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चन्द्रकान्ता सन्तति अध्याय 4 / 24

विषय-सूची

  1. 1 पहला भाग
  2. 2 दूसरा भाग
  3. 3 तीसरा भाग
  4. 4 चौथा भाग
  5. 5 पाँचवाँ भाग
  6. 6 छठा भाग
  7. 7 सातवाँ भाग
  8. 8 आठवाँ भाग
  9. 9 नौवाँ भाग
  10. 10 दसवाँ भाग
  11. 11 ग्यारहवाँ भाग
  12. 12 बारहवाँ भाग
  13. 13 तेरहवाँ भाग
  14. 14 चौदहवाँ भाग
  15. 15 पन्द्रहवाँ भाग
  16. 16 सोलहवाँ भाग
  17. 17 सत्रहवाँ भाग
  18. 18 अठारहवाँ भाग
  19. 19 उन्नीसवाँ भाग
  20. 20 बीसवाँ भाग
  21. 21 इक्कीसवाँ भाग
  22. 22 बाईसवाँ भाग
  23. 23 तेईसवाँ भाग
  24. 24 चौबीसवाँ भाग

चन्द्रकान्ता सन्तति

चौथा भाग

१

अब हम अपने किस्से को फिर उस जगह से शुरू करते हैं, जब रोहतासगढ़ किले के अन्दर लाली को साथ लेकर किशोरी सेंध की राह उस अजायबघ जिसका ताला हमेशा बन्द रहता था और दरवाजे पर बराबर पहरा पड़ा करता था। हम पहले लिख आये हैं कि जब लाली और किशोरी उस मकान के अन्दर घुसी, उसी समय कई आदमी उस छत पर चढ़ गये और "धरो, पकड़ो, जाने न पावे!" की आवाज लगाने लगे। लाली और किशोरी ने भी यह आवाज सुनी। किशोरी तो डरी, मगर लाली ने उसी समय उसे धीरज दिया और कहा, "तुम डरो मत, ये लोग हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।"

लाली और किशोरी छत की राह जब नीचे उतरी तो एक छोटी-सी कोठरी में पहुँची जो बिल्कुल खाली थी। उसके तीन तरफ दीवार में तीन दरवाजे थे, एक दरवाजा तो सदर का था जिसके आगे बाहर की तरफ पहरा पड़ा करता था, दूसरा दरवाजा खला हआ था और मालूम होता था किसी दालान या कमरे में जाने का रास्ता है। लाली ने जल्दी में केवल इतना ही कहा कि ताली लेने के लिए इसी राह से एक मकान में मैं गई थी और तीसरी तरफ एक छोटा-सा दरवाजा था जिसका ताला किवाड़ के पल्ले ही में जडा हुआ था। लाली ने वही ताली जो इस अजायबघर में लगाकर उस दरवाजे को खोला, दोनों उसके अन्दर घुसी। लाली ने फिर उसी मजबूत दरवाजे को अन्दर की तरफ से बन्द कर लिया। ताला इस ढंग से जड़ा हुआ था कि वही ताली बाहर और भीतर दोनों तरफ लग सकती थी। लाली ने यह काम बड़ी फुर्ती से किया, यहाँ तक कि उसके अन्दर चले जाने के बाद तब टूटी हुई छत की राह लोग, जो लाली और किशोरी को पकड़ने के लिए आ रहे थे, नीचे इस कोठरी में उत्तर सके। भीतर से ताला बन्द करके लाली ने कहा, "अब हम लोग निश्चिन्त हुए। डर केवल इतना ही है कि किसी दूसरी राह से कोई आकर हम लोगों को तंग न करे, पर जहाँ तक मैं जानती हूँ और जो कुछ मैंने सुना है, उससे तो विश्वास है कि इस अजायबघर में आने के लिए और कोई राह नहीं है।"

लाली और किशोरी अब एक ऐसे घर में पहुँची जिसकी छत ही बहुत नीची थी, यहाँ तक कि हाथ उठाने से छत छूने में आती थी। यह घर बिल्कुल अंधेरा था। लाली ने अपनी गठरी खोली और सामान निकाल कर मोमबत्ती जलाई। मालूम हुआ कि यह एक कोठरी है जिसके चारों तरफ की दीवार पत्थर की बनी हुई तथा बहुत ही चिकनी और मजबूत है। लाली खोजने लगी कि इस मकान से किसी दूसरे मकान में जाने के लिए रास्ता या दरवाजा है या नहीं।

जमीन में एक दरवाजा बना हुआ दिखा जिसे लाली ने खोला और हाथ में मोमबत्ती लिये नीचे उत्तरी। लगभग बीस-पचीस सीढ़ियाँ उतरकर दोनों एक सुरंग में पहुँचीं जो बहुत दूर तक चली गई थी। ये दोनों लगभग तीन सौ कदम ही गई होंगी कि यह आवाज दोनों के कानों में पहुँची––

"हाय, एक ही दफे मार डाल! क्यों दुख देता है!"

यह आवाज सुनकर किशोरी काँप गई और उसने रुककर लाली से पूछा, "बहिन, यह आवाज कैसी है? आवाज बारीक है और किसी औरत की मालूम होती है!"

लाली––मुझे मालूम नहीं कि यह आवाज कैसी है और न इसके बारे में बूढ़ी माँजी ने मुझे कुछ कहा ही था।

किशोरी––मालूम पड़ता है कि किसी औरत को कोई दुख दे रहा है। कहीं ऐसा न हो कि वह हम लोगों को भी सतावे। हम दोनों का हाथ खाली है, एक छुरा तक पास में नहीं।

लाली––मैं अपने साथ दो छुरे लाई हूँ, एक अपने वास्ते और एक तेरे वास्ते। (कमर से एक छुरा निकाल कर और किशोरी के हाथ में देकर) ले, एक तू रख। मुझे खूब याद है एक दफे तूने कहा था कि मैं यहाँ रहने की बनिस्बत मौत पसन्द करती हूँ, फिर क्यों डरती है? देख, मैं तेरे साथ जान देने को तैयार हूँ।

किशोरी––बेशक मैंने ऐसा कहा था और अब भी कहती हूँ। चलो बढ़ो, अब कोई हर्ज नहीं, छुरा हाथ में है और ईश्वर मालिक है।

दोनों फिर आगे बढ़ीं। बीस-पचीस कदम और आगे जाकर सुरंग खत्म हुई और दोनों एक दालान में पहुँचीं। यहाँ एक चिराग जल रहा था, कम-से-कम सेर भर तेल उसमें होगा, रोशनी चारों तरफ फैली हुई थी और यहाँ की हरएक चीज साफ दिखाई दे रही थी। इस दालान के बीचोंबीच एक खम्भा था और उसके साथ एक हसीन नौजवान और खूबसूरत औरत, जिसकी उम्र बीस वर्ष से ज्यादा न होगी, बँधी हुई थी। उसके पास ही छोटी सी पत्थर की चौकी पर साफ और हलकी पोशाक पहने एक बुड्ढा बैठा हुआ छुरे से कोई चीज काट रहा था। इसका मुँह उसी तरफ था जिधर लाली और किशोरी खड़ी-खड़ी वहाँ की कैफियत देख रही थीं। उस बूढ़े के सामने भी एक चिराग जल रहा था जिससे उसकी सूरत साफ-साफ मालूम होती थी। उस बुड्ढे की उम्र लगभग सत्तर वर्ष के होगी, उसकी सफेद दाढ़ी नाभि तक पहुँचती थी और दाढ़ी तथा मूंछों ने उसके चेहरे का ज्यादा भाग छिपा रक्खा था।

उस दालान की ऐसी अवस्था देखकर किशोरी और लाली दोनों हिचकी और उन्होंने चाहा कि पीछे की तरफ मुड़ चलें, मगर पीछे फिरकर कहाँ जाएँ? इस विचार ने उनके पैर उसी जगह जमा दिये। उन दोनों के पैरों की आहट इस बुड्ढे ने भी पाई, सिर उठाकर उन दोनों की तरफ देखा और कहा––"वाह-वाह, लाली और किशोरी भी आ गईं! आओ-आओ, मैं बहुत देर से तुम्हारी राह देख रहा था!"

२

कंचनसिंह के मारे जाने और कुँवर इन्द्रजीतसिंह के गायब हो जाने से लश्कर में बड़ी हलचल मच गई। पता लगाने के लिए चारों तरफ जासूस भेजे गये। ऐयार लोग भी इधर-उधर फैल गये और फसाद मिटाने के लिए दिलोजान से कोशिश करने लगे। राजा वीरेन्द्रसिंह से इजाजत लेकर तेजसिंह भी रवाना हुए और भेष बदल कर रोहतासगढ़ किले के अन्दर चले गये। किले के सदर दरवाजे पर पहरे का पूरा इन्तजाम था, मगर तेजसिंह की फकीरी सूरत पर किसी ने शक न किया।

साधु की सूरत बने हुए तेजसिंह सात दिन तक रोहतासगढ़ किले के अन्दर घूमते रहे। इस बीच में उन्होंने हरएक मोहल्ला, बाजार, गली, रास्ता, देवालय, धर्मशाला इत्यादि को अच्छी तरह देख और समझ लिया। कई बार दरबार में भी जाकर राजा दिग्विजयसिंह और उनके दीवान तथा ऐयारों की चाल और बातचीत के ढंग पर ध्यान दिया और यह भी मालूम किया कि राजा दिग्विजयसिंह किस-किसको चाहता है, किस-किस की खातिर करता है, और किस-किसको अपना विश्वासपात्र समझता है। इन सात दिनों के बीच में तेजसिंह को कई बार चोबदार और औरत बनने की भी जरूरत पड़ी और अच्छे-अच्छे घरों में घुसकर वहाँ की कैफियत और हालत को भी देख-सुन आये। एक दफे तेजसिंह उस शिवालय में भी गये जिसमें भैरोंसिंह और बद्रीनाथ ने ऐयारी की थी या जहाँ से कुँअर कल्याणसिंह को पकड़ ले गये थे

तेजसिंह ने उस शिवालय के रहने वालों तथा पुजारियों की अजब हालत देखी। जब से कुँअर कल्याणसिंह गिरफ्तार हुए थे, तब से उन लोगों के दिल में ऐसा डर समा गया था कि वे बात-बात में चौंकते और डरते थे। रात में एक पत्ती के खड़कने से भी किसी ऐयार के आने का गुमान होता था, साधु-ब्राह्मण की सूरत से उन्हें घृणा हो गई थी, किसी संन्यासी, ब्राह्मण या साधु को देखा और चट बोल उठे कि ऐयार है। किसी मजदूर को भी अगर मन्दिर के आगे खड़ा पाते तो चट उसे ऐयार समझ लेते और जब तक गर्दन में हाथ दे हाते के बाहर न कर देते, चैन न लेते। इत्तिफाक से आज तेजसिंह भी साधु की सूरत बने शिवालय में जा डटे। पुजारियों ने देखते ही शोर करना शुरू किया कि 'ऐयार है, ऐयार है, धरो, जाने न पाए!' बेचारे तेजसिंह बड़ा घबराये और ताज्जुब करने लगे कि इन लोगों को कैसे मालूम हो गया कि हम ऐयार हैं क्योंकि तेजसिंह को इस बात का गुमान भी न था कि यहाँ के रहने वाले कुत्ते-बिल्ली को भी ऐयार समझते हैं, मगर यकायक वहाँ से भाग निकलना भी मुनासिब न समझ कर रुके और बोले––

तेजसिंह––तुम कैसे जानते हो कि हम ऐयार हैं?

एक पुजारी––अजी, हम खूब जानते हैं कि सिवाय ऐयार के कोई दूसरा हमारे सामने आ नहीं सकता है! अजी, तुम्हीं लोग तो हमारे कुँअर साहब को पकड़ ले गये हो या कोई दूसरा? बस-बस, यहाँ से चले जाओ, नहीं तो कान पकड़ के खा जायेंगे।

"बस-बस, यहाँ से चले जाओ" इत्यादि सुनते ही तेजसिंह समझ गये कि ये लोग बेवकूफ हैं। अगर हमारे ऐयार होने का इन्हें पूरा विश्वास होता तो ये लोग 'चले जाओ' कभी न कहते, बल्कि हमें गिरफ्तार करने का उद्योग करते। बस, इन्हें भैरोंसिंह और बद्रीनाथ डरा गये हैं और कुछ नहीं।

तेजसिंह खड़े सोच ही रहे थे कि इतने में एक लँगड़ा भिखमंगा हाथ में ठीकरा लिये लाठी टेकता वहाँ आ पहुँचा और पुजारीजी की जय-जयकार मनाने लगा। सूरत देखते ही एक पुजारी चिल्ला उठा और बोला, "लो देखो, एक दूसरा ऐयार भी आ पहुँचा, अबकी शैतान लँगड़ा बनकर आया है। जानता नहीं कि हमलोग बिना पहचाने न रहेंगे। भाग, नहीं तो सिर तोड़ डालूँगा!"

अब तेजसिंह को पूरा विश्वास हो गया कि ये लोग सिड़ी हो गये हैं। जिसे देखते हैं उसे ही ऐयार समझ लेते हैं। तेजसिंह वहाँ से लौटे और सोचते हुए खिड़की की राह दीवार के पार हो जंगल में चले गए कि अब यहाँ के ऐयारों से मिलना चाहिए और देखना चाहिए कि वे कैसे हैं और ऐयारी के फन में कितने तेज हैं।

इस किले के अन्दर माँजा पिलाने वालों की कई दूकानें थीं जिन्हें यहाँ वाले 'अड्डा' कहा करते थे। चिराग जलने के बाद ही से गँजेड़ी लोग वहाँ जमा होते जिन्हें अड्डे का मालिक गाँजा बनाकर पिलाता और उनसे एवज में पैसे वसूल करता। वहाँ तरह-तरह की गप्पें उड़ा करती थीं जिनसे शहर भर कर का हाल झूठ-सच मिला-जुला लोगों को मालूम हो जाया करता था।

शाम होने के पहले ही तेजसिंह जंगल से लौटे। लकड़हारों के साथ-साथ वैरागी के भेष में किले के अन्दर दाखिल हुए और सीधे अड्डे पर चले गये जहाँ गँजेड़ी दम पर दम लगाकर धुएँ का गुबार बाँध रहे थे। यहाँ तेजसिंह का बहुत-कुछ काम निकला और उन्हें मालूम हो गया कि महाराज के यहाँ केवल दो ऐयार हैं, एक का नाम रामानन्द, दूसरे का नाम गोविन्दसिंह है। गोविन्दसिंह तो कवर कल्याणसिंह को छुड़ाने के लिए चुनार गया हुआ है, दूसरा रामानन्द यहीं मौजूद है। दूसरे दिन तेजसिंह ने दरबार में जाकर रामानन्द को अच्छी तरह देख लिया लिया और निश्चय कर लिया और कि आज रात को इसी के साथ ऐयारी करेंगे, क्योंकि रामानन्द का ढाँचा तेजसिंह से बहुत-कुछ मिलता था और यह भी जाना गया था कि महाराज सबसे ज्यादा रामानन्द को मानते और अपना विश्वासपात्र समझते हैं।

आधी रात के समय तेजसिंह सन्नाटा देख रामानन्द के मकान में कमन्द लगा कर चढ़ गये। देखा कि धुर ऊपर वाली मंजिल में रामानन्द मसहरी के ऊपर पड़ा खर्राटे ले रहा है, दरवाजे पर पर्दे की जगह पर जाल लटक रहा है जिसमें छोटी-छोटी घंटियाँ बँधी हुई हैं। पहले तो तेजसिंह ने उसे एक मामूली पर्दा समझा, मगर ये तो बड़े ही चालाक और होशियार थे। यकायक पर्दे पर हाथ डालना मुनासिब न समझ कर उसे गौर से देखने लगे। जब मालूम हुआ कि नालायक ने इस जालदार पर्दे में बहुत सी घंटियाँ लटका रक्खी हैं तो समझ गए कि यह बड़ा ही बेवकूफ है। समझता है कि इन घंटियों के लटकाने से हम बचे रहेंगे, इस घर में जब कोई पर्दा हटाकर आवेगा तो घंटियों की आवाज से हमारी आँख खुल जायेगी, मगर यह मूर्ख नहीं समझता कि ऐयार लोग बुरे होते हैं।

तेजसिंह ने अपने बटुए में से कैची निकाली और बहुत सम्हाल कर पर्दे में से एक-एक करके घंटी काटने लगे। थोड़ी ही देर में सब घंटियों को काट के किनारे कर दिया और पर्दा हटाकर अन्दर चले गए। रामानन्द अभी तक खर्राटे ले रहा था। तेजसिंह ने बेहोशी की दवा उसकी नाक के आगे की, हलका धूरा साँस लेते ही दिमाग में चढ़ गया। रामानन्द को एक छोंक आई जिससे मालूम हुआ कि अब बेहोशी इसे घंटों तक होश में न आने देगी।

तेजसिंह ने बटुए में से एक उस्तरा निकालकर रामानन्द की दाढ़ी और मूँछें मूँड ली और उसके बाल हिफाजत से अपने बटुए में रखकर उसी रंग की दूसरी दाढ़ी और मूँछ उसके लगा दी जो उन्होंने दिन में किले के बाहर जंगल में तैयार की थीं। तेजसिंह इतने ही काम के लिए रामानन्द के मकान पर गए थे और इसे पूरा करके कमन्द के सहारे नीचे उतर आए तथा धर्मशाला की तरफ रवाना हुए।

तेजसिंह जब वैरागी साधु के भेष में रोहतासगढ़ किले के अन्दर आए थे तो उन्होंने धर्मशाला के पास एक बैठक वाले के मकान में छोटी-सी कोठरी किराये पर ले ली थी और उसी में रहकर अपना काम करते थे। उस कोठरी का एक दरवाजा सड़क की तरफ था जिसमें ताला लगाकर उसकी ताली ये अपने पास रखते थे, इसलिए उस कोठरी में जाने-आने के लिए उनको दिन और रात एक समान था।

रामानन्द के मकान से जब तेजसिंह अपना काम करके उतरे, उस वक्त पहर भर रात बाकी थी। धर्मशाला के पास अपनी कोठरी में गए और सवेरा होने के पहले ही अपनी सूरत रामानन्द की सी बना और वही दाढ़ी और मूँछ, जो मूँड लाये थे, दुरुस्त करके खुद लगा कोठरी से बाहर निकले और शहर में गश्त लगाने लगे। सवेरा होते ही वे राजमहल की तरफ रवाना हुए और इत्तिला कराकर महाराज के पास पहुँचे।

हम ऊपर लिख आए हैं कि रोहतासगढ़ में रामानन्द और गोविन्दसिंह केवल दो ही ऐयार थे। इन दोनों के बारे में इतना लिख देना जरूरी है कि इन दोनों में से गोविन्दसिंह तो ऐयारी के फन में बहुत ही तेज और होशियार था और वह दिन-रात वही काम किया करता था। रामानन्द भी ऐयारी का फन अच्छी तरह जानता था, मगर उसे अपनी दाढ़ी और मूँछ बहुत प्यारी थीं, इसलिए वह ऐयारी के वे ही काम करता था जिसमें दाढ़ी और मूँछ मुँडाने की जरूरत न पड़े और इसलिए महाराज ने भी उसे दीवान का काम दे रखा था। इसमें भी कोई शक नहीं कि रामानन्द बहुत ही खुशदिल, मसखरा और बुद्धिमान था और उसने अपनी तदबीर से महाराज का दिल अपनी मुट्ठी में कर लिया था।

रामानन्द की सूरत बने हुए तेजसिंह महाराज के पास पहुँचे, मामूल से बहुत पहले रामानन्द को आते देख महाराज ने समझा कि कोई नई खबर लाया है।

महाराज––आज तुम बहुत सवेरे आये! क्या कोई नई खबर है?

रामानन्द––(खासकर) महाराज, हमारे यहाँ कल तीन मेहमान आये हैं।

महाराज––कौन-कौन?

रामानन्द––एक तो खाँसी, जिसने मुझे बहुत ही तंग कर रखा है; दूसरे कुँअर आनन्दसिंह, तीसरे उनके चार ऐयार, जो आज ही कल में किशोरी को यहाँ से निकाल ले जाने का दावा रखते हैं।

महाराज––(हँसकर) मेहमान तो बड़े नाजुक हैं। इनकी खातिर का भी कोई इन्तजाम किया गया है या नहीं?

रामानन्द––इसीलिए तो सरकार में आया हूँ। कल दरबार में उनके ऐयार मौजूद थे। सब के पहले किशोरी का बन्दोवस्त करना चाहिए, उसकी हिफाजत में किसी तरह की कमी न होनी चाहिए।

महाराज––जहाँ तक मैं समझता हूँ, वे लोग किशोरी को तो किसी तरह नहीं ले जा सकते, हाँ, वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों को, जिस तरह भी हो सके, गिरफ्तार करना चाहिए

रामानन्द––वीरेन्द्रसिंह के ऐयार तो अब मेरे पंजे से बच नहीं सकते, वे लोग सूरत बदलकर दरबार में जरूर आयेंगे, और ईश्वर चाहेगा तो आज ही किसी को गिरफ्तार करूँगा, मगर वे लोग बड़े ही धूर्त और चालबाज हैं। प्रायः कैदखाने से भी निकल जाया करते हैं।

महाराज––खैर, हमारे तहखाने से जब वे निकल जायेंगे, तो समझेंगे कि चालाक और धूर्त हैं।

महाराज की इतनी ही बातचीत से तेजसिंह को मालूम हो गया कि यहाँ कोई तहखाना है जिसमें कैदी लोग रखे जाते हैं। अब उन्हें यह फिक्र हुई कि जहाँ तक हो सके, इस तहखाने का ठीक-ठीक हाल मालूम करना चाहिए। यह सोच तेजसिंह ने अपनी लच्छेदार बातचीत में महाराज को ऐसा उलझाया कि मामूली समय से भी आधा घंटे ज्यादा की देर हो गई। ऐसा करने से तेजसिंह का अभिप्राय यह था कि देर होने से असली रामानन्द अवश्य महाराज के पास आवेगा और मुझे देख चौंकेगा, उसी समय मैं अपना काम निकाल लूँगा जिसके लिए उसकी दाढ़ी-मूँछ लाया हूँ! और आखिर तेजसिंह का सोचना ठीक ही निकला।

तेजसिंह रामानन्द की सुरत में जिस समय महाराज के पास आये थे, उस समय ड्योढ़ी पर जितने सिपाही पहरा दे रहे थे, सब बदल गए और दूसरे सिपाही अपनी वारी के अनुसार ड्योढ़ी के पहरे पर मुस्तैद हुए, जो इस बात से बिल्कुल ही बेखबर थे कि रामानन्द महाराज से मिलने के लिए महल में गये हैं।

ठीक समय पर दरबार लग गया। बड़े-बड़े ओहदेदार, नायब दीवान, तहसीलदार, मुंशी, मुत्सद्दी इत्यादि और मुसाहिब लोग दरबार में आकर जमा हो गये। असली रामानन्द अपनी दीवान की गद्दी पर आकर बैठ गया, मगर अपनी दाढ़ी की तरफ से बिल्कुल ही बेखबर था। उसे तेजसिंह का मामला कुछ भी मालूम न था, तो भी यह जानने के लिए वह बड़ी ही उलझन में पड़ा हुआ था कि उस दरवाजे के जालीदार पर्दे में की घंटियाँ किसने काट डाली थीं। घर-भर के आदमियों से उसने पूछा और पता लगाया, मगर पता न लगा। इससे उसके दिल में शक हुआ कि इस मकान में जरूर कोई ऐयार आया था, मगर उसने आकर क्या किया सो नहीं जाना जाता। हाँ, मेरे इस खयाल को उसने जरूर मटियामेट कर दिया कि घंटियाँ लगे हुए जालदार पर्दे के अन्दर मेरे कमरे में चुपके से कोई नहीं आ सकता, उसने बता दिया कि यों आ सकता है। बेशक मेरी भूल थी कि उस पर्दे पर इतना भरोसा रखता था, लेकिन क्या खाली यही बताने के लिए वह ऐयार आया था?

इन्हीं सब बातों को सोचता हुआ रामानन्द अपने जरूरी कामों से छुट्टी पा दरवारी कपड़े पहन बन-उच कर दरवार की तरफ रवाना हुआ। बेशक आज उसे कुछ देरी हो गई थी और वह सोच रहा था कि महाराज दरबार में जरूर आ गये होंगे, मगर वहाँ पहुँचकर उसने गद्दी खाली देखी और पूछने से मालूम हुआ कि अभी तक महाराज के आने की कोई खबर नहीं। रामानन्द क्या, सभी दरबारी ताज्जुब कर रहे थे कि आज महाराज को देर क्यों हुई।

रामानन्द को महाराज बहुत मानते थे, वह उनका मुँहलगा था, इसीलिए सभी ने वहाँ आकर हाल मालूम करने के लिए इसको ही कहा। रामानन्द खुद भी घबराया हुआ था और महाराज का हाल मालूम करना चाहता था। अस्तु, थोड़ी देर बैठकर वहाँ से रवाना हुआ और ड्योढ़ी पर पहुँचकर इत्तिला करवाई।

रामानन्द रूपी तेजसिंह बैठे महाराज से बातें कर रहे थे कि एक खिदमतगार आया और हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया। उसी सूरत से मालूम होता था कि वह घबराया हुआ है और कुछ कहना चाहता है, मगर आवाज मुँह से नहीं निकलती। तेजसिंह समझ गए कि अब कुछ गुल खिला चाहता है। आखिर खिदमतगार की तरफ देख कर बोले––

तेजसिंह––क्यों, क्या कहना चाहता है?

