चन्द्रकान्ता सन्तति
दूसरा भाग
१
घण्टा भर दिन बाकी है। किशोरी अपने उसी बाग में, जिसका कुछ हाल ऊपर लिख चुके हैं, कमरे की छत पर सात-आठ सखियों के बीच में उदास तकिए के सहारे बैठी आसमान की तरफ देख रही है। सुगन्धित हवा के झोंके उसे खुश करना चाहते हैं मगर वह अपनी धुन में ऐसी उलझी हुई है कि दीन-दुनिया की खबर नहीं है। आसमान पर पश्चिम की तरफ लालिमा छाई है। श्याम रंग के बादल ऊपर की तरफ उठ रहे हैं, जिनमें तरह-तरह की सूरतें बात-की-बात में पैदा होतीं और देखते-देखते बदल कर मिट जाती हैं। अभी यह बादल का टुकड़ा खण्ड-पर्वत की तरह दिखाई देता था, अभी उसके ऊपर शेर की मूरत नजर आने लगी, लीजिए, शेर की गर्दन इतनी बढ़ी कि साफ ऊँट की शक्ल बन गई और लहमे भर में हाथी का रूप धर सूँड दिखाने लगी। उसी के पीछे हाथ में बन्दूक लिए एक सिपाही की शक्ल नजर आई, लेकिन यह बन्दूक छोड़ने के पहले खुद ही धुँआ होकर फैल गया।
बादलों की यह ऐयारी इस समय न मालूम कितने आदमी देख-देख कर खुश होते होंगे, मगर किशोरी के दिल की धड़कन इसे देख-देख कर बढ़ती ही जाती है। कभी तो उसका सिर पहाड़-सा भारी हो जाता है, कभी माधवी बाघिन की सूरत ध्यान में आती है, कभी बाकरअली शुतुरमुहार की बदमाशी याद आती है; कभी हाथ में बन्दूक लिए हरदम जान लेने को तैयार बाप की याद तड़पा देती है।
कमला को गए कई दिन हुए, आज तक वह लौटकर नहीं आई। इस सोच ने किशोरी को और भी दुःखी कर रखा है। धीरे-धीरे शाम हो गई, सखियाँ सब पास बैठी ही रहीं, मगर सिवाय ठंडी-ठंडी सांस लेने के किशोरी ने किसी से बातचीत न की और वे सब भी दम न मार सकीं।
कुछ रात जाते-जाते बादल अच्छी तरह से घिर आये, आँधी भी चलने लगी। किशोरी छत पर से नीचे उतर आई और कमरे के अन्दर मसहरी पर जा लेटी, थोड़ी ही देर बाद कमरे के सदर दरवाजे का पर्दा हटा और कमला अपनी असली सूरत में आती दिखाई पड़ी।
कमला के न आने से किशोरी उदास हो रही थी, उसे देखते ही पलंग पर से उठी, आगे बढ़कर कमला को गले से लगा लिया और गद्दी पर अपने पास ला बैठाया, कुशल-मंगल पूछने के बाद बातचीत होने लगी-
किशोरी—कहो बहिन, तुमने इतने दिनों में क्या-क्या काम किया? उनसे मुलाकात भी हुई या नहीं?
कमला-मुलाकात क्यों न होती? आखिर मैं गई थी किस लिए!
किशोरी—कुछ मेरा हालचाल भी पूछते थे?
कमला-तुम्हारे लिए तो जान देने को तैयार हैं, क्या हाल-चाल भी न पूछेगे? बस, दो ही एक दिन में तुमसे मुलाकात हुआ चाहती है।
किशोरी–(खुश होकर) हाँ! तुम्हें मेरी ही कसम, मुझसे झूठ न बोलना!
कमला-क्या तुम्हें विश्वास है कि मैं तुमसे झूठ बोलूँगी?
किशोरी-नहीं-नहीं, मैं ऐसा नहीं समझती हूँ, लेकिन इस खयाल से कहती हूँ कि कहीं दिल्लगी न सूझी हो।
कमला-ऐसा कभी मत सोचना।
किशोरी-खैर, यह कहो कि माधवी की कैद से उन्हें छुट्टी मिली या नहीं, और अगर मिली तो क्यों कर?
कमला-इन्द्रजीतसिंह को माधवी ने उसी पहाड़ी के बीच वाले मकान में रखा था, जिसमें वह पारसाल मुझे और तुम्हें दोनों की आँखों पर पट्टी बाँध कर ले गई थी।
किशोरी-बड़े बेढब ठिकाने छिपा रखा था।
कमला-मगर वहाँ भी उनके ऐयार लोग पहुँच गये!
किशोरी-भला वे लोग क्यों न पहुँचेंगे, हाँ, तब क्या हुआ?
कमला—(किशोरी की सखियों और लौंडियों की तरफ देखके) तुम लोग जाओ, अपना काम करो।
किशोरी-हाँ, अभी काम नहीं है, फिर बुलावेंगे तो आना।
सखियों और लौंडियों के चले जाने पर कमला ने देर तक बातचीत करने के बाद कहा-
"माधवी का और अग्निदत्त दीवान का हाल भी चालाकी से इन्द्रजीतसिंह ने जान लिया, आजकल उनके कई ऐयार वहाँ पहुँचे हुए हैं। ताज्जुब नहीं कि दस-पाँच दिन में वे लोग उस राज्य को ही गारत कर डालें।"
किशोरी-मगर तुम तो कहती हो कि इन्द्रजीतसिंह वहाँ से छूट गये!
कमला-हाँ, इन्द्रजीतसिंह तो वहाँ से छूट गये, मगर उनके ऐयारों ने अभी तक माधवी का पीछा नहीं छोड़ा, इन्द्रजीतसिंह के छुड़ाने का बन्दोबस्त तो उनके ऐयारों ने ही किया था, मगर आखिर में मेरे ही हाथ से उन्हें छुट्टी मिली। मैं उन्हें चुनार पहुँचा कर तब यहाँ आई हूँ और जो कुछ मेरी जुबानी उन्होंने तुम्हें कहला भेजा है, उसे कहना तथा उनकी बात मानना ही मुनासिब समझती हूँ।
किशोरी-उन्होंने क्या कहा है?
कमला—यों तो वे मेरे सामने बहुत-कुछ बक गये, मगर असल मतलब उनका यही है कि तुम चुपचाप चुनार उनके पास बहुत जल्द पहुँच जाओ।
किशोरी—(देर तक सोचकर) मैं तो अभी चुनार जाने को तैयार हूँ, मगर इस में बड़ी हँसाई होगी।
कमला–अगर तुम हँसाई का खयाल करोगी तो बस हो चुका, क्योंकि तुम्हारे माँ-बाप इन्द्रजीतसिंह के पूर दुश्मन हो रहे हैं, जो तुम चाहती हो उसे वे खुशी से कभी मंजूर न करेंगे। आखिर जब तुम अपने मन की करोगी तभी लोग हँसेंगे, ऐसा ही है तो इन्द्रजीतसिंह का ध्यान दिल से दूर करो या फिर बदनामी कबूल करो।
किशोरी-तुम सच कहती हो। एक न एक दिन बदनामी होनी ही है, क्योंकि इन्द्रजीतसिंह को मैं किसी तरह भूल नहीं सकती। आखिर तुम्हारी क्या राय है?
कमला-सखी, मैं तो यही कहूँगी कि अगर तुम इन्द्रजीतसिंह को नहीं भूल सकतीं तो उनसे मिलने के लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा मौका तुम्हें न मिलेगा। चुनार में जाकर बैठी रहोगी तो कोई भी तुम्हारा कुछ बिगाड़ न सकेगा। आज कौन ऐसा है जो महाराज वीरेन्द्रसिंह से मुकाबला करने का साहस रखता हो? तुम्हारे पिता अगर ऐसा करते हैं तो यह उनकी भूल है। आज सुरेन्द्रसिंह के खानदान का सितारा बड़ी तेजी से आसमान पर चमक रहा है और उनसे दुश्मनी का दावा करना अपने को मिट्टी में मिला देना है।
किशोरी–ठीक है, मगर इस तरह वहाँ चले जाने से इन्द्रजीतसिंह के बड़े लोग कब खुश होंगे?
कमला-नहीं-नहीं, ऐसा मत सोचो। क्योंकि तुम्हारी और इन्द्रजीतसिंह की मुहब्बत का हाल वहाँ किसी से छिपा नहीं है। सभी लोग जानते हैं कि इन्द्रजीतसिंह तुम्हारे बिना जी नहीं सकते, फिर उन लोगों को इन्द्रजीतसिंह से कितनी मुहब्बत है यह तुम खुद जानती हो। अस्तु; ऐसी दशा में वे लोग तुम्हारे जाने से कब नाखुश हो सकते हैं। दूसरे, दुश्मन की लड़की अपने घर में आ जाने से वे लोग अपनी जीत समझेंगे। मुझे महारानी चन्द्रकान्ता ने खुद कहा था कि जिस तरह बने तुम समझा-बुझाकर किशोरी को ले आओ, बल्कि उन्होंने अपनी खास सवारी का रथ और कई लौंडी-गुलाम भी मेरे साथ भेजे हैं!
किशोरी-(चौंककर) क्या उन लोगों को अपने साथ लाई हो?
कमला-हाँ, जब महारानी चन्द्रकान्ता की इतनी मुहब्बत तुम पर देखी, तभी तो मैं भी वहाँ चलने के लिए राय देती हूँ।
किशोरी-अगर ऐसा है तो मैं किसी तरह रुक नहीं सकती, अभी तुम्हारे साथ चली चलूँगी, मगर देखो सखी, तुम्हें बराबर मेरे साथ रहना पड़ेगा।
कमला-भला मैं कभी तुम्हारा साथ छोड़ सकती हूँ!
किशोरी-अच्छा, तो यहाँ किसी से कुछ कहना-सुनना तो है नहीं?
कमला-किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं, बल्कि तुम्हारी इन सखियों और लौंडियों को भी कुछ पता नहीं लगना चाहिए जिनको मैंने इस समय यहाँ से हटा दिया है।
किशोरी-वह रथ कहाँ खड़ा है?
कमला-इसी बगल वाली आम की बारी में रथ और चुनार से आये हुए लौंडी, गुलाम सब मौजूद हैं।
किशोरी–खैर, चलो, देखा जायगा। राम मालिक हैं।
किशोरी को साथ ले कमला चुपके से कमरे के बाहर निकली और पेड़ों में छिपती हुई बाग से निकल कर बहुत जल्द उस आम की बारी में जा पहुँची जिसमें रथ और लौंडी-गुलामों के मौजूद रहने का पता दिया था। वहाँ किशोरी ने कई लौंडी-गुलामों और उस रथ को भी मौजूद पाया जिसमें बहुत तेज चलने वाले ऊँचे काले रंग के नागौरी बैलों की जोड़ी जुती हुई थी। किशोरी और कमला दोनों सवार हुईं और रथ तेजी के साथ रवाना हुआ।
इधर घण्टा भर समय बीत जाने पर भी जब किशोरी ने अपनी सखियों और लौंडियों को आवाज न दी तब वे लाचार होकर बिना बुलाये उस कमरे में पहुँची जिस में कमला और किशोरी को छोड़ गई थीं। मगर वहाँ दोनों में से किसी को मौजूद न पाया। घबरा कर इधर-उधर ढूँढ़ने लगीं, मगर कहीं पता न चला। तमाम बाग छान डाला, पर किसी की सूरत दिखाई न पड़ी। सभी में खलबली मच गई, मगर क्या हो सकता था।
आधी रात तक कोलाहल मचता रहा। उसी समय कमला भी वहाँ आ मौजूद हुई। सभी ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और पूछा, "हमारी किशोरी कहाँ है?"
कमला—यह क्या मामला है जो तुम लोग इस बुरी तरह घबरा रही हो? क्या
किशोरी कहीं चली गई?
एक-चली नहीं गई तो कहाँ हैं? तुम उन्हें कहाँ छोड़ आई?
कमला-क्या किशोरी को मैं अपने साथ ले गई थी, जो मुझसे पूछती हो? वह कब से गायब है?
एक–पहर-भर से तो हम लोग ढूँढ़ ही रही हैं! तुम दोनों इसी कमरे में बातें कर रही थीं, हम लोगों को हट जाने के लिए कहा। फिर न मालूम क्या हुआ, कहाँ चली गईं।
कमला-बस-बस, अब मैं समझ गई। तुम लोगों ने धोखा खाया, मैं तो अभी चली ही आती हूँ। हाय, यह क्या हुआ! बेशक दुश्मन अपना काम कर गए और हम लोगों को आफत में डाल गए। हाय, अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किससे पूछूँ कि मेरी प्यारी किशोरी को कौन ले गया।
२
किशोरी खुशी-खुशी रथ पर सवार हुई और रथ खूब तेजी से जाने लगा। वह कमला भी उसके साथ थी। इन्द्रजीतसिंह के विषय में तरह-तरह की बातें कहकर उस का दिल बहलाती जाती थी। किशोरी भी बड़े प्रेम से उन बातों को सुनने में लीन हो रही थी। कभी सोचती कि जब इन्द्रजीत सिंह के सामने जाऊँगी तो किस तरह खड़ी होऊँगी, क्या कहूँगी? अगर वे यह पूछ बैठेंगे कि तुम्हें किसने बुलाया तो क्या जवाब दूँगी? नहीं-नहीं, वे ऐसा कभी न पूछेगे, क्योंकि मुझ पर प्रेम रखते हैं। मगर उनके घर की औरतें मुझे देखकर अपने दिल में क्या कहेंगी! वे जरूर समझेंगी कि किशोरी बड़ी बेहया औरत है। इसे अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा का कुछ भी ध्यान नहीं है। हाय, उस समय तो मेरी बड़ी ही दुर्गति होगी, जिन्दगी जंजाल हो जायगी, किसी को मुँह न दिखा सकूँगी!
ऐसी ही बातों को सोचती, कभी खुश होती, कभी इस तरह बेसमझे-बूझे चल पड़ने पर अफसोस करती थी। कृष्ण पक्ष की सप्तमी थी, अँधेरे ही में रथ के बैल बराबर दौड़े जा रहे थे। चारों तरफ से घेरकर चलने वाले सवारों के घोड़ों की टापों की बढ़ती हुई आवाज दूर-दूर तक फैल रही थी। किशोरी ने पूछा, "क्यों कमला, क्या लौंडियाँ भी घोड़ों पर ही सवार होकर साथ-साथ चल रही हैं?" जिसके जवाब में कमला सिर्फ 'जी हाँ' कहकर चुप हो रही।
अब रास्ता खराब और पथरीला आने लगा। पहियों के नीचे पत्थर के छोटे-छोटे ढोंकों के पड़ने से रथ उछलने लगा, जिसकी धमक से किशोरी के नाजुक बदन में दर्द पैदा हुआ।
किशोरी-ओफ ओह, अब तो बड़ी तकलीफ होने लगी।
कमला-थोड़ी दूर तक यहाँ रास्ता खराव है, आगे हम एक अच्छी सड़क पर जा पहुँचेंगे।
किशोरी-मालूम होता है हम लोग सीधी और साफ सड़क छोड़ किसी दूसरी ही तरफ से जा रहे हैं।
कमला-जी नहीं।
किशोरी-नहीं क्या? जरूर ऐसा ही है।
कमला-अगर ऐसा भी है तो क्या बुरा हुआ। हम लोगों की खोज में जो लोग निकलेंगे, वे हमें पा तो न सकेंगे।
किशोरी-(कुछ सोचकर) खैर जो किया, अच्छा किया, मगर रथ का पर्दा तो उठा, जरा हवा लगे और इधर-उधर की कैफियत भी देखने में आवे, रात का तो समय है।
लाचार होकर कमला ने रथ का पर्दा उठा दिया और किशोरी ताज्जुब-भरी निगाहों से दोनों तरफ देखने लगी।
अब तक तो रात अंधेरी थी, मगर अब विधाता ने किशोरी को यह बताने के लिए कि देख, तू किस बला में फँसी हुई है, तेरे रथ को चारों तरफ से घेरकर चलने वाले सवार कौन हैं, तू किस राह से जा रही है, यह पहाड़ी जंगल कैसा भयानक है-आसमान पर माहताबी जलाई। चन्द्रमा निकल आया और धीरे-धीरे ऊँचा होने लगा जिसकी रोशनी में किशोरी ने सब सामान देख लिये और एकदम चौंक उठी। चारों तरफ की भयानक पहाड़ी और जंगल ने उसका कलेजा दहला दिया। उसने उन सवारों की तरफ अच्छी तरह देखा जो रथ घेरे हुए साथ-साथ जा रहे थे। वह बखूबी समझ गई कि इन सवारों में, जैसा कि कहा गया था, कोई भी औरत नहीं, सब मर्द ही हैं। उसे निश्चय हो गया कि वह आफत में फँस गई है, और घबराहट में नीचे लिखे गए शब्द उसकी जुबान से निकल पड़े-
"चुनार तो पूरब में है, मैं दक्खिन तरफ क्यों जा रही हूँ? इन सवारों में तो एक भी लौंडी नजर नहीं आती। बेशक मुझे धोखा दिया गया। मैं निश्चय कह सकती हूँ कि मेरी प्यारी कमला कोई दूसरी ही है, अफसोस!"
रथ में बैठी हुई कमला किशोरी के मुँह से इन बातों को सुनकर होशियार हो गई और झट रथ से नीचे कूद पड़ी, साथ ही गाड़ीवान ने भी बैलों को रोका और सवारों ने बहुत पास आकर रथ को घेर लिया।
अब किशोरी को अपने धोखा खाने और आफ़त में फँस जाने का पूरा विश्वास हो गया और वह एकदम चिल्ला कर बेहोश हो गई।
३
सुबह का सुहावना समय भी बड़ा ही मजेदार होता है। जबर्दस्त भी पहले सिरे का है। क्या मजाक कि इसकी अमलदारी में कोई धूम तो मचावे, इसके आने की खबर दो घण्टे पहले ही से हो जाती है। वह देखिए, आसमान के जगमगाते हुए तारे कितनी बेचैनी और उदासी के साथ हसरत-भरी निगाहों से जमीन की तरफ देख रहे हैं जिनकी सूरत और चलाचली की बेचैनी देख बागों की सुन्दर कलियों ने भी मुस्कुराना शुरू कर दिया है, अगर यही हालत रही तो सुबह होते तक जरूर खिलखिला कर हँस पड़ेंगी।
लीजिए अब दूसरा ही रंग बदला। प्रकृति की न मालूम किस ताकत ने आसमान की स्याही को धो डाला और इसकी हुकूमत की रात बीतते देख उदास तारों को भी बिदा होने का हुक्म सुना दिया। इधर बेचैन तारों की घबराहट देख अपने हुस्न और जमाल पर भूली हुई खिलखिला कर हँसने वाली कलियों को सुबह की ठण्डी-ठण्डी हवा ने खूब ही आड़े हाथों लिया और मारे थपेड़ों के उनके उस बनाव को बिगाड़ना शुरू कर दिया जो दो ही घण्टे पहले प्रकृति की किसी लौंडी ने दुरुस्त कर दिया था।
मोतियों से ज्यादे आबदार ओस की बूंदों को बिगाड़ते और हँसती हुई कलियों का शृंगार मिटते देख उनकी तरफदार खुशबू से न रहा गया, वह झट फूलों से अलग हो सुबह की ठण्डी हवा से उलझ पड़ी और इधर-उधर फैल धूम मचाना शुरू कर दिया। अपनी फरियाद सुनाने के लिए उन नौजवानों के दिमागों में घुस-घुस कर उन्हें उठाने की फिक्र करने लगी जो रात भर जाग-जाग कर इस समय खूबसूरत पलंगड़ियों पर सुस्त पड़ रहे थे। जब उन्होंने कुछ न सुना और करवट बदल कर रह गये तो मालियों को जा घेरा। झट उठ बैठे और कमर कस कर उस जगह पहुँचे जहाँ फूलों और उमंग भरे हवा के झपेटों से कहा-सुनी हो रही थी। कम्बख्त छोटे लोगों का यह दिमाग कहाँ कि ऐसों का फैसला करें, बस फूलों को तोड़-तोड़ कर चंगेर भरने लगे। चलो छुट्टी हुई, न रहे बाँस न बाजे बाँसुरी। क्या अच्छा झगड़ा मिटाया है! इसके बदले में वे बड़े-बड़े दरख्त खुश हो हवा की मदद से झुक झुक कर मालियों को सलाम करने लगे जिनकी टहनियों में एक भी फूल दिखाई नहीं देता था। ऐसा क्यों न करें? उनमें था ही क्या जो दूसरों को महक देते, अपनी सूरत सभी को भाती है और अपना-सा होते देख सभी खुश होते हैं।
लीजिए उन परीजमालों ने भी पलंग का पीछा छोड़ा और उठते ही आईने केमुकाबिल हो बैठी जिनके बनाव को चाहने वालों ने रात भर में विथोर कर रख दिया था। झटपट अपनी सम्बुली जुल्फों को सुलझा, माहताबी चेहरों को गुलाबजल से साफ कर, अलबेली चाल से अठखेलियाँ करतीं, चम्पई दुपट्टे सँभालती, रविशों पर घूमने और फूलों के मुकाबले में रुक-रुक कर पूछने लगी कि 'कहिये, आप अच्छे या?' हम जब जवाब न पाया तो हाथ बढ़ा तोड़ लिया और बालियों में झुमकी की जगह रख आगे बढ़ीं। गुलाब की पटरी तक पहुंची थीं कि काँटों ने आँचल पकड़ा और इशारे से कहा, "जरा ठहर जाइए, आपके इस तरह लापरवाही से जाने से उलझन होती है, और नहीं तो चार आँखें ही करती और आँसू पोंछती जाइए!"
जाने दीजिए ये सब घमण्डी हैं। हमें तो कुछ उन लोगों की कुलबुलाहट भली मालूम होती है जो सुबह होने के दो घण्टे पहले ही उठ, हाथ-मुँह धो, जरूरी कामों से छुट्टी पा बगल में धोती दबा गंगाजी की तरफ लपके जाते हैं और वहाँ पहुँच स्नान कर, भस्म का चन्दन लगा, पटरों पर बैठ संध्या करते-करते सुबह के सुहावने समय का आनन्द पतित-पावनी श्रीगंगाजी की पाप-नाशिनी तरंगों में ले रहे हैं। इधर गुप्ती में घुसी उँगलियों ने प्रेमानन्द में मग्न मनराज की आज्ञा से गिरिजापति का नाम ले एक दाना पीछे हटाया और उधर तरनतारिणी भागवती जाह्नवी की लहरें तख्तों ही से छू-छू कर दस-बीस जन्म का पाप बहा ले गईं। सुगन्धित हवा के झपेटे कहते फिरते हैं-"जरा ठहर जाइये, अर्घा न उठाइये, अभी भगवान् सूर्यदेव के दर्शन देर में होंगे, तब तक आप कमल के फूलों को खोल कर इस तरह पर श्रीगंगाजी को चढ़ाइये कि लड़ी टूटने न पावे, फिर देखिये, देवता उसे खुद-ब-खुद मालाकार बना देते हैं या नहीं!"
ये सब तो सत्पुरुषों के काम हैं जो यहाँ भी आनन्द ले रहे हैं और वहाँ भी मजा लूटेंगे। आप जरा मेरे साथ चल कर उन दो दिलजलों की सूरत देखिये जो रात भर जागते और इधर-उधर दौड़ते रहे हैं और सुबह के सुहावने समय में एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ चारों तरफ देखते हुए सोच रहे हैं कि किधर जायँ, क्या करें? चाहे वे कितने ही बेचैन क्यों न हों मगर पहाड़ों से टक्कर खाते हुए सुबह की ठण्डी-ठण्डी हवा के झोंकों के डपटने और हिला कर जताने से उन छोटे-छोटे जंगली फूलों के पौधों की तरफ नजर डाल ही देते हैं जो दूर तक कतार बाँधे मस्ती से झूम रहे हैं, उन क्यारियों की तरफ ताक ही लेते हैं जिनके फूल ओस के बोझ से तंग हो टहनियाँ छोड़ पत्थर के ढोकों का सहारा ले रहे हैं, उन साखू और शीशम के पत्तों की घनघनाहट सुन ही लेते हैं जो दक्खिन से आती हुई सुगन्धित हवा को रोक, रहे-सहे जहर को चूस, गुणकारी बना उन तक आने का हुक्म देते हैं।
इन दो आदमियों में से एक तो लगभग बीस वर्ष की उम्र का बहादुर सिपाही है जो ढाल-तलवार के अलावा हाथ में तीर-कमान लिये बड़ी मुस्तैदी से खड़ा है, मगर दूसरे के बारे में हम कुछ नहीं कह सकते कि वह कौन या किस दर्जे और इज्जत का आदमी है। इसकी उम्र चाहे पचास से ज्यादे क्यों न हो मगर अभी तक इसके चेहरे पर वल का नाम-निशान नहीं है, जवानों की तरह खूबसूरत चेहरा दमक रहा है, बेशकीमत पोशाक और हरबों की तरफ खयाल करने से तो यही कहने को जी चाहता है कि किसी फौज का सेनापति है, मगर नहीं, उसका रुआबदार और गम्भीर चेहरा इशारा करता है कि यह कोई बहुत ही ऊँचे दर्जे का आदमी है जो कुछ देर खड़ा एकटक वायुकोण की तरफ देख रहा है।
सूर्य की किरणों के साथ ही साथ लाल वर्दी में बेशुमार फौजी आदमी उत्तर से दक्खिन की तरफ जाते दिखाई पड़े जिससे इस वहादुर का चेहरा जोश में आकर और भी दमक उठा और यह धीरे से बोला, "लो, हमारी फौज भी आ पहुँची!"
