चन्द्रकान्ता सन्तति
इक्कीसवाँ भाग
१
भूतनाथ अपना हाल कहते-कहते कुछ देर के लिए रुक गया और इसके बाद एक लम्बी साँस लेकर पुनः यों कहने लगा।
भूतनाथ––मैं अपने को कैदियों की तरह और अपने सामने अपनी ही स्त्री को सरदारी के ढंग पर बैठे हुए देखकर एक दफे घबड़ा गया और सोचने लगा कि यह क्या मामला है? मेरी स्त्री मुझे सामने ऐसी अवस्था में देखे और सिवाय मुस्कुराने के कुछ न बोले! अगर वह चाहती तो मुझे अपने पास गद्दी पर बैठा लेती, क्योंकि इस कमरे में जितने दिखाई दे रहे हैं उन सभी की वह सरदार मालूम पड़ती है-इत्यादि बातों को सोचते-सोचते मुझे क्रोध चढ़ आया और मैंने लाल आँखों से उसकी तरफ देखकर कहा, "क्या तू मेरी स्त्री वही रामदेई है जिसके लिए मैंने तरह-तरह के कष्ट उठाये और जो इस समय मुझे कैदियों की अवस्था में अपने सामने देख रही है?"
इसके जवाब में मेरी स्त्री ने कहा, "हाँ मैं वही रामदेई हूँ जिसके लड़के को तुम किसी जमाने में अपना होनहार लड़का समझकर चाहते और प्यार करते थे मगर आज उसे दुश्मनी की निगाह से देख रहे हो, मैं वही रामदेई हूँ जो तुम्हारे असली भेदों को न जानकर और तुम्हें नेक ईमानदार तथा सच्चा ऐयार समझकर तुम्हारे फंदे में फंस गई थी, मगर आज तुम्हारे असली भेदों का पता लग जाने के कारण डरती हुई तुमसे अलग हुआ चाहती हूँ, मैं वही रामदेई हूँ जिसे तुमने नकाबपोशों के मकान में देखा था, और मैं वही रामदेई हूँ जिसने उस दिन तुम्हें जंगल में धोखा देकर बैरंग वापस होने पर मजबूर किया था, मगर मैं वह रामदेई नहीं हूँ जिसे तुम 'लामाघाटी' में छोड़ आए हो।"
मुझे उस औरत की बातों ने ताज्जुब में डाल दिया और मैं हैरानी के साथ उसका मुंह देखने लगा। अनूठी बात तो यह थी कि वह अपनी बातों में शुरू से तो रामदेई अथवा मेरी स्त्री बनती चली आई मगर आखिर में बोल बैठी कि "मगर मैं वह रामदेई नहीं हूँ जिसे तुम लामाघाटी में छोड़ आए हो।" आखिर बहुत सोच-विचार कर मैंने पुनः उससे कहा, "अगर तू वह रामदेई नहीं है जिसे मैं लामाघाटी में छोड़ आया था, तो तू मेरी स्त्री भी नहीं है।"
स्त्री-तो यह कौन कहता है कि मैं तुम्हारी स्त्री हूँ?
मैं-अभी इसके पहले तूने क्या कहा था?
स्त्री-(हँस कर) मालूम होता है कि तुम अपने होश में नहीं हो।
इतना सुनते ही मुझे क्रोध चढ़ आया और मैं अपनी हथकड़ी-बेड़ी तोड़ने का उद्योग करने लगा। यह हाल देखकर उस औरत को भी क्रोध आ गया और उसने अपनी एक सखी या लौंडी की तरफ देखकर कुछ इशारा किया। वह लौंडी इशारा पाते ही उठी और उसी जगह आले पर से एक बोतल उठा लाई जिसमें किसी प्रकार का अर्क था। उस से चुल्लू भर उसने दो-तीन छींटे मेरे मुंह पर दिये जिस से मैं बेहोश हो गया और मुझे तनो-बदन की सुध न रही। मैं नहीं बता सकता कि इसके बाद कितने घण्टे तक मैं उसके कब्जे में रहा, परन्तु जब होश में आया तो मैंने अपने को जंगल में एक पेड़ के नीचे पाया। घण्टों तक ताज्जुब के साथ चारों तरफ देखता रहा, इसके बाद एक चश्मे के किनारे जाकर हाथ-मुँह धोने के बाद इस तरफ रवाना हुआ। बस, यही सबब था कि मुझे हाजिर होने में देर हो गई।
भूतनाथ की बातें सुनकर सभी को ताज्जुब हुआ, मगर वे दोनों नकाबपोश एक दम खिलखिलाकर हँस पड़े और उनमें से एक ने भूतनाथ की तरफ देखकर कहा-
नकाबपोश-भूतनाथ, निःसन्देह तुम धोखे में पड़ गये। उस औरत ने जो कुछ तुमसे कहा, उसमें शायद ही दो तीन बातें सच हों। भूतनाथ–(ताज्जुब से) सो क्या? उसने कौन सी बातें सच-सच कही थीं और कौन सी नकाबपोश-सो मैं नहीं कह सकता मगर आशा है कि शीघ्र ही तुम्हें सच-झूठ का पता लग जायगा।
भूतनाथ ने बहुत-कुछ चाहा मगर नकाबपोश ने उसके मतलब की कोई बात न कही। थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें करके नकाबपोश बिदा हुए और जाते समय एक सवाल के जवाब में कह गये कि "आप लोग दो दिन और सब्र करें, इसके बाद कुंअर उन्हें इस बातों के जानने का बड़ा शौक है।"
२
रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। महाराज सुरेन्द्रसिंह अपने कमरे में पलंग पर लेते हुए जीतसिंग से कुछ धिरे-धीरे बाते कर रहें हैं जो चारपाई के नीचे उनके पास ही बैठे है।केवल जीतसिंग ही नहीं बल्कि उनके पास वे दोनो नकापपोश भी बैठे हुए है जो रोज दरबार में आकर लोगों को ताज्जुब में डाला करते है और जिनका नाम है रामसिंह और लक्ष्मणसिंह है। हम नहीं कह सकते कि ये लोग कब से इस कमरे में बैठे हैं या इसके पहले इन लोगों में क्या-क्या बातें हो चुकी हैं, मगर इस समय तो ये सब लोग कई ऐसे मामलों पर बातचीत कर रहे हैं जिनका पूरा होना बहुत जरूरी समझा जाता है।
बात करते-करते एक दफे कुछ रुक कर महाराज सुरेन्द्रसिंह ने जीतसिंह से कहा,"इस राय में गोपाल सिंह का भी शरीक होना उचित जान पड़ता है, किसी को भेजकर उन्हें बुलाना चाहिए।"
"जो आज्ञा" कहकर जीतसिंह उठे और कमरे के बाहर जाकर राजा गोपालसिंह को बुलाने के लिए चोबदार को हुक्म देने के बाद पुनः अपने ठिकाने बैठ कर बातचीत करने लगे।
जीतसिंह–इसमें तो कोई शक नहीं कि भूतनाथ आदमी चालाक और पूरे दर्जेबका ऐयार है मगर उसके दुश्मन लोग उस पर बेतरह टूट पड़े हैं और चाहते हैं कि जिस तरह बने उसे बर्बाद कर दें और इसीलिए उसके पुराने ऐबों को उधेड़ कर तरह-तरह की तकलीफ दे रहे हैं।
सुरेन्द्रसिंह--ठीक है, मगर हमारे साथ भूतनाथ ने सिवाय एक दफे चोरी करने के और कौन-सी बुराई की है जिसके लिए उसे हम सजा दें या बुरा कहें?
