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चन्द्रकान्ता सन्तति अध्याय 24 / 24

विषय-सूची

  1. 1 पहला भाग
  2. 2 दूसरा भाग
  3. 3 तीसरा भाग
  4. 4 चौथा भाग
  5. 5 पाँचवाँ भाग
  6. 6 छठा भाग
  7. 7 सातवाँ भाग
  8. 8 आठवाँ भाग
  9. 9 नौवाँ भाग
  10. 10 दसवाँ भाग
  11. 11 ग्यारहवाँ भाग
  12. 12 बारहवाँ भाग
  13. 13 तेरहवाँ भाग
  14. 14 चौदहवाँ भाग
  15. 15 पन्द्रहवाँ भाग
  16. 16 सोलहवाँ भाग
  17. 17 सत्रहवाँ भाग
  18. 18 अठारहवाँ भाग
  19. 19 उन्नीसवाँ भाग
  20. 20 बीसवाँ भाग
  21. 21 इक्कीसवाँ भाग
  22. 22 बाईसवाँ भाग
  23. 23 तेईसवाँ भाग
  24. 24 चौबीसवाँ भाग

चन्द्रकान्ता सन्तति

चौबीसवाँ भाग

१

दिन घंटे भर से ज्यादा चढ़ चुका है। महाराज सुरेन्द्रसिंह सुनहरी चौकी पर बैठे दातुन कर रहे हैं और जीतसिंह, तेजसिंह, इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, देवीसिंह, भूतनाथ और राजा गोपालसिंह उनके सामने की तरफ बैठे हुए इधर-उधर की बातें कर रहे हैं। रात महाराज की तबीयत कुछ खराब थी, इसलिए आज स्नान-संध्या में देर हो गई है।

सुरेन्द्रसिंह--(गोपालसिंह से) गोपाल, इतना तो हम जरूर कहेंगे कि गद्दी पर वैठने के बाद तुमने कोई बुद्धिमानी का काम नहीं किया, बल्कि हर एक मामले में तुमसे भूल ही होती गई है।

गोपालसिंह--निःसन्देह ऐसा ही है और उस लापरबाही का नतीजा भी मुझे वैसा ही भोगना पड़ा। वीरेन्द्रसिंह धोखा खाये बिना कोई होशियार नहीं होता। कैद से छूटने के बाद तुमने बहुत से अनूठे काम भी किये हैं। हाँ, यह तो बताओ कि दारोगा और जयपाल के लिए तुमने क्या सजा तजवीज की है?

गोपालसिंह--इस बारे में दिन-रात सोचा ही करता हूँ मगर कोई सजा ऐसी नहीं सूझती जो उन लोगों के लायक हो और जिससे मेरा गुस्सा शान्त हो।

सुरेन्द्रसिंह--(मुस्कुरा कर) मैं तो समझता हूँ कि यह काम भूतनाथ के हवाले किया जाय, यही उन शैतानों के लिए कोई मजेदार सजा तजवीज करेगा। (भूतनाथ की तरफ देख के) क्यों जी, तुम कुछ बात सकते हो?

भूतनाथ--(हाथ जोड़ के) उनके योग्य क्या सजा है इसका बताना तो बड़ा ही कठिन है, मगर एक छोटी सी सजा मैं जरूर बात सकता हूँ।

गोपालसिंह--वह क्या?

भूतनाथ--पहले तो उन्हें कच्चा पारा खिलाना चाहिए जिसकी गरमी से उन्हें सख्त तकलीफ हो और तमाम बदन फूट जाय, जब जख्म खूब मजेदार हो जाये तो नित्य लाल मिर्च और नमक का लेप चढ़ाया जाय। जब तक वे दोनों जीते रहें तब तक ऐसा ही होता रहे।

सुरेन्द्रसिंह–सजा हलकी तो नहीं है, मगर किसी की आत्मा..

गोपालसिंह-(बात काटकर) खैर उन कम्बख्तों के लिए आप कुछ न सोचिये, उन्हें मैं जमानिया ले जाऊँगा और उसी जगह उनकी मरम्मत करूँगा।

वीरेन्द्रसिंह--इन सब रज देने वाली बातों का जिक्र जाने दो, यह बताओ कि अगर हम लोग जमानिया के तिलिस्म की सैर करना चाहें तो कैसे कर सकते हैं?

गोपालसिंह--यह तो मैं आप ही निश्चय कर चुका हूँ कि आप लोगों को वहाँ की सैर जरूर कराऊँगा।

इन्द्रजीतसिंह--(गोपाल से) हाँ, खूब याद आया। वहां के बारे में मुझे भी दोएक बातों का शक बना हुआ है।

गोपालसिंह--वह क्या?

इन्द्रजीतसिंह--एक तो यह बताइए कि तिलिस्म के अन्दर जिस मकान में पहले पहल आनन्दसिंह फंसे थे, उस मकान में सिंहासन पर बैठी हुई लाड़िली की मूरत कहाँ से आई और उस आईने (शीशे) वाले मकान में, जिसमें कमलिनी, लाड़िली तथा हमारे ऐयारों की सी मूरतों ने हमें धोखा दिया, क्या था? जब हम दोनों उसके अन्दर गये तो उन मूरतों को देखा जो नालियों पर चला करती थीं, मगर ताज्जुब कि

गोपालसिंह--(बात काट कर) वह सब कार्रवाई मेरी थी। एक तौर पर मैं आप लोगों को कुछ-कुछ तमाशा भी दिखाता जाता था। वे सब मूरतें बहुत पुराने जमाने की बनी हुई हैं मगर मैंने उन पर ताजा रंग-रोगन चढ़ाकर कमलिनी, लाडिली वगैरह की सूरतें बना दी थीं।

इन्द्रजीतसिंह--ठीक है। मेरा भी यही खयाल था। अच्छा, एक बात और बताइये!

गोपालसिंह--पूछिये।

इन्द्रजीतसिंह---जिस तिलिस्मी मकान में हम लोग हँसते-हँसते कूद पड़े थे उसमें कमलिनी के कई सिपाही भी जा फंसे थे और...

गोपलसिंह--जी हाँ, ईश्वर की कृपा से वे लोग कैदखाने में जीते-जागते पाये गये और इस समय जमानिया में मौजूद हैं। उन्हीं में से एक आदमी को दारोगा ने गठरी बाँध कर रोहतासगढ के किले में छोड़ा था जब मैं कृष्ण जिन्न बनकर पहले-पहले वहाँ गया था।

इन्दजीतसिंह--यहबहुत अच्छा हुआ। उन बेचारों की तरफ से मुझे बहुत ही खुटका रहता था।

वीरेन्द्रसिंह--(गोपालसिंह से) आज दलीपशाह की जुबानी जो कुछ उसका किस्सा सुनने में आया उससे हमें बड़ा ही आश्चर्य हुआ। यद्यपि उसका किस्सा अभी तक समाप्त नहीं हुआ और समाप्त होने तक शायद और भी बहुत-सी बातें नई मालूम हों,

परन्तु इस बात का ठीक-ठीक जवाब तो तुम्हारे सिवाय दूसरा शायद कोई नहीं दे सकता कि तुम्हें कैद करने में मायारानी ने कौन सी ऐसी कार्रवाई की कि किसी को पता न लगा और सभी लोग धोखे में पड़ गये, यहाँ तक कि तुम्हारी समझ में भी कुछ न आया और तुम चारपाई पर से उठाकर कैदखाने में डाल दिये गये।

गोपालसिंह––इसका ठीक-ठीक जवाब तो मैं नहीं दे सकता। कई बातों का पता मुझे भी नहीं लगा, क्योंकि मैं ज्यादा देर तक बीमारी की अवस्था में पड़ा नहीं रहा, बहुत जल्द बेहोश कर दिया गया। मैं क्योंकर जान सकता था कि कम्बख्त मायारानी दवा के बदले मुझे जहर पिला रही है, मगर मुझको विश्वास है कि दलीपशाह को इसका हाल बहुत ज्यादा मालूम हुआ होगा।

जीतसिंह––खैर आज के दरबार में और हाल भी मालूम हो जायगा।

कुछ देर तक इसी तरह की बातें होती रहीं। जब महाराज उठ गये तब सब लोग अपने ठिकाने चले गये और कारिन्दे लोग दरबार की तैयारी करने लगे।

भोजन आदि से छुट्टी पाने के बाद दोपहर होते-होते महाराज दरबार में पधारे। आज का दरबार कल की तरह रौनकदार था और आदमियों की गिनती बनिस्बत कल के आज बहुत ज्यादा थी।

महाराज की आज्ञानुसार दलीपशाह ने इस तरह अपना किस्सा बयान करना शुरू किया––

"मैं बयान कर चुका हूँ कि मैंने अपना घोड़ा गिरिजाकुमार को देकर दारोगा का पीछा करने के लिए कहा, अतः जब वह दारोगा के पीछे चला गया तब हम दोनों में सलाह होने लगी कि अब क्या करना चाहिए, अन्त में यह निश्चय हुआ कि इस समय जमानिया न जाना चाहिए, बल्कि घर लौट चलना चाहिए।

"उसी समय इन्द्रदेव के साथी लोग भी वहाँ आ पहुँचे। उनमें से एक का घोड़ा मैंने ले लिया और फिर हम लोग इन्द्रदेव के मकान की तरफ रवाना हुए। मकान पर पहुँचकर इन्द्रदेव ने अपने कई जासूसों और ऐयारों को हर एक बातए का पता लगाने के लिए जमानिया की तरफ रवाना किया किया। मैं भी अपने घर जाने को तैयार हुआ, मगर इन्द्रदेव ने मुझे रोक दिया।

"यद्यपि मैं कह चुका हूँ कि अपने किस्से में भूतनाथ का हाल बयान न करूँगा तथापि मौका पड़ने पर कहीं-कहीं लाचारी से उसका जिक्र करना ही पड़ेगा, अतः इस जगह यह कह देना जरूरी जान पड़ता है कि इन्द्रदेव के मकान पर ही मुझे इस बात की खबर लगी कि भूतनाथ की स्त्री बहुत बीमार हैं। मेरे एक शागिर्द ने आकर यह संदेशा दिया और साथ ही इसके यह भी कहा कि आपकी स्त्री उसे देखने के लिए जाने की आज्ञा माँगती है।

"भूतनाथ की स्त्री शान्ता बड़ी नेक और स्वभाव की बहुत अच्छी है। मैं भी उसे बहिन की तरह मानता था इसलिए उसकी बीमारी का हाल सुनकर मुझे तरद्दुद हुआ और मैंने अपनी स्त्री को उसके पास जाने की आज्ञा दे दी तथा खूबर लगी कि मेरे स्त्री शान्ता को लेकर अपने घर आ गई।

"आठ-दस दिन बीत जाने पर भी न तो जमानिया से कुछ खबर आई और न गिरिजाकुमार ही लौटा। हाँ रियासत की तरफ से एक चिट्ठी न्यौते की जरूर आई, थी जिसके जवाब में इन्द्रदेव ने लिख दिया कि गोपालसिंह से और मुझसे दोस्ती थी सो वह तो चल बसे, अब उनकी क्रिया मैं अपनी आँखों से देखना पसन्द नहीं करता।

"मेरी इच्छा तो हुई कि गिरिजाकुमार का पता लगाने के लिए मैं खुद जाऊँ, मगर इन्द्रदेव ने कहा कि अभी दो-चार दिन और राह देख लो, कहीं ऐसा न हो कि तुम उसकी खोज में जाओ और वह यहाँ आ जाय। अतः मैंने भी ऐसा ही किया।

"बारहवें दिन गिरिजाकुमार हम लोगों के पास आ पहुँचा। उसके साथ अर्जुनसिंह भी थे जो हम लोगों की मण्डली में एक अच्छे ऐयार गिने जाते थे, मगर भूतनाथ और इनके बीच खूब ही चख-चख चली आती थी। (महाराज और जीतसिंह की तरफ देखकर) आपने सुना ही होगा कि इन्होंने एक दिन भूतनाथ को धोखा देकर कुएं में धकेल दिया था और उसके बटुए में से कई चीजें निकाल ली थीं।

जीतसिंह––हाँ मालूम है, मगर इस बात का पता नहीं लगा कि अर्जुन ने भूतनाथ के बटुए में से क्या निकाला था।

इतना कहकर जीतसिंह ने भूतनाथ की तरफ देखा।

भूतनाथ––(महाराज की तरफ़ देखकर) मैंने जिस दिन अपना किस्सा सरकार को सुनाया था उस दिन अर्ज किया था कि जब वह कागज का मुट्ठा मेरे पास से चोरी गया तो मुझे बड़ा ही तरद्दुद हुआ, उसके बहुत दिनों के बाद राजा गोपालसिंह के मरने की खबर उड़ी इत्यादि। यह वही कागज का मुट्ठा था जो अर्जुनसिंह ने मेरे बटुए में से निकाल लिया था, तथा इसके साथ और भी कई कागज थे। असल बात यह है कि उन चिट्ठियों की नकल के मैंने दो मुढे तैयार किये थे, एक तो हिफाजत के लिए अपने मकान में रख छोड़ा था और दूसरा मुट्ठा समय पर काम लेने के लिए हरदम अपने बटुए में रखता था। मुझे गुमान था कि अर्जुनसिंह ने जो मुट्ठा ले लिया था उसी से मुझे नुकसान पहुँचा मगर अब मालूम हुआ कि ऐसा नहीं हुआ, अर्जुनसिंह ने न तो वह किसी को दिया और न उससे मुझे कुछ नुकसान पहुँचा। हाल में जो दूसरा मुट्ठा जयपाल ने मेरे घर से चुरवा लिया था, उसी ने तमाम बखेड़ा मचाया।

जीतसिंह––ठीक है (दलीपशाह की तरफ देख के) अच्छा, तब क्या हुआ?

दलीपशाह ने फिर इस तरह कहना शुरू किया––

दलीपशाह––गिरिजाकुमार और अर्जुनसिंह में एक तरह की नातेदारी भी है परन्तु उसका खयाल न करके ये दोनों आपस में दोस्ती का बर्ताव रखते थे। खैर, उस समय दोनों के आ जाने से हम लोगों को खुशी हुई और इस तरह बातें होने लगीं––

मैं––गिरिजाकुमार, तुमने तो बहुत दिन लगा दिए!

गिरजाकुमार––जी हाँ, मुझे तो और भी कई दिन लग जाते मगर इत्तिफाक से अर्जुनसिंह से मुलाकात हो गई और इनकी मदद से मेरा काम बहुत जल्द हो गया।

मैं––खैर यह बताओ कि तुमने किन-किन बातों का पता लगाया और मुझसे बिदा होकर तुम दारोगा के पीछे कहाँ तक गए?

गिरिजाकुमार––जयपाल को साथ लिए हुए दारोगा सीधे मनोरमा के मकान पर चला गया। उस समय मनोरमा वहाँ न थी, वह दारोगा के आने के तीन पहर बाद रात के समय अपने मकान पर पहुँची। मैं भी छिपकर किसी-न-किसी तरह उस मकान में दाखिल हो गया। रात को दारोगा और मनोरमा में खूब हुज्जत हुई, मगर अन्त में मनोरमा ने उसे विश्वास दिला दिया कि राजा गोपालसिंह को मारने के विषय में उससे जबर्दस्ती पुर्जा लिखा लेने वाला मेरा आदमी न था बल्कि वह कोई और था जिसे मैं नहीं जानती। दारोगा ने बहुत सोच-विचार कर विश्वास कर लिया कि यह काम भूतनाथ का है। इसके बाद उन दोनों में जो कुछ बातें हुईं उनसे यही मालूम हुआ कि गोपालसिंह जरूर मर गये और दारोगा को भी यही विश्वास है, मगर मेरे दिल में यह बात नहीं बैठती, खैर, जो कुछ हो। उसके दूसरे दिन मनोरमा के मकान में से एक कैदी निकाला गया जिसे बेहोश करके जयपाल ने बेगम के मकान में पहुँचा दिया। मैंने उसे पहचानने के लिए बहुत कुछ उद्योग किया मगर पहचान न सका क्योंकि उसे गुप्त रखने में उन्होंने बहुत कोशिश की थी, मगर मुझे गुमान होता है कि यह जरूर बलभद्रसिंह होगा। अगर वह दो-दिन भी बेगम के मकान में रहता तो मैं जरूर निश्चय कर लेता मगर न मालूम किस वक्त और कहाँ बेगम ने उसे पहुँचवा दिया कि मुझे इस बात का कुछ भी पता न लगा, हाँ इतना जरूर मालूम हो गया कि दारोगा भूतनाथ को फँसाने के फेर में पड़ा हुआ है और चाहता है किसी तरह भूतनाथ मार डाला जाय।

"इन कामों से छुट्टी पाकर दारोगा अकेला अर्जुनसिंह के मकान पर गया, इनसे बड़ी नरमी और खुशामद के साथ मुलाकात की, और देर तक मीठी-मीठी बातें करता रहा जिसका तत्व यह था कि तुम दलीपशाह को साथ लेकर मेरी मदद करो और जिस तरह हो सके, भूतनाथ को गिरफ्तार करा दो। अगर तुम दोनों की मदद से भूतनाथ गिरफ्तार हो जायगा तो मैं इसके बदले में दो लाख रुपया तुम दोनों को इनाम दूँगा, इसके अतिरिक्त वह आपके नाम का एक पत्र भी अर्जुनसिंह को दे गया।

"अर्जुनसिंह ने दारोगा का वह पत्र निकाल कर मुझे दिया, मैंने पढ़कर इन्द्रदेव के हाथ में दे दिया और कहा, "इसका मतलब भी वही है जो गिरिजाकुमार ने अभी बयान किया है परन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मैं भूतनाथ के साथ किसी तरह की बुराई करूँ, हाँ, दारोगा के साथ दिल्लगी अवश्य करूँगा।"

"इसके बाद कुछ देर तक और भी बातचीत होती रही। अन्त में गिरिजाकुमार ने कहा कि मेरे इस सफर का नतीजा कुछ भी न निकला और न मेरी तबीयत ही भरी, आप कृपा करके मुझे जमानिया जाने की इजाजत दीजिए।

"गिरिजाकुमार की दरखास्त मैंने मंजूर कर ली। उस दिन रात-भर हम लोग इन्द्रदेव के यहाँ रहे, दूसरे दिन गिरिजाकुमार जमानिया की तरफ रवाना हुआ और मैं अर्जुनसिंह को साथ लेकर अपने घर मिर्जापुर चला आया।

"घर पहुँचकर मैंने भूतनाथ की स्त्री शान्ता को देखा जो बीमार तथा बहुत ही कमजोर और दुबली हो रही थी, मगर उसकी सब बीमारी भूतनाथ की नादानी के सबब से थी और वह चाहती थी कि जिस तरह भूतनाथ ने अपने को मरा हुआ हुआ मशहूर किया था उसी तरह वह भी अपने और अपने छोटे बच्चे के बारे में मशहूर करे। उसकी अवस्था पर मैं बड़ा दुःखी हुआ और जो कुछ वह चाहती थी, उसका प्रबन्ध मैंने कर दिया। यही सबब था कि भूतनाथ ने अपने छोटे बच्चे के विषय में धोखा खाया जिसका हाल महाराज तथा राजकुमारों को मालूम है, मगर सर्वसाधारण के लिए मैं इस समय उसका जिक्र न करूंगा। इसका खुलासा हाल भूतनाथ अपनी जीवनी में बयान करेगा। खैर--

"घर पहुँचकर मैंने दिल्लगी के तौर पर भूतनाथ के विषय में दारोगा से लिखा-पढ़ी शुरू कर दी मगर ऐसा करने में मेरा असल मतलब यह था कि मुलाकात होने पर मैं वह सब पत्र, जो इस समय हरनामसिंह के पास मौजूद हैं भूतनाथ को दिखाऊँ और उसे होशियार कर दूं, अतः अन्त में मैंने उसे (दारोगा को) साफ-साफ जवाब दे दिया।"

यहाँ तक अपना किस्सा कहकर दलीपशाह ने हरनामसिंह की तरफ देखा और हरनामसिंह ने सब पत्र जो एक छोटी-सी सन्दूकड़ी में बन्द थे महाराज के आगे पेश किये जिसे मामूली तौर पर सभी ने देखा। इन चिट्ठियों से दारोगा की बेईमानी के साथ-ही साथ यह भी साबित होता था कि भूतनाथ ने दलीपशाह पर व्यर्थ ही कलंक लगाया। महाराज की आज्ञानुसार वे चिट्ठियाँ कम्बख्त दारोगा के आगे फेंक दी गईं और इसके बाद दलीपशाह ने फिर इस तरह बयान करना शुरू किया-

"मेरे और दारोगा के बीच में जो कुछ लिखा-पढ़ी हुई थी, उसका हाल किसी तरह भूतनाथ को मालूम हो गया या शायद वह स्वयं दारोगा से जाकर मिला और दारोगा ने मेरी चिट्ठियाँ दिखाकर इसे मेरा दुश्मन बना दिया तथा खुद भी मेरी बर्बादी के लिए तैयार हो गया। इस तरह दारोगा की दुश्मनी का वह पौधा जो कुछ दिनों के लिए मुरझा गया था फिर से लहलहा उठा और हरा-भरा हो गया, और साथ ही इसके मैं भी हर तरह से दारोगा का मुकाबला करने के लिए तैयार हो गया।

"कई दिन के बाद गिरिजाकुमार जमानिया से लौटा तो उसकी जुबानी मालूम हुआ कि मायारानी के दिन बड़ी खुशी और चहल-पहल के साथ गुजर रहे हैं। मनोरमा और नागर के अतिरिक्त धनपत नामकी एक और औरत भी है जिसे मायारानी बहुत प्यार करती है मगर उस पर मर्द होने का शक होता है। इसके अतिरिक्त यह भी मालूम हुआ कि दारोगा ने मेरी गिरफ्तारी के लिए तरह-तरह के बन्दोबस्त कर रक्खे हैं और भूतनाथ भी दो-तीन दफे उसके पास आता-जाता दिखाई दिया है, मगर यह बात निश्चय रूप से मैं नहीं कह सकता कि वह जरूर भूतनाथ ही था।

"एक दिन संध्या के समय जब दारोगा अपने बाग में टहल रहा था तो भेष बदले हुए गिरिजाकुमार पिछली दीवार लाँघ के उसके पास जा पहुंचा और बेखौफ सामने खड़ा होकर बोला, "दारोगा साहब, इस समय आप मुझे गिरफ्तार करने का खयाल भी न कीजिएगा क्योंकि मैं आपके कब्जे में नहीं आ सकता, साथ ही इसके यह भी समझ रखिए कि मैं आपकी जान लेने के लिए नहीं आया हूँ, बल्कि आपसे दो-चार बातें करने के लिए आया हूँ।"

दारोगा घबरा गया और उसकी बातों का कुछ विशेष जवाब न देकर बोला,"खैर कहो, क्या कहते हो।"

गिरिजाकुमार--मनोरमा और मायारानी के फेर में पड़कर तुमने राजा गोपालसिंह को मरवा डाला, इसका नतीजा एक-न-एक दिन तुम्हें भोगना ही पड़ेगा।मगर अब मैं यह पूछता हूं कि जिनके डर से तुमने लक्ष्मीदेवी और बलभद्रसिंह को कैद कर रखा था वे तो मर ही गये। अब अगर तुम उन दोनों को छोड़ भी दोगे तो तुम्हारा क्या बिगड़ेगा?

दारोगा--(ताज्जुब में आकर) मेरी समझ में नहीं आता कि तुम कौन हो और क्या कह रहे हो?

गिरिजाकुमार--मैं कौन हूँ यह जानने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं, मगर क्या तुम कह सकते हो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सब झूठ है?

दारोगा–-बेशक झूठ है तुम्हारे पास इन बातों का क्या सबूत है?

गिरिजाकुमार--जयपाल और हेलासिंह के बीच में जो कुछ लिखा-पढ़ी हुई है उसके अतिरिक्त वह चिट्ठी इस समय भी मेरे पास मौजूद है जो राजा गोपालसिंह को मार डालने के लिए तुमने मनोरमा को लिख दी थी।

दारोगा-—मैंने कोई चिट्ठी नहीं लिखी थी, मालूम होता है कि दिलीपशाह और भूतनाथ वगैरह मिल-जुल कर मुझ पर जाल बाँधा चाहते हैं और तुम उन्हीं में से किसी के नौकर हो।

गिरिजाकुमार-- भूतनाथ तो मर गया, अब तुम उसे क्यों बदनाम करते हो?

दारोगा--भूतनाथ जैसा मरा है सो मैं खूब जानता हूँ, अगर खुद मुझसे मुलाकात न हुई होती तो शायद मैं धोखे में आ भी जाता।

गिरिजाकुमार--भूतनाथ तुम्हारे पास न आया होगा, किसी दूसरे आदमी ने सूरत बदलकर तुम्हें धोखा दिया होगा, वह बेशक मर गया!

