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चन्द्रकान्ता सन्तति अध्याय 6 / 24

विषय-सूची

  1. 1 पहला भाग
  2. 2 दूसरा भाग
  3. 3 तीसरा भाग
  4. 4 चौथा भाग
  5. 5 पाँचवाँ भाग
  6. 6 छठा भाग
  7. 7 सातवाँ भाग
  8. 8 आठवाँ भाग
  9. 9 नौवाँ भाग
  10. 10 दसवाँ भाग
  11. 11 ग्यारहवाँ भाग
  12. 12 बारहवाँ भाग
  13. 13 तेरहवाँ भाग
  14. 14 चौदहवाँ भाग
  15. 15 पन्द्रहवाँ भाग
  16. 16 सोलहवाँ भाग
  17. 17 सत्रहवाँ भाग
  18. 18 अठारहवाँ भाग
  19. 19 उन्नीसवाँ भाग
  20. 20 बीसवाँ भाग
  21. 21 इक्कीसवाँ भाग
  22. 22 बाईसवाँ भाग
  23. 23 तेईसवाँ भाग
  24. 24 चौबीसवाँ भाग

चन्द्रकान्ता सन्तति

छठा भाग

१

वे दोनों साधु, जो सन्दूक के अन्दर झाँक न मालूम क्या देख कर बेहोश हो गए थे, थोड़ी देर बाद होश में आए और चीख-चीख कर रोने लगे। एक ने कहा "हाय हाय इन्द्रजीतसिंह, तुम्हें क्या हो गया! तुमने तो किसी के साथ बुराई न की थी, फिर किस कम्बख्त ने तुम्हारे साथ बदी की? प्यारे कुमार, तुमने बड़ा बुरा धोखा दिया, हम लोगों को छोड़ कर चले गए, क्या दोस्ती का हक इसी तरह अदा करते हैं? हाय, हम लोग जी कर क्या करेंगे, अपना काला मुँह ले कर कहाँ जाएँगे? हमको अपने भाई से बढ़कर मानने वाला अब दुनिया में कौन रह गया! तुम हमें किसके सुपुर्द करके चले गये?"

दूसरा बोला––"प्यारे कुमार, कुछ तो बोलो! जरा अपने दुश्मनों का नाम तो बताओ, कुछ कहो तो सही कि किस बेईमान ने तुम्हें मार कर इस सन्दूक में डाल दिया? हाय अब हम तुम्हारी माँ बेचारी चन्द्रकान्ता के पास कौन मुँह लेकर जायेंगे? किस मुँह से कहेंगे कि तुम्हारे प्यारे होनहार लड़के को किसी ने मार डाला! नहीं-नहीं, ऐसा न होगा, हम लोग जीते जी अब लौट कर घर न जायँगे, इसी जगह जान दे देंगे। नहीं नहीं, अभी तो हमें उससे बदला लेना है जिसने हमारा सर्वनाश कर डाला। प्यारे कुमार, जरा तो मुँह से बोलो, जरा आँखें खोल कर देखो तो सही, तुम्हारे पास कौन खड़ा रहा है। क्या तुम हमें भूल गए? हाय, यह यकायक कहाँ से गजब आकर टूट पड़ा!"

अब तो पाठक समझ गए होंगे कि इस सन्दूक में कुँअर इन्द्रजीतसिंह की लाश थी और ये दोनों साधु उनके दोस्त भैरोंसिंह और तारासिंह थे। इन दोनों के रोने से कामिनी असल बात समझ गई, वह झट कोठरी के बाहर निकल आई और मोमबत्ती की रोशनी में कुमार की लाश देख जोर-जोर से रोने लगी। किशोरी इस तहखाने के बगल वाली कोठरी में थी। उसने जो कुँअर इन्द्रजीतसिंह का नाम ले-लेकर रोने की आवाज सुनी तो उसकी अजब हालत हो गई। उसका पका हुआ दिल इस लायक न था कि इतनी ठेस सम्हाल सके, बस एक दफे 'हाय' की आवाज तो उसके मुँह से निकली मगर फिर तन-बदन की सुध न रही। वह ऐसी जगह न थी कि कोई उसके पास जाए या सम्हाले और देखें कि उसकी क्या हालत है।

भैरोसिंह और तारासिंह ने जो कामिनी को देखा, तो वह लोग फूट-फूट कर रोने लगे। तहखाने में हाहाकार मच गया। घंटे भर यही हालत रही। जब कामिनी ने रो क्या कहा कि 'इसी बगल वाली कोठरी में बेचारी किशोरी भी है,हाय,हम लोगों का रोना सुनकर उस बेचारी की क्या अवस्था हुई होगी।'तब भैरोसिंह और तारासिंह चुप हुए और कामिनी का मुंह देखने लगे।

भैरोसिंह——तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि यहां किशोरी भी है?

कामिनी——मैं उससे बातें कर चुकी हूं।

तारासिंह-क्या तुम बड़ी देर से इस तहखाने में हो?

कामिनी-देर क्या, मैं तो कई दिनों से भूखी प्यासी इस तहखाने में कैद हूं। (उस आदमी की तरफ इशारा करके) या मेरा पहरा देता था।

भैरोसिंह-खैर, जो होना था सो हो गया। अब हम लोग अगर रोने-धोने में लगे रहेंगे, तो इसके दुश्मन का पता ना लगा सकेंगे और न उससे बदला ही ले सकेंगे। यों तो जन्म भर रोना ही है परंतु उसके दुश्मन से बदला ले लेंगे तो कलेजे में कुछ ठंडक पड़ेगी। हाय, जब महाराज यहां आएंगे तो हम किस मुंह से कहेंगे कि तुम्हारे प्यारे लड़के की लाश इस तहखाने में पाई गई।

इसके बाद भैरोसिंह ने इस तहखाने में आने का बाकी हाल कहा तथा यह भी बताया कि"जब खंडार के बाहर कुए पर हम दोनों आदमी बैठे थे, तभी तीन आदमियों की बातचीत से मालूम हो गया कि तुमको उन लोगों ने कैद कर लिया है। परंतु यह आशा न ठीक है हम तुम्हें इस अवस्था मैं देखेंगे। उन लोगों ने मुझे देखा तो पहचान कर डरे और भाग गये, मगर मुझे यह मालूम हुआ कि वह लोग कौन है और उन्होंने मुझे कैसे पहचाना?"

कामिनी-(हाथ का इशारा करके) उन्हीं लोगों में से एक ही अभी है जिसे तुमने बांध रखा है।

भैरोसिंह-(उस आदमी से) बता, तू कौन है?

आदमी-बताने को तो मैं सब-कुछ बता सकता हूं, परंतु मेरी जान किसी तरह न बचेगी।

भैरोंसिंह––क्या तुझे अपने मालिक का डर है?

आदमी––जी हाँ।

भैरोंसिंह––मैं वादा करता हूँ कि तेरी जान बचाऊँगा, और तुझे बहुत-कुछ इनाम भी दिलाऊँगा।

आदमी––इस वादे से मेरी तबीयत नहीं भरती। क्योंकि मुझे तो आप लोगों के ही बचने की उम्मीद नहीं। हाय, क्या आफत में जान फँसी है अगर कुछ कहें तो मालिक के हाथ से मारे जायें और न कहें तो इन लोगों के हाथ से दुःख भोगें!

भैरोंसिंह––तेरी बातों से मालूम होता है कि तेरा मालिक बहुत जल्द ही यहाँ आना चाहता है?

आदमी––बेशक ऐसा ही है।

यह सुनते ही भैरोंसिंह ने तारासिंह के कान में कुछ कहा और उनका ऐयारी का बटुआ लेकर अपना बटुआ उन्हें दे दिया जिसे ले वे तुरन्त वहाँ से रवाना हुए और तहखाने के बाहर निकल गए। तारासिंह ने जल्दी-जल्दी खँडहर के बाहर होकर उस कुएँ में से एक लुटिया पानी खींचा और बटुए में से कोई चीज निकाल कर पत्थर पर रगड़ जल में घोलकर पी ली। फिर एक लुटिया जल निकाल कर वही चीज पत्थर पर घिस पानी में मिलाई और बहुत जल्द तहखाने में पहुँचे। जल की लुटिया भैरोंसिंह के हाथ में दी, भैरोंसिंह ने बटुए से कुछ खाने की चीज निकाली और कामिनी से कहा, "इसे खाकर तुम यह जल पी लो।"

कामिनी––भला खाने और जल पीने का यह कौन-सा मौका है? यद्यपि मैं कई दिनों से भूखी हूँ, परन्तु क्या कुमार की लाश के सिरहाने बैठकर मैं खा सकूँगी, क्या यह अन्न मेरे गले के नीचे उतरेगा?

भैरोंसिंह––हाय! इस बात का मैं कुछ भी जवाब नहीं दे सकता। खैर, इस पानी में से थोड़ा तुम्हें पीना ही पड़ेगा। अगर इससे इन्कार करोगी तो हम सब लोग मारे जायँगे। (धीरे से कुछ कहकर) बस, देर न करो।

कामिनी––अगर ऐसा है तो मैं इन्कार नहीं कर सकती।

भैरोंसिंह ने उस लुटिया में से आधा जल कामिनी को पिलाया और आधा आप पीकर लुटिया तारासिंह के हवाले की। तारासिंह तुरन्त तहखाने में से बाहर निकल आए और जहाँ तक जल्द हो सका, इधर-उधर से सूखी हुई लकड़ियाँ और कण्डे बटोर कर खँडहर के बीच में एक जगह रक्खा, तब बटुए में से चकमक पत्थर निकाला और उसमें से आग झाड़ कर गोठों और लकड़ियों को सुलगाया।

तारासिंह यह सब काम बड़ी फुर्ती से कर रहे थे और घड़ी-घड़ी में खँडहर के बाहर मैदान की तरफ देखते भी जाते थे। आग सुलगाने के बाद जब तारासिंह ने मैदान की तरफ देखा तो बहुत दूर पर गर्द उड़ती हुई दिखाई दी। वह अपने काम में फिर जल्दी करने लगे। बटुए में से एक शीशी निकाली जिसमें किसी प्रकार का तेल था, वह तेल आग में डाल दिया, आग पर दो-तीन दफे पानी का छींटा दिया, फिर मैदान की तरफ देखा। मालूम हुआ कि दस-पन्द्रह आदमी घोड़ों पर सवार बड़ी तेजी से इसी तरफ आ रहे हैं। उस समय तारासिंह के मुँह से यकायक निकल पड़ा––"ओफ, अगर जरा भी देर होती तो काम बिगड़ चुका था, खैर, अब यह लोग कहाँ जा सकते हैं।"

आग में से बहुत ज्यादा धुआँ निकला और खँडहर भर में फैल गया। इसके बाद तारासिंह खँडहर के बाहर निकले और कुएँ के पास जाकर नीम के पेड़ पर चढ़ गए तथा अपने को घने पत्तों की आड़ में छिपा लिया। वह पेड़ इतना ऊँचा था कि उस पर से खँडहर के भीतर का मैदान साफ नजर पड़ता था। वे सवार, जिन्हें तारासिंह ने दूर से देखा था, अब खंडहर के पास आ पहुँचे, तारासिंह ने पेड़ पर चढ़े-चढ़े गिना तो मालूम हुआ कि बारह सवार है। उनमें सबके आगे एक साधु था जिसकी सफेद दाढ़ी नाभि तक पहुँच रही थी।

पाठक,यह वही बाबाजी है जिन्होंने रोहतासगढ़ मैं राजा दिग्विजय सिंह के पास रात के समय पहुँच कर उन्हें भड़काया और राजा बिरेंद्रसिंह वगैरह को कैद कराया था।

खंडहर के पास पहुँचकर वे लोग रुके। घोड़े की बागडोरें पत्थरों से अटका कर दस आदमी तो खंडहर के अन्दर घुसे और दो आदमी घोड़े की हिफाजत के लिए बाहर रह गये।

खंडहर के अंदर धुआँ देखकर बुड्ढे साधु ने कहा, "यह धुआँ कैसा है?"

एक––किसी मुसाफिर ने आकर रसोई बनाई होगी।

दूसरा––मगर धुआँ बहुत कड़वा है।

तीसरा––ओफ, आँखों से और नाक से पानी बहने लगा।

साधु––अगर किसी मुसाफिर ने यहाँ आकर रसोई पकाई होगी तो हांडी, पत्थर और पानी का बर्तन इत्यादि कुछ और भी तो यहाँ दिखाई देता। (एक आदमी की तरफ देख कर) हमें इस दोहे का रंग बेढब मालूम होता है, इसकी कड़वाहट इसकी रंगत और इसकी बू कहे देती है की धुएँ में बेहोशी का असर है। है, है, जरूर ऐसा ही है, कुछ अमल भी आ चला और सिर भी घूमने लगा! (जोर से) अरे बाहादुरो,बेशक तुम लोग धोखे में डाले गए, यहाँ कोई ऐयार आ पहुँचा है,क्या ताज्जुब है, अगर तहखाने में से कामिनी को निकालकर ले गया हो।

नीम के पेड़ पर बैठे हुए तारासिंह उस साधु की सब बातें सुन रहे थे क्योंकि वह नीम का पेड़ खँडहर के फाटक के पास ही था। साधु की बातें अभी पूरी न होने पाई हे के खँडहर के पिछवाड़े की तरफ से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। मालूम होता है कि साधु की आखिरी बात उसने सुन ली थी, क्योंकि पहुँचने के साथ ही उसने पुकार कर कहा,"नहीं-नहीं, कामिनी को कोई निकाल कर नहीं ले गया मगर इसमें भी संदेह नहीं कि वीरेंद्रसिंह के दो ऐयार यहाँ आए हैं,एक तहखाने के अंदर है दूसरा (हाथ से इशारा करके) इस नीम के पेड़ पर चढ़ा हुआ है।"

साधु––बस,तब तो मार लिया। बेशक हम लोग आफत में फँस गए है परंतु कामिनी और इंद्रजीत, यह तुम लोग तहखाने में पहुँचा चुके हो, अब बाहर नहीं जा सकते। ताज्जुब नहीं है कि इन ऐयारों ने इंद्रजीतसिंह को मुर्दा समझ लिया हो! देखो, मैं शाहदरवाजे को अभी ऐसा बन्द करता हूँ की फिर ऐयार का बाप भी तहखाने में नहीं जा सकेगा।

इसके जवाब में उस आदमी ने, जो अभी दौड़ता हुआ आया था, कहाँ की "हमारा एक आदमी भी तहखाने में ही है।"

साधु––खैर,अब तो उसका भी उसी तहखाने में घुट कर मर जाना बेहतर है।

तारासिंह ने उस आदमी को पहचान लिया जो खँडहर के पिछवाड़े की तरफ से दौड़ता हुआ आया था। या उन्हीं दोनों आदमियों में से एक था जो भैरोसिंह और तारासिंह को कुएँ पर देख डर के मारे भाग गए थे। ना मालूम कहाँ छुप रहा था जो इस समय बाबा जी को देखकर बेधड़क आ पहुँचा।

साधु ने धुएँ का ख्याल बिल्कुल ही ना किया और खँडहर के अंदर जाकर न मालूम किस कोठरी में घुस गया।

तारासिंह को कुँअर इन्द्रजीतसिंह के मरने का जितना गम था, उसे पाठक से समझ सकते हैं परन्तु उसको उस समय बड़ा ही आश्चर्य हुआ जब साधु के मुँह से यह सुना कि "ताज्जुब नहीं कि ऐयारों ने इन्द्रजीतसिंह को मुर्दा समझ लिया हो!" बल्कि यों कहना चाहिए कि इस बात से तारासिंह को खुश कर दिया। वे अपने दिल में सोचने लगे कि बेशक हम लोगों ने धोखा खाया, मगर ना मालूम उन्हें कैसी दवा खिलाई गई जिसने बिल्कुल मुर्दा ही बना दिया। यदि इस समय भैरोसिंह के पास पहुँचकर खुशखबरी सुनाई जाती है तो क्या हाँ अच्छी बात थी। मगर कम्बख्त साधु तो कहता है कि मैं शाहदरवाजे को ही बन्द कर देता हूँ जिसने फिर कोई आदमी तहखाने में न जा सके। यदि ऐसा हुआ तो बड़ी ही मुश्किल होगी। इन्द्रजीतसिंह अगर जीते भी है तो अब मर जायेंगे! न मालूम यह शाहदरवाजा कौन सा है और किस तरह खुलता और बन्द होता है?

वे लोग तो सुन ही चुके थे कि वीरेंद्रसिंह का एक ऐयार नीम के पेड़ पर चढ़ा हुआ है। बाबाजी शाहदरवाजा बन्द करने चले गये, मगर तारासिंह को इसकी कुछ भी चिन्ता नहीं थी, क्योंकि वे इस बात को बखूबी जानते थे कि बेहोशी का धुआँ जो इस खँडहर में फैला हुआ है, अब इन लोगों को ज्यादा देर तक ठहरने ना देगा, थोड़ी ही देर में बेहोशी आ जाएगी और फिर किसी योग्य न रहेंगे, और आखिर वैसा ही हुआ।

यद्यपि वे लोग ज्यादा धुएँ में नहीं फँसे थे, तो भी जो कुछ उन लोगों की आँखों और नाक की राह से पेट में चला गया था, वही उन लोगों को बेदम करने के लिए काफी था। वे लोग कुएँ पर आ पहुँचे और चारों तरफ से उस नीम के पेड़ को घेर लिया। इस समय उन लोगों की अवस्था शराबियों की सी हो रही थी। उसी समय तारासिंह ने पेड़ पर से चिल्लाकर कहा, "ओ हो हो हो, क्या अच्छे वक्त पर हमारा मालिका पहुँचा। जब जरूरत इन कमबख्तों की जान जाएगी!"

तारासिंह की बात सुनते ही वे लोग ताज्जुब मैं आ गया और मैदान की तरफ देखने लगे। वास्तव में पूरब की तरफ गर्दन उठ रही थी और मालूम होता था कि किसी राजा की सवारी इस तरफ आ रही है। उन लोगों के दिमाग पर आप बेहोशी का असर अच्छी तरह हो चुका था। वे लोग बैठ गए और फिर जमीन पर लेट कर दिन दुनिया से बेखबर हो गए।

तारासिंह की निगाह उसी गर्द की तरफ थी। धीरे-धीरे आदमी और घोड़े दिखाई देने लगे और जब थोड़ी दूर रह गये तो साफ मालूम होता है कि कई सवालों को साथ लिए राजा वीरेंद्रसिंह आ पहुँचे। ऐयारों ने तेजसिंह और पंडित बद्रीनाथ उनके साथ और मुश्की घोड़े पर सवार कमला आगे आगे जा रही थी। जब तक वे लोग खँडहर के पास आवे, तब तक तारासिंह पेड़ के नीचे उतरे, कुएँ में से एक लुटिया जल निकाल कर मुँह धोया और कुछ आगे बढ़ कर उन लोगों से मिले। वीरेंद्रसिंह ने तारा सिंह से पूछा,"कहो, क्या हाल है?"

तारासिंह––विचित्र हाल है।

वीरेंद्रसिंह––सो क्यों, भैरौं कहाँ है?

तारासिंह––भैरोंसिंह इसी खँडहर के तहखाने में है,और किशोरी, कामिनी तथा कुँवर इन्द्रजीतसिंह भी उसी तक आने में कैद है।

तारासिंह ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह का जो कुछ हाल तहखाने में देखा था, वह किसी से कहना मुनासिब न समझा, क्योंकि सुनते हुए लोग अधमरे हो जाते और किसी काम लायक ना रहते और वीरेंद्रसिंह की तो न मालूम क्या हालत होती, शिवाय इसके यह भी मालूम हो ही चुका था कि कुँवर इन्द्रजीतसिंह मरे नहीं है। ऐसी अवस्था में उन लोगों को बुरी खबर सुनाना बुद्धिमानी के बाहर था, इसलिए तारासिंह ने इन्द्रजीतसिंह के बारे में बहुत-सी बातें बनाकर कहीं, जैसे कि आगे चलकर मालूम होगा।

कुँवर आनंदसिंह ने जब तारासिंह की जुबानी यह सुना कि कामिनी भी इसी तहखाने में कैद है तो बहुत ही खुश हुए और सोचने लगे कि अब थोड़ी देर में माशूका से मुलाकात हुआ ही चाहती है। ईश्वर ने बड़ी कृपा की कि ढूँढ़ने और पता लगाने की नौबत न पहुँची। उन्होंने सोचा कि बस, अब हमारा दु:खान्त नाटक सुखान्त हुआ है चाहता है।

वीरेंद्रसिंह ने तारासिंह से पूछा,"क्या तुमने अपनी आँखों से उन लोगों को इस तहखाने में क्या देखा है?"

तारासिंह––जी हाँ,कुँवर इन्द्रजीतसिंह और कामिनी से तो हम दोनों आदमी मिल चुके हैं और भैरोंसिंह उन दोनों के पास ही है, मगर किशोरी को हम लोग न देख सके, कामिनी की जुबानी मालूम हुआ कि जिस तहखाने में हुआ है उसी के बगल वाली कोठरी में किशोरी भी कैद है। पर कोई तरकीब ऐसी ना निकली जिससे हम लोग किशोरी तक पहुँच सकते।

वीरेंद्रसिंह––क्या यहाँ की कोठरियों और दरवाजों में किसी तरह का भेद है?

तारासिंह––भेद क्या, मुझे तो यह एक छोटा तिलिस्म ही मालूम होता है!

वीरेंद्रसिंह––भला तुम और भैरोंसिंह इन्द्रजीतसिंह के पास तक पहुँच गए तो उसे तहखाने के बाहर क्यों न ले आए?

तारासिंह––(कुछ अटककर) मुलाकात होने पर हम लोग उसी तरह खाने में बैठ कर बातें करने लगे। दुश्मन का एक आदमी उस तहखाने में कैदियों की निगहबानी कर रहा था। कैदी हथकड़ी और बेड़ी के सबब बेबस थे। जब हम दोनों ने उस आदमी को गिरफ्तार किया और हाल जानने के लिए बहुत-कुछ मारा-पीटा, तब वह राह पर आया। उसकी जुबानी मालूम हुआ कि हम लोगों का दुश्मन अर्थात् उसका मालिक बहुत से आदमियों को साथ ले यहाँ आया ही चाहता है। तब भैरोंसिंह ने मुझे कहा कि इस समय हम लोगों का इस तहखाने से बाहर निकलना मुनासिब नहीं है, कौन ठिकाना बाहर निकलकर दुश्मनों से मुलाकात हो जाय। वे लोग बहुत होंगे और हम लोग केवल तीन आदमी हैं ताज्जुब नहीं कि तकलीफ उठानी पड़े, इससे यही बेहतर है कि तुम बाहर जाओ और जब दुश्मन लोग इस खँडहर में आ जायें, तो उन्हें किसी तरह गिरफ्तार करी। उन्हीं की आज्ञा पाकर मैं अकेला तहखाने के बाहर निकल आया और मैंने दुश्मनों को गिरफ्तार भी कर लिया।

तेजसिंह––(खुश होकर और हाथ का इशारा करके) मालूम होता है कि वे लोग जो उस पेड़ के नीचे पड़े हैं और कुछ खँडहर के दरवाजे पर दिखाई देते हैं, सब तुम्हारी ही कारीगरी से बेहोश हुए हैं। उन्हें किस तरह बेहोश किया?

तारासिंह––खँडहर के अन्दर आग सुलगाई और उसमें बेहोशी की दवा डाली, जब तक वे लोग आवें तब तक धुआँ अच्छी तरह फैल गया। ऐसी कड़ी दवा से वे लोग क्योंकर बच सकते थे, जरा-सा धुआँ आँख में लगना बहुत था। दुश्मन के केवल दो आदमी बच गये हैं, (घोड़ों की तरफ देखकर) मालूम होता है, आपको आते देख वे लोग भाग गए, यह क्या हुआ!

तेजसिंह––(चारों तरफ देखकर) जाने दो, क्या हर्ज है। हाँ तो अब हम लोगों को तहखाने में चलना चाहिए।

तारासिंह––शायद अब हम लोग तहखाने में न जा सकें।

कमला––सो क्यों?

तारासिंह––उन लोगों में एक साधु भी था, वह बड़ा ही चालाक और होशियार था। आँख में धुआँ लगते ही समझ गया कि इसमें बेहोशी का असर है, अब दम के दम में हम लोग बेहोश हो जायेंगे। उसी समय एक आदमी ने जो पहले हमलोगों को देखकर भाग गया था और छिपकर मेरी कार्रवाई देख रहा था, पहुँचकर उसे हमलोगों के आने की खबर दे दी और यह भी कह दिया कि अभी तक कामिनी, किशोरी और इन्द्रजीतसिंह तहखाने में हैं बल्कि राजा वीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार भी तहखाने में है। यह सुनते ही वह कुछ खुश हुआ और बोला, "अब हमलोग तो बेहोश हुआ ही चाहते हैं, धोखे में पड़ ही चुके हैं, मगर अब हम यहाँ के शाहदरवाजे को बन्द कर देते हैं, फिर किसी की मजाल नहीं कि तहखाने में जा सके और उन लोगों को निकाल सके जो तहखाने के अन्दर अभी तक बैठे हुए हैं।" इस बात को सुनकर उस जासूस ने कहा कि 'हमलोगों का एक आदमी भी उसी तहखाने में है।' साधु ने जवाब दिया कि 'अब उसका भी उसी में घुटकर मर जाना बेहतर होगा।' फिर न मालूम क्या हुआ और उस साधु ने क्या किया अथवा शादरवाजा कौन है और किस तरह खुलता या बन्द होता है!

