब मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं, मेरे लिए मेरा बटुआ काफी है।
इन्द्रजीतसिंह––(अँगूठी और तिलिस्मी खंजर लेकर) अब यद्यपि तुम्हारा किस्सा सुनना बहुत जरूरी है क्योंकि हम लोगों ने एक आश्चर्यजनक घटना के अन्दर तुम्हें छोड़ा था, मगर इस सबके पहले अपना हाल तुम्हें सुना देना हमें उचित जान पड़ता है क्योंकि एकान्त का समय बहुत कम है और उन दोनों औरतों के आ जाने में बहुत विलम्ब नहीं है जिनकी बदौलत हम लोग यहाँ आए हैं और जिनके फेर में अपने को पड़ा हुआ समझते हैं।
भैरोंसिंह––क्या किसी औरत ने आप लोगों को धोखा दिया?
इन्द्रजीतसिंह––निश्चय तो नहीं कह सकता कि धोखा दिया मगर जो कुछ हाल है उसे सुनकर राय दो कि हम लोग अपने को धोखे में फँसा हुआ समझें या नहीं।
इसके बाद कुँअर इन्द्रजीत सिंह ने अपना कुल हाल भैरोंसिंह से जुदा होने के बाद से इस समय तक का कह सुनाया। इसके जवाब में अभी भैरोंसिंह ने कुछ कहा भी न था कि सामने वाले कमरे का दरवाजा खुला और उसमें से इन्द्रानी को निकलकर अपनी तरफ आते देखा।
इन्द्रजीतसिंह––(भैरोंसिंह से)लो वह आ गई, एक तो यही औरत है, इसी का नाम इन्द्रानी है, मगर इस समय वह दूसरी औरत इसके साथ नहीं है जिसे यह अपनी सगी छोटी बहिन बताती है।
भैरोंसिंह––(ताज्जुब से उस औरत की तरफ देखकर) इसे तो मैं पहचानता हूँ मगर यह नहीं जानता था कि इसका नाम 'इन्द्रानी' है।
इन्द्रजीतसिंह––तुमने इसे कब देखा?
भैरोंसिंह––तिलिस्मी खंजर लेकर आपसे जुदा होने के बाद बटुआ पाने के सम्बन्ध में इसने मेरी मदद की थी। जब मैं अपना हाल सुनाऊँगा तब आपको मालूम होगा कि यह कैसी नेक औरत है, मगर इसकी छोटी बहिन को मैं नहीं जानता, शायद उसे भी देखा हो।
इतने ही में इन्द्रानी वहाँ आ पहुँची जहाँ भैरोंसिंह और दोनों कुमार बैठे बातचीत कर रहे थे। जिस तरह भैरोंसिंह ने इन्द्रानी को देखते ही पहचान लिया था उसी तरह इन्द्रानी ने भी भैरोंसिंह को पहचान लिया और कहा, "क्या आप भी यहाँ आ पहुँचे? अच्छा हुआ, क्योंकि आपके आने से दोनों कुमारों का दिल बहलेगा, इसके अतिरिक्त मुझ पर भी किसी का शक-शुव्हा न रहेगा।"
भैरोंसिंह––जी हाँ, मैं भी यहाँ आ पहुँचा और आपको दूर से देखते ही पहचान लिया बल्कि कुमार से कह भी दिया कि इन्होंने मेरी बड़ी सहायता की थी।
इन्द्रानी––यह तो बताओ कि स्नान संध्या से छुट्टी पा चुके हो या नहीं?
भैरोंसिंह––हाँ, मैं स्नान संध्या से छुट्टी पा चुका हूँ और हर तरह निश्चिन्त हूँ।
इन्द्रानी––(दोनों कुमारों से) और आप लोग?
इन्द्रजीतसिंह––हम दोनों भाई भी।
इन्द्रानी––अच्छा तो अब आप लोग कृपा करके उस कमरे में चलिए।
भैरोंसिंह––बहुत अच्छी बात है, (दोनों कुमारों से) चलिए। भैरोंसिंह को लिए हुए कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह उस कमरे में आए जिसे इन्द्रानी ने इनके लिए खोला था। कुमार ने इस कमरे को देखकर बहुत पसन्द किया क्योंकि यह कमरा बहुत बड़ा और खूबसूरती के साथ सजाया हुआ था। इसकी छत बहुत ऊँची और रंगीन थी, तथा दीवारों पर भी मुसौवर ने अनोखा काम किया था। कुछ दीवारों पर जंगल, पहाड़, खोह, कंदराकाघाटी और शिकारगाह तथा बहते हुए चश्मे का अनोखा दृश्य ऐसे अच्छे ढंग से दिया गया था कि देखने वाला नित्य पहरों देखा करे और उसका चित्त न भरे। मौके-मौके से जंगली जानवरों की तस्वीरें भी ऐसी बनी थीं कि देखने वालों को उसके असली होने का धोखा होता था। दीवारों पर बनी हुई तस्वीरों के अतिरिक्त कागज और कपड़ों पर बनी हुई तथा सुन्दर चौखटों में जड़ी हुई तस्वीरों की भी इस कमरे में कमी न थी। ये तस्वीरें केवल ऐसी हसीन और नौजवान औरतों की थीं जिनकी खूबसूरती और भाव को देखकर देखने वाला प्रेम से दीवाना हो सकता था। इन्हीं तस्वीरों में इन्द्रानी और आनन्दी की तस्वीरें भी थीं, जिन्हें देखते ही कुँअर इन्द्रजीत हँस पड़े और भैरोंसिंह की तरफ देख के बोले, "देखो, यह तस्वीर इन्द्रानी की और यह उनकी बहिन आनन्दी की है। उन्हें तुमने न देखा होगा!"
भैरोंसिंह––जी, इनकी छोटी बहिन को तो मैंने नहीं देख।
इन्द्रजीतसिंह––स्वयं जैसी खूबसुरत है वैसी ही तस्वीर भी बनी है। (इन्द्रानी की तरफ देखकर) मगर अब हमें इस तस्वीर के देखने की कोई जरूरत नहीं!
इन्द्रानी––(हँसकर) बेशक, क्योंकि अब आप स्वतन्त्र और लड़के नहीं रहे।
इन्द्रानी का जवाब सुन भैरोंसिंह तो खिलखिलाकर हँस पड़ा, मगर आनन्दसिंह ने मुश्किल से हँसी रोकी।
इस कमरे में रोशनी का सामान (दीवारगीर डोल हांडी इत्यादि) भी बेशकीमत खूबसूरत और अच्छे ढंग से लगा हुआ था। सुन्दर बिछावन और फर्श के अतिरिक्त चाँदी और सोने की कई कुर्सियाँ भी उस कमरे में मौजूद थी जिन्हें देखकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने एक सोने की कुर्सी पर बैठने का इरादा किया मगर इन्द्रानी ने सभ्यता के साथ रोककर कहा––"पहले आप लोग भोजन कर लें, क्योंकि भोजन का सब सामान तैयार है और ठण्डा हो रहा है।"
इन्द्रजीतसिंह––भोजन करने की तो इच्छा नहीं है।
इन्द्रानी––(चेहरा उदास बनाकर) तो फिर आप हमारे मेहमान ही क्यों बने थे? क्या आप अपने को बेमुरौवत और झूठा बनाना चाहते हैं?
इन्द्रानी ने कुमार को हर तरह से कायल और मजबूर करके भोजन करने के लिए तैयार किया। इस कमरे में छोटा-सा दरवाजा दूसरे कमरे में जाने के लिए बना हुआ था, इसी राह से दोनों कुमार और भैरोंसिंह को लिए हुए इन्द्रानी कमरे में पहुँची। यह कमरा बहुत ही छोटा और राजाओं के पूजा-पाठ तथा भोजन इत्यादि ही के योग्य बना हुआ था। कुमार ने देखा कि दोनों भाइयों के लिए उत्तम-से-उत्तम भोजन का सामान चाँदी और सोने के बर्तनों में तैयार है और हाथ में सुन्दर पंखा लिए आनन्दी उसकी हिफाजत कर रही ह। इन्द्रानी ने आनन्दी के हाथ से पंखा ले लिया और कहा, "भैरोंसिंह भी आ पहुँचे हैं, इनके वास्ते भी सामान बहुत जल्द ले आओ।"
आज्ञा पाते ही आनन्दी चली गई और थोड़ी देर में कई औरतों के साथ भोजन का सामान लिए लौट आई। करीने से सब सामान लगाने के बाद उसने उन औरतों को बिदा किया जिन्हें अपने साथ लाई थी।
दोनों कुमार और भैरोंसिंह भोजन करने के लिए बैठे, उस समय इन्द्रजीतसिंह ने भेद भरी निगाह से भैरोंसिंह की तरफ देखा और भैरोंसिंह ने भी इशारे में ही लापरवाही दिखा दी। इस बात को इन्द्रानी और आनन्दी ने ताड़ लिया कि कुमार को इस भोजन में बेहोशी को दवा का शक हुआ मगर कुछ बोलना मुनासिब न समझकर चुप रह गई। जब तक दोनों कुमार भोजन करते रहे तब तक आनन्दी पंखा हाँकती रही। दोनों कुमार इन दोनों औरतों का बर्ताव देखकर बहुत खुश हुए और मन में कहने लगे कि ये औरतें जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही नेक भी हैं, जिनके साथ व्याही जायेंगी उनके बड़भागी होने में कोई सन्देह नहीं (क्योंकि ये दोनों कुमारी मालूम होती थीं)।
भोजन समाप्त होने पर आनन्दी ने दोनों कुमारों और भैरोंसिंह के हाथ धुलाये और इसके बाद फिर दोनों कुमार और भैरोंसिंह इन्द्रानी और आनन्दी के साथ उसी पहले वाले कमरे में आये। इन्द्रानी ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, "अब थोड़ी देर आप लोग आराम करें और मुझे इजाजत दें तो···।"
इन्द्रजीतसिंह––मेरा जी तुम लोगों का हाल जानने के लिए बेचैन हो रहा है, इसलिए मैं नहीं चाहता कि तुम एक पल के लिए भी कहीं जाओ जब तक कि मेरी बातों का पूरा-पूरा जवाब न दे लो। मगर यह बताओ कि तुम लोग भोजन कर चुकी हो या नहीं?
इन्द्रानी––अभी तो हम लोगों ने भोजन नहीं किया है, जैसी मर्जी हो···
इन्द्रजीतसिंह––तब मैं इस समय नहीं रोक सकता। मगर इस बात का वादा जरूर ले लूँगा, कि तुम घण्टे से ज्यादा न लगाओगी, और मुझे अपने इन्तजार का दु:ख न दोगी।
इन्द्रानी––जी मैं वादा करती हूँ कि घण्टे भर के अन्दर ही आपकी सेवा में लौट आऊँगी।
इतना कहकर आनन्दी को साथ लिए हुए इन्द्रानी चली गई और दोनों कुमार तथा भैरोंसिंह को बातचीत करने का मौका दे गई।
६
इन्द्रानी और आनन्दी के चले जाने के बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह आनन्दसिंह और भैरोंसिंह में यों बातचीत होने लगी––
इन्द्रजीतसिंह––(भैरोंसिंह से) असल बात जो मैं इन्द्रानी से पूछना चाहता था उसका मौका तो अभी तक मिला ही नहीं।
भैरोंसिंह––यही कि तुम कौन और कहाँ की रहने वाली हो, इत्यादि···!
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, और किशोरी, कामिनी, कमलिनी इत्यादि कहाँ हैं तथा उनसे मुलाकात क्योंकर हो सकती है?
आनन्दसिंह––(भैरोंसिंह से)इस बात का कुछ पता तो शायद तुम भी दे सकोगे, क्योंकि हम लोगों के पहले तुम इन्द्रानी को जान चुके हो और कई ऐसी जगहों में भी घूम चुके हो जहाँ हम लोग अभी तक नहीं गए हैं।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, पहले तुम अपना हाल तो कहो!
भैरोंसिंह––सुनिए-अपना बटुआ पाने की उम्मीद में जब मैं उस दरवाजे के अन्दर गया तो जाते ही मैंने उन दोनों को ललकार के कहा, "मैं भैरोंसिंह स्वयं आ पहुँचा।" इतने ही में वह दरवाजा जिस राह से मैं उस कमरे में गया था बन्द हो गया। यद्यपि उस समय मुझे एक प्रकार का भय मालूम हुआ परन्तु बटुए की लालच ने मुझे उस तरफ देर तक ध्यान न देने दिया और मैं सीधा उस नकाबपोश के पास चला गया जिसकी कमर में मेरा बटुआ लटक रहा था।
मैं समझे हुए था कि 'पीला मकरन्द' अर्थात् पीली पोशाक वाला नकाबपोश स्याह नकाबपोश का दुश्मन तो है ही, अतएव स्याह नकाबपोश का मुकाबला करने में पीले मकरन्द से मुझे कुछ मदद अवश्य मिलेगी मगर मेरा खयाल गलत था मेरा नाम सुनते ही वे दोनों नकाबपोश मेरे दुश्मन हो गए और यह कहकर मुझसे लड़ने लगे कि "यह ऐयारी का बटुआ अब तुम्हें नहीं मिल सकता, यह रहेगा तो हम दोनों में से किसी एक के पास ही रहेगा।"
परन्तु मैं इस बात से भी हताश न हुआ। मुझे उस बटुए की लालच ऐसी कम न थी कि उन दोनों के धमकाने से डर जाता और अपने बटुए के पाने से नाउम्मीद होकर अपने बचाव की सूरत देखता। इसके अतिरिक्त आपका तिलिस्मी खंजर भी मुझे हताश नहीं होने देता था, अतः मैं उन दोनों के वारों का जवाब उन्हें देने और दिल खोलकर लड़ने लगा और थोड़ी ही देर में विश्वास करा दिया कि राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का मुकाबला करना हँसी-खेल नहीं है।
थोड़ी देर तक तो दोनों नकाबपोश मेरा वार बहुत अच्छी तरह बचाते चले गये मगर इसके बाद जब उन दोनों ने देखा कि अब उनमें वार बचाने की कुदरत नहीं रही और तिलिस्मी खंजर जिस जगह बैठ जायेगा दो टुकड़े किए बिना न रहेगा, तब पीले मकरन्द ने ऊँची आवाज में कहा, "भैरोंसिंह ठहरो-ठहरो, जरा मेरी बात सुन लो तब लड़ना। ओ स्याह नकाब वाले, क्यों अपनी जान का दुश्मन बन रहा है? जरा ठहर जा और मुझे भैरोंसिंह से दो-दो बातें कर लेने दे।"
पीले मकरन्द की बात सुनकर स्याह नकाबपोश ने और साथ ही मैंने भी लड़ाई से हाथ खींच लिया, मगर तिलिस्मी खंजर की रोशनी को कम न होने दिया।
मैं––(स्याह नकाबपोश की तरफ बताकर) इसके पास मेरा ऐयारी का बटुआ जिसे मैं लिया चाहता हूँ।
पीला मकरन्द––तो मुझसे क्यों लड़ रहे हो?