दारोगा--(सिर हिलाकर) हाँ ठीक है, शायद ऐसा ही हो। मगर उन सब बातों से तुम्हें मतलब ही क्या है और तुम मेरे पास किस लिए आये हो सो कहो।

गिरिजासिंह-मैं केवल इसीलिए आया हूँ कि लक्ष्मीदेवी और बलभद्रसिंह को छोड़ देने के लिए तुमसे प्रार्थना करूँ।

दारोगा--पहले तुम अपना ठीक-ठीक परिचय दो, तब मैं तुम्हारी बातों का जवाब दूंगा।

गिरिजासिंह--अपना ठीक परिचय तो नहीं दे सकता।

दारोगा--तब मैं तुम्हारी बातों का जवाब भी नहीं दे सकता।

"इतना कहकर दारोगा पीछे की तरफ हटा और अपने आदमियों को आवाज दो मगर गिरिजाकुमार ने झपटकर एक मुक्का दारोगा की गर्दन पर जमाया और मारने के बाद तेजी के साथ बाग के बाहर निकल गया।

"उसके दूसरे दिन गिरिजाकुमार ने उसी तरह मायारानी से भी मिलने की कोशिश की मगर उसके खास बाग के अन्दर न जा सका। लाचार उसने मायारानी के ऐयार बिहारीसिंह और हरनामसिंह का पीछा किया और दो ही तीन दिन की मेहनत में धोखा देकर बिहारीसिंह को गिरफ्तार कर लिया और उसे अर्जुनसिंह के यहाँ पहुँचा कर मेरे पास चला आया।

'ऊपर लिखी सब बातें बयान करके गिरिजाकुमार चुप हो गया और तब मैंने उससे कहा, 'बिहारीसिंह को तुमने गिरफ्तार कर लिया, यह बहुत बड़ा काम हुआ और जब तुम बिहारीसिंह बनकर वहाँ जाओगे और चालाकी से उन लोगों में मिल-जुल कर अपने को छिपा सकोगे, तो बेशक बहुत-सी छिपी बातों का पता लग जायगा और हम लोगों के साथ जो कुछ दारोगा करना चाहता है वह भी मालूम हो जायगा।"

गिरिजाकुमार–-बेशक ऐसा ही है। मैं आपसे विदा होकर अर्जुनसिंह के यहाँ जाऊँगा और फिर बिहारीसिंह बनकर जमानिया पहुंचूंगा। मेरे जी में तो यही आया था कि मैं कम्बख्त दारोगा को सीधे यमलोक पहुँचा दूं मगर यह काम आपकी आज्ञा के बिना नहीं कर सकता था।

मैं--नहीं-नहीं, इन्द्रदेव की आज्ञा के बिना यह काम कभी न करना चाहिए, पहले वहाँ का असल हाल तो मालूम करो, फिर इस बारे में इन्द्रदेव से बातचीत करेंगे।

गिरिजाकुमार--जो आज्ञा।

"इसके बाद और भी तरह-तरह की बातचीत होती रही। उस दिन गिरिजाकुमार मेरे ही घर पर रहा दूसरे दिन मुझसे बिदा हो अर्जुनसिंह के पास चला गया।"

इसके वाद आठ दिन तक' मुझे किसी नई बात का पता नहीं लगा। आखिर जब गिरिजाकुमार का पत्र आया तब मालूम हुआ कि वह बिहारीसिंह बनकर बड़ी खूबी के साथ उन लोगों में मिल गया है। उन लोगों की गुप्त कमेटी में भी बैठकर हर एक बात में राय दिया करता है जिससे बहुत जल्द कुल भेदों का पता लग जाने की आशा होती है। गिरिजाकुमार ने यह भी लिखा कि दारोगा को उस चिट्ठी की बड़ी ही चिन्ता लगी हुई है जो मनोरमा के नाम से राजा गोपालसिंह को मार डालने के लिए मैंने (गिरिजाकुमार ने) जबर्दस्ती उससे लिखवा ली थी। वह चाहता है कि जिस तरह हो वह चिट्ठी उसके हाथ लग जाय और इस काम के लिए लाखों रुपये खर्च करने को तैयार है। वह कहता है और वास्तव में ठीक कहता है कि 'उस चिट्ठी का हाल अगर लोगों को मालूम हो जायगा तो दूसरों की कौन कहे, जमानिया की रिआया ही मुझे बुरी तरह से मारने के लिए तैयार हो जायगी। एक दिन हरनामसिंह ने उसे राय दी कि दलीपशाह को मार डालना चाहिए। इस पर बह बहुत ही झुंझलाया और बोला कि 'जब तक वह चिट्ठी मेरे हाथ न लग जाय तब तक दलीपशाह और उसके साथियों को मार डालने से मुझे क्या फायदा होगा। बल्कि मैं और भी बहुत जल्द बरबाद हो जाऊंगा क्योंकि दलीपशाह के मारे जाने से उसके दोस्त लोग जरूर उस चिट्ठी को मशहूर कर देंगे, इसलिए जब तक वह चिट्ठी अपने कब्जे में न आ जाय तब तक किसी के मारने का ध्यान भी मन में न लाना चाहिए। हाँ, दलीपशाह को गिरफ्तार करने से बेशक फायदा पहुँच सकता है। अगर वह कब्जे में आ जायगा तो उसे तरह-तरह की तकलीफ पहुँचाकर किसी प्रकार उस चिट्ठी का पता जरूर लगा लूंगा, इत्यादि।

"वास्तव में बात भी ऐसी ही थी। इसमें कोई शक नहीं कि उसी चिट्ठी की बदौलत हम लोगों की जान बची रही, यद्यपि तकलीफें हद दर्जे की भोगनी पड़ी मगर जान से मारने की हिम्मत दारोगा को न हुई, क्योंकि उसके दिल में विश्वास करा दिया गया था कि हम लोगों की मण्डली का एक भी आदमी जिस दिन मारा जायगा, उसी दिन वह चिट्ठी तमाम दुनिया में मशहूर हो जायगी, इसका बहुत ही उत्तम प्रबन्ध किया गया है।

"इसके बाद कई दिन बीत गये मगर गिरिजाकुमार की फिर ओर कोई चिट्ठी न आई जिससे एक तरह पर तरवुद हुआ और जी में आया कि अब खुद जमानिया चलकर उसका पता लगाना चाहिए।

दूसरे दिन अपने घर की हिफाजत का इन्तजाम करके मैं बाहर निकला और अर्जुनसिंह के घर पहुंचा। ये उस समय अपने कमरे में अकेले बैठे हुए एक चिट्ठी लिख रहे थे। मुझे देखते ही उठ खड़े हुए और बोले, "वाह-वाह, बहुत ही अच्छा हुआ जो आप आ गये, मैं इस समय आप ही के नाम एक चिट्ठी लिख रहा था और उसे अपने शागिर्द के हाथ आपके पास भेजने वाला था, आइये बैठिये।"

मैं--(बैठकर) क्या कोई नई बात मालूम हुई है?

अर्जुनसिंह--नहीं, बल्कि एक नई बात हो गई। मैं-वह क्या?

अर्जुनसिंह--आज रात को बिहारी सिंह हमारी कैद से निकलकर भाग गया है।

मैं--(घबराकर) यह तो बहुत बुरा हुआ।

अर्जुनसिंह--बेशक बुरा हुआ। जिस समय वह जमानिया पहुंचेगा उस समय बेचारे गिरिजाकुमार पर जो बिहारीसिंह बनकर बैठा हुआ है, आफत आ जायगी और वह भारी मुसीबत में गिरफ्तार हो जायगा। मैं यही खबर देने के लिए आपके पास आदमी भेजने वाला था।

मैं-- आखिर ऐसा हुआ ही क्यों? हिफाजत में कुछ कसर पड़ गई थी?

अर्जुनसिंह--अब तो ऐसा ही समझना पड़ेगा चाहे उसकी कैसी ही हिफाजत क्यों न की गई हो, मगर असल में यह एक सिपाही की बेईमानी का नतीजा है क्योंकि बिहारीसिंह के साथ ही वह भी यहाँ से गायब हो गया है। जरूर बिहारीसिंह ने उसे लालच देकर अपना पक्षपाती बना लिया होगा।

मैं--खैर, जो कुछ होना था वह तो हो गया। अब किसी तरह गिरिजाकुमार को बचाना चाहिए क्योंकि असली बिहारीसिंह के जमानिया पहुंचते ही नकली बिहारीसिंह (गिरिजाकुमार) का भेद खुल जायगा और वह मजबूर करके कैदखाने में झोंक दिया जायगा।

अजुनसिंह--मैं खुद यही बात कह चुका हूँ, खैर, अब इस विषय में विशेष सोचविचार न करके जहाँ तक हो जल्द जमानिया पहुंचना चाहिए।

मैं--मैं तो तैयार ही हैं, क्योंकि अभी कमर भी नहीं खोली।

अर्जुनसिंह--खैर, आप कमर खोलिए और कुछ भोजन कीजिए, मैं भी आपके साथ चलने के लिए घंटे भर के अन्दर ही तैयार हो जाऊँगा।

मैं--क्या आप जमानिया चलेंगे?

अर्जुनसिंह--(आवाज में जोर देकर) जरूर!

"घंटे भर के अन्दर ही हम दोनों आदमी जमानिया जाने के लिए हर तरह से तैयार हो गये और ऐवारी का पूरा-पूरा सामान दुरुस्त कर लिया। दोनों आदमी असली सुरत में पैदल ही घर से बाहर निकले और कई कोस निकल जाने के बाद जंगल में बैठकर अपनी सूरत बदली, इसके बाद कुछ देर आराम करके फिर आगे की तरफ रवाना हुए और इरादा लिया कि आज की रात जंगल में पेड़ के ऊपर बैठकर बिता देंगे।

"आखिर ऐसा ही हुआ। संध्या होने पर हम दोनों दोस्त जंगल में एक रमणीक स्थान देखकर अटक गये जहां पानी का सुन्दर चश्मा बह रहा था तथा सलई का एक बहुत बड़ा और घना पेड़ भी था जिस पर बैठने के लिए ऐसी अच्छी जगह थी कि उस पर बैठे-बैठे घंटे-दो घंटे नींद भी ले सकते थे।

यद्यपि हम लोग किसी सवारी पर बहुत जल्द जमानिया पहुँच सकते थे और वहाँ अपने लिए टिकने का भी इन्तजाम कर सकते थे, मगर उन दिनों जमानिया की ऐसी बुरी अवस्था थी कि ऐसा करने की हिम्मत न पड़ी और जंगल में टिके रहना ही उचित जान पड़ा। दोनों आदमी एक-दिल थे, इसलिए कुछ तरदुद या किसी तरह के खुटके का भी कुछ खयाल न था।

"अंधकार छा जाने के साथ ही हम दोनों आदमी पेड़ के ऊपर जा बैठे और धीरे धीरे बातें करने लगे, थोड़ी ही देर बाद कई आदमियों के आने की आहट मालूम हुई, हम देनों चुप हो गये और इन्तजार करने लगे कि देखें कौन आता है। थोड़ी ही देर में दो आदमी उस पेड़ के नीचे आ पहुंचे। रात हो जाने के सबब से हम उनकी शक्ल-सूरत अच्छी तरह नहीं देख सकते थे, घने पेड़ों में से छनी हुई कुछ-कुछ और कहीं-कहीं चन्द्रमा रोशनी जमीन पर पड़ रही थी, उसी से अन्दाजा कर लिया कि ये दोनों सिपाही हैं, मगर ताज्जुब होता था कि ये लोग रास्ता छोड़ भेदियों और ऐयारों की तरह जंगल में क्यों टिके हैं!"

"दोनों आदमी अपनी छोटी गठरी जमीन पर रखकर पेड़ के नीचे बैठ गये और इस तरह बातें करने लगे--

एक--भाई, हमें तो इस जंगल में रात काटना कठिन मालूम होता है।

दूसरा--सो क्यों?

पहला--डर मालूम होता है कि किसी जानवर का शिकार न बन जायें।

दूसरा--बात तो ऐसी ही है। मुझे भी यहां टिकना बुरा मालूम होता है, मगर ज्या किया जाये, बाबाजी का हुक्म ही ऐसा है।

पहला--बाबाजी तो अपने काम के आगे दूसरे की जान का कुछ भी खयाल नहीं करते। जब से हमारे राजा साहब का देहान्त हुआ है, तब से इनका दिमाग और भी बढ़ गया है।

दूसरा-इनकी हुकूमत के मारे तो हमारा जी ऊब गया, अब नौकरी करने की इच्छा नहीं होती।

पहला–मगर इस्तीफा देते भी डर मालूम होता है, झट यही कह बैठेंगे कि 'तू हमारे दुश्मनों से मिल गया है। अगर इस तरह की बात उनके दिल में बैठ जाये, तो जान बचानी भी मुश्किल होगी।

दूसरा-इनकी नौकरी में यही तो मुश्किल है। रुपया खूब मिलता है, इसमें कोई सन्देह नहीं, मगर जान का डर हरदम बना रहता है। कम्बख्त मनोरमा की हुकूमत के मारे तो और भी नाक में दम रहता है। जब से राजा साहब मरे हैं इसने महल में डेरा ही जमा लिया है, पहले डर के मारे दिखाई भी नहीं देती थी। एक बाजारू औरत का इस तरह रियासत में घुसे रहना कोई अच्छी बात है?

पहला-अजी, जब हमारी रानी साहिबा ही ऐसी हैं तो दूसरे को क्या कहें? मनोरमा तो बाबाजी की जान ही ठहरी।

दूसरा-बीच में यह बेगम कम्बख्त नई निकल पड़ी है जहाँ घड़ी-घड़ी दौड़ के जाना पड़ता है!

पहला-(हँसकर) जानते नहीं हो? यह जयपालसिंह की नानी (रण्डी) है। पहले भूतनाथ के पास रही, अब इनके गले पड़ी है। इसे भी तुम आफत की पुड़िया ही समझो, चार दफे मैं उसके पास जा चुका हूँ, आज पाँचवीं दफे जा रहा हूँ, इस बीच में मैं उसे अच्छी तरह पहचान गया।

दूसरा-मैं समझता हूँ कि बिहारीसिंह का भी उससे कुछ सम्बन्ध है।

पहला-नहीं ऐसा तो नहीं है, अगर बिहारीसिंह से बेगम का कुछ लगाव होता तो जयपालसिंह और बिहारीसिंह में जरूर खटक जाती, जिसमें इधर तो बिहारीसिंह बहुत दिनों तक अर्जुनसिंह के यहाँ कैदी ही रहे, आज किसी तरह छूट कर अपने घर पहुँचे हैं, अब देखो गिरिजाकुमार पर क्या मुसीबत आती है।

दूसरा--गिरिजाकुमार कौन हैं?

पहला--वही जो बिहारी सिंह बना हुआ था।

दूसरा--वह तो अपना नाम शिवशंकर बताता है।

पहला--बताता है, मगर मैं तो उसे खूब पहचानता हूँ।

दूसरा--तो तुमने बाबाजी से कहा क्यों नहीं?

पहला--मुझे क्या गरज पड़ी है जो उसके लिए दलीपशाह से दुश्मनी पैदा करूँ? वह दलीपशाह का बहुत प्यारा शागिर्द है, खबरदार तुम भी इस बात का जिक्र किसी से न करना, मैंने तुम्हें अपना दोस्त समझ कर कह दिया है।

दूसरा--गहीं जी, मैं क्यों किसी को कहने लगा? (चौंककर) देखो, यह किसी भयानक जानवर के बोलने की आवाज है।

पहला--तो डर के मारे तुम्हारा दम क्यों निकला जाता है? ऐसा ही है तो थोड़ी सी लकड़ी बटोर कर आग सुलगा लो या पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठो।

दूसरा--इससे तो यही बहतर होगा कि यहाँ से चले चलें, सफर ही में रात काट देंगे, बाबाजी कुछ देखने थोड़े ही आते हैं!

पहला—जैसा कहो।

दूसरा--हमारी तो यही राय है।

पहला--अच्छा चलो, जिसमें तुम खुश रहो, वही ठीक!

"उन दोनों की बातें सुनकर हम लोगों को बहुत सी बातों का पता लग गया।

गिरिजाकुमार की बात सुनकर मुझे बड़ा ही दुःख हुआ, साथ ही इस बात के जानने की उत्कंठा भी हुई कि वे दोनों बेगम के यहां क्यों जा रहे हैं। दिल दो तरफ से खिंचाव में पड़ गया। एक तो इच्छा हुई कि दोनों को कब्जे में करके मालूम कर लें कि बेगम के पास किस मजमून की चिट्ठी ले जा रहे हैं और अगर उचित मालूम हो तो इनकी सूरत बनकर खुद बेगम के पास चलें, सम्भव है कि बहुत से भेदों का पता लग जाये, दूसरे इस बात की भी जल्दी पड़ गई कि किसी तरह शीघ्र जमानिया पहुंचकर गिरिजाकुमार की मदद करनी चाहिए। जब यह मालूम हुआ कि अब वे दोनों यहां से जाना चाहते हैं, तब हम लोग भी झट पेड़ से नीचे उतर आए और उन दोनों के सामने खड़े होकर मैंने कहा, "नहीं, जानवरों के डर से मत भागो, हम लोग तुम्हारे साथ हैं।"

हम दोनों को यकायक इस तरह पेड़ से उतरकर सामने खड़े होते देख वे दोनों डर गये, मगर कुछ देर बाद एफ ने जी कड़ा करके कहा, "भाई, तुम लोग कौन हो? भूत हो, प्रेत हो, या जिन्न हो?"

मैं-डरो मत, हम लोग भूत-प्रेत नहीं हैं, आदमी हैं और ऐयार हैं, तुम लोगों में जो कुछ बातें हुई हैं हम लोग पेड़ पर बैठे-बैठे सुन रहे थे, जब देखा कि अब तुम लोग जाना चाहते हो तो हम दोनों भी उतर आये।

एक सिपाही-(घबरायी आवाज से) आप कहाँ के रहने वाले और कौन है?

मैं--हम दोनों आदमो दलीपशाह के नौकर हैं।

दूसरा--अगर आप दलीपशाह के नौकर हैं तो हम लोगों को विशेष नहीं डरना चाहिए क्योंकि आप लोग न तो हमारे मालिकों से मिलेंगे और न इस बात का जिक्र करेंगे कि हम लोग क्या वातें करते थे, हाँ, अगर कोई हमारे दरर का आदमी होता तो जरूर हम लोग बर्बाद हो जाते।

मैं--बेशक ऐसा ही है और तुम लोगों की बातों से यह जानकर हम दोनों बहुत प्रसन्न हुए कि तुम लोग नेक, ईमानदार और इन्साफपसन्द आदमी हो और हमें यह भी उम्मीद है कि जो कुछ हम पूछेगे, उसका ठीक-ठीक जवाब दोगे।

दूसरा--हमारी बातों से आप जान ही चुके हैं कि हम लोग कैसे खूखार आदमी के नौकर हैं और आप लोगों से बातें करने का कैसा बुरा नतीजा निकल सकता है।

मैं--ठीक है, मगर तुम्हारे दारोगा साहब को इन बातों की खबर कुछ भी नहीं लगेगी।

पहला--इस समय हम आपक काबू में हैं क्योंकि सिपाही होने पर भी ऐयारों का मुकाबला नहीं कर सकते तिस पर ऐसी अवस्था में कि दोनों तरफ की गिनती बराबर हो इसलिए इस समय आप जो कुछ चाहें हम लोगों पर जबर्दस्ती कर सकते हैं।

मैं-नहीं-नहीं, हम लोग तुम पर जबर्दस्ती नहीं करना चाहते, बल्कि तुम्हारी खुशी और हिफाजत का खयाल रखकर अपना काम निकालना चाहते हैं।

पहला-इसके अतिरिक्त हम लोगों को इस बात का भी निश्चय हो जाना चाहिए कि आप लोग वास्तव में दलीपशाह के ऐयार हैं और हम लोगों की हिफाजत के लिए आपने कोई अच्छी तरकीब सोच ली है, अगर हम लोग आपकी किसी भी बात का जवाब दें।

सिपाही की आखिरी बात से हमें निश्चित हो गया कि वे लोग हमारे कब्जे में आ जायेंगे और हमारी बात मान लेंगे और अगर ऐसा न करते तो वे लोग कर ही क्या सकते थे? आखिर हर तरह का ऊँच-नीच दिखाकर हमने उन्हें राजी कर लिया और अपना सच्चा परिचय देकर उन्हें विश्वास करा दिया कि जो कुछ हमने कहा है, सब सच है। इसके बाद हमने जो कुछ पूछा, उन्होंने साफ-साफ बता दिया और जो कुछ देखना चाहा (बेगम के नाम का पत्र इत्यादि) दिखा दिया। गिरिजाकुमार के बारे में तो जो कुछ पहले मालूम कर चुके थे, उससे ज्यादा हाल कुछ मालूम न हुआ क्योंकि उसके विषय में उन्हें कुछ विशेष खबर ही न थी, केवल इतना ही जानते थे कि असली बिहारीसिंह के पहुँचने पर नकली बिहारीसिंह (गिरिजाकुमार) गिरफ्तार कर लिया गया, हां, दूसरी बात यह मालूम हो गई कि वे दोनों आदमी दारोगा और जयपाल की चिट्ठी लेकर बेगम के पास जा रहे हैं, कल संध्या-समय तक बेगम के पास पहुंच जायेंगे और परसों संध्या को बेगम को साथ लिए हुए किश्ती की सवारी से गंगाजी की तरफ से रातोंरात जमानिया लौटेंगे। अतः हम लोगों ने उन दोनों सिपाहियों को जिस तरह बन पड़ा, इस बात पर राजी कर किया कि जब तुम लोग बेगम को लिए हुए रातोंरात गंगाजी की राह लौटो, तो अमुक समय अमुक स्थान पर कुछ देरी के लिए किसी बहाने से किश्ती किनारे लगा कर रोक लेना, उस समय हम लोग डाकुओं की तरह पहुंचकर बेगम को गिरफ्तार कर लेंगे और जो कुछ चीजें हमारे मतलब की उसके पास होंगी उन्हें ले लेंगे, मगर तुम लोगों को छोड़ देंगे, इस तरह से हमारा काम भी निकल जायेगा और तुम लोगों पर कोई किसी तरह का शक भी न कर सकेगा।

"रुपये पाने के साथ ही अपना किसी तरह का हर्ज न देखकर दोनों सिपाहियों ने इस बात को भी मंजूर कर लिया। इसके बाद हम लोगों में मेल-मुहब्बत की बातचीत होने लगी और तमाम रात हम लोगों ने उस पेड़ पर काट दी। सवेरा होने पर दोनों सिपाही हमसे बिदा होकर चले गये, हम सब लोग आपस में विचार करने लगे कि अब क्या करना चाहिए। अंत में यह निश्चय करके कि अर्जुनसिंह तो गिरिजाकुमार को छुड़ाने के लिए जमानिया जायें और मैं बेगम के फंसाने का बन्दोबस्त करूँ, हम दोनों भी एक-दूसरे से बिदा हुए।

"इस जगह मैं किस्से के तौर पर थोड़ा-सा हाल गिरिजाकुमार का बयान करूंगा जो कुछ दिन बाद मुझे उसी की जुबानी मालूम हुआ था।

"अर्जुनसिंह की कैद से छुटकारा पाकर बिहारीसिंह सीधे जमानिया दारोगा के पास चला, मगर ऐसे ढंग से गया कि किसी को कुछ मालूम हुआ, न गिरिजाकुमार ही को इस बात का पता लगा। रात पहर-भर से कुछ ज्यादा जा चुकी थी जब दारोगा ने नकली बिहारीसिंह अर्थात् गिरिजावुमार को अपने घर बुलाया। नेवारे गिरिजाकुमार को क्या खबर थी कि आज मैं मुसीबत में डाला जाऊंगा। वह बेधड़क मामूली ढंग पर बाबाजी (दारोगा) के मकान पर चला गया और देखा कि दारोगा अकेले ऊँची गद्दी पर बैठा हुआ है और उसके सामने सात-आठ सिपाही तलवार लगाये खड़े हैं। दारोगा का इशारा पाकर गिरिजाकुमार उसके सामने बैठ गया। बैठने के साथ ही उन सब सिपाहियों ने एक साथ गिरिजाकुमार को धर दबाया और बात की बात में हाथ-पैर बांध के छोड़ दिया। बेचारा गिरिजाकुमार अकेला कुछ भी न कर सका और जो कुछ हुआ, उसने चुपचाप बर्दाश्त कर लिया। इसके बाद पारोगा ने ताली बजाई, उसी समय असली बिहारीसिंह कोठरी में से निकलकर बाहर चला आया और गिरिजाकुमार की तरफ देख के बोला, "अब तो तुम समझ गये होंगे कि तुम्हारा भण्डा फूट गया और मैं तुम्हारी कैद से छूट के निकल आया, मगर शाबाश, तुमने बड़ी खूवी के साथ मुझे धोखा देकर गिरफ्तार किया था। अब मेरी पारी है, देखो, मैं किस तरह तुमसे बदला लेता हूँ!"