जीतसिंह-कुछ भी नहीं, और वह चोरी भी उसने किसी बुरी नीयत से नहीं की थी। इस विषय में नानक ने जो कुछ कहा था, महाराज सुन ही चुके हैं
सुरेन्द्रसिंह-हाँ मुझे याद है, और उसने हम लोगों पर अहसान भी बहुत किये हैं बल्कि यों कहना चाहिए कि उसी की बदौलत कमलिनी, किशोरी, लक्ष्मीदेवी और इन्दिरा वगैरह की जानें बची और गोपालसिंह को भी उसकी मदद से बहुत फायदा पहुंचा है। इन्हीं सब बातों को सोच के तो देवीसिंह ने उसे अपना दोस्त बना लिया है, मगर साथ ही इसके इस बात भी समझ रखना चाहिए कि जब तक भूतनाथ का मामला तय नहीं हो जायगा तब तक लोग उसके ऐबों को खोद-खोद कर निकाला ही करेंगे और तरह-तरह की बातें गढ़ते रहेंगे।
एक नकाबपोश-सो तो ठीक ही है, मगर सच पूछिए तो भूतनाथ का मुकदमा ही कसा और मामला ही क्या? मुकदमा तो असल में नकली बलभद्रसिंह का है जिसने इतना बड़ा कसूर करने पर भी भूतनाथ पर इल्जाम लगाया है। उस पीतल वाली सन्दूकड़ी से तो हम लोगों को कोई मतलब ही नहीं, हाँ, बाकी रह गया चिट्ठियों वाला मुट्ठा जिसके पढ़ने से भूतनाथ लक्ष्मीदेवी का कसूरवार मालूम होता है, सो उसका।जवाब भूतनाथ काफी तौर पर दे देगा और साबित कर देगा कि वे चिट्ठियां उसके हाथ की लिखी हुई होने पर भी वह कसूरवार नहीं है और वास्तव में वह बलभद्रसिंह का दोस्त है, दुश्मन नहीं।
सुरेन्द्रसिंह-(लम्बी सांस लेकर) ओफ-ओह, इस थोड़े से जमाने में कैसे-कैसे उलटफेर हो गए! बेचारे गोपालसिंह के साथ कैसी-कैसी धोखेबाजी की गई!इन बातों पर जब हमारा ध्यान जाता है तो मारे क्रोध के बुरा हाल हो जाता है।
जीतसिंह-ठीक है, मगर खैर अब इन बातों पर क्रोध करने की जगह नहीं रही क्योंकि जो कुछ होना था हो गया। ईश्वर की कृपा से गोपालसिंह भी मौत की तकलीफ उठा र बच गए और अब हर तरह से प्रसन्न हैं, इसके अतिरिक्त उनके दुश्मन लोग भी गिरफ्तार होकर अपने पंजे में आये हुए हैं।
सुरेन्द्रसिंह--बेशक ऐसा ही है मगर हमें कोई ऐसी सजा नहीं सूझती जो उनके दुश्मनों को देकर कलेजा ठंडा किया जाय और समझा जाय कि अब गोपालसिंह के साथ बुराई करने का बदला ले लिया गया।
महाराज सुरेन्द्रसिंह इतना कह ही रहे थे कि राजा गोपालसिंह कमरे के अन्दर आते हुए दिखाई पड़े क्योंकि उनका डेरा इस कमरे से बहुत दूर न था।
राजा गोपालसिंह सलाम करके पलंग के पास बैठ गए और इसके बाद दोनों नकाबपोशों से भी साहब-सलामत करके मुस्कुराते हुए बोले-आप लोग कब से बैठे हैं?
एक नकाबपोश--हम लोगों को आये बहुत देर हो गई।
सुरेन्द्रसिंह--ये बेचारे कई घण्टे से बैठे हुए हमारी तबीयत बहला रहे हैं और कई जरूरी बातों पर विचार कर रहे हैं। गोपालसिंह-वे कौन सी जरूरी बातें हैं?
सुरेन्द्रसिंह-- यही लड़कों की शादी, भूतनाथ का फैसला, कैदियों का मुकदमा,कमलिनी और लाड़िली के साथ उचित बर्ताव इत्यादि विषयों पर बातचीत हो रही है और सोच रहे हैं कि किस तरह क्या किया जाय तथा पहले क्या काम हो?
