←

चन्द्रकान्ता सन्तति अध्याय 22 / 24

विषय-सूची

  1. 1 पहला भाग
  2. 2 दूसरा भाग
  3. 3 तीसरा भाग
  4. 4 चौथा भाग
  5. 5 पाँचवाँ भाग
  6. 6 छठा भाग
  7. 7 सातवाँ भाग
  8. 8 आठवाँ भाग
  9. 9 नौवाँ भाग
  10. 10 दसवाँ भाग
  11. 11 ग्यारहवाँ भाग
  12. 12 बारहवाँ भाग
  13. 13 तेरहवाँ भाग
  14. 14 चौदहवाँ भाग
  15. 15 पन्द्रहवाँ भाग
  16. 16 सोलहवाँ भाग
  17. 17 सत्रहवाँ भाग
  18. 18 अठारहवाँ भाग
  19. 19 उन्नीसवाँ भाग
  20. 20 बीसवाँ भाग
  21. 21 इक्कीसवाँ भाग
  22. 22 बाईसवाँ भाग
  23. 23 तेईसवाँ भाग
  24. 24 चौबीसवाँ भाग

चन्द्रकान्ता सन्तति

बाईसवाँ भाग

१

भूतनाथ की अवस्था ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। कुछ देर तक सन्नाटा रहा और इसके बाद इन्द्रदेव ने पुनः महाराज की तरफ देखकर कहा-

"महाराज, ध्यान देने और विचार करने पर सबको मालूम होगा कि आजकल आपका दरबार 'नाट्यशाला' (थियेटर का घर) हो रहा है। नाटक खेलकर जो-जो बातें दिखाई जा सकती हैं, और जिनके देखने से लोगों को नसीहत मिल सकती है तथा मालूम हो सकता है कि दुनिया में जिस दर्जे तक के नेक और बद, दुखिया और सुखिया, गम्भीर और छिछोरे इत्यादि पाये जाते हैं, वे सब इस समय (आजकल) आपके यहाँ प्रत्यक्ष हो रहे हैं। ग्रह-दशा के फेर में जिन्होंने दुःख भोगा वे भी मौजूद हैं और जिन्होंने अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मारी, वे भी दिखाई दे रहे हैं, जिन्होंने अपने किए का फल ईश्वरेच्छा से पा लिया है, वे भी आए हुए हैं, और जिन्हें अब सजा दी जायेगी, वे भी गिरफ्तार किए गए हैं। बुद्धिमानों का यह कथन है, कि 'जो बुरी राह चलेगा, उसे बुरा फल अवश्य मिलेगा' ठीक है, परन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अच्छी राह चलने वाले तथा नेक लोग भी दुःख के चंगुल में फंस जाते हैं, और दुर्जन तथा दुष्ट लोग आनन्द के साथ दिन काटते दिखाई देते हैं। इसे लोग ग्रह-दशा के कारण कहते हैं, मगर नहीं,इसके सिवाय कोई और बात भी जरूर है। परमात्मा की दी हुई बुद्धि और विचारशक्ति का अनादर करने वाले ही प्रायः संकट में पड़कर तरह-तरह के दुःख भोगते हैं। मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि इस समय अथवा आजकल आपके यहाँ सब तरह के जीव दिखाई देते हैं, दृष्टान्त देने के बदले केवल इशारा करने से काम निकलता है। हाँ, मैं यह कहना इन्हीं में ऐसे भी जीव आए हुए हैं, जो अपने किए का नहीं, बल्कि अपने सम्बन्धियों के किए हुए पापों का फल भोग रहे हैं, और इसी से नाते (रिश्ते) और सम्बन्ध का गूढ़ अर्थ भी निकलता है। बेचारी लक्ष्मीदेवी की तरफ देखिए, जिसने किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा, और फिर भी हद दर्जे की तकलीफ उठाकर भी ताज्जुब है कि जीती बच गई। ऐसा क्यों हुआ? इसके जवाब में मैं तो यही कहूँगा कि राजा गोपालसिंह की बदौलत जो बेईमान दारोगा के हाथ की कठपुतली हो रहे थे, और इस बात की कुछ तो भूल गया, भी खबर नहीं रखते थे कि उनके घर में क्या हो रहा है, या उनके कर्मचारियों ने उन्हें कैसे जाल में फंसा रखा है। जिस राजा को अपने घर की खबर न होगी, वह प्रजा का क्या उपकार कर सकता है, और ऐसा राजा अगर संकट में पड़ जाये तो आश्चर्य ही क्या है! केवल इतना ही नहीं, इनके दुःख भोगने का एक सबब और भी है। बड़ों ने कहा है कि 'स्त्री के आगे अपने भेद की बात प्रकट करना बुद्धिमानों का काम नहीं है' परन्तु राजा गोपालसिंह ने इस बात पर कुछ भी ध्यान न दिया, और दुष्टा मायारानी की मुहब्बत में फंसकर तथा अपने भेदों को बताकर बर्बाद हो गये। सज्जन और सरल स्वभाव होने से ही दुनिया का काम नहीं चलता, कुछ नीति का भी अवलम्बन करना ही पड़ता है। इसी तरह महाराज शिवदत्त को देखिए, जिसे खुशादमियों ने मिल-जुलकर बर्बाद कर दिया। जो लोग खुशामद में पड़कर अपने को सबसे बड़ा समझ बैठते हैं, और दुश्मन को कोई चीज नहीं समझते हैं, उनकी वैसी ही गति होती है, जैसी शिवदत्त की हुई। दुष्टों और दुर्जनों की बात जाने दीजिए, उनके बुरे कामों का तो फल मिलना ही चाहिए, मिला ही है और मिलेगा ही, उनका जिक्रतो मैं पीछे करूँगा, अभी तो मैं उन लोगों की तरफ इशारा करता हूँ जो वास्तव में बुरे नहीं थे, मगर नीति पर न चलने तथा बुरी सोहबत में पड़े रहने के कारण संकट में पड़ गए। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि भूतनाथ ऐसा नेक दयावान और चतुर ऐयार बहुत कम दिखाई देगा, मगर लालच और ऐयाशी के फेर में पड़कर यह ऐसा बर्बाद हुआ कि दुनिया भर में मुंह छिपाने और अपने को मुर्दा मशहूर करने पर भी इसे सुख की नींद नसीब न हुई। अगर यह मेहनत करके ईमानदारी के साथ दौलत पैदा करना चाहता तो आज इसकी दौलत का अन्दाज करना कठिन होता, और अगर ऐयाशी के फेर में न पड़ा होता तो आज नाती-पोतों से इसका घर दूसरों के लिए नजीर गिना जाता। इसने सोचा कि मैं मालदार हूँ, होशियार हूँ, चालाक हूँ, और ऐयार हूँ-कुलटा स्त्रियों और रण्डियों की सोहबत का मजा लेकर सफाई के साथ अलग हो जाऊँगा, मगर इसे अद मालूम हुआ होगा कि रण्डियाँ ऐयारों के भी कान काटती हैं। नागर वगैरह के बर्ताव को जब यह याद करता होगा, तब इसके कलेजे में चोट-सी लगती होगी। मैं इस समय इसकी शिकायत करने पर उतारू नहीं हुआ हूँ, बल्कि इसके दिल पर से पहाड़-सा बोझ हटाकर उसे हल्का करना चाहता हूँ, क्योंकि इसे मैं अपना दोस्त समझता था, और मैं समझता हूँ,हां, इधर कई वर्षों से इसका विश्वास अवश्य उठ गया था और मैं इसकी सोहबत पसन्द नहीं करता था, मगर इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, किसी का चाल-चलन जब खराब हो जाता है, तब बुद्धिमान लोग उसका विश्वास नहीं करते और शास्त्र की भी ऐसी ही आज्ञा है, अतएव मुझे भी वैसा ही करना पड़ा। यद्यपि मैंने इसे किसी तरह की तकलीफ नहीं पहुँचाई परन्तु इसकी दोस्ती को एकदम भूल गया। मुलाकात होने पर उसी तरह बर्ताव करता था जैसा लोग नये मुलाकाती के साथ किया करते हैं। हाँ, अब जबकि यह अपनी चाल-चलन को सुधारकर आदमी बना है, अपनी भूलों को सोच-समझकर पछता चुका है, एक अच्छे ढंग से नेकी के साथ नामवरी पैदा करता हुआ दुनिया में फिर दिखाई देने लगा है और महाराज भी इसकी योग्यता से प्रसन्न होकर इसके अपराधों को (दुनिया के लिए) क्षमा कर चुके हैं, तब मैंने भी इसके अपराधों को दिल-ही-दिल में क्षमा कर इसे अपना मित्र समझ लिया है और फिर उसी निगाह से देखने लगा हूँ, जिस निगाह से पहले देखता था। परन्तु इतना मैं जरूर कहूँगा कि भूतनाथ ही एक ऐसा आदमी है जो दुनिया में नेकचलनी और बदबलनी के नतीजे को दिखाने के लिए नमूना बन रहा है। आज यह अपने भेदों को प्रकट होते देख डरता है और चाहता है कि हमारे भेद छिपे के छिपे रह जायें, मगर यह इसकी भूल है, क्योंकि किसी के ऐब छिपे नहीं रहते। सब नहीं तो बहुत कुछ दोनों कुमारों को मालूम हो ही चुके हैं और महाराज भी जान गए हैं, ऐसी अवस्था में इसे अपना किस्सा पूरा-पूरा बयान करके दुनिया में एक नजीर छोड़ देनी चाहिए और साथ ही इसके (भूतनाथ की तरफ देखते हुए) अपने दिल के बोझ को भी हलका कर देना चाहिए। भूतनाथ, तुम्हारे दो-चार भेद ऐसे हैं जिन्हें सुनकर लोगों की आँखें खुल जायेंगी, और लोग समझेंगे, कि हाँ, आदमी ऐसे-ऐसे काम भी कर गुजरते हैं और उनका नतीजा ऐसा होता है, मगर यह तो कुछ तुम्हारे ही ऐसे बुद्धिमान और अनूठे ऐयार का काम है, कि इतना करने पर भी आज तुम भले-चंगे ही नहीं दिखाई देते हो, बल्कि नेकनामी के साथ महाराज के ऐयार कहलाने की इज्जत भी पा चुके हो। मैं फिर कहता हूँ कि किसी बुरी नीयत से इन बातों का जिक्र मैं नहीं करता, बल्कि तुम्हारे दिल का खुटका दूर करने के साथ-ही-साथ, जिसके नाम से तुम डरते हो, उन्हें तुम्हारा दोस्त बनाना चाहता हूं, अतः तुम्हें बे-खौफ अपना हाल बयान कर देना चाहिए।"

भूतनाथ–ठीक है, मगर क्या करूँ, मेरी जुबान नहीं खुलती, मैंने ऐसे-ऐसे बुरे काम किए हैं कि जिन्हें याद करके आज मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, और आत्महत्या करने की इच्छा होती है, मगर नहीं, मैं बदनामी के साथ दुनिया से उठ जाता पसन्द नहीं करता, अतएव जहाँ तक हो सकेगा, एक दफे नेकनामी अवश्य पैदा करूंगा।

इन्द्रजीतसिंह-नेकनामी पैदा करने का ध्यान जहाँ तक बना रहे अच्छा ही है,परन्तु मैं समझता हूं कि तुम नेकनामी उसी दिन पैदा कर चुके जिस दिन हमारे महाराज ने तुम्हें अपना ऐयार बनाया, इसलिए कि तुमने इधर बहुत ही अच्छे काम किये हैं,और वे सब ऐसे थे कि जिन्हें अच्छे-से-अच्छा ऐयार भी कदाचित् नहीं कर सकता था।चाहे तुमने पहले कैसी ही बुराई और कैसे ही खोटे काम क्यों न किये हों, मगर आज हम लोग तुम्हारे देनदार हो रहे हैं, तुम्हारे अहसान के बोझ से दबे हुए हैं, और समझते हैं कि तुम अपने दुष्कर्मों का प्रायश्वित्त कर चुके हो।

भूतनाथ-आप जो कुछ कहते हैं, वह आपका बड़प्पन है, परन्तु जो मैंने कुछ कुकर्म किए हैं, मैं समझता हूँ कि उनका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है, तथापि अब तो मैं महाराज की शरण में आ ही चुका हूँ, और महाराज ने भी मेरी बुराइयों पर ध्यान न देकर मुझे अपना दासानुदास स्वीकार कर लिया है, इससे मेरी आत्मा सन्तुष्ट है और मैं अपने को दुनिया में मुंह दिखाने योग्य समझने लगा हूँ। मैं यह भी समझता हूँ कि आप जो कुछ आज्ञा कर रहे हैं, यह वास्तव में महाराज की आज्ञा है, जिसे मैं कदापि उल्लंघन नहीं कर सकता, अतः मैं आज अपनी अद्भुत जीवनी सुनाने के लिए तैयार हूँ, परन्तु

इतना कहकर भूतनाथ ने एक लम्बी साँस ली, और महाराज सुरेन्द्रसिंह की तरफ देखा।

सुरेन्द्रसिंह-भूतनाथ, यद्यपि हम लोग तुम्हारा कुछ-कुछ हाल जान चुके हैं,मगर फिर भी तुम्हारा पूरा-पूरा हाल तुम्हारे ही मुंह से सुनने की इच्छा रखते हैं। तुम बयान करने में किसी तरह का संकोच न करो। इससे तुम्हारा दिल भी हल्का हो जायेगा, और दिन-रात जो तुम्हें खुटका बना रहता है, वह भी जाता रहेगा।

भूतनाथ-जो आज्ञा!

इतना कहकर भूतनाथ ने महाराज को सलाम किया और अपनी जीवनी इस तरह बयान करने लगा-

भूतनाथ को जीवनी

भूतनाथ-सबके पहले मैं वही बात कहूँगा, जिसे आप लोग अभी नहीं जानते,अर्थात् मैं नौगढ़ के रहने वाले और देवीसिंह के सगे चाचा जीवनसिंहजी का लड़का हूँ।मेरी सौतेली माँ मुझे देखना पसन्द नहीं। ती थी और मैं उसकी आँखों में काँटे की तरह गड़ा करता था। मेरे ही सबब से मेरी माँ की इज्जत और कदर थी और उस बाँझ को कोई पूछता भी न था, अतएव वह मुझे दुनिया से ही उठा देने की फिक्र में लगी और यह बात मेरे पिता को भी मालूम हो गई, इसलिए जबकि मैं आठ वर्ष का था तो मेरे पिता ने मुझे अपने मित्र देवदत्त ब्रह्मचारी के सुपुर्द कर दिया जो तेजसिंह गुरु थे और महात्माओं की तरह नौगढ़ की उसी तिलिस्मी खोह में रहा करते थे,जिसे राजा वीरेन्द्रसिंहजी ने फतेह किया। मैं नहीं जानता कि मेरे पिता ने मेरे विषय में उन्हें क्या समझाया और क्या कहा, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि ब्रह्मचारी मुझे अपने लड़के की तरह मानते, पढ़ाते-लिखाते और साथ-साथ ऐयारी भी सिखाते थे, परन्तु जड़ी-बूटियों के प्रभाव से उन्होंने मेरी सूरत में बहुत बड़ा फर्क डाल दिया था,जिसमें मुझे कोई पहचान न ले। मेरे पिता मुझे देखने के लिए बराबर उनके पास आया करते थे।

इतना कहकर भूतनाथ कुछ देर के लिए चुप रह गया और सबके मुंह की तरफ देखने लगा!

सुरेन्द्रसिंह--(ताज्जुब के साथ) ओफ-ओह! क्या तुम जीवनसिंह के वही लड़के हो, जिसके बारे में उन्होंने मशहूर कर दिया था कि उसे जंगल में से शेर उठा ले गया?

भूतनाथ--(हाथ जोड़कर) जी हाँ!

तेजसिंह--और आप वही हैं, जिसे गुरुजी 'फिरकी' कहकर पुकारा करते थे,क्योंकि आप एक जगह ज्यादा देर तक बैठते न थे।

भूतनाथ--जी हां।

देवीसिंह-यद्यपि मैं बहुत दिनों से आपको भाई की तरह मानने लग गया हूँ,परन्तु आज यह जानकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा कि आप वास्तव में मेरे भाई हैं, मगर यह तो बताइए कि ऐसी अवस्था में शेरसिंह आपके भाई क्योंकर हुए? वह कौन हैं?

भूतनाथ–वास्तव में शेरसिह मेरा सगा भाई नहीं है, बल्कि गुरुभाई और उन्हीं ब्रह्मचारीजी का लड़का है, मगर हाँ, लड़कपन ही से एकसाथ रहने के कारण हम दोनों में भाई-जैसी मुहब्बत हो गई थी।

तेजसिंह-आजकल शेरसिंह कहाँ हैं?

भूतनाथ-मुझे उनकी कुछ भी खबर नहीं है, मगर मेरा दिल गवाही देता है कि अब वे हम लोगों को दिखाई न देंगे।

वीरेन्द्रसिंह–सो क्यों?

भूतनाथ—इसीलिए कि वे भी अपने को छिपाये और हम लोगों से मिले-जुले रहते और साथ ही इसके ऐबों से खाली न थे।

सुरेन्द्रसिंह-खैर, कोई चिन्ता नहीं, अच्छा तब?

भूतनाथ -अतः मैं उन्हीं ब्रह्मचारीजी के पास रहने लगा। कई वर्ष बीत गए।पिताजी मुझसे मिलने के लिए कभी-कभी आया करते थे, और जब मैं बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे अपने से जुदा करने का सबब भी बयान किया और वे यह जानकर बहुत प्रसन्न हुए कि मैं ऐयारी के फन में बहुत तेज औरहोशियार हो गया हूँ। उस समय उन्होंने ब्रह्मचारी जी से कहा कि इसे किसी रियासत में नौकर रख देना चाहिए तब इसकी ऐयारी खुलेगी।मुख्तसिर यह कि ब्रह्मचारीजी की ही बदौलत मैं गदाधरसिंह के नाम से रणधीरसिंहजी के यहाँ और शेरसिंह महाराज दिग्विजयसिंह के यहां नौकर हो गये और यह जाहिर किया गया कि शेरसिंह और गदाधरसिंह दोनों भाई हैं, और दोनों आपस में प्रेम भी ऐसा ही रखते थे।

उन दिनों रणधीरसिंहजी की जमींदारी में तरह-तरह के उत्पात मचे हुए थे और बहुत से आदमी उनके जानी दुश्मन हो रहे थे। उनके आपस वालों को तो इस बात का विश्वास हो गया था कि अब रणधीरसिंहजी की जान किसी तरह नहीं बच सकती, क्योंकि उन्हीं दिनों उनका ऐयार श्रीसिंह दुश्मनों के हाथों से मारा जा चुका था, और खूनी का कुछ पता नहीं लगता था। कोई दूसरा ऐयार भी उनके पास नहीं था, इसलिए वे बड़े ही तरदुद में पड़े हुए थे। यद्यपि उन दिनों उनके यहां नौकरी करना अपनी जान खतरे में डालना था, मगर मुझे इन बातों की कुछ भी परवाह न हुई। रणधीरसिंहजी भी मुझे नौकर रखकर बहुत प्रसन्न हुए। मेरी खातिरदारी में कभी किसी तरह की कमी नहीं करते थे। इसके दो सबब थे, एक तो उन दिनों उन्हें ऐयार की सख्त जरूरत थी, दूसरे मेरे पिता से और उनसे कुछ मित्रता भी थी जो कुछ दिन के बाद मुझे मालूम हुई।

रणधीरसिंहजी ने मेरा ब्याह भी शीघ्र ही करा दिया। सम्भव है कि इसे भी मैं उनकी कृपा और स्नेह के कारण समझू, पर यह भी हो सकता है कि मेरे पैर में गृहस्थी की बेड़ी डालने और कहीं भाग जाने लायक न रखने के लिए उन्होंने ऐसा किया हो, क्योंकि अकेला और बेफिक्र आदमी कहीं पर जन्म भर रहे और काम करे, इसका विश्वास लोगों को कम रहता है। खैर, जो कुछ हो मतलब यह है कि उन्होंने मुझे बड़ी इज्जत और प्यार के साथ अपने यहाँ रखा और मैंने भी थोड़े ही दिनों में ऐसे अनूठे काम कर दिखाए कि उन्हें ताज्जुब होता था। सच तो यह है कि उनके दुश्मनों की हिम्मत टूट गई और वे दुश्मनी की आग में आप ही जलने लगे।

कायदे की बात है कि जब किसी के हाथ से दो-चार काम अच्छे निकल जाते हैं और चारों तरफ उसकी तारीफ होने लगती है, तब वह अपने काम की तरफ से कुछ बेफिक्र हो जाता है। वही हाल मेरा भी हुआ।

आप जानते ही होंगे कि रणधीरसिंहजी का दयाराम नामक एक भतीजा था जिसे वह बहुत प्यार करते थे, और वही उनका वारिस होने वाला था। उसके मां-बाप लड़कपन ही में मर चुके थे, मगर चाचा की मुहब्बत के सबब उसे भी बाप के मरने का दुःख मालूम न हुआ। वह (दयाराम) उम्र में मुझसे कुछ छोटा था, मगर मेरे और उसके बीच में हद दर्जे की दोस्ती और मुहब्बत हो गई थी। जब हम दोनों आदमी घर पर मौजूद रहते तो बिना मिले जी नहीं मानता था। दयाराम का उठना-बैठना मेरे यहाँ ज्यादा होता था, अक्सर रात को मेरे यहाँ खा-पीकर सो जाता था, और उसके घर वाले भी इसमें किसी तरह का रंज नहीं मानते थे।

जो मकान मुझे रहने के लिए मिला था, वह निहायत उम्दा और शानदार था।उसके पीछे की तरफ एक छोटा-सा नजरबाग था, जो दयाराम के शौक की बदौलत हरदम हरा-भरा, गुजान और सुहावना बना रहता था। प्रायः संध्या के समय हम दोनों दोस्त उसी बाग में बैठकर भांग-बूटी छानते और संध्योपासन से निवृत्त हो बहुत रात गये तक गप-शप किया करते।

जेठ का महीना था और गर्मी हद दर्जे की पड़ रही थी। पहर रात बीत जाने पर हम दोनों दोस्त उसी नजरबाग में दो चारपाइयों के ऊपर लेटे आपस में धीरे-धीरे बातें कर रहे थे। मेरा खूबसूरत और प्यारा कुत्ता मेरे पायताने की तरफ एक पत्थर की चौकी पर बैठा हुआ। बात करते-करते हम दोनों को नींद आ गई।

आधी रात से कुछ ज्यादा बीती होगी, जब मेरी आँख कुत्ते के भौंकने की आवाज से खुल गई। मैंने उस पर कुछ विशेष ध्यान न दिया और करवट बदलकर फिर आँखें बन्द कर लीं, क्योंकि वह कुत्ता मुझसे बहुत दूर और नजरबाग के पिछले हिस्से की तरफ था, मगर कुछ ही देर बाद वह मेरी चारपाई के पास आकर भौंकने लगा, और पुनः मेरी आंख खुल गई। मैंने कुत्ते को अपने सामने बेचैनी की हालत में देखा, उस समय वह जुबान निकालते हुए जोर-जोर से हांफ रहा, और दोनों अगले पैरों से जमीन खोद रहा था।

मैं अपने कुत्ते की आदतों को खूब जानता और समझता था, पतः उसकी ऐसी अवस्था देखकर मेरे दिल में खुटका हुआ और मैं घबराकर उठ बैठा। अपने मित्र भी उठाकर होशियार कर देने की नीयत से मैंने उसकी चारपाई की तरफ देखा, मगर चारपाई खाली पाकर मैं बेचैनी के साथ चारों तरफ देखने लगा और उठकर चारपाई के नीचे खड़े होने के साथ ही मैंने अपने सिरहाने के नीचे से खंजर निकाल लिया। उस समय मेरा नमकहलाल कुत्ता मेरी धोती पकड़कर बार-बार खींचने और बाग के पिछले हिस्से तरफ चलने का इशारा करने लगा और जब मैं उसके इशारे के मुताबिक चला तो धोती छोड़कर आगे-आगे दौड़ने लगा। कदम बढ़ाता हुआ मैं उसके पीछे-पीछे चला। समय मालूम हुआ कि मेरा कुत्ता जख्मी है, उसके पिछले पैर में चोट आई है, इसलिए पैर उठाकर दौड़ता था। अतः कुत्ते के पीछे-पीछे चलकर मैं पिछली दीवार के पास पहुँचा जहाँ मालती और मोमियाने की लताओं के सबब घना कुंज और पूरा अन्धक हो रहा था। कुत्ता उस झुरमुर के पास जाकर रुक गया और मेरी तरफ देखक दुम हिलाने लगा। उसी समय मैंने झाड़ी में से तीन आदमियों को निकलते हुए देखा ज बाग की दीवार के पास चले गए और फुर्ती से दीवार लाँघकर पार हो गए। उन तीनों से एक आदमी के हाथ में एक छोटी-सी गठरी थी जो दीवार लाँघते समय उसके हाथ छूटकर बाग के भीतर ही गिर पड़ी। निःसन्देह वह गठरी लेने के लिए भीतर को लौटत मगर उसने मुझे और मेरे कुत्ते को देख लिया था, इसलिए उसकी हिम्मत न पड़ी।

गठरी गिरने के साथ ही मैंने जफील बजाई और खंजर हाथ में लिए हुए ही उस आदमी का पीछा करना चाहा अर्थात् दीवार की तरफ बढ़ा, मगर कुत्ते ने मेरी धोती पकड़ ली और झाड़ी की तरफ हट कर खींचने लगा, जिससे मैं समझ गया कि इस झाड़ी में भी कोई छिपा हुआ है, जिसकी तरफ कुत्ता इशारा कर रहा है। मैं सम्हल कर खड़ा हो गया और गौर के साथ उस झाड़ी की तरफ देखने लगा। उसी समय पत्तों की खड़-खड़ाहाट ने विश्वास दिला दिया कि इसमें कोई और भी है। मैं इस खयाल से कि जिस तरह पहले तीन आदमी दीवार लांघ कर भाग गये हैं, उसी तरह इसको भी भाग जाने न दूंगा, घूमकर दीवार की तरफ चला गया। उस समय मैंने देखा कि एक चार डंडे की सीढ़ी दीवार के साथ लगी हुई है, जिसके सहारे वे तीनों निकल गये थे। मैंने वह सीढ़ी उठाकर उस गठरी के ऊपर फेंक दी जो उसके हाथ से छूट कर गिर पड़ी थी, क्योंकि मैं उस गठरी की हिफाजत का भी खयाल कर रहा था।

सीढ़ी हटाने के साथ ही दो आदमी उस झाड़ी में से निकले और बड़ी बहादुरी के साथ मेरा मुकाबला किया, और मैं भी जी तोड़कर उनके साथ लड़ने लगा। अन्दाज से मालूम हो गया कि गठरी उठा लेने की तरफ ही उन दोनों का विशेष ध्यान है। आप सुन चुके हैं कि मेरे हाथ में केवल खंजर था, मगर उन दोनों के हाथ में लम्बे-लम्बे लट्ठ थे और मुकाबला करने में भी वे दोनों कमजोर न थे। अतः मुझे अपने बचाव का ज्यादा खयाल था और मैं तब तक लड़ाई खतम करना नहीं चाहता था, जब तक मेरे आदमी न आ जायें, जिन्हें जफील देकर मैंने बुलाया था।

आधी घड़ी से ज्यादा देर तक मेरा उनका मुलाबला होता रहा। उसी समय मुझे रोशनी दिखाई दी और मालूम हुआ कि मेरे आदमी चले आ रहे हैं।उनकी तरफ देखकर मेरा ध्यान कुछ बँटा ही था कि एक आदमी के हाथ का लट्ठ मेरे सिर पर बैठा और मैं चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ा।

२

जब मेरी आँख खुली, मैंने खुद को अपने आदमियों से घिरा हुआ पाया। मशालों की रोशनी बखूबी हो रही थी। जांच करने पर मालूम हुआ कि मैं आधी घड़ी से ज्यादा देर त बेहोश नहीं रहा। जब मैंने दुश्मन के बारे में दरियाफ्त किया, तो मालूम हुआ कि वे दोनों भी भाग गये, मगर मेरे आदमियों के सबब से उस गठरी को नहीं ले जा सके। मैंने अपनी हिम्मत और ताकत पर खयाल किया तो मालूम हुआ कि मैं इस समय उनका पीछा करने लायक नहीं हूँ। आखिर लाचार हो और पहरे का इन्तजाम करके मैं गठरी लिए हुए अपने कमरे में चला आया, मगर अपने मित्र की तरफ से मेरा दिल बड़ा ही बेचैन रहा और तरह-तरह के शक पैदा होते रहे।

मेरे कमरे में रोशनी बखूबी हो रही थी। दरवाजा बन्द करके मैंने गठरी खोली और उसके अन्दर की चीजों को बड़े गौर से देखने लगा।

गठरी में दो जोड़ तो कपड़े निकले जिन्हें मैं पहचानता न था, मगर वे कपड़े पहने हुए और मैले थे। कागजों का एक मुट्ठा निकला, जिसे देखते ही मैं पहचान गया कि यह रणधीरसिंहजी के खास सन्दूक के कागज हैं। मोम का एक सांचा कई कपड़ों की तह में लपेटा हुआ निकला, जो खास रणधीरसिंहजी की मोहर पर से उठाया गया था। इन चीजों के अतिरिक्त मोतियों की एक माला एक कण्ठा और तीन जड़ाऊ अंगूठियाँ निकलीं। ये चीजें मेरे मित्र दयारामसिंह की थीं। इन सब चीजों को पहने हुए ही आज वे मेरे यहाँ से गायब हुए थे।

इन सब चीजों को देखकर मैं बड़ी देर तक सोच-विचार में पड़ा रहा। उसी समय कमरे का वह दरवाजा खुला, जो जनाने मकान में जाने के लिए था और मेरी स्त्री कमला की माँ आती हुई दिखाई पड़ी। उस समय वह एक बच्चे की माँ हो चुकी थी और अपने बच्चे को भी गोद में लिए हुए थी। इसमें कोई शक नहीं कि मेरी वह स्त्री बुद्धिमान थी और छोटे-मोटे कामों में मैं उसकी राय भी लिया करता था।

उसकी सूरत देखते ही मैं पहचान गया कि तरद्दुद और घबड़ाहाट ने उसे अपना शिकार बना लिया है अतः मैंने उसे बुलाकर अपने पास बैठाया और सब हाल कह सुनाया साथ ही इसके यह भी कहा कि मैं इसी समय अपने दोस्त का पता लगाने के लिए जाना चाहता हूँ। मगर उसने इस आखिरी बात को कबूल न किया और कहा कि मेरी राय में पहले रणधीरसिंहजी से मिल लेना चाहिए।"

कई बातों को सोचकर मैंने उसकी राय कबूल कर ली और उस गठरी को लेकर रणधीरसिंहजी से मिलने के लिए रवाना हुआ। मुझे इस बात का भी धोखा लगा हुआ था कि रास्ते में कहीं दुश्मनों से मुलाकात न हो जाये, जो जरूर इस गठरी को छीन लेने की धुन में लगे हुए होंगे, इसलिए मैंने अपने दो शागिर्दो को भी साथ में ले लिया।

रणधीरसिंहजी बेफिक्री और आराम की नींद सो रहे थे जब मैंने पहुँचकर उन्हें उठाया। जागने के साथ ही वे मुझे देखकर चौंके और बोले, "क्यों, क्या मामला है जो इस समय ऐसे ढंग से यहाँ आये हो? दयाराम कुशल से तो है?"