थोड़ी ही देर में वह फौज इस पहाड़ी के नीचे आकर रुक गई जिस पर ये दोनों खड़े थे और एक आदमी पहाड़ी के ऊपर चढ़ता हुआ दिखाई दिया जो बहुत जल्द इन दोनों के पास पहुँच कर सलाम कर खड़ा हो गया।
इस नये आये हुए आदमी की उम्र भी पचास से कम न होगी। इसके सिर और मूँछों के बाल चौथाई सुफेद हो चुके थे। कद के साथ-साथ खूबसूरत चेहरा भी कुछ लम्बा था। इसका रंग सिर्फ गोरा ही न था, बल्कि अभी तक रगों में दौड़ती हुई खून की सुर्खी इसके गालों पर अच्छी तरह उमड़ रही थी, बड़ी-बड़ी स्याह और जोश भरी आँखों में गुलाबी डोरियां बहुत भली मालूम होती थीं। इसकी पोशाक ज्यादे कीमत की या कामदार न थी, मगर कम दाम की भी न थी। उम्दे और मोटे स्याह मखमल की यह पोशाक इतनी चुस्त थी कि उसके अंगों की सुडौली कपड़े के ऊपर से जाहिर हो रही थी। कमर में सिर्फ एक खंजर और लपेटा हुआ कमन्द दिखाई देता था, बगल में सुर्ख मखमल का एक वटुआ भी लटक रहा था।
पाठकों को ज्यादा देर तक हैरानी में न डाल कर साफ-साफ कह देना ही पसन्द करते हैं कि यह तेजसिंह हैं और इनके पहले पहुँचे हुए दोनों आदमियों में एक राजा वीरेन्द्रसिंह और दूसरे उनके छोटे लड़के कुँअर आनन्दसिंह हैं, जिनके लिए हमें ऊपर कुछ फजूल बक जाना पड़ा।
राजा वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह कुछ देर तक सलाह करते रहे, इसके बाद तीनों बहादुर पहाड़ी के नीचे उतर अपनी फौज में मिल गये और दिल खुश करने के सिवाय बहादुरों को जोश में भर देने वाले बाजे को आवाज के तालों पर एक साथ कदम रखती हुई वह फौज दक्खिन की तरफ रवाना हुई।
४
हम ऊपर लिख ही आये हैं कि माधवी के यहां तीन आदमी-अर्थात् दीवान अग्निदत्त, कुबेरसिंह सेनापति और धर्मसिंह कोतवाल-मुखिया थे और तीनों मिलकर माधवी के राज्य का आनन्द लेते थे। इन तीनों में अग्निदत्त का दिन बहुत मजे में कटता था, क्योंकि एक तो वह दीवान के मर्तबे पर था, दूसरे माधवी ऐसी खूबसूरत औरत उसे मिली थी। कुबेरसिंह और धर्मसिंह इसके दिली दोस्त थे, मगर कभी-कभी जब उन दोनों को माधवी का ध्यान आ जाता तो चित्त की वृत्ति बदल जाती और जी में कहते कि 'अफसोस, माधवी मुझे न मिली।'
पहले इन दोनों को यह खबर न थी कि माधवी कैसी है। बहुत कहने-सुनने पर एक दिन दीवान साहब ने इन दोनों को माधवी को देखने का मौका दिया था। उसी दिन से इन दोनों ही के जी में माधवी की सूरत चुभ गई थी और उसके बारे में बहुत-कुछ सोचा करते थे।
आज हम आधी रात के समय दीवान अग्निदत्त को अपने सुनसान कमरे में अकेले चारपाई पर लेटे किसी सोच में डूबे हुए देखते हैं। न मालूम वह क्या सोच रहा है या किस फिक्र में पड़ा है, हाँ, एक दफे उसके मुँह से यह आवाज जरूर निकली-"कुछ समझ में नहीं आता! इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि उसने अपना दिल खुश करने का कोई सामान वहाँ पैदा कर लिया है। तो मैं बेफिक्र क्यों बैठा हूँ? खैर पहले अपने दोस्तों से तो सलाह कर लूँ।" यह कहने के साथ ही वह चारपाई से उठ बैठा और कमरे में धीरे-धीरे टहलने लगा, आखिर उसने खूटी से लटकती हुई अपनी तलवार उतार ली और मकान के नीचे उतर आया।
दरवाजे पर बहुत से सिपाही पहरा दे रहे थे। दीवान साहब को कहीं जाने के लिए तैयार देख ये लोग भी साथ चलने को तैयार हुए, मगर दीवान साहब के मना करने से उन लोगों को लाचार हो उसी जगह अपने काम पर मुस्तैद रहना पड़ा।
अकेले दीवान साहब वहाँ से रवाना हुए और बहुत जल्द कुबेरसिंह सेनापति के मकान पर जा पहुंचे जो इनके यहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक सुन्दर सजे हुए मकान में बड़े ठाठ के साथ रहता था।
दीवान साहब को विश्वास था कि इस समय सेनापति अपने ऐशमहल में आनन्द से सोता होगा, वहाँ से बुलवाना पड़ेगा, मगर नहीं, दरवाजे पर पहुँचते ही पहरे वालों से पूछने पर मालूम हुआ कि सेनापति साहब अभी तक अपने कमरे में हैं, बल्कि कोतवाल साहब भी इस समय उन्हीं के पास हैं।
अग्निदत्त यह सोचता हुआ ऊपर चढ़ गया कि आधी रात के समय कोतवाल यहाँ क्यों आया है और ये दोनों इस समय क्या सलाह-विचार कर रहे हैं। कमरे में पहुँचते ही देखा कि सिर्फ वे ही दोनों एक गद्दी पर तकिये के सहारे लेटे हुए कुछ बात कर रहे हैं जो यकायक दीवान साहब को अन्दर पैर रखते देख उठ खड़े हुए और सलाम करने के बाद सेनापति साहब ने ताज्जुब में आकर पूछा-
"यह आधी रात के समय आप घर से क्यों निकले?"
दीवान-ऐसा ही मौका आ पड़ा, लाचार सलाह करने के लिए आप दोनों से मिलने की जरूरत हुई।
कोतवाल-आइए बैठिए, कुशल तो है?
दीवान-हाँ, कुशल ही है, मगर कई खुटकों ने जी बेचैन कर रखा है।
सेनापति—सो क्या? कुछ कहिए भी तो!
दीवान-हाँ कहता हूँ, इसीलिए आया हूँ, मगर पहले (कोतवाल की तरफ देख कर) आप तो कहिए इस समय यहाँ कैसे पहुँचे?
कोतवाल—मैं तो यहाँ बहुत देर से हूँ, सेनापति साहब की विचित्र कहानी ने ऐसा उलझा रक्खा था कि बस क्या कहूँ। हाँ, आप अपना हाल कहिए, जी बेचैन हो रहा है।
दीवान-मेरा कोई नया हाल नहीं है, केवल माधवी के विषय में कुछ सोचने-विचारने आया हूँ।
सेनापति–माधवी के विषय में अब किस नये सोच ने आपको आ घेरा? कुछ तकरार की नौबत तो नहीं आई?
दीवान-तकरार की नौबत अभी आई तो नहीं, मगर आना चाहती है।
सेनापति–सो क्यों?
दीवान-उसके रंग-ढंग आजकल बेढब नजर आते हैं, तभी तो देखिए, इस समय मैं यहाँ हूँ, नहीं तो पहर रात के बाद क्या कोई मेरी सूरत देख सकता था?
कोतवाल-वहाँ उसका जी कैसे लगता है?
दीवान-यही तो ताज्जुब है, मैं सोचता हूँ कि कोई मर्द वहाँ जरूर है क्योंकि वह कभी अकेले रहने वाली नहीं।
दीवान-पता लगाना चाहिए।
दीवान-पता लगाने के उद्योग में मैं कई दिन से लगा हूँ मगर कुछ हो नहीं सका। जिस दरवाजे को खोल कर वह आती और जाती है उसकी ताली भी इसीलिए बनवाई कि धोखे में वहाँ तक जा पहुँचूँ, मगर काम न चला, क्योंकि जाती समय अन्दर से वह न मालूम ताले में क्या कर जाती है कि चाभी नहीं लगती।
कोतवाल-तो दरवाजा तोड़ के वहाँ पहुँचना चाहिए।
दीवान-ऐसा करने से बड़ा फसाद मचेगा।
कोतवाल-फसाद करके कोई क्या कर लेगा? राज्य तो हम तीनों की मुट्ठी में है!
इतने ही में बाहर दरवाजे इतने ही में बाहर किसी आदमी के पैरों की चाप मालूम हुई। तीनों देर तक उसी तरफ देखते रहे, मगर कोई न आया। कोतवाल यह कहता हुआ कि 'कहीं कोई छिप के बातें सुनता न हो।' उठा, और कमरे के बाहर जाकर इधर-उधर देखने लगा, मगर किसी का पता न चला, लाचार फिर कमरे में चला आया और बोला, "कोई नहीं है, खाली धोखा हुआ।"
इस जगह विस्तार से यह लिखने की कोई जरूरत नहीं कि इन तीनों में क्या-क्या बातचीत होती रही या इन लोगों ने कौन-सी सलाह पक्की की, हाँ, इतना कहना जरूरी है कि बातों-ही-बातों में इन तीनों ने रात बिता दी और सवेरा होते ही अपने-अपने घर का रास्ता लिया।
दूसरे दिन पहर रात जाते-जाते कोतवाल साहब के घर में एक विचित्र बात हुई। वे अपने कमरे में बैठे कचहरी के कुछ जरूरी कागजों को देख रहे थे कि इतने ही में शोरगुल की आवाज उनके कानों में आई। गौर करने से मालूम हुआ कि पर लड़ाई हो रही है। कोतवाल साहब के सामने जो मोमी शमादान जल रहा था उसी के पास एक घण्टी पड़ी हुई थी, उठा कर बजाते ही एक खिदमतगार दौड़ा-दौड़ा सामने आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। कोतवाल साहब ने कहा, "दरियाफ्त करो, बाहर कैसा कोलाहल मचा हुआ है?" खिदमतगार दौड़ा बाहर गया और तुरन्त लौट कर बोला, "न मालूम कहाँ से दो आदमी आपस में लड़ते हुए आये हैं, फरियाद करने के लिए बेधड़क भीतर धंसे आते थे। पहरे वालों ने रोका तो उन्हीं से झगड़ा करने लगे।"
कोतवाल-उन दोनों की सूरत-शक्ल कैसी है?
खिदमतगार-दोनों भले आदमी मालूम पड़ते हैं, अभी मूँछें नहीं निकली हैं, बड़े ही खूबसूरत हैं, मगर खून से तर-बतर हो रहे हैं।
कोतवाल-अच्छा, कहो, उन दोनों को हमारे सामने हाजिर करें।
हुक्म पाते ही खिदमतगार फिर बाहर गया और थोड़ी ही देर में कई सिपाही उन दोनों को लिए हुए कोतवाल के सामने हाजिर हुए। नौकर की बात बिल्कुल सच निकली। वे दोनों कम-उम्र और बहुत खूबसूरत जवान थे, बदन पर लिबास भी बेशकीमत था, कोई हर्वा उनके पास न था, मगर खून से उन दोनों का कपड़ा तर हो रहा था।
कोतवाल-तुम लोग आपस में क्यों लड़ते हो, और हमारे आदमियों से फसाद करने पर उतारू क्यों हुए?
एक-(सलाम करके) हम दोनों भले आदमी हैं, सरकारी सिपाहियों ने बदजबानी की, लाचार गुस्सा तो चढ़ा ही हुआ था, बात बिगड़ गई।
कोतवाल—अच्छा, इसका फैसला पीछे होता रहेगा, पहले तुम यह कहो कि आपस में क्यों खूनखराबी कर बैठे और तुम दोनों का मकान कहाँ है?
दूसरा-जी हम दोनों आपकी रैयत हैं और गयाजी में रहते हैं, दोनों सगे भाई हैं, एक औरत के पीछे लड़ाई हो रही है कि जिसका फैसला आपसे चाहते हैं, बाकी हाल इतने आदमियों के सामने कहना हम लोग पसन्द नहीं करते।
कोतवाल साहब ने सिर्फ उन दोनों को वहां रहने दिया, बाकी सबको वहाँ से हटा दिया, निराला होने पर फिर उन दोनों से लड़ाई का सबब पूछा।
एक-हम दोनों भाई सरकार से कोई मौजा ठीका लेने के लिए यहाँ आ रहे थे। यहाँ से तीन कोस पर एक पहाड़ी है, कुछ दिन रहते ही हम दोनों वहाँ पहुँचे और थोड़ा सुस्ताने की नीयत से उतर पड़े, घोड़ों को चरने के लिए छोड़ दिया और एक पेड़ के नीचे पत्थर की चट्टान पर बैठ बातचीत करने लगे।
दूसरा-(सिर हिला कर) नहीं, कभी नहीं।
पहला-सरकार इसे हुक्म दीजिये कि चुप रहे, पहले मैं कह लूं, फिर जो कुछ इसके जी में आये कहे।
कोतवाल—(दूसरे को डाँट कर) बेशक ऐसा ही करना होगा!
दूसरा-बहुत अच्छा।
पहला-थोड़ी ही देर बैठे थे कि पास ही किसी औरत के रोने की बारीक आवाज आई जिसके सुनने से कलेजा पानी हो गया।
दूसरा-ठीक, बहुत ठीक।
कोतवाल-(लाल आँखें करके) क्यों जी, तुम फिर बोलते हो?
दूसरा-अच्छा, अब न बोलूँगा!
पहला-हम दोनों उठकर उसके पास गए। आह, ऐसी खूबसूरत औरत तो आज तक किसी ने न देखी होगी, बल्कि मैं जोर देकर कहता हूं कि दुनिया में ऐसी खूबसूरत कोई दूसरी न होगी। वह अपने सामने एक तस्वीर को, जो चौखटे में जड़ी हुई थी, रखे बैठी थी और उसे देख फूट-फूट कर रो रही थी।
कोतवाल-वह तस्वीर किसकी थी, तुम पहचानते हो?
पहला-जी हाँ, पहचानता हूँ, वह मेरी तस्वीर थी।
दूसरा-झूठ-झूठ, कभी नहीं, बेशक वह तस्वीर आपकी थी! मैं इस समय बैठा उस तस्वीर से आपकी सूरत मिलान कर गया, बिल्कुल आपसे मिलती है, इसमें कोई शक नहीं! आप इसके हाथ में गंगा-जल देकर पूछिये, किसकी तस्वीर थी?
कोतवाल-(ताज्जुब में आकर) क्या मेरी तस्वीर थी?
दूसरा-बेशक आपकी तस्वीर थी, आप इससे कसम देकर पूछिये तो सही।
कोतवाल-(पहले से) क्यों जो, तुम्हारा भाई क्या कहता है?
पहला-जी ई ई...
कोतवाल-(जोर से) साफ-साफ कहो, सोचते क्या हो?
पहला—जी, बात तो यही ठीक है, आप ही की तस्वीर थी।
कोतवाल—फिर झूठ क्यों बोले?
पहला-बस, यही एक बात झूठ मुंह से निकल गई। अब कोई बात झूठ न कहूँगा, माफ कीजिये।
कोतवाल बेचारा ताज्जुब में आकर सोचने लगा कि उस औरत की मुझमें क्योंकर मुहब्बत हो गई जिसकी खूबसूरती की ये लोग इतनी तारीफ कर रहे हैं? थोड़ी देर बाद फिर पूछा-
कोतवाल-हाँ, तो आगे क्या हुआ?
पहला—(अपने भाई की तरफ इशारा करके) बस, यह उस पर आशिक हो गया और उसे तंग करने लगा।
दूसरा-यह भी उस पर आशिक होकर उसे छेड़ने लगा।
पहला-जी नहीं, उसने मुझे कबूल कर लिया और मुझसे शादी करने पर भी राजी हो गई, बल्कि उसने यह भी कहा कि मैं दो दिन तक यहां रह कर तुम्हारा आसरा देखूँगी, अगर तुम पालकी लेकर आओगे तो तुम्हारे साथ चली चलूंगी।
दूसरा-जी नहीं, यह बड़ा भारी झूठा है, जब यह उसकी खुशामद करने लगा तब उसने कहा कि मैं उसी के लिए जान देने को तैयार हूँ, जिसकी तस्वीर मेरे सामने है। जब इसने उसकी बात न सुनी तो उसने अपनी तलवार से इसे जख्मी किया और मुझसे बोली कि तुम जाकर मेरे दोस्त को जहाँ भी हो ढूंढ़ निकालो और कह दो कि मैं तुम्हारे लिए बर्बाद हो गई, अब भी तो सुध लो, जब मैंने इसे मना किया तो यह मुझसे झगड़ पड़ा। असल में यही लड़ाई का सबब हुआ।
पहला-जी नहीं, यह सन्देशा उसने मुझे दिया क्योंकि यही उसे दुःख दे रहा था।
दूसरा-नहीं, यह झूठ बोलता है।
पहला-नहीं, यह झूठा है, मैं ठीक-ठीक कहता हूँ।
कोतवाल-अच्छा मुझे उस औरत के पास ले चलो, मैं खुद उससे पूछ लूँगा कि कौन झूठा है, और कौन सच्चा है।
पहला-क्या अभी तक वह उसी जगह होगी?
दूसरा-जरूर वहाँ होगी, यह बहाना करता है क्योंकि वहाँ जाने से यह झूठा साबित हो जाएगा।
पहला—(अपने भाई की तरफ देखकर) झूठा तू साबित होगा। अफसोस तो इतना ही है कि अब मुझे वहाँ का रास्ता भी याद नहीं।
दूसरा-(पहले की तरफ देखकर) तू रास्ता भूल गया तो क्या हुआ, मुझे तो याद है। (कोतवाल साहब की तरफ देखकर) मैं जरूर आपको वहाँ ले चलकर इसे झूठा साबित करूँगा! चलिए, मैं आपको वहाँ ले चलता हूँ।
कोतवाल-चलो।
कोतवाल साहब तो खुद बेचैन हो रहे थे, और चाहते थे कि जहाँ तक हो, वहाँ जल्द पहुँच कर देखना चाहिए कि वह औरत कैसी है जो मुझ पर आशिक हो तस्वीर सामने रख याद किया करती है। एक पिस्तौल भरी-भराई कमर में रख उन दोनों भाइयों को साथ ले मकान से नीचे उतरे। उनको बाहर जाने के लिए मुस्तैद देख कई सिपाही साथ चलने को तैयार हुए। उन्होंने अपनी सवारी का घोड़ा मंगवाया और उस पर सवार हो सिर्फ अर्दली के दो सिपाही साथ ले उन दोनों भाइयों के पीछे-पीछे रवाना हुए। दो घण्टे तक बराबर चलने के बाद एक छोटी-सी पहाड़ी के नीचे पहुँच वे दोनों भाई रुके और कोतवाल साहब को घोड़े से उतरने के लिए कहा।
कोतवाल-क्या घोड़ा आगे नहीं जा सकता?
पहला–घोड़ा आगे जा सकता है, मगर मैं एक दूसरी ही बात सोचकर आपको उतरने के लिए कहता हूँ।
कोतवाल-वह क्या?
पहला–जिस औरत के पास आप आये हैं, वह इसी जगह है; दो ही कदम आगे बढ़ने से आप उसे बखूबी देख सकते हैं, मगर मैं चाहता हूँ कि सिवाय आपके ये दोनों प्यादे उसे देखने न पाएँ। इसके लिए मैं किसी तरह जोर नहीं दे सकता, मगर इतना जरूर कहूँगा कि आप आगे बढ़ झाँक कर उसे देख लें, फिर अगर जी चाहे तो इन दोनों को भी साथ ले जायें, क्योंकि वह अपने को गया को रानी बताती है।
कोतवाल-(ताज्जुब से) अपने को गया की रानी बताती है?
दूसरा-जी हाँ।
अब तो कोतवाल साहब के दिल में कोई दूसरा ही शक पैदा हुआ। वह तरह-तरह की बातें सोचने लगे। "गया की रानी तो हमारी माधवी है, यह दूसरी कहाँ से पैदा हुई? क्या वह माधवी तो नहीं है? नहीं-नहीं, वह भला यहाँ क्यों आने लगी! उससे मुझसे क्या सम्बन्ध? वह तो दीवान साहब की हो रही है। मगर वह आई भी हो तो कोई ताज्जुब नहीं, क्योंकि एक दिन हम तीनों दोस्त एक साथ महल में बैठे थे और रानी माधवी यहां पहुंच गई थी, मुझे खूब याद है, उस दिन उसने मेरी तरफ बेढब तरह से देखा था और दीवान साहब की आँखें बचा घड़ी-घड़ी देखती थी, शायद उसी दिन से मुझ पर आशिक हो गई हो! हाय, वह अनोखी चितवन कभी न भूलेगी। अहा, अगर यह वही हो, और मुझे विश्वास हो कि मुझसे प्रेम रखती है तो क्या बात है! मैं ही राजा हो जाऊँगा और दीवान साहब को तो बात-की-बात में खपा डालूँगा! मगर ऐसी किस्मत कहाँ? खैर जो हो, इनकी बात मान जरा झाँक कर देखना तो जरूर चाहिए, शायद ईश्वर ने दिन फेरा ही हो!" ऐसी-ऐसी बहुत-सी बातें सोचते-विचारते कोतवाल साहब घोड़े से उतर पड़े और उन दोनों भाइयों के कहे मुताबिक आगे बढ़े।
यहाँ से पहाड़ियों का सिलसिला बहुत दूर तक चला गया था। जिस जगह कोतवाल साहब खड़े थे, वहाँ दो पहाड़ियाँ इस तरह आपस में मिली हुई थीं कि बीच में कोसों तक लम्बी दरार मालूम पड़ती थी, जिसके बीच मे बहता हुआ पानी का चश्मा और दोनों तरफ छोटे-छोटे दरख्त बहुत भले मालूम पड़ते थे। इधर-उधर बहुत-सी कन्दराओं पर निगाह पड़ने से यही विश्वास होता था कि ऋषियों और तपस्वियों के प्रेमी अगर यहाँ आवें तो अवश्य उनके दर्शन से अपना जन्म कृतार्थ कर सकेंगे।
दरार के कोने पर पहुँच कर दोनों भाइयों ने कोतवाल साहब को बाई तरफ झाँकने के लिए कहा। कोतवाल साहब ने झांककर देखा, साथ ही वे एकदम चौंक पड़े और मारे खुशी के भरे हुए गले से चिल्ला कर बोले, "अहा हा, मेरी किस्मत जागी! बेशक वह रानी माधवी ही तो है!"
५
कमला को विश्वास हो गया कि किशोरी को कोई धोखा देकर ले भागा। वह उस बाग में बहुत देर तक न ठहरी, ऐयारी के सामान से दुरुस्त थी ही, एक लालटेन हाथ में लेकर वहां से चल पड़ी और बाग से बाहर हो चारों तरफ घूम-घूमकर किसी ऐसे निशान को ढूँढ़ने लगी जिससे यह मालूम हो कि किशोरी किस सवारी पर यहाँ से गई है, मगर जब तक वह उस आम की बारी में न पहुँची तब तक सिवाय पैरों के चिह्न के और किसी तरह का कोई निशान जमीन पर दिखाई न पड़ा।
बरसात का दिन था और जमीन अच्छी तरह पर नम हो गई थी, इसीलिए आम की बारी में घूम-घूमकर कमला ने मालूम कर लिया कि किशोरी यहाँ से रथ पर सवार होकर गई है और उसके साथ में कई सवार भी हैं क्योंकि रथ के पहियों का दोहरा निशान और बैलों के खुर जमीन पर साफ मालूम पड़ते थे, इसी तरह घोड़ों की टापों के निशान भी अच्छी तरह दिखाई देते थे।
कमला कई कदम उस निशान की तरफ चली गयी जिधर रथ गया था और बहुत जल्द मालूम कर लिया कि किशोरी को ले जाने वाले किस तरफ गये हैं। इसके बाद वह पीछे लौटी और सीधे अस्तबल में पहुँच एक तेज घोड़े पर बहुत जल्द चारजामा कसने का हुक्म दिया।
कमला का हुक्म ऐसा न था कि कोई उससे इन्कार करता। घोड़ा बहुत जल्द कस कर तैयार किया गया और कमला उस पर सवार हो तेजी के साथ उस तरफ रवाना हुई जिधर रथ पर सवार होकर किशोरी के जाने का उसे विश्वास हो गया था। पाँच कोस बराबर चले जाने के बाद कमला एक चौराहे पर पहुँची, जहाँ से बाईं तरफ का रास्ता चुनार को गया था, दाईं तरफ की सड़क रीवाँ होते हुए गयाजी तक पहुँची थी, तथा सामने का रास्ता एक भयानक जंगल से होता हुआ कई तरफ को फूट गया था।
इस चौमुहानी पर पहुँच कर कमला रुकी और सोचने लगी कि किधर जाऊँ? अगर चुनार वाले किशोरी को ले गये होंगे, तो इसी बाईं तरफ से गये होंगे, और किशोरी की दुश्मन माधवी ने उसे फंसाया होगा तो रथ दाहिनी तरफ से गयाजी को गया होगा, सामने की सड़क से रथ ले जाने वाला तो कोई खयाल में नहीं आता क्योंकि यह जंगल का रास्ता बहुत ही खराब और पथरीला है।
चन्द्रमा निकल आया था और रोशनी अच्छी तरह फैल चुकी थी। कमला घोड़े से नीचे उतर गयी और दाहिनी तरफ जमीन पर रथ के पहिये का दाग ढूँढ़ने लगी मगर कुछ मालूम न हुआ, लाचार घोड़े पर सवार हो सोचने लगी कि किधर जाऊँ, क्या करूँ।
हम पहले लिख आये हैं कि रथ पर जाते-जाते जव किशोरी ने जान लिया कि वह धोखे में डाली गयी है तब उसके मुंह से कई शब्द ऐसे निकले जिन्हें सुन नकली कमला होशियार हो गयी और रथ के नीचे कूद एक घोड़े पर सवार हो पीछे की तरफ लौट गयी।
लौटी हुई नकली कमला ठीक उसी समय घोड़ा दौड़ाती हुई उस चौराहे पर पहुँची जिस समय असली कमला वहाँ पहुँचकर सोच रही थी कि किधर जाऊं क्या करूँ? असली कमला ने सामने से तेजी के साथ आते हुए एक सवार को देख घोड़ा रोकने के लिए ललकारा, मगर वह क्यों रुकने लगी थी, हां, उसे असली कमला के दाहिनी तरफ वाली राह पर जाने के लिए घूमना था, इसलिए अपने घोड़े की तेजी उसे कम करनी ही पड़ी।
जब असली कमला ने देखा कि सामने से आया हुआ सवार उसके ललकारने से भी किसी तरह नहीं रुकता और दाहिनी सड़क से निकल जाना चाहता है तो झट कमर से दुनाली पिस्तौल निकाल उसने घोड़े पर वार किया। गोली लगते ही घोड़ा नकली कमला को लिये जमीन पर गिरा, मगर घोड़े के गिरते ही वह बहुत ही जल्द सम्हलकर उठ खड़ी हुई और उसने भी कमर से दुनाली पिस्तौल निकाल असली कमला पर गोली चलाई।
असली कमला तो पहले ही सम्हली हुई थी, गोली की मार से बच गयी, फिर दूसरी गोली आयी पर वह भी न लगी। लाचार नकली कमला ने अपनी पिस्तौल फिर भरने का इरादा किया मगर असली कमला ने उसे यह मौका न दिया। दोनों गोली बेकार जाते देख वह समझ गयी कि उसकी पिस्तौल खाली हो गयी है, हाथ में पिस्तौल लिये हुए झट उसके कल्ले पर पहुँच गयी और ललकार कर बोली, "खबरदार, जो पिस्तौल भरने का इरादा किया? देख, मेरी पिस्तौल में दूसरी गोली अभी मौजूद है!" तकली कमला भी यह सोचकर चुपचाप खड़ी रह गयी कि अब वह अपने दुश्मन का कुछ नहीं बिगाड़ सकती क्योंकि पिस्तौल की दोनों गोलियां बर्बाद हो चुकी थीं और घोड़ा उसका मर चुका था।
पिस्तौल के अलावे दोनों की कमर में खंजर भी था मगर उसकी जरूरत न पड़ी। असली कमला ने ललकार कर पूछा, "सच बता, तू कौन है?"