गिरिजाकुमार-यह तो ऐयारों का काम ही है कि एक-दूसरे को धोखा दिया करते हैं, इसमें अनर्थ क्या हो गया? मेरा दांव लगा मैंने तुम्हें गिरफ्तार करके कैदखाने में डाल दिया, अब तुम्हारा दांव लगा है तो तुम मुझे कैदखाने में डाल दो। जिस तरह तुम अपनी चालाकी से छूट आये हो, उसी तरह छूटने के लिए मैं भी उद्योग करूंगा।

बिहारीसिंह-सो तो ठीक है, मगर इतना समझ रखो कि हम लोग तुम्हारे साथ मामूली बर्ताव न करेंगे बल्कि हद दर्जे की तकलीफ देंगे।

गिरिजाकुमार-यह तो ऐयारी के कायदे के बाहर है।

बिहारीसिंह-जो भी हो।

गिरिजाकुमार-खैर, कोई हर्ज नहीं, जो कुछ होगा झेलेंगे।

बिहारीसिंह-अगर तुम तकलीफ से बचना चाहो तो मेरी बातों का साफ और सच-सच जवाब दो।

गिरिजाकुमार-वादा तो नहीं करते, मगर जो कुछ पूछना हो पूछो।

बिहारीसिंह-तुम्हारा नाम क्या है?

गिरिजाकुमार-शिवशंकर।

बिहारीसिंह-किसके नौकर हो?

गिरिजाकुमार-किसी के भी नहीं।

बिहारीसिंह-फिर यहाँ किसके काम के लिए आये?

गिरिजाकुमार-गुरुजी के।

बिहारीसिंह-तुम्हारा गुरु कौन है!

गिरिजाकुमार-वही जिसे तुम जान चुके हो और जिसके यहाँ इतने दिनों तक तुम कैद थे।

बिहारीसिंह--अर्जुनसिंह?

गिरिजाकुमार--हाँ।

बिहारीसिंह--उन्हें हम लोगों से क्या दुश्मनी थी?

गिरिजाकुमार--कुछ भी नहीं।

बिहारीसिंह--फिर यहाँ उत्पात मचाने के लिए तुम्हें भेजा क्यों?

गिरिजाकुमार--मुझे सिर्फ भूतनाथ का पता लगाने के लिए भेजा था, क्योंकि उन्हें भूतनाथ से बहुत ही रंज है। यद्यपि भूतनाथ ने अपना मरना मशहूर किया है मग उन्हें विश्वास है कि वह मरा नहीं और दारोगा साहब के साथ मिल-जुलकर काम क रहा है और उनकी (अर्जुनसिंह की) बर्बादी का बन्दोबस्त करता है। इसी से उन्हों मुझे आज्ञा दी थी कि दारोगा साहब के यहाँ घुस-पैठकर और कुछ दिन तक उन लोगों के साथ रहकर ठीक-ठीक पता लगाओ और बन पड़े तो उसे गिरफ्तार भी कर लो, बस!

बिहारीसिंह--भूतनाथ और अर्जुनसिंह से लड़ाई क्यों हो गई? गिरिजाकुमार-लड़ाई तो बहुत पुरानी है, मगर इधर जब से गुरुजी ने उसका ऐयारी का बटुआ ले लिया, तब से रंज ज्यादा हो गया है।

बिहारीसिंह--(ताज्जुब से) क्या भूतनाथ का बटुआ अर्जुनसिंह ने ले लिया?

गिरिजाकुमार--हाँ।

बिहारीसिंह--उसमें से क्या चीज निकाली?

गिरिजाकुमार--सो तो नहीं मालूम, मगर इतना गुरुजी कहते थे कि उस बटुए के बिना हमारा काम नहीं चला इसलिए उसे गिरफ्तार ही करना पड़ेगा।

बिहारीसिंह--मगर भूतनाथ के खयाल से तुम्हारे गुरुजी ने हमको क्यों तक-लीफ दी?

गिरिजाकुमार--तुम्हें उन्होंने किसी भी तरह की तकलीफ नहीं दी, बल्कि बड़े आराम के साथ कैद में रखा था, क्योंकि तुम लोगों से उन्हें किसी तरह की दुश्मनी नहीं है। उनका खयाल यही था कि बिहारीसिंह को तीन-चार दिन से ज्यादा कैद में रखने की जरूरत न पड़ेगी और इसके बीच में ही भूतनाथ का पता लग जायगा। उन्हें इस बात की भी खबर लगी थी कि भूतनाथ जमानिया में बिहारीसिंह के पास आया करता है मगर यहां आने से मुझे उसका कुछ भी पता न लगा, अब मैं एक-दो दिन में खुद ही लौट जाने वाला था। तुम अपनी बुद्धिमानी से अगर न भी छूटते तो एक-दो दिन में जरूर छोड़ दिये जाते।

"गिरिजाकुमार ने ऐसी सूरत बनाकर ये बातें कहीं कि दारोगा और बिहारी-सिंह को उसकी सच्चाई पर विश्वास हो गया। मैं पहले ही यह बयान कर चुका हूँ कि गिरिजाकुमार बातचीत के समय सूरत बनाना बहुत ही अच्छा जानता था। अब गिरिजा-कुमार और बिहारीसिंह की बातें सुन दारोगा ने कहा-"शिवशंकर, मालूम तो होता है कि तुम जो कुछ कहते हो वह सच ही है, परन्तु ऐयारों की बातों पर विश्वास करना जरा मुश्किल है, फिर भी तुम अच्छे और साफ दिल के मालूम होते हो।"

गिरिजाकुमार--आप चाहे जो खयाल करें, मगर मैं तो यही समझता हूँ कि आप लोगों से मुझे झूठ बोलने की जरूरत ही क्या है? न मेरे गुरुजी को आप लोगों से दुश्मनी है न मुझी को; हाँ अगर यह मालूम हो जायगा कि हमारे मुकाबले में आप लोग भूतनाथ को सहायता करते हैं तो बेशक दुश्मनी हो जायगी, यह मैं खुले दिल से कहे देता हूँ चाहे आप मुझे बेवकूफ समझें या नालायक।

दारोगा--नहीं-नहीं शिवशंकर, हम लोग भूतनाथ की मदद किसी तरह नहीं कर सकते, हम तो उसे खुद ही ढूंढ़ रहे हैं, मगर उस कम्बखत का कहीं पता ही नहीं लगता। ताज्जुब नहीं कि वास्तव में मर ही गया हो।

गिरिजाकुमार-—(सिर हिलाकर) कदापि नहीं, अभी महीने भर से ज्यादा न हुआ होगा कि मैंने खुद अपनी आँखों से उसे देखा था, मगर उस समय मैं ऐसी अवस्था में था कि कुछ न कर सका। खैर, कम्बख्त जाता कहाँ है, मुझे उसके दो-चार ठिकाने ऐसे मालूम हैं कि जिसके सबब से एक न एक दिन उसे जरूर गिरफ्तार कर लूंगा।

दारोगा—-(ताज्जुब और खुशी से) क्या तुमने उसे खुद अपनी आँखों से देखा था और उसके दो-चार ठिकाने तुम्हें मालूम हैं?

गिरिजाकुमार–बेशक?

दारोगा--क्या उन ठिकानों का पता मुझे बता सकते हो?

गिरिजाकुमार--नहीं।

दारोगा--सो क्यों?

गिरिजाकुमार--गुरुजी को मुझे जो कुछ ऐयारी सिखानी थी, सिखा चुके। मैं गुरुजी से वादा कर चुका हूँ कि अब आपकी इच्छानुसार गुरुदक्षिणा में भूतनाथ को गिरफ्तार करके आपके हवाले करूंगा और जब तक ऐसा न करूँगा, अपने घर कदापि न जाऊँगा। ऐसी अवस्था में अगर मैं भूतनाथ का कुछ पता आपको बता दूं तो मानो अपने पैर में आप ही कुल्हाड़ी मारूंगा, क्योंकि आप अमीर और शक्तिसम्पन्न हैं, बनिस्बत मुझ गरीब के आप उसे बहुत जल्द गिरफ्तार कर सकते हैं, अब अगर ऐसा हुआ और वह गया तो मैं सूखा ही रह जाऊँगा और गुरु-दक्षिणा न दे सकने के कारण अपने घर भी न जा सकूँगा।

दारोगा-—(हंसकर) मगर शिवशंकर, तुम बड़े ही सीधे आदमी हो और बहुत ही साफ-साफ कह देते हो, ऐयारों को ऐसा न करना चाहिए।

गिरिजाकुमार-नहीं साहब, आपसे साफ-साफ कह देने में कोई हर्ज नहीं है।क्योंकि आप हमारे दुश्मन नहीं हैं, दूसरे यह कि अभी तक मुझे ऐयार की पदवी भी नहीं मिली, जब गुरुदक्षिणा देकर ऐयार की पदवी पा जाऊँगा तो ऐयारों की सी चाल चलूंगा, अभी तो मैं एक गरीब छोकरा हूँ।

दारोगा--नहीं, तुम बहुत अच्छे आदमी हो। हम तुमसे खुश हैं। (बिहारीसिंह की तरफ देख के) इस बेचारे के हाथ-पैर खोल दो!(गिरिजाकुमार से) मगर तुम भूतनाथ का जो कुछ पता-ठिकाना जानते हो हमें बता दो, हम तुमसे वादा करते हैं कि भूतनाथ को गिरफ्तार करके अपना काम भी निकाल लेंगे और तुम्हारे सिर से गुरु-दक्षिणा का बोझ भी उतरवा देंगे।

गिरिजाकुमार--(मुंह बिचका कर और सिर हिलाकर) जी नहीं। हाँ, अगर इसके साथ आप और भी दो-तीन बातों का वादा करें, तो मैं बेशक आपकी मदद कर आपके हाथ सकता हूँ।

बिहारीसिंह--(गिरिजाकुमार के हाथ-पैर खोलकर) तुम और जो कुछ चाहोगे,बाबाजी देंगे, मगर इनकी बातों से इनकार न करो।

गिरिजाकुमार--(अच्छी तरह बैठकर) ठीक है, मगर मैं विशेष धन-दौलत नहीं चाहता, और न मुझे इसकी जरूरत ही है, क्योंकि ईश्वर ने मुझे बिल्कुल ही अकेला कर दिया है-न बाप, न मां, न भाई, न भौजाई, ऐसी अवस्था में मैं धन-दौलत लेकर क्या करूंगा? मगर दो-तीन बातों का इकरार लिए बिना मैं दारोगा साहब को कुछ भी नहीं बताऊँगा, चाहे मार ही डाला जाऊँ!

दारोगा--(मुस्कराकर) अख्छा-अच्छा बताओ, तुम क्या चाहते हो?

गिरिजाकुमार--एक तो यह कि उसकी खोज में मैं अगुआ रखा जाऊँ।

दारोगा-मंजूर है, अच्छा और बताओ।

गिरिजाकुमार--बिहारीसिंह मेरी मदद के लिए दिये जायें, क्योंकि मैं भी इन्हें पसन्द करता हूँ।

दारोगा--यह भी कबूल है, और बोलो।

गिरिजाकुमार--जहाँ तक जल्द हो सके मैं गुरुदक्षिणा के बोझ से हलका किया जाऊँ, क्योंकि इसके लिए मैं जोश में आकर बहुत बुरी कसम खा चुका हूँ। यद्यपि गुरुजी मना करते थे कि तुम कसम न खाओ, तुम्हारे जैसे जिद्दी आदमी का कसम खाना अच्छा नहीं है!

दारोगा--वेशक तुम जो चाहते हो वही होगा, और कहो!

गिरिजाकुमार--गुरुदक्षिणा से छुट्टी पाकर मैं ऐयार की पदवी पा जाऊँ तो मुझे यहां किसी तरह नौकरी मिल जाय जिसमें मेरा गुजारा चले, और मेरी शादी करा दी जाय। यह मैं इसलिए कहता हूँ कि मुझे शादी करने का शौक है और मैं अपनी बिरादरी में ऐसा गरीव हूँ कि कोई मुझे लड़की देना कबूल न करेगा।

दारोगा--यह सब कुछ हो जायगा, तुम कुछ चिन्ता न करो। और फिर तुम गरीब भी न रहोगे। अच्छा बताओ, और भी कुछ चाहते हो!

गिरिजाकुमार--एक बात और है।

दारोगा--वह भी कह डालो।

गिरिजाकुमार--(विहारीसिंह की तरफ इशारा करके)ये हमारे गुरुजी से किसी तरह की दुश्मनी न रखें और मेरे साथ वहां चलने में कोई परहेज न करें। देखिये, अपने दिल का हाल बहुत साफ कह रहा हूँ।

बिहारीसिंह-- ठीक है, ठीक है। जो कुछ तुम कहते हो, मंजूर है।

गिरिजाकुमार--(दारोगा की तरफ देखकर) तो बस, मैं आपका हुक्म बजा लाने के लिए दिलोजान से तैयार हूँ।

दारोगा--अच्छा तो अब उसके दो-तीन ठिकाने जो तुम्हें मालूम हैं, उनका पता चताओ।

गिरिजाकुमार--पता क्या, अव तो मैं खुद इनको (बिहारीसिंह को) अपने साथ ले चलकर सब-कुछ दिखाऊँगा और पता लगाऊँगा। मैं उस कम्बख्त को बिना ढूँढ़े छोड़ने वाला नहीं, मुझे आप चाणक्य की तरह जिद्दी समझिये।

दारोगा--अच्छा यह तो बताओ तुमने भूतनाथ को कहाँ देखा था जिसका जिक्र अभी तुमने किया है।

गिरिजाकुमार--बेगम के मकान से बाहर निकलते हुए।

बिहारीसिंह--(ताज्जुब से) कौन बेगम?

गिरिजाकुमार--वही, जिसे जयपालसिंह अपनी समझते हैं। ताज्जुब क्या करते हैं, उसे आप साधारण औरत न समझिए। मैं साबित कर दूंगा कि उसका मकान भी भूतनाथ का एक अड्डा है, मगर वहाँ इत्तिफाक ही से वह कभी जाता है, हाँ बेगम उससे मिलने के लिए कभी कहीं जाती है, परन्तु उसका ठीक हाल मुझे मालूम नहीं हुआ। मैंने तो अब तक उसका भी पता लगा लिया होता, मगर क्या कहूँ, गुरुजी ने कहा कि तुम जमानिया हो आओ, वहाँ भूतनाथ जल्दी मिल जायगा, नहीं तो मैं बेगम का ही पीछा करने वाला था।

दारोगा--मुझे तुम्हारी इन बातों पर ताज्जुब मालूम पड़ता है!

गिरिजाकुमार--अभी क्या है, आगे चलकर और भी ताज्जुब होगा, जब खुद बिहारीसिंह वहाँ की कैफियत आपसे बयान करेंगे।

दारोगा--खैर, अगर तुम्हारी राय हो तो मैं बेगम को यहाँ बुलाऊँ?

गिरिजाकुमार--बुलवाइए, मगर मेरी समझ में उसे होशियार कर देना मुना-सिब न होगा, बल्कि मैं तो कहता हूँ कि इसका जिक्र अभी आप जयपालसिंह से भी न कीजिए, कुछ सबूत इकट्ठा कर लेने दीजिए।

दारोगा--खैर, जैसा तुम चाहते हो, वैसा ही होगा। बेगम को यहाँ बुलवाकर भूतनाथ का जिक्र न करूंगा, बल्कि उसकी तबीयत और नीयत का अन्दाज करूंगा।

गिरिजाकुमार--हाँ तो बुलवाइये!

दारोगा--तब तक तुम क्या करोगे?

गिरिजाकुमार--कुछ भी नहीं, अभी तो दो-तीन दिन मैं यहाँ से न जाऊँगा, बल्कि मैं चाहता हूँ कि दो रोज मुझे आप इन्हीं (बिहारीसिंह) की सूरत में रहने दीजिए और बिहारीसिंह को कहिए कि अपनी सुरत वदल लें। जब बेगम आकर यहाँ से चली जायगी तब हम दोनों आदमी भूतनाथ की खोज में जायेंगे।

दारोगा--इसमें क्या फायदा है? असली सूरत में अगर तुम यहाँ रहो तो क्या कोई हर्ज है?

गिरिजाकुमार--हाँ, जरूर हर्ज है, यहाँ मैं कई ऐसे आदमियों से मिलजुल रहा हूँ जिनसे भूतनाथ की बहुत-सी बातें मालूम होने की आशा है। उन्हें अगर मेरा असल भेद मालूम हो जायगा तो बेशक हर्ज होगा। इसके अतिरिक्त जब बेगम यहाँ आ जाय तो मैं बिहारीसिंह बना हुआ आपके सामने ऐसे ढंग पर बातें करूंगा कि ताज्जुब नहीं आपको भी इस बात का पता लग जाय कि भूतनाथ से और उससे कुछ सम्बन्ध है

दारोगा--अगर ऐसी बात है तो तुम्हारा विहारीसिंह ही बने रहना ठीक है।

गिरिजाकुमार--इसी से तो मैं कहता हूँ।

दारोगा--खैर, ऐसा ही होगा और मैं आज ही बेगम को लाने के लिए आदमी भेजता हूँ। (बिहारीसिंह की तरफ देखकर) तुम अपनी सूरत बदलने का भी बन्दोबस्त करो!

बिहारीसिंह--बहुत अच्छा।

यहाँ तक बयान करके दलीपशाह चुप हो गया और कुछ दम लेकर फिर इस तरह बयान करने लगा-

"इस समय मेरी बातें सुन-सुनकर दारोगा और जयपाल वगैरह के कलेजे पर साँप लोट रहा होगा और उस समय की बातें याद करके ये बेचैन हो रहे होंगे, क्योंकि वास्तव में गिरिजाकुमार ने उन्हें ऐसा उल्लू बनाया कि उस बात को ये कभी भूल नहीं सकते। खैर, उस समय जब हम दोनों आदमी जंगल में दारोगा के सिपाहियों से जुदा हुए, हमें गिरिजाकुमार के मामले की कुछ खबर न थी, अगर खबर होती तो बेगम को न लूटते और न अर्जुनसिंह ही गिरिजाकुमार की खोज में जमानिया जाते। खैर, फिर भी जो कुछ हुआ, अच्छा ही हुआ और अब मैं आगे का हाल बयान करता हूँ।"

२

दलीपशाह ने फिर इस तरह अपना किस्सा शुरू किया-

"गिरिजाकुमार ने अपनी बातचीत में दारोगा और बिहारीसिंह को ऐसा उल्लू बनाया कि उन दोनों को गिरिजाकुमार पर पूरा-पूरा भरोसा हो गया और वह खुशी के साथ जमानिया में रहकर बेगम का इन्तजार करने लगा, बल्कि दारोगा के साथ जाकर उसने खास बाग का रास्ता और मायारानी को भी देख लिया था। इधर अर्जुनसिंह गिरिजाकुमार की खोज में जमानिया गये और मैं बेगम को गिरफ्तार करने की फिक्र में पड़ा।

"पहले तो मैं अपने घर गया और वहाँ से कई आदमियों का इन्तजाम करके लौटा। फिर ठीक समय पर गंगा के किनारे उस ठिकाने पहुंच गया जहाँ बेगम की किश्ती किनारे लगाकर लूट लेने की बातचीत कही-बदी थी।

"मैं इस घटना का हाल बहुत बढ़ाकर न कहूंगा कि वेगम की किश्ती क्योंकर आई और क्या-क्या हुआ तथा मैंने किसको किस तरह गिरफ्तार किया-संक्षेप में केवल इतना ही कहूँगा कि बेगम पर मैंने कब्जा कर लिया और जो चीजें उसके पास थीं, सब ले ली गयीं। उन्हीं चीजों में ये सब कागज और वह हीरे की अंगूठी भी जो भूतनाथ बेगम के यहाँ से ले आया और जो इस समय दरबार में मौजूद हैं। आगे चलकर मैं इन चीजों का हाल बयान करूँगा और यह भी कहूँगा कि ये सब चीजें मेरे कब्जे में आकर फिर क्योंकर निकल गई। इस समय मैं पुनः गिरिजाकुमार का हाल बयान करूँगा जो उसी की जुबानी मुझे मालूम हुआ था।

"गिरिजाकुमार जमानिया में बैठा हुआ दारोगा के साथ बेगम का इन्तजार कर रहा था। जब बेगम को लुटवाकर दोनों सिपाही जिनके साथ बेगम के भी दो आदमी थे और जिन्हें मैंने जानबूझकर छोड़ दिया था, रोते-कलपते हुए जमानिया पहुंचे तो सीधे दारोगा के पास चले गये। उस समय वहाँ सूरत बदले हुए असली बिहारीसिंह और गिरिजाकुमार भी बिहारीसिंह बना हुआ बैठा था। दारोगा के सिपाहियों और बेगम के आदमियों ने अपनी बर्बादी और बेगम के लुट जाने का हाल बयान किया जिसे सुनते ही दारोगा को ताज्जुब और रंज हुआ। उसने गिरिजाकुमार की तरफ देखकर कहा,कार्रवाई किसने की होगी?"

गिरजाकुमार--खुद बेगम ने या फिर भूतनाथ ने! (बेगम के आदमियों की तरफ देखकर) क्यों जी! मैं समझता हूँ कि शायद महीने-भर के लगभग हुआ होगा जब एक भूतनाथ मेरे साथ बेगम के यहाँ गया था। उस समय तुम भी तो वहाँ थे, क्या तुमने मुझे पहचाना था?

बेगम का आदमी--जी नहीं, मैंने भापको नहीं पहचाना था।

गिरिजाकुमार--(दारोगा की तरफ देख कर) आप ही के कहे मुताबिक मैं दो-तीन दफे भूतनाथ के साथ बेगम के यहां गया था, पर वास्तव में भूतनाथ अच्छा आदमी है और ये लोग भी बड़ी मुस्तैदी के साथ वहाँ रहते हैं। (बेगम के आदमियों की तरफ देखकर) क्यों जी, है न यही बात?

बेगम का आदमी--(हाथ जोड़ कर) जी हाँ सरकार!

बेगम के आदमियों की जुबान से गिरिजाकुमार ने बड़ी खूबी के साथ 'जी हाँ सरकार' कहलवा लिया। इसमें कोई शक नहीं कि भूतनाथ बेगम के यहाँ जाया करता था और गिरिजाकुमार को यह हाल मालूम था, मगर ऐसे मौके पर उसके आदमियों की जुबान से 'हाँ' कहला लेना मामूली बात न थी। उन खुशामदी आदमियों ने कर कि जब खुद बिहारीसिंह भूतनाथ के साथ अपना जाना कबूल करते हैं तो हाँ कहना ही अच्छा है-'जी हाँ सरकार' कह दिया और गिरिजाकुमार दारोगा तथा बिहारीसिंह की निगाह में सच्चा बन बैठा। साथ ही इसके गिरिजाकुमार दारोगा से पहले ही कह चुका था कि बेगम आवेगी तो मैं बात-ही-बात में किसी तरह साबित करा दूंगा कि भूतनाथ उसके यहां आता-जाता है, वह बात भी दारोगा को खूब याद थी, अत: दारोगा को गिरिजाकुमार पर और भी विश्वास हो गया। उसने गिरिजाकुमार का इशारा पाकर बेगम के दोनों आदमियों को बिना कुछ कहे थोड़ी देर के लिए बिदा किया और फिर आपस में इस तरह बातचीत करने लगा-

दारोगा--कुछ समझ में नहीं आता कि क्या मामला है!

गिरिजाकुमार--अजी, यह उसी कम्बख्त भूतनाथ की बदमाशी और दोनों की मिली-जुली सांठ-गांठ है। बेगम जान-बूझ कर यहाँ नहीं आई। अगर वह आती तो उसके आदमियों की तरह खास उसकी जुबान से भी मैं इस बात को साबित करा देता कि उससे और भूतनाथ से ताल्लुक है और इसीलिए मैं अभी तक बिहारी सिंह बना हुआ था, मगर खैर कोई चिन्ता नहीं, मैं बहुत जल्द इन सव भेदों का पूरा-पूरा पता लगा लूंगा और सोच भूतनाथ को भी गिरफ्तार कर लूंगा!

दारोगा--तो अब देर क्यों करते हो?

गिरिजाकुमार--कुछ नहीं, कल मेरे साथ चलने के लिए बिहारीसिंह तैयार हो जायें।

बिहारीसिंह--अच्छी बात है। यह बताओ कि किस सुरत-शक्ल में सफर किया जायगा?

गिरिजाकुमार--मैं तो एक ज्योतिषी की सूरत बनूंगा, और आप...