मैं––मैं तुमसे नहीं लड़ता बल्कि तुम खुद मुझसे लड़ रहे हो!
पीला मकरन्द––(स्याह नकाबपोश से) क्यों अब क्या इरादा है, इनका बटुआ खुशी से इन्हें दे दोगे या लड़कर अपनी जान दोगे?
स्याह नकाबपोश––जब बटुए का मालिक स्वयं आ पहुँचा है, बटुआ देने में मुझे क्योंकर इनकार हो सकता है? हाँ यदि ये न आते तो बटुआ कदापि न देता।
पीला मकरन्द––जब ये न आते मैं भी देख लेता कि तुम वह बटुआ मुझे कैसे नहीं देते। खैर अब इनका बटुआ इन्हें दे दो और पीछा छुड़ाओ!
स्याह नकाबपोश ने बटुआ खोलकर मेरे आगे रख दिया और कहा, "अब तो मुझे छुट्टी मिली?" इसके जवाब में मैंने कहा, "नहीं, पहले मुझे देख लेने दो कि मेरी अनमोल चीजें इसमें हैं या नहीं।"
मैंने उस बटुए के बन्धन पर निगाह पड़ते ही पहचान लिया कि मेरे हाथ की दी हुई गिरह ज्यों की त्यों मौजूद है तथापि होशियारी के तौर पर बटुआ खोल कर देख लिया और जब निश्चय हो गया कि मेरी सब चीजें इसमें मौजूद हैं तो खुश होकर बटुआ कमर में लगाकर स्याह नकाबपोश से बोला, "अब मेरी तरफ से तुम्हें छुट्टी है,मगर यह तो बता दो कि कुमार के पास किस राह से जा सकता हूँ?" इसका जवाब स्याह नकाबपोश ने यह दिया कि "यह सब हाल मैं नहीं जानता, तुम्हें जो कुछ पूछना है पीले मकरन्द से पूछ लो।"
इतना कहकर स्याह नकाबपोश न मालूम किधर चला गया और मैं पीले मकरन्द का मुँह देखने लगा। पीले मकरन्द ने मुझसे पूछा, "अब तुम क्या चाहते हो?"
मैं––अपने मालिक के पास जाना चाहता हूँ!
पीला मकरन्द––तो जाते क्यों नहीं?
मैं––क्या उस दरवाजे की राह जा सकूँगा जिधर से आया था?
पीला मकरन्द––क्या तुम देखते नहीं कि वह दरवाजा बन्द हो गया है और अब तुम्हारे खोलने से नहीं खुल सकता!
मैं––तब मैं क्योंकर बाहर जा सकता हूँ?
इसके जवाब में पीले मकरन्द ने कहा, "तुम मेरी सहायता के बिना यहाँ से निकलकर बाहर नहीं जा सकते क्योंकि रास्ता बहुत कठिन और चक्करदार है। खैर तुम मेरे पीछे-पीछे चले आओ, मैं तुम्हें यहाँ से बाहर कर दूँगा।"
पीले मकरन्द की बात सुनकर मैं उसके साथ-साथ जाने के लिए तैयार हो गया, मगर फिर भी अपना दिल भरने के लिए मैंने एक दफे उस दरवाजे को खोलने का उद्योग किया जिधर से उस कमरे में गया था। जब वह दरवाजा न खुला तब लाचार होकर मैंने पीले मकरन्द का सहारा लिया मगर दिल में इस बात का खयाल जमा रहा कि कहीं वह मेरे साथ दगा न करे।
पीले मकरन्द ने चिराग उठा लिया और मुझे अपने पीछे-पीछे आने के लिए कहा तथा मैं तिलिस्मी खंजर हाथ में लिये हुए उसके साथ रवाना हुआ। पीले मकरन्द ने विचित्र ढंग से कई दरवाजे खोले और मुझे कई कोठरियों में घुमाता हुआ मकान के बाहर ले गया। मैं तो समझे हुए था कि अब आपके पास पहुँचा चाहता हूँ मगर जब बाहर निकलने पर देखा तो अपने को किसी और ही मकान के दरवाजे पर पाया। चारो तरफ सुबह की सुफेदी अच्छी तरह फैल चुकी थी और मैं ताज्जुब की निगाहों से चारों तरफ देख रहा था। उस समय पीले मकरन्द ने मुझे उस मकान के अन्दर चलने के लिए कहा मगर इस जगह वह स्वयं पीछे हो गया और मुझे आगे चलने के लिए बोला। उसकी इस बात से मुझे शक पैदा हुआ, मैंने उससे कहा कि "जिस तरह अभी तक तुम मेरे आगे-आगे चलते आये हो उसी तरह अब भी इस मकान के अन्दर क्यों नहीं चलते? मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चला चलूँगा।" इसके जवाब में पीले मकरन्द ने सिर हिलाया और कुछ कहा ही चाहता था कि मेरे पीछे की तरफ से आवाज आई, "ओ भैरोसिंह, खबरदार! इस मकान के अन्दर पैर न रखना, और इस पीले मकरन्द को पकड़ रखना, भागने न पावे!"
मैं घूमकर पीछे की तरफ देखने लगा कि यह आवाज देने वाला कौन है। इतने ही में इस इन्द्रानी पर मेरी निगाह पड़ी जो तेजी के साथ चलकर मेरी तरफ आ रही थी। पलट कर मैंने पीले मकरन्द की तरफ देखा तो उसे मौजूद न पाया, न मालूम वह यकायक क्योंकर गायब हो गया। जब इन्द्रानी मेरे पास पहुँची तो उसने कहा, "तुमने बड़ी भूल की जो उस शैतान मकरन्द को पकड़ न लिया। उसने तुम्हरे साथ धोखेबाजी की। बेशक वह तुम्हारे बटुए की लालच में तुम्हारी जान लिया चाहता था। ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि मुझे खबर लग गई और मैं दौड़ी हुई यहाँ तक चली आई। वह कम्बख्त मुझे देखते ही भाग गया।"
इन्द्रानी की बात सुनकर मैं ताज्जुब में आ गया और उसका मुँह देखने लगा। सबसे ज्यादा ताज्जुब तो मुझे इस बात का था कि इन्द्रानी जैसी खूबसूरत और नाजुक औरत को देखते ही वह शैतान मकरन्द भाग क्यों गया? इसके अतिरिक्त देर तक तो मैं इन्द्रानी की खूबसूरती ही को देखता रह गया। (मुस्कुरा कर) माफ कीजिए, बुरा न मानियेगा, क्योंकि मैं सच कहता हूँ कि इन्द्रानी को मैंने किशोरी से भी बढ़कर खूबसूरत पाया। सुबह के सुहावने समय में उसका चेहरा दिन की तरह दमक रहा था!
इन्द्रजीतसिंह––यह तुम्हारी खुशनसीबी थी कि सुबह के वक्त ऐसी खूबसूरत औरत का मुँह देखा।
भैरोंसिंह––उसी का यह फल मिला कि जान बच गई और आपसे मिल सका।
इन्द्रजीतसिंह––खैर, तब क्या हुआ?
भैरोंसिंह––मैंने धन्यवाद देकर इन्द्रानी से पूछा कि "तुम कौन हो और यह मकरन्द कौन था?" इसके जवाब में इन्द्रानी ने कहा कि "यह तिलिस्म है, यहाँ के भेदों को जानने का उद्योग न करो। जो कुछ आप-से-आप मालूम होता जाय, उसे समझते जाओ। इस तिलिस्म में तुम्हारे दोस्त और दुश्मन बहुत हैं, अभी तो आए हो, दो-चार दिन में बहुत सी बातों का पता लग जाएगा, हाँ, अपने बारे में मैं इतना जरूर कहूँगी कि इस तिलिस्म की रानी हूँ और तुम्हें तथा दोनों कुमारों को अच्छी तरह जानती हूँ।"
इन्द्रानी इतना कहके चुप हो गई और पीछे की तरफ देखने लगी। उसी समय और भी चार-पाँच औरतें वहाँ आ पहुँची जो खूबसूरत कमसिन और अच्छे गहने-कपड़े पहने हुए थीं। मैंने किशोरी कामिनी वगैरह का हाल इन्द्रानी से पूछना चाहा, मगर उसने बात करने की मोहलत न दी और यह कहकर मुझे एक और के सुपुर्द कर दिया दि "यह तुम्हें कुँअर इन्द्रजीतसिंह के पास पहुँचा देगी।" इतना कहकर बाकी औरतों को साथ लिए हुए इन्द्रानी चली गई और मुझे पीछे तरद्दुद में छोड़ गई। अन्त में उसी औरत की मदद से मैं यहाँ तक पहुँचा।
इन्द्रजीतसिंह––आखिर उस औरत से भी तुमने कुछ पूछा या नहीं?
भैरोंसिंह––पूछा तो बहुत कुछ, मगर उसने जवाब एक बात का भी न दिया मानो वह कुछ सुनती ही न थी। हाँ, एक बात कहना तो मैं भूल ही गया।
इन्द्रानी––वह क्या?
भैरोंसिंह––इन्द्रानी के चले जाने के बाद जब मैं उस औरत के साथ इधर आ रहा था तब रास्ते में एक लपेटा हुआ कागज मुझे मिला जो जमीन पर इस तरह पड़ा हुआ था जैसे किसी राह-चलते की जेब से गिर गया हो। (कमर से कागज निकाल कर और कुँअर इन्द्रजीतसिंह के हाथ में देकर) लीजिए पढ़िए, मैं तो इसे पढ़कर पागल सा हो गया था।
भैरोंसिंह के हाथ से कागज लेकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने पढ़ा और उसे अच्छी तरह देखकर भैरोंसिंह से कहा, "बड़े आश्चर्य की बात है, मगर यह हो नहीं सकता, क्यों कि हमारा दिल हमारे कब्जे में नहीं है और न हम किसी के आधीन हैं।"
आनन्दसिंह––भैया, जरा मैं भी तो देखूँ, यह कागज कैसा है और इसमें क्या लिखा है?
इन्द्रजीतसिंह––(वह कागज देकर) लो देखो।
आनन्दसिंह––(कागज को पढ़कर और उसे अच्छी तरह देखकर) यहतो अच्छी जबर्दस्ती है, मानो हम लोग कोई चीज ही नहीं हैं। (भैरोंसिंह से) जिस समय यह चिट्ठी तुमने जमीन पर से उठाई थी उस समय उस औरत ने भी देखा या तुमसे कुछ कहा था कि नहीं जो तुम्हारे साथ थी?
भैरोंसिंह––उसे इस बात की कुछ भी खबर नहीं थी क्योंकि वह मेरे आगे-आगे चल रही थी। मैंने जमीन पर से चिट्ठी उठाई भी और पढ़ी भी मगर, उसे कुछ भी मालूम न हुआ। मुझे तो शक होता है कि वह गूँगी और बहरी अथवा हद से ज्यादा सीधी और बेवकूफ थी।
आनन्दसिंह––इस पर मोहर इस ढंग की पड़ी हुई है जैसे किसी राजदरवार की हो।
भैरोंसिंह––बेशक ऐसी ही मालूम पड़ती है। (हँसकर इन्द्रजीतसिंह से) चलिए आपके लिए तो पौ-बारह हैं किस्मत का धनी होना इसे ही कहते हैं?
इन्द्रजीतसिंह––तुम्हारी ऐसी की तैसी।
पाठकों के सुभीते के लिए हम उस चिट्ठी की नकल यहाँ लिख देते हैं जिसे पढ़ कर और देखकर दोनों कुमारों और भैरोंसिंह को ताज्जुब मालूम हुआ था––"पूज्यवर,
पत्र पाकर चित्त प्रसन्न हुआ। आपकी राय बहुत अच्छी है। उन दोनों के लिए कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ऐसा वर मिलना कठिन है, इसी तरह दोनों कुमारों को भी ऐसी स्त्री नहीं मिल सकती। बस अब इसमें सोच-विचार करने की कोई जरूरत नहीं, आपकी आज्ञानुसार मैं आठ पहर के अन्दर ही सब सामान दुरुस्त कर दूँगा। बस परसों ब्याह हो जाना ही ठीक है। बड़े लोग इस तिलिस्म में जो कुछ दहेज की रकम रख गये हैं वह इन्हीं दोनों कुमारियों के योग्य है। यद्यपि इन दोनों का दिल चुटीला हो चुका है परन्तु हमारा प्रताप भी तो कोई चीज है! जब तक दोनों कुमार आपकी आज्ञा न मानेंगे, तब तक वे जा कहाँ सकते हैं? अन्त को वह होना आवश्यक है जो आप चाहते हैं।
मुहर द॰––मु॰ मा॰"
इस चिट्ठी को कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने पुनः पढ़ा और ताज्जुब करते हुए अपने छोटे भाई की तरफ देख कर कहा, "ताज्जुब नहीं कि यह चिट्ठी किसी ने दिल्लगी के तौर पर लिख कर भैरोंसिंह के रास्ते में डाल दी हो और हम लोगों को तरदुद में डाल कर तमाशा देखना चाहते हो?"
आनन्दसिंह––कदाचित ऐसा ही हो। अगर कमलिनी से मुलाकात हो गई होती तो···
भैरोंसिंह––तब क्या होता? मैं यह पूछता हूँ कि इस तिलिस्म के अन्दर आकर आप दोनों भाइयों ने क्या किया? अगर इसी तरह से समय बिताया जायगा तो देखियेगा कि आगे चल कर क्या-क्या होता है!
इन्द्रजीतसिंह––तो तुम्हारी क्या राय है, बिना समझे-बूझे तोड़-फोड़ मचाऊँ?
भैरोंसिंह––बिना समझे-बूझे तोड़-फोड़ मचाने की क्या जरूरत है? तिलिस्मी किताब और तिलिस्मी बाजे से आपने क्या पाया और वह किस दिन काम आवेगा? क्या इन बागों का हाल उसमें लिखा हुआ न था?
इन्द्रजीतसिंह––लिखा हुआ तो था मगर साथ ही इसके यह भी अन्दाज मिलता था कि तिलिस्म के ये हिस्से टूटने वाले नहीं हैं।
भैरोंसिंह––यह तो मैं भी बिना तिलिस्मी किताब पढ़े हो समझ सकता हूँ कि तिलिस्म के ये हिस्से टूटने वाले नहीं हैं, अगर टूटने वाले होते तो किशोरी, कामिनी वगैरह को राजा गोपालसिंह हिफाजत के लिए यहाँ न पहुँचा देते, मगर यहाँ से निकल जाने का या तिलिस्म के उस हिस्से में पहुँचने का रास्ता तो जरूर होगा जिसे आप तोड़ सकते हैं।
आनन्दसिंह––हाँ, इसमें क्या शक है!