नकली कमला को जान दे देना कबूल था मगर अपने मुँह से यह बताना मंजूर न था कि वह कौन है। असली कमला ने यह देख अपने कोड़े का ऐसा चपेटा दिया कि वह किसी तरह सम्हल न सकी और जमीन पर गिर पड़ी। जब तक वह होशियार होकर उठना चाहे, तब तक असली कमला झट घोड़े से कूद उसकी छाती पर सवार दिखाई देने लगी।
असली कमला ने जबर्दस्ती उसकी नाक में बेहोशी की दवा लूंस दी और जब वह बेहोश हो गयी तो उसकी छाती पर से उतरकर अलग खड़ी हो गयी।
असली कमला जब उसकी छाती पर सवार हुई तो उसे अपनी ही सूरत का पाया, इसलिए समझ गयी कि यह कोई ऐयार या ऐयारा है, सिवाय इसके किशोरी की सखियों की जुबानी उसने यह मालूम कर ही लिया था कि कोई उसी की सूरत बना किशोरी को ले गया है। अब उसे विश्वास हो गया कि किशोरी को इसी ने धोखा दिया है।
थोड़ी देर बाद कमला ने अपने बटुए में से पानी-भरी छोटी-सी बोतल निकाली और नकली कमला का मुँह धोकर साफ किया। इसके बाद चकमक से आग निकाल बत्ती जलाकर पहचानना चाहा कि वह कौन है मगर बिना ऐसा किये वह केवल चन्द्रमा की ही मदद से पहचान ली गयी कि माधवी की सखी ललिता है। क्योंकि कमला उसे अच्छी तरह जानती थी, और वर्षों साथ रहने के अलावा मिला-जुला भी करती थी।
कमला को विश्वास तो हो ही गया कि किशोरी को धोखा देकर ले जाने वाली यही ललिता है मगर इस बात का ताज्जुब बना ही रहा कि वह सामने से लौटकर आती हुई क्यों दिखाई पड़ी! कमला यह भी जानती थी कि चाहे जान चली मगर ललिता असल भेद कभी न बतावेगी, इसलिए उसकी जुबानी पता लगाने का उद्योग करना उसने व्यर्थ समझा और अपने साथ ललिता को घोड़े पर लादकर घर की तरफ पलट पड़ी।
रात बिलकुल बीत चुकी थी, बल्कि कुछ दिन निकल आया था जब ललिता को लादे हुए कमला घर पहुँची। यहाँ किशोरी के गायब होने से बड़ा ही हाहाकार मचा हुआ था। उसकी खोज में कई आदमी चारों तरफ जा चुके थे। किशोरी का नाना रणधीरसिंह भारी जमींदार होने के सिवाय बड़ा ही दिमागदार और जबर्दस्त आदमी था। उसने यही समझ रखा था कि शिवदत्त के दुश्मन वीरेन्द्रसिंह की तरफ से यह कार्रवाई की गयी है। मगर जब ललिता को लिये हुए कमला पहुँची और उसकी जुबानी सब हाल मालूम हुआ तब माधवी की बदमाशी पर बहुत बिगड़ा। वह माधवी की चाल-चलन पर पहले से ही रंज था मगर कुछ जोर न चलने से लाचार था। आज गुस्से के मारे इस बात का बिलकुल ध्यान न रहा कि माधवी एक भारी राज्य की मालिक है और ज़बर्दस्त फौज रखती है, उसने कमला के मुंह से सब हाल सुनते ही तलवार हाथ में ले कसम खा ली कि, "जिस तरह हो सकेगा, अपने हाथ से माधवी का सिर काट कलेजा ठंडा करूँगा।"
ललिता एक अँधेरी कोठरी में कैद की गयी और रणधीरसिंह की आज्ञा पा कमला अपने बड़े भाई हरनामसिंह को साथ ले किशोरी की मदद को पैदल ही चल दी।
कमला आज भी उसी कल वाले रास्ते पर रवाना हुई और दोपहर होते-होते उसी चौराहे पर पहुँची जहाँ कल ललिता मिली थी। वे दोनों बेधड़क सामने वाली सड़क पर चले।
चौराहे के आगे लगभग तीन कोस चले जाने बाद खराब और पथरीली राह मिली जिसे देख हरनामसिंह ने कहा, "इस राह से रथ ले जाने में जरूर तकलीफ हुई होगी।"
कमला-बेशक ऐसा ही हुआ होगा, और मुझे तो अभी तक निश्चय ही नहीं हुआ कि किशोरी इसी राह से गयी है।
हरनामसिंह-मगर मैं तो यही समझता हूँ कि रथ इसी राह से गया है और किशोरी का साथ छोड़ कोई दूसरी कार्रवाई करने के लिए ललिता लौटी थी।
कमला-शायद ऐसा ही हो।
और थोड़ी दूर जाने के बाद पैर की एक पाजेब जमीन पर पड़ी हुई दिखाई दी। हरनामसिंह ने उसे देखते ही उठा लिया और कहा, "बेशक किशोरी इसी राह से गयी है, इस पाजेब को मैं खूब पहचानता हूँ।"
कमला-अब तो मुझे भी निश्चय हो गया कि किशोरी इधर ही से गयी है।
हरनामसिंह–हाँ, जब उसे मालूम हो गया कि उसने धोखा खाया और दुश्मनों के फंदे में पड़ गयी तब उसने यह पाजेब चुपके से जमीन पर फेंक दी।
कमला-इसलिए कि वह जानती थी कि उसकी खोज में बहुत से आदमी निकलेंगे और इधर आकर इस पाजेब को देखेंगे तो जान जायेंगे कि किशोरी इधर ही गयी है।
हरनामसिंह-मैं खयाल करता हूँ कि आगे चलकर किशोरी की फेंकी हुई और भी कोई चीज हम लोग जरूर देखेंगे।
कमला-बेशक ऐसा ही होगा।
कुछ आगे जाकर दूसरी पाजेब और उससे थोड़ी दूरी पर किशोरी के और कुछ गहने इन लोगों ने पाये। अब कमला को किशोरी के इसी राह से जाने का पूरा विश्वास हो गया और वे दोनों बेधड़क कदम बढ़ाते हुए राजगृह की तरफ रवाना हुए।
६
कुँअर इन्द्रजीतसिंह अभी तक उस रमणीक स्थान में विराज रहे हैं। जी कितना ही बेचैन क्यों न हो मगर उन्हें लाचार माधवी के साथ दिन काटना ही पड़ता है। खैर, जो होगा देखा जायेगा, मगर इस समय दो पहर दिन बाकी रहने पर भी कुँअर इन्द्रजीत-सिंह कमरे के अन्दर सुनहरे पायों की चारपाई पर आराम कर रहे हैं और एक लौंडी धीरे-धीरे पंखा झल रही है। हम ठीक नहीं कह सकते कि उन्हें नींद दबाये हुए है या जानबूझकर बहठियाये पड़े हैं और अपनी बदकिस्मती के जाल को सुलझाने की तरकीब सोच रहे हैं। खैर, इन्हें इसी तरह पड़े रहने दीजिए और आप जरा तिलोत्तमा के कमरे में चलकर देखिए कि वह माधवी के साथ किस तरह की बातचीत कर रही है। माधवी का हँसता हुआ चेहरा कहे देता है कि बनिस्बत और दिनों के आज वह खुश है, मगर तिलोत्तमा के चेहरे से किसी तरह की खुशी नहीं मालूम होती।"
माधवी ने तिलोत्तमा का हाथ पकड़कर कहा, "सखी, आज तुझे उतना खुश नहीं पाती हूँ जितनी मैं खुद हूँ।"
तिलोत्तमा–तुम्हारा खुश होना बहुत ठीक है!
माधवी-तो क्या तुम्हें इस बात की खुशी नहीं है कि किशोरी मेरे फन्दे में फँस गयी और एक कैदी की तरह मेरे यहाँ तहखाने में बन्द है?
तिलोत्तमा–इस बात की तो मुझे भी खुशी है।
माधवी-तो रंज किस बात का है? हाँ समझ गयी, अभी तक ललिता के लौटकर न आने का बेशक तुम्हें दुःख होगा।
तिलोत्तमा–ठीक है, मैं ललिता के बारे में भी बहुत-कुछ सोच रही हूँ। मुझे तो विश्वास हो गया है कि उसे कमला ने पकड़ लिया।
माधवी-तो उसे छुड़ाने की फिक्र करनी चाहिए।
तिलोत्तमा–मुझे इतनी फुरसत नहीं है कि उसे छुड़ाने के लिए जाऊँ क्योंकि मेरे हाथ-पैर किसी दूसरे ही तरदुद ने बेकार कर दिये हैं जिनकी तुम्हें जरा-भी खबर नहीं, अगर खबर होती तो आज तुम्हें भी अपनी ही तरह उदास पाती।
तिलोत्तमा की इस बात ने माधवी को चौंका दिया और वह घबराकर तिलोत्तमा का मुँह देखने लगी।
तिलोत्तमा–मुँह क्या देखती है, मैं झूठ नहीं कहती। तू तो अपने ऐश-आराम में ऐसी मस्त हो रही है कि दीन-दुनिया की खबर नहीं। तू जानती ही नहीं कि दो-चार दिन में ही तुझ पर कैसी आफत आने वाली है। क्या तुझे विश्वास हो गया कि किशोरी तेरी कैद में रह जाएगी? कुछ बाहर की भी खबर है कि क्या हो रहा है? क्या बदनामी ही उठाने के लिए तू गया का राज्य कर रही है? मैं पचास दफे तुझे समझा चुकी कि अपने चाल-चलन को दुरुस्त कर, मगर तूने एक न सुनी, लाचार तुझे तेरी मर्जी पर छोड़ दिया। और प्रेम के सबब मैं तेरा हुक्म मानती आयी, मगर अब मेरे सम्हाले नहीं सम्हलता!
माधवी-तिलोत्तमा, आज तुझे क्या हो गया है जो इतना कूद रही है? ऐसी कौन-सी आफत आ गयी है जिसने तुझे बदहवास कर दिया है? क्या तू नहीं जानती कि दीवान साहब इस राज्य का इन्तजाम कसी अच्छी तरह कर रहे हैं और सेनापति तथा कोतवाल अपने काम में कितने होशियार हैं? क्या इन लोगों के रहते हमारे राज्य में कोई विघ्न डाल सकता है?
तिलोत्तमा–यह जरूर ठीक है कि इन तीनों के रहते कोई इस राज्य में विघ्न नहीं डाल सकता, लेकिन तुझे तो इन्हीं तीनों की खबर नहीं! कोतवाल साहब जहन्नुम में चले ही गये, दीवान साहब और सेनापति साहब भी आजकल में जाया चाहते हैं बल्कि चले भी गये हों तो ताज्जुब नहीं।
माधवी-यह तू क्या कह रही है?
तिलोत्तमा–जी हाँ, मैं बहुत ठीक कहती हूँ। बिना परिश्रम ही यह राज्य वीरेन्द्रसिंह का हुआ चाहता है। इसीलिए कहती थी कि इन्द्रजीतसिंह को अपने यहाँ मत फँसा, उनका एक-एक ऐयार आफत का परकाला है। मैं कई दिनों से उन लोगों की कार्रवाई देख रही हूँ। उन लोगों को छेड़ना ऐसा है जैसा आतिशबाजी की चरखी में आग लगा देना।
माधवी-क्या वीरेन्द्रसिंह को पता लग गया कि उनका लड़का यहाँ कैद है
तिलोत्तमा-पता नहीं लगा है तो यों ही उनके सब ऐयार यहाँ पहुँच ऊधम मचा रहे हैं?
माधवी-तो तूने मुझे पहले खबर क्यों न की?
तिलोत्तमा-क्या खबर करती, तुझे इस खबर को सुनने की छुट्टी भी है!
माधवी-तिलोत्तमा, ऐसी जली-कटी बातों का कहना छोड़ दे और मुझे ठीक-ठीक बता कि क्या हुआ और क्या हो रहा है? सच पूछे तो मैं तेरे ही भरोसे कूद रही हूँ। मैं खूब जानती हूँ कि सिवाय तेरे मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं। मुझे विश्वास था कि इन चार पहाड़ियों के बीच जब तक मैं हूँ, मुझ पर किसी तरह की आफत न आवेगी, मगर अब तेरी बातों से यह उम्मीद बिलकुल जाती रही।
तिलोत्तमा–ठीक है, तुझे अब ऐसा भरोसा न रखना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि मैं तेरे लिए जान देने को तैयार हूँ, मगर तू ही बता कि वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों के सामने मैं क्या कर सकती हूँ, बेचारी ललिता मेरी मददगार थी, सो वह भी किशोरी को फँसाने में आप पकड़ी गयी, अब अकेली मैं क्या-क्या करूँ?
माधवी-तू सब-कुछ कर सकती है, हिम्मत मत हार, हाँ, पहले यह बता कि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार यहाँ क्योंकर आये और अब क्या कर रहे हैं?
तिलोत्तमा–अच्छा सुन, मैं सब-कुछ कहती हूँ। यह तो मैं नहीं जानती कि पहले-पहल यहाँ कौन आया, हाँ, जब से चपला आयी है तब से मैं थोड़ा-बहुत हाल जानती हूँ।
माधवी (चीखकर) क्या चपला यहाँ पहुँच गयी?
तिलोत्तमा–हाँ पहुँच गयी, उसने यहाँ पहुँचकर उस सुरंग की दूसरी ताली भी तैयार कर ली जिस राह से तू आती-जाती है और जिसमें मैंने किशोरी को कैद कर रखा है। एक दिन रात को जब तू इन्द्रजीतसिंह को सोता छोड़ दीवान साहब से मिलने के लिए गयी तो वह चपला भी इन्द्रजीतसिंह को साथ ले अपनी ताली से सुरंग का ताला खोल तेरे पीछे-पोछे चली गयी और छिपकर तेरी और दीवान साहब की कैफियत इन दोनों ने देख ली। यह न समझ कि इन्द्रजीतसिंह बेचारे सोधे-सादे हैं और तेरा हाल नहीं जानते, वे सब-कुछ जान गये।
माधवी—(कुछ देर तक सोच में डूबी रहने के बाद) तूने चपला को कैसे देखा?
तिलोत्तमा-मेरा बल्कि ललिता का भी कायदा है कि रात को तीन-चार दफे उठ कर इधर-उधर घूमा करती हैं। उस समय मैं अपने दालान के खम्भे की आड़ में खड़ी इधर-उधर देख रही थी जब चपला और इन्द्रजीतसिंह तेरा हाल देख कर सुरंग से लौटे थे। इसके बाद वे दोनों बहुत देर तक नहर के किनारे खड़े बात-चीत करते रहे। बस, उसी समय से मैं होशियार हो गई और अपनी कार्रवाई करने लगी।
माधवी-इसके बाद भी कुछ हुआ?
तिलोत्तमा–हाँ, बहुत-कुछ हुआ, सुनो मैं कहती हूँ। दूसरे दिन मैं ललिता को साथ ले उस तालाब पर पहुँची, देखा कि वीरेन्द्रसिंह के कई ऐयार वहाँ बैठे बातचीत कर रहे हैं। मैंने छिप कर उनकी बातचीत सुनी। तब मालूम हुआ कि वे लोग दीवान साहब, सेनापति और कोतवाल को भी गिरफ्तार करना चाहते हैं। मुझे उस समय एक दिल्लगी सूझी। जब वे लोग राय पक्की करके वहाँ से जाने लगे, मैंने वहाँ से कुछ दूर हट कर एक छींक मारी और दूर भाग गई।
माधवी-(मुस्करा कर) वे लोग घबरा गये होंगे!
तिलोत्तमा–बेशक घबराये होंगे, उसी समय गाली-गुफ्तार करने लगे, मगर हम दोनों ने वहां ठहरना पसन्द नहीं किया।
माधवी-फिर क्या हुआ?
तिलोत्तमा–मैंने तो सोचा था कि वे लोग मेरी छींक से डर कर अपनी कार्रवाई रोकेंगे, मगर ऐसा नहीं हुआ। कुल दो ही दिन की मेहनत में उन लोगों ने कोतवाल को गिरफ्तार कर लिया, भैरोंसिंह और तारासिंह ने उन्हें बुरा धोखा दिया।
इसके बाद तिलोत्तमा ने कोतवाल साहब के गिरफ्तार होने का पूरा हाल, जैसा हम ऊपर लिख आए हैं माधवी से कहा, तभी साथ ही उसने यह भी कह दिया कि दीवान साहब को भी शक हो गया है कि तूने किसी मर्द को यहाँ लाकर रक्खा है और उसके साथ आनन्द कर रही है।
तिलोत्तमा की जुबानी यह सब हाल सुनकर माधवी सोच-सागर में गोते लगाने लगी और आधे घण्टे तक उसे तन-बदन की सुध न रही। इसके बाद उसने अपने को सँभाला और फिर तिलोत्तमा से बातचीत करना आरम्भ किया।
माधवी-खैर, जो हुआ सो हुआ, यह बता कि अब क्या करना चाहिए?
तिलोत्तमा–मुनासिब तो यही है कि इन्द्रजीतसिंह और किशोरी को छोड़ दो, तब फिर तुम्हारा कोई कुछ न बिगाड़ेगा।
माधवी-(तिलोत्तमा के पैरों पर गिर कर और रो कर) ऐसा न कह! अगर मुझ पर तेरा सच्चा प्रेम है, तो ऐसा करने के लिए जिद न कर! अगर मेरा सिर चाहे तो काट ले, मगर इन्द्रजीतसिंह को छोड़ने के लिए मत कह।
तिलोत्तमा–अफसोस कि इन बातों की खबर दीवान साहब को भी नहीं कर सकती, बड़ी मुश्किल है। अच्छा, मैं उद्योग करती हूँ, मगर निश्चय नहीं कह सकती कि क्या होगा?
माधवी-तुम चाहोगी तो सब काम हो जायगा।
तिलोत्तमा–पहले तो मुझे ललिता को छुड़ाना मुनासिब है।
माधवी-अवश्य।
तिलोत्तमा–हाँ, एक काम इसके भी पहले करना चाहिए, नहीं तो किशोरी दो ही दिन में यहाँ से गायब हो जायगी और ताज्जुब नहीं कि धड़धड़ाते हुए वीरेन्द्रसिंह के कई ऐयार यहाँ पहुँच जायँ और मनमानी धूम मचावें।
माधवी-शायद तुम्हारा मतलब उस पानी वाली सुरंग को बन्द कर देने से हो?
तिलोत्तमा–हाँ।
माधवी–मैं भी अब यही मुनासिब समझती हूँ। मैं सोचती हूँ कि जरूर कोई ऐयार उस रोज उसी पानी वाली सुरंग की राह से यहाँ तक आया था जिसकी देखा-देखी इन्द्रजीतसिंह उस सुरंग में घुसे थे, मगर बेचारे पानी में आगे नहीं जा सके और लौट आये। तुम जरूर उस सुरंग को अच्छी तरह बन्द कर दो जिसमें कोई ऐयार उस राह से आने-जाने न पावे। तुम लोगों के लिए वह रास्ता है ही, जिधर से मैं आती हूँ। हाँ, एक बात और है, तू अपने पिता को मेरी मदद के लिए क्यों नहीं ले आती? उनसे और मेरे से बड़ी दोस्ती थी मगर अफसोस, आजकल वे मुझसे बहुत रंज हैं!
तिलोत्तमा–मैं कल उनके पास गई थी पर वे किसी तरह नहीं मानते। तुमसे बहुत ही ज्यादे रंज हैं, मुझ पर बहुत बिगड़ते थे, अगर मैं तुरंत न चली आती तो बेइज्जती के साथ निकलवा देते, अब मैं उनके पास कभी न जाऊँगी।
माधवी-खैर, जो कुछ मेरी किस्मत में है, उसे भोगूंगी। अच्छा, अब तो सब की आमद-रफ्त इसी सुरंग से होगी, तो अब किशोरी को वहाँ से निकाल कर भी किसी दूसरी जगह रखना चाहिए।
तिलोत्तमा–उस सुरंग से बढ़कर कौन-सी ऐसी जगह है जहाँ उसे रक्खोगी? दीवान साहब का भी तो डर है!
थोड़ी देर तक इन दोनों में बातचीत होती रही। इसके बाद इन्द्रजीतसिंह के सो कर उठने की खबर आई। शाम भी हो चुकी थी, माधवी उठ कर उनके पास गई और तिलोत्तमा पानी वाली सुरंग को बन्द करने की फिक्र में लगी।
पाठक, इस जगह मामला बड़ा ही गोलमाल हो गया। तिलोत्तमा ने चालाकी से वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों की कार्रवाई देख ली। माधवी और तिलोत्तमा की बातचीत से आप यह भी जान गये होंगे कि बेचारी किशोरी उसी सुरंग में कैद की गई है जिसकी ताली चपला ने बनाई थी या जिस सुरंग की राह चपला और कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने माधवी के पीछे जाकर यह मालूम कर लिया था कि वह कहाँ जाती है। उस सुरंग की दूसरी ताली तो मौजूद ही थी, किशोरी को छुड़ाना चपला के लिए कोई बड़ी बात न थी, अगर तिलोत्तमा होशियार होकर उस आने-जाने वाली राह, अर्थात् पानी वाली सुरंग, को जिसमें इन्द्रजीतसिंह गये थे और आगे जलमय देख कर लौट आये थे, पत्थर के ढोंकों से मजबूती के साथ बन्द न कर देती। कुँअर इन्द्रजीतसिंह को मालूम हो ही गया था कि हमारे ऐयार लोग इसी राह से आया-जाया करते हैं, अब उन्होंने अपनी आँखों से यह भी देख लिया कि यह सुरंग बखूबी बन्द कर दी गई है। उनकी नाउम्मीदी हर तरह से बढ़ने लगी, उन्होंने समझ लिया कि अब कमला से मुलाकात न होगी और बाहर हमारे छुड़ाने के लिए क्या-क्या तरकीब हो रही है, इसका पता भी बिल्कुल न लगेगा। सुरंग की नई ताली जो चपला ने बनाई थी वह उसी के पास थी, तो भी इन्द्रजीतसिंह ने हिम्मत न हारी। उन्होंने जी में ठान लिया कि अब जबर्दस्ती से काम लिया जाएगा, जितनी औरतें यहाँ मौजूद हैं सब की मुश्क बाँध नहर के किनारे डाल देंगे और सुरंग की असली ताली माधवी के पास से लेकर सुरंग की राह माधवी के महल में पहुँच कर खून-खराबी मचावेंगे। आखिर क्षत्रियों को इससे बढ़कर लड़ने-भिड़ने और जान देने का कौन-सा समय हाथ लगेगा। मगर ऐसा करने के लिए सबसे पहले सुरंग की ताली अपने कब्जे में कर लेना मुनासिब है, नहीं तो मुझे बिगड़ा हुआ देख जब तक मैं दो-चार औरतों की मुश्कें बाँधूँगा, तब तक सब सुरंग की राह भाग जायँगी। फिर मेरा मतलब, जैसा मैं चाहता हूँ, सिद्ध न होगा।
इन्द्रजीतसिंह ने सुरंग की ताली लेने के लिए बहुत कोशिश की, मगर न ले सके क्योंकि अब वह ताली उस जगह से जहां पहले रहती थी, हटा कर किसी दूसरी जगह रख दी गई थी।
७
आपस में लड़ने वाले दोनों भाइयों के साथ जाकर सुबह की सुफेदी निकलने के साथ ही कोतवाल ने माधवी की सूरत देखी और यह समझ कर कि दीवान साहब को छोड़ महारानी अब मुझसे प्रेम रखना चाहती हैं, बहुत खुश हुआ। कोतवाल साहब के गुमान में भी न था कि वे ऐयारों के फेर में पड़े हैं। उनको इन्द्रजीतसिंह के कैद होने और वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों के यहाँ पहुँचने की खबर ही न थी। वह तो जिस तरह हमेशा रिआया लोगों के घर अकेले पहुँच कर तहकीकात किया करते थे, उसी तरह आज भी सिर्फ दो अर्दली के सिपाहियों को साथ ले इन दोनों ऐयारों के फेर में पड़ घर से निकल पड़े थे।
कोतवाल साहब ने जब माधवी को पहचाना, तो अपने सिपाहियों को उसके सामने ले जाना मुनासिब न समझा और अकेले ही माधवी के पास पहुँचे। देखा कि हकीकत में उन्हीं की तस्वीर सामने रखे माधवी उदास बैठी है।
कोतवाल साहब को देखते ही माधवी उठ खड़ी हुई और मुहब्बत-भरी निगाहों से उनकी तरफ देख कर बोली-
"देखो, मैं तुम्हारे लिए कितनी बेचैन हूँ, पर तुम्हें मेरी जरा भी खबर नहीं!"
कोतवाल-अगर मुझे यकायक इस तरह अपनी किस्मत के जागने की खबर होती तो क्या मैं लापरवाह बैठा रहता? कभी नहीं, मैं तो आप ही दिन-रात आपसे मिलने की उम्मीद में अपना खून सुखा रहा था।
माधवी—(हाथ का इशारा करके) देखो, ये दोनों आदमी बड़े ही बदमाश हैं, इनको यहाँ से चले जाने के लिए कहो तो फिर हमसे-तुमसे बातें होंगी।
इतना सुनते ही कोतवाल साहब ने उन दोनों भाइयों की तरफ, जो हकीकत में भैरोंसिंह और तारासिंह थे, कड़ी निगाह से देखा और कहा, "तुम दोनों अभी-अभी यहाँ से भाग जाओ, नहीं तो बोटी-बोटी काट कर रख दूँगा।"
भैरोंसिंह और तारासिंह वहाँ से चलते बने। इधर चपला, जो माधवी को सूरत बनी हुई थी, कोतवाल को बातों में फँसाये हुए वहाँ से दूर एक गुफा के मुहाने पर ले गई और बैठ कर बातचीत करने लगी।
चपला माधवी की सूरत तो बनी मगर उसकी और माधवी की उम्र में बहुत-कुछ फर्क था। कोतवाल बड़ा धूर्त और चालाक था। सूरज की चमक में जब उसने माधवी की सूरत अच्छी तरह देखी और बातों में भी कुछ फर्क पाया तो फौरन उसे खटका पैदा हुआ और वह बड़े गौर से उसे सिर से पैर तक देख अपनी निगाहों की तराजू पर तौलने और जाँचने लगा। चपला समझ गई कि अब कोतवाल को शक पैदा हो गया, देर करना मुनासिब न जान उसने जफील (सीटी) बजाई। उसी समय गुफा के अन्दर से देवीसिंह निकल आये और कोतवाल साहब से तलवार रख देने के लिए कहा।
कोतवाल ने भी जो सिपाही और शेरदिल आदमी था बिना लड़े-भिड़े अपने को कैदी बना देना पसन्द न किया और म्यान से तलवार निकाल देवीसिंह पर हमला किया। थोड़ी ही देर में देवीसिंह ने उसे अपने खंजर से जख्मी किया और जमीन पर पटक उसकी मुश्कें बाँध डालीं।
कोतवाल साहब का हुक्म पा भैरोंसिंह और तारासिंह जब उनके सामने से चले गये तो वहाँ पहुँचे जहाँ कोतवाल के साथी दोनों सिपाही खड़े अपने मालिक के लौट आने की राह देख रहे थे। इन दोनों ऐयारों ने उन सिपाहियों को अपनी मुश्के बँधवाने के लिए कहा मगर उन्होंने इन दोनों को साधारण समझ मंजूर न किया और लड़ने-भिड़ने को तैयार हो गये। उन दोनों की मौत आ चुकी थी, आखिर भैरोंसिंह और तारासिंह के हाथ से मारे गये, मगर उसी समय बारीक आवाज में किसी ने इन दोनों ऐयारों को पुकार कर कहा, "भैरोंसिंह और तारासिंह, अगर मेरी जिन्दगी है, तो बिना इसका बदला लिये न छोड़ूँगी!"