तारासिंह की इस बात ने सभी को तरद्दुद में डाल दिया और थोड़ी देर तक वे लोग सोच-विचार में पड़े रहे इसके बाद कमला ने कहा, "पहले खँडहर में चलकर तहखाने का दरवाजा खोलना चाहिए, देखें खुलता है या नहीं, अगर खुल गया तो सोच-विचार की कुछ जरूरत नहीं, यदि न खुल सका तो देखा जायगा।"

इस बात को सभी ने पसन्द किया और राजा वीरेन्द्रसिंह ने कमला को आगे चलने और तहखाने का दरवाजा खोलने के लिए कहा। खँडहर में इस समय धुआँ कुछ भी न था, सब साफ हो चुका था। कमला सभी को साथ लिए हुए उस दालान में पहुँची जहाँ से तहखाने में जाने का रास्ता था। मोमबत्ती जला कर हाथ में ली और बगल वाली कोठरी में जाकर मोमबत्ती तारासिंह के हाथ में दे दी। इस कोठरी में एक आलमारी थी जिसके पल्लों में दो मुढें लगे हुए थे। इन्हीं मुट्ठों के घुमाने से दरवाजा खुल जाता था और फिर एक कोठरी में पहुँच जाने से तहखाने में उतरने के लिए सीढ़ियाँ मिलती थीं। इस समय कमला ने इन्हीं दोनों मुट्ठों को कई वार घुमाया, वे घूम तो गए मगर दरवाजा न खुला। इसके बाद तारासिंह ने और फिर तेजसिंह ने भी उद्योग किया मगर कोई काम न चला। तब तो सभी का जी बेचैन हो गया और विश्वास हो गया कि उस बेईमान साधु ने जो कुछ कहा, सो किया। इस खंडहर में कोई शाहदरवाजा जरूर है जिसे साधु ने बन्द कर दिया और जिसके सबब से यह दरवाजा अब नहीं खुलता।

सब लोग उस कोठरी से बाहर निकले और उस साधु को ढूँढ़ने लगे। खँडहर में और नीम के पेड़ के नीचे आठ आदमी बेहोश हुए थे जो सब इकट्ठे किए गए। दो आदमी जो घोड़ों की हिफाजत करने के लिए रह गये थे और बेहोश नहीं हुए थे वे तो न मालूम कहाँ भाग ही गए थे, अब साधु रह गए सो उनके शरीर का कहीं पता न लगा। चारों तरफ खोज होने लगी।

राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और तारासिंह को साथ लिए हुए कमला उस कोठरी में पहुँची जिसमें दीवार के साथ लगी हुई पत्थर की मूरत थी, जिसमें एक दफे रात के समय कामिनी जा चुकी थी, और जिसका हाल ऊपर के किसी बयान में लिखा जा चुका है। इसी कोठरी में पत्थर की मूरत के पास ही साधु महाशय बेहोश पड़े हुए थे।

तेजसिंह––(मूरत को अच्छी तरह देखकर) मालूम होता है कि शाहदरवाजे से इस मूरत का कोई सम्बन्ध है।

वीरेन्द्रसिंह––शायद ऐसा ही हो, क्योंकि मुझे यह खँडहर तिलिस्मी मालूम होता है। हाय, बेचारा लड़का इस समय कैसी मुसीबत में पड़ा हुआ है। अब दरवाजा खुलने की तरकीब किससे पूछी जाय और उसका कैसे पता लगे? मेरी राय तो यह है कि इस खँडहर में जो कुछ मिट्टी-चूना पड़ा है, सब बाहर फिकवाकर जगह साफ करा दी जाय और दीवार तथा जमीन भी खोदी जाय।

तेजसिंह––मेरी भी यही राय है।

तारासिंह––जमीन और दीवार खुदने से जरूर काम चल जायगा। तहखाने की दीवार खोदकर हम लोग अपना रास्ता निकाल लेंगे, बल्कि और भी बहुत-सी बातों का पता लग जायगा।

वीरेन्द्रसिंह––(तेजसिंह की तरफ देख कर) बहुत जल्द बन्दोबस्त करो और दो आदमी रोहतासगढ़ भेज कर एक हजार आदमी की फौज बहुत जल्द मँगवाओ। वह फौज ऐसी हो कि सब काम कर सके, अर्थात् जमीन खोदने, सेंध लगाने, सड़क बनाने इत्यादि का काम बखूबी जानती हो।

तेजसिंह––बहुत खूब।

राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ-साथ सौ आदमी आये हुए थे। वे सब-के-सब काम में लग गये। बेहोश दुश्मनों के हाथ-पैर बाँध दिये गये और उन्हें उठा कर एक दालान में रख देने के बाद सब लोग खँडहर की मिट्ठी उठा-उठाकर बाहर फेंकने लगे। जल्दी के मारे मालिकों ने भी काम में हाथ लगाया।

रात हो गई। कई मशाल भी जलाये गये, मिट्टी की सफाई बराबर जारी रही, मगर तारासिंह का विचित्र हाल था, उन्हें घड़ी-घड़ी रुलाई आती थी, और उसे वे बड़ी मुश्किल से रोकते थे। यद्यपि तारासिंह ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह का हाल बहुत-कुछ झूठ-सच मिलाकर राजा वीरेन्द्रसिंह से कहा था, मगर वे बखूबी जानते थे कि इन्द्रजीतसिंह की अवस्था अच्छी नहीं है, उनकी लाश तो अपनी आँखों से देख ही चुके थे, परन्तु साधु की बातों ने उनकी कुछ तसल्ली कर दी थी। वे समझ गये थे कि इन्द्रजीतसिंह मरे नहीं, बल्कि बेहोश हैं, मगर अफसोस तो यह है कि यह बात केवल तारासिंह को ही मालूम है, भैरोंसिंह को भी यदि इस बात की खबर होती, तो तहखाने में बैठे-बैठे कुमार को होश में लाने का कुछ उद्योग करते। कहीं ऐसा न हो कि बेहोशी में ही कुमार की जान निकल जाय, ऐसी कड़ी बेहोशी का नतीजा अच्छा नहीं होता है, इसके अतिरिक्त कई दिनों से कुमार बेहोशी की अवस्था में पड़े हैं, बेहोशी भी ऐसी कि जिसने बिल्कुल ही मुर्दा बना दिया, क्या जाने, जीते भी हैं या वास्तव में मर ही गये।

ऐसी-ऐसी बातों के विचार से तारासिंह बहुत ही बेचैन थे, मगर अपने दिल का हाल किसी से कहते नहीं थे।

यहाँ से थोड़ी दूर पर एक गाँव था। कई आदमी दौड़ गये और कुदाल-फावड़ा इत्यादि जमीन खोदने का सामान वहाँ से ले आये और बहुत से मजदूरों को साथ लिवाते आये। रात-भर काम लगा रहा, और सवेरा होते-होते तक खँडहर साफ हो गया।

अब उस दालान की खुदाई शुरू हुई, जिसके बगल वाली कोठरी के अन्दर से तहखाने में जाने का रास्ता था। हाथ-भर तक जमीन खुदने के बाद लोहे की सतह निकल आई, जिसमें छेद होना भी मुश्किल था। यह देखकर वीरेन्द्रसिंह को भी बहुत रंज हुआ और उन्होंने खण्डहर के बीच की जमीन अर्थात् चौक को खोदने का हुक्म दिया।

दूसरे दिन चौक की खुदाई से छुट्टी मिली। खुद जाने पर वहाँ एक छोटी-सी खूबसूरत बावली निकली; जिसके चारों तरफ छोटी-छोटी संगमरमर की सीढ़ियाँ थीं। यह बावली दस गज से ज्यादा गहरी न थी, और इसके नीचे की सतह तीन गज चौड़ी और इतनी ही लम्बी होगी। दो पहर दिन चढ़ते-चढ़ते उस बावली की मिट्टी निकल गई और नीचे की सतह में एक पीतल की एक मूरत दिखाई पड़ी। मूरत बहुत बड़ी न थी, एक हिरन का शेर ने शिकार किया था, हिरन की गर्दन का आधा हिस्सा शेर के मुँह में था। मूरत बहुत ही खूबसूरत और कीमती थी, मगर मिट्टी के अन्दर बहुत दिनों तक दबे रहने से मैली और खराब हो रही थी। वीरेन्द्रसिंह ने उसे अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर साफ करने का हुक्म दिया।

वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह से कहा, "इस खुदाई में समय भी नष्ट हुआ, और काम भी न निकला।"

तेजसिंह––मैं इस मूरत पर अच्छी तरह गौर कर रहा हूँ, मुझे आशा है कि कोई अनूठी बात जरूर दिखाई पड़ेगी।

वीरेन्द्रसिंह––(ताज्जुब में आकर) देखो-देखो, शेर की आँखें इस तरह घूम रहा हैं जैसे वह इधर-उधर देख रहा हो!

आनन्दसिंह––(अच्छी तरह देखकर) हाँ, ठीक तो है!

इसी समय एक आदमी दौड़ता हुआ आया, और हाथ जोड़कर बोला, "महाराज, चारों तरफ से दुश्मन की फौज ने आकर हम लोगों को घेर लिया है। दो हजार सवारों के साथ शिवदत्त आ पहुँचा, जरा मैदान की तरफ देखिए।"

न मालूम शिवदत्त इतने दिनों तक कहाँ छिपा हुआ था, और वह क्या कर रहा था। इस समय दो हजार फौज के साथ उसका यकायक आ पहुँचना और चारों तरफ से खँडहर को घेर लेना बड़ा ही दुखदायी हुआ, क्योंकि वीरेन्द्रसिंह के पास इस समय केवल सौ सिपाही थे।

सूर्य अस्त हो चुका था, चारों तरफ से अँधेरी घिरी चली आती थी। फौज सहित राजा शिवदत्त जब तक खँडहर के पास पहुँचे, तब तक रात हो गई। राजा शिवदत्त को तो यह मालूम ही हो चुका था कि केवल सौ सिपाहियों के साथ राजा वीरेन्द्रसिंह, कुँअर आनन्दसिंह और उनके ऐयार लोग इसी खँडहर में हैं, परन्तु राजा वीरेन्द्रसिंह, कुमार और उनके ऐयारों की वीरता और साहस को भी वह अच्छी तरह जानता था, इसलिए रात के समय खँडहर के अन्दर घुसने की उसकी हिम्मत न पड़ी। यद्यपि उसके साथ दो हजार सिपाही थे, मगर खँडहर के अन्दर डेढ़ दो सौ सिपाहियों से ज्यादा नहीं जा सकते थे, क्योंकि उसके अन्दर ज्यादा जमीन न थी, और वीरेन्द्रसिंह तथा उनके साथी इतने आदमियों को कुछ भी न समझते, इसलिए शिवदत्त ने सोचा कि रात भर इस खँडहर को घेर कर चुपचाप पड़े रहना ही उत्तम होगा। वास्तव में शिवदत्त का विचार बहुत ठीक था और उसने ऐसा ही किया भी। राजा वीरेन्द्रसिंह को भी रात-भर सोचनेविचारने की मोहलत मिली। उन्होंने कई सिपाहियों को फाटक पर मुस्तैद कर दिया और उसके बाद अपने बचाव का ढंग सोचने लगे।

२

इस समय शिवदत्त की खुशी का अन्दाज करना मुश्किल है और यह कोई ताज्जुब की बात भी नहीं है, क्योंकि लड़ाकों और दोस्त ऐयारों के सहित राजा वीरेन्द्रसिंह को उसने ऐसा बेबस कर दिया कि उन लोगों को जान बचाना कठिन हो गया है। शिवदत्त के आदमियों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और उसे निश्चय हो गया कि अब हम पुनः चुनार की गद्दी पावेगे, और इसके साथ ही नौगढ़, विजयगढ़, गयाजी और रोहतासगढ़ की हुकूमत भी बिना परिश्रम हाथ लगेगी।

एक घने वटवृक्ष के नीचे अपने दोस्तों और ऐयारों को साथ लिये शिवदत्त गप्पें उड़ा रहा है। ऊपर एक सफेद चँदोवा तना हुआ है। बिछावन और गद्दी उसी प्रकार की है जैसी मामूली सरदार अथवा डाकुओं के भारी गिरोह के अफसर की होनी चाहिए। दो मशालची हाथ में मशालें लिए सामने खड़े हैं, और इधर-उधर कई जगह आग सुलग रही है। बाकरअली, खुदाबक्श, यारअली और अजायबसिंह ऐयार शिवदत्त के दोनों तरफ बैठे हैं, और सभी की निगाह उन शराब की बोतलों और प्यालों पर बराबर पड़ रही है जो शिवदत्त के सामने काठ की चौकी पर रखे हुए हैं। धीरे-धीरे शराब पीने के साथ-साथ सब कोई शेखी बघार रहे हैं। कोई अपनी बहादुरी की तारीफ कर रहा है, तो कोई वीरेन्द्रसिंह को सहज ही गिरफ्तार करने की तरकीब बता रहा है। शिवदत्त ने सिर उठाया और बाकरअली ऐयार की तरफ देखकर कुछ कहना चाहा, परन्तु उसी समय उसकी निगाह सामने मैदान की तरफ जा पड़ी, और वह चौंक उठा। ऐयारों ने भी पीछे फिरकर देखा और देर तक उसी तरफ देखते रहे।

दो मशालों की रोशनी, जो कुछ दूर पर थी, इसी तरफ आती दिखाई पड़ी। वे दोनों मशाल मामूली न थे, बल्कि मालूम होता था कि लम्बे नेजे या छोटे-से बाँस के सिरे पर बहुत-सा कपड़ा लपेट कर मशाल का काम लिया गया है और उसे हाथ में लिए बल्कि ऊँचा किए हुए दो सवार घोड़ा दौड़ाते इसी तरफ आ रहे हैं। उन्हीं मशालों को देखकर शिवदत्त चौंका था।

बाकरअली ऐयार पेड़ के ऊपर चढ़ गया और थोड़ी देर में नीचे उतरकर बोला, "मशाल लेकर केवल दो सवार ही नहीं हैं, बल्कि और भी कई सवार उनके साथ मालूम होते हैं।"

थोड़ी देर में शिवदत्त के कई आदमी उन सवारों को अपने साथ लिये हुए वहीं आ पहुँचे, जहाँ शिवदत्त बैठा हुआ था। उन सवारों में से एक ने घोड़े पर से उतरने में शीघ्रता की। शिवदत्त ने पहचान लिया कि वह उसका लड़का भीमसेन है। भीमसेन दौड़कर शिवदत्त के कदमों पर गिर पड़ा। शिवदत्त ने प्रेम के साथ उठाकर गले लगा लिया। दोनों की आँखों में आँसू भर आये और देर तक मुहब्बत-भरी निगाहों से एक दूसरे को देखता रह गया। इसके बाद लड़के का हाथ थामे हुए शिवदत्त अपनी गद्दी पर जा बैठा, और भीमसेन से बातचीत करने लगा। उन सवारों ने भी कमर खोली जो भीमसेन के साथ आये थे।

भीमसेन––(गद्गद स्वर से) इन चरणों के दर्शन की कदापि आशा न थी।

शिवदत्त––ठीक है, केवल मेरी ही भूल ने यह सब किया, परन्तु आज मुझ पर ईश्वर की दया हुई है, जिसका सबूत इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि वीरेन्द्रसिंह को मैंने फाँस लिया और मेरा प्यारा लड़का भी मुझसे आ मिला। हाँ, यह कहो, तुम्हें छुट्टी क्योंकर मिली?

भीमसेन––(अपने साथियों में से एक की तरफ इशारा करके) केवल इनकी बदौलत मेरी जान बची। भीमसेन ने उस आदमी को जिसको तरह इशारा किया था अपने पास बुलाया और बैठने का इशारा किया, वह अदब के साथ सलाम करने के बाद बैठ गया। उसकी उम्र लगभग चालीस वर्ष के होगी, शरीर दुबला और कमजोर था। रंग यद्यपि गोरा और आँखें बड़ी थीं परन्तु चेहरे से उदासी और लाचारी पाई जाती थी और यह भी मालूम होता था कि कमजोर होने पर भी क्रोध ने उसे अपना सेवक बना रक्खा है।

भीमसेन––इसी ने मेरी जान बचाई है। यद्यपि यह बहुत दुबला और कमजोर मालूम होता है परन्तु परले सिरे का दिलावर और बात का धनी है और मैं दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि इसके ऐसा चतुर और बुद्धिमान होना आजकल के जमाने में कठिन है। यह ऐयार नहीं है मगर ऐयारों को कोई चीज नहीं समझता! यह रोहतासगढ़ का रहने वाला है, वीरेन्द्रसिंह के कारिन्दों के हाथ से दुःखी होकर भागा और इसने कसम खा ली है कि जब तक वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान का नाम-निशान न मिटा लूँगा अन्न न खाऊँगा, केवल कन्दमूल खाकर जान बचाऊँगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह जो कुछ चाहे कर सकता है। रोहतासगढ़ के तहखाने और (हाथ का इशारा करके) इस खँडहर का भेद भी यह बखूबी जानता है जिसमें वीरेन्द्रसिंह वगैरह लाचार और आपके सिपाहियों से घिरे पड़े हैं। इसने मुझे जिस चालाकी से निकाला उसका हाल इस समय कह कर समय नष्ट करना उचित नहीं जान पड़ता क्योंकि आज ही इस थोड़ी सी बची हुई रात में इसकी मदद से एक भारी काम निकलने की उम्मीद है। अब आप स्वयं इससे बातचीत कर लें।

भीमसेन की बात, जो उस आदमी की तारीफ से भरी हुई थी, खुशी के मारे कूल उठा और उससे स्वयं बातचीत करने लगा।

शिवदत्त––सब के पहले मैं आपका नाम सुनना चाहता हूँ।

रूहा––(धीरे से कान की तरफ झुककर) मुझे लोग बाँकेसिंह कहकर पुकारते थे, परन्तु अब कुछ दिनों के लिए मैंने अपना नाम बदल दिया है। आप मुझे 'रूहा' कहकर पुकारा कीजिए जिसमें किसी को मेरा असल नाम मालूम न हो।

शिवदत्त––जैसा आपने कहा वैसा ही होगा। इस समय तो हमने वीरेन्द्रसिंह को अच्छी तरह घेर लिया है, उनके साथ सिपाही भी बहुत कम हैं जिन्हें हम लोग सहज ही गिरफ्तार कर लेंगे। आपका प्रण भी अब पूरा हुआ ही चाहता है।

रूहा––(मुस्कुरा कर) इस बन्दोबस्त से आप वीरेन्द्रसिंह का कुछ भी नहीं कर सकते।

शिवदत्त––सो क्यों?

रूहा––क्या आप इस बात को नहीं जानते कि इस खँडहर की दीवार बड़ी मजबूत है?

शिवदत्त––बेशक मजबूत है मगर इससे क्या हो सकता है?

रूहा––क्या इस खँडहर के भीतर घुसकर आप उनका मुकाबला कर सकेंगे?

शिवदत्त––क्यों नहीं!

रूहा––कभी नहीं। इसके अन्दर सौ आदमियों से ज्यादे के जाने की जगह नहीं है और इतने आदमियों को वीरेन्द्रसिंह के साथी सहज ही में काट गिरावेंगे।

शिव––हमारे आदमी दीवारों पर चढ़ कर हमला करेंगे और सबसे भारी बात यह है कि वे लोग दो ही तीन दिन में भूख-प्यास से तंग होकर लाचार बाहर निकलेंगे, उस समय उनको मार लेना कोई बड़ी बात नहीं है।

रूहा––सो भी नहीं हो सकता, क्योंकि यह खँडहर एक छोटा सा तिलिस्म है जिसका रोहतासगढ़ के तहखाने वाले तिलिस्म से सम्बन्ध है। इसके अन्दर घुसना और दीवारों पर चढ़ना खेल नहीं है। वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों को इस खँडहर का बहुत कुछ भेद मालूम है और आप कुछ भी नहीं जानते इसी से समझ लीजिए कि आपमें और उनमें क्या फर्क है, इसके अतिरिक्त इस खँडहर में बहुत से तहखाने और सुरंगें भी हैं, जिनसे वे लोग बहुत फायदा उठा सकते हैं।

शिवदत्त––(कुछ सोच कर) आप बड़े बुद्धिमान हैं और इस खंडहर का हाल अच्छी तरह जानते हैं। अब मैं अपना बिल्कुल काम आप ही की राय पर छोड़ता हूँ, जो आप कहेंगे मैं वही करूँगा, अब आप ही कहिये क्या किया जाय?

रूहा––अच्छा मैं आपकी मदद करूँगा और राय दूँगा। पहले आप बतावें कि क्या वीरेन्द्रसिंह के यहाँ आने का सबब आप जानते हैं?

शिवदत्त––नहीं।

रूहा––इसका असल हाल मुझे मालूम हो चुका है। (भीमसेन की तरफ देखकर) उस आदमी का कहना बहुत ठीक है।

भीमसेन––बेशक ऐसा ही है, वह आपका शागिर्द होकर आपसे झूठ कभी नहीं बोलेगा।

शिवदत्त––क्या बात है?

रूहा––हम लोग यहाँ आ रहे थे तो रास्ते में मेरा एक चेला मिला था जिसकी जुबानी वीरेन्द्रसिंह के यहाँ आने का सबब हम लोगों को मालूम हो गया।

शिवदन––क्या मालूम हुआ?

रूहा––इस खँडहर के तहखाने में कुँअर इन्द्रजीतसिंह न मालूम क्यों कर जा फँसे हैं जो किसी तरह निकल नहीं सकते, उन्हीं को छुड़ाने के लिए ये लोग आये हैं। मैं खँडहर के हरएक तहखाने और उसके रास्ते को जानता हूँ, अगर चाहूँ तो कुँअर इन्द्रजीतसिंह को सहज ही निकाल लाऊँ।

शिवदत्त––ओ हो, यदि ऐसा हो तो क्या बात है। परन्तु आपको इस खँडहर में कोई जाने क्यों देगा और बिना खँडहर में गये आप तहखाने के अन्दर पहुँच नहीं सकते।

रूहा––नहीं-नहीं, खँडहर में जाने की कोई जरूरत नहीं हैं, मैं बाहर ही बाहर अपना काम कर सकता हूँ।

शिवदत्त––तो फिर ऐसे काम में क्यों न जल्दी की जाय?

रूहा––मेरी राय है कि आप या आपके लड़के भीमसेन पाँच सौ बहादुरों को साथ लेकर मेरे साथ चलें, यहाँ से लगभग दो कोस जाने के बाद एक छोटा सा टूटा-फूटा मकान मिलेगा, पहले उसे घेर लेना चाहिए।

शिवदत्त––उसके घेरने से क्या फायदा होगा?

रूहा––इस खँडहर में से एक सुरंग गई है जो उसी मकान में निकली है, ताज्जुब नहीं है कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह उस राह सेभाग जायँ इसलिए उस पर कब्जा कर लेना चाहिए। सिवाय इसके एक बात और है!

शिवदत्त––वह क्या?

रूहा––उसी मकान में से एक दूसरी सुरंग उस तहखाने में गई है जिसमें कुँअर इन्द्रजीतसिंह हैं। यद्यपि उस सुरंग की राह से इस तहखाने तक पहुँचते-पहुँचते पाँच दरवाजे लोहे के मिलते हैं जिनका खोलना अति कठिन है परन्तु खोलने की तरकीब मुझे मालूम है। वहाँ पहुँचकर मैं और भी कई काम करूँगा।

शिवदत्त––(खुश होकर) तब तो सबके पहले हमें वहाँ ही पहुँचना चाहिए

रूहा––बेशक ऐसा ही होना चाहिए, पांच सौ सिपाही लेकर आप मेरे साथ चलिये या भीमसेन चलें, फिर देखिये मैं क्या करता हूँ।

शिवदत्त––अब भीमसेन को तकलीफ देना तो मैं पसन्द नहीं करता।

रूहा––यह बहुत थक गये हैं और कैद की मुसीबत उठा कर कमजोर भी हो गये हैं, यहाँ का इन्तजाम इन्हें सुपुर्द कीजिए और आप मेरे साथ चलिये।

इसके कुछ ही देर बाद शिवदत्त पाँच सौ फौज को लेकर रूहा के साथ उत्तर की तरफ रवाना हुआ। इस समय पहर भर रात बाकी थी, चाँद ने भी अपना चेहरा छिपा लिया था मगर नरमदिल तारे डबडबाई हुई आँखों से दुष्ट शिवदत्त और उसके साथियों की तरफ देख-देख अफसोस कर रहे थे।

ये पाँच सौ लड़ाके घोड़ों पर सवार थे, रूहा और शिवदत्त अरबी घोड़ों पर सवार सबके आगे-आगे जा रहे थे। रूहा केवल एक तलवार कमर से लगाये हुए था मगर शिवदत्त पूरे ठाठ से था कमर में कटार और तलवार तथा हाथ में नेजा लिये हुए बड़ी खुशी से घुल-घुल कर बातें करता जाता था। सड़क पथरीली और ऊँची-नीची थी इसलिए ये लोग पूरी तेजी के साथ नहीं जा सकते थे तिस पर भी घंटे भर चलने के बाद एक छोटे से टूटे-फूटे मकान दीवार पर रूहा की नजर पड़ी और उसने हाथ का इशारा करके शिवदत्त से कहा, "बस अब हम लोग ठिकाने पर आ पहुँचे, यही मकान है।"

शिवदत्त के साथी सवारों ने उस मकान को चारों तरफ से घेर लिया।

रूहा––इस मकान में कुछ खजाना भी है जिसका हाल मुझे अच्छी तरह मालूम है।

शिवदत्त––(खुश होकर) आजकल मुझे रुपये की जरूरत भी है।

रूहा––मैं चाहता हूँ कि पहले केवल आपको इस मकान में ले चलकर दो एक जगह निशान और वहाँ का कुछ भेद बता दूँ फिर आगे जैसा मुनासिब होगा वैसा किया जायगा। आप मेरे साथ अकेले चलने के लिए तैयार हैं, डरते तो नहीं?

शिवदत्त––(घमंड के साथ) क्या तुमने मुझे डरपोक समझ लिया है? और फिर ऐसी अवस्था में जब कि हमारे पाँच सौ सवारों से यह मकान घिरा हुआ है?