मेरी सूरत देखते ही उन्होंने दयाराम का कुशल पूछा, इससे मुझे बड़ा ही ताज्जुब हुआ। खैर, मैं उनके पास बैठ गया और जो कुछ मामला हुआ था, साफ-साफ कह सुनाया।

मैं इस किस्से को मुख्तसिर ही में बयान करूँगा। रणधीरसिंहजी इस हाल को सुनकर बहुत ही दुःखी और उदास हुए। बहुत कुछ बातचीत करने के बाद अन्त में बोले,"दयाराम मेरा एक ही वारिस है और तुम्हारा दिली दोस्त है, ऐसी अवस्था में उसके लिए क्या करना चाहिए, सो तुम ही सोच लो! मैं क्या कहूँ! मैं तो समझ चुका था कि दुश्मनों की तरफ से अब निश्चिन्त हुआ, मगर नहीं।"

इतना कहकर वे कपड़े से अपना मुंह ढांप कर रोने लगे। मैं उन्हें बहुत-कुछ समझा बुझाकर विदां हुआ और अपने घर चला आया। अपनी स्त्री से मिलकर सब हाल कहने और समझाने-बुझाने के बाद मैं अपने शागिों को साथ लेकर घर से बाहर निकला। बस यहीं से मेरी बदकिस्मती का जमाना शुरू हुआ।

इतना कहकर भूतनाथ अटक गया और सिर नीचा करके कुछ सोचने लगा।सब कोई बेचैनी के साथ उसकी तरफ देख रहे थे और भूतनाथ की अवस्था से मालूम होता था कि वह इस बात को सोच रहा है कि मैं अपना किस्सा आगे बयान करूं या नहीं। उसी समय दो आदमी और कमरे के अन्दर चले आये और महाराज को सलाम करके खड़े हो गये। इनकी सूरत देखते ही भूतनाथ के चेहरे का रंग उड़ गया और वह डरे हुए ढंग से उन दोनों की तरफ देखने लगा।

दोनों आदमी, जो अभी-अभी कमरे में आये, वे ही थे जिन्होंने भूतनाथ को अपना नाम 'दलीपशाह' बतलाया था। इन्द्रदेव की आज्ञा पाकर वे दोनों भूतनाथ के पास ही बैठ गये।

३

प्रेमी पाठक भूले न होंगे कि दो आदमियों ने भूतनाथ से अपना नाम दलीपशाह बतलाया, जिनमें से एक को पहला दलीप और दूसरे को दूसरा दलीप समझना चाहिए।

भूतनाथ तो पहले ही सोच में पड़ गया था कि अपना हाल आगे बयान करे या नहीं, अब दोनों दलीपशाह को देखकर वह और भी घबड़ा गया। ऐयार लोग समझ रहे थे कि अब उसमें बात करने की भी ताकत नहीं रही। उसी समय इन्द्रदेव ने भूतनाथ से कहा, "क्यों भूतनाथ, चुप क्यों हो गये? कहो हाँ, तब आगे क्या हुआ?"

इसका जवाब भूतनाथ ने कुछ न दिया और सिर झुकाकर जमीन की तरफ देखने लगा। उस समय पहले दलीपशाह ने हाथ जोड़ कर महाराज की तरफ देखा और कहा,"कृपानाथ, भूतनाथ को अपना हाल बयान करने में बड़ा कष्ट हो रहा है, और वास्तव में बात भी ऐसी ही है। कोई भला आदमी अपनी उन बातों को जिन्हें वह ऐब समझता है, अपनी जबान से अच्छी तरह बयान नहीं कर सकता। अतः यदि आज्ञा हो तो मैं इसका हाल पूरा-पूरा बयान कर जाऊँ, क्योंकि मैं भी भूतनाथ का हाल उतना ही जानता हूँ, जितना स्वयं भूतनाथ। भूतनाथ जहाँ तक बयान कर चुके हैं, उसे मैं बाहर खड़ा-खड़ा सुन भी चुका हूँ। जब मैंने समझा कि अब भूतनाथ से अपना हाल नहीं कहा जाता तब मैं यह अर्ज करने के लिए हाजिर हुआ हूँ। (भूतनाथ की तरफ देखकर) मेरे इस कहने से आप यह न समझिएगा कि मैं आपके साथ दुश्मनी कर रहा हूँ। नही, जो काम आपके सुपुर्द किया गया है, उसे आपके बदले में मैं आसानी के साथ कर देना चाहता हूँ।"

इन दोनों आदमियों (दलीपशाह) को महाराज तथा और सब ने भी ताज्जुब के साथ देखा था, मगर यह समझ कर इन्द्रदेव से किसी ने कुछ भी न पूछा कि जो कुछ है, थोड़ी देर में मालूम हो ही जायेगा, मगर जब दलीपशाह ऊपर लिखी बात बोलकर चुप हो गया, तब महाराज ने भेद-भरी निगाहों से इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कुमार ने झुककर धीरे से कुछ कह दिया, जिसे वीरेन्द्रसिंह तथा तेजसिंह ने भी सुना तथा इनके जरिए से हमारे और साथियों को भी मालूम हो गया कि कुमार ने क्या कहा।

दलीपशाह की बात सुनकर इन्द्रदेव ने महाराज की तरफ देखा और हाथ जोड़कर कहा, "इन्होंने (दलीपशाह ने) जो कुछ कहा, वास्तव में ठीक है, मेरी समझ में अगर भूतनाथ का किस्सा इन्हीं की जवानी सुन लिया जाये तो कोई हर्ज नहीं है!" इसके जवाब में महाराज ने मंजूरी के लिए सिर हिला दिया।

इन्द्रजीतसिंह--(भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, इसमें तुम्हें किसी तरह का उज्र है?

भूतनाथ--(महाराज की तरफ देखकर और हाथ जोड़कर) जो महाराज की मर्जी, मुझमें 'नहीं' कहने की सामर्थ्य नहीं है। मुझे क्या खबर थी कि कसूर माफ हो जाने पर भी यह दिन देखना नसीब होगा। यद्यपि यह मैं खूब जानता हूँ कि मेरा भेद अब किसी से छिपा नहीं रहा, परन्तु फिर भी अपनी भूल बार-बार कहने या सुनने से लज्जा बढ़ती ही जाती है कम नहीं होती। खैर कोई चिन्ता नहीं, जैसा होगा वैसा अपने कलेजे को मजबूत करूंगा और दलीपशाह की कही हुई बातें सुनूंगा तथा देलूंगा कि ये महाशय कुछ झूठ का भी प्रयोग करते हैं या नहीं।

दलीपशाह--नहीं-नहीं भूतनाथ, मैं झूठ कदापि न बोलूंगा, इससे तुम बेफिक रहो! (इन्द्रदेव की तरफ देख के) अच्छा तो अब मैं प्रारम्भ करता हूँ। दलीपशाह ने इस तरह कहना शुरू किया-

"महाराज, इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐयारी के फन में भूतनाथ परले सिरे का उस्ताद और तेज आदमी है। अगर यह ऐयाशी के दरिया में गोते लगाकर अपने को बर्बाद न कर दिए होता तो इसके मुकाबले का ऐयार आज दुनिया में दिखाई न देता। मेरी सूरत देख के ये चौंकते और डरते हैं और इनका डरना वाजिब ही है मगर अब मैं इनके साथ किसी तरह का बुरा बर्ताव नहीं कर सकता, क्योंकि मैं ऐसा करने के लिए दोनों कुमारों से प्रतिज्ञा कर चुका हूँ और इनकी आज्ञा मैं किसी तरह टाल नहीं सकता क्योंकि इन्हीं की बदौलत आज मैं दुनिया की हवा खा रहा हूँ। (भूतनाथ की तरफ देख के) भूतनाथ, मैं वास्तव में दलीपशाह हूँ, उस दिन तुमने मुझे नहीं पहचाना तो इसमें तुम्हारी आँखों का कोई कसूर नहीं है, कैद की सख्तियों के साथ-साथ जमाने की चाल ने मेरी सूरत ही बदल दी है, तुम तो अपने हिसाब से मुझे मार हो चुके थे और तुम्हें मुझसे मिलने की कभी उम्मीद भी न थी मगर सुन लो और देख लो कि ईश्वर की कृपा से मैं अभी तक जीता-जागता तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। यह कुंअर साहब के चरणों का प्रताप है। अगर मैं कैद न हो जाता तो तुमसे बदला लिए बिना कभी न रहता, मगर तुम्हारी किस्मत अच्छी थी जो मैं कैद हो रह गया और छूटा भी तो कुंअर साहब के हाथ से, जो तुम्हारे पक्षपाती हैं। तुम्हें इन्द्रदेव से बुरा न मानना चाहिए और न यह सोचना चाहिए कि तुम्हें दुःख देने के लिए इन्द्रदेव तुम्हारा पुराना पचड़ा खुलवा रहे हैं! तुम्हारा किस्सा तो सब को मालूम हो चुका है, इस समय ज्यों का त्यों चुपचाप रह जाने पर तुम्हारे चित्त को शान्ति नहीं मिल सकती और तुम हम लोगों की सूरत देख-देखकर दिन-रात तरवुद में पड़े रहोगे अतः तुम्हारे पिछले ऐबों को खोलकर इन्द्रदेव तुम्हारे चित्त को शान्ति दिया चाहते हैं और तुम्हारे दुश्मनों को, जिनके साथ तुम ही ने बुराई की है, तुम्हारा दोस्त बना रहे हैं। ये यह भी चाहते हैं कि तुम्हारे साथ-ही-साथ हम लोगों का भेद भी खुल जाय और तुम जान जाओ कि हम लोगों ने तुम्हारा कसूर माफ कर दिया है क्योंकि अगर ऐसा न होगा तो जरूर तुम हम लोगों को मार डालने की फिक्र में पड़े रहोगे और हम लोग इस धोखे में रह जायेंगे कि हमने इनका कसूर तो माफ ही कर दिया,अब ये हमारे साथ बुराई न करेंगे। (जीतसिंह की तरफ देखकर) अब मैं मतलब की तरफ झुकता हूँ और भूतनाथ का किस्सा बयान करता हूँ।

जिस जमाने का हाल भूतनाथ बयान कर रहा है, अर्थात् जिन दिनों भूतनाथ के मकान से दयाराम गायब हो गए थे उन दिनों यही नागर काशी के बाजार में वेश्या बनकर बैठी हुई अमीरों के लड़कों को चौपट कर रही थी। उसकी बढ़ी-चढ़ी खूबसूरती लोगों के लिए जहर हो रही थी और माल के साथ ही विशेष प्राप्ति के लिए यह लोगों की जान पर भी वार करती थी। यही दशा मनोरमा की भी थी परन्तु उसकी बनिस्बत यह बहुत ज्यादा रुपए वाली होने पर भी नागर की-सी खूबसूरत न थी, हाँ, चालाक जरूर ज्यादा थी। और लोगों की तरह भूतनाथ और दयाराम भी नागर के प्रेमी हो रहे थे। भूतनाथ को अपनी ऐयारी का घमण्ड था और नागर को अपनी चालाकी का। भूतनाथ नागर के दिल पर कब्जा करना चाहता था और नागर इसकी तथा दयाराम की दौलत अपने खजाने में मिलाना चाहती थी।

दयाराम की खोज में घर से शागिर्दो को साथ लिए हुए बाहर निकलते ही भूतनाथ ने काशी का रास्ता लिया और तेजी के साथ सफर तय करता हुआ नागर के मकान पर पहुँचा। नागर ने भूतनाथ की बड़ी खातिरदारी और इज्जत की तथा कुशल-मंगल पूछने के बाद यकायक यहाँ आने का सबब भी पूछा।

भूतनाथ ने अपने आने का ठीक-ठीक सबब तो नहीं बताया, मगर नागर समझ गई कि कुछ दाल में काला जरूर है। इसी तरह भूतनाथ को भी इस बात का शक पैदा हो गया कि दयाराम की चोरी में नागर का कुछ लगाव जरूर है अथवा यह उन आदमियों को जरूर जानती है जिन्होंने दयाराम के साथ ऐसी दुश्मनी की है।

भूतनाथ का शक काशी ही वालों पर था इसलिए काशी ही में अड्डा बनाकर इधर-उधर घूमना और दयाराम का पता लगाना आरम्भ किया। जैसे-जैसे दिन बीतता था, भूतनाथ का शक भी नागर के ऊपर बढ़ता जाता था। सुनते हैं कि उसी जमाने में भूतनाथ ने एक औरत के साथ काशीजी में ही शादी भी कर ली थी जिससे कि नानक पैदा हुआ है क्योंकि इस झमेले में भूतनाथ को बहुत दिनों तक काशी में रहना पड़ा था।

यह सच है कि कम्बख्त रंडियाँ रुपये के सिवा और किसी की नहीं होती। जो दयाराम कि नागर को चाहता, मानता और दिल खोलकर रुपया देता था, नागर उसी के खून की प्यासी हो गई क्योंकि ऐसा करने से उसे विशेष प्राप्ति की आशा थी। भूतनाथ ने यद्यपि अपने दिल का हाल नागर से बयान नहीं किया मगर नागर को विश्वास हो गया कि भूतनाथ को उस पर शक है और यह दयाराम ही की खोज में काशी आया हुआ है, अतः नागर ने अपना उचित प्रबन्ध करके काशी छोड़ दी और गुप्त रीति से जमानिया में जा बसी। भूतनाथ भी मिट्टी सूंघता हुआ उसकी खोज में जमानिया जा पहुँचा और एक भाड़े का मकान लेकर वहाँ रहने लगा।

इस खोज-ढूंढ़ में वर्षों बीत गये, मगर दयाराम का पता न लगा। भूतनाथ ने अपने मित्र इन्द्रदेव से भी मदद मांगी और इन्द्रदेव ने मदद दी भी मगर नतीजा कुछ भी न निकला। इन्द्रदेव ही के कहने से मैं उन दिनों भूतनाथ का मददगार बन गया था।

इस किस्से के सम्बन्ध में रणधीरसिंह के रिश्तेदारों की तथा जमानिया गयाजी और राजगृह इत्यादि की भी बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं परन्तु मैं भी भूतनाथ का मददगार था, मगर अफसोस, भूतनाथ की किस्मत तो कुछ और ही कराना चाहती थी इसलिए हम लोगों की मेहनत का कोई अच्छा नतीजा न निकला, बल्कि एक दिन जब मिलने के लिए मैं भूतनाथ के डेरे पर गया तो मुलाकात होने के साथ ही भूतनाथ ने आँखें बदलकर मुझसे कहा, "दलीपशाह, मैं तो तुम्हें बहुत अच्छा और नेक समझता था मगर तुम बहुत ही बुरे और दगाबाज निकले। मुझे ठीक-ठीक पता लग चुका है कि दयाराम का भेद तुम्हारे दिल के अन्दर है और तुम हमारे दुश्मनों के मददगार हो और भेदिए हो तथा खूब जानते हो कि इस समय दयाराम कहाँ हैं। तुम्हारे लिए यही अच्छा है कि सीधी तरह उनका (दयाराम का) पता बता दो, नहीं तो मैं तुम्हारे साथ बुरी तरह पेश आऊँगा और तुम्हारी मिट्टी पलीद करके छोडूंगा।"

महाराज, मैं नहीं कह सकता कि उस समय भूतनाथ की इन बेतुकी बातों को सुनकर मुझे कितना क्रोध चढ़ आया। इसके पास बैठा भी नहीं और न इसकी बात का कुछ जवाब ही दिया,T चुपचाप पिछले पैर लौटा और मकान के बाहर निकल आया। मेरा घोड़ा बाहर खड़ा था, मैं उस पर सवार होकर सीधे इन्द्रदेव की तरफ चला गया।(इन्द्रदेव की तरफ हाथ का इशारा करके) दूसरे दिन इनके पास पहुंचा और जो कुछ बीती थी इनसे कह सुनायी। इन्हें भी भूतनाथ की बातें बहुत बुरी मालूम हुई और एक लम्बी साँस लेकर ये मुझसे बोले, "मैं नहीं जानता कि इन दो-चार दिनों में भूतनाथ को कौन-सी नई बात मालूम हो गई और किस बुनियाद पर उसने तुम्हारे साथ ऐसा सलूक किया। खैर कोई चिन्ता नहीं, भूतनाथ अपनी इस बेवकूफी पर अफसोस करेगा और पछतावेगा, तुम इस बात का खयाल न करो और भूतनाथ से मिलना-जुलना छोड़कर दयाराम की खोज में लगे रहो, तुम्हारा अहसान रणधीरसिंह पर और मेरे ऊपर होगा।

इन्द्रदेव ने बहुत कुछ कह-सुनकर मेरा क्रोध शान्त किया और दो दिन तक मुझे अपने यहाँ मेहमान रक्खा। तीसरे दिन मैं इन्द्रदेव से बिदा होने वाला ही था कि तभी इनके एक शागिर्द ने आकर एक विचित्र खबर सुनाई। उसने कहा कि आज रात को बारह बजे के समय मिर्जापुर के एक जमींदार 'राजसिंह' के यहाँ दयाराम के होने का पता मुझे लगा है। खुद मेरे भाई ने यह खबर दी है। उसने यह भी कहा है कि आज कल नागर भी उन्हीं के यहाँ है।

इन्द्रदेव--(शागिर्द से) वह खुद मेरे पास क्यों नहीं आया?

शागिर्द--वह आप ही के पास आ रहा था, मुझसे रास्ते में मुलाकात हुई और उसके पूछने पर मैंने कहा कि दयाराम जी का पता लगाने के लिए मैं तैनात किया गया हूँ। उसने जवाब दिया कि अब तुम्हारे जाने की कोई जरूरत न रही, मुझे उनका पता लग गया और यही खुशखबरी सुनाने के लिए मैं सरकार के पास जा रहा था, मगर अब तुम मिल गये हो तो मेरे जाने की कोई जरूरत नहीं। जो कुछ मैं कहता हूँ, तुम जाकर उन्हें सुना दो और मदद लेकर बहुत जल्द मेरे पास आओ। मैं फिर उसी जगह जाता हूँ, कहो ऐसा न हो कि दयाराम जी वहाँ से भी निकालकर किसी दूसरी जगह पहुँचा दिये जायँ और हम लोगों को पता न लगे, मैं जाकर इस बात का ध्यान रखूगा। इसके बाद उसने सब कैफियत बयान की और अपने मिलने का पता बताया।

इन्द्रदेव--ठीक है उसने जो कुछ किया बहुत अच्छा किया, अब उसे मदद पहुंचाने का बन्दोबस्त करना चाहिए।

शागिर्द--यदि आज्ञा हो तो भूतनाथ को भी इस बात की इत्तिला दे दी जाय?

इन्द्रदेव-कोई जरूरत नहीं, अब तुम जाकर कुछ आराम करो, तीन घण्टे बाद फिर तुम्हें सफर करना होगा।

इसके बाद इन्द्रदेव का शागिर्द जब अपने डेरे पर चला गया, तब मुझसे और इन्द्रदेव से बातचीत होने लगी। इन्द्रदेव ने मुझसे मदद माँगी और मुझे मिर्जापुर जाने के लिए कहा, मगर मैंने इनकार किया और कहा कि अब मैं न तो भूतनाथ का मुंह देखूगा और न उसके किसी काम में शरीक होऊँगा। इसके जवाब में इन्द्रदेव ने मुझे पुनःसमझाया और कहा कि यह काम भूतनाथ का नहीं है, मैं कह चुका हूँ कि इसका अहसान मुझ पर और रणधीरसिंह जी पर होगा।

इसी तरह की बहुत-सी बातें हुईं, लाचार मुझे इन्द्रदेव की बात माननी पड़ी और कई घण्टे के बाद इन्द्रदेव के उसी शागिर्द 'शम्भू' को साथ लिए हुए मैं मिर्जापुर की तरफ रवाना हुआ। दूसरे दिन हम लोग मिर्जापुर जा पहुँचे और बताये हुए ठिकाने पर पहुँचकर शम्भू के भाई से मुलाकात की। दरियाफ्त करने पर मालूम हुआ कि दयाराम अभी तक मिर्जापुर की सरहद के बाहर नहीं गये हैं, अतः जो कुछ हम लोगों को करना था, आपस में तय करने के बाद सूरत बदलकर बाहर निकलें।

दयाराम को ढूंढ़ निकालने के लिए हमने कैसी-कैसी मेहनत की और हम लोगों को किस-किस तरह की तकलीफें उठानी पड़ीं, इसका बयान करना किस्से को व्यर्थ तूल देना और अपने मुंह मियां मिठू बनना है। महाराज के (आपके) नामी ऐयारों ने जैसे-अनूठे काम किये हैं उनके सामने हमारी ऐयारी कुछ भी नहीं है अतएव केवल इतना ही कहना काफी है कि हम लोगों ने अपनी हिम्मत से बढ़कर काम किया और हद दर्जे की तकलीफ उठाकर दयाराम जी को ढूंढ निकाला। केवल दयाराम को नहीं, बल्कि उनके साथ-ही-साथ 'राजसिंह' को भी गिरफ्तार करके हम लोग अपने ठिकाने पर ले आये, मगर अफसोस! हम लोगों की सब मेहनत पर भूतनाथ ने पानी ही नहीं फेर दिया, बल्कि जन्म भर के लिए अपने माथे पर कलंक का टीका भी लगाया।

कैद की सख्ती उठाने के कारण दयाराम जी बहुत ही कमजोर और बीमार हो रहे थे, उनमें बात करने की भी ताकत न थी, इसलिए हम लोगों ने उसी समय उन्हें उठाकर इन्द्रदेव के पास ले जाना मुनासिब न समझा और दो-तीन दिन तक आराम देने की नीयत से अपने गुप्त स्थान पर, जहाँ हम लोग टिके हुए थे, ले गये। जहाँ तक हो सका, नरम बिछावन का इन्तजाम करके उस पर उन्हें लिटा दिया और उनके शरीर में ताकत लाने का बन्दोबस्त करने लगे। इस बात का भी निश्चय कर लिया कि जब तक इनकी तबीयत ठीक न हो जायगी, इनसे कैद किये जाने का सबब तक न पूछेगे।

दयाराम जी के आराम का इन्तजाम करने के बाद हम लोगों ने अपने-अपने हर्के खोलकर उनकी चारपाई के नीचे रख दिए, कपड़े उतारे और बातचीत करने तथा दुश्मनी का सबब जानने के लिए राजसिंह को होश में लाये और उसकी मुश्के खोलकर बातचीत करने लगे क्योंकि उस समय इस बात का डर हम लोगों को कुछ भी न था कि वह हम पर हमला करेगा या हम लोगों का कुछ बिगाड़ सकेगा।

जिस मकान में हम लोग टिके हुए थे वह बहुत ही एकान्त और उजाड़ मुहल्ले में था। रात का समय था और मकान की तीसरी मंजिल पर हम लोग बैठे हुए थे, एक मद्धिम चिराग आले पर जल रहा था। दयाराम जी का पलंग हम लोगों के पीछे की तरफ था और राजसिंह सामने बैठा हुआ ताज्जुब के साथ हम लोगों का मुंह देख रहा था। उसी समय यकायक कई धमाके होने की आवाज आई और उसके कुछ ही देर बाद भूतनाथ तथा उसके दो साथियों को हम लोगों ने अपने सामने खड़ा देखा। सामना होने के साथ ही भूतनाथ ने मुझसे कहा, "क्यों वे शैतान के बच्चे, आखिर मेरी बात ठीक निकली न! तू ही ने राजसिंह के साथ मेल करके हमारे साथ दुश्मनी पैदा की! खैर, ले अपने किए का फल चख!"