खिदमतगार––मैं ताज्जुब के साथ यह इत्तिला करते डरता हूँ कि दीवान साहब (रामानन्द ड्योढ़ी पर हाजिर हैं।

महाराज––रामानन्द!

खिदमतगार––जी हाँ।

महाराज––(तेजसिंह की तरफ देखकर) यह क्या मामला है?

तेजसिंह––(मुस्कुराकर) महाराज, बस, अब काम निकला ही चाहता है। मैं जो कुछ अर्ज कर चुका, वही बात है। कोई ऐयार मेरी सूरत बनाकर आया है और आपको धोखा देना चाहता है। लीजिये, इस कम्बख्त को तो मैं अभी गिरफ्तार करता हूँ, फिर देखा जायगा। सरकार उसे पहले हाजिर होने का हुक्म दें, फिर देखें, मैं क्या। मुझे जरा छिप जाने दें, वह आकर बैठ तो मैं उसका पर्दा खोलूँ।

महाराज––तुम्हारा कहना ठीक है, बेशक कोई ऐयार ही है। अच्छा, तुम छिप जाओ, फिर मैं उसे बुलाता हूँ।

तेजसिंह––बहुत खूब, मैं छिप जाता हूँ। मगर ऐसा है कि सरकार उसकी दाढ़ी-मूँछ पर खूब ध्यान दें, मैं यकायक पर्दे से निकलकर उसकी दाढ़ी उखाड़ लूँगा, क्योंकि नकली दाढ़ी परा-सा ही झटका चाहती है।

महाराज––(हँसकर) अच्छा-अच्छा! (खिदमतगार की तरफ देखकर) देखो, उससे और कुछ मत कहना, केवल हाजिर होने का हुक्म सुना दे।

तेजसिंह दूसरे कमरे में जाकर छिप रहे और असली रामानन्द धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा जहाँ महाराज विराज रहे थे। रामानन्द को ताज्जुब था कि अक्ष महाराज ने देर क्यों लगाई, इससे उसका चेहरा भी कुछ उदास सा हो रहा था। दाज तो वही थी जो तेजसिंह ने लगा दी थी। तेजसिंह ने दाढ़ी बनाते समय जानबूझ कर कुछ फर्क डाल दिया था, जिस पर रामानन्द ने तो कुछ ध्यान न दिया, मगर वही फर्क अब महाराज की आँखों में खटकने लगा। जिस निगाह से कोई किसी बहुरूपिये को देखता है उसी निगाह से बिना कुछ बोले-चाले महाराज अपने दीवान साहब को देखने लगे। रामानन्द यह देखकर और भी उदास हुआ कि इस समय महाराज की निगाह में अन्तर क्यों पड़ गया है।

तरद्दुद और ताज्जुब के सबब रामानन्द के चेहरे का रंग जैसे-जैसे बदलता गया, तैसे-तैसे उसके ऐयार होने का शक भी महाराज के दिल में बैठता गया। कई सायत बीतने पर भी न तो रामानन्द ही कुछ पूछ सका और न महाराज ही ने उसे बैठने का हुक्म दिया। तेजसिंह ने अपने लिए यह मौका बहुत अच्छा समझा, झट बाहर निकल आये और हँसते हुए एक फर्शी सलाम उन्होंने रामानन्द को किया। ताज्जुब, तरद्दुद और डर से रामानन्द के चेहरे का रंग उड़ गया और वह एकटक तेजसिंह की तरफ देखने लगा।

ऐयारी भी कठिन काम है। इस फन में सबसे भारी हिस्सा जीवट का है। जो ऐयार जितना डरपोक होगा, उतना ही जल्द फँसेगा। तेजसिंह को देखिये, किस जीवट का ऐयार है कि दुश्मन के घर में घुसकर भी जरा नहीं डरता और दिन-दोपहर सच्चे को झूठा बना रहा है! ऐसे समय अगर जरा भी उसके चेहरे पर खौफ या तरद्दुद की निशानी आ जाय तो ताज्जुब नहीं कि वह खुद फँस जाय।

तेजसिंह ने रामानन्द को बात करने की भी मोहलत न दी, हँसकर उसकी तरफ देखा और कहा, "क्यों वे! क्या महाराज दिग्विजयसिंह के दरबार को तूने ऐसा-वैसा समझ रखा है! क्या तु यहाँ भी ऐयारी से काम निकालना चाहता है? यहाँ तेरी कारीगरी न लगेगी, देख, तेरी गदहे की सी मुटाई मैं कैसे पिचकाता हूँ!"

तेजसिंह ने फुर्ती से रामानन्द की दाढ़ी पर हाथ डाल दिया और महाराज को दिखा कर एक झटका दिया। झटका तो जोर से दिया मगर इस ढंग से कि महाराज को बहुत हलका झटका मालूम हो। रामानन्द की नकली दाढ़ी अलग हो गई।

इस तमाशे ने रामानन्द को पागल-सा बना दिया। उसके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगी। यह समझकर कि यह ऐयार मुझ सच्चे को झूठा किया चाहता है, उसे क्रोध चढ़ आया और वह खंजर निकालकर तेजसिंह पर झपटा, पर तेजसिंह वार बचा गए। महाराज को रामानन्द पर और भी शक बैठ गया। उन्होंने उठक रामानन्द की कलाई, जिसमें वह खंजर लिये था, मजबूती से पकड़ ली और एक चूंसा उसके मुंह पर दिया। ताकतवर महाराज के हाथ का चूंसा खाते ही रामानन्द का सिर घूम गया और वह जमीन पर बैठ गया। तेजसिंह ने जेब से बेहोशी की दवा निकाली और जबर्ददस्ती रामानन्द को सुंघा दी।

महाराज––क्यों, इसे बेहोश क्यों कर दिया?

तेजसिंह––महाराज, गुस्से में आया हुआ और अपने को फँसा जान यह ऐयार न मालूम कैसी-कैसी बेहूदी बातें बकता, इसलिए इसे बेहोश कर दिया। कैदखाने में ले जाने के बाद फिर देखा जायगा।

महाराज––खैर, यह भी चलो, अच्छा ही किया। अब मुझसे ताली लो और तहखाने में ले जाकर इसे दारोगा के सुपुर्द करो।

महाराज की बात सुन तेज सिंह घबराये और सोचने लगे कि अब बुरी हुई। महाराज से तहखाने की ताली लेकर कहाँ जाऊँ? मैं क्या जानूँ तहखाना कहाँ है और दारोगा कौन है! बड़ी मुश्किल हुई! अगर जरा भी ना-नुकुर करता हूँ तो उल्टी आँते गले पड़ती हैं। आखिर कुछ सोच-विचार कर तेजसिंह ने कहा––

तेजसिंह––महाराज भी साथ चलें तो ठीक है।

महाराज––क्यों?

तेजसिंह––दारोगा साहब इस ऐयार को और मुझे देखकर घबरायेंगे और उन्हें न जाने क्या-क्या शक पैदा हो। यह पाजी अगर होश में आ जायेगा, तो जरूर कुछ बात बनावेगा, आह रहेंगे तो दारोगा को किसी तरह का शक न होगा।

महाराज––(हँस कर) अच्छा चलो, हम भी चलते हैं।

तेजसिंह––हाँ महाराज, फिर मुझे पीठ पर यह भारी लाश लादे ताला खोलने और बन्द करने में भी मुश्किल होगी।

महाराज ने अपने कलमदान में से ताली निकाली और खिदमतगार से एक लालटेन मँगवा कर साथ ले ली। तेजसिंह ने रामानन्द की गठरी बाँध पीठ पर लादी। तेजसिंह को साथ लिये हुए महाराज अपने सोने वाले कमरे में गये और दीवार में जड़ी हुई एक आलमारी का ताला खोला। तेजसिंह ने देखा कि दीवार पोली है और उस जगह से नीचे उतरने का एक रास्ता है। रामानन्द की गठरी लिये हुए महाराज के पीछे-पीछे तेजसिंह नीचे उतरे, दालान में पहुँचने के बाद छोटी सी कोठरी में जाकर दरवाजा खोला और बहुत बड़ी बारहदरी में पहुँचे। तेजसिंह ने देखा कि बारहदरी के बीचोंबीच में छोटी सी गद्दी लगाए एक बूढ़ा बैठा कुछ लिख रहा है जो महाराज को देखते ही उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ कर सामने आया।

महाराज––दारोगा साहब, देखिए आज रामानन्द ने दुश्मन के एक ऐयार को फाँसा है, इसे अपनी हिफाजत में रखिये।

तेजसिंह––(पीठ से गठरी उतार और उसे खोल कर) लीजिए, अब इसे सम्हालिए, अब आप जानिए।

दारोगा––(ताज्जुब से) क्या यह दीवान साहब की सूरत बनाकर आया था?

तेजसिंह––जी हाँ, उसने मुझी को फजूल समझा।

तेजसिंह––(हँसकर) खैर चलो, अब दारोगा साहब इसका बन्दोरस्त कर लेंगे।

तेजसिंह––महाराज, यदि आज्ञा हो तो मैं ठहर जाऊँ और इस नालायक को होश में लाकर अपने मतलब की बातों का कुछ पता लगाऊँ। सरकार को भी अटकने के लिए मैं कहता, परन्तु दरबार का समय बिल्कुल निकल जाने या दरबार न करने से रिआया के दिल में तरह-तरह के शक पैदा होंगे और आजकल ऐसा न होना चाहिए।

महाराज––तुम ठीक कहते हो। अच्छा, मैं जाता हूँ, अपनी ताली साथ लिये जाता हूँ और ताला बन्द करता जाता हूँ। तुम दूसरी राह से दारोगा के साथ अना। (दारोगा की तरफ देखकर) आप भी आइयेगा और अपना रोजनामचा लेते आइयेगा।

तेजसिंह को उसी जगह छोड़ महाराज चले गए। रामानन्द रूपी तेजसिंह को लिये दारोगा साहब अपनी गद्दी पर आये और अपनी जगह तेजसिंह को बैठा कर आप नीचे बैठे। तेजसिंह ने आधे घण्टे तक दारोगा को अपनी बातों में खूब ही उलझाया, इसके बाद यह कहते हुए उठे, "अच्छा, अब इस ऐयार को होश में लाकर मालूम करना चाहिए कि यह कौन है" वे ऐयार के पास आए। अपनी जेब में हाथ डाल लखलखे की डिविया खोजने लगे, आखिर बोले, "ओफ ओह, लखलखे की डिबिया तो दीवानखाने में ही भूल आये, अब क्या किया जाए?"

दारोगा––मेरे पास लखलखे की डिबिया है, हुक्म हो तो लाऊँ?

तेजसिंह––लाइए, मगर आपके लखलखे से यह होश में न आयेगा, क्योंकि जो बेहोशी की दवा इसे दी गई, वह मैंने नये ढंग से बनाई है और उसके लिए लखलखे का नुसखा भी दूसरा है। खैर, लाइये तो मही, शायद काम चल जाए।

"बहुत अच्छा" कहकर दारोगा साहब लखलखा लेने चले गये, इधर निराला पाकर तेजमिह ने दूमरी डिविया जेब से निकाली (जिसमें लाल रंग की कोई बुकनी थी) और एक चुटकी रामानन्द की नाक में साँस के साथ चढ़ा दी। फिर निश्चिन्त होकर बैठे। अब सिवा तेजसिंह के दूसरे का बनाया लखलखा उसे कब होश में ला सकता है (हाँ, दो-एक रोज तक पड़े रहने पर वह आप से आप चाहे भले ही होश में आ जाए।

दम-भर में दारोगा साहब लखलखे की डिबिया लिये आ पहुँचे। तेजसिंह ने कहा, "बस, आप ही सुँघाइये और देखिये कि इस लखलखे से कुछ काम निकलता है या नहीं।"

दारोगा साहब ने लखलखे की डिबिया बेहोश रामानन्द की नाक से लगाई, पर क्या असर होना था। लाचार तेजसिंह का मुँह देखने लगे।

तेजसिंह––क्यों व्यर्थ मेहनत करते हैं, मैं पहले ही कह चुका हूँ कि इस लखलखे से काम नहीं चलेगा। चलिए, महाराज के पास चलें। इसे यों ही रहने दीजिये, अपना लखलखा लेकर फिर लौटेंगे तो काम चलेगा।

दारोगा––जैसी मर्जी, इस लखलखे से तो काम नहीं चलता।

दारोगा साहब ने रोजनामचे की किताब बगल में दाबी और तालियों का झब्बा और लालटेन हाथ में लेकर रवाना हुए। एक कोठरी में घुसकर ने दूसरा दरवाजा खोला। ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ नजर आईं। ये दोनों ऊपर चढ़ गये और दो-तीन कोठरियों से घुसते हुए एक सुरंग में पहुँचे। दूर तक चले जाने के बाद इनका सिर छत से अड़ा। दारोगा ने एक सूराख में ताली लगाई और खटका दबाया। एक पत्थर का टुकड़ा अलग हो गया और ये दोनों बाहर निकले। यहाँ तेजसिंह ने अपने को एक कब्रिस्तान में पाया।

इस सन्तति के तीसरे भाग के चौदहवें व्यान में हम इस कब्रिस्तान का हाल लिख चुके हैं। इसी राह से कुँअर आनन्दसिंह और तारासिंह उस तहखाने में गये थे इस समय हम जो हाल लिख रहे हैं, वह कुँअर आनन्दसिंह के तहखाने में जाने से पहले का है। सिलसिला मिलाने के लिए फिर पीछे की तरफ लौटना पड़ा। तहखाने के हर एक दरवाजे में पहले ताला लगा रहता था, मगर जब से तेजसिंह ने इसे अपने कब्जे में कर लिया (जिसका हाल आगे चलकर मालूम होगा) तब से ताला लगाना बन्द हो गया, केवल खटकों पर ही कार्रवाई रह गई।

तेजसिंह ने चारों तरफ निगाह दौड़ाकर देखा और मालूम किया कि इस जंगल में जासूसी करते हुए कई दफे आ चुके हैं और इस कब्रिस्तान में भी पहुँच चुके हैं, मगर जानते नहीं थे कि यह कब्रिस्तान क्या है और किस मतलब से बना हुआ है। अब तेजसिंह ने सोच लिया कि हमारा काम चल गया, दारोगा साहब को इसी जगह फँसाना चाहिए, जाने न पावें।

तेजसिंह––दारोगा साहब, हकीकत में तुम बड़े ही जूतीखोर हो।

दारोगा––(ताज्जुब से तेजसिंह का मुँह देख के) मैंने क्या कसूर किया है जो आप गाली दे रहे हैं? ऐसा तो कभी नहीं हुआ था!

तेजसिंह––फिर मेरे सामने गुर्राता है! कान पकड़ के उखाड़ लूँगा!

दारोगा-आज तक महाराज ने भी मेरी ऐसी बेइज्जती नहीं की!

तेजसिंह ने दारोगा को एक लात ऐसी मारी कि बेचारा धम्म से जमीन पर गिर पड़ा। तेजसिंह उसकी छाती पर चढ़ बैठे और बेहोशी की दवा जबर्दस्ती नाक में ठूँस दी। बेचारा दारोगा बेहोश हो गया। तेजसिंह ने दारोगा की कमर से और अपनी कमर से भी चादर खोली और उसी में दारोगा की गठरी बाँध ताली का गुच्छा और रोजनामचे की किताब भी उसी में रख, पीठ पर लाद, तेजी के साथ अपने लश्कर की तरफ रवाना हुए तथा दो पहर दिन चढ़ते-चढ़ते राजा वीरेन्द्रसिंह के खेमे में जा पहुँचे। पहले तो रामानन्द की सुरत देख वीरेन्द्रसिंह चौंके, मगर जब बँधे हुए इशारे से तेजसिंह ने अपने को जाहिर किया तो वे बहुत ही खुश हुए।

३

तेजसिंह के लौट आने से राजा वीरेन्द्रसिंह बहुत खुश हुए और उस समय तो उनकी खुशी और भी ज्यादा हो गई जब तेजसिंह ने रोहतासगढ़ आकर अपनी कार्रवाई करने का खुलासा हाल कहा। रामानन्द की गिरफ्तारी का हाल सुनकर हँसते-हँसते लोट गये, मगर साथ ही इसके यह सुनकर कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह का पता रोहतासगढ में नहीं लगता, बल्कि मालूम होता है कि वे रोहतासगढ़ में नहीं हैं, राजा वीरेन्द्रसिंह उदास हो गये। तेजसिंह ने उन्हें हर तरह से समझाया और दिलासा दिया। थोड़ी देर बाद तेजसिंह ने अपने दिल की वे सब बातें कहीं जो वे किया चाहते थे। वीरेन्द्रसिंह ने उनकी राय बहुत पसन्द की और बोले-

वीरेन्द्र॰-तुम्हारी कौन-सी ऐसी तरकीब है जिसे मैं पसन्द नहीं कर सकता। हाँ, यह कहो कि इस समय अपने साथ किस ऐयार को ले जाओगे!

तेजसिंह-मुझे तो इस समय कई ऐयारों की जरूरत थी मगर यहाँ केवल चार मौजूद हैं और बाकी सब कुँअर इन्द्रजीतसिंह का पता लगाने गये हैं। खैर, कोई हर्ज नहीं! पण्डित बद्रीनाथ को तो इसी लश्कर में रहने दीजिये, उन्हें किसी दूसरी जगह भेजना मैं मुनासिब नहीं समझता, क्योंकि यहाँ बड़े ही चालाक और पुराने ऐयार का काम है, बाकी ज्योतिषीजी, भैरों और तारा को मैं अपने साथ ले जाऊँगा।

वीरेन्द्र-अच्छी बात है, इन तीनों से तुम्हारा काम बखूबी चलेगा?

तेजसिंह-जी नहीं, मैं तीनों ऐयारों को अपने साथ नहीं रखना चाहता बल्कि भैरों और तारा को तो वहाँ का रास्ता दिखाकर वापस कर दूँगा, इसके बाद वे दोनों थोडे से लड़ाकों को मेरे पास पहुँचा कर फिर आपको या कुँअर आनन्दसिंह को लेकर मेरे पास आवेंगे, तब वह सब कार्रवाई की जाएगी जो मैं आपसे कह चुका हूँ।

वीरेन्द्र॰-और यह दारोगा वाली किताब, जो तुम ले आये हो, क्या होगी?

तेजसिंह-इसे फिर कभी अपने साथ ले जाऊँगा और मौका मिलने पर शुरू से आखिर तक पढ़ जाऊँगा। यही तो एक चीज हाथ लगी है।

वीरेन्द्र–बेशक उम्दा चीज है (किताब तेजसिंह के हाथ से लेकर) रोहतासगढ़ तहखाने का कुल हाल इससे तुम्हें मालूम हो जाएगा, बल्कि इसके अलावा वहाँ का और भी बहुत भेद मालूम होगा।

तेजसिंह-जी हाँ, इसमें दारोगा ने रोज-रोज का हाल लिखा है, मैं समझता हूँ वहाँ ऐसी-ऐसी और भी कई किताबें होंगी जो इसके पहले के और दारोगाओं के हाथ से लिखी गई होंगी।

वीरेन्द्र-जरूर होंगी, और इससे उस तहखाने के खजाने का पता लगता है।

तेजसिंह-लीजिए, अब वह खजाना भी हमीं लोगों का हुआ चाहता है! अब हमें यहाँ देर न करके बहुत जल्द वहाँ पहुँचना चाहिए, क्योंकि दिग्विजयसिंह मुझे और दारोगा को अपने पास बुला गया था। देर हो जाने पर वह फिर तहखाने में आवेगा और किसी को न देखेगा तो सब काम ही चौपट हो जाएगा।

वीरेन्द्र-ठीक है, अब तुम जाओ, देर मत करो।

कुछ जलपान करने के बाद ज्योतिषीजी, भैरोंसिंह और तारासिंह को साथ लिए हुए तेजसिंह वहाँ से रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए और दो घण्टे दिन रहते ही तहखाने में जा पहुँचे। अभी तक तेजसिंह, रामानन्द की सूरत में थे। तहखाने का रास्ता दिखाने के बाद भैरोंसिंह और तारासिंह को तो वापस किया और ज्योतिषीजी को अपने पास ही रखा। अबकी दफे तहखाने से बाहर निकलने वाले दरवाजे में तेजसिंह ने ताला नहीं लगाया, उन्हें केवल खटकों पर बन्द रहने दिया।

तहखाने वाले रोजनामचे के पढ़ने से तेजसिंह को बहुत-सी बातें मालूम हो गई जिन्हें यहाँ जिखने की कोई जरूरत नहीं, समय-समय पर वे आप ही मालूम हो जायेंगी। हाँ, उनमें से एक बात यहाँ लिख देना जरूरी है। जिस दालान में दारोगा रहता था, उसमें एक खम्भे के साथ लोहे की एक तार बँधी हुई थी, जिसका दूसरा सिरा छत में सूराख करके ऊपर की तरफ निकाल दिया था। तेजसिंह को किताब के पढ़ने से मालूम हुआ कि इस तार को खींचने या हिलाने से वह घण्टा बोलेगा जो खास दिग्विजयसिंह के दीवानखाने में लगा हुआ है क्योंकि उस तार का दूसरा सिरा उसी घंटे से बँधा है। जब किसी तरह की मदद की जरूरत पड़ती थी तब दारोगा उस तार को छेड़ता था। उस दालान की बगल की एक कोठरी के अन्दर भी एक बड़ा-सा घण्टा लटकता था जिसके साथ बँधी हुई लोहे की तार का दूसरा हिस्सा महाराज के दीवानखाने में था। महाराज भी जब तहखाने वालों को होशियार करना चाहते थे या और कोई जरूरत पड़ती थी, तो ऊपर लिखी रीति से वह तहखाने वाला घंटा भी बजाया जाता, लेकिन यह काम केवल महाराज का था क्योंकि तहखाने का हाल बहुत गुप्त था। तहखाना कैसा है और उसके अन्दर क्या होता है, यह हाल सिवाय बहुत खास आठ-दस आदमियों के और किसी को भी मालूम न था। इसके सब भेद मन्त्र की तरह गुप्त रखे जाते थे।

हम ऊपर लिख आये हैं कि असली रामानन्द को ऐयार समझकर महाराज दिग्विजयसिंह तहखाने में ले आए और लौटकर जाती समय नकली रामानन्द, अर्थात् तेजसिंह और दारोगा को कहते गये कि तुम दोनों फुरसत पाकर हमारे पास आना।

महाराज के हुक्म की तालीम न हो सकी, क्योंकि दारोगा को कैद कर तेजसिंह अपने लश्कर में ले गये जौर ज्यादा हिस्सा दिन का उधर ही बीत गया था, जैसा कि हम ऊपर लिख आये हैं। जब तेजसिंह लौटकर तहखाने में आये तो ज्योतिषीजी को बहुत सी बातें समझाईं और उन्हें दारोगा बना कर गद्दी पर बैठाया। उसी समय सामने की कोठरियों में से खटके की आवाज आई। तेजसिंह समझ गये कि महाराज आ रहे हैं। ज्योतिषीजी को तो लिटा दिया और कहा कि "तुम हाय-हाय करो, मैं महाराज से बातचीत करूँगा।" थोड़ी देर में महाराज उस तहखाने में उसी राह से आ पहुँचे जिस राह से तेजसिंह को साथ लाये थे।

महाराज-(तेजसिंह की तरफ देखकर) रामानन्द, तुम दोनों को हम अपने पास आने के लिए हुक्म दे गये थे। क्यों नहीं आये? और इस दारोगा को क्या हुआ जो हाय-हाय कर रहा है?

तेजसिंह-महाराज, इन्हीं के सबब से तो आना नहीं हुआ। यकायक बेचारे के पेट में दर्द पैदा हो गया, बहुत-सी तरकीबें करने के बाद अब कुछ आराम हुआ है।

महाराज-(दारोगा के हाल पर अफसोस करने के बाद) ऐयार का कुछ हाल मालूम हुआ?

तेजसिंह-जी नहीं, उसने कुछ भी नहीं बताया। खैर, क्या हर्ज है, दो-एक दिन में पता लग ही जायगा, ऐयार लोग जिद्दी तो होते ही हैं।

थोड़ी देर बाद महाराज दिग्विजयसिंह वहाँ से चले गये। महाराज के जाने के बाद तेजसिंह भी तहखाने के बाहर हुए और महाराज के पास गये। दो घंटे तक हाजिरी देकर शहर में गश्त करने के बहाने से बिदा हुए। पहर रात से कुछ ज्यादा गयी थी कि तेजसिंह फिर महाराज के पास गये और बोले-

तेजसिंह-मुझे जल्द लौट आते देख महाराज ताज्जुब करते होंगे, मगर एक जरूरी खबर देने के लिए आना पड़ा।

महाराज-वह क्या?

तेजसिंह-मुझे पता लगा है कि मेरी गिरफ्तारी के लिए कई ऐयार आये हए हैं, महाराज होशियार रहें। अगर रात भर मैं उनके हाथ से बच गया तो कल जरूर कोई तरकीब करूँगा, यदि फँस गया तो खैर!

महाराज-तो आज रात भर तुम यहीं क्यों नहीं रहते?