भैरोंसिंह––अगर शक नहीं है तो उसे खोजना चाहिए।
इतने ही में इन्द्रानी और आनन्दी भी आ पहुँचीं, जिन्हें देख दोनों कुमार बहुत प्रसन्न हुए और इन्द्रजीतसिंह ने इन्द्रानी से कहा––"मैं बहुत देर से तुम्हारे आने का इन्तजार कर रहा था।"
इन्द्रानी––मेरे आने में वादे से ज्यादा देर तो नहीं हुई।
इन्द्रजीतसिंह––न सही, मगर ऐसे आदमी के लिए जिसका दिल तरह-तरह के तरद्दुदों और उलझनों में पड़ कर खराब हो रहा हो, इतना इन्तजार भी कम नहीं है।
इस समय इन्द्रानी और आनन्दी यद्यपि सादी पोशाक में थीं, मगर किसी तरह की सजावट की मुहताज न रहने वाली उनकी खूबसूरती देखने वाले का दिल, चाहे वह परले सिरे का त्यागी क्यों न हो, अपनी तरफ खींचे बिना नहीं रह सकती थी। नुकीले हों से ज्यादा काम करने वाली उनकी बड़ी-बड़ी आँखों में मारने और जिलाने वाली दोनों तरह की शक्तियाँ मौजूद थीं। गालों पर इत्तिफाक से आ पड़ी हुई धुँघराली लटें शान्त बैठे हुए मन को भी चाबुक लगा कर अपनी तरफ मुतवज्जह कर रही थीं। सूधेपन और नेकचलनी का पता देने वाली सीधी और पतली नाक तो जादू का काम कर रही थी। मगर उनके खूबसूरत, पतले और लाल होंठों को हिलते देखने और उनमें से तुले हुए तथा मन लुभाने वाले शब्दों के निकलने की लालसा से दोनों कुमारों को छुटकारा नहीं मिल सकता था और उनकी सुराहीदार गर्दनों पर गर्दन देने वालों की कमी नहीं हो सकती थी। केवल इतना ही नहीं, उनके सुन्दर सुडौल और उचित आकार वाले अंगों की छटा बड़े-बड़े कवियों और चित्रकारों को भी चक्कर में डाल कर लज्जित कर सकती थी।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के आग्रह से वे दोनों उनके सामने बैठ गई मगर अदब का पल्ला लिए और सिर नीचा किए हुए।
इन्द्रानी––इस जल्दी और थोड़े समय में हम लोग आपकी खातिरदारी और मेहमानी का इन्तजाम कुछ भी न कर सकीं। मगर मुझे आशा है कि कुछ देर के बाद इस कसूर की माफी का इन्तजाम अवश्य कर सकूँगी।
इन्द्रजीतसिंह––इतना क्या कम है कि मुझ जैसे नाचीज मुसाफिर के साथ यहाँ की रानी होकर तुमने ऐसा अच्छा बर्ताव किया। अब आशा है कि जिस तरह तुमने अपने बर्ताव से मुझे प्रसन्न किया है, उसी तरह मेरे सवालों का जवाब देकर मेरा स देह भी दूर करोगी।
इन्द्रानी––आप जो कुछ पूछना चाहते हों पूछे, मुझे जवाब देने में किसी तरह का उज्र न होगा।
इन्द्रजीतसिंह––किशोरी, कामिनी, कमलिनी और लाड़िली वगैरह इस तिलिस्म के अन्दर आई हैं?
इन्द्रानी––जी हाँ, आई तो हैं!
इन्द्रजीतसिंह––क्या तुम जानती हो कि इस समय वे सब कहाँ हैं?
इन्द्रानी––जी हाँ, मैं अच्छी तरह जानती हूँ। इस बाग के पीछे सटा हुआ एक और तिलिस्मी बाग है, सभी को लिए हुए कमलिनी उसी में चली गई हैं और उसी में रहती हैं!
इन्द्रजीतसिंह––क्या हम लोगों को तुम उनके पास पहुँचा सकती हो?
इन्द्रानी––जी नहीं।
इन्द्रजीतसिंह––क्यों?
इन्द्रानी––वह बाग एक दूसरी औरत के अधीन है, जिससे बढ़ कर मेरी दुश्मन इस दुनिया में कोई नहीं।
इन्द्रजीतसिंह––तो क्या तुम उस बाग में कभी नहीं जाती?
इन्द्रानी––जी नहीं, क्योंकि एक तो दुश्मन के खयाल से मेरा जाना वहाँ नहीं होता, दूसरे उसने रास्ता भी बन्द कर दिया है। इसी तरह मैं उसके पक्षपातियों को अपने बाग में नहीं आने देती।
इन्द्रजीतसिंह––तो हमारी और उनकी मुलाकात क्योंकर हो सकती है?
इन्द्रानी––यदि आप उन सभी से मिलना चाहें तो तीन-चार दिन और सब्र करें क्योंकि अब ईश्वर की कृपा से ऐसा प्रबन्ध हो गया है कि तीन-चार दिन के अन्दर ही वह बाग मेरे कब्जे में आ जाय और उसका मालिक मेरा कैदी बने। मेरे दारोगा ने तो कमलिनी को उस बाग में जाने से मना किया था। मगर अफसोस कि उसने दारोगा की बात न मानी और धोखे में पड़ कर अपने को एक ऐसी जगह जा फँसाया, जहाँ से हम लोगों का सम्बन्ध कुछ भी नहीं।
इन्द्रजीतसिंह––तो क्या तुम लोग राजा गोपालसिंह के अधीन नहीं होते?
इन्द्रानी––हम लोग जरूर राजा गोपालसिंह के अधीन हैं, और मैं हूँ कि आप यहाँ के तिलिस्म को तोड़ने के लिए आए हैं, अस्तु, इस बात को भी जानते होंगे कि यहाँ के बहुत से ऐसे हिस्से हैं, जिन्हें आप नहीं तोड़ सकेंगे।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, जानते हैं।
इन्द्रानी––उन्हीं हिस्सों में से जो टूटने वाले नहीं हैं, कई दर्जे ऐसे हैं जो केवल सैर-तमाशे के लिए बनाये गए हैं और वहां जमानिया का राजा प्रायः अपने मेहमानों को भेज कर सैर-तमाशा दिखाया करता है, अस्तु इसलिए कि वह जगह हमेशा अच्छी हालत में बनी रहे हम लोगों के कब्जे में दे दी गई है और नाम मात्र के लिए हम लोग तिलिस्म की रानी कहलाती हैं, मगर हाँ इतना तो जरूर है कि हम लोगों को सोना-चाँदी और जवाहिरात की (यहाँ की बदौलत) कमी नहीं है।
इन्द्रजीतसिंह––जिन दिनों राजा गोपाल सिंह को मायारानी ने कैद कर लिया था उन दिनों यहाँ की क्या अवस्था थी? मायारानी भी कभी यहाँ आती थी या नहीं?
इन्द्रानी––जी नहीं, मायारानी को इन सब बातों और जगहों की कुछ खबर ही न थी। इसलिए वह अपने समय में यहाँ कभी नहीं आई और तब तक हम लोग स्वतन्त्र बने रहे। अब इधर जब से आपने राजा गोपालसिंह को कैद से छुड़ा कर हम लोगों को पुनः जीवनदान दिया है, तब से केवल तीन दफे राजा गोपालसिंह यहाँ आए हैं और चौथी दफे परसों मेरी शादी में यहाँ आवेंगे!
इन्द्रजीतसिंह––(चौंक कर) क्या परसों तुम्हारी शादी होने वाली है?
इन्द्रानी––(कुछ शरमा कर) जी हाँ, मेरी और (आनन्दी की तरफ इशारा करके) मेरी इस छोटी बहिन की भी।
इन्द्रजीतसिंह––किसके साथ?
इन्द्रानी––सो तो मुझे मालूम नहीं।
इन्द्रजीतसिंह––शादी करने वाले कौन हैं? तुम्हारे माँ-बाप होंगे?
इन्द्रानी––जी, मेरे माँ-बाप नहीं हैं केवल गुरुजी महाराज हैं, जिनकी आज्ञा मुझे माँ-बाप की आज्ञा से भी बढ़ कर माननी पड़ती है।
भैरोंसिंह––(इन्द्रानी से) इस तिलिस्म के अन्दर कल-परसों में किसी और का ब्याह भी होने वाला है?
इन्द्रानी––नहीं।
भैरोंसिंह––मगर हमने सुना है।
इन्द्रानी––कदापि नहीं, अगर ऐसा होता तो हम लोगों को पहले खबर होती।
इन्द्रानी का जवाब सुनकर भैरोंसिंह ने मुस्कराते हुए कुँअर इन्द्रजीतसिंह औ आनन्दसिंह की तरफ देखा और दोनों कुमारों ने भी उसका मतलब समझ कर सिर नीचा कर लिया।
इन्द्रजीतसिंह––(इन्द्रानी से) क्या तुम लोगों में पर्दे का कुछ खयाल नहीं रहता?
इन्द्रानी––पर्दे का खयाल बहुत ज्यादा रहता है। मगर उस आदमी से पर्दे का बर्ताव करना पाप समझा जाता है, जिसको ईश्वर ने तिलिस्म तोड़ने की शक्ति दी है, तिलिस्म तोड़ने वाले को हम ईश्वर समझें, यही उचित है।
आनन्दसिंह––तो तुम राजा गोपालसिंह के पास जा सकती हो या हमारी चिट्ठी उनके पास पहुँचा सकती हो?
इन्द्रानी––मैं स्वयं राजा गोपालसिंह के पास जा सकती हूँ और अपना आदमी भी भेज सकती हूँ। मगर आजकल ऐसा करने का मौका नहीं है, क्योंकि आजकल मायारानी वगैरह खास बाग में आई हुई हैं, और उनसे तथा राजा गोपालसिंह से बदाबदी हो रही है, शायद यह बात आपको भी मालूम होगी।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, मालूम है।
इन्द्रानी––ऐसी अवस्था में हम लोगों का या हमारे आदमियों का वहाँ जाना अनुचित ही नहीं बल्कि दुःखदायी भी हो सकता है!
इन्द्रजीतसिंह––हाँ, सो तो जरूर है।
इन्द्रानी––मगर मैं आपका मतलब समझ गई, आप शायद उसके विषय में राजा गोपालसिंह को लिखना चाहते हैं जिसके हिस्से में किशोरी-कामिनी वगैरह पड़ी हुई हैं, मगर ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है। दो रोज सब्र कीजिए, तब तक स्वयं राजा गोपालसिंह ही यहाँ आकर आपसे मिलेंगे।
इन्द्रजीतसिंह––अच्छा, यह बताओ कि हमारी चिट्ठी किशोरी या कमलिनी के पास पहुँचवा सकती हो?
इन्द्रानी––जी हाँ, बल्कि उसका जवाब भी मँगवा सकती हूँ, मगर ताज्जुब की बात है कि कमलिनी ने आपके पास कोई पत्र क्यों नहीं भेजा? इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन्हें आप लोगों का यहाँ आना मालूम है।
इन्द्रजीतसिंह––शायद कोई सबब होगा। अच्छा तो कमलिनी के नाम से एक चिट्ठी लिख दूँ?
इन्द्रानी––हाँ लिख दीजिये, मैं उसका जवाब मँगा दूँगी। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने भैरोंसिंह की तरफ देखा। भैरोंसिंह ने अपने बटुए में से कलम-दवात और कागज निकाल कर कुमार के सामने रख दिया और कुमार ने कमलिनी के नाम से इस मजमून की चिट्ठी लिख और बन्द कर इन्द्रानी के हवाले कर दी––
"मेरी...कमलिनी,
यह तो मुझे मालूम ही है कि किशोरी, कामिनी, लक्ष्मीदेवी और लाड़िली वगैरह को साथ लेकर राजा गोपालसिंह की इच्छानुसार तुम यहाँ आई हो। मगर मुझे अफसोस इस बात का है कि तुम्हारा दिल जो किसी समय मक्खन की तरह मुलायम था, अब फौलाद की तरह ठोस हो गया। इस बात का तो विश्वास हो ही नहीं सकता कि तुम इच्छा करके भी मुझसे मिलने में असमर्थ हो, परन्तु इस बात का रंज अवश्य हो सकता है कि किसी तरह का कसूर न होने पर भी तुमने मुझे दूध की मक्खी की तरह अपने दिल से निकाल कर फेंक दिया। खैर, तुम्हारे दिल की मजबूती और कठोरता का परिचय तो तुम्हारे अनूठे कामों ही से मिल चुका था, परन्तु किशोरी के विषय में अभी तक मेरा दिल इस बात की गवाही नहीं देता कि वह भी मुझे तुम्हारी ही तरह अपने दिल से भुला देने की ताकत रखती है। मगर क्या किया जाय? पराधीनता की बेड़ी उसके पैरों में है और लाचारी की मुहर उसके होठों पर! अतः इन सब बातों का लिखना तो अब वृथा ही है, क्यों कि तुम अपनी आप मुख्तार हो, मुझसे मिलना चाहो, यह तुम्हारी इच्छा है, मगर अपना तथा अपने साथियों का कुशल-मंगल तो लिख भेजो, या यदि अब मुझे इस योग्य भी नहीं समझतीं तो जाने दो।
कुँअर आनन्दसिंह की भी इच्छा थी कि अपने दिल का कुछ हाल कामिनी और लाड़िली को लिखें। परन्तु कई बातों का खयाल कर रह गए। इन्द्रानी कुँअर इन्द्रजीतसिंह की लिखी हुई चिट्ठी लेकर उठ खड़ी हुई और यह कहती हुई अपनी बहिन को साथ लिए चली गई कि "अब मैं चिराग जलने के बाद आप लोगों से मिलूँगी, तब तक आप लोग यदि इच्छा हो तो इस बाग की सैर करें। मगर किसी मकान के अन्दर जाने का उद्योग न करें।
७
अब हम थोडा-सा हाल राजा गोपालसिंह का लिखते हैं। जब वह बरामदे पर से झाँकने वाला आदमी मायारानी के चलाए हुए तिलिस्मी तमंचे की तासीर से बेहोश होकर नीचे आ गिरा और भीमसेन उसके चेहरे की नकाब हटाने और सूरत देखने पर चौंककर बोल उठे कि "वाह-वाह, यह तो राजा गोपालसिंह हैं, तब मायारानी बहुत ही प्रसन्न हुई और भीमसेन से बोली, "बस, अब विलम्ब करना उचित नहीं है, एक ही बार में सिर धड़ से अलग कर देना चाहिए।"
भीमसेन––नहीं, इसे एकदम से मार डालना उचित न होगा, बल्कि कैद करके तिलिस्म का कुछ हाल मालूम करना लाभदायक होगा।
मायारानी––मैंने इसे कैद में रख कर हद से ज्यादा तकलीफें दी, तब तो इसने तिलिस्म का कुछ हाल कहा नहीं, अब क्या कहेगा, बस इसे मार डालना ही मुनासिव है।
इसके जवाब में उसी बरामदे पर से जिस पर से वह आदमी लुढ़क कर नीचे आया था किसी ने कहा, "तिलिस्म का हाल जानने का शौक अभी तक लगा ही है। इस बात की खबर नहीं कि अब तुम लोगों के मरने में केवल सात घण्टे की देर बाकी रह गई है।"
सभी ने चौंककर उसकी तरफ देखा और पुनः एक आदमी को उसी बरामदे में टहलता हुआ पाया मगर अब की दफ इस आदमी का चेहरा नकाब से खाली था और एक जलती हुई मोमबत्ती बायें हाथ में मौजूद थी जिससे उसका रोबीला चेहरा साफ-साफ दिखाई दे रहा था। मायारानी और उसके साथियों को यह देख कर बड़ा ताज्जुब हुआ कि यह दूसरा आदमी भी राजा गोपालसिंह ही मालूम होता था बल्कि बनिस्बत पहले आदमी के ठीक राजा गोपालसिंह मालूम होता था। इस कैफियत ने मायारानी का कलेजा हिला दिया और वह डर से काँपती हुई उसको इस तरह देखने लगी जैसे कोई व्याध जंगल में अकस्मात् आ खड़े हुए शेर की तरफ देखता हो।
सभी को अपनी तरफ ताज्जुब के साथ देखते-देखते उस आदमी ने पुनः कहा, "न तो वह राजा गोपाल सिंह है और न उसकी जुबानी तिलिस्म का कोई भेद ही तुम लोगों को मालूम हो सकता है। अरे ओ कम्बख्त मायारानी, तू तो वर्षों तक मेरे साथ रह चुकी है, क्या तू भी मुझे नहीं पहचानती। राजा गोपाल सिंह मैं हूँ या वह है? तू उसके नाटे कद को नहीं देखती? अगर वह राजा गोपाल सिंह होता तो क्या उस तिलिस्मी तमंचे की एक गोली खाकर गिर पड़ता! भला मुझ पर भी एक नहीं पचास गोली चला, देख, क्या असर होता है।"
नये गोपालसिंह की इस बात ने मायारानी की रही-सही ताकत भी हवा कर दी और अब उसे अपने सामने मौत की सूरत दिखाई देने लगी। यद्यपि उसने इस गोपालसिंह पर भी तिलिस्मी तमंचा चलाने का इरादा किया था, मगर अब उसके हाथों में इतनी ताकत न रही कि तमंचे में गोली डालकर चला सके। इसी तरह उसके साथी भी घबड़ाकर इस नये राजा गोपालसिंह की तरफ देखने और अपने मन में सोचने लगे, "व्यर्थ इस मायारानी के फेर में पड़ कर यहाँ आए।"
इस नये गोपालसिंह ने पुनः पुकारकर मायारानी ने कहा, "हाँ-हाँ, सोचती क्या है, तिलिस्मी तमंचा चला और तमाशा देख, या कह तो मैं स्वयं तेरे पास चला आऊँ! और भीमरोन वगैरह, तुम लोग क्यों इसके फेर में पड़कर अपनी-अपनी जान दे रहे हो! क्या तुम समझ रहे हो कि यह तिलिस्म की रानी हो जायेगी और तुम्हें अपना हिस्सेदार बना लेगी! कदापि नहीं, अब इसकी जान किसी तरह नहीं बच सकती और मैं अभी नीचे आकर तुम सभी का काम तमाम करता हूँ। हाँ, अगर तुम लोग अपनी जान बचाना चाहते हो तो मैं तुम्हें कहता हूँ कि मायारानी का खयाल न करके उसे इसी जगह छोड़ दो और तुम लोग उस सफेद संगमरमर के चबूतरे पर भागकर चले जाओ। खबरदार, दूसरी जगह मत खड़े होना और मेरे नीचे आने के पहले ही यहाँ से हटकर उस चबूतरे पर चले जाना, नहीं तो पछताओगे!"