इतना कहकर भूतनाथ ने मेरे ऊपर खंजर का वार किया जिसे बड़ी खूबी के साथ मेरे साथी ने रोका। मैं भी उठकर खड़ा हो गया और भूतनाथ के साथ लड़ाई होने लगी। भूतनाथ ने एक ही हाथ में राजसिंह का काम तमाम कर दिया और थोड़ी ही देर में मुझे भी खूब जख्मी किया यहाँ तक कि मैं जमीन पर गिर पड़ा और मेरे दोनों साथी भी बेकार हो गये। उस समय दयारामजी को, जो पड़े-पड़े सब तमाशा देख रहे थे जोश चढ़ आया और चारपाई पर से उठकर खाली हाथ भूतनाथ के सामने आ खड़े हुए, कुछ बोला ही चाहते थे कि भूतनाथ के हाथ का खंजर उनके कलेजे के पार हो गया और वे बेदम होकर जमीन पर गिर पड़े।

४

मैं नहीं कह सकता कि भूतनाथ ने ऐसा क्यों किया। भूतनाथ का कौल तो यही है कि मैंने उनको पहचाना नहीं, और धोखा हुआ। खैर जो हो, दयाराम के गिरते ही मेरे मुंह से 'हाय' की आवाज निकली और मैंने भूतनाथ से कहा, "ऐ कम्बख्त! तूने बेचारे दयाराम को क्यों मार डाला जिन्हें बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने खोज निकाला था!".

मेरी बात सुनते ही भूतनाथ सन्नाटे में आ गया। इसके बाद उसके दोनों साथी तो न मालूम क्या सोचकर एकदम भाग खड़े हुए, मगर भूतनाथ बड़ी बेचैनी से दयाराम के पास बैठकर उनका मुंह देखने लगा। उस समय भूतनाथ के देखते ही देखते उन्होंने आखिरी हिचकी ली और दम तोड़ दिया। भूतनाथ उनकी लाश के साथ चिपटकर रोने लगा और बड़ी देर तक रोता रहा। तब तक हम तीनों आदमी पुनः मुकाबला करने लायक हो गये और इस बात से हम लोगों का साहस और भी बढ़ गया कि भूतनाथ के दोनों साथी उसे अकेला छोड़कर भाग गये थे। मैंने मुश्किल से भूतनाथ को अलग किया और कहा, "अब रोने और नखरा करने से फायदा ही क्या होगा, उसके साथ ऐसी ही मुहब्बत थी तो उन पर वार न करना था, अब उन्हें मारकर औरतों की तरह नखरा करने बैठे हो!"

इतना सुनकर भूतनाथ ने अपनी आँखें पोंछी और मेरी तरफ देख के कहा, "क्या मैंने जानबूझकर इन्हें मार डाला है?"

मैं-—बेशक! क्या यहाँ आने के साथ ही तुमने उन्हें चारपाई पर पड़े नहीं देखा था?

भूतनाथ-–देखा था, मगर मैं नहीं जानता था कि ये दयाराम हैं। इतने मोटे-ताजे आदमी को यकायक ऐसा दुबला-पतला देखकर मैं कैसे पहचान सकता था?

मैं--क्या खूब, ऐसे ही तो तुम अन्धे थे? खैर, इसका इन्साफ तो रणधीरसिंह के सामने ही होगा, इस समय तुम हमसे फैसला कर लो, क्योंकि अभी तक तुम्हारे दिल में लड़ाई का हौसला जरूर बना होगा।

भूतनाथ -- (अपने को संभालकर और मुंह पोंछकर) नहीं-नहीं, मुझं अब लड़ने का हौसला नहीं है, जिसके वास्ते मैं लड़ता था जब वही नहीं रहा तो अब क्या? मुझे ठीक पता लग चुका था कि दयाराम तुम्हारे फेर में पड़े हुए हैं, और अपनी आँखों से देख भी लिया, मगर अफसोस है कि मैंने पहचाना नहीं और ये इस तरह धोखे में मारे गये। लेकिन इसका कसुर भी तुम्हारे ही सिर लग सकता है।

मैं-खैर, अगर तुम्हारे किए हो सके तो तुम बिल्कुल कसूर मेरे ही सिर थोप देना, मैं अपनी सफाई आप कर लंगा, मगर इतना समझ रखो कि लाख कोशिश करने पर भी तुम अपने को बचा नहीं सकते, क्योंकि मैंने इन्हें खोज निकालने में जो कुछ मेहनत की थी, वह इन्द्रदेवजी के कहने से की थी, न तो मैं अपनी प्रशंसा कराना चाहता था और न इनाम ही लेना चाहता था, बल्कि जरूरत पड़ने पर मैं इन्द्रदेव की गवाही दिला सकता हूँ और तुम भी अपने को बेकसूर साबित करने के लिए नागर को पेश कर देना, जिसके कहने और सिखाने में आकर तुमने मेरे साथ दुश्मनी पैदा कर ली।

इतना सुनकर भूतनाथ सन्नाटे में आ गया। सिर झुकाकर देर तक सोचता रहा और इसके बाद लम्बी सांस लेकर उसने मेरी तरफ देखा और कहा, "बेशक मुझे नागर कम्बख्त ने धोखा दिया! अब मुझे भी इन्हीं के साथ मर-मिटना चाहिए।" इतना कह-कर भूतनाथ ने खंजर हाथ में ले लिया, मगर कुछ न कर सका, अर्थात् अपनी जान न दे सका।

महाराज, जवामर्दो का कहना बहुत ठीक है कि बहादुरों को अपनी जान प्यारी नहीं होती। वास्तव में जिसे अपनी जान प्यारी होती है, वह कोई हौसले का काम नहीं कर सकता और जो अपनी जान हथेली पर लिए रहता है और समझता है कि दुनिया में मरना एक बार ही है, कोई बार-बार नहीं मरता, वही सब कुछ कर सकता है। भूत-वहादुर होने में सन्देह नहीं, परन्तु इसे अपनी जान प्यारी जरूर थी और इस उल्टी बात का सबब यही था कि वह ऐयाशी के नशे में चूर था। जो आदमी ऐयाश होता है, उसमें ऐयाशी के सबब कई तरह की बुराइयाँ आ जाती हैं और बुराइयों की बुनियाद जम जाने के कारण ही उसे अपनी जान प्यारी हो जाती है, तथा वह कोई भी काम नहीं कर सकता। यही सबब था कि उस समय भूतनाथ जान न दे सका, बल्कि उसकी हिफाजत करने का ढंग जमाने लगा, नहीं तो उस समय मौका ऐसा ही था, इससे जैसी भूल हो गई थी, उसका बदला तभी पूरा होता जब यह भी उसी जगह अपनी जान दे देता और उस मकान से तीनों लाशें एक साथ ही निकाली जाती।

भूतनाथ ने कुछ देर तक सोचने के बाद मुझसे कहा-“मुझे इस समय अपनी जान भारी हो रही है है और मैं मर जाने के लिए तैयार हूँ, मगर मैं देखता हूँ कि ऐसा करने से भी किसी को फायदा नहीं पहुँचेगा। मैं जिसका नमक खा चुका हूँ और खाता हूँ, उसका और भी नुकसान होगा क्योंकि इस समय वह दुश्मनों से घिरा हुआ है। अगर मैं जीता रहूँगा तो उनके दुश्मनों का नामोनिशान मिटाकर उन्हें बेफिक्र कर सकूँगा, अतएव मैं माफी माँगता हूं कि तुम मेहरबानी कर मुझे सिर्फ दो साल के लिए जीता छोड़ दो।"

मै--दो वर्ष के लिए क्या, जिन्दगी-भर के लिए मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ। जब तुम मुझसे लड़ना नहीं चाहते तो मैं क्यों तुम्हें मारने लगा? बाकी।खामखाह मुझसे दुश्मनी पैदा कर ली है, सो उसका नतीजा तुम्हें आप से आप मिल जायगा जब लोगों को यह मालूम होगा कि भूतनाथ के हाथ से बेचारा दयाराम मारा यह बात कि तुमने गया।

भूतनाथ--नहीं-नहीं, मेरा मतलब तुम्हारी पहली बात से नहीं है, बल्कि दूसरी बात से है, अर्थात् अगर तुम चाहोगे तो लोगों को इस बात का पता ही नहीं लगेगा कि दयाराम भूतनाथ के हाथ से मारा गया।

मैं--यह क्योंकर छिप सकता है?

भूतनाथ--अगर तुम छिपाओ तो सब छिप जायगा।

मुख्तसिर यह कि धीरे-धीरे बातों को बढ़ाता हुआ भूतनाथ मेरे पैरों पर गिर पड़ा और बड़ी खुशामद के साथ कहने लगा कि तुम इस मामले को छिपाकर मेरी जान बचा लो। केवल इतना ही नहीं, इसने मुझे हर तरह के सब्जबाग दिखाए और कसमें दे-देकर मेरी नाक में दम कर दिया। लालच में तो मैं नहीं पड़ा, मगर पिछली मुरौवत के फेर में जरूर पड़ गया और भेद को छिपाये रखने की कसम खाकर अपने साथियों को साथ लिए हुए मैं उस घर के बाहर निकल गया। भूतनाथ तथा दोनों लाशों को उसी तरह छोड़ दिया, फिर मुझे मालूम नहीं कि भूतनाथ ने उन लाशों के साथ क्या बर्ताव किया।"

यहाँ तक भूतनाथ का हाल कहकर कुछ देर के लिए दलीपशाह चुप हो गया और उसने इस नीयत से भूतनाथ की तरफ देखा कि देखें यह कुछ बोलता है या नहीं। इस समय भूतनाथ की आँखों से आँसू की नदी बह रही थी और वह हिचकियाँ ले-लेकर रो रहा था। बड़ी मुश्किल से भूतनाथ ने अपने दिल को सम्हाला और दुपट्टे से मुह पोंछ कर कहा, "ठीक है, ठीक है, जो कुछ दलीपशाह ने कहा, सब सच है। मगर यह बात मैं कसम खाकर कह सकता हूँ कि मैंने जानबूझकर दयाराम को नहीं मारा। वहाँ राजसिंह को खुले हुए देखकर मेरा शक यकीन के साथ बदल गया और चारपाई पर पड़े हुए देखकर भी मैंने दयाराम को नहीं पहचाना। मैंने समझा कि यह भी कोई दलीपशाह का साथी होगा। बेशक दलीपशाह पर मेरा शक मजबूत हो गया था और मैं समझ बैठा था कि जिन लोगों ने दयाराम के साथ दुश्मनी की है दलीपशाह जरूर उनका साथी है। यह शक यहाँ तक मजबूत हो गया था कि दयाराम के मारे जाने पर भी दलीपशाह की तरफ से मेरा दिल साफ न हुआ। बल्कि मैंने समझा कि इसी (दलीपशाह) ने दयाराम को वहाँ लाकर कैद किया था। जिस नागर पर मुझे शक हुआ था, उसी कम्बख्त की जादू-भरी बातों में मैं फंस गया और उसी ने मुझे विश्वास दिला दिया कि इसका कर्ता-धर्ता दलीप शाह है। यही सबब है कि इतना हो जाने पर भी मैं दलीपशाह का दुश्मन बना ही रहा। हाँ, दलीपशाह ने एक बात नहीं कही, वह यह है कि इस भेद को छिपाये रखने की कसम खाकर भी दलीपशाह ने मुझे सूखा नहीं छोड़ा। इन्होंने कहा कि तुम कागज पर लिखकर माफी मांगो तब मैं तुम्हें माफ करके यह भेद छिपाये रखने की कसम खा सकता हूँ। लाचार होकर मुझे ऐसा करना पड़ा और मैं माफी के लिए चिट्ठी लिख हमेशा के लिए इनके हाथ में फंस गया।

दलीपशाह--बेशक यही बात है, और मै अगर ऐसा न करता तो थोड़े ही दिन बाद भूतनाथ मुझे दोपी ठहरा कर आप सच्चा बन जाता। खैर, अब मैं इसके आगे का हाल बयान करता हूँ जिसमें थोड़ा-मा हाल तो ऐसा ही होगा जो मुझे खास भूतनाथ से मालूम हुआ था।

इतना कहकर दलीपशाह ने फिर अपना बयान शुरू किया-

दलीपशाह--जैसाकि भूतनाथ भी कह चुका है, बहुत मिन्नत और खुशामद से लाचार होकर मैंने कसूरवार होने और माफी मांगने की चिट्ठी लिखाकर इसे छोड़ दिया और इसका ऐब छिपा रखने का वादा करके अपने साथियों को साथ लिए उस घर से बाहर निकल गया और भूतनाथ की इच्छानुसार दयाराम की लाश को और भूतनाथ को उसी मकान में छोड़ दिया। फिर मुझे नहीं मालूम कि क्या हुआ और इसने दयाराम की लाश के साथ कैसा बर्ताव किया।

वहाँ से बाहर होकर मैं इन्द्रदेव की तरफ रवाना हुआ, मगर रास्ते भर सोचता जाता था कि अब मुझे क्या करना चाहिए, दयाराम का सच्चा-सच्चा हाल इन्द्रदेव से बयान करना चाहिए या नहीं। आखिर हम लोगों ने निश्चय कर लिया कि जब भूतनाथ से वादा कर चुके हैं तो इस भेद को इन्द्रदेव से भी छिपा ही रखना चाहिए।

जब हम लोग इन्द्रदेव के मकान में पहुंचे तो उन्होंने कुशल-मंगल पूछने के बाद दयाराम का हाल दरियाफ्त किया जिसके जवाब में मैंने असल मामले को तो छिपा रखा और बात बनाकर यों कह दिया कि कुछ मैंने या आपने सुना था, वह ठीक ही निकला अर्थात् राजसिंह ही ने दयाराम के साथ वह सलूक किया और दयाराम राजसिंह के घर में मौजूद भी थे, मगर अफसोस, बेचारे दयाराम को हम लोग छुड़ा न सके और वे जान से मारे गये!

इन्द्रदेव--(चौंककर) हैं! जान से मारे गये!

मैं जी हां, और इस बात की खबर भूतनाथ को भी लग चुकी थी। मेरे पहले ही भूतनाथ, राजसिंह के उस मकान में जिसमें दयाराम को कैद कर रखा था, पहुँच गया और उसने अपने सामने दयाराम की लाश देखी जिसे कुछ ही देर पहले राज सह ने मार डाला था, तब भूतनाथ ने उसी समय राजसिंह का सिर काट डाला। सिवाय इसके वह और कर ही क्या सकता था!इसके थोड़ी देर बाद हम लोग भी उस घर जा पहुंचे और दयाराम तथा राजसिंह की लाश और भूतनाथ को वहां मौजूद पाया, दरियाफ्त करने पर भूतनाथ ने सब हाल बयान किया और अफसोस करते हुए हम लोग वहाँ से रवाना हुए।

इन्द्रदेव--अफसोस! बहुत बुरा हुआ! खैर, ईश्वर की मर्जी!

मैंने भूतनाथ के ऐब को छिपाकर जो कुछ इन्द्रदेव से कहा, भूतनाथ की इच्छानुसार ही कहा था। भूतनाथ ने भी यही बात मशहूर की और इस तरह अपने ऐब को छिपा रखा।

यहां तक भूतनाथ का किस्सा कहकर जब दलीपशाह कुछ देर के लिए चुप हो गया तब तेजसिंह ने उससे पूछा, "तुमने तो भला भूतनाथ की बात मानकर उस मामले को छिपा रखा, मगर शम्भू वगैरह इन्द्रदेव के शागिर्दो ने अपने मालिक से उस भेद को क्यों छिपाया?"

दलीपशाह--(एक लम्बी साँस लेकर) खुशामद और रुपया बड़ी चीज है। बस, इसी से समझ जाइये और मैं क्या कहूँ!

तेजसिंह-ठीक है, अच्छा तब क्या हुआ? भूतनाथ की कथा इतनी ही है, या और भी कुछ?

दलीपशाह-जी अभी भूतनाथ की कथा समाप्त नहीं हुई, अभी मुझे बहुत-कुछ कहना बाकी है। और बातों के सिवाय भूतनाथ से एक कसूर ऐसा हुआ है जिसका रंज भूतनाथ को इससे भी ज्यादा होगा।

तेजसिंह–सो क्या?

दलीपशाह–सो भी मैं अर्ज करता हूँ।

इतना कहकर दलीपशाह ने फिर कहना शुरू किया-

इस मामले को वर्षों बीत गये। मैं भूतनाथ की तरफ से कुछ दिनों तक बेफिक रहा, मगर जब यह मालूम हुआ कि भूतनाथ मेरी तरफ से निश्चिन्त नहीं है बल्कि मुझे इस दुनिया से उठा, बेफिक्र हुआ चाहता है तो मैं भी होशियार हो गया और दिन-रात अपने बचाव की फिक्र में डूबा रहने लगा। (भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, अब मैं वह हाल बयान करूँगा जिसकी तरफ उस दिन मैंने इशारा किया था, जब तुम हमें गिरफ्तार करके एक विचित्र पहाड़ी स्थान में ले गये थे और जिसके विषय में तुमने कहा था कि-"यद्यपि मैंने दलीपशाह की सूरत नहीं देखी है" इत्यादि। मगर क्या तुम इस समय भी...

भूतनाथ--(बात काटकर) भला मैं कैसे कह सकता हूँ कि मैंने दलीपशाह की सुरत नहीं देखी है जिसके साथ ऐसे-ऐसे मामले हो चुके हैं, मगर उस दिन मैंने तुम्हें भी धोखा देने के लिए वे शब्द कहे थे, क्योंकि मैंने तुम्हें पहचाना नहीं था। इस कहने से मेरा मतलब था कि अगर तुम दलीपशाह न होगे तो कुछ न कुछ जरूर बात बनाओगे। खैर, जो कुछ हुआ सो हुआ। मगर तुम वास्तव में अब उस किस्से को बयान करने वाले हो?

दलीपशाह--हां, मैं उसे जरूर बयान करूँगा।

भूतनाथ--मगर उसके सुनने से किसी को कुछ फायदा नहीं पहुंच सकता और न किसी तरह की नसीहत ही हो सकती है। वह तो महज मेरी नादानी और पागलपने की बात थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, उसे छोड़ देने से कोई हर्ज नहीं होगा।

दलीपशाह--नहीं, उसका बयान जरूरी जान पड़ता है। क्या तुम नहीं जानते या भूल गये कि उसी किस्से को सुनने के लिए कमला की भां, अर्थात् तुम्हारी स्त्री यहाँ आई हुई है?

भूतनाथ-ठीक है, मगर हाय! मैं सच्चा बदनसीब हूँ जो इतना होने पर भी उन्हीं बातों को

इन्द्रदेव--अच्छा-अच्छा, जाने दो भूतनाथ! अगर तुम्हें इस बात का शक है कि दलीपशाह बातें बनाकर कहेगा या उसके कहने का ढंग लोगों पर बुरा असर डालेगा तो

मैं दलीपशाह को वह हाल कहने से भी रोक दूंगा और तुम्हारे ही हाथ की लिखी हुई तुम्हारी अपनी जीवनी पढ़ने के लिए किसी को दूंगा जो इस सन्दूकड़ी में बन्द है।

इतना कहकर इन्द्रदेव ने वही सन्दूकड़ी निकाली जिसकी सूरत देखने ही से भूतनाथ का कलेजा काँपता था।

उस सन्दूकड़ी को देखते ही एक दफे तो भूतनाथ घबराया-सा होकर काँपा, मगर तुरन्त ही उसने अपने को सँभाल लिया और इन्द्रदेव की तरफ देख के बोला, "हाँ हाँ आप कृपा कर इस सन्दूकड़ी को मेरी तरफ बढ़ाइये, क्योंकि यह मेरी चीज है और मैं इसे लेने का हक रखता हूँ। यद्यपि कई ऐसे कारण हो गये हैं जिनसे आप कहेंगे कि यह सन्दूकड़ी तुम्हें नहीं दी जायगी, मगर फिर भी मैं इसी समय इस पर अपना कब्जा कर सकता हूँ, क्योंकि देवीसिंहजी मुझसे प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि सन्दूकड़ी बन्द की बन्द तुम्हें दिला दूंगा, अब देवीसिंहजी की प्रतिज्ञा झूठी नहीं हो सकती!" इतना कहकर भूतनाथ ने देवीसिंह की तरफ देखा।

देवीसिंह--(महाराज से) निःसन्देह मैं ऐसी प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।

महाराज--अगर ऐसा है तो तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी नहीं हो सकती। मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो।

इतना सुनते ही देवीसिंह उठ खड़े हुए, उन्होंने इन्द्रदेव के सामने से वह सन्दूकड़ी उठा ली और यह कहते हुए भूतनाथ के हाथ में दे दी, "लो मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता हूँ, तुम महाराज को सलाम करो जिन्होंने मेरी और तुम्हारी इज्जत रख ली।"

भूतनाथ–-(महाराज को सलाम करके) महाराज की कृपा से अब मैं जी उठा।

तेजसिंह--भूतनाथ, तुम यह निश्चय जानो कि यह सन्दूकड़ी अभी तक खोली नहीं गयी है, अगर सहज में खुलने लायक होती तो शायद खुल गयी होती।

भूतनाथ--(सन्दूकड़ी अच्छी तरह देख-भाल कर) बेशक यह अभी तक खुली नहीं है! मेरे सिवाय कोई दूसरा आदमी इसे बिना तोड़े खोल भी नहीं सकता। यह सन्दूकड़ी मेरी बुराइयों से भरी हुई है, या यों कहिये कि यह मेरे भेदों का खजाना है, यद्यपि इसमें के कई भेद खुल चुके हैं, खुल रहे हैं और खुलते जायेंगे, तथापि इस समय इसे ज्यों का त्यों बन्द पाकर मैं बराबर महाराज को दुआ देता हुआ यही कहूँगा कि मैं जी उठा, जी उठा, जी उठा! अब मैं खुशी से अपनी जीवनी कहने और सुनने के लिए तैयार हूँ और साथ ही इसके यह भी कह देता हूँ कि अपनी जीवनी के सम्बन्ध में जो कुछ कहूँगा, सच कहूंगा!

इतना कहकर भूतनाथ ने वह सन्दूकड़ी अपने बटुए में रख ली और पुनः हाथ जोड़कर महाराज से बोला, महाराज, मैं वादा कर चुका हूँ कि अपना हाल सच-सच वयान करूँगा, परन्तु मेरा हाल बहुत बड़ा और शोक, दुःख तथा भयंकर घटनाओं से भरा हुआ है। मेरे प्यारे मित्र इन्द्रदेवजी, जिन्होंने मेरे अपराधों को क्षमा कर दिया है, कहते हैं कि तेरी जीवनी से लोगों का उपकार होगा और वास्तव में बात भी ठीक ही है अतएव कई कठिनाइयों पर ध्यान देकर मैं नियमपूर्वक महाराज से एक महीने की मौहलत मांगता हूँ। इस बीच मैं अपना पूरा-पूरा हाल लिखकर पुस्तक के रूप में महाराज के सामने पेश करूंगा और सम्भव है कि महाराज उसे सुन-सुनाकर यादगार के तौर पर अपने खजाने में रखने की आज्ञा देंगे। इस एक महीने के बीच में मुझे भी सब बातें याद करके लिख लेने का मौका मिलेगा और मैं अपनी निर्दोष स्त्री तथा उन लोगों से जिन्हें देखने की भी आशा नहीं थी, परन्तु जो बहुत-कुछ दुःख भोगकर भी दोनों कुमारों की बदौलत इस समय यहाँ आ गये हैं और जिन्हें मैं अपना दुश्मन समझता था, मगर अब महाराज की कृपा से जिन्होंने मेरे कसूरों को माफ कर दिया है, मिल-जुलकर कई बातों का पता भी लगा लूंगा, जिससे मेरा किस्सा सिलसिलेवार और कायदे से हो जायगा।"

इतना कहकर भूतनाथ ने इन्द्रदेव, राजा गोपालसिंह, दोनों कुमारों और दलीपशाह वगैरह की तरफ देखा और तुरन्त ही मालूम कर लिया कि उसकी अर्जी कबूल कर ली जायगी।

महाराज ने कहा, "कोई चिन्ता नहीं, तब तक हम लोग कई जरूरी कामों से छुट्टी पा लेंगे।" राजा गोपालसिंह और इन्द्रदेव ने भी इस बात को पसन्द किया और इसके बाद इन्द्रदेव ने दलीपशाह की तरफ देखकर पूछा, "क्यों दलीपशाह, इसमें तुम लोगों को कोई उज्र तो नहीं है?"

दलीपशाह--(हाथ जोड़कर) कुछ भी नहीं, क्योंकि अब महाराज की आज्ञानुसार हम लोगों को भूतनाथ से किसी तरह की दुश्मनी भी नहीं रही और न यही उम्मीद है कि भूतनाथ हमारे साथ किसी तरह की खुटाई करेगा, परन्तु मैं इतना जरूर कहूँगा कि हम लोगों का किस्सा भी महाराज के सुनने लायक है और हम लोग भूतनाथ बाद अपना किस्सा भी सुनाना चाहते हैं।

महाराज--निःसन्देह तुम लोगों का किस्सा भी सुनने योग्य होगा और हम लोग उसके सुनने की अभिलाषा रखते हैं। यदि सम्भव हुआ तो पहले तुम्हीं लोगों का किस्सा सुनने में आवेगा। मगर सुनो दलीपशाह, यद्यपि भूतनाथ से बड़ी-बड़ी बुराइयाँ हो चुकी हैं और भूतनाथ तुम लोगों का भी कसूरवार है, परन्तु इधर हम लोगों के साथ भूतनाथ ने जो कुछ किया है, उसके लिए हम लोग इसके अहसानमन्द हैं और इसे अपना हितू समझते हैं।

इन्द्रदेव--बेशक-बेशक!

गोपाल सिंह-जरूर हम लोग इसके अहसान के बोझ से दबे हुए हैं।

दलीपशाह--मैं भी ऐसा ही समझता हूँ। भूतनाथ ने इधर जो-जो अनूठे काम किए हैं, उनका हाल कुँअर साहब की जुबानी हम लोग सुन चुके हैं। इसी खयाल से तथा कुंअर साहब की आज्ञा से हम लोगों ने सच्चे दिल से भूतनाथ का अपराध क्षमा ही नहीं कर दिया बल्कि कुअर साहब के सामने इस बात की प्रतिज्ञा भी कर चुके हैं कि भूतनाथ को दुश्मनी की निगाह से कभी न देखेंगे।

महाराज--बेशक, ऐसा ही होना चाहिए, अतः बहुत-सी बातों को सोचकर और इसकी कार गुजारी पर ध्यान देकर हमने इसके सब कसूर माफ करके इसे अपना ऐयार बना लिया है, आशा है कि तुम लोग भी इसे अपनायत की निगाह से देखोगे और पिछली बातों को बिल्कुल भूल जाओगे।

दलीपशाह-महाराज अपनी आज्ञा के विरुद्ध चलते हुए हम लोगों को कदापि न देखेंगे, यह हमारी प्रतिज्ञा है।

महाराज-(अर्जुनसिंह तथा दलीपशाह के दूसरे साथी की तरफ देख कर) तुम गों की जुबान से भी हम ऐसा ही सुनना चाहते हैं।

दलीपशाह का साथी—मेरी भी यही प्रतिज्ञा है और ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरे दिल में दुश्मनी के बदले दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करने वाली भूतनाथ की मुहब्बत पैदा करें।

महाराज-शाबाश! शाबाश!