तेजसिंह-क्या उन लोगों के खौफ से बिना कुछ कार्रवाई किये मैं अपने को छिपाऊँ? यह नहीं हो सकता।

महाराज-शाबाश! ऐसा ही करना मुनासिब है। खैर जाओ, जो होगा देखा जायगा।

तेजसिंह घर की तरफ लौटे। रामानन्द के घर की तरफ नहीं, बल्कि अपने लश्कर की तरफ। उन्होंने इस बहाने अपनी जान बचाई और चलते हुए। सवेरे जब दरबार में रामानन्द न आये, तो महाराज को विश्वास हो गया कि वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने उन्हें फँसा लिया।

४

अपनी कार्रवाई पूरी करने के बाद तेजसिंह ने सोचा कि अब असली रामानन्द को तहखाने से ऐसी खूबसूरती के साथ निकाल लेना चाहिए जिसमें महाराज को किसी तरह का शक न हो और यह गुमान भी न हो कि तहखाने में वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग घुसे हैं या तहखाने का हाल किसी दूसरे को मालूम हो गया है। यह काम तभी हो सकता है जब कोई ताजा मुर्दा हाथ लगे।

रोहतासगढ़ से चलकर तेजसिंह अपने लश्कर में पहुँचे और सब हाल वीरेन्द्रसिंह से कहने के बाद कई जासूसों को इस काम के लिए रवाना किया कि अगर कहीं कोई ताजा मुर्दा, जो सड़ न गया हो या फूल न गया हो, मिले तो उठा लावें और लश्कर के पास ही कहीं रखकर हमें इत्तिला दें। इत्तिफाक से लश्कर से दो-तीन कोस की दूरी पर नदी के किनारे एक लावारिस भिखमंगा उसी दिन मरा था जिससे जासूस लोग शाम होते-होते उठा लाये और लश्कर से कुछ दूर रख तेजसिंह को खबर की। भैरोंसिंह को साथ लेकर तेजसिंह मुर्दे के पास गये और अपनी कार्रवाई करने लगे।

तेजसिंह ने उस मुर्दे को ठीक रामानन्द की सूरत का बनाया और भैरोंसिंह की मदद से उठाकर रोहतासगढ़ तहखाने के अन्दर ले गये। और तहखाने के दारोगा (ज्योतिषीजी) के सुपुर्द कर और उसके बारे में बहुत-सी बाजें समझा-बुझाकर असली रामानन्द को अपने लश्कर में उठा लाये।

तेजसिंह के जाने के बाद हमारे नये दारोगा साहब ने खम्भे से बँधे हुए उस तार को खींचा, जिसके सबब से दिग्विजयसिंह के दीवानखाने वाला घण्टा बोलता था। उस समय दो घण्टे रात जा चुकी थी, महाराज अपने कई मुसाहिबों को साथ ले दीवानखाने में बैठे दुश्मन पर फतह पाने के लिए बहुत-सी तरकीबें सोच रहे थे, यकायक घण्टे की आवाज सुनकर वे चौंके और समझ गये कि तहखाने में हमारी जरूरत है। दिग्विजयसिंह उसी समय उठ खड़े हुए और उन जल्लादों को बुलाने का हुक्म दिया जो जरूरत पड़ने पर तहखाने में जाया करते थे और जान के खौफ या नमकहलाली के सबब से वहाँ का हाल किसी दूसरे से कभी नहीं कहते थे।

महाराज दूसरे कमरे में गये। जब तक कपड़े बदलकर तैयार हों, जल्लाद लोग भी हाजिर हो गये। ये जल्लाद बड़े ही मजबूत, ताकतवर और कद्दावर थे। स्याह रंग, मूँछें चढ़ी हुईं, पोशाक में केवल जाँघिया, मिर्जई और कन्टोप पहने, हाथ में भारी तेगा लिए बड़े ही भयंकर मालूम होते थे। महाराज ने केवल चार जल्लादों को साथ लिया और उसी मामूली रास्ते से तहखाने में उतर गये। महाराज को आते देखकर दारोगा चैतन्य हो गया और सामने आ हाथ जोड़कर बोला, "लाचार महाराज को तकलीफ देनी पड़ी।"

महाराज-क्या मामला है?

दारोगा-वह ऐयार मर गया जिसे दीवान रामानन्दजी ने गिरफ्तार किया था।

महाराज-(चौंककर) हैं, मर गया!

दारोगा-जी हाँ, मर गया। न मालूम कैसी जहरीली बेहोशी दी गयी थी कि जिसका असर यहाँ तक हुआ।

महाराज-यह बहुत ही बुरा हुआ, दुश्मन समझेगा कि दिग्विजयसिंह ने जानबूझकर हमारे ऐयार को मार डाला जो कायदे के बाहर की बात है। दुश्मनों को अब हमसे जिद हो जायगी और वे भी कायदे के खिलाफ वेहोशी की जगह जहर को बरतने लगेंगे तो हमारा बड़ा नुकसान होगा और बहुत आदमी जान से मारे जायेंगे।

दारोगा-लाचारी है, अब क्या किया जाय? भूल दीवान साहब की है।

महाराज-(कुछ जोश में आकर) रामानन्द तो पूरा उजड्ड है! झक मारने के लिए उसने अपने को ऐयार मशहूर कर रखा है, तभी तो वीरेन्द्रसिंह का एक अदना ऐयार आया और उसे पकड़कर ले गया। चलो, छुट्टी हुई!

महाराज की बातें सुनकर मन-ही-मन ज्योतिषीजी हँसते और कहते थे कि देखो कितना होशियार और बहादुर राजा क्या जरा-सी बात में बेवकूफ बना है। वाह रे तेजसिंह, तू जो चाहे कर सकता है।

महाराज ने रामानन्द की लाश को खुद देखा और दूसरी जगह ले जाकर जमीन में गाड़ देने के लिए जल्लादों को हुक्म दिया। जल्लादों ने उसी तहखाने में एक जगह, जहाँ मुर्दे गाड़े जाते थे, ले जाकर उस लाश को दबा दिया। महाराज अफसोस करते हुए तहखाने के बाहर निकल आये और इस सोच में पड़े कि देखें, वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग इसका क्या बदला लेते हैं।

५

ऊपर लिखी वारदात के तीसरे दिन दारोगा साहब अपनी गद्दी पर बैठे रोजनामचा देख रहे थे और उस तहखाने की पुरानी बातें पढ़-पढ़कर ताज्जुब कर रहे थे कि यकायक पीछे की कोठरी से खटके की आवाज आयी। घबराकर उठ खड़े हुए और पीछे की तरफ देखने लगे। फिर आवाज आयी। ज्योतिषीजी दरवाजा खोलकर अन्दर गये, मालूम हुआ कि उस कोठरी के दूसरे दरवाजे से कोई भागा जाता है। कोठरी में बिलकुल अँधेरा था, ज्योतिषीजी कुछ आगे बढ़े ही थे कि जमीन पर पड़ी हुई एक लाश उनके पैरों से टकराई, जिसकी ठोकर खा वे गिर पड़े, मगर फिर सम्हलकर आगे बढ़े, लेकिन ताज्जुब करते थे कि यह लाश किसकी है। मालूम होता है यहाँ कोई खून हुआ है, और ताज्जुब नहीं कि वह भागने ही वाला खूनी हो! वह आदमी आगे-आगे सुरंग में भागा जाता था और पीछे-पीछे ज्योतिषीजी हाथ में खंजर लिये दौड़े जा रहे थे, मगर वे उसे किसी तरह पकड़ न सके। यकायक सुरंग के मुहाने पर रोशनी मालूम हुई। ज्योतिषीजी समझे कि अब वह बाहर निकल गया। दम-भर में ये भी वहाँ पहुँचे और सुरंग के बाहर निकल चारों तरफ देखने लगे। ज्योतिषीजी की पहली निगाह जिस पर पड़ी वह पण्डित बद्रीनाथ थे। देखा कि एक औरत को पकड़े हुए बद्रीनाथ खड़े हैं और दिन आधी घड़ी से कम बाकी है।

बद्रीनाथ–दारोगा साहब, देखिये आपके यहाँ चोर घुसे और आपको खबर भी नहीं!

ज्योतिषीजी-अगर खबर न होती तो पीछे-पीछे दौड़ा हुआ यहाँ तक क्यों आता।

बद्रीनाथ-फिर भी आपके हाथ से तो चोर निकल ही गया था। अगर इस समय हम न पहुँच जाते तो आप इसे न पा सकते।

ज्योतिषीजी-हाँ, बेशक इसे मैं मानता हूँ। क्या आप पहचानते हैं कि यह कौन है? याद आता है कि इस औरत को मैंने कभी कहीं देखा है।

बद्रीनाथ–जरूर देखा होगा, अब इसे तहखाने में ले चलो, फिर देखा जायगा। इसका तहखाने से खाली हाथ निकलना मुझे ताज्जुब में डालता है।

ज्योतिषीजी-यह खाली हाथ नहीं, बल्कि हाथ साफ करके आयी है। इसके पीछे आते समय एक लाश मेरे पैरों से टकराई थी, मगर पीछा करने की धुन में मैं कुछ जाँच न कर सका।

पण्डित बद्रीनाथ और ज्योतिषीजी उस औरत को गिरफ्तार किये हुए तहखाने में आये और उस दालान या बारहदरी में, जिसमें दारोगा साहब की गद्दी लगी रहती थी, पहुँचे। उस औरत को खम्भे के साथ बाँध दिया और हाथ में लालटेन ले उस लाश को देखने गये जो ज्योतिषीजी के पैरों में अड़ी थी। बद्रीनाथ ने देखते ही उस लाश को पहचान लिया और बोले, "यह तो माधवी है!"

ज्योतिषीजी-यह यहाँ क्योंकर आयी? (माधवी की नाक पर हाथ रखकर) अभी दम है, मरी नहीं। यह देखिये, इसके पेट में जख्म लगा है। जख्म भारी नहीं है, बच सकती है।

बद्रीनाथ–(नब्ज देखकर) हाँ, बच सकती है। अभी इसके जख्म पर पट्टी बाँध कर इसी तरह छोड़ दो, फिर बूझा जायगा। हाँ, थोड़ा-सा अर्क इसके मुँह में डाल देना चाहिए।

बद्रीनाथ ने माधवी के जख्म पर पट्टी बाँधी और थोड़ा-सा अर्क भी उसके मुँह में डालकर उसे वहाँ से उठा दूसरी कोठरी में ले गये। इस तहखाने में कई जगह से रोशनी और हवा पहुँचा करती थी, कारीगरों ने इसके लिए अच्छी तरकीब की थी।

बद्रीनाथ और ज्योतिषीजी माधवी को उठाकर एक ऐसी कोठरी में ले गये जहाँ बादाकश की राह ठण्डी-ठण्डी हवा आ रही थी और उसे उसी जगह छोड़ आप बारहदरी में आये जहाँ उस औरत को, जिसने माधवी को घायल किया था, खम्भे के साथ बाँधा था। बद्रीनाथ ने धीरे से ज्योतिषीजो से कहा कि "आज कुँअर आनन्दसिंह और उनके थोड़ी ही देर बाद मैं बीस-पच्चीस आदमियों को साथ लेकर यहाँ आऊँगा। अब मैं जाता हूँ, वहाँ बहुत-कुछ काम है, केवल इतना ही कहने के लिए आया था। मेरे जाने के बाद तुम इस औरत से पूछताछ कर लेना कि यह कौन है, मगर एक बात का खौफ है।"

ज्योतिषीजी-वह क्या?

बद्रीराथ—यह औरत हम लोगों को पहचान गयी है, कहीं ऐसा न हो कि तुम महाराज को बुलाओ और वे आ जायें तो यह कह उठे कि दारोगा साहब तो राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयार हैं!

ज्योतिषीजी-जरूर ऐसा होगा, इसका भी बन्दोबस्त कर लेना चाहिए।

बद्रीनाथ-खैर, कोई हर्ज नहीं, मेरे पास मसाला तैयार है। (बटुए में से एक डिबिया निकालकर और ज्योतिषीजी के हाथ में देकर) इसे आप रखें, जब मौका हो तो इसमें से थोड़ी-सी दवा इसकी जबान पर जबर्दस्ती मल दीजियेगा, बात की बात में जुबान ऐंठ जायगी। फिर यह साफ तौर पर कुछ भी न कह सकेगी। तब जो आपके जी आवे, महाराज को समझा दें।

बद्रीनाथ वहाँ से चले गये। उनके जाने के बाद उस औरत को डरा-धमका ओर कुछ मार-पीटकर ज्योतिषीजी ने उसका हाल मालूम करना चाहा, मगर कुछ न हो सका, पहरों की मेहनत बर्बाद गयी। आखिर उस औरत ने ज्योतिषीजी से कहा, "ज्योतिषीजी, मैं आपको अच्छी तरह से जानती हूँ। आप यह न समझिए कि माधवी को मैंने मारा है, उसको घायल करने वाला कोई दूसरा ही था। खैर, इन सब बातों से कोई मतलब नहीं, क्योंकि अब तो माधवी भी आपके कब्जे में नहीं रही।"

ज्योतिषीजी-माधवी मेरे कब्जे में से कहाँ जा सकती है?

औरत-जहाँ जा सकती थी वहाँ गयी। आप जहाँ रख आये थे वहाँ जाकर देखिये, है या नहीं।

औरत की बात सुनकर ज्योतिषीजी बहुत घबराये और उठ खड़े हुए। वहाँ गये जहाँ माधवी को छोड़ आये थे। उस औरत की बात सच निकली, माधवी का वहाँ पता भी न था। हाथ में लालटेन ले घण्टों ज्योतिषीजी इधर-उधर खोजते रहे, मगर कुछ फायदा न हुआ, आखिर लौटकर फिर उस औरत के पास आये और बोले, "तेरी बात ठीक निकली, मगर अब मैं तेरी जान लिए बिना नहीं रहता, हाँ, अगर सच-सच अपना हाल बता देगी तो छोड़ दूँगा।"

ज्योतिषीजी ने हजार सिर पटका, मगर उस औरत ने कुछ भी न कहा। इसी औरत के चिल्लाने या बोलने की आवाज किशोरी और लाली ने इस तहखाने में आकर सुनी थी जिसका हाल इस भाग के पहले बयान में लिख आये हैं, क्योंकि इसी समय। लाली और किशोरी भी वहाँ आ पहुँची थीं।

ज्योतिषीजी ने किशोरी को पहचाना, किशोरी के साथ लाली का नाम लेकर भी पुकारा, मगर अभी यह नहीं मालूम हुआ कि लाली को ज्योतिषीजी क्योंकर और कब से जानते थे। हाँ, किशोरी और लाली को इस बात का ताज्जुब था कि दारोगा ने उन्हें पहचान लिया, क्योंकि ज्योतिषीजी दारोगा के भेष में थे।

ज्योतिषी ने किशोरी ओर लाली को अपने पास बुलाकर कुछ बात करना चाहा, मगर मौका न मिला। उसी समय घण्टे के बजने की आवाज आयी और ज्योतिषीजी समझ गये कि महाराज आ रहे हैं। मगर इस समय महाराज क्यों आते हैं? शायद इस वजह से कि लाली और किशोरी इस तहखाने में घुस आयी हैं और इसका हाल महाराज को मालूम हो गया है।

जल्दी के मारे ज्योतिषीजी सिर्फ दो काम कर सके। एक तो किशोरी और लाली की तरफ देखकर बोले, "अफसोस, अगर आधी घड़ी की भी मोहलत मिलती तो तुम्हें यहाँ से निकाल ले जाता, क्योंकि यह सब बखेड़ा तुम्हारे ही लिए हो रहा है।" दूसरे, उस औरत की जुबान पर मसाला लगा सके जिसमें वह महाराज के सामने कुछ कह न सके। इतने ही में मशालचियों और कई जल्लादों को लेकर महाराज आ पहँचे और ज्योतिषीजी की तरफ देखकर बोले, "इस तहखाने में किशोरी और लाली आई हैं, तुमने देखा है?"

दरोगा-(खड़े होकर) जी, अभी तक तो यहाँ नहीं पहुँची।

महाराज-खोजो, कहाँ हैं, यह औरत कौन है?

दरोगा-मालूम नहीं, कौन है और क्यों आई है? मैंने इसी तहखाने में इसे गिरफ्तार किया है, पूछने से कुछ नहीं बताती।

महाराज-खैर किशोरी और लाली के साथ इसे भी भूतनाथ पर चढ़ा देना (बलि देना) चाहिए, क्योंकि यही यहाँ का बँधा कायदा है कि लिखे आदमियों के सिवा दूसरा जो इस तहखाने को देख ले, उसे तुरत बलि दे देना चाहिए।

सब लोग किशोरी और लाली को खोजने लगे। इस समय ज्योतिषीजी घबराये और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि कुँअर आनन्दसिंह और हमारे ऐयार लोग जल्द यहाँ आवें जिसमें किशोरी की जान बचे।

किशोरी और लाली कहीं दूर न थीं, तुरत गिरफ्तार कर ली गईं और उनकी मुश्कें बंध गईं। इसके बाद उस औरत से महाराज ने कुछ पूछा जिसकी जबान पर ज्योतिषीजी ने दवा मल दी थी, पर उसने महाराज की बात का कुछ भी जबाब न दिया। आखिर खंभे से खोलकर उसकी भी मुश्कें बांध दी गई और तीनों और दरवाजे की राह दूसरी संगीन बारहदरी में पहुंचाई गईं जिसमें सिंहासन के ऊपर स्याह पत्थर की वह भयानक मूरत बैठी हुई थी जिसका हाल इस सन्तति के तीसरे भाग के आखिरी बयान में हम लिख आये हैं। इसी समय आनन्दसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह वहाँ पहुँचे और उन्होंने अपनी आँखों से उस औरत के मारे जाने का दृश्य देखा जिसकी जबान पर दवा लगा दी गई थी। जब किशोरी के मारने की बारी आई तब कअर आनन्दसिंह और दोनों ऐयारों से न रहा गया और उन्होंने खंजर निकाल कर उस झुण्ड पर टूट पड़ने का इरादा किया, मगर वह न हो सका, क्योंकि पीछे से कई आदमियों ने आकर इन तीनों को पकड़ लिया।

६

अब हम अपने किस्से के सिलसिले को मोड़कर दूसरी तरफ झुकते हैं और पाठकों को पुण्यधाम काशी में ले चलकर संध्या के समय गंगा के किनारे बैठी हुई एक नौजवान औरत की अवस्था पर ध्यान दिलाते हैं।

सूर्य भगवान अस्त हो चुके हैं, चारों तरफ अँधेरी रात घिरी आती है। गंगाजी शान्त-भाव से धीरे-धीरे बह रही हैं। आसमान पर छोटे-छोटे बादल के टुकड़े पूरब की तरफ से चले आकर पश्चिम की तरफ इकट्ठे हो रहे हैं। गंगा के किनारे पर ही एक नौजवान औरत, जिसकी उम्र पन्द्रह वर्ष से ज्यादा न होगी, हवेली पर गाल रखे जल की तरफ देखती न मालूम क्या सोच रही है। इसमें कोई शक नहीं कि यह औरत नखशिख से दुरुस्त और खूबसूरत है मगर रंग इसका साँवला है, तो भी इसकी खूबसूरती और नजाकत में किसी तरह का बट्टा नहीं लगता। थोड़ी-थोड़ी देर पर यह औरत सिर उठा कर चारों तरफ देखती और फिर उसी तरह हथेली पर गाल रखकर कुछ सोचने लग जाती है।

इसके सामने ही गंगाजी में एक छोटा-सा बजरा खड़ा है जिस पर चार-पाँच आदमी दिखाई दे रहे हैं और कुछ सफर का सामान और दो-चार हर्वे भी मौजूद हैं।

थोड़ी देर में अँधेरा हो जाने पर वह औरत उठी, साथ ही बजरे पर से दो सिपाही उतर आए और उसे सहारा देकर बजरे पर ले गये। वह छत पर जा बैठी और किनारे की तरफ इस तरह देखने लगी जैसे किसी के आने की राह देख रही हो। बेशक ऐसा ही था, क्योंकि उसी समय हाथ में गठरी लटकाये एक आदमी आया जिसे देखते ही दो मल्लाह किनारे पर उतर आये, एक ने उसके हाथ से गठरी लेकर बजरे की छत पर पहुँचा दी और दूसरे ने उस आदमी को अपने हाथ का हल्का सहारा देकर बजरे पर चढ़ा लिया। वह भी छत पर उस औरत के सामने खड़ा हो गया और तब इशारे से पूछा कि 'अब क्या हुक्म होता है?' जिसके जवाब में इशारे ही से उस औरत ने गंगा के उस पार की तरफ चलने को कहा। उस आदमी ने, जो अभी आया था, माँझियों को पुकार कर कहा कि बजरा उस पार ले चलो, इसके बाद अभी आये हुए आदमी और उस औरत में दो-चार बातें इशारों में हुईं जिन्हें हम कुछ नहीं समझे। हाँ, इतना मालूम हो गया कि यह औरत गूंगी और बहरी है, यह मुँह से कुछ नहीं बोल सकती और न कान से कुछ सुन सकती है।

बजरा किनारे से खोला गया और वह पार की तरफ चला। चार माँझी डाँडे लगाने लगे। वह औरत छत से उतर कर नीचे चली गई और मर्द भी अपनी गठरी को, जिसे लाया था, लेकर छत से नीचे उतर आया। बजरे में नीचे दो कोठरियाँ थीं, एक में सुन्दर-सफेद फर्श बिछा हुआ था और दूसरी में एक चारपाई बिछी थी और कुछ असवाब पड़ा हुआ था। यह औरत हाथ से कुछ इशारा करके फर्श पर बैठ गई और मर्द ने एक लकड़ी की पटिया और छोटी-सी खड़िये की टुकड़ी उसके सामने रख दी और आप भी बैठ गया और दोनों में उसी लकड़ी की पटिया पर खड़िया से लिखकर बातचीत होने लगी। अब उन दोनों में जो बातचीत हुई हम नीचे लिखते हैं, परन्तु पाठक समझ रखें कि सारी बातचीत लिखकर हुई।

पहले उस औरत ने गठरी खोली और देखने लगी कि उसमें क्या है। पीतल का एक कलमदान निकला जिसे उस औरत ने खोला। पाँच-सात चिट्ठियाँ और पुर्जे निकले जिन्हें पढ़कर उसी तरह रख दिया और दूसरी चीजें देखने लगी। दो-चार तरह के रूमाल और कुछ पुराने सिक्के देखने के बाद टीन का एक बड़ा-सा डिब्बा खोला जिसके अन्दर कोई ताज्जुब की चीज थी। डिब्बा खोलने के बाद पहले कुछ कपड़ा हटाया, जो वेठन की तौर पर लगा हुआ था, इसके बाद झाँक कर उस चीज को देखा जो उस डिब्बे के अन्दर थी।

न मालूम उस डिब्बे में ऐसी क्या चीज थी कि जिसे देखते ही उस औरत की अवस्था बिल्कुल बदल गई। झाँक के देखते ही वह हिचकी और पीछे की तरफ हट गई, पसीने से तर हो गई और बदन काँपने लगा, चेहरे पर हवाई उड़ने लगी और आँखें बन्द हो गईं। उस आदमी ने फुर्ती से बेठन का कपड़ा डाल दिया और उस डिब्बे को उसी तरह बन्द कर उस औरत के सामने से हटा लिया। उसी समय बजरे के बाहर से एक आवाज आई, "नानकजी!"

नानकप्रसाद उसी आदमी का नाम था जो गठरी लाया था। उसका कद न लम्बा और न बहुत नाटा था। वदन मोटा, रंग गोरा और ऊपर के दाँत कुछ खुड़े-बुड़े से थे। आवाज सुनते ही वह आदमी उठा और बाहर आया, मल्लाहों ने डाँड़ लगाना बन्द कर दिया था, और तीन सिपाही दरवाजे पर मुस्तैद खड़े थे।

नानक-(एक सिपाही से) क्या है?

सिपाही-(पार की तरफ इशारा करके) मुझे मालूम होता है कि उस पार बहुत से आदमी खड़े हैं। देखिए, कभी-कभी बादल हट जाने से जब चन्द्रमा की रोशनी पड़ती है तो साफ मालूम होता है कि वे लोग भी बहाव की तरफ ही हटे जाते हैं जिधर हमारा बजरा जा रहा है।

नानक-(गौर से देखकर) हाँ, ठीक तो है।

सिपाही-क्या ठिकाना, शायद हमारे दुश्मन ही हों।

नानक-कोई ताज्जुब नहीं, अच्छा, तुम नाव को बहाव की तरफ जाने दो, पार मत चलो।

इतना कह कर नानकप्रसाद अन्दर गया, तब तक औरत के भी हवास ठीक हो गये थे और वह उस टीन के डिब्बे की तरफ, जो इस समय बन्द था, बड़े गौर से देख रही थी। नानक को देखकर उसने इशारे से पूछा, "क्या है?"

इसके जवाब में नानक ने लकड़ी की पटिया पर खड़िया से लिखकर दिखाया कि "पार की तरफ बहुत से आदमी दिखाई पड़ते हैं, कौन ठिकाना, शायद हमारे दुश्मन हों।"

औरत-(लिखकर) बजरे को बहाव की तरफ जाने दो। सिपाहियों को कहो, बन्दूकें लेकर तैयार रहें। अगर कोई जल में तैर कर यहाँ आता हुआ दिखाई, पड़े तो बेशक गोली मार दें।

नानक-बहुत अच्छा।

नानक फिर बाहर आया और सिपाहियों को हुक्म सुनाकर भीतर चला गया। उस औरत ने अपने आँचल से एक ताली खोल कर नानक के हाथ में दी और इशारे से कहा कि इस टीन के डिब्बे को हमारे सन्दूक में रख दो।

नानक ने वैसा ही किया, फिर दूसरी कोठरी में गया। इसमें पलंग बिछा हुआ था और कुछ असबाब और सन्दूक रखा हुआ था और उसी ताली से एक सन्दूक खोल कर वह टीन का डिब्बा रख दिया और उसी तरह ताला बन्द कर ताली उस औरत के हवाले की। उसी समय बाहर से बन्दूक की आवाज आई।

नानक ने तुरंत बाहर आकर पूछा, "क्या है?"

