चन्द्रकान्ता सन्तति
तीसरा भाग
१
पाठक समझ ही गये होंगे कि रामशिला के सामने फलगू नदी में बीच में भयानक टीले के ऊपर रहने वाले बाबाजी के पास जो दोनों औरतें गई थीं वे माधवी और उसकी सखी तिलोत्तमा थीं। बाबाजी ने उन दोनों से वादा किया था कि तुम्हारी बात का जवाब कल देंगे, इसलिए दूसरे दिन वे दोनों आधी रात के समय फिर बाबाजी के पास गईं। किवाड़ खटखटाते ही अन्दर से वाबाजी ने दरवाजा खोल दिया और उन दोनों को बुला कर अपने पास बैठाया।
बाबा-कहो माधवी अच्छी हो?
माधवी-अच्छी क्या रहूँगी, अपने किये को पछताती हूँ!
बाबा-अब भी अपने को सम्हालो तो मैं वादा करता हूँ कि राजा वीरेन्द्रसिंह से कहकर तुम्हारा राज्य तुम्हें दिलवा दूँगा।
माधवी-अजी, अब भीख मांगने की इच्छा नहीं होती, अब तो जहाँ तक बन पड़ेगा अपने दुश्मनों को मार के ही कलेजा ठंडा करूँगी, चाहे इसके लिए मेरी जान भी जाय तो कोई परवाह नहीं!
बाबा-अगर यही खयाल है तो तम्हें अपने दीवान अग्निदत्त से बदला लेना चाहिए, वीरेन्द्रसिंह के लड़कों ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा!
माधवी-आपका कहना ठीक है मगर मैंने जो कुछ सोच रक्खा है वही करूँगी। मैं अपना इरादा किसी तरह बदल नहीं सकती और इसमें आपको हर तरह से मेरी मदद करनी होगी।
बाबा-खैर, जिस तरह बनेगा मैं तुम्हारी मदद करूँगा, मगर यह तो बताओ, सिवाय मेरे इस समय और भी कोई तुम्हारा मददगार है या नहीं?
माधवी-कल तक तो मेरा मददगार कोई भी न था, मगर आज मेरे कई मददगार पहुँच गये हैं और अब मेरा काम जरूर हो जायेगा इसमें शक नहीं।
बाबा-कौन मददगार पहुँच गया है?
माधवी––मेरा भाई भीमसेन!
बाबा––शिवदत्त का लड़का भीमसेन?
माधवी––जी हाँ।
बाबा––तब तो तुम्हारा काम ज़रूर हो जायेगा।
माधवी––तो भी आपको मेरी मदद करनी ही होगी।
बाबा––मैं जरूर मदद करूँगा, जो कुछ कहो मैं करने को तैयार हूँ!
माधवी––कल भीमसेन उस मकान में जाने का उद्योग करेगा जिसमें किशोरी रहती है। उसने मौका पाते ही अपनी बहिन किशोरी को मार डालने की कसम खाई है। अगर कल वह उस मकान के अन्दर किसी तरह जा सका तो जरूर ही किशोरी को मार डालेगा। फिर मुझे किसी तरह का तरद्दुद न रहेगा और न आपसे मदद लेने की ही जरूरत पड़ेगी, लेकिन वह उस मकान के अन्दर न जा सका तो जिस तरह हो आपको ऐसी कोई तरकीब करनी पड़ेगी जिसमें किशोरी उस मकान को छोड़ दे।
बाबा––भरसक तो मेरी मदद की जरूरत ही न पड़ेगी।
माधवी––ऐसा न कहिए! अगर उस मकान में कमन्द लगाने की जगह होती तब तो कोई बात ही न थी, अब तक मैं अपना काम निकाल लिए होती।
हाँ, यह तो मैं भी जानता हूँ कि तुम्हारे पिता ने उस मकान के बनवाने में बड़ी कारीगरी खर्च की है, मगर तो भी भीमसेन ने उसके अन्दर जाने की कोई तरकीब सोची ही होगी।
माधवी––जी हाँ, देखा चाहिए, कल क्या होता है।
बाबा––अच्छा, अब तुम परसों मुझसे जरूर मिलना। अगर तुम्हारा काम हो गया तो ठीक ही है, नहीं तो चौथे दिन मैं सहज ही में तुम्हारा काम कर दूँगा।
'बहुत अच्छा' कह कर माधवी वहाँ से उठी और अपनी सखी तिलोत्तमा को साथ लिये अपने डेरे पर चली आई।
माधवी के चले जाने पर थोड़ी देर तक बाबाजी कुछ सोचते रहे, इसके बाद वेम्टी के बाहर निकले और दो-चार दफे जोर से ताली बजाई। यकायक इधर-उधर पड़ों की आड़ में से चार-पाँच आदमी निकल कर बाबाजी के पास आये और एक ने बढ़कर पूछा, "कहिये, क्या हाल है?"
बाबाजी ने कहा, "आज अब तुम लोगों की कोई जरूरत नहीं है, जहाँ चाहो चले जाओ, मगर कल एक घण्टे रात जाते-जाते तुम लोग जहाँ जरूर जुट जाओ!"
एक––क्यों, खैर तो है? मैं बिना कुछ हाल सुने जाने वाला नहीं!
बाबा––अच्छा, तो फिर यह भी सुन लो कि कल क्या होगा और हम लोग क्या करेंगे।
सभी को लेकर बाबाजी कुटी के अन्दर गये और किवाड़ बन्द कर न मालूम क्या बातचीत करने लगे।
अब हम उसी मकान में पहुँचते हैं जिसमें किशोरी और किन्नरी का डेरा है या जहाँ इन्द्रजीतसिंह को लेकर कमला गई है।
किशोरी के चिल्लाने की आवाज सुन कर किन्नरी हाथ में तलवार लिए बहुत जल्द नीचे उतर गई। कमला ने किवाड़ खटखटाया है, दरवाजा खोलना चाहिए, इसका खयाल तो जाता रहा और इधर-उधर किशोरी को ढूँढ़ने लगी मगर इसे ढूँढ़ने में उसने ज्यादा देर न लगाई, दो ही चार दफे दालान और कोठरियों में घूम कर वह लौटी और सदर दरवाजा खोल कर कमला को मकान के अन्दर कर लिया।
दरवाजा खुलने में देर हुई इसी से कमला समझ गई कि भीतर कुछ गोलमाल हुआ है। अन्दर आते ही उसने पूछा, "क्यों, क्या हुआ?" जिसके जवाब में बदहवास किन्नरी केवल इतना ही कह सकी, "दरवाजा खोलने के लिए किशोरी नीचे उतरी थी, मगर न मालूम चिल्ला कर कहाँ गायब हो गई!"
कमला ने इस बात का कुछ जवाब न दिया। उसने सबसे पहले छत पर जाकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह को कमन्द लगाने में मदद दी। जब वे और तारासिंह ऊपर चढ़ आये तो उन दोनों को भी साथ ले वह नीचे आँगन में उतर आई और किन्नरी की ही तरह संक्षेप में किशोरी के गायब हो जाने का हाल कहकर इधर-उधर ढूँढ़ने लगी। ये सब बातें थोड़ी ही देर में हो गई और अँधेरा होने पर भी बात की बात में कमला ने नीचे की कुल कोठरियों में किशोरी को ढूँढ़ डाला, परेशान और बदहवास इन्द्रजीतसिंह उसके साथ-साथ घूमते रह।
ढूँढते-ढूँढ़ते कमला जब उस कोठरी में पहुँची जिसकी पीठ खँडहर की तरफ पड़ती थी तो यकायक चाँदना मालूम पड़ा। भीतर घुसी, और तुरत ही निश्चय हो गया कि खँडहर की तरफ से कोई दीवार में सेंध लगा कर इस मकान के अन्दर घुसा और यह आफत मचा गया। उस खुलासा सेंध की राह से ये चारों आदमी भी बाहर खँडहर में निकल गये और वहाँ एक विचित्र तमाशा देखा!
२
शिवदत्तगढ़ में महाराज शिवदत्त बैठा हुआ बेफिक्री का हलुआ नहीं उड़ाता। सच पूछिये तो तमाम जमाने की फिक्र ने उसको आ घेरा है। वह दिन और रात सोचा ही करता है और उसके ऐयारों और जासूसों का दिन दौड़ते ही बीतता है। चुनार, गयाजी और राजगृह का हाल तो उसे रत्ती-रत्ती मालूम है क्योंकि इन तीनों जगहों की खबरें पहुँचाने के लिए उसने पूरा बन्दोबस्त किया हुआ है। आज यह खबर पाकर कि गयाजी का राज्य राजा वीरेन्द्रसिंह के कब्जे में आ गया, माधवी राज ही छोड़ कर भाग गई, और किशोरी दीवान अग्निदत्त के हाथ फँसी हुई है, शिवदत्त घबड़ा उठा और तरह-तरह की बातें सोचने में इतना लीन हो गया कि तन-बदन की सुध जाती रही। किशोरी के ऊपर उसे इतना गुस्सा आया कि अगर वह यहाँ मौजूद होती तो अपने हाथ से उसके टुकड़े-टुकड़े कर डालता। इस समय भी वह यह प्रण करके उठ खड़ा हुआ कि 'जब तक किशोरी के मरने की खबर न पाऊँगा अन्न न खाऊँगा' और सीधा महल में चला गया, हुक्म देता गया कि भीमसेन को हमारे पास भेज दो।
राजा शिवदत्त महल में जाकर अपनी रानी कलावती के पास बैठ गया। उसके चेहरे की उदासी और परेशानी का सबब जानने के लिए कलावती ने बहुत-कुछ उद्योग किया मगर जब तक उसका लड़का भीमसेन महल में न आया, उसने कलावती की बात का कुछ भी जवाब न दिया। माँ-बाप के पास पहुंचते ही भीमसेन ने प्रणाम किया और पूछा, "क्या आज्ञा होती है?"
शिवदत्त––किशोरी के बारे में जो कुछ खबर आज पहुँची तुमने भी सुनी होगी?
भीमसेनी––जी हाँ।
शिवदत्त––अफसोस, फिर भी तुम्हें अपना मुँह दिखाते शर्म नहीं आती! न मालूम तुम्हारी बहादुरी किस दिन काम आयेगी और तुम किस दिन अपने को इस लायक बनाओगे कि मैं तुम्हें अपना लड़का समझू!
भीमसेन––मुझे जो आज्ञा हो, तैयार हूँ।
शिवदत्त––मुझे उम्मीद नहीं कि तुम मेरी बात मानोगे!
भीमसेन––मैं यज्ञोपवीत हाथ में लेकर कसम खाता हूँ कि जब तक जान बाकी है उस काम के करने की पूरी कोशिश करूँगा जिसके लिए आप आज्ञा देंगे!
शिवदत्त––मेरा पहला हुक्म यह है कि किशोरी का सिर काट कर मेरे पास लाओ।
भीमसेन––(कुछ सोच और ऊँची साँस लेकर) बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। और क्या हुक्म होता है?
शिवदत्त––इसके बाद वीरेन्द्रसिंह या उनके लड़कों में से जब तक किसी को मार न लो यहाँ मत आओ। यह न समझना कि यह काम मैं तुम्हारे ही सुपुर्द करता हूँ। नहीं, मैं खुद आज इस शिवदत्तगढ़ को छोड़ेंगा और अपना कलेजा ठंडा करने के लिए पूरा उद्योग करूँगा। वीरेन्द्रसिंह का चढ़ता प्रताप देख कर मुझे निश्चय हो गया कि लड़ कर उन्हें किसी प्रकार नहीं जीत सकता इसलिए आज से मैं उनके साथ लड़ने का खयाल छोड़ देता हूँ और उस ढंग पर चलता हूँ जिसे ठग, चोर या डाकू लोग पसन्द करते हैं।
भीमसेन––अख्तियार आपको है, जो चाहें करें। मुझे आज्ञा हो तो इसी समय चला जाऊँ और जो कुछ हुक्म हुआ है उसे पूरा करने का उद्योग करूँ!
शिवदत्त––अच्छा जाओ मगर यह कहो कि अपने साथ किस-किस को ले जाते हो?
भीमसेन––किसी को नहीं।
शिवदत्त––तब तुम कुछ न कर सकोगे। दो-तीन ऐयार और दस-बीस लड़ाकों को अपने साथ जरूर लेते जाओ।
भीमसेन––आपके यहाँ ऐसा कौन ऐयार है जो वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का मुकाबला करे और ऐसा कौन बहादुर है जो उन लोगों के सामने तलवार उठा सके?
शिवदत्त––तुम्हारा कहना ठीक है मगर तुम्हारे साथ गए हुए ऐयारों की कार्रवाई तब तक बहुत अच्छी होगी जब तक दुश्मनों को यह न मालूम हो जाय कि शिवदत्तगढ़ का कोई आया है! सिवाय इसके मैं बहादुर नाहरसिंह को तुम्हारे साथ भेजता हूँ जिसका मुकाबला करने वाला वीरेन्द्रसिंह की तरफ कोई नहीं है।
भीमसेन––बेशक नाहरसिंह ऐसा ही है मगर मुश्किल तो यह है कि नाहरसिंह जितना बहादुर है उससे ज्यादा इस बात को देखता है कि अपने कौल का सच्चा रहे। उसका कहना है कि जिस दिन कोई बहादुर द्वन्द्व-युद्ध में मुझे जीत लेगा, उसी दिन मैं उसका हो जाऊँगा।' ईश्वर न करे, कहीं ऐसी नौबत आ पहुँची तो वह उसी दिन से हम लोगों का दुश्मन हो जायगा।
शिवदत्त––यह सब तुम्हारा खयाल है, द्वन्द्व-युद्ध में उसे जीतने वाला वहाँ कोई नहीं है।
भीमसेन––अच्छा जो आज्ञा।
शिवदत्त––(खड़े होकर) चलो, मैं इसी वक्त चल कर तुम्हारे जाने का बन्दोबस्त कर देता हूँ।
शिवदत्त और भीमसेन के बाहर चले जाने के बाद रानी कलावती ने, जो बहुत देर से इन लोगों की बातें सुन-सुनकर गरम-गरम आँसू गिरा रही थी सिर उठाया और लम्बी साँस लेकर कहा, "हाय, अब तो जमाने का उलट-फेर ही दूसरा हुआ चाहता है। बेचारी किशोरी का क्या कसूर? वह आप से आप तो चली ही नहीं गई? उसने अपने आप तो कोई ऐसा काम किया ही नहीं जिससे उसकी इज्जत में फर्क आवे! हाय, किस कलेजे से भीमसेन अपनी बहिन को मारने का इरादा करेगा! मेरी जिन्दगी अन व्यर्थ है क्योंकि बेचारी लड़की तो अब मारी ही जायगी, भीमसेन भी वीरेन्द्रसिंह से दुश्मनी करके अपनी जान नहीं बचा सकता, दूसरे उस लड़के का भरोसा क्या जो अपने हाथ से अपनी बहिन का सिर काटे। अगर इन सब बातों को भी भूल जाऊँ और यही सोच कर बैठ रहूँ कि मेरे सर्वस्व तो पति हैं मुझे लड़के-लड़कियों से क्या मतलब, तो भी नहीं बनता, क्योंकि वे भी डाकू-वृत्ति लिया चाहते हैं। इस अवस्था में वे किसी प्रकार का सुख नहीं पा सकते। फिर जीते-जी अपने पति को दुःख भोगते मैं कैसे देखूगी? हाय! वीरेन्द्रसिंह वही वीरेन्द्रसिंह है जिसकी बदौलत मेरी जान बची थी, न मालूम बुर्दाफरोशों की बदौलत मेरी क्या दुर्दशा होती! वही वीरेन्द्रसिंह है जिसने कृपा कर मुझे अपने पति के पास खोह में भिजवा दिया था! वही वीरेन्द्रसिंह है जिसने हम लोगों का कसूर एकदम माफ कर दिया था और चुनार गढ़ की गद्दी लौटा देने को भी तैयार था! किस-किस बात की तरफ देखू? वीरेन्द्रसिंह के बराबर धर्मात्मा तो कोई दुनिया में न होगा! फिर किसको दोष दूँ, अपने पति को? नहीं, कभी नहीं, यह मेरे किए न होगा! यह सब दोष तो मेरे कर्मों का ही है। फिर जब भाग्य ही बुरे हैं तो ऐसे भाग्य को लेकर दुनिया में क्यों रहूँ? मैं अपनी छुट्टी तो आप ही कर लेती हूँ फिर मेरे पोछे क्या जाने क्या होगा, इसकी खबर ही किसे है!"
रानी कलावती पागलों की तरह बहुत देर तक न जाने क्या-क्या सोचती रही, आखिर उठ खड़ी हुई और तालियों का गुच्छा उठाकर अपना एक सन्दूक खोला। न मालूम उसमें से क्या निकालकर उसने अपने मुँह में रख लिया और पास ही पड़ी हुई सोने की सुराही में से जल निकालकर पीने के बाद कलम-दवात और कागज लेकर कुछ लिखने बैठ गयी। लेख समाप्त होते-होते तक उसकी सखियाँ भी आ पहुँचीं। कलावती ने लिखे हुए कागज को लपेट कर अपनी एक सखी के हाथ में दिया और कहा, "जब महाराज मुझे पूछे तो यह कागज उनके हाथ में दे देना। बस, तुम लोग जाओ, अपना काम करो। मैं इस समय सोना चाहती हूँ। जब तक मैं खुद न उठू, खबरदार, मुझको कोई मत उठाना!"
हुक्म पाते ही उसकी लौंडियाँ वहाँ से हट गयीं और रानी कलावती ने पलंग पर लेटकर आँचल से मुह ढाँप लिया।
दो ही पहर के बाद मालूम हो गया कि रानी कलावती सो गयी, आज के लिए नहीं, बल्कि वह हमेशा के लिए सो गयी, अब वह किसी के जगाये नहीं जाग सकतीं।
शाम के वक्त जब महाराज शिवदत्त फिर महल में आये तो महारानी का लिखा कागज उनके हाथ में दिया गया। पढ़ते ही शिवदत्त दौड़ा हुआ उस कमरे में गया जिसमें कलावती सोई हुई थी। मुँह पर से कपड़ा हटाया, नब्ज देखी, और तुरन्त लौटकर बाहर चला गया।
अब तो उसकी सब सखियों और लौंडियों को भी मालूम हो गया कि रानी कलावती हमेशा के लिए सो गयी। न मालूम बेचारी ने किन-किन बातों को सोचकर जान दे देना ही मुनासिब समझा। उसकी प्यारी सखियाँ, जिन्हें वह जान से ज्यादा मानती थी, पलंग के चारों तरफ जमा हो गयीं और उसकी आखिरी सूरत देखने लगी। भीमसेन चार घण्टे पहले ही मुहिम पर रवाना हो चुका था। उसे अपनी प्यारी माँ के मरने की कुछ खबर ही नहीं और यह सोचकर कि वह उदास और सुस्त होकर अपना काम न कर सकेगा, शिवदत्त ने भी कलावती के मरने की खबर उसके कान तक पहुँचने न दी।
ऐयारों और थोड़े से लड़ाकों के सिवाय नाहरसिंह को साथ लिए हुए भीमसेन राजगृह की तरफ रवाना हुआ। उसका साथी नाहरसिंह बेशक लड़ाई के फन में बहुत ही जबर्दस्त था। उसे विश्वास था कि कोई अकेला आदमी लड़कर कभी मुझसे जीत नहीं सकता। भीमसेन भी अपने को ताकतवर और होशियार लगाता था, मगर जब से लोभवश नाहरसिंह ने उसकी नौकरी कर ली और आजमाइश के तौर पर दो-चार दफे नाहरसिंह और भीमसेन में नकली लड़ाई हुई, तब से भीमसेन को मालूम हो गया कि नाहरसिंह के सामने वह एक बच्चे के बराबर है। नाहरसिंह लड़ाई के फन में जितना होशियार और ताकतवर था उतना ही नेक और ईमानदार भी था और उसका यह प्रण करना बहुत ही मुनासिब था कि उसे जिस दिन जो कोई जीतेगा, वह उसी दिन से उसकी तावेदारी कबूल कर लेगा।
ये लोग पहले राजगृह में पहुँचे और एक गुप्त खोह में डेरा डालने के बाद भीमसेन ने ऐयारों को वहाँ का हाल मालूम करने के लिए मुस्तैद किया। दो ही दिन की कोशिश में ऐयारों ने वहाँ का कुल हाल मालूम कर लिया और भीमसेन ने जब यह सुना कि माधवी वहाँ मौजूद नहीं है, तब बिना छेड़छाड़ मचाये गयाजी की तरफ कूच किया।
इस समय राजगृह को अपने कब्जे में कर लेना भीमसेन के लिए कोई बड़ी बात न थी, मगर इस खयाल से कि गयाजी में राजा वीरेन्द्रसिंह की अमलदारी हो गयी है, राजगृह दखल करने से कोई फायदा न होगा और वीरेन्द्रसिंह के मुकाबले में लड़कर भी जीतना बहुत ही मुश्किल है उसने राजगृह का खयाल छोड़ दिया। सिवाय इसके जाहिर होकर वह किसी तरह किशोरी को अपने कब्जे में कर भी नहीं सकता था, उसे लुक-छिपकर पहले किशोरी पर ही सफाई का हाथ दिखाना मंजूर था।
गयाजी के पास पहुँचते ही एक गुप्त और भयानक पहाड़ी में उन लोगों ने डेरा डाला और खबर लेने के लिए ऐयारों को रवाना किया। जिस तरह भीमसेन के ऐयार लोग घूम-घूमकर टोह लिया करते थे उसी तरह माधवी की सखी तिलोत्तमा भी अपना काम साधने के लिए भेष बदलकर चारों तरफ घूमा करती थी। इत्तिफाक से भीमसेन के ऐयारों की मुलाकात तिलोत्तमा से हो गयी और बहुत जल्द माधवी की खबर भीमसेन को तथा भीमसेन की खबर माधवी को लग गयी।
भीमसेन के साथ जितने लड़ाके थे उन सभी को खोह में ही छोड़ सिर्फ भीमसेन और नाहरसिंह को माधवी ने उस मकान में बुला लिया जिसका हाल हम ऊपर लिख चुके हैं।
आज किशोरी के घर में घुसकर आफत मचाने वाले ये ही भीमसेन और नाहरसिंह हैं। अपने ऐयारों की मदद से उस मकान के बगल वाले खंडहर में घुसकर भीमसेन ने उस मकान में सेंध लगाई और उस सेंध की राह नाहरसिंह ने अन्दर जाकर जो कुछ किया, वह पाठकों को मालूम ही है।
नाहरसिंह मकान के अन्दर घुसकर उसी सेंध की राह किशोरी को लेकर बाहर निकल आया और उस बेचारी को जमीन पर गिराकर मालिक के हुक्म के मुताबिक उसे मार डालने पर मुस्तैद हुआ। मगर एक बेकसूर औरत पर इस तरह जुल्म करने का इरादा करते ही उस जवाँमर्द का कलेजा दहल गया। वह किशोरी को जमीन पर रख दूर जा खड़ा हुआ और भीमसेन से, जो मुँह पर नकाब डाले उसी जगह मौजूद था, बोला, "लीजिए, इसके आगे अब जो कुछ करना है आप ही कीजिये। मेरी हिम्मत नहीं पड़ती! मगर मैं आपको भी···!"
हाथ में खंजर लेकर भीमसेन फौरन बेचारी किशोरी की छाती पर, जो उस समय डर के मारे बेहोश थी, जा चढ़ा। साथ ही इसके किशोरी की बेहोशी भी जाती रही और उसने अपने को मौत के पंजे में फँसा हुआ पाया, जैसा कि हम ऊपर लिख आये हैं।
भीमसेन ने खंजर उठाकर ज्यों ही किशोरी को मारना चाहा, पीछे से किसी ने उसकी कलाई थाम ली और खंजर लिए उसके मजबूत हाथ को बेबस कर दिया। भीमसेन ने फिरकर देखा तो एक साधु की सूरत नजर पड़ी। वह किशोरी को छोड़ उठ खड़ा हुआ और उसी खंजर से उसने साधु पर वार किया।
यह साधु वही है जो रामशिला पहाड़ी के सामने फलगू नदी के बीच में भयानक टीले पर रहता था और जिसके पास मदद के लिए माधवी और तिलोत्तमा का जाना और उन्हीं के पास देवीसिंह का पहुँचना भी हम लिख आये हैं। इस समय यह साधु इस बात पर मुस्तैद दिखाई देता है कि जिस तरह बने, इन दुष्टों के हाथ से बेचारी किशोरी को बचावे।
चाँदनी रात में दूर खड़ा नाहरसिंह यह तमाशा देखता रहा मगर भीमसेन को साधु से जबर्दस्त समझकर मदद के लिए पास न आया। भीमसेन के चलाए हुए खंजर ने साधु का कुछ भी नुकसान न किया और उसके खंजर का वार बचाकर फुर्ती से भीमसेन के पीछे जा उसकी टाँग पकड़ कर इस ढंग खींची कि भीमसेन किसी तरह सँभल न सका और धम्म से जमीन पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही वह साधु हट गया, और बोला, "उठ खड़ा हो और फिर आकर लड़!"