इतना कहकर नये गोपालसिंह ने मोमबत्ती नीचे फेंक दी और पीछे की तरफ हटकर उन लोगों की नजरों से गायब हो गये।
अब भीमसेन और माधवी वगैरह को निश्चय हो गया कि मायारानी के किए कुछ न होगा और इसका साथ करके हम लोगों ने व्यर्थ ही में अपने को आफत में ला फँसाया। इस तिलिस्मी बाग तथा राजा गोपालसिंह की माया का पता नहीं लगता, अतः मायारानी का साथ देना और गोपालसिंह की बात न मानना निःसन्देह अपना गला अपने हाथ से काटना है। इतना सोचते-सोचते ही वे लोग गोपाल सिंह के कहे मुताबिक उस संगमरमर के चबूतरे पर चले गये जो उनसे थोड़ी ही दूर पर उनके पीछे की तरफ पड़ता था।
होना तो ऐसा ही चाहिए था कि गोपालसिंह की बातों से डरकर मायारानी भी उन लोगों के साथ-ही-साथ उसी संगमरमर वाले चबूतरे पर चली जाती, मगर न मालूम क्या सोचकर उसने ऐसा न किया और वहाँ से भागकर उन फौजी सिपाहियों की भीड़ में जा छिपी जो इस बाग में खड़े हुए इनकी बातें सुन नहीं सकते थे, मगर ताज्जुब के साथ सब-कुछ देख जरूर रहे थे।
वह संगमरमर का चबूतरा, जिस पर भीमसेन वगैरह चले गये थे, उनके जाने के थोड़ी ही देर बाद इस तेजी के साथ जमीन के अन्दर धंस गया कि उन लोगों को कूदकर भागने की भी मोहलत न मिली। कुछ देर बाद उन सभी को न मालूम कहाँ उलटकर वह चबूतरा फिर ऊपर चला आया और ज्यों का त्यों अपने स्थान पर जम गया।
इस समय केवल सुबह की सफेदी ही ने चारों तरफ अपना दखल नहीं जमा लिया था, बल्कि आसमान पर पूरव की तरफ सूरज की लालिमा भी कुछ दूर तक फैल चुकी थी, इसलिए उस चबूतरे पर जाने वाले भीमसेन और माधवी वगैरह का जो हाल हुआ, वह माधवी के फौजी सिपाहियों ने भी बखूबी देख लिया। अपने मालिक और उनके साथियों की यह दशा देख फौजी सिपाही घबरा गये और चाहने लगे कि यदि कहीं रास्ता मिल जाय तो हम लोग भी यहाँ से भागकर अपनी जान बचावें। उन्हें अपने झुँड में मायारानी का आ जाना बहुत ही बुरा मालूम हुआ और उन्होंने बड़ी बेमुरौवती के साथ मायारानी से कहा, "तुम्हारी ही बदौलत हम लोगों की यह दशा हुई है और हमारे मालिकों पर भी आफत आई, अत: अब तुम हमारी मण्डली में से चली जाओ, नहीं तो हम लोग जूते से तुम्हारे सिर की खबर लेंगे, तुम्हारे जाने के बाद हम लोगों पर जो कुछ बीतेगी, उसे सह लेंगे।"
अफसोस, अपनी करतूतों के कारण आज मायारानी इस दशा को पहुँच गई कि अपने सिपाहियों की झिड़की सहे और जूतियाँ खाय। सिपाहियों की बात जब मायारानी ने न मानी तो कई सिपाहियों ने जूतियों से उसकी खबर ली, और उसी समय ऊपर से किसी के पुकारने की आवाज आई।
जिस जगह ये सिपाही लोग थे, उससे थोड़ी ही दूर पर एक बुर्ज था। इस समय उसी बुर्ज पर चढ़े हुए राजा गोपालसिंह को उन सिपाहियों ने देखा और मालूम किया कि वह आवाज उन्हीं ने दी थी।
गोपालसिंह की कैफियत देखकर सिपाहियों का कलेजा पहले ही दहल चुका था, अतः अब इस बात का हौसला नहीं कर सकते थे कि उनका मुकाबला करें। उन्हें देखने के साथ ही उस फौज का अफसर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला, "आज्ञा!"
गोपालासिंह ने कहा, "हम खूब जानते हैं कि तुम लोग बेकसूर हो और जो कुछ कसूर है, वह तुम्हारे मालिकों का है, सो तुमने देख ही लिया कि वे अपनी सजा को पहुँच गये, अब वे जीते नहीं हैं जो तुमसे आकर मिलेंगे, अतः अब तुम लोगों को हुक्म दिया जाता है कि तुम लोग अपनी-अपनी जान बचाकर यहाँ से निकल जाओ। यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम्हारे जाने के लिए दरवाजा खोल दिया जाय और तुम लोग बाग से बाहर होकर जहाँ इच्छा हो चले जाओ। यदि तुम चाहोगे और नेकचलनी का वादा करोगे तो हमारी फौज में भी तुम को जगह मिल जायगी।"
फौजी अफसर––(हाथ जोड़े हुए) आप स्वयं राजा हैं और जानते हैं कि सिपाही लोग तनख्वाह के वास्ते लड़ते हैं। जो राज्य या जमीन के वास्ते लड़े और सिपाहियों को तनख्वाह दे, कसूर उसी का समझा जाता है। हमारे मालिक नादान थे, आपके प्रताप का खयाल न करके मायारानी की बातों में आकर नष्ट हो गये, अब हम लोग आपके अधीन हैं और चाहते हैं कि हम लोगों को इस कैद से छुटकारा ही नहीं बल्कि आपके सरकार में नौकरी भी मिले। इस समय हम लोग अपने को आप ही का ताबेदार समझते हैं।
गोपालसिंह––अच्छा, तो जैसा चाहते हो, वैसा ही होगा। इस समय से तुम्हें अपना नौकर समझ के हुक्म दिया जाता है कि मायारानी जो तुम लोगों के बीच में चली आई है, जूतियाँ लगाकर अलग कर दी जाय और तुम लोग (हाथ का इशारा करके) उस तरफ की दीवार के पास चले जाओ। वहाँ तुम्हें एक छोटा सा दरवाजा खुला हुआ दिखाई देगा, बस उसी राह से तुम लोग बाहर चले जाना और किसी ठिकाने मैदान में डेरा जमाना। हमारा राजदीवान स्वयं तुम्हारे पास पहुँचकर सब इन्तजाम कर देगा। मगर खबरदार, इस बात का खूब खयाल रखना कि मायारानी तुम लोगों के साथ बाहर न जाने पावे और तुम लोगों में से एक आदमी भी उसका साथ न दे।
फौजी अफसर––जो हुक्म।
मायारानी बेइज्जत हो ही चुकी थी, मगर फिर भी दूर खड़ी यह सब कार्रवाई देख और बातें सुन रही थी। उसे इन सिपाहियों की नमकहरामी पर बड़ा क्रोध आया और वह वहाँ से भागकर पश्चिम की तरफ वाले दालान में चली गई, तथा एक कोठरी के अन्दर घुसकर गायब हो गयी। शायद इस कोठरी में कोई तहखाना या रास्ता था, जिसका हाल उसे मालूम था। उसी राह से होकर वह मकान की दूसरी मंजिल पर चली गई और उसी जगह से छिपकर तिलिस्मी तमंचे की गोली उन फौजी सिपाहियों पर चलाने लगी जो राजा गोपालसिंह की आज्ञानुसार दरवाजे की तरफ जा रहे थे। इन गोलियों की तासीर का हाल हम पहले कई जगह लिख आये हैं और बता आये हैं कि इन गोलियों में से निकला हुआ धुआँ आला दर्जे की बेहोशी का असर बात की बात में पैदा करता था, अब बेचारे सिपाहियों को दरवाजे तक पहुँचने की भी मोहलत न मिली और तीन ही चार गोलियों में से निकले धुएँ ने उन सभी को बेहोश करके जमीन पर लिटा दिया।
अपनी कार्रवाई को देखकर मायारानी बहुत प्रसन्न हुई, मगर उसकी प्रसन्नता ज्यादा देर तक कायम न रही, क्योंकि उसी समय उसने राजा गोपालसिंह को उन सिपाहियों की तरफ जाते देखा। वह ताज्जुब में आकर उसी जगह खड़ी देखने लगी कि अब क्या होता है। उसने देखा कि राजा गोपालसिंह ने उन सिपाहियों के मध्य में पहुँचकर एक गोला जमीन पर पटका जो गिरते ही भारी आवाज के साथ फट गया और उसमें से इतना ज्यादा धुआँ निकला कि उसने क्रमशः फैलकर हर तरफ से उन सिपाहियों को घेर लिया और फिर हवा होकर आसमान की तरफ उठ गया। उस धुएँ की तासीर से सब सिपाहियों की बेहोशी जाती रही और वे लोग उठकर ताज्जुब के साथ एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। सिपाहियों के अफसर ने अपने पास राजा गोपाल सिंह को मौजूद पाया और निगाह पड़ते ही हाथ जोड़कर बोला, "आपने तो हम लोगों को बाहर चले जाने की आज्ञा दे दी थी, फिर हम लोग बेहोश क्यों कर दिये गये?"
इसके जवाब में गोपालसिंह ने कहा, "तुम लोगों को हमने नहीं, बल्कि कम्बख्त मायारानी ने बेहोश किया था, हमने यहाँ पहुँचकर तुम्हारी बेहोशी दूर कर दी। अब तुम लोग एक सायत भी विलम्ब न करो और शीघ्र ही यहाँ से चले जाओ।"
उस अफसर ने झुककर सलाम किया और अपने साथियों को कुछ इशारा करके वहाँ से चल पड़ा। यह हाल देख मायारानी ने पुनः तिलिस्मी तमंचे की गोलियाँ उन लोगों पर चलाईं, मगर इसका असर कुछ भी न हुआ और वे सब सिपाही राजा गोपालसिंह की बदौलत थोड़ी ही देर में इस तिलिस्मी बाग के बाहर हो गये। फिर मायारानी को यह भी मालूम न हुआ कि राजा गोपालसिंह कहाँ गये और क्या हुए।
८
वास्तव में भूतनाथ का हाल बड़ा ही विचित्र है। अभी तक उसका असल भेद खुलने में नहीं आता। वह जहाँ जाता है वहाँ ही एक विचित्र घटना देखने में आती है, जिससे मिलता है, उसी से एक नई बात पैदा होती है, और जब जो कुछ करता है, उसी में एक अनूठापन मालूम होता है। इस समय वह बलभद्रसिंह के साथ चुनारगढ़ वाले तिलिस्म में मौजूद है और वहाँ पहुँचने के साथ ही वह सुन चुका है कि कल राजा वीरेन्द्रसिंह भी इस जगह आने वाले हैं। वीरेन्द्रसिंह को तो आये हुए आज कई दिन हो चुके होते, मगर उन्होंने जान बूझकर रास्ते में बहुत देर लगा दी। नकली किशोरी, कामिनी और कमला के क्रिया-कर्म का बखेड़ा (जिसका करना लोगों को धोखे में डालने के लिए आवश्यक था) चुनार में ले आना उन्होंने पसन्द न किया बल्कि रास्ते में निपटा डालना उचित जाना, इसलिए पन्द्रह-बीस दिन की देर उन्हें रास्ते में हो गई और इसी से वहाँ पहुँच जाने पर भूतनाथ ने सुना कि राजा वीरेन्द्रसिंह कल आने वाले हैं।
उस खँडहर में पहुँचने पर रात के समय भूतनाथ ने जो कुछ तमाशा देखा था उसका विचित्र हाल तो हम ऊपर के किसी बयान में लिख ही चुके हैं, आज उसी के आगे का हाल लिखकर हम अपने पाठकों के चित्त में भूतनाथ की तरफ से पुनः एक तरह का खुटका पैदा करना चाहते हैं।
बलभद्रसिंह ने जब अपने सिरहाने वाला लिफाफा उठाकर शमादान के सामने खोला तो उसके अन्दर से एक अँगूठी निकली जिसे देखते ही वह चिल्ला उठा और तब बिना कुछ कहे अपनी चारपाई पर आकर बैठ गया। भूतनाथ ने उससे पूछा, "क्यों, यह अँगूठी कैसी है और इसे देखकर तुम घबरा क्यों गये?"