भैरोंसिंह ने उस तरफ देखा जिधर से आवाज आई थी। एक लड़का भागता हुआ दिखाई पड़ा। ये दोनों उसके पीछे दौड़े, मगर पकड़ न सके क्योंकि उस पहाड़ी की छोटी-छोटी कन्दराओं और खोहों में न मालूम कहाँ छिपकर उसने इन दोनों के हाथ से अपने को बचा लिया।
पाठक समझ गये होंगे कि इन दोनों ऐयारों को पुकार कर चिताने वाली वही तिलोत्तमा है जिसने बात करते-करते माधवी से इन दोनों ऐयारों के हाथ कोतवाल के फँस जाने का समाचार कहा था।
८
इस जगह हम उस तालाब का हाल लिखते हैं जिसका जिक्र कई दफे ऊपर आ चुका है, जिसमें एक औरत को गिरफ्तार करने के लिए योगिनी और वनचरी कूदी थीं, या जिसके किनारे बैठ हमारे ऐयारों ने माधवी के दीवान, कोतवाल और सेनापति को पकड़ने के लिए राय पक्की की थी।
यही तालाब उस रमणीक स्थान में पहुंचने का रास्ता था जिसमें कुंअर इन्द्रजीतसिंह कैद हैं। इसका दूसरा मुहाना वही पानी वाली सुरंग थी जिसमें कुँअर इन्द्रजीतसिंह घुसे थे और कुछ दूर जाकर जल से भरी देख लौट आए थे या जिसको तिलोत्तमा ने अब पत्थर के ढों कों से बन्द करा दिया है।
जिस पहाड़ी के नीचे यह तालाब था उसी पहाड़ी के दूसरी तरफ वह गुप्त स्थान था जिसमें इन्द्रजीतसिंह कैद थे। इस राह से हरएक का आना मुश्किल था, हाँ, ऐयार लोग अलबत्ता जा सकते थे जिनका दम खूब सधा हुआ था और तैरना बखूबी जानते थे, पर इस तालाब की राह से वहाँ तक पहुँचने के लिए कारीगरों ने एक सुभीता भी किया था। उस सुरंग से इस तालाब की जाट (लाट) तक भीतर-भीतर एक मजबूत जंजीर लगी हुई थी जिसे थाम कर यहां तक पहुँचने में बड़ा ही सुभीता होता था।
कोतवाल साहब को गिरफ्तार करने के बाद कई दफे चपला ने चाहा कि इस तालाब की राह इन्द्रजीतसिंह के पास पहुँच कर इधर के हाल-चाल की खबर करे, मगर ऐसा न कर सकी, क्योंकि तिलोत्तमा ने सुरंग का मुंह बन्द करा दिया था। अब हमारे ऐयारों को निश्चय हो गया कि दुश्मन सँभल बैठा और उसको हम लोगों की खबर हो गई। इधर कोतवाल साहब के गिरफ्तार होने से और उनके सिपाहियों की लाश मिलने पर शहर में हलचल मच रही थी। दीवान साहब वगैरह इस खोज में परेशान होरहे थे कि हम लोगों का दुश्मन ऐसा कौन आ पहुँचा जिसने कोतवाल साहब को गायब कर दिया।
कई रोज के बाद एक दिन आधी रात के समय भैरोंसिंह, तारासिंह, पण्डित बद्रीनाथ, देवीसिंह और चपला इस तालाब पर बैठे आपस में सलाह कर रहे थे और सोच रहे थे कि अब कुँअर इन्द्रजीतसिंह के पास किस तरह पहुंचना चाहिए और उनके छुड़ाने की क्या तरकीब करनी चाहिए।
कमला-अफसोस, मैंने जो ताली तैयार की थी वह अपने साथ लेती आई, नहीं, तो इन्द्रजीतसिंह उस ताली से जरूर कुछ-न-कुछ काम निकालते। अब हम लोगों का वहाँ तक पहुंचना बहुत मुश्किल हो गया।
बद्रीनाथ-इस पहाड़ी के उस पार ही तो इन्द्रजीतसिंह हैं! चाहे यह पहाड़ी कैसी ही बेढब क्यों न हो, मगर हम लोग उस पार पहुँचने के लिए चढ़ने-उतरने की जगह बना ही सकते हैं।
भैरोंसिंह-मगर यह काम कई दिनों का है।
तारा-सब से पहले इस बात की निगरानी करनी चाहिए कि माधवी ने जहाँ इन्द्रजीतसिंह को कैद कर रखा है वहाँ कोई ऐसा मर्द न पहुँचने पावे जो उन्हें सता सके, औरतें यदि पाँच सौ भी होंगी तो कुछ कर न सकेंगी।
देवीसिंह-कुँअर इन्द्रजीतसिंह ऐसे बोदे नहीं हैं कि यकायक किसी के फंदे में आ जावें, मगर फिर भी लोगों को होशियार रहना चाहिए। आज-कल में उन तक पहुँचने का मौका नहीं मिलेगा, तो हम इस घर को उजाड़ डालेंगे और दीवान साहब वगैरह को जहन्नुम में पहुँचा देंगे।
भैरोंसिंह-अगर कुमार को यह मालूम हो गया कि हम लोगों के आने-जाने का रास्ता बन्द कर दिया गया तो वे चुप न बैठे रहेंगे, कुछ-न-कुछ फसाद जरूर मचावेंगे।
तारा–बेशक।
इसी तरह की बहुत-सी बातें वे लोग कर रहे थे कि तालाब के उस पार जल में उतरता हुआ एक आदमी दिखाई पड़ा। ये लोग टकटकी बाँध उसी तरफ देखने लगे। वह आदमी जल में कूदा और जाट के पास पहुँच कर गोता मार गया, जिसे देख भैरोंसिंह ने कहा, "बेशक यह कोई ऐयार है जो माधवी के पास जाना चाहता है।"
चपला-मगर यह माधवी का ऐयार नहीं है, अगर माधवी की तरफ का होता तो रास्ता बन्द होने का हाल इसे मालूम होता।
भैरोंसिंह-ठीक है।
तारासिंह–अगर माधवी की तरफ का नहीं तो हमारे कुमार का पक्षपाती होगा।
देवीसिंह-वह लौटे तो अपने पास बुलाना चाहिए।
थोड़ी ही देर बाद वह आदमी जाट के पास जाकर निकला और जाट थाम जरा सुस्ताने लगा, कुछ देर बाद किनारे पर चला आया और तालाब के ऊपर वाले चौतरे पर बैठ कर कुछ सोचने लगा।
भैरोंसिंह अपने ठिकाने से उठे और धीरे-धीरे उस आदमी की तरफ चले। जब उसने अपने पास किसी को आते देखा तो उठ खड़ा हुआ, साथ ही भैरोंसिंह ने आवाज दी, "डरो मत, जहाँ तक मैं समझता हूँ तुम भी उसी की मदद किया चाहते हो जिसके छुड़ाने की फिक्र में हम लोग हैं।"
भैरोंसिंह के इतना कहते ही उस आदमी ने खुशी-भरी आवाज से कहा, "वाह-वाह-वाह, आप भी यहाँ पहुँच गये! सच पूछो तो यह सब फसाद तुम्हारा ही खड़ा किया हुआ है।"
भैरोंसिंह-जिस तरह मेरी आवाज तूने पहचान ली उसी तरह तेरी मुहब्बत ने मुझे भी कह दिया कि तू कमला है।
कमला-बस-बस, रहने दीजिये, आप लोग कितने बड़े मुहब्बती हैं इसे मैं खूब पर बैठ जानती हूँ।
भैरोंसिंह–जानती हो तो ज्यादा क्या कहूँ?
कमला-कहने का मुँह भी तो हो!
भैरोंसिंह–कमला, मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारे पास बैठा बातें ही करता रहूँ मगर इस समय मौका नहीं है क्योंकि (हाथ का इशारा करके) पण्डित बद्रीनाथ, देवीसिंह, तारासिंह, तारासिंह और माँ वहीं बैठी हुई हैं। तुमको तालाब में जाते और नाकाम लौटते हम लोगों ने देख लिया और इसी से हम लोगों ने मालूम कर लिया कि तुम माधवी की तरफदार नहीं हो, अगर होती तो सुरंग के बन्द किये जाने का हाल तुम्हें जरूर मालूम होता।
कमला-क्या तुम्हें सुरंग बन्द करने का हाल मालूम है?
भैरोंसिंह-हाँ, हम जानते हैं।
कमला-फिर, अब क्या करना चाहिए?
भैरोसिंह-तुम वहाँ चली चलो जहाँ हम लोगों के संगी-साथी हैं, उसी जगह मिल-जुल कर सलाह करेंगे।
भैरोंसिंह कमला को लिए अपनी माँ चपला के पास पहुंचे और पुकार कर कहा, "माँ, यह कमला है, इसका नाम तो तुमने सुना ही होगा।"
"हाँ-हाँ, मैं इसे बखूबी जानती हूँ।" यह कह चपला ने उठ कर कमला को गले लगा लिया और कहा, "बेटी तू अच्छी तरह तो है? मैं तेरी बड़ाई बहुत दिनों से सुन रही हूँ, भैरोंसिंह ने तेरी बड़ी तारीफ की थी, मेरे पास बैठ और कह किशोरी कैसी है?"
कमला-(बैठ कर) किशोरी का हाल क्या पूछती हैं? वह बेचारी तो माधवी की जेल में पड़ी है, ललिता कुँअर इन्द्रजीतसिंह के नाम का धोखा देकर उसे ले आई।
भैरोंसिंह-(चौंक कर) क्या यहाँ तक नौबत पहुँच गई?
कमला-जी हाँ, मैं वहाँ मौजूद न थी, नहीं तो ऐसा न होने पाता!
भैरोंसिंह-खुलासा हाल कहो, क्या हुआ?
कमला ने सब हाल हाल किशोरी के धोखा खाने और ललिता के पकड़ लेने का सुना कर कहा, "यह बखेड़ा (भैरोंसिंह की तरफ इशारा करके) इन्हीं का मचाया हुआ है, न ये इन्द्रजीतसिंह बन कर शिवदत्तगढ़ जाते न बेचारी किशोरी की यह दशा होती।"
चपला-हाँ, मैं सुन सकी हुँ। इसी कसूर पर बेचारी को शिवदत्त ने अपने यहाँ से निकाल दिया। खैर, तूने यह बड़ा काम किया कि ललिता को पकड़ लिया, अब हम लोग अपना काम सिद्ध कर लेंगे।
कमला-आप लोगों ने क्या किया और अब यहाँ क्या करने का इरादा है?
चपला ने भी अपना और इन्द्रजीतसिंह का सब हाल कह सुनाया। थोड़ी देर तक बातचीत होती रही। सुबह की सफेदी निकलना ही चाहती थी कि ये लोग वहाँ से उठ खड़े हुए और एक पहाड़ी की तरफ चले गए।
९
कुँअर इन्द्रजीतसिंह अब जबर्दस्ती करने को उतारू हुए और इस ताक में लगे कि माधवी सुरंग का ताला खोल दीवान से मिलने के लिए महल में जाय तो मैं अपना रंग दिखाऊँ। तिलोत्तमा के होशियार कर देने से माधवी भी चेत गई थी और दीवान साहब के पास आना-जाना उसने बिल्कुल बन्द कर दिया था, मगर जब पानी वाली सुरंग बन्द की गई तब से तिलोत्तमा इसी दूसरी सुरंग की राह आने-जाने लगी और इस सुरंग की ताली जो माधवी के पास रहती थी अपने पास रखने लगी। पानी वाली सुरंग के बन्द होते ही इन्द्रजीतसिंह जान गये कि अब इन औरतों की आमद-रफ्त इसी सुरंग से होगी, मगर माधवी ही की ताक में लगे रहने से कई दिनों तक उनका मतलब सिद्ध नहीं हुआ।
अब कुँअर इन्द्रजीतसिंह उस दालान में ज्यादा टहलने लगे जिसमें सुरंग के दरवाजे वाली कोठरी थी। एक दिन आधी रात के समय माधवी का पलंग खाली देख इन्द्रजीतसिंह ने जाना कि वह बेशक दीवान से मिलने गई है। वह भी पलंग से उठ खड़े हुए और खूटी से लटकती हुई एक तलवार उतारने के बाद जलते शमादान को बुझा उसी दालान में पहुँचे जहाँ इस समय बिल्कुल अँधेरा था और उसी सुरंग वाले दरवाजे के बगल में छिप कर बैठ रहे। जब पहर भर रात बाकी रही उसी सुरंग का दरवाजा भीतर से खुला और एक औरत ने इस तरफ निकल कर फिर ताला बन्द करना चाहा, मगर इन्द्रजीतसिंह ने फुर्ती से उसकी कलाई पर कर ताली छीन ली और कोठरी के अन्दर जा भीतर से ताला बन्द कर लिया।
वह औरत माधवी थी जिसके हाथ से इन्द्रजीतसिंह ने ताली छीनी थी। वह अँधेरे में इन्द्रजीतसिंह को पहचान न सकी। हाँ, उसके चिल्लाने से कुमार जान गए कि यह माधवी है।
इन्द्रजीतसिंह एक दफे उस सुरंग में जा ही चुके थे, उसके रास्ते और सीढ़ियों को वे बखूबी जानते थे, इसलिए अंधेरे में उनको बहुत तकलीफ न हुई और वे अन्दाज से टटोलते हुए तहखाने की सीढ़ियाँ उतर गए। नीचे पहुँच कर जब उन्होंने दूसरा दरवाजा खोला, तो उन्हें सुरंग के अन्दर कुछ दूर पर रोशनी मालूम हुई जिसे देख उन्हें ताज्जुब हुआ और बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, जब उस रोशनी पास पहुँचे एक औरत पर नजर पड़ी जो हथकड़ी और बेड़ी के सबब उठने-बैठने से बिल्कुल लाचार थी। चिराग की रोशनी में इन्द्रजीतसिंह ने उसको और उसने इनको अच्छी तरह देखा और दोनों ही चौंक पड़े।
ऊपर जिक्र पूरा आ जाने से पाठक समझ ही गये होंगे कि यह किशोरी है जो तकलीफ के सबब बहुत ही कमजोर और सुस्त हो रही थी। इन्द्रजीतसिंह के दिल में उसकी तस्वीर मौजूद थी और इन्द्रजीनसिंह उसकी आँखों में पुतली की तरह डेरा जमाये थे। एक ने दूसरे को बखूबी पहचान लिया और ताज्जुब मिली हुई खुशी के सबब देर तक एक-दूसरे की सूरत देखते रहे, इसके बाद इन्द्रजीतसिंह ने उसकी हथकड़ी और बेड़ी खोल डाली और प्रेम से हाथ पकड़ कर कहा, "किशोरी! तू यहाँ कैसे आ गई?"
किशोरी–(इन्द्रजीतसिंह के पैरों पर गिर कर) अभी तक तो मैं यही सोचती थी कि मेरी बदकिस्मती मुझे यहाँ ले आई मगर नहीं, अब मुझे कहना पड़ा कि मेरी खुशकिस्मती ने मुझे यहाँ पहुँचाया और ललिता ने मेरे साथ बड़ी नेकी की जो मुझे लेकर आई, नहीं तो न मालूम कब तक तुम्हारी सूरत...
इससे ज्यादा बेचारी किशोरी कुछ कह न सकी और जार-जार रोने भगी। इन्द्रजीतसिंह भी बराबर रो रहे थे। आखिर उन्होंने किशोरी को उठाया और दोनों हाथों से उसकी कलाई पकड़े हुए बोले"हाय, मुझे कब उम्मीद थी कि मैं तुम्हें यहाँ देखूगा। मेरी जिन्दगी में आज की खुशी याद रखने लायक होगी। अफसोस, दुश्मन ने तुम्हें बड़ा ही कष्ट दिया!" किशोरी-बस, अब मुझे किसी तरह की आरजू नहीं है। मैं ईश्वर से यही माँगती थी कि एक दिन तुम्हें अपने पास देख लूँ सो मुराद आज पूरी हो गई। अब चाहे माधवी मुझे मार भी डाले तो मैं खुशी से करने को तैयार हूँ।
इन्द्रजीतसिंह-जब तक मेरे दम में दम है किसकी मजाल है जो तुम्हें दुःख अब तो किसी तरह इस सुरंग की ताली मेरे हाथ में लग गई है जिससे हम दोनों को निश्चय समझना चाहिए कि इस कैद से छुट्टी मिल गई। अगर जिन्दगी है तो मैं माधवी से समझ लूँगा, वह जाती कहाँ है?
इन दोनों को यकायक इस तरह के मिलाप से कितनी खुशी हुई, यह ये ही जानते होंगे। दीन-दुनिया की सुध भूल गये। यह याद ही नहीं रहा कि हम कहाँ जाने वाले थे, कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं और क्या करना चाहिए। मगर यह खुशी बहुत ही थोड़ी देर के लिए थी, क्योंकि इसी समय हाथ में मोमबत्ती लिए एक औरत उसी तरफ से आती हुई दिखाई दी जिधर इन्द्रजीतसिंह जाने वाले थे और जिसको देख ये दोनों ही चौंक पड़े।
वह औरत इन्द्रजीतसिंह के पास पहुँची और बदन का दाग दिखला बहुत जल्द जाहिर कर दिया कि वह चपला है।
चपला-इन्द्रजीतसिंह! हैं, तुम यहाँ कैसे आए! (चारों तरफ देख कर) मालूम होता है बेचारी किशोरी को तुमने इसी जगह पाया है।
इन्द्रजीतसिंह-हाँ, यह इसी जगह कैद थी, मगर मैं नहीं जानता था। मैं तो माधवी के हाथ से जबर्दस्ती ताली छीन इस सुरंग में चला आया और उसे चिल्लाता ही छोड़ आया।
चपला-माधवी तो अभी इसी सुरंग की राह से वहाँ गई थी।
इन्द्रजीतसिंह-हाँ, और मैं दरवाजे के पास छिपा खड़ा था। जैसे ही वह ताला खोल अन्दर पहुँची वैसे ही मैंने पकड़ लिया और ताली छीन इधर आ भीतर से ताला बन्द कर दिया।
चपला-तुमने बहुत बुरा किया, इतनी जल्दी कर जाना मुनासिब न था। अब तुम दो रोज भी माधवी के पास नहीं गुजार सकते, क्योंकि वह बड़ी ही बदकार और चाण्डालिन की तरह बेदर्द है, अब वह तुम्हें पावे तो किसी-न-किसी तरह धोखा दे बिना जान लिए कभी न छोड़े।
इन्द्रजीतसिंह-आखिर मैं ऐसा न करता तो क्या करता? उधर जिस राह से तुम आयी थी अर्थात् पानी वाली सुरंग का मुहाना मेरे देखते-देखते बिल्कुल बन्द कर दिया गया जिससे मुझे मालूम हो गया कि तुम्हारे आने-जाने की खबर उस शैतान की बच्ची को लग गई और तुम्हारे मिलने या किसी तरह की मदद पहुँचने की उम्मीद बिल्कुल जाती रही, पर नामर्दों की तरह मैं अपने को कब तक बनाये रहता, और अब मुझे माधवी के पास लौट जाने की जरूरत ही क्या है?
चपला-बेशक हम लोगों की खबर माधवी को लग गई, मगर तुम बिल्कुल नहीं जानते कि तिलोत्तमा ने कितना फसाद मचा रखा है और इधर महल की तरफ कितनी मजबूती कर रखी है। तुम किसी तरह इधर से नहीं निकल सकते। अफसोस, अब हम लोग भारी खतरे में पड़ गये।
इन्द्रजीतसिंह-रात का तो समय है, लड़-भिड़ कर निकल जायँगे।
चपला-तुम दिलावर हो, तुम्हारा ऐसा खयाल करना बहुत मुनासिब है मगर (किशोरी की तरफ इशारा करके) इस बेचारी की क्या दशा होगी? इसके सिवाय अब सवेरा हुआ ही चाहता है।
इन्द्रजीतसिंह-फिर क्या किया जाये?
चपला-(कुछ सोच कर) क्या तुम जानते हो इस समय तिलोत्तमा कहाँ है?
इन्द्रजीतसिंह-जहाँ तक मैं खयाल करता हूँ, इस खोह के बाहर है।
चपला—यह और मुश्किल है, वह बड़ी ही चालाक है, इस समय भी जरूर किसी धुन में लगी होगी, वह हम लोगों का ध्यान दम भर के लिए भी नहीं भुलाती।
इन्द्रजीतसिंह-इस समय हमारी मदद के लिए इस महल में और भी कोई मौजूद है या अकेली तुम ही हो?
चपला-देवीसिंह, भैरोंसिंह और पण्डित बद्रीनाथ तो महल के बाहर इधर-उधर लुके-छिपे मौजूद हैं, मगर सूरत बदले हुए कमला इस सुरंग के मुहाने पर, अर्थात् बाहर वाले कमरे में खड़ी है, मैं उसे अपनी हिफाजत के लिए वहाँ छोड़ आई हूँ।
किशोरी—(चौंक कर) कमला कौन?
चपला-तुम्हारी सखी!
किशोरी-वह यहाँ कैसे आई?
चपला—इसका हाल तो बहुत लम्बा-चौड़ा है इस समय कहने का मौका नहीं, मुख्तसिर यह है कि तुमको धोखा देनेवाली ललिता को उसने पकड़ लिया और खुद तुमको छुड़ाने के लिए आई है, यहाँ हम लोगों से भी मुलाकात हो गई। (इन्द्रजीतसिंह की तरफ देख कर) बस अब यहाँ ठहर कर अपने को इस सुरंग के अन्दर ही फँसा कर मार डालना मुनासिब नहीं।
इन्द्रजीतसिंह-बेशक यहाँ ठहरना ठीक न होगा। चलो चलें, जो होगा देखा जायगा। तीनों वहाँ से चल पड़े, और सुरंग के दूसरे मुहाने अर्थात् उस कमरे में पहुँचे, जिसमें माधवी को दीवान साहब के साथ बैठे हुए इन्द्रजीतसिंह ने देखा था। वहाँ इस समय सूरत वदले हुए कमला भी मौजूद थी, और रोशनी बखूबी हो रही थी। इन तीनों को देखते ही कमला चौंक पड़ी और किशोरी को गले लगा लिया, मगर तुरन्त ही अलग होकर चपला से बोली, "सुबह की सुफेदी निकल आई है, यह बहुत ही बुरा हुआ।"
चपला—जो हो, अब कर ही क्या सकते हैं!