रूहा––(हँसकर) नहीं-नहीं, मैंने इसलिए टोका कि शायद इस पुराने मकान में आपको भूत-प्रेत का गुमान पैदा हो।

शिवदत्त––छि:, मैं ऐसे खयाल का आदमी नहीं हूँ, बस देर न कीजिये, चलिये।

रूहा ने पथरी से आग झाड़ कर मोमबत्ती जलाई जो उसके पास थी और शिवदत्त को साथ लेकर मकान के अन्दर घुसा। इस समय उस मकान की अवस्था बिल्कुल खराब थी, केवल तीन कोठरियाँ बची हुई थीं जिनकी तरफ इशारा करके रूहा ने शिवदत्त से कहा, यद्यपि यह मकान बिल्कुल टूट-फूट गया है मगर इन तीनों कोठरियों को अभी तक किसी तरह का सदमा नहीं पहुँचा है, मुझे केवल इन्हीं कोठरियों से मतलब है। इस मकान की मजबूत दीवारें अभी दो-तीन और बरसातें सम्हालने की हिम्मत रखती हैं।

शिवदत्त––मैं देखता हूँ कि वे तीनों कोठरियाँ एक के साथ एक सटी हुई हैं और इसका भी कोई सबब जरूर होगा।

रूहा––जी हाँ, मगर इन तीन कोठरियों से इस समय तीन काम निकलेंगे।

इसके बाद रूहा एक कोठरी के अन्दर घुसा। इसमें एक तहखाना था और नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ नजर आती थीं। शिवदत्त ने पूछा, "मालूम होता है इसी सुरंग की राह आप मुझे ले चलेंगे?" इसके जवाब में रूहा ने कहा, "हाँ इन्द्रजीतसिंह को गिरफ्तार करने के लिए इसी सुरंग में चलना होगा, मगर अभी नहीं, मैं पहले आपको दूसरी कोठरी में ले चलता हूँ जिसमें खजाना है, मेरी तो यही राय है कि पहले खजाना निकाल लेना चाहिए, आपकी क्या राय है?"

शिवदत्त––(खुश होकर) हाँ-हाँ, पहले खजाना अपने कब्जे में लेना चाहिए। कहिये, तो कुछ आदमियों को अन्दर बुलाऊँ?

रूहा––अभी नहीं, पहले आप स्वयं चल कर उस खजाने को देख तो लीजिए।

शिवदत्त––अच्छा चलिये।

अब ये दोनों दूसरी कोठरी में पहुँचे। इसमें भी एक वैसा ही तहखाना नजर आया जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ मौजूद थीं। शिवदत्त को साथ लिए हुए रूहा उस तहखाने में उतर गया। यह ऐसी जगह थी कि यदि सौ आदमी एक साथ मिल कर चिल्लाएं तो भी मकान के बाहर आवाज न जाय। शिवदत्त को उम्मीद थी कि अब रुपये और अशर्फियों से भरे हुए देग दिखाई देंगे मगर उसके बदले यहाँ दस सिपाही ढालतलवार लिए मुँह पर नकाब डाले दिखाई पड़े और साथ ही इसके एक सुरंग पर भी नजर पड़ी जो मालूम होता था कि अभी खोद कर तैयार की गई है। शिवदत्त एक दम काँप उठा, उसे निश्चय हो गया कि रूहा ने मेरे साथ दगा की, और ये लोग मुझे मार कर इसी गड़हे में दबा देंगे। उसने एक लाचारी की निगाह रूहा पर डाली और कुछ कहना चाहा मगर खौफ ने उसका गला ऐसा दबा दिया कि एक शब्द भी मुँह से न निकल सका।

उन दसों ने शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया और मुश्कें बाँध लीं। रूहा ने कहा, "बस अब आप चुपचाप इन लोगों के साथ इस सुरंग में चले चलिए नहीं तो इसी जगह आपका सिर काट लिया जायगा।"

इस समय शिवदत्त रूहा और उसके साथियों का हुक्म मानने के सिवाय और कुछ भी न कर सकता था। सुरंग में उतरने के बाद लगभग आधा कोस के चलना पड़ा, इसके बाद सब लोग बाहर निकले और शिवदत्त ने अपने को एक सुनसान मैदान में पाया। यहाँ पर कई साईसों की हिफाजत में बारह घोड़े कसे-कसाये तैयार थे। एक पर शिवदत्त को सवार कराया गया और नीचे से उसके दोनों पैर बाँध दिए गए, बाकी पर रूहा और वे दसों नकाबपोश सवार हुए और शिवदत्त को लेकर एक तरफ को चलते

कुँअर इन्द्रजीतसिंह पर आफत आने से वीरेन्द्रसिंह दुखी होकर उनको छुड़ाने का उद्योग कर ही रहे थे परन्तु बीच में शिवदत्त का आ जाना बड़ा ही दुखदाई हुआ। ऐसे समय में जब कि यह अपनी फौज से बहुत ही दूर पड़े हैं सौ दो सौ आदमियों को लेकर शिवदत्त की दो हजार फौज से मुकाबला करना बहुत ही कठिन मालूम पड़ता था, साथ ही इसके यह सोच कर कि जब तक शिवदत्त यहाँ है कुँअर इन्द्रजीतसिंह के छुड़ाने की कार्रवाई किसी तरह नहीं हो सकती, वे और भी उदास हो रहे थे। यदि उन्हें कुँअर इन्द्रजीतसिंह का खयाल न होता तो शिवदत्त का आना उन्हें न गड़ता और वे लड़ने से बाज न आते मगर इस समय राजा वीरेन्द्रसिंह बड़ी फिक्र में पड़ गए और सोचने लगे कि क्या करना चाहिए। सबसे ज्यादा फिक्र तारासिंह को थी क्योंकि वह कुँअर इन्द्रजीत सिंह का मृत शरीर अपनी आँखों से देख चुका था। राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके साथी लोग तो अपनी फिक्र में लगे हुए थे और खंडहर के दरवाजे पर तथा दीवारों पर से लड़ने का इन्तजाम कर रहे थे, परन्तु तारासिंह उस छोटी सी बावली के किनारे जो अभी जमीन खोदने से निकली थी बैठा अपने खयाल में ऐसा डूबा था कि उसे दीन-दुनिया की खबर न थी। वह नहीं जानता था कि हमारे संगी-साथी इस समय क्या कर रहे हैं। आधी रात से ज्यादे जा चुकी थी मगर वह अपने ध्यान में डूबा हुआ बावली के किनारे बैठा है। राजा वीरेन्द्रसिंह ने भी यह सोच कर कि शायद वह इसी बावली के विषय में कुछ सोच रहा है तारासिंह को कुछ न टोका और न कोई काम उसके सुपुर्द किया।

हम ऊपर लिख आये हैं कि इस बावली में से कुछ मिट्टी निकल जाने पर बावली के बीचोबीच में पीतल की मूरत दिखाई पड़ी। उस मूरत का भाव यह था कि एक हिरन का शेर ने शिकार किया है और हिरन की गर्दन का आधा भाग शेर के मुँह में है। मूरत बहुत ही खूबसूरत बनी हुई थी।

जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं अर्थात् आधी रात गुजर जाने के बाद यकायक उस मूरत में एक प्रकार की चमक पैदा हुई और धीरे-धीरे वह चमक यहाँ तक बढ़ी कि तमाम बावली बल्कि तमाम खँडहर में उजियाला हो गया, जिसे देख सब-केसब घबरा गए। वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और कमला ये तीनों आदमी फुर्ती के साथ उस जगह पहुँचे जहाँ तारासिंह बैठा हुआ ताज्जुब में आकर उस मूरत को देख रहा था। घण्टा भर बीतते-बीतते मालूम हुआ कि वह मूरत हिल रही है। उस समय शेर की दोनों आँखें ऐसी चमक रही थीं कि निगाह नहीं ठहरती। मूरत को हिलते देख सभी को बड़ा ताज्जुब हुआ और निश्चय हो गया कि अब तिलिस्म की कोई-न-कोई कार्रवाई हम लोग जरूर देखेंगे।

यकायक मूरत बड़े जोर से हिली और तब एक भारी आवाज के साथ जमीन के अन्दर धँस गई। खँडहर में चारों तरफ अँधेरा हो गया। कायदे की बात है कि आँखों के सामने जब थोड़ी देर तक कोई तेज रोशनी रहे और वह यकायक गायब हो जाय या बुझा दी जाय तो आँखों में मामूली से ज्यादा अँधेरा छा जाता है, वही हालत इस समय खँडहर वालों की हुई। थोड़ी देर तक उन लोगों को कुछ भी नहीं सूझता था। आधी घड़ी गुजर जाने के बाद वह गड़हा दिखाई देने लगा जिसके अन्दर मूरत धँस गई थी। अब उस गड़हे के अन्दर भी एक प्रकार की चमक मालूम होने लगी और देखते-देखते हाथ में चमकता हुआ नेजा लिए वही राक्षसी उस गड़हे में से बाहर निकली जिसका जिक्र ऊपर कई दफे किया जा चुका है।

हमारे वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयार लोग उस औरत को कई दफे देख चुके थे और वह औरत इनके साथ अहसान भी कर चुकी थी, इनलिए उसे यकायक देख कर वे लोग कुछ प्रसन्न हुए और उन्हें विश्वास हो गया कि इस समय यह औरत जरूर हमारी कुछ-न-कुछ मदद करेगी और थोड़ा-बहुत यहाँ का हाल भी हम लोगों को जरूर मालूम होगा।

उस औरत ने नेजे को हिलाया। हिलने के साथ ही बिजली-सी चमक उसमें पैदा हुई और तमाम खंडहर में उजाला हो गया। वह वीरेन्द्र सिंह के पास आई और बोली, आपको पहर भर की मोहलत दी जाती है। इसके अन्दर इस खँडहर के हर एक तहखाने में यदि रास्ता मालूम है तो आप घूम सकते हैं। शाहदरवाजा जो बन्द हो गया था, उसे आपके खातिर से पहर भर के लिए मैंने खोल दिया है। इससे विशेष समय लगाना अनर्थ करना है।"

इतना कह वह राक्षसी उसी गड़हे में घुस गई और वह पीतल वाली मूरत जमीन के अन्दर धँस गई थी फिर अपने स्थान पर आकर बैठ गई। इस समय उसमें किसी तरह की चमक न थी।

अब वीरेन्द्रसिंह और आनन्दसिंह वगैरह को कुँअर इन्द्रजीत सिंह से मिलने की उम्मीद हुई।

वीरेन्द्रसिंह––कुछ मालूम नहीं होता कि यह औरत कौन है और समय-समय पर हम लोगों की सहायता क्यों करती है

तारासिंह––जब तक वह स्वयं अपना हाल न कहे हम लोग उसे किसी तरह नहीं जान सकते। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह औरत तिलिस्मी है और कोई भारी सामर्थ्य रखती है।

कमला––परन्तु सूरत इसकी भयानक है।

तेजसिंह––यदि यह सूरत बनावटी हो तो भी कोई आश्चर्य नहीं।

वीरेन्द्रसिंह––हो सकता है, खैर, अब हमको तहखाने के अन्दर चलना और इन्द्रजीत को छुड़ाना चाहिए, पहर भर का समय हम लोगों के लिए कम नहीं है, मगर शिवदत्त के लिए क्या किया जाय? यदि वह इस खँडहर में घुस आने और लड़ने का उद्योग करेगा तो यह अमूल्य पहर भर समय यों ही नष्ट हो जायगा।

तेजसिंह––इसमें क्या सन्देह है? ऐसे समय में इस कम्बख्त का चढ़ आना बड़ा ही दुःखदायी हुआ।

इतना कहकर तेजसिंह गौर में पड़ गये और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। इसी बीच में खँडहर के फाटक की तरफ से सिपाहियों के चिल्लाने की आवाज आई और यह भी मालूम हुआ कि वहाँ लड़ाई हो रही है।

जिस समय शिवदत्त के चढ़ आने की खबर मिली थी उसी समय राजा वीरेन्द्रसिंह के हुक्म से पचास सिपाही खँडहर के फाटक पर मुस्तैद कर दिये गये थे और उसिपाहियों ने आपस में निश्चय कर लिया था कि जब तक पचास में से एक भी जीता रहेगा, फाटक के अन्दर कोई घुसने न पावेगा।

फाटक पर कोलाहल सुनकर तेजसिंह और तारासिंह दौड़े गये और थोड़ी देर में वापस आकर खुशी-भरी आवाज में तेजसिंह ने वीरेन्द्रसिंह से कहा, "वेशक फाटक पर लड़ाई हो रही है। न मालूम हमारे किस दोस्त ने किस ऐयारी से शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया जिससे उसकी फौज हताश हो गई। थोड़े आदमी तो फाटक पर आकर लड़ रहे हैं और बहुत लोग भागे जा रहे हैं। मैंने एक सिपाही से पूछा तो उसने कहा कि "मैं अपने साथियों के साथ फाटक पर पहरा दे रहा था कि यकायक कुछ सवार इसी तरफ से मैदान की ओर भागे जाते देखे। वे लोग चिल्ला-चिल्ला कर यह कहते जाते थे कि 'तुम लोग भागो और अपनी जान बचाओ। शिवदत्त गिरफ्तार हो गया, अब तुम उसे किसी तरह से नहीं छुड़ा सकते!' इसके बाद बहुत-से तो भाग गये और भाग रहे हैं, मगर थोड़े आदमी यहाँ आ गये जो लड़ रहे हैं।

तेजसिंह की बात सुन कर वीरेन्द्र सिंह वीर भाव से यह कहते हुए फाटक की तरफ लपके कि "तब तो पहले उन्हीं लोगों को भगाना चाहिए जो भागने से बच रहे हैं, जब तक दुश्मन का कोई आदमी गिरफ्तार न होगा, खुलासा हाल मालूम न होगा।"

खँडहर के फाटक पर से लौट कर तेजसिंह ने जो कुछ हाल राजा वीरेन्द्रसिंह से कहा वह बहुत ठीक था। जब रूहा अपनी बातों में फँसा कर शिवदत्त को ले गया, उसके दो घण्टे बाद भीमसेन ने अपने साथियों को तैयार होने और घोड़े कसने की आज्ञा दी। शिवदत्त के ऐयारों को ताज्जुब हुआ, उन्होंने भीमसेन से इसका सबब पूछा जिसके जवाब में भीमसेन ने केवल इतना ही कहा कि "हम क्या करते हैं सो अभी मालूम हो जायगा।" जब घोड़े तैयार हो गये तो साथियों को कुछ इशारा करके भीमसेन घोड़े पर सवार हो गया और म्यान से तलवार निकाल शिवदत्त के आदमियों को जख्मी करता और यह कहता हुआ कि "तुम लोग भागो और अपनी जान बचाओ, शिवदत्त तुम्हारा गिफ़्तार हो गया अब तुम उसे किसी तरह नहीं छुड़ा सकते" मैदान की तरफ भागा। उस समय शिवदत्त के ऐयारों की आँखें खुली और वे समझ गये कि हम लोगों के साथ ऐयारी की गई तथा यह भीमसेन नहीं है, बल्कि कोई ऐयार है! उस समय शिवदत्त की फौज हर तरह से गाफिल और बेफिक्र थी। शिवदत्त के ऐयारों के कई आदमियों ने घोड़ों की नंगी पीठ पर सवार होकर नकली भीमसेन का पीछा किया मगर अब क्या हो सकता था, बल्कि उसका नतीजा यह हुआ कि फौजी आदमी अपने साथियों को भागता हुआ समझ खुद भी भागने लगे। ऐयारों ने रोकने के लिए बहुत उद्योग किया, परन्तु बिना मालिक की फौज कब तक रुक सकती थी, बड़ी मुश्किल से थोड़े आदमी रुके और खँडहर के फाटक पर आकर हुल्लड़ मचाने लगे, परन्तु उस समय उन लोगों की हिम्मत भी जाती रही जब बहादुर वीरेन्द्रसिंह, आनन्दसिंह उनके ऐयार तथा शेरदिल साथी और सिपाही हाथों में नंगी तलवारें लिए उन लोगों पर आ टूटे। राजा वीरेन्द्रसिंह और कुँअर आनन्दसिंह शेर की तरह जिस तरफ झपटते थे, सफाई हो जाती थी। जिसे देख शिवदत्त के आदमियों में से बहुतों की तो यह अवस्था हो गई कि खड़े होकर उन दोनों की बहादुरी देखने के सिवाय कुछ भी न कर सकते थे। आखिर यहाँ तक नौवत पहुँची कि सभी ने पीठ दिखा दी और मैदान का रास्ता लिया।

इस लड़ाई में जो घण्टे भर से ज्यादा तक होती रही, राजा वीरेन्द्रसिंह के दस आदमी मारे गए और बीस जख्मी हुए। शिवदत्त के चालीस मारे गए और साठ जख्मी हुए जिनसे दरियाफ्त करने पर राजा वीरेन्द्रसिंह को भीमसेन और शिवदत्त का खुलासा हाल जैसा कि हम ऊपर लिख आए हैं मालूम हो गया, मगर इसका पता न लगा कि शिवदत्त को किसने किस रीति से गिरफ्तार कर लिया।

वीरेन्द्रसिंह ने अपने कई आदमी लाशों को हटाने और जख्मियों की हिफाजत के लिए तैनात किये और इसके बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए खँडहर के तहखाने में जाने का इरादा किया।

जिस तहखाने में कुँअर इन्द्रजीतसिंह थे, उसके रास्ते का हाल कई दफे लिखा जा चुका है, पुनः लिखने की कोई आवश्यकता नहीं, इसलिए केवल इतना ही लिखा जाता है कि वे दरवाजे जिनका खुलना शाहदरवाजा बन्द हो जाने के कारण कठिन हो गया था अब सुगमता से खुल गए जिससे सभी को खुशी हुई और केवल वीरेन्द्र, तेजसिंह, कमला और तारासिंह मशाल लेकर उस तहखाने के अन्दर उतर आये।

इस समय तारासिंह की अजब हालत थी। उसका कलेजा काँपता और उछलत था। वह सोचता था कि देखें कुँअर इन्द्रजीतसिंह, भैरोंसिंह और कामिनी को किस अवस्था में पाते हैं। ताज्जुब नहीं कि हमारे पाठकों की भी इस समय वही अवस्था हो और वे भी इसी सोच-विचार में हों, मगर वहाँ तहखाने में तो मामला ही दूसरे ढंग का था।

तहखाने में उतर जाने के बाद राजा वीरेन्द्रसिंह, आनन्दसिंह और ऐयारों ने चारों तरफ देखना शुरू किया मगर कोई आदमी दिखाई न पड़ा और न कोई ऐसी चीज नजर पड़ी जिससे उन लोगों का पता लगता, जिनकी खोज में वे लोग तहखाने के अन्दर गए थे। न तो वह सन्दूक था जिसमें इन्द्रजीतसिंह की लाश थी और न भैरोंसिंह, कामिनी या उस सिपाही की सूरत नजर आई, जो उस संदूक के साथ तहखाने में आया था, जिसमें कुँअर इन्द्रजीतसिंह की लाश थी।

वीरेन्द्रसिंह (तारासिंह की तरफ देख कर) यहाँ तो कोई भी नहीं है! क्या तुमने उन लोगों को किसी दूसरे तहखाने में छोड़ा था?

तारासिंह––जी नहीं, मैंने उन सभी को इसी जगह छोड़ा। (हाथ से इशारा करके) इसी कोठरी में कामिनी ने अपने को बन्द कर रखा था!

वीरेन्द्रसिंह––कोठरी का दरवाजा खुला हुआ है, उसके अन्दर जाकर देखो तो शायद कोई हो।

कमला ने कोठरी का दरवाजा खोला और झाँककर देखा इसके बाद कोठरी के अन्दर घुस कर उसने आनन्दसिंह और तारासिंह को पुकारा और उन दोनों ने भी कोठरी के अन्दर पैर रखा।

कमला, तारासिंह और आनन्दसिंह को कोठरी के अन्दर घुसे आधी घड़ी से ज्यादा गुजर गई, मगर उन तीनों में से एक भी बाहर न निकला। आखिर तेजसिंह ने पुकारा परन्तु जवाब न मिलने पर लाचार हो हाथ में मशाल लेकर तेजसिंह खुद कोठरी के अन्दर गए और इधर-उधर ढूँढ़ने लगे।

वह कोठरी बहुत छोटी और संगीन थी। चारों तरफ पत्थर की दीवारों पर खूब ध्यान देने से कोई खिड़की या दरवाजे का निशान नहीं पाया जाता था, हाँ ऊपर की तरफ एक छोटा-सा छेद दीवार में था मगर वह भी इतना छोटा था कि आदमी का सिर किसी तरह उसके अन्दर नहीं जा सकता था और दीवार में कोई ऐसी रुकावट भी न थी जिस पर चढ़ कर या पैर रख कर कोई आदमी अपना हाथ उस मोखे (छेद) तक पहुँचा सके। ऐसी कोठरी में से यकायक कमला, तारासिंह और आनन्दसिंह का गायब हो जाना बड़े ही आश्चर्य की बात थी। तेजसिंह ने इसका सबब बहुत कुछ सोचा मगर अक्ल ने कुछ मदद न थी। वीरेन्द्रसिंह भी कोठरी के अन्दर गये और तलवार के कब्जे से हर एक दीवार को ठोंक-ठोंक कर देखने लगे जिसमें मालूम हो जाय कि किसी जगह से दीवार पोली तो नहीं है मगर इससे भी कोई काम न चला। थोड़ी देर तक दोनों आदमी हैरान हो चारों तरफ देखते रहे। आखिर किसी आवाज ने उन्हें चौकन्ना दोनों ध्यान देकर उस छेद की तरफ देखने लगे जो उस कोठरी के अन्दर ऊँची दीवार में था और जिसमें से आवाज आ रही थी। वह आवाज यह थी–– "बस, जहाँ तक जल्द हो सके तुम दोनों आदमी इस तहखाने से बाहर निकल जाओ, नहीं तो व्यर्थ तुम दोनों की जान चली जायेगी। अगर बचे रहोगे तो दोनों कुमारों को छुड़ाने का उद्योग करोगे और पता लगा ही लोगे। मैं वही बिजली की तरह चमकने वाला नेजा हाथ में रखने वाली औरत हूँ, पर लाचार, इस समय मैं किसी तरह तुम्हारी मदद नहीं कर सकती। अब तुम लोग बहुत जल्द रोहतासगढ़ चले जाओ, उसी जगह आकर मैं तुममें मिलूँगी और सब हाल खुलासा कहूँगी। अब मैं जाती हूँ क्योंकि इस समय मुझे भी अपनी जान की पड़ी है।"

इस बात को सुन कर दोनों आदमी ताज्जुब में आ गए और कुछ देर तक सोचने के बाद तहखाने के बाहर निकल आए।

डबडबाई आँखों के साथ उसांसें लेते हुए राजा वीरेन्द्रसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए। कैदियों और अपने कुल आदमियों को साथ लेते गए, मगर तेजसिंह ने न मालूम क्या कह-सुन कर और क्यों छुट्टी ले ली और राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ रोहतासगढ़ न गये।

राजा वीरेन्द्रसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए और तेजसिंह ने दक्खिन का रास्ता लिया। इस वारदात को कई महीने गुजर गये और इस बीच में कोई बात ऐसी नहीं हुई जो लिखने योग्य हो।

३

अब हम अपने पाठकों को फिर उस मैदान के बीच वाले अद्भुत मकान के पास ले चलते हैं जिसके अन्दर इन्द्रजीतसिंह, देवीसिंह, शेरसिंह और कमलिनी के सिपाही लोग जा फँसे थे अर्थात् कमन्द के सहारे दीवार पर चढ़ कर अन्दर की तरफ झाँकने के बाद हँसते-हँसते उस मकान में कूद पड़े थे। हम लिख आये हैं कि जब वे लोग मकान के अन्दर कूद गए तो न मालूम क्या समझ कर कमलिनी हँसी और अपनी ऐयारा तारा को साथ ले वहाँ से रवाना हो गई।

तारा को साथ लिए और बातें करती हुई कमलिनी दक्खिन की तरफ रवाना हुई जिधर का जंगल घना और सुहावना था। लगभग दो कोस चले जाने के बाद जंगब बहुत ही रमणीक मिला, बल्कि यों कहना चाहिए कि जैसे-जैसे वे दोनों बढ़ती जाती थीं, जंगल सुहावना और खुशबूदार जंगली फूलों की महक से बसा हुआ मिलता था। यहाँ तक कि दोनों एक ऐसे सुन्दर चश्मे के किनारे पहुँची जिसका जल बिल्लौर की तरह साफ था और जिसके दोनों किनारों पर दूर-दूर तक मौलसिरी के पेड़ लगे हुए थे। इस चश्मे का पाट दस हाथ का होगा और गहराई दो हाथ से ज्यादा न होगी। यहां की जमीन पथरीली और पहाड़ी थी।

अब ये दोनों उस चश्मे के किनारे-किनारे चलने लगीं। ज्यों-ज्यों आगे जाती थीं, जमीन ऊँची मिलती जाती थी, जिससे समझ लेना चाहिए कि यह मुकाम किसी पहाड़ी की तराई में है। लगभग आधा कोस जाने के बाद वे दोनों ऐसी जगह पहुँचीं जहाँ चश्मे के दोनों किनारे वाले मौलसिरी के पेड़ झुककर आपस में मिल गये थे और जिसके सबब से चश्मा अच्छी तरह से ढँककर मुसाफिरों का दिल लुभा लेने वाली छटा दिखा रहा था। इस जगह चश्मे के किनारे एक छोटा-सा चबूतरा था जिसकी ऊँचाई पुर्सा भर से कम न होगी। चबूतरे पर एक छोटी-सी पिण्डी इस ढब से बनी हुई थी जिसे देखते ही लोगों को विश्वास हो जाय कि किसी साधु की समाधि है।

इस ठिकाने पर पहुँचकर वे दोनों रुकीं और घोड़े से नीचे उतर पड़ीं। तारा ने अपने घोड़े का असबाब नहीं उतारा अर्थात् उसे कसा-कसाया छोड़ दिया परन्तु कमलिनी ने अपने घोड़े का चारजामा उतार लिया और लगाम उतारकर घोड़े को यों ही छोड़ दिया। घोड़ा पहले तो चश्मे के किनारे आया और पानी पीने के बाद कुछ दूर जाकर सब्ज जमीन पर चरने और खुशी-खुशी घूमने लगा। तारा ने भी अपने घोड़े को पानी पिलाया और बागडोर के सहारे एक पेड़ से बाँध दिया। इसके बाद कमलिनी और तारा चश्मे के किनारे पत्थर की एक बड़ी-सी चट्टान पर बैठ गयी और यों बातचीत करने लगीं––

कमलिनी––अब इसी जगह से मैं तुमसे अलग होऊँगी।

तारा––अफसोस, यह दुश्मनी अब हद से ज्यादा बढ़ चली!