गुस्से में भरा हुआ भीमसेन उठ खड़ा हुआ और खंजर जमीन पर फेंक साधु से लिपट गया क्योंकि वह कुश्ती के फन में अपने को बहुत होशियार समझता था। मगर साधु से कुछ पेश न गयी। थोड़ी ही देर में साधु ने भीमसेन को सुस्त कर दिया और "जा तुझे मैं छोड़ देता हूँ। अगर अपनी जिन्दगी चाहता है तो अभी यहां से भाग जा।"
भीमसेन हैरान होकर साधु का मुँह देखता रह गया, कुछ जवाब न दे सका। जमीन-पर पड़ी हुई बेचारी किशोरी यह कैफियत देख रही थी, मगर डर के मारे न तो उससे उठा जाता था और न वह चिल्ला ही सकती थी।
भीमसेन को इस तरह बेदम देखकर नाहरसिंह से न रहा गया। वह झपट कर साधु के पास आया और ललकार कर बोला, "अगर बहादुरी का दावा रखता है तो इधर आ। मैं समझ गया कि तू साधु नहीं, बल्कि कोई मक्कार है।"
साधु महाशय नाहरसिंह से भी उलझने को तैयार हो गये मगर ऐसी नौबत न आयी क्योंकि उसी समय ढूँढ़ते हुए सेंध की राह से कुँअर इन्द्रजीतसिंह और तारासिंह भी खंडहर में आ पहुँचे और उनके पीछे-पीछे किन्नरी और कमला भी आ मौजूद हुई। कुँअर इन्द्रजीतसिंह को देखते ही वे साधूराम तो हट गये और खंडहर की दीवार फाँद न मालूम कहाँ चले गये। उधर एक पेड़ के पास खड़े हुए अपने नेजे को नाहरसिंह ने उखाड़ लिया और उसी से इन्द्रजीतसिंह का मुकाबला किया। तारासिंह ने उछलकर एक लात भीमसेन को ऐसी लगाई कि वह किसी तरह सम्हल न सका, तुरंत जमीन पर लोट गया। भीमसेन एक लात खाकर जमीन पर लोट जाने वाला न था मगर साधु के साथ लड़कर वह बदहवास और सुस्त हो रहा था इसलिए तारासिंह की लात से सम्हल न सका। तारासिंह ने भीमसेन की मुश्के बाँध ली और उसे एक किनारे रख के नाहरसिंह की लड़ाई का तमाशा देखने लगा।
आधे घंटे तक नाहरसिंह और इन्द्रजीतसिंह के बीच लड़ाई होती रही। इन्द्रजीतसिंह की तलवार ने नाहरसिंह के नेजे को दो टुकड़े कर दिये और नाहरसिंह की ढाल पर बैठकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह की तलवार कब्जे से अलग हो गयी। थोड़ी देर के लिए दोनों बहादुर ठहर गये। कुँअर इन्द्रजीतसिंह की बहादुरी देखकर नाहरसिंह बहुत खुश हुआ और बोला––
नाहरसिंह––शाबाश! तुम्हारे ऐसा बहादुर मैंने आज तक नहीं देखा।
इन्द्रजीतसिंह––ईश्वर की सृष्टि में एक से एक बढ़ के पड़े हैं, तुम्हारे या हमारे ऐसों की बात ही क्या है!
नाहरसिंह––आपका कहना बहुत ठीक है, मेरा प्रण क्या है, आप जानते हैं?
इन्द्रजीतसिंह––कह जाइए, अगर नहीं जानता हूँ तो अब मालूम हो जायेगा।
नाहरसिंह––मैंने प्रण किया है कि जो कोई लड़कर मुझे जीतेगा, मैं उसी की ताबेदारी कबूल करूँगा।
इन्द्रजीतसिंह––तुम्हारे ऐसे बहादुर का यह प्रण बेमुनासिब नहीं है। फिर आइए, कुश्ती से निपटारा कर लिया जाय।
नाहरसिंह––बहुत अच्छा, आइए!
दोनों में कुश्ती होने लगी। थोड़ी ही देर में कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने नाहरसिंह को जमीन पर दे मारा और पूछा, "कहो, अब क्या इरादा है?"
नाहरसिंह––मैं तावेदारी कबूल करता हूँ।
इन्द्रजीतसिंह उसकी छाती पर से उठ खड़े हुए और इधर-उधर देखने लगे। चारों तरफ सन्नाटा था। किशोरी, किन्नरी या कमला का कहीं पता नहीं। भीमसेन और उसके साथियों का भी (अगर कोई वहाँ हो) नाम-निशान नहीं, यहाँ तक कि अपने ऐयार तारासिंह की सूरत भी उन्हें दिखाई न दी।
इन्द्रजीतसिंह––यह क्या! चारों तरफ सन्नाटा क्यों छा गया?
नाहरसिंह––ताज्जुब है! इसके पहले तो यहाँ कई आदमी थे, न मालूम वे सब कहाँ चले गये?
इन्द्रजीतसिंह––तुम कौन हो और तुम्हारे साथ कौन था?
नाहरसिंह––मैं आपका ताबेदार हूँ, मेरे साथ शिवदत्त सिंह का लड़का भीमसेन था और उसके पहलू में उसका नौकर था। आशा है कि आप भी अपना परिचय मुझे देंगे।
इन्द्रजीतसिंह––मेरा नाम इन्द्रजीतसिंह है।
नाहरसिंह––हाँ!
नाम सुनते ही नाहरसिंह उनके पैरों पर गिर पड़ा और बोला, "मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि उसने मुझे आपकी तावेदारी में सौंपा! यदि किसी दूसरे की ताबेदारी कबूल करनी पड़ती तो मुझे बड़ा दुःख होता! नाहरसिंह ने सच्चे दिल से कुमार की ताबेदारी कबूल की। इसके बाद बड़ी देर तक दोनों बहादुर चारों तरफ घूम-घूमकर लोगों को ढूँढ़ते रहे, मगर किसी का पता न लगा। हाँ, एक पेड़ के नीचे भीमसेन दिखाई पड़ा जिसके हाथ-पैर कमन्द से मजबूत बँधे हुए थे। भीमसेन ने पुकारकर कहा, "क्यों नाहरसिंह! क्या मेरी मदद न करोगे?"
नाहरसिंह––अब मैं तुम्हारा ताबेदार नहीं हूँ।
इन्द्रजीतसिंह––(भीमसेन से) तुम्हें किसने बाँधा?
भीमसेन––मैं पहचानता तो नहीं, मगर इतना कह सकता हूँ कि आपके एक साथी ने।
इन्द्रजीतसिंह––और वह बाबाजी कहाँ चले गये?
भीमसेन––क्या मालूम?
इतने ही में खँडहर की दीवार फाँदकर आते हुए तारासिंह भी दिखाई पड़े। इन्द्रजीतसिंह घबराए हुए उसकी तरफ बढ़े और पूछा, "तुम कहाँ चले गये थे?"
तारासिंह––जिस समय हम लोग यहाँ आये थे, एक बाबाजी भी इस जगह मौजूद थे मगर न मालूम कहाँ चले गये! मैं एक आदमी की मुश्कें बाँध रहा था कि उसी समय (हाथ का इशारा करके) उस झाड़ी में छिपे कई आदमी बाहर निकले और किशोरी को जबर्दस्ती उठाकर उसी तरफ ले चले। उन लोगों को जाते देख किन्नरी और कमला भी उसी तरफ लपकी। मैंने यह सोचकर कि कहीं ऐसा न हो कि आपको लड़ाई के समय धोखा देकर यह आदमी पीछे से आप पर वार करे झटपट उसकी मुश्कें बाँधी और फिर मैं भी उसी तरफ लपका जिधर वे लोग गये थे। वहाँ कोने में एक खुली हुई खिड़की नजर आयी। मैं यह सोच उस खिड़की के बाहर गया कि बेशक इसी राह से वे लोग निकल गये होंगे।
इन्द्रजीतसिंह––फिर कुछ पता लगा?
तारासिंह––कुछ भी नहीं, न मालूम वे लोग किधर गायब हो गये! मैं आपको लड़ते हुए छोड़ गया था, इसलिए तुरन्त लौट आया। अब आप घर चलिए, आपको पहुँचाकर मैं उन लोगों की खोज में निकलूँगा। (नाहरसिंह की तरफ इशारा करके) इनसे क्या निपटारा हुआ?
इन्द्रजीतसिंह––इन्होंने मेरी ताबेदारी कबूल कर ली।
तारासिंह––सो तो ठीक है, मगर दुश्मन का
नाहरसिंह––आप इन सब बातों न सोचिये। ईश्वर चाहेगा तो आप मुझे बेईमान कभी न पावेंगे
तारासिंह––ईश्वर ऐसा ही करे!
रात की अँधेरी बिलकुल जाती रही और अच्छी तरह सवेरा हो गया। मुहल्ले के कई आदमी उस खिड़की की राह खँडहर में चले आये और अपने राजा को वहाँ पा हैरान हो देखने लगे। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, तारासिंह और नाहरसिंह अपने साथ भीमसेन को लिए हुए महल में पहुँचे और इन्द्रजीतसिंह ने सब हाल अपने छोटे भाई आनन्दसिंह से कहा। आज रात की वारदात ने दोनों कुमारों को हद से ज्यादा तरद्दुद में डाल दिया। किन्नरी और किशोरी के इस तरह मिल कर भी पुनः गायब हो जाने से दोनों ही पहले से ज्यादा उदास हुए और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।
आधी रात का समय है और सन्नाटे की हवा चल रही है। बिल्लौर की तरह खूबी पैदा करने वाली चाँदनी आशिकमिजाजों को सदा ही भली मालूम होती है, लेकिन आज की सर्दी ने उन्हें भी पस्त कर दिया है, यह हिम्मत नहीं पड़ती कि जरा मैदान में निकलें और इस चाँदनी की बहार लें, मगर घर में बैठे दरवाजे की तरफ देखा करने और उसाँसें लेने से होता ही क्या है। मर्दानगी कोई और ही चीज है, इश्क किसी दूसरी ही वस्तु का नाम है, तो भी इश्क के मारे हुए माशूक की नागिन सी जुल्फों से अपने को डॅसाना ही जवामर्दी समझते हैं और दिलबर की तिरछी निगाहों से अपने कलेजे को छलनी बनाने में ही बहादुरी मानते हैं। मगर वे लोग जो सच्चे बहादुर हैं, घर बैठे 'ओफ' करना पसन्द नहीं करते और समय पड़ने पर तलवार ही को अपना माशूक मानते हैं। देखिये, इस सर्दी और ऐसे भयानक स्थान में भी एक सच्चे बहादुर को किसी पेड़ की आड़ में बैठ जाना भी बुरा मालूम होता है।
अब रात पहर भर से भी कम बाकी है। एक पहाड़ी के ऊपर, जिसकी ऊँचाई बहुत ज्यादा नहीं तो इतनी कम भी नहीं है कि बिना दम लिए एक ही दौड़ में कोई ऊपर चढ़ जाय, एक आदमी मुंह पर नकाब डाले काले कपड़े से तमाम बदन को छिपाये इधर-उधर टहल रहा है। चारों तरफ सन्नाटा है, कोई उसे पहचानने वाला यहाँ मौजूद नहीं, शायद इसी खयाल उसने नकाब उलट दी और कुछ देर के लिए खड़े होकर मैदान की तरफ देखने लगा।
इस पहाड़ी की बगल में एक दूसरी पहाड़ी है जिसकी जड़ इस पहाड़ी से मिली हुई है। मालूम होता है कि एक पहाड़ी के दो टुकड़े हो गए हैं। बीच में डाकुओं और लुटेरों के आने-जाने लायक रास्ता है जिसे भयानक दरार कहना मुनासिब जान पड़ता है। इस आदमी की निगाह घड़ी-घड़ी उसी दर की तरफ दौड़ती है और सन्नाटा पाकर मैदान की तरफ घूम जाती है जिससे मालूम होता है कि उसकी आँखें किसी ऐसे ढूंढ़ रही हैं जिसके आने की इस समय पूरी उम्मीद है।
टहलते-टहलते उसे बहुत देर हो गई, पूरब तरफ आसमान पर कुछ-कुछ सुफेदी फैलने लगी जिसे देख यह कुछ घबराया सा हो गया और दस कदम आगे बढ़ कर मैदान की तरफ देखने लगा, साथ ही इसके चौंका और धीरे से बोल उठा, "आ पहुँचे।"
उस आदमी ने धीरे से सीटी बजाई। इधर-उधर चट्टानों की आड़ में छिपे हुए दस-बारह आदमी निकल आये जिन्हें देख वह हुकूमत के तौर पर बोला, "देखो वे लोग आ पहुँचे, अब बहुत जल्द नीचे उतर चलना चाहिए।"
बात के अन्दाज से मालूम हो गया कि वह आदमी, जो बहुत देर से पहाड़ी के ऊपर टहल रहा था उन सभी का सरदार है। अब उसने अपने चेहरे पर नकाब डाल ली और अपने-अपने साथियों को साथ लेकर तेजी के साथ पहाड़ी के नीचे उतर आने वालों का मुहाना रोक लिया।
कपड़े में लपेटी हुई एक लाश उठाए और उसे चारों तरफ से घेरे कई आदमी उस दर में घुसे। वे लोग तेज कदम बढ़ाये जा रहे थे। उन्हें स्वप्न में भी यह गुमान न था कि हम लोगों के काम में बाधा डालने वाला इस पहाड़ के बीच में से कोई निकल आएगा।
जब लाश उठाए हुए वे लोग उस दर्रे के बीच में घुसे बल्कि उन लोगों ने जब आधी दरार को तै कर लिया, तब यकायक चारों तरफ से छिपे कई आदमी उन लोगों पर टूट पड़े और हर तरह से उन्हें लाचार कर दिया। वे लोग किसी तरह भी लाश को न ले जा सके और तीन-चार आदमियों के घायल होने तथा एक के मर जाने पर उसी जगह उस लाश को छोड़ आखिर सभी को भाग ही जाना पड़ा।
दुश्मनों के भाग जाने पर उस सरदार ने जो पहले ही से उस पहाड़ी पर मौजूद था जिसका जिक्र हम कर आये हैं, अपने साथियों को पुकार कर कहा, "पीछा करने की कोई जरूरत नहीं, हमारा मतलब निकल गया। मगर यह देख लेना चाहिए कि यह किशोरी ही है या नहीं!"
एक ने बटुए में से मोमबत्ती निकाल कर जलाई और उस लाश के मुँह पर से कपड़ा हटा कर देखने के बाद कहा, "किशोरी ही तो है।" सरदार ने किशोरी की नब्ज पर हाथ रक्खा और कहा––
सरदार––ओफ! इसे बहुत तेज बेहोशी दी गई है, देखो, तुम भी देख लो!
एक––(नब्ज देख कर) बेशक बहुत ज्यादा बेहोशी दी गई है। ऐसी हालत में अक्सर जान निकल जाती है!
दूसरा––इसे कुछ कम करना चाहिए।
सरदार ने अपने बटुए में से एक डिबिया निकाली तथा खोल कर किशोरी को सुँघाने के बाद फिर नब्ज पर हाथ रक्खा और कहा, "वस इससे ज्यादा बेहोशी कम करने पर यह होश में आ जायगी, चलो उठाओ, अब यहाँ ठहरना मुनासिब नहीं है।"
किशोरी को उठा कर वे लोग उसी दर्रे की राह घूमते हुए पहाड़ी के पार हो गये और न मालूम किस तरफ चले गये। इनके जाने के बाद उसी जगह जहाँ पर लड़ाई हुई थी, छिपा हुआ एक आदमी बाहर निकला और चारों तरफ देखने लगा। जब वहाँ किसी को मौजूद न पाया तो धीरे से बोल उठा––
"मेरा पहले ही से यहाँ आ पहुँचना कैसा मुनासिब हुआ! मैं उन लोगों को खूब पहचानता हूँ जो लड़-भिड़ कर बेचारी किशोरी को ले गये। खैर, क्या मुजायका है, मुझसे भाग कर ये लोग कहाँ जायेंगे। मेरे लिए तो दोनों ही बराबर हैं, वे ले जाते तब भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती, और ये लोग ले गये हैं तब भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ेगी। खैर, हरि इच्छा, अब बाबाजी को ढूँढ़ना चाहिए। उन्होंने भी इसी जगह मिलने का वादा किया था।"
इतना कह वह आदमी चारों तरफ घूमने और बाबाजी को ढूँढ़ने लगा। इस समय इस आदमी को यदि माधवी देखती तो तुरंत पहचान लेती क्योंकि यह वही साधु है जो रामशिला पहाड़ी के सामने टीले पर रहता था, जिसके पास माधवी गयी थी, या जिसने भीमसेन के हाथ से उस समय किशोरी की जान बचाई थी जब खँडहर के बीच में वह उसकी छाती पर सवार हो खंजर उसके कलेजे के पार किया ही चाहता था।
साफ सवेरा हो चुका था बल्कि पूरब तरफ सूर्य की लालिमा ने चौथाई आसमान पर अपना दखल जमा लिया था। वह साधु इधर-उधर घूमता-फिरता एक जगह अटक गया और सोचने लगा कि किधर जाय या क्या करे, इतने ही में सामने से इसी की एक दूसरे बाबाजी आते हुए दिखाई पड़े। देखते ही यह उनकी तरफ बढ़ा और बोला, "मैं बड़ी देर से आपको ढूँढ़ता रहा हूँ, क्योंकि इसी जगह मिलने का वादा किया था!"
अभी आए हुए बाबाजी ने कहा, "मैं भी वादा पूरा करने के लिए आ पहुँचा (हँस कर) बहुत खासे! यदि इस समय कोई देखे तो अवश्य बावला हो जाय और कहे कि एक ही रंग और सूरत-शक्ल के दो बाबाजी कहाँ से पैदा हो गये? अच्छा, हमारे पीछे-पीछे चले आओ।"
दोनों बाबाओं ने एक तरफ का रास्ता लिया और देखते-देखते न मालूम किधर गायब हो गये या किस खोह में जा छिपे।
किशोरी की जब आँख खुली तो उसने अपने को एक सुन्दर मसहरी पर लेटे हुए पाया और उम्दा कपड़ों और जेवरों से सजी हुई कई औरतें भी उसे दिखाई पड़ीं। पहले तो किशोरी ने यही समझा कि वे सब अच्छे अमीरों और सरदारों की लड़कियाँ हैं, मगर थोड़ी ही देर बाद उनकी बातचीत और कायदे से मालूम हो गया कि लौंडियाँ हैं। अपनी बेवसी और बदकिस्मती पर रोती हुई भी किशोरी को यह जानने की बड़ी उत्कण्ठा हुई कि किस महाराजाधिराज के मकान में आ फँसी हूँ जिसकी लौंडियाँ इस शान और शौकत की दिखाई पड़ती हैं।
किशोरी को होश में आते देख उनमें की दो-तीन लौंडियाँ न मालूम कहाँ चली गई, मगर किशोरी ने बखूबी समझ लिया कि मेरे होश में आने की किसी को खबर करने गई हैं।
ताज्जुब-भरी निगाहों से किशोरी चारों तरफ देखने लगी। वाह-वाह, क्या सुन्दर कमरा बना हुआ है! चारों तरफ दीवारों पर मीनाकारी का काम किया हुआ है छत में सुनहरी बेल और बीच-बीच में जड़ाऊ फूलों को देखकर अक्ल दंग होती है। न मालूम इसकी तैयारी में कितने रुपये खर्च हो गये होंगे! छत से लटकती हुई बिल्लौरी हाँडियों की परइयों में मानिक की लोलकें लटक रही हैं, जड़ाऊ डारों पर बेशकीमत दीवारगीरें अपनी बहार दिखा रही हैं, दरवाजों की महराबों पर अँगूर की बेलें और उस पर बैठी हुई छोटी-छोटी खूबसुरत चिड़ियों के बनाने में कारीगर ने जो कुछ मेहनत की होगी, उसका जानना बहुत ही मुश्किल है। उन अँगूरों में कहीं पक्के अँगूर की जगह मानिक और कच्चे की जगह पन्ना काम में लाया गया था। अलावा इन सब बातों के उस कमरे की कुल सजावट का हाल अगर लिखा जाय तो हमारा असल मतलब बिल्कुल छूट जायेगा और मुख्तसिर लिखावट के वादे में फर्क पड़ जायगा। अस्तु, इस बारे में हम कुछ नहीं लिखते।
इस मकान को देख किशोरी दंग हो गई। उसकी हालत का लिखना बहुत ही मुश्किल है। जिधर को भी उसकी निगाह जाती उधर ही की हो रहती थी, पर उस जगह की सजावट किशोरी अच्छी तरह देखने भी न पाई थी कि पहले की सी और कई लौंडियाँ वहाँ आ मौजूद हुई और बोली, "महाराज को साथ लिए रानी साहिबा आ रही हैं!"
तभी महाराज को साथ लिये रानी साहिबा उस कमरे में आ पहुँची। बेचारी किशोरी को भला क्या मालूम कि ये दोनों कौन हैं या कहाँ के राजा हैं। तो भी इन दोनों की सूरत-शक्ल देखते ही किशोरी रुआब में आ गई। महाराजा की उम्र लगभग पचास वर्ष की होगी। लम्बा कद, गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें, चौड़ी पेशानी, ऊपर को उठी हुई मूँछें, बहादुरी चेहरे पर बरस रही थी। रानी साहिबा की उम्र भी लगभग पैंतीस वर्ष के होगी फिर भी उनके बदन की बनावट और खूबसूरती नौजवान परीजमालों की आँखें नीची करती थी। उनकी बड़ी-बड़ी रतनार आँखों में अब भी वही बात थी जो उनकी जवानी में रही होगी। उनके अंगों की लुनाई में किसी तरह का फर्क नहीं आया था। इस समय एक कीमती धानी पोशाक उनकी खूबसूरती को बढ़ा रही थी और जड़ाऊ जेवरों से उनका बदन भरा हुआ था मगर देखने वाला यही कहेगा कि इन्हें जेवरों की कोई जरूरत ही नहीं, यह तो अपने हुस्न ही के बोझ से दवी जाती हैं।
उन दोनों के रुआब ने किशोरी को पलंग पर पड़े रहने न दिया। वह उठ खड़ी हुई और उनकी तरफ देखने लगी। रानी साहिबा चाहे कैसी ही खूबसूरत क्यों न हों और उन्हें अपनी खूबसूरती पर चाहे कितना ही घमण्ड क्यों न रहा हो, मगर किशोरी की सूरत देखते ही वे दंग हो गईं और उनकी शेखी हवा हो गई। इस समय वह हर तरह से सुस्त और उदास थी, किसी तरह की सजावट उसके बदन पर न थी, तो भी महारानी के जी ने गवाही दे दी कि इससे बढ़ कर खूबसूरत दुनिया में कोई न होगी। किशोरी उनकी खूबसूरती के रुआब में आकर पलंग के नीचे नहीं उतरी थी, बल्कि इज्जत के लिहाज से और यह सोचकर कि जब इस मामूली कमरे की इतनी बड़ी सजावट है तो उनके खास कमरे की क्या नौवत होगी और वह कितने बड़े राज्य और दौलत की मालिक होंगी।
राजा और रानी दोनों ने प्यार की निगाह से किशोरी की तरफ देखा और राजा ने आगे बढ़ कर किशोरी की पीठ पर हाथ फेर कर कहा, "वेशक यह मेरी ही पतोहू होने के लायक है।"
इस आखिरी शब्द ने किशोरी के साथ वह काम किया जो नमक जख्म के साथ, आग फूस की झोंपड़ी के साथ, तीर कलेजे के साथ, शराब धर्म के साथ, लालच ईमान के साथ और विजली गिर कर तन-बदन के साथ करती है।
५
कुँअर इन्द्रजीतसिंह नाहरसिंह और तारासिंह को साथ लिए घर आये और अपने छोटे भाई से सब हाल कहा। वे भी सुनकर बहुत उदास हुए और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। दोनों कुमार बड़े ही तरद्दुद में पड़े। अगर तारासिंह को पता लगाने के लिए भेजें तो गया में कोई ऐयार न रह जायगा और यह बात अगर उनके पिता सुनें तो बहुत रंज हों, जिसका खयाल उन्हें सब से ज्यादा था। दोपहर दिन चढ़े तक दोनों भाई बड़े ही तरदुद में पड़े रहे, दोपहर के बाद उनका तरद्दुद कुछ कम हुआ जब पण्डित बद्रीनाथ, भैरोंसिंह और जगन्नाथ ज्योतिषी वहाँ आ मौजूद हुए। तीनों के पहुँचने से दोनों कुमार बहुत खुश हुए और समझे कि अब हमारा काम अटका न रहेगा।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तारासिंह, पण्डित बद्रीनाथ, भैरोंसिंह और ज्योतिषी जी ये सब बाग की बाहरदरी में एकान्त समझ कर चले गये और बातचीत करने लगे।
आनन्दसिंह––लीजिए साहब, अब तो दुश्मन लोग यहाँ भी बहुत से हो गये।
ज्योतिषी––कोई हर्ज नहीं।
इन्द्रजीतसिंह––भैरोंसिंह, पहले तुम अपना हाल कहो, यहाँ से जाने के बाद क्या हुआ?