कमला-खैर, जो होगा देखा जायगा, जल्दी नीचे उतरो।
इस खुशनुमा और आलीशान मकान के चारों तरफ एक बाग था जिसके चारों तरफ चहारदीवारियाँ बनी हुई थीं। बाग के पूरब तरफ एक बहुत बड़ा फाटक था, जहाँ बारी-बारी से बीस आदमी नंगी तलवार लिए घूम-घूम कर पहरा देते थे। चपला और कमला कमन्द के सहारे बाग की पिछली दीवार लाँघ कर यहाँ पहुँची थीं और इस समय भी ये चारों उसी तरह निकल जाना चाहते थे।
हम यह कहना भूल गये कि बाग के चारों कोनों में चार गुमटियाँ बनी हुई थीं, जिनमें सौ सिपाहियों का डेरा था और आजकल तिलोत्तमा के हुक्म से वे सभी हरदम तैयार रहते थे। तिलोत्तमा ने उन लोगों को यह भी कह रखा था कि जिस समय मैं अपने बनाये हुए बम के गोले को जमीन पर पटकू और उसकी भारी आवाज तुम लोग सुनो, फौरन हाथ में नंगी तलवारें लिए वाग के चारों तरफ फैल जाओ, जिस आदमी को आते-जाते देखो, तुरन्त गिरफ्तार कर लो।
चारों आदमी सुरंग का दरवाजा खुला छोड़ नीचे उतरे, और कमरे के बाहर हो बाग के पिछली दीवार की तरफ जैसे ही चले कि तिलोत्तमा पर नजर पड़ी। चपला यह खयाल करके कि अब बहुत ही बुरा हुआ, तिलोतमा की तरफ लपकी और उसे पकड़ना चाहा, मगर वह शैतान लोमड़ी की तरह चक्कर मार निकल ही गई और एक किनारे पहुँच मसाले से भरा हुआ गेंद जमीन पर पटककर, जिसकी भारी आवाज चारों तरफ गूँज गई और उसके कहे मुताबिक सिपाहियों ने होशियार होकर बाग को चारों तरफ से घेर लिया।
तिलोत्तमा के भाग कर निकल जाते ही चारों आदमी, जिनके आगे-आगे हाथ में नंगी तलवार लिए इन्द्रजीतसिंह थे, बाग की पिछली दीवार की तरफ न जाकर सदर फाटक की तरफ लपके, मगर वहाँ पहुँचते ही पहरे वाले सिपाहियों से रोके गये और मार-काट शुरू हो गई। इन्द्रजीतसिंह ने तलवार तथा चपला और कमला ने खंजर चलाने में अच्छी बहादुरी दिखाई।
हमारे ऐयार लोग भी वाग के बाहर चारों तरफ लुके-छिपे खड़े थे, तिलोत्तमा के चलाये हुए गोले की आवाज सुनकर और किसी भारी फसाद होने का खयाल कर फाटक पर आ जुटे और खंजर निकाल माधवी के सिपाहियों पर टूट पड़े। बात की बात में माधवी के बहुत से सिपाहियों की लाशें जमीन पर दिखाई देने लगी, और बहुत बहादुरी के साथ लड़ते-भिड़ते हमारे बहादुर लोग किशोरी को लिए निकल ही गए।
ऐयार लोग तो दौड़ने-भागने में तेज होते ही हैं, इन लोगों का भाग जाना कोई आश्चर्य न था, मगर गोद में किशोरी को उठाये इन्द्रजीतसिंह उन लोगों के बराबर में कब दौड़ सकते थे और ऐयार लोग भी ऐसी अवस्था में उनका साथ कैसे छोड़ सकते थे। लाचार जैसे बना, उन दोनों को भी साथ लिए हुए मैदान का रास्ता लिया। इस समय पूरब की तरफ सूर्य की लालिमा अच्छी तरह फैल चुकी थी।
माधवी के दीवान अग्निदत्त का मकान इस बाग से बहुत दूर न था, और वह बड़े सवेरे उठा करता था। तिलोत्तमा के चलाये हुए गोले की आवाज उसके कानों में पहुँच ही चुकी थी, बाग के दरवाजे पर लड़ाई होने की खबर भी उसे उसी समय मिल गई। वह शैतान का बच्चा बहुत ही दिलेर और लड़ाका था, फौरन ढाल-तलवार ले मकान के नीचे उतर आया, और अपने यहाँ रहने वाले कई सिपाहियों को साथ ले बाग के दरवाजे पर पहुँचा। देखा कि बहुत से सिपाहियों की लाशें जमीन पर पड़ी हुई हैं और दुश्मन का पता नहीं है।
बाग के चारों तरफ फैले हुए सिपाही भी फाटक पर आ जुटे थे और गिनती में एक सौ से ज्यादा थे। अग्निदत्त ने सभी को ललकारा और साथ ले इन्द्रजीतसिंह का पीछा किया। थोड़ी ही दूर पर उन लोगों को पा लिया, और चारों तरफ से घेर, मारकाट शुरू कर दी।
अग्निदत्त की निगाह किशोरी पर जा पड़ी। अब क्या पूछना था? सब तरफ का खयाल छोड़ इन्द्रजीतसिंह के ऊपर टूट पड़ा। बहुत से आदमियों से लड़ते हुए इन्द्रजीतसिंह किशोरी को सँभाल न सके, और उसे छोड तलवार चलाने लगे, अग्निदत्त को मौका मिला, इन्द्रजीतसिंह के हाथ जख्मी होने पर भी उसने दम न लिया और किशोरी को गोद में उठा ले भागा। यह देखकर इन्द्रजीतसिंह की आँखों में खून उतर आया। इतनी भीड़ को काटकर उसका पीछा तो न कर सके, मगर अपने ऐयारों को ललकार कर इस तरह की लड़ाई की, कि उन सौ में से आधे बेदम होकर जमीन पर गिर पड़े, और बाकी अपने सरदार को चला गया देख जान बचा भाग गये। इन्द्रजीतसिंह भी बहुत से जख्मों के लगने से बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। चपला और भैरोंसिंह वगैरह बहुत ही बेदम हो रहे थे, तो भी वे लोग बेहोश इन्द्रजीतसिंह को उठा वहाँ से निकल गये, और फिर किसी की निगाह पर न चढ़े।
१०
जख्मी इन्द्रजीतसिंह को लिए हुए उनके ऐयार लोग वहाँ से दूर निकल गए और बेचारी किशोरी को दुष्ट अग्निदत्त उठाकर अपने घर ले गया। यह सब हाल देख तिलोत्तमा वहाँ से चलती बनी और बाग के अन्दर कमरे में पहुँची। देखा कि सुरंग का दरवाजा खुला हुआ है और ताली भी उसी जगह जमीन पर पड़ी है। उसने ताली उठा ली और सुरंग के अन्दर जा किवाड़ बन्द करती हुई माधवी के पास पहुँची। माधवी की अवस्था इस समय बहुत ही खराब हो रही थी। दीवान साहब पर बिल्कुल भेद खुल गया होगा, यह समझ मारे डर के वह घबरा गई और उसे निश्चय हो गया कि अब किसी तरह कुशल नहीं है, क्योंकि बहुत दिनों की लापरवाही में दीवान साहब ने तमाम रिआया और फौज को अपने कब्जे में कर लिया था। तिलोत्तमा ने वहाँ पहुँचते ही माधवी से कहा-
तिलोत्तमा–अब क्या सोच रही है और क्यों रोती है? मैंने पहले ही कहा था कि इन बखेड़ों में मत फँस, इसका नतीजा अच्छा न होगा! वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग जिसके पीछे पड़ते हैं बला की तरह उसका सत्यानाश कर डालते हैं, पर तूने मेरी बात न मानी, अब यह दिन देखने की नौबत पहुँची।
माधवी––वीरेन्द्रसिंह का कोई ऐयार नहीं आया। इन्द्रजीतसिंह जबरदस्ती मेरे हाथ से ताली छीनकर चले गये, मैं कुछ न कर सकी।
तिलोत्तमा––आखिर तू उनका कर ही क्या सकती थी? माधवी-अब उन लोगों का क्या हाल है?
तिलोत्तमा––वे लोग लड़ते-भिड़ते और तुम्हारे सैकड़ों आदमियों को यमलोक पहुँचाते निकल गये। किशोरी को आपके दीवान साहब उठा ले गये। जब उनके हाथ किशोरी लग गई, तब उन्हें लड़ने-भिडने की जरूरत ही क्या थी? किशोरी की सरत देखकर तो आसमान की चिड़ियाएँ भी नीचे उतर आती हैं, फिर दीवान साहब क्या चीज हैं? अब तो वह दुष्ट इस धुन में होगा कि तुम्हें मार पूरी तरह से राजा बन जाय और किशोरी को रानी बनाये, तुम उसका कर ही क्या सकती हो!
माधवी––हाय, मेरे बुरे कर्मों ने मुझे मिट्टी में मिला दिया। अब मेरी किस्मत में राज्य नहीं है। अब तो मालूम होता है कि मैं भिखमंगिनों की तरह दर-दर मारी-मारी फिरूँगी।
तिलोत्तमा––हाँ, अगर किसी तरह तुम यहाँ से जान बचा कर निकल जाओगी तो भीख माँग कर भी जान बचा लोगी, नहीं तो बस यह भी उम्मीद नहीं है।
माधवी––क्या दीवान साहब मुझसे इस तरह की बेमुरौवती करेंगे?
तिलोत्तमा––अगर तुझे उस पर भरोसा है तो रह और देख कि क्या होता है, पर मैं तो अब एक पल भी टिकने वाली नहीं!
माधवी--अगर किशोरी उसके हाथ न पड़ गई होती, तो मुझे किसी तरह की उम्मीद होती, और कोई बहाना भी कर सकती थी, मगर अब तो···
इतना कह माधवी बेतरह रोने लगी, यहाँ तक कि हिचकी बँध गई और वह तिलोत्तमा के पैरों पर गिर कर बोली––
"तिलोत्तमा, मैं कसम खाती हैं कि आज से तेरे हुक्म के खिलाफ कोई काम न करूँगी।"
तिलोत्तमा––अगर ऐसा है तो मैं भी कसम खाकर कहती हूँ कि तुझे फिर इसी दर्जे पर पहुँचाऊँगी और वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों और दीवान साहब से भी ऐसा बदला लूँगी कि वे भी याद करेंगे।
माधवी––बेशक मैं तुम्हारा हुक्म मानूँगी और जो कहोगी सो करूँगी।
तिलोत्तमा––अच्छा तो आज रात को यहाँ से निकल चलना और जहाँ तक जमा-पूंजी अपने साथ ले चलते बने ले लेना चाहिए!
माधवी––बहुत अच्छा! मैं तैयार हूँ, जब चाहे चलो, मगर यह तो कहो कि मेरी इन सखी-सहेलियों की क्या दशा होगी?
तिलोत्तमा––बुरों की संगत करने का जो फल सब भोगते हैं, सो ये भी भोगेंगी। मैं इनका कहाँ तक खयाल करूँगी?
किसी की खबर नहीं लेता।
दीवान अग्निदत्त किशोरी को लेकर भागे तो सीधे अपने घर में आ घुसे। वे किशोरी की सुरत पर ऐसे मोहित हुए कि तन-बदन की सुध जाती रही। सिपाहियों ने इन्द्रजीतसिंह और उनके ऐयारों को गिरफ्तार किया या नहीं, अथवा उनकी बदौलत सभी की क्या दशा हुई, इसकी परवाह तो उन्हें जरा न रही, असल बात तो यह है कि इन्द्रजीतसिंह को वे पहचानते भी न थे।
बेचारी किशोरी की क्या दशा थी और वह किस तरह रो-रोकर अपने सिर के बाल नोंच रही थी इसके बारे में इतना ही कहना बहुत है कि अगर दो दिन तक उसकी यही दशा रही तो किसी तरह जीती न बचेगी और 'हा इन्द्रजीतसिंह, हा इन्द्रजीतसिंह' कहते-कहते प्राण छोड़ देगी।
दीवान साहब के घर में उनकी जोरू और किशोरी ही के बराबर उम्र की एक कुँआरी लड़की थी जिसका नाम कामिनी था और वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही स्वभाव की भी अच्छी थी। दीवान साहब की स्त्री का भी स्वभाव और चाल-चलन अच्छा था, मगर वह बेचारी अपने पति के दुष्ट स्वभाव और बुरे व्यवहारों से बराबर दुःखी रहा करती थी और डर के मारे कभी किसी बात में कुछ रोक-टोक न करती, तिस पर भी आठ-दस दिन पीछे वह अग्निदत्त के हाथ से जरूर मार खाया करती।
बेचारी किशोरी को अपनी जोरू और लड़की के हवाले करके हिफाजत करने के अतिरिक्त समझाने-बुझाने की भी ताकीद कर दीवान साहब बाहर चले आये और अपने दीवानखाने में बैठ सोचने लगे कि किशोरी को किस तरह राजी करना चाहिए। यह औरत कौन और किसकी लड़की है, जिन लोगों के साथ यह थी वे लोग कौन हैं? और यहाँ आकर धूम-फसाद मचाने की उन्हें क्या जरूरत थी? चाल-ढाल और पोशाक से तो वे लोग ऐयार मालूम पड़ते थे मगर यहाँ उन लोगों के आने का क्या सबब था? इसी सब सोच-विचार में अग्निदत्त को आज स्नान तक करने की नौबत न आई। दिन भर इधर-उधर घूमते तथा लाशों को ठिकाने पहुँचाते और तहकीकात करते बीत गया, मगर किसी तरह इस बखेड़े का ठीक पता न लगा, हाँ, महल के पहरे वालों ने इतना कहा––"दो-तीन दिन से तिलोत्तमा हम लोगों पर सख्त ताकीद रखती थी और हुक्म दे गई थी कि जब मेरे चलाये बम के गोले की आवाज तुम लोग सुनो तो फौरन मुस्तैद हो जाओ और जिसको आते देखो गिरफ्तार कर लो।"
अब दीवान साहब का शक माधवी और तिलोत्तमा के ऊपर हुआ और देर तक सोचने-विचारने के बाद उन्होंने निश्चय कर लिया कि इस बखेड़े का हाल बेशक ये दोनों पहले ही से जानती थीं मगर यह भेद मुझसे छिपाये रखने का कोई विशेष कारण अवश्य है।
चिराग जलने के बाद अग्निदत्त अपने घर पहुँचा। किशोरी के पास न जाकर निराले में अपनी स्त्री को बुला कर उसने पूछा, "उस औरत की जुबानी उसका कुछ हाल-चाल तुम्हें मालूम हुआ नहीं?"
अग्निदत्त की स्त्री ने कहा, "हाँ, उसका हाल मालूम हो गया। वह महाराज शिवदत्त की लड़की है और उसका नाम किशोरी है। राजा वीरन्द्रसिंह के लड़के इन्द्रजीतसिंह पर रानी माधवी मोहित गई थी और उनको अपने यहाँ किसी तरह से फँसा लाकर खोह में रख छोड़ा था। इन्द्रजीतसिंह का प्रेम इस किशोरी पर था इसलिए उसने ललिता को भेज कर धोखा दे किशोरी को भी अपने फंदे में फंसा लिया था। वह भी कई दिनों से यहाँ कैद थी और वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग भी कई दिनों से इसी शहर में टिके हुए थे। किसी तरह मौका मिलने पर इन्द्रजीतसिंह किशोरी को ले खोह से बाहर निकल आए और यहाँ तक नौबत आ पहुँची।"
राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयारों का नाम सुन मारे डर के अग्निदत्त काँप उठा, बदन के रोंगटे खड़े हो गए, घबराया हुआ बाहर निकल आया और अपने दीवानखाने में पहुँच मसनद के ऊपर गिर भूखा-प्यासा आधी रात तक यही सोचता रह गया कि अब क्या करना चाहिए।
अग्निदत्त समझ गया कि कोतवाल साहब को जरूर वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने पकड़ लिया है और अब किशोरी को अपने यहाँ रखने से किसी तरह जान न बचेगी, फिर भी वह किशोरी को छोड़ना नहीं चाहता था और सोचते-विचारते जब उसका जी ठिकाने आता तब यही कहता कि "चाहे जो हो, किशोरी को कभी न छोड़ेंगा!
किशोरी को अपने यहाँ रखकर सलामत रहने की सिवाय इसके उसे कोई तरकीब न सूझी कि वह माधवी को मार डाले और स्वयं राजा हो बैठे। आखिर इसी सलाह को उसने ठीक समझा और अपने घर से निकल माधवी से मिलने के लिए महल की तरफ रवाना हुआ, मगर वहाँ पहुँच कर सारी बातें मामूल के खिलाफ देख और भ हो गया। उसे उम्मीद थी कि खोह का दरवाजा बन्द होगा मगर नहीं, खोह का दरवाजा खुला हुआ था और माधवी की सब सखियाँ जो खोह के अन्दर रहती थीं,महल में ऊपर नीचे चारों तरफ फैली हुई थीं और रोती हुई इधर से उधर माधवी को खोज रही थीं।
रात आधी से ज्यादा जा चुकी थी, बाकी रात भी दीवान साहब ने माधवी की सखियों का इजहार लेने में बिता दी और दिन-रात का पूरा अखण्ड उपवास किये रहे। देखना चाहिए, इसका फल उन्हें क्या मिलता है।
शुरू से लेकर माधवी के भाग जाने तक का हाल उसकी सखियों ने दीवान साहब को कह सुनाया। आखिर में कहा, "सुरंग की ताली माधवी अपने पास रखती थी। इसलिए हम लोग लाचार थीं, यह सब हाल आपसे कह न सकीं।"
अग्निदत्त दाँत पीस कर रह गया। आखिर यह निश्चय किया कि कल दशहरा (विजयदशमी) है, गद्दी पर खुद बैठ राजा बन और किशोरी को रानी बना नजरें लूंगा, फिर जो होगा देखा जायगा। सुबह को वह जब अपने घर पहुंचा और पलंग पर जाकर लेटना चाहा, वैसे ही तकिए के पास एक तह किये हुए कागज पर उसकी नजर पड़ी। खोल कर देखा तो उसी की तस्वीर मालूम पड़ी, छाती पर चढ़ा हुआ एक भयानक सूरत का आदमी उसके गले पर खंजर फेर रहा था! इसे देखते ही वह चौंक पड़ा। डर और चिन्ता ने उसे ऐसा पटका कि बुखार चढ़ आया, मगर थोड़ी ही देर में चंगा हो घर के बाहर निकल फिर तहकीकात करने लगा।
११
हम ऊपर के बयान में सुबह का दृश्य लिख कर कह आये हैं कि राजा वीरेन्द्रसिंह अर आनन्दसिंह और तेजसिंह सेना सहित किसी तरफ को जा रहे हैं। पाठक तो समझ ही गये होंगे कि उन्होंने जरूर किसी तरफ चढ़ाई की है और वेशक ऐसा ही है भी। राजा वीरेन्द्रसिंह ने यकायक माधवी के गयाजी पर धावा कर दिया जिसका लेना इस समय उन्होंने बहुत ही सहज समझ रक्खा था, क्योंकि माधवी के चाल-चलन की खबर उन्हें बखूबी लग गयी थी। वे जानते थे कि राज-काज पर ध्यान न दे दिन-रात ऐश में डूबे रहने वाले राजा का राज्य कितना कमजोर हो जाता है। रैयत को ऐसे राजा से कितनी नफरत हो जाती है और किसी दूसरे नेक धर्मात्मा के आ पहुँचने के लिए वे लोग कितनी मिन्नतें मानते रहते हैं।
वीरेन्द्रसिंह का खयाल बहुत ही ठीक था। गया दखल करने में उनको जरा भी तकलीफ नहीं हुई, किसी ने उनका मुकाबला न किया। एक तो उनका चढ़ा-बढ़ा प्रताप ही ऐसा था कि कोई मुकाबला करने का साहस भी नहीं कर सकता था, दूसरे बेदिल रियाया और फौज तो चाहती ही थी कि वीरेन्द्रसिंह के ऐसा कोई यहाँ का भी राजा हो। चाहे दिन-रात ऐश में डूबे और शराब के नशे में चूर रहने वाले मालिकों को कुछ भी खबर न हो, पर बड़े-बड़े जमींदारों और राजकर्मचारियों को माधवी और कुँअर इन्द्रजीत के बीच खिचाखिची की खबर लग चुकी थी और उन्हें मालूम हो चुका था कि आजकल वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग राजगृह में विराज रहे हैं।
राजा वीरेन्द्रसिंह ने बेरोक-टोक शहर में पहुँच कर अपना दखल जमा लिया और अपने नाम की मुनादी करवा दी। वहाँ के दो-एक राजकर्मचारी, जो दीवान अग्निदत्त के दोस्त और खैरख्वाह थे, रंग कुरंग देख कर भाग गये; बाकी फौजी अफसरों और रैयतों ने उनकी अमलदारी खुशी से कबूल कर ली, जिसका हाल राजा वीरेन्द्रसिंह को इसी से मालूम हो गया कि उन लोगों ने दरबार में बेखौफ और हँसते हुए पहुँच कर मुबारकबाद के साथ नजरें गुजारी।
विजयादशमी के एक दिन पहले गया का राज्य राजा वीरेन्द्रसिंह के कब्जे में आ गया और विजयादशमी को अर्थात् दूसरे दिन प्रातःकाल उनके लड़के आनन्दसिंह को यहाँ की गद्दी पर बैठे हुए लोगों ने देखा तथा नजरें दीं। अपने छोटे लड़के कुँअर आनन्दसिंह को गया की गद्दी दे दूसरे ही दिन राजा वीरेन्द्रसिंह चुनार लौट जाने वाले थे, मगर उनके रवाना होने के पहले ही ऐयार लोग जख्मी और बेहोश कुँअर इन्द्रजीतसिंह को लिए हुए गयाजी पहुँच गये जिन्हें देख राजा वीरेन्द्रसिंह को अपना इरादा छोड़ देना पड़ा और बहुत दिन से बिछुड़े हुए प्यारे लड़के को आज इस अवस्था में पाकर उन्हें अपने तन-बदन की सुध भुला देनी पड़ी।
राजा वीरेन्द्रसिंह के मौजूद होने पर भी गयाजी का बड़ा भारी राजभवन सूना हो रहा था क्योंकि उसमें रहने वाले माधवी और दीवान अग्निदत्त के रिश्तेदार लोग भाग गये थे और हुक्म के मुताबिक किसी ने भी उनको भागते समय नहीं रोका था। इस समय राजा वीरेन्द्रसिंह, उनके दोनों लड़कों और ऐयारों के सिवाय सिर्फ थोड़े से फौजी अफसरों का डेरा इस महल में पड़ा हुआ है। ऐयारों में सिर्फ भैरोंसिंह और तारासिंह यहाँ मौजूद हैं, बाकी के कुल ऐयार चुनार लौटा दिये गये थे। शहर के इन्तजाम में सब से पहले यह किया गया कि चिट्ठी या अरजी डालने के लिए एक बगल छेद करके दो बड़े-बड़े सन्दूक राजभवन के फाटक के दोनों तरफ लटका दिये गये और मुनादी करवा दी गई कि जिसको अपना सुख-दुःख अर्ज करना हो दरबार में हाजिर होकर अर्ज किया करे और जो किसी कारण से हाजिर न हो सके वह अर्जी लिख कर इन्हीं सन्दूकों में डाल दिया करे। हुक्म था कि बारी-बारी से ये सन्दूक दिन-रात में छ: मर्तबा कुँअर आनन्दसिंह के सामने खोले जाया करें। इस इन्तजाम से गयाजी की रिआया बहुत प्रसन्न थी।
रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है। एक सजे हुए कमरे में, जिसमें रोशनी अच्छी तरह हो रही है, छोटी सी खूबसूरत मसहरी पर जख्मी कुँअर इन्द्रजीतसिंह लेटे हुए हल्की दुलाई गर्दन तक ओढ़े हैं। आज कई दिनों बाद उन्हें होश आई है, इससे अचम्भे में आकर इस नये कमरे में चारों तरह निगाह दौड़ा कर अच्छी तरह देख रहे हैं। बगल में बायें हाथ का ढासना पलँगड़ी पर दिये हुए उनके पिता राजा वीरेन्द्रसिंह बैठे उनका मुँह देख रहे हैं, और कुछ पायताने की तरफ हट कर पाटी पकड़े कुँअर आनन्दसिंह बैठे बड़े भाई की तरफ देख रहे हैं। पायताने की तरफ पलँगड़ी के नीचे भैरोंसिंह और तारासिंह धीरे-धीरे तलवा साँस रहे हैं। कुँअर आनन्दसिंह के बगल में देवीसिंह बैठे हैं। उनके अलावे वैद्य जर्राह और बहुत से सिपाही नंगी तलवारें लिए पहरा दे रहे हैं।
थोड़ी देर तक कमरे में सन्नाटा रहा इसके बाद कुँअर इन्द्रजीत ने अपने पिता की तरफ देख कर पूछा––
इन्द्रजीतसिंह––यह कौन सी जगह है? यह किसका मकान है?
वीरेन्द्रसिंह––यह चन्द्रदत्त की राजधानी गयाजी है। ईश्वर की कृपा से आज यह हमारे कब्जे में आ गई है। मकान भी चन्द्रदत्त ही के रहने का है। हम लोग इस शहर में अपना दखल जमा चुके थे जब तुम यहाँ पहुँचाये गये।
यह सुन इन्द्रजीतसिंह चुप हो रहे और कुछ सोचने लगे, साथ ही इसके राजगृह में दीवान अग्निदत्त के साथ होने वाली लड़ाई का समाँ उनकी आँखों के आगे घूम गया और वे किशोरी को याद कर अफसोस करने लगे। इनके बेहोश होने के बाद क्या हुआ और किशोरी पर क्या बीती इसके जानने के लिए दिल बैचेन था मगर पिता का लिहाज कर भैरोंसिंह से कुछ पूछ न सके सिर्फ ऊँची साँस लेकर रह गये मगर देवीसिंह उनके जी का भाव समझ गये और बिना पूछे ही कुछ कहने मौका समझ कर बोले, "राजगृह में लड़ाई के समय जितने आदमी आपके साथ थे ईश्वर की कृपा से सब बच गये और अपने ठिकाने पर हैं, केवल आप ही को इतना कष्ट भोगना पड़ा।"
देवीसिंह के इतना कहने से इन्द्रजीतसिंह की बेचैनी बिल्कुल ही जाती तो नहीं रही मगर कुछ कम जरूर हो गई। इतने में दिल बहलाने का कुछ ठिकाना समझ कर देवीसिंह पुनः बोल उठे।
देवीसिंह––अर्जियों वाला सन्दूक हाजिर है, उसके देखने का समय भी हो गया है।
इन्द्रजीत––कैसा सन्दूक?
आनन्दसिंह––यहाँ महल के फाटक पर दो सन्दूक इसलिए रख दिए गए हैं कि जो लोग दरबार में हाजिर होकर अपना दुख-सुख न कह सकें, वे लोग अरजी लिख कर इस सन्दूक में डाल दिया करें।
इन्द्रजीतसिंह––बहुत मुनासिब है, इससे रैयतों के दिल का हाल अच्छी तरह मालूम हो सकता है। इस तरह के कई सन्दूक शहर में इधर-उधर भी रखवा देने चाहिए क्योंकि बहुत से आदमी खौफ से फाटक तक आते भी हिचकेंगे।
आनन्दसिंह––बहुत खूब, कल इसका इन्तजाम हो जायगा।
वीरेन्द्रसिंह––हमने यहाँ की गद्दी पर आनन्दसिंह को बैठा दिया है।
इन्द्रजीतसिंह––बड़ी खुशी की बात है, यहाँ का इन्तजाम ये बहुत ही अच्छी तरह कर सकेंगे क्योंकि यह तीर्थ का मुकाम है और इनका पुराणों से बड़ा प्रेम है और उन्हें अच्छी तरह समझते भी हैं। (देवीसिंह की तरफ देख कर) हाँ साहब, वह सन्दूक मँगवाइये जरा दिल तो बहले।
हाथ भर का चौखूँटा सन्दुक हाजिर किया गया और उसे खोलकर उसमें भरी अर्जियाँ जिनसे वह सन्दूक भरा था बाहर निकाली गई। पढ़ने से मालूम हुआ कि यहाँ की रिआया नये राजा की अमलदारी से बहुत प्रसन्न है और मुबारकबाद दे रही है, हाँ, एक अर्जी उसमें ऐसी भी निकली जिसके पढ़ने से सभी को तरद्दुद ने आ घेरा और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। पाठकों की दिलचस्पी के लिए हम उस अर्जी की नकल नीचे लिखे देते हैं––
"हम लोग मुद्दत से मनाते थे कि यहाँ की गद्दी पर हुजूर को या हुजूर के खानदान में से किसी को बैठा देखें। ईश्वर ने आज हम लोगों की आरजू पूरी की और कम्बख्त माधवी और अग्निदत्त का बुरा साया हम लोगों के सिर से हटाया। चाहे उन दोनों दुष्टों का खौफ अभी हम लोगों को बना हो, मगर फिर भी हुजूर के भरोसे पर हम लोग बिना मुबारकबाद दिए और खुशी मनाये नहीं रह सकते। वह डर इस बात का नहीं है कि यहाँ फिर उन दुष्टों की अमलदारी होगी तो कष्ट भोगना पड़ेगा। राम-राम, ऐसा तो कभी तो ही नहीं सकता, हम लोगों को यह गुमान तो स्वप्न में भी नहीं हो सकता, वह डर बिल्कुल दूसरा ही है जो हम लोग नीचे अर्ज करते हैं। आशा है कि बहुत जल्द उससे हम लोगों की रिहाई होगी, नहीं तो महीने भर में यहाँ की चौथाई रिआया यमलोक में पहुँच जायेगी। मगर नहीं, हुजूर के नामी और अपनी आप नजीर रखने वाले ऐयारों के हाथ से वे बेईमान हरामजादे कब तक बच सकते हैं जिनके डर से हम लोगों को पूरी नींद सोना नसीब नहीं होता।
"कुछ दिनों से दीवान अग्निदत्त की तरफ से थोड़े बदमाश लोग इस काम के लिए मुकर्रर कर दिये हैं कि अगर कोई आदमी अग्निदत्त के खिलाफ नजर आवे तो बेधड़क उसका सिर चोरी से रात के समय काट डालें, या दीवान साहब को जब रुपये की जरूरत हो, तो जिस अमीर या जमींदार के घर में चाहे डाका डाल दें या चोरी करके कंगाल बना दें। क्योंकि इसकी फरियाद कहीं सुनी नहीं जाती, इस वजह से और भी बाहरी चोरों को अपना घर भरने और हम लोगों को सताने का मौका मिलता है। हम लोगों ने अभी उन दुष्टों की सूरत तो नहीं देखी और यह भी नहीं जानते कि वे लोग कौन हैं या कहाँ रहते हैं जिनके खौफ से दिन-रात हम लोग काँपा करते हैं।"
इस अर्जी के नीचे कई मशहूर और नामी रईसों और जमींदारों के दस्तखत थे। यह अर्जी उसी समय देवीसिंह के हवाले कर दी गयी और देवीसिंह ने वादा किया कि एक महीने के अन्दर इन दुष्टों को जिन्दा या मरे हुए हुजूर में हाजिर करूँगा।
इसके बाद जर्राहों ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह के जख्मों को खोला और दूसरी पट्टी बदली, कविराज ने दवा खिलाई और हुक्म पाकर सब अपने-अपने ठिकाने चले गये। देवीसिंह उसी समय बिदा हो न मालूम कहाँ चले गये और राजा वीरेन्द्रसिंह भी वहाँ से हटकर अपने कमरे में चले गए।
इस कमरे के दोनों तरफ छोटी-छोटी दो कोठरियाँ थीं। एक में संध्या-पूजा का सामान दुरुस्त था और दूसरी में खाली फर्श पर एक मसहरी विछी हुए थी जो उस मसहरी से कुछ छोटी थी जिस पर कुँअर इन्द्रजीतसिंह आराम कर रहे थे। कोठरी से वह मसहरी बाहर निकाली गई और कुँअर आनन्दसिंह के सोने के लिए कुँअर इन्द्रजीतसिंह की मसहरी के पास बिछाई गयी। भैरोंसिंह और तारासिंह ने भी दो मसहरियों के नीचे अपना बिस्तर जमाया। सिवाय इन चारों के उस कमरे में और कोई न रहा। इन लोगों ने रात भर आराम से काटी और सवेरा होने पर आँख खुलते ही विचित्र तमाशा देखा।
सुबह के पहले ही दोनों ऐयारों की आँखें खुलीं और हैरत-भरी निगारों से चारों तरफ देखने लगे, इसके बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी जागे और फूलों की खुशबू, जो इस कमरे में बहुत देर पहले से ही भर रही थी, लेने तथा दोनों ऐयारों की तरह ताज्जुब से चारों तरफ देखने लगे।
आनन्दसिंह––खुशबूदार फूलों के गजरे और गुलदस्ते इस कमरे में किसने सजाये हैं?