सिपाही–देखिये, कई आदमी तैर कर इधर आ रहे हैं।

दूसरा-मगर बन्दूक की आवाज पाकर अब लौट चले।

नानक फिर अन्दर गया और बाहर का हाल पटिया पर लिखकर औरत को समझाया। वह भी उठ खड़ी हुई और बाहर आकर पार की तरफ देखने लगी। घण्टा भर यों ही गुजर गया और अब वे आदमी, जो पार दिखाई दे रहे थे या तर कर इस बजरे की तरफ आ रहे थे, कहीं चले गये, दिखाई नहीं देते। नानकप्रसाद को साथ आने का इशारा करके वह औरत फिर बजरे के अन्दर चली गई और नानक भी गया। उस गठरी में और जो-जो चीजें थीं, उन्हें वह गंगी औरत देखने लगी। तीन-चार बेशकीमत मर्दाने कपड़ों के सिवाय और उस गठरी में कुछ भी नहीं था। गठरी बाँध कर एक किनारे रख दी गई और पटिया पर लिख-लिख कर दोनों में बातचीत होने लगी।

औरत-कलमदान में जो चिट्ठियाँ हैं, वे तुमने कहाँ पाईं?

नानक-उसी कलमदान में थीं।

औरत-और वह कलमदान कहाँ पर था?

नानक-उसकी चारपाई के नीचे पड़ा हुआ था, घर में सन्नाटा था और कोई दिखाई न पड़ा, जो कुछ जल्दी में पाया, ले आया।

औरत-खैर, कोई हर्ज नहीं। हमें केवल उस टीन के डिब्बे से मतलब था। यह कलमदान मिल गया तो इन चिट्ठी-पुर्जों से भी बहुत काम चलेगा।

इसके अलावा और कई बातें हुई जिसके लिखने की यहाँ कोई जरूरत नहीं। रात एक पहर से ज्यादा जा चुकी थी जब वह औरत वहाँ से उठी और शमादान को बुझा कर अपनी चारपाई पर जाकर लेट रही। नानक भी एक किनारे फर्श पर सो रहा और रात-भर नाव बेखटके चलती गई, कोई बात ऐसी नहीं हुई जो लिखने योग्य हो।

जब थोड़ी रात वाकी रही, वह औरत अपनी चारपाई से उठी और खिड़की से बाहर झाँक कर देखने लगी। इस समय आसमान बिल्कुल साफ था, चन्द्रमा के साथही-साथ तारे भी समयानुसार अपनी चमक दिखा रहे थे और दो-तीन खिड़कियों की राह इस बजरे के अन्दर भी चाँदनी आ रही थी। वल्कि जिस चारपाई पर वह औरत सोई हुई थी, चन्द्रमा की रोशनी अच्छी तरह पड़ रही थी। वह औरत धीरे से चारपाई के नीचे उतरी और उस संदूक को खोला जिसमें नानक का लाया हुआ टीन का डिब्बा रखवा दिया था। डिब्बा उसमें से निकाल कर चारपाई पर रक्खा और सन्दूक बन्द करने के बाद दूसरा संदूक खोलकर उसमें से एक मोमबत्ती निकाली और चारपाई पर आकर बैठ रही। मोमबत्ती में से मोम लेकर उसने टीन के डिब्बे की दरारों को अच्छी तरह बन्द किया और हर एक जोड़ में मोम लगाया जिसमें हवा तक भी उसके अन्दर न जा सके। इस काम के बाद वह खिड़की के बाहर गर्दन निकाल कर बैठी और किनारे की तरफ देखने लगी। दो माँझी धीरे-धीरे डाँड़ खे रहे थे। जब वे थक जाते तो दूसरे दो को उठा कर उसी काम पर लगा देते और आप आराम करते।

सवेरा होते-होते वह नाव एक ऐसी जगह पहुँची जहाँ किनारे पर कुछ आबादी थी, बल्कि गंगा के किनारे ही एक ऊँचा शिवालय भी था और उतर कर गंगाजी में स्नान करने के लिए सीढ़ियाँ भी बनी हुई थीं। औरत ने उस मुकाम को अच्छी तरह देखा और जब वह बजरा उस शिवालय के ठीक सामने पहुंचा तब उसने टीन का डिब्बा जिसमें कोई अद्भुत बस्तु थी और जिसके सूराखों को उसने अच्छी तरह मोम से बन्द कर दिया था, जल में फेंक दिया और फिर अपनी चारपाई पर लेट रही। यह हाल किसी दूसरे को मालूम न हुआ। थोड़ी ही देर में वह आबादी पीछे रह गई और बजरा भी दूर निकल गया।

जब अच्छी तरह सवेरा हुआ, सूर्य की लालिमा निकल आई, तो उस औरत के हुक्म के मुताबिक बजरा एक जंगल के किनारे पहुँचा। उस औरत ने किनारे-किनारे चलने का हुक्म दिया। यह किनारा इसी पार का था जिस तरफ काशी पड़ती है या जिस हिस्से से बजरा खोलकर सफर शुरू किया गया था।

बजरा किनारे-किनारे जाने लगा और वह औरत किनारे के दरख्तों को बड़े गौर से देखने लगी। जंगल गुंजान और रमणीक था, सुबह के सुहावने समय में तरहतरह के पक्षी बोल रहे थे, हवा के झपेटों के साथ जंगली फलों की मीठी खुशबू आ रही थी। वह औरत एक खिड़की में सिर रक्खे जंगल की शोभा देख रही थी। यकायक उसकी निगाह किसी चीज पर पड़ी जिसे देखते ही वह चौंकी और बाहर आकर बजा रोकने और किनारे लगाने का इशारा करने लगी।

बजरा किनारे लगाया गया और वह गूँगी औरत अपने सिपाहियों को कुछ इशारा करके नानक को साथ लेकर नीचे उतरी।

घण्टे-भर तक वह जंगल में घूमती रही। इसी बीच में उसने अपने जरूरी काम और नहाने-धोने से छुट्टी पा ली और तब बजरे में आकर कुछ भोजन करने के बाद उसने अपनी मर्दानी सूरत बनाई। चुस्त पायजामा, घुटने के ऊपर तक का चपकन, कमरबन्द, सिर से बड़ा-सा मुंडासा बाँध और ढाल-तलवार-खंजर के अलावा एक छोटी-सी पिस्तौल, जिसमें गोली भरी हुई थी, कमर में छिपा और थोड़ी-सी गोली-बारूद भी पास रख बजरे से उतरने के लिए तैयार हुई।

नानक ने उसकी ऐसी अवस्था देखी तो सामने अड़ कर खड़ा हो गया और इशारे से पूछा कि अब हम क्या करें? इसके जवाब में उस औरत ने पटिया और खड़िया माँगी और लिख-लिखकर दोनों में बातचीत होने लगी।

औरत-तुम इसी बजरे पर अपने ठिकाने चले जाओ। मैं तुमसे आ मिलूँगी!

नानक—मैं किसी तरह तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकता, तुम खूब जानती हो कि तुम्हारे लिए मैंने कितनी तकलीफें उठाई हैं और नीच-से-नीच काम करने को तैयार रहा हूँ।

औरत-तुम्हारा कहना ठीक है, मगर मुझ गूँगी के साथ तुम्हारी जिन्दगी खुशी से नहीं बीत सकती। हाँ, तुम्हारी मुहब्बत के बदले में तुम्हें अमीर किये देती हूँ, जिसके जरिये तुम खूबसूरत-से-खूबसूरत औरत ढूँढ़कर शादी कर सकते हो।

नानक-अफसोस, आज तुम इस तरह की नसीहत करने पर उतारू हुई और मेरी सच्ची मुहब्बत का कुछ खयाल न किया। मुझे धन-दौलत की परवाह नहीं और न मुझे तुम्हारे गूँगी होने का रंज है। बस, मैं इस बारे में ज्यादा बातचीत नहीं करना चाहता, या तो मुझे कबूल करो या साफ जवाब दो ताकि मैं इसी जगह तुम्हारे सामने अपनी जान देकर हमेशा के लिए छुट्टी पाऊँ। मैं लोगों के मुँह से यह नहीं सुनना चाहता कि 'रामभोली के साथ तुम्हारी मुहब्बत सच्ची न थी और तुम कुछ न कर सके।'

रामभोली—(गूंगी औरत): अभी मैं अपने कामों से निश्चिन्त नहीं हुई, जब आदमी बेफिक्र होता है तो शादी-ब्याह और हँसी-खुशी की बातें सूझती हैं, मगर इसमें शक नहीं कि तुम्हारी मुहब्बत सच्ची है और मैं तुम्हारी कद्र करती हूँ।

नानक-जब तक तुम अपने कामों से छुट्टी नहीं पातीं, मुझे अपने साथ रक्खो, मैं हर काम में तुम्हारी मदद करूँगा और जान तक दे देने को तैयार रहूँगा।

रामभोली-खैर, मैं इस बात को मंजूर करती हूँ, सिपाहियों को समझा दो कि बजरे को ले जायँ और इसमें जो चीजें हैं, अपनी हिफाजत में रक्खें, क्योंकि वह लोहे का डिब्बा भी जो तुम कल लाये थे, मैं इसी नाव में छोड़े जाती हूँ।

नानकप्रसाद खुशी के मारे ऐंठ गये। बाहर आकर सिपाहियों को बहुत-कुछ समझाने-बुझाने के बाद आप भी बदन पर हर्बे लगा हर तरह से लैस हो, साथ चलने को तैयार हो गए। रामभोली और नानक बजरे के नीचे उतरे। इशारा पाकर माँझियों ने बजरा खोल दिया और वह फिर बहाव की तरफ जाने लगा।

नानक को साथ लिये हुए रामभोली जंगल में घुसी। थोड़ी ही दूर जाकर वह एक ऐसी जगह पहुँची जहाँ बहुत-सी पगडण्डियाँ थीं वहां खड़ी होकर चारों तरफ देखने लगी। उसकी निगाह एक कटे हुए साखू के पेड़ पर पड़ी जिसके पत्ते सूखकर गिर चुके थे। वह उस पेड़ के पास जाकर खड़ी हो गई और इस तरह चारों तरफ देखने लगी जैसे कोई निशान ढूँढ़ती हो। उस जगह की जमीन बहुत पथरीली और ऊँची-नीची थी। लगभग पचास गज की दूरी पर एक पत्थर का ढेर नजर आया जो आदमी के हाथ का बनाया हुआ मालूम होता था। वह उस पत्थर के ढेर के पास गई और कुछ दम लेने या सुस्ताने के लिए बैठ गई। नानक ने अपना कमरबन्द खोला और एक पत्थर की चट्टान झाड़कर उसे बिछा दिया, रामभोली उसी पर जा बैठी और नानक को अपने पास बैठने का इशारा किया।

ये दोनों आदमी अभी सुस्ताये भी न थे कि सामने से एक सवार सुर्ख पोशाक पहने इन्हीं दोनों की तरफ आता हुआ दिखाई पड़ा। पास आने पर मालूम हुआ कि यह एक नौजवान औरत है जो बड़े ठाठ के साथ हर्के लगाये मर्दो की तरह घोड़े पर बैठी बहादुरी का नमूना दिखा रही है। वह रामभोली के पास आकर खड़ी हो गई और उस पर एक भेद वाली नजर डालकर हँसी। रामभोली ने भी उसकी हँसी का जवाब मुस्कराकर दिया और कनखियों से नानक की तरफ इशारा किया। उस औरत ने रामभोली को अपने पास बुलाया, और जब वह घोड़े के पास जाकर खड़ी हो गई तो आप घोड़े से नीचे उतर पड़ी। कमर से एक छोटा-सा बटुआ खोल एक चिट्ठी और एक अंगूठी निकाली जिस पर एक सुर्ख नगीना जड़ा हुआ था और रामभोली के हाथ में रख दिया।

रामभोली का चेहरा गवाही दे रहा था कि वह इस अँगूठी को पाकर हद से ज्यादा खुश हुई है। रामभोली ने इज्जत देने के ढँग पर उस अँगूठी को सिर से लगाया और इसके बाद अपनी उँगली में पहन लिया, चिट्ठी कमर में खोंसकर फुर्ती से उस घोड़े पर सवार हो गई और देखते-ही-देखते जंगल में घुसकर नजरों से गायब हो गई।

नानकप्रसाद यह तमाशा देख भौचक-सा रह गया, कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ा। न मुँह से कोई आवाज निकली और न हाथ के इशारे ही से कुछ पूछ सका, पूछता भी तो किससे? रामभोली ने तो नजर उठाके उसकी तरफ देखा तक नहीं। नानक बिल्कुल नहीं जानता था कि यह सुर्ख पोशाक वाली औरत कौन है जो यकायक यहाँ आ पहुँची और जिसने इशारेबाजी करके रामभोली को अपने घोड़े पर सवार कर भगा दिया। वह औरत नानक के पास आई और हँस के बोली-

औरत-वह औरत जो तेरे साथ थी, मेरे घोड़े पर सवार होकर चली गई, कोई हर्ज नहीं, मगर तू उदास क्यों हो गया? क्या तुझसे और उससे कोई रिश्तेदारी थी?

नानकप्रसाद-रिश्तेदारी थी तो नहीं, मगर होने वाली थी, तुमने सब चौपट कर दिया।

औरत-(मुस्कुरा कर) क्या उससे शादी करने की धुन समाई थी?

नानकप्रसाद-बेशक ऐसा ही था। वह मेरी हो चुकी थी, तुम नहीं जानतीं कि मैंने उसके लिए कैसी-कैसी तकलीफें उठाईं। अपने बाप-दादों की जमींदारी चौपट की और उसकी गुलामी करने पर तैयार हुआ।

औरत-(बैठ कर) किसकी गुलामी?

नानकप्रसाद-उसी रामभोली की, जो तुम्हारे घोड़े पर सवार होकर चली गई।

औरत-(चौंक कर) क्या नाम लिया? जरा फिर तो कहो!

नानकप्रसाद-रामभोली।

औरत-(हँस कर) बहुत ठीक, तू मेरी सखी अर्थात् उस औरत को कब से जानता है?

नानकप्रसाद—(कुछ चिढ़कर और मुँह बनाकर) उसे मैं लड़कपन से जानता हूँ, मगर तुम्हें सिवाय आज के कभी नहीं देखा, वह तुम्हारी सखी क्योंकर हो सकती है?

औरत-तू झूठा बेवकूफ और उल्लू बल्कि उल्लू का इत्र है! तू मेरी सखी को क्या जाने, जब तू मुझे नहीं जानता तो उसे क्योंकर पहचान सकता है?

उस औरत की बातों ने नानक को आपे से बाहर कर कर दिया। वह एकदम चिढ़ गया और गुस्से में आकर म्यान से तलवार निकालकर बोला-

नानकप्रसाद-कम्बख्त औरत, तू मुझे बेवकूफ बनाती है! जली-कटी बातें कहती है और मेरी आँखों में धूल डालना चाहती है! अभी तेरा सिर काटके फेंक देता हूँ!

औरत-(हँसकर) शाबाश, क्यों न हो, आप जवाँमर्द जो ठहरे! (नानक के मुँह के पास चुटकियाँ बजाकर) चेत ऐंठासिंह, जरा होश की दवा कर!

अब नानकप्रसाद बर्दाश्त न कर सका और यह कहकर कि 'ले, अपने किये का फल भोग!' उसने उस औरत पर तलवार का वार किया। औरत ने फर्ती से अपने को बचा लिया और हाथ बढ़ा नानक की कलाई पकड़ जोर से ऐसा झटका दिया कि तलवार उसके हाथ से निकलकर दूर जा गिरी और नानक आश्चर्य में आकर उसका मुंह देखने लगा। औरत ने हँस कर नानक से कहा, "बस, इसी जवाँमर्दी पर मेरी सखी से ब्याह करने का इरादा था! बस, जा और हिजड़ों में मिलकर नाचा कर!"

इतना कहकर औरत हट गई और पश्चिम की तरफ रवाना हुई। नानक का क्रोध अभी शान्त नहीं हुआ था। उसने अपनी तलवार, जो दूर पड़ी हुई थी, उठाकर म्यान में रख ली और कुछ सोचता हुआ तथा दाँत पीसता हुआ उस औरत के पीछे-पीछे चला। वह औरत इस इस बात से भी होशियार थी कि नानक पीछे से आकर धोखे में तलवार न मारे, वह कनखियों से पीछे की तरफ देखती जाती थी।

थोड़ी दूर जाने के बाद वह औरत एक कुएँ पर पहुँची जिसका संगीन चबूतरा एक पूर्से से कम ऊँचा न था। चारों तरफ चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। कआँ बहुत बड़ा और खूबसुरत था। वह औरत कुएँ पर चली गई और बैठ कर धीरे-धीरे कुछ गाने लगी।

समय दोपहर का था, धूप खूब निकली हुई थी, मगर इस जगह कुएँ के चारों तरफ घने पेड़ों की ऐसी छाया थी और ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी कि नानक की तबीयत खश हो गई। क्रोध, रंज और बदला लेने का ध्यान बिल्कुल ही जाता रहा, जिस पर उस औरत की सुरीली आवाज ने और भी रंग जमाया। वह उस औरत के सामने जाकर वैठ गया और उसका मुँह देखने लगा। दो ही तीन तान लेकर वह औरत चुप हो गई और नानक से बोली-

औरत—अब तू मेरे पीछे-पीछे क्यों घूम रहा है? जहाँ तेरा जी चाहे, जा और अपना काम कर। व्यर्थ समय क्यों नष्ट करता है? अब तुझे तेरी रामभोली किसी तरह नहीं मिल सकती, उसका ध्यान अपने दिल से दूर कर दे।

नानकप्रसाद-रामभोली झख मारेगी और मेरे पास आवेगी, वह मेरे कब्जे में है। उसकी एक ऐसी चीज मेरे पास है जिसे वह जीते-जी कभी नहीं छोड़ सकती।

औरत-(हँस कर) इसमें कोई शक नहीं कि तू पागल है। तेरी बातें सुनने से हँसी आती है। खैर तू जान तेरा काम जाने, मुझे इससे क्या मतलब!

इतना कहकर उस औरत ने कुएँ में झाँका और पुकार कर कहा, "कूपदेव, मुझे प्यास लगी है, जरा पानी तो पिलाना।"

औरत को बात सुनकर नानक घबराया और जी में सोचने लगा कि यह अजब औरत है जो कुएँ पर हुकूमत चलाती है और कहती है कि मुझे पानी पिला। यह औरत मुझे पागल कहती है, मगर मैं इसी को पागल समझता हूँ, भला कुआँ इसे क्योंकर पानी पिलायेगा? जो हो, मगर यह औरत बहुत खूबसूरत है और इसका गाना भी बहुत ही उम्दा है।

नानक इन बातों को सोच ही रहा था कि कोई चीज देख कर चौंक पड़ा, बल्कि घबरा कर उठ खड़ा हुआ और काँपते हुए तथा डरी हुई सुरत से कुएँ की तरफ देखने लगा। वह एक हाथ था जो चाँदी के कटोरे में साफ और ठंडा जल लिये हुए कुएँ के अन्दर से निकला और इसी को देखकर नानक घबरा गया था।

वह हाथ किनारे पर आया, उस औरत ने कटोरा ले लिया और जल पीने के बाद कटोरा उसी हाथ पर रख दिया, हाथ कुएँ के अन्दर चला गया और वह औरत फिर उसी तरह गाने लगी। नानक ने अपने जी में कहा, 'नहीं-नहीं, यह औरत पागल नहीं, बल्कि मैं ही पागल हूँ, क्योंकि इसे अभी तक न पहचान सका। बेशक यह कोई गन्धर्वी या अप्सरा है, नहीं-नहीं, देवता है जो रूप बदल कर आई है तभी तो इसके बदन में इतनी ताकत है कि मेरी कलाई पकड़ और झटका देकर इसने तलवार गिरा दी। मगर रामभोली से इसका परिचय कहाँ हुआ?"

गाते-गाते यकायक ही वह औरत उठ खड़ी हुई और बड़े जोर से चिल्लाकर उसी कुएं में कूद पड़ी।

७

लाल पोशाक वाली औरत की अद्भुत बातों ने नानक को हैरान कर दिया। वह घबराकर चारों तरफ देखने लगा और डर के मारे उसकी अजब हालत हो गई। वह उस कएँ पर भी ठहर न सका और जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता हुआ इस उम्मीद में गंगाजी की तरफ रवाना हुआ कि अगर हो सके तो किनारे-किनारे चलकर उस बजरे तक पहुँच जाय, मगर यह भी न हो सका, क्योंकि उस जंगल में बहुत-सी पगडण्डियाँ थीं जिन पर चलकर वह रास्ता भूल गया और किसी दूसरी ही तरफ जाने लगा।

नानक लगभग आधा कोस ही गया होगा कि प्यास के मारे बेचैन हो गया। वह जल खोजने लगा, मगर उस जंगल में कोई चश्मा या सोता ऐसा न मिला जिससे प्यास बुझाता। आखिर घूमते-घूमते उसे पत्तों की बनी एक झोंपड़ी नजर पड़ी जिसे वह किसी फकीर की कुटिया समझकर उसी तरफ चल पड़ा। मगर वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ कि उसने धोखा खाया। उस जगह कई पेड़ ऐसे थे जिनकी डालियाँ झुककर और आपस में मिलकर ऐसी हो रही थीं कि दूर से झोंपड़ी मालूम पड़ती थी, तो भी नानक के लिए वह जगह बहुत उत्तम सिद्ध हुई। क्योंकि उन्हीं पेड़ों में उसे एक चश्मा साफ पानी का बहता हुआ दिखाई पड़ा जिसके दोनों तरफ खुशनुमा सायेदार पेड़ लगे हुए थे जिन्होंने एक तौर पर उस चश्मे को भी अपने साये के नीचे कर रखा था। नानक खुशी-खुशी-खुशी चश्मे के किनारे पहुँचा और हाथ-मुँह धोने के बाद जल पीकर आराम करने के लिए बैठ गया।

थोड़ी देर चश्मे के किनारे बैठे रहने के बाद दूर से कोई चीज पानी में बह कर इसी तरफ आती हुई नानक ने देखी। पास आने पर मालूम हुआ कि कोई कपड़ा है। वह जल में उतर गया और कपड़े को खींच लाकर गौर से देखने लगा क्योंकि यह वही कपड़ा था जो बजरे से उतरते समय रामभोली ने अपनी कमर में लपेट रखा था।

नानक ताज्जुब में आकर देर तक उस कपड़े को देखता और तरह-तरह की बातें सोचता रहा। रामभोली उसके देखते-देखते घोड़े पर सवार हो चली गयी थी, फिर उसे क्योंकर विश्वास हो सकता था कि यह कपड़ा रामभोली का है। तो भी उसने कई दफे अपनी आँखें मलीं और उस कपड़े को देखा, आखिर विश्वास करना ही पड़ा कि यह रामभोली की ही चादर है। रामभोली से मिलने की उम्मीद में वह चश्मे के किनारे-किनारे रवाना हुआ, जबकि उसे इस बात का गुमान हुआ कि घोड़े पर सवार होकर चले जाने के बाद रामभोली जरूर इसी चश्मे के किनारे पहुँची होगी और किसी सबब से यह कपड़ा जल में गिर पड़ा होगा।

नानक चश्मे के किनारे-किनारे कोस-भर के लगभग चला गया और चश्मे के दोनों तरह सायेदार पेड़ मिलते गये, यहाँ तक कि दूर से उसे एक छोटे से मकान की सफेदी नजर आई। वह यह सोचकर खुश हुआ कि शायद इसी मकान में रामभोली से मुलाकात हो जाय। कदम बढ़ता हुआ तेजी से जाने लगा और थोड़ी देर में उस मकान के पास जा पहुँचा।

वह मकान चश्मे के बीचोंबीच में पुल के तौर पर बना हुआ था। चश्मा बहुत चौड़ा न था, उसकी चौड़ाई बीस-पचीस हाथ से ज्यादा न होगी। चश्मे के दोनों पार की जमीन इस मकान के नीचे आ गई थी और बीच में पानी बह जाने के लिए नहर की चौड़ाई के बराबर पुल की तरह का एक दर बना हुआ था। नानक इस मकान को देख कर बहुत ही खुश हुआ और सोचने लगा कि यह जरूर किसी मनचले शौकीन का बनवाया हुआ होगा। यहाँ से इस चश्मे और चारों तरफ के जंगल की बहार खूब ही नजर आती है। इस मकान के अन्दर चलकर देखना चाहिए, खाली है या कोई इसमें रहता है। नानक उस मकान के सामने की तरफ गया। उसकी कुर्सी बहुत ऊँची थी, पन्द्रह सीढ़ियां चढ़ने के बाद वह दरवाजे पर पहुंचा। दरवाजा खुला हुआ था, बेधड़क अन्दर घुस गया।

इस मकान के चारों कोनों में चार कोठरियाँ और चारों तरफ चार दालान बरामदों के तौर पर थे जिसके आगे कमर बराबर ऊँचा जंगला लगा हुआ था अर्थात् हरएक दालान की दोनों बगल कोठरियाँ पड़ती थीं और बीचोंबीच में एक भारी कमरा था। इस मकान में किसी तरह की सजावट न थी, मगर साफ था।

दरवाजे के अन्दर पैर रखते ही बीच वाले कमरे में बैठे हुए एक साधु पर नानक की निगाह पड़ी। वह मृगछाले पर बैठा हुआ था। उसकी उम्र अस्सी वर्ष से भी ज्यादा होगी। उसके बाल रुई की तरह सफेद हो रहे थे, लम्बे-लम्बे सिर के बाल सूखे और खुले रहने के सबब खूब फैले हुए थे, और दाढ़ी नाभि तक लटक रही थी। कमर में मूंज की रस्सी के सहारे कौपीन थी, और कोई कपड़ा उसके बदन पर न था, गले में जनेऊ पड़ा हुआ था और उसके दमकते हुए चेहरे पर बुजुर्गी और तपोबल की निशानी पाई जाती थी। जिस समय नानक की निगाह उस साधु पर पड़ी वह पद्मासन में बैठा हुआ ध्यान में था, आँखें बन्द थीं और हाथ जाँघों पर पड़े हुए थे। नानक उसके सामने जाकर देर तक खड़ा रहा, मगर उसे कुछ खबर न हुई। नानक ने सिर उठाकर चारों तरफ अच्छी तरह देखा, मगर सिवाय बड़ी-बड़ी दो तस्वीरों के, जिन पर पर्दा पड़ा हुआ था और जो साधु के पीछे की तरफ दीवार के साथ लगी हुई थीं, और कहीं कुछ दिखाई न पड़ा।

नानक को ताज्जुब हुआ और वह सोचने लगा कि इस मकान में किसी तरह का सामान नहीं है, फिर महात्मा का गुजर क्योंकर चलता होगा? और वे दोनों तस्वीरें कैसी हैं जिनका रहना इस मकान में जरूरी समझा गया! इसी फिक्र में वह चारों तरफ घूमने और देखने लगा। उसने हरएक दालान और कोठरी की सैर की, मगर कहीं एक तिनका भी नजर न आया। हाँ, एक कोठरी में वह नहीं जा सका, जिसका दरवाजा बन्द था, मगर जाहिर में कोई ताला या जंजीर उसके दरवाजे में दिखाई न दिया। मालूम नहीं, वह क्योंकर बन्द था। घूमता-फिरता नानक बगल के दालान में आया और बरामदे से झांक कर नीचे की बहार देखने लगा और इसी में उसने घण्टाभर बिता दिया।

घूम-फिरकर पुनः बाबाजी के पास गया, मगर उन्हें उसी तरह आँखें बन्द किए बैठा पाया। लाचार इस उम्मीद में एक किनारे बैठ गया कि आखिर कभी तो आँख खुलेगी। शाम होते-होते बगल की कोठरी में से, जिसका दरवाजा बन्द था और जिसके अन्दर नानक न जा सका था, शंख बजने की आवाज आई। नानक को बड़ा ही ताज्जुब हुआ, मगर उस आवाज ने साधु का ध्यान तोड़ दिया। आँखें खुलते ही नानक पर उसकी नजर पड़ी।

साधु-तू कौन है और यहाँ क्यों आया है?