कमलिनी––फिर क्या किया जाय, तू ही बता, इसमें मेरा क्या कसूर है।

तारा––तुम्हें कोई भी दोषी नहीं ठहरा सकता। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महारानी अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मार रही हैं।

कमलिनी––हरएक लक्षण पर ध्यान देने से अब महारानी को भी निश्चय हुआ है कि ये ही दोनों भाई तिलिस्म के मालिक होंगे, फिर उसके लिए जिद करना और उन दोनों की जान लेने का उद्योग करना भूल नहीं तो क्या है?

तारा––बेशक भूल है और इसकी वह सजा पावेंगी। तुमने बहुत अच्छा किया कि उनका साथ छोड़ दिया। (मुस्करा कर) इसके बदले में जरूर तुम्हारी मुराद पूरी होगी।

कमलिनी––(ऊँची साँस लेकर) देखें, क्या होता है।

तारा––होना क्या है? क्या उनकी आँखों ने उनके दिल का हाल तुमसे नहीं कह दिया?

कमलिनी––हाँ, ठीक है। खैर, इस समय तो उन पर भारी मुसीबत या पड़ी है। जहाँ तक हो सके उन्हें जल्द बचाना चाहिए।

तारा––मगर मुझे ताज्जुब मालूम होता है कि उनके छुड़ाने का कोई उद्योग किए बिना ही तुम यहाँ चली आयीं?

कमलिनी––क्या तुझे मालूम नहीं कि नानक ने इसी ठिकाने मुझसे मिलने का वादा लिया है? उसने कहा था कि जब मिलना हो, इसी ठिकाने आना। कह दिया?

तारा––(कुछ सोचकर) हाँ-हाँ, ठीक है, अब याद आया। तो क्या वह यही जगह है?

कमलिनी––हाँ, यही जगह है।

तारा––मगर तुम तो इस तरह घोड़ा फेंके चली आयीं, जैसे कई दफे जाने-आने के कारण यहाँ का रास्ता तुम्हें बखूबी याद हो।

कमलिनी––बेशक मैं यहाँ कई दफे आ चुकी हूँ। बल्कि नानक को इस ठिकाने का पता पहले मैंने ही बताया था, और यहाँ का कुछ भेद भी कहा था।

तारा––अफसोस, इस जगह का भेद तुमने आज तक मुझसे कुछ नहीं कहा।

कमलिनी––यद्यपि तू ऐयारा है और मैं तुझे चाहती हूँ, परन्तु तिलिस्मी कायदे के मुताबिक मेरे भेदों को तू नहीं जान सकती।

तारा––सो तो मैं जानती हूँ मगर अफसोस इस बात का है कि मुझसे तो तुमने छिपाया और नानक को यहाँ का भेद बता दिया। न मालूम, नानक की कौन-सी बात पर तुम रीझ गई हो?

कमलिनी––(कुछ हँसकर और तारा के गाल पर धीरे से चपत मारकर) बदमाश कहीं की, मैं नानक पर क्यों रीझने लगी?

तारा––(झुँझलाकर) तो फिर ऐसा क्यों किया?

कमलिनी––अरे, उससे उस कोठरी की ताली जो लेनी है, जिसमें खून से लिखी हुई किताब रखी है।

तारा––तो फिर ताली लेने के पहले ही यहाँ का भेद उसे क्यों बता दिया? अगर वह ताली न दे तब?

कमलिनी––ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि भूतनाथ ने मेरी दिलजमई कर दी है और वह भूतनाथ के कब्जे में है।

"हाँ-हाँ, वह मेरे कब्जे में है––" उसी समय यह आवाज पेड़ों के झुरमुट में से, जो कमलिनी के पीछे की तरफ था, आई और कमलिनी ने फिर कर देखा तो भूतनाथ की सूरत दिखाई पड़ी।

कमलिनी––अजी आओ भूतनाथ, तुम कहाँ थे? मैं बड़ी देर से यहाँ बैठी हूँ, नानक कहाँ है?

बात की बात में नानक भी वहाँ आ पहुँचा और कमलिनी को सलाम करके खड़ा हो गया।

कमलिनी––कहो जी नानकप्रसाद, अब वादा पूरा करने में क्या देर है?

नानक––कुछ देर नहीं। मैं तैयार हूँ, परन्तु आप भी अपना वादा पूरा कीजिये और समाधि पर हाथ रखकर कसम खाइये।

कमलिनी––हाँ-हाँ, लो, मैं अपना वादा पूरा करती हूँ।

भूतनाथ––मेरा भी ध्यान रखना।

कमलिनी––अवश्य।

कमलिनी उठी और समाधि के पास जाकर खड़ी हो गयी। पहले तो उसने समाधि के सामने अदब से सिर झुकाया और तब उस पर हाथ रखकर यों बोली––

"मैं उस महात्मा की समाधि पर हाथ रखकर कसम खाती हूँ जो अपना सानी नहीं रखता था, हर एक शास्त्र का पूरा पण्डित, पूरा योगी, भूत-भविष्य और वर्तमान का हाल जानने वाला और ईश्वर का सच्चा भक्त था। यद्यपि यह उसकी समाधि है। परन्तु मुझे विश्वास है कि योगिराज सजीव हैं और मेरी रक्षा का ध्यान उन्हें सदैव रहता है। (हाथ जोड़कर) योगिराज से मैं प्रार्थना करती हूँ कि मेरी प्रतिज्ञा को निबाहें। (समाधि पर हाथ रखकर) यदि नानक मुझे वह ताली दे देगा तो मैं उसके साथ कभी दगा न करूँगी, उसे अपने भाई के समान मानूँगी और उसी काम में उद्योग करूँगी जिसमें उसकी खुशी हो। मैं उस आदमी के लिए भी कसम खाती हूँ जिसने अपना नाम भूतनाथ रखा हुआ है। उसे मैं अपने सहोदर भाई के समान मानूँगी और जब तक वह मेरे साथ बुराई न करेगा, मैं उसकी भलाई करती कहूँगी।"

इतना कहकर कमलिनी समाधि से अलग हो गयी। नानक ने एक छोटी-सी डिबिया कमलिनी के हाथ में दी और उसके पैरों पर गिर पड़ा। कमलिनी ने पीठ ठोंक कर उसे उठाया और उस डिबिया को इज्जत के साथ सिर से लगाया। इसके बाद चारों आदमी फिर उस पत्थर की चट्टान पर आकर बैठ गये और बातचीत होने लगी।

भूतनाथ––(कमलिनी से) जब आपने मुझे और नानक को अपने भाई के समान मान लिया तो मुझे जो कुछ आपसे कहना हो, दिल खोलकर कह सकता हूँ और जो कुछ माँगना हो माँग सकता हूँ चाहे आप दें अथवा न दें।

कमलिनी––(मुस्कराकर) हाँ-हाँ, जो कुछ कहना हो कहो और जो माँगना हो, माँगो।

भूतनाथ––इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके पास एक से एक बढ़कर अनमोल चीजें होंगी, अस्तु मुझे और नानक को कोई ऐसी चीज दीजिए जो समय पर काम आये और दुश्मनों को धमकाने और उन पर फतह पाने के लिए बेनजीर हो।

कमलिनी––इसके कहने की तो कोई जरूरत न थी, मैं स्वयं चाहती थी कि तुम दोनों को कोई अनमोल वस्तु दूँ, खैर ठहरो, मैं अभी ला देती हूँ।

इतना कह कर कमलिनी उठी और चश्मे के जल में कूद पड़ी। उस जगह जल बहुत गहरा था, इसलिए मालूम न हुआ कि वह कहाँ चली गयी। कमलिनी के इस काम ने सभी को ताज्जुब में डाल दिया और तीनों आदमी टकटकी बाँधकर उसी तरफ देखने लगे।

आधे घण्टे बाद कमलिनी जल के बाहर निकली। उसके एक हाथ में छोटी-सी कपड़े की गठरी और दूसरे हाथ में लोहे की जंजीर थी। यद्यपि कमलिनी जल में से निकली थी और उसके कपड़े गीले हो रहे थे, तथापि उस कपड़े की गठरी पर जल ने कुछ भी असर न किया था, जिसे कमलिनी लाई थी।

कमलिनी ने कपड़े की गठरी पत्थर की चट्टान पर रख दी और लोहे की जंजीर भूतनाथ के हाथ में देकर बोली, "इसे तुम दोनों आदमी मिलकर खींचो।" उस जंजीर के साथ लोहे का एक छोटा-सा मगर हलका सन्दूक बँधा हुआ था, जिसे भूतनाथ और नानक ने खींचकर बाहर निकाला।

कमलिनी ने एक खटका दबाकर सन्दूक खोला। इसके अन्दर चार खंजर, एक नेजा और पाँच अंगूठियाँ थीं। कमलिनी ने पहले एक अँगूठी निकाली और अपनी अंगुली में उसे पहिन लिया, इसके बाद एक खंजर निकाला और उसे भी म्यान से बाहर कर तारा, भूतनाथ और नानक को दिखाकर बोली, "देखो इस खंजर का लोहा कितना उम्दा है।"

भूतनाथ––वेशक बहुत उम्दा लोहा है।

कमलिनी––अब इसके गुण सुनो। यह खंजर जिस चीज पर पड़ेगा उसे दो टुकड़े कर देगा चाहे वह चीज लोहा, पत्थर, अष्टधातु या फौलादी हर्बा क्यों न हो। इसके अतिरिक्त जब इसका कब्जा दबाओगे तो इसमें बिजली की तरह चमक पैदा होगी, उस समय यदि सौ आदमी भी तुम्हें घेरे हुए खड़े होंगे तो चमक से सभी की आँखें बन्द हो जायंगी। यद्यपि इस समय दिन है और किसी तरह की चमक सूर्य का मुकाबला नहीं कर सकती, तथापि इसका मजा मैं तुम्हें दिखाती हूँ।

इतना कह कर कमलिनी ने खंजर का कब्जा दबाया। यकायक इतनी ज्यादा चमक उसमें से पैदा हुई कि दिन का समय होने पर भी उन तीनों की आँखें बन्द हो गईं। मालूम हुआ कि एक बिजली सी आँख के सामने चमक गई।

कमलिनी––सिवाय इसके इस खंजर को जो कोई छूएगा या जिसके बदन से यह खंजर छुआ दोगे उसके खून में एक प्रकार की विजली दौड़ जायगी और वह तुरंत बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ेगा। लो, इसे तुम लोग छूकर देखो, यही अद्भुत खंजर मैं तुम लोगों को दूँगी।

कमलिनी ने खंजर भूतनाथ के आगे रख दिया। भूतनाथ ने उसे उठाना चाहा मगर हाथ लगाने के साथ ही वह काँपा और बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ा। कमलिनी ने अपना दूसरा हाथ, जिसमें अंगूठी थी, उसके बदन पर फेरा तब उसे होश आया।

भूतनाथ––चीज तो बहुत अच्छी है मगर इसका छूना गजब है।

कमलिनी––(सन्दूक में से कई अंगूठियाँ निकाल कर) पहले इन अंगूठियों को तुम लोग पहिनो तब इस खंजर को हाथ में ले सकोगे और तभी इसकी तेज चमक भी तुम्हारी आँखों पर अपना पूरा असर न कर सकेगी अर्थात् जो कोई मुकाबले में या तुम्हारे चारों तरफ होगा उसकी आँखें तो बन्द हो जायेंगी, मगर तुम्हारी आँखें खुली रहेंगी और तुम दुश्मनों को बखूबी मार सकोगे।

इतना कह कर कमलिनी ने एक-एक अँगूठी तीनों को पहिना दी और इसके बाद एक-एक खंजर तीनों के हवाले किया। तारा, भूतनाथ और नानक ऐसा अद्भुत खंजर पाकर हद से ज्यादा खुश हुए और घड़ी-घड़ी उसका कब्जा दबाकर उसकी चमक का मजा लेते रहे।

कमलिनी––अव एक खंजर और एक अँगूठी बच गई सो कुँअर इन्द्रजीतसिंह के लिए अपने पास रक्खूँगी। जिस समय उनसे मुलाकात होगी उनके हवाले करूँगी, और यह अँगूठी जो मेरी उँगली में है और यह नेजा, जो अपने वास्ते लाई हूँ, इसमें भी वही गुण हैं जो खंजर में हैं मगर फर्क इतना है कि बनिस्बत खंजर के इस नेजे में बिजली का असर बहुत ज्यादे है।

उस नेजे के चार टुकड़े थे जो पेंच पर चढ़ा कर एक कर दिये जाते थे। कमलिनी ने इन चारों टुकड़ों को एक कर दिया और अब वह पूरा नेजा हो गया।

भूतनाथ––इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपने हम लोगों को अद्भुत और अनमोल चीज दी, इसकी बदौलत हम लोगों के हाथ से बड़े-बड़े काम निकलेंगे।

इसके बाद कमलिनी ने वह कपड़े की गठरी खोली। इसमें स्याह रंग की एक साड़ी, एक चोली और एक बोतल थी। कमलिनी उठ कर समाधि के पीछे गई और गीले कपड़े उतार कर वही काली साड़ी और चोली पहिन कर अपने ठिकाने आ बैठी। वह साड़ी और चोली रेशमी थी और उसमें एक प्रकार का रोगन चढ़ा हुआ था जिसके सबब उस कपड़े पर पानी का असर नहीं होता था। कमलिनी ने वह गीली साड़ी और चोली तारा के सामने रख दी और बोली, "इसे तू पेड़ पर डाल दे जिसमें झटपट सूख जाय, इसके बाद तू कमलिनी बन जा अर्थात् मेरी तरह अपनी सूरत बना ले और इसी साड़ी और चोली को पहिन कर मेरे घर अर्थात् उस तालाब वाले मकान में जाकर बैठ जिसमें नौकरों को मेरे गायब होने का हाल मालूम न हो, वे यही समझें कि तारा कहीं गई हुई है!

तारा––बहुत अच्छा, मगर आप कहाँ जायँगी?

कमलिनी––मेरा कोई ठिकाना नहीं, मुझे बहुत काम करना है। (भूतनाथ और नानक की तरफ देखकर) आप लोग भी जाइये और जहाँ तक हो सके, राजा वीरेन्द्रसिंह की भलाई का उद्योग कीजिये।

नानकप्रसाद––बहुत अच्छा। (हाथ जोड़ कर) मेरी बात का जवाब दीजिए तो बड़ी कृपा होगी।

कमलिनी––वह क्या?

नानकप्रसाद––इस प्रकार का खंजर उन लोगों के पास भी है या नहीं?

कमलिनी––(हँस कर) क्या उन लोगों के पास पुनः जाने की इच्छा है? अपनी रामभोली को देखा चाहता है?

नानकप्रसाद––हाँ, यदि मौका मिलेगा तो।

कमलिनी––अच्छा जा, कोई हर्ज नहीं, इस प्रकार की कोई वस्तु उन लोगों के पास नहीं है और न इसका पता ही उन्हें मिल सकता है। मगर जो कुछ करना, होशियारी के साथ।

इसके बाद कमलिनी ने वह बोतल खोली जो कपड़े की गठरी में थी। उसमें किसी प्रकार का अर्क था। समाधि के पीछे जाकर कमलिनी ने वह अर्क अपने तमाम बदन में लगाया जिससे बात की बात में उसका रंगं बहुत ही काला हो गया, तब वह फिर तारा पास आई और उससे दो लम्बे बनावटी दाँत लेकर अपने मुँह में लगाने के बाद नेजा हाथ में लेकर खड़ी हो गई।

तारा ने भी अपनी सूरत बदली और कमलिनी बन कर तैयार हो गई। इस काम में भूतनाथ ने उसकी मदद की। कमलिनी के हुक्म से वह सन्दूक और जंजीर पानी में डाल दी गई।

कमलिनी ने अपने घोड़े को आवाज दी। यद्यपि वह कुछ दूर पर चर रहा था, परन्तु मालिक की आवाज के साथ ही दौड़ता हुआ पास आ गया। तारा ने उसे पकड़ लिया और चारजामा कस कर उस पर सवार हो गई तथा कमलिनी तारा के घोड़े पर सवार हुई। अन्त में चारों आदमी कुछ सलाह करके अलग हुए और चारों ने अपना-अपना रास्ता लिया अर्थात् उसी जगह से चारों आदमी जुदा हो गए।

इस वारदात के कई दिन बाद कमलिनी इसी राक्षसी वेष में नेजा लिए रोहतासगढ़ की पहाड़ी पर कब्रिस्तान में कमला से मिली थी, इसी ने राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को कैद से छुड़ाया, और फिर भी कई दफे उनके काम आई थी, जिसका हाल पिछले बयानों में लिखा जा चुका है।

४

अब तो मौसम में फर्क पड़ गया। ठंडी-ठंडी हवा जो कलेजे को दहला देती थी और बदन में कँपकँपी पैदा करती थी अब भली मालूम पड़ती है। वह धूप भी, जिसे देख चित्त प्रसन्न होता था और जो बदन में लग कर रग-रग से सर्दी निकाल देती थी, अब बुरी मालूम होती है। यद्यपि अभी आसमान पर बादल के टुकड़े दिखाई नहीं देते तथापि संध्या के समय मैदान, बाग और तराई की ठंडी-ठंडी और शीतल तथा मन्द-मन्द वायु सेवन करने को जी चाहता है। वहाँ से हिलते हुए पेड़ों की कोमल-कोमल पत्तियों की बहार आँखों की राह घुस कर अन्दर से दिल को अपनी तरफ खींच लेती है तथा टकटकी बँधी हुई आँखों को दूसरी तरफ देखने का यकायक मौका नहीं मिलता। यद्यपि सूर्य अस्त हुआ ही चाहता है और आसमान पर उड़ने वाले परिन्दों के उतार और जमीन की तरफ झुके हुए एक ही तरफ उड़े जाने से मालूम होता है कि बात की बात में चारों तरफ अँधेरा छा जायगा तथापि हम अपने पाठकों को किसी पहाड़ की तराई में ले चलकर एक अनूठा रहस्य दिखाया चाहते हैं।

तीन तरफ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और बीच में कोसों तक का मैदान रमणीक तो है परन्तु रात की अवाई और सन्नाटे ने उसे भयानक बना दिया है। सूर्य अस्त होने में अभी विलम्ब है परन्तु ऊँचे-ऊँचे पहाड़ सूर्य की आखिरी लालिमा को इस मैदान में पहुँचने नहीं देते। चारों तरफ सन्नाटा है, जहाँ तक निगाह काम करती है इस मैदान में आदमी की सूरत दिखाई नहीं पड़ती, हाँ पश्चिम तरफ वाले पहाड़ के नीचे एक छोटा चमड़े का खेमा दिखाई पड़ता है। इस समय हमें इसी खेमे से मतलब है और इसी के दरवाजे पर पहुँच कर अपना काम निकाला चाहते हैं।

इस खेमे के दरवाजे पर केवल एक आदमी कमर में खंजर लगाए टहल रहा है।

यद्यपि इसकी जवानी ने इसका साथ छोड़ दिया है और फिक्र ने इसे दुर्बल कर दिया है मगर फुर्ती, मजबूती और दिलेरी ने अभी तक इसके साथ दुश्मनी नहीं की और वे इस गई, गुजरी हालत में भी इसका साथ दिए जाती हैं। इस आदमी की सूरत-शक्ल के बारे में हमें कुछ विशेष लिखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारे पाठक इसे पहचानते हैं और जानते हैं कि इसका नाम 'भूतनाथ' है।

भूतनाथ को खेमे के दरवाजे पर टहलते हुए देर हो गई। वह न मालूम किस सोच में डूबा हुआ था कि सिर नीचा किए हुए सिवाय टहलने के इधर-उधर देखने की उसे बिल्कुल फुरसत न थी, हाँ कभी-कभी वह सिर उठाता और एक लम्बी साँस लेकर केवल उत्तर की तरफ देखता और सिर नीचा कर फिर उसी तरह टहलने लगता। अब सूर्य ने अपना मुँह अच्छी तरह जमीन के पर्दे में छिपा लिया और भूतनाथ ने कुछ बेचैन होकर उत्तर की तरफ देख धीरे से कहा, "अब तो बहुत ही विलम्ब हो गया, क्या बेमौके जान आफत में फँसी है।"

यकायक तेजी के साथ घोड़ा दौड़ाता हुआ एक सवार उत्तर की तरफ से आता हुआ दिखाई पड़ा। कुछ और पास आने से मालूम हो गया कि वह औरत है मगर सिपाहियाना ठाठ में, ढाल-तलवार के सिवाय उसके पास कोई हरबा न था। इस औरत की उम्र लगभग चालीस वर्ष की होगी। सूरत-शक्ल से मालूम होता था कि किसी समय में यह बहुत ही हसीन और दिल लुभाने वाली रही होगी। बात की बात में यह औरत खेमे के पास आ पहुँची और घोड़े से उतर कर उसकी लगाम खेमे की एक डोरी से अटका देने के बाद भूतनाथ के पास आकर बोली, "शाबाश भूतनाथ, बेशक तुम वादे के सच्चे हो।"

भूतनाथ––मगर अभी तक मेरी समझ में यह न आया कि तुम मुझसे दुश्मनी रखती हो या दोस्ती।

औरत––(हँस कर) अगर तुम ऐसे ही समझदार होते तो जीते-जागते और निरोग रहने पर भी मुर्दो में क्यों गिने जाते?

भूतनाथ––(कुछ सोचकर) खैर जो हुआ सो हुआ, अब मुझसे क्या चाहती हो?

औरत––तुमसे एक काम कराना चाहती हूँ

भूतनाथ––वह कौन काम है जिसे तुम स्वयं नहीं कर सकती?

औरत––केवल यही एक काम!

भूतनाथ––(आश्चर्य की रीति से गर्दन हिलाकर) खैर कहो तो सही, करने लायक होगा तो करूँगा।

औरत––मैं खूब जानती हूँ कि तुम उस काम को सहज ही में कर सकते हो।

भूतनाथ––तब कहने में देर क्यों करती हो?

औरत––अच्छा सुनो, यह तो जानते ही हो कि कमलिनी को ईश्वर ने अद्भुत बल दे रक्खा है।

भूतनाथ––हाँ बेशक! उसमें कोई देवी शक्ति है, वह जो कुछ चाहे, सो कर सकती है। जो कोई उसे जानता है वहीं कहेगा कि कमलिनी को कोई जीत नहीं सकता।

औरत––हाँ ठीक है परन्तु मैं खूब जानती हूँ कि तुम कमलिनी से ज्यादा ताकत रखते हो।

भूतनाथ––(चौंक और काँप कर) इसका क्या मतलब?

औरत––मतलब यही कि तुम अगर चाहो तो उसे मार सकते हो।

भूतनाथ––मगर मैं ऐसा क्यों करने लगा?

औरत––केवल मेरी आज्ञा से।

इतना सुनते ही भूतनाथ के चेहरे पर मुर्दनी छा गई, उसका कलेजा काँपने लगा और सिर कमजोर होकर चक्कर खाने लगा, यहाँ तक कि वह अपने को सँभाल न सका और जमीन पर बैठ गया। मालूम होता था कि उस औरत की आखिरी बात ने उसका खून निचोड़ लिया है। न मालूम क्या सबब था कि निडर होकर भी एक साधारण और अकेली औरत की बातों का जवाब नहीं दे सकता और उसकी सूरत से मजबूरी और लाचारी झलक रही है।

भूतनाथ की ऐसी अवस्था देखकर उस औरत को किसी तरह का रंज नहीं हुआ बल्कि वह मुस्कुराई और उसी जगह घास पर बैठ कर न मालूम क्या सोचने लगी। थोड़ी देर बाद जब भूतनाथ का जी ठिकाने हआ तो उसने उस औरत की तरफ देखा और हाथ जोड़कर कहा, "क्या सचमुच मुझे ऐसा हुक्म लगाया जाता है?"

औरत––हाँ, कमलिनी का सिर लेकर मेरे पास हाजिर होना पड़ेगा और यह काम सिवाय तेरे और कोई भी नहीं कर सकता, क्योंकि वह तुझ पर विश्वास रखती है।

भूतनाथ––(कुछ सोचकर) नहीं-नहीं, मेरे किए यह काम न होगा। जो कुछ कर चुका हूँ उसी के प्रायश्चित से आज तक छुट्टी नहीं मिलती।

औरत––क्या तू मेरा हुक्म टाल सकता है? क्या तुझमें इतनी ताकत है?

यह सुन भूतनाथ बहुत बेचैन हुआ। वह उठ खड़ा हुआ और सिर नीचा किए इधर-उधर टहलने और नीचे लिखी बातें धीरे-धीरे बोलने लगा––

"आह मुझ-सा बदनसीब भी दुनिया में कोई न होगा। मुद्दत तक मुर्दो में अपनी गिनती कराई, अब ऐसा संयोग हो गया कि अपने को जीता-जागता साबित करूँ, मगर अफसोस, करी-कराई मेहनत मिट्टी हुआ चाहती है। हाय, उस आदमी के साथ जिसमें नेकी कूट-कूटकर भरी है, मैं बदी करने के लिए मजबूर किया जा रहा हूँ। क्या उसके साथ बदी करने वाला कभी सुख भोग सकता है? नहीं-नहीं, कभी नहीं, फिर मैं ऐसा क्यों करूँ? मगर मेरी जान क्योंकर बच सकती है इसका हुक्म न मानना मेरी कुदरत के बाहर है। हाय, एक दफे की भूल जन्म-भर के लिए दुःखदाई हो जाती है। शेरसिंह सच कहता था, इन्हीं बातों को सोचकर उसने मेरा नाम 'काल' रख दिया था और उसे मेरी सुरत से घृणा हो गई थी। (कुछ देर तक चुप रहकर) ओफ, मैं भी व्यर्थ के विचार में पड़ा है, आखिर जान तो जायेगी ही, इसका हुक्म मानूँगा तो भी मारा जाऊँगा और यदि न मानूँगा तो भी मौत की तकलीफ उठाऊँगा और तमाम दुनिया में मेरी बुराई फैलेगी। (चौंक कर) राम-राम, मुझे क्या हो गया जो...