अर्जुनसिंह-कुंअरसाहब के सामने मैं जो कुछ प्रतिज्ञा कर चुका हूँ उसे महाराज सुन चुके होंगे। इस समय महाराज के सामने भी शपथ खाकर कहता हूँ कि स्वप्न में भी भूतनाथ के साथ दुश्मनी का ध्यान आने पर मैं अपने को दोषी समझूगा।

इतना कहकर अर्जुनसिंह ने वह तस्वीर जो उसके हाथ में थी, फाड़ डाली और टुकड़े-टुकड़े करके भूतनाथ के आगे फेंक दी और पुनः महाराज की तरफ देखकर कहा, "यदि आज्ञा हो और बेअदबी न समझी जाय तो हम लोग इसी समय भूतनाथ से गले मिलकर अपने उदास दिल को प्रसन्न कर लें।"

महाराज-यह तो हम स्वयं कहने वाले थे।

इतना सुनते ही दोनों दलीपशाह, अर्जुनसिंह और भूतनाथ आपस में गले मिले और इसके बाद महाराज का इशारा पाकर एक साथ बैठ गये।

भूतनाथ-(दूसरे दलीपशाह और अर्जुनसिंह की तरफ देखकर) अब कृपा करके मेरे दिल का खटका मिटाओ और साफ-साफ बता दो कि तुम दोनों में से असल में अर्जुनसिंह कौन हैं? जब मैं दलीपशाह को बेहोश करके उस घाटी में ले गया था, तब तुम दोनों में से कौन महाशय वहाँ पहुँचकर दूसरे दलीपशाह बनने को तैयार हुए थे?

दूसरा दलीपशाह—(हंसकर) उस दिन मैं ही तुम्हारे पास पहुंचा था। इत्तिफाक से उस दिन मैं अर्जुनसिंह की सूरत बनकर बाहर घूम रहा था और जब तुम दलीपशाह को धोखा देकर ले चले तब मैंने छिपकर पीछा किया था। आज केवल धोखा देने को ही अर्जुनसिंह के रहते मैं अर्जुनसिंह बन कर दलीपशाह के साथ यहाँ आया हूँ।

इतना कहकर दूसरे दलीपशाह ने पास से गीला गमछा उठाया और अपने चेहरे का रंग पोंछ डाला जो उसने थोड़ी देर के लिए बनाया या लगाया था।

चेहरा साफ होते ही उसकी सूरत ने राजा गोपालसिंह को चौंका दिया और वह यह कहते हुए उसके पास चले गये कि "क्या आप भरतसिंहजी हैं, जिनके विषय में इन्द्रजीतसिंह ने हमें नकाबपोश बनकर इतिला दी थी?" और इसके जवाब में "जी हाँ" सुनकर वे भरतसिंह के गले से चिपट गये। इसके बाद उनका हाथ थामे हुए गोपालसिंह अपनी जगह पर चले आये और भरतसिंह को अपने पास बैठा कर महारज से

बोले, "इनके मिलने की मुझे हद से ज्यादा खुशी हुई, बहुत देर से मैं चाहता था। इनके विषय में कुछ पूर्वी!"

महाराज--मालूम होता है इन्हें भी दारोगा ही ने अपना शिकार बनाया था?

भरतसिंह--जी हां, आज्ञा होने पर मैं अपना हाल बयान करूंगा।

इन्द्रजीतसिंह--(महाराज से) तिलिस्म के अन्दर मुझे पांच कैदी मिले थे जिनमें से तीन तो यही अर्जुनसिंह, भरतसिंह और दलीपशाह हैं। इसके अतिरिक्त दे और हैं जो यहां बुलाये नही गये।दारोगा, मायारानी तथा उसके पक्ष वालों के सम्बन्ध में इन पांचों ही का किस्सा सुनने योग्य है। जब कैदियों का मुकदमा होगा, तब आप देखियेगा कि इन लोगों की सूरत देखकर कैदियों की क्या हालत होती है।

महाराज--वे दोनों कहां हैं?

इन्द्रजीतसिंह--इस समय यहां मौजूद नहीं हैं, छुट्टी लेकर अपने घर की अवस्था देखने गये हैं, दो-चार दिन में आ जायेंगे। भूतनाथ—-(इन्द्रदेव से) यदि आज्ञा हो तो मैं भी कुछ पूछू?

इन्द्रदेव--आप जो कुछ पूछेगे उसे मैं खूब जानता हूँ। मगर खैर, पूछिये।

भूतनाथ--कमला की मां आप लोगों को कहाँ से और क्योंकर मिली?

इन्द्रदेव--यह तो उसी की जुबानी सुनने में ठीक होगा। जब वह अपना किस्सा बयान करेगी, कोई बात छिपी न रह जायगी।

भूतनाथ--और नानक की मां तथा देवीसिंहजी की स्त्री के विषय में कब मालूम होगा?

इन्द्रदेव--वह भी उसी समय मालूम हो जायगा। मगर भूतनाथ, (मुस्कराकर)तुमने और देवीसिंह ने नकाबपोशों का पीछा करके व्यर्थ खटका और तरवुद खरीद लिया। यदि उनका पीछा न करते और पीछे से तुम दोनों को मालूम होता कि तुम्हारी स्त्रियाँ भी इस काम में शरीक हुई थीं, तो तुम दोनों को एक प्रकार की प्रसन्नता होती।प्रसन्नता तो अब भी होगी, मगर खटके और तरदुद से कुछ खून सुखा लेने के बाद!

इतना कहकर इन्द्रदेव हंस पड़े और इसके बाद सभी के चेहरों पर मुस्कराहट दिखाई देने लगी।

तेजसिंह--(मुस्कराते हुए देवीसिंह से) अब तो आपको भी मालूम हो ही गया होगा कि आपका लड़का तारासिंह कई विचित्र भेदों को आपसे क्यों छिपाता था?

देवीसिंह--जी हाँ, सब कुछ मालूम हो गया। जब अपने को प्रकट करने के पहले ही दोनों कुमारों ने भैरोंसिंह और तारासिंह को अपना साथी बना लिया, तो हम लोग जहां तक आश्चर्य में डाले जाते, थोड़ा था! देवीसिंह की बात सुनकर पुनः सभी ने मुस्करा दिया और अब दरबार का रंग-ढंग ही कुछ दूसरा हो गया अर्थात् तरदुद के बदले सभी के चेहरे पर हंसी और मुस्कराहट दिखाई देने लगी।

तेजसिंह--(भूतनाथ से) भूतनाथ, आज तुम्हारे लिए बड़ी खुशी का दिन है, क्योंकि और बातों के अतिरिक्त तुम्हारी नेक और सती स्त्री भी तुम्हें मिल गई।जिसे तुम मरी समझते थे और हरनामसिंह तुम्हारा लड़का भी तुम्हारे पास बैठा हुआ दिखाई देता है। जो बहुत दिनों से गायब था और जिसके लिए बेचारी कमला बहुत परेशान थी, जब वह हरनामसिंह का हाल सुनेगी, तो बहुत ही प्रसन्न होगी।

भूतनाथ--निःसन्देह ऐसा ही है, परन्तु मैं हरनामसिंह के सामने भी एक संदूकड़ी देखकर डर रहा हूँ कहीं यह भी मेरे लिए कोई दुःख-दर्द सामान लेकर न आया हो?

इन्द्रदेव--(हँस कर) भूतनाथ, अब तुम अपने दिल को व्यर्थ के खटकों में न डालो, जो कुछ होना था, सो हो गया। अब तुम पूरे तौर पर महाराज के ऐयार हो गये,किसी की मजाल नहीं कि तुम्हें किसी तरह की तकलीफ दे सके और महाराज भी तुम्हारे बारे में किसी तरह की शिकायत नहीं सुनना चाहते! हरनामसिंह तो तुम्हारा लड़का ही है, वह तुम्हारे साथ बुराई क्यों करने लगा?

इसी समय महाराज सुरेन्द्र सिंह ने जीतसिंह की तरफ देखकर कुछ इशारा किया और जीतसिंह ने इन्द्रदेव से कहा, "भूतनाथ का मामला तो अब तय हो गया इसके बारे में महाराज किसी तरह की शिकायत सुनना नहीं चाहते। इसके अतिरिक्त भूतनाथ ने वायदा किया है कि अपनी जीवनी लिख कर महाराज के सामने पेश करेगा। अतः अब रह गये दलीपशाह, अर्जुन सिंह और भरतसिंह तथा कमला की मां। इन सभी पर जो कुछ मुसीबतें गुजरी हैं, उसे महाराज सुनना चाहते हैं। परन्तु अभी नहीं, क्योंकि विलम्ब बहुत हो गया। अब महाराज आराम करेंगे। अतः अब दरबार बर्खास्त करना चाहिए जिसमें ये लोग भी आपस में मिल-जुलकर अपने दिल की कुलफत निकाल लें, क्योंकि अब यहाँ तो किसी से मिलने में अथवा आपस का बर्ताव करने में परहेज न होना चाहिए।"

इन्द्रजीतसिंह-(हाथ जोड़ कर) जो आज्ञा!

दरबार बर्खास्त हुआ। इन्द्रदेव की इच्छानुसार महाराज आराम करने के लिए जीतसिंह को साथ लिए एक दूसरे कमरे में चले गये। इसके बाद और सब कोई उठे और और अपने-अपने ठिकाने पर, जैसाकि इन्द्रदेव ने इन्तजाम कर दिया था, चले गये मगर कई आदमी जो आराम नहीं करना चाहते थे, वे बँगले के बाहर निकलकर बगीचे की तरफ रवाना हुए।

५

एक सुन्दर पायों वाली मसहरी पर महाराज सुरेन्द्रसिंह लेटे हुए हैं। ऐयारों के सरताज जीतसिंह उसी मसहरी के पास फर्श पर बैठे तथा दाहिने हाथ से मसहरी पर ढासना लगाये धीरे-धीरे बातें कर रहे हैं।

महाराज-- इन्द्रदेव का स्थान बहुत ही सुन्दर और रमणीक है, यहां से जाने को जी नहीं चाहता।

जीतसिंह--ठीक है, इस स्थान की तरह इन्द्रदेव का बर्ताव भी चित्त को प्रसन्न करता है, परन्तु मेरी राय यही है कि तक जहाँ जल्द हो यहाँ से लौट चलना चाहिए।

महाराज--हम भी यही सोचते हैं। इन लोगों की जीवनी और आश्चर्य-भरी कहानी तो वर्षों तक सुनते ही रहेंगे। परन्तु इन्द्रजीत और आनन्दसिंह की शादी जहाँ तक हो सके जल्द कर देनी चाहिए, जिसमें और किसी तरह के विघ्न पड़ने का फिर डर न रहे।

जीतसिंह--जरूर ऐसा होना चाहिए, इसीलिए मैं चाहता हूँ कि यहाँ से जल्द चलिए। भरतसिंह वगैरह की कहानी वहाँ ही सुन लेंगे या शादी के बाद और लोगों को भी यहाँ ले आवेंगे, जिसमें वे लोग भी तिलिस्म और इस स्थान का आनन्द ले लें।

महाराज--अच्छी बात है, खैर अब यह बताओ कि कमलिनी और लाडिली के विषय में भी तुमने कुछ सोचा?

जीतसिंह--उन दोनों के लिए जो कुछ आप विचार रहे हैं, वही मेरी भी राय है। उनकी भी शादी दोनों कुमारों के साथ ही कर देनी चाहिए।

महाराज--है न यही राय

जीतसिंह--जी हाँ, मगर किशोरी और कामिनी की शादी के बाद। क्योंकि किशोरी एक राजा की लड़की है, इसलिए उसी की औलाद को गद्दी का हकदार होना चाहिए। यदि कमलिनी के साथ पहले शादी हो जायगी तो उसी का लड़का गद्दी का मालिक समझा जायगा, इसी से मैं चाहता हूँ कि पटराना किशोरी ही बनाई जाय।

महाराज--यह बात तो ठीक है, अतः ऐसा ही होगा और साथ ही इसके कमला की शादी भैरों के साथ और इन्दिरा की तारा के साथ कर दी जायगी।

जीतसिंह--जो मर्जी।

महाराज--अच्छा तो अब यही निश्चय रहा दलीपशाह और भरतसिंह की बीती यहाँ से चलने के बाद घर पर ही सुननी चाहिए।

जीतसिंह--जी हाँ, सच तो यों है कि ऐसा करना ही पड़ेगा, क्योंकि इन लोगों की कहानी दारोगा और जयपाल इत्यादि कैदियों से घना सम्बन्ध रखती है, बल्कि यों कहना चाहिए कि इन्हीं लोगों के इजहार पर उन लोगों के मुकदमे का दारोमदार (हेस नेस) है और यही लोग उन कैदियों को लाजवाब करेंगे।

महाराज--निःसन्देह ऐसा ही है, इसके अतिरिक्त उन कैदियों ने हम लोगों तथा हमारे सहायकों को बड़ा दुःख दिया है और दोनों कुमारों की शादी में भी बड़े-बड़े विघ्न डाले हैं। अतएव उन कम्बख्तों को कुमारों की शादी का जलसा भी दिखा देना चाहिए, जिसमें ये लोग भी अपनी आँखों से देख लें कि जिन बातों को वे बिगाड़ना चाहते थे, वे आज कैसी खूबी और खुशी के साथ हो रही हैं, इसके बाद उन लोगों को सजा दी जानी चाहिए। मगर अफसोस तो यह है कि मायारानी और माधवी जमानिया में ही मार डाली गई, नहीं तो वे दोनों भी देख लेतीं कि...

जीतसिंह--खैर, उनकी किस्मत में यही बदा था,

महाराज--अच्छा, तो एक बात का और खयाल करना चाहिए।

जीतसिंह--आज्ञा?

महाराजा--भूतनाथ वगैरह को मौका देना चाहिए कि वे अपने सम्बन्धियों से बखूबी मिल-जुल कर अपने दिल का खटका निकाल लें, क्योंकि हम लोग तो उनका हाल वहाँ चल कर ही सुनेंगे।

जीतसिंह--बहुत खूब।

इतना कहकर जीतसिंह उठ खड़े हुए और कमरे से बाहर चले गये।

६

इन्द्रदेव के इस स्वर्ग-तुल्य स्थान में बंगले से कुछ दूर हट कर बगीचे के दक्खिन तरफ एक घना जामुन का पेड़ है, जिसे सुन्दर लताओं ने घेर कर देखने योग्य बना रखा है और वहाँ एक कुंज की-सी छटा दिखाई पड़ती है। उसी के नीचे साफ पानी का एक चश्मा भी बह रहा है। अपनी सुरीली बोली से लोगों के दिल लुभा लेने वाली चिड़ियाएँ संध्या का समय निकट जान अपने घोंसलों के चारों तरफ फुदक-फुदक कर अपने चुलबुले बच्चों को चैतन्य करती हुई कह रही हैं, "देखो, मैं बहुत दूर से तुम लोगों के लिए दाना-पानी अपने पेट में भर लाई हूँ, जिससे तुम्हारी सन्तुष्टि हो जायगी।"

यह रमणीक स्थान ऐसा है कि यहाँ दो-चार आदमी छिप कर इस तरह बैठ सकते हैं कि वे चारों तरफ के आदमियों को बखूबी देख लें, पर उन्हें कोई भी न देखे। इस स्थान पर हम इस समय भूतनाथ और उसकी पहली स्त्री, (कमला की माँ) को पत्थर की चट्टानों पर बैठे बातें करते हुए देख रहे हैं। ये दोनों मुद्दत के बिछड़े हुए हैं, और दोनों के दिल में नहीं तो कमला की माँ के दिल में जरूर शिकायतों का खजाना भरा हुआ है जिसे वह इस समय बेतरह उगलने के लिए तैयार है। प्यारे पाठक, आइये हम आप मिलकर जरा इन दोनों की बातें तो सुन लें

भूतनाथ--शान्ता', आज तुमसे मिलकर मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ।

शान्ता--क्यों? जो चीज किसी कारणवश खो जाती है, उसे यकायक पाने से प्रसन्नता हो सकती है, मगर जो चीज जान-बूझ कर फेंक दी जाती है, उसके पाने की प्रसन्नता कैसी?

भूतनाथ--किसी को कहीं से एक पत्थर का टुकड़ा मिल जाय और वह उसे बेकार या बदसूरत समझ कर फेंक दें तथा कुछ समय के बाद जब उसे यह मालूम हो कि वास्तव में वह हीरा था पत्थर नहीं, तो क्या उसके फेंक देने का उसको दुःख न होगा? या उसे पुनः पाकर प्रसन्नता न होगी?

शान्ता-–अगर वह आदमी, जिसने हीरे को पत्थर समझकर फेंक दिया है, यह जानकर कि वह वास्तव में हीरा था, उसकी खोज करे, या इस विचार से कि उसे मैंने

फलां जगह छोड़ा या फेंका है वहां जाने से जरूर मिल जायेगा, उसकी तरफ दौड़ जाय,तो बेशक समझा जायगा कि उसे उसके फेंक देने का रंज हुआ था और उसके मिल जाने से प्रसन्नता होगी, लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो नहीं।

भूतनाथ--ठीक है, मगर वह आदमी उस जगह, जहाँ उसने हीरे को पत्थर समझकर फेंका, था पुनः उसे पाने की आशा में तभी जायगा जब अपना जाना सार्थक समझेगा। परन्तु जब उसे यह निश्चय हो जायगा कि वहां जाने में उस हीरे के साथ तू भी बर्बाद हो जायगा, अर्थात् वह हीरा भी काम का न रहेगा और तेरी भी जान जाती रहेगी, तब वह उसकी खोज में क्यों जायगा?

शान्ता--ऐसी अवस्था में वह अपने को इस योग्य बनावेगा ही नहीं कि वह उस हीरे की खोज में जाने लायक न रहे, यदि यह बात उसके हाथ में होगी और वह उस हीरे को वास्तव में हीरा समझता होगा।

भूतनाथ-–बेशक, मगर शिकायत की जगह तो ऐसी अवस्था में हो सकती थी जब वह अपने बिगड़े हुए कॅटीले रास्ते की, जिसके सबब से वह उस हीरे तक नहीं पहुंच सकता था, पुनः सुधारने और साफ करने के लिए परले सिरे का उद्योग करता हुआ दिखाई न देता।

शान्ता--ठीक है, लेकिन जब वह हीरा यह देख रहा है कि उसका अधिकारी या मालिक बिगड़ी हुई अवस्था में भी एक मानिक के टुकड़े को कलेजे से लगाए हुए घूम रहा है और यदि वह चाहता तो उस हीरे को भी उसी तरह रख सकता था, मगर अफसोस, उस हीरे की तरफ जो वास्तव में पत्थर ही समझा गया है, कोई भी ध्यान नहीं देता जो बे-हाथ-पैर का होकर भी उसी मालिक की खोज में जगह-जगह की धूल छानता फिर रहा है जिसने जान-बूझकर उसे पैर में गड़ने वाले कंकड़ की तरह अपने आगे से उठाकर फेंक दिया है और जानता है कि उस पत्थर के साथ, जिसे वह व्यर्थ ही में हीरा कह रहा है, वास्तव में छोटी-छोटी हीरे की कनियां भी चिपकी हुई हैं जो छोटी होने के कारण सहज ही मिट्टी में मिल जा सकती हैं, तब क्या शिकायत की जगह नहीं है!

भूतनाथ--परन्तु अदृष्ट भी कोई वस्तु है, प्रारब्ध भी कुछ कहा जाता है और होनहार भी किसी चीज का नाम है!

शान्ता-—यह दूसरी बात है, इन सभी का नाम लेना वास्तव में निरुत्तर (लाजवाब) होना और चलती बहस को जान-बूझकर बंद कर देना ही नहीं है बल्कि उद्योग ऐसे अनमोल पदार्थ की तरफ से मुंह फेर लेना भी है। अतः जाने दीजिए मेरी यह इच्छा भी नहीं है कि आपको परास्त करने की अभिलाषा से मैं विवाद करती ही जाऊँ,यह तो बात-ही-बात में कुछ कहने का मौका मिल गया और छाती पर पत्थर रखकर जी का उबाल निकाल लिया, नहीं तो जरूरत ही क्या थी।

भूतनाथ--मैं कसूरवार हूँ ओर बेशक कसूरवार हूँ, मगर यह उम्मीद भी तो न थी कि ईश्वर की कृपा से तुम्हें इस दुनिया में इस तरह जीती देखेंगा।

शान्ता--अगर यही आशा या अभिलाषा होती तो अपने परलोकगामी होने की खबर मुझ अभागी के कानों तक पहुँचाने की कोशिश क्यों करते और ...

भूतनाथ--बस-बस, अब मुझ पर दया करो और इस ढंग की बातें छोड़ दो क्योंकि आज बड़े भाग्य से मेरे लिए यह खुशी का दिन नसीब हुआ है। इसे जली-कटी बातें सुनाकर पुनः कड़वा न करो और यह सुनाओ कि तुम इतने दिनों तक कहाँ छिपी हुई थी और अपनी लड़की कमला को किस तरह धोखा देकर चली गई कि आज तक वह तुमको मरी हुई ही समझती है?

इस समय शान्ता का खूबसूरत चेहरा नकाब से ढका हुआ नहीं है। यद्यपि वह जमाने के हाथों सताई हुई तथा दुबली-पतली और उदास है और उसका तमाम बदन पीला पड़ गया है मगर फिर भी आज की यह खुशी उसके सुन्दर बादामी चेहरे पर रौनक पैदा कर रही है और इस बात की इजाजत नहीं देती कि कोई उसे ज्यादा उम्रवाली कह कर खूबसूरतों की पंक्ति में बैठने से रोके। हजार गई-गुजरी होने पर भी वह रामदेई (भूतनाथ की दूसरी स्त्री) से बहुत अच्छी मालूम पड़ती है और इस बात को भूतनाथ भी बड़े गौर से देख रहा है। भूतनाथ की आखिरी बात सुनकर शान्ता ने अपनी डबडबाई हुई बड़ी-बड़ी आँखों को आँचल से साफ किया और एक लम्बी साँस ले कर कहा-

शान्ता--मैं रणधीरसिंह जी के यहाँ से कभी न भागती अगर अपना मुंह किसी को दिखाने लायक समझती। मगर अफसोस, आपके भाई ने इस बात को खूब अच्छी तरह मशहूर किया कि आपके दुश्मन (अर्थात् आप) इस दुनिया से उठ गये। इसके सबूत में उन्होंने बहुत सी बातें पेश कीं, मगर मुझे विश्वास न हुआ, तथापि इस गम में मैं बीमार हो गई और दिन-दिन मेरी बीमारी बढ़ती ही गई। उसी जमाने में मेरी मौसेरी बहिन अर्थात् दलीपशाह की स्त्री मुझे देखने के लिए मेरे घर आई। मैंने अपने दिल का हाल और बीमारी का सबब उससे बयान किया और यह भी कहा कि जिस तरह मेरे पति ने सही-सलामत रह कर भी अपने को मरा मशहूर किया, उसी तरह मुझे तुम कहीं छिपा कर मरा हुआ मशहूर कर दो। अगर ऐसा हो जायगा तो मैं अपने पति को ढूंढ निकालने का उद्योग करूँगी। उन्होंने मेरी बात पसन्द कर ली और लोगों को यह कहकर कि मेरे यहाँ की आबोहवा अच्छी है वहाँ शान्ता को बहुत जल्द ही आराम हो जायगा, मुझे अपने यहाँ उठा ले जाने का बन्दोबस्त किया और रणधीरसिंहजी से इजाजत भी ले ली। मैं दो दिन तक अपनी लड़की कमला को नसीहत करती रही और इसके बाद उसे किशोरी के हवाले करके और अपनी छोटे दूध-पीते बच्चे को गोद में लेकर दलीपशाह के घर चली आई और धीरे-धीरे आराम होने लगी। थोड़े ही दिन बाद दलीपशाह के घर में उस भयानक आधी रात के समय आपका आना हुआ, मगर हाय, उस समय आपकी अवस्था पागलों की सी हो रही थी और आपने धोखे में पड़कर अपने प्यारे लड़के का, जिसे मैं अपने साथ ले गई थी, खून कर डाला।

इतना कहते-कहते शान्ता का जी भर आया और वह हिचकियाँ ले-लेकर रोने

लगी। भूतनाथ की बुरी अवस्था हो रही थी और इससे ज्यादे वह उस भयानक घटना का हाल नहीं सुनना चाहता था। वह यह कहता हुआ कि 'बस माफ करो, अब इसका जिक्र न करो' अपनी स्त्री शान्ता के पैरों पर गिरा ही चाहता था कि उसने पैर खींचकर भूतनाथ का सिर थाम लिया और कहा-'हाँ-हाँ, यह क्या करते हो? क्यों मेरे सिर पर पाप चढ़ाते हो? मैं खूब जानती हूँ कि आपने उसे बिलकुल नहीं पहचाना मगर इतना जरूर समझते थे कि वह दलीपशाह का लड़का है, अतः फिर भी आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था, खैर अब मैं इस जिक्र को छोड़ देती हूँ।"

इतना कहकर शान्ता ने अपने आँसू पोंछे और फिर इस तरह बयान करना शुरू किया-

"शोक और दुःख से मैं पुनः बीमार पड़ गई, मगर आशा-लता ने धीरे-धीरे कुछ दिन में अपनी तरह मुझे भी (आराम) कर दिया। यह आशा केवल इसी बात की थी कि एक दफे आपसे जरूर मिलूंगी। मुश्किल तो यह थी कि उस घटना ने दलीपशाह को भी आपका दुश्मन बना दिया था, केवल उस घटना ने ही नहीं, इसके अतिरिक्त भी दलीपशाह को बर्बाद करने में आपने कुछ उठा न रक्खा था, यहाँ तक कि आखिर वह दारोगा के हाथ फंस ही गये।"

भूतनाथ—-(बेचैनी के साथ लम्बी साँस लेकर) ओफ! मैं कह चुका हूँ कि इन बातों को मत छेड़ो, केवल अपना हाल बयान करो, मगर तुम नहीं मानतीं!