नानक-मैं मुसाफिर हूँ और आफत का मारा भटकता हुआ इधर आ निकला। यहाँ आपके दर्शन हुए, दिल में बहुत-कुछ उम्मीदें पैदा हुई।

साधु-मनुष्य से किसी तरह की उम्मीद न रखनी चाहिए। खैर, यह बता, तेरा मकान कहाँ है और इस जंगल में, जहाँ आकर वापस जाना मुश्किल है, तू कैसे आया?

नानक-मैं काशी का रहने वाला हूँ। कार्यवश एक औरत के साथ, जो मेरे मकान के बगल ही में रहा करती थी, यहाँ आना हुआ। इस जंगल में उस औरत का साथ छूट गया और ऐसी विचित्र बातें देखने में आईं जिनके डर से अभी तक मेरा कलेजा काँप रहा है।

साधु-ठीक है, तेरा किस्सा बहुत बड़ा मालूम होता है जिसके सुनने की अभी मुझे फुरसत नहीं है। जरा ठहर, मैं एक काम से छुट्टी पा लूं तो तुझसे बातें करूं। घबराना नहीं, मैं ठीक एक घण्टे में आऊँगा।

इतना कहकर साधु वहाँ से चला गया। दरवाजे की आवाज और अन्दाज से नानक को मालूम हुआ कि साधु उसी कोठरी में गया जिसका दरवाजा बन्द था और जिसके अन्दर नानक नहीं जा सका था। लाचार नानक बैठा रहा मगर इस बात से कि साधु को आने में घण्टे भर की देर लगेगी, वह घबराया और सोचने लगा कि तब तक क्या करना चाहिए। यकायक उसका ध्यान उन दोनों तस्वीरों पर गया जो दीवार के साथ लगी हुई थीं! जी में आया कि इस समय यहाँ सन्नाटा है, साधु महाशय भी नहीं हैं, जरा पर्दा उठा कर देखें तो यह तस्वीर किसकी है। नहीं-नहीं, ऐसा न हो कि साधु आ जायँ, अगर देख लेंगे तो रंज होंगे, जिस तस्वीर पर पर्दा पड़ा हो, उसे बिना आज्ञा कभी न देखना चाहिए। लेकिन अगर देख ही लेंगे तो क्या होगा? साधु तो आप ही कह गए हैं कि हम घण्टे भर में आवेंगे, फिर डर किसका है?

नानक एक तस्वीर के पास गया और डरते-डरते पर्दा उठाया। उस तस्वीर पर निगाह पड़ते ही वह बड़े खौफ से चिल्ला उठा, हाथ से पर्दा गिर पड़ा, हाँफता हुआ पीछे हटा और अपनी जगह पर आकर बैठ गया। फिर यह हिम्मत न पड़ी कि दूसरी तस्वीर देखे।

वह तस्वीर दो औरतों और एक मर्द की थी। नानक उन तीनों को पहचानता था। एक औरत तो रामभोली और दूसरी वह थी जिसके घोड़े पर सवार होकर रामभोली चली गई थी और जो नानक के देखते-देखते कुएँ में कूद पड़ी थी, तीसरी तस्वीर नानक के पिता की थी। उस तस्वीर का भाव यह था कि नानक का पिता जमीन पर पड़ा हुआ था, दूसरी औरत उसके सिर के बाल पकड़े हुए थी, रामभोली उसकी छाती पर सवार गले पर छुरी फेर रही थी। इस तस्वीर को देखकर नानक की अजब हालत हो गई। वह एक दम घबरा उठा और बीती हुई बातें उसकी आँखों के सामने इस तरह मालूम होने लगी जैसे आज हुई हैं। अपने बाप की हालत याद कर उसकी आँखें डबडबा आई और कुछ देर तक सिर नीचा किए वह कुछ सोचता रहा। आखिर में उसने एक लम्बी साँस ली और सिर "ओफ! क्या मेरा बाप इन औरतों के हाथ से मारा गया? नहीं, कभी नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मगर इस तस्वीर में ऐसी अवस्था क्यों दिखाई गई है? बेशक दूसरी तरफ वाली तस्वीर भी कुछ ऐसे ही ढंग की होगी और उसका भी सम्बन्ध कुछ मुझ ही से होगा। जी घबराता है, यहाँ बैठना मुश्किल है!" इतना कह नानक उठ खड़ा हुआ और बाहर बरामदे में जाकर टहलने लगा। सूर्य बिल्कुल अस्त हो गये, शाम की पहली अँधेरी चारों तरफ फैल गई और धीरे-धीरे अंधकार का नमूना दिखाने लगी। इस मकान में भी अँधेरा हो गया और नानक सोचने लगा कि यहाँ रोशनी का कोई सामान दिखाई नहीं पड़ता। क्या बाबाजी अँधेरे में ही रहते हैं? ऐसा सुन्दर साफ मकान मगर बालने के लिए दीया तक नहीं और सिवाय एक मृगछाला के, जिस पर बाबाजी बैठते हैं, एक चटाई तक नजर नहीं आती। शायद इसका सबब यह हो कि यहाँ की जमीन बहुत सीफ, चिकनी और धोई हुई है।

इस तरह के सोच-विचार में नानक को दो घण्टे बीत गए। यकायक उसे याद आया कि बाबाजी एक घण्टे का वादा करके गये थे, अब वह अपने ठिकाने आ गये होंगे और वहाँ मुझे न देख न मालूम क्या सोचते होंगे। बिना उनसे मिले और बातचीत किए यहाँ का कुछ हाल मालूम न होगा, चलूँ, देखू तो सही, वे आ गये या नहीं।

नानक उठकर उस कमरे में गया जिसमें बाबाजी से मुलाकात हुई थी, मगर वहाँ सिवाय अंधकार के और कुछ दिखाई न पड़ा। थोड़ी देर तक उसने आँखें फाड़-फाड़ कर अच्छी तरह तरह देखा मगर कुछ मालूम न हुआ। लाचार हो उसने पुकारा–– "बाबाजी!" मगर कुछ जवाब न मिला, उसने और दो दफे पुकारा, मगर कुछ फल न हुआ। आखिर टटोलता हुआ बाबाजी के मृगछाले तक गया, मगर उसे खाली पाकर लौट आया और बाहर बरामदे में, जिसके नीचे चश्मा बह रहा था, आकर बैठ रहा।

घण्टे भर तक चुपचाप सोच-विचार में बैठे रहने के बाद बाबाजी से मिलने की उम्मीद में वह फिर उठा और उस कमरे की तरफ चला। अबकी उसने कमरे का दरवाजा भीतर स बन्द पाया, ताज्जुब और खौफ से काँपता हुआ फिर लौटा और बरामदे में अपने ठिकाने आकर बैठ रहा। इसी फेर में पहर भर से ज्यादा रात गुजर गई और चारों तरफ से जंगल में बोलते हुए दरिन्दे जानवरों की आवाजें आने लगी जिनके खौफ से वह इस लायक न रहा कि मकान के नीचे उतरे, बल्कि बरामदे में रहना भी उसने नापसन्द किया और बगल वाली कोठरी में घुसकर किवाड़ बन्द करके सो रहा। नानक आज दिन भर भूखा रहा और इस समय भी उसे खाने को कुछ न मिला, फिर भला नींद क्यों अनि लगी थी। इसके अतिरिक्त उसने दिन भर में ताज्जुब पैदा करने वाली कई तरह की बातें देखी और सुनी थीं, जो अभी तक उसकी आँखों के सामने घूम रही थीं और नींद की बाधक हो रही थीं। आधी रात बीतने पर उसने और भी ताज्जुब की बातें देखीं।

रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी थी जब नामक के कानों में दो आदमियों की बातचीत की आवाज आई। वह गौर से सुनने लगा क्योंकि जो कुछ बातचीत हो रही थी उसे वह अच्छी तरह सुन और समझ सकता था। नीचे लिखी बातें उसने सुनी, आवाज बारीक होने से नानक ने समझा कि वे दोनों औरतें हैं––

एक––नानक ने इश्क को दिल्लगी समझ लिया।

दूसरी––इस कम्बख्त को सूझी क्या जो अपना घर-बार छोड़कर इस तरह एक औरत के पीछे निकल पड़ा?

एक––यह तो उसी से पूछना चाहिए।

दूसरी––बाबाजी ने उससे मिलना मुनासिब न समझा। मालूम नहीं, इसका क्या सबब है।

एक––जो हो, मगर यह नानक आदमी बहुत ही होशियार और चालाक है, ताज्जुब नहीं कि उसने जो कुछ इरादा कर रक्खा है, उसे पूरा करे!

दूसरी––यह जरा मुश्किल है, मुझे उम्मीद नहीं कि रानी इसे छोड़ दे क्यों कि वह इसके खून की प्यासी हो रही है। हाँ, अगर यह उस बजरे पर पहुँच कर वह डिब्बा अपने कब्जे में कर ले, तो फिर इसका कोई कुछ न कर सकेगा।

एक––(हँस कर, जिसकी आवाज नानक ने अच्छी तरह सुनी) यह तो हो नहीं सकता।

दूसरी––खैर, इन बातों से अपने को क्या मतलब? हम लौंडियों में इतनी अक्ल कहाँ कि इन बातों पर बहस करें।

एक––क्या लौंडी होने से अक्ल में बट्टा लग जाता है?

दूसरी––नहीं, मगर असली बातों की लौंडियों को खबर ही कब होती है!

एक––मुझे तो खबर है।

दूसरी––सो क्या?

एक––यही कि दम-भर में नानक गिरफ्तार कर लिया जायेगा। बस अब बात-चीत करना मुनासिब नहीं, हरिहर आता ही होगा।

इसके बाद फिर नानक ने कुछ न सुना मगर इन बातों ने उसे परेशान कर दिया, डर के मारे काँपता हुआ उठ बैठा और चुपचाप यहाँ से भाग चलने पर मुस्तैद हुआ धीरे से किवाड़ खोलकर कोठरी के बाहर आया, चारों तरफ सन्नाटा था। इस मकान से बाहर निकलकर जंगल में भालू, चीते या शेर के मिलने का डर जरूर था मगर इस में रहकर उसने बचाव की कोई सूरत न समझी, क्योंकि उन दोनों औरतों की बातों ने उसे हर तरह से निराश कर दिया था। हाँ बजरे पर पहुँच उस डिब्बे पर कब्जा कर लेने के खयाल ने उसे बेबस कर दिया था और जहाँ तक जल्द हो सके, बजरे तक पहुँचना उसने अपने लिए उत्तम समझा।

नानक बरामदे से होता हुआ सदर दरवाजे पर आया और सीढ़ी के नीचे उतरना ही चाहता था कि दूसरे दालान में से झपटते हुए कई आदमियों ने आकर उसे गिरफ्तार कर लिया। उन आदमियों ने जबर्दस्ती नानक की आँखें चादर से बाँध दीं और कहा, "जिधर हम ले चलें, चुपचाप चला चल, नहीं तो तेरे लिए अच्छा न होगा।" लाचार नानक को ऐसा ही करना पड़ा।

नानक की आँखें बन्द थीं और हर तरह से लाचार था, तो भी वह रास्ते की चलाई पर खूब ध्यान दिये हुए था। आधे घण्टे तक वह बराबर चलता गया, पत्तों की खड़खड़ाहट और जमीन की नमी से उसने जाना कि वह जंगल ही जंगल जा रहा है। इसके बाद एक ड्यौढ़ी लाँघने की नौबत आई और उसे मालूम हुआ कि वह किसी फाटक के अन्दर जाकर पत्थर पर या किसी पक्की जमीन पर चल रहा है। वहाँ से कई दफे बाईं और दाहिनी तरफ घूमना पड़ा। बहुत देर बाद फिर एक फाटक के लाँघने की नौबत आई और फिर उसने अपने को कच्ची जमीन पर चलते हुए पाया। कोस भर जाने के बाद फिर एक चौखट लाँघ कर पक्की जमीन पर चलने लगा। यहाँ पर नानक को विश्वास हो गया कि रास्ते का भुलावा देने के लिए मुझे बेफायदे घुमाया जा रहा है। ताज्जुब नहीं कि यह वही जगह हो जहाँ पहले आ चुके हैं।

थोड़ी दूर जाने के बाद नानक सीढ़ी पर चढ़ाया गया। बीस-पचीस सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद फिर नीचे उतरने की नौबत आई और सीढ़ियाँ खतम होने के बाद उसकी आँखें खोल दी गईं।

नानक ने अपने को एक विचित्र स्थान में पाया। उसकी पीठ की तरफ एक ऊँची दीवार और सीढ़ियाँ थीं, सामने की तरफ खुशनुमा बाग था जिसके चारों तरफ ऊँची दीवारें थीं और उसमें रोशनी बखूबी हो रही थी। फलों के कलमी पेड़ों में लगी शीशे की छोटी-छोटी कन्दीलों में मोमबत्तियाँ जल रही थीं और बहुत से आदमी भी घूमते-फिरते दिखाई दे रहे थे। बाग के बीचोंबीच एक आलीशान बँगला था। नानक वहाँ पहुँचाया गया और उसने आसमान की तरफ देख कर मालूम किया कि अब रात बहुत थोड़ी रह गई है।

यद्यपि नानक बहुत होशियार, चालाक, बहादुर और ढीठ था, मगर इस समय बहुत ही घबराया हुआ था। उसके ज्यादा घबराने का सबब यह था कि उसके हरबे छीन लिये गए थे और वह इस लायक न रह गया कि दुश्मनों के हमला करने पर उनका मुकाबला करे या किसी तरह अपने को बचा सके। हाँ, हाथ-पैर खुले रहने के सबब नानक इस खयाल से भी बेफिक्र न था कि अगर किसी तरह भागने का मौका मिले तो भाग जाय।

बाहर ही से मालूम हुआ कि मकान में रोशनी बखूबी हो रही है। बाहर के सहन में कई दीवारगीरें जल रही थीं और चोबदार हाथ में सोने का आसा लिये नौकरी अदा कर रहे थे। उन्हीं के पास नानक खड़ा कर दिया गया और वे आदमी, जो उसे गिरफ्तार कर के लाए थे और गिनती में आठ थे, मकान के अन्दर चले गये मगर चोबदार से यह कहते गये कि इस आदमी से होशियार रहना, हम सरकार में खबर करने जाते हैं। नानक को आधे घण्टे तक वहाँ खड़ा रहना पड़ा।

जब वे लोग, जो गिरफ्तार कर लाये थे और खबर करने के लिए अन्दर गये थे, लौटे तो नानक की तरफ देखकर बोले, "इत्तिला कर दी गई, अब तू अन्दर चला जा।"

नानक––मुझे क्या मालूम है कि कहाँ जाना होगा और रास्ता कौन है?

एक––यह मकान तुझे आप ही रास्ता बतावेगा, पूछने की जरूरत नहीं!

लाचार नानक ने चौखट के अन्दर पैर रक्खा और अपने को तीन दर के एक दालान में पाया। घूम कर पीछे की तरफ देखा तो वह दरवाजा बन्द हो गया था जिस राह से इस दालान में आया था। उसने सोचा कि वह इसी जगह में कैद हो गया और अब नहीं निकल सकता, यह सब कार्रवाई केवल इसी के लिए थी। मगर नहीं, उसका विचार ठीक न था, क्योंकि तुरन्त ही उसके सामने का दरवाजा खुला और उधर रोशनी मालूम होने लगी। डरता हुआ नानक आगे बढ़ा और चौखट के अन्दर पैर रक्खा ही था कि दो नौजवान औरतों पर नजर पड़ी जो साफ और सुथरी पोशाक पहने हुए थीं, दोनों ने नानक के दोनों हाथ पकड़ लिये और साथ ले चलीं।

नानक डरा हुआ था, मगर उसने अपने दिल को काबू में रखा, तो भी उसका कलेजा उछल रहा था और दिल में तरह-तरह की बातें पैदा हो रही थीं। कभी तो वह अपनी जिन्दगी से नाउम्मीद हो जाता, कभी यह सोचकर कि मैंने कोई कसुर नहीं किया, उसे ढाढ़स होता और कभी सोचता कि जो कुछ होना है वह तो होगा ही, गर किसी तरह उन बातों का पता तो लगे जिनके जाने बिना जी बेचैन हो रहा है कल से जो-जो बातें ताज्जुब की देखने में आई हैं, जब तक उनका असल भेद नहीं खुलता, मेरे हवास दुरुस्त नहीं होते।

वे दोनों औरतें उसे कई दालानों और कोठरियों में घुमाती-फिराती एक ऐनी बारहदरी में ले गईं जिसमें नानक ने कुछ अजब ही तरह का समाँ देखा। यह बारहदरी अच्छी तरह से सजी हुई थी और यहाँ रोशनी भी बखूबी हो रही थी। दरबार का सारा साज-सामान यहाँ मौजूद था। बीच में जड़ाऊ सिंहासन पर एक नौजवान औरत दक्षिणी ढंग की बेशकीमत पोशाक पहने सिर से पैर तक जड़ाऊ जेवरों से लदी हुई बैठी थी। अपनी जिन्दगी में नानक ने ऐसी खूबसूरत औरत कभी नहीं देखी थी। उसे इस बात का विश्वास होना मुश्किल हो गया कि यह औरत इस लोक की रहने वाली है। उसके दाहिनी तरफ सोने की चौकी पर मृगछाला बिछाए हुए वही साधु बैठा था, जिसे नानक ने शाम को नहर वाले कमरे में देखा था। साधु के बाद गोलाकार बीस जड़ाऊ कुर्सियाँ और थीं जिन पर एक से एक बढ़ के खूबसूरत औरतें दक्षिणी ढंग की पोशाक पहने ढाल-तलवार लगाये बैठी थीं। सिंहासन के बाईं तरफ छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर रामभोली को उन्हीं लोगों की सी पोशाक पहने ढाल-तलवार लगाये बैठी देख नानक के ताज्जुब की कोई हद न रही, मगर साथ ही इसके यह विश्वास भी हो गया कि अब उसकी जान नहीं जाती। रामभोली की बगल में जड़ाऊ कुर्सी पर वह औरत बैठी थी जिसने नानक के सामने से रामभोली को घोड़े पर भगा दिया था। उसके बाद बीस जड़ाऊ कुर्सियों पर बीस नौजवान औरतें उसी ठाठ से बैठी हुई थीं जैसी सिंहासन के दाहिनी तरफ थीं।

सामने की तरफ बीस औरतें ढाल-तलवार लगाये, जड़ाऊ आसा हाथ में लिये अदब से अपने सिर झुकाए इशारे पर हुक्म बजाने के तैयार दुपट्टी खड़ी थीं, जिनके बीच में नानक को ले जाकर खड़ा कर दिया गया।

इस दरबार को देख कर नानक की आँखों में चकाचौंध-सी आ गई। वह एक दम घबड़ा उठा और अपने चारों तरफ देखने लगा। इस बारहदरी की जिस चीज पर भी उसकी नजर पड़ती, उसे लासानी पाता। नानक एक बडे अमीर बाप का लड़का था और बड़े-बड़े राजदरबारों को देख चुका था, मगर उसकी आँखों ने यहाँ जैसी चीजें देखों वैसी स्वप्न में भी न देखी थीं। आलों (ताकों) पर जो गुलदस्ते सजाए हुए थे वे बिल्कुल बनावटी थे और उनमें फूल-पत्तियों की जगह पर बेशकीमत जवाहिरात काम में लाये गये थे। केवल इन गुलदस्तों ही को देखकर नानक ताज्जुब करता था कि इतनी दौलत इन लोगों के पास कहाँ से आई! इसके अतिरिक्त और जितनी चीजें सजावट की वहाँ थीं, सभी इस योग्य थीं कि जिनका मिलना मनुष्यों को बहुत ही कठिन समझना चहिए। उन औरतों की पोशाक और जेवरों का अन्दाज करना तो ताकत से बाहर था।

सब तरफ से घूम-फिर कर नानक की आँखें रामभोली की तरफ जा कर अटक गई और वह एकटक उसकी सूरत देखने लगा।

उस औरत ने जो बड़े रोब के साथ जड़ाऊ सिंहासन पर बैठी हुई थी, एक नजर सिर से पैर तक नानक को देखा और फिर रामभोली की तरफ आँखें फेरी। रामभोली तुरन्त अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और सामने की तरफ हटकर सिंहासन की बगल में खड़ी हो हाथ जोड़कर बोली, "यदि आज्ञा हो तो हुक्म के मुताबिक कार्रवाई की जाये? इसके जवाब में उस औरत ने, जिसे महासनी कहना उचित है, बड़े गरूर के साथ सिर हिलाया, अर्थात् मना किया और उस दूसरी की तरफ देखा जो रामभोली की बगल में बैठी थी।

यह बात नानक के लिए बड़े ताज्छुब की थी। आज उसके कानों ने एक ऐसी आवाज सुनी जो कभी सुनी न थी और न सुनने की उम्मीद थी। एक तो यही ताज्जुब की बात कि जो रामभोली उसके पड़ोस में रहती थी, जिसे नानक लड़कपन से जानता था और सिवाय उस दिन के, जिस दिन बजरे पर सवार हो सफर में निकली, जिसे कभी अपना घर छोड़ते नहीं देखा था और न कभी जिसके माँ-बाप ने उसे अपनी आँखों से दूर किया था, आज इस जगह ऐसी अवस्था और ऊँचे दर्जे पर दिखाई दी। दूसरे, जो रामभोली जन्म से गूँगी थी, जिसके माँ-बाप ने भी कभी उसे बोलते नहीं सुना, आज इस तरह उसके मुँह से मीठी आवाज निकल रही है! इस आवाज ने नानक के दिल के साथ क्या काम किया, इसे वही जानता होगा। इस बात को नानक क्योंकर समझ सकता था कि जिस समभोली ने कभी घर से बाहर पैर नहीं निकाला वह इन लोगों में आपस के तौर क्यों पाई जाती है और ये सब औरतें कौन हैं!

नानक को इन सब बातों को अच्छी तरह सोचने का मौका न मिला। वह दूसरी औरत, जो रामभोली के बगल में कुर्सी पर बैठी हुई थी और जिसको नानक ने पहले भी देखा था, इशारा पाते ही उठ खड़ी हुई और कुछ आगे बढ़कर नानक से बातचीत करने लगी।

औरत––नानकप्रसाद, इसके कहने की तो जरूरत नहीं कि तुम मुजरिम बनाकर यहाँ लाये गये हो और तुम्हें किसी तरह की सजा दी जायगी।

नानक––हाँ, बेशक मैं मुजरिम बनाकर लाया गया हूँ मगर असल में मुजरिम नहीं हूँ और न मैंने कोई कसूर ही किया है।

औरत––तुम्हारा कसूर यही है कि तुमने वह बड़ी तस्वीर, जो बाबाजी के कमरे में थी और जिस पर पर्दा पड़ा हुआ था, बिना आज्ञा के देखी। क्या तुम यह नहीं जानते कि जिस तस्वीर पर पर्दा पड़ा हो, उसे बिना आज्ञा के नहीं देखना चाहिए?

नानक––(कुछ सोच कर) बेशक यह कसूर तो हुआ।

औरत––हमारे यहाँ का कानून यही है कि जो ऐसा कसूर करे, उसका सिर काट लिया जाय।

नानक––अगर ऐसा कानून है तो इसे जुल्म ही कहना चाहिए!

औरत––जो हो, मगर अब तुम किसी तरह बच नहीं सकते।

नानक––खैर, मैं मरने से नहीं डरता और खुशी से मरना कबूल करता हूँ यदि आप मुझे मेरे कुछ सवालों का जवाब दे दें!