बलभद्रसिंह––इस अँगूठी ने मुझे कई ऐसी बातें याद दिला दीं जिन्हें स्वप्न की तरह कभी याद करके मैं चौंक पड़ता था, मगर आज नहीं, फिर कभी मैं इसका खुलासा हाल तुमसे कहूँगा।
भूतनाथ––भला देखो तो सही उस लिकाफे के अन्दर कोई चिट्ठी भी है या केवल अँगूठी।
बलभद्रसिंह––(लिफाफा भूतनाथ के हाथ में देकर) लो, तुम्हीं देखो।
भूतनाथ––(शमादान के पास लिफाफा ले जाकर और उसे अच्छी तरह देखकर) हाँ-हाँ, इसमें चिट्ठी भी तो है।
बलभद्रसिंह––(भूतनाथ के पास जाकर) देखें।
भूतनाथ ने वह चिट्ठी बलभद्रसिंह के हाथ में दी और बलभद्रसिंह ने बड़े शौक से उसे पढ़ा, यह लिखा हुआ था––
"यह अँगूठी देकर तुम्हें विश्वास दिलाते हैं कि तुम हमारे हो और हम तुम्हारे हैं। भूतनाथ को अपना सच्चा सहायक समझो और जो कुछ वह कहे, उसे करो। भूतनाथ यह नहीं जानता कि हम कौन हैं, मगर हम कल उससे मिलकर अपना परिचय देंगे और जो कुछ कहना होगा, कहेंगे।"
इस चिट्ठी को पढ़कर दोनों के जी में एक तरह का खुटका पैदा हो गया और बिना कुछ विशेष बातचीत किये दोनों अपनी-अपनी चारपाई पर जाकर लेट रहे, मगर बची हुई रात दोनों ने अपनी आंखों में ही काटी, किसी को नींद न आई।
दूसरे दिन सवेरे ही पन्नालाल उन दोनों के पास पहुँचे और रात भर का कुशल-मंगल पूछा। दोनों ही ने दुनियादारी के तौर पर कुशल-मंगल कहकर बातचीत की मगर रात के विचित्र हाल को अपने दिल के अन्दर ही छिपा रखा।
दिनभर इन दोनों का बड़े चैन और आराम से बीता। जीतसिंह से भी मुलाकात और कई तरह की बातें हुई, मगर जीतसिंह और उनकी आज्ञानुसार किसी ऐयार ने भी उन दोनों से मुकदमे की बात या किसी तरह का सवाल न किया क्योंकि यह बात पहले ही से तय पा चुकी थी कि बिना राजा वीरेन्द्रसिंह के आये इस बारे में किसी तरह की बातचीत भूतनाथ से न की जायगी।
आज किसी समय राजा वीरेन्द्रसिंह के आने की खबर थी, मगर वे न आये। संध्या के समय हरकारे ने आकर जीतसिंह को खबर दी कि राजा साहब कल संध्या के समय यहाँ आवेंगे, भूतनाथ और बलभद्रसिंह के आने की खबर उन्हें हो गई है।
संध्या होने के साथ ही भूतनाथ और बलभद्रसिंह के दिलों में धुकधुकी पैदा हो गई कि देखना चाहिए कि आज की रात कैसी गुजरती है। तिलिस्मी चबूतरे के अन्दर से कौन निकलता है, और क्या कहता है।
रात आधी से ज्यादा जा चुकी है, कल की तरह आज भी इस लम्बे-चौड़े मकान के अन्दर सन्नाटा छाया हुआ है। भूतनाथ और बलभद्रसिंह अपनी-अपनी चारपाई पर लेटे हुए हैं। मगर नींद किसी की आँखों में नहीं है और दोनों का ध्यान उसी तिलिस्मी चबूतरे की तरफ है। कल की तरह आज भी उस चबूतरे वाले दालान में कन्दील जल रही है जिसके सबब से वह पत्थर वाला चबूतरा साफ दिखाई दे रहा है। भूतनाथ ने देखा कि कल की तरह आज भी इस पत्थर वाले चबूतरे का दरवाजा खुला और उसके अन्दर से एक आदमी स्याह लबादा ओढ़े हुए निकला। धीरे-धीरे घूमता-फिरता वह उस कमरे के दरवाजे पर पहुँचा जिसमें भूतनाथ और बलभद्रसिंह आराम कर रहे थे। कमरे का दरवाजा खुलने के साथ ही वे दोनों उठ बैठे और उस आदमी को कमरे के अन्दर पैर रखते हुए देखा।
उस आदमी ने हाथ के इशारे से बलभद्रसिंह को बैठने के लिए कहा और भूतनाथ को अपने पास बुलाया। भूतनाथ चारपाई के नीचे उतर पड़ा और अपना तिलिस्मी खंजर, जो खूटी के साथ लटक रहा था, लेकर उस आदमी के पास गया। वह आदमी भूतनाथ को अपने साथ कमरे के बाहर वाले दालान में ले गया और वहाँ से सीढ़ी की राह नीचे उतरने के लिए कहा। भूतनाथ भी चुपचाप उसके साथ नीचे चला गया।
यहाँ भी एक कन्दील जल रही थी और चारों तरफ सन्नाटा था। उस आदमी ने अपना चेहरा खोल दिया और भूतनाथ को अपनी तरफ अच्छी तरह देखने के लिए कहा। भूतनाथ सूरत देखते ही चौंक पड़ा और बोला––"हैं, यह मैं किसकी सूरत देख रहा हूँ! क्या धोखा तो नहीं है?"
आदमी––नहीं-नहीं, कोई धोखा नहीं है, 'मेमकुलचे' कहने से शायद तुम्हारा शक जाता रहेगा।
भूतनाथ––हाँ, अब मेरा शक जाता रहा। मगर आप यहाँ कहाँ? क्या मुझे किसी तरह का विचित्र हुक्म दिया जायगा? या मुझे राजा साहब से माफी माँगने की मोहलत ही न मिलेगी?
आदमी––हाँ, तुम्हें एक विचित्र हुक्म दिया जायगा, मगर यह बताओ कि राजा साहब के बारे में तुमने क्या सुना है? वे कब तक यहाँ आवेंगे?
भूतनाथ––राजा वीरेन्द्रसिंह कल यहाँ अवश्य आ जायेंगे, आज हरकारे ने आकर यह पक्की खबर जीतसिंह को दी है।
आदमी––(कुछ सोचकर) यह तो बड़ी मुश्किल हुई है, हमारे लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे लिए।
भूतनाथ––(काँपकर) सो क्यों! मैंने अब कौन-सा नया अपराध किया है?
आदमी––नया अपराध किया तो नहीं, मगर करना पड़ेगा।
भूतनाथ––नहीं-नहीं, मैं अब कोई अपराध न करूँगा। जो कुछ कर चुका हूँ, उसी का कलंक मिटाना मुश्किल हो रहा है!
आदमी––मगर क्या किया जाय, लाचारी है, अपराध तो करना ही होगा और सो भी इसी समय।
भूतनाथ––(कुछ सोचकर) भला यह तो बताइये कि वह अपराध है क्या और मुझे क्या करना होगा?
आदमी––यह तो जानते ही हो कि बलभद्रसिंह हमारा है।
भूतनाथ––जी हाँ, इस समय तो मेरी जान बचाने वाला है।
आदमी––बेशक।
भूतनाथ––तब आप क्या चाहते हैं?
आदमी––यही कि इसी समय बलभद्रसिंह को बेहोश करके हमारे हवाले कर दो। हम तो उन्हें कल ही उठा ले गये होते, मगर कल हमें निश्चय हो गया कि तुम जाग रहे होंगे और लड़ने लिए अवश्य तैयार हो जाओगे, इसलिए सोचा कि पहले तुम्हें अपना परिचय दे लें, तब यह काम करें जिसमें तुम्हारा दिल भी खुटके में न रहे।
भूतनाथ––मगर यह तो बड़ी मुश्किल होगी। अच्छा, कल राजा वीरेन्द्रसिंह से उनकी मुलाकात तो करा लेने दीजिए।
आदमी––यह नहीं हो सकता, उन्हें हम आज ही ले जायेंगे। नहीं तो हमारा बहुत हर्ज होगा और उस हर्ज में तुम्हारा भी नुकसान है।
भूतनाथ––हाय, नुकसान और दुःख भोगने के लिए तो मैं पैदा ही हुआ हूँ! न जाने मेरी किस्मत में निश्चिन्त होना भी बदा है या नहीं। राजा वीरेन्द्रसिंह सुन चुके हैं कि भूतनाथ, बलभद्रसिंह को छुड़ा लाया है, अब अगर इस समय आप उन्हें ले जायेंगे कल राजा वीरेन्द्रसिंह उन्हें मुझसे माँगेंगे तो क्या जवाब दूँगा?
आदमी––कह देना कि मैं रात को सोया हुआ था, न मालूम बलभद्रसिंह कहाँ चले गये। मुझे कुछ खबर नहीं, आप अपने पहरे वालों से पूछिए।
भूतनाथ––हाँ, यदि आप न मानेंगे तो ऐसा ही करना पड़ेगा।
आदमी––तो बस अब विलम्ब न करो, झटपट जाओ और उन्हें बेहोश करके हमारे पास ले आओ।
भूतनाथ––जिस समय मैंने बलभद्रसिंह को छुड़ाया था, उस समय उन्हें विश्वास नहीं होता था कि मैं उनके साथ नेकी कर रहा हूँ, बड़ी मुश्किल से तो उन्हें विश्वास दिलाया। इस समय आप जानते हैं कि वे भी जाग रहे हैं, आप खुद ही उन्हें बैठे रहने के लिए कह आए हैं, अब मैं उन्हें जबर्दस्ती बेहोश करूँगा तो उनके दिल में क्या आवेगा? क्या वे यह समझेंगे कि भूतनाथ ने नेकनीयती के साथ मेरी जान बचाई थी?
आदमी––अगर ऐसा समझेंगे तो समझें, तुम सोच क्या रहे हो! क्या मेरा हुक्म न मानोगे?
भूतनाथ––मेरी क्या मजाल जो आपका हुक्म न मानूं।
इतने ही में उसी तरह का स्याह लबादा ओढ़े और भी एक आदमी वहाँ आ पहुँचा। भूतनाथ समझ गया कि वह आदमी इसी का साथी है और कल भी यहाँ आया था। इस नये आये हुए आदमी ने पहले आदमी से खास बोली (भाषा) में कुछ बातचीत की जिसे भूतनाथ कुछ भी न समझ सका, इसके बाद उसने परदा हटा के अपनी सूरत भूतनाथ को दिखा दी।
अव भूतनाथ के ताज्जुब का कोई ठिकाना न रहा और वह एक दम घबरा के बोला, "नहीं-नहीं, मैं जागता नहीं हूँ बल्कि जो कुछ देख रहा हूँ, सब स्वप्न है!"
दूसरा आदमी––भूतनाथ, तुम पागल हो गए हो!
भूतनाथ––बेशक यही बात है, या तो मैं स्वप्न देख रहा हूँ या पागल हो गया हूँ।
पहला आदमी––न तो तुम स्वप्न देख रहे हो और न पागल ही हो गए हो, जो कुछ देख-सुन रहे हो सब ठीक है। अच्छा, अब तुम हम लोगों के साथ आओ, किसी दूसरी जगह अँधेरे में खड़े होकर बातचीत करेंगे, तो हम यहाँ केवल इसलिए खड़े हो गये थे कि तुम्हें अपनी सूरत दिखा दें।
इतना कहकर वे दोनों आदमी भूतनाथ का हाथ पकड़े हुए दूसरे दालान में चले गए जहाँ बिल्कुल अन्धकार था और वहाँ बातचीत करने लगे। इस जगह उन तीनों में जो कुछ बातें हुईं वह ऐयारी भाषा में हुईं, इसलिए लिख न सके, मगर आगे चलकर इन बातों का जो कुछ नतीजा निकलेगा पाठकों को मालूम हो जायगा। हाँ इतना कह देना जरूरी है कि डेढ़ घण्टे तक उन तीनों में खूब बातें होती रहीं, इस बीच में दो दफे भूतनाथ के बड़े जोर से हँसने की आवाज आई, ताज्जुब नहीं कि वह आवाज बलभद्रसिंह के कानों तक भी पहुँची हो। इसके बाद भूतनाथ वहाँ से रवाना होकर बलभद्रसिंह के पास आया, देखा कि अभी तक वह बैठे हुए हैं और भूतनाथ का इन्तजार कर रहे हैं।
भूतनाथ को देखते ही बलभद्रसिंह बोले, "आओ-आओ भूतनाथ, मेरे पास बैठ जाओ और बताओ कि क्या हुआ! वह आदमी कौन था जो तुम्हें ले गया था?"
"मैं सब विचित्र हाल आपसे कहता हूँ।" यह कहता हुआ भूतनाथ बलभद्रसिंह के पास बैठ गया, मगर इस तरह पर सटकर बैठा कि उसकी कमर में लगा तिलिस्मी खंजर बलभद्रसिंह के बदन से छू गया और वह उसी समय काँपकर बेहोश हो गये।
बलभद्रसिंह के बेहोश हो जाने के बाद भूतनाथ ने उनकी गठरी बाँधी और नीचे उतारकर दोनों विचित्र आदमियों के पास ले गया। उन दोनों ने उसे तिलिस्मी चबूतरे के पास पहुँचा देने के लिए कहा और भूतनाथ उसे तिलिस्मी चबूतरे के पास ले गया, तब वे दोनों आदमी बलभद्रसिंह को लेकर चबूतरे के अन्दर चले गये, चबूतरे का पल्ला बन्द हो गया और भूतनाथ कुछ सोचता-विचारता अपनी चारपाई पर आकर लेट रहा।
९
सवेरा हो जाने पर जब भूतनाथ और बलभद्रसिंह से मिलने के लिए पन्नालाल तिलिस्मी खँडहर के अन्दर नम्बर दो वाले कमरे में गये तो भूतनाथ को चारपाई पर सोते पाया और बलभद्र सिंह को वहाँ न देखा। पन्नालाल ने भूतनाथ को जगाकर पूछा, "आज तुम इस समय तक खुर्राटे ले रहे हो, यह क्या मामला है!"