गोपालसिंह--इस समय मैं भी इसी उलझन में पड़ा हुआ था। सोया नहीं था बल्कि जागता हुआ इन्हीं बातों को सोच रहा था कि आपका सन्देशा पहुँच गया और तुरन्त उठकर इस तरफ चला आया। (नकाबपोशों की तरफ बता कर) आप लोग तो अव हमारे घर के व्यक्ति हो रहे हैं अतः ऐसे विचारों में आप लोगों को शरीक होना ही चाहिए।
सुरेन्द्रसिंह--जीतसिंह कहते हैं कि कैदियों का मुकदमा होने और उनको सजा देने के पहले ही दोनों लड़कों की शादी हो जानी चाहिए जिसमें कैदी लोग भी इस उत्सव को देखकर अपना जी जला लें और समझ लें कि उनकी बेईमानी, हरामजदगी और दुश्मनी का नतीजा क्या निकला। साथ ही इसके एक बात का फायदा और भी होगा,अर्थात् कैदियों के पक्षपाती लोग भी, जो ताज्जुब नहीं कि इस समय भी कहीं इधर-उधर छिपे मन के लड्डू बना रहे हों, समझ जायँगे कि अब उन्हें दुश्मनी करने की कोई जरूरत नहीं रही और न ऐसा करने से कोई फायदा ही है।
गोपालसिंह- ठीक है, जब तक दोनों कुमारों की शादी न हो जायगी तब तक तरह-तरह के खुटके बने ही रहेंगे। शादी हो जाने के बाद मेहमानों के सामने ही कैदियों को जहन्नुम में पहुंचाकर दुनिया को दिखा दिया जायगा कि बुरे कर्मों का नतीजा यह होता है।
सुरेन्द्र सिंह-खैर, तो आपकी भी यही राय होती है?
गोपालसिंह-बेशक!
सुरेन्द्रसिंह--(जीतसिंह की तरफ देखकर) तो अब हमें और किसी से राय मिलाने की जरूरत नहीं रही। आप हर तरह का बन्दोबस्त शुरू कर दें और जहाँ-जहाँ न्यौता भेजना हो भिजवा दें।
जीतसिंह-जो आज्ञा। अच्छा, अब भूतनाथ के विषय में कुछ तय हो जाना चाहिए।
गोपालहिं-हम लोगों में से कौन सा आदमी ऐसा है जो भूतनाथ के अहसानों के बोझ से दबा हुआ न हो? बाकी रही यह बात कि जयपाल ने भूतनाथ के हार की चिट्ठियाँ कमलिनी और लक्ष्मीदेवी को दिखाकर भूतनाथ को दोषी ठहराया है, सो वास्तव में भूतनाथ दोषी नहीं है और इस बात का सबूत भी वह दे देगा।
सुरेन्द्रसिंह हाँ, तुमको तो इन सब बातों का सच्चा हाल जरूर ही मालूम होगा क्योंकि तुम्हीं ने कृष्ण जिन्न बनकर उसकी सहायता की थी। अगर वास्तव में वह दोषी होता तो तुम ऐसा करते ही क्यों? गोपालसिंह-बेशक यही बात है। इन्दिरा का किस्सा आपको मालूम ही है क्यों कि मैंने आपको लिख भेजा था और आशा है कि आपको वे बातें याद होंगी?
सुरेन्द्रसिंह-हाँ मुझे बखूबी याद है, बेशक उस जमाने में भूतनाथ ने तुम लोगों की बड़ी सहायता की थी बल्कि इसी सबब से उसमें और दरोगा में दुश्मनी हो गई थी,अतः कब हो सकता है कि भूतनाथ लक्ष्मीदेवी के साथ दगा करता जो कि दरोगा से दोस्ती और बलभद्र सिंह से दुश्मनी किए बिना हो ही नहीं सकता था! लेकिन आखिर यह बात क्या हैं, वे चिट्ठियाँ भूतनाथ की लिखी हैं या नहीं? फिर, इस जगह एक बात का और भी खयाल होता है वह यह कि उस मुट्ठ में दोनों तरफ की चिट्ठियाँ मिली हुई हैं अर्थात् जो रघुबरसिंह ने भेजी वे भी हैं और जो रघुबर के नाम आई थीं वे भी हैं।
गोपालसिंह-जी हाँ और यह बात भी बहुत से शकों को दूर करती है। असल यह है कि वे सब चिट्ठियां भूतनाथ के हाथ की नकल की हुई हैं! वह रघुबरसिंह,जो दारोगा का दोस्त था और जमानिया में रहता था, उसी की यह सब कार्रवाई है और यह सब विष उसी के बोये हुए हैं। वह बहुत जगह इशारे के तौर पर अपना नाम भूतनाथ लिखा करता थ। आपने इन्दिरा के हाल में पढ़ा होगा कि भूतनाथ बेनीसिंह बनकर बहुत दिनों तक रघुबरसिंह के यहाँ रह चुका है और उन दिनों यही भूतनाथ हेलासिंह के यहाँ रघुबरसिंह का खत लेकर आया-जाया करता था।
सुरेन्द्र सिंह-ठीक है, मुझे याद है।
गोपालसिंह-बस ये सब चिट्ठियाँ उन्हीं चिट्ठियों की नकलें हैं। भूतनाथ ने मौके पर दुश्मनों को कायल करने के लिए उन चिट्ठियों की नकल कर ली थी और कुछ उनके घर से भी चुराई थीं। बस, भूतनाथ की गलती या बेईमानी जो कुछ समझिए यही हुई कि उस समय कुछ नगदी फायदे के लिए उसने इस मामले को दबाये रक्खा और उसी वक्त मुझ पर प्रकट न कर दिया। रिश्वत लेकर दारोगा को छोड़ देना और कलमदान के भेद को छिपा रखना भी भूतनाथ के ऊपर धब्बा लगाता है क्योंकि अगर ऐसा न होता तो मुझे यह बुरा दिन देखना नसीब न होता और इन्हीं भूलों पर आज भूतनाथ पछताता और अफसोस करता है। मगर आखिर में भूतनाथ ने इन बातों का बदला भी ऐसा अदा किया कि वे सब कसूर माफ कर देने के लायक हो गए।
सुरेन्द्रसिंह-उस कलमदान में क्या चीज थी?