औरत––तुम मरने से तो किसी तरह इनकार नहीं कर सकते, मगर मेहरबानी करके तुम्हारे एक सवाल का जवाब मिल सकता है। ज्यादा सवाल तुम नहीं कर सकते। पूछो, क्या पूछते हो?

नानक––(कुछ देर तक सोच कर) खैर, जब एक ही सवाल का जवाब मिल सकता है तो मैं यह पूछता हूँ कि (रामभोली की तरफ इशारा करके) यह यहाँ क्योंकर आईं और यहाँ इन्हें इतनी बड़ी इज्जत क्योंकर मिली?

औरत––ये तो दो सवाल हुए! अच्छा, इनमें से एक सवाल का जवाब यह दिया जाता है कि जिसके बारे में तुम पूछते हो, वह हमारी महारानी की छोटी बहिन हैं और यही सबब है कि उनके बगल में सिंहासन के ऊपर बैठी हैं।

नानक––मुझे क्योंकर विश्वास हो कि तुम सच कहती हो?

औरत––मैं धर्म की कसम खाकर कहती हूँ कि यह बात झूठ नहीं है। मानने न मानने का तुम्हें अख्तियार है!

नानक––खैर, अगर ऐसा है तो मैं किसी प्रकार मरना पसन्द नहीं करता।

औरत––(हँस कर) मरना पसन्द न करने से क्या तुम्हारी जान छोड़ दी जायगी?

नानक––बेशक ऐसा ही है। जब तक मैं मरना न मंजूर करूँगा, तुम लोग मुझे मार नहीं सकतीं।

औरत––यह तो हम लोग जानते हैं कि तुम एक भारी कुदरत रखते हो और उसके सबब से बड़े-बड़े काम कर सकते हो, मगर इस जगह तुम्हारे किये कुछ नहीं हो सकता। हाँ, एक बात अगर तुम कबूल करो तो तुम्हारी जान छोड़ दी जायगी, बल्कि इनाम के तौर पर तुम जो माँगोगे, सो दिया जायगा।

नानक––वह क्या?

औरत––कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की जान, जो तुम्हारे कब्जे में है, वह महारानी के कब्जे में दे दो।

नानक––(क्रोध के मारे लाल आँखें निकाल कर) कम्बख्त, खबरदार! फिर ऐसी बात जुबान पर भी न लाना! मैं नहीं जानता था कि ऐसी खूबसूरत मण्डली कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की दुश्मन निकलेगी। तुझ ऐसी हजारों को मैं उन पर न्यौछावर करता हूँ! बस, मालूम हो गया कि तुम लोग सिर्फ कठपुतलियाँ हो। किसकी ताकत है जो मुझे मारे या मेरे साथ किसी तरह की जबर्दस्ती करे!

उस औरत का चेहरा नानक की तरह यह बात सुनकर क्रोध के मारे लाल हो गया, बल्कि और औरतें भी जो वहाँ मौजूद थीं, नानक की दबंगता देख क्रोध के मारे काँपने लगीं, मगर महारानी के चेहरे पर क्रोध की निशानी न थी।

औरत––(तलवार खींचकर) बेशक अब तुम मारे जाओगे। बीस-बीस मदों की ताकत (कुर्सियों की तरफ इशारा करके) इन एक-एक औरत में और मुझमें है। यह न समझना कि तुम्हारे हाथ-पैर खुले हैं तो कुछ कर सकोगे। क्या भूल गये कि मैंने तुम्हारे हाथ से तलवार गिरा दी थी?

नानक––इतनी ही ताकत अगर तुम लोगों में है तो दोनों कुमारों की जान मुझसे क्यों माँगती हो? खुद जाकर उन लोगों का सिर क्यों नहीं काट लाती?

औरत––कोई खास सबब है कि हम लोग अपने हाथ से इस काम को नहीं करतीं, कर भी सकती हैं मगर देर होगी, इसलिए तुमसे कहती हैं। अब भी मंजूर करो, नहीं तो मैं जान लिए बिना न छोड़ेंगी।

नानक––(रामभोली की तरफ इशारा करके) उस औरत की जान, जिसे तुम महारानी की बहिन बताती हो, मेरे कब्जे में है, जरा इसका भी खयाल करना।

इतना सुनते ही रामभोली अपनी जगह से उठी और बोली, "यह कभी न समझना कि वह डिब्बा, जिसे तुम लाये थे, मैं बजरे में ही छोड़ आई और वह तुम्हारे या तुम्हारे सिपाहियों के कब्जे में है। मैंने उसे गंगा जी में फेंक दिया था और अब मंगा लिया, (हाथ का इशारा करके) देखो, उस कोने में छत से लटक रहा है।"

नानक घूम कर देखा और छत से उस डिब्बे को लटकता पाया। यह देख वह एकदम घबरा गया, उसके होश-हवास जाते रहे, उसके मुँह से एक चीख की आवाज निकली और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।

आधी घड़ी तक नानक बेहोश पड़ा रहा। इसके बाद जब वह होश में आया, उसमें खड़े होने की ताकत न थी। वह बैठा-बैठा इस तरह सोचने लगा जैसे कि अब वह जिन्दगी से बिल्कुल ही नाउम्मीद हो चुका हो। वह औरत नंगी तलवार लिए अभीतक उसके पास खड़ी थी। एकाएक भी नानक को कोई बात याद आई जिससे उसकी हालत बिल्कुल ही बदल गई, गई हुई ताकत बदन में फिर से लौट आई और वह यह कहता हुआ कि 'मैं व्यर्थ ही सोच में पड़ा हूँ', उठ खड़ा हुआ तथा उस औरत से फिर बातचीत करने लगा।

नानक––नहीं-नहीं, मैं कभी नहीं मर सकता।

औरत––अब तुम्हें बचाने वाला कौन है?

नानक––(रामभोली की तरफ देख के) उस कोठरी की ताली, जिसमें किसी के खून से लिखी हुई पुस्तक रखी है।

इतना सुनते ही रामभोली चौंकी। उसका चेहरा उतर गया, सिर घूमने लगा, और वह यह कहती हुई सिंहासन की बगली पर झुक गई, "आह, गजब हो गया! भूल हुई! वह ताली तो उसी जगह छूट गई! कम्बख्त, तेरा बुरा हो, मुझे जबर्दस्ती अ···प···ने···हा···थ!"

केवल रामभोली ही की ऐसी दशा नहीं हुई बल्कि वहाँ जितनी औरतें थीं सभी का चेहरा पीला पड़ गया, खून की लाली जाती रही और सब की सब एकटक नानक की तरफ देखने लगीं। अब नानक को भी विश्वास हो गया कि उसकी जान बच गई, जो कुछ उसने सोचा था, वह ठीक निकला। कुछ देर ठहर कर नानक फिर बोला––

नानक––उस किताब को मैं पढ़ भी चुका हूँ बल्कि एक दोस्त को भी इस काम में अपना साथी बना चुका हूँ। यदि तीन दिन के अन्दर मैं उससे न मिलूँगा तो वह जरूर कोई काम शुरू कर देगा।

नानक की इस बात ने सभी की बेचैनी और बढ़ा दी। महारानी ने आँखों में आँसू भरकर अपनी बगल में बैठे बाबाजी की तरफ इस ढंग से देखा जैसे वह अपनी जिन्दगी से निराश हो चुकी हो। बाबाजी ने इशारे से उसे ढाढ़स दिया और नानक की तरफ देखकर कहा––

बाबा––शाबाश बेटे, तुमने खूब काम किया! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, चेला बनाने के लिए मैं भी किसी ऐसे चतुर आदमी को ढूँढ़ रहा था!

इतना कहकर बाबाजी उठे और नानक का हाथ पकड़कर दूसरी तरफ ले चले। बाबाजी का हाथ इतना कड़ा था कि नानक की कलाई दर्द करने लगी, उसे मालूम हुआ मानो लोहे के हाथ ने उसकी कलाई पकड़ी हो जो किसी तरह नर्म या ढीला नहीं हो सकता। साफ सवेरा हो चुका था बल्कि सूर्य की लालिमा ने बाग के खुशनुमा पेड़ों की ऊपर वाली टहनियों पर अपना दखल जमा लिया था जब बाबाजी नानक को लिए एक कोठरी के दरवाजे पर पहुँचे जिसमें ताला लगा हुआ था। बाबाजी ने दूसरे हाथ से एक ताली निकाली जो उनकी कमर में थी और उस कोठरी का ताला खोलकर नानक को उसके अन्दर धकेल दिया और फिर दरवाजा बन्द करके ताला लगा दिया।

चाहे दिन निकल चुका हो, मगर उस कोठरी के अन्दर नानक को रात ही का समाँ नजर आया। बिल्कुल अँधेरा था, कोई सूराख भी ऐसा नहीं था जिससे किसी तरह की रोशनी पहुँचती। नानक को यह भी नहीं मालूम हो सकता था कि यह कोठरी कितनी बड़ी है, हाँ उस कोठरी की पत्थर की जमीन इतनी सर्द थी कि घण्टे भर में ही नानक के हाथ-पैर बेकार हो गए। घण्टे भर बाद नानक को चारों तरफ की दीवार दिखाई देने लगी। मालूम हुआ कि दीवारों में से किसी तरह की चमक निकल रही है और वह चमक धीरे-धीरे बढ़ रही है। यहाँ तक कि थोड़ी देर में वहाँ अच्छी तरह उजाला हो गया और उस जगह की हरएक चीज साफ दिखाई देने लगी।

यह कोठरी बहुत बड़ी न थी। इसके चारों कोनों में हड्डियों के ढेर लगे थे, चारों तरफ दीवारों में पुरसे भर ऊँचे चार मोखे (छेद) थे जो बहुत बड़े न थे, मगर इस लायक थे कि आदमी का सिर उनके अन्दर जा सके। नानक ने देखा कि उसके सामने की तरफ वाले (मोखे) में कोई चीज चमकती हुई दिखाई दे रही है। बहुत गौर करने पर थोड़ी देर बाद मालूम हुआ कि वे बड़ी-बड़ी दो आँखें हैं जो उसी की तरफ देख रही हैं।

उस अंधेरी कोठरी में धीरे-धीरे चमक पैदा होने और उजाला हो जाने से ही नानक डरा था, अब उन आँखों ने और भी डरा दिया। धीरे-धीरे नानक का डर बढ़ता ही गया क्योंकि उसने कलेजा दहलाने वाली और भी कई बातें यहाँ पाईं।

हम ऊपर लिख आये हैं कि उस कोठरी की जमीन पत्थर की थी। धीरे-धीरे यह जमीन गर्म होने लगी जिससे नानक के बदन में हरारत पहुँची और वह सर्दी जिसके सबब से वह लाचार हो गया था, जाती रही। आखिर वहाँ को जमीन यहाँ तक गर्म हुई कि नानक को अपनी जगह से उठना पड़ा मगर कहाँ जाता! उस कोठरी की तमाम जमीन एक-सी गरम हो रही थी, वह जिधर जाता उधर ही पैर जलता था। नानक का ध्यान फिर मोखे की तरफ गया जिसमें चमकती हुई आँखें दिखाई दी थी, क्योंकि इस समय उसी मोखे में से एक हाथ निकालकर नानक की तरफ बढ़ रहा था। नानक दबक कर एक कोने में हो रहा जिसमें वह हाथ उस तक न पहुँचे, मगर हाथ बढ़ता ही गया यहाँ तक कि उसने नानक की कलाई पकड़ ली।

न मालूम वह हाथ कैसा था जिसने नानक की कलाई मजबूती से थाम ली। बदन के साथ छूते ही एक तरह की झुनझुनी पैदा हुई और बात की बात में इतनी बढ़ी कि नानक अपने को किसी तरह सम्हाल न सका और न उस हाथ से अपने को छुड़ा ही सका, यहाँ तक कि वह बेहोश होकर अपने आपको बिल्कुल भूल गया। जब नानक होश में आया, उसने अपने आपको गंगा के किनारे उसी जगह पाया जहाँ वह रामभोली के साथ बजरे से उतरा था। बगल में पक्के केले का एक घौद भी रखा देखा। दिन बहुत कम बाकी था और सूर्य भगवान अस्ताचल की तरफ जा रहे थे।

८

अब हम फिर उस महारानी के दरबार का हाल लिखते हैं, जहाँ से नानक निकाला जाकर गंगा के किनारे पहुँचाया गया था।

नानक को कोठरी के अन्दर धकेल कर बाबाजी लौटे तो महारानी के पास न जाकर दूसरी ही तरफ रवाना हुए और एक बारहदरी में पहुँचे। वहाँ कई आदमी बैठे कुछ काम कर रहे थे। बाबाजी को देखते ही वे लोग उठ खड़े हुए। बाबाजी ने उन लोगों की तरफ देख कर कहा, "नानक को मैं ठिकाने पहुँचा आया हूँ, बड़ा भारी ऐयार निकला, हम लोग उसका कुछ न कर सके। खैर, उसे गंगा किनारे उसी जगह पहुँचा दो जहाँ बजरे से उतरा था, उसके लिए कुछ खाने की चीज भी वहाँ रख देना।" इतना कहकर बाबाजी वहाँ लौटे और महारानी के पास पहुँचे। इस समय महारानी का दरबार उस ढंग का न था और न भीड़भाड़ ही थी। सिंहासन और कुर्सियों का नाम-निशान न था; केवल फर्श बिछा हुआ था जिस पर महारानी, रामभोली और वह औरत, जिसके घोड़े पर सवार हो रामभोली नानक से जुदा हुई थी, बैठी आपस में कुछ बातें कर रही थीं। बाबाजी ने पहुँचते ही कहा, "मैं नहीं समझता था कि नानक इतना बड़ा धूर्त और चालाक निकलेगा। धनपति ने कहा था कि वह बहुत सीधा है, सहज ही में काम निकल जायगा, व्यर्थ इतना आडम्बर करना पड़ा!"

पाठक याद रखें, धनपति उसी औरत का नाम था जिसके घोड़े पर सवार होकर रामभोली नानक के सामने से भागी थी। ताज्जुब नहीं कि धनपति के नाम से बारीक खयाल वाले पाठक चौंकें और सोचें कि ऐसी औरत का नाम धनपति क्यों हुआ! यह सोचने की बात है और आगे चलकर यह नाम कुछ रंग लावेगा।

धनपति––खैर, जो होना था, सो हो चुका, इतना तो मालूम हुआ कि हम लोग नानक के पंजे में फँस गये। अब कोई ऐसी तरकीब करनी चाहिए जिससे जान बचे और नानक के हाथ से छुटकारा मिले।

बाबाजी––मैं तो फिर भी नसीहत करूँगा कि आप लोग इस फेर न पड़ें। कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह बड़े प्रतापी हैं, उन्हें अपने अधीन करना और उनके हिस्से की चीज छीन लेना बहुत कठिन है, सहज नहीं। देखा, पहली ही सीढ़ी में आप लोगों ने कैसा धोखा खाया। ईश्वर न करे, यदि नानक मर जाय या उसे कोई मार डाले और वह किताब उसी के कब्जे में रह जाय और पता न लगे क्या आप लोगों के बचने की कोई सूरत हो सकती है?

रामभोली––बेशक कभी नहीं, बेशक हम लोग बुरी मौत मारे जायेंगे।

वाबाजी––मैं बेशक जोर देता और ऐसा कभी होने न देता मगर सिवाय समझाने के और कुछ नहीं कर सकता।

महारानी––(बाबाजी की तरफ देखकर) एक दफे और उद्योग करूँगी अगर काम न चलेगा तो फिर जो कुछ आप कहेंगे, वही किया जायगा।

बाबाजी––मर्जी तुम्हारी, मैं कुछ कह नहीं सकता।

महारानी––(धनपति और रामभोली की तरफ देख कर) सिवाय तुम दोनों के इस काम के लायक और कोई भी नहीं है।

धनपति––मैं जान लड़ाने से कब बाज आने वाली हूँ।

रामभोली––जो हुक्म होगा, करूँगी ही।

महारानी––तुम दोनों जाओ और जो कुछ करते बने, करो!

रामभोली––काम बाँट दीजिए।

महारानी––(धनपति की तरफ देख कर) नानक के कब्जे से किताब निकाल लेना तुम्हारा काम और (रामभोली की तरफ देखकर) किशोरी को गिरफ्तार करके लाना तुम्हारा काम।

बाबाजी––मगर दो बातों का ध्यान रखना, नहीं तो जीती न बचोगी!

दोनों––वह क्या?

बाबाजी––एक तो कुँअर इन्द्रजीतसिंह या आनन्दसिंह को हाथ न लगाना, दूसरे ऐसे काम करना जिसमें नानक को तुम दोनों का पता न लगे, नहीं तो वह बिना जान लिए कभी न छोड़ेगा और तुम लोगों के किए कुछ न होगा। (रामभोली की तरफ देखकर) यह न समझना कि वह तुम्हारा मुलाहिजा करेगा, अब उसे असल हाल मालूम हो गया है, वह हम लोगों को जड़-बुनियाद से खोदकर फेंक देने का उद्योग करेगा।

महारानी––ठीक है, इसमें कोई शक नहीं। मगर यह दोनों भी चालाक हैं, अपने को बचावेंगी। (दोनों की तरफ देखकर) खैर, तुम लोग जाओ, देखो, ईश्वर क्या करता है। खूब होशियार रहना और अपने को बचाना।

दोनों––जो आज्ञा!

९

अब हम रोहतासगढ़ की तरफ चलते हैं और तहखाने में बेबस पड़ी हुई बेचारी किशोरी और कुँअर आनन्दसिंह इत्यादि की सुध लेते हैं।

जिस समय कुंअर आनन्दसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह तहखाने के अन्दर गिरफ्तार हो गए और राजा दिग्विजयसिंह के सामने लाये गये तो राजा के आदमियों ने उन तीनों का परिचय दिया जिसे सुन राजा हैरान रह गया और सोचने लगा कि ये तीनों यहाँ क्योंकर आ पहुँचे। किशोरी भी उसी जगह खड़ी थी। उसने सुना कि ये लोग फलों हैं तो वह घबरा गई। उसे विश्वास हो गया कि अब इनकी जान नहीं बचती। इस समय वह मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि जिस तरह हो सके, इनकी जान बचाए, इनके बदले में मेरी जान जाय तो कोई हर्ज नहीं, परन्तु मैं अपनी आँखों से न्हें मरते नहीं देखना चाहती, इसमें कोई शक नहीं कि ये मुझी को छुड़ाने आये थे, नहीं तो इन्हें क्या मतलब था कि इतना कष्ट उठाते।

जितने आदमी तहखाने के अन्दर मौजूद थे, सभी जानते थे कि इस समय तहखाने के अन्दर कुँअर आनन्दसिंह का मददगार कोई भी नहीं है, परन्तु हमारे पाठक महाशय जानते हैं कि पण्डित जगन्नाथ ज्योतिषीजी, जो इस समय दारोगा बने यहाँ मौजूद हैं, कुंअर वीरेन्द्रसिंह की मदद जरूर करेंगे, मगर एक आदमी के किए होता ही क्या है? तो भी ज्योतिषीजी ने हिम्मत न हारी और वह राजा से बातचीत करने लगे। ज्योतिषी जी जानते थे कि मेरे अकेले के किए ऐसे मौके पर कुछ नहीं हो सकता, और वहाँ की किताब पढ़ने से उन्हें यह भी मालूम हो गया था कि इस तहखाने के कायदे से मुताबिक ये जरूर मारे जायेंगे, फिर भी ज्योतिषीजी को इनके बचने की उम्मीद कुछ-कुछ जरूर थी, क्योंकि पण्डित बद्रीनाथ कह गये थे कि 'आज इस तहखाने में कुँअर आनन्दसिंह आवेंगे, और उनके थोड़ी ही देर बाद कुछ आदमियों को लेकर हम भी आवेंगे।' अब ज्योतिषीजी सिवाय इसके और कुछ नहीं कर सकते थे कि राजा को बातों में लगाकर देर करें, जिसमें पण्डित बद्रीनाथ वगैरह आ जाये और आखिर उन्होंने ऐसा ही किया। ज्योतिषीजी अर्थात् दारोगा साहब राजा के सामने गये और बोले-

दारोगा-मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि आप-से-आप कुँअर आनन्दसिंह हम लोगों के कब्जे में आ गये।

राजा-(सिर से पैर तक ज्योतिषीजी को अच्छी तरह देख कर) ताज्जुब है कि आप ऐसा कहते हैं! मालूम होता है कि आज आपकी अक्ल घास चरने चली गई है! छी! छी!!

दारोगा-(घबराकर और हाथ जोड़कर) सो क्यों महाराज?

राजा-(रज होकर) फिर भी आप पूछते हैं, सो क्यों? आप ही कहिये, आनन्दसिंह आप से आप यहाँ आ फंसे तो क्यों आप खुश हए?

दारोगा-मैं यह सोचकर खुश हुआ कि जब इनकी गिरफ्तारी का हाल राजा वीरेन्द्रसिंह सूनेंगे, तो जरूर कहला भेजेंगे कि आनन्दसिंह को छोड़ दीजिए, इसके बदले में हम कुँअर कल्याणसिंह को छोड़ देंगे।

राजा-अब मुझे मालूम हो गया कि तुम्हारी अक्ल सचमुच घास चरने गई है या तुम वह दारोगा नहीं हो, कोई दूसरे हो।

दारोगा—(काँप कर) शायद आप इसलिए कहते हों कि मैंने जो कुछ अर्ज किया, इस तहखाने के कायदे के खिलाफ किया।

राजा–हाँ, अब तुम राह पर आये! बेशक ऐसा ही है। मुझे इनके यहाँ आ फँसने का रंज है। अब मैं अपनी और अपने लड़के की जिन्दगी से भी नाउम्मीद हो गया। बेशक अब यह रोहतासगढ़ उजाड़ हो गया। मैं किसी तरह कायदे के खिलाफ नहीं कर सकता, चाहे जो हो, आनन्दसिंह को अवश्य मारना पड़ेगा और आनन्दसिंह पहले-पहल यहाँ नहीं आये बल्कि इनके कई ऐयार इसके पहले भी जरूर यहाँ आकर सब हाल देख गये होंगे। कई दिनों से यहाँ के मामले में जो विचित्रता दिखाई पड़ती है यह सब उसी का नतीजा है। सच तो यह है कि इस समय की बातें सुनकर मुझे आप पर भी शक हो गया है। यहाँ का दारोगा इस तरह आनन्दसिंह के आ फँसने से कभी यह न कहता कि मैं खुश हूँ। वह जरूर समझता कि कायदे के मुताबिक इन्हें मारना पड़ेगा, इसके बदले में कल्याणसिंह मारा जायेगा, और इसके अतिरिक्त वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग ऐयारी के कायदे को तिलांजलि देकर बेहोशी की दवा के बदले जहर का इस्तेमाल करेंगे और एक ही सप्ताह में रोहतासगढ़ को चौपट कर डालेंगे। इस तहखाने के दारोगा को जरूर इस बात का रंज होता।

राजा की बातें सुनकर ज्योतिषीजी की आँखें खुल गयीं। उन्होंने मन में अपनी भूल कबूल की और गर्दन नीची करके सोचने लगे। उसी समय राजा ने पुकार कर अपने आदमियों से कहा, "इस नकली दारोगा को भी गिरफ्तार कर लो और अच्छी तरह आजमाओ कि यहाँ का दारोगा है या वीरेन्द्रसिंह का कोई ऐयार!"

बात की बात में दारोगा साहब की मुश्कें बाँध ली गयीं और राजा ने दो आदमियों को गरम पानी लाने का हुक्म दिया। नौकरों ने यह समझ कर कि यहाँ पानी गरम करने में देर होगी, ऊपर दीवानखाने में हरदम गरम पानी मौजूद रहता है, वहाँ से लाना उत्तम होगा, महाराज से आज्ञा चाही। महाराज ने इसको पसन्द करके ऊपर दीवानखाने से पानी लाने का हक्म दिया।

दो नौकर गरम पानी लाने के लिए दौड़े, मगर तुरन्त लौट आकर बोले, "ऊपर जाने का रास्ता तो बन्द हो गया।"

महाराज-सो क्यों! रास्ता कैसे बन्द हो सकता है? नौकर-क्या जाने, ऐसा क्यों हुआ?

महाराज-ऐसा कभी नहीं हो सकता! (ताली दिखाकर) देखो, यह ताली मेरे पास मौजूद है, इस ताली के बिना कोई कैसे उन दरवाजों को बन्द कर सकता है?

नौकर-जो हो, मैं कुछ नहीं अर्ज कर सकता, सरकार खुद चलकर देख लें।

राजा ने स्वयं जाकर देखा तो ऊपर जाने का रास्ता अर्थात दरवाजा बन्द पाया। ताज्जुब हुआ और सोचने लगा कि दरवाजा किसने बन्द किया! ताली तो मेरे पास थी! आखिर दरवाजा खोलने के लिए ताली लगाई मगर ताला न खुला। आज तक इसी ताली से बराबर इस तहखाने में आने-जाने का दरवाजा खोला जाता था, लेकिन इस समय ताली कुछ काम नहीं करती। यह अनोखी बात, जो राजा दिग्विजयसिंह के ध्यान में कभी न आयी थी, आज यकायक पैदा हो गयी। राजा के ताज्जुब की कोई हद न रही। उस तहखाने में और भी बहुत से दरवाजे उसी ताली से खुला करते थे। दिग्विजयसिंह ने ताली ठोंक-पीटकर एक-दूसरे दरवाजे में लगाई, मगर वह भी न खला। राजा की आँखों में आंसू भर आये और यकायक उसके मुँह से यह आवाज निकली, "अब इस तहखाने की और हम लोगों की उम्र पूरी हो गयी।"

राजा दिग्विजयसिंह घबराया हुआ चारों तरफ घूमता और घड़ी-घड़ी दरवाजों में ताली लगाता था, इतने ही में उस काले रंग की भयानक मूर्ति के मुँह में से, जिसके सामने एक औरत की बलि दी जा चुकी थी, एक तरह की आवाज निकलने लगी। यह भी एक नयी बात थी। दिग्विजयसिंह और जितने आदमी वहाँ थे, सब डर गये तथा उसी तरफ देखने लगे। काँपता हुआ राजा उस मूर्ति के पास जाकर खड़ा हो गया और गौर से सुनने लगा कि क्या आवाज आती है।

थोड़ी देर तक वह आवाज समझ में न आयी, इसके बाद यह सुनाई पड़ा-"तेरी ताली केवल बारह नम्बर की कोठरी को खोल सकेगी। जहाँ तक जल्दी हो सके, किशोरी को उसमें बन्द कर दे, नहीं तो सभी की जान मुफ्त में जायगी!"