भूतनाथ––बलभद्र सिंह जी ने गप-शप में तीन पहर रात बैठे ही बैठे बिता दी इसलिए सोने में बहुत कम आया और अभी तक आँख नहीं खुली, आइये बैठिये।
पन्नालाल––बलभद्रसिंह जी कहाँ हैं?
भूतनाथ––मुझे क्या खबर, इसी जगह कहीं होंगे, मुझे तो अभी आपने सोते से जगाया है।
पन्नालाल––मगर मैंने तो उन्हें कहीं भी नहीं देखा!
भूतनाथ––किसी पहरे वाले से पूछिये, शायद हवा खाने के लिए कहीं बाहर चले गये हों।
बलभद्रसिंह को वहाँ न पाकर पन्नालाल को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और भूतनाथ भी घबराया-सा दिखाई देने लगा। पहले तो पन्नालाल और भूतनाथ दोनों ही ने उन्हें खँडहर वाले मकान के अन्दर खोजा मगर जब कुछ पता न लगा तब फाटक पर आकर पहरे वालों से पूछा। पहरे वालों ने भी उन्हें देखने से इनकार करके कहा कि "हम लोगों ने बलभद्र सिंह जी को फाटक के वाहर निकलते नहीं देखा। अतः हम लोग उनके बारे में कुछ नहीं कह सकते।"
बलभद्रसिंह कहाँ चले गये? आसमान पर उड़ गये, दीवार में घुस गये, या जमीन के अन्दर समा गये, क्या हुए? इस बात ने सभी को तरद्दुद में डाल दिया। धीरे-धीरे जीतसिंह को भी इस बात की खबर हुई। जीतसिंह स्वयं उस खँडहर वाले मकान में गये और तमाम कमरों, कोठरियों ओर तहखानों को देख डाला मगर बलभद्रसिंह का पता न लगा। भूतनाथ से भी तरह-तरह के सवाल किये गये, मगर इससे भी कुछ फायदा न हुआ।
संध्या के समय राजा वीरेन्द्रसिंह की सवारी उस तिलिस्मी खँडहर के पास आ पहुँची और राजा वीरेन्द्र सिंह तथा तेजसिंह वगैरह सब कोई उसी खँडहर वाले मकान में उतरे। पहर भर जाते तक तो इन्तजामी होहल्ला मचता रहा, इसके बाद लोगों को राजा साहब से मुलाकात करने की नौबत पहुँची, मगर राजा साहब ने वहाँ पहुँचने के साथ ही भूतनाथ और बलभद्रसिंह का हाल जीतसिंह से पूछा था और बलभद्रसिंह के बारे में जो कुछ हुआ था, उसे उन्होंने राजा साहब से कह सुनाया था। पहर रात जाने के बाद जब भूतनाथ आज्ञानुसार दरबार में हाजिर हुआ तब राजा वीरेन्द्रसिंह ने उससे पूछा, "कहो भूतनाथ, अच्छे तो हो?"
भूतनाथ––(हाथ जोड़कर) महाराज के प्रताप से प्रसन्न हूँ।
वीरेन्द्रसिंह––सफर में हमको जो कुछ रंज और गम हुआ, तुमने वह सुना ही होगा?
भूतनाथ––ईश्वर न करे महाराज को कभी रंज और गम हो मगर हाँ समयानुकूल जो कुछ होना था हो ही गया।
वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब से) क्या तुम्हें इस बारे में कुछ मालूम हुआ है?
भूतनाथ––जी हाँ!
वीरेन्द्रसिंह––कैसे?
भूतनाथ––इसका जवाब देना तो कठिन है, क्योंकि भूतनाथ बनिस्वत जवान और कान के अन्दाज से ज्यादा काम लेता है।
वीरेन्द्रसिंह––(मुस्कुराकर) तुम्हारी होशियारी और चालाकी में तो कोई शक नहीं है मगर अफसोस इस बात का है कि तुम्हारे रहस्य तुम्हारी ही तरह द्विविधा में डालने वाले हैं। अभी कल की बात है कि हमको तुम्हारे बारे में इस बात की खुशखबरी मिली थी कि तुम बलभद्रसिंह को किसी भारी कैद से छुड़ाकर ले आये, मगर आज कुछ और ही बात सुनाई पड़ रही है।
भूतनाथ––जी हाँ, मैं तो हर तरह से अपनी किस्मत की गुत्थी को सुलझाने का उद्योग करता हूँ मगर विधाता ने उसमें उलझनें डाल दी हैं कि मालूम पड़ता है कि अव इस शरीर को चुनारगढ़ के कैदखाने का आनन्द अवश्य भोगना ही पड़ेगा।
वीरेन्द्रसिंह––नहीं-नहीं भूतनाथ, यद्यपि बलभद्रसिंह का यकायक गायब हो जाना तरह-तरह के खुटके पैदा करता है मगर हमें तुम्हारे ऊपर किसी तरह का सन्देह नहीं हो सकता। अगर तुम्हें ऐसा करना ही होता तो इतनी आफत उठा कर उन्हें क्यों छुड़ाते और क्यों यहाँ तक लाते? अतः तुम हमारी खफगी से तो बेफिक्र रहो, मगर इस बात के जानने का उद्योग जरूर करो कि बलभद्रसिंह कहाँ गये और क्या हुए।
भूतनाथ––(सलाम करके) ईश्वर आपको सदैव प्रसन्न रक्खे! मैं आशा करता हूँ कि एक सप्ताह के अन्दर ही बलभद्रसिंह का पता लगाकर उन्हें सरकार में उपस्थित करूंगा।
वीरेन्द्रसिंह––शाबाश, अच्छा अब तुम जाकर आराम करो।
आज्ञानुसार मूतनाथ वहाँ से उठकर अपने डेरे पर चला गया और बाकी लोग भी अपने ठिकाने कर दिये गये। जब राजा वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह अकेले रह गए तब उन दोनों में यों बातचीत होने लगी––
वीरेन्द्रसिंह––कुछ समझ में नहीं आता कि यह रहस्य कैसा है? भूतनाथ की बातों से तो किस तरह का खुटका नहीं होता!
तेजसिंह––जहाँ तक पता लगाया गया है उससे यही जाहिर होता है कि बलभद्रसिंह इस इमारत के बाहर नहीं गए, मगर इस बात पर भी विश्वास करना कठिन हो रहा है।
वीरेन्द्रसिंह––निःसन्देह ऐसा ही है।
तेजसिंह––देखना चाहिए भूतनाथ एक सप्ताह के अन्दर क्या कर दिखाता है।
वीरेन्द्रसिंह––यद्यपि मैंने भूतनाथ की दिलमाजई कर दी है, परन्तु उसका जी शान्त नहीं हो सकता। खैर जो भी हो, मगर तुम उसे अपनी हिफाजत में समझो और पता लगाओ कि यह मामला कैसा है।
तेजसिंह––ऐसा ही होगा!
१०
मायारानी ने जब समझा कि वे फौजी सिपाही इस बाग के बाहर हो गये और गोपालसिंह को भी वहाँ न देखा, तब हिम्मत करके अपने ठिकाने से निकली और पुनः बाग में आकर उस तरफ रवाना हुई जिधर उस गोपालसिंह को बेहोश छोड़ आई थी जो उसके चलाए हुए तिलिस्मी तमंचे की गोली के असर से बेहोश होकर बरामदे के नीचे आ रहा था, मगर वहाँ पहुँचने के पहले ही उसने उस दूसरे कुएँ के ऊपर एक गोपालसिंह को देखा जिसे फौजी सिपाहियों ने मिट्टी से पाट दिया था। मायारानी एक पेड़ की आड़ में खड़ी हो गई और उसी जगह से तिलिस्मी तमंचे वाली एक गोली उसने इस गोपालसिंह पर चलाई। गोली लगते ही गोपालसिंह लुढ़ककर जमीन पर आ रहा और मायारानी दौड़ती हुई उसके पास जा पहुँची। थोड़ी देर तक तो उसकी सूरत देखती रही, इसके बाद कमर से खंजर निकालकर गोपालसिंह का सिर काट डाला और तब खुशी-भरी निगाहों से चारों तरफ देखने लगी, यद्यपि उसे पूरा विश्वास न था कि मैंने असली गोपालसिंह को मार डाला है।
यद्यपि दिन बहुत चढ़ चुका था मगर अभी तक उसे जरूरी कामों से निपटने या कुछ खाने-पीने की परवाह न थी या यों कहिए कि उसे इन बातों का मोहलत हो नहीं मिल सकी थी। गोपालसिंह की लाश को उसी जगह छोड़कर वह बाग के तीसरे दर्जे में जाने की नीयत से अपने दीवानखाने में आई और उसी मामूली राह से बाग के तीसरे दर्जे में चली गई जिस राह से एक दिन तेजसिंह वहाँ पहुँचाये गये थे।
वहाँ भी उसने दूर ही से नम्बर दो वाली कोठरी के दरवाजे पर एक गोपालसिंह को बैठे बल्कि कुछ करते हुए देखा। मायारानी ताज्जुब में आकर थोड़ी देर तक तो उस गोपालसिंह को देखती रही, इसके बाद उसे भी उसी तिलिस्मी तमंचे वाली गोली का निशाना बनाया। जब वह भी बेहोश होकर जमीन पर लेट गया तब मायारानी ने वहाँ पहुँचकर उसका भी सिर काट डाला और एक लम्बी साँस लेकर आप-ही-आप बोली, "क्या अब भी असली गोपालसिंह न मरा होगा! मगर अफसोस, उस एक गोपालसिंह पर ऐसी गोली ने कुछ भी असर न किया था। कदाचित असली गोपालसिंह वही हो!"
इसके जवाब में किसी ने कोठरी के अन्दर से कहा, "हाँ, असली गोपालसिंह वह भी न था और असली गोपालसिंह अभी तक नहीं मरा!"
इस बात ने मायारानी का कलेजा हिला दिया और वह काँपती हुई ताज्जुब के साथ कोठरी के अन्दर देखने लगी।
अकस्मात् कोठरी के अन्दर से निकलते हुए नानक पर मायारानी की निगाह पड़ी। नानक को देखते ही मायारानी का पुराना क्रोध (जो नानक के बारे में था) पुनः उसके चेहरे पर दिखाई देने लगा। वह कुछ देर तक तो नानक को देखती रही और इसके बाद उसे तिलिस्मी गोली का निशाना बनाना चाहा, मगर नानक मायारानी की अवस्था देखकर हँस पड़ा और बोला, "क्या अब भी आप मुझे अपना पक्षपाती नहीं समझतीं?"
मायारानी––क्यों? तूने कौन-सा ऐसा काम किया है जिससे मैं तुझे अपना पक्षपाती समझूँ?
नानक––क्या आपको इस बात की खबर न लगी होगी कि राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान तथा ऐयारों से मेरी गहरी दुश्मनी हो गई? मेरा बाप गिरफ्तार करके दोषी ठहराया गया है, वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने उसे बहुत तंग किया और इसी के साथ-ही-साथ मेरी भी बहुत बड़ी बेइज्जती की। मेरा बाप अपने बचाव की फिक्र कर रहा है और मैं उन सभी से लदला लेने का बन्दोबस्त कर रहा हूँ। इस समय मैं इसलिए यहां आया हूँ कि आप मेरी सहायता करें और मैं आपका साथ दूं।
मायारानी––यदि तेरा कहना वास्तव में सच है तो बड़ी खुशी की बात है।
नानक––जो कुछ मैं कह रहा हूँ उसके सच होने में किसी तरह का सन्देह न कीजिए, मैं उन लोगों की बुराई में जान तक खर्च करने का संकल्प कर चुका हूँ।
मायारानी––यदि तू पहले ही मेरी बात मान चुका होता तो आज मुझे और तुझे दोनों ही को यह दिन देखना नसीब न होता। खैर, आज भी अगर तू राह पर आ जाय तो हम लोग मिल-जुलकर बहुत-कुछ कर सकते हैं
नानक––उन दिनों मुझे हरी-हरी सूझती थी और उस दरबार से बहुत-कुछ पाने की आशा थी, मगर इस बात की खबर न थी कि उनके ऐयार अपनी मण्डली के सिवाय किसी नये या दूसरे ऐयार को अपने दरबार में देखना पसन्द नहीं करते। मुझे कमलिनी ने जितनी उम्मीदें दिलाई थीं उनका एक अंश भी कभी पूरा न हुआ, उल्टे मेरा बाप दोषी ठहराया गया।
मायारानी––भूतनाथ पर जो कुछ इल्जाम लगाया गया है मुझे उसकी पूरी-पूरी खबर लग चुकी है। अब भूतनाथ बिना मेरी मदद के किसी तरह अपनी जान नहीं बचा सकता और न वह बलभद्रसिंह का ही पता लगा सकता है। सच तो यह है कि भूतनाथ ने मुझे भी बड़ा धोखा दिया।
नानक––उन दिनों जो कुछ उन्होंने किया, सो किया, क्योंकि कमलिनी की दिलाई हुई उम्मीदों ने उन्हें भी अन्धा कर दिया था, मगर अब तो उन्हें कमलिनी से भी दुश्मनी हो गयी है, और मैं भी यह सुनकर कि कमलिनी वगैरा को राजा गोपालसिंह ने इसी बाग में लाकर रक्खा है, उससे बदला लेने का खयाल करके यहाँ आया हूँ।
मायारानी––यहाँ का रास्ता तुझे किसने बताया?
नानक––यहाँ के बहुत से रास्तों का हाल कमलिनी ने ही मुझे बताया था। मैं एक दफे यहाँ पहले भी आ चुका हूँ।
मायारानी––कब?
नानक––जब तेजसिंह को आपने कैद किया था और जब चंडूल ने आकर आप लोगों को छकाया था।
मायारानी––(उन बातों की याद से काँपकर) तब तो तुम्हें मालूम होगा कि वह चंडूल कौन था।
नानक––वह कमलिनी थी और मैं उसके साथ था।
मायारानी––(कुछ सोचकर) हाँ...ठीक है। त...तब तो तुम्हें...अच्छा...अच्छा तुम मेरे पास आओ, पहले मैं निश्चय कर लूँ कि तुम ईमानदारी से साथ देने के लिए तैयार हो या सब बातें धोखा देने के लिए कह रहे हो। इसके बाद अगर तुम सच्चे निकले तो हम दोनों आदमी मिलकर बहुत-बड़ा काम कर सकेंगे और तुम्हें भी बहुत-सी...खैर तुम इधर आओ और मेरे साथ एकान्त में चलो।
नानक––(मायारानी के पास आकर) और यहाँ तीसरा कौन है जो हम लोगों की बातें सुनेगा?