बिहारीसिंह--मैं वैद्य बनूंगा।

गिरिजाकुमार--बस-बस, यही ठीक है, मगर एक बात मैं अभी से कहे देता हूँ कि दो घण्टे के लिए मैं गुरुजी से मिलने जरूर जाऊँगा।

बिहारीसिंह--क्या हर्ज है, अगर कहोगे तो मैं भी तुम्हारे साथ चला चलूंगा या कहीं अटक जाऊँगा।

"मुख्तसिर यह है कि दूसरे दिन दोनों ऐयार ज्योतिषी और वैद्य बने हुए जमानिया के बाहर निकले।

“मजा तो यह है कि गिरिजाकुमार ने चालाकी से उस समय तक किसी को अपनी असली सूरत देखने नहीं दी। जब तक वहाँ रहा बिहारीसिंह ही बना रहा, जब वाहर निकला तो ज्योतिषी बन कर निकला। खैर दारोगा का तो कहना ही क्या है, खुद बिहारी सिंह और हरनामसिंह व्यर्थ ही ऐयार कहलाये, असल में कोई अच्छा काम इन दोनों के हाथ से होते देखा-सुना नहीं गया।

"अब हम थोड़ा-सा हाल अर्जुनसिंह का बयान करते हैं, जो गिरिजाकुमार व पता लगाने लिए हमसे जुदा होकर जमानिया गये थे। जमानिया में सेठ रामसरन नामक एक गलाजन अर्जुनसिंह का दोस्त था, अतः ये सूरत बदले हुए सीधे उसी के मकान पर चले गये और मौका पाकर उससे मुलाकात करने के बाद सब हाल बयान किया और उससे मदद चाही। पहले तो वह दारोगा और मायारानी के खिलाफ कार्रवाई करने के नाम से बहुत डरा, मगर अर्जुनसिंह ने उसे बहुत भरोसा दिलाया और कहा कि जो कुछ हम करेंगे, वह ऐसे ढंग से करेंगे कि तुम पर किसी को किसी तरह का शक न होगा, इसके अतिरिक्त हम तुमसे और किसी तरह की मदद नहीं चाहते केवल एक गुप्त कोठरी ऐसे ढंग की चाहते हैं जिसमें अगर हम किसी को गिरफ्तार करके यहाँ लावें तो दो-चार दिन के लिए कैद करके रख सके और यह काम भी ऐसी खूबी के साथ किया जायगा कि कैदी को इस बात का गुमान भी न होगा कि वह कहाँ और किसके मकान में कैद किया गया था।

"खैर, रामसरन ने किसी तरह अर्जुनसिंह की बात मंजूर कर ली और तब अर्जुनसिंह उसके मकान से बाहर निकल कर हरनामसिंह को फंसाने की फिक्र करने लगे क्योंकि इन्होंने निश्चय कर लिया था कि बिना किसी को फंसाये हुए गिरिजाकुमार का पता लगाना कठिन ही नहीं, बल्कि असम्भव है।

"मुख्तसिर यह कि दो दिन की कोशिश में अर्जुन सिंह ने भुलावा दे हरनामसिंह को गिरफ्तार कर लिया, उसे रामसरन के मकान की एक अँधेरी कोठरी में ले जाकर कैद किया तथा खाने-पीने का भी प्रबन्ध कर दिया। हरनामसिंह को यह मालूम न हुआ कि उसे किसने कैद किया है और वह किस स्थान पर रखा गया है, तथा उसे खाने-पीने को कौन देता है। इस काम से छुट्टी पाकर हरनामसिंह की सूरत बन अर्जुनसिंह दारोगा के दरबार में जा घुसे और इस तरकीब से बहुत जल्द गिरिजाकुमार को पहचान लिया और उसका पता लगा लिया। गिरिजाकुमार ने जिस चालाकी से अपने को बचा लिया था, उसे जानकर उसकी बुद्धिमानी पर अर्जुनसिंह को आश्चर्य हुआ, मगर भण्डा फूटने के डर से वे अपने को बहुत ही बचाये हुए थे और दारोगा तथा असली बिहारीसिंह से सिर-दर्द का बहाना करके बातचीत कम करते थे।

"जब बिहारीसिंह को साथ लेकर गिरिजाकुमार शहर के बाहर निकला तो अर्जुनसिंह ने भी सूरत बदल कर उसका पीछा किया। जब दोनों मुसाफिर एक मंजिल रास्ता तय कर चुके तो दूसरे दिन सफर में एक जगह मौका पाकर कुछ देर के लिए गिरिजाकुमार को अकेला देख कर अर्जुनसिंह उसके पास चले गये और उन्होंने अपने को उस पर प्रकट कर दिया। जल्दी-जल्दी बातचीत करके इन्होंने उसे यह बता दिया कि उसके जमानिया चले जाने के बाद क्या हुआ तथा अब उसे क्या और किस-किस ढंग पर कार्रवाई करनी चाहिए और हमसे-तुमसे कहाँ-कहाँ किस-किस मौके पर या कैसी सूरत में मुलाकात होगी।

अर्जुनसिंह ने गिरिजाकुमार को जो कुछ समझाया उसका हाल आगे चल कर मालूम होगा। इस जगह केवल इतना ही कहना काफी है कि गिरिजाकुमार को समझा कर अर्जुनसिंह फिर जमानिया चले गए और रात के समय हरनामसिंह को बेहोश करके कैदखाने से निकाल, शहर के बाहर बहुत दूर मैदान में ले जाकर छोड़ दिया और अपना रास्ता पकड़ा, जिसमें होश में आकर वह अपने घर चला जाय और उसे मालूम न हो कि उसके साथ किसने क्या सलूक किया, बल्कि यह बात उसे स्वप्न की तरह याद रहे।

"इसके बाद अर्जुनसिंह बहुत जल्द मेरे पास पहुंचे और जो कुछ हो चुका था उसे बयान किया। गिरिजाकुमार का हाल सुन कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मैंने बेगम के साथ जो कुछ सलूक किया था, उसका हाल अर्जुनसिंह से बयान किया तथा जो कुछ चीजें उसकी मेरे हाथ लगी थीं दिखाकर यह भी कहा कि बेगम अभी तक मेरे यहाँ कैद है। अतः सोचना चाहिए कि अब उसके साथ क्या कार्रवाई की जाय?

"उन दिनों असल में मुझे तीन बातों की फिक्र लगी थी। एक तो यह कि यद्यपि भूतनाथ से और मुझसे रंज चला आता था और भूतनाथ ने अपना मरना मशहूर कर दिया था, मगर भूतनाथ की स्त्री मेरे यहाँ आई हुई थी और उसकी अवस्था पर मुझे दुःख होता था, इसलिए मैं चाहता था कि किसी तरह भूतनाथ से मुलाकात हो और मैं उसे समझा-बुझा कर ठीक रास्ते पर लाऊँ, दूसरे यह कि राजा गोपालसिंह के मरने का असली सबब दरियाफ्त करूँ और तीसरे बलभद्र सिंह तथा लक्ष्मीदेवी को दारोगा की कैद से छुड़ाऊँ, जिनका कुछ-कुछ हाल मुझे मालूम हो चुका था। बस, इन्हीं कामों के लिए हमलोगों ने इतनी मेहनत अपने सिर उठाई थी, नहीं तो जमानिया के बारे में हम लोगों के लिए अब किसी तरह की दिलचस्पी नहीं रह गई थी।

"बेगम की जो चीजें मेरे हाथ लगी थीं, उनमें से कई कागज और एक हीरे की अँगूठी ऐसी थी, जिस पर ध्यान देने से हम लोगों को मालूम हो गया कि बेगम भी कोई साधारण औरत नहीं थी। उन कागजों में से कई चिट्ठियाँ ऐसी थीं जो भूतनाथ के विषय में जयपाल ने बेगम को लिखी थीं और कई चिट्ठियाँ ऐसी थीं जिनके पढ़ने से मालूम होता था कि मायारानी के बाप को इसी जयपाल ने मायारानी और दारोगा की इच्छानुसार मार कर जहन्नुम में पहुंचा दिया है और बलभद्रसिंह अभी तक जीता है, मगर साथ ही इसके उन चिट्ठियों से यह भी जाहिर होता था कि असली लक्ष्मीदेवी निकल कर भाग गई, जिसका पता लगाने के लिए दारोगा बहुत उद्योग कर रहा है, मगर पता नहीं लगता। वह जो हीरे की अंगूठी थी वह वास्तव में हेलासिंह (मायारानी के बाप) की थी जो उसके मरने के बाद जयपाल के हाथ लगी थी। उस अंगूठी के साथ एक कागज का पुर्जा बंधा हुआ था जिस पर बलभद्रसिंह को कैद में रखने और हेलासिंह को मार डालने की आज्ञा थी और उस पर मायारानी तथा दारोगा दोनों के हस्ताक्षर थे।

"वे कागज पुर्जे और अंगूठी इस समय महाराज के दरबार में मौजूद हैं जी भूतनाथ बेगम के यहाँ से उस समय ले आया था, जब वह असली बलभद्रसिंह को छुड़ाने लिए गया था। आप लोगों को इस बात आश्चर्य होगा कि जब ये सब चीजें बेगम के गिरफ्तार करने पर मेरे कब्जे में आ ही चुकी थीं तो पुनः बेगम के कब्जे में कैसे चली गई? इसके जवाब में केवल इतना ही कह देना काफी है कि जब बेगम मेरे कब्जे से निकल गई तो वे चीजें भी उसी के साथ जाती रहीं और फिर मैं भी बेगम तथा दारोगा के कब्जे में चला गया और इन सब बातों का कर्ता-धर्ता भूतनाथ ही है जिसने उस समय बहुत धोखा खाया और जिसके सबब से कुछ दिन बाद उसे भी तकलीफ उठानी पड़ी। मैंने यह भी सुना था कि अपनी इस भूल से शर्मिन्दा होकर भूतनाथ ने बेगम और जमपाल को बड़ी तकलीफें दीं, मगर उसका नतीजा उस समय कुछ भी न निकला। खैर अब मैं पुनः अपने किस्से की तरफ झुकता हूँ।"

दलीपशाह की इस बात को सुनकर महाराज ने पुनः उन हीरे की अंगूठी और उन चिट्ठियों के देखने की इच्छा प्रकट की जो भूतनाथ बेगम के यहाँ से उठा लाया था। तेजसिंह ने पहले महाराज को फिर और लोगों को भी वे चीजें दिखाई और इसके बाद फिर दलीपशाह ने इस तरह अपना हाल बयान करना शुरू किया

"अर्जुनसिंह ज्यादा देर तक मेरे पास नहीं ठहरे, उस समय जो कुछ हम लोगों को करना चाहिए था, बहुत जल्द निश्चय कर लिया गया और इसके बाद अर्जुनसिंह के साथ मैं घर से वाहर निकला और हम दोनों मित्र गिरिजाकुमार की तरफ रवाना हुए।

"अब गिरिजाकुमार का हाल सुनिये कि अर्जुनसिंह से मिलने के बाद फिर क्या हुआ।

"बिहारीसिंह और गिरिजाकुमार दोनों आदमी सफर करते हुए एक ऐसे स्थान में पहुंचे जहाँ से बेगम का मकान केवल पाँच कोस की दूरी पर था। यहां पर एक छोटा गाँव था, जहाँ मुसाफिरों के लिए खाने-पीने की मामूली चीजें मिल सकती थीं और जिसमें हलवाई की एक छोटी-सी दुकान भी थी। गांव के बाहरी प्रान्त में जमींदारों के देहाती ढंग के बगीचे थे और पास ही में पलाश का छोटा-सा जंगल भी था। संध्या होने में घण्टे भर की देर थी और बिहारीसिंह चाहता था हम लोग बराबर चले जायं, दो-तीन घण्टे रात जाते बेगम के मकान तक पहुँच ही जायेंगे, मगर गिरिजाकुमार को यह बात मंजूर न थी। उसने कहा कि मैं बहुत थक गया हूँ और अब एक कोस भी आगे नहीं चल सकता, इसलिए यही अच्छा होगा कि आज की रात इसी गांव के बाहर किसी बगीचे अथवा जंगल में बिता दी जाय।

"यद्यपि दोनों की राय दो तरह की थी, मगर बिहारीसिंह को लाचार हो गिरिजा-कुमार की बात माननी पड़ी और यह निश्चय करना ही पड़ा कि आज की रात अमुक बगीचे में बिताई जायगी।अस्तु संध्या हो जाने पर दोनों आदमी गाँव में हलवाई की दुकान पर गये और वहां पूरी-तरकारी बनवाकर पुनः गांव के बाहर चले आए।

चाँदनी निकली हुई थी और चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। बिहारीसिंह और गिरिजाकुमार एक पेड़ के नीचे बैठे हुए धीरे-धीरे भोजन और निम्नलिखित बातें करते जाते थे-

गिरिजाकुमार--आज की भूख में ये पूरियाँ बड़ा ही मजा दे रही हैं।

बिहारीसिंह--यह के भूख ही कारण नहीं, बल्कि बनी भी अच्छी हैं, इसके अतिरिक्त तुमने आज बूटी (भांग) भी गहरी पिला दी है।

गिरिजाकुमार--अजी, इसी बूटी की बदौलत तो सफर की हरारत मिटेगी।

बिहारीसिंह--मगर नशा तो तेज हो रहा है और अभी तक बढ़ता ही जाता है।

गिरिजाकुमार--तो हम लोगों को करना ही क्या है?

बिहारीसिंह--और नहीं तो अपने कपड़े-लत्ते और बटुए का खयाल तो है ही।

गिरिजाकुमार--(हँसकर) मजा तो तब हो जो इस समय भूतनाथ से सामना हो जाय।

बिहारीसिंह--हर्ज ही क्या है? मैं इस समय भी लड़ने को तैयार हूँ। मगर वह बड़ा ही ताकतवर और काइयाँ ऐयार है।

गिरिजाकुमार--उसकी कदर तो राजा गोपालसिंह जानते थे।

बिहारीसिंह--मेरे खयाल से तो यह बात नहीं है।

गिरिजाकुमार--तुम्हें खबर नहीं है, अगर कभी मौका मिला तो मैं इस बात को साबित कर दूंगा।

बिहारीसिंह--किस ढंग से साबित करोगे?

गिरिजाकुमार--खुद राजा गोपालसिंह की जबान से।

बिहारीसिंह--(हँसकर) क्या भंग के नशे में पागल हो गये हो? राजा गोपाल-सिंह अब कहाँ हैं?

गिरिजाकुमार--असल बात तो यह है कि मुझे राजा गोपालसिंह के मरने का विश्वास ही नहीं है।

बिहारीसिंह--(चौकन्ना होकर) सो क्यों? तुम्हारे पास उनके जीते रहने का क्या सबूत है?

गिरिजाकुमार--बहुत-कुछ सबूत है मगर इस विषय पर मैं हुज्जत या बहस करना पसन्द नहीं करता। जो कुछ असल बात है तुम स्वयं जानते हो, अपने दिल से पूछ लो।

बिहारीसिंह--मैं तो यही जानता हूँ कि राजा साहब मर गये।

गिरिजाकुमार--खैर यह तो मैं कही चुका हूँ कि इस विषय पर बहस न करूंगा।

बिहारीसिंह--मगर बताओ तो सही कि तुमने क्या समझ के ऐसा कहा?

गिरिजाकुमार-मैं कुछ भी न बताऊंगा।

बिहारीसिंह--फिर हमारी-तुम्हारी दोस्ती ही क्या ठहरी जो एक जरा सी बात छिपा रहे हो और पूछने पर भी नहीं बताते।

गिरिजाकुमार--(हँसकर) तुम्हें ऐसा कहने का हक नहीं है। जब तुम खुद दोस्ती का खयाल न करके ये बातें छिपा रहे हो तो मैं क्यों बताऊँ?

विहारीसिंह--(संकोच के साथ) मैं तो कुछ भी नहीं छिपाता।

गिरिजाकुमार---अच्छा मेरे सिर पर हाथ रखके कह तो दो कि वास्तव में राजा साहब मर गये, मैं अभी साबित कर देता हूँ कि तुम छिपाते हो या नहीं। अगर तुम सच कह दोगे तो मैं भी बता दूंगा कि इसमें कौन सी नई बात पैदा हो गई और क्या रंग खिला चाहता है!

बिहारीसिंह--(कुछ सोचकर) पहले तुम बताओ, फिर मैं बताऊँगा।

"इस समय बिहारासिंह नशे में मस्त था, एक तो गिरिजाकुमार ने उसे भंग पिला दी थी, दूसरे उसने जो पूरियाँ खाई थीं उसमें भी एक प्रकार का बेढब नशा मिला हुआ था, क्योंकि वास्तव में उस हलवाई के यहाँ अर्जुनसिंह ने पहले ही से प्रबंध कर लिया था और ये बातें गिरिजाकुमार से कही-बदी थीं जैसा कि ऊपर के बयान से आपको मालूम हो चुका है, अतः गिरिजाकुमार ने पहले ही से एक दवा खा ली थी जिससे उन पूरियों का असर उस पर कुछ भी न हुआ, मगर बिहारीसिंह धीरे-धीरे अलमस्त हो गया और थोड़ी ही देर में बेहोश होने वाला था। वह ऐसा मस्त और दिल खुश करने वाला नशा था जिसके वश में होकर बिहारीसिंह ने अपने दिल का भेद खोल दिया, मगर अफसोस भूतनाथ ने हमारी कुल मेहनत पर मिट्टी डाल दी और हम लोगों को बबाँद कर दिया। उस भेद का पता लग जाने पर भी हम लोग कुछ न कर सके जिसका सबब आगे चल कर आपको मालूम होगा। जब गिरिजाकुमार और बिहारीसिंह से बातें हो रही थीं उस समय हम दोनों मित्र भी वहाँ से थोड़ी ही दूर पर छिपे हुए खड़े थे और इन्तजार कर रहे थे कि बिहारीसिंह बेहोश हो जाय और गिरिजाकुमार बुलाये तो हम दोनों भी वहाँ जा पहुँचें।

"गिरिजाकुमार ने पुनः जोर देकर कहा, ऐसा नहीं हो सकता, पहले तुम्हा को दिल का परदा खोल के और सच्चा-सच्चा हाल कहके दोती का परिचर और यह बात मुझसे छिपी नहीं रह सकती कि तुमने सच कहा यः सूट क्योंकि जो कुछ भेद है उसे मैं खूब जानता हूँ।

बिहारीसिंह--मुझे भी ऐसा ही मालूम होता है। खैर अब मैं कोई बात तुमसे न छिपाऊँगा, सब भेद साफ कह दूंगा। मगर इस समय मैं केवल इतना ही कहूँगा कि वास्तव में राजा साहब मरे नहीं बल्कि अभी तक जीते हैं।

गिरिजाकुमार--इतना तो मैं खुद कह चुका हूँ, इससे ज्यादा कुछ कहो तो मुझे विश्वास हो।

"गिरिजाकुमार की बात का बिहारीसिंह कुछ जवाब दिया ही चाहता था कि सामने से एक आदमी आता हुआ दिखाई पड़ा जो पास आते ही चाँदनी के सबब से बहुत जल्द पहचान लिया गया कि भूतनाथ है। बिहारी सिंह ने, जो भूतनाथ को देख कर घबड़ा गया था गिरिजाकुमार से कहा, "लो सम्हल जाओ, भूतनाथ आ पहुँचा!" दोनों आदमी सम्हल कर खड़े हो गये और भूतनाथ भी वहाँ पहुँच कर दिलेराना ढंग पर उन दोनों के सामने अकड़ कर खड़ा हो गया और बोला, "तुम दोनों को मैं खूब पहचानता हूँ और मुझे यकीन है कि तुम लोगों ने भी मुझे पहचान लिया होगा कि यह भूतनाथ है।"

बिहारीसिंह--बेशक मैंने तुमको पहचान लिया, मगर तुमको हम लोगों के बारे में धोखा हुआ है।

भूतनाथ--(हँसकर) मैं तो कभी धोखा खाता ही नहीं! मुझे खूब मालूम है कि तुम दोनों बिहारीसिंह और गिरिजाकुमार हो और साथ ही इसके मुझे यह भी मालूम है कि तुम लोग मुझे गिरफ्तार करने के लिए जमानिया से बाहर निकले हो! मुझे तुम अपने ऐसा बेवकूफ न समझो। (गिरिजाकुमार की तरफ बताकर) जिसे तुम लोगों ने आज तक नहीं पहचाना और जिसे तुम अभी तक शिवशंकर समझे हुए हो उसे मैं खूब जानता हूँ कि यह दलीपशाह का शागिर्द गिरिजाकुमार है। जरा सोचो तो सही कि तुम्हारे ऐसा बेवकूफ आदमी मुझे क्या गिरफ्तार करेगा जिसे एक लौंडे (गिरिजाकुमार) ने धोखे में डालकर उल्लू बना दिया और जो इतने दिनों तक साथ रहने पर भी गिरिजा कुमार को पहचान न सका। खैर, इसे जाने दो, पहले अपनी हिम्मत और बहादुरी का अन्दाज कर लो, देखो, मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, मुझे गिरफ्तार करो तो सही!

"भूतनाथ की बातें सुनकर बिहारीसिंह हैरान बल्कि बदहवास हो गया क्योंकि वह भूतनाथ की जीवट और उसकी ताकत को खूब जानता था और उसे विश्वास था कि इस तरह खुले मैदान भूतनाथ को गिरफ्तार करना दो-चार आदमियों का काम नहीं है। साथ ही वह यह सुनकर और भी घबड़ा गया कि हमारा साथी वास्तव में शिवशंकर या हमारा मददगार नहीं है बल्कि हमें धोखे में डालकर उल्लू बनाने और भेद ले लेने वाला एक चालाक ऐयार है। इससे मैंने जो गोपालसिंह के जीते रहने का भेद बता दिया सो अच्छा नहीं किया।

इसी घबराहट में बिहारीसिंह का नशा पूरे दर्जे पर पहुँच गया और सिर नीचा करके सोचता-ही-सोचता वह बेहोश होकर जमीन पर लम्बा हो गया। उस समय गिरिजाकुमार की तरफ देख के भूतनाथ ने कहा, "तुम इस बात का खयाल छोड़ दो कि मेरे सामने से भाग जाओगे या चिल्लाकर लोगों को इकट्ठा कर लोगे।"

गिरिजाकुमार--मगर मुझसे आपको किसी तरह की दुश्मनी न होनी चाहिए, क्योंकि मैंने आपका कुछ नुकसान नहीं किया है।

भूतनाथ--सिवाय इसके कि मुझे गिरफ्तार करने की फिक्र में थे।

गिरिजाकुमार--कदापि नहीं, यह तो एक तरकीब थी जिससे कि मैंने अपने को कैद होने से बचा लिया, यही सबब था कि इस समय मैंने इसे (बिहारीसिंह को) धोखा देकर बेहोशी का दवा दी और इसे बाँधकर अपने घर ले जाने वाला था।

भूतनाथ--तुम्हारी बातें मान लेने के योग्य हैं मगर मैं इस बात को भी खूब जानता हूँ कि तुम बड़े बातूनी हो और बातों के जाल में बड़े-बड़े चालाकों को फंसाकर उल्लू बना सकते हो।

"इतना कहकर भूतनाथ ने अपनी जेब में से कपड़े का एक टुकड़ा निकालकर गिरिजाकुमार के मुंह पर रख दिया और फिर गिरिजाकुमार को दीन-दुनिया की कुछ भी खबर न रही। इसके बाद क्या हुआ सो उसे मालूम नहीं और न मैं ही जानता हूँ, क्योंकि इस विषय में मैं वही बयान करूंगा जो गिरिजाकुमार ने मुझसे कहा था।

"हम दोनों मित्र जो उस समय छिपे हुए थे बैठे-बैठे घबड़ा गये और जब लाचार होकर उस बाग में गये तो न गिरिजाकुमार को देखा न बिहारीसिंह को पाया। कुछ पता न लगा कि दोनों कहाँ गये क्या हुए या उन पर कैसी बीती। बहुत खोजा, पता लगाया, कई दिन तक उस इलाके में घूमते रहे, मगर नतीजा कुछ न निकला। लाचार अफसोस करते हुए अपने घर की तरफ लौट आए।

"अब बहुत विलम्ब हो गया, महाराज भी घबड़ा गये होंगे। (जीतसिंह की तरफ देखकर) यदि आज्ञा हो तो मैं अपनी राम-कहानी यहीं पर रोक दूं और जो कुछ बाकी है उसे कल के दरबार में बयान करूँ।"

इतना कहकर दलीपशाह चुप हो गया और महाराज का इशारा पाकर जीत-सिंह ने उसकी बात मंजूर कर ली। दरबार बर्खास्त हुआ और लोग अपने-अपने डेरे की तरफ रवाना हुए

३

दूसरे दिन मामूली ढंग पर दरबार लगा और दलीपशाह ने इस तरह अपना हाल बयान करना शुरू किया--

"कई दिन बीत गये मगर मुझे गिरिजाकुमार का कुछ पता न लगा और न इस बात का ही खयाल हुआ कि वह भूतनाथ के कब्जे में चला गया होगा। हाँ, जब मैं गिरजाकुमार की खोज में सूरत बदल कर धूम रहा था,तब इस बात का पता लग गया कि भूतनाथ मेरे पीछे पड़ा हुआ है और दारोगा से मिलकर मुझे गिरफ्तार तरफ रवाना हुए। करा देने का बन्दोबस्त कर रहा है।

"उस मामले के कई सप्ताह बाद एक दिन आधी रात के समय भूतनाथ पागलों की सी हालत में मेरे घर आया और उसने मेरा लड़का समझ कर अपने हाथ से खुद अपने लड़के का खून कर दिया जिसका रंज इस जिन्दगी में उसके दिल से नहीं निकल सकता और जिसका खुलासा हाल वह स्वयं अपनी जीवनी में बयान करेगा। इसी के थोड़े दिन बाद भूतनाथ की बदौलत मैं दारोगा के कब्जे में जा फंसा।

"जब तक मैं स्वतन्त्र रहा मुझे गिरिजाकुमार का हाल कुछ भी मालूम न हुआ,जब मैं पराधीन होकर कैदखाने में गया और वहाँ गिरिजाकुमार से जिसे, भूतनाथ ने दारोगा के सुपुर्द कर दिया था, मुलाकात हुई तब गिरिजाकुमार की जुबानी सब हाल मालूम हुआ।

"भूतनाथ के कब्जे में पड़ जाने के बाद जब गिरिजाकुमार होश में आया तो उसने अपने को एक पत्थर के खंभे के साथ बँधा हुआ पाया जो किसी सुन्दर सजे हुए कमरे के बाहरी दालान में था। वह चौकन्ना होकर चारों तरफ देखने और गौर करने लगा मगर इस बात का निश्चय न कर सका कि यह मकान किसका है, हाँ शक होता था कि यह दारोगा का मकान होगा, क्योंकि अपने सामने भूतनाथ के साथ-ही-साथ बिहारीसिंह और दारोगा साहब को भी बैठे हुए देखा।

गिरिजाकुमार दारोगा, बिहारीसिंह और भूतनाथ में देर तक तरह-तरह की बातें होती रहीं और मिरिजाकुमार ने भी बातों की उलझन में उन्हें ऐसा फंसाया कि किसी तरह असल भेद का वे लोग पता न लगा सके, मगर फिर भी गिरिजाकुमार को उनके हाथों छुट्टी न मिली और वह तिलिस्म के अन्दर वाले कैदखाने में लूंस दिया गया, हाँ, उसे इस बात का विश्वास हो गया कि वास्तव में राजा गोपालसिंह मरे नहीं, बल्कि कैद कर लिए गए हैं।

"राजा गोपालसिंह के जीते रहने का हाल यद्यपि गिरिजाकुमार को मालूम हो गया मगर इसका नतीजा कुछ भी न निकला क्योंकि इस बात का पता लगाने के साथ ही ह गिरफ्तार हो गया और यह हाल किसी से भी बयान न कर सका। अगर हम लोगों में से किसी को भी मालूम हो जाता कि वास्तव में राजा गोपालसिंह जीते हैं और कैद में हैं तो हम लोग उन्हें किसी-न-किसी तरह जरूर छुड़ा ही लेते, मगर अफसोस!