भैरोंसिंह––मुझे तो रास्ते ही में मालूम हो गया था कि किशोरी वहाँ नहीं है।
इन्द्रजीतसिंह––यह हाल मुझे भी मालूम हुआ था।
भैरोंसिंह––ठीक है, वह आदमी आपके पास भी आया होगा जिसने मुझे खबर दी थी।
इन्द्रजीतसिंह––खैर, तब क्या हुआ?
भैरोंसिंह––फिर भी मैं वहाँ चला गया (बद्रीनाथ और ज्योतिषीजी की तरफ इशारा करके) और इन लोगों के साथ मिल कर काम करने लगा। ये लोग दो सौ बहादुरों के साथ वहाँ पहले से मौजूद थे। आखिर नतीजा यह हुआ कि दीवान अग्निदत्त और दो-तीन उसके साथी गिरफ्तार करके चुनार भेज दिये गये। माधवी का पता नहीं कि वह कहाँ गई। वहाँ की सब रिआया अग्निदत्त से रंज थी इसलिए राजगृह अपने कब्जे में कर लेना हम लोगों को बहुत ही सहज हुआ। अब उन्हीं दो सौ आदमियों के साथ पन्नालाल को वहाँ छोड़ आया हूँ।
बद्रीनाथ––आप यहाँ का हाल तो कहिये। सुना है यहाँ बड़े-बड़े बेढब मामले हो गये हैं!
इन्द्रजीतसिंह––यहाँ का हाल भैरोंसिंह की जुबानी आपने सुना ही होगा, इसके बाद आज रात को एक अजीब बात हो गई है।
तारासिंह ने रात भर का कुल हाल उन लोगों से कहा जिसे सुन वे लोग बहुत ही तरद्दुद में पड़ गये।
इन लोगों की बातचीत हो ही रही थी कि एक चोबदार ने आकर अर्ज किया कि 'अखण्डनाथ बाबाजी बाहर खड़े हैं और यहाँ आना चाहते है।' अखण्डनाथ नाम सुन ये लोग सोचने लगे कि कौन हैं और कहाँ से आये हैं। आखिर इन्द्रजीतसिंह ने उन्हें अपने पास बुलाया और सुरत देखते ही पहचान लिया।
पाठक, ये अखण्डनाथ बाबाजी वही हैं, जो रामशिला के सामने फलगू के बीच भयानक टीले पर रहते थे, जिनके पास माधवी जाती थी, तथा जिन्होंने उस समय किशोरी की जान बचाई थी, जब खँडहर में उसकी छाती पर सवार हो भीमसेन खंजर उसके कलेजे में भोंका ही चाहता था, और जिनका हाल ऊपर के तीसरे बयान में हम लिख आये हैं। इन बाबाजी को तारासिंह भी पहचानते थे, क्योंकि कल रात को यह भी इन्द्रजीतसिंह के साथ ही थे।
इन्द्रजीतसिंह ने उठ कर बाबाजी को प्रणाम किया। इनको उठते देख और सब लोग भी उठ खड़े हुए। कुमार ने अपने पास बाबाजी को बैठाया और ऐयारों की तरफ देख के कहा, "इन्हीं का हाल मैं कह चुका हुँ, इन्होंने ही उस खँडहर में किशोरी की जान बचाई थी।"
बाबा––जान बचाने वाला तो ईश्वर है, मैं क्या कर सकता हूँ। खैर, यह तो कहिये, उस मामले के बाद की भी आपको खबर है कि क्या हुआ?
इन्द्रजीतसिंह––कुछ भी नहीं, हम लोग इस समय इसी सोच-विचार में पड़े हैं।
बाबा––अच्छा तो फिर मुझसे सुनिये। दो औरतें और जो उस मकान में थीं, उनका हाल तो मुझे मालूम नहीं कि किशोरी की खोज में कहाँ गईं, मगर किशोरी का हाल मैं खूब जानता हूँ।
बाबाजी की बातों ने सभी का दिल अपनी तरफ खींच लिया और सब लोग एकाग्र होकर उनकी बातें सुनने लगे। बाबाजी ने यों कहना शुरू किया––
"नाहरसिंह से जब कुमार लड़ रहे थे, उस समय भीमसेन के साथियों को, जो उसी जगह छिपे हुए थे मौका मिला और वे लोग किशोरी को लेकर शिवदत्तगढ़ की तरफ भागे, मगर ले न जा सके, क्योंकि रास्ते ही में रोहतासगढ़ के राजा के ऐयार लोग छिपे हुए थे जिन लोगों ने लड़कर किशोरी को छीन लिया और रोहतासगढ़ को ले गये। किशोरी की खूबसूरती का हाल सुनकर रोहतासगढ़ के राजा ने इरादा कर लिया था कि अपने लड़के के साथ उसे व्याहेगा और बहुत दिन से उसके ऐयार लोग किशोरी की धुन में लगे हुए भी थे। अब मौका पाकर वे लोग अपना काम कर गये। अगर आप लोग जल्द उसके छुड़ाने की फिक्र न करेंगे तो वेचारी के बचने की उम्मीद जाती रहेगी।
लड़-भिड़ कर रोहतासगढ़ के किले को फतह करना बहुत मुश्किल है, चाहे फौज और दौलत में आप लोग बढ़ के क्यों न हों मगर पहाड़ के ऊपर के उस आलीशान किले के अन्दर घुसना बड़ा ही कठिन है मगर फिर भी चाहे जो हो आप लोग हिम्मत न हारें। किशोरी का खयाल चाहे न भी हो, मगर यह सोचकर कि आपके समीप का यह मजबूत किला आप ही के योग्य है, जरूर मेहनत करनी चाहिए। ईश्वर आपको विजय देगा और जहाँ तक हो सकेगा, मैं भी आपकी मदद करूँगा।"
बाबाजी की जबानी सब हाल सुनकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह बहुत प्रसन्न हुए। एक तो किशोरी का पता लगने की खुशी, दूसरे रोहतासगढ़ के राजा से बड़ी भारी लड़ाई लड़कर जवानी का हौसला निकालने और मशहूर किले पर अपना दखल जमाने की खुशी से वे गद्गद हो गये और जोश-भरी आवाज में बाबाजी से बोले––
इन्द्रजीतसिंह––बड़े-बड़े वीरों की आत्माएँ स्वर्ग से झाँक झाँक कर देखेंगी कि रोहतासगढ़ की लड़ाई कैसी होती है, और किस तरह से हम लोग उस किले को फतह करते हैं। रोहतासगढ़ का हाल हम बखूबी जानते हैं, मगर बिना कोई सबब हाथ लगे ऐसा इरादा नहीं कर सकते थे।
बाबा––अच्छा, एक लोटा जल मँगाइये।
तुरन्त जल आया। बाबाजी ने अपनी दाढ़ी नोंचकर फेंक दी, और मुँह धो डाला। अब तो सभी ने पहचान लिया कि ये देवीसिंह हैं।
पाठक, रामशिला पहाड़ी के सामने भयानक टीले पर रहने वाले बाबाजी देवीसिंह का मिलना आप भूले न होंगे और आपको यह बात भी अब तक याद होगी, कि देवीसिंह से बाबाजी ने कहा था कि 'कल इस स्थान को हम छोड़ देंगे।' बस, बाबाजी के जाने के बाद देवीसिंह ही उनकी सूरत में उस गद्दी पर जा विराजे और जो कुछ काम किया, आप जानते ही हैं। उस दिन बाबाजी की सूरत में देवीसिंह ही थे, जिस दिन माधवी ने मिलकर कहा था कि 'हमारी मदद के लिए भीमसेन आ गया है।' असली बाबाजी भी उस पहाड़ी पर देवीसिंह से मिल चुके हैं जहाँ हमने लिखा है कि एक ही सूरत के दो बाबाजी इकट्ठे हुए हैं, और उन्होंने बाबाजी की जवानी रोहतासगढ़ का मामला देवीसिंह ने सुना था।
देवीसिंह ने अपना सारा हाल दोनों कुमारों से कहा, और आखिर में बोले, "अब रोहतासगढ़ पर हम जरूर चढ़ाई करेंगे।"
इन्द्रजीतसिंह––बहुत अच्छी बात है, हम लोगों का हौसला भी तभी दिखाई देगा! हाँ, यह तो कहिए, नाहरसिंह से कैसा बर्ताव किया जाये
देवीसिंह––कौन नाहरसिंह?
इन्द्रजीतसिंह––उस खँडहर में जो मुझसे लड़ा था! बड़ा ही बहादुर है। उसने प्रण कर रखा था कि जो मुझे जीतेगा, उसी का मैं ताबहार हो जाऊँगा। अब उसने भीमसेन का साथ छोड़ दिया, और हम लोगों के साथ रहने को तैयार है।
देवीसिंह––ऐसे बहादुर पर जरूर मेहरबानी करनी हिए, मगर आज हम उसे आजमावेंगे। आप उसके लिए एक अच्छा-सा मकान दे दें, और हर तरह के आराम का बन्दोबस्त कर दें।
इन्द्रजीतसिंह-बहुत अच्छा।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने उसी समय नाहरसिंह को अपने पास बुलाया और बड़ी मेहरबानी के साथ पेश आये। एक मकान देकर अपने सेनापति की पदवी उसे दी और भीमसेन को कैद में रखने का हुक्म दिया।
अपने ऊपर कुमार की इतनी मेहरबानी देखकर नाहरसिंह बहुत प्रसन्न हुआ। कुछ देर तक बातें करता रहा, तब सलाम करके अपने ठिकाने चला गया, और सेनापति के काम को ईमानदारी के साथ पूरा करने का उद्योग करने लगा।
आधी रात जा चुकी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। गलियों और सड़कों पर चौकीदारों के "जागते रहियो, होशियार रहियो" पुकारने की आवाज आ रही है। नाहरसिंह अपने मकान में पलंग पर लेटा हुआ कोई किताब देख रहा है और सिरहाने शमादान जल रहा है।
नाहरसिंह के हाथ में श्रुति-स्मृति या पुराण की कोई पुस्तक नहीं है, उसके हाथ में त स्वीरों की एक किताब है जिसके पन्ने वह उलटता है और एक-एक तस्वीर को देर तक बड़े गौर से देखता है। इन तस्वीरों में बड़े-बड़े राजाओं और बहादुरों की मशहूर लड़ाइयों का नक्शा दिखाया गया है और पहलवानों की बहादुरी और दिलावरों की दिलावरी का खाका उतारा हुआ है जिसे देख-देखकर बहादुर नाहरसिंह की रगें जोश मारती हैं, और वह चाहता है कि ऐसी लड़ाइयों में हमें भी कभी हौसला निकालने का मौका मिले।
तस्वीरें देखते-देखते बहुत देर हो गई, और नाहरसिंह की नींद-भरी आँखें भी बन्द होने लगीं। आखिर उसने किताब बन्द करके एक तरफ रख दी और थोड़ी ही देर बाद गहरी नींद में सो गया।
इस मकान के किसी कोने में एक आदमी न मालूम कबका छिपा हुआ था, जो नाहरसिंह को सोता जानकर उस कमरे में चला आया और पलंग के पास खड़ा हो उसे गौर से देखने लगा। इस आदमी को हम नहीं पहचानते क्योंकि यह मुंह पर नकाब डाले हुए है। थोड़ी देर बाद अपनी जेब से उसने एक पुड़िया निकाली और एक चुटकी बुकनी की नाहरसिंह की नाक के पास ले गया। सांस के साथ धरा दिमाग में पहुंचा और वह छींक मार कर बेहोश हो गया।
उस आदमी ने अपनी कमर से एक रस्सी खोली और नाहरसिंह के हाथ-पैर मजबूती से बांध कर उसे होशियार करने के बाद तलवार खींच मुंह पर से नकाब हटा सामने खड़ा हो गया। होश में आते ही नाहरसिंह ने अपने को बेबस और हाथ में नंगी तलवार लिए महाराज शिवदत्त को सामने मौजूद पाया।
शिवदत्त-क्यों नाहरसिंह, एक नाजुक समय में हमारे लड़के का साथ छोड़ देना और उसे दुश्मनों के हाथ में फंसा देना क्या तुम्हें मुनासिब था?
नाहरसिंह-जब तक बहादुर इन्द्रजीतसिंह ने मुझ पर फतह नहीं पाई, तब तक मैं बराबर तुम्हारे लड़के का साथी रहा, जब कुमार ने मुझे जीत लिया तो अपने कौल के मुताबिक मैंने उनकी तावेदारी कबूल कर ली। मेरे कौल को तो तुम पहले से जानते ही थे।
शिवदत्त—जो कुछ तुमने किया है, उसकी सजा देने के लिए इस समय मैं मौजूद
नाहरसिंह--खैर, ईश्वर की मर्जी।
शिवदत्त-अब भी अगर तुम हमारा साथ देना मंजूर करो, तो छोड़ सकता हूँ।
नाहरसिंह—यह नहीं हो सकता, ऐसे बहादुर का साथ छोड़ तुम्हारे ऐसे बेईमान का संग करना मुझे मंजूर नहीं!
शिवदत्त—(डपट कर और तलवार उठा कर) क्या तुम्हें अपनी जान देना मंजूर है?
नाहरसिंह-खुशी से मंजूर है मगर मालिक का संग छोड़ना कबूल नहीं है!
शिवदत्त-देखो, मैं फिर तुम्हें समझाता हूँ, सोचो और मेरा साथ दो।
नाहरसिंह-बस बहुत बकवाद करने की जरूरत नहीं, जो कुछ तुम कर सको कर लो। मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता।
शिवदत्त ने बहुत-कुछ समझाया और डराया-धमकाया मगर बहादुर नाहरसिंह की नीयत न बदली। आखिर लाचार होकर शिवदत्त ने अपने हाथ से तलवार दूर फेंक दी और नाहर सिंह की पीठ ठोंक कर बोला-
"शाबाश बहादुर! तुम्हारे ऐसे जवाँमर्द का दिल अगर ऐसा न होगा तो किसका होगा? मैं शिवदत्त नहीं हूँ, कुमार का ऐयार देवीसिंह हूँ, तुम्हें आजमाने के लिए आया था!"
इतना कहकर उन्होंने नाहरसिंह की मुश्कें खोल दी, और वहाँ से फौरन चले गये। देवीसिंह ने यह हाल दोनों कुमारों से कहकर नाहरसिंह की तारीफ की, मगर बहादुर नाहरसिंह ने अपनी जिन्दगी भर इस आजमाने का हाल किसी से न कहा।
दूसरे दिन देवीसिंह चुनार चले गये और कह गये कि रोहतासगढ़ की चढ़ाई का बन्दोबस्त करके मैं बहुत जल्द आऊँगा।
यह जानकर कि किशोरी को रोहतासगढ़ वाले ले गये हैं, कुँअर इन्द्रजीतसिंह की बेचैनी हद से ज्यादा बढ़ गई। दम भर के लिए भी आराम करना मुश्किल हो गया, दो ही पहर में सूरत बदल गई। किसी का बुलाना या कुछ पूछना उन्हें जहर-सा मालूम पड़ने लगा। इनकी ऐसी हालत देख भैरोंसिंह से न रहा गया, निराले में बैठ उन्हें समझाने लगा।
इन्द्रजीतसिंह-तुम्हारे समझाने से मेरी हालत किसी तरह बदल नहीं सकती और किशोरी की जान का खतरा जो मुझे लगा हुआ है किसी तरह कम नहीं हो सकता।
भैरोंसिंह-किशोरी को अगर शिवदत्तगढ़ वाले ले जाते तो बेशक उसकी जान का खतरा था, क्योंकि शिवदत्त रंज के मारे बिना उसकी जान लिए न रहता, मगर अब तो वह रोहतासगढ़ के राजा के कब्जे में है और वह अपने लड़के से उसकी शादी किया चाहता है, ऐसी हालत में किशोरी की जान का दुश्मन वह क्योंकर हो सकेगा?
इन्द्रजीतसिंह-अगर जबर्दस्ती किशोरी की शादी कर दी गई तब क्या होगा?
भैरोंसिंह-हाँ, अगर ऐसा हो तो जरूर रंज होगा, खैर आप चिन्ता न करिये, ईश्वर चाहेगा तो पाँच ही सात दिन में कुल बखेड़ा तय करे देता हूँ।
इन्द्रजीतसिंह-क्या किशोरी को वहाँ से ले आओगे?
भैरोंसिंह-रोहतासगढ़ के किले में घुस कर किशोरी को निकाल लाना तो दो तीन दिन का काम नहीं, इसके अतिरिक्त क्या रोहतासगढ़ का किला ऐयारों से खाली होगा?
इन्द्रजीतसिंह-फिर तुम पाँच-सात दिन में क्या करोगे?
भैरोंसिंह-कोई काम ऐसा जरूर करूँगा, जिससे किशोरी की शादी रुक जाये।
इन्द्रजीतसिंह-वह क्या?
भैरोंसिंह-जिस तरह बनेगा वहाँ के राजकुमार कल्याणसिंह को पकड़ लाऊँगा, जब हम लोगों का फैसला हो जायेगा तब छोड़ दूँगा।
इन्द्रजीतसिंह-हाँ, अगर ऐसा करो तो क्या बात है!
भैरोंसिंह-आप चिन्ता न कीजिये। मैं अभी यहाँ से रवाना होता हूँ, मगर आप किसी से मेरे जाने का हाल न कहियेगा।
इन्द्रजीतसिंह-क्या अकेले जाओगे?
भैरोंसिंह-जी हाँ।
इन्द्रजीतसिंह-वाह! कहीं फँस जाओ तो मैं तुम्हारी राह ही देखता रह जाऊँ कोई खबर देने वाला भी नहीं!
भैरोंसिंह-ऐसी उम्मीद न रखिये।
कुँअर इन्द्रजीत सिंह से वादा करके भैरोंसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए, मगर भैरोसिंह का अकेले रोहतासगढ़ जाना इन्द्रजीतसिंह को न भाया। उस समय तो भैरोसिह की जिद से चुप हो रहे, मगर उसके जाने के बाद कुमार ने सब हाल पण्डित बद्रीनाथ से कहकर दोस्त की मदद के लिए जाने का हुक्म दिया। हुक्म पाते ही पण्डित बद्रीनाथ भी रोहतासगढ़ रवाना हए और रास्ते ही में भैरोंसिंह से जा मिले।
दो रोज चलकर ये दोनों आदमी रोहतासगढ़ पहुँचे और पहाड़ के ऊपर चढ़ किले में दाखिल हुए। यह बहुत बड़ा किला पहाड़ पर निहायत खूबी का बना हुआ था और इसी के अन्दर शहर भी बसा था जो बड़े-बड़े सौदागरों, महाजनों, व्यापारियों और जौहरियों के कारबार से अपनी चमक-दमक दिखा रहा था। इस शहर की खूबी और सजावट का हाल इस जगह लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती और इतना समय भी नहीं है, हाँ, मौके पर दो-चार दफे पढ़कर इसकी खूबी का हाल पाठक मालूम कर लेंगे। इस किले के अन्दर एक छोटा किला और भी था। जिसमें महाराजा और उनके आपस वाले रहा करते थे और लोगों में वह महल के नाम से मशहूर था।
इस पहाड़ पर छोटे झरने और तालाब बहुत हैं। ऊपर जाने के लिए केवल एक ही राह है और वह भी बहुत बारीक। उसके चारों तरफ घना जंगल इस ढंग का है कि जरा भी आदमी चूका और राह भूल कर कई दिन तक भटकने की नौबत आई। दुश्मनों का और किसी तरह से इस पहाड़ पर चढ़ना बहुत ही मुश्किल है और वह बारीक राह भी इस लायक नहीं कि पांच-सात आदमी से ज्यादा एक साथ चढ़ सकें। भेष बदले हुए हमारे दोनों ऐयार रोहतासगढ़ पहुँचे और वहाँ की रंगत देख कर समझ गये कि इस किले को फतह करने में बहुत मुश्किल पड़ेगी।
भैरोंसिंह और पण्डित बद्रीनाथ मथुरिया चौबे बने हुए रोहतासगढ़ में घूमने और एक-एक चीज को अच्छी तरह देखने लगे। दोपहर के समय एक शिवालय पर पहुँचे जो बहुत ही खूबसूरत और बड़ा बना हुआ था, सभामंडप इतना बड़ा था कि सौडेढ़-सौ आदमी अच्छी तरह उसमें बैठ सकते थे। उसके चारों तरफ खुलासा सहन था जिस पर कई ब्राह्मण और पुजारी बैठे धूप सेंक रहे थे। उन्हीं लोगों के पास जाकर हमारे दोनों ऐयार खड़े हो गये और गरज कर बोले-"जय जमुना मैया की!"
पुजारियों ने हमारे दोनों चौवों को खातिरदारी से बैठाया और बातचीत करने लगे।
एक पुजारी-कहिए चौबे जी, कब आना हुआ?
बद्रीनाथ-बस अभी चले ही तो आते हैं महाराज! पहाड़ पर चढ़ते-चढ़ते थक गये, गला सूख गया, कृपा कर सिल-लुढ़िया दो तो भंग छने और चित्त ठिकाने हो।
पुजारी-लीजिए, सिल-लुढ़िया लीजिए, मसाला लीजिए, चीनी लीजिए, खूब भंग छानिए।
भैरोंसिंह-भंग-मसाला तो हमारे साथ ही है, आप ब्राह्मणों का क्यों नुकसान करें।
पुजारी-नहीं-नहीं, हमारा कुछ नहीं है, यहाँ सब चीजें महाराज के हुक्म से मौजूद रहती हैं, ब्राह्मण परदेशी जो कोई आवे सभी को देने का हुक्म है।
बद्रीनाथ-वाह-वाह, तब क्या बात है! लाइये फिर महाराज की जयजयकार मनावें!
पुजारी ने इन दोनों को सब सामान दिया और इन दोनों ने भंग बनाई, आप भी पी और पुजारियों को भी पिलाई। दोनों ऐयारों ने बातचीत और मसखरेपन से वहाँ के पुजारियों को अपने बस में कर लिया बड़े पुजारी बहुत प्रसन्न हुए और बोले, "चौबेजी महाराज, बड़े भाग्य से आप लोगों के दर्शन हुए हैं। आप लोग दो-चार रोज यहाँ जरूर रहिये! इसी जगह आपको महाराज कुमार से भी मिलावेंगे और आप लोगों को बहुत-कुछ दिलावेंगे। हमारे महाराज कुमार बहुत हँसमुख, नेक और बुद्धिमान हैं। आप उन्हें देख बहुत प्रसन्न होंगे!"
बद्रीनाथ-बहुत खूब महाराज, आप लोगों की इतनी कृपा है तो जरूर रहेंगे और आपके महाराज कुमार से भी मिलेंगे। वे यहाँ कब आते हैं?
पुजारी-प्रातः और सायंकाल दोनों समय यहाँ आते हैं और इसी मंदिर में सन्ध्या-पूजा करते हैं!
भैरोंसिंह-तो आज भी उनके दर्शन होगे?
पुजारी-अवश्य।
यह मन्दिर किले की दीवार के पास ही था। इसके पीछे की तरफ एक छोटी सी लोहे की खिड़की थी जिसकी राह से लोग किले के बाहर जंगल में जा सकते थे। पुजारी के हुक्म से भंग पीने के बाद दोनों ऐयार उसी राह से जंगल में गए और मैदान होकर लौट आये, पुजारी लोग भी उसी राह से जंगल-मैदान गये।
संध्या समय महाराज कुमार भी वहाँ आये और मन्दिर के अन्दर दरवाजा बन्द करके घण्टे भर से ज्यादा देर तक सन्ध्या-पूजा करते रहे। उस समय केवल एक बड़ा पुजारी उस मन्दिर में तब तक मौजूद रहा जब तक महाराज कुमार नित्य-नेम करते रह। दोनों ऐयारों ने भी महाराजकुमार को अच्छी तरह देखा, मगर पुजारी को कह दिया था कि आज महाराज कुमार को यह मत कहना कि यहाँ दो चौबे आये हैं, कल सायंकाल को हम लोगों का सामना कराना।
दोनों ऐयारों ने रात भर उसी मन्दिर में गुजारा किया और अपने मसखरेपन जारा महाशय को बहत ही प्रसन्न किया, साथ ही इसके उन्हें इस बात का भी विश्वास दिलाया कि इस पहाड़ के नीचे एक बड़े भारी महात्मा आए हुए हैं, आपको उनसे जरूर मिलावेंगे, हम लोगों पर उनकी बड़ी ही कृपा रहती है।
सवेरे उठ कर इन दोनों ने फिर भंग घोंट कर पी और सभी को पिलाने के बाद उसी खिड़की की राह मैदान गये। दोनों ऐयार तो अपनी धुन में थे, महाराजकुमार को यहाँ से उड़ाने की फिक्र सोच रहे थे तथा उसी खिड़की की राह निकल जान का उन्होंने मौका तजबीजा था, इसलिए मैदान जाते समय इस जंगल को दोनों आदमी अच्छी तरह देखने लगे कि इधर से सीधी सडक पर निकल जाने का क्योंकर हम लोगों को मौका मिल सकता है। इस काम में उन्होंने दिन भर बिता दिया और आर रास्ता अच्छी तरह समझ-बूझ कर शाम होते-होते मन्दिर में लौट आये।
पुजारी-कहिये चौबे महाराज! आप लोग कहाँ चले गये थे?