मायारानी––चाहे न हो, मगर शक तो है।
मायारानी नानक को लिए दूसरी तरफ चली गई।
११
संध्या होने में अभी दो घण्टे से कुछ ज्यादा देर थी जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और भैरोंसिंह कमरे से बाहर निकलकर बाग के उस हिस्से में घूमने लगे जो तरह-तरह के खुशनुमा पेड़ों-फूल-पत्तों, गमलों और फैली हुई लताओं से सुन्दर और सुहावना मालूम पड़ता था क्योंकि इन तीनों को इन्द्रानी के मुँह से निकले हुए ये शब्द बखूबी याद थे कि 'मगर आप लोग किसी मकान के अन्दर जाने का उद्योग न करें!'
भैरोंसिंह––(घूमते हुए एक फूल तोड़कर) यहाँ एक तो बगीचे के लिए बहुत कम जमीन छोड़ी गई है दूसरे जो कुछ जमीन छोड़ी गई है उसमें भी काम खूबी और खूबसूरती के साथ नहीं लिया गया है। जहाँ पर जिस ढंग के पेड़ होने चाहिए वैसे नहीं लगाये गये हैं।
आनन्दसिंह––शौकीन लोग प्रायः बेला, चमेली, जुही और गुलाब आदि खुशबूदार फूलों के पेड़ क्यारियों के बीच में लगाते हैं।
इन्द्रजीतसिंह––ऐसा नहीं होना चाहिए, क्यारियों के अन्दर केवल पहाड़ी गुल बूटों के ही लगाने में मजा है। जूही, बेला, मोतिया इत्यादि देशी खूशबूदार फूलों को रविशों के दोनों तरफ लगाना चाहिए, जिसमें सैर करने वाला घूमता-फिरता जब चाहे एक-दो फल तोड़ के सूंघ सके।
आनन्दसिंह––वेशक ऐसा न होना चाहिए कि खुशबूदार फूल तोड़ने की लालच में कहीं सैर करने वाला बुद्धि-विसर्जन करके क्यारी के बीच में पैर रक्खे और जूते समेत फिल्ली तक जमीन के अन्दर जा रहे, क्योंकि सिंचाई का पानी क्यारियों में जमा होकर कीचड़ करता है, इसलिए क्यारियों के बीच में उन्हीं पेड़-पौधों का होना आवश्यक है जिन्हें केवल देखने ही में तृप्ति हो जाय और जिनमें ज्यादा सर्दी और पानी के बर्दाश्त करने की ताकत हो।
भैरोंसिंह––मेरी भी यही राय है, मगर साथ ही इसके मैं यह भी कहूँगा कि गुलाब के पेड़ रविशों के दोनों तरफ न लगाने चाहिए जिसमें काँटों की बदौलत सैर करने वाले के (यदि वह भूल से कुछ किनारे की तरफ जा रहे तो) कपड़ों की दुर्गति हो जाय, उसके लिए क्यारी अलग ही होनी चाहिए जिसकी जमीन बहुत नम न हो।
इन्द्रजीतसिंह––ठीक है, इसी तरह चमेली के पेड़ों की कतार भी ऐसी जगह लगानी चाहिए जहाँ टट्टी बनाकर आड़ कर देने का इरादा हो।
भैरोंसिंह––आड़ का काम तो मेंहदी की टट्टी से भी लिया जाता है।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ लिया जाता है मगर जमीन के उस हिस्से में जो बीच वाली या खास जलसे वाली इमारत से कुछ दूर हो, क्योंकि मेंहदी जब फूलती है तो अपने सिवाय और फूलों की खुशबू का आनन्द लेने की इजाजत नहीं देती।
आनन्दसिंह––जैसे कि अब भैरोंसिंह को हम लोग अपने साथ चलने की इजाजत न देंगे।
भैरोंसिंह––(चौंककर) हैं, इसका क्या मतलब?
आनन्दसिंह––इसका मतलब यही है कि अब आप थोड़ी देर के लिए हम दोनों भाइयों का पिण्ड छोड़िये और कुछ दूर हटकर उधर की रविशों पर पैर थकाइए।
भैरोंसिंह––(कुछ चिढ़कर) क्या अब मुझ ऐसे साथी और ऐयार से भी बात छिपाने की नौबत आ गई?
आनन्दसिंह––(इन्द्रजीतसिंह का इशारा पाकर) हाँ, और इसलिए कि बात छिपाने का कायदा तुम्हारी तरफ से जारी हो गया।
भैरोंसिंह––सो कैसे?
आनन्दसिंह––अपने दिल से पूछो।
भैरोंसिंह––क्या मैं वास्तव में भैरोंसिंह नहीं हूँ?
आनन्दसिंह––तुम्हारे भैरोंसिंह होने में कोई शक नहीं है बल्कि तुम्हारी बातों की सचाई में शक है।
भैरोंसिंह––यह शक कब से हुआ?
आनन्दसिंह––जब से तुमने स्वयं कहा कि राजा गोपालसिंह ने तुम्हें इस तिलिस्म में पहुँचते समय ताकीद कर दी थी सब काम कमलिनी की आज्ञानुसार करना, यहाँ तक कि यदि कमलिनी तुम्हें सामना हो जाने पर भी कुमार से मिलने के लिए मना करे तो तुम कदापि न मिलना।
भैरोंसिंह––(कुछ सोचकर) हाँ ठीक है, मगर आपको यह कैसे निश्चय हुआ कि मैंने राजा गोपालसिंह की बात मान ली?
इन्द्रजीतसिंह––यह इसी से मालूम हो गया कि तुमने अपने बटुए का जिक्र करते समय तिलिस्मी खंजर का जिक्र छोड़ दिया।
भैरोंसिंह––(कुछ सोचकर और शर्मा कर) बेशक यह मुझसे भूल हुई।
आनन्दसिंह––कि उस तिलिस्मी खंजर के लिए भी कोई अनूठा किस्सा गढ़ कर हम लोगों को सुना न दिया।
भैरोंसिंह––(और भी शर्माकर) नहीं, ऐसा नहीं है, उस समय मैं इतना कहना भूल गया कि ऐयारी के बटुए के साथ-साथ वह तिलिस्मी खंजर मुझे उस नकागपोश या पीले मकरन्द से नहीं मिला, उन्होंने कसम खाकर कहा कि तुम्हारा खंजर हममें से किसी के पास नहीं है।
आनन्दसिंह––हाँ-और तुमने मान लिया!
भैरोंसिंह––(हिचकता हुआ) इस जरा-सी भूल के हो जाने पर ऐसा नहीं होना चाहिए कि आप लोग अपना विश्वास मुझ पर से उठा लें।
इन्द्रजीतसिंह––नहीं-नहीं, इससे हम लोगों का खयाल ऐसा नहीं हो सकता कि तुम भैरोंसिंह नहीं हो या अगर हो भी तो हमारे दुश्मन के साथी बनकर हमें नुकसान पहुँचाया चाहते हो? कदापि नहीं। हम लोग अब भी तुम्हारा उतना ही भरोसा रखते हैं जितना पहले रखते थे, मगर कुछ देर के लिए जिस तरह तुम असली बातों को छिपाते हो, उसी तरह हम भी छिपावेंगे।
अभी भैरोंसिंह इस बात का जवाब सोच ही रहा था कि सामने से एक औरत आती हुई दिखाई पड़ी। तीनों का ध्यान उसी तरफ चला गया। कुछ पास आने और ध्यान देने पर दोनों कुमारों ने उसे पहचान लिया कि इसे हम इस बाग में आने के पहले इन्द्रानी और आनन्दी के साथ नहर के किनारे देख चुके हैं।
आनन्दसिंह––यह भी उन्हीं औरतों में से एक है जिन्हें हम लोग इन्द्रानी और आनन्दी के साथ पहले बाग में नहर के किनारे देख चुके हैं!
इन्द्रजीतसिंह––बेशक, मगर सब-की-सब एक ही खानदान की मालूम पड़ती हैं यद्यपि उम्र में इन सभी के वहुत फर्क नहीं है।
आनन्दसिंह––देखना चाहिए, यह क्या सन्देशा लाती है।
इतने में वह औरत कुमार के पास आ पहुँची और हाथ जोड़कर दोनों कुमारों की तरफ देखती हुई बोली, "इन्द्रानी और आनन्दी ने हाथ जोड़कर आप दोनों से इस बात की माफी माँगी है कि अब वे दोनों आप लोगों के सामने हाजिर नहीं हो सकती।"
इन्द्रजीतसिंह––(ताज्जुब से) सो क्यों?
औरत––उन्हें इस बात का बहुत रंज है कि वे आप लोगों की खातिरदारी अच्छी तरह से न कर सकी और उनके गुरु महाराज ने उन्हें आप लोगों का सामना करने से रोक दिया।
इन्द्रजीतसिंह––आखिर इसका कोई सबब भी है?
औरत––इसके सिवाय तो और कोई सबब नहीं जान पड़ता कि उन दोनों की शादी आप दोनों भाइयों के साथ होने वाली है।
इन्द्रजीतसिंह––(ताज्जुब के साथ) मुझसे और आनन्द से?
औरत––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––हमारे या हमारे बुजुर्गों की इच्छा के बिना ही।
औरत––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––चाहे हम लोग राजी हों या न हों?
औरत––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––तब तो यह खांसी जबर्दस्ती है!
औरत––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––क्या उनके गुरु महाराज में इतनी सामर्थ्य है कि अपनी इच्छानुसार हम लोगों के साथ बर्ताव करें?
औरत––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––(झुँझलाकर) कभी नहीं, कदापि नहीं!
आनन्दसिंह––ऐसा हो ही नहीं सकता! (औरत से, जो जाने के लिए अपना मुँह फेर चुकी थी) क्या तुम जाती हो?
औरत––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––बस, इतना ही कहने के लिए आई थीं?
औरत––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह––क्या भेजने वालों ने तुम्हें कह दिया था कि 'जी हाँ' के सिवाय और कुछ मत बोलना?
औरत––जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह की झुँझलाहट देखकर उस औरत को भी हँसी आ गई और वह मुस्कुराती हुई जिधर से आई थी उधर ही चली गई तथा थोड़ी दूर जाकर नजरों से गायब हो गई। तब भैरोंसिंह ने दिल्लगी के तौर पर कुमार से कहा, "आप लोगों की खुशकिस्मती का कोई ठिकाना है! रम्भा और उर्वशी के समान औरतें जबर्दस्ती आप लोगों के गले मढ़ी जाती हैं, तिस पर मजा यह कि आप लोग नखरा करते हैं। ऐसा ही है तो मुझे कहिए मैं आपकी सूरत बनकर व्याह कर लूँ।
इन्द्रजीतसिंह––तब कमला किसके नाम की हाँडी चढ़ावेगी?
भैरोंसिंह––अजी कमला से क्या जाने कब मुलाकात हो और क्या हो! यह तो परोसी हुई थाली ठहरी।
इन्द्रजीतसिंह––ठीक है मगर भैरोंसिंह, जहाँ तक मेरा खयाल है, मैं समझता हूँ कि तुम्हें इस ब्याह-शादी वाले मामले की कुछ-न-कुछ खबर जरूर है।
भैरोंसिंह––अगर खबर हो भी तो अब मैं कुछ कहने का साहस नहीं कर सकता
आनन्दसिंह––सो क्यों?
भैरोंसिंह––इसलिए कि आप लोग मुझे झूठा समझ चुके हैं।
इन्द्रजीतसिंह––सो तो जरूर है।
भैरोंसिंह––(चिढ़कर) अगर ऐसा ही खयाल है तो अब मैं आप लोगों के साथ रहना भी मुनासिब नहीं समझता।
इन्द्रजीत––मेरी भी यही राय है।
भैरोंसिंह––अच्छा तो (सलाम करता हुआ) जय माया की।
इन्द्रजीतसिंह––जय माया की।
आनन्दसिंह––जय माया की, मगर यह तो मालूम हो कि आप जायँगे कहाँ?
भैरोंसिंह––इससे आपको कोई मतलब नहीं।
इन्द्रजीतसिंह––हाँ साहब, इससे हम लोगों को मतलब नहीं। आप जाइए और जल्द जाइए।
इसके जवाब में भैरोंसिंह ने कुछ भी न कहा और वहाँ से रवाना होकर पूरब तरफ वाली इमारत के नीचे वाली एक कोठरी में घुस गया। इसके बाद मालूम न हुआ कि भैरोंसिंह का क्या हुआ या कहाँ गया। उसके जाने के बाद दोनों कुमार भी धीरे-धीरे उसी कोठरी में चले गए मगर वहाँ भैरोंसिंह दिखाई न पड़ा और न उस कोठरी में से किसी तरफ जाने का रास्ता ही मालूम हुआ।
इन्द्रजीतसिंह––(आनन्द से) क्यों, हम लोगों का खयाल ठीक निकला न!