गोपालसिंह-उस कलमदान को दारोगा की गुप्त सभा का दफ्तर ही समझिए।सब सभासदों के नाम और सभा के मुख्य भेद उसी में बन्द रहते थे, इसके अतिरिक्त दामोदरसिंह ने जो वसीयतनामा इन्दिरा के नाम लिखा था वह भी उसी में बन्द था।
सुरेन्द्रसिंह-ठीक है, ठीक है, इन्दिरा के किस्से में यह बात भी तुमने लिखी थी, हमें याद आया। मगर इसमें भी कोई शक नहीं कि उन दिनों लालच में पड़कर भूतनाथ ने बहुत बुरा किया और उसी सबब से तुम लोगों को तकलीफ उठानी पड़ी।
एक नकाबपोश-शायद भूतनाथ को इस बात की खबर न थी कि इस लालच का नतीजा कहाँ तक बुरा निकलेगा।
सुरेन्द्रसिंह-जो हो मगर उस समय की बातों पर ध्यान देने से यह भी कहना पड़ता है कि उन दिनों भूतनाथ एक हाथ से भलाई के नाम कर रहा था और दूसरे हाथ से बुराई के।
गोपालसिंह-ठीक है, बेशक ऐसी ही बात थी।
सुरेन्द्रसिंह-(जीतसिंह की तरफ देख के) भूतनाथ और इन्द्रदेव को भी इसी समय यहाँ बुलाकर इस मामले को तय कर देना चाहिए।
"जो आज्ञा” कहकर जीतसिंह उठे और कमरे के बाहर जाकर चोबदार को हुक्म देने के बाद लौट आये, इसके बाद कुछ देर सन्नाटा रहा, फिर गोपालसिंह ने कहा-
गोपालसिंह-अपने खयाल में तो भूतनाथ ने कोई बुराई नहीं की थी क्योंकि बीस हजार अशर्फी दारोगा से वसूल करके उसे छोड़ देने पर भी उसने एक इकरार-नामा लिखा लिया था कि वह (दारोगा) ऐसे किसी काम में शरीक न होगा और न खुद ऐसा कोई काम करेगा जिसमें इन्द्रदेव, सरयू, इन्दिरा और मुझ (गोपालसिंह) को किसी तरह का नुकसान पहुँचे मगर दारोगा फिर भी बेईमानी कर ही गया और भूतनाथ इकरारनामे के भरोसे बैठा रह गया। इससे खयाल होता है कि शायद भूतनाथ को भी इन मामलों की ठीक खबर न हो अर्थात मुन्दर का हाल मालूम न हुआ हो, और वह लक्ष्मीदेवी के बारे में धोखा खा गया हो तो भी ताज्जुब नहीं।
सुरेन्द्रसिंह-हो सकता है, (कुछ देर तक चुप रहने के बाद) मगर यह तो बताओ कि इन सब मामलों की खबर तुम्हें कब और क्योंकर लगी?
गोपालसिंह-इन सब बातों का पता मुझे भूतनाथ के गुरुभाई शेरसिंह की जुबानी लगा जो भूतनाथ को भाई की तरह प्यार करता है मगर उसकी इन सब लालच भरी कार्रवाइयों के बुरे नतीजे को सोच और उसे पूरा कसूरवार समझकर उससे डरता और नफरत करता है। जिन दिनों रोहतासगढ़ का राजा दिग्विजयसिंह किशोरी को।अपने किले में ले गया था और इस सबब से शेरसिंह ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी, उन दिनों भूतनाथ छिपा-छिपा फिरता था। मगर जब शेरसिंह ने उस तिलिस्मी तहखाने
में जाकर डेरा डाला, और छिपे-छिपे कमला और कामिनी की मदद करने लगा तो उन्हीं दिनों उस तिलिस्मी तहखाने में जाकर भूतनाथ ने शेरसिंह से एक तौर पर (बहुत दिनों तक गायब रहने के बाद) नई मुलाकात की, मगर धर्मात्मा शेरसिंह को यह बात बहुत बुरी मालूम हुई।
गोपालसिंह इतना कह ही रहे थे कि भूतनाथ और इन्द्रदेव कमरे के अन्दर आ पहुँचे और सलाम करके आज्ञानुसार जीतसिंह के पास बैठ गये।
जीतसिंह-(भूतनाथ और इन्द्रदेव से) आप लोग बहुत जल्द आ गये।
इन्द्रदेव-हम दोनों इसी जगह बरामदे के नीचे बाग में टहल रहे थे, इसलिए चोबदार नीचे उतरने के साथ ही हम लोगों से जा मिला।
जीतसिंह-खैर, (गोपालसिंह से) हाँ तब?
गोपालसिंह-अपनी नेकनामी में धब्बा लगने और बदनाम होने के डर से भूतनाथ की सूरत देखना भी शेरसिंह पसन्द नहीं करता था, बल्कि उसका तो यही बयान है कि 'मुझे भूतनाथ से मिलने की आशा ही न थी और मैं समझे हुए था कि अपने दोषों से लज्जित होकर भूतनाथ ने जान दे दी।' मगर जिस दिन उसने उस तहखाने में भूतनाथ की सूरत देखी तो काँप उठा। उसने भूतनाथ की बहुत लानत-मलामत करने के बाद कहा कि "अब तुम हम लोगों को अपना मुंह मत दिखाओ और हमारी जान और आबरू पर दया करके किसी दूसरे देश में चले जाओ।" मगर मूतनाथ ने इस बात को मंजूर न किया और यह कहकर अपने भाई से बिदा हुआ कि चुपचाप बैठे देखते रहो कि मैं किस तरह अपने पुराने परिचितों में प्रकट होकर खास राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार बनता हूं। बस इसके बाद भूतनाथ कमलिनी से जा मिला और जी-जान से उसकी मदद करने लगा। मगर शेरसिंह को यह बात पसन्द न आई। यद्यपि कुछ दिनों तक शेरसिंह ने कमलिनी तथा हम लोगों का साथ दिया, मगर डरते-डरते। आखिर एक दिन शेरसिंह ने एकान्त में मुझसे मुलाकात की और अपने दिल का हाल तथा मेरे विषय में जो कुछ जानता था, कहने के बाद बोला, “यह सब हाल कुछ तो मुझे अपने भाई भूतनाथ की जुबानी मालूम हुआ और कुछ रोहतासगढ़ को इस्तीफा देने के बाद तहकीकात करने से मालूम हुआ, मगर इस बात की खबर हम दोनों भाइयों में से किसी को भी न थी कि आपको मायारानी ने कैद कर रक्खा है। खैर, अब ईश्वर की कृपा से आप छूट गये हैं इसलिए आपके सम्बन्ध जो कुछ मुझे मालूम है आपसे कह दिया, जिसमें आप दुश्मनों से अच्छी तरह बदला ले सकें। अब मैं आगे अपना मुंह किसी को दिखाना नहीं चाहता क्योंकि मेरा भाई भूतनाथ जिसे मैं मरा हुआ समझता था प्रकट हो गया और न मालूम क्या-क्या किया चाहता है। कहीं ऐसा न हो कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाय,अतः अब मैं जहाँ भागते बनेगा भाग जाऊँगा। हाँ, अगर भूतनाथ जो कि बड़ा जिद्दी और उत्साही है किसी तरह नेकनामी के साथ राजा वीरेन्द्र सिंह का ऐयार बन गया तो पुनः प्रकट हो जाऊँगा।" इतना कहकर शेरसिंह न मालूम कहाँ चला गया। मैंने बहुत