बद्रीनाथ-अजी महाराज, कुछ न पूछो! जरा आगे क्या बढ़ गये बस जहन्नुम पहुँच गये। ऐसा रास्ता भूले कि बस हमारा ही जी जानता है।
भैरोंसिंह-ईश्वर की ही कृपा से इस समय लौट आये, नहीं तो कोई उम्मीद यहाँ पहुँचने की न थी।
पुजारी-राम-राम! यह जंगल बड़ा ही भयानक है। कई दफे तो हम लोग इसमें भूल गये हैं और दो-दो दिन तक भटकते ही रह गए हैं, आप बेचारे तो नये ठहरे, आइये, बैठिये, कुछ जलपान कीजिए।
भैरोंसिंह-अजी, कहाँ का खाना कैसा पीना! होश तो ठिकाने ही नहीं हैं, बस भंग पीकर खूब सोवेंगे। घूमते-घूमते ऐसे थके कि तमाम बदन चूर-चूर हो गया। कृपानिधान, आज भी हम लोगों की इत्तिला कुमार से न कीजिएगा, हम लोग मिलाने लायक नहीं हैं, इस समय तो खूब गहरी छनेगी!
पुजारी-खैर, ऐसा ही सही! (हँस कर) आइये, बैठिए तो।
दोनों ऐयारों ने भंग पी और बाकी लोगों को भी पिलाई। इसके बाद कुछ देर आराम करके बाजार में घूमने-फिरने के लिए गये और अच्छी तरह देख-भाल कर लौट आये। सोते समय फिर उन्हीं महात्मा का जिक्र पुजारी से करने लगे जिनसे मिलाने का वायदा कर चुके थे और यहाँ तक उनकी तारीफ की कि पुजारीजी उनसे मिलने के लिए जल्दी करने लगे और बोले, "यह तो कहिए, कल आप उनके दर्शन करावेंगे या नहीं?"
बद्रीनाथ-जरूर, बस कुमार यहां से सन्ध्या-पूजा करके लौट जायें तो चले चलिए, मगर अकेले आप ही चलिए, नहीं तो महात्मा बड़ा बिगड़ेंगे कि इतने आदमियों को क्यों ले आए। वह जल्दी किसी से मिलने-मिलाने वाले नहीं हैं।
पुजारी-हमें क्या गरज पड़ी है, जो किसी को साथ ले जायँ, अकेले आपके साथ चलेंगे।
भैरोंसिंह-बस, तभी तो ठीक होगा।
दूसरे दिन जव महाराजकुमार सन्ध्या-पूजा करके लौट गए, तो बद्रीनाथ और भैरोंसिंह पुजारी को साथ ले वहाँ से रवाना हुए और पहाड़ के नीचे उतरने के बाद बोले, "बस, अब यहीं बूटी छान लें, इसीलिए लुटिया लेता आया हूँ।"
पुजारी-क्या हर्ज है, बूटी छान लीजिए।
बद्रीनाथ-आपके हिस्से की भी बनाऊँ न?
पुजारी-इस दोपहर के समय क्या बूटी पिलाइयेगा। हमें तो अपनी आदत न थी, आप ही लोगों के सबब दो दिन से खूब पीने में आती है।
बद्रीनाथ-क्या हर्ज है, थोड़ी-सी पी लीजिएगा।
पुजारी-जैसी आपकी मर्जी।
हमारे बहादुर ऐयारों ने एक पत्थर की चट्टान पर भंग घोंट कर पी और नजर बचा थोड़ी-सी बेहोशी की दवा मिला पुजारी को भी पिलाई। थोड़ी ही देर में पुजारी जी महाराज तो चीं बोल गए और गहरी बेहोशी में मस्त हो गए। दोनों ऐयार उसे उठाकर ले गए और एक झाड़ी में छिपा आये।
बद्रीनाथ-अब क्या करना चाहिए?
भैरोंसिंह-आप यहाँ रहिए, मैं उसी तरकीब से कुमार को उठा लाता हूँ।
बद्रीनाथ-अच्छी बात है, मैं अपने हाथ से पुजारी की सूरत तुम्हें बनाता हूँ।
भैरोंसिंह-बनाइए।
पुजारी की सूरत बना बद्रीनाथ को उसी जगह छोड़ भैरोंसिंह लौटे। सन्ध्या होने के पहले ही मन्दिर में जा पहुँचे। लोगों ने पूछा, "कहिए पुजारीजी, महात्मा से मुलाकात हुई या नहीं? और अकेले क्यों लौटे, चौबेजी कहाँ रह गये?"
नकली पुजारी ने कहा-महात्मा से मुलाकात हुई। वाह क्या बात है, महात्मा क्या वह तो पूरे सिद्ध हैं! दोनों चौबों को बहत मानते हैं। उन्हें तो आने न दिया मगर मैं चला आया। अब चौबेजी कल आवेंगे।"
समय पर महाराजकुमार भी आ पहुँचे और सन्ध्या करने के लिए मन्दिर के अन्दर घुसे। मामूली तौर पर पुजारी के बदले में नकली पुजारी अर्थात् भैरोसिंह मन्दिर के अन्दर रहे और कुमार के आने पर भीतर से किवाड़ बन्द कर लिया। सन्ध्या करने क समय महाराजकुमार के साथ मन्दिर के अन्दर घुस कर पुजारी क्या-क्या करते थे, यह दोनों ऐयारों ने उनसे बातों-बातों में पहले ही मालूम कर लिया था। पुजारीजी मन्दिर के अन्दर बैठे कुछ विशेष काम नहीं करते थे, केवल पूजा का सामान कुमार के आगे जमा कर देते और एक किनारे बैठे रहते थे। चलते समय प्रसादी में माला कुमार को देते थे और वे उसे सूंघ आँखों से लगा कर उसी जगह रख चले जाते थे। आज इन सब कामों को हमारे ऐयार पुजारीजी ने ही पूरा किया।
इस मन्दिर में चारों तरफ चार दरवाजे थे। आगे की तरफ तो कई आदमी और पहरे वाले बैठे रहते थे, बाई तरफ के दरवाजे पर होम करने का कुण्ड बना हुआ था, शाहन दरवाजे पर फूलों के कई गमले रखे हए थे, और पिछले दरवाजे बिल्कुल सन्नाटा पड़ता था।
मन्दिर के अन्दर दरवाजा बन्द करके कुमार सन्ध्या करने लगे। प्राणायाम के मय मौका जान कर नकली पुजारी ने आशीर्वाद में देने वाली फूलों की माला में बेहोशी लाया। जब कुमार चलने लगे, पुजारी ने माला गले में डाली, कुमार ने उसे गल से निकाल संघा और माथे से लगाकर उसी जगह रख दिया।
माला सूंघने के साथ ही कुमार का सिर घूमा और वे बेहोश होकर जमीन पर सह ने झटपट उनकी गठरी बाँधी और पिछले दरवाजे की राह बाहर निकल आये, इसके बाद उसी छोटी खिड़की की राह किले के बाहर ही जंगल का रास्ता और दो ही घण्टे में उस जगह जा पहुँचे जहां पण्डित बद्रीनाथ को छोड़ गए थे। ये दोनों ऐयार कुमार कल्याणसिंह को ले गयाजी की तरफ रवाना हुए।
६
इश्क भी क्या बुरी बला है? हाय, इस दुष्ट ने जिसका पीछा किया उसे खराब करके छोड़ दिया और उसके लिए दुनिया भर के अच्छे पदार्थ बेकाम और बुरे बना दिये।
छिटकी हुई चाँदनी उसके वदन में चिनगारियां पैदा करती है, शाम की ठंडी हवा उसे लू सी लगती है, खुशनुमा फूलों को देखने से उसके कलेजे में काँटे चुभते हैं, वाग की रविशों पर टहलने से पैरों में छाले पड़ते हैं, नरम बिछावन पर पड़े रहने से हड्डियाँ टूटती हैं, और वह करवटें बदल कर भी किसी तरह आराम नहीं ले सकता।
खाना-पीना हराम हो जाता है, मिसरी की डली जहर मालूम होती है, गम खाते-खाते पेट भर जाता है, प्यास बुझाने के लिए आँसू की बूंदें बहुत हो जाती हैं, हजार दुःख भोगने पर भी किसी की जुल्फ में उलझी हुई जान को निकल भागने का मौका हाथ नहीं लगता। दोस्तों की नसीहतें जिगर के टुकड़े-टुकड़े करती हैं, जुदाई की आग में कलेजा भुन जाता है, बदन का खून पानी हो जाता है और इसी से उसकी भूख-प्यास दोनों ही जाती रहती हैं। जिसकी सूरत उसकी आँखों में छुपी रहती है, दरो-दीवार में वही दिखाई देता है, स्वप्न में भी इठलाता हुआ वही नजर आता है। उसकी सुनी हुई बातें रात-दिन कानों में गूंजा करती हैं, हँसी के समय दिखाई दिये हुए मोतियों रे दाँत गले का हार बन बैठते हैं, भुलाये नहीं भूलते, जादू-भरी चितवनों की याद दिल को उचाट कर देती है, गले में हाथ डाल कर ली हई अँगड़ाई बदन को दबाये देती है, उसकी याद में एक तरफ झुके हुए, कभी सीधे भी नहीं होने पाते।
वे दिन-रात आँखें बन्द कर हुस्न के बाग में टहला करते हैं। ठंडी साँसें आँधी का काम देती हैं। सुखे पत्ते उड़ाया करते हैं और धीरे-धीरे आप भी ऐसे सूख जाते हैं कि साँस के साथ उड़ जाने की हिम्मत बाँधते हैं, मुहब्बत का गुरु चाबुक लिए हर-दम पीछे मौजूद रहता है, बुदबुदाते हुए अपने चेले को कहीं ठहरने नहीं देता और न माशूक के नाम के सिवाय कोई दूसरा शब्द मुंह से निकालने देता है।
आदमी क्या हवा तक ऐसों से दिल्लगी करती है, किवाड़ खटखटा माशूक के आने की याद दिला चुटकियाँ लेती है, और कभी कान में झुक कर कहती है कि मैं उस गली से आई हूँ जिसमें तेरा प्यारा रहता है।
बाग में टहलने के समय हवा के चपेटों में पड़ी हुई पेड़ों की टहनियाँ हिलहिल कर अपने पास बुलाती हैं और जब वह पास जाता है तो हँसी के दो फूल गिरा कर चुप हो जाती हैं जिससे उसका दिल और भी बेचैन हो जाता है और वह दोनों हाथों से कलेजा थाम कर बैठ जाता है। उसके प्यारे रिश्तेदार यह हालत देख अफसोस करते हैं और उसकी नर्म अँगुलियों को हाथ में ले कर पूछते हैं कि क्या ये नाखून बढ़ा रखे हैं?
बेचैनी इतनी बढ़ जाती है कि आधे घण्टे तक के लिए भी ध्यान एक तरफ नहीं जमता और न एक जगह थोड़ी देर तक आराम के साथ बैठने की मोहलत मिलती है। आँखों में छिपी रहने वाली नींद भी न मालूम कहाँ चली जाती है और अपनी जगह टकटकी को जो दम-दम में तरह-तरह की तस्वीरें बनाने और बिगाड़ने वाली है छोड़ जाती है।
यही हमारे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और उनकी प्यारी किशोरी की हालत है। उस समय दोनों एक-दूसरे से दूर पड़े हैं, मगर मुहब्बत का भूत रंग-बिरंग की सूरत बन दोनो की आँखों में नाचा करता है और बढ़ती हुई उदासी और बेचैनी को किसी तरह कम नहीं होने देता।
रोहतासगढ़ महल में रहने वाली जितनी भी औरतें हैं, सभी को किशोरी की खातिरदारी का ध्यान रहने पर भी किशोरी की उदासी किसी तरह कम नहीं होती। यद्यपि उसे यहाँ किसी तरह की भी तकलीफ नहीं थी, मगर कलेजे को टुकड़े-टुकड़े करने वाली वह बात एक सायत के लिए भी उसके दिल से नहीं भूलती थी जो उसने यहाँ आने के साथ ही पीठ पर हाथ फेरते हुए महाराज के मुंह से सुनी थी, अर्थात्- “यह तो मेरी पतोहू होने लायक है!"
यों तो ऊँचे दर्जे की औरतों के जिद करने से लाचार होकर जनाने नजरबाग में किशारी को टहलना ही पड़ता था मनर वहाँ की कोई चीज उस बेचारी के जी को ढाढ़स नहीं दे सकती थी। खिले हए गुलाब के फल पर नजर पड़ते ही वह मुरझा जाती, नर्गिस की तरफ देखते ही उसकी शर्मीली आँखें पलकों की चिलमन में छिप जातीं, सरो के पास हुपत हा वह गम के बोझ से झक जाती और खशनमा फलों से लदी हई पेचीली लताएँ उसके सामने पड़ कर कँअर इन्द्रजीतसिंह की संबली जुल्फों की याद दिलातीं, जिसमें उलझी हुई उसकी जान को जीते-जी छटने की उम्मीद न थी।
रविशों को वह यार की जदाई का मैदान समझती, छोटे-छोटे रंगीन फूलों से भरे हुए पेड़ों की क्यारियों को वह घना जंगल जानती और गंजते हुए भौंरों की आवाज उसके कानों में झिल्ली की झनकार मालम होती जो जंगल में बिना मौसम पर ध्यान दिये बारहों महीने बोला करती है और इत्तिफाक से आ पड़े हुए नाजुक-बदनों के कलेजो को दहलाया करती है।
नमें हवा के झोंकों से हिलती हुई रंग-बिरंग की खूबसूरत पत्तियों को देखते ही वह काप जाती, सुन्दर और साफ मोती-सरीखे जल से भरे और बहते हुए बनावटी झरने के पास पहुंचते ही उसका दिल डूब जाता, छूटते हुए फव्वारे पर नजर पड़ते ही कलेजा मुह का आता और आँखों से टपाटप आँसू की बंदें गिरने लगतीं जिन्हें देख तरह-तरह की बोलियों से दिल खुश करने वाली बाग की नाजुक चिड़ियों से चुप न रहा जाता आर वे बोल उठती-"हाय-हाय! इस बेचारी का दिल किसी की जुदाई में खून हो गया और वह खून पानी होकर आँखों की राह निकला जाता है।"
उन कुछ जवान, नाजुक और चंचल औरतों को, जो किशोरी के साथ रहने पर मुस्तैद की गई थीं, उसकी हालत पर अफसोस आता मगर लाचार थी, क्योकि उन्ह अपनी जान बहुत प्यारी थी।
रात के समय जब किशोरी अपने को अकेली पाती, तरह-तरह की बातें सोचा करती। कभी तो वह निकल भागने की तरकीब सोचती, मगर अनहोनी जान उधर से खयाल को लौटा कर अपने प्यारे इन्द्रजीतसिंह की तरफ ध्यान लगाती और कहती कि क्या वे मेरी मदद न करेंगे और मुझे यहाँ से न छुड़ावेंगे? नहीं, जरूर छुड़ावेंगे, मगर कब? जब उन्हें यह खबर होगी कि किशोरी फलाँ जगह कैद है। हाय-हाय! कहीं ऐसा न हो कि खबर होते-होते तक मुझे यह दुनिया छोड़ देनी पड़े और दिल के अरमान दिल ही में ले जाने पड़ें। नहीं, अगर मेरे साथ जबर्दस्ती की जायगी तो जरूर ऐसा करूँगी और सिवाय उसके, जिसके ऊपर न्यौछावर हो चुकी हूँ, दूसरे की न कहलाऊँगी। ऐसी नौबत आने के पहले ही शरीर छोड़ उनसे जा मिलूँगी। कोई ताकत ऐसी नहीं जो मुझे ऐसा करने से रोक सके। हे ईश्वर! क्या तु उन आफत के परकाले ऐयारों को यहाँ का रास्ता न बतायेगा जो कुमार के लिए जान तक दे देने को मुस्तैद रहते हैं?
एक रात वह इसी सोच-विचार में पड़ी थी कि सवेरा हो गया और कमरे के बाहर से एक ऐसी आवाज उसके कानों में आई कि वह चौंक पडी। उसके फैले हुए खयाल इकट्ठे हो गये, साथ ही कुछ-कुछ खशी उसके चेहरे पर झलकने लगी। वह आवाज यह थी-
"यह काम बेशक वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का है।"
किशोरी उठ खड़ी हुई और कमरे के बाहर निकलने पर घण्टे-भर ही में उसे मालूम हो गया कि कुंअर कल्याणसिंह को वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग ले भागे।
अब किशोरी को अपने छटने की कुछ-कुछ उम्मीद हई और वह दिन भर इसा खयाल में डूबी रहने लगी कि देखें, इसके आगे क्या होता है।
७
आधी रात से ज्यादा जा चुकी है। किशोरी अपने कमरे में मसहरी पर लेटी हुई न मालूम क्या-क्या सोच रही है। हाँ, उसकी डबडबाई हुई आँखें जरूर इस बात की खबर देती हैं कि उसके दिल में किसी तरह का द्वन्द्व मचा हुआ है। उसकी आँखों में नींद बिल्कुल नहीं है, वह घड़ी-घड़ी करवटें बदलती और लम्बी साँसें लेकर रह जाती है।
यकायक कमरे के बाहर से कोई तड़पा देने वाली आवाज उसके कान में आई जिसके सुनते ही वह बेचैन हो गई, किसी तरह लेटी रह न सकी। पलंग से नीचे उतर पड़ी और दरवाजा खोल बाहर इधर-उधर देखने लगी। वह आवाज किसी के सिसक-सिसक कर रोने की थी।
कमरे के बाहर आठ दर का दालान था जहाँ एक खम्भे के सहारे खड़ी बिलखबिलख कर रोती हुई एक कमसिन औरत को किशोरी ने देखा। खम्भे और उस औरत पर चाँदनी अच्छी तरह पड़ रही थी। पास जाने से मालूम हुसा कि सर्दी से वह औरत काँप रही है, क्योंकि कोई भारी कपड़ा उसके बदन पर न था, जिससे सर्दी का बचाव होता।
किशोरी का दिल तो पहले ही से जख्मी हो रहा था। वह इस तरह से बिलखबिलख कर किसी को रोते कब देख सकती थी! जाते ही उस औरत का हाथ थाम लिया और पूछा-
"तुम पर क्या आफत आई है जो इस तरह बिलख-बिलख कर रो रही हो?"
औरत–हाय, मेरे ऊपर वह आफत आई जो किसी तरह टहल नहीं सकती!
किशोरी उसे अपने कमरे में ले आई और अपने पास फर्श पर बैठा कर बातचात करने लगी। इस औरत की उम्र अठारह वर्ष से ज्यादा न होगी। यह हर तरह से खूबसूरत और नाजुक थी, इसके बदन पर जो कुछ जेवर था, उसके देखने से साफ मालूम होता था कि यह जरूर किसी बड़े खानदान की लड़की है।
किशोरी–मैं उम्मीद करती हूँ कि अपने दिल का हाल मुझसे साफ-साफ कहागी और मुझे बहिन समझ कर कुछ न छिपाओगी।
औरत-बहिन, मैं जरूर अपना हाल तुमसे कहूँगी, क्योंकि तुम भी उसी बला में फंसी हो, जिसमें मैं।
किशोरी-(चौंक कर) क्या मेरी ही तरह से तुम पर भी जुल्म किया गया है?
औरत-बेशक।
किशोरी-(लम्बी साँस लेकर) हे ईश्वर! मैंने तो किसी के साथ बुराई नहीं की थी, फिर क्यों यह दुख भोग रही हूँ।
औरत-मगर मैं अब इस जगह ठहर नहीं सकती!
किशोरी–सो क्यों? क्या किसी तरह का खौफ मालूम होता है?
औरत-नहीं-नहीं, डर किसी बात का नहीं है, पर इस समय मुझे किसी की कल भागने की उम्मीद है, इसीलिए अपने कमरे से निकल यहाँ तक आई थी।
किशोरी-क्या कोई तरकीब निकाली गई है?
औरत–हाँ, और अगर चाहो तो तुम भी मेरे साथ यहाँ से भाग सकती हो। इसी राज्य का एक जबर्दस्त आदमी आज हमारी मदद करेगा।
वह सुनकर किशोरी बहुत ही खुश हुई। यह औरत कौन है, उसका नाम क्या या दुख पड़ा है? यह सब पूछना तो बिल्कुल भूल गई और निकल भागने उस औरत का हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर प्रेम से उसकी तरफ देख पूछने लगी, "क्या तुम्हारी मदद से मेरा भी छुटकारा यहाँ से हो सकता है?"
औरत-जरूर हो सकता है मगर अब देर नहीं करनी चाहिए।
इसके जवाब में किशोरी कुछ कहना ही चाहती थी कि सामने का दरवाजा खुला भार एक हसीन औरत अन्दर आती हई दिखाई पड़ी। इसकी अवस्था लगभग बीस वष का होगी, सफेद गेहूँ का सा रंग, कद न लम्बा न नाटा, बदन साफ और सुडौल, नमकान चहरा, रस-भरी आँखें, नाक में एक हीरे की कील के अलावा दो-चार मामूली गहने पहन हुए थी, तो भी वह इस लायक थी कि ऊँचे दर्जे के ख बसरतों की पंक्ति में बैठ सके। इसे देखते ही वह औरत, जो किशोरी के पास बैठी थी, चौंकी और उसकी तरफ देख कर बोली, "लाली, इस समय तुम्हारा यहाँ आना मुझे ताज्जुब में डालता है!"
लाली-लेकिन यह सुनकर तुम्हें और भी ताज्जुब होगा कि मैं तुम्हारे पंजे से बेचारी किशोरी की जान बचाने के लिए आई हूँ।
इतना सुनते ही उस औरत का रंग-ढंग बिल्कुल बदल गया। उसके चेहरे पर मदद से निकल भागने की उम्मीद है। है, उस पर क्या दुख पड़ा है? यह सब जो अभी तक उदासी छाई हुई थी, बिल्कुल जाती रही और तमतमाहट आ मौजूद हुई। उसकी आंखें भी जो डबडबाई हुई थीं, खुश्क हो गई और उनमें गुस्से की सुीं दिखाई देने लगी। वह इस निगाह से लाली को देखने लगी, जैसे उस पर किसी तरह की हुकूमत रखती हो।
लाली को किशोरी भी पहचानती थी, क्योंकि यह उन हसीनों में से थी जो किशोरी का दिल बहलाने और उसकी हिफाजत करने के लिए तैनात की गई थीं।
हुकूमत-भरी निगाहों से कई सायत तक लाली की तरफ देखने के बाद वह औरत फिर बोली-
"लाली, क्या तू आज पागल हो गई है जो मेरे सामने इस तरह से बेअदब होकर बोलती है?"
लाली-तू कौन है, जो तेरे साथ अदब का बर्ताव करूं?
औरत-(खड़ी होकर) तू नहीं जानती कि मैं कौन हूँ?
लाली–कुन्दन, मैं तुझे खूब जानती हूँ, मगर तू यह नहीं जानती कि तेरी नकेल मेरे हाथ में है जिससे तू मेरा कुछ नहीं कर सकती और न अपनी बेईमानी का जाल ही बेचारी किशोरी पर फैला सकती है!
इतना सुनते ही वह औरत, जिसका नाम कुन्दन था, लाल हो गई और अपने जोश को किसी तरह भी सम्हाल न सकी। छुरा, जो कमर में छिपाये हुए थी, हाथ में ले लिया और मारने के लिए लाली की तरफ झपटी। मगर लाली ने झट अपनी वगल से एक नारंगी निकालकर उसे दिखाई और पूछा, "क्या तू भूल गई कि इसमें कै फाँके हैं?"