शान्ता--नहीं-नहीं, मैं तो अपना ही हाल बयान कर रही हूँ, खैर, मुख्तसिर ही में कहती हूँ।

उस घटना के बाद ही मेरी इच्छानुसार दलीपशाह ने मेरा और बच्चे का मर जाना मशहूर किया जिसे सुनकर हरनामसिंह और कमला भी मेरी तरफ से निश्चिन्त हो गये। जब खुद दलीपशाह भी दारोगा के हाथ में फंस गये, तब मैं बहुत ही परेशान हुई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। उस समय दलीपशाह के घर में उनकी स्त्री, एक छोटा सा बच्चा और मैं, केवल ये तीन ही आदमी रह गये थे। दलीपशाह की स्त्री को मैंने धीरज धराया और कहा कि अभी तू अपनी जान मत बर्बाद कर, मैं बराबर तेरा साथ दूंगी और दलीपशाह को खोज निकालने का उद्योग करूँगी मगर अब हमलोगों को यह घर एकदम छोड़ देना चाहिए और ऐसी जगह छिपकर रहना चाहिए जहाँ दुश्मनों को हम लोगों का पता न लगे। आखिर ऐसा ही हुआ, अर्थात् हम लोगों की जो कुछ जमा-पूँजी थी उसे लेकर हमने उस घर को एक दम छोड़ दिया और काशीजी में जाकर एक अँधेरी गली में पुराने और गंदे मकान में डेरा डाला, मगर इस बात की टोह लेते रहे कि दलीपशाह कहाँ हैं अथवा छूटने के बाद अपने घर की तरफ जा कर हम लोगों को ढूंढ़ते हैं या नहीं। इस फिक्र में मैं कई दफे सूरत बदल कर बाहर निकली और इधर-उधर घूमती रही। इत्तिफाक से दिल में यह बात पैदा हुई कि किसी तरह अपने लड़के हरनामसिंह से छिप कर मिलना और उसे अपना साथी बना लेना चाहिए। ईश्वर ने मेरी यह मुराद पूरी की। जब माधवी कुंअर इन्द्रजीतसिंह को फंसा ले गई और उसके बाद उसने किशोरी पर भी कब्जा कर लिया, तब कमला और हरनाम सिंह दोनों आदमी किशोरी की खोज में निकले और वे एक-दूसरे से जुदा हो गये। किशोरी की खोज में हरनामसिंह काशी की गलियों में घूम रहा था जब उस पर मेरी निगाह पड़ी और मैंने इशारे से अलग बुला कर अपना परिचय दिया। उस को मुझसे मिलकर जितनी खुशी हुई उसे मैं बयान नहीं कर सकती। मैं उसे अपने घर में ले गई और सब हाल उससे कह अपने दिल का इरादा जाहिर किया जिसे उसने खुशी से मंजूर कर लिया। उस समय मैं चाहती तो कमला को भी अपने पास बुला लेती, मगर नहीं, उसे किशोरी की मदद के लिए छोड़ दिया क्योंकि किशोरी के नमक को मैं किसी तरह भूल नहीं सकती थी, अतः मैंने केवल हरनामसिंह को अपने पास रख लिया और खुद चुपचाप अपने घर मैं बैठी रहकर आपका और दलीपशाह का पता लगाने का काम लड़के को सुपुर्द किया। बहुत दिनों तक बेचारा लड़का चारों तरफ मारा फिरा और तरह-तरह की खबरें ला कर मुझे सुनाता रहा। जब आप प्रकट होकर कमलिनी के साथी बन गए और उसके काम के लिए चारों तरफ घूमने लगे तब हरनामसिंह ने भी आपको देखा और पहचान कर मुझे इतिला दी। थोड़े दिन बाद यह भी उसी की जुबानी मालूम हुआ कि अब आप नेकनाम होकर दुनिया में अपने को प्रकट किया चाहते हैं। उस समय मैं बहुत प्रसन्न हुई और मैंने हरनाम को राय दी कि तू किसी तरह राजा वीरेन्द्र सिंह के किसी ऐयार की शागिर्दी कर ले। आखिर वह तारासिंह से मिला और उसके साथ रह कर थोड़े ही दिनों में उसका प्यारा शागिर्द बल्कि दोस्त बन गया तब उसने अपना हाल तारासिंह को कह सुनाया और तारासिंह ने भी उसके साथ बहुत अच्छा प्यार का बर्ताव करके उसकी इच्छानुसार उसके भेदों को छिपाया। तब से हरनामसिंह सूरत बदले हुए तारासिंह का काम करता रहा और मुझे भी आपकी पूरी-पूरी खबर मिलती रही। आपको शायद इस बात की खबर न हो कि तारासिंह की माँ चम्पा से और मुझसे बहिन का रिश्ता है, वह मेरे मामा की लड़की है, अत: चम्पा ने अपने लड़के की जुबानी हरनामसिंह का हाल सुना और जब यह मालूम हुआ कि वह रिश्ते में उसका भतीजा होता है, तब उसने भी उस पर दया प्रकट की और तब से उसे बराबर अपने लड़के की तरह मानती रही।

जमानिया के तिलिस्म को खोलते और कैदियों को साथ लिए हुए जब दोनों कुमार उस खोह वाले तिलिस्मी बंगले में पहुँचे तो उन्होंने भैरोंसिंह और तारासिंह को अपने पास बुला लिया और तिलिस्म का पूरा हाल उनसे कह के उन दोनों को अपने पास रक्खा। दलीपशाह को यह हाल भी तारासिंह ही से मालूम हुआ कि उनके बाल-बच्चे ईश्वर की कृपा से अभी तक राजी-खुशी हैं, साथ ही इसके मेरा हाल भी दलीपशाह को मालूम हुआ। उस समय तारासिंह दोनों कुमारों से आज्ञा लेकर हरनामसिंह को उस बँगले में ले आया और दलीपशाह से उसकी मुलाकात कराई। हरनामसिंह को साथ लेकर दलीपशाह काशी गये और वहाँ से मुझको तथा अपनी स्त्री और लड़के को साथ लेकर कुमार के पास चले आये। जब तारासिंह की जबानी चम्पा ने यह हाल सुना तब वह मुझसे मिलने के लिए तारासिंह के साथ यहाँ अर्थात् उस बँगले में आई।

भूतनाथ-जब दोनों कुमार नकाबपोश बन कर भैरोंसिंह और तारासिंह को यहाँ ले आए, उसके पहले तो तारासिंह यहाँ नहीं आए थे?

शान्ता-जी उसके पहले ही से वे दोनों यहां आते जाते रहे, उस दिन तो प्रकट रूप से यहाँ लाए गये थे। क्या इतना हो जाने पर भी आपको अन्दाज से मालूम न हुआ?

भूतनाथ--ठीक है, इसका शक तो मुझे और देवीसिंह को भी होता रहा।

शान्ता का किस्सा भूतनाथ ने बड़े गौर के साथ ध्यान देकर सुना और तब देर तक आरजू-मिन्नत के साथ शान्ता माफी मांगता रहा और इसके बाद पुनः दोनों में बातचीत होने लगी।

शान्ता--अब तो आपको मालूम हो गया कि चम्पा यहाँ क्यों कर और किस लिए आई?

भूतनाथ--हाँ, यह भेद तो खुल गया मगर इसका पता न लगा कि नानक और उसकी मां का यहाँ आना कैसे हुआ?

शान्ता--सो मैं न कहूँगी, यह उसी से पूछ लेना।

भूतनाथ--(ताज्जुब से) सो क्यों?

शान्ता--मैं उसके बारे में कुछ कहना ही नहीं चाहती!

भूतनाथ--आखिर इसका कोई सबब भी है?

शान्ता--सबब यही है कि उसकी यहाँ कोई इज्जत नहीं है बल्कि वह बेकदरी की निगाह से देखी जाती है।

भूतनाथ--वह है भी इसी योग्य! पहले तो मैं उसे प्यार करता था, मगर जब यह सुना कि उसी की बदौलत मैं जैपाल (नकली बलभद्र) का शिकार बन गया और एक भारी आफत में फंस गया, तब से मेरी तबीयत उससे खट्टी हो गई।

शान्ता--सो क्यों?

भूतनाथ--इसीलिए कि वह बेगम की गुप्त सहेली नन्हीं से गहरी मुहब्बत रखती है। और इसी सबब से वह कागज का मुट्ठा जो मैंने अपने फायदे के लिए तैयार किया था, गायब हो के जैपाल के हाथ लग गया और उससे मुझे नुकसान पहुँचा। इस बात का सबूत भी मैंने अपनी आँखों से देख लिया।

शान्ता--सो ठीक है, मैं भी दलीपशाह से यह बात सुन चुकी हूँ।

भूतनाथ--इसी से अब मैं उसे अपनी स्त्री नहीं बल्कि दुश्मन समझता हूँ। केवल नन्हीं से ही नहीं बल्कि कम्बख्त गौहर से भी वह दोस्ती रखती थी और वह दोस्ती पाक न थी। (लम्बी साँस लेकर) अफसोस! इसी से उस खोटी का लड़का नानक भी खोटा ही निकला।

शान्ता--(मुस्कुराकर) तब आप उसके लिए इतना परेशान क्यों थे? क्योंकि यह बात सुनने बाद ही तो आपने उसे नकाबपोशों के स्थान पर देखा था!

भूतनाथ--वह परेशानी मेरी उसकी मुहब्बत के सबब से न थी बल्कि इस खयाल से थी कि कहीं वह मुझ पर कोई नई आफत लाने के लिए तो नकाबपोशों से नहीं आ

शान्ता--मिली।

शान्ता–-ठीक भी है, यह खयाल हो सकता था।

भूतनाथ--फिर इसी बीच में जब उसने मुझे जंगल में गाना सुना के धोखा दिया और गिरफ्तार करके अपने स्थान पर ले गई, जिसका हाल शायद तुम्हें मालूम होगा, तब मेरा रंज और भी बढ़ गया।

शान्ता--यह हाल मुझे मालूम है मगर यह कार्रवाई उसकी न थी, बल्कि इन्द्रदेव की थी। उन्होंने ही आपके साथ यह ऐयारी की थी और उस दिन जंगल में घोड़े पर सवार जो औरत आपको मिली थी और जिसे आपने अपनी स्त्री समझा था, वह भी इन्द्रदेव का एक ऐयार ही था। यह बात मैं उन्हीं (इन्द्रदेव) की जुबानी सुन चुकी हूँ, शायद आपसे भी वे कहें। हाँ, उस दिन बँगले में जिस औरत को आपने देखा था, वह बेशक नानक की माँ थी। वह तो खुद कैदियों की तरह यहाँ रक्खी गई है, मैदान की हवा क्योंकर खा सकती है! दोनों कुमार नहीं चाहते थे कि प्रकट होने के पहले ही कोई उन लोगों का पता लगा ले इसीलिए ये सब खेल खेले गये। (कुछ सोचकर) आखिर आपने धीरे-धीरे नानक की माँ का हाल पूछ ही लिया, मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं कहना चाहती थी, अतः अब इससे आगे और कुछ भी न कहूँगी, आप उसके बारे में मुझसे कुछ न पूछे।

भूतनाथ--नहीं-नहीं, जब इतना बता चुकी हो तो कुछ और भी बताओ क्योंकि मैं उससे मिलकर कुछ भी नहीं पूछना चाहता, बल्कि अब तो उसका मुंह देखना भी मुझे पसन्द नहीं है। अच्छा, यह तो बताओ कि वह कम्बख्त यहाँ क्यों लाई गई?

शान्ता--लाई नहीं गई, बल्कि उसी नन्हीं के यहाँ गिरफ्तार की गई, उस समय नानक भी उसके साथ था।

भूतनाथ--(आश्चर्य और क्रोध से) फिर भी उसी नन्हीं के यहाँ गई थी?

शान्ता--जी हाँ।

भूतनाथ--(लम्बी साँस लेकर) लोग सच कहते हैं कि ऐयाशी का नतीजा बहुत बुरा निकलता है।

शान्ता-–अतः अब उसके बारे में मुझसे कुछ न पूछिए, इन्द्रदेवजी आपको सब-

भूतनाथ-–हाँ, ठीक है, खैर, अब उसके बारे में कुछ न पूछूगा, जो कुछ पूछूगा वह तुम्हारे और हरनाम ही के बारे में होगा। अच्छा, एक बात और बताओ, आज के दरबार में मैंने हरनाम को हाथ में एक सन्दूकड़ी लिए देखा था। वह सन्दूकड़ी कंसी थी और उसमें क्या था?

शान्ता--उसमें दारोगा के हाथ की लिखी हुई बहुत-सी चिट्ठियाँ हैं जिनके देखने से आपको निश्चय हो जायगा कि आपने दलीपशाह को व्यर्थ ही अपना दुश्मन समझ लिया था। पहले जब दारोगा ने दलीपशाह को लालच दिखा कर लिखा था कि वह आपको गिरफ्तार करा दें, तब दो-चार चिट्ठियों में तो दलीपशाह ने इस नीयत से कि कुछ बता देंगे।

दारोगा की शैतानियों का सबूत उससे मिलकर ही बटोर लें, दारोगा के मतलब ही का जवाब दिया था जिससे खुश होकर उसने कई चिट्ठियों में दलीपशाह को तरह-तरह के सब्जबाग दिखलाए, मगर जब दारोगा की कई चिट्ठियां दलीपशाह ने बटोर ली तब साफ जवाब दे दिया। उस समय दारोगा बहुत घबराया और उसने सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि दलीपशाह मुझसे दुश्मनी करके मेरा यह भेद खोल दे, अतः किसी तरह उसे गिरफ्तार कर लेना चाहिए। उस समय कम्बख्त दारोगा आपसे मिला और उसने दलीप-शाह की पहली चिट्ठियाँ आपको दिखा कर खुद आप ही को दलीपशाह का दुश्मन बना दिया, बल्कि आप ही के जरिये से दलीपशाह को गिरफ्तार भी करा लिया।

भूतनाथ-ठीक है, इस विषय में मैंने बहुत बड़ा धोखा खाया।

शान्ता-मगर दलीपशाह को गिरफ्तार कर लेने पर भी वे चिट्ठियाँ दारोगा के हाथ न लगी क्योंकि वे दलीपशाह की स्त्री के कब्जे में थीं। हम लोग उन्हें अपने साथ लाये हैं जिसमें दारोगा के मुकदमे में पेश करें।

भूतनाथ-अब मेरे दिल का पूरा खुटका निकल गया और मुझे निश्चय हो गया कि हरनाम की कोई कार्रवाई मेरे खिलाफ न होगी।

शान्ता-भला वह कोई काम ऐसा क्यों करेगा जिससे आपको तकलीफ हो? ऐसा खयाल भी आपको न रखना चाहिए। इन दोनों में इस तरह की बातें हो रही थी कि किसी के आने की आहट मालूम हुई। भूतनाथ ने जब घूमकर देखा तो नानक पर निगाह पड़ी। जब वह पास आया तब भूतनाथ ने उससे पूछा, "क्या चाहते हो?"

नानक-मेरी माँ आपसे मिलना चाहती हैं।

भूतनाथ-तो यहाँ पर क्यों न चली आई? यहाँ कोई गैर तो था नहीं।

नानक-सो तो वही जानें।

भूतनाथ-अच्छा, जाओ, उसे इसी जगह मेरे पास भेज दो।

नानक-बहुत अच्छा।

इतना कहकर नानक चला गया और इसके बाद शान्ता ने भूतनाथ से कहा,"शायद उसे मेरे सामने आपसे बातचीत करना मंजूर न हो, शर्म आती हो या किसी तरह का और कुछ खयाल हो, अतः आज्ञा दीजिए तो मैं चली जाऊँ, फिर...

भूतनाथ-नहीं-नहीं, उसे जो कुछ कहना होगा तुम्हारे सामने ही कहेगी, तुम चुपचाप बैठी रहो।

शान्ता-सम्भव है कि वह मेरे रहते यहाँ न आवे, या उसे इस बात का खवाल हो कि तुम मेरे सामने उसकी बेइज्जती करोगे।

भूतनाथ-हो सकता है, मगर (कुछ सोच के) अच्छा, तुम जाओ।

इतना सुनकर शान्त। वहाँ से उठी और बैंगले की तरफ रवाना हुई। इस समय सूर्य अस्त हो चुका था और चारों तरफ से अंधेरी झुकी आती थी।

७

इन्द्रदेव का यह स्थान बहुत बड़ा था। इस समय यहां जितने आदमी आए हुए हैं उनमें से किसी को किसी तरह की भी तकलीफ नहीं हो सकती थी और इसके लिए प्रबन्ध भी ब अच्छा कर रक्खा गया था। औरतों के लिए एक खास कमरा मुकर्रर किया गया था मगर रामदेई (नानक की माँ) की निगरानी की जाती थी और इस बात का भी बन्दोबस्त कर रक्खा गया था कि कोई किसी के साथ दुश्मनी का बर्ताव न कर सके। महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह और दोनों कुमारों के कमरे के आगे पहरे का पूरा-पूरा इन्तजाम था और हमारे ऐयार लोग भी बराबर चौकन्ने रहा करते ये।

यद्यपि भूतनाथ एकान्त में बैठा हुआ अपनी स्त्री से बातें कर रहा था, मगर यह बात इन्द्रदेव और देवीसिंह से छि हुई न थी जो इस समय बगीचे में टहलते हुए बातें कर रहे थे। इन दोनों के देखते ही देखते नानक भूतनाथ की तरफ गया और लौट आया इसके बाद भूतनाथ की स्त्री अपने डेरे पर चली गई और फिर रामदेई, अर्थात् नानक की मां, भूतनाथ की तरफ जाती हुई दिखाई पड़ी। उस समय इन्द्रदेव ने देवीसिंह से कहा, "सिंहजी, देखिये भूतनाथ अपनी पहली स्त्री से बातचीत कर चुका है, अब उसने नानक की मां को अपने पास बुलाया है। शान्ता की जुबानी उसकी खुटाई का सारा हाल तो उसे जरूर मालूम हो ही गया होगा, इसलिए ताज्जुब नहीं कि वह गुस्से में आकर रामदेई के हाथ-पैर तोड़ डाले!"

देवीसिंह-ऐसा हो तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है, मगर उस औरत ने भी तो सजा पाने के ही लायक काम किया है।

इन्द्रदेव--ठीक है, मगर इस समय उसे बचाना चाहिए।

देवीसिंह--तो जाइए वहां छिप कर तमाशा देखिए और मौका पड़ने पर उसकी सहायता कीजिए। (मुस्कुराकर) आप ही आग लगाते हैं फिर आप ही बुझाने दौड़ते हैं।

इन्द्रदेव--(हंस कर) आप तो दिल्लगी करते हैं।

देवीसिंह--दिल्लगी काहे की? क्या आपने उसे गिरफ्तार नहीं कराया है और अगर गिरफ्तार कराया है तो क्या इनाम देने के लिए?

इन्द्रदेव--(मुस्कुराते हुए) तो आपकी राय है कि इसी समय उसकी मरम्मत की जाय!

देवीसिंह–-चाहिए तो ऐसा ही! जी में आवे तो तमाशा देखने चलिए। कहिए तो मैं आपके साथ चलूं।

इन्द्रदेव--नहीं-नहीं, ऐसा न होना चाहिए। भूतनाथ आपका दोस्त है और अब तो नातेदार भी। आप ऐसे मौके पर उसके सामने जा सकते हैं। जाइए और उसे बचाइए, मेरा जाना मुनासिब न होगा।

देवीसिंह--(हँस कर) तो आप चाहते हैं कि मैं भी भूतनाथ के हाथ से दो-एक घूमे खा लूं? अच्छा साहब जाता हूँ, आपका हुक्म कैसे टालूं, आज आपने बड़ी-बड़ी बातें मुझे सुनाई हैं इसलिए आपका अहसान भी तो मानना होगा।

इतना कहते हुए देवीसिंह पेड़ों की आड़ लेते हुए भूतनाथ की तरफ रवास हुए और जब ऐसी जगह पहुंचे जहां से उन दोनों की बातें बखूबी सुन सकते थे, तब एक चट्टान पर बैठ गये और सुनने लगे कि वे दोनों क्या बातें करते हैं!

भूतनाथ--खैर, अच्छा ही हुआ जो तुम यहाँ तक आ गईं, मुझसे मुलाकात भी हो गई और मैं 'लामाघाटी' तक जाने से बच गया। मगर अब यह तो बताओ कि अपनी सहेली 'नन्हीं' को यहाँ तक क्यों न लेती आई, मैं भी जरा उससे मिल के अपना कलेजा ठण्डा कर लेता?

रामदेई--नन्हीं बेचारी पर क्यों आक्षेप करते हो, उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? और वह यहाँ आती ही काहे को? क्या तुम्हारी लौंडी थी! व्यर्थ ही एक आदमी को बदनाम और दिक करने के लिए टूटे पड़ते हैं!

भूतनाथ--(उभड़ते हुए गुस्से को दबा कर) छी-छी, वह बेचारी हमारी लौंडी क्यों होने लगी, लौंडी तो तुम उसकी थीं जो झख मारने के लिए उसके घर गई थीं।

रामदेई--(आंचल से आँसू पोंछती हुई) अगर मैं उसके यहाँ गई तो क्या पाप किया? मैं पहले ही नानक से कहती कि जाकर पूछ आओ तब मैं नन्हीं के यहाँ जाऊँ नहीं तो कहीं व्यर्थ ही बात का बतंगड़ न बन जाय। मगर लड़के ने न माना और आखिर वही नतीजा निकला। बदमाशों ने वहां पहुंच कर उसे भी बेइज्जत किया और मुझे भी बेइज्जत करके यहाँ तक घसीट लाये। उसके सिर झूठे ही कलंक थोप दिया कि वह बेगम की सहेली है।

इतना कहकर रामदेई नखरे के साथ रोने लगी।

भूतनाथ--तुमने पहले भी कभी उसका जिक्र मुझसे किया था कि वह तुम्हारी नातेदार है, या मुझसे पूछ कर कभी उसके यहाँ गई थीं?

रामदेई--एक दफा गई सो तो यह गति हुई, यदि और जाती तो न मालूम क्या होता!

भूतनाथ--जो लोग तुझे यहाँ ले आये हैं वे बदमाश थे?

रामदेई--बदमाश तो कहे ही जाएँगे! जो व्यर्थ दूसरों को दुःख दें वेही बदमाश होते हैं और क्या बदमाशों के सिर पर सींग होते हैं! तुम्हारी अक्ल पर तो पत्थर पड़ गया है कि जो लोग तुम्हारी बेइज्जती किये ही जाते हैं, उन्हीं के लिए तुम जान दे रहे हो। न मालूम तुम्हें ऐसी क्या गरज पड़ी हुई है?

भूतनाथ-–ठीक है, यही राय लेने के लिए तो मैंने तुम्हें यहाँ एकान्त में बुलाया है। अगर तुम्हारी राय होगी तो मैं बते-देखते इन लोगों से बदला ले लूंगा, क्या मैं कमजोर या दब्बू हूँ!

रामदेई--जरूर बदला लेना चाहिए, अगर तुम ऐसा नहीं करोगे तो मैं समझूगी कि तुमसे बढ़कर कमीना कोई नहीं है।

इतना सुनकर भूतनाथ को बेहिसाब गुस्सा चढ़ आया मगर फिर भी उसने अपने क्रोध को दबाया और कहाभूतनाथ--अच्छा, तो अब मैं ऐसा ही करूंगा, मगर यह तो बताओ कि शेर की लड़की 'गौहर' से तुमसे क्या नाता है?

रामदेई--उस मुसलमानिन से मुझसे क्या नाता होगा! मैंने तो उसकी सुरत भी नहीं देखी।

भूतनाथ--लोग तो कहते हैं कि तुम उसके यहाँ भी आती-जाती हो और मेरे बहुत से भेद तुमने उसे बता दिये हैं।

रामदेई--सब झूठ है। ये लोग बात लगाने वाले जैसे ही धूर्त और पाजी हैं वैसे ही तुम सीधे और बेवकूफ हो।

अब भूतनाथ अपने गुस्से को बर्दाश्त न कर सका और उसने एक चपत रामदेई के गाल पर ऐसी जमाई कि वह तिलमिला कर जमीन पर लेट गई, मगर उसे चिल्लाने का साहस न हुआ। कुछ देर बाद वह उठ बैठी और भूतनाथ का मुंह देखने लगी।

भूतनाथ--कमीनी हरामजादी! जिनके लिए मैं जान तक देने को तैयार हूँ उन्हीं लोगों की शान में तू ऐसी बातें कह रही है जो एक पराये को भी कहना उचित नहीं है और जिसे मैं एक सायत के लिए भी बर्दाश्त नहीं कर सकता! ले समझ ले और कान खोल कर सुन ले कि तेरे हाथ की लिखी वह चिट्ठी मुझे मिल गई है जो तूने चाँद वाले दिन गौहर के यहाँ मिलने के लिए नन्हीं के पास भेजी थी और जिसमें तूने अपना परिचय 'करौंदा की ये-छैये' दिया था। बस, इसीसे समझ ले कि तेरी सब कलई खुल गई और तेरी बेईमानी लोगों को मालूम हो गई। अब तेरा नखरे के साथ रोना बातें बना कर अपने को बेकसूर साबित करना व्यर्थ है। अब तेरी मुहब्बत, एक रत्ती बराबर मेरे दिल में नहीं रह गई और तुझे उस जहरीली नागिन से भी हजार दर्जे बढ़ के समझने लग गया जिसे खूबसूरत होने पर भी कोई हाथ से छूने तक का साहस नहीं कर सकता। मुझे आज इस बात का सख्त रंज है कि मैंने तुझे इतने दिन तक प्यार किया और इस बात की सरफ कुछ भी ध्यान न दिया कि उस मुहब्बत, ऐयाशी और शौक का नतीजा एक-नएक दिन जरूर भयानक होता है जिसे छिपाने की जरूरत समझी जाती है और जिसका जाहिर होना मिन्दगी और बेहयाई का सबब समझा जाता है। मुझे इस बात का भारी अफसोस है कि तुझसे अनुचित सम्बन्ध रखकर मैंने उस उचित सम्बन्ध वाली का साथ छोड़ दिया जिसकी जूतियों की बराबरी भी तू नहीं कर सकती या यों कहना चाहिए कि तेरे शरीर का चमड़ा जिसकी जूतियों में भी देखना मैं पसन्द नहीं कर सकता। मुझे इस बात का दुःख है कि नागर या मायारानी के कब्जे से तुझे छुड़ाने के लिए मैंने तरह-तरह के ढोंग रचे और इसका दम भर के लिए भी विचार न किया कि मैं उस क्षयी रोग को अपनी छाती से लगाने का प्रबन्ध कर रहा हूँ जिसे पहली ही अवस्था में ईश्वर की कृपा ने मुझसे अलग कर दिया था। ये बातें तू अपने ही लिए न समझ, बल्कि अपने जाए नानक के लिए भी समझ कर मेरे सामने से उठ जा और उससे भी कह दे कि आज से मेरे सामने आकर मेरी जूतियों का शिकार न बने। यदि मेरे पुराने विचार न बदल गये होते और उन दिनों की तरह आज भी मैं पाप को पाप न समझता होता तो आज तेरी खाल खिचवा कर नमक और मिर्च का उबटन लगवा देता, मगर खैर, अब इतना ही कहता हूँ कि मेरे सामने से उठ जा और फिर कभी अपना काला मुंह मुझे मत दिखाना। जिस कुल को तू पहले कलंक लगा चुकी है अब भी उसी कुल की बदनामी का सबब बन कर दुनिया की हवा खा।

रामदेई के पास भूतनाथ की बातों का जवाब न था। वह अपनी पुरानी चिट्ठी का सच्चा परिचय सुन कर ददहवास हो गई और समझ गई कि उसके अच्छे नसीब के पहिए की धुरी टूट गई जिसे अब किसी तरह भी नहीं बना सकती। वह अपने धड़कते हुए कलेजे और कांपते गए बदन के साथ भूतनाथ की बातें सुनती रही और अन्त में उठने का साहस करने पर भी अपनी जगह से न हिल सकी। मगर भूतनाथ वहाँ से उठ खड़ा हुआ और बँगले की तरफ चल पड़ा। थोड़ी ही दूर गया होगा कि देवीसिंह से मुलाकात हुई जिसने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, "भूतनाथ, शाबाश! शाबाश! जो कुछ नेक और बहादुर आदमियों को करना चाहिए, इस समय तुमने वही किया। मैं छिप कर तुम्हारी सब बातें सुन रहा था। अगर तुम कुछ बेजा काम करना चाहते तो मैं तुम्हें जरूर रोकता, मगर ऐसा करने का मौका न हुआ, जिससे मैं बहुत ही खुश हूँ। अच्छा जाओ, अपने कमरे में जाकर आराम करो, मैं अब इन्द्रदेव के पास जाता हूँ।"

८

रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है, एक सुन्दर सजे हुए कमरे में राजा गोपालसिंह और इन्द्रदेव बैठे हैं और उनके सामने नानक हाथ जोड़े बैठा दिखाई देता है।

गोपालसिंह--(नानक से) ठीक है, यद्यपि इन बातों में तुमने अपनी तरफ से कुछ नमक--मिर्च जरूर लगाया होगा, मगर फिर भी मुझे कोई ऐसी बात नहीं जान पड़ती जिससे भूतनाथ को दोषी ठहराऊँ। उसने जो कुछ तुम्हारी माँ से कहा सच कहा और उसके साथ जैसा बर्ताव किया वह उचित ही था। इस विषय में मैं भूतनाथ को कुछ भी नहीं कह सकता और न अब तुम्हारी बातों पर भरोसा ही कर सकता हूँ। बड़े अफसोस की बात है कि मेरी नसीहत ने तुम्हारे दिल पर कुछ भी असर न किया और अगर कुछ किया भी तो वह दो-चार दिन बाद जाता रहा। अगर तुम अपनी मां के साथ नन्हीं के मकान में गिरफ्तार न हुए होते तो कदाचित् मैं तम्हारे धोखे में आ जाता, मगर अब मैं किसी तरह भी तुम्हारा साथ नहीं दे सकता।

नानक--मगर आप मेरा कसूर माफ कर चुके हैं और

इन्द्रदेव--(नानक से) अगर तुम उस माफी को पाकर खुश हुए थे तो फिर पुराने रास्ते पर क्यों गये और पुनः अपनी को लेकर नन्हीं के पास क्यों पहुंचे? तुम्हें बात करते शर्म नहीं आती!