भूतनाथ––(उस औरत की तरफ देख के) अच्छा मैं कमलिनी को मारने के लिए तैयार हूँ, मगर इसके बदले में मुझे इनाम क्या मिलेगा?

औरत––(हँस कर) तू इस लायक नहीं है कि तुझे इनाम दिया जाये।

भूत––क्या मैं इस दर्जे को पहुँच गया?

औरत––बेशक।

भूत––नहीं, कभी नहीं! जा, मैं तेरा हुक्म नहीं मानता। देखूँ तू मेरा क्या कर लेती है!

औरत––भूतनाथ, देख खूब सोचकर कोई बात मुँह से निकाल, ऐसा न हो कि अन्त में पछताना पड़े।

भूत––जा जा, जो करते बने कर ले।

भूतनाथ की आखिरी बात सुनकर वह औरत क्रोध में आकर काँपने लगी। उसके होंठ काँप रहे थे मगर कुछ कहना मुश्किल हो रहा था।

इस समय चारों तरफ अँधेरा छा चुका था अर्थात् रात बखूबी हो चुकी थी। थोड़ी देर के लिए दोनों आदमी चुप हो गये, यकायक घोड़ों की टापों की आवाज (जो बहुत दूर से आ रही थी) भूतनाथ के कान में पड़ी और साथ ही इसके वह औरत भी बोल उठी, "अच्छा देख, मैं तेरी ढिठाई का कैसा मजा चखाती हूँ।"

भूतनाथ पहले तो कुछ घबड़ाया मगर उसने तुरन्त ही अपने को सँभाला और कमर से खंजर निकाल कर उस औरत के सामने खड़ा हो गया। वह खंजर वही था जो कमलिनी ने उसे दिया था। कब्जा दबाते ही खंजर में से बिजली की चमक पैदा हुई जिसके सबब से उस औरत की आँखें बन्द हो गई और वह बावली-सी हो गई तथा उस समय तो उसे तन-बदन की सुध भी न रही जब भूतनाथ ने खंजर उसके बदन से छुआ दिया।

भूतनाथ ने बड़ी होशियारी से उस बेहोश औरत को उसके घोड़े पर लादा और आप भी उसी पर सवार हो तेजी के साथ मैदान का रास्ता लिया। थोड़ी दूर जाकर भूतनाथ ने बेहोशी की तेज दवा उसे सुँघाई, जिससे वह औरत बहुत देर के लिए मुर्दे की-सी हो गई। हमको इससे कोई मतलब नहीं कि वे सवार जिनके घोड़ों के टापों की आवाज भूतनाथ के कान में पड़ी थी कौन थे और उन्होंने वहाँ पहुँच कर क्या किया जहाँ से भूतनाथ उस औरत को ले भागा था, हम केवल भूतनाथ के साथ चलते हैं, जिसमें उस औरत का और भूतनाथ का हाल मालूम हो।

यद्यपि रात अँधेरी और रास्ता पथरीला था तथापि भूतनाथ ने चलने में कसर न की। थोड़ी-थोड़ी दूर पर घोड़ा ठोकर खाता था जिससे भूतनाथ को तकलीफ होती थी और वह बड़ी मुश्किल से उस बेहोश औरत को सँभाले लिए जाता था मगर यह तकलीफ ज्यादा देर के लिए न थी क्योंकि पहर भर के बाद ही आसमान पर कुदरती माहताबी जलने लगी और उसकी (चन्द्रमा की) रोशनी ने चारों तरफ ठंडक और खूबसूरती के साथ उजाला कर दिया। ऐसी अवस्था में भूतनाथ ने रुकना उचित न समझा और सवेरा होने तक तेजी के साथ बराबर चलता गया। जिस समय आसमान पर सुबह की सफेदी फैल रही थी, घोड़े ने यहाँ तक हिम्मत हार दी कि दस कदम भी चलना उसके लिए कठिन हो गया। लाचार भूतनाथ घोड़े के नीचे उतरा और उस औरत की भी उतार लिया। घोड़ा उसी समय जमीन पर गिर पड़ा, मगर भूतनाथ ने उसकी कुछ परवाह न की।

कमर से चादर खोल उसने औरत की गठरी बाँधी और पीठ पर लाद आगे का रास्ता लिया।

पहर भर चलते जाने बाद भूतनाथ एक ऐसी पहाड़ी के नीचे पहुँचा जिसकी ऊँचाई बहुत ज्यादा न थी मगर खुशनुमा और सायेदार दरख्त पहाड़ी के ऊपर तथा उसकी तराई में बहुत थे। पहाड़ी की चोटी पर सलई का एक ऊँचा पेड़ था और उसके ऊपर लम्बी काँड़ी में लगा हुआ एक लाल फरहरा (ध्वजा) दूर से दिखाई दे रहा था। यह निशान कमलिनी का लगाया हुआ था। भूतनाथ, तारा और नानक से मिलने के लिए कमलिनी ने एक यह जगह भी मुकर्रर की थी और निश्चय कर रखा था कि जब इन चारों में किसी को किसी से मिलने की आवश्यकता पड़े तो वह इसी जगह आवे और यदि किसी से मुलाकात न हो, इस झंडे को झुका हुआ देखे तो तुरन्त इस पहाड़ी के नीचे आवे और नियत स्थान पर अपने साथी को ढूँढ़े। यह फरहरा बहुत दूर से दिखाई देता था और यह पहाड़ी रोहतासगढ़ और गयाजी के बीच में पड़ती थी।

उस औरत को पीठ पर लादे हुए भूतनाथ पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगा। लगभग दो सौ कदम जाने के बाद रास्ता छोड़कर दाहिनी तरफ घूमा जिधर छोटे-छोटे जंगली पेड़ों की गुंजान झाड़ी दूर तक चली गई थी। उस झाड़ी में आदमी बखूबी छिप सकता था अर्थात् उस झाड़ी के पेड़ यद्यपि छोटे थे परन्तु आदमी की ऊँचाई से उन पेड़ों की ऊँचाई कुछ ज्यादा थी। भूतनाथ दोनों हाथ से पेड़ों को हटाता हुआ कुछ दूर तक चला गया। आखिर उसे एक गुफा मिली जिसका मुँह जंगली लताओं ने अच्छी तरह ढाँक रखा था। भूतनाथ उस गुफा के अन्दर चला गया और अपना बोझ अर्थात् उस औरत को गुफा के अन्दर छोड़ बाहर निकल आया। इसके बाद पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गया और सलई पेड़ पर चढ़कर लाल फरहरे (झण्डे) को झुकाने का इरादा किया परन्तु उसी समय सलई के पेड़ पर चढ़ी हुई कमलिनी उसे दिखाई पड़ी जो फरहरा झुकाने का उद्योग कर रही थी। इस समय भी कमलिनी उसी राक्षसी के भेष में थी जैसा कि ऊपर के बयानों में लिख आए हैं। भूतनाथ ने कमलिनी को पहचाना और उसने भी भूतनाथ को देखा। कमलिनी पेड़ के नीचे उतर आई और बोली––

कमलिनी––खूब पहुँचे, मैं तुमसे मिला चाहती थी, इसीलिए झण्डा झुकाने का उद्योग कर रही थी।

भूतनाथ––मैं खुद तुमसे मिलना चाहता था, इसीलिए यहाँ तक आया हूँ। यदि इस समय तुम न मिलती तो मैं इस पेड़ पर चढ़कर फरहरा झुकाता।

कमलिनी––कहो, क्या बात है और कौन-सी जरूरत आ पड़ी?

भूतनाथ––पहले तुम कहो कि मुझसे मिलने की क्या आवश्यकता थी?

कमलिनी––नहीं-नहीं, पहले तुम्हारा हाल सुन लूँगी तब कुछ कहूँगी, क्योंकि तुम्हारे चेहरे पर घबराहट और उदासी हद से ज्यादा पाई जाती है।

भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है और मैं तुमसे आखिरी मुलाकात करने आया हूँ, क्योंकि अब जीने की उम्मीद नहीं रही और खुली बदनामी बल्कि कलंक मंजूर नहीं

कमलिनी––क्यों क्यों, ऐसी क्या आफत आ गई, कुछ कहो तो सही!

भूतनाथ––मेरे साथ पहाड़ी के नीचे चलो। मैं एक औरत को बेहोश करके लाद लाया हूँ, जो उसी खोह के अन्दर है, पहले उसे देख लो तब मेरी सुनो।

कमलिनी––खैर ऐसा ही सही, चलो।

भूतनाथ के साथ-ही-साथ कमलिनी पहाड़ी के नीचे उतरी और उस खोह के मुहाने पर आकर बैठ गई जिसके अन्दर भूतनाथ ने उस औरत को रखा था। भूतनाथ उस बेहोश औरत को खोह के बाहर निकाल लाया। कमलिनी उस औरत को देखते ही चौंकी और उठ खड़ी हुई।

भूतनाथ––इसी के मारे मेरी जिन्दगी जवाल हो रही है, मगर तुम इसे देखकर चौंकी क्यों? क्या इस औरत को पहचानती हो?

कमलिनी––हाँ, मैं इसे पहचानती। यह वह काली नागिन है कि जिसके डँसने का मन्त्र ही नहीं! जिसे इसने काटा वह पानी तक नहीं माँगता, तुमने इसके साथ दुश्मनी की सो अच्छा नहीं किया।

भूतनाथ––मैंने जान-बूझकर इसके साथ दुश्मनी नहीं की। तुम खुद जानती हो कि मैं इसके काबू में हूँ किसी तरह इसका हुक्म टाल नहीं सकता, मगर कल इसने जो कुछ काम करने के लिए मुझे कहा वह मैं किसी तरह नहीं कर सकता था और इनकार की भी हिम्मत न थी, लाचार इसी खंजर की मदद से गिरफ्तार कर लाया हूँ। अब कोई ऐसी तरकीब निकालो जिसमें जान बचे और मैं वीरेन्द्रसिंह को मुँह दिखाने लायक हो जाऊँ।

कमलिनी––मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्या कह रहे हो! मुझे कुछ भी नहीं मालूम कि तुम इसके कब्जे में क्योंकर फँसे हो, न तुमने इसके बारे में कभी मुझसे कुछ कहा ही।

भूतनाथ––बेशक मैं इसका हाल तुमसे कह चुका हूँ और यह भी कह चुका हूँ कि इसी की बदौलत मुझे मरना पड़ा, बल्कि तुमने वादा किया था कि इसके हाथ से तुम्हें छुट्टी दिला दूँगी।

कमलिनी––हाँ, वह बात मुझे याद है, मगर तुमने तो श्यामा का नाम लिया था!

भूतनाथ––ठीक है, वह यही श्यामा है।

कमलिनी––(हँस कर) इसका नाम श्यामा नहीं है मनोरमा है। मैं इसकी सात पुश्तों को जानती हूँ। वेशक इसने अपने नाम में भी तुमको धोखा दिया। खैर, अब मालूम हुआ कि तुम्हें इसी ने सता रखा है, तुम्हारे हाथ की लिखी हुई दस्तावेज इसी के कब्जे में है और इस सबब से तुम इसे जान से मार भी नहीं सकते। इसने मुझे भी कई दफे धोखा देना चाहा था मगर मैं कब इसके पंजे में आने वाली हूँ। हाँ, यह तो कहो कि इसने क्या काम करने के लिए कहा था?

भूतनाथ––इसने कहा था कि तू कमलिनी का सिर काट कर मेरे पास ले आ, यह काम तुझसे बखूबी हो सकेगा क्योंकि वह तुझ पर विश्वास करती है।

कमलिनी––(कुछ देर तक सोचकर) खैर, कोई हर्ज नहीं। पहले तो मुझे इसकी कोई विशेष फिक्र न थी, परन्तु अब इसके साथ चाल चले बिना काम नहीं निकलता। देखो तो, मैं इसे कैसा दुरुस्त करती हूँ और तुम्हारे कागजात भी इसके कब्जे से कैसे निकालती हूँ।

भूतनाथ––मगर इस काम में देर न करनी चाहिए।

कमलिनी––नहीं-नहीं, देर न होगी, क्योंकि कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए भी मुझे इसी के मकान पर जाना पड़ेगा। बस, दोनों काम एक साथ ही निकल जायेंगे।

भूतनाथ––अच्छा, तो अब क्या करना चाहिए?

कमलिनी––(हाथ का इशारा करके) तुम इस झाड़ी में छिपे रहो, मैं इसे होश में लाकर कुछ बातचीत करूँगी। आज यह मुझे किसी तरह नहीं पहचान सकती।

भूतनाथ झाड़ी के अन्दर छिपा रहा। कमलिनी ने अपने बटुए में से लखलखे की डिबिया निकाली और सुँघाकर उस औरत को होश में लाई। मनोरमा जब होश में आई, उसने अपने सामने एक भयानक रूपवाली औरत को देखा। वह घबरा कर उठ बैठी और बोली––

मनोरमा––तुम कौन हो और मैं यहाँ क्योंकर आई?

कमलिनी––मैं जंगल की रहने वाली भिल्लिनी हूं। तुम्हें एक लम्बे कद का आदमी पीठ पर लादे लिये जाता था। मैं इस पहाड़ी के नीचे सूअर का शिकार कर रही थी। जब वह मेरे पास पहुँचा मैंने उसे ललकारा और पूछा कि पीठ पर क्या लादे लिये जाता है? जब उसने कुछ न बताया तो लाचार (नेजा दिखा कर) इसी जहरीले नेजे से उसे जख्मी किया। जब वह बेहोश होकर गिर पड़ा तब मैंने गठरी खोली, जब तुम्हारी सूरत नजर आई तो हाल जानने की इच्छा हुई। लाचार इस जगह उठा लाई और होश में लाने का उद्योग करने लगी। अब तुम्हीं बताओ कि वह आदमी कौन था और तुम्हें इस तरह क्यों लिये जाता था?

मनोरमा––मैं अपना हाल तुमसे जरूर कहूँगी, मगर पहले यह बताओ कि वह आदमी तुम्हारे इस जहरीले नेजे के असर से मर गया या जीता है?

कमलिनी––वह मर गया और मेरे साथी लोग उसे जला देने के लिए ले गए।

मनोरमा––(ऊँची साँस लेकर) अफसोस, यद्यपि उसने मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया तथापि उसकी मुहब्बत मेरे दिल से किसी तरह नहीं जा सकती, क्योंकि वह मेरा प्यारा पति था। अफसोस अफसोस, तुमने उसके हाथ से मुझे व्यर्थ छुड़ाया।

पाठक, झाड़ी के अन्दर छिपा हुआ भूतनाथ भी मनोरमा की बातें सुन रहा था। मनोरमा ने जो कुछ कमलिनी से कहा, न मालूम उसमें क्या तासीर थी कि सुनने के साथ ही भूतनाथ का कलेजा काँपने लगा और उसे चक्कर-सा आ गया। बहुत मुश्किल से उसने अपने को सम्हाला और कान लगाकर फिर दोनों की बातें सुनने लगा।

कमलिनी––(कुछ सोचकर) मैं केसे विश्वास करूँ कि तुमने जो कुछ कहा वह सच है?

मनोरमा––पहले यह सोचो कि मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूँगी?

कमलिनी––इसके कई सबब हो सकते हैं। सब से भारी सबब यह है कि तुम्हारा भेद एक गैर के सामने खुल जायेगा जिससे तुम्हें कोई मतलब नहीं। मगर मुझे विश्वास नहीं होता कि जो आदमी तुम्हें इतना कष्ट दे और बेहोश करके गठरी में बाँध कर कहीं ले जाने का इरादा रक्खे, उसे तुम प्यार करो और अपना पति कहकर सम्बोधित करो।

मनोरमा––नहीं-नहीं, यों तो शक की कोई दवा नहीं। परन्तु मैं इतना अवश्य कहूँगी कि उस आदमी के बारे में मैंने जो कुछ कहा, वह सच है।

कमलिनी––खैर, ऐसा ही होगा, मुझे इससे कोई मतलब नहीं चाहे वह आदमी तुम्हारा पति हो अथवा नहीं, अब तो वह मर चुका, किसी तरह जी नहीं सकता। लेकिन यह बताओ कि अब तुम क्या करना चाहती हो और कहाँ जाने की इच्छा रखती हो?

मनोरमा––मुझे गयाजी का रास्ता बता दो। मेरे माँ-बाप उसी शहर में रहते हैं। अब मैं उन्हीं के पास जाऊँगी।

कमलिनी––अच्छा, पहाड़ी के नीचे चलो, मैं तुम्हें गयाजी का रास्ता बता देती हूँ। हाँ, मैं तुम्हारा नाम पूछना तो भूल ही गई।

मनोरमा––मेरा नाम इमामन है।

कमलिनी––(जोर से हँस कर) क्या ठगने के लिए मैं ही थी?

मनोरमा––(चौंक कर और कमलिनी को सिर से पैर तक खूब अच्छी तरह देख कर) मुझे तुम पर शक होता है।

कमलिनी––यह कोई ताज्जुब की बात नहीं, मगर शक होने ही से क्या हो सकता है? आज तक तुमने मुझे कभी नहीं देखा और न फिर देखोगी।

मनोरमा––तब मैं अवश्य ही कह सकती हूँ कि तुम कमलिनी हो!

कमलिनी––नहीं-नहीं, मैं कमलिनी नहीं हो सकती, हाँ कमलिनी को पहचानती जरूर हूँ, क्योंकि वह वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान की दोस्त है, इसलिए मेरी दुश्मन!

मनोरमा––अब मैं तुम्हारी बातों का विश्वास नहीं कर सकती।

कमलिनी––तो इसमें मेरा कोई भी हर्ज नहीं। (आहट पाकर और दाहिनी तरफ देख कर) लो देखो, अब तो मैं सच्ची हुई? वह कमलिनी आ रही है!

संयोग से उसी समय तारा भी आ पहुँची जो कमलिनी की सूरत में उसके कहे मुताबिक सब काम किया करती थी। कमलिनी ने गुप्त रीति से तारा को कुछ इशारा किया जिससे वह कमलिनी का मतलब समझ गई। कमलिनी रूपी तारा लपक कर उन दोनों के पास पहुँची और कमर से खंजर निकाल कर और उसे चमका कर बोली, "इस समय तुम दोनों भले मौके पर मुझे मिल गई हो, आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ। अब मैं तुम दोनों से बिना बदला लिये टलने वाली नहीं।"

तारा की यह बात सुन कमलिनी जान-बूझकर काँपने लगी। मालूम होता था कि वह डर से काँप रही है। मनोरमा भी यकायक कमलिनी को मौजूद देख कर घबरा गई, इसके अतिरिक्त उस चमकते हुए खंजर को देखकर उसे विश्वास हो गया कि अब किसी तरह जान नहीं बचती, क्योंकि इसी तरह का खंजर भूतनाथ के हाथ में चुकी थी और उसके प्रबल प्रताप का नमूना उसे मालूम हो चुका था, साथ ही उसे इस बात का भी विश्वास हो गया कि राक्षसी (कमलिनी), जिसने उसे भूतनाथ के हाथ से छुड़ाया, सच्ची और उसकी खैरख्वाह है।

कमलिनी ने तारा को फिर इशारा किया जिसे मनोरमा ने नहीं जाना। पर तारा ने वह खंजर मनोरमा के बदन से लगा दिया और वह बात-की-बात में बेहोश होकर जमीन पर गिर गई। झाड़ी में छिपा हुआ भूतनाथ भी निकल आया और कमलिनी से बोला––

भूतनाथ––जो हो, मगर मेरा काम कुछ भी न हुआ।

कमलिनी––इसमें कोई शक नहीं कि तुम बड़े बुद्धिमान हो, परन्तु कभी-कभी तुम्हारी अक्ल भी हवा खाने चली जाती है। तुम इस बात को नहीं जानते कि तुम्हारा काम पूरा-पूरा हो गया। यकायक तारा के पहुँच जाने से मालूम हुआ कि तुम्हारी किस्मत तेज है, नहीं तो मुझे बहुत-कुछ बखेड़ा करना पड़ता।

भूतनाथ––सो क्या, मुझे साफ समझा दो तो जी ठिकाने हो।

कमलिनी––मेरे पास बैठ जाओ, मैं अच्छी तरह समझा देती हूँ। (तारा की तरफ देख कर) कहो, तुम्हारा आना क्योंकर हुआ?

तारा––मुझे एक ऐसा काम आ पड़ा कि बिना तुमसे मिले कठिनता दूर होने की आशा न रही, लाचार झण्डी टेढ़ी करके तुमसे मिलने की उम्मीद में यहाँ आयी थी।

कमलिनी––अच्छा हुआ कि तुम आईं, इस समय तुम्हारे आने से बड़ा ही काम चला। अच्छा, बैठ जाओ और जो कुछ मैं कहती हूँ, उसे सुनो।

इसके बाद कमलिनी, तारा और भूतनाथ में देर तक बातचीत होती रही जिसे यहाँ पर लिखना हम मुनासिब नहीं समझते, क्योंकि इन लोगों ने जो कुछ करना विचारा है, वह आगे के बयान में स्वयं खुल जायेगा। जब बातचीत से छुट्टी मिली तो मनोरमा को उठा तीनों आदमी पहाड़ी के नीचे उतरे। मनोरमा एक पेड़ के साथ बाँध दी गई। इस काम से छुट्टी पाकर तारा और भूतनाथ वहाँ से अलग हो गए और किसी झाड़ी में छिप कर दूर से इन दोनों को देखते रहे। थोड़ी ही देर बाद मनोरमा होश में आई और अपने को बेबस पाकर चारों तरफ देखने लगी। पास ही में पेड़ से बँधी हुई कमलिनी पर भी उसकी निगाह पड़ी और वह अफसोस के साथ कमलिनी की तरफ देख कर बोली–– मनोरमा––बेशक तुम सच्ची हो। मेरी भूल थी जो तुम पर शक करती थी।

कमलिनी––खैर, इस समय तो तुम्हारे ही सबब से मुझे भी कष्ट भोगना पड़ा।

मनोरमा––इसमें कोई सन्देह नहीं।

कमलिनी––तुम्हारा छूटना तो मुश्किल है मगर मैं किसी-न-किसी तरह धोखा देकर छूट ही जाऊँगी और तब कमलिनी से समझूँगी। अब बिना उसकी जान लिए मुझे चैन कहाँ?

मनोरमा––तुम्हारी भी तो वह दुश्मन है, फिर तुम्हें क्योंकर छोड़ देगी?

कमलिनी––मेरी-उसकी दुश्मनी भीतर-ही-भीतर की है, इसके अतिरिक्त एक और सबब ऐसा है कि जिससे मैं अवश्य छूट जाऊँगी। तब तुम्हारे छुड़ाने का भी उद्योग करूँगी।

मनोरमा––वह कौन-सा सबब है?

कमलिनी––सो मैं अभी नहीं कह सकती। तुम्हें वह स्वयं मालूम हो जायगा। (चारों तरफ देख कर) न मालूम वह कम्बख्त कहाँ गई!

मनोरमा––क्या तुम्हें भी नहीं मालूम?

कमलिनी––नहीं, मुझे जब होश आया मैंने अपने को इसी तरह बेबस पाया।

मनोरमा––खैर, कहीं भी हो, आवेगी ही। हाँ तुम्हें यदि अपने छूटने की उम्मीद है तो कब तक?

कमलिनी––उसके आने पर दो-चार बातें करने से ही मुझे छुट्टी मिल जायगी और मैं तुम्हें भी अवश्य छुड़ाऊँगी। हाँ, अकेली होने के कारण विलम्ब जो कुछ हो। यदि तुम्हारा कोई मददगार हो तो बताओ, ताकि छुट्टी मिलने पर मैं तुम्हारे हाल की उसे खबर दूँ।

मनोरमा––(कुछ सोचकर) यदि कष्ट उठाकर तुम मेरे घर तक जाओ और मेरी सखी को मेरा हाल कह सको, तो वह सहज ही में मुझे छुड़ा लेगी।

कमलिनी––इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि मैं अवश्य छूट जाऊँगी। तुम अपने घर का पता और अपनी सखी का नाम बताओ। मैं जरूर उससे मिलकर तुम्हारा हाल कहूँगी और स्वयं भी जहाँ तक हो सकेगा, तुम्हें छुड़ाने के लिए उसका साथ दूँगी।

मनोरमा––यदि ऐसा करो तो मैं जन्म-भर तुम्हारा अहसान मानूँगी। जब उसके कान तक मेरा हाल पहुँच जायगा तो तुम्हारी मदद की आवश्यकता न रहेगी।

कमलिनी––खैर, अब पता और नाम बताने में विलम्ब न करो। कहीं ऐसा न हो कि कमलिनी आ जाय, तब कुछ न हो सकेगा।

मनोरमा––हाँ ठीक है-काशीजी में त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास लाल रंग का मकान एक छोटे से बाग के अन्दर है। मछली के निशान की स्याह रंग की झण्डी दूर से ही दिखाई पड़ेगी। मेरी सखी का नाम 'नागर' है, समझ गईं?

कमलिनी––मैं खूब समझ गई, मगर उसे मेरी बात का विश्वास कैसे होगा?