नारंगी देखने के साथ ही और लाली के मुँह से निकले हुए शब्दों को सुनते ही उसका जोश जाता रहा, खौफ और घबराहट से उसका रंग बिल्कुल उड़ गया और वह एक चीख मार कर जमीन पर गिर पड़ी।
८
रोहतासगढ़ किले के सामने पहाड़ी से कुछ दूर हटकर वीरेन्द्रसिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। चारों तरफ फौजी आदमी अपने-अपने काम में लगे हुए दिखाई देते हैं। कुछ फौज आ चुकी है, और बराबर चली ही आती है। बीच में राजा वीरेन्द्रसिंह का कारचोबी खेमा शान-शौकत के साथ खड़ा है, उसके दोनों बगल कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्द सिंह के खेमे हैं। सामने और पीछे की तरफ दुपट्टी बड़े-बड़े सरदारों और बहादों का डेरा पड़ा है। बाजार लगने को तैयारियाँ हो रही हैं, लड़ाई का सामान इकट्ठा हो रहा है कि देखने से दुश्मनों का कलेजा दहल जाय।
डेरा खड़ा होने के दूसरे दिन कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, पण्डित बद्रीनाथ, भैरोंसिंह, तारासिंह, जगन्नाथ ज्योतिषी, फतहसिंह (पुराने सेनापति जो नौगढ़ में थे) और नाहरसिंह इत्यादि को साथ लिये राजा वीरेन्द्रसिंह भी आ पहँचे और सब लोग अपने-अपने खेमे में उतरे। पन्नालाल गयाजी में और रामनारायण तथा चुन्नीलाल चुनारगढ़ में रखे गये। इस लड़ाई के लिए सेनापति की पदवी नाहरसिंह को दी गई। तीसरे दिन और भी फौज आ जाने पर पाँच झण्डे (पचास हजार फौज का निशान) खड़े किये गये। बहादुरों के चेहरों पर खुशी मालूम होती थी। सब इसी फिक में थे कि जहाँ तक हो लड़ाई जल्दी छिड़ जाय और बेशक एक ही दो दिन में लड़ाई छिड़ जाने की उम्मीद थी, मगर वीरेन्द्र सिंह के लश्कर पर यकायक ऐसी आफत आ पड़ी कि कुछ दिनों तक लड़ाई रुकी रही। इस आफत के आने का किसी को स्वप्न में भी गुमान न था जिसका हाल हम आगे चल कर लिखेंगे।
राजा दिग्विजयसिंह का पत्र लेकर उनका एक ऐयार राजा वीरेन्द्रसिंह के पास आया। वीरेन्द्रसिंह ने पत्र लेकर मुंशी को पढ़ने के लिए दिया। उसमें जो कुछ लिखा था, उसका संक्षेप यह है-
"हमारे-आपके बीच कभी दुश्मनी नहीं रही, तो भी न मालूम, आपस में लड़ने या बिगाड़ पैदा करने का इरादा आपने क्यों किया। खैर, इसका सबब जो कुछ हो हम नहीं कह सकते मगर इतना याद रखना चाहिए कि पचास वर्ष लड़ कर भी यह किला आप हमसे नहीं ले सकते। अगर हम चुपचाप बैठे रहें तो भी आप हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, फिर भी हम आपसे लड़ेंगे और मैदान में निकल कर बहादुरी दिखायेंगे। अगर आपको अपनी बहादुरी या जवाँमर्दी का घमंड है तो फौज को जान क्यों लेते हैं। एक पर एक अड़ के फैसला कर लीजिये। बहादुरों की कार्रवाई देखने के बाद हमसे और आपसे द्वन्द्व-युद्ध हो जाय। आप हम पर फतह पायें तो यह राज्य आपका हो जाय, नहीं तो आप हमारे मातहत समझे जायँ। अफसोस, इस समय हमारा लड़का मौजूद नहीं है, अगर होता तो आपके दोनों लड़कों से वह अकेला ही भिड़ जाता।"
इस पत्र के जवाब में जो कुछ राजा वीरेन्द्रसिंह ने लिखा, हम उसका भी संक्षेप नीचे लिख देते हैं-
"आप हमारे राज्य में घुस कर किशोरी को ले गये, क्या यह आपकी जबर्दस्ती नहीं है? क्या इसे लड़ाई की बुनियाद कायम करना नहीं कह सकते? हाँ, अगर आप किशोरी को इज्जत के साथ हमारे पास भेज दें, तो हम बेशक अपने घर लौट जायँगे। नहीं तो याद रहे, हम इस किले की एक-एक ईट उखाड़ कर फेंक देंगे, जिसकी मजबूती पर आप इतना घमंड करते हैं। हम लोग द्वन्द्व-युद्ध करने के लिए भी तैयार हैं, जिसका जी चाहे एक पर एक लड़ के हौसला निकाल ले, आपका लड़का मेरे यहाँ कैद है। यदि आप किशोरी को हमारे पास भेज दें, तो हम उसे छोड़ने के लिए तैयार हैं।"
इस पत्र के जवाब में रोहतासगढ़ के किले से तोप की एक आवाज आई। अब लड़ाई में किसी तरह का शक न रहा। दोनों तरफ के ऐयार अपनी-अपनी कार्रवाई दिखाने पर मुस्तैद हो गये, और उन लोगों ने जो कुछ किया, उसका हाल आगे चलकर मालूम होगा।
रोहतासगढ़ किले के अन्दर राजमहल की अटारियों पर चढ़ी हुई बहुत-सी औरतें उस तरफ देख रही हैं जिधर वीरेन्द्रसिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। कुँअर कल्याणसिंह के गिरफ्तार हो जाने से किशोरी को एक तरह की निश्चिन्ती-सी हो गई थी क्योंकि ज्यादा डर उसे अपनी शादी उसके साथ हो जाने का था, अपने मरने की उसे जरा भी परवाह न थी। हाँ, कुँअर इन्द्रजीतसिंह को याद वह एक सायत के लिए भी नहीं भुला सकती थी जिनकी तस्वीर उनके कलेजे में खिंची हुई थी। वीरेन्द्रसिंह की चढ़ाई का हाल सुनकर उसे बड़ी खुशी हुई और वह भी अपनी अटारी पर चढ़कर हसरत-भरी निगाहों से उस तरफ देखने लगी जिधर वीरेन्द्रसिंह की फौज पड़ी हुई थी। चाहे यहाँ से बहुत दूर हो तो भी किशोरी की निगाहें वहाँ तक पहुँच और भीड़ में घुस-घुस कर किसी को ढूँढ़ निकालने की कोशिश कर रही थीं। इस समय किशोरी के साथ ही लाली भी थी जिसने आज से कई दिन पहले किशोरी के कमरे में कुन्दन को नारंगी दिखाकर डरा दिया था।
लाली किशोरी की निगहबानी पर रखी गई थी, तो भी वह किशोरी पर मेहरबानी रखती थी। किशोरी ने नारंगी वाले भेद को जानने की कई दफे कोशिश की, मगर पता न लगा। उस दिन के बाद कई दफे कुन्दन से भी मुलाकात हुई, मगर पूछने पर उसने ऐसी कोई बात न कही जिससे किशोरी का शक दूर हो जाय। नित्य एक घर में रहने पर भी लाली और कुन्दन में फिर किसी तरह की दुश्मनी न दिखाई पड़ी, इस बात ने किशोरी के ताज्जुब को और भी बढ़ा रखा था।
इस समय किशोरी के साथ सिवाय लाली के दूसरी कोई औरत न थी। ये दोनों वीरेन्द्रसिंह के लश्कर की तरफ बड़े गौर से देख रही थीं कि यकायक किशोरी को फिर वही नारंगी वाली बात याद आई और थोड़ी देर तक सोचने के बाद वह लाली से पूछने लगी।
किशोरी––लाली, उस दिन की बात जब मैं याद करती हूँ, या उस पर विचार करती हूँ, तो कुन्दन की दगाबाजी साफ झलक जाती है। कुन्दन अगर सच्ची होती तो तुम्हें मारने के लिए न झपटती, या हकीकत में अगर वह उस समय यहाँ से भाग जाने वाली होती तो उसके काम में विघ्न पड़ जाने से उसे रंज होता, सो उसके बदले में वह खुश दिखाई देती है।
लाली––नहीं, वह एकदम से झूठी भी नहीं है।
किशोरी––क्या उसकी बातों का कोई हिस्सा सच भी था?
लाली––जरूर था।
किशोरी––वह क्या?
लाली––यही कि वह भी इस किले में उसी काम के लिए लाई गई है जिस काम के लिए आप लाई गई हैं।
किशोरी––यानी तुम्हारे राजकुमार के साथ ब्याहने के लिए?
लाली––हाँ।
किशोरी––अच्छा, उसकी और कौन सी बात सच थी?
लाली––इन सब बातों को पूछकर क्या करोगी? इस भेद के खुलने से बहुत बड़ी बुराई पैदा होगी।
किशोरी––नहीं-नहीं, मेरी प्यारी लाली, मेरी जुबान से वह बात कोई दूसरा कभी नहीं सुन सकता और मैं उम्मीद करती हूँ कि तुम मुझसे उसका हाल साफ-साफ कह दोगी! उस दिन से मुझे विश्वास हो गया है कि तुम मेरी दर्दशरीक हो। अस्तु, अगर मेरा खयाल ठीक है तो तुम उसका हाल मुझे जरूर बता दो, जिससे मैं हर दम होशियार रहूँ।
लाली––अब वह तुम्हारे साथ बुराई कभी नहीं करेगी।
किशोरी––तो भी मेहरबानी करके···
लाली––खैर, बता देती हूँ। मगर खबरदार, इसका जिक्र किसी दूसरे के सामने कभी मत करना।
किशोरी––ऐसा कदापि नहीं कर सकती और तुम खुद ही जानती हो कि इस महल में सिवाय तुम्हारे कोई भी ऐसा नहीं है कि जिससे मैं दो बातें करती होऊँ।
लाली––अच्छा, तो सिवाय उस बात के, जो मैं ऊपर कह चुकी हूँ, बाकी कुल बातें उसकी झूठ थीं। वह इस मकान से भागना नहीं चाहती थी, वह तो हमारे कुमार के साथ व्याह होने की उम्मीद में खुश है। मगर जिस दिन से तुम आई हो, उस दिन से वह फिक्र में पड़ गई है, क्योंकि वह खूबसूरती और इज्जत में तुमको अपने से बहुत बढ़के समझती है और हकीकत में ऐसा ही है। उसे यह खयाल सता रहा है कि राजकुमार से पहले किशोरी की शादी हो लेगी, तब मेरी होगी और ऐसी अवस्था में किशोरी बड़ो रानी कहलावेगी और उसी के लड़के गद्दी के मालिक समझे जायेंगे। इसी वह इस फिक्र में थी कि तुम्हें मार डाले, मगर किसी ऐसे ठिकाने पर ले जाकर, जिसमें उस पर कोई शक न कर सके।
किशोरी––छि:-छिः!
लाली––मगर अब वह तुम्हारे साथ बुराई नहीं कर सकती।
किशोरी––और वह नारंगी वाला भेद क्या है?
लाली––वह मैं नहीं कह सकती। मगर तुम उसी से क्यों नहीं पूछती? अब तो वह हरदम तुम्हारी खुशामद किया करती है।
किशोरी––मैं उससे पूछ चुकी हूँ।
लाली––उसने क्या कहा?
किशोरी––उसने कहा कि लाली ने नारंगी दिखाकर यह नसीहत की कि देखो, इसमें कई फाँकें है, मगर एक साथ रहने और छिलके से ढंके रहने के कारण एक ही गिनी जाती हैं। कोई कह नहीं सकता कि इसमें के फाँके हैं, इसी तरह हम लोगों को भी रहना चाहिए।
लाली––ठीक तो कहा।
किशोरी––वाह-वाह! तुमने तो उसी का साथ दिया! एकदम छोकरी बनाकर भुलावा देने लगीं!
लाली––(हँसकर) खैर, घबराओ मत, धीरे-धीरे सब मालम हो जायगा।
इतने में सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आहट मालूम हुई और दोनों उस तरफ देखने लगीं। कुन्दन ने पहुँचकर दोनों को सलाम किया और हँसी-हँसी में लाली की तरफ देखकर बोली, "एक आदमी तुम्हें खोजता हुआ आया है, वह कहता है कि लाली ने मेरी किताब चुराई है, वह किताब जो किसी के खून से लिखी गई है।"
कुन्दन के इन शब्दों में न मालूम क्या भेद भरा हुआ था कि सुनते ही लाली का रंग उड़ गया। खौफ के मारे उसके तमाम बदन में कँपकँपी पैदा हो गई और मालूम होता था कि किसी ने उसके तमाम बदन का खून खींच लिया है। थोड़ी देर तक वह अपने हवास में न रही, अन्त में हाथ जोड़कर उसने कुन्दन से कहा––
लाली––कुन्दन, मुझसे बड़ी भूल हुई। मुझ पर रहम खा! मैं तमाम उम्र तेरी लौंडी बनकर रहूँगी!
कुन्दन––क्या गुलामी की दस्तावेज मेरे आँचल पर लिख देगी?
कुन्दन के इस दूसरे जुमले ने तो लाली को एकदम ही बदहवास कर दिया। अबकी दफे वह अपने को किसी तरह न सँभाल सकी, उसका सिर घूमने लगा और वह चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ी।
लाली का यह हाल देख कुन्दन चुपचाप वहाँ से चली गई, मगर उसकी सूरत से मालूम होता था कि वह अपनी कार्रवाई पर खुश है या उसने लाली के ऊपर अपनी हुकूमत पैदा कर ली है। उसका मुंह सिकोड़ कर सिर हिलाना कहे देता था कि वह लाली पर कुछ और भी जुल्म किया चाहती है।
बेचारी किशोरी का अजब हाल था। नारंगी वाला भेद जानने के लिए वह पहले ही परेशान थी, अब इस दूसरे भेद ने और भी कलेजा ऐंठ दिया। उसने बड़ी मुश्किल से अपने को सँभाला और लाली को उसी तरह छोड़ छत के नीचे उतर आई तथा अपने कमरे से एक गिलास जल लाकर लाली के मुँह पर छींटा दिया। थोड़ी देर में लाली होश में आई और विना कुछ बात किये रोती हुई अपने रहने की जगह चली गई और किशोरी भी अपने कमरे की तरफ रवाना हुई।
जिस कमरे में किशोरी रहती थी, वह एक खुशनुमा बाग के बीचोंबीच में था। इस बाग के चारों कोनों में छोटी-छोटी चार इमारतें और भी थीं। एक में वे सब औरतें रहती थीं जो किशोरी की हिफाजत के लिए मुकर्रर की गई थीं। इन औरतों की अफसर लाली थी। दूसरे मकान में दो-तीन लौंडियों के साथ लाली रहती थी। तीसरा मकान अमीराना ठाठ से रहने के लिए कुन्दन को मिला हुआ था, चौथे मकान में जो सबसे छोटा था, ताला बंद था, मगर बारी-बारी से कई औरतें नंगी तलवार लिये उसके दरवाजे पर पहरा दिया करती थीं। यह बाग जनाने महल में था और किसी गैर का यहाँ आना या यहाँ से किसी का निकल भागना बड़ा ही मुश्किल था।
९
आधी रात का समय है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में पहरा देने वालों के सिवाय सभी आराम की नींद सोये हुए हैं। हाँ, थोड़े से फौजी आदमियों का सोना कुछ विचित्र ही ढंग का है जिन्हें न तो जागा ही कह सकते हैं और न सोने वालों में ही गिन सकते हैं, क्योंकि ये लोग, जो गिनती में एक हजार से ज्यादा न होंगे, लड़ाई की पोशाक पहने और उम्दे हर्वे बदन पर लगाये लेटे हुए हैं। जाड़े का मौसम है मगर कोई ऐसा कपड़ा, जो वखूबी सर्दी को दूर कर सके, ओढ़े हुए नहीं हैं, इसलिए तेज हवा के साथ मिली हुई सर्दी उन्हें नींद में मस्त होने नहीं देती।
राजा वीरेन्द्रसिंह के खेमे की चौकसी फतहसिंह कर रहे हैं, खुद तो दरवाजे के आगे एक चौकी पर बैठे हुए हैं, मगर मातहत सिपाही खेमे के चारों तरफ नंगी तलवारें लिए घूम रहे हैं। कुँअर इन्द्रजीतसिंह के खेमे की चौकसी कंचनसिंह और आनन्दसिंह के खेमे की हिफाजत नाहरसिंह सिपाहियों के साथ कर रहे हैं।
जब आधी रात से ज्यादा जा चुकी, एक आदमी कुँअर इन्द्रजीतसिंह के खेमे के दरवाजे पर आया और कंचनसिंह को सलाम करके पास खड़ा हो गया। यह आदमी लम्बे कद का और मजबूत मालम होता था, सिर पर मुंडासा बाँधे और ऊपर से एक काश्मीरी स्याह चोगा डाले हुए था।
कंचनसिंह––तुम कौन हो और क्यों आये हो?
आदमी––मैं रोहतासगढ़ किले का रहने वाला हूँ और किशोरीजी का सन्देशा लेकर आया हूँ।
कंचनसिंह––क्या सन्देशा है?
आदमी––हुक्म है कि कुमार के सिवाय और किसी से न कहूँ।
कंचनसिंह––कुमार तो इस समय सोये हुए हैं!
आदमी––अगर आप मेरा आना जरूरी समझते हों, तो मुझे खेमे के अन्दर ले चलिए या कुमार को उठाकर खबर कर दीजिये।
कंचनसिंह––(कुछ सोचकर) बेशक ऐसी हालत में कुमार को जगाना ही पड़ेगा। कहो, तुम्हारा नाम क्या है?
आदमी––मैं अपना नाम नहीं बता सकता, मगर कुमार मुझे अच्छी तरह जानते हैं। आप अपने साथ मुझे खेमे के अन्दर ले चलिए। आँख खुलते ही मुझे पहचान लेंगे, आपको कुछ कहने की जरूरत न पड़ेगी!
कंचनसिंह उस आदमी को लेकर खेमे के अन्दर घुसा। आगे-आगे कंचनसिंह और पीछे-पीछे वह आदमी। जब दोनों खेमे के मध्य में पहुँचे तो उस आदमी ने अपने कपड़े के अन्दर से एक भुजाली निकालकर धोखे में पड़े हुए बेचारे कंचनसिंह की गरदन पर पीछे से इस जोर से मारी कि खट से सिर कटकर दूर जा गिरा, बेचारे के मुँह से कोई आवाज तक न निकल पायी। इसके बाद वह भुजाली पोंछकर अपनी कमर में रखी और नींद में मस्त सोये हुए कुँअर इन्द्रजीतसिंह के पास आकर खड़ा हो गया। कमर से एक शीशी निकाली और बहुत सम्हालकर कुमार की नाक से लगाई। इस शीशी में तेज बेहोशी की दवा थी। कुमार के बेहोश हो जाने के बाद उसने अपनी कमर से एक लोई खोली और उसमें उनकी गठरी बाँध दरवाजे पर पर्दे के पास आकर देखने लगा कि आगे की तरफ सन्नाटा है या नहीं।
इस समय पहरे वाले गश्त लगाते हुए खेमे के पीछे की तरफ निकल गये थे। आगे सन्नाटा पाकर उसने कुमार की गठरी उठाई और खेमे के बाहर हो अपने को बचाता हुआ लश्कर से दूर निकल गया। लश्कर से कुछ दूरी पर एक रथ खड़ा था जिसमें दो मजबूत मुश्की रंग के घोड़े जुते हुए थे। कोचवान तैयार बैठा था। गठरी खोलकर कुमार को उसी पर लिटा दिया और खुद भी सवार हो रथ हाँकने का हुक्म दिया।
रथ थोड़ी ही दूर गया था कि सारथी को मालूम हो गया कि पीछे कोई सवार आ रहा है। उसने घबड़ा कर अन्दर बैठे हुए आदमी से कहा कि कोई सवार बराबर रथ के साथ चला आ रहा है।
रथ और तेज किया गया, मगर सवार ने पीछा न छोड़ा। सुबह होते-होते रथ बहुत दूर निकल गया और ऐसी जगह पहुँचा जहाँ सड़क के दोनों तरफ घना जंगल था। तब वह सवार घोड़ा बढ़ाकर रथ के बराबर आया और बोला, "बस, अब रथ रोक लो!"
सारथी––तुम कौन हो जो तुम्हारे कहने से रथ रोका जाय?
सवार––हम तुम्हारे बाप हैं! बस खबरदार, अब रथ आगे न बढ़ने पावे!
इस सवार के हाथ में एक बरछी थी। जब सारथी ने उसकी बात न सुनी तो लाचार उसने बरछी मारी। चोट खाकर सारथी जमीन पर गिर पड़ा। रथ के घोड़े भड़ककर और तेजी के साथ भागे और पहिया सारथी के ऊपर से होकर निकल गया।
सवार ने घोड़े को बरछी मारी। एक घोड़ा जख्मी होकर गिर पड़ा, दूसरा घोड़ा भी रुक गया। वह आदमी जो रथ के अन्दर बैठा हुआ था, कूदकर तलवार खींचकर सवार के सामने आ खड़ा हुआ। बात की बात में सवार ने उसे भी बेजान कर दिया और घोड़े के नीचे उतर पड़ा। यह सवार नकाबपोश था।
बरछी गाड़ कर सवार ने घोड़े को उससे बाँध दिया और बड़ी होशियारी से कुँअर इन्द्रजीतसिंह को रथ से नीचे उतारा। सड़क के दोनों तरफ घना जंगल था। कुमार को उठाकर जंगल में ले गया और एक सलई के पेड़ के नीचे रख लौट आया और अपने घोड़े पर सवार हो फिर उसी जगह पहुँचने के बाद कुमार के पास बैठ उनको होश में लाने की फिक्र करने लगा।
सुबह की ठण्डी हवा लगने पर कुमार होश में आये और घबड़ा कर उठ बैठे। सवार तलवार खींच सामने खड़ा हो गया। कुमार भी सँभल कर खड़े हो गये और बोले––
कुमार––क्या तुम हमें यहाँ लाये हो?
सवार––नहीं, कोई दूसरा ही आपको लिए जाता था, मैंने छुड़ाया है।
कुमार––(चारों तरफ देखकर) जब तुमने मुझे किसी दुश्मन के हाथ से छुड़ाया है तो स्वयं तलवार लेकर सामने क्यों खड़े हो गये?
सवार––आपकी बहादुरी और दिलावरी की बहुत-कुछ तारीफ सुनी है, लड़ने का हौसला रखता हूँ।
ममार––मेरे पास कोई हरबा न होने पर भी लड़ने को तैयार हूँ। वार करो।
सवार––जो आदमी रथ पर सवार करके आपको लिए जाता था, उसकी ढाल-तलवार मैं ले आया हूँ, (हाथ का इशारा करके) वह देखिए, आपकी बगल में मौजूद है, उठा लीजिए और मुकाबला कीजिए। मैं खाली हाथ आपसे लड़ना नहीं चाहता।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह ढाल-तलवार उठा पैतरे के साथ उस नकाबपोश सवार के मुकाबले में खड़े हो गये। थोड़ी देर तक लड़ाई होती रही। कुमार को मालूम हो गया कि यह दुश्मनो के तौर पर नहीं लड़ता। ललकार कर बोले, "तुम लड़ते हो या खिलवाड़ करते हो?"
सवार––कोई दुश्मनी तो आपसे है नहीं!
कुमार––फिर लड़ने को तैयार क्यों हुए?
सवार––इसलिए कि आपके बदन में जरा फुर्ती आये। बहुत देर तक बेहोश पड़े रहने से रगों में सुस्ती आ गयी होगी। अगर आपसे दुश्मनी रहती तो आपको दुश्मन के हाथ से ही क्यों बचाते?
कुमार––तो क्या तुम हमारे दोस्त हो?
सवार––मैं यह भी नहीं कह सकता।
कुमार––जरूर तुम हमारे दोस्त हो अगर दुश्मन के हाथ से हमें बचाया।
सवार––क्या इस बारे में कोई शक है कि मैंने आपकी जान बचायी?
कुमार––जरूर शक है। मैं कैसे विश्वास कर सकता हूँ कि तुम मुझे लाये हो या कोई दूसरा?
सवार––इसके लिए मैं तीन सबूत दूँगा। एक तो, अगर मैं दुश्मन होता तो बेहोशी में आपको मार डालता।
कुमार––बेशक, और दो सबूत कौन से हैं?
सवार––जरा ठहरिये, मैं अभी आता हूँ तो ये दोनों सबूत भी देता हूँ।
इतना कह वह नकाबपोश सवार झट अपने घोड़े पर सवार हुआ और वहाँ पहुँचा जहाँ वह रथ था, जिस पर कुमार लाये गये थे। एक घोड़ा मरा हुआ पड़ा था, दूसरा बागडोर से बँधा अलग खड़ा था। उस ऐयार की लाश भी उसी जगह पड़ी हुई थी जो कुमार को बेहोश करके उठा लाया था। पीछे की तरफ थोड़ी दूर पर सारथी की लाश थी।
वह नकाबपोश सवार अपने घोड़े से उतर पड़ा और जोर लगाकर किसी तरह उस रथ को उलट दिया जो अभी तक खड़ा था। फिर सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए? उसकी निगाह सारथी की लाश पर पड़ी, वहाँ गया और उस लाश को घसीट लाकर रथ के पास रख दिया और कुछ सोचकर धीरे से बोला, "अब कुमार नहीं समझ सकते कि उनका लश्कर किधर है और वे किस तरफ से लाये गये, उन्हें धोखे में डालकर अपनी और उनकी किस्मत का अन्दाजा लेना चाहिए।" इसके बाद वह सवार फिर अपने घोड़े पर चढ़ा और वहाँ पहुँचा जहाँ कुमार उसकी राह देख रहे थे।
कुमार––तुम कहाँ गये थे?
सवार––एक आदमी की खोज में गया था, मगर वह नहीं मिला।
कुमा––खैर, तुम अपनी सच्चाई के लिए और सबूत देने वाले थे!
सवार घोड़े पर से उतर पड़ा और कुमार से बोला, "आप घोड़े पर सवार हो लीजिए और मेरे साथ चलिए।" मगर कुमार ने मंजूर न किया। सवार ने भी घोड़े की लगाम थामी और पैदल कुमार को लिए हुए उस रथ के पास पहुँचा और सब हाल कहकर बोला, "देखिये, इसी रथ पर आप लाये गये, यही बदमाश आपको लाया है, और यह दूसरा सारथी है। मैं इत्तिफाक से आपके पास मिलने के लिए जा रहा था जो आपके काम आया। अब उस रथ का एक घोड़ा जो बचा हुआ है, उसी पर आप सवार होकर लश्कर में चले जाइये!"
कुमार––बेशक तुमने मेरी जान बचाई, इसका अहसान कभी न भूलूँगा।
सवार––क्या इसका अहसान आप मानते हैं?