कुछ समझाया मगर उसने एक न मानी। (कुछ रुककर) यही सब है कि मुझे इन सब बातों से आगाही हो गई और मैं भूतनाथ के भी बहुत से भेदों को जान गया।
जीतसिंह-ठीक है। (भूतनाथ की तरफ देख के) भूतनाथ, इस समय तुम्हारा ही मामला पेश है! इस जगह हम जितने भी आदमी हैं, सभी कोई तुमसे हमदर्दी रखते हैं; महाराज भी तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। ताज्जुब नहीं कि वह दिन आज ही हो कि तुम्हारे कसूर माफ किए जायं और तुम महाराज के ऐयार बन जाओ, मगर तुम्हें अपना हाल या जो कुछ तुमसे पूछा जाय उसका जवाब सच-सच कहना और देना चाहिए। इस समय तुम्हारा ही किस्सा हो रहा है।
भूतनाथ-(खड़े होकर सलाम करने के बाद) आज्ञा के विरुद्ध कुछ भी न करूंगा और कोई बात छिपा न रक्खूगा।
जीतसिंह--तुम्हें यह तो मालूम हो गया कि सरयू और इन्दिरा भी यहाँ आ गई हैं जो जमानिया के तिलिस्म में फंस गई थी और उन्होंने अपना अनूठा किस्सा बड़े दर्द के साथ बयान किया था।
भूतनाथ-(हाथ जोड़ के) जी हाँ, मुझ कम्बख्त की बदौलत उन्हें उस कैद की तकलीफ भोगनी पड़ी। उन दिनों बदकिस्मती ने मुझे हद से ज्यादा लालची बना दिया था। अगर मैं लालच में पड़कर दारोगा को न छोड़ देता तो यह बात कभी न होती। आपने सुना ही होगा कि उन दिनों हथेली पर जान लेकर मैंने कैसे-कैसे काम किये थे, मगर दौलत की लालच ने मेरे सब कामों पर मिट्टी डोल दी। अफसोस, मुझे इस बात की कुछ भी खबर न हुई कि दारोगा ने अपनी प्रतिज्ञा के विरुद्ध सारे काम किये,अगर मुझे खबर लग जाती तो उससे समझ लेता।
जीतसिंह-अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा भाई शेरसिंह कहाँ है?
भूतनाथ-मेरे यहाँ होने के सबब से न मालूम वह कहाँ जाकर छिपा बैठा है। उसे विश्वास है कि भूतनाथ जिसने बड़े-बड़े कसूर किए हैं, कभी निर्दोष छूट नहीं सकता। बल्कि ताज्जुब नहीं कि उसके सबंब से मुझ पर भी किसी तरह का इलजाम लगे। हाँ, अगर वह मुझे बेकसूर छूटा हुआ देखेगा या सुनेगा तो तुरन्त प्रकट हो जायगा।
जीतसिंह--वह चिट्ठयों वाला मुट्ठा तुम्हारे ही हाथ का लिखा हुआ है या नहीं?
भूतसिंह-जी वे सब चिट्ठियाँ है तो मेरे ही हाथ की लिखी हुई, मगर वे असल नहीं बल्कि उन असली चिट्ठियों की नकलें हैं जो कि मैंने जयपाल (रघुवरसिंह) के यहाँ से चोरी की थीं। असल में इन चिट्ठियों का लिखने वाला मैं नहीं, बल्कि जयपाल है।
जीतसिंह-खैर, तो जब तुमने जयमाल के यहाँ से असल चिट्ठियों की नकल की थी तो तुम्हें उसी समय मालूम हुआ होगा कि लक्ष्मीदेवी और बलभद्रसिंह पर क्या आफत आने वाली है?
भूतनाथ-क्यों न मालूम होता! परन्तु रुपये की लालच में पड़कर अर्थात् कुछ लेकर मैंने जयपाल को छोड़ दिया। मगर बलभद्र सिंह से मैंने इस होनहार के बारे में इशारा जरूर कर दिया था, हाँ जयपाल का नाम नहीं बताया क्योंकि उससे रुपया वसूल कर चुका था। ओ यह कहना भी मैं भूल ही गया कि रुपये वसूल करने के साथ ही मैंने जयपाल को इस बात की कसम भी खिला दी थी कि अब वह लक्ष्मीदेवी और बल-भद्रसिंह से किसी तरह की बुराई न करेगा। मगर अफसोस, उसने (जयपाल ने) मेरे साथ दगा करके मुझे धोखे में डाल दिया और वह काम कर गुजरा जो किया चाहता था। इसी तरह मुझे वलभद्र सिंह के बारे में भी धोखा हुआ। दुश्मनों ने उन्हें कैद कर लिया और मुझे हर तरह से विश्वास दिला दिया कि बलभद्र सिंह मर गए। लक्ष्मीदेवी के बारे में जो कुछ चालाकी दारोगा ने की, उसका भी मुझे कुछ पता न लगा और न मैं कई वर्षों तक लक्ष्मीदेवी की सूरत ही देख सका कि पहचान लेता। बहुत दिनों के बाद जब मैंने नकली लक्ष्मी देवी को देखा भी तो मुझे किसी भी तरह का शक न हुआ, क्योंकि लड़कपन की सूरत और अधेड़पन की सूरत में बहुत बड़ा फर्क पड़ जाता है। इसके अतिरिक्त जिन दिनों मैंने नकली लक्ष्मीदेवी को देखा था, उस समय उनकी दोनों बहिनें अर्थात् श्यामा (कमलिनी) और लाडिली भी उसके साथ ही रहती थीं, जब वे ही दोनों उसकी बहन होकर धोखे में पड़ गईं तो मेरी कौन गिनती है?