गोपालसिंह--फिर भी मैं अपनी जबान (माफी) का खयाल करूँगा और तुम्हें किसी तरह की तकलीफ न दूंगा, मगर अब भूतनाथ की तरह मैं भी तुम्हारी गूरत देखना पसन्द नहीं करता और न भूतनाथ को इस विषय में कुछ कहना चाहता हूँ। इन्द्रदेव ने तुम्हारे साथ इतनी ही रियायत की सो बहुत किया कि तुमको यहाँ से निकल जाने की आज्ञा दे दी, नहीं तो तुम इस लायक थे कि जन्म-भर कैद में पड़े सड़ा करते।

नानक--जो आज्ञा, मगर मेरे पिता से इतना तो दिला दीजिए कि मेरी माँ जन्म भर खाने-पीने की तरफ से बेफिक्र रहे।

इन्द्रदेव--अबे कमीने, तुझे यह कहते शर्म नहीं मालूम होती! इतना बड़ा हो के भी तू अपनी मां के लायक दाना-पानी नहीं जुटा सकता? खैर, अब तुझे आखिरी मर्तबे कहा जाता है कि अब हम लोगों से किसी तरह की उम्मीद न रख और अपनी माँ को साथ लेकर यहाँ से जा। भूतनाथ ने भी मुझे यही कहने के लिए कहला भेजा है।

इतना कहकर इन्द्रदेव ने ताली बजाई और साथ ही अपने ऐयार सरयूसिंह को कमरे के अन्दर आते देखा।

इन्द्रदेव--(सरयू से) भूतनाथ कहाँ है?

सरयू--नम्बर पांच के कमरे में देवीसिंहजी से बातें कर रहे हैं। वे दोनों यहाँ आए भी थे मगर यह सुनकर कि नानक यहां बैठा हुआ है, पिछले पैर लौट गए।

इन्द्रदेव--अच्छा, तुम जाओ और उन्हें यहाँ बुला लाओ।

सरयूसिंह--जो आज्ञा! परन्तु मुझे आशा नहीं है कि वे लोग नानक के रहते यहाँ आवेंगे।

इन्द्रदेव--अच्छा, तो मैं खुद जाता हूँ।

गोपालसिंह–--हाँ तुम्हारा ही जाना ठीक होगा, देवीसिंह को भी बुलाते आना।

इन्द्रदेव उठकर चले गए और थोड़ी ही देर में भूतनाथ तथा देवीसिंह को साथ लिए हुए आ पहुंचे।

गोपालसिंह---(भूतनाथ से) क्यों साहब, आप यहाँ तक आकर लौट क्यों गए?

भूतनाथ---यों ही, मैंने समझा कि आप लोग किसी खास बात में लगे हुए हैं।

गोपालसिंह---अच्छा, बैठिए और एक बात का जवाब दीजिए।

भूतनाथ---कहिए!

गोपालसिंह---रामदेई और नानक के बारे में आप क्या हुक्म देते हैं?

भूतनाथ---महाराज ने क्या आज्ञा दी है?

गोपालसिंह---उन्होंने इसका फैसला आप ही के ऊपर छोड़ा है।

भूतनाथ---फिर जो राय आप लोगों की हो, मैंने तो इन दोनों के बारे में इसकी माँ को हुक्म सुना ही दिया है।

गोपालसिंह---इनके कसूर तो आप सुन ही चुके होंगे।

भूतनाथ---पिछले कसुरों को तो मैं सुन ही चुका हूँ, हाँ नया कसूर सिर्फ इतना ही मालूम हुआ है कि ये दोनों नन्हीं के यहां गिरफ्तार हुए हैं।

गोपालसिंह---इसके अतिरिक्त एक बात और है।

भूतनाथ--वह क्या?

गोपालसिंह--यही कि ये दोनों अगर खाली हाथ न होते तो बेचारी शान्ता को जान से मार डालते।

इतने ही में नानक बोल उठा, "नही-नहीं, यह आपके जासूसों ने हमारे ऊपर झूठा इलजाम लगाया है!"

भूतनाथ--अगर यह बात है तो मैं इसे हथकड़ी से खाली क्यों देखता हूँ?

इन्द्रदेव--इसीलिए कि हमारे हाते के अन्दर ये लोग कुछ कर नहीं सकते। जब ये लोग यहाँ गिरफ्तार होकर आये तो कुछ दिन तक तो भलमनसी के साथ रहे, मगर आज इनकी नीयत बिगड़ी हुई मालूम पड़ी।

भूतनाथ--खैर, अब आप ही इनके लिए हुक्म सुनाइए। मगर इन्द्रदेव, आप यह न समझियेगा कि इन लोगों के बारे में मुझे किसी तरह का रंज है। मैं सच कहता हूँ कि इन दोनों का यहाँ आना मेरे लिए बहुत अच्छा हुआ! मैं इन लोगों के फेर में बेतरह फंसा हुआ था। आज मालूम हुआ कि ये लोग जहरी हलाहल से भी बढ़े हुए हैं, अतः आज इन लोगों से पीछा छुड़ाकर मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ। मेरे सिर से बोझा उतर गया और अब मेरी जिन्दगी खुशी के साथ बीतेगी। आपका कहना सच निकला अर्थात् इनका यहाँ आना मेरे लिए खुशी का सबब हुआ

इन्द्रदेव--अच्छा यह बताइए कि ये अगर इसी तरह छोड़ दिये जायें तो आपके खजाने को तो किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा सकते जो 'लामाघाटी' के अन्दर है?

भूतन--कुछ भी नहीं, और 'लामाघाटी' के अन्दर जेवरों के अतिरिक्त और कुछ है भी नहीं, सो जेवरों को मैं वहाँ से मँगवा ले सकता हूँ।

इन्द्रदेव--अगर सिर्फ नानक की माँ के जेवरों से आपका मतलब है तो वह अब मेरे कब्जे में हैं क्योंकि नन्हीं के यहां वह बिना जेवरों के नहीं गई थी।

भूतनाथ--बस, तो मैं उस तरफ से बेफिक्र हो गया, यद्यपि उन जेवरों की मुझे कोई परवाह नहीं है मगर उसके पास मैं एक कौड़ी भी नहीं छोड़ना चाहता। इसके अतिरिक्त यह भी जरूर कहूँगा कि अब ये लोग सूखे छोड़ देने लायक नहीं रहे।

इन्द्रदेव--खैर, जैसी राय होगी, वैसा ही किया जायगा।

इतना कहकर इन्द्रदेव ने पुनः सरयूसिंह को बुलाया और जब वह कमरे के अन्दर आ गया तो कहा--"थोड़ी देर के लिए नानक को बाहर ले जाओ।"

नानक को लिए हुए सरयूसिंह कमरे के बाहर चला गया और इसके बाद चारों आदमी विचार करने लगे कि नानक और उसकी मां के साथ क्या बर्ताव करना चाहिए। देर तक सोच-विचार कर यही निश्चय किया कि उन दोनों को देश से निकाल दिया जाय और कह दिया जाय कि जिस दिन हमारे महाराज की अमलदारी में दिखाई दोगे, उसी दिन मार डाले जाओगे।

इस हुक्म पर महाराज से आज्ञा लेने की इन लोगों को कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि उन्होंने सब बातें सुन-सुनाकर पहले ही हुक्म दे दिया था कि भूतनाथ की आज्ञानुसार काम किया जाय, अतः नानक कमरे के अन्दर बुलाया गया और इसके बाद रामदेई भी बुलाई गई। जब दोनों इकट्ठे हो गए तो उन्हें हुक्म सुना दिया गया।

यह हुक्म यद्यपि साधारण मालूम होता है मगर उन दोनों के लिए ऐसा न था जिन्हें भूतनाथ की बदौलत शाहखर्ची की आदत पड़ गई थी। नानक और रामदेई की आँखों से आँसू जारी थे, जब इन्द्रदेव ने सरयूसिंह को हुक्म दिया कि चार आदमी इन दोनों को ले जायँ और महाराज की सरहद के बाहर कर आवें। सरयूसिंह दोनों को लिए हुए कमरे के बाहर निकल गया।

भूतनाथ--सिर से वोझ उतरा और कम्बख्तों से पीछा छूटा। अच्छा, अब बतलाइये कि कल क्या-क्या होगा?

गोपालसिंह–-महाराज ने तो यही हुक्म किया है कि कल यहाँ से डेरा कूच किया जाये और तिलिस्म की सैर करते हुए चुनारगढ़ पहुँचें, चम्पा, शान्ता, हरनामसिंह, भरतसिंह और दलीपशाह वगैरह बाहर की राह से चुनार भेज दिये जायें। यदि हमारे किसी ऐयार की भी इच्छा हो तो उनके साथ चला जाये।

भूतनाथ--ऐसा कौन बेवकूफ होगा, जो तिलिस्म की सैर छोड़कर उनके साथ जायेगा!

देवीसिंह--सभी कोई ऐसा ही कहते हैं।

भूतनाथ–-हाँ, यह तो बताइये कि मैंने नानक को जब दरबार में देखा था, तो उसके हाथ में एक लपेटी तस्वीर थी, अब वह तस्वीर कहाँ है और उसमें क्या बात थी?

इन्द्रदेव--वह कागज जिसे आप तस्वीर समझे हुए हैं मेरे पास है, आपको दिखाऊंगा। असल में वह तस्वीर नहीं है, बल्कि नानक ने उसमें एक बहुत बड़ी दर्खास्त लिखकर तैयार की थी, जो दरबार में आकर पेश करना चाहता था, मगर ऐसा कर न सका।

भूतनाथ--उसमें लिखा क्या था?

इन्द्रदेव--जो लोग उसे गिरफ्तार कर लाये हैं, उनकी शिकायत के सिवाय और कुछ भी नहीं। साथ ही इसके उस दर्खास्त में इस बात पर बहुत जोर दिया गया था कि कमला की माँ वास्तव में मर गई है और आज जिस शान्ता को सब कोई देख रहे हैं, वह वास्तव में नकली है।

भूतनाथ--वाह रे शैतान! (कुछ सोचकर) तो शायद वह दर्खास्त महाराज के हाथ तक नहीं पहुँची?

इन्द्रदेव--क्यों नहीं, मैंने जान-बूझकर उसे ऐसा करने का मौका दिया। वह रात को पहरे वालों से इत्तिला कराकर खुद महाराज के पास पहुँचा और उनके सामने वह दर्खास्त रख दी। उस समय महाराज ने मुझे बुलाया और मुझी को वह दर्खास्त पढ़ने के लिए दी गई। उसे सुनकर महाराज ने मुस्कुरा दिया और इशारा किया कि वह कमरे के बाहर निकाल दिया जाये, क्योंकि इसके पहले मैं शान्ता और हरनामसिंह का पूरा-पूरा हाल महाराज से अर्ज कर चुका था।

भूतनाथ---अच्छा, मुझे भी वह दर्खास्त दिखाइयेगा।

इन्द्रदेव--(उँगली से इशारा करके) वहाँ कारनिस के ऊपर पड़ी हुई है, देख लीजिये।

भूतनाथ ने दर्खास्त उतार कर पढ़ी और उसके बाद कुछ देर तक उन लोगों में बातचीत होती रही।

९

सुबह का सुहावना समय सब जगह एक सा नहीं मालूम होता, घर की खिड़कियों में उसका चेहरा कुछ और ही दिखायी देता है और बाग में उसकी कैफियत कुछ और ही मस्तानी होती है, पहाड़ में उसकी खूबी कुछ और ही ढंग की दिखाई देती है और जंगल में उसकी छटा कुछ निराली ही होती है। आज इन्द्रदेव के इस अनूठे स्थान में इसकी खूबी सबसे चढ़ी-बढ़ी है, क्योंकि यहां जंगल भी हैं, पहाड़ भी, अनूठा बाग तथा सुन्दर बँगला या कोठी भी है, फिर यहाँ के आनन्द का पूछना ही क्या। इसलिए हमारे महाराज, कुंअर साहब और ऐयार लोग भी यहाँ घूम-घूमकर सुबह के सुहावने समय का पूरा आनन्द ले रहे हैं, खास करके इसलिए कि आज ये लोग डेरा कूच करने वाले हैं।

बहुत देर घूमने-फिरने के बाद सब कोई बाग में आकर बैठे और इधर-उधर की बातें होने लगीं।

जीतसिंह--(इन्द्रदेव से) भरतसिंह वगैरह तथा औरतों को आपने चुनार रवाना कर दिया?

इन्द्रदेव--जी हाँ, बड़े सवेरे ही उन लोगों को बाहर की राह से रवाना कर दिया। औरतों के लिए सवारी का इन्तजाम कर देने के अतिरिक्त अपने दस-पन्द्रह मातबर आदमी भी साथ कर दिये हैं।

जीतसिंह--अब हम लोग कुछ भोजन करके यहां से रवाना हुआ चाहते हैं।

इन्द्रदेव--जैसी मर्जी!

जीतसिंह--भैरों और तारा जो आपके साथ यहाँ आए थे कहाँ चले गये, दिखाई नहीं पड़ते।

इन्द्रदेव--अब भी मैं उन्हें अपने साथ ही ले जाने की आज्ञा चाहता हूँ, क्योंकि उनकी मदद की मुझे जरूरत है।

जीतसिंह--तो त्या आप हम लोगों के साथ न चलेंगे?

इन्द्रदेव--जी हाँ, उस बाग तक जरूर साथ चलूंगा, जहाँ से मैं आप लोगों को यहाँ तक ले आया हूँ, पर उसके बाद गुप्त हो जाऊँगा, क्योंकि मैं आपको कुछ तिलिस्मी तमाशे दिखाना चाहता हूँ और इसके अतिरिक्त उन चीजों को भी तिलिस्म के अन्दर से निकलवा कर चुनार पहुँचाना है, जिनके लिए आज्ञा मिल चुकी है।

सुरेन्द्रसिंह--नहीं-नहीं, गुप्त रीति पर हम तिलिस्म का तमाशा नहीं देखना चाहते, हमारे साथ रहकर जो कुछ दिखा सको, दिखा दो। बाकी रहा उन चीजों को निकलवा कर चुनार पहुंचाना, सो यह काम दो दिन के बाद भी होगा तो कोई हर्ज नहीं।

इन्द्रदेव--जैसी आज्ञा!

इतना कहकर इन्द्रदेव थोड़ी देर के लिए कहीं चले गए और तब भैरोंसिंह तथा तारासिंह को साथ लिए आकर बोले, "भोजन तैयार है।"

सब लोग वहाँ से उठे और भोजन इत्यादि से छुट्टी पाकर तिलिस्म की तरफ रवाना हुए। जिस तरह इन्द्रदेव इन लोगों को अपने स्थान में ले आए थे, उसी तरह पुनः उस तिलिस्मी बाग में ले गए, जिसमें से लाए थे।

जब महाराज सुरेन्द्रसिंह वगैरह उस बारहदरी में पहुँचे, जिसमें पहले दिन आराम किया था और जहाँ बाजे की आवाज सुनी थी, तब दिन पहर भर से कुछ ज्यादा बाकी था। जीतसिंह ने इन्द्रदेव से पूछा, “अब क्या करना चाहिए?"

इन्द्रदेव--यदि महाराज आज की रात यहाँ रहना पसन्द करें, तो एक दूसरे वाग में चलकर वहाँ की कुछ कैफियत दिखाऊँगा!

जीतसिंह--बहुत अच्छी बात है, चलिए।

इतना सुनकर इन्द्रदेव ने उस बारहदरी की कई आलमारियों में से एक आलमारी खोली और उसके अन्दर जाकर सभी को अपने पीछे आने का इशारा किया। यहाँ एक गली की तौर पर रास्ता बना हुआ था, जिसमें सब कोई इन्द्रदेव की इच्छानुसार बेखौफ चले गए और थोड़ी दूर जाने के बाद जब इन्द्रदेव ने दूसरा दरवाजा खोला, तब उसके बाहर होकर सभी ने अपने को एक छोटे बाग में पाया, जिसकी बनावट कुछ विचित्र ही ढंग की थी। यह बाग जंगली पौधों की सब्जी से हरा-भरा मा और पानी का चश्मा भी बह रहा था, मगर चारदीवारी के अतिरिक्त और किसी तरह की बड़ी इमारत इसमें न थी, हाँ बीच में एक बहुत बड़ा चबूतरा जरूर था, जिस पर धूप और बरसाती पानी के लिए सिर्फ मोटे-मोटे बारह खम्भों के सहारे पर छत बनी हुई थी और चबूतरे पर चढ़ने के लिए चारों तरफ सीढ़ियाँ थीं।

यह चबूतरा कुछ अजीब ढंग का बना हुआ था। लगभग चालीस हाथ के चौड़ा और इतना ही लम्बा होमा। इसके फर्श में लोहे की बारीक नालियां जाल की तरह जड़ी हुई थीं और बीच में एक चौखूटा स्याह पत्थर इस अन्दाज का रखा था, जिस पर चार आदमी बैठ सकते थे। बस, इसके अतिरिक्त इस चबूतरे में और कुछ भी न था।

थोड़ी देर तक सब कोई उस चबूतरे की बनावट देखते रहे, इसके बाद इन्द्रदेव ने महाराज से कहा, "तिलिस्म बनाने वालों ने यह बगीचा केवल तमाशा देखने के लिए बनाया था। यहाँ की कैफियत आपके साथ रहकर मैं नहीं दिखा सकता। हाँ, यदि आप मुझे दो-तीन पहर की छुट्टी दें तो!"

इन्द्रदेव की बात महाराज ने मंजूर कर ली और तब वह (इन्द्रदेव) सभी के देखते देखते चौखूटे पत्थर के ऊपर चले गए जो चबूतरे के बीच में जड़ा हुआ था। सवार होने साथ ही वह पत्थर हिला और इन्द्रदेव को लिए हुए जमीन के अन्दर चला गया, मगर थोड़ी देर में पुनः ऊपर चला आया और अपने ठिकाने पर ज्यों का त्यों बैठ गया लेकिन इस समय इन्द्रसेन उस पर न थे।

इन्द्रदेव के चले जाने के बाद थोड़ी देर तक तो सब कोई उस चबूतरे पर खड़े रहे, इसके बाद धीरे-धीरे वह चबूतरा गरम होने लगा और वह गर्मी यहाँ तक बढ़ी कि लाचार उन सभी को चबूतरा छोड़ देना पड़ा, अर्थात् सब कोई चबूतरे के नीचे उतर आए और बाग में टहलने लगे। इस समय दिन घण्टे भर से कुछ कम बाकी था।

इस खयाल से देखें कि इसकी दीवार किस ढंग की बनी हुई हैं, सब कोई घूमते हुए पूरब की तरफ वाली दीवार के पास जा पहुंचे और गौर से देखने लगे, मगर कोई अनूठी बात दिखाई न दी। इसके बाद उत्तर तरफ वाली और फिर पश्चिम तरफ वाली दीवार को देखते हुए सब कोई दक्खिन की तरफ गए और उधर की दीवार को आश्चर्य के साथ देखने लगे, क्योंकि इसमें कुछ विचित्रता थी।

यह दीवार शीशे की मालूम होती थी और इसमें महाभारत की तस्वीरें बनी हुई थीं। ये तस्वीरें उसी ढंग की थीं, जैसी कि उस तिलिस्मी बंगले में चलती-फिरती तस्वीरें इन लोगों ने देखी थीं। ये लोग तस्वीरों को बड़ी देर तक देखते रहे और सभी को विश्वास हो गया कि जिस तरह उस बंगले वाली तस्वीरों को चलते-फिरते और काम करते हम लोग देख चुके हैं उसी तरह इन तस्वीरों को भी देखेंगे, क्योंकि दीवार पर हाथ फेरने से साफ मालूम होता था कि तस्वीरें शीशे के अन्दर हैं।

इन तस्वीरों को देखने से महाभारत की लड़ाई का जमाना आँखों के सामने फिर जाता था। कौरवों और पाण्डवों की फौज, उसके बड़े-बड़े सेनापति तथा रथ, हाथी, घोड़े इत्यादि जो कुछ बने थे, सभी अच्छे और दिल पर असर पैदा करने वाले थे। 'इस लड़ाई की नकल अपनी आँखों से देखेंगे' इस विचार से सब कोई प्रसन्न थे। बड़ी दिलचस्पी के साथ उन तस्वीरों को देख रहे ये, यहाँ तक कि सूर्य अस्त हो गया और धीरे-धीरे अंधकार ने चारों तरफ अपना दखल जमा लिया। उस समय यकायक दीवार चमकने लगी और तस्वीरों में हरकत पैदा हुई जिससे सभी ने समझा कि नकली लड़ाई शुरू हुआ चाहती है मगर कुछ ही देर बाद लोगों का यह विश्वास ताज्जुब के साथ बदल गया, जब यह देखा कि उसमें की तस्वीरें एक-एक करके गायब हो रही हैं, यहां तक कि घड़ी भर के अन्दर ही सब तस्वीरें गायब हो गई और दीवार साफ दिखाई देने लगी। इसके बाद दीवार की चमक भी बन्द हो गई और फिर अन्धकार दिखाई देने लगा।

थोड़ी देर बाद उस चबूतरे की तरफ रोशनी मालूम हुई। यह देखकर सब कोई उसी तरफ रवाना हुए और जब उसके पास पहुंचे तो देखा कि उस चबूतरे की छत में जड़े हुए शीशों के दस-बारह टुकड़े इस तेजी के साथ चमक रहे हैं कि उनसे केवल चबूतरा ही नहीं बल्कि तमाम बाग में उजाला हो रहा है। इसके अतिरिक्त सैकड़ों मूरतें भी उस चबूतरे पर इधर-उधर चलती-फिरती दिखाई दीं। गौर करने से मालूम हुआ कि ये मूरतें (या तस्वीरें) बेशक वे ही हैं, जिन्हें उस दीवार के अन्दर देख चुके हैं। ताज्जुब नहीं कि वह दीवार इन सभी का खजाना हो और वही यहाँ इस चबूतरे पर आकर तमाशा दिखाती हों।

इस समय जितनी मूरतें उस चबूतरे पर थीं, सब अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की लडाई से सम्बन्ध रखती थीं। जब उन मूरतों ने अपना काम शुरू किया तो ठीक अभि-मन्यु की लड़ाई का तमाशा आँखों के सामने दिखाई देने लगा। जिस तरह कौरवों के रचे हुए व्यूह के अन्दर फंसकर कुमार अभिमन्यु ने वीरता दिखाई थी और अन्त में अधर्म के साथ जिस तरह वह मारा गया था, उसी को आज नाटक स्वरूप में देखकर सब कोई बड़े प्रसन्न हुए और सभी के दिलों पर बहुत देर तक इसका असर रहा।

इस तमाशे का हाल खुलासा तौर पर हम इसलिए नहीं लिखते कि इसकी कथा बहुत प्रसिद्ध है और महाभारत में विस्तार के साथ लिखी है।

यह तमाशा थोड़ी ही देर में खत्म नहीं हुआ बल्कि देखते हुए तमाम रात बीत गई। सवेरा होने के कुछ पहले अंधकार हो गया और उसी अंधकार में सब मूरतें गायव हो गईं। उजाला होने और आँखें ठहरने पर जब सभी ने देखा तो उस चबूतरे पर सिवाय इन्द्रदेव के और कुछ भी दिखाई न दिया।

इन्द्रदेव को देखकर सब कोई प्रसन्न हुए और साहव-सलामत के बाद इस तरह वातचीत होने लगी--

इन्द्रदेव--(चबूतरे से नीचे उतर कर और महाराज के पास आकर) मैं उम्मीद करता हूँ कि इस तमाशे को देखकर महाराज प्रसन्न हुए होंगे।

महाराज--बेशक! क्या इसके सिवाय और भी कोई तमाशा यहाँ दिखाई दे सकता है?

इन्द्रदेव--जी हाँ, यहाँ पूरा महाभारत दिखाई दे सकता है, अर्थात् महाभारत ग्रन्थ में जो कुछ लिखा है, वह सब इसी ढंग पर और इसी चबूतरे पर आप देख सकते हैं मगर दो-चार दिन में नहीं बल्कि महीनों में! इसके साथ-साथ बनाने वाले ने इसकी भी तरकब की है कि चाहे शुरू ही से तमाशा दिखाया जाए या बीच ही से कोई टुकड़ा दिखा दिया जाये अर्थात् महाभारत के अन्तर्गत जो कुछ चाहें देख सकते हैं।

महाराज--इच्छा तो बहुत कुछ देखने की थी, मगर इस समय हम लोग यहाँ ज्यादा रुक नहीं सकते, अतः फिर कभी जरूर देखेंगे। हाँ, हमें इस तमाशे के विषय में कुछ समझाओ तो सही कि यह काम क्योंकर हो सकता है और तुमने यहाँ से कहाँ जाकर क्या किया?