यह नयी अद्भुत और अनोखी बात देख-सुनकर राजा का कलेजा दहलने लगा, मगर उसकी समझ में कुछ न आया कि यह मूर्ति क्योंकर बोली! आज तक कभी ऐसी बात न हुई थी। सैकड़ों आदमी इसके सामने बलि हो गये, लेकिन ऐसी नौबत न आयी थी। अब राजा को विश्वास हो गया कि इस मूरत में कोई करामात जरूर है तभी तो बड़े लोगों ने बलि का प्रबन्ध किया है। यद्यपि राजा ऐसी बातों पर विश्वास कम रखता था, परन्तु आज उसे डर ने दबा लिया। उसने सोच-विचार में ज्यादा समय नष्ट न किया और उसी ताली से बारह नम्बर वाली कोठरी खोलकर किशोरी को उसके अन्दर बन्द कर दिया।

राजा दिग्विजयसिंह ने अभी इस काम से छुट्टी न पायी थी कि बहुत से आदमियों को साथ लेकर पण्डित बद्रीनाथ उस तहखाने में आ पहुँचे। कुँअर आनन्दसिंह और तारासिंह को बेबस पाकर झपट पड़े और बहुत जल्द उनके हाथ-पैर खोल दिए। महाराज के आदमियों ने इनका मुकाबला किया, पण्डित बद्रीनाथ के साथ जो आदमी आये थे वे लोग भी भिड़ गये। जब आनन्दसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह छूटे तो लड़ाई गहरी हो गयी। इन लोगों के सामने ठहरने वाला कौन था? केवल चार ऐयार ही उतने लोगों के लिए काफी थे। कई मारे गये, कई जख्मी होकर गिर पड़े। राजा दिग्विजयसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया, वीरेन्द्रसिंह की तरफ का कोई न मरा। इन सब कामों से छुट्टी पाने के बाद किशोरी की खोज की गयी।

इस तहखाने में जो कुछ आश्चर्य की बातें हुई थीं, सभी ने देखी-सुनी थीं। लाली और ज्योतिषीजी ने सब हाल आनन्दसिंह और ऐयार लोगों को बताया और यह भी कहा कि किशोरी बारह नम्बर की कोठरी में बन्द कर दी गयी है।

पण्डित बद्रीनाथ ने दिग्विजयसिंह की कमर से ताली निकाल ली और बारह नम्बर की कोठरी खोली, मगर किशोरी को उसमें न पाया। चिराग लेकर अच्छी तरह ढूंढ़ा परन्तु किशोरी न दिखाई पड़ी, न मालूम जमीन में समा गयी या दीवार खा गयी। इस बात का आश्चर्य सभी को हुआ कि बन्द कोठरी में से किशोरी कहाँ गायब हो गयी! हाँ, एक कागज का पुर्जा उस कोठरी में जरूर मिला जिसे भैरोंसिंह ने उठा लिया और पढकर सभी को सुनाया। यह लिखा था-

"धनपति रंग मचायौ, साध्यौ काम। भोली भलि मुड़ि ऐहैं यदि यहि ठाम॥"

इस 'बरवै' का मतलब किसी की समझ में न आया, लेकिन इतना विश्वास हो गया कि अब इस जगह किशोरी का मिलना कठिन है। उधर लाली इस बरवै को सुनते ही खिलखिला कर हँस पड़ी, लेकिन जब लोगों ने हँसने का सबब पूछा तो कुछ जवाब न दिया, सिर नीचा करके चुप हो रही। जब ऐयारों ने बहुत जोर दिया तो बोली, "मेरे हँसने का कोई खास सबब नहीं है। बड़ी मेहनत करके किशोरी को मैंने यहाँ से छुड़ाया था। (किशोरी के छुड़ाने के लिए जो-जो काम उसने किये थे, सब कहने के बाद) मैं सोचे हुए थी कि इस काम के बदले में राजा वीरेन्द्रसिंह से कुछ इनाम पाऊँगी, लेकिन कुछ न हुआ, सेरी मेहनत चौपट हो गयी, मेरे देखते-ही-देखते किशोरी इस कोठरी में बन्द हो गयी थी। जव आप लोगों ने कोठरी खोली तो मुझे उम्मीद थी कि उसे देखेंगी और वह अपनी जुबान से मेरे परिश्रम का हाल कहेगी, परन्तु कुछ नहीं। ईश्वर की भी क्या विचित्र गति है, वह क्या करता है, सो कुछ समझ में नहीं आता! यही सोचकर मैं हँसी थी और कोई बात नहीं है।"

लाली की बातों का और सभी को चाहे विश्वास हो गया हो, लेकिन हमारे ऐयारों के दिल में उसकी बातें न बैठीं। देखना चाहिए, अब वे लोग लाली के साथ क्या सलूक करते हैं।

पण्डित बद्रीनाथ की राय हुई कि अब इस तहखाने में ठहरना मुनासिब नहीं। जब यहाँ की अजायबातों से खुद यहाँ का राजा परेशान हो गया, तो हम लोगों की क्या बात है। यह भी उम्मीद नहीं है कि इस समय किशोरी का पता लगे। अस्तु, जहाँ तक जल्द हो सके यहाँ से चले चलना ही मुनासिब है।

जितने आदमी मर गये थे, उसी तहखाने में गड़हा खोदकर गाड़ दिये गये। बाकी बचे हुए चार-पाँच आदमियों को राजा दिग्विजयसिंह के सहित कैदियों की तरह साथ लिया और सभी का मुँह चादर से बाँध दिया। ज्योतिषीजी ने भी ताली का झब्बा संभाला, रोजनामचा हाथ में लिया, और सभी के साथ तहखाने से बाहर हुए। अब की दफे तहखाने से बाहर निकलते हए जितने दरवाजे थे, सभी में ज्योतिषीजी ताला लगाते गये जिसमें उसके अन्दर कोई आने न पावे।

तहखाने से बाहर निकलने पर लाली ने कुँअर आनन्दसिंह से कहा, "मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि मेरी सारी मेहनत बरबाद हो गयी और किशोरी से मिलने की कोई आशा न रही! अब यदि आप आज्ञा दें, तो मैं अपने घर जाऊँ, क्योंकि किशोरी ही की तरह मैं भी इस किले में कैद की गयी थी।"

आनन्दसिंह-तुम्हारा मकान कहाँ है?

लाली-मथुराजी।

भैरोंसिंह-(आनन्दसिंह से) इसमें कोई शक नहीं कि लाली का किस्सा भी बहुत बड़ा और दिलचस्प होगा। इन्हें हमारे महाराज के पास अवश्य ले चलना चाहिए।

बद्रीनाथ–जरूर ऐसा होना चाहिए, नहीं तो महाराज रंज होंगे।

ऐयारों का मतलब कुँअर आनन्दसिंह समझ गये और इसी जगह से लाली को बिदा होने की आज्ञा उन्होंने न दी। लाचार लाली को कुँअर साहब के साथ ही जाना पड़ा और ये लोग बिना किसी तरह की तकलीफ पाए राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में पहुँच गये जहाँ लाली इज्जत के साथ एक खेमे में रखी गई।

१०

दूसरे दिन संध्या के समय राजा वीरेन्द्रसिंह अपने खेमे में बैठे रोहतासगढ़ के बारे में बातचीत करने लगे। पण्डित बद्रीनाथ, भैरोंसिंह, तारासिंह, ज्योतिषीजी, कुँअर आनन्दसिंह और तेजसिंह उनके पास बैठे हुए थे। अपने-अपने तौर पर सभी ने रोहतासगढ़ के तहखाने का हाल कह सुनाया और अन्त में वीरेन्द्रसिंह से बातचीत होने लगी।

वीरेन्द्रसिंह-रोहतासगढ़ के बारे में अब क्या करना चाहए?

तेजसिंह-इसमें तो कोई शक नहीं कि रोहतासगढ़ के मालिक आप हो चुके! जब राजा और दीवान दोनों आपके कब्जे में आ गये तो अब किस बात की कसर रह गई? हाँ, अब यह सोचना है कि राजा दिग्विजय सिंह के साथ क्या सलूक किया जाय।

वीरेन्द्रसिंह-और किशोरी के लिए क्या बन्दोबस्त करना चाहिए?

तेजसिंह-जी हाँ, यही दो बातें हैं। किशोरी के बारे में तो मैं अभी कुछ कह कह नहीं सकता, बाकी राजा दिग्विजयसिंह के बारे में पहले आपकी राय सुनना चाहता हूँ।

वीरेन्द्रसिंह-मेरी राय तो यही है कि यदि वह सच्चे दिल से ताबेदारी कबल करे तो रोहतासगढ़ पर खिराज (मालगुजारी) मुकर्रर करके उसे छोड़ देना चाहिए।

तेजसिंह-मेरी भी यही राय है।

भैरोंसिंह-यदि वह इस समय कबूल करने के बाद पीछे बेईमानी पर कमर बाँधे, तो?

तेजसिंह-ऐसी उम्मीद तो नहीं है। जहाँ तक मैंने सुना है, वह ईमानदार, सच्चा और बहादुर जाना जाता है। ईश्वर न करे यदि उसकी नीयत कुछ दिन बात बदल भी जाय तो हम लोगों को इसकी परवाह न करनी चाहिए।

वीरेन्द्रसिंह-इसका विचार कहाँ तक किया जायगा! (तारासिंह की तरफ देख कर) तुम जाओ, दिग्विजयसिंह को ले आओ, मगर मेरे सामने हथकड़ी-बेड़ी के साथ मत लाना।

'जो हुक्म' कहकर तारासिंह दिग्विजयसिंह को लाने के लिए चले गये और थोडी ही देर में उन्हें अपने साथ लेकर हाजिर हुए। तब तक इधर-उधर की बातें होती रहीं। दिग्विजयसिंह ने अदब के साथ राजा वीरेन्द्रसिंह को सलाम किया और हाथ जोड कर सामने खड़ा हो गया।

वीरेन्द्रसिंह-कहिये, अब क्या इरादा है?

दिग्विजयसिंह-यही इरादा है कि जन्म भर आपके साथ रहूं और ताबेदारी करूँ।

वीरेन्द्रसिंह-नीयत में किसी तरह का फर्क तो नहीं है?

दिग्विजयसिंह-आप ऐसे प्रतापी राजा के साथ खुटाई रखने वाला पूरा कम्बख्त है। वह पूरा बेबकूफ है जो किसी तरह पर आपसे जीतने की उम्मीद रक्खे। इसमें कोई शक नहीं कि आपका एक-एक ऐयार दस-दस राज्य गारत कर देने की सामर्थ्य रखता है। मुझे इस रोहतासगढ़ किले की मजबूती पर बड़ा भरोसा था, मगर अब निश्चय हो गया कि वह मेरी भूल थी। आप जिस राज्य को चाहें, बिना लड़े फतह कर सकते हैं। मेरी तो अक्ल नहीं काम करती, कुछ समझ में नहीं आता कि क्या हुआ और आपके ऐयारों ने क्या तमाशा कर दिया। सैकड़ों वर्षों से जिस तहखाने का हाल एक भेद के तौर पर छिपा चला आता था, बल्कि सच तो यह है कि जहाँ का ठीक हाल अभी तक मुझ भी मालूम न था, उसी तहखाने पर बात-की-बात में आपके ऐयारों ने कब्जा कर लिया, यह करामात नहीं तो क्या है! बेशक ईश्वर की आप पर कृपा है और यह सब सच्च दिल से उपासना का प्रताप है। आपसे दश्मनी रखना अपने हाथ से अपना सिर काटना है।

दिग्विजयसिंह की बात सुन कर राजा वीरेन्द्रसिंह मुस्कुराये और उनकी तरफ देखने लगे। दिग्विजयसिंह ने जिस ढंग से ऊपर लिखी बातें कहीं, उसमें सचाई की बू आती थी। वीरेन्द्रसिंह बहुत खुश हुए और दिग्विजयसिंह को अपने पास बैठा कर बोले-

वीरेन्द्रसिंह-सुनो दिग्विजयसिंह, हम तुम्हें छोड़ देते हैं और रोहतासगढ़ की गद्दी पर अपनी तरफ से तुम्हें बैठाते हैं, मगर इस शर्त पर कि तुम हमेशा अपने को हमारा मातहत समझो और खिराज के तौर पर कुछ मालगुजारी दिया करो।

दिग्विजयसिंह-मैं तो अपने को आपका तबेदार समझ चुका, अब क्या समझूँगा। बाकी रही रोहतासगढ़ की गद्दी, सो मुझे मंजूर नहीं। इसके लिए आप कोई दूसरा नायब मुकर्रर कीजिए और मुझे अपने साथ रहने का हुक्म दीजिये।

बीरेन्द्रसिंह-तुमसे बढ़ कर और कोई नायब रोहतासगढ़ के लिए मुझे दिखाई नहीं देता।

दिग्विजयसिंह-(हाथ जोड़कर) बस, मुझ पर कृपा की जिये। अब राज्य का जंजाल मैं नहीं उठा सकता।

आधे घण्टे तक यही हुज्जत रही। वीरेन्द्रसिंह अपने हाथ से रोहतासगढ़ की गद्दी पर दिग्विजयसिंह को बैठाना चाहते थे और दिग्विजयसिंह इन्कार करते थे, लेकिन आखिर लाचार होकर दिग्विजयसिंह को वीरेन्द्रसिंह का हुक्म मंजूर करना पड़ा, मगर साथ ही इसके उन्होंने वीरेन्द्रसिंह से इस बात का इकरार करा लिया कि महीने भर तक आपको वहाँ मेरा मेहमान बनना पड़ेगा और इतने दिनों तक रोहतासगढ़ में रहना पड़ेगा।

वीरेन्द्रसिंह ने इस बात को खुशी से मंजूर किया, क्योंकि रोहतासगढ़ के तहखाने का हाल उन्हें बहुत-कुछ मालूम करना था। वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह को विश्वास हो गया था कि वह तहखाना जरूर कोई तिलिस्म है।

राजा दिग्विजयसिंह ने हाथ जोड़ कर तेजसिंह की तरफ देखा और कहा, "कृपा कर मुझे समझा दीजिए कि आप और आपके मातहत ऐयार लोगों ने रोहतासगढ़ में क्या किया, अभी तक मेरी अक्ल हैरान है।"

तेजसिंह ने सब हाल खुलासा तौर पर कह सुनाया। दीवान रामानन्द का हाल सुन दिग्विजयसिंह खूब हँसे बल्कि उन्हें अपनी बेवकूफी पर भी हँसी आई और बोले, "आप लोगों से कोई बात दूर नहीं है।" इलके बाद दीवान रामानन्द भी उसी जगह पर बुलाये गये और दिग्विजयसिंह के हवाले किए गये और दिग्विजयसिंह के लड़के कुँअर कल्याणसिंह को लाने के लिए भी कई आदमी चुनारगढ़ रवाना किए गए।

इन सब कामों से छुट्टी पाकर लाली के बारे में बातचीत होने लगी। तेजसिंह ने दिग्विजय सिंह से पूछा कि लाली कौन है और आपके यहाँ कब से है? इसके जवाब में दिग्विजयसिंह ने कहा कि लाली को हम बखूबी नहीं जानते। महीने भर से ज्यादा न हआ होगा कि चार-पांच दिन के आगे-पीछे लाली और कुन्दन दो नौजवान औरतें मेरे यहाँ पहुँचीं। उनकी चाल-ढाल और पोशाक से मुझे मालूम हुआ कि किसी इज्जतदार घराने की लड़कियां हैं। पूछने पर उन दोनों ने अपने को इज्जतदार घराने की लड़की जाहिर भी किया और कहा कि मैं अपनी मुसीबत के दो-तीन महीने आपके यहां काटना चाहती हैं। रहम खाकर मैंने उन दोनों को इज्जत के साथ अपने यहाँ रखा, बस, इसके सिवाय और मैं कुछ नहीं जानता।

तेजसिंह-बेशक इसमें कोई भेद है, वे दोनों साधारण औरतें नहीं हैं।

ज्योतिषीजी-एक ताज्जुब की बात मैं सुनाता हूँ।

तेजसिंह-वह क्या?

ज्योतिषीजी-आपको याद होगा कि इस तहखाने का हाल कहते समय मैंने कहा था कि जब तहखाने में किशोरी और लाली को मैंने देखा, तो दोनों का नाम लेकर पुकारा जिससे उन दोनों को आश्चर्य हुआ।

तेजसिंह-हाँ-हाँ, मुझे याद है। मैं यह पूछने ही वाला था कि लाली को आपने कैसे पहचाना?

ज्योतिषीजी-बस, यही वह ताज्जुब की बात है जो अब मैं आपसे कहता हूँ।

तेजसिंह-कहिए, जल्द कहिए।

ज्योतिषीजी-एक दफे रोहतासगढ़ के तहखाने में बैठे-बैठे मेरी तबीयत घबराई तो मैं कोठरियों को खोल-खोल कर देखने लगा। उस ताली के झब्बे में, जो मेरे हाथ लगा था, एक ताली सबसे बड़ी है जो तहखाने की सब कोठरियों में लगती है मगर बाकी बहुत सी तालियों का पता मुझे अभी तक नहीं लगा कि कहाँ की हैं।

तेजसिंह-खैर, तब क्या हुआ?

ज्योतिषीजी-सब कोठरियों में अंधेरा था। चिराग ले जाकर मैं कहाँ तक देखता, मगर एक कोठरी में दीवार के साथ चमकती हुई कोई चीज दिखाई दी। यद्यपि कोठरी में अँधेरा था, तो भी अच्छी तरह मालूम हो गया कि यह कोई तस्वीर है। उस पर ऐसा मसाला लगा हुआ था कि अँधेरे में भी वह तस्वीर साफ मालूम होती थी। आँख, कान, नाक, बल्कि बाल तक साफ मालूम होते थे। तस्वीर के नीचे 'लाली' ऐसा लिखा हुआ था। मैं बड़ी देर तक ताज्जुब से उस तस्वीर को देखता रहा, आखिर कोठरी बन्द करके अपने ठिकाने चला आया। उसके बाद जब किशोरी के साथ मैंने लाली को देखा तो साफ पहचान लिया कि वह तस्वीर इसी की है। मैंने तो सोचा था कि लाली उसी जगह की रहने वाली है इसीलिए उसकी तस्वीर वहाँ पाई गई, मगर इस समय महाराज दिग्विजयसिंह की जुबानी उसका हाल सुनकर ताज्जुब होता है, लाली अगर वहाँ की रहने वाली नहीं, तो उसकी तस्वीर वहाँ कैसे पहुँची?

दिग्विजयसिंह-मैंने अभी तक वह तस्वीर नहीं देखी, ताज्जुब है।

वीरेन्द्रसिंह-अभी क्या, जब मैं आपको साथ लेकर अच्छी तरह उस तहखाने की छानबीन करूँगा, तो बहुत-सी बातें ताज्जुब की दिखाई पड़ेंगी।

दिग्विजयसिंह-ईश्वर करे, जल्द ऐसा मौका आये। अब तो आपको बहुत जल्द रोहतासढ़ चलना चाहिए।

वीरेन्द्रसिंह-(तेजसिंह की तरफ देखकर)इन्द्रजीतसिंह के बारे में क्या बन्दोबस्त हो रहा है?

तेजसिंह-मैं बेफिक्र नहीं हैं। जासूस लोग चारों तरफ भेजे गये हैं। इस समय तक रोहतासगढ़ की कार्रवाई में फँसा हुआ था, अब स्वयं उनकी खोज में जाऊँगा, कुछ पता लगा भी है।

वीरेन्द्रसिंह-हाँ! क्या पता लगा है?

तेजसिंह-इसका हाल कल कहँगा, आज भर और सब्र कीजिए।

राजा वीरेन्द्रसिंह अपने दोनों लड़कों को बहुत चाहते थे। इन्द्रजीतसिंह के गायब होने का रंज उन्हें बहुत था, मगर वह अपने चित्त के भाव भी खूब ही छिपाते थे और समय का ध्यान उन्हें बहुत रहता था। तेजसिंह का भरोसा उन्हें बहुत था और उन्हें मानते भी बहुत थे। जिस काम में उन्हें तेजसिंह रोकते थे, उसका नाम फिर वह जुबान पर तब तक न लाते थे जब तक तेजसिंह स्वयं उसका जिक्र न छेड़ते। यही सबव था कि इस समय वे तेजसिंह के सामने इन्द्रजीतसिंह के बारे में कुछ न बोले।

दूसरे दिन महाराज दिग्विजयसिंह सेना-सहित तेजसिंह को रोहतासगढ़ किले में ले गये। कुँअर आनन्दसिंह के नाम का डंका बजाया गया। यह मौका ऐसा था कि खुशी के जलसे हाते, मगर कुँअर इन्द्रजीतसिंह के खयाल से किसी तरह की खुशी न की गई।

राजा दिग्विजयसिंह के बर्ताव और खातिरदारी से राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके साथी लोग बहुत प्रसन्न हुए। दूसरे दिन दीवानखाने में थोड़े आदमियों की कमेटी इसलिए की गई कि अब क्या करना चाहिए। इस कमेटी में केवल नीचे लिखे बहादूर और ऐयार लोग इकट्ठे थे-राजा वीरेन्द्रसिंह, कुंअर आनन्दसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, पण्डित बद्रीनाथ, ज्योतिषीजी, राजा दिग्विजयसिंह और रामानन्द। इनके अतिरिक्त एक और आदमी मुंह पर नकाव डाले मौजूद था जिसे तेजसिंह अपने साथ लाये थे और उसे अपनी जमानत पर कमेटी में शरीक किया था।

वीरेन्द्रसिंह-(तेजसिंह की तरफ देखकर) इस नकाबपोश आदमी के सामने. जिसे तुम अपने साथ लाये हो, हम लोग भेद की बातें कर सकते हैं?

तेजसिंह-हाँ-हाँ, कोई हर्ज की बात नहीं है।

वीरेन्द्रसिंह-अच्छा, तो अब हम लोगों को पहले किशोरी के पता लगाने का, दूसरे यहाँ के तहखाने में जो बहुत-सी बातें जानने और विचारने लायक हैं उनके मालूम करने का, तीसरे इन्द्रजीतसिंह के खोजने का बन्दोबस्त सबसे पहले करना चाहिए।

(तेजसिंह की तरफ देखकर) तुमने कहा था कि इन्द्रजीतसिंह का कुछ हाल मालूम हो चुका है?

तेजसिंह-जी हाँ, बेशक मैंने कहा था और उसका खुलासा हाल इस समय आपको मालूम हुआ चाहता है, मगर इसके पहले मैं दो-चार बातें राजा साहब से (दिग्विजयसिंह की तरफ इशारा करके) पूछना चाहता हूँ जो बहुत जरूरी हैं, इसके बाद अपने मामले में बातचीत करूँगा।

वीरेन्द्रसिंह-कोई हर्ज नहीं।

दिग्विजयसिंह-हाँ-हाँ, पूछिये।

तेजसिंह-आपके यहाँ पहले शेरसिंह नाम का कोई ऐयार था?

दिग्विजय-हाँ था, बेचारा बहुत ही नेक, ईमानदार और मेहनती आदमी था और ऐयारी के फन में पूरा उस्ताद था। रामानन्द और गोविन्द सिंह उसी के चेले हैं। उसके भाग जाने का मुझे बहुत ही रंज है। आज के दो-तीन दिन पहले दूसरी तरह का रंज था, मगर आज और तरह का अफसोस है।

तेजसिंह-दो तरह का रंज और अफसोस! इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। कृपा कर साफ-साफ कहिये।

दिग्विजयसिंह-पहले उसके भाग जाने का अफसोस क्रोध के साथ था मगर आज इस बात का अफसोस है कि जिन बातों को सोच कर वह भागा था, वे बहुत ठीक थीं। उसकी तरफ से मेरा रंज होना अनुचित था। यदि इस समय वह होता तो बड़ी खुशी से आपके काम में मदद करता।

तेजसिंह-उससे आप क्यों रंज हुए थे और वह क्यों भाग गया था?

दिग्विजयसिंह-इसका सगव यह था कि जब मैंने किशोरी को अपने कब्जे में कर लिया तो उसने मुझे बहुत-कुछ समझाया और कहा कि 'आप ऐसा काम न कीजिए बल्कि किशोरी को राजा वीरेन्द्रसिंह के यहाँ भेज दीजिये।' यह बात मैंने मंजूर न की, बल्कि उससे नाखुश होकर मैंने इरादा कर लिया कि उसे कैद कर लूँ। असल बात यह है कि मुझसे और रणधीरसिंह से दोस्ती थी, शेरसिंह मेरे यहाँ रहता था और उसका छोटा भाई गदाधरसिंह, जिसकी लड़की कमला है, आप उसे जानते होंगे...