मनोरमा––इसमें विश्वास की कोई जरूरत नहीं है। वह मुझ पर आफत आने का हाल सुनते ही बेचैन हो जायगी और किसी तरह न रुकेगी।

कमलिनी––तथापि मुझे हर तरह से दुरुस्त रहना चाहिए। शायद वह समझे कि यह मुझे धोखा देने आई है और चाहती है कि मैं घर के बाहर जाऊँ तो कोई मतलब निकाले।

मनोरमा––(कुछ सोचकर) हाँ, ऐसा हो सकता है। अच्छा, मैं तुम्हें एक परिचय बताती हूँ। जब वह बात उसके कान में कहोगी, तब वह तुम्हारा पूरा विश्वास कर लेगी। परन्तु उस परिचय को बड़ी होशियारी से अपने दिल में रखना, खबरदार! दूसरा न जानने पावे, नहीं तो मुश्किल होगी और मेरी जान किसी तरह न बचेगी।

कमलिनी––तुम विश्वास रक्खो कि वह शब्द सिवाय एक दफे के जब मैं तुम्हारी सखी के कान में कहूँगी, दूसरी दफे मेरे मुँह से न निकलेगा। (इधर-उधर देख कर) जन्दी कहो, अब देर न करो।

मनोरमा––(कमलिनी की तरफ झुक कर धीरे से) 'विकट' शब्द कहना। बस, सन्देह न करेगी और तुम्हें मेरा विश्वासपात्र समझेगी।

कमलिनी––ठीक है, अब जहाँ तक जल्द हो सकेगा, मैं तुम्हारी सखी के पास पहुँचूंगी और अपना मतलब निकालूँगी।

मनोरमा––पहले तो मुझे यह देखना है कि कमलिनी तुम्हें क्योंकर छोड़ती है! जब तुम छूट जाओगी तब कहीं जाकर मुझे अपने छूटने की कुछ उम्मीद होगी।

कमलिनी––(हँस कर) मैं उतनी ही देर में छूट जाऊँगी जितनी देर में तुम एक से लेकर निन्यानवै तक गिन सको।

इतना कह कर कमलिनी ने सीटी बजाई। सीटी की आवाज सुनते ही तारा और भूतनाथ जो वहाँ से थोड़ी दूर पर एक झाड़ी के अन्दर छिपे हुए थे, कमलिनी के पास आ पहुँचे। कमलिनी ने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखा और कहा, "मुझे छोड़ दो।"

भूतनाथ ने कमलिनी को, जो पेड़ से बँधी हुई थी, खोल दिया। कमलिनी उठ कर मनोरमा के पास आई और बोली, "क्यों, मैं अपने कहे मुताबिक छूट गयी या नहीं!"

कमलिनी की चालाकी के साथ ही भूतनाथ की सूरत देखकर मनोरमा सन्न हो गई और ताज्जुब के साथ उन तीनों की तरफ देखने लगी। इस समय भूतनाथ के चेहरे पर उदासी के बदले खुशी की निशानी पाई जाती थी। भूतनाथ ने हँस कर मनोरमा की तरफ देखा और कहा, "क्या अब भी भूतनाथ तेरे कब्जे में है? अगर हो तो कह, इसी समय कमलिनी का सिर काट कर तेरे आगे रख दूँ, क्योंकि वह यहाँ मौजूद है।"

मनोरगा ने क्रोध के मारे दाँत पीसे और सिर नीचा कर लिया। थोड़ी देर बाद बोली, "अफसोस, मैं धोखा खा गई!"

कमलिनी––(तारा से) अब समय नष्ट करना ठीक नहीं। इस हरामजादी को तुम ले जाओ और लोहे वाले तहखाने में बन्द करो, फिर देखा जायगा। (अपने हाथ का नेजा देकर) इस नेजे को अपने पास रखो और वह खंजर मुझे दे दो। अब नेजे के बदले खंजर रखना ही मैं उत्तम समझती हूँ। यद्यपि एक खंजर मेरे पास है परन्तु वह कुँअर इन्द्रजीतसिंह के लिए है।

तारा––मैं भी यही कहना चाहती थी, क्योंकि खंजर और नेजे में गुण तो एक ही है फिर बोझ लेकर घूमने से क्या फायदा। यह लो खंजर, अपने पास रखो।

कमलिनी––(भूतनाथ से) तुम भी तारा के साथ जाओ और इस हरामजादी को हमारे घर पहुँचाकर बहुत जल्द लौट जाओ, तब तक मैं इसी जगह रहूँगी और तुम्हारे आते ही तुम्हें साथ लेकर काशीजी जाऊँगी। पहले तुम्हारा काम करके कुँअर इन्द्रजीतसिंह से मिलूँगी और मायारानी की मण्डली को, जिसने दुनिया में अन्धेर मचा रखा है, जहन्नुम में भेजूँगी।

भूतनाथ––(सिर झुकाकर) जो हुक्म!

५

रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, कभी-कभी कुत्तों के भोंकने की आवाज के सिवाय और किसी तरह की आवाज सुनाई नहीं देती। ऐसे समय में काशी की तंग गलियों में दो आदमी, जिनमें एक औरत और दूसरा मर्द है, घूमते हुए दिखाई देते हैं। ये दोनों कमलिनी और भूतनाथ हैं जो त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास मनोरमा के मकान पर पहुँचने की धुन में कदम बढ़ाये हुए तेजी के साथ जा रहे हैं। जब ये दोनों एक चौमुहानी के पास पहुँचे तो देखा कि दाहिनी तरफ से एक आदमी पीठ पर गट्ठर लादे आया और उसी तरफ को घूमा जिधर ये दोनों जाने वाले थे। कमलिनी ने धीरे से भूतनाथ के कान में कहा, "इस गठरी में जरूर कोई आदमी है।"

भूतनाथ––बेशक ऐसा ही है। इस आदमी की चाल पर भी मुझे कुछ शक पड़ता है। ताज्जुब नहीं कि यह मनोरमा का नौकर श्यामलाल हो।

कमलिनी––तुम्हारा शक ठीक हो सकता है क्योंकि तुम बहुत दिनों तक मनोरमा के मकान पर रह चुके हो और वहाँ के हर एक आदमी को बखूबी जानते हो।

भूतनाथ––कहो तो इसे रोकू?

कमलिनी––हाँ-हाँ रोको, जाने न पावे।

भूतनाथ लपककर उस आदमी के सामने गया और कमर से खंजर निकालकर उसके सामने चमकाया। उसकी चमक में भूतनाथ और कमलिनी ने उस आदमी को पहचान लिया, मगर वह इन दोनों को अच्छी तरह न देख सका, क्योंकि बिजली की तरह चमकने वाली रोशनी ने उसकी आँखें बन्द कर दी और वह घबराकर बैठ गया। भूतनाथ ने खंजर उसके बदन से लगाया जिसकी तासीर से वह एक दफे काँपा और बेहोश होकर जमीन पर लम्बा हो गया। भूतनाथ ने उसे उसी तरह छोड़ दिया और गठरी का कोना खोलकर देखा तो उसमें एक कमसिन औरत बँधी पाई। कमलिनी के हुक्म से भूतनाथ ने वह गठरी अपनी पीठ पर लाद ली और मनोरमा के घर का रास्ता छोड़ दोनों आदमी गंगा-किनारे की तरफ रवाना हुए।

बात-की-बात में दोनों गंगा-किनारे जा पहुँचे। इस समय चन्द्रमा की रोशनी अच्छी तरह फैली हुई थी। एक मढ़ी के ऊपर बैठने के बाद भूतनाथ ने बह गठरी खोली। उस बेहोश औरत के चेहर पर चन्द्रमा की रोशनी पड़ते ही भूतनाथ चौंक कर बोला, "ओफ, यह तो कमला है!"

कमला होश में लाई गई। जब उसकी निगाह भूतनाथ के ऊपर पड़ी तो वह एकदम काँप उठी। कमला को उस दिन की बात याद आ गई जिस दिन खँडहर के तहखाने में अपने चाचा शेरसिंह पास भूतनाथ को देखा था, कमला को शक हो गया कि इस समय वह जिसके हुक्म से बेहोश करके लाई गई, वह भूतनाथ ही है। कमला की दूसरी निगाह कमलिनी पर पड़ी मगर वह कमलिनी को पहचान न सकी। यद्यपि कमला कमलिनी को रोहतासगढ़ पहाड़ी पर देख चुकी थी परन्तु इस समय कमलिनी उस भयानक राक्षसी के भेष में न थी, रंग काला जरूर था, परन्तु लम्बे-लम्बे दाँत उसके मुँह में न थे, इसी से वह कमलिनी को नहीं पहचान सकी।

कमलिनी ने जब देखा कि कमला बहुत ही डरी हुई और हैरान मालूम पड़ती है तो उसने कमला का हाथ पकड़ लिया और धीरे से दवाकर कहा, "कमला, तू डर मत। हम लोगों ने इस समय तुझे एक दुश्मन के हाथ से छुड़ाया है।"

कमला––अब मेरा जी ठिकाने हुआ। मुझे उम्मीद है कि आप लोगों की तरफ से मुझे तकलीफ न पहुँचेगी। परन्तु आप लोगों को जानने के लिए मेरा जी बेचन हो रहा है।

कमलिनी––ठीक है, जरूर तेरा जी चाहता होगा कि हम लोगों का हाल जाने और इसी तरह मैं भी तुझसे बहुत-कुछ पूछना चाहती हूँ मगर इस समय केवल चार-पाँच घण्टे के लिए तुझसे जुदा होती हूँ, तब तक तू (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनके साथ रह। किसी तरह से डर मत, सवेरा होने के पहले ही मैं तुझसे आकर मिलूँगी और बातचीत के बाद कुँअर इन्द्रजीतसिंह के छुड़ाने का उद्योग करूँगी।

कमला––मैं आपके हुक्म के खिलाफ कुछ न करूँगी। मैं आपसे हर तरह पर भलाई की आशा रखती हूँ क्योंकि आपने मुझे एक ऐसे दुश्मन के हाथ से जिसका हाल मैं ही जानती हूँ।

कमलिनी––अच्छा, तो अब बातों में समय नष्ट करना ठीक नहीं है। (भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, यहाँ छोटी-छोटी बहुत-सी डोंगियाँ बँधी हुई हैं, सन्नाटा और मौका देखकर कोई एक डोंगी खोल लो और कमला को साथ लेकर गंगा-पार चले जाओ। मैं अब मनोरमा के घर जाती हूँ, वहाँ अपना मतलब साधकर सवेरा होने के पहले ही तुमसे आ मिलूँगी।

कमला––(चौंककर) क्या नाम लिया, मनोरमा! हाय-हाय, वह तो बड़ी शैतान है। हम लोगों को तो उसने तबाह कर डाला! क्या तुम उसके...

कमलिनी––डर मत कमला! मनोरमा को मैंने कैद कर लिया है और अब एक जरूरी काम के लिए उसके घर पर जा रही हूँ। (आसमान की तरफ देखकर) ओफ, बहुत बिलम्ब हुआ, खैर, अब बिदा होती हूँ, पुनः मिलने पर सब हाल कहूँगी।

कमलिनी वहाँ से रवाना हुई और थोड़ी ही देर में उस बाग के फाटक पर जा पहुँची जिसमें मनोरमा का मकान था। फाटक के साथ लोहे की एक जंजीर लगी हुई थी जिसे हिलाने से दरबान ने एक छोटे-से सुराख में से बाहर की तरफ देखा जो इसी काम के लिए बना हुआ था। केवल एक औरत को दरवाजे पर मौजूद पाकर दरबान ने फाटक खोल दिया और जब कमलिनी अन्दर चली आई तो फाटक उसी तरह बन्द कर दिया और तब कमलिनी से पूछा, "तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आई हो?"

कमलिनी––मुझे मनोरमा जी ने पत्र देकर अपनी सखी नागर के पास भेजा है, तुम मुझे नागर के पास बहुत जल्द ले चलो।

दरबान––वह तो यहाँ नहीं हैं, किसी दूसरी जगह गई हैं।

कमलिनी––कब आवेंगी?

दरबान––सो मैं ठीक नहीं कह सकता।

कमलिनी––क्या तुम यह भी नहीं कह सकते कि वे आज या कल तक लौट आवेंगी या नहीं?

दरबान––हाँ, यह तो मैं कह सकता हूँ कि चार-पाँच दिन तक वे न आवेंगी; इसके बाद चाहे जब आवें।

कमलिनी––अफसोस, अब बेचारी मनोरमा नहीं बच सकती।

दरबान––(चौंककर) क्यों-क्यों? उन पर क्या आफत आई?

कमलिनी––यह एक गुप्त बात है जो मैं तुमसे नहीं कह सकती, हाँ, इतना कहने में कोई हर्ज नहीं कि यदि तीन दिन के अन्दर उन्हें बचाने का उद्योग न किया जायगा तो चौथे दिन कुछ नहीं हो सकता, वे अवश्य मार डाली जायेंगी।

दरबान––अफसोस, यदि आप एक दिन तक यहाँ अटकना मंजूर करें तो मैं नागरजी के पास जाकर उन्हें बुला लाऊँ। आपको यहाँ किसी तरह की तकलीफ न होगी!

कमलिनी––(कुछ सोचकर) मुझे एक जरूरी काम है, इसलिए अटक तो नहीं सकती, परन्तु कल शाम तक अपना काम करके लौट आ सकती है।

दरबान––यदि आप ऐसा कर तो भी काम चल सकता है, परन्तु आप अटक न जायँ। यदि आपका काम ऐसा हो जिसे हम लोग कर सकते हों तो आप कहें, उसका बन्दोबस्त कर दिया जायगा।

कालिनी नहीं, बिना मेरे गये वह काम नहीं हो सकता। मगर कोई चिन्ता नहीं, मैं कल शाम तक अवश्य आ जाऊँगी।

दरबान––जैसी मर्जी, आपकी मेहरबानी से यदि हमारे मालिक की जान बच जायगी तो हम लोग जन्म भर के लिए गुलाम रहेंगे।

कमलिनी––मैं अवश्य आऊँगी और उनके लिए हर तरह का उद्योग करूँगी, तुम जाती समय इसका बन्दोबस्त कर जाना कि यदि तुम्हारे लौट आने के पहले ही मैं यहाँ पहुँच जाऊँ तो मुझे यहाँ रहने में किसी तरह का तरद्दुद न हो।

दरबान––इससे आप बेफिक्र रहें, मैं पूरा-पूरा इन्तजाम करके जाऊँगा और नागरजी को लेकर बहुत जल्दी लौटूँगा।

फाटक खोल दिया गया और कमलिनी बाग के बाहर हो गई। वह अभी बीस कदम भी आगे न गई होगी कि एक आदमी बदहवास और दौड़ता हुआ उसी बाग के फाटक पर पहुँचा और दरवाजा खुलवाने का उद्योग करने लगा। कमलिनी जान गई कि यह वही आदमी है जिसके हाथ से अभी थोड़ी ही देर पहले मैंने कमला को छुड़ाया है। कमलिनी उसी जगह आड़ में खड़ी होकर उसे देखने और कुछ सोचने लगी। जब बाग का फाटक खुल गया और वह आदमी अन्दर चला गया तो न मालूम क्या सोचती विचारती कमलिनी भी वहाँ से रवाना हुई और थोड़ी रात बाकी थी, जब कमला और भूतनाथ के पास पहुँची जो गंगा-पार उसके आने की राह देख रहे थे। कमलिनी को बहुत जल्दी लौट आते देख भूतनाथ को ताज्जुब हुआ और उसने कहा––

भूतनाथ––मालूम होता है कि कुछ काम न हुआ और आपको खाली ही लौट आना पड़ा!

कमलिनी––हाँ, इस समय तो खाली ही लौटना पड़ा, मगर काम हो जायगा। नागर घर पर मौजूद न थी, उसका आदमी उसे बुलाने के लिए गया है। मैं कल शाम तक फिर वहाँ पहुँचने का वादा कर आई हूँ। इच्छा तो यही थी कि वहाँ अटक जाऊँ क्योंकि ऐसा करने से और भी कुछ काम निकलने की उम्मीद थी, परन्तु कमला के खयाल से लौट आना पड़ा। मैं चाहती हूँ कि कमला को रोहतासगढ़ रवाना कर दूँ क्योंकि उसकी जुबानी कुछ हाल सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह को ढाढ़स होगी और लड़कों के सोच में बहुत व्याकुल न रहेंगे। (कमला की तरफ देख कर) तेरी क्या राय है?

कमला––जो कुछ आप हुक्म दें मैं करने को तैयार हूँ, परन्तु इस समय मैं बहुत सी बातों का असल भेद जानने के लिए बेचैन हो रही हूँ और सिवाय आपके कोई दूसरा मेरी दिलजमई नहीं कर सकता!

कमलिनी––कोई हर्ज नहीं, मैं हर तरह से तेरी दिलजमई कर दूँगी।

इतना सुनकर कमला भूतनाथ की तरफ देखने लगी। कमलिनी समझ गई कि यह निराले में मुझसे कुछ पूछना चाहती है। अस्तु, उसने भूतनाथ को वहाँ से हट जाने के लिए कहा और जब वह कुछ दूर चला गया तो कमला से बोली, "अब निराला हो गया, जो कुछ पूछना हो पूछो।"

कमला––मुझे आपका कुछ हाल भूतनाथ की जुबानी मालूम हुआ है परन्तु उस से पूरी दिलजमई नहीं होती। मुझे पूरा-पूरा पता लग चुका था कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह आपके यहाँ कैद हैं, फिर न मालूम, उन पर क्या आफत आई और उनके साथ आपने क्या सलूक किया। यद्यपि उस समय हम लोग आपके नाम से डरते थे, परन्तु जब आपने कई दफे हम लोगों के साथ नेकी की जिसका हाल आज मालूम हुआ है तो वह बात अब मेरे दिल से जाती रही, फिर भी कुँअर इन्द्रजीतसिंह के बारे में शक बना ही रहा है।

कमलिनी––सुन, मैं तुझसे पूरा-पूरा हाल कहती हूँ। यह तो तुझे मालूम ही हो चुका कि मैं कमलिनी हूँ।

कमला––जी हाँ, यह तो (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनकी कृपा से मालूम हो गया और इन्हीं के जुबानी यह भी जान गई कि रोहतासगढ़ में उस कब्रिस्तान के अन्दर हाथ में चमकता हुआ नेजा लेकर आप ही ने हम लोगों की मदद की थी और बेहोश करके रोहतासगढ़ किले के अन्दर पहुँचा दिया था। दूसरी दफे राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को रोहतासगढ़ के कैदखाने से आप ही ने छुड़ाया था और तीसरी दफे उस खँडहर में यकायक विचित्र रीति से आप ही को पहुँचते हम लोगों ने देखा था।

कमलिनी––यद्यपि कुछ लोगों ने मुझे बदनाम कर रक्खा है, परन्तु वास्तव से मैं वैसी नहीं हूँ। मैं नेकी करने के लिए हरदम तैयार रहती हूँ, इसी तरह दुष्टों को मजा चखाने की भी नीयत रहती है। मैंने कुँअर इन्द्रजीतसिंह के साथ किसी तरह की बुराई नहीं की, बल्कि उनके साथ नेकी की और उन्हें एक बहुत बड़े दुश्मन के हाथ से छुड़ाया। जब वे तुम लोगों से मिलेंगे और हाल कहेंगे, तब मालूम होगा कि कमलिनी ने सच कहा था!

इसके बाद कमलिनी ने इन्द्रजीतसिंह का अपने लश्कर से गायब होना और उन्हें दुश्मन के हाथ से छुड़ाना, कई दिनों तक अपने मकान में रखना, माधवी को गिरफ्तार करना, किशोरी का रोहतासगढ़ के तहखाने से निकलना और धनपति के कब्जे में पड़ना, तारा के खबर पहुँचाने पर इन्द्रजीतसिंह को साथ लेकर किशोरी को छुड़ाने के लिए जाना, रास्ते में शेरसिंह और देवीसिंह से मिलना, अग्निदत्त का हाल और अन्त में उस तिलिस्मी मकान के अन्दर सभी लोगों का कूद जाना आदि कमला से पूरा-पूरा बयान किया। कमला ताज्जुब से सब बातें सुनती रही और अब कमलिनी पर उसे पूरा पूरा विश्वास हो गया।

कमला फिर किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह उस खँडहर वाले तहखाने में क्योंकर पहुँचे?

कमलिनी––वह खँडहर एक छोटे से तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है। एक औरत जो मायारानी के नाम से पुकारी जाती है और जिसका हाल कुछ दिन बाद तुम लोगों को मालूम होगा, उस तिलिस्म पर राज्य करती है। मैं उसकी सगी बहिन हैं। हमारी तिलिस्मी किताब से साबित होता है कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह उस तिलिस्म को तोड़ेंगे क्योंकि तिलिस्म तोड़ने वालों के जो-जो लक्षण उस किताब में लिखे वे सब इन दोनों भाइयों में पाये जाते हैं, परन्तु मायारानी चाहती है कि तिलिस्म टने न पावे और इसीलिए वह दोनों कुमारों को अपनी कैद में रखने अथवा मार डालने का उद्योग कर रही है। मैंने उसे बहुत-कुछ समझाया और कहा कि तिलिस्म बनाने वालों के खिलाफ चलने और इन दोनों भाइयों से दुश्मनी रखने का नतीजा अच्छा न होगा परन्तु उसने न माना बल्कि वह मेरी भी दुश्मन बन बैठी। अन्त में लाचार मुझे उसका साथ छोड़ देना पड़ा। मैंने उस तालाब वाले मकान पर अपना कब्जा कर लिया और उसी में रहने लगी। उस मकान में मैं बेफिक्र रहती हूँ। मायारानी के कई आदमियों ने, जो नेक और ईमानदार थे, मेरा साथ दिया। तिलिस्म का जितना हाल उसे मालूम है, उतना ही मुझे भी मालूम है। यही सबब है कि वह अर्थात् तिलिस्मी महारानी (मायारानी) वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान के साथ दुश्मनी कर रही है और मैं हर तरह से उसकी मदद कर रही हूँ। उस तिलिस्मी मकान के अन्दर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों तथा मेरे नौकरों का हँसते-हँसते कूद जाना उसी तिलिस्मी महारानी की कार्रवाई थी और उस खँडहर वाले तहखाने में जो कुछ तुम लोगों ने देखा, वह सब भी उसी की बदौलत थी। अफसोस, गुप्त राह से महारानी के बहुत से आदमियों के पहुँच जाने के कारण मैं कुछ कर न सकी। खैर, कोई हर्ज नहीं। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और किशोरी तथा कामिनी वगैरह का मायारानी कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, क्योंकि उसकी असल जमा-पूँजी जो थी, वह मेरे हाथ लग चुकी है जिसका खुलासा हाल इस समय मैं नहीं कह सकती। हाँ, इतना प्रतिज्ञापूर्वक कहती हूँ कि उन लोगों को मैं बहुत जल्द कैद से छुड़ाऊँगी।"

कमला––मैं समझती हूँ कि वह मकान भी तिलिस्मी होगा जिसके अन्दर कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह हँसते-हँसते कूद पड़े थे।

कमलिनी––नहीं, उस मकान का तिलिस्म से कोई सम्बन्ध नहीं, वह नया बनाया गया है। मुझे उसकी खबर न थी इसी से मैं धोखे में आ गई, पीछे पता लगाने से मालूम हुआ कि वह भी मायारानी की कार्रवाई थी।

कमला––अब मेरा जी ठिकाने हुआ और आपकी बदौलत अपनी प्यारी सखी किशोरी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह के छूटने की उम्मीद हई। अब आशा है कि आपकी कृपा से एक दफे मायारानी को भी देखूँगी।

कमलिनी––इसके लिए जल्दी करना मुनासिब नहीं, मैं आज ही कल में तुझे अपने साथ मायारानी के घर ले चलती, क्योंकि मुझे वहाँ जाने की बहुत जल्दी है परन्तु इस समय तेरा रोहतासगढ़ लौट जाना ही ठीक है क्योंकि राजा वीरेन्द्रसिंह लड़कों की जुदाई में हद से ज्यादे दुःखी होंगे, तेरे लौट जाने से उन्हें ढाढ़स होगा और मेरी जुबानी जो कुछ तूने सुना है जब उनसे बयान करेगी तो उन्हें एक प्रकार की आशा हो जायगी। हाँ, एक बात तुझसे पूछना मैं भूल गई।

कमला––वह क्या?

कमलिनी––तू कहती है कि मैं मायारानी को देखना चाहती हूँ, तो क्या तूने उसे नहीं देखा? उसी के आदमी तो तुझे गिरफ्तार करके ले गए थे, जहाँ तक मैं समझती हूँ, तू उसके पास जरूर पहुँचाई गई होगी।

कमला––हाँ-हाँ, मैं एक जनाने दरबार में पहुँचाई गई थी मगर यह नहीं कह सकती कि वह मायारानी का ही दरवार था या कोई दूसरा, और यदि मायरानी का ही दरवार था तो......

कमलिनी––पहले तू अपना हाल कह जा कि जब खँडहर के अन्दर तहखाने में घुमी तो क्या हुआ और क्योंकर गिरफ्तार होकर कहाँ गई?

कमला––जब हम लोग राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ कुमार को निकालने के लिए उस खँडहर वाले तहखाने में गये तो वहाँ किसी को न पाया। सीढ़ी के नीचे एक छोटी कोठरी थी, मैं उसमें घुस गई। देखा कि पत्थर की एक सिल्ली दीवार से अलग होकर जमीन पर पड़ी हुई और उस जगह एक आदमी के जाने लायक रास्ता है। उस दरवाजे के दूसरी तरफ एक और कोठरी नजर आई जिसमें चिराग जल रहा था। मैंने आनन्द सिंह और तारासिंह को पुकारा, जब वे आ गए तो तीनों आदमी उस कोठरी के अन्दर घसे। जब दो-तीन कदम आगे गये तो यकायक पीछे से खटके की आवाज आई, घूमकर देखा तो वह रास्ता बन्द पाया जिधर से आये थे। ताज्जुब में आकर हम लोग सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। यकायक कई आदमी एक तरफ से निकलकर आये और उन लोगों ने फुर्ती के साथ एक-एक चादर हम लोगों के ऊपर डाल दी। मुझे उस चादर की तेज महक कभी न भूलेगी। सिर पर पड़ते ही अजब हालत हो गई, एक प्रकार की तेज महक नाक के अन्दर घुसी और उसने तन-बदन की सुध भुला दी। न मालूम उसी दिन या दूसरे या कई दिन के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को रात के समय एक जनाने दरबार में पाया।

कमलिनी––वह दरबार कैसा था?

कमला––वह दरबार एक बारहदरी में था। जड़ाऊ सिंहासन पर एक नौजवान औरत दक्षिणी ढंग की पोशाक पहने बैठी थी। मैं कह सकती हूँ कि सिवाय किशोरी के उसके मुकाबले की खूबसूरत औरत आज तक किसी ने न देखी होगी।

कमलिनी––बस-बस, मैं समझ गई, वही मायारानी थी। हाँ, और क्या देखा?