इन्द्रदेव ने इस तमाशे का पूरा-पूरा भेद सभी को समझाया और कहा कि ऐसे-ऐसे कई तमाशे इस तिलिस्म में भरे पड़े हैं, अगर आप चाहें तो इस काम में वर्षों बिता सकते हैं, इसके अतिरिक्त यहाँ की दौलत का भी यही हाल है कि वर्षों तक ढोते रहिये फिर भी कमी न हो, सोने-चांदी का तो कहना ही क्या है, जवाहिरात भी आप जितना चाहं ले सकते हैं। सच तो यह है, कि जितनी दौलत यहाँ है, उसके रहने का ठिकाना यहीं हो सकता है। इस बगीचे के आस-पास ही और भी चार बाग हैं, शायद उन सभी में घूमना और वहाँ के तमाशों को देखना इस समय आप पसन्द न करें

महाराज--बेशक इस समय हम इन सब तमाशों में समय बिताना पसन्द नहीं करते। सबसे पहले शादी-ब्याह के काम से छुट्टी पाने की इच्छा लगी हुई है मगर इसके बाद पुनः एक दफे इस तिलिस्म में आकर यहां की सैर जरूर करेंगे।

कुछ देर तक इसी किस्म की बातें होती रही, इसके बाद इन्द्रदेव सभी को पुनः उसी बाग में ले आए, जिसमें उनसे मुलाकात हुई थी या जहाँ से इन्द्रदेव के स्थान में जाने का रास्ता था।

१०

इस बाग में पहले दिन जिस बारहदरी में बैठकर सभी ने भोजन किया था, आज पुनः उसी बारहदरी में बैठने और भोजन करने का मौका मिला। खाने की चीजें ऐयार लोग अपने साथ ले आये थे और जल की वहाँ कमी ही न थी, अतः स्नान-सन्ध्योपासन और भोजन इत्यादि से छुट्टी पाकर सब कोई उसी बारहदरी में सो रहे क्योंकि रात के जागे हुए थे और बिना कुछ आराम किये आगे बढ़ने की इच्छा न थी।

जब दिन पहर भर से कुछ कम बाकी रह गया, तब सब कोई उठे और चश्मे के जल से हाथ-मुँह धोकर आगे की तरफ बढ़ने के लिए तैयार हुए।

हम ऊपर किसी बयान में लिख आये हैं कि यहाँ तीनों तरफ की दीवारों में कई आलमारियाँ भी थीं, अतः इस समय कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने उन्हीं आलमारियों में से एक आलमारी खोली, और महाराज की तरफ देखकर कहा, “चुनार के तिलिस्म में जाने का यही रास्ता है, और हम दोनों भाई इसी रास्ते से वहाँ तक गये थे।"

रास्ता बिल्कुल अँधेरा था, इसलिए इन्द्रजीतसिंह तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए आगे-आगे रवाना हुए और उनके पीछे महाराज सुरेन्द्रसिंह, राजा वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, इन्द्रदेव वगैरह और ऐयार लोग रवाना हुए। सबसे पीछे कुंअर आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए जाने लगे, क्योंकि सुरंग पतली थी, और केवल आगे की रोशनी से काम नहीं चल सकता था।

ये लोग उस सुरंग में कई धण्टे तक बराबर चलते गये और इस बात का पता न लगा कि कब संध्या या अब कितनी रात बीत चुकी है। जब सुरंग का दूसरा दरवाजा इन लोगों को मिला और उसे खोलकर सब कोई बाहर निकले तो अपने को एक लम्बी-चौड़ी कोठरी में पाया, जिसमें इस दरवाजे के अतिरिक्त तीनों तरफ की दीवारों में और भी तीन दरवाजे थे, जिनकी तरफ इशारा करके कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "अब हम लोग उस चबूतरे वाले तिलिस्म के नीचे आ पहुँचे हैं। इस जगह एक-दूसरे से मिली हुई सैकड़ों कोठरियाँ हैं जो भूल-भुलैये की तरह चक्कर दिलाती हैं और जिनमें फँसा हुआ अनजान आदमी जल्दी निकल ही नहीं सकता। जब पहले-पहल हम दोनों भाई यहाँ आये थे तो सब कोठरियों के दरवाजे बन्द थे जो तिलिस्मी किताब की सहायता से खोले गये और जिनका खुलासा हाल आपको तिलिस्मी किताब के पढ़ने से मालूम होगा, मगर इनके खोलने में कई दिन लगे और तकलीफ भी बहुत हुई। इन कोठरियों के मध्य में एक चौखूटा कमरा आप देखेंगे जो ठीक चबूतरे के नीचे है और उसी में से बाहर निकलने का रास्ता है, बाकी सब कोठरियों में असबाब और खजाना भरा हुआ है। इसके अतिरिक्त छत के ऊपर एक और रास्ता उस चबूतरे में से बाहर निकलने के लिए बना हुआ है, जिसका हाल मुझे पहले मालूम न था, जिस दिन हम दोनों भाई उस चबूतरे की राह निकले हैं, उस दिन देखा कि इसके अतिरिक्त एक रास्ता और भी है।"

इन्द्रदेव--जी हाँ, दूसरा रास्ता भी जरूर है, मगर वह तिलिस्म के दारोगा के लिए बनाया गया था, तिलिस्म तोड़ने वाले के लिए नहीं। मुझे उस रास्ते का हाल बखूबी मालूम है।

गोपालसिंह--मुझे भी उस रास्ते का हाल (इन्द्रदेव की तरफ इशारा करके) इन्हीं की जुबानी मालूम हुआ है, इसके पहले मैं कुछ भी नहीं जानता था और न ही मालूम था कि इस तिलिस्म के दारोगा यही हैं।

इसके बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने सबको तहखाने अथवा कोठरियों और कमरों की सैर कराई, जिसमें लाजवाब और हद दर्जे की फिजूलखर्ची को मात करने वाली दौलत भरी हुई थी, और एक-से-एक बढ़कर अनूठी चीजें लोगों के दिल को अपनी तरफ खींच रही थीं। साथ ही इसके यह भी समझाया कि इन कोठरियों को हम लोगों ने कैसे खोला, और इस काम में कैसी-कैसी कठिनाइयाँ उठानी पड़ी।

घूमते-फिरते और सैर करते हुए सब कोई उस मध्य वाले कमरे में पहुंचे जो ठीक तिलिस्मी चबूतरे के नीचे था। वास्तव में यह कमरा कल-पुर्जी से बिल्कुल भरा हुआ था। जमीन से छत तक बहुत-सी तारों और कल-पुर्जी का सम्बन्ध था और दीवार के अन्दर से ऊपर चढ़ जाने के लिए सीढ़ियां दिखाई दे रही थीं।

दोनों कुमारों ने महाराज को समझाया कि तिलिस्म टूटने के पहले वे कल-पुर्जे किस ढंग पर लगे थे और तोड़ते समय उनके साथ कैसी कार्रवाई की गई। इसके बाद इन्द्रजीतसिंह सीढ़ियों की तरफ इशारा करके कहा, "अब भी इन सीढ़ियों का तिलिस्म कायम है, हर एक की मजाल नहीं कि इन पर पैर रख सके।"

वीरेन्द्रसिंह--यह सब कुछ है, मगर असल तिलिस्मी बुनियाद वही खोह वाला बंगला जान पड़ता है, जिसमें चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा देखा था, और जहाँ से तिलिस्म के अन्दर घुसे थे।

सुरेन्द्रसिंह–-इसमें क्या शक है। वही चुनार, जमानिया और रोहतासगढ़ वगैरह के तिलिस्मों की नकेल है, और वहाँ रहने वाला तरह-तरह के तमाशे देख-दिखा सकता है और सबसे बढ़कर आनन्द ले सकता है।

जीतसिंह--वहाँ की पूरी-पूरी कैफियत अभी देखने में नहीं आई।

इन्द्रजीतसिंह--दो-चार दिन में वहाँ की कैफियत देख भी सकते हैं। जो कुछ आप लोगों ने देखा वह रुपये में एक आना भी न था। मुझे भी अभी पुनः वहाँ जाकर बहुत-कुष्ठ देखना बाकी है।

सुरेन्द्रसिंह--इस समय तो जल्दी में थोड़ा-बहुत देख लिया है, मगर काम से निश्चिन्त होकर पुनः हम लोग वहां चलेंगे, और उसी जगह से रोहतासगढ़ के तहखाने की भी सैर करेंगे। अच्छा, अब यहाँ से बाहर होना चाहिए।

आगे-आगे कुंअर इन्द्रजीतसिंह रवाना हुए। पाँच-सात सीढ़ियाँ चढ़ जाने के बाद एक छोटा-सा लोहे का दरवाजा मिला, जिसे उसी हीरे वाली तिलिस्मी ताली से खोला, और तब सबको लिए हुए दोनों कुमार तिलिस्मी चबूतरे के बाहर हुए।

सब कोई तिलिस्म की सैर करके लौट आये और अपने-अपने काम-धंधे में लगे। कैदियों के मुकदमे को थोड़े दिन तक मुल्तवी रखकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की शादी पर सबने ध्यान दिया और इसी के इन्तजाम की फिक्र करने लगे। महाराज सुरेन्द्रसिंह ने जो काम जिसके लायक समझा, उसके सुपुर्द करके कुल कैदियों को चुनारगढ़ भेजने का हुक्म दिया और यह भी निश्चय कर लिया कि दो-तीन दिन के बाद हम लोग भी चुनारगढ़ चले जायेंगे, क्योंकि बारात चुनारगढ़ ही से निकलकर यहाँ आयेगी।

भरतसिंह और दिलीपशाह वगैरह का डेरा बलभद्रसिंह के पड़ौस ही में पड़ा और दूसरे मेहमानों के साथ-ही-साथ इनकी खातिरदारी का बोझ भी भूतनाथ के ऊपर डाला गया। इस जगह संक्षेप में हम यह भी लिख देना उचित समझते हैं कि कौन काम किसके सुपुर्द किया गया।

(1) इस तिलिस्मी इमारत के इर्द-गिर्द जिन मेहमानों के डेरे पड़े हैं, उन्हें किसी बात की तकलीफ तो नहीं होती, इस बात को बराबर मालूम करते रहने का काम भूतनाथ के सुपुर्द किया गया-

(2) मोदी, बनिए और हलवाई वगैरह किसी से किसी चीज का दाम तो नहीं लेते, इस बात की तहकीकात के लिए रामनारायण ऐयार मुकर्रर किए गए।

(3) रसद वगैरह के काम में कहीं किसी तरह की बेईमानी तो नहीं होती, या चोरी का नाम तो किसी की जुबान से नहीं सुनाई देता, इसको जानने और शिकायतों के करने पर चुन्नीलाल ऐयार तैनात किए गए।

(4) इस तिलिस्मी इमारत से लेकर चुनारगढ़ तक की सड़क और उसकी सजावट का काम पन्नालाल और पण्डित बद्रीनाथ के जिम्मे किया गया।

(5) चुनारगढ़ में बाहर से न्यौते में आए हुए पण्डितों की खातिरदारी और पूजा-पाठ इत्यादि के सामान की दुरुस्ती का बोझ जगन्नाथ ज्योतिषी पर डाला गया।

(6) बारात और महफिल वगैरह की सजावट तथा उसके सम्बन्ध में जो कुछ काम हो, उसके जिम्मेवार तेजसिंह बनाये गये।

(7) आतिशबाजी और अजायबातों के तमाशे तैयार करने के साथ-ही-साथ उसी तरह की एक इमारत के बनवाने का हुक्म इन्द्रदेव को दिया गया, जैसी इमारत के अन्दर हँसते-हँसते इन्द्रजीतसिंह वगैरह एक दफे कूद गये थे, और जिसका भेद अभी तक खोला नहीं गया है।

(8) पन्नालाल वगैरह के बदले में रणधीरसिंहजी के डेरे की हिफाजत तथा किशोरी, कामिनी वगैरह की निगरानी के जिम्मेवार देवीसिंह बनाये गये।

(9) ब्याह-सम्बन्धी खर्च की तह्वील (रोकड़) राजा गोपालसिंह के हवाले की गई।

(10) कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ रहकर उनके विवाहसम्बन्धी शान-शौकत और जरूरतों को कायदे के साथ निभाने के लिए भैरोंसिंह और तारासिंह छोड़ दिये गये।

(11) हरनामसिंह को अपनी मातहती में लेकर जीतसिंह ने यह काम अपने जिम्मे ले लिया कि हर एक के कामों की जाँच और निगरानी रखने के अतिरिक्त कुछ कैदियों को भी किसी उचित ढंग से इस विवाहोत्सव के तमाशे दिखा देंगे, ताकि वे लोग भी देख लें, कि जिस शुभ दिन के हम बाधक थे, वह आज किस खुशी और खूबी के साथ बीत रहा है और सर्वसाधारण भी देख लें, कि धन-दौलत और ऐश-आराम के फेर में पड़कर अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मारने वाले, छोटे होकर बड़ों के साथ पैर बांध के नतीजा भोगने वाले, मालिक के साथ में नमकहरामी और उग्र पाप करने का कुछ फल इस जन्म में भी भोग लेने वाले, और बदनीयती तथा पाप के साथ ऊंचे दर्जे पर पहुंचकर यकायक रसातल में पहुँच जानेवाले, धर्म और ईश्वर से सदा विमुख रहने वाले ये ही प्रायश्चित्ती लोग हैं।

इन सबके साथ मातहती में काम करने के लिए आदमी भी काफी तौर पर दिए गये।

इनके अतिरिक्त और लोगों को भी तरह-तरह के काम सुपुर्द किए गए और सब कोई बड़ी खूबी के साथ अपना-अपना काम करने लगे।

अब हम थोड़ा-सा हाल कुँअर इन्द्रजीतसिंह का बयान करेंगे, जिन्हें इस बात का बहुत ही रंज है कि कमलिनी की शादी किसी दूसरे के साथ हो गई, और वे उम्मीद ही में बैठे रह गये।

रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी है और कुँअर इन्द्रजीतसिंह अपने कमरे में बैठे भैरोंसिंह से धीरे-धीरे बातें कर रहे हैं। इन दोनों के सिवाय कोई तीसरा आदमी इस कमरे में नहीं है और कमरे का दरवाजा भी भिड़वाया हुआ है।

भैरोंसिंह--तो आप साफ-साफ कहते क्यों नहीं कि आपकी उदासी का सबब क्या है? आपको तो आज खुश होना चाहिए, कि जिस काम के लिए आप बरसों परेशान रहे, जिसकी उम्मीद में तरह-तरह की तकलीफ उठाई, जिसके लिए हथेली पर जान रखकर बड़े-बड़े दुश्मनों से मुकाबला करना पड़ा और जिसके होने या मिलने पर ही तमाम दुनिया की खुशी समझी जाती थी, आज वही काम आपकी इच्छानुसार हो रहा है, और उसी किशोरी के साथ आपकी शादी का इन्तजाम हम अपनी आँखों से देख रहे हैं, फिर भी ऐसी अवस्था में आपको उदास देखकर कौन ऐसा है जो ताज्जुब न करेगा?

इन्द्रजीतसिंह--बेशक, मेरे लिए आज यह बड़ी खुशी का दिन है, और मैं खुश हूँ भी, मगर कमलिनी की तरफ से जो रंज मझे हुआ है, उसे हजार कोशिश करने पर भी मेरा दिल बर्दाश्त नहीं कर पाता।

भैरोंसिंह--(ताज्जुब का चेहरा बनाकर)हैं, कमलिनी की तरफ से और आपको रंज! जिसके अहसानों के बोझ से आप दबे हुए हैं, उसी कमलिनी से रंज! यह आप क्या कह रहे हैं?

इन्द्रजीतसिंह–-इस बात को तो मैं खुद ही कह रहा हूँ, कि उसके अहसानों के वोझ से मैं जिन्दगी-भर हलका नहीं हो सकता और अब तक उसके जी में मेरी भलाई का ध्यान बंधा ही हुआ है, मगर रंज इस बात का है कि अब मैं उसे उस मुहब्बत की निगाह से नहीं देख सकता जिससे पहले देखता था।

भैरोंसिंह--सो क्यों? क्या इसलिए कि अब वह अपनी ससुराल चली जायेगी, और फिर उसे आप पर अहसान करने का मौका न मिलेगा?

इन्द्रजीतसिंह--हाँ, करीब-करीब यही बात है।

भैरोंसिंह--मगर अब आपको उसकी मदद की जरूरत भी तो नहीं है। हां, इस बात का खयाल बेशक हो सकता है कि अब आप उसके तिलिस्मी मकान पर कब्जा न कर सकेंगे।

इन्द्रजीतसिंह--नहीं-नहीं, मुझे इस बात की कुछ जरूरत नहीं है, और न इसका कुछ खयाल ही है!

भैरोंसिंह--तो इस बात का खयाल है कि उसने अपनी शादी में आपको न्यौता नहीं दिया? मगर वह एक हिन्दू लड़की की हैसियत से ऐसा कर भी तो नहीं सकती थी! हाँ, इस बात की शिकायत आप राजा गोपालसिंहजी से जरूर कर सकते हैं, क्योंकि उस काम के कर्ता-धर्ता वे ही हैं।

इन्द्रजीतसिंह--उनसे तो मुझे बहुत ही शिकायत है, मगर मैं शर्म के मारे कुछ कह नहीं सकता।

भैरोंसिंह--(चौंककर) शर्म तो तब होती, जब आप इस बात की शिकायत करते कि मैं खुद उससे शादी करना चाहता था।

इन्द्रजीतसिंह--हाँ, बात तो ऐसी ही है। (मुस्कराकर) मगर तुम तो पागलों की-सी बातें करते हो।

भैरोंसिंह--(हँसकर) यह कहिए न कि आप दोनों हाथ लड्डू चाहते थे! तो इस चोर को आप इतने दिनों तक छिपाए क्यों रहे?

इन्द्रजीतसिंह--तो यही कब उम्मीद हो सकती थी कि इस तरह यकायक गुमसुम उसकी शादी हो जायेगी।

भैरोंसिंह--खैर, अब तो जो कुछ होना था सो हो गया, मगर आपको इस बात का खयाल न करना चाहिए। इसके अतिरिक्त क्या आप समझते हैं, कि किशोरी इस बात को पसन्द करती? कभी नहीं, बल्कि आये दिन का झगड़ा पैदा हो जाता।

इन्द्रजीतसिंह--नहीं, किशोरी से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं हो सकती। खैर, अब इस विषय पर बहस करना व्यर्थ है, मगर मुझे इसका रंज जरूर है। अच्छा, यह तो बताओ, तुमने उन्हें देखा है जिनके साथ कमलिनी की शादी हुई?

भैरोंसिंह--कई दफे, बातें भी अच्छी तरह कर चुका हूँ।

इन्द्रजीतसिंह--कैरो हैं?

भैरोसिंह--बड़े लायक, पढ़े-लिखे, पण्डित, बहादुर, दिलेर, हँसमुख और सुन्दर।

इस अवसर पर आवेंगे ही, आप भी देख लीजिएगा। आपने कमलिनी से इस बारे में कुछ बातचीत नहीं की?

इन्द्रजीतसिंह--इधर तो नहीं, मगर तिलिस्म की सैर को जाने से पहले मुलाकात हुई थी, उसने खुद मुझे बुलाया था, बल्कि उसी की जुबानी उसकी शादी का हाल मुझे मालूम हुआ था। मगर उसने मेरे साथ विचित्र ढंग का बर्ताव किया।

भैरोंसिंह–-सो क्या? इन्द्रजीतसिंह--(जो कुछ कैफियत हो चुकी थी, उसे बयान करने के बाद)तुम इस बर्ताव को कैसा समझते हो?

भैरोंसिंह--बहुत अच्छा और उचित।

इसी तरह की बातचीत हो रही थी कि पहले दिन की तरह बगल वाले कमरे का दरवाजा खुला, और एक लौंडी ने आकर सलाम करने के बाद कहा, "कमलिनीजी आपसे मिलना चाहती हैं, आज्ञा हो तो।"

इन्द्रजीतसिंह--अच्छा, मैं चलता हूं, तू दरवाजा बन्द कर दे।

भैरोंसिंह–-अब मैं भी जाकर आराम करता हूँ।

इन्द्रजीतसिंह--अच्छा, जाओ, फिर कल देखा जायेगा।

लौंडी–-इनसे (भैरोंसिंह से) भी उन्हें कुछ कहना है।

यह कहती हुई लौंडी ने दरवाजा बद कर दिया, तब तक स्वयं कमलिनी इस कमरे में आ पहुंची, और भैरोंसिंह की तरफ देखकर बोली, (जो उठकर बाहर जाने के लिए तैयार था) "आप कहाँ चले? आप ही से तो मुझे बहुत-सी शिकायत करनी है।"

भैरोंसिंह–-सो क्या?

कमलिनी--अब उसी कमरे में चलिये, वहीं बातचीत होगी।

इतना कहकर कमलिनी ने कुमार का हाथ पकड़ लिया, और अपने कमरे की तरफ ले चली, पीछे-पीछे भैरोंसिंह भी गये। लौंडी दरवाजा बन्द करके दूसरी राह से बाहर चली गई और कमलिनी ने इन दोनों को उचित स्थान पर बैठाकर पानदान आगे रख दिया और भैरोंसिंह से कहा, "आप लोग तिलिस्म की सैर कर आये और मुझे पूछा भी नहीं!"

भैरोंसिंह–-महाराज खुद कह चुके हैं कि शादी के बाद औरतों को भी तिलिस्म की सैर करा दी जाये और फिर तुम्हारे लिए तो कहना ही क्या है। तुम तो जब भी चाहो, तभी तिलिस्म की सैर कर सकती हो।

कमलिनी--ठीक है, मानो यह मेरे हाथ की बात है!

भैरोंसिंह--ऐसा ही है।

कमलिनी--(हंसकर) टालने के लिए यह अच्छा ढंग है! खैर, जाने दीजिये, मुझे कुछ ऐसा शौक भी नहीं है। हाँ, यह बताइए कि वहाँ क्या-क्या कैफियत देखने में आई? मैंने सुना कि भूतनाथ वहाँ बड़े चक्कर में पड़ गया था और उसकी पहली स्त्री भी वहाँ दिखाई पड़ गई।

भैरोंसिंह--बेशक ऐसा ही हुआ।

इतना कहकर भैरोंसिंह ने कुल हाल खुलासा बयान किया और इसके बाद कमलिनी ने इन्द्र जीतसिंह से कहा, "खैर. आप बताइए कि शादी की खुशी में मुझे क्या इनाम मिलेगा?"

इन्द्रजीतसिंह--(हँसकर) गालियों के सिवाय और किसी चीज की तुम्हें कमी ही क्या है जो मैं दूं?

कमलिनी–-(भैरोंसिंह से)सुन लीजिये, मेरे लिए कैसा अच्छा इनाम सोचा गया है! (कुमार से हँसकर) याद रखियेगा, इस जवाब के बदले मैं आपको ऐसा छकाऊँगी कि खुश हो जाइयेगा!

भैरोंसिंह–-इन्हें तो तुम छका चुकी हो, अब इससे बढ़कर क्या होगा कि चुपचाप दूसरे के साथ शादी कर ली, और इन्हें अंगठा दिखा दिया। अब तुम्हें ये गालियां न दें तो क्या करें!

कमलिनी--(मुस्कराती हुई) आपकी रा। भी यही है?

भैरोंसिंह--बेशक!

कमलिनी–-तो बेचारी किशोरी के साथ आप यह अच्छा सलूक करते हैं!

भैरोंसिंह--इसका इल्जाम तो कुमार के ऊपर हो सकता है!

कमलिनी–-हाँ, साहब, आज के मर्दो की मुरोवत जो कुछ न कर दिखाए थोड़ा है मैं किशोरी बहिन से इसका जिक्र करूंगी।

भैरोंसिंह--तब तो अहसान पर अहसान करोगी।

इन्द्रजीतसिंह–-(भैरोंसिंह से) तुम भी व्यर्थ की छेड़छाड़ मचा रहे हो, भला इन बातों से क्या फायदा?

भैरोंसिंह--व्याद-शादी में ऐसी बातें हुआ ही करती हैं!

इन्द्रजीतसिंह--तुम्हारा सिर हुआ करता है! (कमलिनी से)अच्छा, यह बताओ कि इस समय तुमने मुझे क्यों याद किया?

कमलिनी–-हरे राम! अब क्या मैं ऐसी भारी हो गई कि मुझसे मिलना भी बुरा मालूम होता है?

इन्द्रजीतसिंह--नहीं-नहीं, अगर मिलना बुरा मालूम होता तो मैं यहाँ आता ही क्यों? पूछता हूँ कि आखिर कोई काम भी है या?

कमलिनी–-हाँ, है तो सही।

इन्द्रजीतसिंह--कहो!

कमलिनी--आपको शायद मालूम होगा कि मेरे पिता जब से यहाँ आये हैं, उन्होंने अपने खाने-पीने का इन्तजाम अलग रखा है, अर्थात् आपके यहाँ का अन्न नहीं खाते और न कुछ अपने लिए खर्च कराते हैं।

इन्द्रजीतसिंह-हाँ, मुझे मालूम है।

कमलिनी--अब उन्होंने इस मकान में रहने से भी इनकार किया है। उनके एक मित्र ने खेमे वगैरह का इन्तजाम कर दिया है, और वे उसी में अपना डेरा उठाकर जाने वाले हैं।

इन्द्रजीतसिंह--यह भी मालूम है।

कमलिनी--मेरी इच्छा है कि यदि आप आप आज्ञा दें, तो लाडिली को साथ लेकर मैं भी उसी डेरे में चली जाऊँ।

इन्द्रजीतसिंह--क्यों? तुम्हें यहाँ रहने में परहेज ही क्या हो सकता है?

कमलिनी--नहीं-नही, मुझे किस बात का परहेज होगा, मगर यों ही जी चाहता है कि मैं दो-चार दिन अपने बाप के साथ ही रहकर उनकी खिदमत करूं।

इन्द्रजीतसिंह--यह दूसरी बात है, इसकी इजाजत तुम्हें अपने मालिक से लेनी चाहिए। मैं कौन हूँ जो इजाजत दूं?

कमलिनी--इस समय वे तो यहाँ हैं, नहीं अतः उनके बदले में मैं आप ही को अपना मालिक समझती हूँ।

इन्द्रजीतसिंह--(मुस्कराकर) फिर तुमने वही रास्ता पकड़ा? खैर, मैं इस बात की इजाजत न दूंगा।

कमलिनी--तो मैं आज्ञा के विरुद्ध कुछ न करूंगी।

इन्द्रजीतसिंह–-(भैरोंसिंह इनकी बातचीत का ढंग देखते हो?

भैरोंसिंह–(हँसकर) शादी हो जाने पर भी ये आपको नहीं छोड़ना चाहतीं, तो में क्या करूं?

कमलिनी--अच्छा, मुझे एक बात की इजाजत तो जरूर दीजिए।

इन्द्रजीतसिंह--वह क्या?

कमलिनी--आपकी शादी में मैं आपसे एक विचित्र दिल्लगी करना चाहती हूँ।

इन्द्रजीतसिंह--वह कौन-सी दिल्लगी होगी?

कमलिनी—यह बता दूंगी तो उसमें मजा ही क्या रह जायेगा? बस, आप इतना कह दीजिए कि उस दिल्लगी से रंज न होंगे, चाहे वह कैसी गहरी क्गों न हो।

इन्द्रजीतसिंह—(कुछ सोचकर) खैर, मैं रंज न करूंगा।

इसके बाद थोड़ी देर तक हँसी की बातें होती रहीं, और फिर सब उठकर अपने-अपने ठिकाने चले गये।

१२

ब्याह की तैयारी और हँनी-खुशी में ही कई सप्ताह बीत गये और किसी को कुछ मालूम न हुआ। हाँ; कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को खुशी के साथ ही रंज और उदासी से भी मुकाबला करना पड़ा। यह रंज और उदासी क्यों? शायद कमलिनी और लाड़िली के सबब से हो। जिस तरह कुंअर इन्द्रजीतसिंह कमलिनी से मिलकर और उसकी जुबानी उसके ब्याह का हो जाना सुनकर दुःखी हुए, उसी तरह आनन्दसिंह को भी लाडिली से मिलकर दुःखी होना पड़ा या नहीं सो हम नहीं कह सकते क्योंकि लाड़िली में और आनन्दसिंह में जो बातें हुईं, उसमें और कमलिनी की बातों में बड़ा फर्क है। कमलिनी ने तो खुद इन्द्रजीतसिंह को अपने कमरे में बुलवाया था, मगर लाड़िली ने ऐसा नहीं किया। लाडिली का कमरा भी आनन्दसिंह के कमरे के बगल में ही था। जिस रात कमलिनी में और इन्द्रजीतसिंह में दूसरी मुलाकात हुई थी, उसी रात को आनन्दसिंह ने भी अपने बगल वाले कमरे में लाड़िली को देखा था, मगर दूसरे ढंग से। आनन्दसिंह अपने कमरे में.मसहरी पर लेटे हुए तरह-तरह की बातें सोच रहे थे कि उसी समय बगल वाले कमरे में से कुछ खटके की आवाज आई जिससे आनन्दसिंह चौंके और उन्होंने घूमकर देखा तो उस कमरे का दरवाजा कुछ खुला हुआ नजर आया। इन्हें यह जरूर मालूम था कि हमारे बगल ही में लाड़िली का कमरा है, और उससे मिलने की नीयत से इन्होंने कई दफे दरवाजा खोलना भी चाहा था, मगर बन्द पाकर लाचार हो गये थे। अब दरवाजा खुला पाकर बहुत खुश हुए और मसहरी पर से उठकर धीरे-धीरे दरवाजे के पास गये। हाथ के सहारे दरवाजा कुछ विशेष खोला और अन्दर की तरफ झाँककर देखा। लाड़िली पर निगाह पड़ी जो एक शमादान के आगे बैठी हुई कुछ लिख रही थी। शायद उसे इस बात की कुछ खबर ही न थी कि मुझे कोई देख रहा है।

भीतर सन्नाटा पाकर अर्थात् किसी गैर को न देखकर आनन्दसिंह बेधड़क कमरे के अन्दर चले गये। पैर की आहट पाते ही लाड़िली चौंकी तथा आनन्दसिंह को अपनी तरफ आते देख उठ खड़ी हुई और बोली, "आपने दरवाजा कैसे खोल लिया?"