"बहुत दिनों तक खोजने और पता लगाने पर भी जब गिरिजाकुमार का कुछ हाल मालूम न हुआ तब लाचार होकर मैं इन्द्रदेव के पास गया और सब हाल वयान करने के बाद मैंने इनसे सलाह पूछी कि अब क्या करना चाहिए। बहुत गौर करने के बाद इन्द्रदेव ने कहा कि मेरा दिल यही कहता है कि गिरिजाकुमार गिरफ्तार हो गया और इस समय दारोगा के कब्जे में है। इसका पता इस तरह लग सकता है कि तुम किसी तरह दारोगा को गिरफ्तार करके ले आओ और उसकी सूरत बनकर पाँच-दस दिन उसके मकान में रहो। इसी बीच में उसके नौकरों की जुबानी कुछ-न-कुछ हाल गिरिजाकुमार का जरूर मालूम हो जायगा, मगर इसमें कुछ शक नहीं कि दारोगा को गिरफ्तार करना जरा मुश्किल है।

"इन्द्रदेव की राय मुझे बहुत पसन्द आई और मैं दारोगा को गिरफ्तार करने की फिक्र में पड़ा। इन्द्रदेव से बिदा होकर मैं अर्जुनसिंह के घर गया और जो कुछ सलाह हुई थी बयान किया। इन्होंने भी यह राय पसन्द की और इस काम के लिए मेरे सा जमानिया चलने को तैयार हो गये, अतः हम दोनों आदमी भेष बदलकर घर से निक और जमानिया की तरफ रवाना हुए।

"संध्या हुआ ही चाहती थी जब हम दोनों आदमी जमानिया शहर के पास पहुँचे, उस समय सामने से दारोगा का एक सिपाही आता हुआ दिखाई पड़ा। हम लोग बहुत खुश हुए और अर्जुनसिंह ने कहा-'लो भाई सगुन तो बहुत अच्छा मिला कि शिकार सामने आ पहुँचा और चारों तरफ सन्नाटा भी छाया हुआ है। इस समय इसे जरूर गिरफ्तार करना चाहिए, इसके बाद इसी की सूरत बनकर दारोगा के पास पहुँचना और उसे धोखा देना चाहिए।'

"हम दो आदमी थे और सिपाही अकेला था, ऐसी अवस्था में किसी तरह की चालबाजी की जरूरत न थी, केवल तकरार कर लेना ही काफी था। हुज्जत और तकरार करने के लिए किसी मसाले की जरूरत नहीं पड़ती, जरा छेड़ देना ही काफी होता है। पास आने पर अर्जुनसिंह ने जान-बूझकर उसे धक्का दे दिया और वह भी दारोगा के घमंड पर फूला हम लोगों से उलझ पड़ा। आखिर हम लोगों ने उसे गिरफ्तार कर लिया और बेहोश करके वहाँ से दूर एक सन्नाटे के जंगल में ले जाकर उसकी तलाशी लेने लगे। उसके पास से भूतनाथ के नाम की एक चिट्ठी निकली जो खास दारोगा के हाथ की लिखी हुई थी और जिसमें यह लिखा हुआ था-प्यारे भूतनाथ,

कई दिनों से हम तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं। अब ठीक-ठीक बताओ कि कब मुलाकात होगी और कब तक काम हो जाने की उम्मीद है।'

"इस चिट्ठी को पढ़कर हम दोनों ने सलाह की कि इस आदमी को छोड़ देना चाहिए और इसके पीछे चलकर देखना चाहिए कि भूतनाथ कहाँ रहता है। उसका पता लग जाने से बहुत काम निकलेगा।

"हम दोनों ने वह चिट्ठी फिर उस आदमी की जेब में रख दी और उसे उठाकर पुनः सड़क पर लाकर डाल दिया जहां उसे गिरफ्तार किया था। इसके बाद लखलखा सुंघाकर हम दोनों दूर हटकर आड़ में खड़े हो गये और देखने लगे कि वह होश में आकर क्या करता है। उस समय रात आधी से ज्यादा जा चुकी थी।

"होश में आने के बाद आदमी ताज्जुब और तरदुद में थोड़ी देर तक इधर-उधर घूमता रहा और इसके बाद आगे की तरफ चल पड़ा। हम लोग भी आड़ देते हुए उसके पीछे-पीछे चल पड़े।

"आसमान पर सुबह की सुफेदी फैलना ही चाहती थी जब हम लोग एक घने और सुहावने जंगल में पहुँचे। थोड़ी देर तक चलकर वह आदमी एक पत्थर की चट्टान पर बैठ गया। मालूम होता था कि थक गया है और कुछ देर तक सुस्ताना चाहता है, मगर ऐसा न था। लाचार हम दोनों भी उसके पास ही आड़ देकर बैठ गये और उसी समय पेड़ों की आड़ में से कई आदमियों ने निकलकर हम दोनों को घेर लिया। उन सभी के हाथों में नंगी तलवारें और चेहरे पर नकाबें पड़ी हुई थीं।

"बिना लड़े-भिड़े यों ही गिरफ्तार होकर दुःख भोगना हम लोगों को मंजूर न था, अस्तु फुर्ती से तलवार खींचकर उन लोगों के मुकाबले में खड़े हो गये। उस समय एक ने अपने चेहरे पर से नकाब उलट दी और मेरे पास आकर खड़ा हो गया। असल में वह भूतनाथ था जिसका चेहरा सुबह की सुफेदी में बहुत साफ दिखाई दे रहा था और मालूम होता था कि वह हम दोनों को देखकर मुस्कुरा रहा है।

"भूतनाथ को सूरत देखते ही हम दोनों चौंक पड़े और मुंह से निकल पड़ा'भूतनाथ'। उसी समय मेरी निगाह उस आदमी पर जा पड़ी जिसके पीछे-पीछे हम लोग वहाँ तक पहुंचे थे, देखा कि दो आदमी खड़े-खड़े उससे बातें कर रहे और हाथ के इशारे से मेरी तरफ कुछ बता रहे हैं।

"मेरे मुंह से निकली हुई आवाज सुनकर भूतनाथ हँसा और बोला, "हाँ, मैं वास्तव में भूतनाथ हूं, और आप लोग?"

मैं--हम दोनों गरीब मुसाफिर हैं।

भूतनाथ--(हँसकर) यद्यपि आप लोगों की तरह भूतनाथ अपनी सूरत नहीं बदला करता मगर आप लोगों को पहचानने में किसी तरह की भूल भी नहीं कर सकता।

मै--अगर ऐसा है तो आप ही बताइए कि हम लोग कौन हैं?

भूतनाथ--आप लोग दलीपशाह और अर्जुनसिंह हैं, जिन्हें मैं कई दिनों से खोज रहा हूँ।

मैं--(ताज्जुब के साथ) ठीक है, जब आपने पहचान ही लिया तो मैं अपने को क्यों छिपाऊँ, मगर यह तो बताइये कि आप मुझे क्यों खोज रहे थे?

भूतनाथ-—इसलिए कि मैं आपसे अपने कसूरों की माफी मांगू, आरजू नू-मिन्नत और खुशामद के साथ अपने को आपके पैरों पर डाल दूं और कहूं कि अगर जी में आवे तो अपने हाथ से मेरा सिर काट लीजिए मगर एक दफे कह दीजिए कि मैंने तेरा कसूर माफ किया।

मैं--बड़े ताज्जुब की बात है कि तुम्हारे दिल में यह बात कैसे पैदा हुई? क्या तुम्हारी आँखें खुल गई और मालूम हो गया कि तुम बहुत बुरे रास्ते पर चल रहे हो?

भूतनाथ जी हाँ, मुझे मालूम हो गया है और मैं समझ गया हूँ कि मैं अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मार रहा हूँ।

मैं--बड़ी खुशी की बात है अगर तुम सच्चे दिल से कह रहे हो।

भूतनाथ–बेशक मैं सच्चे दिल से कह रहा हूँ और अपने किये पर मुझे बड़ा अफसोस है।

मैं-भला कह तो जाओ कि तुम्हें किन-किन बातों का अफसोस है?

भूतनाथ--सो न पूछिये, सिर से पैर तक मैं कसूरवार हो रहा हूँ। एक-दो हों तो कही जाय, कहाँ तक गिनाऊँ?

मैं--खैर न सही, अच्छा अब यह बताओ कि मुझसे किस कसूर की माफी चाहते हो? मेरा तो तुमने कुछ भी नहीं बिगाड़ा।

भूतनाथ--यह आपका बड़प्पन है जो आप ऐसा कहते हैं। मगर वास्तव में मैंने आपका बहुत बड़ा कसुर किया है। और बातों के अतिरिक्त मैंने आपके सामने आपरं लड़के को मार डाला है यह कहाँ का

मैं--(बात काटकर) नहीं नहीं भूतनाथ! तुम भूलते हो, अथवा तुम्हें मालूम नहीं है कि तुमने मेरे लड़के का खून नहीं किया, बल्कि अपने लड़के का खून किया है।

भूतनाथ--(चौंककर बेचैनी के साथ) यह आप क्या कह रहे हैं?

मैं--बेशक मैं सच ही कह रहा हूँ। इस काम में तुमने धोखा खाया और अपने लड़के को अपने हाथ से मार डाला। उन दिनों तुम्हारी स्त्री बीमार होकर मेरे यहाँ आई हुई थी और अपनी आँखों से तुम्हारी इस कार्रवाई को देख रही थी।

भूतनाथ--(घबराहट के साथ) तो क्या अब भी मेरी स्त्री आप ही के मकान में हैं?

मैं--नहीं वह मर गई क्योंकि बीमारी में वह इस दुःख को बर्दाश्त न कर सकी।

भूतनाथ--(कुछ देर चुप रहने और सोचने के बाद) नहीं-नहीं, वह बात नहीं है। ऐसा मालूम होता है कि तुमने खुद मेरे लड़के को मारकर अपने लड़के का बदला चुकाया!

अर्जुनसिंह--नहीं-नहीं भूतनाथ, वास्तव में तुमने खद अपने लड़के को मारा है और मैं इस बात को खूब जानता हूँ।

भूतनाथ--(भारी आवाज में) खैर अगर मैंने अपने लड़के का खून किया है तब भी दलीपशाह का कसूरवार हूँ। इसके अतिरिक्त और भी कई कसूर मुझसे हुए हैं,अच्छा हुआ कि मेरी स्त्री मर गई नहीं तो उसके सामने...

मैं--मगर हरनामसिंह और कमला को ईश्वर कुशलपूर्वक रखें।

भूतनाथ--(लम्बी सांस लेकर) बेशक भूतनाथ बड़ा ही बदनसीब है।

मैं--अब भी सम्हल जाओ तो कोई चिन्ता नहीं।

भूतनाथ-–बेशक मैं अपने को सम्हालूंगा और जो कुछ आप कहेंगे वही करूंगा।अच्छा मुझे थोड़ी देर के लिए आज्ञा दीजिए तो मैं उस आदमी से दो बातें कर आऊँ जिसके पीछे आप यहाँ तक आए हैं।

"इतना कहकर भूतनाथ उस आदमी के पास चला गया मगर उसके साथी लोग हमें घेरे खड़े ही रहे। इस समय मेरे दिल का विचित्र ही हाल था। मैं निश्चय नहीं कर सकता था कि भूतनाथ की बातें किस ढंग पर जा रही हैं और इसका नतीजा क्या होगा, तथापि मैं इस बात के लिए तैयार था कि जिस तरह भीहो सके मेहनत करके भूतनाथ को अच्छे ढर्रे पर ले जाऊँगा। मगर मैं वास्तव मैं ठगा गया और जो कुछ सोचता था वह मेरी नादानी थी।

"उस आदमी से बातचीत करने में भूतनाथ ने बहुत देर की और उसे झटपट बिदा करके वह पुनः मेरे पास आकर बोला, कम्बख्त दारोगा मुझसे चालबाजी करता है और मेरे ही हाथों से मेरे दोस्तों को गिरफ्तार कराना चाहता है।"

मैं--दारोगा बड़ा ही शैतान है और उसके फेर में पड़कर तुम बर्बाद हो जाओगे। अच्छा अब हम लोग भी बिदा होना चाहते हैं। यह बताओ कि तुमसे किस तरह की उम्मीद अपने साथ लेते जायँ?

भूतनाथ––मुझसे आप हर तरह की उम्मीद कर सकते हैं। जो आप कहेंगे मैं वही करूँगा बल्कि आपके घर चलूँगा।

मैं––अगर ऐसा करो तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहे।

भूतनाथ––बेशक मैं ऐसा ही करूँगा मगर पहले आप यह बता दें कि आपने मेरा कसूर माफ किया या नहीं?

मैं––हाँ, मैंने माफ किया।

भूतनाथ––अच्छा तो अब मेरे डेरे पर चलिये।

मैं––तुम्हारा डेरा कहाँ पर है?

भूतनाथ––यहाँ से थोड़ी ही दूर पर।

मैं––खैर, चलो मैं तैयार हूँ, मगर पहले इस बात का वायदा कर दो कि लौटते समय मेरे साथ चलोगे।

भूतनाथ––जरूर चलूँगा।

"कहकर भूतनाथ चल पड़ा हम दोनों भी उसके पीछे-पीछे रवाना हुए।

"आप लोग खयाल करते होंगे कि भूतनाथ ने हम दोनों को उसी जगह क्यों नहीं गिरफ्तार कर लिया मगर यह बात भूतनाथ के किए नहीं हो सकती थी। यद्यपि उसके साथ कई सिपाही या नौकर भी मौजूद थे मगर फिर भी वह इस बात को खूब समझता था कि इस खुले मैदान में दलीपशाह और अर्जुनसिंह को एक साथ गिरफ्तार कर लेना उसकी सामर्थ्य के बाहर है। साथ ही इसके यह भी कह देना जरूरी है कि उस समय तक भूतनाथ को इस बात की खबर न थी उसके बटुए को चुरा लेने वाला यही अर्जुनसिंह है। उस समय तक क्या बल्कि अब तक भूतनाथ को इस बात की खबर न थी। उस दिन जब स्वयं अर्जुनसिंह ने अपनी जुबान से कहा तब मालूम हुआ।

"कोस-भर से ज्यादा हम लोग भूतनाथ के पीछे-पीछे चले गये और इसके बाद एक भयानक सुनसान और उजाड़ घाटी में पहुँचे जो दो पहाड़ियों के बीच में थी। वहाँ से कुछ दूर तक घूम-घुमौवे रास्ते पर चलकर भूतनाथ के डेरे पर पहुँचे। वह एक ऐसा स्थान था जहाँ किसी मुसाफिर का पहुँचना कठिन ही नहीं, बल्कि असम्भव था। जिस खोह में भूतनाथ का डेरा था वह बहुत बड़ी और बीस-पचीस आदमियों के रहने लायक थी और वास्तव में इतने ही आदमियों साथ वह वहाँ रहता था।

"वहाँ भूतनाथ ने हन दोनों की बड़ी खातिर की और बार-बार आजिजी करता और माफी माँगता रहा। खाने-पीने का सब सामान वहाँ मौजूद था, अतः इशारा पाकर भूतनाथ के आदमियों ने तरह-तरह का खाना बनाना आरम्भ कर दिया और कई आदमी नहाने-धोने का सामान दुरुस्त करने लगे।"

"हम दोनों बहुत प्रसन्न थे और समझते थे कि अब भूतनाथ ठीक रास्ते पर आ जायेगा, अतः हम लोग जब तक संध्या-पूजन से निश्चिन्त हुए, तव तक भोजन भी तैयार हुआ और से।फिक्री के साथ हम तीनों आदमियों ने एक साथ भोजन किया। इसके बाद निश्चिन्ती से बैठकर बातचीत करने लगे।

भूतनाथ––दिलीपशाह, मुझे इस बात का दुःख है कि मेरी स्त्री का देहान्त हो गया और मेरे हाथ से एक बहुत ही बुरा काम हो गया

मैं––बेशक, अफसोस की जगह है, मगर खैर, जो कुछ होना था हो गया, अब तुम घर पर चलो और नेकनीयती के साथ दुनिया में काम करों।

भूतनाथ––ठीक है, मगर मैं यह सोचता हूँ कि अब घर पर जाने से फायदा ही क्या है? मेरी स्त्रो मर गई और अब दूसरी शादी मैं कर ही नहीं सकता, फिर किस सुख के लिए शहर में चलकर बसूँ?

मैं––हरनामसिंह और कमला का भी तो कुछ खयाल करना चाहिये। इसके अतिरिक्त क्या विधुर लोग शहर में रहकर नेकनीयती के साथ रोजगार नहीं करते?

भूतनाथ––कमला और हरनामसिंह होशियार हैं और एक अच्छे रईस के यहाँ परवरिश पा रहे हैं, इसके अतिरिक्त किशोरी उन दोनों की ही सहायक है, अतएव उनके लिए मुझे किसी तरह की चिन्ता नहीं है। बाकी रही आपकी दूसरी बात, उसका जवाब यह हो सकता है कि शहर में नेकनीयती के साथ अब मैं कर ही क्या सकता हूँ, क्योंकि मैं तो किसी को मुँह दिखलाने लायक ही नहीं रहा। एक दयाराम वाली वारदात ने मुझे बेकाम कर ही दिया था, दूसरे इस लड़के के खून ने मुझे और भी बर्बाद और बेकाम कर दिया। अब मैं कौन-सा मुँह लेकर भले आदमियों में बैठूँगा?

मैं––ठीक है, मगर इन दोनों मामलों की खबर हम लोग या दो-तीन खास-खास आदमियों के सिवाय और किसी को नहीं है और हम लोग तुम्हारे साथ कदापि बुराई नहीं कर सकते।

भूतनाथ––तुम्हारी इन बातों पर मुझे विश्वास नहीं हो सकता, क्योंकि मैं इस बात को खूब जानता हूँ कि आजकल तुम मेरे साथ दुश्मनी का बर्ताव कर रहे हो और मुझे दारोगा के हाथ में फँसाना चाहते हो, ऐसी अवस्था में तुमने मेरा भेद जरूर कई आदमियों से कह दिया होगा।

मैं––नहीं भूतनाथ, यह तुम्हारी भूल है कि तुम ऐसा सोच रहे हो! मैंने तुम्हारा भेद किसी को नहीं कहा और न मैं तुम्हें दारोगा के हवाले करना चाहता हूँ। बेशक, दारोगा ने मुझे इस काम के लिए लिखा था, मगर मैंने इस बारे में उसे धोखा दिया। दारोगा के हाथ की लिखी चिट्ठियाँ मेरे पास मौजूद हैं, घर चलकर मैं तुम्हें दिखाऊँगा, और उनसे तुम्हें मेरी बातों का पूरा सबूत मिल जायेगा।

"इसी समय बात करते-करते मुझे कुछ नशा गालूम हुआ और मेरे दिल में एक प्रकार का खुटका हो गया। मैंने घूमकर अर्जुनसिंह की तरफ देखा तो उनको भी आँखें लाल अंगारे की तरह दिखाई पड़ीं। उसी समय भूतनाथ मेरे पास से उठकर दूर जा बैठा गौर बोला––

भूतनाथ––जब मैं तुम्हारे घर जाऊँगा, तब मुझे इस बात का सबूत मिलेगा, मगर मैं इसी समय तुम्हें इस बात का सबूत दे सकता हूँ कि तुम मेरे साथ दुश्मनी कर रहे हो।

"इतना कहकर भूतनाथ ने अपनी जेब से निकालकर मेरे हाथ की लिखी वे चिट्ठियाँ मेरे सामने फेंक दीं, जो मैंने दारोगा को लिखी थीं और जिनमें भूतनाथ के गिरफ्तार करा देने का वादा किया था।"

"मैं सरकार में बयान कर चुका हूँ, कि उस समय दारोगा से इस ढंग का पत्र-व्यवहार करने से मेरा मतलब क्या था और मैंने भूतनाथ को दिखाने के लिए दारोगा के हाथ की चिट्ठियाँ बटोरकर किस तरह दारोगा से साफ इनकार कर दिया था, मगर उस मौके पर मेरे पास वे चिट्ठियाँ मौजूद न थीं कि मैं उन्हें भूतनाथ को दिखाता और भूतनाथ के पास वे चिट्ठियाँ मौजूद थीं जो दारोगा ने उसे दी थीं और जिनके सबब से दारोगा का मन्त्र चला था।" अतः उन चिट्ठियों को देखकर मैंने भूतनाथ से कहा––

मैं––हाँ-हाँ, इन चिट्ठियों को मैं जानता हूँ और बेशक ये मेरे हाथ की लिखी हुई हैं, मगर मेरे इस लिखने का मतलब क्या था और इन चिट्ठियों से मैंने क्या काम निकाला सो तुम्हें मालूम नहीं हो सकता, जब तक कि बस, दारोगा के हाथ की लिखी हुई चिट्टियाँ तुम न पढ़ लो, जो मेरे पास मौजूद हैं।

भूतनाथ––(मुस्कराकर) बस-बस-बस, ये सब धोखेबाजी के ढर्रे रहने दीजिए। भूतनाथ से यह चालाकी न चलेगी, सच तो यह है कि मैं खुद कई दिनों से तुम्हारी खोज में हूँ। इत्तिफाक से तुम स्वयं मेरे पंजे में आकर फँस गये और अब किसी तरह नहीं निकल सकते। उस जंगल में मैं तुम दोनों को काबू में नहीं कर सकता था, इसलिए सब्जबाग दिखाता हुआ यहाँ तक ले आया और भोजन में बेहोशी की दवा खिलाकर बेकाम कर दिया। अब तुम लोग मेरा कुछ भी नहीं कर सकते। समझ लो कि तुम दोनों जहन्नुम में भेजे जाओगे, जहाँ से लौटकर आना मुश्किल है।

"भूतनाथ की ऐसी बातें सुनकर हम दोनों को क्रोध चढ़ आया, मगर उठने की कोशिश करने पर कुछ भी न कर सके, क्योंकि नशे का पूरा-पूरा असर हो गया था और तमाम बदन में कमजोरी आ गई थी।"

"थोड़ी ही देर बाद हम लोग बेहोश हो गये और तन-बदन की सुध न रही। जब आँखें खुलीं, तो अपने को दारोगा के मकान में कैद पाया और सामने दारोगा जयपाल हरनामसिंह और बिहारीसिंह को बैठे हुए देखा। रात का समय था और मेरे हाथ-पैर एक खम्भे के साथ बंधे हुए थे। अर्जुनसिंह न मालूम कहाँ थे और उन पर न जाने क्या बीत रही थी।"

"दारोगा ने मुझसे कहा––कहो, दिलीपशाह, तुमने तो मुझ पर बड़ा भारी जाल फैलाया था, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला।"

मैं––मैंने क्या जाल फैलाया था?