कमला––उसके दाहिनी तरफ सोने की एक चौकी पर मृगछाला बिछा हुआ था मगर उस पर कोई बैठा न था।

कमलिनी––वह तिलिस्म के दरोगा की जगह थी जो वृद्ध साधु के वेष में रहता है, मगर आज कल उसे राजा वीरेन्द्रसिंह ने कैद कर लिया है।

कमला––(ताज्जुब से) राजा वीरेन्द्रसिंह ने कब और किस दारोगा को कैद किया है?

कमलिनी––उस तिलिस्मी खँडहर में जब तुम लोग गये तो किसी साधु को बेहोश पाया था या नहीं?

कमला––(कुछ सोचकर) हाँ-हाँ, एक कोठरी के अन्दर जिसमें एक मूरत थी। क्या वही तिलिस्मी दारोगा है?

कमलिनी––हाँ, वही दारोगा है, वही बहुत से आदमियों को साथ लेकर तहखाने में से कुमार को उठा लाने के लिए उस खँडहर में गया था, मगर तारासिंह की चालाकी से अपने साथियों के सहित बेहोश हो गया। उस समय वेष बदले मेरा भी एक आदमी वहाँ मौजूद था, मगर दूर ही से सब-कुछ देख रहा था। हाँ तो उस दरबार में और क्या देखा?

कमला––उस मृगछाला बिछी हुई चौकी के पास अर्धगोलाकार बीस जड़ाऊ कुर्सियाँ और थीं और उसी तरह सिंहासन के बाईं तरफ छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर एक खूबसूरत औरत बैठी हुई थी जिसके बाद फिर बीस या इक्कीस जड़ाऊ कुर्सियाँ थीं, और दोनों तरफ वाली जड़ाऊ कुर्सियों पर नौजवान और खूबसूरत औरतें बड़े ठाठ से बैठी थीं। मैं उस दरबार को कभी न भूलूँगी।

कमलिनी––ठीक है, तो अब तुझे मायारानी को देखने की कोई आवश्यकता नहीं, खैर, मुख्तसिर में कह, फिर क्या हुआ?

कमला––पहले यह बता दीजिये कि मायारानी के बगल में छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर कौन औरत थी, क्योंकि वह भी बड़ी ही खूबसूरत थी?

कमलिनी––वह मेरी छोटी बहिन थी। सब से बड़ी मायारानी, उससे छोटी मैं और मुझसे छोटी वही औरत है, उसका नाम लाड़िली है।

कमल––आपकी और भी कोई बहिन है?

कमलिनी––नही, हम तीनों के सिवाय और कोई बहिन या भाई नहीं है। अब तू अपना हाल कह, फिर क्या हुआ?

कमला––मायारानी के सिंहासन के पीछे मनोरमा खड़ी थी। उन सभी की बातचीत से मुझे मालूम हुआ कि उसका नाम मनोरमा है। वह बड़ी दुष्ट थी!

कमलिनी––थी नहीं, बल्कि है। हाँ, तब क्या हुआ?

कमला––ऐसे दरबार को देख मैं घबरा गई। जिधर निगाह पड़ती थी उधर ही एक से एक बढ़ के जड़ाऊ चीजें नजर आती थीं। मैं हैरान थी कि इतनी दौलत इन लोगों के पास कहाँ से आई और ये लोग कौन हैं। मैं ताज्जब में आकर चारों तरफ देखने लगी। यकायक मेरी निगाह कुँअर आनन्दसिंह और तारासिंह पर पड़ी। कुँअर आनन्दसिंह हथकड़ी और बेड़ी से लाचार मेरे पीछे की तरफ बैठे थे। उनके पास उन्हीं की तरह हथकड़ी-वेड़ी से वेबस तारासिंह भी बैठे थे। फर्क इतना था कि कुँअर आनन्दसिंह जख्मी न थे, मगर तारासिंह बहुत ही जख्मी और खून से तरबतर हो रहे थे। उनकी पोशाक खून से रँगी हुई मालूम पड़ती थी। यद्यपि उनके जख्मों पर पट्टी बँधी हुई थी मगर सुरत देखने से साफ मालूम पड़ता था कि उनके बदन से खून बहुत निकल गया है और इसी से वे सुस्त और कमजोर हो रहे हैं। कुमार की अवस्था देखकर मुझ क्रोध चढ़ आया, मगर क्या कर सकती थी, क्योंकि हथकडी और बेडी ने मुझे भी लाचार कर रक्खा था। हाथ में नंगी तलवारें लिए कई औरतें कुँअर आनन्दसिंह, तारासिंह और मुझको घेरे हुए थीं। यह जानने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा था कि जब हम लोग बेहोश करके यहाँ लाए गये तो तारासिंह को जख्मी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। मायारानी ने मनोरमा की तरफ देखा और कुछ इशारा किया, मनोरमा तुरत मेरे पास आई। उसके एक हाथ में कोई चिट्ठी थी और दूसरे हाथ में कलम और दावात। मनोरमा ने वह चिट्ठी मेरे आगे रख दी और उस पर हस्ताक्षर कर देने के लिए मुझे कहा, मैंने चिट्ठी पढ़ी और क्रोध के साथ हस्ताक्षर करने से इनकार किया।

कमलिनी––उस चिट्ठी में क्या लिखा हुआ था? कमला-वह चिट्ठी मेरी तरफ से राजा वीरेन्द्रसिंह के नाम लिखी गई थी और उसमें यह लिखा था––

"आप चिट्ठी देखते ही केवल एक ऐयार को लेकर इस आदमी के साथ बेखौफ चले आइए। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और किशोरी वगैरह इसी जगह कैद हैं। उनको छुड़ाने का पूरा-पूरा उद्योग में कर चुकी हूँ, केवल आपके आने की देर है। यदि आप तीन दिन के अन्दर यहाँ न पहुँचेंगे तो इन लोगों में से एक की भी जान न बचेगी।"

कमलिनी––अच्छा फिर क्या हुआ?

कमला––जब मैंने दस्तखत करने से इनकार किया तो मनोरमा बहुत बिगड़ी और बोली कि "यदि तू हस्ताक्षर न करेगी, तो तेरे सामने ही कुँअर आनन्दसिंह और तारासिंह का सिर काट लिया जायगा और उसके बाद तुझे भी सूली दे दी जायगी।" यह सुनकर मैं घबरा गई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। इतने में ही। तारासिंह ने मुझे पुकारकर कहा, "कमला, उस चिट्ठी में जो कुछ लिखा है मैं अन्दाज से कुछ-कुछ समझ गया। खबरदार, इन लोगों की धमकी में न आना, और चाहे जो हो, उस चिट्ठी पर दस्तखत भी न करना।" तारासिंह की बात सुनकर मायारानी की तो केवल भौंहें ही चढ़कर रह गयीं, परन्तु मनोरमा बहुत ही उछली-कूदी और बकझक करने लगी। उसने मायारानी की तरफ देखकर कहा, "कम्बख्त तारासिंह को अवश्य सूली देनी चाहिए उसने अब यहाँ का रास्ता भी देख लिया है इसलिए उसका मारना आवश्यक हो गया है, और इस नालायक कमला को सरकार मेरे हवाले करें, मैं इसे अपने घर ले जाऊँगी।" मायारानी ने इशारे से मनोरमा की बात मंजूर की। मनोरमा ने एक चोबदार औरत की तरफ देखकर कहा, "कमला को ले जाकर कैद में रखो। चार-पाँच दिन बाद काशीजी में हमारे घर पर भिजवा देना, क्योंकि इस समय मुझे एक जरूरी काम के लिए जाना है जहाँ से तीन-चार दिन के अन्दर शायद न लौट सकूँगी।" हुक्म के साथ ही मुझ पर पुनः चादर डाल दी गई जिसकी तेज महक ने मुझको बेहोश कर दिया और फिर जब मैं होश में आई, तो अपने को एक अँधेरी कोठरी में कैद पाया। कई दिन तक मैं उसी कोठरी में कैद रही और इस बीच में जो कुछ रंज और तकलीफ उठानी पडी, उसका कहना व्यर्थ है। आखिर एक दिन भोजन में मुझे बेहोशी की दवा दी गई और बेहोश होने के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को आपके कब्जे में पाया। अब न मालूम कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, किशोरी और उनके ऐयार लोगों पर क्या मुसीबत आई और वे लोग किस अवस्था में पड़े हुए हैं!

यहाँ तक कहकर कमला चुप हो गई मगर उसकी आँखों से आँसू की बूँदें बराबर जारी थीं। कमलिनी भी बड़े गौर और अफसोस के साथ उसकी बातें सुनती जाती थी और जब वह चुप हो गई तो बोली––

कमलिनी––कमला, सब्र कर, घबरा मत। देख, मैं उन लोगों को कैसा छकाती हूँ। उन लोगों की क्या मजाल जो मेरे हाथ से बचकर निकल जायें। तिलिस्मी मकान के अन्दर जब कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह हँसते-हँसते कूद गये थे तो उन लोगों के पहले मैंने अपने कई आदमी उस मकान के अन्दर कुदाये थे जिसका हाल थोड़ी देर पहले मैं तुझके कह चुकी हूँ। मैंने उन आदमियों को बेसबब दुश्मनों के हाथ में नहीं फँसाया, कुछ समझ-बूझ के ही ऐसा किया था। वे लोग साधारण मनुष्य न थे, आशा है कि थोड़े दिन में तू सुन लेगी कि उन लोगों ने क्या-क्या कार्रवाई की।

कमला––आज आपके मिलने से और बहुत-सी बातें सुनकर मेरा जी ठिकाने हुआ। आप सरीखा मददगार के पाकर मैं भी अपने जी का हौसला निकालना चाहती हूँ और...

कमलिनी––नहीं-नहीं, इस समय तू और कुछ मत सोच और सीधे रोहतासगढ़ चली जा। तेरे वहाँ जाने से दो काम निकलेंगे, एक तो तेरी जुबानी सब हाल सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह को बहुत-कुछ ढाढ़स होगी, दूसरे, तू इस बात से भी होशियार रहना और सबको भी होशियार कर देना कि वह तिलिस्मी दारोगा अर्थात् बूढ़ा साधु कहीं घोखा देकर निकल न जाय। इसमें कोई शक नहीं कि मायारानी ने उसे छुड़ाने के लिए कई आदमी रोहतासगढ़ भेजे होंगे।

कमला––बहुत अच्छा! मैं रोहतासगढ़ जाती हूँ और उस बुड्ढे कम्बख्त से होशियार रहूँगी। मगर एक भेद बहुत दिनों से मेरे दिल में खटक रहा है, यदि आप चाहें तो मेरे दिल से वह खुटका निकाल सकती हैं।

कमलिनी––वह क्या है?

कमला––(भूतनाथ की तरफ इशारा करके) यह कौन हैं? इनका असल भेद मुझको बता दीजिये।

कमलिनी––(हँसकर) इसमें सन्देह नहीं कि भूतनाथ के बारे में तरह-तरह की बातें तू सोचती होगी, परन्तु लाचार है कि इस समय इनका असल भेद तुझसे नहीं कह सकती। थोड़े ही दिनों में इनका हाल तुझे ही नहीं, सभी को मालूम हो जायगा। हाँ, इतना अवश्य कहूँगी कि तुझे अपने चाचा शेरसिंह की तरह इनसे डरने की कोई जरूरत नहीं। ये तुझे किसी तरह की तकलीफ न देंगे, बल्कि जहाँ तक हो सकेगा, तेरी मदद करेंगे।

कमलिनी से अपने सवाल का पूरा-पूरा जवाब न पाकर कमला चुप हो रही और कमलिनी की आज्ञानुसार उसको उसी समय रोहतासगढ़ चले जाना पड़ा।

६

दूसरे दिन कुछ रात बीते कमलिनी फिर मनोरमा के मकान पर पहुँची। बाग के फाटक पर उसी दरबान को टहलते पाया जिससे कल बातचीत कर चुकी थी। इस समय बाग का फाटक खुला हुआ था और उस दरबान के अतिरिक्त और भी कई सिपाही वहाँ मौजद थे। दरबान कमलिनी को देखते ही खुशी से आगे बढ़ा और बोला, "आइये आइये, मैं कब से आपकी राह देख रहा हूँ। नागरजी को आये दो घण्टे से ज्यादा हो गये और वे आपसे मिलने के लिए बेताब हो रही हैं।"

दरबान के साथ ही साथ कमलिनी बाग के अन्दर गई और उस आलीशान मकान के सहन में पहुँची जो इस बाग के बीचोंबीच बना हुआ था। इस मकान के कमरों, दालानों, कोठरियों, तहखानों और पेचीले रास्तों का यदि यहाँ पूरा-पूरा बयान किया जाय तो पाठकों का बहुत समय नष्ट होगा, क्योंकि इस हिकमती मकान के हरएक दर्जे और हरएक हिस्से बड़ी कारीगरी और मतलब के साथ बनाये गये हैं। यदि हमारे पाठकों को तीन-चार बार इस मकान के अन्दर जाने और रात भर रहने का मौका मिल जायगा तो उन्हें यहाँ का बहुत भेद मालूम हो जायगा।

कमलिनी ने नागर को सहन में टहलते हए पाया। वह सिर नीचा किये किसी सोच में डूबी हुई टहल रही थी, कमलिनी के पैर की आहट पाकर चौंकी और बोली––

नागर––क्या मेरी सखी मनोरमा का सन्देशा लेकर तुम ही आई हो?

कमलिनी––हाँ।

नागर––तुम कौन और कहाँ की रहने वाली हो? मैंने तुम्हें सिवाय आज के पहले कभी नहीं देखा।

कमलिनी––हाँ, ठीक है, परन्तु मैं अपना परिचय किसी तरह नहीं दे सकती।

नागर––यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारी बातों पर क्योंकर विश्वास करूँगी?

कमलिनी––यदि मेरी बातों पर विश्वास न करोगी तो मेरा कुछ भी न बिगड़ेगा अगर कुछ बिगड़ेगा तो तुम्हारा या तुम्हारी सखी मनोरमा का। जब मनोरमा ने मुझे तुम्हारे पास भेजा तो मुझे भी इस बात का तरद्दुद हुआ और मैंने उनसे कहा कि तुम मुझे भेजती तो हो, मगर जाने से कोई काम न निकलेगा क्योंकि मैं किसी तरह अपना परिचय किसी को नहीं दे सकती और बिना मुझे अच्छी तरह जाँचे नागर मेरी बात पर विश्वास न करेंगी। इसके जवाब में मनोरमा ने कहा कि मैं लाचार हूँ, सिवाय तेरे यहाँ पर मेरा हित कोई नहीं जिसे नागर के पास भेजूँ। यदि तू न जायेगी तो मेरी जान किसी तरह नहीं बच सकती। खैर, तुम्हें मैं एक शब्द बताती हूँ, मगर खबरदार, वह शब्द सिवाय नागर के किसी दूसरे के सामने जबान से न निकालना। जिस समय नागर तेरी जबान से वह शब्द सुनेगी, उसी समय उसका शक जाता रहेगा और जो कुछ तू उसे कहेगी वह अवश्य करेगी। आखिर मनोरमा ने वह शब्द मुझे बताया और उसी के भरोसे मैं यहाँ तक आई हूँ।

नागर––(कुछ सोचकर) वह शब्द क्या है?

कमलिनी––(चारों तरफ देखकर और किसी को न पाकर) 'विकट'!

नागर––(कुछ देर तक सोचने के बाद) खैर, मुझे तुम पर भरोसा करना पड़ा। अब कहो, मनोरमा किस अवस्था में है और मुझे क्या करना चाहिए?

कमलिनी––मनोरमा भूतनाथ से मिलने के लिए गई थी, मगर उससे मुलाकात होने पर न मालूम कौन-सा ऐसा सबब आ पड़ा कि उसने भूतनाथ का सिर काट लिया।

नागर––(चौंककर) हैं! भूतनाथ को मार ही डाला!

कमलिनी––हाँ, उस समय मैं मनोरमा के साथ, मगर कुछ दूर पर, खड़ी यह हाल देख रही थी।

नागर––अफसोस, मनोरमा ने बहुत ही बुरा किया! आजकल भूतनाथ से बहुत कुछ काम निकलने का जमाना था। खैर, तब क्या हुआ?

कमलिनी––मनोरमा को मालूम न था कि राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार तेजसिंह इस समय थोड़ी ही दूर पर एक पेड़ की आड़ में खड़ा भूतनाथ और मनोरमा की तरफ देख रहा है।

नागर––ओफ, तेजसिंह को भूतनाथ के मरने का सख्त रंज हुआ होगा, क्योंकि इन दिनों भूतनाथ दिलोजान से उन लोगों की मदद कर रहा था, अच्छा तब?

कमलिनी––तेजसिंह बड़ी फुर्ती से उस जगह जा पहुँचा जहाँ मनोरमा खड़ी थी और एक लात मनोरमा की छाती पर ऐसी लगाई कि वह बदहवास हो जमीन पर गिर पड़ी। तेजसिंह ने उसकी मुश्कें बाँध लीं और जफील बजाई, जिसकी आवाज सुन कई आदमी वहाँ आ पहुँचे। उन लोगों ने मनोरमा के साथ मुझे भी गिरफ्तार कर लिया। उसी समय मनोरमा के कई सवार दूर से आते हुए दिखाई पड़े, मगर उन लोगों के पहुँचने के पहले ही तेजसिंह और उसके साथी हम दोनों को लेकर वहाँ से थोड़ी दूर पर पेड़ों की आड़ में जा छिपे। दूसरे दिन हम दोनों ने अपने को रोहतासगढ़ किले के अन्दर पाया। मनोरमा ने अपने छूटने की बहुत-कुछ कोशिश की, मगर कोई काम न चला। आखिर उसने तेजसिंह से कहा कि "भूतनाथ बड़ा ही शैतान, नालायक और खूनी आदमी था; उसका असल हाल आप लोग नहीं जानते, यदि जानते तो आप लोग खुद भूतनाथ का सिर काट डालते।" इसके जवाब में तेजसिंह ने कहा कि "यदि इस बात को तू साबित कर दे तो मैं तुझे छोड़ दूँगा।" मनोरमा ने मेरी तरफ इशारा करके कहा कि "यदि आप इसे छोड़ दें और पाँच दिन की मोहलत दें तो इसे मैं अपने घर भेजकर भूतनाथ के लिखे थोड़े कागजात ऐसे मँगा दूँ कि जिन्हें पढ़ते ही आपको मेरी बातों पर विश्वास हो जाय और भूतनाथ का वह विचित्र हाल भी, जिसे आप लोग नहीं जानते, मालूम हो। यदि मैं झूठी निकलूं तो जो कुछ चाहें, मुझे सजा दीजियेगा।" तेजसिंह ने कुछ देर सोच-विचार कर कहा कि "हो सकता है मुझसे बहाना करके इसे घर भेजो और किसी तरह की मदद मँगाओ, मगर मुझे इसकी कुछ परवाह नहीं, मैं तुम्हारी बात मंजूर करता हूँ और इसे (मेरी तरफ इशारा करके) छोड़ देता हूँ, जो कुछ चाहो, इसे समझा-बुझाकर अपने घर भेजो।" इसके बाद मुझसे निराले में बातचीत करने के लिए आज्ञा माँगी गई और तेजसिंह ने उसे भी मंजूर किया। आखिर मनोरमा ने मुझे बहुत-कुछ समझा-बुझाकर तुम्हारे पास रवाना किया। अब मैं तो रोहतासगढ़ जाने वाली नहीं, क्योंकि बड़ी मुश्किल से जान बची है, मगर तुम्हें मुनासिब है कि जहाँ तक हो सके, भूतनाथ के कागजात लेकर जल्द रोहतासगढ़ जाओ और अपनी सखी के छुड़ाने का बन्दोवस्त करो।

कमलिनी की बातें सुनकर नागर सोच-सागर में डूब गयी। न मालूम उसके दिल में क्या-क्या बातें पैदा हो रही थीं, मगर लगभग आधी घड़ी के वह चुपचाप बैठी रही। इसके बाद उसने सिर उठाया और कमलिनी की तरफ देखकर कहा, "खैर, अब मुझे रोहतासगढ़ जाना जरूरी हुआ। रात-भर में वे सब इन्तजाम करके सवेरे या कुछ दिन चढ़े रवाना हो जाऊँगी।"

कमलिनी––अच्छा, तो मेरे जिम्मे जो कुछ काम था उसे मैं कर चुकी। अब तुम जो मुनासिब समझो करो और मुझे आज्ञा दो कि जाऊँ और अपना काम देखूँ।

नागर––इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुमने मुझ पर और मनोरमा पर भारी अहसान किया। अब मैं चाहती हैं कि आज की रात यहाँ रह जाओ क्योंकि मनोरमा को छुड़ाने के लिए रात भर में मैं जो कुछ इन्तजाम करूँगी उसका हाल सवेरे तुमसे कहूँगी और उसके बाद तुमसे कुछ सलाह करके तब रोहतासगढ़ जाऊँगी।

कमलिनी––मैं इस योग्य नहीं हूँ कि तुम्हें राय दूँ परन्तु रात भर के लिए अटक जाने में मेरा कोई हर्ज नहीं है, यदि इससे आप लोगों की कुछ भी भलाई हो।

नागर ने कमलिनी के लिए एक कमरा खोल दिया और उसके खाने-पीने के लिए बखूबी इन्तजाम कर दिया।

७

आधी रात जा चुकी है। कमलिनी उस कमरे में, जो उसके सोने के लिए मुकर्रर किया गया था, चारपाई पर लेटी हुई करवटें बदल रही है क्योंकि उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं है। उसके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होती और मिटती हैं। उसे इस कोठरी की बनावट ने और भी तरदुद में डाल रखा है। यद्यपि इस कोठरी में विशेष सामान नहीं और न किसी तरह की सजावट ही है, केवल एक चारपाई जिस पर कमलिनी सोई है और एक चौकी पड़ी है तथा कोने में एक शमादान जल रहा है परन्त तीन तरफ की दीवारों पर वह ताज्जुब और तरदुद की निगाह डाल रही है। इस कमरे की एक तरफ की दीवार, जिधर से इसमें आने के लिए दरवाजा था, ईंट और चने से बनी हुई थी, परन्तु बाकी तीन तरफ की दीवारें तख्तेबन्दी की थीं, अर्थात लकडी से बनी हई थीं। कमलिनी के दिल में शक पैदा हआ और उसने सोचा कि इन तख्तेबन्दी की दीवारों में कोई भेद जरूर है। इस मकान का कछ-कछ भेद कमलिनी को मालम था, पर यहाँ का पूरा-पूरा हाल वह नहीं जानती थी और जानने की इच्छा रखती थी। आखिर कमलिनी से न रहा न गया, और वह चारपाई से उठी। पहले उसने उस दरवाजे को भीतर की तरफ से बन्द किया जो इस कमरे में आने-जाने के लिए था। इसके बाद कमर से खंजर निकाल लिया और उसके कब्जे से तख्तेबन्दी की दीवारों को जगह-जगह से ठोंककर देखने लगी। एक जगह से उसे दीवार पोली मालूम पड़ी और उस पर वह बखूबी गौर करने लगी। जब कुछ मालूम न हआ तो उसने शमादान उठा लिया और फिर उस जगह को गौर से देखा। थोड़ी ही देर में उसे विश्वास हो गया कि यहाँ पर एक छोटा-सा दरवाजा है, क्योंकि दरवाजे के चारों तरफ की बारीक दरार का निशान बहुत गौर करने पर मालूम होता था। कमलिनी ने दरार में खंजर की नोक चुभोई और उसे अच्छी तरह दो-चार बार हिलाया। दरार बड़ी हो गयी और आधा खंजर उसके अन्दर चला गया। फिर से कोशिश करने पर लकड़ी का एक तख्ता अलग हो गया और दूसरी तरफ जाने लायक रास्ता निकल आया।

हाथ में शमादान लिए हुए कमलिनी अन्दर घुसी और एक बहुत लम्बी-चौड़ी कोठरी में पहुँची। इस कोठरी में चारों तरफ की दीवार भी तख्तेबन्दी की थी इसमें कई चीजें ऐसी पड़ी हुई थीं जिनके देखने से चाहे कैसा ही संगदिल और दिलावर आदमी क्यों न हो, एक दफे जरूर काँप उठे और उसका कलेजा मामूली से चौगुना और अठगुना धड़कने लग जाय।

इस कोठरी में एक घोड़े की लाश थी, मगर वह अजीब ढंग की थी। उसके चारों तरफ चार खूँटियाँ जमीन में गड़ी हुई थीं और उन खूँटियों के सहारे उस घोड़े के चारों पैर बँधे हुए थे। उस घोड़े का पेट चीरा हुआ और आँतें निकाल कर बाहर रक्खी हुई थीं। चारों तरफ खून फैला हुआ था, मालूम होता था कि यह घोड़ा किसी काम के लिए आज ही मारा गया है। उसके पास ही थोड़ी दूर पर फूलों के कई गमले रक्खे हुए थे और उनके पास ही एक सुन्दर बिछौना था जिस पर सफेद चादर बिछी हुई थी तथा उस पर एक आदमी गर्दन तक सफेद ही चादर ओढ़े सो रहा था। घोड़े के पास से लेकर उस बिछावन तक पैर से लगे हुए खून के दाग जमीन पर दिखाई दे रहे थे और बिछावन की चादर तथा उस चादर में भी, जो वह आदमी ओढ़े हुए था, खून के धब्बे लगे हुए थे।

उस आदमी को देखकर कमलिनी इसलिए हिचकी कि कहीं वह जागकर कमलिनी को देख न ले, मगर थोड़ी देर तक खड़े रहने पर भी उसके हिलने-डुलने अथवा उसकी साँस चलने की आहट न मिली। तब कमलिनी हाथ में शमादान लिए हए उस विछावन के पास गई और रोशनी में उस आदमी की सूरत देखने लगी जिसका बिल्कुल चेहरा बखूबी खुला हुआ था। सूरत देखते ही कमलिनी चौंक पड़ी और शमादान जमीन पर रख बेधड़क उस आदमी का बाजू पकड़ के हिलाने और यह कहकर उसको जगाने का उद्योग करने लगी कि "वाह-वाह! तुम यहाँ बेखबर पड़े हुए हो और मुझे इसका हाल जरा भी नहीं मालूम!"