बहुत दिनों के बाद जब यह कागज का मुट्ठा मेरे यहाँ से चोरी हो गया, तब मैं घबराया और डरा कि समय पर चोरी गया हुआ वह मुट्ठा मुझको मुजरिम बना देगा, और आखिर ऐसा ही हुआ। दुष्टों ने वही कागजों का मुट्ठा कैदखाने में बलभद्रसिंह को दिखाकर मेरी तरफ से उनका दिल फेर दिया और तमाम दोष मेरे ही सिर पर थोपा। इसके बाद और भी कई वर्ष बीत जाने पर जब राजा गोपालसिंह के मरने की खबर उड़ी और इस बात में किसी को किसी तरह का शक न रहा, तब धीरे-धीरे मुझे दारोगा और जयपाल की शैतानी का कुछ पता लगा, मगर फिर मैंने जान-बूझकर तरह दे दिया और सोचा कि अब उन बातों को खोदने से फायदा ही क्या, जब कि खुद राजा गोपालसिंह ही इस दुनिया से उठ गये तो मैं किसके लिए इन बखेड़ों को उठाऊँ? (हाथ जोड़कर) बेशक यही मेरा कसूर है और इसीलिए मेरा भाई भी रंज है। हाँ इधर जब कि मैंने देखा कि अब श्रीमान् राजा वीरेन्द्रसिंह का दौरा-दौरा है और कमलिनी भी उस घर से निकल खड़ी हुई तब मैंने भी सिर उठाया और अबकी दफे नेकनामी के साथ नाम पैदा करने का इरादा कर लिया। इस बीच में मुझ पर बड़ी आफतें आई, मेरे मालिक रणधीरसिंह भी मुझसे बिगड़ गये और मैं अपना काला मुंह लेकर दुनिया से किनारे हो बैठा तथा अपने को मरा हुआ मशहूर कर दिया अब कहाँ तक बयान करूँ, बात तो यह है कि मैं सिर से पैर तक अपने को कसूरवार समझकर ही महाराजा की शरण में
जीतसिंह-तुम्हारी पिछली कार्रवाई का बहुत-सा हाल महाराज को मालूम हो चुका है, उस जमाने में इन्दिरा को बचाने के लिए जो कार्रवाइयाँ तुमने की थीं उनसे महाराज प्रसन्न हैं, खास करके इसलिए कि तुम्हारे हरएक काम में दबंगता का हिस्सा ज्यादा था और तुम सच्चे दिल से इन्द्रदेव के साथ दोस्ती का हक अदा कर रहे थे,इस जगह एक बात का बड़ा ताज्जुब है।
भूतनाथ-वह क्या?
जीतसिंह-इन्दिरा के बारे में जो-जो काम तुमने किये थे वे इन्द्रदेव से तो तुमने जरूर ही कहे होंगे?
भूतनाथ-बेशक जो कुछ काम मैं करता था वह हमेशा ही इन्द्रदेव से पूरा-पूरा कह देता था।
जीतसिंह-तो फिर इन्द्रदेव ने दारोगा को क्यों छोड़ दिया? सजा देना तो दूर रहा, इन्होंने गुरुभाई का नाता तक नहीं तोड़ा।
भूतनाथ-(एक लम्बी साँस लेकर और उँगली से इन्द्रदेव की तरफ इशारा करके) इनके ऐसा भी बहादुर और मुरौवत का आदमी मैंने दुनिया में नहीं देखा। इनके साथ जो कुछ सलूक मैंने किया था उसका बदला भी अपने एक ही काम से इन्होंने ऐसा अदा किया कि जो इनके सिवाय दूसरा कर ही नहीं सकता था और जिससे मैं जन्म भर इनके सामने सिर उठाने लायक न रहा, अर्थात् जब मैंने रिश्वत लेकर दारोगा को छोड़ देने और कलमदान दे देने का हाल इनसे कहा, तो सुनते ही इनकी आँखों में आंसू भर आये और एक लम्बी साँस लेकर इन्होंने मुझसे कहा, "भूतनाथ, तुमने यह काम बहुत ही बुरा किया। किसी दिन इसका नतीजा बहुत ही खराब निकलेगा! खैर, अब तो जो कुछ होना था हो गया, तुम मेरे दोस्त हो अतः जो कुछ तुम कर आये, उसे मैं भी मंजूर करता हूँ और दारोगा को एक दम भूल जाता हूँ। अब मेरी लड़की और स्त्री पर चाहे कैसी आफत क्यों न आये और मुझे भी चाहे कितना ही कष्ट क्यों न भोगना पड़े, मगर आज से दारोगा का नाम भी न लूंगा और न अपनी स्त्री के विषय में ही किसी से कुछ जिक्र करूँगा, जो कुछ तुम्हें करना हो करो और उस कम्बख्त दारोगा से भले ही कह दो कि 'इन बातों की खबर इन्द्रदेव को नहीं दी गई।' मैं भी अपने को ऐसा ही बनाऊँगा कि दारोगा को किसी तरह का खुटका न होगा और वह मुझे निरा उल्लू ही समझता रहेगा।" इन्द्रदेव की बात मेरे कलेजे में तीर की तरह लगी और मैं यह कहकर उठ खड़ा हुआ कि "दोस्त, मुझे माफ करो, बेशक मुझसे बड़ी भूल हुई है। अब मैं दारोगा को कभी न छोडूंगा और जो कुछ उससे लिया है उसे वापस कर दूंगा।" मगर इतना कहते ही इन्द्रदेव ने मेरी कलाई पकड़ ली और जोर के साथ मुझे बैठाकर कहा, “भूत-मैंने यह बात तुमसे ताने के ढंग पर नहीं कही है कि सुनने के साथ ही तुम उठ खड़े हुए। नहीं-नहीं, ऐसा कभी न होने पायेगा, हमने और तुमने जो कुछ किया और जो कहा सो कहा, अब उसके विपरीत हम दोनों में से कोई भी न जा सकेगा!"
सुरेन्द्र सिंह-शाबाश!
इतना कहकर सुरेन्द्र सिंह ने गहरी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रदेव की तरफ देखा और भूतनाथ ने फिर इस तरह कहना शुरू किया-
भूतनाथ-मैंने बहुत कुछ कहा मगर इन्द्रदेव ने एक न माना और एक बहुत बड़ी कसम देकर मेरा मुंह बन्द कर दिया, मगर इस बात का नतीजा यह निकला कि उसी दिन से हम दोनों दोस्त दुनिया से उदासीन हो गये। मेरी उदासीनता में तो कुछ कसर न रह गई मगर इन्द्रदेव की उदासीनता में किसी तरह की कसर न रही। यही सबब था कि इन्द्रदेव के हाथ से दारोगा बच गया और दारोगा इन्द्रदेव की तरफ से (मेरे कहे मुताबिक) बेफिक्र रहा।
सुरेन्द्रसिंह —— बेशक इन्द्रदेव ने यह बड़े हौसले और सब्र का काम किया!