कुमार––जरूर।
सवार––तो आप कुछ देकर इस अहसान का बोझ अपने ऊपर से उतार दीजिये।
कुमार––बड़ी खुशी के साथ मैं ऐसा करने को तैयार हूँ, जो कहो दूँ।
सवार––इस समय तो मैं आपसे कुछ नहीं ले सकता। मगर आप वादा करें तो जरूरत पड़ने पर आपसे कुछ माँगू और मदद लूँ!
कुमार––मैं वादा करता हूँ कि जो कुछ माँगोगे दूँगा, जब चाहे ले लो।
सवार––देखिए, फिर बदल न जाइएगा।
कुमार––कभी नहीं, यह क्षत्रियों का धर्म नहीं।
सवार––अच्छा, अब एक सबूत और देता हूँ कि बिना आपको किसी तरह का कष्ट दिये अपने घर चला जाता हूँ।
कुमार––तुम अपने चेहरे पर से नकाब तो हटाओ, जिसमें तुमको पहचान रखूँ।
सवार––यह बात भी जरूरी है।
इतना कहकर सवार ने अपने चेहरे पर से नकाब उलट दी और कुमार को हैरत में डाल दिया, क्योंकि वह एक हसीन और नौजवान औरत थी।
बेशक सिवाय किशोरी के ऐसी हसीन औरत कुमार ने कभी नहीं देखी थी। उसने अपनी तिरछी चितवन से कुमार के दिल का शिकार कर लिया और उनकी बँधी हुई टकटकी की तरफ कुछ खयाल न कर, उन्हें उसी तरह छोड़, सड़क से नीचे उतर, जंगल का रास्ता लिया।
उसके चले जाने के बाद थोड़ी देर तक तो कुमार उसी तरफ देखते रहे, जिधर वह घोड़े पर सवार हो गयी थी। इसके बाद रथ और सड़क की तरफ देखा, फिर उस घोड़े के पास गये जो रथ के दोनों घोड़ों में से जीता मौजूद था। उसकी पीठ पर जो कुछ असबाब था खोल दिया, सिर्फ लगाम रहने दी और नंगी पीठ पर सवार हो उसी तरफ का रास्ता लिया, जिधर वह नकाबपोश औरत उनके देखते-देखते चली गयी थी।
भूखे-प्यासे दोपहर तक घोड़ा दौड़ाते चले गये, मगर उस औरत का पता न लगा कि किधर गयी और क्या हुई। भूख और प्यास से परेशान हो गये और इस फिक्र में पड़े कि कहीं ठण्डा पानी मिले तो प्यास बुझावें। मगर इस जंगल में कहीं किसी सोते या झरने का पता न लगा। लाचार वह आगे बढ़ते ही गये और शाम होते तक एक ऐसे में पहुँचे, जिसके चारों तरफ तो घना जंगल था मगर बीच में सुन्दर साफ जल से लहराता हुआ एक अनूठा तालाब था।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह उस विचित्र तालाब को देख बड़े ही विस्मित हुए और एक-टक उसकी तरफ देखने लगे। इस तालाब के बीचोंबीच एक खूबसूरत छोटा-सा मकान बना हुआ था जिसके चारों तरफ सहन था और चारों कानों में चार औरतें तीर-कमान चढ़ाये मुस्तैद थीं। मालूम होता था कि ये अभी तीर छोड़ना ही चाहती हैं। मकान की छत पर एक छोटे से चबूतरे पर भी एक औरत दिखाई पड़ी, जिसका सिर नीचे और पैर आसमान की तरफ थे। बड़ी देर तक देखने के बाद मालूम हुआ कि ये औरतें जानदार नहीं हैं बल्कि बनावटी हैं, जिन्हें पुतली कहना मुनासिब है। एक छोटी-सी डोंगी भी उसी चबूतरे के साथ रस्सी के सहारे बँधी हुई थी, जिससे मालूम होता था कि इस मकान में जरूर कोई रहता है जिसके आने-जाने के लिए यह डोंगी मौजूद है।
कुमार घोड़े की लगाम एक पत्थर से अटका कर तालाब के नीचे उतरे। हाथ-मुँह धोकर जल पिया और कुछ सुस्ताने के बाद फिर उसी मकान की तरफ देखने लगे, क्योंकि कुमार का इरादा हुआ कि तैर कर उस मकान तक जायें और देखें कि उसमें क्या है।
सूर्य अस्त होते-होते एक औरत उस मकान के अन्दर से निकली और सहन पर खड़ी हो कुमार की तरफ देखने लगी। इसके बाद हाथ के इशारे से कहा कि यहाँ से चले जाओ। कुमार ने उस औरत को साफ पहचान लिया कि यह वही नकाबपोश सवार है जिसने कुमार को रथ पर ले जाते हुए ऐयार के हाथ से बचाया था।
१०
कुछ रात जा चुकी है। रोहतासगढ़ किले के अन्दर अपने मकान में बैठी हुई बेचारी किशोरी न मालूम किस ध्यान में डूबी हुई है और क्या सोच रही है। कोई दूसरी औरत उसके पास नहीं है। आखिर किसी के पैर की आहट पा अपने खयाल में डूबी हुई किशोरी ने सिर उठाया और दरवाजे की तरफ देखने लगी। लाली ने पहुँचकर सलाम किया और कहा, "माफ कीजिएगा, मैं बिना हुक्म के इस कमरे में आयी हूँ।"
किशोरी––मैंने लौंडियों को हुक्म दे रखा है कि इस कमरे में कोई न आने पावे, मगर साथ ही इसके यह भी कह दिया था कि लाली आने का इरादा करे तो उसे मत रोकना।
लाली––बेशक आपने मेरे ऊपर बड़ी मेहरबानी की।
किशोरी––मगर न मालूम, तुम मेरे ऊपर दया क्यों नहीं करतों! आओ बैठो।
लाली––(बैठ कर) आप ऐसा न कहें। मैं जी-जान से आपके काम आने को तैयार हूँ
किशोर––ये सब बनावटी बातें करती हो। अगर ऐसा ही होता तो अपना और कुन्दन वाला भेद मुझसे क्यों छिपाती? नारंगी वाले भेद से तो मैं पहले ही हैरान हो रही थी, मगर जब से कुन्दन ने अपनी बातों का असर तुम पर डाला है, तब से मेरी घबराहट और भी बढ़ गई है।
लाली––बेशक आपको बहुत-कुछ ताज्जुब हुआ होगा। मैं कसम खा कर कह सकती हूँ कि कुन्दन ने उस समय जो मुझे कहा था या कुन्दन की जिन बातों को सुन कर मैं डर गई थी, वह उसे पहले से मालूम न थीं। अगर मालूम होती तो जिस समय मैंने नारंगी दिखाकर उसे धमकाया था, उसी समय वह मुझसे बदला ले लेती। अब मुझे विश्वास हो गया कि इस मकान में कोई बाहर का आदमी जरूर आया है जिसने हमारे भेद से कुन्दन को होशियार कर दिया। अफसोस, अब मेरी जान मुफ्त में जाया चाहती है क्योंकि कुन्दन बड़ी ही बेरहम और बदकार औरत है।
किशोरी––तुम्हारी बातें मेरी घबराहट को और बढ़ा रही हैं। कृपा करके कुछ कहो तो सही, क्या भेद है?
लाली––मैं सारा हाल आपसे कहूँगी। और आपकी चिन्ता दूर करूँगी, मगर आज रात भर आप मुझे और माफ कीजिये और इस समय एक काम में मेरी मदद कीजिए।
किशोरी––वह क्या?
लाली––यह तो मुझे विश्वास हो ही गया कि अब मेरी जान किसी तरह नहीं बच सकती, तो भी अपने बचने के लिए मैं कोई न कोई उद्योग जरूर करूँगी। मैं चाहती हूँ कि अपने मरने के पहले ही कुन्दन को इस दुनिया से उठा दूं, मगर एक ऐसी अंडस में पड़ गई हूँ कि ऐसा करने का इरादा भी नहीं कर सकती, हाँ, कुन्दन का कुछ विशेष हाल जानना चाहती हूँ और इसके बाद बाग के उस कोने वाले मकान में घुसा चाहती हूँ जिसमें हरदम ताला बन्द रहता है और दरवाजे पर नंगी तलवार लिये दो औरतें बारी-बारी से पहरा दिया करती हैं। इन्हीं दोनों कामों में मैं आपसे मदद लिया चाहती हूँ।
किशोरी––उस मकान में क्या है, तुम्हें कुछ मालूम है?
लायी––हाँ, कुछ मालूम है और बाकी भेद जानना चाहती हूँ। मुझे विश्वास है कि अगर आप भी मेरे साथ उस मकान के अन्दर चलेंगी और हम दोनों आदमी किसी तरह बच कर निकल आवेंगे, तो फिर आपको भी इस कैद से छुट्टी मिल जायेबी। मगर उसके अन्दर जाना और बच कर निकल आना यही मुश्किल है।
किशोरी––यह और ताज्जुब की बात तुमने कही। खैर, ऐसी जिन्दगी से मैं मरना उत्तम समझती हूँ। जो कुछ तुम्हें करना हो, करो और जिस तरह की मदद मुझसे लिया चाहती हो, लो।
लाली––(एक छोटी-सी तस्वीर कमर से निकाल और किशोरी के हाथ में देकर) थोड़ी देर बाद मामूली तौर पर कुन्दन जरूर आपके पास आवेगी, उस समय यह तस्वीर ऐसे ढंग से उसे दिखाइए जिसमें उसे यह न मालूम हो कि आप जान-बूझ कर दिखा रही हैं। फिर उसके चेहरे की जैसी रंगत हो या जो कुछ वह कहे मुझसे कहिए। इस समय तो यही एक काम है।
किशोरी––यह काम मैं बखूबी कर सकूँगी।
किशोरी ने लाली के हाथ से तस्वीर लेकर पहले खुद देखी। इस तस्वीर में एक खोह की हालत दिखाई गई थी, जिसमें एक आदमी उलटा लटक रहा था और एक औरत हाथ में छुरा लिए उसके बदन में घाव लगा रही थी, एक कमसिन औरत खड़ी थी और कोने की तरफ कब्र खोदी जा रही थी।
पाठक, यह तस्वीर ठीक उस समय की थी, जिसका हाल हम पहले भाग के आठवें बयान में लिख आये हैं। मगर वह हाल किशोरी को अभी तक मालूम नहीं हुआ था। किशोरी उस तस्वीर को देख कर बहुत ही हैरान हुई और उसके बारे में लाली से कुछ पूछना भी चाहा, मगर लाली तस्वीर देने के बाद वहाँ न ठहरी, तुरत बाहर चली गई।
लाली के जाने के थोड़ी ही देर बाद कुन्दन आ पहुँची। मगर उस समय किशोरी उस तस्वीर के देखने में अपने को यहाँ तक भूली हुई थी कि कुन्दन का आना उसे तब मालूम हुआ जब उसने पास आकर कुछ देर तक खड़े रहकर पूछा, "कहो बहिन, क्या देख रही हो?"
किशोरी––(चौंककर) है! तुम यहाँ कब से खड़ी हो?
कुन्दन––कुछ देर से। इस तस्वीर में कौन सी ऐसी बात है जिसे तुम बड़े गौर से देख रही हो?
किशोरी––तुमने इस तस्वीर को देखा है?
कुन्दर––सैकड़ों दफे। मैं समझती हूँ कि यह तस्वीर तुम्हें लाली ने खास मुझे दिखाने के लिए दी है। आप लाली से कह दीजिएगा कि मैं इस तस्वीर को देख कर नहीं डर सकती। मैं बिना बदला लिए कभी न छोड़ेंगी क्योंकि जिस दिन पहले-पहले रात को आपसे मुलाकात हुई थी, उस दिन यहाँ से मेरे निकल जाने का सामान बिल्कुल ठीक था। इसी लाली ने मेरे उद्योग को मिट्टी कर दिया और मेरे मददगारों को भी फँसा दिया। खैर, देखा जायगा। मैं आपके मिलने से प्रसन्न थी मगर अफसोस, उसने झूठी बात गढ़ कर आपका दिल भी मेरी तरफ से फेर दिया। तो भी मैं आपके साथ बुराई न करूँगी और जहाँ तक हो सकेगा, उसकी चालबाजियों से आपको होशियार कर दूँगी, मानने न मानने का आपको अख्तियार है।
किशोरी-मेरी समझ में कुछ नहीं आता कि क्या हो रहा है। हे ईश्वर, मैंने क्या अपराध किया था कि मुझे चारों तरफ से संकटों ने आकर घेर लिया? हाय, मैं बिल्कुल नहीं जान सकती कि यहाँ कौन मेरा दोस्त है और कौन दुश्मन?
इतना कह किशोरी रोने लगी। उसने अपने को बहुत सँभालना चाहा मगर न हो सका। हिचकियों ने उसका गला दबा दिया। कुन्दन किशोरी के पास बैठ गई और उसका हाथ अपने दोनों हाथों में दबा कर बोली-
"प्यारी किशोरी, यह समझना तो बहुत मुश्किल है कि यहाँ आपका दोस्त कौन है। बात बना कर दोस्ती साबित करना भूल है तिसमें दुश्मन के घर में, हाँ, यह मैं जरूर साबित कर दूँगी कि लाली आपसे दुश्मनी रखती है। लाली ने आपसे जरूर कहा होगा कि आपकी तरह मैं भी कुमार के साथ ब्याह करने के लिए लाई गई हैं। मगर नहीं, यह बात बिल्कुल झूठ हैं। सचाई तो यह है कि लाली मुझको बिल्कुल नहीं जानती और न मैं जानती हूँ कि लाली कौन है। मगर आज-कल लाली जिस फिक्र में पड़ी है, उससे मैं समझती हूँ कि वह आपके साथ दुश्मनी कर रही है। ताज्जुब नहीं कि वह आपको एक दिन उस मकान में ले जाय, जिसका ताला बराबर बन्द रहता है और जिसके दरवाजे पर नंगी तलवार का पहरा पड़ा करता है क्योंकि आज कल वह वहाँ पहरा देने वाली औरतों से दोस्ती बढ़ा रही है और ताला खोलने के लिए एक ताली तैयार कर रही है। उसकी दुश्मनी का अन्त उसी दिन होगा जिस दिन वह आपको उस मकान के अन्दर कर देगी, फिर आपकी जान किसी तरह नहीं बच सकती। उसका ऐसा करना केवल आपही के साथ दुश्मनी करना नहीं, बल्कि यहाँ के राजा और इस राज्य के साथ भी दुश्मनी करना है। बेशक वह आपको उस मकान के अन्दर भेजेगी और आप उस चौखट के अन्दर पैर भी न रक्खेंगी।
किशोरी—उस मकान के अन्दर क्या है?
कुन्दन–सो तो मैं नहीं जानती।
किशोरी–यहाँ का कोई आदमी जानता है?
कुन्दन-कोई नहीं, बल्कि जहाँ तक मैं खयाल करती हूँ, यहाँ का राजा भी उसके अन्दर का हाल नहीं जानता।
किशोरी—क्या मकान कभी खोला नहीं जाता?
कुन्दन-मेरे सामने तो कभी खोला नहीं गया।
किशोरी—फिर कैसे कह सकती हो कि उसके अन्दर जाकर कोई बच नहीं सकता?
कुन्दन-इसका जानना तो कोई मुश्किल नहीं है। पहले तो यही सोचिए कि वहाँ हरदम ताला बन्द रहता है। अगर कोई चोरी से भीतर गया भी तो निकलने का मौका मुश्किल से मिलेगा। फिर हम लोगों को उसके अन्दर जाकर फायदा ही क्या होगा? आपने देखा होगा, उस दरवाजे के ऊपर लिखा है कि-'इसके अन्दर जो जायगा उसका सिर आपसे आप कट कर गिर पड़ेगा!' जो हो, मगर यह सब होते हुए भी लाली आपको उस मकान के अन्दर जरूर भेजना चाहेगी।
किशोरी––खैर, इस तस्वीर का हाल अगर तुम जानती हो, तो कहो।
कुन्दन––कहती हूँ, सुनो––जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह को धोखा देकर माधवी ले गई तो उनके छोटे भाई आनन्दसिंह उनकी खोज में निकले। एक मुसलमानी ने उन्हें धोखा देकर गिरफ्तार कर लिया और अपने साथ शादी करनी चाही, मगर उन्होंने मंजूर न किया और तीन दिन भूखे-प्यासे उसके यहाँ कैद रह गये। आखिर उन्हीं के ऐयार देवीसिंह ने उस कैद से उनको छुड़ाया, मगर उन्हें अभी तक मालूम नहीं है कि उन्हें देवीसिंह ने छुड़ाया था।
इसके बाद उस तस्वीर के बारे में जो कुछ आनन्दसिंह ने देखा-सुना था, कुन्दन ने वहाँ तक कह सुनाया, जब आनन्दसिंह बेहोश करके उस खोह के बाहर निकाल दिये गये, बल्कि घर पहुँचा दिये गये।
किशोरी––यह सब हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ?
कुन्दन––मुझसे देवीसिंह ने कहा था।
किशोरी––देवोसिंह से तुमसे क्या सम्लन्ध?
कुन्दन––जान-पहचान है। आपने इस तस्वीर के बारे में लाली से कुछ सुना है या नहीं?
किशोरी––कुछ नहीं।
कुन्दन––पूछिये, देखें, क्या कहती है। अच्छा, अब मैं जाती हूँ, फिर मिलूंगी।
किशोरी––जरा ठहरो तो!
कुन्दन––अब मत रोको, बेमौका हो जायगा। मैं फिर बहुत जल्द मिलूनंगी। कुन्दन चली गई, मगर किशोरी पहले से भी ज्यादा सोच में पड़ गई। कभी तो उसका दिल लाली की तरफ झुकता और उसको अपने दुःख का साथी समझती, कभी सोचते-सोचते लाली की बातों में शक पड़ जाने पर कुन्दन ही को सच्ची समझती। उसका दिल दोनों तरफ के खिंचाव में पड़कर बेबस हो रहा था। वह ठीक निश्चय नहीं कर सकती थी कि अपना हमदर्द लाली को बनावे या कुन्दन को, क्योंकि लाली और कुन्दन दोनों ही अपने असली भेदों को किशोरी से छिपा रही थीं।
उस दिन लाली ने फिर मिल कर किशोरी से पूछा, "उस तस्वीर को देख कर कुन्दन की क्या दशा हुई?" जिसके जवाब में किशोरी ने कहा, "कुन्दन ने उस तस्वीर की तरफ ध्यान भी न दिया और मेरे खुद पूछने पर कहा कि मैं नहीं जानती, यह तस्वीर कैसी है और न इसे कभी मैंने पहले देखा ही था।"
यह सुन कर लाली का चेहरा कुछ उदास हो गया और वह किशोरी के पास से उठ कर चली गई। किशोरी ने कहा, "भला तुम ही बताती जाओ कि यह तस्वीर कैसी है?" मगर लाली ने इसका कुछ जवाब न दिया और चली गई।
इस बात को कई दिन बीत गये। लश्कर से कुँअर इन्द्रजीत के गायब होने का हाल भी चारों तरफ फैल गया, जिसे सुन धीरे-धीरे किशोरी की उदासी और भी ज्यादा बढ़ गई।
एक दिन रात को अपनी पलंगड़ी पर लेटी हुई किशोरी तरह-तरह की बातें सोच रही थी, लाली और कुन्दन के बारे में भी गौर कर रही थी। यकायक वह उठ बैठी और धीरे से आप-ही-आप बोली, "अब मुझे खुद कुछ करना चाहिए, इस तरह पड़े रहने से काम नहीं चलता। मगर अफसोस, मेरे पास कोई हरबा भी तो नहीं है।"
किशोरी पलंग के नीचे उतरी और कमरे में इधर-उधर टहलने लगी, आखिर कमरे के बाहर निकली।। देखा कि पहरेदार लौंडियाँ खूब गहरी नींद में सो रही हैं। रात आधी से ज्यादा जा चुकी थी, चारों तरफ अँधेरा छाया हुआ था। धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई कुन्दन के मकान की तरफ बढ़ी। जब पास पहुँची तो देखा कि एक आदमी काले कपड़े पहने उसी तरफ लपका हुआ जा रहा है, बल्कि उस कमरे के दालान में पहुँच गया जिसमें कुन्दन रहती है। किशोरी एक पेड़ की आड़ में खड़ी हो गई, शायद इसलिए कि वह आदमी लौट कर चला जाय तो आगे बढ़ूँ।
थोड़ी देर बाद कुन्दन भी उसी आदमी के साथ बाहर निकली और धीरे-धीरे बाग के उस तरफ रवाना हुई, जिधर घने दरख्त लगे हुए थे। जब दोनों उस पेड़ के पास पहुंचे जिसकी आड़ में किशोरी छिपी हुई थी, तब वह आदमी रुका और धीरे से बोला-
आदमी-अब तुम जाओ, ज्यादा दूर तक पहुँचाने की कोई जरूरत नहीं।
कुन्दन-फिर भी मैं कहे देती हूँ कि अब पाँच-सात दिन तक 'नारंगी' की कोई जरूरत नहीं।
आदमी-खैर, मगर किशोरी पर दया बनाये रहना!
कुन्दन-इसके कहने की कोई जरूरत नहीं।
वह आदमी पेड़ों के झुण्ड की तरफ चला गया और कुन्दन लौट कर अपने कमरे में चली गई। किशोरी भी फिर वहाँ न ठहरी और अपने कमरे में आकर पलंग पर लेट रही, क्योंकि उन दोनों की बातों ने, जिन्हें किशोरी ने अच्छी तरह सुना था, उसे परेशान कर दिया और वह तरह-तरह की बातें सोचने लगी। मगर अपने दिल का हाल किससे कहे? इस लायक वहां कोई भी न था।
पहले तो किशोरी बनिस्बत कुन्दन के लाली को सच्ची और नेक समझती थी, मगर अब वह बात न रही। किशोरी उस आदमी के मुंह से निकली हुई उस बात को फिर याद करने लगी कि "किशोरी पर दया बनाये रहना।"
वह आदमी कौन था? इस बाग में आना और यहाँ से निकल कर जाना तो बड़ा ही मुश्किल है, फिर वह क्यों कर आया! उस आदमी की आवाज पहचानी हुई सी मालूम होती है। बेशक मैं उससे कई दफे बातें कर चुकी हूं मगर कब और कहाँ सो याद नहीं पड़ता और न उसकी सूरत का ध्यान बंधता है। कुन्दन ने कहा था, "पाँच-सात दिन तक नारंगी की कोई जरूरत नहीं।" इससे मालूम होता है कि नारंगी वाली बात कुछ उस आदमी से सम्बन्ध रखती है और लाली उस भेद को जानती है। इस समय तो यह निश्चय हो गया कि कुन्दन मेरी खैरख्वाह है और लाली मुझसे दुश्मनी किया चाहती है। मगर इसका भी विश्वास नहीं होता। कुछ भेद खुला मगर इससे तो और भी उलझन हो गई। खैर, कोशिश करूँगी तो कुछ औ भी पता लगेगा, मगर अबकी लाली का हाल मालूम करना चाहिए।
थोड़ी देर तक इन सब बातों को किशोरी सोचती रही, आखिर फिर अपने पलंग से उठी और कमरे के बाहर आई। उसकी हिफाजत करने वाली लौंडियाँ उसी तरह गहरी नींद में सो रही थीं। जरा रुककर वह बाग के उस कोने की तरफ बढ़ी जिधर लाली का मकान था। पेड़ों की आड़ में अपने को छिपाती और रुक-रुक कर चारों तरफ की आहट लेती हुई चली जाती थी। जब लाली के मकान के पास पहुँची तो धीरे-धीरे किसी की बातचीत की आहट पाकर एक अंगूर की झाड़ी में रुक रही और कान लगा कर सुनने लगी, केवल इतना ही सुना, "आप बेफिक्र रहिए, जब तक मैं जीती हूँ, कुन्दन किशोरी का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती और न ही उसे कोई दूसरा ले जा सकता है। किशोरी इन्द्रजीतसिंह की है और बेशक उन तक पहुँचाई जायगी।"
किशोरी ने पहचान लिया कि यह लाली की आवाज है! लाली ने यह बात बहुत धीरे से कही थी, मगर किशोरी बहुत पास पहुंच चुकी थी, इसलिए बखूबी सुनकर पहचान सकी कि लाली की आवाज है, मगर यह न मालूम हुआ कि दूसरा आदमी कौन है। लाली अपने कमरे के पास ही थी, बात कहकर तुरन्त दो-चार सीढ़ियाँ चढ़ अपने कमरे में घुस गई और उसी जगह से एक आदमी निकल कर पेड़ों की आड़ में छिपता हआ बाग की पिछली तरफ, जिधर दरवाजे में बराबर ताला बन्द रहने वाला मकान था, चला गया, मगर उसी समय जोर-जोर से 'चोर-चोर' की आवाज आई। किशोरी ने इस आवाज को भी पहचान कर मालूम कर लिया कि कुन्दन है जो उस आदमी को फंसाया चाहती है। किशोरी फौरन लपकती हुई अपने कमरे में चली आई और 'चोर-चोर' की आवाज वढ़ती ही गई।
किशोरी अपने कमरे में आकर पलंग पर लेट रही और उन बातों पर गौर करने लगी जो अभी दो-तीन घण्टे के हेर-फेर में देख-सुन चुकी थी। वह मन-ही-मन कहने लगी, "कुन्दन की तरफ भी गई और लाली की तरफ भी गई, जिससे मालूम हो गया कि वे दोनों ही एक-एक आदमी से जान-पहचान रखती हैं जो बहुत छिपकर इस मकान में आता है। कुन्दन के साथ जो आदमी मिलने आया था, उसकी जबानी जो कुछ मैंने सुना, उससे जाना जाता था कि कुन्दन मुझसे दुश्मनी नहीं रखती, बल्कि मेहरबानी का बर्ताव किया चाहती है। इसके बाद जब लाली की तरफ गई तो वहाँ की बातचीत से मालूम हुआ कि लाली सच्चे दिल से मेरी मददगार है और कुन्दन शायद दुश्मनी की निगाह से मुझे देखती है। हाँ ठीक है, अब समझी, बेशक ऐसा ही होगा। नहीं-नहीं, मुझे कुन्दन की बातों पर विश्वास न करना चाहिए! अच्छा, देखा जायेगा। कुन्दन ने बेमौके चोर-चोर का शोर मचाया, कहीं ऐसा न हो कि बेचारी लाली पर कोई आफत आवे।"
इन्हीं सब बातों को सोचती हुई किशोरी ने बची हुई थोड़ी-सी रात जाग कर है। बिता दी और सुबह की सफेदी फैलने के साथ ही अपने कमरे के बाहर निकली क्योंकि रात की बातों का पता लगाने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा था।
किशोरी जैसे ही दालान में पहुँची, सामने से कुन्दन को आते हुए देखा। कुन्दन ने पास आकर सलाम किया और कहा, "रात का कुछ हाल मालूम है या नहीं?"