जब बाजू पकड़ के हिलाने से भी वह आदमी न जागा तब कमलिनी को ताज्जुब हआ और गौर से उसकी सूरत देखने लगी, मगर नब्ज पर हाथ रक्खा तो मालूम हो गया कि वह जिन्दा नहीं, बल्कि मुर्दा है। यह जानते ही कमलिनी का जी भर आया और वह मुर्दे के सिर पर हाथ रखकर रोने और गरम-गरम आँसू गिराने लगी। थोड़ी देर तक कमलिनी इसी अवस्था में पड़ी रही, आखिर वह चैतन्य हुई और यह कहकर उठ खड़ी हुई कि "बात तो बहुत ही बुरी हुई, मगर इस समय मुझे सब्र करना चाहिए, नहीं तो कुछ भी न कर सकूँगी। हाय, मेरा दिल और मेरे काबू में न रहे! नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं पूरा-पूरा सब करूँगी और देखूँगी कि क्या कर सकती हूँ। इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि इसकी जान निकले चार पहर से ज्यादा अभी नहीं हुए।" कमलिनी फिर शमादान उठाकर उस कोठरी में घूमने और चारों तरफ देखने लगी। पूरब और दक्खिन के कोने में एक लाश छत से लटकती हुई दिखाई पड़ी जिसके गले में फाँसी लगी थी। वह ताज्जुब के साथ शमादान ऊँचा करके उसकी सूरत देखने लगी, जब अच्छी तरह पहचान चुकी तो नफरत के साथ उस लाश पर थूककर अपना मुँह फेर लिया और दूसरी तरफ चली ही थी कि यह आवाज सुनकर ठहर गई और उस तरफ देखने लगी, जिधर से आवाज आई थी। आवाज यह थी––"हाय, मौत को भी मौत आ गई!" उसे ताज्जुब मालूम हुआ कि यह आवाज किधर से आई! वह यह देखने के लिए उस तरफ बढ़ी, जिधर से आवाज आई थी कि शायद कोई सूराख या खिड़की दिखाई दे और आखिर ऐसा ही हआ। दीवार के पास पहुँचते ही एक सूराख ऐसा दिखा जिसमें आदमी की गर्दन वखूबी जा सकती थी। यह टेढ़ा और नीचे की तरफ झुका हुआ सूराख, जिसे किसी कमरे का रोशनदान कहना चाहिए, दीवार के बिल्कुल नीचे की तरफ था।

कमलिनी ने उस सूराख में से झाँककर देखा तो एक छोटे से मगर सजे हुए कमरे में निगाह गई। यह कमरा उस कोठरी से एक खंड नीचे था जिसमें से कमलिनी झाँक रही थीं। उस कमरे में जो कुछ कमलिनी ने देखा, उससे उसके दिल को बड़ा ही सदमा पहुँचा और जब तक वह देखती रही उसकी आँखों से आँसू बराबर जारी रहे।

कमलिनी ने देखा कि एक पलंग पर, जिसके पास ही शमादान जल रहा है, आफत की मारी बेचारी किशोरी पड़ी हुई है। रंज और गम के मारे सुखकर काँटा हो रही है। चेहरे पर मुर्दनी छायी हुई है और कमजोरी की यह अवस्था है कि साँस भी मुश्किल से आती-जाती है। थोड़ी-थोड़ी देर पर उसके होंठ हिलते हैं और धीरे-धीरे कुछ कहती है, मगर जब कहती है तो उसकी आवाज साफ सुनाई देती है। वह कह रही थी––

"हाय, इससे बढ़कर मेरी दुर्दशा और क्या हो सकती है! इन्द्रजीतसिंह, तुम्हारी मुहब्बत में मैं यहाँ तक पहुँच चुकी, कुल में कलंकिनी कहाई, लज्जा को तिलांजलि दे बैठी, और वह सब दुःख झेलने को तैयार हुई, यह सब तुम्हारी बदौलत...

"(थोड़ी देर चुप रहकर) यहाँ तक रोई कि अब आँखों में आँसू भी नहीं रहे। खाना-पीना छोड़ देने पर भी निगोड़ी जान नहीं निकलती। हाय, मौत को भी मौत आ गई! नहीं-नहीं, मौत को मौत नहीं आई, वह देखो, मेरे सामने खड़ा हुआ काल मेरी तरफ देख रहा है। अब कुछ दम की मेहमान हूँ। मैं तो जाती हूँ, मगर अफसोस, अपने प्यारे की जुदाई का रंज और उसकी बेवफाई और बेमुरौवती की शिकायत अपने साथ लिए जाती हैं। हाय, इस समय ऐसा कोई भी नहीं जो मेरी हालत देखे और मेरा हाल उनसे जाकर...

"(थोड़ी देर चुप रहकर) जब उनको मेरी परवाह ही नहीं, तो मेरा हाल कोई उनसे कहकर करेगा ही क्या? उन्होंने तो खुद कहला भेजा है कि मुझे कुछ भी परवाह नहीं। हाय, मैं ऐसी बात कैसे सुन सकी! उसी समय मेरी जान क्यों न निकल गई! नहीं-नहीं, यह सब ऐयारी है, उन्होंने ऐसी बात कभी न कही होगी। पर इससे क्या हो सकता है जब कि दम निकलने में कुछ कसर बाकी नहीं है। देखो-देखो वह काल अब मेरी तरफ बढ़ा चला आता है। अच्छा है, किसी तरह वह सायत आए भी तो। हे सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर, मैं तुम्हीं को गवाह रखती हूँ क्योंकि तुम खूब जानते हो कि मैं निर्दोष इस दुनिया से उठी जाती हूँ और इन्द्रजीतसिंह की मुहब्बत के सिवाय अपने साथ कुछ भी नहीं लिए जाती, हाँ उस प्यारे की..."

इसके बाद बहुत देर तक राह देखने पर भी कुछ सुनाई न दिया। कमलिनी ने समझा कि या तो इसे कमजोरी से गश आ गया और या इस हसरत की मारी बेचारी का दम ही निकल गया। इस समय कमलिनी ने जो कुछ देखा या सुना, वह उसे बेसुध करने के लिए काफी था। कमलिनी जार-जार रो रही थी, यहाँ तक कि हिचकी बँध गई और उसे इस बात का ध्यान बिल्कुल ही जाता रहा कि मैं यहाँ किस काम के लिए आई हूँ क्या कर रही हूँ और इस समय कैसे खतरे में फँसी हुई हूँ।

कमलिनी के लिए यह समय बड़े ही संकट का था। वह नहीं चाहती थी कि बेचारी किशोरी का पूरा-पूरा हाल जाने या उसे किसी तरह की मदद पहुँचाए बिना यहाँ से चली जाय और साथ ही इसके भूतनाथ के कागजात को भी, जिनके लेने का वह पूरापूरा उद्योग कर चुकी थी, किसी तरह छोड़ नहीं सकती थी, क्योंकि यह मौका निकल जाने पर फिर उनका हाथ लगना बहुत ही कठिन था।

किशोरी की हालत पर अफसोस करती हुई कमलिनी अभी नीचे देख ही रही थी कि यकायक उस कमरे का दरवाजा खुला और एक खूबसूरत नौजवान अमीराना पोशाक पहने अन्दर आता हुआ दिखाई पड़ा। उसके पीछे हाथ में पंखा लिए एक लौंडी भी थी जिसने अन्दर पहुँचने पर उस दरवाजे को उसी तरह बन्द कर दिया।

इस नौजवान की उम्र लगभग पचीस वर्ष के होगी। दर्म्याना कद, गोरा रंग, हाथ-पैर से मजबूत और खूबसूरत था। वह किशोरी के पलंग के पास आकर खड़ा हो गया और गौर से उसकी तरफ देखने लगा। उस पलंग के पास ही एक मोढा कपड़े से मढ़ा हुआ पड़ा था जिसे लौंडी उठा लाई और पलंग के पास रखकर पंखा झलने लगी। नौजवान ने बड़े गौर से किशोरी की नाड़ी देखी और फिर उस लौंडी की तरफ मुँह करके कहा, "गश आ गया है।"

लौंडी––कमजोरी के सबब से।

नौजवान––एक तो बीमार, दूसरे कई दिन से खाना-पीना सब छोड़ दिया, फिर ऐसी नौबत तो हुआ ही चाहे। अफसोस, यह मेरी बात नहीं मानती और मुफ्त में जान दे रही है।

लौंडी––इस जिद का भी कोई ठिकाना है!

नौजवान––खैर चाहे जो हो, मगर दो बात से तीसरी कभी हो ही नहीं सकती, या तो यह मेरी होकर रहेगी या इसी अवस्था में पड़ी-पड़ी यमलोक को सिधार जायगी। अच्छा, इसे होश में लाना चाहिए।

"जो हुक्म" कह कर लौंडी वहाँ से चली गई और एक आलमारी में से जो पलंग के सिरहाने की तरफ थी, कई बोतलें निकाल लाई, जिन्हें उस नौजवान के पास रख कर दह फिर पंखा झलने लगी।

नौजवान ने अपनी जेब में से रूमाल निकाल कर एक बोतल के अर्क से उसे तर किया और दूसरी बोतल में से थोड़ा-सा अर्क हाथ में लेकर किशोरी के मुँह पर छींटा दिया। इसके बाद वही रूमाल नाक के पास ले जाकर कुछ देर तक सुँघाया। जब उससे कुछ काम न चला तो तीसरी बोतल से अर्क लेकर उसके मुँह पर छींटा दिया। थोड़ी देर में किशोरी का गश जाता रहा और उसने आँख खोल कर देखा मगर जैसे ही उस नौजवान पर निगाह पड़ी वह काँप उठी और दोनों हाथों से मुँह ढाँप कर बोली––

"हाय, न मालूम यह चाण्डाल अब क्यों मेरे पास आया है!"

नौजवान––मैं इसी वास्ते आया हूँ कि एक दफे तुमसे और पूछ लूँ।

किशोरी––एक दफे क्या सौ दफे कह चुकी कि तू मुझसे किसी तरह की उम्मीद न रख। मैं तेरी सूरत देखने की बनिस्बत मौत को हजार दर्जे अच्छा समझती हूँ!

नौजवान––क्या अभी तक तुझे इस बात की उम्मीद है कि इन्द्रजीतसिंह आकर तेरी मदद करेंगे और छुड़ा ले जायेंगे?

किशोरी––मुझे क्या पड़ी है कि इन सब बातों का तुझे जवाब दूँ? मैं तुझ पर बल्कि तेरे सात पुश्त पर थूकती हूँ। चाण्डाल, हट जा मेरे सामने से?

लौंडी––(नौजवान से) हुजूर, इस कमीनी औरत से क्यों बेइज्जती करा रहे हैं? इसमें क्या ऐसा हीरा जड़ा है?

नौजवान क्रोध के मारे काँपने लगा, आँखें लाल हो गईं, और दाँत पीसता हुआ मोढ़े पर से उठ खड़ा। दाहिने हाथ से वह छुरा निकाल लिया जो उसकी कमर में छिपा हुआ था और बाएँ हाथ से किशोरी का हाथ पकड़कर यह कहता हुआ उसकी तरफ झुका, "जब ऐसा ही है तो मैं इसी समय क्यों न तुझे यमलोक पहुँचाऊँ!"

उस नौजवान और किशोरी की यह अवस्था देख कर कमलिनी परेशान हो गई और सोचने लगी कि इस जल्दी में कौन सी तरकीब की जाय कि किशोरी की जान बचे। मगर वह कर ही क्या सकती थी? एक तो वह स्वयं चोरों की तरह कोठरियों में घूम रही थी, यदि किसी को जरा भी शक हो जाय तो उसकी जान पर आ बने। दूसरे, कोई ऐसा रास्ता भी नहीं दिखाई देता था जिधर से किशोरी के पास पहुँचकर उसकी सहायता करती। मगर इसमें कोई सन्देह नहीं कि कमलिनी बहुत होशियार चालाक और बुद्धिमान थी। उसने बहुत जल्द ही दिल में इस बात का फैसला कर लिया कि अब क्या करना चाहिए। एक खयाल बिजली की तरह उसके दिल में दौड़ गया मगर देखना चाहिए उससे कहाँ तक काम निकलता है।

जिस समय किशोरी को मारने के लिए वह नौजवान झुका और कमलिनी को मालूम हुआ कि अब उस बेचारी का काम तमाम होना चाहता है उसी समय कमलिनी ने अपनी कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल लिया और जिस मोखे में देख रही थी उसके अन्दर डाल कर उसका कब्जा दबाया। यह खंजर बिजली की तरह चमका और उस कोठरी में इतनी ज्यादा चमक या रोशनी पैदा हुई कि तुरत किशोरी और उस नौजवान की आँखें बिल्कुल बन्द हो गई जो किशोरी को मारना चाहता था, इसके साथ ही कमलिनी ने भारी स्वर में यह आवाज दी, "खबरदार! किशोरी की जान लेकर अपनी जान का ग्राहक मत बन!"

उस बिजली की चमक ने तो नौजवान को परेशान कर ही दिया था, मगर साथ ही कमलिनी की आवाज ने जो गैव की आवाज मालूम होती थी उसे बदहवास कर दिया और वह इतना डरा और घबराया कि बिना कुछ सोचे और किशोरी को दु:ख दिये उस कोठरी से निकल भागा। कमलिनी ने भी अब उस जगह ठहरना मुनासिब न जाना। जहाँ तक जल्द हो सका अपने कमरे में चली आई। उस तख्ते के दरवाजे को जिसे खोल दूसरी कोठरी में गई थी ज्यों-का-त्यों बन्द करने के बाद अपने कमरे का दरवाजा भी खोल दिया जो दूसरी कोठरी में जाने के पहले भीतर से बन्द कर लिया था।

इस समय रात बहुत थोड़ी रह गई थी। कमलिनी ने चाहा कि दो घण्टे आराम करे मगर जो कुछ अद्भुत बातें उसने देखी और सूनी थीं, उनके खयाल और विचार न आराम लेने न दिया और उसे किसी तरह नींद न आई। अभी आसमान पर सुबह का सफेदी अच्छी तरह फैलने भी नहीं पाई थी कि दरवाजा खुलने की उसे आहट मालूम हुई। कमलिनी ने दरवाजे की तरफ देखा तो नागर पर नजर पड़ी।

कमलिनी पहले ही से सोचे हुए थी कि आज की अद्भुत बातों का असर कुछ न कुछ नागर पर जरूर पड़ेगा और वह सवेरा होने से पहले ही यहाँ पहुँचेगी बल्कि ताज्जुब नहीं कि वह मुझ पर किसी तरह का शक भी करे। आखिर कमलिनी का सोचना ठीक निकला।

इस समय नागर के चेहरे पर परेशानी और उदासी छाई हुई थी। उसने आते ही कमलिनी पर एक तेज निगाह डाली और सवाल करना शुरू किया––

नागर––इस समय तुम्हारी आँखें लाल मालूम होती हैं, क्या नींद नहीं आई?

कमलिनी––हाँ दो घण्टे के लगभग तो मैं सोई मगर फिर नींद नहीं आई, अभी तक डर के मारे मेरा कलेजा काँप रहा है। यह उम्मीद न थी कि तुम मुझे एसी भयानक जगद सोने के लिए दोगी क्योंकि मैंने तुम्हारे साथ किसी तरह की बुराई नहीं की था।

नागर––(ताज्जुब से) सो क्या? तुम्हें किस बात की तकलीफ हुई और यहाँ पर क्या भयानक वस्तु देखने में आई?

कमलिनी––मैं यहाँ पर अब एक सायत भी नहीं ठहर सकती, केवल तुम्हारा राह देख रही थी।

नागर––आखिर मामला क्या है, कुछ कहो भी तो।

कमलिनी––अच्छा, बाहर चलो तो जो कुछ देखा है तुमसे कहूँ।

इसमें कोई शक नहीं कि नागर बहुत तेजी के साथ आई थी और उसे कमलिनी पर शक था मगर कमलिनी ने ऐसे ढंग से बातें कीं कि उसकी हालत बिल्कुल ही बदल गई और वह तरह-तरह के सोच में पड़ गई। नागर और कमलिनी बाहर आई और सहन में एक संगमरमर की चौकी पर बैठकर बातचीत करने लगी।

नागर––हाँ कहो, तुमने क्या देखा?

कमलिनी––दो घण्टे तो मैं बड़े आराम से सोई पर यकायक घड़घड़ाहट की आवाज सुन चौंक पड़ी और घबरा कर चारों तरफ देखने लगी।

नागर––घड़घड़ाहट की आवाज कैसी?

कमलिनी––मालूम होता था कि इस कमरे के नीचे कई गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। पहले तो मुझे शक हुआ कि शायद भूकम्प आने वाला है क्योंकि उसके पहले भी प्रायः ऐसी घटना हुआ करती है, मगर सो न हुआ। आखिर थोड़ी देर तक राह देख कर फिर सो रही। आधा घण्टा भी न हुआ होगा कि मेरी चारपाई हिली, मैं घबरा कर उठ बैठी और अपने सामने एक कम-उम्र लड़के को देख कर ताज्जुब करने लगी।

नागर––(ताज्जुब से) कम-ऊम्र लड़का! या कोई औरत थी? शायद तुमने अच्छी तरह खयाल न किया हो।

कमलिनी––जी नहीं, जहाँ तक मैं समझती हूँ, वह लड़का ही था!

नागर––भला उसकी उम्र क्या होगी? और सूरत-शक्ल कैसी थी?

कमलिनी––शायद चौदह या पन्द्रह वर्ष होगी, चेहरा खूबसूरत और रंग गोरा, सिर पर मुँडासा बाँधे और हाथ में एक बड़ा-सा डिब्बा लिए था।

नागर––(कुछ सोच कर) तुमने धोखा खाया, वह जरूर कोई औरत बल्कि कमलिनी...अच्छा, तब क्या हुआ?

कमलिनी––उसने आते ही मुझसे पूछा कि 'सच बता, किशोरी कहाँ है?'

नागर––आते ही किशोरी को पूछा?

कमलिनी––जी हाँ। मैंने जवाब दिया कि 'मुझे खबर नहीं।' इतना सुनते ही उसकी आँखें लाल हो गई और गुस्से के मारे थरथर काँपने लगा। उसने वह बड़ा डिब्बा जो हाथ में लिए था जमीन पर दे मारा। उस डिब्बे में से इतनी तेज चमक पैदा हुई कि जिसे मैं अच्छी तरह बयान नहीं कर सकती। मालूम होता था कि आसमान से उतर कर कई बिजलियाँ एक साथ कमरे के अन्दर आ घुसी हैं। मेरी आँखें एकदम बन्द हो गई और मैं काँप कर चारपाई पर गिर पड़ी। थोड़ी देर बाद मालूम हुआ कि कोई आदमी मेरे बदन पर हाथ फेर रहा है। बस, उस समय मैं बेहोश हो गई और तन-बदन की सध जाती रही। मैं समझती हूँ कि कोई पहर भर के बाद मुझे होश आई और तब से बराबर जाग रही हूँ। मैंने बहुत चाहा कि कमरे से निकल भागूँ मगर डर के मारे हाथ-पैर ऐसे कमजोर हो गए थे कि चारपाई से उठ न सकी, इस समय जब तुम्हारी सूरत देखी तो जरा जी ठिकाने हुआ।

नागर––(कुछ देर सोचने के बाद धीरे से) बेशक यह काम मँझली रानी का है, दूसरे का नहीं।

कमलिमी––मँझली रानी कौन?

नागर––तुम उसे नहीं जानती हो।

कमलिनी––खैर, जो हो, मैं तो सोचे हुए थी कि कल या परसों जब मैं अपना काम करके लौटँगी और एक रात इस शहर में काटने की नौबत आवेगी तो बस इसी मकान में रह जाऊँगी, क्योंकि मनोरमा की मोहब्बत के भरोसे इसे भी अपना घर समझती हूँ मगर रात की बात ने ऐसा डरा दिया कि अब हिम्मत नहीं पड़ती।

नागर––नहीं-नहीं, तुम जब इधर आया-जाया करो तो यहाँ जरूर टिका करो और इस मकान को अपना ही समझो। मैं लौंडियों और नौकरों को इस विषय में पूरा-पूरा हुक्म देती हूँ। यह भयानक घटना जो आज हुई है, रोज नहीं हो सकती, इससे निश्चित रहो।

कमलिनी––क्या कहूँ अभी तक होशहवास दुरुस्त नहीं हुए।

नागर––जरा ठहरो, मैं इस कमरे में जाती हूँ और एक चीज देख कर अभी लौट आती हूँ।

नागर उठी और उस कमरे में चली गई जिसमें कमलिनी सोई थी। मगर, थोड़ी देर बाद आकर बोली, "तुम बेखौफ रहो, आज के बाद फिर कभी इस मकान में ऐसी घटना न देखोगी। क्या करूँ लाचार हूँ, क्योंकि इस समय मुझे झख मार कर रोहतासगढ़ मनोरमा को छुड़ाने के लिए जाना ही पड़ेगा नहीं तो आज एक भारी काम निकलने का मौका आ गया था।"

कमलिनी––तुमने क्या कहा, मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया।

नागर––इन बातों को तुम नहीं समझ सकतीं। खैर, अब तुम्हारा क्या इरादा है? मैं तो रोहतासगढ़ जाने के लिए तैयार हो चुकी हूँ।

कमलिनी––अच्छी बात है। जहाँ तक हो सके जल्दी जाओ, मैं भी एक जरूरी काम के लिए मिर्जापुर जाती हूँ, कल या परसों तक लौटूँगी। मैं तो कल ही चली जाती, मगर तुमने व्यर्थ मुझे रोक लिया।

नागर––मैंने व्यर्थ नहीं रोका था, मगर हाँ, अब उसे व्यर्थ ही कहना चाहिए, खैर माफ करो और कृपा करके मेरी एक बात स्वीकार करो तो बड़ा अहसान मानूँगी।

कमलिनी––वह क्या?

नागर––इस समय तो मैं रोहतासगढ़ जाती हूँ, क्या जाने कब तक लौटना हो, मगर तुम पन्द्रह दिन के अन्दर मुझसे एक दफे जरूर मिलो।

कमलिनी––पन्द्रह दिन तक तो मैं इस प्रान्त में नहीं रह सकती, हाँ पाँच-सात दिन तक में यदि मुझसे मिल सको तो ठीक है।

नागर––शायद पाँच-सात दिन तक मेरा लौटना न हो।

कमलिनी––ऐसा नहीं हो सकता, तुम जिस समय पहुँचोगी और भूतनाथ के कागजात तेजसिंह को दिखाओगी उसी समय मनोरमा की छुट्टी हो जायगी। इसमें कुछ सन्देह नहीं कि तेजसिंह बात का बड़ा धनी है।

नागर––यदि ऐसा हो तो मैं अपने तेज घोड़े पर सवार होकर कल बखूबी रोहतासगढ़ पहुँच सकती हूँ।

कमलिनी––ऐसा करो तो तुम चार ही दिन में लौट आओगी। मैं भी कल या परसों मिर्जापुर से आ जाऊँगी और जब तक तुम न लौटोगी इसी मकान में टिकी रहूँगी क्योंकि मनोरमा ने पुनः मिलने के लिए मुझसे कसम खिला ली है। अस्तु, पाँच-चार दिन तक अपना हर्ज करके भी मनोरमा के लिए यहाँ अटकना आवश्यक है।

नागर––बहुत अच्छी बात है। जब मनोरमा से वायदा कर चुकी हो तो मुझे विशेष कहने की कोई आवश्यकता नहीं।

कमलिनी––अच्छा तो आप अब मेरा एक काम करें।

नागर––कहिये।

कमलिनी––अपने किसी आदमी को भेज कर एक घोड़ा किराये का मँगवा दीजिए, जिस पर सवार होकर मैं मिर्जापुर जाऊँ, क्योंकि यद्यपि मैं ऐयार हूँ परन्तु रोहतासगढ़ से यहाँ तक तेजी के साथ आने के कारण बहुत सुस्त हो रही हूँ।

नागर––क्या मनोरमा के घर में घोड़ों की कमी है जो तुम्हारे लिए किराए का घोड़ा मँगवाया जाय।

इतना कह कर नागर चली गई। थोड़ी देर के बाद एक लौंडी आई जिसने कमलिनी को स्नान इत्यादि से छुट्टी पा लेने के लिए कहा। कमलिनी ने दो-एक जरूरी काम से तो छुट्टी पा ली, मगर स्नान करने से इन्कार किया और अपने बटुए से सामान निकाल कर चिट्ठी लिखने लगी।

घण्टे भर बाद सफर के सामान से लैस होकर कई लौंडियों को साथ लिए हुए नागर भी उसी जगह आ पहुँची जहाँ कमलिनी बैठाई गई थी। उस समय कमलिनी चिट्ठी लिख चुकी थी।

नागर––मैंने तुम्हारे पास इसलिए एक लौंडी भेजी थी कि तुम्हें नहला-धुला दे मगर तुमने...

कमलिनी––हाँ, मैंने स्नान नहीं किया क्योंकि इस समय अर्थात सूर्योदय के पहले स्नान करने की मेरी आदत नहीं। कहीं स्नान कर लूँगी, और कामों से छुट्टी पा चुकी हूँ।

नागर––खैर, कुछ मेवा खाकर जल पी लो।

कमलिनी––नहीं, इस समय माफ करो। हाँ, थोड़ा-सा मेवा साथ रख लूँगी जो सफर में काम आवेगा।

थोडी देर बाद दो घोड़े कसे-कसाये लाए गये, एक पर नागर और दूसरे पर कमलिनी सवार हुई। उस समय कमलिनी ने वह चिट्ठी जो अभी घण्टा-भर हुआ लिख कर तैयार की थी नागर के हाथ में दे दी और कहा, "इसे हिफाजत से रखो, मनोरमा को देकर मेरी तरफ से 'जय माया की' कहना।" वह चिट्ठी लिफाफे के अन्दर थी और जोड़ पर मोहर लगाई हुई थी।

बाग के बाहर निकल कर कमलिनी ने पश्चिम का रास्ता लिया और नागर पूरब की तरफ रवाना हुई।