आनन्दसिंह--(मुस्कराते हुए) किसी हिकमत से!

लाड़िली--क्या आज के पहले वह हिकमत मालूम न थी? शायद सफाई के लिए किसी लौंडी ने दरवाजा खोला हो और बन्द करना भूल गई हो।

आनन्दसिंह--अगर ऐसा ही हो तो क्या कुछ हर्ज है?

लाड़िली--नहीं, हर्ज काहे का है, मैं तो खुद ही आपसे मिलना चाहती थी, मगर लाचारी

आनन्दसिंह--लाचारी कैसी? क्या किसी ने मना कर दिया था?

लाड़िली--मना ही समझना चाहिए, जबकि मेरी बहिन कमलिनी ने जोर देकर कह दिया कि “या तो तू मेरी इच्छानुसार शादी कर ले या इस बात की कसम खा जा कि किसी गैर मर्द से कभी बातचीत न करेगी।" जिस समय उनकी (कमलिनी की) शादी होने लगी थी, उस समय भी लोगों ने मुझ पर शादी कर लेने के लिए दबाव डाला था, मगर मैं इस समय जैसी हूँ, वैसी ही रहने के लिए कसम खा चुकी हूँ। मतलब यह है कि इसी बखेड़े में मुझमें और उनमें कुछ तकरार भी हो गई है।

आनन्दसिंह--(घबराहट और ताज्जुब के साथ)क्या कमलिनीजी की शादी हो गई?

लाड़िली--जी हाँ।

आनन्दसिंह--किसके साथ?

लाड़िली--सो तो मैं नहीं कह सकती, आपको खुद मालूम हो जायेगा।

आनन्दसिंह--यह बहुत बुरा हुआ।

लाड़िली–-बेशक, बहुत बुरा हुआ, मगर क्या किया जाये! जीजाजी (गोपालसिंह) की मर्जी ही ऐसी थी, क्योंकि किशोरी ने ऐसा करने के लिए उन पर बहुत जोर डाला था, अतः कमलिनी बहिन दबाव में पड़ गईं, मगर मैंने साफ इनकार कर दिया, कि जैसी हूँ वैसी ही रहूँगी।

आनन्दसिंह--तुमने बहुत अच्छा किया।

लाड़िली--और मैं ऐसा करने के लिए सख्त कसम खा चुकी हूँ।

आनन्दसिंह--(ताज्जुब से) क्या तुम्हारे इस कहने का यह मतलब लगाया जाय कि अब तुम शादी करोगी ही नहीं?

लाडिली-–बेशक!

आनन्दसिंह--यह तो कोई अच्छी बात नहीं!

लाड़िली-जो हो, अब तो मैं कसम खा चुकी हूँ और बहुत जल्द यहाँ से चली जाने वाली भी हूँ, सिर्फ कामिनी बहिन की शादी हो जाने का इन्तजार कर रही हूँ।

आनन्दसिंह-—(कुछ सोचकर) कहाँ जाओगी?

लाड़िली--आप लोगों की कृपा से अब तो मेरा बाप भी प्रकट हो गया है, अब इसकी चिन्ता ही क्या है?

आनन्दसिंह--मगर जहाँ तक मैं समझता हूँ, तुम्हारे बाप तुम्हें शादी करने के लिए जरूर जोर देंगे।

लाड़िली--इस विषय में उनकी कुछ न चलेगी।

लाड़िली की बातों से आनन्द सिंह को ताज्जुब के साथ-ही-साथ रंज भी हुआ और ज्यादा रंज तो इस बात का था कि अब तक लाड़िली ने खड़े-ही-खड़े बातचीत की और कुमार को बैठने तक के लिए नहीं कहा। शायद इसका यह मतलब हो कि 'मैं ज्यादा देर तक आपसे बात नहीं कर सकती।' अतः आनन्दसिंह को क्रोध और दुःख के साथ लज्जा ने भी धर दबाया और वे यह कहकर कि 'अच्छा मैं जाता हूँ' अपने कमरे की तरफ लौट चले।

आनन्दसिंह के दिल में जो बातें घूम रही थीं, उनका अन्दाजा शायद लाडिली को भी मिल गया और जब वे लौटकर जाने लगे तब उसने पुनः इस ढंग पर कहा मानो उसकी आखिरी बात अभी पूरी नहीं हुई थी-"क्योंकि जिनकी मुझ पर कृपा रहती थी, अब वे और ही ढंग के हो गए!'इस बात ने कुमार को तरदुद में डाल दिया। उन्होंने घूमकर एक तिरछी निगाह लाड़िली पर डाली और कहा, "इसका क्या मतलब?"

लाड़िली--सो कहने की सामर्थ्य मुझ में नहीं है। हाँ, जब आपकी शादी हो जायगी तब मैं साफ-साफ आपसे कह दूंगी। उस समय जो कुछ आप राय देंगे, उसे मैं कबूल भी कर लूंगी!

इस आखिरी बात से कुमार को कुछ हिम्मत बँध गई, मगर बैठने की या और कुछ कहने की हिम्मत न पड़ी और 'अच्छा' कहकर वे वे अपने कमरे में चले आये।

१३

विवाह का सब सामान ठीक हो गया, मगर हर तरह की तैयारी हो जाने पर भी लोगों की मेहनत में कमी नहीं हुई। सब कोई उसी तरह दौड़-धूप और काम-काज में लगे हुए दिखाई दे रहे हैं। महाराज सुरेन्द्र सिंह सभी को लिए हुए चुनारगढ़ चले गए। अब इस तिलिस्मी मकान में सिर्फ जरूरत की चीजों के ढेर और इन्तजामकार लोगों के डेरे भर ही दिखाई दे रहे हैं। इस मकान में से उन लोगों के लिए भी रास्ता बनाया गया है जो हँसते-हँसते उस तिलिस्मी इमारत में कूदा करेंगे जिसके बनाने की आज्ञा इन्द्र देव को दी गई थी और जो इस समय बनकर तैयार हो गई है।

यह इमारत बीस गज लम्बी और इतनी ही चौड़ी थी। ऊँचाई इसकी लगभग चालीस हाथ से कुछ ज्यादा होगी। चारों तरफ की दीवार साफ और चिकनी थी तथा किसी तरफ कोई दरवाजे का निशान दिखाई नहीं देता था। पूरब की तरफ ऊपर चढ़ जाने के लिए छोटी सीढ़ियाँ बनी हुई थीं जिनके दोनों तरफ हिफाजत के लिए लोहे के सींखचे लगा दिए गये थे। उसी पूरब की तरफ वाली दीवार पर दड़े-बड़े हरफों में यह भी लिखा हुआ था--

"जो आदमी इन सीढ़ियों की राह ऊपर जायगा और एक नजर अन्दर की तरफ झांक वहां की कैफियत देखकर इन्हीं सीढ़ियों की राह नीचे उतर आवेगा, उसे एक लाख रुपये इनाम में दिए जायेंगे।"

इस इमारत ने चारों तरफ एक अनूठा रंग पैदा कर दिया था। हजारों आदमी उस इमारत के ऊपर चढ़ जाने के लिए तैयार थे और हर एक आदमी अपनी-अपनी लालसा पूरी करने के लिए जल्दी मचा रहा था, मगर सीढ़ी का दरवाजा बन्द था। पहरेदार लोग किसी को ऊपर जाने की इजाजत नहीं देते थे और यह कह कर सभी को सन्तोष करा देते थे कि बारात वाले दिन यह दरवाजा खुलेगा और पन्द्रह दिन तक बन्द न होगा।

यहां से चुनारगढ़ की सड़क के दोनों तरफ जो सजावट की गई थी, उसमें भी एक अनूठापन था। दोनों तरफ रोशनी के लिए जाफरी बनी हुई थी और उनमें अच्छे-अच्छे नीति के श्लोक दरसाए गये थे। बीच-बीच में थोड़ी-थोड़ी दूर पर नौबतखाने के बगल में एक-एक मचान था जिस पर एक या दो कैदियों के बैठने के लिए जगह बनी हुई थी। जाफरी के दोनों तरफ दस हाथ चौड़ी जमीन में बाग का नमूना तैयार किया गया था और इसके बाद आतिशबाजी लगाई गई थी। आध-आध कोस की दूरी पर सर्वसाधारण और गरीब तमाशबीनों के लिए महफिल तैयार की गई थी और उसके लिए अच्छी-अच्छी गाने वाली रंडियाँ और भाँड़ मुकर्रर किए गए थे। रम्त अंधेरी होने के कारण रोशनी का सामान ज्यादा तैयार किया गया था और वह तिलिस्मी चन्द्रमा जो

दोनों राजकुमारों को तिलिस्म के अन्दर से मिला था, चुनारगढ़ किले के ऊँचे कँगूरे पर लगा दिया गया था जिसकी रोशनी इस तिलिस्मी मकान तक बड़ी खूबी और सफाई के साथ पड़ रही थी।

पाठक, दोनों कुमारों की बारात की सजावट, महफिलों की तैयारी, रोशनी और आतिशबाजी की खूबी, मेहमानदारी की तारीफ और खैरात की बहुतायत इत्यादि का हाल विस्तारपूर्वक लिखकर पढ़ने वालों का समय नष्ट करना हमारी आत्मा और आदत के विरुद्ध है। आप खुद समझ सकते हैं कि दोनों कुमारों की शादी का इन्तजाम किस खूबी के साथ किया गया होगा, नुमाइश की चीजें कैसी अच्छी होंगी, वड़प्पन का कितना बड़ा खयाल किया गया, और बारात किस धूमधाम से निकली होगी। हम आज तक जिस तरह संक्षेप में लिखते आए हैं अब भी उसी तरह लिखेंगे, तथापि हमारी उन लिखावटों से जो ब्याह के सम्बन्ध में ऊपर कई दफे मौके-मौके पर लिखी जा चुकी हैं आपको अन्दाज के साथ-साथ अनुमान करने का हौसला भी मिल जायगा और विशेष सोच-विचार की जरूरत न रहेगी। हम इस जगह पर केवल इतना ही लिखेंगे कि--

बारात बड़े धूम-धाम से चुनारगढ़ के बाहर हुई। आगे-आगे नौबत, निशान और उसके बाद सिलसिले से फौजी सवार, पैदल और तोपखाने वगैरह थे, जिसके बाद ऐसी फुलवारियाँ थीं जिनके देखने से खुशी और लूटने से दौलत हासिल हो। इसके बाद बड़े सजे हुए अम्बारीदार हाथी पर दोनों कुमार हाथी पर ही सवार अपने बड़े बुजुर्गों, रिश्तेदारों और मेहमानों से घिरे हुए धीरे-धीरे दोतर्फी बहार लूटते और दुश्मनों के कलेजों को जलाते हुए जा रहे थे और उनके बाद तरह-तरह की सवारियों और घोड़ों पर बैठे हुए बड़े-बड़े सरदार लोग दिखाई दे रहे थे। अन्त में फिर फौजी सिपाहियों का सिलसिला था। आगे वाले नौबत-निशान से लेकर कुमारों के हाथी तक कई तरह के बाजे वाले अपने मौके से अपना इल्म और हुनर दिखा रहे थे।

कुशलपूर्वक बारात ठिकाने पहुंची और शास्त्रानुसार कर्म तथा रीति होने के बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह का विवाह किशोरी से और आनन्दसिंह का कामिनी के साथ हो गया और इस काम में रणधीरसिंह ने भी वित्त के अनुसार दिल खोलकर खर्च किया। दूसरे रोज पहर भर दिन चढ़ने के पहले ही दोनों बहुओं की रुखसती कराके महाराज चुनार की तरफ लौट पड़े।

चुनारगढ़ पहुँचने पर जो कुछ रस्में थीं वे पूरी होने लगी और मेहमान तथा तमाशबीन लोग नरह-तरह के तमाशों और महफिलों का आनन्द लूटने लगे। उधर तिलिस्मी मकान की सीढ़ियों पर लाख रुपया इनाम पाने की लालसा से लोगों ने चढ़ना आरम्भ किया। जो कोई दीवार के ऊपर पहुंचकर अन्दर की तरफ झाँकता, वह अपने दिल को किसी तरह न सम्हाल सकता और एक दफे खिलखिलाकर हँसने के बाद अन्दर की तरफ कूद पड़ता तथा कई घण्टे के बाद उस चबूतरे वाली बहुत बड़ी तिलिरमी इमारत की राह से बाहर निकल जाता।

बस, विवाह का इतना ही हाल संक्षेप में लिखकर अब हम इस बयान को पूरा करते हैं और इसके बाद सोहागरात की एक बहुत ही अनूठी घटना का उल्लेख करके इस बाईसवें भाग को समाप्त करेंगे क्योंकि हम दिलचस्प घटनाओं का लिखना ही पसन्द करते हैं।

१४

आज कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है क्योंकि तरह-तरह की तकलीफें उठाकर एक मुद्दत के बाद इन दोनों को दिली मुरादें हासिल हुई हैं।

रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है और एक सुन्दर सजे हुए कमरे में ऊँची और मुलायम गद्दी पर किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह बैठे हुए दिखाई देते हैं। यद्यपि कुँअर इन्द्रजीत सिंह की तरह किशोरी के दिल में भी तरह-तरह की उमंगें भरी हुई हैं और वह आज इस ढंग पर कुँअर इन्द्रजीतसिंह की पहली मुलाकात को सौभाग्य का कारण समझती है मगर उस अनोखी लज्जा के पाले में पड़ी हुई किशोरी का चेहरा चूंघट की ओट से बाहर नहीं होता जिसे प्रकृति अपने हाथों से औरत की बुद्धि में जन्म ही से दे देती है। यद्यपि आज से पहले कुँअर इन्द्र जीतसिंह को कई दफे किशोरी देख चुकी है और उनसे बातें भी कर चुकी है तथापि आज पूरी स्वतन्त्रता मिलने पर भी यकायक सूरत दिखाने की हिम्मत नहीं पड़ती। कुमार तरह-तरह की बातें कहकर और समझाकर उसकी लज्जा दूर किया चाहते हैं मगर कृतकार्य नहीं होते। बहुत-कुछ कहनेसुनने पर कभी-कभी किशोरी दो-एक शब्द बोल देती है मगर वह भी धड़कते हुए कलेजे के साथ। कुमार ने सोच लिया कि यह स्त्रियों की प्रकृति है अतएव उसके विरुद्ध जोर न देना चाहिए, यदि इस समय इसकी हिम्मत नहीं खुलती तो क्या हुआ, घण्टे-दो-घण्टे, पहरदो-पहर या एक-दो दिन में खुल ही जायगी! आखिर ऐसा ही हुआ।

इसके बाद किस तरह की छेड़छाड़ शुरू हुई या क्या हुआ, सो हम नहीं लिख सकते, हाँ उस समय का हाल जरूर लिखेंगे, जब धीरे-धीरे सुबह की सफेदी आसमान पर फैाने लग गई थी और नियमानुसार प्रातःकाल बजाई जाने वाली नफीरी की आवाज ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह और किशोरी को नींद से जगा दिया था। किशोरी जो कुंअर इन्द्रजीतसिंह के बगल में सोई हुई थी, घबरा कर उठ बैठी और मुंह धोने तथा बिखरे बालों को सुधारने की नीयत से उस सुनहरी चौकी की तरफ बढ़ी, जिस पर सोने के बर्तन में गंगाजल भरा हुआ था और जिसके पास ही जल गिराने के लिए एक बड़ा सा चाँदी का आफताबा भी रखा हुआ था। हाथ में जल लेकर चेहरे पर लगाने और पुनः अपना हाथ देखने के साथ ही किशोरी चौंक पड़ी और घबरा कर बोली, "हैं! यह क्या मामला है?"

इन शब्दों ने इन्द्रजीतसिंह को चौंका दिया। वे घबड़ा कर किशोरी के पास चले गए और पूछा, "क्यों, क्या हुआ?"

किशोरी--मेरे साथ यह क्या दिल्लगी की गई है?"

इन्द्रजीतसिंह--कुछ कहो भी तो क्या हुआ?

किशोरी--(हाथ दिखा कर) देखिए यह रंग कैसा है, जो चेहरे पर से पानी लगने के साथ ही छूट रहा है।

इन्द्रजीतसिंह--(हाथ देख कर) हाँ है तो सही! मगर मैंने तो कुछ भी नहीं किया, तुम खुद सोच सोच सकती हो कि मैं भला तुम्हारे चेहरे पर रंग क्यों लगाने लगा, मगर तुम्हारे चेहरे पर यह रंग आया ही कहाँ से?

किशोरी--(पुनः चेहरे पर जल लगाकर) यह देखिए, है या नहीं!

इन्द्रजीतसिंह–-सो तो मैं खुद कह रहा हूँ कि रंग जरूर है, मगर जरा मेरी तरफ देखो तो सही!

किशोरी ने जो अब समयानुकूल लज्जा के हाथों से छूट कर ढिठाई का पल्ला पकड़ चुकी थी और जो कई घण्टों की कशमकश और चाल-चलन की बदौलत बातचीत करने लायक समझी जाती थी, कुमार की तरफ देखा और फिर कहा, "देखिए और कहिए, यह किसकी सूरत है?"

इन्द्रजीतसिंह--(और भी हैरान होकर) बड़े ताज्जुब की बात है! और इस रंग छूटने से तुम्हारा चेहरा भी कुछ बदला हुआ सा मालूम पड़ता है! अच्छा, जरा अच्छी तरह से मुंह धो डालो! किशोरी ने 'अच्छा' कह मुंह धो डाला और रूमाल से पोंछने के बाद कुमार की तरफ देख कर बोली, "बताइए, अब कैसा मालूम पड़ता है? रंग अब छूट गया या अभी नहीं?"

इन्द्रजीतसिंह--(घबराकर) हैं! अब तो तुम साफ कमलिनी मालूम पड़ती हो! यह क्या मामला है?

किशोरी–-मैं कमलिनी तो नहीं हुई हूँ। क्या पहले कोई दूसरी मालूम पड़ती थी?

इन्द्रजीतसिंह--बेशक! पहले तुम किशोरी मालूम पड़ती थीं, कम रोशनी और कुछ लज्जा के कारण यद्यपि बहुत अच्छी तरह तुम्हारी सूरत रात को देखने में नहीं आई, तथापि मौके-मौके पर कई दफे निगाह पड़ ही गई थी। अतः किशोरी के सिवाय दूसरी औरत होने का गुमान भी नहीं हो सकता था! मगर सच तो यह है कि तुमने मुझे बड़ा धोखा दिया!

कमलिनी--(जिसे अब इसी नाम से लिखना उचित है) मैंने धोखा नहीं दिया, बल्कि आप मुझे इस बात का जवाब तो दीजिए कि अगर आपने मुझे किशोरी समझा था तो इतनी ढिठाई करने की हिम्मत कैसे पड़ी? क्योंकि किशोरी आपकी स्त्री नहीं थी! इन्द्रजीतसिंह--क्या पागलपने की-सी बातें कर रही हो! अगर किशोरी मेरी स्त्री नही थी तो क्या तुम मेरी स्त्री थीं?

कमलिनी--अगर आपने मुझे किशोरी समझा था तो आपको मेरे पास से उठ जाना चाहिए था। जब कि आप जानते हैं कि किशोरी कुमार के साथ ब्याही गई है तो आपको उसके पास बैठने या उससे बातचीत करने का क्या हक था?

इन्द्रजीतसिंह--तो क्या मैं इन्द्रजीत नहीं हूँ? बल्कि उचित तो यह था कि तुम मेरे पास से उठ जातीं। जब तुम कमलिनी थीं तो तुम्हें पराये मर्द के पास बैठना भी न चाहिए था।

कमलिनी--(ताज्जुब और कुछ क्रोध का चेहरा बना कर) फिर आप वही बातें कहे जाते हैं? आप अपने को समझ ही क्या रहे हैं? पहले आप आईने में अपनी सूरत देखिए और तब कहिए कि आप किशोरी के पति हैं या कमलिनी के! (आले पर से आईना उठा और कुमार को दिखाकर) अन बताइये, आप कौन हैं? और मैं क्यों आपके पास से उठ जाती?

अब तो कुमार के ताज्जुब की कोई हद न रही, क्योंकि आईने में उन्होंने अपनी सूरत में फर्क पाया। यह तो नहीं कह सकते थे कि किस आदमी की सूरत मालूम पड़ती है। क्योंकि ऐसे आदमी को कभी देखा भी न था, मगर इतना जरूर कह सकते थे कि सूरत बदल गई और अब मैं इन्द्रजीतसिंह नहीं मालूम पड़ता। इन्द्रजीत सिंह समझ गए कि किसी ने मेरे और कमलिनी के साथ चालबाजी करके दोनों का धर्म नष्ट किया और इसमें बेचारी कमलिनी का कोई कसूर नहीं है। मगर फिर भी कमलिनी को आज का सामान देख कर चौंकना चाहिए था। हां, ताज्जुब की बात यह है कि इस घर में आने के पहले मुझे किसी ने टोका भी नहीं! तो क्या इस घर में आने के बाद मेरी सूरत बदली गई? मगर ऐसा भी क्योंकर हो सकता है?—इत्यादि बातें सोचते हुए कुमार कमलिनी का मुंह देखने लगे। कमलिनी ने आईना हाथ से रख दिया और पूछा, "अब बताइये, आप कौन हैं?" इसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "अब मैं भी अपना मुंह धो डालूं तो कहूँ।"

यह कहकर कुमार ने भी जल से अपना चेहरा साफ किया और रूमाल से पोंछने के बाद कमलिनी की तरफ देखकर कहा–'अब तुम ही बताओ कि मैं कौन हूँ?"

कमलिनी--अरे, यह क्या हुआ! तुम तो बेशक बड़े कुमार हो? मगर तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? तुम्हें जरा भी धर्म का विचार न हुआ? बताओ, अब मैं किस लायक रह गई और क्या कर सकती हूँ? लोगों को कैसे अपना मुँह दिखाऊँगी और इस दुनिया में क्योंकर रहूँगी?

इन्द्रजीतसिंह--जिसने ऐसा किया वह बेशक मारे जाने लायक है। मैं उसे कभी न छोडूंगा क्योंकि ऐसा होने से मेरा भी धर्म नष्ट हुआ है। और इस बदमाशी को मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता, मगर यह तो बताओ कि आज का सामान देखकर तुम्हारे दिल में किसी प्रकार का शक पैदा न हुआ?

कमलिनी--क्योंकर शक पैदा हो सकता था, जब कि आप ही की तरह मेरे लिए भी 'सोहाग रात' आज ही तय गई थी! मैं नहीं कह सकती थी कि दूसरी तरफ का क्या हाल है! ताज्जुब नहीं कि जिस तरह मैं धोखे में डाली गई, उसी तरह किशोरी के साथ भी बेईमानी की गई हो और आपके बदले में किशोरी मेरे पति के पास पहुंचाई गई हो!

ओ हो! कमलिनी की इस बात ने तो कुमार की रही-सही अक्ल भी खो दी!

जिस बात का अब तक कुमार के दिल में ध्यान भी न था, उसे समझा कर तो कमलिनी ने अनर्थ कर दिया। ब्याह हो जाने पर भी किशोरी किसी दूसरे मर्द के पास भेजी जाय, क्या इस बात को कुमार बर्दाश्त कर सकते थे? कभी नहीं! सुनने के साथ ही मारे क्रोध के उनका शरीर काँपने लगा और वे घबरा कर कमलिनी से बोले, "यह तो तुमने ठीक कहा! ताज्जुब नहीं कि ऐसा हुआ हो। लेकिन अगर ऐसा हुआ होगा तो मैं उन दोनों को इस दुनिया से उठा दूंगा!"

इतना कहकर कुमार ने अपनी तलवार उठा ली जो गद्दी पर पड़ी हुई थी और कमरे के बाहर जाने लगे। उस समय कमलिनी ने कुमार का हाथ पकड़ लिया और कहा, "कृपानिधान, जरा मेरी एक बात का जवाब दे दीजिये तो यहाँ से जाइये!"

इन्द्रजीतसिंह--कहो।

कमलिनी--आपका धर्म नष्ट हुआ, खैर, कोई चिन्ता नहीं, क्योंकि धर्मशास्त्र में मर्दो के लिए कोई कड़ी पाबन्दी नहीं लगाई गई है, मगर औरतों को तो किसी लायक नहीं छोड़ा है। आपके लिए तो प्रायश्चित्त है, मगर मेरे लिए तो कोई प्रायश्चित्त भी नहीं जिसे करके मैं सुधार जाऊँगी, इतना जानकर भी मेरा धर्म नष्ट होने पर आपको उतना रंज या क्रोध नहीं हुआ, जितना यह सोच कर हुआ कि किशोरी की भी ऐसी ही दशा हुई होगी! ऐसा क्यों? क्या मेरा पति कमजोर और नामर्द है? क्या वह भी आपकी ही तरह क्रोध में न आया होगा? क्या इसी तरह वह भी तलवार लेकर मेरी और आपकी खोज में न निकला होगा? आप जल्दी क्यों करते हैं, वह खुद यहाँ आता होगा क्योंकि वह आपसे ज्यादा क्रोधी है, मैं तो खुद उसके सामने अपनी गर्दन झुका दूंगी!

कुमार को क्रोध-पर-क्रोध, रंज-पर-रंज और अफसोस-पर-अफसोस होता ही जाता था। कमलिनी की इस आखिरी बात ने कुमार के दिल में दूसरा ही रंग पैदा कर दिया। उन्होंने घबरा कर एक लम्बी सांस ली और ऊपर की तरफ मुंह करके कहा, "विधाता! टूने यह क्या किया? मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके बदले में इस खुशी को ऐसे रंज के साथ तूने बदल दिया! अब मैं क्या करूँ? क्या अपने हाथ से अपना गला काटकर निश्चिन्त हो जाऊँ? मुझ पर आत्मघात का दोष तो नहीं लगाया जायगा!"

इन्द्रजीतसिंह ने इतना ही कहा था कि कमरे का वह दरवाजा, जिसे कुमार बन्द समझते थे, खुला और किशोरी तथा कमला अन्दर आती हुई दिखाई पड़ी। कुमार ने समझा कि बेशक किशोरी इसी ढंग का उलाहना लेकर आई होगी, मगर उन दोनों के चेहरों पर हँसी देख कर कुमार को ताज्जुब हुआ और यह देख कर उनका ताज्जुब और भी बढ़ गया कि किशोरी और कमला को देख कर कमलिनी खिलखिला कर हँस पड़ी और किशोरी से बोली- "लो बहिन, आज मैंने तुम्हारे पति को अपना बना लिया!" इसके जवाब में किशोरी बोली, "तुमने पहले ही अपना बना लिया था, आज की बात ही क्या है!"