दारोगा––क्या इसके कहने की भी जरूरत है? नहीं, बस, इस समय हम इतना ही कहेंगे कि तुम्हारा शागिर्द हमारी कैद में है और तुमने मेरे लिए जो कुछ किया है, उसका हाल हम उसकी जुबानी सुन चुके हैं। अब अगर वह चिट्ठी मुझे दे दो जो गोपालसिंह के बारे में मनोरमा का नाम लेकर जबरदस्ती मुझसे लिखवाई गई थी तो मैं तुम्हारा सब कसूर माफ कर दूँ।

मैं––मेरी समझ में नहीं आता आप किस चिट्ठी के बारे में मुझसे कह रहे हैं।

दारोगा--(चिढ़कर) ठीक है, मैं पहले ही समझे हुए था कि तुम बिना लात खाये नाकं पर मक्खी. नहीं बैठने दोगे। खैर, देखो, मैं तुम्हारी क्या दुर्दशा करता हूँ।

"इतना कहकर दारोगा ने मुझे सताना शुरू किया। मैं नहीं कह सकता कि इसने मुझे किस-किस तरह की तकलीफें दी और सो भी एक-दो दि तक नहीं, बल्कि महीने भर तक, इसके बाद बेहोश करके मुझे तिलिस्म के अन्दर पहुंचा दिया। जब मैं होश में आया तो अपने सामने अर्जुनसिंह और गिरिजाकुमार को बैठे हुए पाया। बस, यही तो मेरा किस्सा है और यही मेरा बयान!"

दिलीपशाह का हाल सुनकर सबको बड़ा ही दुःख हुआ और सभी कोई लाल-लाल आँखें करके दारोगा तथा जयपाल वगैरह की तरफ देखने लगे। दरबार बर्खास्त करने का इशारा करके महाराज उठ खड़े हुए, कैदी जेलखाने में भेज दिए गए और बाकी सब अपने डेरों की तरफ रवाना हुए।

४

रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। महाराज सुरेन्द्रसिंह के कमरे में राजा वीरेन्द्र-सिंह, राजा गोपालसिंह, कुंअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, तारासिंह,भैरोंसिंह, भूतनाथ और इन्द्रदेव बैठे आपस में धीरे-धीरे बातें कर रहे हैं। वृद्ध महाराज, सुरेन्द्रसिंह मसहरी पर लेटे हुए हैं।

सुरेन्द्रसिंह--दिलीपशाह की जीवनी ने दारोगा की शैतानी और भी अच्छी तरह से झलका दी है।

जीतसिंह--बेशक ऐसा ही है। सच तो यह है कि ईश्वर ही ने पांचों कैदियों की रक्षा की, नहीं तो दारोगा ने कोई बात उठा नहीं रखी थी।

भूतनाथ--साथ ही इसके यह भी है कि सबसे ज्यादा दिलीपशाह के किस्से ने दरबार में मुझे शर्मिन्दा किया, मगर क्या करूं लाचार था कि चालबाज दारोगा ने दिलीपशाह की चिट्ठियों का मुझे ऐसा मतलब समझाया कि मैं अपने आपे से बाहर हो गया, बल्कि यह कहना चाहिए कि अन्धा हो गया!

तेजसिंह--वह जमाना ही चालबाजियों का था और चारों तरफ ऐसी ही बातें हो रही थीं। भूतनाथ, तुम अब उन बातों को एकदम से भूल जाओ और जिस नेक रास्ते पर चल रहे हो, उसी का ध्यान रखो।

जीतसिंह--अच्छा, तो अब कैदियों के बारे में जो कुछ हो फैसला कर ही देना चाहिये, जिसमें अगले दरबार में उन्हें हुक्म सुना दिया जाये।

सुरेन्द्रसिंह--(गोपालसिंह से)कहो साहब, तुम्हारी क्या राय है, किस-किस कैदी को क्या-क्या सजा देनी चाहिए?

गोपालसिंह--जो दादाजी(महाराज)की इच्छा हो, हुक्म दें! मेरी प्रार्थना केवल इतनी ही है कि कम्बख्त दारोगा मेरे हवाले किया जाये और मुझे हुक्म हो जाये कि जो मैं चाहूं, उसे सजा हूँ।

सुरेन्द्रसिंह--केवल दारोगा ही नहीं, बल्कि तुम्हारे और कैदी भी तुम्हारे हवाले किये जायेंगे।

गोपालसिंह--और दिलीपशाह, अर्जुनसिंह, भरतसिंह, हरदीन और गिरिजा-कुमार भी मुझे दे दिए जायें, क्योंकि ये सबलोग मेरे सहायक हैं और इनके साथ रहकर मेरा दिन बड़ी खुशी के साथ बीतेगा!

सुरेन्द्रसिंह--(जीतसिंह से) ऐसा ही किया जाये।

जीतसिंह--बहुत अच्छा, मैं नम्बरवार कैदियों के बारे में जो कुछ हुक्म होता है, लिखता जाता हूँ।

इतना कहकर जीतसिंह ने कलम-दवात और कागज ले लिया और महाराज की आज्ञानुसार इस तरह लिखने लगे--

(1) कम्बख्त दारोगा को सजा पाने के लिए राजा गोपालसिंह के हवाले किया जाये। राजा साहब जो मुनासिब समझें उसे सजा दें।

(2) शिखण्डी (दारोगा का चचेरा भाई) मायाप्रसाद, जयपाल, हरनामसिंह,बिहारीसिंह, हरनामसिंह की लड़की, लीला, मनोरमा, नागर, वेगम, नौरतन और जमालो वगैरह भी जिन्हें जमानिया से घना सम्बन्ध है, राजा गोपालसिंह के हवाले कर दिए जायें।

(3) बेगम के घर से निकली हुई दौलत, जो काशिराज ने यहाँ भिजवा दी है,बलभद्रसिंह को दे दी जाये।

(4) गौहर और गिल्सन शेरअलीखों के पास भेज दी जायें।

(5) किशोरी से पूछकर भीमसेन को छोड़ दिया जाये और उसे पुनः शिवदत्त की गद्दी पर बिठाया जाये।

(6) कुबेरसिंह, बाकरअली, अजायबसिंह, खुदाबख्श, यारअली, धरमसिंह,गोविन्दसिंह, भवगनिया, ललिता और धन्नूसिंह, तथा वे कैदी जो कमलिनी के तालाब वाले मकान से आये थे, सब जन्म-भर के लिए कैदखाने में भेज दिए जायें, इसके अतिरिक्त और जो भी कोई कैदी हों, (नानक इत्यादि) कैरखाने भेज दिए जायें।

(7) दिलीपशाह, अर्जुनसिंह, हरदीन, भरतसिंह और गिरिजाकुमार को राजा गोपालसिंह ले जायें और इन सबको बड़ी खातिर और आराम के साथ रखें। कैदियों के विषय में इस तरह का हुक्म देकर महाराज चुप हो गये और फिर आपस में दूसरे ढंग की बातें होने लगीं। थोड़ी देर के बाद दरबार बर्खास्त और सज लोग अपने-अपने ठिकाने चले गये।

५

कुंअर इन्द्रजीतसिंह इस छोटे-से दरबार से उठकर महल में गये और किशोरी के कमरे में पहुंचे। इस समय कमलिनी भी उसी कमरे में मौजूद किशोरी से हँसी-खुशी की बातें कर रही थीं। कुमार को देखकर दोनों उठ खड़ी हुई और जब हँसते हुए कुमार बैठ गये तो किशोरी भी उनके साथ बैठ गई, मगर कमलिनी कमरे के बाहर की तरफ चल पड़ी। उस समय कुमार ने उसे रोका और कहा, "तुम कहाँ चली? बैठो-बैठो इतनी जल्दी क्या है?"

कमलिनी--(बैठती हुई)बहुत अच्छा. बैठती हूँ, मगर क्या आज रात को सोना नहीं है?

कुमार--क्या यह बात मेरे आने के पहले नहीं सुझी थी?

किशोरी--आपको देखकर सोना याद आ गया।

किशोरी की बात ने दोनों को हँसा दिया और फिर कमलिनी ने कहा

कमलिनी--दिलीपशाह के किस्से ने मेरे दिल पर ऐसा असर किया है कि कह नहीं सकती। देखना चाहिये, दुष्टों को महाराज क्या सजा देते हैं। सच तो यह है कि उनके लिए कोई सजा है ही नहीं।

कुमार--तुम ठीक कहती हो, इस समय मैं महाराज के पास से ही चला आता हूँ, वहाँ एक छोटा-सा निजी दरबार लगा हुआ था और कैदियों के ही विषय में बात-चीत हो रही थी, बल्कि यह कहना चाहिये कि आज उन बदमाशों का फैसला लिखा जा रहा था।

कमलिनी--(उत्कण्ठा से)हाँ! अच्छा, बताइए तो सही दारोगा और जयपाल के लिए क्या सजा तजवीज की गई?

कुमार--उन्हें क्या सजा दी जायेगी, इसका निश्चय गोपाल भाई करेंगे, क्योंकि महाराज ने इस समय यही हुक्म लिखाया है कि दारोगा, जयपाल, शिखण्डी, हरनाम, बिहारी, मनोरमा और नागर वगैरह जितने जमानिया और गोपाल भाई से सम्बन्ध रखने वाले कैदी हैं, सब उनके हवाले किये जायें और वे जो कुछ मुनासिब समझें उन्हें सजा दें।

कमलिनी--चलिए, यह भी अच्छा ही हुआ, क्योंकि मुझे इस बात का बहुत बड़ा खयाल बना हुआ था कि हमारे रहम-दिल महाराज इन कैदियों के लिए कोई अच्छी सजा नहीं, तजबीज कर सकेंगे, अगर वे लोग जीजाजी के सुपुर्द किए गए हैं तो उन्हें सजा भी वाजिब ही मिल जायेगी।

कुमार--(हँसकर)अच्छा, तुम ही बताओ कि अगर सजा देने के लिये सब कैदी तुम्हारे सुपुर्द किये जाते तो तुम उन्हें क्या सजा देती?

कमलिनी–-मैं?(कुछ सोचकर)मैं पहले तो इन सबके हाथ-पैर कटवा डालती, फिर इनके जख्म आराम करवाकर बड़े-बड़े लोहे के पिंजड़ों में इन्हें बन्द करके और सदर चौमुहानी पर लटकाकर हुक्म देती कि जितने आदमी इस राह से जायें वे सब इनके मुंह पर थूककर तब आगे बढ़े।

कुमार--(मुस्कराकर) सजा तो बहुत अच्छी सोची है। तो बस, अपने जीजा साहब को समझा देना कि उन्हें ऐसी ही सजा दें।

कमलिनी–-जरूर कहूँगी, बल्कि इस बात पर जोर भी दूंगी। अब यह बताइए कि नानक के लिए क्या हुक्म हुआ है?

कुमार--केवल इतना ही, जन्म-भर के लिए कैदखाने भेज दिया जाये। बाकी के और कैदियों के लिए भी यही हुक्म हुआ!

किशोरी–-भीमसेन के लिए भी यही हुक्म हुआ होगा?

कुमार--नहीं, उसके लिए दूसरा ही हुक्म हुआ।

किशोरी--वह क्या?

कुमार--वह तुम्हारा भाई है, इसलिए हुक्म हुआ कि तुमसे पूछकर वह एकदम छोड़ दिया जाये, बल्कि शिवदत्तगढ़ की गद्दी पर बैठा दिया जाये।

किशोरी-—जब उसे छोड़ देने का ही हुक्म हुआ तो मुझसे पूछना कैमा!

कुमार—-यही कि शायद तुम उसे छोड़ना न चाहो, तो कैद में ही रखा जाये।

किशोरी--भला मैं इस बात को कब पसन्द करूंगी कि मेरा भाई जन्म-भर के लिये कैद रहे? मगर हां, इतना खयाल जरूर है कि कहीं वह छूटने के बाद पुनः आपसे दुश्मनी न करे।

कुमार--खैर, अगर पुनः बदमाशी करेगा तो देखा जायेगा।

कमलिनी--(मुस्कराती हुई) उसके विषय में चपला चाची से पूछना चाहिये,क्योंकि वह असल में उन्हीं का कैदी है। जब सूअर के शिकार में उन्होंने उसे गिरफ्तार किया था, तो तरह-तरह की कसमें खिलाकर छोड़ा था कि भविष्य में पुनः दुश्मनी पर कमर न बांधेगा।

कुमार--बात तो ऐसी ही थी, मगर नहीं अब वह दुश्मनी का बर्ताव न करेगा।(किशोरी से) अगर कहो, तो तुम्हारे पास उसे बुलवाऊँ जो कुछ तुम्हें कहना-सुनना हो, कह सुन लो।

किशोरी--नहीं-नहीं, मैं बाज आई, मैं स्वप्न में भी उससे नहीं मिलना चाहती, जो कुछ उसकी किस्मत में लिखा होगा, सो भोगेगा।

कुमार--आखिर, उसे छोड़ने के विषय में तुमसे पूछा जायेगा, तो क्या जवाब दोगी?

किशोरी-—(कमलिनी की तरफ देखकर और मुस्कराकर) बस, कह दूंगी कि मेरे बदले चपला चाची से पूछ लिया जाये, क्योंकि वह उन्हीं का कैदी है।

कुमार--खैर, इन बातों को जाने दो। (कमलिनी से) जमानिया तिलिस्म के अन्दर मायारानी और माधवी के मरने का सबब मुझे अभी तक मालूम न हुआ। इसका पता न लगा कि वे दोनों खुद मर गईं, या गोपाल भाई ने उन्हें मार डाला! और अगर भाई साहब ने ही उन्हें मार डाला तो ऐसा क्यों किया?

कमलिनी--इसका असल हाल तो मुझे भी मालूम नहीं है, मैंने दो दफे जीजाजी से इस विषय में पूछा था, मगर वह बात टालकर बतोला दे गये।

कुमार--मैंने भी एक दफे उनसे पूछा था, तो यह कहकर रह गए कि फिर कभी बता देंगे।

किशोरी-–बहिन लक्ष्मीदेवी को इसका हाल जरूर मालूम होगा।

कमलिनी--उन्हें बेशक मालूम होगा। उन्होंने भुलावा देकर जरूर पूछ लिया होगा। इस समय तो वे अपने रंगमहल में होंगी, नहीं तो मैं जरूर बुला लाती।

कुमार--नहीं, आज तो अकेली ही अपने कमरे में बैठी होंगी, क्योंकि इस समय गोपाल भाई इन्द्रदेव को साथ लेकर कहीं बाहर गये हैं। मुझसे कह गये हैं कि कल पहर-दिन तक आयेंगे।

कमलिनी--तब तो कहिये मैं जाकर बुला लाऊँ!

कुमार--अच्छा जाओ कमलिनी उठकर चली गई और थोड़ी ही देर में लक्ष्मीदेवी को साथ लिए हुए आ पहुँची।

लक्ष्मी--(मुस्कराती हुई)कहिये क्या है, जो इतनी रात गये मेरी याद आई है?

कुमार--मैंने सोचा कि आज आप अकेली उदास बैठी होंगी, अतएव मैं ही बुलाकर आपका दिल खुश करूँ।

लक्ष्मी--(हँसकर)क्या बात है! बेशक आपकी मेहरबानी मुझ पर बहुत ज्यादा रहती है। (बैठकर) यह बताइये कि आप लोगों में किसी तरह की हुज्जत-तकरार तो नहीं हुई है जो मुझे फैसला करने के लिए बुलाया है?

कुमार--ईश्वर न करे ऐसा हो, हाँ, इतना जरूर है कि माधवी और मायारानी की मौत के विषय में तरह-तरह की बातें हो रही हैं, क्योंकि उन दोनों के मरने का असल हाल तो किसी को मालूम नहीं है और न भाई साहब ने पूछने पर किसी को बताया ही, इसलिए आपको तकलीफ दी है, क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है कि आपने किसी-न-किसी तरह यह हाल जरूर पूछ लिया होगा।

लक्ष्मी--(मुस्कराकर)बेशक, बात तो ऐसी ही है, मैंने जिद करके किसी-न-किसी तरह उनसे पूछ तो लिया, मगर सुनने से घृणा हो गई। इसीलिए वे भी यह हाल किसी से खुलकर नहीं कहते और समझते हैं कि जो कोई सुनेगा, उसी को घृणा होगी। इसी खयाल से आपको भी उन्होंने टाल दिया होगा।

कुमार-आखिर, उसमें क्या बात है, कुछ भी तो बताओ!

लक्ष्मी--माधवी को तो उन्होंने नहीं मारा, मगर मायारानी को जरूर मारा,और इस बेइज्जती और तकलीफ से मारा कि सुनने से रोंगटे खड़े होते हैं। यद्यपि माधवी को उन्होंने कुछ भी नहीं कहा, मगर मायारानी की मौत की कार्रवाई वह देख न सकी, जो उसके सामने की जाती थी और उसी डर से वह बेहोश होकर मर गई। इसमें कोई ऐसी अनूठी बात नहीं है, जो सुनने लायक हो। मुझे वह हाल बयान करते, भी लज्जा और घृणा होती है, अत:-

कुमार--बस-बस, मैं समझ गया, इससे ज्यादा सुनने की मुझे कोई जरूरत नहीं है, केवल इतना ही जानना था कि उनकी मौत के विषय में कोई अनूठी बात तो नहीं हुई।

लक्ष्मी-जी नहीं। अच्छा, यह तो बताइए कि कल कैदी लोगों के विषय में क्या किया जायेगा? दिलीपशाह का किस्सा तो समाप्त हो गया और अब कोई ऐसी बात मालूम करने के लायक भी नहीं रह गई है।

कुमार-कैदियों का मामला तो कब का साफ हो गया, इस समय तो महाराज ने उनके विषय में हुक्म भी लिखा दिया है, जो कल या परसों तक दरबार में सबको सुना दिया जायेगा।

लक्ष्मी-किस-किसके लिए क्या हुक्म हुआ है?

इसके जवाब में कुमार ने फैसले का सब हाल बयान किया, जो थोड़ी देर पहले किशोरी और कमलिनी को सुना चुके थे।

लक्ष्मी-बहुत अच्छा फैसला हुआ है।

किशोरी-(हँसकर)क्यों न कहोगी। तुम्हारे दुश्मन तुम्हारे कब्जे में दे दिए गए, अव तो दिल खोलकर बदला लोगी।

लक्ष्मी-बेशक! (कुमार से) हाँ, यह तो बताइए कि भूतनाथ ने अपनी जीवनी लिखकर दे दी या नहीं?

कुमार-नहीं, आज देने वाला है।

लक्ष्मी-और हम लोगों को उस तिलिस्मी मकान का तमाशा कब दिखाया जायेगा जिसमें लोग हँसते-हँसते कूद पड़ते हैं?

कुमार-परसों या कल उसका भेद भी सब पर खुल जायेगा।

लक्ष्मी-अच्छा, यह बताइए कि आपके भाई साहब कहाँ गये हैं?

किशोरी-(हँसकर, ताने के ढंग पर) आखिर रहा न गया! पूछे बिना जी नहीं इतने में ही बाहर की तरफ से आवाज आई, "इसमें भी क्या किसी का इजारा है? ये अपनी चीज की खबरदारी करती हैं किसी दूसरे की जमा नहीं छीनती! बहुत दिनों के बाद जो खोई चीज मिलती है, उसके लिए अकारण पुन: खो जाने का खटका बना ही रहता है, इसलिए अगर उन्होंने पूछा तो बुरा ही क्या किया!" इस आवाज के साथ-ही-साथ कमला पर सबकी निगाह पड़ी, जो मुस्कराती हुई कमरे के अन्दर आ रही थी।

किशोरी-(हँसती हुई)यह आई लक्ष्मीबहिन की तरफदार बीबी नक्को, तुमको यहाँ किसने बुलाया था?

कमला--(मुस्कराती हुई) बुलायेगा कौन? क्या मेरा रास्ता देखा हुआ नहीं है? यह बताओ कि तुम लोग इस आधी रात के समय इतना शोर-गुल क्यों मचा रहे हो?

किशोरी-(मसखरेपन के साथ हाथ जोड़कर) जी, हम लोगों को इस बात की।खबर न थी कि इस शोर-गुल से आपकी नींद उचट जायेगी और फिर सादी चारपाई पर पड़े रहना मुश्किल हो जायेगा।

कुमार--यह कहो कि अकेले जी नहीं लगता, लोगों को खोजती-फिरती हूँ।

कमला--जी हाँ, आप ही को खोज रही थी।

कुमार--अच्छा, तो फिर आओ, बैठ जाओ, और समझ लो कि मैं मिल गया।

कमला--(बैठकर किशोरी से) आज तुम्हें कोई आराम न करने देगा। (कुमार से) कहिए, दिलीपशाह का किस्सा तो खत्म हो गया। अब कैदियों को कब सजा दी जायेगी?

कुमार--कैदियों का फैसला हो गया, उसमें किसी को ऐसी सजा नहीं दी गई जो तुम्हारी पसन्द हो।

इतना कहकर कुमार ने पुनः सब हाल बयान किया।

कमला--तो मैं बहिन लक्ष्मीदेवी के साथ जरूर जमानिया जाऊंगी और दारोगा वगैरह की दुर्दशा अपनी आँखों से देखूगी।

थोड़ी देर तक इसी तरह की हँसी-दिल्लगी होती रही, इसके बाद लक्ष्मीदेवी और कमला अपने-अपने ठिकाने चली गई।

६

सुबह की सफेदी आसमान पर फैलना ही चाहती है और इस समय की दक्षिणी हवा जंगली पेड़ों, पौधों लताओं और पत्तों से हाथापाई करती हुई मैदान की तरफ दौड़ी जाती है! ऐसे समय में भूतनाथ और देवीसिंह हाथ-में-हाथ दिए जंगल के किनारे-किनारे मैदान में टहलते धीरे-धीरे हँसी-दिल्लगी की बातें करते जाते हैं।

देवीसिंह--भूतनाथ, लो, इस समय एक नई और मजेदार बात तुम्हें सुनाते हैं।

भूतनाथ--वह क्या?

देवीसिंह--फायदे की बात है, अगर तुम कोशिश करोगे तो लाख-दो-लाख रुयया मिल जाएगा।

भूतनाथ--ऐसा कौन-सा उद्योग है, जिसके करने से सहज ही इतनी बड़ी रकम हाथ लग जायेगी? और अगर इस बात को तुम जानते ही हो, तो खुद क्यों नहीं उद्योग करते?

देवीसिंह--मैं भी उद्योग करूंगा, मगर कोई जरूरी बात नहीं है कि जिसका जी चाहे उद्योग करके लाख-दो-लाख पा जाये, हाँ, जिसका भाग्य लड़ जायेगा और जिसकी अक्ल काम कर जायेगी, वह बेशक अमीर हो जायेगा। मैं जानता हूँ कि हम लोगों में तुम्हारी तबीयत बड़ी तेज है और तुम्हें बहुत दूर की सूझा करती है, इसलिए कहता हूँ कि अगर तुम उद्योग करोगे तो लाख-दो-लाख रुपया पा जाओगे। यद्यपि हम लोग सदा ही अमीर बने रहते हैं और रुपये-पैसे की कुछ परवाह नहीं करते, मगर फिर भी यह रकम थोड़ी नहीं है, और तिस पर बाजी के ढंग पर जीतना ठहरा, इसलिए प्रेसी रकम पाने की खुशी होती है।

भूतनाथ--आखिर बात क्या है, पर कुछ कहो भी तो सही।

देवीसिंह--बात यही है कि उधर जो तिलिस्मी मकान बनाया गया है, जिसके अन्दर लोग हँसते-हँसते कूद पड़ते हैं, उसके विषय में महाराज ने रात को हुक्म दिया है कि तिलिस्मी मकान के ऊपर सर्वसाधारण लोग तो चढ़ चुके और किसी को कामयाबी नहीं हुई, अब कल हमारे ऐयार लोग उस पर चढ़कर अपनी अक्ल का नमूना दिखायें और उनके लिए इनाम भी दूना कर दिया जाये, मगर इस काम में चार आदमी शरीक न किये जाएँ-एक जोतसिंहजी, दूसरे तेजसिंह, तीसरे भैरोंसिंह, चौथे तारासिंह!

भूतनाथ--बात तो बहुत अच्छी हुई, कई दिनों से मेरे दिल में गुदगुदी हो रही थी किसी तरह इस मकान के ऊपर चढ़ना चाहिए, मगर महाराज की आज्ञा बिना ऐसा कब कर सकता था। मगर यह तो कहो कि उन चारों के लिए मनाही क्यों कर दी गई?

देवीसिंह--इसलिए कि उन्हें इसका भेद मालूम है।

भूतनाथ--यों तो तुमको भी कुछ-न-कुछ भेद मालूम ही होगा, क्योंकि एक दफे तुम भी ऐसे ही मकान के अन्दर जा चुके हो, जब शेरसिंह भी तुम्हारे साथ थे।

देवीसिंह--ठीक है, मगर इससे क्या असल भेद का पता लग सकता है? अगर ऐसा ही हो, तो इस जलसे में हजारों आदमी उस मकान के अन्दर गये होंगे, किसी को दोहराकर जाने की मनाही तो नहीं थी, कोई पुनः जाकर जरूर बाजी जीत ही लेता।

भूतनाथ--आखिर उसमें क्या है?

देवीसिंह--सो मुझे नहीं मालूम, हाँ, दो दिन के बाद वह भी मालूम हो जायेगा।

भूतनाथ--पहली दफे जब तुम ऐसे ही मकान के अन्दर कूदे थे, तो उसमें क्या देखा था और उसमें हँसने की क्या जरूरत पड़ी थी?