गोपालसिंह —— दोस्ती का हक अदा करना इसे कहते हैं, जितने अहसान भूतनाथ ने इन पर किये थे, सभी का बदला एक ही बात से चुका दिया! भूतनाथ —– (गोपालसिंह की तरफ देख के) कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह से इन्दिरा ने अपना हाल किस तरह पर बयान किया था सो मुझे मालूम न हुआ। अगर यह मालूम हो जाता तो अच्छा होता कि इन्दिरा ने जो कुछ बयान किया था वह ठीक है अथवा उसने जो कुछ सुना था वह सच था?
गोपालसिंह —— जहाँ तक मेरा खयाल है, मैं कह सकता हूँ कि इन्दिरा ने अपने विषय में कोई बात ज्यादा नहीं कही, बल्कि ताज्जुब नहीं कि वह कई बातें मालूम न होने के कारण छोड़ गई हो। मैंने उसका पूरा-पूरा किस्सा महाराज को लिख भेजा था। (जीतसिंह की तरफ देखकर) अगर मेरी वह चिट्ठी यहाँ मौजूद हो, तो भूतनाथ को दे दीजिये, उसमें से इन्दिरा का किस्सा पढ़कर ये अपना शक मिटा लें।
"हां वह चिट्ठी मौजूद है" इतना कह कर जीतसिंह उठे और आलमारी से वह किताबनुमा चिट्ठी निकाल कर और इन्दिरा का किस्सा बता कर भूतनाथ को दे दी। भूतनाथ उसे तेजी के साथ पढ़ गया और अन्त में बोला, "हाँ ठीक है, करीब-करीब सभी बातें उसे मालूम हो गई थी और आज मुझे भी एक बात नई मालूम हुई अर्थात् आखिरी मर्तबे जब मैं इन्दिरा को दारोगा के कब्जे से निकालकर ले गया था और अपने एक अड्डे पर हिफाजत के.साथ रख गया था तो वहाँ से एकाएक उसका गायब हो जाना मुझे बड़ा ही दुःखदायी हुआ। मैं ताज्जुब करता था कि इन्दिरा वहाँ से क्योंकर चली गई। जब मैंने अपने आदमियों से पूछा तो उन्होंने कहा कि 'हम लोगों को कुछ भी नहीं मालूम कि वह कब निकल कर भाग गई, क्योंकि हम लोग कैदियों की तरह उस पर निगाह नहीं रखते थे बल्कि घर का आदमी समझ कर कुछ बेफिक्र थे।' परन्तु मुझे अपने आदमियों की बात पसन्द न आई और मैंने उन लोगों को सख्त सजा दी। आज मालूम हुआ कि वह कांटा मायाप्रसाद का बोया हुआ था। मैं उसे अपना दोस्त समझता था मगर अफसोस, उसने मेरे साथ बड़ी दगा की!"
गोपालसिंह —— इन्दिरा की जुबानी यह किस्सा सुन कर मुझे भी निश्चय हो गया कि मायाप्रसाद दारोगा का हितू है अतः मैंने उसे तिलिस्म में कैद कर दिया है। अच्छा, यह तो बताओ कि उस समय जब तुम आखिरी मर्तबे इन्दिरा को दारोगा के यहाँ से निकाल कर अपने अड्डे पर रख आये और लौट कर पुनः जमानिया गये, तो फिर क्या हुआ, दारोगा से कैसे निपटे, और सरयू का पता क्यों न लगा सके?
भूतनाथ -- इन्दिरा को उस ठिकाने रख कर जब मैं लौटा तो पुनः जमानिया गया परन्तु अपनी हिफाजत के लिए पाँच आदमिमों को अपने साथ लेता गया और उन्हें (अपने आदमियों को) कब क्या करना चाहिए इस बात को भी अच्छी तरह समझा दिया क्योंकि वे पांचों आदमी मेरे शागिर्द थे और कुछ ऐयारी भी जानते थे। मुझे सरयू के लिए दारोगा से फिर मुलाकात करने की जरूरत थी मगर उसके घर में जाकर भुलाकात करने का इरादा न था क्योंकि मैं खूब समझता था कि वह 'दूध का जला छाछ फूंक के पीता होगा' और मेरे लिए अपने घर में कुछ-न-कुछ बन्दोबस्त जरूर कर रक्खा होगा! अगर अबकी दिलेरी के साथ उसके घर में जाऊँगा तो बेशक फंस जाऊँगा, इसलिए बाहर ही उससे मुलाकात करने का बन्दोबस्त करने लगा। खैर, इसी फेर में दस-बारह दिन बीत गए और इस बीच में मुलाकात करने का कोई अच्छा मौका न मिला। पता लगाने से मालूम हुआ कि वह बीमार है और घर से बाहर नहीं निकलता। यह बात मुझे मायाप्रसाद ने कही थी मगर मैंने मायाप्रसाद से इन्दिरा के बारे में कुछ भी नहीं कहा और न राजा साहब (गोपालसिंह की तरफ इशारा करके) ही से कुछ कहा, क्योंकि दारोगा को बेदाग छोड़ देने के लिए मेरे दोस्त इन्द्रदेव ने पहले ही से तय कर लिया था, अब अगर राजा साहब से मैं कुछ कहता तो दारोगा जरूर सजा पा जाता। लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि मायाप्रसाद और दारोगा को इस बात का पता क्योंकर लग गया कि इन्दिरा फलां जगह है। खैर, मुख्जसिर यह है कि एक दिन स्वयं मायाप्रसाद ने मुझसे कहा-“गदाधरसिंह, मैं तुम्हें इसकी इत्तिला देता हूँ कि सरयू निःसन्देह दारोगा की कैद में है मगर बीमार है, अगर तुम किसी तरह दारोगा के मकान में चले जाओ तो उसे जरूर अपनी आँखों से देख सकोगे। मेरी इस बात में तुम किसी तरह का शक न करो, मैं बहुत पक्की बात तुमसे कह रहा हूँ।” मायाप्रसाद की बात सुनकर मुझे एक दफे जोश चढ़ आया और मैं दारोगा के मकान में जाने