आनन्दसिंह––निःसन्देह वह झूठा था, अगर ऐसा न होता तो जानकारों की तरह इस कोठरी में घुसकर गायब न हो जाता।
इन्द्रजीतसिंह––बात तो यह है कि तिलिस्म के इस भाग में बहुत समझ-बूझकर काम करना चाहिए जहाँ की आबोहवा अपनों को भी पराया कर देती है।
आनन्दसिंह––मामला तो कुछ ऐसा ही नजर आता है। मेरी राय में तो अब यहाँ चुपचाप बैठना भी व्यर्थ जान पड़ता है। यहाँ से किसी तरफ जाने का उद्योग करना चाहिए।
इन्द्रजीतसिंह––अब आज की रात तो सब करके बिता दो, कल सवेरे कुछ-न-कुछ बन्दोबस्त जरूर करेंगे।
इसके बाद दोनों भाई वहाँ से हटे और टहलते हुए बावली के पास आकर संगमर्मर वाले चबूतरे पर बैठ गए। उसी समय उन्होंने एक आदमी को सामने वाली इमारत के अन्दर से निकलकर अपनी तरफ आते देखा।
यह शख्स वही बुड्ढ़ा दारोगा था जिससे पहले बाग में मुलाकात हा चुकी थी, जिसने नानक को गिरफ्तार किया था और जिसके दिए हुए कमन्द के सहारे दोनों कुमार उस दूसरे बाग में उतर कर इन्द्रानी और आनन्दी से मिले थे।
जब वह कुमार के पास पहुँचा तो साहब-सलामत के बाद कुमारों ने उसे इज्जत के साथ पास बैठाया और यों बातचीत होने लगी इन्द्रजीतसिंह––आज पुनः आपसे मुलाकात होने की आशा तो न थी।
दारोगा––बेशक मुझे भी इस बात का गुमान न था परन्तु एक आवश्यक कार्य के कारण मुझे आप लोगों की सेवा में उपस्थित होना पड़ा। क्षमा कीजिएगा जिस समय आप कमन्द के सहारे उस बाग में उतरे थे उस समय मुझे इस बात की कुछ भी खबर न थी कि उन औरतों में जिन्हें देखकर आप उस बाग में गए थे, दो औरतें ऐसी हैं जिन्हें और बातों के अतिरिक्त यहाँ की रानी कहलाने की प्रतिष्ठा भी प्राप्त है। जिन्दगी का पिछला भाग इस बुढ़ौती के लिबास में काट रहा हूँ इसलिए आँखों की रोशनी और ताकत ने भी एक तौर पर जवाब ही दे दिया है, इसीलिए मैं उन औरतों को भी पहचान न सका।
इन्द्रजीतसिंह––खैर तो यह बात ही क्या थी जिसके लिए आप माफी मांग रहे हैं और इससे मेरा हर्ज भी क्या हुआ? आप उस काम की फिक्र कीजिए जिसके लिए आपको यहाँ आने की तकलीफ उठानी पड़ी।
दारोगा––इस समय वे ही दोनों, अर्थात् इन्द्रानी और आनन्दी, मेरे यहाँ आने का सबब हुई हैं। मैं आपके पास इस बात की इतिला करने के लिए भेजा गया हूँ कि परसों उन दोनों औरतों की शादी आप दोनों भाइयों के साथ होने वाली है, आशा है कि आप दोनों भाई इसे स्वीकार करेंगे।
इन्द्रजीतसिंह––मैं अफसोस के साथ यह जवाब देने पर मजबूर हूँ कि हम लोग इस शादी को मंजूर नहीं कर सकते और इसके कई सबब हैं।
दारोगा––ठीक है, मुझे भी पहले-पहले यही जवाब सुनने की आशा थी, मगर मैं आपको अपनी तरफ से भी नेकनीयती के साथ यह राय दूँगा कि आप इस शादी से इनकार न करें और मुझे उन सब बातों के कहने का मौका न दें जिन्हें लाचारी की हालत में निवेदन करके समझाना पड़ेगा कि आप इस शादी से इनकार नहीं कर सकते, बाकी रही यह बात कि इनकार करने के कई सबब हैं, सो यद्यपि मैं उन कारणों के जानने का दावा तो नहीं कर सकता मगर इतना तो जरूर कह सकता हूँ कि सबसे बड़ा सबब जो है वह केवल मुझी को नहीं बल्कि सभी को यहाँ तक कि इन्द्रानी और आनन्दी को भी मालूम है। परन्तु मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ कि किशोरी और कामिनी को भी इस शादी से किसी तरह का दुःख न होगा, क्योंकि उन्हें इस बात की पूरी-पूरी खबर है कि यह शादी ही आपकी और उनकी मुलाकात का सबब होगी, बिना इस शादी के हुए वे आपको और आप उन्हें देख भी नहीं सकते।
इन्द्रजीतसिंह––मैं आपकी बातों पर विश्वास करने की कोशिश करूँगा, परन्तु और सब बातों को किनारे रखकर मैं आपसे यह पूछता हूँ कि यह शादी किस रीति के अनुसार हो रही है? विवाह के आठ प्रकार शास्त्र ने कहे हैं, यह उनमें से कौन सा प्रकार है और ऐसी शादी का नतीजा क्या निकलेगा। यद्यपि इसमें मेरी कुछ हानि नहीं हो सकती परन्तु मेरी अनिच्छा के कारण जो कुछ हानि हो सकती है इसका विचार लड़की वाले के सिर है।
दारोगा––ठीक है, मगर जहाँ तक मैं सोचता हूँ इन सब बातों पर अच्छी तरद विचार किया जा चुका है और ज्योतिषी ने भी निश्चय दिला दिया है कि इस शादी का नतीजा दोनों तरफ बहुत अच्छा निकलेगा। यद्यपि आप इस समय प्रसन्न नहीं होते परन्तु अन्त में बहुत ही प्रसन्न होंगे। अच्छा इस समय तो मैं जाता हूँ क्योंकि मैं केवल इत्तिला करने के लिए आया था वाद-विवाद करने के लिए नहीं, परन्तु इसका जवाब पाने के लिए कल प्रातःकाल अवश्य आऊँगा।
इतना कहकर दारोगा उठ खड़ा हुआ और जावब का इन्तजार कुछ भी न करके जिधर से आया था उधर ही चला गया। उसके जाने के बाद कुछ देर तक तो दोनों भाई उसी जगह बातचीत करते रहे और इसके बाद जरूरी कामों से छुट्टी पाकर और उसी बावली पर संन्ध्या-वन्दन कर पुनः उस कमरे में चले आये जिसमें दोपहर तक बिता चुके थे। इस समय संध्या हो चुकी थी और कुमारों को यह देखकर ताज्जुब हो रहा था कि उस कमरे में रोशनी हो चुकी थी मगर किसी गैर की सूरत दिखाई नहीं पड़ती थी।
कुमार को उस कमरे में गए बहुत देर न हुई होगी कि इन्द्रानी और आनन्दी वहाँ आ पहुँचीं जिन्हें देख कुमार बहुत खुश हुए और इन्द्रजीतसिंह ने इन्द्रानी से कहा, "तुमने तो कहला भेजा था कि अब मैं मुलाकात नहीं कर सकती!"
इन्द्रानी––बेशक बात ऐसी ही है, मगर मैं छिप कर आपसे कुछ कहने के लिए आई हूँ।
इन्द्रजीतसिंह––वह कौन सी बात है जिसने तुम्हें छिप कर यहाँ आने के लिए मजबूर किया और वह कौन सा कसूर है जिसने मुझे तुम्हारा मेहमान···
इन्द्रानी––(बात काट कर और मुस्कुरा कर) मैं आपकी सब बातों का जवाब दूँगी, आप मेहरबानी करके जरा मेरे साथ इस दूसरे कमरे में आइये।
इन्द्रजीतसिंह––क्या मेरी चिट्ठी का जवाब भी लाई हो?
इन्द्रानी––जी हाँ, जवाब की चिट्ठी भी इसी समय आपको दूँगी। (इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को उठते देखकर आनन्दसिंह से) आप इसी जगह ठहरिये, (आनन्द से) तू भी इसी जगह ठहर, मैं अभी आती हूँ।
इन्द्रजीतसिंह यद्यपि इन्द्रानी के साथ शादी करने से इनकार करते थे, मगर इन्द्रानी और आनन्दी की खूबसूरती, बुद्धिमानी, सभ्यता और उनकी मीठी बातें इस योग्य न थीं कि कुमार के दिल पर गहरा असर न करतीं और सामना होने पर उन्हें अपनी तरफ न खींचतीं। इन्द्रजीतसिंह इन्द्रानी की बात से इनकार न कर सके और खुशी-खुशी उसके साथ दूसरे कमरे में चले गये।
हम नहीं कह सकते कि इन्द्रजीतसिंह और इन्द्रानी में दो घण्टे तक क्या बातें हुईं और इधर आनन्दसिंह और आनन्दी में कैसी ठहरी, मगर इतना जरूर कहेंगे कि जब इन्द्रजीतसिंह और इन्द्रानी दोनों आदमी लौटकर कमरे में आये तो बहुत खुश थे और इसी तरह आनन्दी और आनन्दसिंह के चेहरे पर भी खुशी की निशानी पाई जाती थी। इन्द्रानी और आनन्दी के चले जाने-बाद कई औरतें खाने पीने का सामान लेकर हाजिर हुईं और दोनों भाई भोजन करके सो रहे। सुबह को जब वह दारोगा अपनी बातों का जवाब लेने के लिए आया तो दोनों कुमार उससे खुशी-खुशी मिले और बोले कि हम दोनों भाइयों को इन्द्रानी और आनन्दी के साथ व्याह करना स्वीकार है।
१२
कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने इन्द्रानी और आनन्दी से ब्याह करना स्वीकार कर लिया और इस सबब से उस छोटे से बाग में ब्याह की तैयारी दिखाई देने लगी। इन दोनों कुमारों के ब्याह का बयान धूमधाम से लिखने के लिए हमारे पास कोई मसाला नहीं है। इस शादी में न तो बारात है, न बाराती, न गाना है न बजाना, न धूम है न धड़क्का, न महफिल है न ज्याफत, अगर कुछ बयान किया भी जाय तो किसका! हाँ इसमें कोई शक नहीं कि ब्याह कराने वाले पण्डित अविद्वान और लालची न थे, तथा शास्त्र की रीति से ब्याह कराने में किसी तरह की त्रुटि भी दिखाई नहीं देती थी। बावली के ऊपर संगमर्म वाला चबूतरा ब्याह का मँड़वा बनाया गया था और उसी पर दोनों शादियाँ एक साथ ही हुई थीं, अतः ये बातें भी इस योग्य नहीं कि जिनके बयान में तूल दिया जाय और दिलचस्प मालूम हों, हाँ इस शादी के सम्बन्ध में कुछ बातें ऐसी जरूर हुईं जो ताज्जुब और अफसोस की थीं और उनका बयान इस जगह कर देना हम आवश्यक समझते हैं।
इन्द्रानी के कहे मुताबिक कुँअर इन्द्रजीतसिंह को आशा थी कि राजा गोपालसिंह से मुलाकात होगी मगर ऐसा न हुआ। ब्याह के समय पाँच-सात औरतों के (जिन्हें कुमार देख चुके थे मगर पहचानते न थे) अतिरिक्त केवल चार मर्द वहाँ मौजूद थे। एक वही बुड्ढा दारोगा; दूसरे ब्याह कराने वाले पण्डितजी, तीसरा एक और आदमी जो पूजा इत्यादि की सामग्री इधर-से-उधर समयानुकूल रखता था और चौथा वह आदमी था जिसने कन्यादान (दोनों) किया था। चाहे वह इन्द्रानी और आनन्दी का बाप हो या गुरु हो या चाचा इत्यादि जो कोई भी हो, मगर उसकी सूरत देख कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को बड़ा ही आश्चर्य हुआ। यद्यपि उसकी उम्र पचास से ज्यादा न थी मगर वह साठ वर्ष से भी ज्यादे उम्र का बुड्ढा मालूम होता था। उसके खूबसूरत चेहरे पर जर्दी छाई थी, बदन में हड्डी-ही-हड्डी दिखाई देती थी, और मालूम होता था कि इसकी उम्र का सबसे बड़ा हिस्सा रंज, गम और मुसीबत ही में बीता है। इसमें कोई शक नहीं कि यह किसी जमाने में खूबसूरत, दिलेर और बहादुर रहा होगा, मगर अब तो अपनी सूरत-शक्ल से देखने वालों के दिल में दुःख ही पैदा करता था। दोनों कुमार ताज्जुब की निगाहों से उसे देखते रहे और उसका असल हाल जानने की उत्कण्ठा उन्हें बेचैन कर रही थी।
कन्यादान हो जाने के बाद दोनों कुमारों ने अपनी-अपनी उँगली से अँगूठी उतार कर अपनी-अपनी स्त्री को (निशानी या तोहफे के तौर पर) दी और इसके बाद सभी की इच्छानुसार दोनों भाई उठकर उसी कमरे में चले गये जो एक तौर पर उनके बैठने या रहने का स्थान हो चुका था। इस समय रात घण्टे भर से कुछ कम बाकी थी।
दोनों कुमारों को उस कमरे में बैठे पहर भर से ज्यादा बीत गया मगर किसी ने आकर खबर न ली कि वे दोनों क्या कर रहे हैं और उन्हें किसी चीज की जरूरत है या नहीं। आखिर राह देखते-देखते लाचार होकर दोनों कुमार कमरे के बाहर निकले और इस समय बाग में चारों तरफ सन्नाटा देखकर उन्हें बड़ा ही ताज्जुब हुआ। इस समय न तो उस बाग में कोई आदमी था और न ब्याह-शादी के सामान में से ही कुछ दिखाई देता था, यहाँ तक कि उस संगमर्मर के चबूतरे पर भी (जिस पर ब्याह का मँड़वा था) हर तरह से सफाई थी और यह नहीं मालूम होता था कि आज रात को इस पर कुछ हुआ था।
बेशक यह बात ताज्जुब की थी बल्कि इससे भी बढ़कर यह बात ताज्जुब की थी कि दिन भर बीत जाने पर भी किसी ने उनकी खबर न ली। जरूरी कामों से छुट्टी पाकर दोनों कुमारों ने बावली में स्नान किया और दो-चार फल, जो कुछ उस बागीचे में मिल सके, खाकर उसी पर सन्तोष किया।
दोनों भाइयों ने तरह-तरह के सोच-विचार में ज्यों-त्यों करके दिन बिता दिया मगर संध्या होते-होते जो कुछ वहाँ पर उन्होंने देखा उसके बर्दाश्त करने की ताकत उन दोनों के कोमल कलेजों में न थी। संध्या होने में थोड़ी ही देर थी जब उन दोनों ने उस बुड्ढे दारोगा को तेजी के साथ अपनी तरफ आते हुए देखा। उसकी सूरत पर हवाई उड़ रही थी और वह घबड़ाया हुआ सा मालूम पड़ रहा था। आने के साथ ही उसने कुँअर इन्द्रजीतसिंह की तरफ देख के कहा, "बड़ा अन्धेर हो गया! आज का दिन हम लोगों के लिए प्रलय का दिन था इसलिए आपकी सेवा में उपस्थित न हो सका!"
इन्द्रजीतसिंह––(घबड़ाहट और ताज्जुब के साथ) क्या हुआ?
दारोगा––आश्चर्य है कि इसी बाग में दो-दो खून हो गये और आपको कुछ भी मालूम न हुआ!
इन्द्रजीत––(चौंक कर) कहाँ और कौन मारा गया?
दारोगा––(हाथ का इशारा करके) उस पेड़ के नीचे चलकर देखने से आपको मालूम होगा कि एक दुष्ट ने इन्द्रानी और आनन्दी को इस दुनिया से उठा दिया, लेकिन बड़ी कारीगरी से मैंने खूनी को गिरफ्तार कर लिया है।
यह एक ऐसी बात थी जिसने इन्द्रजीत और आनन्दसिंह के होश उड़ा दिए। दोनों घबड़ाए हुए उस बुड्ढे दारोगा के साथ पूरब की तरफ चले गये और एक पेड़ के नीचे इन्द्रानी और आनन्दी की लाश देखी। उनके बदन में कपड़े और गहने सब वही थे जो आज रात को ब्याह के समय कुमार ने देखे थे, और पास ही एक पेड़ के साथ बँधा हुआ नानक भी उसी जगह मौजूद था। उन दोनों को देखने के साथ ही इन्द्रजीतसिंह ने नानक से पूछा, "क्या इन दोनों को तूने मारा है?"
इसके जवाब में नानक ने कहा, "हाँ, इन दोनों को मैंने मारा है और इनाम पाने का काम किया है, ये दोनों बड़ी ही शैतान थीं!"