इन्द्रजीतसिंह––ताज्जुब है, हमारे आदमी बिना हुक्म पाये ऐसा कब कर सकते हैं?
भैरोंसिंह––हम दोनों आदमी घण्टे भर के पहले से उठकर इस पर गौर कर रहे हैं, मगर कुछ समझ नहीं आता कि क्या मामला है।
आनन्दसिंह––गुलदस्ते भी बहुत खूबसूरत और बेशकीमत मालूम पड़ते हैं।
तारासिंह––(एक गुलदस्ता उठाकर और पास लाकर) देखिए, इस सोने के गुलदस्ते पर क्या उम्दा मीने का काम किया हुआ है! बेशक किसी बहुत बड़े शौकीन का बनवाया हुआ है, इसी ढंग के सब गुलदस्ते हैं।
भैरोंसिंह––हाँ, एक बात ताज्जुब की और भी है जो मैंने अभी तक आपसे नहीं कही।
इन्द्रजीतसिंह––वह क्या?
भैरोंसिंह––(हाथ का इशारा करके) ये दोनों दरबाजे सिर्फ घुमाकर मैंने खुले छोड़ दिये थे; मगर सुबह को और दरवाजों की तरह इन्हें भी बन्द पाया।
तारासिंह––(आनन्दसिंह की तरफ देखकर) शायद रात को आप उठे हों?
आनन्दसिंह––नहीं।
इसी तरह देर तक ये लोग ताज्जुब भरी बातें करते रहे, मगर अक्ल ने कुछ गवाही न दी कि क्या मामला है। राजा वीरेन्द्रसिंह भी आ पहुँचे, उनके साथ और भी कई मुसाहिब लोग आ जमे। सभी इस आश्चर्य की बात को सुन कर सोचने और गौर करने लगे। कई बुजदिलों को भूत-प्रेत और पिशाच का ध्यान आया, मगर महाराज और दोनों कुमारों के खौफ से कुछ बोल न सके, क्योंकि ये लोग ऐसे डरपोक और इस खयाल के आदमी न थे और न ऐसे आदमियों को अपने साथ रखना ही पसन्द करते थे।
उन फूलों के गजरों और गुलदस्तों को किसी ने न छेड़ा और ज्यों के त्यों जहाँ के तहाँ लगे रह गये। रईसों की हाजिरी और शहर के इन्तजाम में दिन बीत गया और रात को फिर कल ही की तरह दोनों भाई मसहरी पर सो रहे। दोनों ऐयार भी मसहरी के बगल में जमीन पर लेट गये, मगर आपस में मिल-जुलकर बारी-बारी से जागते रहने का विचार दोनों ने ही कर लिया था और अपने बीच में एक लम्बी छड़ी इसलिए रख ली थी कि अगर रात को किसी समय कोई ऐयार कुछ देखे तो बिना मुँह से बोले छड़ी के इशारे से दूसरे को जगा दे। इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने भी कह रखा था कि अगर घर में किसी को देखना तो चुपके से हमें जगा देना, जिससे हम लोग भी देख लें कि कौन है और कहाँ से आता है।
आधी रात से कुछ ज्यादा जा चुकी है। कुँवर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह गहरी नींद में बेसुध पड़े थे। पहरे के मुताबिक लेटे-लेटे तारासिंह दरवाजे की तरफ देख रहे हैं। यकायक पूरब की तरफ वाली कोठरी में कुछ खटका हुआ। तारासिंह जरा-सा घूम गये और पड़े-पड़े ही उस कोठरी की तरफ देखने लगे। बारीक चादर पहले ही से दोनों ऐयारों के मुंह पर पड़ी हुई थी और रोशनी अच्छी तरह हो रही थी।
कोठरी का दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा। तारासिंह ने छड़ी के इशारे से भैरोंसिंह को उठा दिया जो बड़ी होशियारी से घूमकर कोठरी की तरफ देखने लगे। कोठरी के दरवाजे का एक पल्ला अब अच्छी तरह खुल गया और एक निहायत हसीन और कमसिन औरत किवाड़ पर हाथ रखे खड़ी दोनों मसहरियों की तरफ देखती नजर पड़ी। भैरोंसिह और तारासिंह ने मसहरी के पाये पर हाथ का इशारा देकर दोनों भाइयों को भी जगा दिया।
इन्द्रजीतसिंह का रुख तो पहले ही उस कोठरी की तरफ था, मगर आनन्दसिंह उस तरफ पीठ किये सो रहे थे। जब उनकी आँखें खुली तो अपने सामने की तरफ जहाँ तक देख सकते थे कुछ भी न देखा, लाचार धीरे से उनको करवट बदलनी पड़ी और तब मालूम हुआ कि इस कमरे में क्या आश्चर्य की बात दिखाई दे रही है।
अब कोठरी के दोनों पल्ले खुल गये और वह हसीन औरत सिर से पैर तक अच्छी तरह इन चारों को दिखाई देने लगी क्योंकि उसके तमाम बदन पर बखूबी रोशनी पड़ रही थी। वह औरत नखशिख से ऐसी दुरुस्त थी कि उसकी तरफ चारों की टकटकी बँध गयी। बेशकीमत सफेद साड़ी और जड़ाऊ जेवरों से वह बहुत ही भली मालूम हो रही थी, जेवरों में सिर्फ खुशरंग मानिक जड़ा हुआ था जिसकी सुर्खि उसके गोरे रंग पर पड़कर उसके हुस्न को हद से ज्यादा रौनक दे रही थी। उसकी पेशानी (माथे) पर एक दाग था जिसके देखने से विश्वास होता था कि बेशक इसने कभी तलवार या किसी हर्वे की चोट खायी है। यह दो अंगुल का दाग भी उसकी खूबसूरती को बढ़ाने के लिए जेवर ही हो रहा था। उसे देख ये चारों आदमी यही सोचते होंगे कि इससे बढ़कर खूबसूरत रम्भा और उर्वशी अप्सरा भी न होंगी। कुँअर इन्द्रजीतसिंह तो किशोरी पर मोहित हो रहे थे, उसको तस्वीर इनके दिल में खिच रही थी, उन पर चाहे इसके हुस्न ने ज्यादा असर न किया हो, मगर आनन्दसिंह की क्या हालत हो गयी यह वे ही जानते होंगे। बहुत बचाते रहने पर भी ठण्डी साँसें उनसे न रुक सकी जिससे हम भी कह सकते हैं कि उनके दिल ने उनकी ठण्डी साँसों के साथ ही बाहर, निकलकर कह दिया कि अब हम तुम्हारे कब्जे में नहीं हैं।
कुँअर आनन्दसिंह अपने को सँभाल न सके, उठ बैठे और उधर ही देखने लगे जिधर वह औरत किवाड़ का पल्ला थामे खड़ी थी। उनकी यह हालत देख तीनों आदमियों को विश्वास हो गया कि वह भाग जायेगी, मगर नहीं, वह इनको उठकर बैठते देख जरा भी न हिचकी, ज्यों की त्यों खड़ी रही, बल्कि इनकी तरफ देख उसने जरा-सा हँस दिया, जिससे ये और भी बेचैन हो गये।
कुँअर आनन्दसिंह यह सोचकर कि उस कोठरी में किसी दूसरी तरफ निकल जाने के लिए दूसरा दरवाजा नहीं है मसहरी पर से उठ खड़े हुए और उस औरत की तरफ चले। इनको अपनी तरफ आते देख वह औरत कोठरी में चली गयी और फुर्ती से उसका दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह की तबीयत चाहे दुरुस्त हो गयी हो मगर कमजोरी अभी तक मौजूद है, बल्कि सब जख्म भी अभी तक कुछ गीले हैं, इसलिए अभी घूमने-फिरने लायक नहीं हुए। उस परीजमाल को भीतर से किवाड़ बन्द कर लेते देख सब उठ खड़े हुए, कुँअर इन्द्रजीतसिंह भी तकिए का सहारा लेकर बैठ गये और बोले, "इस कोठरी में किसी तरफ निकल जाने का रास्ता तो नहीं है?"
भैरोंसिंह––जी नहीं।
आनन्दसिंह––(किवाड़ में धक्का देकर) इसे खोलना चाहिए।
तारासिंह––मुश्किल तो कुछ नहीं, (इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर) क्या हुक्म होता है?
इन्द्रजीतसिंह––जब इस कोठरी में दूसरी तरफ निकल जाने का रास्ता ही नहीं है तो जल्दी क्यों करते हो?
इन्द्रजीतसिंह के इतना कहते ही आनन्दसिंह वहाँ से हटे और अपने भाई के पास आकर बैठ गये। भैरोंसिंह और तारासिंह भी पास आकर बैठ गये और यों बातचीत होने लगी––
इन्द्रजीतसिंह––(भैरोंसिंह और तारासिंह की तरफ देखकर) तुममें से कोई जागता भी रहा या दोनों सो गए थे?
भैरोंसिंह––नहीं सो क्यों जायेंगे? हम लोग बारी-बारी से बराबर जागते और महीन चादर से मुँह ढाँके दरवाजे की तरफ देखते रहे।
इन्द्रजीतसिंह––तो क्या इसी दरवाजे में से इस औरत को आते देखा था?
आनन्दसिंह––बेशक इसी तरफ से आयी होगी!
तारासिंह––जी नहीं, यही तो ताज्जुब है कि कमरे के दरवाजे ज्यों के त्यों भिड़े रह गये और यकायक कोठरी का दरवाजा खुला और वह नजर आयी।
इन्द्रजीतसिंह––यह तो अच्छी तरह मालूम है न कि उस कोठरी में और कोई दरवाजा नहीं है?
भैरोंसिंह––जी हाँ, अच्छी तरह जानते हैं, भीतर कोई दरवाजा नहीं है।
तारासिंह––क्या कहें, कोई सुने तो यही कहे कि चुडैल थी।
आनन्दसिंह––राम-राम, यह भी कोई बात है!
इन्द्रजीतसिंह––खैर, जो हो, मेरी राय यही है कि पिताजी के आने तक कोठरी का दरवाजा न खोला जाय।
आनन्दसिंह––जो हुक्म, मगर मैं तो यह चाहता था कि पिताजी के आने तक दरवाजा खोलकर सब-कुछ दरियाफ्त कर लिया जाता।
इन्द्रजीतसिंह––खैर खोलो।
हुक्म पाते ही कुँअर आनन्दसिंह उठ खड़े हुए, खूँटी से लटकती हुई एक भुजाली उतार ली और उस दरवाजे के पास जा एक-एक हाथ दोनों कुलाबों पर मारा जिससे कुलाबे कट गये। तारासिंह ने दोनों पल्ले उतारकर अलग रख दिए। भैरोंसिंह ने एक वलता हुआ शमादान उठा लिया और चारों आदमी उस कोठरी के अन्दर गए मगर वहाँ एक चूहे का बच्चा भी नजर न आया।
इस कोठरी में तीन तरफ मजबूत दीवारें थीं और एक तरफ वही दरवाजा था जिसका कुलाबा काट ये लोग अन्दर आए थे, हाँ, सामने की तरफ वाली अर्थात् बिचली दीवार में काठ की एक आलमारी जड़ी हुई थी। इन लोगों का ध्यान उस आलमारी पर गया और सोचने लगे कि शायद यह आलमारी इस ढंग की हो जो दरवाजे का काम देती हो और इसी राह से वह औरत आयी हो, मगर उन लोगों का यह खयाल भी तुरन्त ही जाता रहा और विश्वास हो गया कि यह आलमारी किसी तरह दरवाजा नहीं हो सकती और न इस राह से वह औरत आई ही होगी, क्योंकि उस आलमारी में भैरोंसिंह ने अपने हाथ से कुछ जरूरी असबाब रखकर ताला लगा दिया था जो अभी तक ज्यों का त्यों बन्द था। यह कब हो सकता है कि कोई ताला खोलकर इस अलमारी के अन्दर घुस गया हो और बाहर का ताला जैसा का तैसा दुरुस्त कर दिया हो! लेकिन तब फिर क्या हुआ? यह औरत क्योंकर आयी और किस राह से चली गयी? उन लोगों ने लाख सिर धुना और गौर किया, मगर कुछ समझ में न आया।
ताज्जुब भरी बातों ही में रात बीत गयी। सुबह को जब राजा वीरेन्द्रसिंह अपने लड़के को देखने के लिए उस कमरे में आए तो जहि वैद्य तथा और मुसाहिब लोग भी उनके साथ थे। वीरेन्द्रसिंह ने इन्द्रजीतसिंह से तबीयत का हाल पूछा। उन्होंने कहा, "अब तबीयत अच्छी है मगर एक जरूरी बात अर्ज करना चाहता हूँ जिसके लिए तख लिया (एकान्त) हो जाना बेहतर होगा।"
वीरेन्द्रसिंह ने भैरोंसिंह की तरफ देखा। उसने तखलिया हो जाने में महाराज की रजामन्दी जानकर सभी को हट जाने का इशारा किया। बात की बात में सन्नाटा हो गया और सिर्फ वही पाँच आदमी उस कमरे में रह गए।
वीरेन्द्रसिंह––कहो, क्या बात है?
इन्द्रजीतसिंह––आज रात एक अजीब बात देखने में आयो।
वीरेन्द्रसिंह––वह क्या है?
इन्द्रजीतसिंह––(तारासिंह की तरफ देखकर) तारासिंह, तुम्हीं सब हाल कह जाओ क्योंकि उस समय तुम्ही जागते थे, हम लोग तो पीछे जगाए गए हैं।
तारासिंह––बहुत खूब।
तारासिंह ने रात का पूरा-पूरा हाल राजा वीरेन्द्रसिंह से कह सुनाया जिसे सुनकर उन्होंने बहुत ताज्जुब किया और घण्टों तक गौर में डूबे रहने के बाद बोले, "खैर, यह बात किसी और को न मालूम हो, नहीं तो मुसाहिबों और अहलकारों में खलबली पैदा हो जायेगी और सैकड़ों तरह की गप्पें उड़ने लगेंगी। देखो तो क्या होता है और कब तक पता नहीं लगता, आज हम भी इसी कमरे में सोयेंगे।"
एक दिन क्या, कई दिनों तक राजा वीरेन्द्रसिंह उस कमरे में सोए मगर कुछ मालूम न हुआ और न फिर कोई बात ही देखने में आयी, आखिर उन्होंने हुक्म दिया कि उस कोठरी का दरवाजा नया कुलाबा लगाकर फिर उसी तरह बन्द कर दिया जाय।
१२
आज पाँच दिन के बाद देवीसिंह लौटकर आये हैं। जिस कमरे का हाल हम ऊपर लिख आए हैं उसी में राजा वीरेन्द्र सिंह, उनके दोनों लड़के, भैरोंसिंह, तारासिंह और कई सरदार लोग बैठे हैं। इन्द्रजीतसिंह की तबीयत अब बहुत अच्छी है और वे चलने फिरने लायक हो गये हैं। देवीसिंह को बहुत जल्द लौट आते देखकर सभी को विश्वास हो गया कि जिस काम पर मुस्तैद किए गये थे उसे कर चुके, मगर ताज्जुब इस बात का था कि वे अकेले क्यों आये।
वीरेन्द्रसिंह––कहो, देवीसिंह, खुश तो हो?
देवीसिंह––खुशी तो मेरी खरीदी हुई है! (और लोगों की तरफ देख कर) अच्छा, अब आप लोग जाइये। बहुत विलम्ब हो गया।
दरबारियों और खुशामदियों के चले जाने के बाद वीरेन्द्रसिंह ने देवीसिंह से पूछा––
वीरेन्द्रसिंह––कहो, उस अर्जी में जो कुछ लिखा था, सच था या झूठ?
देवीसिंह––उसमें जो कुछ लिखा था, वह बहुत ठीक था। ईश्वर की कृपा से शीघ्र ही उन दुष्टों का पता लग गया, मगर क्या कहें कुछ ऐसी ताज्जुब की बातें देखने में आई कि अभी तक बुद्धि चकरा रही है।
वीरेन्द्रसिंह––(हँस कर) उधर तुम ताज्जुब को बातें देखो, इधर हम लोग अद्भुत बातें देखें।
देवीसिंह––सो क्या?
वीरेन्द्रसिंह––पहले तुम अपना हाल कह लो तो यहाँ का सुनो!
देवीसिंह––बहुत अच्छा। फिर सुनिए। रामशिला पहाड़ी के नीचे मैंने एक कागज अपने हाथ से लिख कर चिपका दिया जिसमें यह लिखा था––
"हम खूब जानते हैं कि जो अग्निदत्त के विरुद्ध होता है उसका तुम लोग सिर काट लेते हो, जिसका घर चाहते हो लूट लेते हो। मैं डंके की चोट से कहता हूँ कि अग्निदत्त का दुश्मन मुझसे बढ़ के कोई न होगा और गयाजी में मुझसे बढ़ कर मालदार भी कोई नहीं है, जिस पर मजा यह है कि मैं अकेला हूँ, अब देखना चाहिए कि तुम लोग मेरा क्या कर लेते हो?"
आनन्दसिंह––अच्छा, तब क्या हुआ?"
देवीसिंह––उन दुष्टों का पता लगाने के उपाय तो मैंने और भी कई किए थे, मगर काम इसी से चला। उस राह से आने-जाने वाले सभी उस कागज को पढ़ते थे और चले जाते थे। मैं उस पहाड़ी के कुछ ऊपर जाकर पत्थर की चट्टान की आड़ में छिपा हुआ हर दम उसकी तरफ देखा करता था। एक दफे दो आदमी एक साथ वहाँ आये और उसे पढ़ मूंछों पर ताव देते शहर की तरफ चले गये। शाम को वे दोनों लौटे और फिर उस कागज को पढ़ सिर हिलाते बराबर की पहाड़ी की ओर चले गये। मैंने सोचा कि इनका पीछा जरूर करना चाहिये क्योंकि कागज के पढ़ने का असर सबसे ज्यादा इन्हीं दोनों पर हुआ है। आखिर मैंने उनका पीछा किया और जो सोचा था वही ठीक निकला। वे लोग पन्द्ररा-बीस आदमी हैं और खूब हट्टे-कट्टे और मुस्टंडे हैं। उसी झुण्ड में मैंने एक औरत को भी देखा। अहा, ऐसी खूबसूरत औरत तो मैंने आज तक नहीं देखी। पहले मैंने सोचा कि वह इन लोगों में से किसी की लड़की होगी, क्योंकि उसकी अवस्था बहुत कम थी, मगर नहीं, उसके हाव-भाव और उसकी हुकूमत-भरी बातचीत से मालूम हुआ कि वह उन सब की मालिक है, पर सच तो यह है कि मेरा जी इस बात पर भी नहीं जमता। उसकी चाल-ढाल, उसकी बढ़िया पोशाक और उसके जड़ाऊ कीमती गहनों पर, जिनमें सिर्फ खुश रंग कीमती मानिक ही जड़े हुए थे, ध्यान देने से दिल की कुछ विचित्र हालत हो जाती है।
मानिक के जड़ाऊ जेवरों का नाम सुनते ही मानो कुँअर आनन्दसिंह चौंक पड़े, इन्द्रजीतसिंह और तारासिंह का भी चेहरा बदल गया और उस औरत का विशेष हाल जानने के लिए घबराने लगे, क्योंकि उस रात को इन चारों ने इस कमरे में या यों कहिए कोठरी में जिस औरत की झलक देखी थी वह भी मानिक के जड़ाऊ जेवरों से ही अपने को सजाये हुए थी। आखिर आनन्दसिंह से न रहा गया, देवीसिंह को बात कहते-कहते रोक कर पूछा––
आनन्दसिंह––उस औरत का नख-शिख जरा अच्छी तरह कह जाइए।
देवीसिंह––सो क्यों?
वीरेन्द्रसिंह––(लड़कों की तरफ देख कर) तुम लोगों को ताज्जुब किस बात का है, तुम लोगों के चेहरे पर हैरानी क्यों छा गई है?
भैरोंसिंह––जी, वह औरत जिसे हम लोगों ने देखा था, ऐसे ही गहने पहने हुए थी जैसे चाचाजी कह रहे हैं।
वीरेन्द्रसिंह––हाँ!
भैरोंसिंह––जी हाँ।
देवीसिंह––तुम लोगों ने कैसी औरत देखी थी?
वीरेन्द्रसिंह––सो पीछे सुनना, पहले जो ये पूछते हैं उसका जवाब दे लो।
देवीसिंह––नखशिख सुन के क्या कीजिएगा? सबसे ज्यादा पक्का निशान तो यह है कि उसके ललाट में दो-ढाई अंगुल का एक आड़ा दाग है। मालूम होता है शायद उसने कभी तलवार की चोट खाई है!
आनन्दसिंह––बस-बस-बस!
इन्द्रजीतसिंह––बेशक वही औरत है।
तारासिंह––कोई शक नहीं कि वही है।
भैरोंसिंह––अवश्य वही है!
वीरेन्द्रसिंह––मगर आश्चर्य है, कहाँ उन दुष्टों का संग और कहाँ हम लोगों के साथ आपस का बर्ताव।
भैरोंसिंह––हम लोग तो उसे दुश्मन नहीं समझते।
देवीसिंह––अब हम न बोलेंगे, जब तक यहाँ का खुलासा हाल न सुन लेंगे। न मालूम आप लोग क्या कह रहे हैं?
वीरेन्द्रसिंह––खैर, यही सही, अपने लड़के से पूछिए कि यहाँ क्या हुआ
तारासिंह––जी हाँ, सुनिए, मैं अर्ज करता हूँ।
तारासिंह ने यहाँ का सारा हाल खूब अच्छी तरह कहा। फूल तो फेंक दिए गए थे मगर गुलदस्ते अभी तक मौजूद थे, वे भी दिखाये। देवीसिंह हैरान थे कि यह क्या मामला है, देर तक सोचने के बाद बोले, "मुझे तो विश्वास ही नहीं होता कि यहाँ वही औरत आई होगी जिसे मैंने वहाँ देखा है!"