तेजसिंह-हाँ-हाँ, हम सब कोई उसे अच्छी तरह जानते हैं।

दिग्विजयसिंह-खैर, तो गदाधरसिंह, रणधीरसिंह के यहाँ रहता था। गदाधर सिंह को मरे बहत दिन हो गये, इसी बीच में मुझसे और रणधीरसिंह से भी कुछ बिगड़ गई। इधर जब मैंने रणधीरसिंह की नातिनी किशोरी को अपने लड़के के साथ ब्याहने का बन्दोबस्त किया तो शेरसिंह को बहुत बुरा मालूम हुआ। मेरी तबीयत भी शेरसिंह से फिर गईं। मैंने सोचा कि शेरसिंह की भतीजी कमला हमारे यहाँ से किशोरी को निकाल ले जाने का जरूर उद्योग करेगी और इस काम में अपने चाचा शेरसिंह से मदद लेगी। यह बात मेरे दिल में बैठ गई और मैंने शेरसिंह को कैद करने का विचार किया। उसे मेरा इरादा मालूम हो गया और वह चुपचाप न मालूम कहाँ भाग गया।

तेजसिंह-अब आप क्या सोचते हैं? उसका कोई कसूर था या नहीं?

दिग्विजयसिंह-नहीं-नहीं, वह बिल्कुल बेकसूर था, बल्कि मेरी ही भूल थी थी जिसके लिए आज मैं अफसोस करता हूँ। ईश्वर करे, उसका पता लग जाय तो मैं उससे अपना कसूर माफ कराऊँ।

तेजसिंह-आप मुझे कुछ इनाम दें तो मैं शेरसिंह का पता लगा दूँ!

दिग्वजयसिंह-आप जो माँगेंगे मैं दूँगा और इसके अतिरिक्त आपका भारी अहसान मुझ पर होगा।

तेजसिंह-बस, मैं यही इनाम चाहता हूँ कि यदि शेरसिंह को ढूँढ़ कर ले आऊँ तो उसे आप हमारे राजा वीरेन्द्रसिंह के हवाले कर दें! हम उसे अपना साथी बनाना चाहते हैं।

दिग्वजयसिंह-मैं खुशी से इस बात को मंजूर करता हूँ। वादा करने की क्या जरूरत है, जब कि मैं स्वयं राजा वीरेन्द्रसिंह का ताबेदार हूँ।

इसके बाद तेजसिंह ने उस नकाबपोश की तरफ देखा जो उनके पास बैठा हुआ था और जिसे वह अपने साथ इस कमेटी में लाये थे। नकाबपोश ने अपने मुंह पर से नकाब उतार कर फेंक दिया और यह कहता हुआ राजा दिग्विजयसिंह के पैरों पर गिर पड़ा कि 'आप मेरा कसूर माफ करें।' राजा दिग्विजयसिंह ने शेरसिंह को पहचाना, बड़ी खुशी से उठाकर गले लगाया और कहा, "नहीं-नहीं, तुम्हारा कोई कसूर नहीं, बल्कि मेरा कसूर है और मैं तुमसे क्षमा चाहता हूँ।"

शेरसिंहसिंहजते के पास जा बैठे। तेजसिंह ने कहा, "सुनो शेर सिंह, अब तुम हमारे हो चुके!"

शेरसिंह-बेशक मैं आपका हो चुका हूँ, जब आपने महाराज से वचन ले लिया तो अब क्या उज्र हो सकता है?

राजा वीरेन्द्रसिंह ताज्जुब से ये बातें सुन रहे थे। अन्त में तेजसिंह की तरफ देखकर बोले, "तुम्हारी मुलाकात शेरसिंह से कैसे हुई?"

तेजसिंह-शेरसिंह ने मुझसे स्वयं मिलकर सब हाल कहा। असल बात यह है हम लोगों पर भी शेरसिंह ने भारी अहसान किया है।

वीरेन्द्रसिंह-वह क्या?

तेजसिंह-कुँअर इन्द्रजीतसिंह का पता लगाया है और अपने कई आदमी उनकी हिफाजत के लिए तैनात कर चुके हैं। इस बात का भी निश्चय दिला दिया है कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह को किसी तरह की तकलीफ न होने पावेगी।

वीरेन्द्रसिंह-(खुश होकर और शेरसिंह की तरफ देख कर) वाह! कहाँ पता लगा और किस हालत में है?

शेरसिंह-जितना हाल मुझे मालूम था, मैं वह सब दीवान साहब (तेजसिंह) से कह चुका हूँ। वह आपसे कह देंगे, आप उसके जानने की जल्दी न करें। मैं इस समय यहाँ जिस काम के लिए आया था, मेरा वह काम हो चुका। अब मैं यहाँ ठहरना मुनासिब नहीं समझता। आप लोग अपने मतलब की बातचीत करें, क्योंकि मदद के लिए मैं बहुत जल्द कुँअर इन्द्रजीतसिंह के पास पहुँचना चाहता हूँ। हाँ, यदि आप कृपा करके अपना एक ऐयार मेरे साथ कर दें तो उत्तम हो और काम भी शीघ्र हो जाय।

वीरेन्द्रसिंह–(खुश होकर) अच्छी बात है, आप जाइये और मेरे जिस ऐयार को चाहें, साथ लेते जाइये।

शेरसिंह-अगर आप मेरी मर्जी पर छोड़ते हैं तो मैं देवीसिंह को अपने साथ के लिए माँगता हूँ।

तेजसिंह–हाँ, आप खुशी से इन्हें ले जायँ। (देवीसिंह की तरफ देखकर) आप तैयारी कीजिए।

देवीसिंह-मैं हरदम तैयार ही रहता हूँ। (शेरसिंह से) चलिए, अब इन लोगों का पीछा छोड़िए।

देबीसिंह को साथ लेकर शेरसिंह रवाना हुए और इधर इन लोगों में विचार होने लगा कि अब दया करना चाहिए। घण्टे भर में यह निश्चय हुआ कि लाली से कुछ विशेष पूछने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह अपना हाल ठीक-ठीक कभी न कहेगी। हाँ, उसे हिफाजत में रखना चाहिए और तहखाने को अच्छी तरह देखना और वहाँ का हाल मालूम करना चाहिए।

११

अब तो कुन्दन का हाल जरूर ही लिखना पड़ा। पाठक महाशय उसका हाल जानने के लिए उत्कण्ठित हो रहे होंगे। हमने कुन्दन को रोहतासगढ़ महल के उसी बाग में छोड़ा है जिसमें किशोरी रहती थी। कुन्दन इस फिक्र में लगी रहती थी कि किशोरी किसी तरह लाली के कब्जे में न पड़ जाय।

जिस समय किशोरी को लेकर सेंध की राह लाली उस घर में उतर गई जिसमें से तहखाने का रास्ता था और यह हाल कुन्दन को मालूम हुआ, तो वह बहुत घबराई। उसने महल-भर में इस बात का गुल मचा दिया। वह सोच में पड़ी कि अब क्या करना चाहिए। हम पहले लिख आये हैं कि किशोरी और लाली के जाने के बाद 'धरो! पकड़ो!' की आवाज लगाते हुए कई आदमी सेंध की राह उसी मकान में उतर गये जिसमें लाली और किशोरी गई थीं।

उन्हीं लोगों में मिलकर कुन्दन भी एक छोटी-सी गठरी कमर साथ बाँध उस मकान के अन्दर चली गई और यह हाल घबराहट और शोरगुल में किसी को मालूम न हुआ। उस मकान अन्दर भी बिल्कुल अँधेरा था। लाली ने दूसरी कोठरी में जाकर दरवाजा बन्द कर लिया, इसलिए लाचार होकर पीछा करनेवालों को लौटना पड़ा और उन लोगों ने इस बात की इत्तिला महाराज से की, मगर कुन्दन उस मकान से न लौटी, बल्कि किसी कोने में छिप रही।

हम पहले लिख आये हैं और अब फिर लिखते हैं कि उस मकान के अन्दर तीन दरवाजे थे, एक तो वह सदर दरवाजा था जिसके बाहर पहरा पड़ा करता था, दूसरा खुला पड़ा था, तीसरे दरवाजे को खोलकर किशोरी को साथ लिये लाली गई थी।

जो दरवाजा खुला था उसके अन्दर एक दालान था। इसी दालान तक लाली और किशोरी को खोजकर पीछा करनेवाले लौट गये थे, क्योंकि कहीं आगे जाने का रास्ता उन लोगों को नहीं मिला था। जब वे लोग मकान के बाहर निकल गये तो कुन्दन ने अपनी कमर से गठरी खोली और उसमें से सामान निकालकर मोमबत्ती जलाने के बाद चारों तरफ देखने लगी।

यह एक छोटा-सा दालान था मगर चारों तरफ से बन्द था। इस दालान की दीवारों में तरह-तरह की भयानक तस्वीरें बनी हुई थीं, मगर कुन्दन ने उन पर कुछ भी ध्यान न दिया। दालान के बीचोंबीच बित्ते-बित्ते भर के ग्यारह डिब्बे लोहे के रखे हुए थे और हरएक डिब्बे पर आदमी की खोपड़ी रखी हुई थी। कुन्दन उन्हीं डिब्बों को गौर से देखने लगी। ये डिब्बे गोलाकार एक चौकी पर सजाये हुए थे। एक डिब्बे पर आधी खोपड़ी थी और बाकी डिब्बों पर पूरी-पूरी। कुन्दन इस बात को देखकर ताज्जुब कर रही थी कि इसमें से एक खोपड़ी जमीन पर क्यों पड़ी हुई है तथा औरों की तरह उसके नीचे डिब्बा क्यों नहीं है? कुन्दन ने उस डिब्बे से, जिस पर आधी खोपड़ी रखी हुई थी, गिनना शुरू किया। मालूम हुआ कि सातवें नम्बर की खोपड़ी के नीचे डिब्बा नहीं है। यकायक कुन्दन के मुंह से निकला, "ओह-ओह, बेशक, इसके नीचे का डिब्बा लाली ले गई क्योंकि असली तालीवाला डिब्बा वही था, मगर यह हाल उसे क्यों कर मालूम हुआ?"

कुन्दन ने फिर गिनना शुरू किया और टूटी हुई खोपड़ी से पाँचवें नम्बर पर रुक गई, खोपड़ी उठाकर नीचे रख दी और डिब्बे को उठा लिया। अब अच्छी तरह गौर से देखकर जोर से जमीन पर पटका। डिब्बे के चार टुकड़े हो गए, मानो चार जगहों से जोड़ लगाया हुआ हो। उसके अन्दर से एक ताली निकली जिसे देख कुन्दन हँसी और खुश होकर आप ही आप बोली, "अब देखो, लाली को मैं कैसा छकाती हूँ।"

कुन्दन ने उस ताली से काम लेना शुरू किया। उसी दालान में दीवार के साथ एक आलमारी थी जिसे कुन्दन ने उसी ताली से खोला। नीचे उतरने के लिए सीढियाँ नजर आईं और वह बेखौफ नीचे उतर गई। एक कोठरी में पहुंची जहाँ एक छोटे सिंहासन के ऊपर हाथ-भर लम्बी और इससे कुछ कम चौड़ी ताँबे की एक पट्टी रखी हुई थी। कुन्दन ने उसे उठाकर अच्छी तरह देखा, मालूम हुआ कि कुछ लिखा हुआ है, अक्षर खुदे हुए हुए थे और उन पर किसी तरह की चिकनाई या तेल मला हुआ था जिसके सबब से पटिया अभी तक जंग लगने से बची हुई थी। कुन्दन ने उस लेख को बड़े गौर से पढ़ा और हँसकर चारों तरफ देखने लगी। उस कोठरी की दीवार में दो तरफ दो दरवाजे थे और एक पल्ला जमीन में था। उसने एक दरवाजा खोला तो ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ मिलीं। वह बेखौफ ऊपर चढ़ गई और एक ऐसी तंग कोठरी में पहुँची जिसमें चार-पाँच आदमी से ज्यादा के बैठने की जगह न थी। मगर इस कोठरी के चारों तरफ की दीवारों में छोटे-छोटे कई छेद थे, जलती हुई बत्ती बुझाकर उन छेदों में से एक छेद में आँख लगाकर कुन्दन ने देखा।

कुन्दन ने अपने को ऐसी जगह पाया, जहाँ से वह भयानक मूर्ति, जिसके आगे एक औरत बलि दी जा चुकी थी और जिसका हाल ऊपर लिख आये हैं, साफ दिखाई देती थी। थोड़ी देर में कुन्दन ने वहाँ महाराज दिग्विजयसिंह, तहखाने के दारोगा; लाली, किशोरी और बहुत-से आदमियों को देखा। उसके देखते-ही-देखते एक औरत की उस मूरत के सामने बलि दी गई और कुँअर आनन्दसिंह ऐयारों सहित पकड़े गये। इस तहखाने में से किशोरी और कुँअर आनन्दसिंह का भी कुछ हाल हम ऊपर लिख आये हैं वह सब कुन्दन ने देखा था। आखिर में कुन्दन नीचे उतर आई और उस पल्ले को, जो जमीन में था, उसी ताली से खोलकर तहखाने में उतरने के बाद बत्ती बाल कर देखने लगी। छत की तरफ निगाह करने से मालूम हुआ कि वह सिंहासन पर बैठी हुई भयानक मूर्ति, जो भीतर की तरफ से बिल्कुल (सिंहासन-सहित) पोली थी, उसके सिर के ठीक ऊपर है।

कुन्दन फिर ऊपर आई और दीवार में लगे हुए दूसरे दरवाजे को खोलकर एक सुरंग में पहुँची। कई कदम जाने के बाद एक छोटी खिड़की मिली। उसी ताली से कुन्दन ने उस खिड़की को भी खोला। अब वह उस रास्ते में पहुँच गई जो दीवानखाने और तहखाने में आने-जाने के लिए था और जिस राह से महाराज आते थे। तहखाने से दीवानखाने में जाने तक जितने दरवाजे थे, सभी को कुन्दन ने अपनी ताली से बन्द कर दिया। ताले के अलावे उन दरवाजों में एक-एक खटका और था, उसे भी कुन्दन ने चढ़ा दिया। इस काम से छुट्टी पाने के बाद फिर वहाँ पहुँची जहाँ से वह भयानक मूर्ति और आदमी सब दिखाई दे रहे थे। कुन्दन ने अपनी आँखों से राजा दिग्वजयसिंह की घबराहट देखी जो दरवाजा बन्द हो जाने से उन्हें हुई थी।

मौका देखकर कुन्दन वहाँ से उतरी और उस तहखाने में जो उस भयानक मूर्ति के नीचे था, पहुँची। थोड़ी देर तक कुछ बकने के बाद कुन्दन ने ही वे शब्द कहे जो उस भयानक मूर्ति के मुंह से निकलते हुए राजा दिग्विजयसिंह या और लोगों ने सुने थे और जिनके मुताबिक किशोरी बारह नम्बर की कोठरी में बन्द कर दी गई थी। असल में वे शब्द कुन्दन ही के कहे हुए थे, जो सब लोगों ने सुने थे।

कुन्दन वहाँ से निकलकर यह देखने के लिए कि राजा किशोरी को उस कोठरी में बन्द करता है या नहीं, फिर उस छत पर पहुँची जहाँ से सब लोग दिखाई पड़ते थे। जब कुन्दन ने देखा कि किशोरी उस कोठरी में कैद कर दी गई तो वह नीचे तहखाने में उतरी। उसी जगह से एक रास्ता था जो उस कोठरी के ठीक नीचे पहुँचता था जिसमें किशोरी बन्द की गई थी। वहाँ की छत इतनी नीची थी कि कुन्दन को बैठकर जाना पड़ा। छत में एक पेंच लगा हुआ या जिसके घुमाने से एक पत्थर की चट्टान हट गई और आँचल से मुँह ढाँपे कुन्दन किशोरी के सामने जा खड़ी हुई।

बेचारी किशोरी तरह-तरह की आफतों से आप ही बदहवास हो रही थी, अँधेरे में बत्ती लिये यकायक कुन्दन को निकलते हुए देख घबरा गई। उसने घबराहट में कुन्दन को बिल्कुल नहीं पहचाना, बल्कि उसे भूत, प्रेन या कोई आसेब समझकर डर गई और एक चीख मारकर बेहोश हो गई।

कुन्दन ने अपनी कमर से कोई दवा निकालकर किशोरी को सुंघाई जिससे वह अच्छी तरह बेहोश हो गई, इसके बाद अपनी छोटी गठरी में से सामान निकाल कर वह बरवा अर्थात् 'धनपति रंग मचायौ साध्यौ काम...' इत्यादि लिखकर कोठरी में एक तरफ रख दिया और अपनी कमर से एक चादर खोली, जिसे महल से लेती आई थी, उसी में किशोरी की गठरी बाँधी और नीचे घसीट ले गई। जिस तरह पेंच को घुमाकर पत्थर की चट्टान हटाई थी, उसी तरह रास्ता बन्द कर दिया।

यह सुरंग कोठरी के नीचे खत्म नहीं हुई थी, बल्कि दूर तक चली गई थी और आगे यह चौड़ी और ऊँची होती गई थी। किशोरी को लिये हुए कुन्दन उस सुरंग में चलने लगी। लगभग सौ कदम जाने के बाद एक दरवाजा मिला जिसे कुन्दन ने उसी ताली से खोला, आगे फिर उसी सुरंग में चलना पड़ा। आधी घड़ी के बाद सुरंग का अन्त हुआ और कुन्दन ने अपने को एक खोह के मुंह पर पाया।

इस जगह पहुँच कर कुन्दन ने सीटी बजाई। थोड़ी देर में इधर-उधर से पांच आदमी आ मौजूद हुए और एक ने बढ़कर पूछा, "कौन है? धनपतिजी!"

कुन्दन–हाँ रामा, तुम लोगों को यहाँ बहुत दुःख भोगना पड़ा और कई दिन तक अटकना पड़ा।

रामा-जब हमारे मालिक ही इतने दिनों तक अपने को बला में डाले हए थे. जहाँ से जान बचाना मुश्किल था, तो फिर हम लोगों की क्या बात है। हम लोग तो खले मैदान में थे।

कुन्दन-लो, किशोरी तो हाथ लग गई। अब इसे ले चलो और जहाँ तक जल्द हो सके, भागो।

वे लोग किशोरी को लेकर वहाँ से रवाना हुए।

पाठक तो समझ ही गये होंगे कि किशोरी धनपति के काबू में पड़ गई। कौन धनपति? यह वही धनपति है, जिसे नानक और रामभोली के बयान में आप लोग जान चुके हैं। मेरे इस लिखने से पाठक महाशय चौंकेंगे और उनका ताज्जुब घटेगा नहीं बल्कि बढ़ जायगा, इसके साथ-ही-साथ पाठकों को नानक की यह बात कि 'वह किताब भी जो किसी के खन से लिखी गई है...' भी याद आयेगी, जिसके सबब से नानक ने अपनी जान बचाई थी। पाठक इस बात को भी जरूर सोचेंगे कि कुन्दन अगर असल में धन थी, तो लाली जरूर रामभोली होगी, क्योंकि धनपति को 'किसी के खून से लिखी हुई किताब' का भेद मालूम था और यह भेद रामभोली को मालूम था। जब धनपति ने रोहतासगढ़ महल में लाली के सामने उस किताब का जिक्र किया तो लाली कांप गई. जिससे मालूम होता है कि वह रामभोली ही होगी। किसी के खून से लिखी हुई किताब का नाम सुनकर अगर लाली डर गई तो धनपति भी जरूर समझ गई होगी कि यह रामभोली है, फिर धनपति (कुन्दन) लाली से मिल क्यों न गई, क्योंकि वे दोनों तो एक ही के तुल्य थीं? ऐसी अवस्था में तो इस बात का शक होता है कि लाली रामभोली न थी। फिर तहखाने में धनपति के लिखे हुए 'बरवे' को सुनकर लाली क्यों हँसी? इत्यादि बातों को सोचकर पाठकों की चिन्ता अवश्य बढ़ेगी, पर क्या किया जाय, लाचारी है!

१२

दूसरे दिन दो पहर दिन चढ़े बाद किशोरी की बेहोशी दूर हुई। उसने अपने को एक गहन वन में पेड़ों के झुरमुट में जमीन पर पड़े पाया और अपने पास कुन्दन और कई आदमियों को देखा। बेचारी किशोरी इन थोड़े ही दिनों में तरह-तरह को मुसीबतों में पड़ चुकी थी, बल्कि जिस सायत से वह घर से निकली, आज तक एक पल के लिए भी सुखी न हुई, मानो सुख तो उसके हिस्से ही में न था। एक मुसीबत से छूटी तो दूसरी में फँसी, दूसरी से छूटी तो तीसरी में फँसी। इस समय भी उसने अपने को बुरी अवस्था में पाया। यद्यपि कुन्दन उसके सामने बैठी थी, परन्तु उसे उसकी तरफ से किसी तौर पर कुछ भी भलाई की आशा न थी। इसके अतिरिक्त वहाँ और भी कई आदमियों को देख तथा अपने को बेहोशी की अवस्था में चैतन्य होते पा उसे विश्वास हो गया कि कुन्दन ने उसके साथ दगा की है। रात की बातें वह स्वप्न की तरह याद करने लगी और इस समय भी वह इस बात का निश्चय न कर सकी कि उसके साथ कैसा बर्ताव किया जायगा। थोड़ी देर तक वह अपनी मुसीबतों को सोचती और ईश्वर से अपनी मौत माँगती रही, आखिर उस समय उसे कुछ होश आया जब धनपति (कुन्दन) ने उसे पुकार कर कहा,

"किशोरी, तू घबरा मत, तेरे साथ कोई बुराई न की जायगी।"

किशोरी––मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्या कह रही हो। जो कुछ तुमने किया, उससे बढ़कर और बुराई क्या हो सकती है?

धनपति––तेरी जान नहीं मारी जायगी, बल्कि जहाँ तू रहेगी, हर तरह से आराम मिलेगा।

किशोरी––क्या इन्द्रजीतसिंह भी वहाँ दिखाई देंगे?

धनपति––हाँ, अगर तू चाहेगी।

किशोरी––(चौंककर) हैं, क्या कहा? अगर मैं चाहूँगी?

धनपति––हाँ, यही बात है।

किशोरी––कैसे?

धनपति––एक चिट्ठी इन्द्रजीतसिंह के नाम की लिखकर मुझे दे और उसमें जो कुछ मैं कहूँ, लिख दे!

किशोरी––उसमें क्या लिखना पड़ेगा?

धनपति––केवल इतना ही लिखना पड़ेगा––"अगर आप मुझे चाहते हैं तो बिना कुछ विचार किए इस आदमी के साथ मेरे पास चले आइये और जो कुछ यह माँगे दे दीजिए, नहीं तो मुझसे मिलने की आशा छोड़िए!"

किशोरी—(कुछ देर तक सोचने के बाद) मैं समझ गई कि तुम्हारी नीयत क्या है। नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता। मैं ऐसी चिट्ठी लिखकर प्यारे इन्द्रजीतसिंह को आफत में नहीं फँसा सकती।

धनपति-तब तू किसी तरह भी नहीं छूट सकती।

किशोरी–जो भी हो।

धनपति-बल्कि तेरी जान भी चली जायगी।

किशोरी–बला से, इन्द्रजीतसिंह के नाम पर मैं जान देने को तैयार हूँ।

इतना सुनते ही धनपति (कुन्दन) का चेहरा मारे गुस्से के लाल हो गया, अपने साथियों की तरफ देखकर बोलो, "अब मैं इसे नहीं छोड़ सकती, लाचार हूँ। इसके हाथ-पैर बाँधो और मुझे तलवार दो!" हुक्म पाते ही उसके साथियों ने बड़ी बेरहमी के साथ बेचारी किशोरी के हाथ-पैर बाँध दिए और धनपति तलवार लेकर किशोरी का सिर काटने के लिए आगे बढ़ी। उसी समय धनपति के एक साथी ने कहा, "नहीं, इस तरह मारना मुनासिब न होगा। हम लोग बात-की-बात में सूखी लकड़ियाँ बटोरकर ढेर करते हैं, इसे उसी पर रख कर फूंक दो, जलकर भस्म हो जायगी और हवा के झोंकों में इसकी राख का भी पता न लगेगा।"

इस राय को धनपति ने पसन्द किया और ऐसा ही करने के लिए उन्हें हुक्म दे दिया। संगदिल हरामखोरों ने थोड़ी ही देर में जंगल से चुनकर सूखी लकड़ियों का ढेर दिया। हाथ-पैर बाँध कर बेबस की हुई किशोरी उसी पर रख दी गई। धनपति के साथियों में से एक ने बटुए से सामान निकालकर एक छोटी-सी मशाल जलायी और उसे धनपति ने अपने हाथ में ले लिया। मुँह बन्द किए हुए किशोरी यह सब बात देख, सुन और सह रही थी। जिस समय धनपति मशाल लिये चिता के पास पहुँची, किशोरी, ऊँचे स्वर में कहा-

"हे अग्निदेव, तुम साक्षी रहना! मैं कुँअर इन्द्रजीतसिंह की मुहब्बत में खुशी-खुशी अपनी जान देती हूँ। मैं खूब जानती हूँ कि तुम्हारी आँच प्यारे की जुदाई की आँच से बढ़कर नहीं है। जान निकलने में मुझे कुछ भी कष्ट न होगा। प्यारे इन्द्रजीत! देखना, मेरे लिए दुःखी न होना, बल्कि मुझे बिलकुल ही भूल जाना!!

हाय! प्रेम से भरी हुई बेचारी किशोरी की दिल को टुकड़े-टुकड़े कर देने वाली धनपति ने, चिता में मशाल रख ही दी।