देवीसिंह--अच्छा, उस समय जो कुछ हुआ था, सो मैं तुमसे बयान करता हूँ, क्योंकि अब उसका हाल कहने में कोई हर्ज नहीं है। जब मैं कमन्द लगाकर दीवार के ऊपर चढ़ गया तो ऊपर से दीवार बहुत चौड़ी मालूम हुई और इस सबब से बिना दीवार पर गये, भीतर की कोई चीज दिखाई नहीं देती थी, अतः मैं लाचार होकर दीवार पर चढ़ गया और अन्दर झाँकने लगा। अन्दर की जमीन पांच या चार हाथ नीची थी, जो किसी मकान की छत मालूम होती थी, मगर इस समय मैं अन्दाज से कह सकता हूँ कि वह वास्तव में छत न थी बल्कि कपड़े का चंदोवा तना हुआ या किसी शामियाने की छत थी, मगर उसमें से एक प्रकार की ऐसी भाप (वाष्प) निकल रही थी कि जिससे दिमाग में नशे की-सी हालत पैदा होती थी और खूब हँसने को जी चाहता था, मगर पैरों में कमजोरी मालूम होती थी और वह बढ़ती जाती थी

भूतनाथ--(बात काटकर) अच्छा, यह तो बताओ कि अन्दर झांकने से पहले ही कुछ नशा-सा चढ़ आया था या नहीं?

देवीसिंह--कब? दीवार पर चढ़ने के बाद?

भूतनाथ--हाँ, दीवार पर चढ़ने के बाद और अन्दर झाँकने के पहले।

देवीसिंह--(कुछ सोचकर) नशा तो नहीं, मगर कुछ शिथिलता जरूर मालूम हुई थी।

भूतनाथ--खैर, अच्छा तब?

देवीसिंह--अन्दर की तरफ जो छत थी, उस पर मैंने देखा कि किशोरी हाथ में एक चाबुक लिए खड़ी है और उसके सामने की तरफ कुछ दूर हटकर कई मोटे-ताजे आदमी खड़े हैं जो किशोरी को पकड़ कर बाँधना चाहते हैं, मगर वह किसी के काबू में नहीं आती। ताल ठोंक-ठोंककर लोग उसकी तरफ बढ़ते हैं मगर वह कोड़ा मार-मारकर हटा देती है। ऐसी अवस्था में उन आदमियों की मुद्रा (जो किशोरी को पकड़ना चाहते थे ऐसी खराब होती थी कि हँसी रोके नहीं रुकती, तथा उस भाप की बदौलत आया हुआ नशा हँसी को और भी बढ़ा देता था। पैरों में पीछे हटने की ताकत न थी, मगर भीतर की तरफ कूद पड़ने में किसी तरह का हर्ज भी नहीं मालूम पड़ता था क्योंकि जमीन ज्यादा नीची न थी, और इसके अतिरिक्त किशोरी को बचाना भी बहुत ही जरूरी था, अतः मैं अन्दर की तरफ कूद पड़ा, बल्कि यों कहो कि ढुलक पड़ा और उसके बाद तन-बदन की सुध न रही। मैं नहीं जानता कि उसके बाद क्या हुआ और क्योंकर हुआ। हां जब मैं होश में आया तो अपने को कैदखाने में पाया।

भूतनाथ--अच्छा तो इससे तुमने क्या नतीजा निकाला?

देवीसिंह--कुछ भी नहीं, मैंने केवल इतना ही खयाल किया कि किसी दवा के नशे से दिमाग खराब हो जाता है।

भूतनाथ--केवल इतना ही नहीं है, मैंने इससे कुछ ज्यादा खयाल किया है, खैर कोई चिन्ता नहीं कल देखा जायेगा, सौ में नव्वै दर्जे तो मैं जरूर बाहरी रास्ते ही से लौट आऊँगा। यहाँ उस तिलिस्मी मकान के अन्दर लोगों ने जो कुछ देखा है वह भी करीब-करीब वैसा ही है जैसा तुमने देखा था। तुमने किशोरी को देखा और इन लोगों ने किसी दूसरी औरत को देखा, बात एक ही है।

इसी तरह की बातें करते हुए दोनों ऐयार कुछ देर तक सुबह की हवा खाते रहे, और इसके बाद मकान की तरफ लौटे। जब महाराज के पास गये तो पुनः सुनने में आया कि ऐयारों को तिलिस्मी मकान पर चढ़ने की आज्ञा हुई है।

७

दिन अनुमान दो घंटे के चढ़ चुका है। महाराज सुरेन्द्रसिंह, राजा बीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह वगैरह खिड़कियों में बैठे उस तिलिस्मी मकान की तरफ देख रहे हैं, जिसके अन्दर लोग हँसते-हँसते कूद पड़ते हैं। उस मकान के नीचे बहुत-सी कुर्सियां रखी हुई हैं जिन पर हमारे ऐयार तथा और भी कई प्रतिष्ठित आदमी बैठे हुए हैं और सब लोग इस बात का इन्तजार कर रहे हैं कि इस मकान पर बारी-बारी से ऐयार लोग चढ़ें और अपनी अक्ल का नमूना दिखावें।

और ऐयारों की पोशाक तो मामूली ढंग की है, मगर भूतनाथ इस समय कुछ अजब ढंग की पोशाक पहने हुए है। सिवाय चेहरे के उसका कोई अंग खुला हुआ नहीं है। ढीला-ढीला मोटा पायजाम पौर गॅवारू रूईदार चपकन के अतिरिक्त बहुत बड़ा काला मुंडासा बाँधे हुए है, जिसका छिला सिरा पीठ पर से होता हुआ जमीन तक लटक रहा है। दोनों हाथ बल्कि नाखून तक चपकन की आस्तीन में घुसा हुआ है और पैर के जूते की भी विचित्र सूरत हो रही है। भूतनाथ का मतलब चाहे कुछ भी क्यों न हो, मगर लोग इसे केवल मसखरापन ही समझ रहे हैं।

सबके पहले पन्नालाल उस मकान की दीवार पर चढ़ गये और अन्दर की तरफ झांककर देखने लगे, मगर पांच-सात पल से ज्यादा अपने को न बचा सके और हँसते हुए अन्दर की तरफ कूद पड़े।

इसके बाद पंडित बद्रीनाथ, रामनारायण और चुन्नीलाल ने कोशिश की, मगर ये तीनों भी लौटकर न आ सके और पन्नालाल की तरह हंसते हुए अन्दर कूद पड़े।

इसके बाद और ऐयारों ने भी उद्योग किया, मगर कोई सफल-मनोरथ न हुआ। यहाँ तक कि जीतसिंह, तेजसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह को छोड़कर सभी ऐयार बारी-बारी से जाकर मकान के अन्दर कूद पड़े, केवल भूतनाथ रह गया जिसने सबके आखीर में चढ़ने का इरादा कर लिया था।

भूतनाथ मस्तानी चाल से चलता हुआ सीढ़ी के पास गया और धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा। देखते ही देखते वह दीवार के ऊपर जा पहुंचा। उस पर खड़े होकर एक दफे चारों ओर मैदान की तरफ देखा और इसके बाद मकान के अन्दर की तरफ झांका। यहाँ जो कुछ था उसे देखने के बाद उसने अपना चेहरा उस तरफ किया, जिधर खिड़कियों में बैठे हुए महाराज और राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह बड़े शौक से उसकी कैफियत देख रहे थे।

भूतनाथ ने हाथ उठाकर तीन दफे महाराज को सलाम किया और जोर से पुकार कर कहा, "मैं इसके अन्दर झांक कर देख चुका और बड़ी देर तक दीवार पर खड़ा भी रहा, अब हुक्म हो तो नीचे उतर जाऊँ!"

महाराज ने नीचे उतर आने का इशारा किया और भूतनाथ मुस्कुराता हुआ,मकान के नीचे उतर आया, इस बीच में और ऐयार लोग भी जो भूतनाथ के पहले मकान के अन्दर कूद चुके थे, घूमते हुए बड़े तिलिस्सी मकान के अन्दर से आ पहुँचे और भूतनाथ की कैफियत देख-सुनकर ताज्जुब करने लगे।

भूतनाथ के उतर आने के बाद सब ऐयार मिल-जुलकर महाराज के पास गये और महाराज ने प्रसन्न होकर भूतनाथ को दो लाख रुपए इनाम देने का हुक्म दिया। सभी ऐयारों को इस बात का ताज्जुब था कि उस तिलिस्म का असर भूतनाथ पर क्यों नहीं हुआ और वह कैसे सभी को बेवकूफ बनाकर आप बुद्धिमान बन बैठा और दो लाख का इनाम भी पा गया।

जीतसिंह--भूतनाथ, यह तुमने क्या किया कौन-सी तरकीब निकाली जिससे इस तिलिस्मी हवा का तुम पर कुछ भी असर न हुआ?

भूतनाथ--बात मामूली है, जब तक मैं नहीं कहता तभी तक आश्चर्य मालूम पड़ता है।

तेजसिंह--आखिर कुछ कहो भी तो सही।

भूतनाथ--मेरे दिल को इस बात का निश्चय हो गया था कि इस मकान के अन्दर से किसी तरह की हवा, भाफ या धुआं ऊपर की तरफ जरूर उठता है जो झाँक दर देखने वाले के दिमाग में सांस के रास्ते से चढ़कर उसे बदहोश या पागल बना देता है, और दीवार के ऊपरी हिस्से पर भी कुछ-कुछ बिजली का असर है, जो उस पर पैर रखने वाले के शरीर को शिथिल कर देता है। या और भी किसी तरह का असर कर जाता है। मैं इस बात को खूब जानता हूँ कि लकड़ी पर बिजली का असर कुछ भी नहीं होता, अर्थात् जिस तरह धातु, मिट्टी, जल, चमड़ा और शरीर में बिजली घुसकर पार निकल जाती है उस तरह लकड़ी को छेद कर बिजली पार नहीं हो सकती अतएव मैंने अपने पैर में लकड़ी के बुरादे का थैला चढ़ा लिया, बल्कि जूते के अन्दर भी लकड़ी की तख्ती रख दी, जिसमें दीवार से पैदा होने वाली बिजली का मुझ पर असर न हो, इसके बाद बेहोशी का असर न होने के लिए दवा भी खा ली, इतना करने पर भी जब तक मैं मकान के अन्दर झांकता रहा तब तक अपनी सांस को रोके रहा। मैंने अन्दर की तरफ चलती-फिरती और नाट्य करके हँसाने वाली पुतलियों को देखा और उस पीतल की चादर पर भी ध्यान दिया जो दीवार के ऊपर जड़ी थी और जिसके साथ कई तारे भी लगी हुई थीं। यद्यपि उसका असल भेद मुझे मालूम न हुआ मगर मैंने अपने बचाव की सूरत निकाल ली।

इतना कहकर भूतनाथ ने खंजर की नोक से अपने पायजामे में एक छेद कर दिया और उसमें, से लकड़ी का बुरादा निकाल कर सभी को दिखाया। भूतनाथ की बातें सुनकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भूतनाथ तथा और ऐयारों की तरफ देखकर कहा, "वास्तव में भूतनाथ ने बहुत ने बहुत ठीक तर्कीब सोची। उस तिलिस्म के अन्दर जो कुछ भेद है हम बता देते हैं, इसके बाद तुम लोग उसके अन्दर जाकर देख लेना। जमानिया तिलिस्म के अन्दर से इन्द्रजीतसिंह एक कुत्ता लाए हैं जो देखने में बहुत छोटा और संग-मर्मर का बना हुआ मालूम होता है और बहुत-सी पीतल की बारीक तारें उस पर लिपटी हुई हैं। असल में वह कुत्ता कई तरह के मसालों और दवाइयों से बना हुआ है। वह कुत्ता जब पानी में छोड़ दिया जाता है तो उसमें से मस्त और बदहोश कर देने वाली भाफ निकलती है और उसके साथ जो तारें लिपटी हुई हैं, उनमें बिजली पैदा हो जाती है। दीवार के ऊपर जो पीतल की चादर बिछाई गई है उसी के साथ वे तारें लगा दी गई हैं और उससे कुछ नीचे हटकर एक अच्छे तनाव का शामियाना तान दिया गया है, जिसमें कूदने वाले को चोट न लगे। इसके अतिरिक्त (भूतनाथ से) जिन्हें तुम पुतलियाँ कहते हो वे वास्तव में पुतलियाँ नहीं हैं बल्कि जीते जागते आदमी हैं जो भेष बदलकर काम करते हैं और एक खास किस्म की पोशाक पहनने और दवा सूंघने के सबब उन सब पर उस बिजली और बेहोशी का असर नहीं होता। इस खेल के दिखाने की तरकीब भी एक ताम्रपत्र पर लिखी हुई है जो उसी कुत्ते के साथ पाया गया था। इन्द्रजीत का बयान है कि जमानिया तिलिस्म में इस तरह के और भी कुत्ते मौजूद हैं।

महाराज की बातें सुनकर सभी को बड़ा ताज्जुब हुआ, इसी तरह हमारे पाठक महाशय भी ताज्जुब करते और सोचते होंगे कि यह तमाशा सम्भव है या असम्भव? मगर उन्हें समझ रखना चाहिए कि दुनिया में कोई बात असम्भव नहीं है। जो अब असम्भव है वह पहले जमाने में सम्भव थी और जो पहले जमाने में असम्भव थी वह आज सम्भव हो रही है। 'दीवार कहकहा' वाली बात आप लोगों ने जरूर सुनी होगी।

उसके विषय में भी यही कहा जाता है कि उस दीवार पर चढ़ कर दूसरी तरफ झांकने वाला हँसता-हँसता दूसरी तरफ कूद पड़ता था और फिर उस आदमी का पता ही नहीं लगता कि क्या हुआ और कहाँ गया। इस मशहूर और ऐतिहासिक बात को कई आदमी झूठ समझते हैं मगर वास्तव में ऐसा नहीं है। इसके विषय में हम नीचे एक लेख की नकल करते हैं जो तारीख 14 मार्च सन् 1905 ई० के अवध अखबार में छपा था-

"अगले जमाने में फिलासफर (वैज्ञानिक) लोग अपनी बुद्धि से जो चीजें बना गये हैं अब तक यादगार हैं। उनकी छोटी-सी तारीफ यह है कि इस समय के लोग उनके कामों को समझ भी नहीं सकते। उनके ऊंचे हौसले और ऊँचे खयाल की निशानी चीन हाते की दीवार है और हिन्दुस्तान में भी ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जिनका किस्सा आगे चल कर मैं लिखूगा। इस समय 'दीवार कहकहा' पर लिखना चाहता हूँ।"

"मैंने सन् 1899 ई० में 'अखबार आलम' मेरठ में कुछ लिखा जिसकी मालिक अखबार ने बड़ी प्रशंसा की थी, अब उसके कुछ और विशेष सबब खयाल में आये हैं जो बयान करना चाहता हूँ।

"मुसलमानों के प्रथम राज्य में उस समय के हाकिम ने इस दीवार की अवस्था जानने के लिए एक कमीशन भेजा था जिसके सफर का हाल दुनिया भर के अखबारों से प्रकट हुआ है।

"संक्षेप में यह कि कई आदमी मरे परन्तु ठीक तौर पर नहीं मालूम हो सका कि उस दीवार के उस तरफ क्या हाल-चाल है।

"उसकी तारीफ इस तरह पर है कि उस दीवार की ऊँचाई पर कोई आदमी जा नहीं सकता और जो जाता है वह हँसते-हँसते दूसरी तरफ गिर जाता है, यदि गिरने से किसी तरह रोक लिया जाय तो जोर से हँसते-हंसते मर जाता है।

"यह एक तिलिस्म कहा जाता है या कोई और बात है, पर यदि सोचा जाय तो यह कहा जायगा कि अवश्य किसी बुद्धिमान आदमी ने हकीमी कायदे से इस विचित्र दीवार को बनाया है।

"यह दीवार अवश्य कीमियाई विद्या से मदद लेकर बनाई गई होगी।"

यह बात जो प्रसिद्ध है कि दीवार के उस तरफ जिन्न और परी रहते हैं जिनको देखकर मनुष्य पागल हो जाता है और उसी तरफ को दिल दे देता है, यह बात ठीक हो सकती है परन्तु हँसता क्यों है यह सोचने की बात है।

कश्मीर में केशर के खेतों की भी यही तारीफ है। तो क्या उसकी सुगन्ध वहाँ जाकर एकत्र होती है, या वहाँ भी केशर के खेत हैं जिससे हंसी आती है? परन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि ऐसा होता तो यह भी मशहूर होता कि वहाँ केशर की महक आती है। नहीं-नहीं, कुछ और ही हिकमत है जैसा कि हिन्दुस्तान में किसी शहर के मसजिद की मीनारों में यह तारीफ थी कि ऊपर खड़े होकर पानी का भरा गिलास हाथ में लो तो वह आप ही आप छलकने लगता था। इसकी जाँच के लिए एक इंजीनियर साहब ने उसे गिरबा दिया और फिर उसी जगह पर बनवाया परन्तु वह बात न रही। या आगरा में ताजबीबी के रौजे के फव्वारों के नल जो मिट्टी के खरनचे की तरह थे जैसे खपरैल या बगीचे के नल होते हैं। संयोग से फव्वारों का एक नल टूट गया, उसकी मरम्मत की गई, तो दूसरी जगह से फट गया यहाँ तक कि तीस-चालीस वर्ष से बड़े-बड़े कारीगरों ने अपनी-अपनी कारीगरी दिखाई परन्तु सब व्यर्थ हुआ। अब तक तलाश है कि कोई उसे बना कर अपना नाम करे, मतलब यह कि 'दीवार कहकहा' भी ऐसी ही कारीगरी से बनी है जिसकी कीमियाई बनावट मेरी समझ में यों आती है कि सतह जहाँ जमीन से आसमान तक कई हिस्सों में अलग की गई है, लम्बाई का भाग कई हवाओं से मिला है जैसे आक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कार्बोलिकएसिड गैस, क्लोराइन इत्यादि। फिर इन हवाओं में से और भी कई चीजें बनती हैं जैसा कि नाइट्रोजन का एक मोरक्कब पुट ऑक्साइड आफ नाइट्रोजन है (जिसको लाफिंग गैस भी कहते हैं)। बस दुनिया के उस सतह पर जहाँ लाफिंग गैस जिसको हिन्दी में हंसाने वाली हवा कहते हैं पाई गई है, उस जगह पर यह दीवार सतह जमीन से इस ऊँचाई तक बनाई गई है। इस जगह पर बड़ी दलील यह होगी कि फिर बड़ी बनाने वाले आदमी कैसे उस जगह अपने होश में रह सकें वे क्यों न हँसते-हँसते मर गये? और यही हल करना पहले मुझसे रह गया था जिसे अब उस नजीर से जो अमेरिका में कायम हुई है हल करता हूँ, याने जिस तरह एक मकान कल के सहारे एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रख दिया जाता है उसी तरह यह दीवार भी किसी नीची जगह में इतनी ऊँची बनाकर कल से उठाकर उस जगह रख दी गई है जहाँ अब है। लाफिंग गैस में यह असर है कि मनुष्य उसके सूंघने से हँसते-हँसते दम घुट कर मर जाता है।

अब यह बात रही कि आदमी उस तरफ क्यों गिर पड़ता है? इस खिचाव को भी हम समझे हुए हैं परन्तु उसकी केमिस्ट्री (कीमियाई) अभी हम न बतावेंगे, इसको फिर किसी समय पर कहेंगे।

"दृष्टान्त के लिए यह नजीर लिख सकते हैं कि ग्वालियर की जमीन की यह तासीर है कि जो मनुष्य वहाँ जाता है, वहीं का हो जाता है, जैसे यह कहावत है कि एक कांवर वाला जिसके कांवर में उसके माता-पिता थे वहाँ पहुँचा और कांवर उतार कर बोला कि तुम्हारा जहाँ जी चाहे जाओ, मुझको तुमसे कुछ वास्ता नहीं। उस तपस्वी के माता-पिता बुद्धिमान थे, उन्होंने अपने प्यारे लड़के की आरजू-मिन्नत करके कहा कि हमको चम्बल दरिया के पार उतार दो फिर हम चले जायेंगे। लाचार होकर बड़ी हुज्जत से लड़का उनको दरिया के पार ले गया, ज्योंही उस पार हुआ, त्योंही चाहा कि अपनी नादानी से लज्जित होकर माता-पिता के चरणों पर गिर कर माफी चाहे, परन्तु उसके माता-पिता ने कहा कि 'ऐ बेटा, तेरा कुछ कसूर नहीं, यह तासीर उस जमीन की थी।'

'दीवार कहकहा के उस तरफ भी ऐसा ही खिंचाव है, जिसको हम ग्वालियर की हिस्टरी तैयार हो जाने पर यदि जीते रहे तो किसी समय परमेश्वर कृपा से आप लोगों पर जाहिर करेंगे, अभी तो हमको यह विश्वास है कि इतिहास ग्वालियर के बनाने वाले ग्रेटर साहब ही इस खिंचाव के बारे में कुछ बयान करेंगे। इतिहास लेखक महाशय को चाहिए कि ग्वालियर की तारीफ में इस किस्से की हकीकत जरूर बयान करें कि कांवर वाले ने कांवर क्यों रख दी थी और इसकी तारीख लिखें या इस किस्से को झूठ साबित करें, क्योंकि जो बात मशहूर होती है ग्रंथकर्ता को उसके झूठ-सच के बारे में जरूर कुछ लिखना चाहिए। तो भी ग्वालियर का इतिहास तैयार हो जाने पर उस खिंचाव के बारे में जो दीवार के उस तरफ है पूरा-पूरा हाल लिखेंगे।"

ग्वालियर की जमीन में कई तरह की खासियत हैं जिनको हम उस हिस्टरी की समालोचना में (यदि वह बातें हिस्टरी से बच रहीं) जाहिर करेंगे। दीवार-कहकहा के सम्बन्ध में जहाँ तक अपना खयाल था आप लोगों पर प्रकट किया, यानी दुनिया के उस हिस्से की सतह पर दीवार नहीं बनाई गई है जहाँ ऑक्साइड आफ नाइट्रोजन है बल्कि पहले दूसरी जगह बनाकर फिर कल के जरिये से वहाँ उठाकर रख दी गई है। यदि यह कहा जाय कि गैस सिर्फ उसी जगह थी और जगह क्यों नहीं है तो उसका सहज जवाब यह है कि जमीन से आसमान तक तलाश करो, किसी-न-किसी ऊँचाई पर तुमको गैस मिल ही जायगी। दूसरे यह कि कोई हवा सिर्फ खास जगह पर मिलती है, मसलन बन्द जगह की हलाक करने वाली बन्द हवा, जैसा कि अक्सर कुएँ में आदमी बर्तते हैं और घबरा कर मर जाते हैं। यदि यह कहा जाय कि वहाँ हवा नहीं है तो यह नहीं हो सकता। X X X

पहले जमाने के आदमी अपनी कारीगरी का अच्छा-अच्छा नमूना छोड़ गये हैं—जैसे मिट्टी की मीनार, या नौशेरवानी बाग या जवाहरात के पेड़ों पर चिड़ियों का गाना या आगरे का ताज जिसकी तारीफ में तारीख-तुराब के बुद्धिमान लेखक ने किसी लेखक का यह फिकरा लिखा है जिसका संक्षेप यह है कि "इसमें कुछ बुराई नहीं, यदि है तो यही है कि कोई बुराई नहीं।"देखिये आगरा में बहुत-सी बादशाही समय की टूटी-फूटी इमारतें हैं जिनमें पानी दौड़ाने के नल (पाइप) वैसे ही मिट्टी के हैं जैसे कि आज-कल मिट्टी के गोल परनाले होते हैं, उन्हीं नलों से दूर-दूर से पानी आता और नीचे से ऊपर कई मरातिम तक जाता था। इसी तरह से ताजगंज के फव्वारों के नल भी थे तथा और भी इसी तरह के हैं जिनमें से एक टूटने पर लोहे के नल लगाये गये, जब उनसे काम न चला तो बड़े-बड़े भारी पत्थरों में छेद करके लगाये गये, परन्तु बेफायदा हुआ।

उन फव्वारों की यह तारीफ है कि जो जितना ऊँचा जा रहा है उतनी ही ऊँचाई पर यहाँ से वहाँ तक बराबर धारें गिरती हैं। अब जो कहीं बनते हैं तो धार बराबर करने को ऊँची-नीची सतह पर फव्वारे लगाने पड़ते हैं। X X X

इसी तरह का तिलिस्म के विषय का एक लेख ता० 30 मार्च, सन् 1905 के अवध अखबार में छपा था, उसका अनुवाद भी हम नीचे लिखते हैं-

"गुजरे हुए जमाने के काबिल-कदर यादगारो! तुमको याद करके हम कहाँ तक रोयें और कहाँ तक विलाप करें? जमाने के बेकदर हाथों की बदौलत तुम अब मिट गये और मिटते चले जाते हो, जमीन तुमको खा गई और उनको भी खा गई जो तुम्हारे जानने वाले थे, यहाँ तक कि तुम्हारा निशान, तो निशान तुम्हारा नाम तक भी मिट गया!