किशोरी-सब-कुछ मालूम है! तुम्हीं ने तो शोर मचाया था!
कुन्दन-(ताज्जुब से) यह कैसी बात कहती हो? किशोरी—तुम्हारी आवाज साफ मालूम होती थी।
कुन्दन-मैं तो चोर-चोर का शोर सुनकर वहाँ पहुँची थी और उन्हीं की तरह खुद भी चिल्लाने लगी थी।
किशोरी—(हँसकर) शायद ऐसा ही हो।
कुन्दन-क्या इसमें आपको कोई शक है?
किशोरी–बेशक। लो, यह लाली भी तो आ रही है।
कुन्दन–(कुछ घबरा कर) जो कुछ किया, उन्होंने किया।
इतने में लाली भी आकर खड़ी हो गई और कुन्दन की तरफ देखकर बोली, 'आपका वार तो खाली गया।"
कुन्दन-(घबरा कर) मैंने क्या...
लाली–बस, रहने दीजिये, आपने मेरी कार्रवाई कम देखी होगी, मगर दो घंटे पहले मैं आपकी पूरी कार्रवाई मालूम कर चुकी थी।
कुन्दन-(बदहवास होकर) आप तो कसम खा...
लाली-हाँ-हाँ, मुझे खूब याद है, मैं उसे नहीं भूलती।
किशोरी–जो हो, मुझे अब पाँच-सात दिन तक नारंगी की कोई जरूरत नहीं।
किशोरी की इस बात ने लाली और कुन्दन दोनों को चौंका दिया। लाली के चेहरे पर कुछ हँसी थी, मगर कुन्दन के चेहरे का रंग बिल्कुल ही उड़ गया था, क्योंकि उसे विश्वास हो गया कि किशोरी ने भी रात की कुल बातें सुन लीं। कुन्दन की घबराहट और परेशानी यहाँ तक बढ़ गई कि किसी तरह अपने को सम्हाल न सकी और बिना कुछ कहे वहाँ से उठ कर अपने कमरे की तरफ चली गई। अब लाली और किशोरी में बातचीत होने लगी-
लाली-मालूम होता है, तुमने भी रात भर ऐयारी की!
किशोरी–हाँ, मैं कुन्दन की तरफ छिप कर गई थी।
लाली–तब तो तुम्हें मालूम हो गया होगा कि कुन्दन तुम्हें धोखा दिया चाहती है।
किशोरी—पहले तो यह साफ नहीं जान पड़ता था, मगर जब तुम्हारी तरफ गई और तुमको किसी से बातें करते सुना तो विश्वास हो गया कि इस महल में केवल तुम्हीं से मैं कुछ भलाई की उम्मीद कर सकती हूँ।
लाली–ठीक है, कुन्दन की कुल बातें तुमने नहीं सुनीं, क्या मुझसे भी...(रुक कर) खैर, जाने दीजिए। हाँ, अब वह समय आ गया कि तुम और हम दोनों यहाँ से निकल जायें। क्या तुम मुझ पर विश्वास रखती हो?
किशोरी–बेशक, तुमसे मुझे नेकी की उम्मीद है, मगर कुन्दन बहुत बिगड़ी हुई मालूम होती है।
लाली-वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
किशोरी-अगर तुम्हारा हाल किसी से कह दे तो?
लाली-अपनी जबान से वह नहीं कह सकती, क्योंकि वह मेरे पंजे में उतनी ही फँसी हुई है जितनी मैं उसके पंजे में।
किशोरी–अफसोस! इतनी मेहरबान रहने पर भी तुम वह भेद मुझसे नहीं कहती!
लाली–घबराओ मत! धीरे-धीरे सब-कुछ मालूम हो जायेगा।
इसके बाद लाली ने दबी जबान से किशोरी को कुछ समझाया और दो घण्टे में फिर मिलने का वादा करके वहाँ से चली गई।
११
हम ऊपर कई दफे लिख आये हैं कि उस बाग में, जिसमें किशोरी रहती थी, एक तरफ एक ऐसी इमारत है जिसके दरवाजे पर बराबर ताला बन्द रहता है और नंगी तलवार का पहरा पड़ा करता है।
आधी रात का समय है। चारों तरफ अँधेरा छाया हुआ है। तेज हवा चलने के कारण बडे-बड़े पेड़ों के पत्ते खड़खड़ा कर सन्नाटे को तोड़ रहे हैं। इसी समय हाथ में कमन्द लिए हए लाली अपने को हर तरफ से बचाती और चारों तरफ गौर से देखती हए उसी मकान के पिछवाड़े की तरफ जा रही है। वह दीवार के पास पहुँची और कमन्द लगाकर छत के ऊपर चढ़ गई। छत के ऊपर चारों तरफ तीन-तीन हाथ ऊँची दीवार थी। लाली ने बड़ी होशियारी से छत फोड़ कर एक इतना बड़ा सूराख किया जिसमें से आदमी बखूबी नीचे उतर जा सके और खुद कमन्द के सहारे उसके अन्दर उतर गई।
दो घण्टे के बाद एक छोटी-सी सन्दूकड़ी लिए हुए लाली निकली और कमन्द के सहारे छत के नीचे उतर एक तरफ को रवाना हुई। पूरब तरफ वाली बारहदरी में आई, जहाँ से महल में जाने का रास्ता था, फाटक के अन्दर घुसकर महल में पहुँची। यह महल वहत बड़ा और आलीशान था, दो सौ लौंडियों और सखियों के साथ महारानी साहिवा इसी में रहा करती थीं। कई दालानों और दरवाजों को पार करती हुई लाली ने एक कोठरी के दरवाजे पर पहुँच कर धीरे से कुण्डा खटखटाया।
एक बुढ़िया ने उठकर किवाड़ खोला और लाली को अन्दर करके फिर बन्द कर लिया। उस बुढ़िया की उम्र लगभग अस्सी वर्ष के होगी, नेकी और रहमदिली उसके चेहरे पर झलक रही थी। सिर्फ छोटी-सी कोठरी, थोड़े में जरूरी सामान और मामूली चारपाई पर ध्यान देने से मालूम होता था कि बुढ़िया लाचारी में अपनी जिन्दगी बिता रही है। लाली ने दोनों पैर छूकर प्रणाम किया और उम बढ़िया ने पीठ पर हाथ फेर कर बैठने के लिए कहा।
लाली-(सन्दूक आगे रखकर) यही है?
बुढ़िया-क्या ले आई? हाँ ठीक है, बेशक यही है। अब आगे जो कुछ करना, बहुत सम्हाल कर! ऐसा न हो कि इस आखिरी समय में मुझे कलंक लगे।
लाली–जहाँ तक हो सकेगा बड़ी होशियारी से काम करूँगी। आप आशीर्वाद दीजिए कि मेरा उद्योग सफल हो।
बुढ़िया-ईश्वर तुझे इस नेकी बदला दे। वहाँ कुछ डर तो नहीं मालूम हुआ?
लाली-दिल कड़ा करके इसे ले आई, नहीं तो मैंने जो कुछ देखा, जीते-जी भूलने योग्य नहीं। अभी तो फिर एक दफे देखना नसीब होगा। ओफ, अभी तक कलेजा काँपता है।
बुढ़िया-(मुस्कुरा कर) बेशक वहाँ ताज्जुब के सामान इकट्ठे हैं, मगर डरने की कोई बात नहीं जा। ईश्वर तेरी मदद करेगा।
लाली ने उस सन्दूकड़ी को उठा लिया और अपने खास घर में आ सन्दूकड़ी को हिफाजत से रख पलंग पर जा लेटी। सवेरे उठकर किशोरी के कमरे में गई।
किशोरी-मुझे रात-भर तुम्हारा खयाल बना रहा और घड़ी-घड़ी उठकर बाहर जाती थी कि कहीं से शोरगुल की आवाज तो नहीं आती।
लाली-ईश्वर की दया से मेरे काम में किसी तरह का विघ्न नहीं पड़ा।
किशोरी-आओ, मेरे पास बैठो! अब तो तुम्हें उम्मीद हो गई होगी कि मेरी जान बच जायेगी और मैं यहाँ से जा सकूँगी।
लाली-बेशक, अब मुझे पूरी उम्मीद हो गई।
किशोरी–सन्दूकड़ी मिली?
लाली-हाँ, यह सोचकर कि दिन को किसी तरह भी मौका न मिलेगा, उसी समय उसे मैं बूढ़ी दादी को भी दिखा आई। उन्होंने पहचान कर कहा कि बेशक यही सन्दकड़ी है। उसी रंग की वहाँ कई सन्दूकड़ियाँ थी, मगर वह खास निशान जो बूढ़ी दादी ने बताया था, देखकर मैं उसी एक को ले आई!
किशोरी-मैं भी उस सन्दूकड़ी को देखा चाहती हूँ।
लाली–बेशक मैं तुम्हें अपने यहाँ ले चल कर वह सन्दूकड़ी दिखा सकती हूँ मगर उसके देखने से तुम्हें किसी तरह का फायदा नहीं होगा। बल्कि तुम्हारे वहाँ चलने से कन्दन को खटका हो जायेगा और वह सोचेगी कि किशोरी लाली के यहाँ क्यों गई। उस सन्दूकड़ी में भी कोई ऐसी बात नहीं है जो देखने लायक हो। उसे मामूली एक छोटा-सा डिब्बा ही समझना चाहिए जिसमें कहीं ताली लगाने की जगह भी नहीं है और मजबूत भी इतनी है कि किसी तरह टूट नहीं सकती।
किशोरी–फिर वह क्यों कर खुल सकेगी और उसके अन्दर से वह चाबी क्यों कर निकलेगी जिसकी हम लोगों को जरूरत है?
लाली–रेती से रेत कर उसमें सूराख किया जायेगा।
किशोरी–देर लगेगी!
लाली-हाँ, दो दिन में यह काम होगा, क्योंकि सिवाय रात के दिन को मौका नहीं मिल सकता।
किशोरी-मुझे तो एक घड़ी सौ-सौ वर्ष के समान बीतती है।
लाली-खैर, जहाँ इतने दिन बीते, वहाँ दो दिन और सही।
थोड़ी देर तक बातचीत होती रही। इसके बाद लाली उठकर अपने मकान में चली गई और मामूली कामों की फिक्र में लगी।
इसके तीसरे दिन आधी रात के समय लाली अपने मकान से बाहर निकली और किशोरी के मकान में आई। वे लौंडियां, जो किशोरी के यहाँ पहरे पर मुकर्रर थीं, गहरी नीद में पड़ी खर्राटे ले रही थीं, मगर किशोरी की आँखों में नींद का नामनिशान नहीं। वह पलंग पर लेटी दरवाजे की तरफ देख रही थी। उसी समय हाथ में एक छोटी-सी गठरी लिए लाली ने कमरे के अन्दर पैर रखा जिसे देखते ही किशोरी उठ खड़ी हुई, बड़ी मुहब्बत के साथ हाथ पकड़ लाली को अपने पास बैठाया।
किशोरी-ओफ! मेरे ये दो दिन बड़ी कठिनता से बीते हैं। दिन-रात डर लगा ही रहता था।
लाली-क्यों?
किशोरी—इसलिए कि कोई उस छत पर जाकर देख न ले कि किसी ने सेंध लगाई है।
लाली-उँह, कौन उस पर जाता है और कौन देखता है! लो, अब देर करना मुनासिब नहीं।
किशोरी–मैं तैयार हूँ, कुछ लेने की जरूरत तो नहीं है? लाली-जरूरत की सब चीजें मेरे पास हैं, तुम बस चली चलो।
लाली और किशोरी वहाँ से रवाना हुई और पेड़ों की आड़ में छिपती हुई उस मकान के पिछवाड़े पहुँची जिसकी छत में लाली ने सेंध लगाई थी। कमन्द लगाकर दोनों ऊपर चढ़ी, फिर कमन्द खींच लिया और उसी कमन्द के सहारे सेंध की राह दोनों मकान के अन्दर उतर गईं। वहाँ की अजायबातों को देख किशोरी की अजब हालत हो गई, मगर तुरन्त ही उसका ध्यान दूसरी तरफ जा पड़ा। किशोरी और लाली जैसे ही उस मकान के अन्दर उतरी, वैसे ही बाहर से किसी के ललकारने की आवाज आई, साथ ही फुर्ती से कई कमन्द लगा दस-पन्द्रह आदमी छत पर चढ़ आये और 'धरो-धरो! जाने न पावे, जाने न पावे!" की आवाज आने लगी।
१२
कुँअर इन्द्रजीतसिंह तालाब के किनारे खड़े उस विचित्र इमारत और हसीन औरत की तरफ देख रहे हैं। उनका इरादा हुआ कि तैर कर उस मकान में चले जायें जो इस तालाब के बीचोंबीच में बना हुआ है, मगर उस नौजवान औरत ने उन्हें हाथ के इशारे से मना किया, बल्कि वहाँ से भाग जाने के लिए कहा। उसका इशारा समझ ये रुक गये, मगर जी न माना, फिर तालाब में उतरे।
उस नाजनीन को विश्वास हो गया कि कुमार बिना यहाँ आए न मानेंगे, तब उसने इशारे से ठहरने के लिए कहा और यह भी कहा कि मैं किश्ती लेकर आती हूँ। उस औरत ने किश्ती खोली और उस पर सवार हो अजीब तरह से घुमाती-फिराती तालाब के पिछले कोने की तरफ ले गई और कुमार को भी उसी तरफ आने का इशारा किया। कुमार उस तरफ गये और खुशी-खुशी उस औरत के साथ किश्ती पर सवार हुए। वह किश्ती को उसी तरह घुमाती-फिराती मकान के पास ले गई। दोनों आदमी उतर कर अन्दर गये।
उस छोटे-से मकान की सजावट कुमार ने बहुत पसन्द की। वहाँ सभी चीजें जरूरत की मौजूद थीं। बीच का बड़ा कमरा अच्छी तरह से सजा हुआ था, बेशकीमती शीशे लगे हुए थे, काश्मीरी गलीचे, जिनमें तरह-तरह के फूल-बूटे बने हुए थे, छोटीछोटी मगर ऊँची संगमरमर की चौकियों पर सजावट के सामान और गुलदस्ते लगाये हुए थे। गाने-बजाने का सामान भी मौजूद था, दीवारों पर की तस्वीरों को बनाने में मुसौवरों ने अच्छी कारीगरी खर्च की थी। उस कमरे की बगल में एक और छोटा-सा कमरा सजा हुआ था, जिसमें सोने के लिए एक मसहरी बिछी हुई थी। उसकी बगल में एक कोठरी नहाने की थी जिसको जमीन सफेद और स्याह पत्थरों से बनी हुई थी। बीच में एक छोटा-सा हौज बना हुआ था जिसमें एक तरफ से तालाब का जल आता था और दूसरी तरफ से निकल जाता था। इसके अलावा और भी तीन-चार कोठरियाँ जरूरी कामों के लिए मौजूद थीं, मगर उस मकान में सिवाय उस एक औरत के और कोई दूसरी औरत न थी, न कोई नौकर या मजदूरनी ही नजर आती थी।
उस मकान को देख और उसमें सिवाय उस नौजवान नाजनीन के और किसी को न पा कुमार को बड़ा ताज्जुब हुआ। वह मकान इस योग्य था कि बिना चार-पाँच आदमियों के उसकी सफाई या वहाँ के सामान की दुरुस्ती हो नहीं सकती थी।
थके-माँदे और धूप खाये हुए कुँअर इन्द्रजीतसिंह को वह जगह बहुत ही भली मालूम हुई और उस हसीन औरत के अलौकिक रूप की छटा में ऐसे मोहित हुए कि पीछे की सुध बिल्कुल ही जाती रही। बड़े नाज और अन्दाज से उस औरत ने कुमार को कमरे में ले जाकर गद्दी पर बैठाया और आप उनके सामने बैठ गई।
कुमार-तुमने जो कुछ अहसान मुझ पर किया है, मैं किसी तरह उसका बदला नहीं चुका सकता।
औरत-ठीक है, मगर मैं उम्मीद करती हूँ कि आप कोई काम ऐसा भी न करेंगे जो मेरी बदनामी का सबब हो।
कुमार-नहीं-नहीं, मुझसे ऐसी उम्मीद कभी न करना। लेकिन क्या सबब है जो तुमने ऐसा कहा?
औरत-इस मकान में, जहाँ मैं अकेली रहती हूँ, आपका इस तरह आना और देर तक रहना बेशक मेरी बदनामी का सबब होगा।
कुमार—(कुछ सोच कर) तुम इतनी खूबसूरत क्यों हुई? अफसोस! तुम्हारी एक-एक अदा मुझे अपनी तरफ खींचती है। (कुछ अटक कर) जो हो, मुझे अब यहाँ से चले ही जाना चाहिए। अगर ऐसा ही था तो मुझे किश्ती पर चढ़ा कर यहां क्यों लाईं?
औरत-मैंने तो पहले ही आपको चले जाने का इशारा किया मगर जब आप जल में तैर कर यहाँ आने लगे तो लाचार मुझे ऐसा करना पड़ा। मैं जान-बूझ कर उस आदमी को किसी तरह आफत में फँसा नहीं सकती हूँ जिसकी जान खुद एक जालिम ऐयार के हाथ से बचाई हो। आप यह न समझें कि कोई आदमी इस तालाब में तैर कर यहाँ तक आ सकता है, क्योंकि इस तालाब में चारों तरफ जाल फेंके हुए हैं। अगर कोई आदमी यहाँ तैर कर आने का इरादा करेगा तो बेशक जाल में फंस कर अपनी जान बर्बाद करेगा। यही सबब था कि मुझे आपके लिए किश्ती ले जानी पड़ी।
कुमार—बेशक, तब इसके लिए भी मैं धन्यवाद दूंगा। माफ करना, मैं यह नहीं जानता था कि मेरे यहाँ आने से तुम्हारा नुकसान होगा। अब मैं जाता हूँ, मगर कृपा करके अपना नाम तो बता दो जिसमें मुझे याद रहे कि फलां औरत ने बड़े वक्त पर मेरी मदद की थी।
औरत-(हँस कर) मैं अपना नाम नहीं किया चाहती और न इस धूप में आपको यहाँ से जाने के लिए कहती हैं, बल्कि मैं उम्मीद करती हूँ कि आप मेरी मेहमानी कबूल करेंगे।
कुमार-वाह-वाह! कभी तो आप मुझे मेहमान बनाती हैं और कभी यहाँ से निकल जाने के लिए हुक्म लगाती हैं। आप लोग जो चाहें, करें।
औरत-(हँस कर) खैर, ये सब बातें पीछे होती रहेंगी। अब आप यहाँ से उठे और कुछ भोजन करें, क्योंकि मैं जानती हूँ कि आपने अभी तक कुछ भोजन नहीं किया।
कुमार—अभी तो स्नान-सन्ध्या भी नहीं की है। लेकिन मुझे ताज्जुब है कि यहाँ तुम्हारे पास कोई लौंडी दिखाई नहीं देती।
औरत-आप इसके लिए चिन्ता न करें। आपकी लौंडी मैं मौजूद हूँ। आप जरा बैठे, मैं सब सामान ठीक करके अभी आती हूँ।
इतना कह बिना कुमार की मर्जी पाये वह औरत वहाँ से उठी और बगल के एक कमरे में चली गई। उसके जाने के बाद कुमार कमरे में टहलने और एक-एक चीज को गौर से देखने लगे। यकायक एक गुलदस्ते के नीचे दबे हुए कागज के टुकड़े पर उनकी नजर पड़ी। मुनासिब न था कि उस पुर्जे को उठा कर पढ़ते, मगर लाचार थे। उस पुर्जे के कई अक्षर, जो गुलदस्ते के नीचे दबने से रह गये थे, साफ दिखाई पड़ते थे और उन्हीं अक्षरों ने कुमार को पुर्जा निकाल कर पढ़ने के लिए मजबूर किया। वे अक्षर ये थे-
"किशोरी"
लाचार कुमार ने उस पुरजे को निकाल कर पढ़ा, यह लिखा हुआ था-
"आपके कहे मुताबिक कुल कार्रवाई अच्छी तरह हो रही है। लाली और कुन्दन में खूब घातें चल रही हैं। किशोरी ने भी पूरा धोखा खाया। किशोरी का आशिक भी यहाँ मौजूद हैं और उसे किशोरी से बहुत-कुछ उम्मीद है। मैंने भी इनाम पाने लायक काम किया है। इस समय लाली कुछ अजब ही रंग लाया चाहती है, खैर, दो-तीन दिन में खुलासा हाल लिखूँगी।
कुमार ने उस पुरजे को झटपट पढ़ कर उसी तरह रख दिया और गद्दी पर आकर बैठ गये। सोच और तरद्दु्द ने चारों तरफ से आकर उन्हें घेर लिया। इस पुरजे ने तो उनके दिल का भाव ही बदल दिया। इस समय उनकी सूरत देख कर उनका हाल कोई सच्चा दोस्त भी नहीं मालूम कर सकता था, हाँ, कुछ देर सोचने के बाद इतना तो कुमार ने लम्बी सांस के साथ खुल कर कहा, "खैर, कहाँ जाती है कम्बख्त! मैं बिना कुछ काम किये टलने वाला नहीं।"
इतने ही में वह औरत भी आ गई और बोली, "उठिये, सब सामान दुरुस्त है।" कुमार उसके साथ नहाने वाली कोठरी में गये जिसमें हौज बना हुआ था।
धोती-गमछा और पूजा का सब सामान वहाँ मौजूद था। कुमार ने स्नान और सन्ध्या किया। वह औरत एक चाँदी की रकाबी में कुछ मेवा और खोए की चीजें इनके सामने रख कर चली गई और दूसरी दफे पीने के लिए जल भी लाकर रख गई। उसी समय कुमार ने सुना कि बगल के कमरे में दो औरतें बातें कर रही हैं। उन्हें ताज्जुब हुआ कि ये दूसरी औरतें कहाँ से आई! कुमार भोजन करके उठे, हाथ-मुँह धोकर कोठरी के बाहर निकला चाहते थे कि सामने का दरवाजा खुला और दो औरतें नजर पड़ीं, जिन्हें देखते ही कुमार चौंक पड़े और बोले-"हैं, ये दोनों यहाँ कहाँ से आ गईं!"
१३
आधी रात के समय सुनसान मैदान में दो कमसिन औरतें आपस में कुछ बातें करती चली जा रही हैं। राह में छोटे-छोटे टीले पड़ते हैं जिन्हें तकलीफ के साथ लाँघने और दम फूलने पर कभी ठहर कर फिर चलने से मालूम होता है कि इन दोनों को इसी समय किसी खास जगह पर पहुँचने या किसी से मिलने की सख्त जरूरत है। हमारे पाठक इन दोनों औरतों को बखूबी पहचानते हैं, इस लिए इनकी सूरत-शक्ल के बारे में कुछ लिखने की जरूरत नहीं, क्योंकि इन दोनों में से एक तो किन्नरी है और दूसरी कमला।
किन्नरी–कमला, देखो, किस्मत का हेर-फेर इसे कहते हैं। एक हिसाब से गयाजी में हम लोग अपना काम पूरा कर चुके थे, मगर अफसोस!