वीरेन्द्रसिंह––यह शक भी मिटा ही डालना चाहिए।
देवीसिंह––उन लोगों का जमाव वहाँ रोज ही होता है जहाँ मैं देख आया हूँ, आज तारा या भैरों को अपने साथ ले चलूँगा। ये खुद ही देख लें कि वही औरत है या दूसरी।
वीरेन्द्रसिंह––ठीक है। आज ऐसा ही करना। हाँ, अब तुम अपना हाल और आगे कहो।
देवीसिंह––मुझे वहाँ यह भी मालूम हुआ कि उन दुष्टों ने हमेशा के लिए अपना डेरा उसी पहाड़ी में कायम किया है और बातचीत से यह भी जाना गया कि लूट और चोरी का माल भी वे लोग उसी ठिकाने कहीं रखते हैं। मैंने अभी बहुत खोज उन लोगों की नहीं की, जो कुछ मालूम हुआ था आपसे कहने के लिए चला आया। अब उन लोगों को गिरफ्तार करना कुछ मुश्किल नहीं है। हुक्म हो तो थोड़े से आदमी अपने साथ ले जाऊँ और आज ही उन लोगों को उस औरत के सहित गिरफ्तार कर लाऊँ।
वीरेन्द्रसिंह––आज तो तुम भैरों या तारा को अपने साथ ले जाओ। फिर कल उन लोगों की गिरफ्तारी की फिक्र की जायगी।
आखिर भैरोंसिंह को अपने साथ लेकर देवीसिंह बराबर के उस पहाड़ पर गए जो गयाजी से तीन-चार कोस की दूरी पर होगा। घूमघुमौवा और पेचीली पगडण्डियों को तय करते हुए पहर रात जाते-जाते ये दोनों उस खोह के पास पहुँच गए जिसमें वे बदमाश डाकू लोग रहते थे। उस खोह के पास ही एक और छोटी-सी गुफा थी जिसमें मुश्किल से दो आदमी बैठ सकते थे। इस गुफा में एक बारीक दरार ऐसी पड़ी हुई थी जिसमें ये दोनों ऐयार उस लम्बी-चौड़ी गुफा का हाल बखूबी देख सकते थे जिसमें वे डाकू लोग रहते थे। इस समय वे सब-के-सब वहाँ मौजूद भी थे, बल्कि वह औरत भी सरदार के तौर पर छोटी-सो गद्दी लगाए वहाँ मौजूद थी। ये दोनों ऐयार उस दरार से उन लोगों की बातचीत तो नहीं सुन सकते थे, मगर सूरत-शक्ल, भाव और इशारे अच्छी तरह देख सकते थे।
इन लोगों ने इस समय वहाँ पन्द्रह डाकुओं को बैठे हुए पाया और उस औरत को देख कर भैरोंसिंह ने पहचान लिया कि यह यह वही है जो कुँअर इन्द्रजीतसिंह के कमरे में आई थी। आज वह वैसी पोशाक या उन जेवरों को पहने हुए तो न थी, तो भी सूरत-शक्ल में किसी तरह का फर्क न था।
इन दोनों ऐयारों के पहुँचने बाद दो घण्टे तक वे डाकू लोग आपस में कुछ बातचीत करते रहे। इस बीच में कई डाकुओं ने दो-तीन दफे हाथ जोड़ कर उस औरत से कुछ कहा जिसके जवाब में उसने सिर हिला दिया, जिससे मालूम हुआ कि मंजूर नहीं किया। इतने ही में एक-दूसरी हसीन कमसिन और फुर्तीली औरत लपकती हुई वहाँ आ मौजूद हुई। उसके हाँफने और दम फूलने से मालूम होता था कि वह बहुत दूर से दौड़ती हुई आ रही है।
उस नई आई औरत ने न मालूम उस सरदार औरत के कान में झुक कर क्या कहा जिसके सुनते ही उसकी हालत बदल गई। बड़ी-बड़ी आँखें सुर्ख हो गईं, खूबसूरत चेहरा तमतमा उठा और तुरत उस नई औरत को साथ लेकर उस खोह के बाहर चली गई। वे डाकू उन दोनों औरतों का मुँह देखते ही रह गये, मगर कुछ कहने की हिम्मत न पड़ी।
जब दो घण्टे तक दोनों औरतों में से कोई न लौटी, तो डाकू लोग भी उठ खड़े हुए और खोह के बाहर निकल गये। उन लोगों के इशारे और आकृति से मालूम होता या कि वे दोनों औरतों के यकायक इस तरह पर चले जाने से ताज्जुब कर रहे हैं। यह हालत देख कर देवीसिंह भी वहाँ से तुरन्त चल पड़े और सुबह होते-होते राजमहल में आ पहुँचे।
१३
कुँअर इन्द्रजीतसिंह तो किशोरी पर जी-जान से आशिक हो ही चुके थे। इस बीमारी की हालत में भी उसकी याद इन्हें सता रही थी और यह जानने के लिए बेचैन हो रहे थे कि उस पर क्या बीती, वह किस अवस्था में कहाँ है और अब उसकी सुरत कब किस तरह देखनी नसीब होगी। जब तक वे अच्छी तरह दुरुस्त नहीं हो जाते, न तो खुद कहीं जाने के लिए हुक्म ले सकते थे और न किसी बहाने से अपने प्रेमी साथी ऐयार भैरोंसिंह को ही कहीं भेज सकते थे। इस बीमारी की हालत में समय पाकर उन्होंने भैरोंसिंह से सब हाल मालूम कर लिया था। वे यह सुन कर कि किशोरी को दीवान अग्निदत्त उठा ले गया बहुत ही परेशान थे, मगर यह खबर उन्हें कुछ-कुछ ढाढ़स देती थी कि चपला, चम्पा और पण्डित बद्रीनाथ उसके छुड़ाने की फिक्र में लगे हुए हैं और राजा वीरेन्द्रसिंह को भी यह धुन जी से लगी हुई है कि जिस तरह बने, शिवदत्त की लड़की किशोरी की शादी अपने लड़के के साथ करके शिवदत्त को नीचा दिखावें और शर्मिन्दा करें।
कुँअर आनन्दसिंह ने भी अब इश्क के मैदान में पैर रख दिया, मगर इनकी हालत अजब गोमगो में पड़ी हुई है। जब उस औरत का ध्यान आता, जी बेचैन हो जाता था, मगर जब देवीसिंह की बात को याद करते कि वह डाकुओं के एक गिरोह की सरदार है तो कलेजे में अजीब तरह का दर्द पैदा होता था और थोड़ी देर के लिए चित्त का भाव बदल जाता था, लेकिन साथ ही इसके सोचने लगते थे कि कहीं अगर वह हम लोगों की दुश्मन होती तो मेरी तरफ देख कर प्रेम-भाव से कभी न हँसती और फूलों के गुलदस्ते और गजरे सजाने के लिए जब उस कमरे में आई थी तो हम लोगों को नींद में गाफिल पाकर जरूर मार डालती। पर, फिर हम लोगों की दुश्मन अगर नहीं है तो उन डाकुओं का साथ कैसा!
ऐसे-ऐसे सोच-विचार ने उनकी अवस्था खराब कर रक्खी थी। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह को उनके जी का पता कुछ-कुछ लग चुका था मगर जब तक उसकी इज्जत-आबरू और जात-पात की खबर के साथ-साथ यह भी मालूम न हो जाय कि वह दोस्त है या दुश्मन, तब तक कुछ कहना-सुनना या समझाना मुनासिब नहीं समझते थे।
राजा वीरेन्द्रसिंह को अब यह चिन्ता हुई कि जिस तरह वह औरत इस घर में आ पहुँची, कहीं डाकू लोग भी आकर लड़कों को दुख न दें और फसाद न मचावें। उन्होंने पहरे वगैरह का अच्छी तरह इन्तजाम किया और यह सोच कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह अभी तन्दुरुस्त नहीं हुए हैं कमजोरी बनी हुई है और किसी तरहे लड़-भिड़ नहीं सकते, इनको अकेले छोड़ना मुनासिब नहीं, अपने सोने का इन्तजाम भी उसी कमरे में किया और साथ ही एक नया तथा विचित्र तमाशा देखा।
हम ऊपर लिख आये हैं कि इस कमरे के दोनों तरफ दो कोठरियाँ हैं, एक में सन्ध्यापूजन का सामान है और दूसरी वही विचित्र कोठरी है जिसमें से वह औरत पैदा हुई थी। सन्ध्या-पूजा वाली कोठरी में बाहर से ताला बन्द कर दिया गया और दूसरी कोठरी का कुलाबा वगैरह दुरुस्त करके बिना बाहर ताला लगाये उसी तरह छोड़ दिया गया जैसे पहले था, बल्कि राजा वीरेन्द्रसिंह ने उसी दरवाजे पर अपना पलंग बिछवाया और सारी रात जागते रह गए।
आधी रात बीत गई मगर कुछ देखने में न आया, तब वीरेन्द्रसिंह अपने बिस्तरे पर से उठे और कमरे में इधर-उधर घूमने लगे। घण्टे भर बाद उस कोठरी में से कुछ खटके की आवाज आई, वीरेन्द्रसिंह ने फौरन तलवार उठा ली और तारासिंह को उठाने के लिए चले मगर खटके की आवाज पा तारासिंह पहले ही से सचेत हो गये थे, अब हाथ में खंजर ले वीरेन्द्रसिंह के साथ टहलने लगे।
आधी घड़ी के बाद जंजीर खटकने की आवाज इस जगह पर हुई, जिससे साफ मालूम हो गया कि किसी ने इस कोठरी का दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया। थोड़ी ही देर बाद पैरों के धमाधम की आवाज भीतर से आने लगी, मानो चार-पाँच आदमी भीतर उछल-कूद रहे हैं। वीरेन्द्रसिंह कोठरी के दरवाजे के पास गये और हाथ का एक धक्का देकर किवाड़ खोलना चाहा मगर भीतर से बन्द रहने के कारण दरवाजा न खुला, लाचार उसी जगह खड़े हो भीतर की आहट पर गौर करने लगे।
अब पैरों की धमाधम की आवाज बढ़ने लगी और धीरे-धीरे इतनी ज्यादा हुई कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी उठे और कोठरी के पास जा कर खड़े हो गये। फिर दरवाजा खोलने की कोशिश की गई मगर न खुला। भीतर जल्द-जल्द पैर उठाने और पटकने की आवाज से सब को निश्चय हो गया कि अन्दर लड़ाई हो रही है। थोड़ी ही देर बाद तलवारों की झनझनाहट भी सुनाई देने लगी। अब भीतर लड़ाई होने में किसी तरह का शक न रहा। आनन्दसिंह ने चाहा कि दरवाजे का कुलाबा तोड़ा जाय, मगर वीरेन्द्रसिंह की मरजी न पा कर सब चुपचाप खड़े आहट सुनते रहे।
यकायक धमधमाहट की आवाज बढ़ी और तब सन्नाटा हो गया। घड़ी भरतक ये लोग बाहर खड़े रहे मगर कुछ मालूम न हुआ और न फिर किसी तरह की आहट या आवाज ही सुनाई दी। रात सिर्फ दो घंटे बल्कि इससे भी कम बाकी रह गई थी। पहरे वाले टहल कर अच्छी तरह से पहरा दे रहे हैं या नहीं यह देखने के लिए तारासिंह बाहर गए और सभी को अपने काम पर मुस्तैद पाकर लौट आए। इतने ही में कमरे का दरवाजा खुला, और भैरोंसिंह को साथ लिए देवीसिंह आते दिखाई पड़े।
दोनों ऐयार सलाम करने के बाद वीरेन्द्रसिंह के पास बैठ गये मगर यह देखकर कि यहाँ अभी तक ये लोग जाग रहे हैं ताज्जुब करने लगे।
देवीसिंह––आप लोग इस समय तक जाग रहे हैं!
वीरेन्द्रसिंह––हाँ, यहाँ कुछ ऐसा ही मामला हुआ जिससे निश्चिन्त हो सो न सके।
देवीसिंह––सो क्या?
वीरेन्द्रसिंह––खैर तुम्हें भी वह मालूम हो जायेगा, पहले अपना हाल तो कहो। (भैरोसिंह की तरफ देख कर) तुमने उस औरत को पहचाना?
भैरोंसिंह––जी हाँ, बेशक वही औरत है, जो यहाँ आई थी, बल्कि वहाँ एक औरत और दिखाई दी।
वीरेन्द्रसिंह––यहाँ से जाकर तुमने क्या किया और क्या-क्या देखा, सो खुलासा कह जाओ।
भैरोंसिंह ने जो कुछ देखा था, कहने के बाद यहाँ का हाल पूछा। वीरेन्द्रसिंह ने भी यहाँ की कुल कैफियत कह सुनाई और बोले, "हम यही राह देख रहे थे कि सवेरा हो जाये और तुम लोग भी आ जाओ, तो इस कोठरी को खोलें, और देखें कि क्या है, कहीं से किसी के आने-जाने का पता लगता है या नहीं।"
कोठरी खोली गई। एक हाथ में रोशनी, दूसरे में नंगी तलवार लेकर पहले देवीसिंह कोठरी के अन्दर घुसे और तुरन्त ही बोल उठे––"वाह-वाह, यहाँ तो खूनखराबा मच चुका है!" अब राजा वीरेन्द्रसिंह, दोनों कुमार और उनके दोनों ऐयार भी कोठरी के अन्दर गये, और ताज्जुब भरी निगाहों से चारों तरफ देखने लगे।
इस कोठरी में जो फर्श बिछा हुआ था वह इस तरह से सिमट गया था जैसे कई आदमियों के वेअख्तियार उछल-कूद करने या लड़ने से इकट्ठा हो गया हो, ऊपर से वह खून से तर भी हो रहा था। चारों तरफ दीवारों पर भी खून के छींटे और लड़ते समय हाथ बहक कर बैठ जाने वाली तलवारों के निशान दिखाई दे रहे थे। बीच में एक लाश पड़ी हुई थी, मगर बेसिर की, कुछ समझ में नहीं आता था कि यह लाश किसकी है। कपड़ों में सिर्फ एक लँगोटा उसकी कमर में था। तमाम बदन नंगा, जिसमें अन्दाज से ज्यादा तेल लगा हुआ था। दाहिने हाथ में तलवार थी मगर वह हाथ भी कटा हुआ, सिर्फ जरा-सा चमड़ा लगा हुआ था, वह भी इतना कम कि अगर कोई खींचे तो अलग हो जाये। सबसे ज्यादा परेशान और बेचैन करने वाली एक चीज और दिखाई दी।
दाहिने हाथ की कटी हुई एक कलाई जिसमें फौलादी कटार अभी तक मौजूद थी, दिखाई पड़ी। आनन्दसिंह ने फौरन उस हाथ को उठा लिया और सभी लोगों की निगाह भी गौर के साथ उस पर पड़ने लगी। यह कलाई किसी नाजुक हसीन औरकमसिन औरत की थी। हाथ में हीरे का जड़ाऊ कड़ा और जमीन पर मानिक की दो तीन बारीक जड़ाऊ चूड़ियाँ भी मौजूद थीं, शायद कलाई कट कर गिरते समय ये चूड़ियाँ हाथ से अलग हो जमीन पर फैल गई हों।
इस कलाई के देखने से सभी को रंज हुआ और झट उस औरत की तरफ खयाल दौड़ गया, जिसे इस कोठरी में से निककते सभी ने देखा था। चाहे उस औरत के सबब से ये कैसे ही हैरान क्यों न हों मगर उसकी सूरत ने सभी को अपने ऊपर मेहरबान बना लिया था, खास करके कुँअर आनन्दसिंह के दिल में तो वह उनके जान और माल की मालिक ही होकर बैठ गई थी, इसलिए सबसे ज्यादा दुःख छोटे कुँअर साहब को हुआ। यह सोचकर कि बेशक यह उसी औरत की कलाई है कुँअर आनन्दसिंह की आँखों में जल भर आया और कलेजे में एक किस्म का दर्द पैदा हुआ, मगर इस समय कुछ कहने या अपने दिल का हाल जाहिर करने का मौका न समझ उन्होंने बड़ी कोशिश से अपने को सम्हाला और चुपचाप सभी का मुँह देखने लगे।
पाठक, अभी इस औरत के बारे में बहुत-कुछ लिखना है इसलिए जब तक यह मालूम न हो जाये कि यह औरत कौन है तब तक अपने और आपके सुभीते के लिए हम इसका नाम 'किन्नरी' रख देते हैं।
राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयारों ने इन सब अद्भुत बातों को जो इधर कई दिनों में हो चुकी थीं, छिपाने की बहुत कोशिश की, मगर हो न सका। कई तरह पर रंग बदल कर यह बात तमाम शहर में फैल गई। कोई कहता था, 'महाराज के मकान में देव और परियों ने डेरा डाला है!' कोई कहता था, 'गयाजी के भूत-प्रेम इन्हें सता रहे हैं!' कोई कहता था, 'दीवान अग्निदत्त के तरफदार बदमाश और डाकुओं ने यह फसाद मचाया है!' इत्यादि बहुत तरह की बातें शहर वाले आपस में कहने लगे, मगर उस समय उन बातों का ढंग ही बिल्कुल बदल गया, जब राजा वीरेन्द्रसिंह के हुक्म देवीसिंह ने उस सिरकटी लाश को जो कोठरी में से निकली थी, उठवाकर सदर चौक में रखवा दिया और उसके पास एक मुनादी वाले को यह कहकर पुकारने के लिए बैठा दिया कि––"अग्निदत्त के तरफदार डाकू लोग जो शहर के रईसों और अमीरों को सताया करते थे, ऐयारों के हाथ गिरफ्तार होकर मारे जाने लगे। आज एक डाकू मारा गया है जिसकी लाश यह है।"
१४
सूर्य भगवान के अस्त होने में अभी घंटे भर की देर है, फिर भी मौसम के मुताबिक बाग में टहलने वाले हमारे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को ठंडी हवा सिहरावनदार मालूम हो रही है। रंग-बिरंग के खूबसूरत फूल खिले हुए हैं, जिनके देखने से हरएक की तबीयत उमंग पर आ सकती है मगर इन दोनों के दिल की कली किसी तरह भी खिलने में नहीं आतीं। बाग में जितनी चीजें दिल खुश करने वाली हैं वे सभी इस समय इन दोनों को बुरी मालूम होती हैं। बहुत देर से ये दोनों भाई बाग में टहल रहे हैं मगर ऐसी नौबत न आई कि एक दूसरे से बात करें या हँसें क्योंकि दोनों के दिल चुटीले हो रहे हैं, दोनों ही अपनी-अपनी धुन में डूबे हुए हैं, दोनों ही को अपने-अपने माशूक की खोज है, दोनों ही सोच रहे हैं, कि 'हाय, क्या ही आनन्द होता अगर इस समय वह भी मौजूद होता जिसे जी प्यार करता है या जिसके बिना दुनिया की सम्पत्ति तुच्छ मालूम होती है!' दिल बहलाने का बहुत-कुछ उद्योग किया, मगर न हो सका, लाचार दोनों भाई उस बारहदरी में पहुँचे जो बाग के दक्खिन तरफ महल के साथ सटी हुई है और जहाँ इस समय राजा वीरेन्द्रसिंह अपने मुसाहिबों के साथ जी बहलाने की बातें कर रहे थे। देवीसिंह भी उनके पास बैठे हुए थे जो कभी-कभी लड़कपन की बातें याद दिलाने के साथ ही गुप्त दिल्लगी भी करते जाते थे और जवाब भी पाते थे। दोनों लड़के भी वहाँ जा पहुँचे मगर इनके बैठते ही मजलिस का रंग बदल गया और बातों ने पलटा खाकर दूसरा ही ढंग पकड़ लिया जैसा अक्सर हँसी-दिल्लगी करते बड़ों के बीच में समझदार लड़कों के पास आ बैठने से हो जाता है।
वीरेन्द्रसिंह––अब तो चुनार जाने का जी चाहता है मगर···
देवीसिंह––यहाँ आपकी जरूरत भी अब क्या है?
वीरेन्द्रसिंह––ठीक है, यहाँ मेरी जरूरत नहीं है, लेकिन यहाँ की अद्भुत बातें देख कर यह विचार होता है कि मेरे चले जाने से कोई बखेड़ा न मचे और लड़कों को तकलीफ न हो।
इन्द्रजीतसिंह––(हाथ जोड़ कर) इसकी चिन्ता आप न करें। हम लोग जब इतनी छोटी-छोटी बातों से अपने को सम्हाल न सकेंगे तो आगे क्या करेंगे!
वीरेन्द्र––तो क्या तुम्हारा इरादा भी यहाँ रहने का है?
इन्द्रजीतसिंह––यदि आज्ञा हो!
वीरेन्द्रसिंह––(कुछ सोच कर) क्यों देवीसिंह?
देवीसिंह––क्या हर्ज है, रहने दीजिए।
वीरेन्द्रसिंह––और तुम?
देवीसिंह––मैं आपके साथ चलूँगा, यहाँ भैरों और तारा रहेंगे, वे दोनों होशियार हैं, कुछ हर्ज नहीं है!
भैरोंसिंह––(हाथ जोड़ कर) यहाँ की अद्भुत बातें हम लोगों का कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं!
तारासिंह––(हाथ जोड़ कर) सरकार की मर्जी नहीं पाई, नहीं तो ऐसी-ऐसी लीलाओं की तो मैं एक ही दिन में काया पलट कर देने की हिम्मत रखता हूँ।
भैरोंसिंह––अगर मरजी हो तो इन अद्भुत बातों का आज ही निपटारा कर दिया जाये।
वीरेन्द्रसिंह––(मुस्कुरा कर) नहीं, ऐसी कोई जरूरत नहीं, हमें तुम लोगों के हौसले पर पूरा भरोसा है। (देवीसिंह की तरफ देखकर) खैर, तो आज दिन भी अच्छा है।
देवीसिंह––बहुत खूब! (एक मुसाहिब की तरफ देखकर) आप जरा तकलीफ करें।
मुसाहिब––बहुत अच्छा, मैं जाता हूँ।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह यही चाहते थे कि किसी तरह वीरेन्द्रसिंह चुनार जायें क्योंकि उनके रहते ये दोनों अपने मतलब की कार्रवाई नहीं कर सकते थे। इस बात को वीरेन्द्रसिंह भी समझते थे मगर इसके सिवाय भी न मालूम क्या सोच कर वे इस समय चुनार जा रहे हैं या गयाजी की सरहद छोड़कर क्या मतलब निकाला चाहते हैं!
राजा वीरेन्द्रसिंह का विचार कोई जान नहीं सकता था। वे किसी से यह नहीं कह सकते ये कि हम दो घण्टे के बाद क्या करेंगे। कोई यह नहीं कह सकता था कि महाराज आज तो यहाँ हैं मगर कल कहाँ रहेंगे, या महाराज फलां काम को क्यों और किस इरादे से कर रहे हैं। पहले दिल-ही-दिल में अपना इरादा मजबूत कर लेते थे, जिसे कोई बदल नहीं सकता था, मगर अपने बाप की बहुत इज्जत करते थे और उनके मुकाबले में अपने दृढ़ विचार को भी हुक्म के मुताबिक बदल देने में बुरा नहीं समझते थे, बल्कि उसे कर्तव्य और धर्म मानते थे।
दो घड़ी रात जाते-जाते वीरेन्द्रसिंह ने चुनार की तरफ कूच कर दिया और देवीसिंह को साथ लेते गए। अब कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह खुदमुख्तार हो गये, मगर साथ ही इसके राजा हो गए तो क्या, अपनी खुदमुख्तारी के सामने आनन्दसिंह अपने बड़े भाई के हुक्म की नाकदरी नहीं कर सकते थे। और यहाँ दोनों ही के इरादे दूसरे हैं, जिसमें एक-दूसरे का बाधक नहीं हो सकता था।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह बीमार थे, इसलिए दोनों भाई एक ही कमरे में रहा करते थे, मगर अब दोनों ने अपने-अपने लिए अलग-अलग दो कमरे मुकर्रर किए। जिस कमरे में विचित्र कोठरी थी, और जिसका हाल ऊपर लिखा गया है, उसे आनन्दसिंह ने अपने लिए रखा। उससे कुछ दूर पर इन्द्रजीतसिंह का दूसरा कमरा था।
१५
रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। गयाजी में हर मुहल्ले के चौकीदार 'जागते रहियो, होशियार रहियो' कह-कह कर इधर से उधर घूम रहे हैं। रात अँधेरी है, चारों तरफ अँधेरा छाया हुआ है। यहाँ का मुख्य स्थान विष्णु-पादुका है, उसके चारों तरफ की आबादी बहुत घनी है, मगर इस समय हम गुंजान आबादी में न जाकर उस मुख्तसिर आबादी की तरफ चलते हैं, जो शहर के उत्तर रामशिला पहाड़ी के नीचे आबाद है और जहाँ के कुल मकान कच्चे और खपड़े की छावनी के हैं। इसी आबादी में से दो आदमी स्याह कम्बल ओढ़े बाहर निकले और फलगू नदी की तरफ रवाना हुए।
रामशिला पहाड़ी से पूरब फलगू नदी के बीचोंबीच में एक बड़ा भयानक ऊँचा टीला है। उस टीले पर किसी महात्मा की समाधि है और उसी जगह पत्थर की मजबूत बनी हुई कुटी में एक साधु भी रहते हैं। उस समाधि और कुटी के चारों तरफ बेर, मकोइचे, धौ इत्यादि जंगली पेड़ों से बड़ा ही गुंजान हो रहा है, और वहाँ जमीन पर पड़ी हुई हड्डियों की यह कैफियत है कि बिना उन पर पैर रखे कोई आदमी समाधि या उस कुटी तक जा ही नहीं सकता। छोटी-बड़ी, साबुत और टूटी सैकड़ों तरह की खोपड़ियाँ इधर से उधर लुढ़क रही हैं। न मालूम कब और क्यों कर इतनी हड्डियाँ चारों तरफ जमा हो गईं। उस आबादी से निकले हुए दोनों आदमी इसी टीले की तरफ जा रहे हैं।
कोई साधारण आदमी ऐसी अँधेरी रात में उस टीले की तरफ जाने का साहस कभी नहीं कर सकता, मगर ये दोनों बिना किसी तरह की रोशनी साथ लिए अँधेरे में ही हड्डियों पर पैर रखते और कँटीली झाड़ियों में घुसते चले जा रहे हैं। आखिर ये दोनों कुटी के पास जा पहुँचे, और दरवाजे पर खड़े होकर एक ने ताली बजाई।
भीतर से-कौन है?
एक-किवाड़ खोलो।
भीतर से-क्यों किवाड़ खोलें?
एक-काम है।
भीतर से-तुम लोग हमें व्यर्थ तंग करते हो।
साधु ने उठकर किवाड़ खोला और वे दोनों अन्दर जाकर एक तरफ बैठ गये। भीतर धनी के जलने से कुटी अच्छी तरह गर्म हो रही थी, इसलिए उन दोनों ने कम्बल उतारकर रख दिया। अब मालूम हुआ कि ये दोनों औरतें हैं और साथ ही इसके यह भी देखने में आया कि एक औरत की दाहिनी कलाई कटी हैं, जिस पर वह कपड़ा लपेटे हुए है। एक औरत तो चुपचाप बैठी रही मगर वह दूसरी औरत, जिसकी कलाई कटी हई थी, बाबाजी से यों बातचीत करने लगी
औरत-कहिये, आपने कुछ सोचा?
बाबाजी—जो काम मेरे किए हो ही नहीं सकता, उसके लिए मैं क्या सोचूं?
औरत–बेशक आपके किए वह काम हो सकता है क्योंकि वह आपको गुरु के समान मानती है।
साधु-गुरु के समान मानती है तो क्या मेरे कहने से वह अपनी जान दे देगी? तुम लोग भी क्या अंधेर करती हो!
औरत-इसमें जान देने की क्या जरूरत है?
साधु-तो तुम क्या चाहती हो?
औरत-बस, इतना ही कि वह उस मकान को छोड़ दे।
साधु-उस बेचारी ने किसी को कुछ दुःख तो दिया नहीं, फिर उसके पीछे क्यों पड़ी हो?
औरत-क्या उसने मुझे और मेरे आदमियों को धोखा नहीं दिया?