"खलीफा-बिन-उम्मीयाँ के जमाने में जिन दिनों अब्दुल मलिक बिनमर्दा की तरफ से उसका भाई अब्दुलअजीज बिनमर्दा मिश्र देश का गवर्नर था, एक दिन उसके सामने दफीना (जमीन के नीचे छिपा हुआ खजाना) का हाल बतलाने वाल: कोई शख्स हाजिर हुआ। अब्दुल अजीज ने बात-बात ही में उससे कहा, "किसी दफीना का हाल तो बताइये!" जिसके जवाब में उसने एक टीले का नाम लेकर कहा कि उसमें खजाना है और इसकी परख इस तौर से हो सकती है कि वहां की थोड़ी जमीन खोदने पर संगमरमर और स्याह पत्थर का फर्श मिलेगा, जिसके नीचे फिर खोदने से एक खाली दरवाजा दिखाई देगा, उस दरवाजे के उखड़ने के बाद सोने का एक खम्भा नजर आवेगा, जिसके ऊपरी हिस्से पर एक मुर्ग बैठा होगा, उसकी आँखों में जो सुर्ख मानिक जड़े हैं वह इस कदर कीमती हैं कि सारी दुनिया उनके बदले और दाम में काफी हो तो हो। उसके दोनों बाजू मानिक और पन्ने से सजे हुए हैं और सोने वाले खम्भे से सोने के पत्तरों का कुछ हिस्सा निकल कर उस मुर्ग के सिर पर छाया किये हुए है।

"यह ताज्जुब की बात सुन कर उस गवर्नर का कुछ ऐसा शौक बढ़ा कि आमतौर पर हुक्म दे दिया कि वह जगह खोदी जाय और जो लोग उसको खोदेंगे और उसमें काम करेंगे, उनको हजारों रुपये दिये जायेंगे। वह जगह एक टीले पर थी, इस वजह से बहुत घेरा देकर खुदाई का काम शुरू हुआ। पता देने वाले ने जो संगमर्मर और स्याह पत्थर के फर्श वगैरह बताये थे, वे मिलते जाते थे और बताने वाले के कौल की तसदीक होती जाती थी और इसी वजह से अब्दुलअजीज का शौक बढ़ता जाता था तथा खुदाई का काम मुस्तैदी के साथ होता जाता था कि यकायक मुर्ग का सिर जाहिर हुआ। सिर के जाहिर होते ही एकवारगी आँखों को चकाचौंध करने वाली तेज रोशनी उस खोदी हुई जगह से निकल कर फैल गई, मालूम हुआ कि बिजली तड़प गई।

"यह गैरमामूली रोशनी मुर्ग की आँखों से निकल रही थी। दोनों आँखों में बड़े-बड़े मानिक जड़े हुए थे, जिनकी यह बिजली थी। और ज्यादा खोदे जाने पर उसके दोनों जड़ाऊ बाजू भी नजर आये और फिर उसके पाँव भी दिखाई दिये।

"उस मुर्ग वाले सोने के खम्भे के अलावा एक और खम्भा भी नजर आया जो एक इमारत की तरह पर था। यह इमारती खम्भा रंग-बिरंगे पत्थरों का बना हुआ था, जिसमें कई कमरे थे और उनकी छतें बिल्कुल छज्जेदार थीं। उसके दरवाजों पर बड़े और खूबसूरत आलों (ताकों) की एक कतार थी, जिनमें तरह-तरह की रखी हुई सूरतें और बनी सूरतें खूबी के साथ अपनी शोभा दिखा रही थीं, सोने और जवाहरात के जगह-जगह पर ढेर थे, जो छिपे हुए थे, ऊपर से चाँदी के पत्तर लगे थे और पत्तरों पर सोने की कीलें जड़ी थीं। अब्दुलअजीज बिनमर्दा यह खबर पाते ही बड़ो चाह से उस मौके पर पहुँचा और जो आश्चर्यजनक तिलिस्म वहाँ जाहिर था, उसको बहुत दिलचस्पी के साथ देर तक देखता रहा और तमाम खलकत की भीड़-भाड़ थी, तमाशबीन अपने बढ़े हुए शौक में एक-दूसरे पर गिरे पड़ते थे। एक जगह ढले हुए ताँबे की सीढ़ी ऊपर तक लगी हुई थी, उसको देखकर एक शख्स ऊपर जल्दी-जल्दी चढ़ने लगा, हरएक तमाशबीन ताज्जुब के साथ वहाँ की हर चीज को देख रहा था।

"उस जीने की चौथी सीढ़ी पर जब चढ़ने वाले ने कदम रखा तो जीने की दाहिनी और बाईं तरफ से दो नंगी तलवारें, अपना काट और तड़प दिखाती हुई निकलीं। यद्यपि इस चढ़ने वाले ने बचने के लिए हर तरह की कोशिश की। मगर दोनों निकलने वाली तलवारें प्राणघातक शत्रु थीं, जिन्होंने देखते-ही-देखते इस चढ़ने वाले आदमी का काम तमाम कर दिया और फिर यह देखा गया कि इस शख्स के टुकड़े नीचे कट कर गिरे। उनके गिरते ही वह खम्भा झोंके ले-लेकर आप-से-आप हिलने लगा और उस पर से बैठा हुआ मुर्ग कुछ अजब शान से उड़ा कि देखने वाले अचम्भे में होकर देखते रह गये।

जिस वक्त उसने उड़ने के लिए अपने बाजू (डैने) फड़फड़ाये तो अद्भुत सुरीली और दिल लुभाने वाली आवाजें उससे निकलीं--लोग उन्हें सुनकर दंग रह गये और ये आवाजें हवा में गूंज कर दूर-दूर तक फैल गई।

उस मुर्ग के उड़ते ही एक किस्म की गर्म हवा चली जिसकी वजह से जिस कदर तमाशबीन आसपास में खड़े थे वे सब-के-सब उस तिलिस्मी गार (खोह) में गिर पड़े। उस गड़हे के अन्दर उस वक्त खोदने वोले बेलदार, मिट्टी को बाहर फेंकने वाले मजदूर और मेट वगैरह, जिनकी तादाद एक हजार कही जाती है, मौजूद थे। जो सब-के-सब बेचारे फौरन मर गये। अब्दुलअजीज ने यह हाल देखकर एक चीख मारी और कहा, "यह भी अजीब दुखदाई बात हुई! इससे क्या उम्मीद रखनी चाहिए!"

इसके बाद और मजदूर उसमें लगा दिये गए। जिस कदर मिट्टी वगैरह निकली थी, वह सब-की-सब अन्दर डाल दी गई। वह मर जाने वाले तमाशबीन भी सब उसी के अन्दर तोप दिये गए और आखिर में वह तिलिस्मी जगह अच्छा-खासा एक 'कब्रिस्तान' बन गया। गये थे दफीना निकालने के लिए और इतनी जानें दफन कर आये, खर्च घाटे में रहा।

८

तीसरे दिन पुनः दरबार हुआ और कैदी लोग लाकर हाजिर किये गए। महाराज सुरेन्द्रसिंह का लिखाया हुआ फैसला सभी के सामने तेजसिंह ने पढ़ कर सुनाया। सुनते ही कम्बख्त दारोगा जयपाल, हरनामसिंह वगैरह रोने, कलपने, चिल्लाने और महाराज से कहने लगे कि इसी जगह हम लोगों का सिर काट लिया जाय या जो चाहें महाराज सजा दें मगर हम लोगों को गोपालसिंह के हवाले न करें कैदियों ने बहुत सिर पीटा, मगर उनकी कुछ न सुनी गई। जो कुछ महाराज ने फैसला लिखाया था उसी मुताबिक कार्रवाई की गई और इस फैसले को सभी ने पसन्द किया।

इन सब कामों से छुट्टी पाने के बाद एक बहुत बड़ा जलसा किया गया और कई दिनों तक खुशी मनाने के बाद सब कोई बिदा कर दिये गए। राजा गोपालसिंह कैदियों को साथ लेकर जमानिया चले गए, लक्ष्मीदेवी उनके साथ गई और तेजसिंह तथा और भी बहुत से आदमी महाराज की तरफ से उनको साथ पहुँचाने के लिए गए। जब वे लौट आये तब औरतों को साथ लेकर राजा वीरेन्द्रसिंह इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह वगैरह पुनः तिलिस्म में गए और उन्हें तिलिस्म की खूब सैर कराई। कुछ दिन बाद रोहतासगढ़ के तहखाने की भी उन लोगों को सैर कराई और फिर सब कोई हँसी-खुशी से दिन बिताने लगे।

प्रेमी पाठक महाशय, अब इस उपन्यास में मुझे सिवाय इसके और कुछ कहना नहीं है कि भूतनाथ ने प्रतिज्ञानुसार अपनी जीवनी लिख कर दरबार में पेश की और महाराज ने पढ़कर उसे खजाने में रख दिया। इस उपन्यास का भूतनाथ की खास जीवनी से कोई सम्बन्ध न था इसलिए इसमें वह जीवनी नत्थी न की गई, हाँ खास-खास भेद जो सतनाथ से सम्बन्ध रखते थे खोल दिये गए, तथापि भूतनाथ की जीवनी जिसे चन्द्रकान्ता सन्तति का उपसंहार भाग भी कह सकेंगे स्वतन्त्र रूप से लिख कर अपने प्रेमी पाठकों की नजर करूँगा, मगर इसके बदले में अपने प्रेमी पाठकों से इतना जरूर कहूँगा कि इस उपन्यास में जो कुछ भूल चूक रह गई हो और जो भेद रह गए हों वह मुझे अवश्य बतावें जिसमें 'भूतनाथ की जीवनी' लिखते समय उन पर ध्यान रहे, क्योंकि इतने बड़े उपन्यास में मेरे ऐसे अनजान आदमी से किसी भी तरह की त्रुटि का रह जाना कोई आश्चर्य नहीं है।

प्रिय पाठक महाशय, अब चन्द्रकान्ता सन्तति की लेख प्रणाली के विषय में भी कुछ कहने की इच्छा होती है।

जिस समय मैंने 'चन्द्रकान्ता' लिखनी आरम्भ की थी उस समय कविवर प्रतापनारायण मिश्र और पण्डितवर अम्बिकादत्त व्यास जैसे धुरंधर किन्तु अनुद्धत सुकवि और सुलेखक विद्यमान थे, तथा राजा शिवप्रसाद, राजा लक्ष्मणसिंह जैसे सुप्रतिष्ठित पुरुष हिन्दी की सेवा करने में अपना गौरव समझते थे, परन्तु अब न वैसे मार्मिक कवि हैं और वैसे सुलेखक। उस समय हिन्दी के लेखक थे परन्तु ग्राहक न थे, इस समय ग्राहक हैं पर वैसे लेखक नहीं हैं। मेरे इस कथन का यह मतलब नहीं है कि वर्तमान समय के साहित्यसेवी प्रतिष्ठा के योग्य नहीं हैं, बल्कि यह मतलब है कि जो स्वर्गीय सज्जन अपनी लेखनी से हिन्दी के आदि युग में हमें ज्ञान दे गए हैं वे हमारी अपेक्षा बहुत बढ़-चढ़ कर उनकी लेख प्रणाली में चाहे भेद रहा हो, परन्तु उन सब का लक्ष्य यही था कि इस भूमि में किसी तरह मातृ-भाषा का एकाधिपत्य हो, लेकिन यह कोई नियम की बात नहीं है कि वैसे लोगों से कुछ भूल हो ही नहीं उनसे भूल हुई तो यही कि प्रचलित शब्दों पर उन्होंने अधिक ध्यान नहीं दिया। राजा शिवप्रसादजी के राजनीति के विचार चाहे कैसे ही रहे हों पर सामाजिक विचार उनके बहुत ही प्राञ्जल थे और वे समयानुकूल काम करना खूब जानते थे, विशेषत जिस ढंग की हिन्दी वे लिख गए हैं उसी से वर्तमान में हिन्दी का रास्ता कुछ साफ हुआ है।

चाहे कोई हिन्दू हों चाहे जैन या बौद्ध हों और चाहे आर्य समाजी या धर्म-समाजी ही क्यों न हों परन्तु जिन सज्जनों के माननीय अवतारों और पूर्वजों ने इस पुण्य भूमि का अपने आविर्भाव से गौरव बढ़ाया है उनमें ऐसा अभागा कौन होगा जो पुण्यता और मधुरता-युक्त संस्कृत भाषा के शब्दों का प्रचुर प्रचार न चाहेगा? मेरे विचार में किसी विवेकी भारत सन्तान के विषय में केवल यह देखकर कि वह विदेशी भाषा के शब्दों का प्रसार कर रहा है यह गढन्त कर लेना कि वह देववाणी के पवित्र शब्दों का विरोधी है भ्रम ही नहीं किन्तु अन्याय भी है। देखना यह चाहिए कि ऐसा करने से उसका मतलब क्या है? भारतवर्ष में आठ सौ वर्ष तक विदेशी यवनों का राज्य रहा है इसलिए फारसी-अरबी के शब्द हिन्दू समाज में "न पठेत् यावनी भाषा" की दीवार लांघ कर उसी प्रकार आ घुसे जिस प्रकार हिमालय के उन्नत मस्तक को लांघकर वे स्वयं यहां आ गए, यहाँ तक कि महात्मा तुलसीदास जी जैसे भगवद्भक्त कवियों को भी "गरीब-निवाज" आदि शब्दों का बर्ताव दिल खोल कर करना पड़ा।

आठ सौ वर्ष के कुसंस्कार को जो गिनती के दिनों में दूर करना चाहते हैं, उनके उत्साह और साहस की प्रशंसा करने पर भी हम यह कहने के लिए मजबूर हैं कि वे अपने बहुमूल्य समय का सदुपयोग नहीं करते बल्कि जो कुछ वे कर सकते थे, उससे भी दूर हटते हैं। यदि ईश्वरचन्द्र विद्यासागर सीधे-सादे शब्दों से बंगला में काम न लेते तो उत्तर काल के लेखकों को संस्कृत शब्द के बाहुल्य प्रचार का अवसर न मिलता और यदि राजा'शिवप्रसादी हिन्दी' प्रकट न होती तो सरकारी पाठशालाओं में हिन्दी के चन्द्रमा की चाँदनी मुश्किल से पहुंचती। मेरे बहुत से मित्र हिन्दुओं की अकृतज्ञता का यों वर्णन करते हैं कि उन्होंने हरिश्चन्द्रजी जैसे देश हितैषी पुरुष की उत्तम-उत्तम पुस्तकें नहीं खरीदी, पर मैं कहता हूँ कि यदि बाबू हरिश्चन्द्र अपनी भाषा को थोड़ा सरल करते तो हमारे भाइयों को अपने समाज पर कलंक लगाने की आवश्यकता न पड़ती और स्वाभाविक शब्दों के मेल से हिन्दी की पैसिजर भी मेल बन जाती। प्रवाह के विरुद्ध चलकर यदि कोई कृतकार्य हो तो निःसन्देह उसकी बहादुरी है, परन्तु बड़े-बड़े दार्शनिक पंडितों ने इसको असम्भव ठहराया है। सारसुधानिधि और कविवचनसुधा की भाषा यद्यपि भावुक-जनों के लिए आदर की वस्तु थी, परन्तु समय के उपयोगी न थी। हमारे 'सुदर्शन' की लेख-प्रणाली को हिन्दी के धुरन्धर लेखकों और विद्वानों ने प्रशंसा के योग्य ठहराया है,परन्तु साधारणजन उससे कितना लाभ उठा सकते है यह सोचने की बात है। यदि महाकवि भवभूति के समान किसी भविष्य पुरुष की आशा ही पर ग्रन्थकारों और लेखकों को यत्न करना चाहिए, तब तो मैं सुदर्शन के सम्पादक पण्डित माधवप्रसाद मिश्र को भी भविष्य की आशा पर बधाई देता हूँ, पर यदि ग्रन्थकारों को भविष्य की अपेक्षा वर्तमान से अधिक सम्बन्ध है तो निःसन्देह इस विषय में मुझे आपत्ति है।

किसी दार्शनिक ग्रंथ या पत्र की भाषा के लिए यदि किसी बड़े कोष को टटोलना पड़े, तो कुछ परवाह नहीं, परन्तु साधारण विषयों की भाषा के लिए भी कोषी की खोज करनी पड़े तो निःसन्देह दोष की बात है। मेरी हिन्दी किस श्रेणी की हिन्दी है इसका निर्धारण मैं नहीं करता परन्तु मैं यह जानता हूँ कि इसके पढ़ने के लिए कोष की तलाश नहीं करनी पड़ती। चन्द्रकान्ता के आरम्भ के समय मुझे यह विश्वास न था कि उसका इतना अधिक प्रचार होगा, यह मनोविनोद के लिए लिखी गई थी, पर पीछे लोगों का अनुराग देखकर मेरा भी अनुराग हो गया और मैंने अपने उन विचारों को जिनको मैं अभी तक प्रकाश नहीं कर सका था, फैलाने के लिए इस पुस्तक को द्वार बनाया और सरल भाषा में उन्हीं मामूली बातों को लिखा जिससे मैं उस होनहार मण्डली का प्रियपात्र बन जाऊँ, जिसके हाथ में भारत का भविष्य सौंपकर हमें इस असार संसार से बिदा होना है। मुझे इस बात से बड़ा हर्ष है कि मैं इस विषय में सफल हुआ और मुझे ग्राहकों की अच्छी श्रेणी मिल गई। यह बात बहुत से सज्जनों पर प्रकट है कि 'चन्द्रकान्ता' पढ़ने के लिए बहुत से पुरुष नागरी की वर्णमाला सीखते हैं और जिनको कभी हिन्दी सीखना न था उन लोगों ने भी इसके लिए सीखी।

हिन्दी के हितैषियों में दो प्रकार के सज्जन हैं : एक तो वे जिनका विचार यह है कि चाहे अक्षर फारसी क्यों न हों पर भाषा विशुद्ध संस्कृत मिश्रित होनी चाहिए और दूसरे वे जो यह चाहते हैं कि चाहे भाषा में फारसी के शब्द मिले भी हों पर अक्षर नागरी होने चाहिए। पहले मैं पंजाब के आर्यसमाजियों और धर्म सभा वालों को मान लेता हूँ, जिनके लेखों में वर्णमाला के सिवाय फारसी, अरबी को कुछ भी सहारा नहीं, सब-कुछ संस्कृत का है, और दूसरे पक्ष में मैं अपने को ठहरा लेता हूँ, जो इसके विपरीत है। बात को भी स्वीकार करता हूँ कि जिस प्रकार फारसी, वर्णमाला उर्दू का शरीर और अरबी, फारसी के उपयुक्त शब्द उसके जीवन हैं, ठीक उसी प्रकार नागरी वर्णमाला हिन्दी का शरीर और संस्कृत के उपयुक्त शब्द उसके प्राण कहे जा सकते हैं। यदि यह देश यवनों के अधिकार में न हुआ होता, और यदि कायस्थादि हिन्दू जातियों में उर्दू भाषा का प्रेम इस उसी प्रकार हमारे ग्रंथों की सजीव उत्पत्ति होती जिस प्रकार द्विज बालकों की होती है। शरीर में यदि आत्मा न हो तो वह बेकार है और यदि आत्मा को उपयुक्त शरीर न मिल कर पशु पक्षी आदि शरीर मिल जाये, तो भी वह निष्फल ही है, इसलिए शरीर बनाकर फिर उसमें आत्मदेव की स्थापना करना ही न्याययुक्त और लाभप्रद है। 'चन्द्रकान्ता' और 'सन्तति' में यद्यपि इस बात का पता नहीं लगेगा कि कब और कहाँ भाषा का परिवर्तन हो गया, परन्तु उसके आरम्भ और अन्त में आप ठीक वैसा ही परिवर्तन पायेंगे, बालक और वृद्ध में। एक दम से शब्दों का प्रचार करते तो कभी सम्भव न था कि उतने संस्कृत शब्द हम उन कुपढ़ ग्रामीण लोगों को याद करा देते, जिनके निकट काला अक्षर बाईस के बराबर था।मेरे इस कर्तव्य का आश्चर्यमय फल देखकर वे लोग भी बोधगम्य उर्दू के शब्दों को अपनी विशुद्ध हिन्दी में लाने लगे हैं जो आरम्भ में इसीलिए मुझ पर कटाक्षपात करते थे। इस प्रकार प्राकृतिक प्रवाह के साथ-साथ साहित्यसेवियों की सरस्वती का प्रवाह बदलता देखकर समय के बदलने का अनुमान करना कुछ अनुचित नहीं है। जो हो भाषा के विषय में हमारा वक्तव्य यही है कि वह सरल हो और नागरी वाणी में हो, क्योंकि जिस भाषा के अक्षर होते हैं, उनका खिंचाव उन्हीं मूल भाषाओं की ओर होता है जिससे उनकी उत्पत्ति हुई है।

भाषा के सिवाय दूसरी बात मुझे भाव के विषय में कहनी है। मेरे कई मित्र आक्षेप करते है कि मुझे देश-हितपूर्ण और धर्मभावमय कोई ग्रन्थ लिखना उचित था, जिससे मेरी प्रसरणशील पुस्तकों के कारण समाज का बहुत-कुछ उपकार व सुधार हो जाता। बात बहुत ठीक है, परन्तु एक अप्रसिद्ध ग्रंथकार की पुस्तक को कौन पढ़ता? यदि मैं चन्द्रकान्ता और सन्तति को न लिखकर अपने मित्रों से भी दो-चार बातें हिन्दी के विषय में कहना चाहता तो कदाचित् वे भी सुनना पसन्द नहीं करते। गम्भीर विषय के लिए जैसे एक विशेष भाषा का प्रयोजन होता है वैसे ही विशेष पुरुष का भी। भारतवर्ष में विशेषता की अधिकता न देखकर मैंने साधारण भाषा में साधारण बातें लिखना ही आवश्यक समझा। संसार में ऐसे भी लोग हुए होंगे जिन्होंने सरल और भावमय एक ही पुस्तक लिखकर लोगों का चित्त अपनी ओर खींच लिया हो पर वैसा कठिन काम मेरे ऐसे के करने के योग्य न था। तथापि पात्रों की चाल-चलन दिखाने में जहाँ तक हो सका इसका ध्यान रखा गया है। सब पात्र यथासमय सन्ध्या-तर्पण करते हैं और अवसर पड़ने पर पूजा प्रकार भी वीरेन्द्रसिंह आदि के वर्णन में जगह-जगह दिखाई देता है।

कुछ दिनों की बात है कि मेरे कई मित्रों ने संवाद-पत्रों में इस विषय का आंदोलन उठाया था कि इनके कथानक सम्भव है या असम्भव। मैं नहीं समझता कि यह बात क्यों बनाई और बढ़ाई गई! जिस प्रकार पंचतन्त्र-हितोपदेश आदि ग्रन्थ बालकों की शिक्षा के लिए लिखे गये, उसी प्रकार यह लोगों के मनोविनोद के लिए। पर यह सम्भव है या असम्भव इस विषय में कोई यह समझे कि 'चन्द्रकान्ता' और 'वीरेन्द्रसिंह' इत्यादि पात्र और उनके विवित्र स्थानादि सब ऐतिहासिक है तो बड़ी भारी भूल है। कल्पना का मैदान विस्तृत है और उसका यह एक छोटा-सा नमूना है। रही सम्भव असंभव की बात अर्थात् कौन-सी बात हो सकती है और कौन नहीं हो सकती! इसका विचार प्रत्येक मनुष्य की योग्यता और देश काल पात्र से सम्बन्ध रखता है। कभी ऐसा समय था कि यहां के आकाश में विमान उड़ते थे, एक एक वीर पुरुष के तीरों में यह सामर्थ्य थी कि क्षणमात्र में सहस्रों मनुष्यों का संहार हो जाता था, पर अब वह बातें खाली पौराणिक कथा समझी जाती है पर दो सौ वर्ष पहले जो बातें असम्भव थीं आजकल विज्ञान के सहारे वे सब सम्भव हो रही हैं। रेल, तार, बिजली आदि के कार्यो को पहले कौन मान सकता था? और फिर यह भी है कि साधारण लोगों की दृष्टि में जो असम्भव है कवियों की दृष्टि में भी वह असम्भव ही रहे यह कोई नियम की बात नहीं है। संस्कृत साहित्य के सर्वोत्तम उपन्यास 'कादम्बरी' की नायिका युवती की युवती ही रही पर उसके नायक के तीन जन्म हो गये,तथापि कोई बुद्धिमान पुरुष इसको दोषावह न समझकर गुणधायक ही समझेगा। चन्द्रकान्ता में जो अद्भुत बातें लिखी गई हैं, वे इसलिए नहीं कि लोग उनकी सचाई-झुठाई की परीक्षा करें, प्रत्युत इसलिए कि उसका पाठ कुतूहल वर्द्धक हो।

एक समय था कि लोग 'सिंहासन' 'बत्तीसी' 'वैतालपचीसी' आदि कहानियों को विश्राम काल में रुचि से पढ़ते थे फिर 'चहारदरवेश' और 'अलिफलैला' के किस्सों का समय आया, अब इस ढंग के उपन्यासों का समय है। अब भी वह समय दूर है, जब लोग बिना किसी प्रकार की न्यूनाधिकता के ऐतिहासिक पुस्तकों को रुचि से पढ़ेंगे।जब वह समय आवेगा उस समय 'कथासरित्सागर' के समान 'चन्द्रकान्ता' बतलावेगी कि एक वह भी समय था, जब इसी प्रकार के ग्रन्थों से ही वीर प्रसू भारत भूमि की सन्तान का मनोविनोद होता था। भगवान उस समय को शीघ्र लावें!