कमला-जहाँ तक हो सका, तुमने किशोरी की मदद जी-जान से की। बेशक किशोरी जन्म-भर याद रखेगी और तुम्हें तो अपनी बहिन मानेगी। खैर, कोई चिन्ता नहीं, हम लोगों को हिम्मत न हारनी चाहिए और न किसी समय ईश्वर को भूलना चाहिए। मुझे घड़ी-घड़ी बेचारे आनन्दसिंह याद आते हैं। तुम पर उनकी सच्ची मुहब्बत है, मगर तुम्हारा कुछ हाल न जानने से, न मालूम, उनके दिल में क्या-क्या बातें पैदा होंगी, हाँ, अगर वे जानते कि जिनको उनका दिल प्यार करता है वह फलाँ है तो बेशक वे खुश होते।
किन्नरी—(ऊँची साँस लेकर) जो ईश्वर की मर्जी! कमला-देखो, वह उस पुराने मकान की दीवार दिखाई देने लगी।
किन्नरी हाँ ठीक है, अब आ पहुँचे।
इतने ही में वे दोनों एक ऐसे टूटे-फूटे मकान के पास पहुँची जिसकी चौड़ी-चौड़ी दीवारें और बड़े-बड़े फाटक कहे देते थे कि किसी जमाने में यह इज्जत रखता होगा। चाहे इस समय यह इमारत कैसी ही खराब हालत में क्यों न हो, तो भी इसमें छोटी-छोटी कोठरियों के अलावा कई बड़े-बड़े दालान और कमरे अभी तक मौजूद हैं।
ये दोनों उस मकान के अन्दर चली गईं। बीच में चूने-मिट्टी-ईंटों का ढेर लगा हुआ था, जिसके बगल में घूमती हुई दोनों एक दालान में पहुंचीं। इस दालान में एक तरफ एक कोठरी थी जिसमें जाकर कमला ने मोमबत्ती जलाई और चारों तरफ देखने लगी। बगल में एक आलमारी दीवार के साथ जुड़ी हुई थी जिसमें पल्ला खींचने के लिए दो मुट्ठे लगे थे। कमला ने बत्ती किन्नरी के हाथ में देकर दोनों हाथों से दोनों मुट्ठों को तीन-चार दफे घुमाया, तुरन्त ही पल्ला खुल गया और भीतर एक छोटी-सी कोठरी नजर आई। दोनों उस कोठरी के अन्दर चली गईं और उन पल्लों को फिर बन्द कर लिया। उन पल्लों में भीतर की तरफ भी उसी तरह खोलने और बन्द करने के लिए मुळे लगे हुए थे।
इस कोठरी में तहखाना था जिसमें उतर जाने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। वे दोनों नीचे उतर गईं और वहाँ पर एक आदमी को बैठे देखा जिसके सामने मोमबत्ती जल रही थी और वह कुछ लिख रहा था। इस आदमी की उम्र लगभग साठ वर्ष की होगी। सिर और मूंछों के बाल आधे से ज्यादा सफेद हो रहे थे, तो भी उसके बदन में किसी तरह की कमजोरी नहीं मालूम होती थी। उसके हाथ-पैर गठीले और मजबूत थे तथा चौड़ी छाती उसकी बहादुरी को जाहिर कर रही थी। चाहे उसका रंग साँवला क्यों न हो, मगर चेहरा खूबसूरत और रोबीला था। बड़ी-बड़ी आँखों में जवानी की चमक मौजूद थी, चुस्त मिर्जई उसके बदन पर बहुत भली मालूम होती थी। सिर नंगा था मगर पास ही जमीन पर एक सफेद मुँड़ासा रखा हुआ था, जिसके देखने से मालूम होता था कि गर्मी मालूम होने पर उसने उतारकर रख दिया है। उसके बायें हाथ में पंखा था, जिसके जरिये वह गर्मी दूर कर रहा था, मगर अभी तक पसीने की नमी बदन में मालूम होती थी।
एक तरफ ठीकरे में थोड़ी-सी आग थी, जिसमें कोई खुशबूदार चीज जल रही थी जिससे वह तहखाना अच्छी तरह सुगन्धित हो रहा था। कमला और किन्नरी के पैर की आहट पा वह पहले ही से सीढ़ियों की तरफ ध्यान लगाये था, और इन दोनों को देखते ही उसने कहा, "तुम दोनों आ गईं?"
कमला-जी हाँ!
आदमी-(किन्नरी की तरफ इशारा करके) इन्हीं का नाम कामिनी है?
कमला-जी हाँ।
आदमी–कामिनी! आओ बेटी, तुम मेरे पास बैठो। मैं जिस तरह कमला को समझता हूँ, उसी तरह तुम्हें भी मानता हूँ।
कामिनी-बेशक कमला की तरह मैं भी आपको अपना सगा चाचा मानती हूँ।
आदमी-तुम किसी तरह की चिन्ता मत करो। जहाँ तक होगा, मैं तुम्हारी मदद करूँगा। (कमला की तरफ देखकर) तुझे कुछ रोहतासगढ़ की खबर भी मालूम है?
कमला-कल मैं वहाँ गई थी, मगर अच्छी तरह मालूम न कर सकी। आपसे यहाँ मिलने का वादा किया था, इसलिए जल्दी लौट आई।
आदमी-अभी पहर-भर हुआ, मैं खुद रोहतासगढ़ से चला आता हूँ। कमला-तो बेशक आपको बहुत-कुछ हाल वहाँ का मिला होगा।
आदमी-मुझसे ज्यादा वहाँ का हाल कोई नहीं मालूम कर सकता। पच्चीस वर्ष तक ईमानदारी और नेकनामी के साथ वहां के राजा की नौकरी कर चुका हूँ। चाहे आज दिग्विजयसिंह हमारे दुश्मन हो गये हैं, फिर भी मैं कोई काम ऐसा न करूँगा जिससे उस राज्य का नुकसान हो। हाँ, तुम्हारे सबब से किशोरी की मदद ज़रूर करूँगा।
कमला-दिग्विजयसिंह नाहक हो आपसे रंज हो गये।
आदमी-नहीं-नहीं, उन्होंने अनर्थ नहीं किया। जब वे किशोरी को जबर्दस्ती अपने यहाँ रखा चाहते हैं और जानते हैं कि शेरसिंह ऐयार की भतीजी कमला किशोरी. के यहाँ नौकर लगी है और ऐयारी के फन में तेज है। वह किशोरी को छुड़ाने के लिए दाँव-घात करेगी, तो उन्हें मुझसे परहेज करना बहुत मुनासिब था, चाहे मैं कैसा ही खैरख्वाह और नेक क्यों न समझा जाऊँ। उन्होंने मुझे कैद करने का इरादा बेजा नहीं किया। हाय! एक वह जमाना था कि रणधीरसिंह (किशोरी का नाना) और दिग्विजयसिंह में दोस्ती थी, मैं दिग्विजयसिंह के यहाँ नौकर था और मेरा छोटा भाई अर्थात् तुम्हारा बाप (ईश्वर उसे वैकुण्ठ दे) रणधीरसिंह के यहाँ रहता था। आज देखो, कितना उलट-फेर हो गया है। मैं बेकसूर कैद होने के डर से भाग तो आया, मगर लोग जरूर कहेंगे कि शेरसिंह ने धोखा दिया।
कमला-जब आप दिल से रोहतासगढ़ की बुराई नहीं करते, तो लोगों के कहने से क्या होता है, वे लोग आपकी बुराई क्यों कर दिखा सकते हैं?
शेरसिंह-हाँ ठीक है, खैर, इन बातों को जाने दो, हाँ, कुन्दन बेचारी को लाली ने खूब ही छकाया, अगर मैं लाली का एक भेद न जानता होता और कुन्दन को न कह देता तो लाली कुन्दन को जरूर बर्बाद कर देती। कुन्दन ने भी भूल की, अगर वह अपना सच्चा हाल लाली से कह देती तो बेशक दोनों में दोस्ती हो जाती।
कमला-कुँअर इन्द्रजीतसिंह का भी कुछ हाल मालूम हुआ?
शेरसिंह-हाँ मालूम है, उन्हें उसी चुडैल ने फंसा रक्खा है जो अजायबघर में रहती है।
कमला-कौन-सा अजायबघर?
शेरसिंह-वही जो तालाब के बीच में बना है और जिसे जड़-बुनियाद से खोद कर फेंक देने का मैंने इरादा किया है, यहाँ से थोड़ी ही दूर तो है।
कमला-जी हाँ, मालूम हुआ, उसके बारे में बड़ी-बड़ी विचित्र बातें सुनने में आती हैं।
शेरसिंह-बेशक वहाँ की सभी बातें ताज्जुब से भरी हुई हैं। अफसोस, न मालूम कितने खूबसूरत नौजवान बेचारे वहाँ बेदर्दी के साथ मारे गये होंगे!
इतने ही में छत के ऊपर किसी के पैरों की आहट मालूम हुई। तीनों का ध्यान सीढ़ियों पर गया।
कमला-कोई आता है।
शेरसिंह-हमें तो यहाँ किसी के आने की उम्मीद न थी, जरा होशियार हो जाओ।
कमला-मैं होशियार हूँ, देखिए, वह आया!
एक लम्बे कद का आदमी सीढ़ी से नीचे उतरा और शेरसिंह के सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी उम्र चाहे जो भी हो, मगर बदन की कमजोरी, दुबलेपन और चेहरे की उदासी ने उसे पचास वर्षों से भी ज्यादा उम्र का बना रक्खा था। उसके खूबसूरत चेहरे पर उदासी और रंज के निशान पाये जाते थे, बड़ी-बड़ी आँखों में आँसुओं की तरी साफ मालूम होती थी, उसकी हसरत-भरी निगाहें उसके दिल की हालत दिखा रही थीं और कह रही थीं कि रंज-गम-फिक्र-तरद्दु्द और नाउम्मीदी ने उसके बदन में खून और मांस का नाम नहीं छोड़ा, केवल हड्डी ही बच गई है। उसके कपड़े भी बहुत पुराने और फटे हुए थे।
इस आदमी की सूरत से भलमनसी और सीधापन झलकता था, मगर शेरसिंह उसकी सूरत देखते ही काँप गया। खौफ और ताज्जुब ने उसका गला दबा दिया। एकदम ऐसा घबरा गया जैसे कोई खूनी जल्लाद की सूरत देखकर घबरा जाता है। शेरसिंह ने उसकी तरफ देख कर कहा, "अहा...हा...आप...हैं! आई...ए...!" मगर ये शब्द घबराहट के मारे बिल्कुल ही उखड़े-पुखड़े शेरसिंह के मुँह से निकले।
उस आदमी ने कमला की तरफ इशारा करके कहा, "क्या ये लड़की..."
शेरसिंह-हाँ...आप...(कमला और कामिनी की तरफ देख कर) तुम दोनों जरा ऊपर चली जाओ। ये बड़े नेक आदमी हैं. मुझसे मिलने आये हैं, मैं इनसे कुछ बातें किया चाहता हूँ।
कमला और कामिनी दोनों तहखाने से निकल कर ऊपर चली आई। उस आदमी के आने और अपने चाचा को विचित्र अवस्था में देखने से कमला घबड़ा गई। जी में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं। ऐसे कमजोर, लाचार और गरीब आदमी को देख कर उसका ऐयारी के फन में बड़ा ही तेज और शेरदिल चाचा इस तरह क्यों घबरा गया और इतना क्यों डरा, वह इसी सोच में परेशान थी। बेचारी कामिनी भी हैरान और डरी हुई थी यहाँ तक कि घण्टा-भर बीत जाने पर भी उन दोनों में कोई बातचीत न हुई। घण्टे भर के बाद वह आदमी तहखाने से निकल कर ऊपर चला आया और कामिनी की तरफ देख कर बोला-"अब तुम लोग नीचे जाओ, मैं जाता हूँ।" इतना कहता हुआ उसी तरह किवाड़ खोलकर चला गया, जिस तरह कामिनी को साथ लिये हुए कमला इस मकान में आई थी।
कमला और कामिनी नीचे तहखाने में जा शेरसिंह के सामने बैठ गईं। शेरसिंह के चेहरे से अभी तक घबराहट और परेशानी गई नहीं थी। बड़ी मुश्कल से थोड़ी देर में उसने होश-हवास दुरुस्त किये और कमला की तरफ देख कर कहा
शेरसिंह-अच्छा; अब हम लोगों को क्या करना चाहिए?
कमला—जो हुक्म हो सो किया जाय। यह आदमी कौन था जिसे देख आप...?
शेरसिंह-था एक आदमी, उसका हाल जानने की कोशिश न करो और न उसका खयाल ही करो, बल्कि उसे बिल्कुल ही भूल जाओ।
उस आदमी के बारे में कमला बहुत-कुछ जानना चाहती थी, मगर अपने चाचा के मुँह से साफ जवाब पाकर दम न मार सकी और दिल की दिल ही में रखने पर लाचार हुई।
शेरसिंह-कमला, तू रोहतासगढ़ जा और दो-तीन दिन में लौटकर वहाँ का जो कुछ हाल हो, मुझसे कह। किशोरी से मिलकर उसे ढाढ़स देना और कहना कि घबराये नहीं। उसी रास्ते से किले के अन्दर बल्कि उस बाग में, जिसमें किशोरी रहती है, चली आना, जिस राह का हाल मैंने तुझसे कहा था। उस राह से आना-जाना कभी किसी को मालूम न होगा।
कमला-बहुत अच्छा, मगर कामिनी के लिए क्या हुक्म होता है? शेरसिंह-मैं इसे ले जाता हूँ, अपने एक दोस्त के सुपुर्द कर दूंगा। वहाँ यह बड़े आराम से रहेगी। जब सब तरफ से फसाद मिट जायगा, मैं इसे ले आऊँगा, तब यह भी अपनी मुराद को पहुँच जायगी।
कमला-जो मर्जी!
तीनों आदमी तहखाने से बाहर निकले और जैसा ऊपर लिखा जा चुका है उसी तरह कोठरियों और दालानों में से होते हुए मकान के बाहर निकल आये।
शेरसिंह-कमला, अब तू जा और कामिनी की तरफ से बेफिक्र रह। मुझसे मिलने के लिए यही ठिकाना मुनासिब है।
कमला-अच्छा, मैं जाती हूँ, मगर यह तो कह दीजिये कि उस आदमी से मझे कहाँ तक होशियार रहना चाहिए जो आपसे मिलने आया था?
शेरसिंह-(कड़ी आवाज में) एक दफे कह तो दिया कि उसका ध्यान भुला दे। उससे होशियार रहने की जरूरत नहीं और न वह तुझे कभी दिखाई देगा।
१४
रोहतासगढ़ किले के चारों तरफ घना जंगल है जिसमें साखू, शीशम, तेंद, आसन और सलई इत्यादि के बड़े-बड़े पेड़ों की घनी छाया से एक तरह का अंधकारसा हो रहा है। रात की तो बात ही दूसरी है, वहाँ दिन को भी रास्ते या पगडण्डी का पता लगाना मुश्किल था, क्योंकि सूर्य की सुनहरी किरणों को पत्तों में से छन कर जमीन तक पहुँचने का बहुत कम मौका मिलता था। कहीं-कहीं छोटे-छोटे पेड़ों की बदौलत जंगल इतना घना हो रहा था कि उसमें भूले आदमियों को मुश्किल से ही छुटकारा मिलता था। ऐसे मौके पर उसमें हजारों आदमी इस तरह छिप सकते थे कि हजार सिर पटकने और खोजने पर भी उनका पता लगाना असम्भव था। दिन को तो इस जंगल में अन्धकार रहता ही था मगर हम रात का हाल लिखते हैं जिस समय उसकी अँधेरी और वहाँ के सन्नाटे का आलम भूले-भटके मुसाफिरों को मौत का समाचार देता था और वहाँ की जमीन के लिए अमावस्या और पूर्णिमा की रात एक समान थी।
किले के दाहिनी तरफ वाले जंगल में आधी रात के समय हम तीन आदमियों को, जो स्याह चोगों में और नकाबों में अपने को छिपाये हुए हैं, घूमते देख रहे हैं। न मालूम ये किसकी खोज और किस जमीन की तलाश में हैरान हो रहे हैं! इनमें से एक कुँअर आनन्दसिंह, दूसरे भैरोंसिंह और तीसरे तारासिंह हैं। ये तीनों आदमी देर तक घूमने के बाद छोटी-सी चारदीवारी के पास पहुँचे जिसके चारों तरफ की दीवार पाँच हाथ से ज्यादा ऊँची न थी और वहाँ के पेड़ भी कम घने और गुंजान थे, कहीं-कहीं चन्द्रमा की रोशनी भी जमीन पर पड़ती थी।
आनन्दसिंह-शायद यही चारदीवारी है?
भैरोंसिंह-बेशक यही है, देखिए, फाटक पर हड्डियों का ढेर लगा हुआ है।
तारासिंह-खैर, भीतर चलिए, देखा जायगा।
भैरोंसिंह-जरा ठहरिये! पत्तों की खड़खड़ाहट से मालूम होता है कि कोई आदमी इसी तरफ आ रहा है!
आनन्दसिंह-(कान लगाकर) हाँ, ठीक तो है। हम लोगों को छिपकर देखना चाहिए कि वह कौन है और इधर क्यों आता है।
उस आने वाले की तरफ ध्यान लगाये हए तीनों आदमी पेड़ों की आड़ में छिप रहे और थोड़ी ही देर में सुफेद कपड़े पहने एक औरत को आते हुए उन लोगों ने देखा। वह औरत पहले तो फाटक पर रुकी, तब कान लगाकर चारों तरफ की आहट लेने के बाद फाटक के अन्दर घुस गई। भैरोंसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, "आप दोनों इसी जगह ठहरिये, मैं इस औरत के पीछे जाकर देखता हूँ कि यह कहाँ जाती है।" इस बात से दोनों ने मंजूर किया और भैरोंसिंह छिपते हुए उस औरत के पीछे रवाना हुए।
ऐसे घने जंगल में भी उस चारदीवारी के अन्दर पेड़, झाड़ या जंगल का न होना ताज्जुब की बात थी। भैरोंसिंह ने वहाँ की जमीन बहुत साफ-सुथरी पाई, हाँ, छोटे जंगली बेर के दस-बीस पेड़ वहाँ जरूर थे जो किसी तरह का नुकसान न पहँचा सकते थे और न उनकी आड़ में कोई आदमी छिप ही सकता था, मगर मरे हुए जानवरों और उनकी हड्डियों की बहुतायत से वह जगह बड़ी ही भयानक हो रही थी। उस चारदीवारी के अन्दर बहुत-सी कब्र बनी हुई थीं जिनमें कई कच्ची तथा कई ईंट, चूने और पत्थर की भी थीं और बाग में एक सबसे बड़ी कब्र संगमर्मर की बनी हुई थी।
भैरोंसिंह ने फाटक के अन्दर पैर रखते ही उस औरत को, जिसके पीछे गए थे, बीच वाली संगमर्मर की बड़ी कब्र पर खड़े और चारों तरफ देखते पाया, मगर थोड़ी देर ही में वह देखते-देखते कहीं गायब हो गई। भैरोंसिंह ने उस कन्न के पास जाकर उसे ढूंढा मगर पता न लगा, दूसरी कब्रों के चारों तरफ और इधर-उधर भी खोजा, मगर कोई निशानः न मिला। लाचार वे आनन्दसिंह और तारासिंह के पास लौट आये और बोले
भैरों-वह औरत वहीं चली गई जहाँ हम लोग जाया चाहते हैं।
आनन्द–हाँ! भैरों-जी हाँ। आनन्द–फिर अब क्या राय है?
भैरों-उसे जाने दीजिये, चलिये, हम लोग भी वहीं चलें। अगर वह रास्ते में मिल भी जायगी तो क्या हर्ज है? वह एक औरत हम लोगों का कुछ नुकसान नहीं कर सकती।
ये तीनों आदमी उस चारदीवारी के अन्दर गए और बीच वाली संगमर्मर की बड़ी कब्र पर पहुँच कर खड़े हो गये। भैरोंसिंह ने उस कब्र की जमीन को अच्छी तरह टटोलना शुरू किया। थोड़ी ही देर में एक खटके की आवाज आई और एक छोटा सा पत्थर का टुकड़ा, जो शायद कमानी के जोर पर लगा हुआ था, दरवाजे की तरह खुलकर अलग हो गया। ये तीनों आदमी उसके अन्दर घुसे और उस पत्थर के टुकड़ें को उसी तरह बन्द कर आगे बढ़े। अब ये तीनों आदमी एक सुरंग में थे जो बहुत ही तंग और लम्बी थी। भैरोंसिंह ने अपने बटुए में से एक मोमबत्ती निकाल कर जलाई और चारों तरफ अच्छी तरह निगाह करने के बाद आगे बढ़। थोड़ी ही देर में यह सुरंग खत्म हो गई और ये तीनों एक भारी दालान में पहुँचे। इस दालान की छत बहुत ऊँची थी और इसमें कड़ियों के सहारे कई जंजीरें लटक रही थीं। इस दालान के दूसरी तरफ एक और दरवाजा था जिसमें से होकर ये तीनों एक कोठरी में पहुँचे। इस कोठरी के नीचे एक तहखाना था जिसमें उतरने के लिए संगमर्मर की सीढ़ियां बनी हुई थीं। ये तीनों नीचे उतर गये। अब एक बड़े भारी घण्टे के बजने की आवाज इन तीनों के कानों में पड़ी जिसे सुन कर ये कुछ देर के लिए रुक गये। मालूम हुआ कि इस तहखाने वाली कोठरी की बगल में कोई और मकान है जिसमें घण्टा बज रहा है। इन तीनों को वहाँ और भी कई आदमियों के मौजूद होने का गुमान हुआ।
इस तहखाने में भी दूसरी तरफ निकल जाने के लिए एक दरवाजा था जिसके पास पहुँच कर भैरोंसिंह ने मोमबत्ती बुझा दी और धीरे से दरवाजा खोल जब उस तरफ झांका तो एक बड़ी संगीन बारहदरी नजर पड़ी जिसके खम्भे संगमर्मर के थे। इस बारहदरी में दो मशाल जल रहे थे जिनकी रोशनी से वहाँ की हरएक चीज साफ मालूम होती थी और इसी से वहाँ दस-पन्द्रह आदमी भी दिखाई पड़े जिनमें रस्सियों से मुश्के बँधी हुईं तीन औरतें भी थीं। भैरोंसिंह ने पहचाना कि इन तीनों औरतों में एक किशोरी है जिसके दोनों हाथ पीठ की तरफ कस कर बँधे हुए हैं और वह नीचे सिर किए रो रही है। उसके पास वाली दोनों औरतों की भी वैसी ही दशा थी, मगर उन्हें भैरोंसिंह, आनन्दसिंह या तारासिंह नहीं पहचानते थे। उन तीनों के पीछे नंगी तलवार लिए तीन आदमी भी खड़े थे जिनकी सूरत और पोशाक से मालूम होता था कि वे जल्लाद हैं।
उस बारहदरी के बीचोंबीच चाँदी के सिंहासन पर स्याह पत्थर की एक इतनी बड़ी मूरत बैठी हुई थी कि आदमी पास में खड़ा होकर भी उस बैठी हुई मूरत के सिर पर हाथ नहीं रख सकता था। मूरत की सुरत-शकल के बारे में इतना ही लिखना काफी है कि उसे आप कोई राक्षस समझें, जिसकी तरफ आँख उठा कर देखने से डर मालूम होता था।
भैरोंसिंह, तारासिंह और आनन्दसिंह उसी जगह खड़े होकर देखने लगे कि उस दालान में क्या हो रहा है। अब घंटे की आवाज बड़े जोर से आ रही थी मगर यह नहीं मालूम होता था कि वह कहाँ बज रहा है।
उन तीनों औरतों को, जिनमें किशोरी भी थी, छह आदमियों ने अच्छी तरह मजबूती से पकड़ा और बारी-बारी से उस स्याह मूरत के पास ले गए जहाँ उसके पैरों पर जबर्दस्ती सिर रखवा कर पीछे हटे और फिर उसी के सामने खड़ा कर दिया।
इसके बाद दो आदमी एक औरत को, जिसे हमारे तीनों आदमियों में से कोई भी नहीं पहचानता था, लेकर आगे बढ़े। उस औरत के पीछे जो जल्लाद नंगी तलवार लिऐ खड़ा था, वह भी आगे बढ़ा। दोनों आदमियों ने उस औरत को स्याह मूरत के ऊपर इस जोर से ढकेल दिया कि बेचारी बेतहाशा गिर पड़ी, साथ ही जल्लाद ने एक हाथ तलवार का ऐसा मारा कि सिर कटकर दूर जा पड़ा और तड़पने लगा। इस हाल को देख वे दोनों औरतें, जिनमें बेचारी किशोरी भी थी, बड़े जोर से चिल्लाईं और बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ीं।
इस कैफियत को देख कर हमारे दोनों ऐयारों और कुँअर आनन्दसिंह की अजब हालत हो गई। गुस्से के मारे थर-थर काँपने लगे। थोड़ी देर बाद उन लोगों ने किशोरी को उठाया और उस मूरत के पास ले चले। उसके साथ ही दूसरा जल्लाद भी आगे बढ़ा। अब ये तीनों किसी तरह बर्दाश्त न कर सके। कुँअर आनन्दसिंह ने दोनों ऐयारों को ललकारा-"मारो इन जालिमों को! ये थोड़े से आदमी हैं क्या चीज!"
तीनों आदमी खंजर निकाल आगे बढ़ना ही चाहते थे कि पीछे से कई आदमियों ने आकर इन लोगों को भी पकड़ लिया। और "यही हैं, यही हैं, पहले इन्हीं को बलि देना चाहिए!" कहकर चिल्लाने लगे।