साधु-तुम अपना राज्य दूसरे को देकर आप भाग गई, अब तो वही मालिक है, इसलिए वे लोग उसी के नौकर गिने जायेंगे।
औरत-मैं अपना राज्य फिर अपने कब्जे करना चाहती हूँ।
साधु-जो तुमसे हो सके करो, पर मैं किसी तरह की मदद नहीं दे सकता। तुम लड़कपन से मुझे जानती हो, तुम्हारे पिता तुमको गोद में लेकर यहाँ आया करते थे, मैं कभी किसी के भले-बुरे का साथी नहीं हुआ।
औरत—जो भी हो, आपको वह काम करना ही पड़ेगा जो मैं कहती हूँ और याद रखिये कि अगर आप इन्कार करेंगे, तो इसका नतीजा अच्छा न होगा। मैं साधु और महात्मा समझ कर छोड़ न दंगी।
साधु-(कुछ देर सोचने के बाद) अच्छा, आज भर तुम मुझे और मोहलत दो, कल इसी समय यहाँ आना।
औरत-खैर, एक दिन और सही।
ये दोनों औरतें वहाँ से उठकर रवाना हुई। न मालूम कब से एक आदमी कुटी के पीछे छिपा हुआ था, जो इस समय नजर बचाकर उन दोनों के पीछे-पीछे तब तक चलता ही गया, जब तक वे दोनों आबादी में पहुँचकर अपने मकान के अन्दर न घुस गईं। जब उन दोनों औरतों ने मकान के अन्दर जाकर दरवाजा बन्द कर लिया, जिसे खुला छोड़ गई थीं, तब वह आदमी वहाँ से लौटा, और फिर उसी कुटी में पहुँचा, जिस का हाल ऊपर लिख चुके हैं। कुटी का दरवाजा खुला हुआ था, और साधु बेचारे उसी तरह बैठे कुछ सोच रहे थे। वह आदमी कुटी के अन्दर बेधड़क चला गया, और दंडवत करके एक तरफ बैठ गया।
साधु-कहिए देवीसिंहजी, आप आ गए?
देवीसिंह-(हाथ जोड़कर) जी महाराज, मैं तभी से यहाँ हूँ, जब वे दोनों यहाँ आई भी न थीं, अब उन दोनों को उनके घर पहुँचा कर लौटा आ रहा हूँ।
साधु-हाँ!
देवीसिंह-जी हाँ, आपने बड़ी कृपा की जो उनका हाल मुझे बता दिया, कई दिनों से हम हैरान हो रहे थे। क्या कहूँ, आपकी आज्ञा न हुई, नहीं तो मैं इसी जगह से इन दोनों को अपने कब्जे में कर लेता।
साधु-नहीं भैया, ऐसा करने से यह हमारे गुरु की कुटिया बदनाम होती, अब तुमने उसका घर देख ही लिया है, सब काम बना लोगे। वीरेन्द्रसिंह बड़े प्रतापी और धर्मात्मा राजा हैं, ऐसे को कभी कोई सता नहीं सकता। देखो, इस दुष्टा माधवी ने अपने चाल-चलन को कैसा खराब किया और प्रजा को कितना दुःख दिया है! आखिर उमी की सजा भोग रही है। अच्छा, अब ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। वीरेन्द्रसिंह से मेरा आशीर्वाद कहना। अहा, वह कैसा धर्मात्मा और नीति पर चलनेवाला भक्त् राजा है।
देवीसिंह–अच्छा, तो मुझे आज्ञा है न?
साधु-हाँ, जाओ, मगर देखो, मैं तुम्हें पहले भी कह चुका हूँ और अब भी कहता हूँ कि माधवी को जान से मत मारना, और बेचारी कामिनी पर दया रखना। मैं उसे अपनी पुत्री ही मानता हूँ। वीरेन्द्रसिंह से कह देना कि वे कामिनी को अपनी लड़की समझें और आनन्दसिंह के साथ उसका सम्बन्ध करने में कुछ सोच-विचार न करें, क्या हुआ, अगर उसका बाप आपके सामने खड़ा होने लायक नहीं है।
देवीसिंह-(हाथ जोड़कर) बहुत अच्छा, कह दूँगा। राजा वीरेन्द्रसिंह कदापि आपकी आज्ञा न टालेंगे; मगर फिर एक दफे मैं आपकी सेवा में आऊँगा।
साधु-नहीं, अब मुझसे मुलाकात न होगी। मैं आज ही इस कुटी को छोड़ दूँगा। हाँ, ईश्वर चाहेगा तो मैं एक दिन स्वयं तुम लोगों से मिलूँगा।
देवीसिंह-जैसी आज्ञा। साधु-हाँ बस, अब जाओ, यहाँ मत अटको।
पाठक सोचते होंगे कि देवीसिंह तो वीरेन्द्रसिंह के साथ चुनार चले गये थे, यहाँ कैसे आ पहुँचे! मगर नहीं, लोगों के जानने में वीरेन्द्रसिंह देवीसिंह को अपने साथ ले गये थे, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं हुआ था। राजा वीरेन्द्रसिंह की गुप्त नीति साधारण नहीं होती।
१६
राजा वीरेन्द्रसिंह के चुनार चले जाने के बाद दोनों भाइयों को अपनी-अपनी फिक्र पैदा हुई। कुँअर आनन्दसिंह किन्नरी की फिक्र में पड़े और कुंअर इन्द्रजीतसिंह को राजगृह की फिक्र पैदा हुई। राजगृह को फतह कर लेना उनके लिए एक अदना काम था, मगर इस विचार से कि किशोरी वहाँ फँसी हुई है, हमें सताने के लिए अग्निदत्त उसे तकलीफ न दे, धावा करने का जल्दी साहस नहीं कर सकते थे। जिस समय वह आजाद हए, अर्थात् वीरेन्द्रसिंह के मौजूद रहने का खयाल जाता रहा, उसी समय से किशोरी की मुहब्बत ने जोर बाँधा और तरद्दुद के साथ मिली हुई बेचैनी बढ़ने लगी। आखिर अपने मित्र भैरोंसिंह से बोले, "अब मैं बिना राजगृह गए नहीं रह सकता। जिस जगह हमारे देखते-देखते बेचारी किशोरी हम लोगों से छीन ली गई, उस जगह अर्थात् उस अमलदारी को बिना तहस-नहस किये और किशोरी को पाये मेरा जी ठिकाने न होगा और न मुझे दुनिया की कोई चीज भली मालूम होगी।
भैरोंसिंह-आपका कहना ठीक है, मगर आप अकेले वहाँ क्या करेंगे?
इन्द्रजीतसिंह-दुष्ट अग्निदत्त के लिए मैं अकेला ही बहुत हूँ।
भैरोंसिंह-दुष्ट अग्निदत्त के लिए तो आप अकेले बहुत हैं, मगर शहर भर के लिए नहीं।
इन्द्रजीतसिंह-शहर भर से मुझे कोई मतलब नहीं।
भैरोंसिंह-आखिर शहर वाले उसकी तरफदारी करेंगे या नहीं?
इन्द्रजीतसिंह-इसका अन्दाजा तो गयाजी पर कब्जा करने से ही तुम्हें मालूम हो गया होगा।
भैरोंसिंह-ठीक है, मगर अपनी तरफ से मजबूती रखना मुनासिब है।
इन्द्रजीतसिंह-अच्छा, तो मैं आनन्द को समझा दूँगा कि फलाँ दिन एक सरदार को थोड़ी फौज देकर हमारी मदद के लिए भेज देना।
भैरोंसिंह-यह हो सकता है, मगर उत्तम तो यही था कि दो-चार दिन और ठहर जाते, तब तक मैं राजगृह से घूम आता।
इन्द्रजीतसिह-नहीं, अब इस किस्म की नसीहत सुनने लायक मैं नहीं रहा।
भैरोंसिंह-(कुछ देर सोचकर) खैर, जैसी आपकी मर्जी।
शाम के वक्त दोनों भाई घोड़ों पर सवार हो अपने दोनों ऐयारों और बहुत से मुसाहिबों और सरदारों को साथ ले घूमने और हवा खाने के लिए महल के बाहर निकले कायदे के मुताबिक सरदार और मुसाहिब लोग अपने-अपने घोड़ों पर उन दोनों भाइयों के घोड़ों से लगभग पच्चीस कदम पीछे जाते थे। जब इन्द्रजीतसिंह या आनन्दसिंह घूमकर उनकी तरफ देखते, तब ये लोग झट आगे बढ़ जाते और बात सुनकर फिर पीछे हट जाते। हाँ दोनों ऐयार घोड़ों की रकाब थामे पैदल साथ जा रहे थे। जब ये दोनों भाई घूमने के लिए बाहर निकलते, तब शहर के मर्द-औरत बल्कि छोटे-छोटे बच्चे भी इनको देखकर खुश होते थे। जिसके मुँह से सुनिये, यही आवाज निकलती थी, "ईश्वर ने हम लोगों की सुन ली, जो ऐसे राजकुमारों के चरण यहाँ आये, और उस खुदगर्ज नमकहराम बेईमान का साया हमारे सिर से हटा।"
जब घूमते हुए ये दोनों भाई शहर से बाहर हुए, इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, "मैं किसी काम के लिए भैरोंसिंह को साथ लेकर राजगृह जाता हूँ। आज से ठीक आठवें दिन, अर्थात् रविवार को, किसी सरदार के साथ थोड़ी-सी फौज हमारी मदद को भेज देना।"
आनन्दसिंह-(थोड़ी देर चुप रहने के बाद) जो हुक्म; मगर...
इन्द्रजीतसिंह-तुम किसी तरह की चिन्ता मत करो। मैं अपने को हर तरत से सँभाले रहूँगा।
आनन्दसिंह-ठीक है, लेकिन...
इन्द्रजीतसिंह-गयाजी पहुँचने से ही तुम्हें मालूम हो गया होगा कि माधवी की रिआया हमारे खिलाफ न होगी।
आनन्दसिंह-ईश्वर करे ऐसा ही हो, परन्तु...
इन्द्रजीतसिंह-जब तक तुम्हारी फौज वहाँ न पहुँच जायगी, हम लोगों को जो कुछ करना होगा, छिप कर करेंगे।
आनन्दसिंह—ऐसा करने पर भी...
इन्द्रजीतसिंह-खैर, जो कुछ तुम्हें कहना हो, साफ-साफ कहो!
आनन्दसिंह-आपका अकेले जाना मुनासिब नहीं, दुश्मन के घर में जाकर अपने को सँभाले रहना भी कठिन है, राजा की मौजूदगी में रिआया को हर तरह उसका डर बना ही रहता है, आप दुश्मन के घर किसी तरह निश्चिन्त नहीं रह सकते और आपके इस तरह चले जाने बाद मेरा जी यहाँ कभी नहीं लग सकता।
राजगृह जाने पर कुँअर इन्द्रजीतसिंह कैसे ही मुस्तैद क्यों न हों, लेकिन छोटे भाई की आखिरी बात ने उन्हें हर तरह से मजबूर कर दिया। कुँअर इन्द्रजीतसिंह बड़े ही समझदार और बुद्धिमान थे, मगर मुहब्बत का भूत जब किसी के सिर पर सवार होता है तो वह पहले उसकी बुद्धि की ही मिट्टी पलीत करता है।
छोटे भाई की बात सुन इन्द्रजीतसिंह ने भैरोंसिंह की तरफ देखा।
भैरोंसिंह-मैं भी यही चाहता था कि आप दो-चार रोज यहीं और सब्र करें, और तब तक मुझे राजगृह से घूम आने दें।
आनन्दसिंह–(भैरोंसिंह की तरफ देखकर) वादा करके जाओ कि तुम कब लौटोगे?
भैरोंसिंह-चार दिन के अन्दर ही मैं यहाँ पहुँच जाऊँगा।
आनन्दसिंह–(भैरोंसिंह की तरफ देखकर इन्द्रजीतसिंह से) यदि आज्ञा हो जाय तो ये इधर ही से चले जायें, घर जाने की जरूरत ही क्या?
भैरोंसिंह-मैं तैयार हूँ।
इन्द्रजीतसिंह-घर जाकर अपना सामान तो इन्हें दुरुस्त करना ही होगा, हाँ मुझसे चाहे इसी समय बिदा हो जायँ।
१७
भैरोंसिंह को राजगृह गये आज तीसरा दिन है। वहाँ का हाल-चाल अभी तक कुछ मालूम नहीं हुआ, इसी सोच में आधी रात के समय अपने कमरे में पलंग पर लेटे हुए कुँअर इन्द्रजीतसिंह को नींद नहीं आ रही है। किशोरी की खयाली तस्वीर उनकी आँखों के सामने आ-आ कर गायब हो जाती है। इससे उन्हें और भी दुःख होता है, घबरा कर लम्बी साँस ले उठ बैठते हैं। कभी-कभी जब बेचैनी बहुत बढ़ जाती है तो पलंग को छोड़ कमरे में टहलने लगते हैं।
इसी हालत में इन्द्रजीत सिंह कमरे के अन्दर टहल रहे थे, इतने में पहरे के एक सिपाही ने अन्दर की तरफ झाँक कर देखा और इनको टहलते देख हट गया, थोडी देर बाद वह दरवाजे के पास इस उम्मीद में आकर खड़ा हो गया कि कुमार उसकी तरफ, देखकर पूछे तो वह कुछ कहे, मगर कुमार तो अपने ध्यान में डूबे हुए हैं, उन्हें खबर ही क्या है कि कोई उनकी तरफ झाँक रहा या इस उम्मीद में खड़ा है कि वे उसकी तरफ देखें और कुछ पूछे। आखिर उस सिपाही ने जान-बूझ कर किवाड़ का एक पल्ला इस ढंग से खोला कि कुछ आवाज हुई, साथ ही कुमार ने घूम कर उसकी तरफ देखा और इशारे से पूछा कि क्या है।
राजा सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का बराबर के लिए हुक्म था कि मौका न होने पर चाहे किसी की इत्तिला न की जाय मगर जब कोई ऐयार आवे और कहे कि मैं ऐयार हैं और इसी समय मिलना चाहता हूँ तो चाहे कैसा ही बेमौका क्यों न हो हम तक उसकी इत्तिला जरूर पहुँचनी चाहिए। अपने घर के ऐयारों के लिए तो कोई रोक-टोक थी नहीं, चाहे वह कुसमय में भी महल में घुस जायें या जहाँ चाहे वहाँ पहुँचें, महल में उनकी खातिर और उनका लिहाज ठीक उतना ही किया जाता था जितना पन्द्रह वर्ष के लडके का किया जाता और इसी का ठीक नमूना ऐयार लोग दिखलाते थे।
सिपाही ने हाथ जोड़ कर कहा, "एक ऐयार हाजिर हुआ है और इसी समय कुछ अज करना चाहता है!" कुमार ने कहा, "रोशनी को तेज कर दो और उसे अभी यहाँ लाओ।" थोड़ी देर के बाद स्याह मखमल की चुस्त पोशाक पहने, कमर से खंजर लटकाये, हाथ में कमन्द लिए एक खूबसूरत लड़का कमरे में आ मौजूद हुआ।
इन्द्रजीतसिंह ने गौर से उसकी ओर देखा, साथ ही उनके चेहरे को रगत बदल गई। जो अभी उदास मालूम होता था, खशी से दमकता हआ दिखाई देने लगा।
इन्द्रजीतसिंह-मैं तुम्हें पहचान गया।
लड़का-क्यों न पहचानेंगे जब कि आपके यहां एक-से-एक बढ़ कर ऐयार है और दिन-रात उनका संग है, मगर इस समय मैंने भी अपनी सूरत अच्छी तरह नहीं बदली है।
इन्द्रजीतसिंह–कमला, पहले यह कहो कि किशोरी कहाँ और किस हालत में हैं, और उन्हें अग्निदत्त के हाथ से छुट्टी मिली या नहीं?
कमला-अग्निदत्त को अब उनकी कोई खबर नहीं है।
इन्द्रजीतसिंह-इधर आओ और हमारे पास बैठो। खुलासा कहो कि क्या-क्या हुआ, मैं तो इस लायक नहीं कि अपना मुँह उन्हें दिखाऊँ, क्योंकि मेरे किए कुछ भी न हो सका।
कमला-(बैठ कर) आप ऐसा खयाल न करें, आपने बहुत-कुछ किया, अपनी जान देने को तैयार हो गए और महीनों दुःख भी झेला। आपके ऐयार लोग अभी तक राजगृह में इस मुस्तैदी से काम कर रहे हैं कि अगर उन्हें यह मालूम हो जाता कि किशोरी वहां नहीं हैं तो उस राज्य का नाम-निशान मिटा देते।
इन्द्रजीतसिंह-मैंने भी यही सोच के उस तरफ ज्यादा जोर नहीं दिया कि कहीं अग्निदत्त के हाथ पड़ी हुई बेचारी किशोरी पर कुछ आफत न आवे। हाँ तो अब किशोरी वहाँ नहीं हैं?
कमला-नहीं।
इन्द्रजीतसिंह–कहाँ हैं और किसके कब्जे में हैं?
कमला-इस समय वह खुदमुख्तार हैं, सिवाय लज्जा के उन्हें और किसी का डर नहीं।
इन्द्रजीतसिंह-जल्द बताओ, वह कहाँ हैं? मेरा जी घबरा रहा है। कमला-वह इसी शहर में हैं मगर अभी आपसे मिलना नहीं चाहतीं।
इन्द्रजीतसिंह-(आँखों में आँसू भर कर) बस तो मुझे मालूम हो गया कि उन्हें मेरी तरफ से रंज है, मेरे किए कुछ न हो सका, इसका उन्हें दुःख है।
कमला-नहीं-नहीं, ऐसा भूल के भी न सोचिए।
इन्द्रजीतसिंह-तो फिर मैं उनसे क्यों नहीं मिल सकता?
कमला—(कुछ सोच कर) मिल क्यों नहीं सकते, मगर इस समय-
इन्द्रजीतसिंह-क्या तुमको मुझ पर दया नहीं आती! अफसोस, तुम बिल्कुल नहीं जानतीं कि तुम्हारी बातें सुन कर इस समय मेरी दशा कैसी हो रही है। जब तुम खुद कह रही हो कि वह स्वतन्त्र हैं, किसी के दबाव में नहीं हैं और इसी शहर में हैं तो मुझसे न मिलने का कारण ही क्या है? बस, यही न कि मैं उसके लायक नहीं समझा जाता!
कमला-फिर भी आप उसी खयाल को मजबूत करते हैं! खैर, तो फिर चलिए मैं आपको ले चलती हूँ, जो होगा देखा जायगा, मगर अपने साथ किसी ऐयार को लेते चलिए। भैरोंसिंह तो यहाँ हैं नहीं, आपने उन्हें राजगृह भेज दिया है।
इन्द्रजीतसिंह-क्या हर्ज है तारासिंह को साथ लिये चलता हूँ, मगर भैरोंसिंह के जाने की खबर तुम्हें क्योंकर मिली?
कमला-मैं बखूबी जानती हूँ, बल्कि उनसे मिलकर मैंने कह भी दिया है कि किशोरी राजगृह में नहीं हैं, तुम बेखौफ अपना काम करना।
इन्द्रजीतसिंह-अगर तुमने उससे ऐसा कह दिया है तो राजगृह में वह बड़ा ही बखेड़ा मचावेगा!
कमला-मचाना ही चाहिए।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने उसी समय तारासिंह को बुलाया और उन्हें साथ ले कपड़े पहनकर कमला के साथ किशोरी से मिलने की खुशी में लम्बे-लम्बे कदम बढ़ाते रवाना हुए।
शहर-ही-शहर बहुत-सी गलियों में घुमाती हुई इन दोनों को साथ लिए कमला बहुत दर चली गई और विष्णुपादुका मन्दिर के पास ही एक मकान के मोड पर पहुँच कर खड़ी हो गई।
इन्द्रजीतसिंह-क्यों, क्या हुआ? रुक क्यों गईं?
कमला-बस, हम लोगों को इसी मकान में चलना है।
इन्द्रजीतसिंह-तो चलो।
कमला-इस मकान के दरवाजे के सामने ही एक भारी जमींदार की बैठक है। वहाँ दिन-रात पहरा लगता है। इधर से आप लोगों का जाना और यह जाहिर करना कि आज इस मकान में दो नये आदमी घुसे हैं, मुनासिब नहीं।
तारासिंह-तो फिर क्या करना चाहिए?
कमला—मैं दरवाजे की राह से जाती हूँ। आप लोग पीछे की तरफ जाइये और कमन्द लगा कर मकान के अन्दर पहुँचिये।
इन्द्रजीतसिंह-क्या हर्ज है, ऐसा ही होगा, तुम दरवाजे की राह से जाओ।
कमला-मगर एक बात और सुन लीजिये। जब मैं इस मकान में पहुँच कर छत पर से झाँक तभी आप कमन्द फेंकिये, क्योंकि बिना मेरी मदद के कमन्द अड़ न सकेगी।
१८
मकान के अन्दर कमला, इन्द्रजीतसिंह और तारासिंह के पहुंचने के पहले ही हम अपने पाठकों को इस मकान में ले चलकर यहाँ की कैफियत दिखाते हैं।
इस मकान के अन्दर छोटी-छोटी न मालम कितनी कोठरियाँ हैं पर हमें उनसे कोई मतलब नहीं, हम तो उस दालान के पास जा कर खड़े होते हैं जिसके दोनों तरफ दो कोठरियाँ और सामने लम्बा-चौडा सहन है। इस दालान में किसी तरह की सजावट नहीं, सिर्फ एक दरी बिछी हुई है और खूटियों पर कुछ कपड़े लटक रहे हैं। आधी रात का समय होने पर भी इस दालान में चिराग की रोशनी नहीं है। यह दालान ऊपर के दर्जे में है, इसके ऊपर कोई इमारत नहीं, सामने का सहन बिलकुल खुला हुआ है। चन्द्रमा की फैली हुई सुफेद चाँदनी सहन से घुसती हुई धीरे-धीरे दालान में आ रही है जिसकी रोशनी उस दालान की हर एक चीज को दिखलाने के लिए काफी है। एक तरफ की कोठरी तो बन्द है मगर दूसरी बगल वाली कोठरी का दरवाजा खुला हुआ है। यह कोठरी बहुत बड़ी नहीं है और इसके भीतर सफेद फर्श पर दो औरतें बैठी हई धीरे-धीरे कुछ बातें कर रही हैं।
हमारे पाठक इन दोनों औरतों को बखूबी पहचानते हैं इनमें से एक तो किशोरी और दूसरी वही किन्नरी है जिस पर कुँअर आनन्दसिंह रीझे हुए हैं, जो कई दफ़े आनन्दसिंह के कमरे में कोठरी के अन्दर से निकल अपनी चितवनों से उन्हें घायल कर चुकी है और साथ-साथ आप भी आशिक हो चुकी है।
किशोरी-बहिन, तुमने जो कुछ नेकी मेरे साथ की है उसे मैं किसी तरह भूल नहीं सकती। मुझसे यह कभी न होगा कि तुम्हें ऐसी हालत में छोड़ इन्द्रजीतसिंह वे पास चली जाऊँ।
किन्नरी–फिर क्या किया जाय, किस तरह उम्मीद हो कि मुझे कोई पूछेगा।
किशोरी–कमला ने मुझसे कसम खाकर कहा है कि आनन्दसिंह किन्नर की चाह में डूबे हैं। इसे भी जाने दो, आखिर तुम्हारा भी कुछ अहसान उनके ऊपर है नहीं? इतने बदमाशों को, जो यहाँ फसाद मचा रहे थे, सिवाय तुम्हारे और कौन मार सकता था!
किन्नरी–खैर, जो होगा देखा जायगा, अब तो यह सोचना चाहिए कि हम लोग कहाँ जायें और क्या करें?
किशोरी कमला यहाँ आ जाय तो उससे राय मिला कर जो मुनासिब मालूम हो किया जाय। ओफ, यहाँ बैठे-बैठे जी घबरा गया, चलो, बाहर चलें, चाँदनी खूब निकली हुई है।
दोनों औरतें उस कोठरी के बाहर निकलीं और सहन में आकर टहलने लगीं। मौसम के मुताबिक कुछ सर्दी पड़ रही थी इसलिए दोनों ज्यादा देर तक सहन में टहल न सकीं, दालान में आकर दरी पर बैठ गई और बातचीत करने लगीं।
इस मकान के बगल में एक छोटा-सा नजरबाग था, मगर उसकी हालत ऐसा खराब हो रही थी कि उसे नजरबाग की जगह खंडहर या जंगल ही कहना मुनासिब है। नजरबाग में जाने के लिए इस मकान से एक रास्ता था, बाकी चारों तरफ उसके ऊँची-ऊंची दीवारें थीं। इस मकान में बिना भीतर वाले की मदद के कोई कमन्द लगा कर चढ़ नहीं सकता था, क्योंकि इसकी ऊपर की दीवारें इस खूबी से बनी हुई थीं कि किसी तरह कमन्द अड़ नहीं सकती थी। हाँ, अगर कोई चाहे तो कमन्द के जरिए उस नजरबाग में जरूर जा सकता था, मगर इस मकान में आने के लिए वहाँ से भी वहा दिक्कत होती।
थोड़ी देर किन्नरी और किशोरी बातें करती रहीं, इसके बाद नीचे से किवाड़ खटखटाने की आवाज आई। किशोरी ने कहा, "लो बहिन, कमला भी आ पहुँची।"
किन्नरी-खटखटाने की आवाज से तो मालूम होता है कि कमला ही है, मगर तो भी खिड़की से झाँक के मामूली सवाल कर लेना मुनासिब है।
किशोरी—ऐसा जरूर करना चाहिए, क्योंकि हम लोगों को धोखा देने के लिए दुश्मन लोग पचासों रंग लाया करते हैं।
"तुम ठहरो, मैं कुछ पूछती हूँ।" इतना कह कर किशोरी ने दरवाजे की तरफ वाली खिड़की में से झाँक कर पूछा, "गिनती पूरी हुई?" इसके जवाब में किसी ने कहा, "हाँ, पचासी तक।"
किशोरी—अच्छा, मैं नीचे आकर दरवाजा खोलती हूँ।
दरवाजा खोलने के लिए खुशी-खुशी किशोरी नीचे उतरी, मगर चौखट के पास पहुँचने के पहले ही नीचे के अँधेरे दालान में एक मोटे और कद्दावर आदमी को खड़ा देख डर के मारे चिल्ला उठी तथा उसी समय वह एक चीख मारकर बिल्कुल ही बेहोश हो गई, जब वह शैतान इस बेचारी की तरफ झपटा और हाथ तथा कमर से पकड़कर बेदर्दी के साथ एक तरफ खींच ले चला।
किशोरी के चिल्लाने की आवाज सुनते ही हाथ में नंगी तकवार लिए किन्नरी धड़धड़ाती हुई नीचे पहुँची मगर चारों तरफ घूम-घूम कर देखने पर भी उसने किसी को न पाया, बल्कि किशोरी का भी पता न लगा।
किन्नरी दरवाजा खोलना तो भूल गई, और किशोरी को न पाने से घबरा कर इधर-उधर ढूँढ़ने लगी। उस भयानक अँधेरे में दालान और कोठरियों में घूमती हुई किन्नरी को इस बात का जरा भी खौफ न मालूम हुआ कि किशोरी की तरह कहीं मुझ पर आफत न आ जाय।
बेचारी किशोरी चीख मार कर बेहोश हो गई मगर जब वह होश में आई तो उसने अपने को मौत के पंजे में गिरफ्तार पाया। उसने देखा कि झाड़ियों के बीच में जबर्दस्ती वह जमीन पर गिराई हुई है, एक आदमी नकाब से अपनी सूरत छिपाये उसकी छाती पर सवार है और खंजर उसके कलेजे के पार करना ही चाहता है।