के लिए तैयार भी हो गया। मैं क्या जानता था कि मायाप्रसाद दारोगा से मिला हुआ है। खैर, मैं अपनी हिफाजत के लिए कई तरह का बन्दोबस्त करके आधी रात के समय कमन्द के जरिये दारोगा के लम्बेचौड़े और शैतान की आंत की सूरत वाले मकान में घुस गया और चोरों की तरह टोह लेता हुआ उस कमरे में जा पहुंचा जिसमें दारोगा एक गद्दी के ऊपर उदास बैठा हुआ कुछ सोच रहा था। उस समय उसके बदन पर कई जगह पट्टी बंधी हुई थी जिससे वह चुटीला मालूम पड़ता था और उसके सिर का भी यही हाल था। दारोगा मुझे देखते ही चौंक उठा और आँखें चार होने के साथ ही मैंने उससे कहा, "दारोगा साहब, मैं आपके मकान में कैद होने के लिए नहीं आया हूँ बल्कि सरयू को देखने के लिए आया हूँ जिसके इस मकान में होने का पता मुझे लग चुका है। अतः इस समय मुझसे किसी तरह बुराई करने की उम्मीद न रखिए क्योंकि मैं अगर आधे घंटे के अन्दर इस मकान के बाहर होकर अपने साथियों के पास न चला जाऊँगा तो उन्हें विश्वास हो जायगा कि गदाधरसिंह फंस गया और तब वे लोग आपको हर तरह से बर्बाद कर डालेगे, जिसका कि मैं पूरा-पूरा बन्दोबस्त कर आया हूँ।"
इतना सुनते ही दारोगा खड़ा हो गया और उसने हँस कर जवाब दिया, "मेरे लिए आपको इस कड़े प्रबन्ध की कोई आवश्यकता न थी और न मुझमें इतनी सामर्थ्य ही है कि आप जैसे ऐयार का मुकाबला करूँ, मैं तो खुद आपकी तलाश में ही था कि किसी तरह आपको पाऊँ और अपना कसूर माफ कराऊँ। मुझे तो विश्वास है कि जब आप एक बड़ा कसुर माफ कर चुके हैं तो इसको भी माफ कर देंगे। गुस्से को दूर कीजिए, फिर भी आपके लिए हाजिर हूँ।"
मैं-(बैठकर और दारोगा को बैठा कर) कसूर माफ कर देने के लिए तो कोई हर्ज नहीं है मगर आइन्दा के लिए कसूर न करने का वादा करके भी आपने मेरे साथ दगा की, इसका मुझे जरूर बड़ा रंज है!
दारोगा —— (हाथ जोड़कर) खैर, जो हो गया सो हो गया, अब अगर फिर कोई कसूर मुझसे हो तो जो चाहे सजा दीजियेगा, मैं उफ भी न करूंगा।
मैं —— खैर, एक दफा और सही, मगर इस कसूर के लिए आपको कुछ जुर्माना जरूर देना पड़ेगा।
दारोगा —— यद्यपि आप मुझे पहले ही पूरी तरह कंगाल कर चुके हैं मगर फिर भी मैं आपकी आज्ञा-पालन के लिए हाजिर हूँ।
मैं —— दो हजार अशर्फी।
दारोगा —— (आलमारी में से एक थैली निकाल कर और मेरे सामने रखकर) बस, एक हजार अशर्फी को कबूल कीजिए और..
मैं —— (मुस्कुराकर) मैं कबूल करता हूँ और अपनी तरफ से यह थैली आपको देकर इसके बदले में सरयू को मांगता हूँ जो इस समय आपके घर में है।
दारोगा -– बेशक सरयू मेरे घर में है और मैं उसे अभी आपके हवाले करूँगा मगर इस थैली को आप कबूल कर लीजिए, नहीं तो मैं समझूगा कि आपने मेरा कसूर माफ नहीं किया।
मैं —— नहीं-नहीं, मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने आपका कसूर माफ कर दिया और खुशी से यह थैली आपको वापस करता हूँ, अब मुझे सिवाय सरयू के और कुछ नहीं चाहिए।
हम दोनों में देर तक इसी तरह की बातें हुईं और और इसके बाद मेरी आखिरी बात सुनकर दारोगा उठ खड़ा हुआ और मेरा हाथ पकड़ दूसरे कमरे की तरफ यह कहता हुआ ले चला कि “आओ मैं तुमको सरयू के पास ले चलूं, मगर अफसोस की बात है कि इस समय वह हद दर्जे की बीमार हो रही है!' खैर, वह मुझे घुमाता-फिराता एक दूसरे कमरे में ले गया और वहाँ मैंने एक पलंग पर सरयू को बीमार पड़े देखा। एक मामूली चिराग उससे थोड़ी ही दूर पर जल रहा था। (लम्बी साँस लेकर) अफसोस, मैंने देखा कि बीमारी ने उसे आखिरी मंजिल के करीब पहुंचा दिया है और वह इतनी कमजोर हो रही है कि बात करना भी उसके लिए कठिन हो रहा है। मुझे देखते ही उसकी आँखें डबडबा आईं और मुझे भी रुलाई आने लगी। उस समय मैं उसके पास बैठ गया और अफसोस के साथ उसका मुंह देखने लगा। उस वक्त दो लौंडियाँ उसकी खिदमत के लिए हाजिर थीं जिनमें से एक ने आगे बढ़कर रूमाल से उसके आँसू पोंछे और पीछे हट गई! मैंने अफसोस के साथ पूछा- “सरयू, यह तेरा क्या हाल है?"
इसके जवाब में सरयू ने बहुत बारीक आवाज में रुककर कहा, "भैया, (क्योंकि वह प्रायः मुझे भैया कह कर ही पुकारा करती थी) मेरी बुरी अवस्था हो रही है। अब मेरे बचने की आशा न करनी चाहिए। यद्यपि दारोगा साहब ने मुझे कैद किया था मगर मैं इनका अहसान मानती हूँ कि इन्होंने मुझे किसी तरह की तकलीफ नहीं दी बल्कि इस बीमारी में मेरी बड़ी हिफाजत की, दवा इत्यादि का भी पूरा प्रबन्ध रखा, मगर यह न बताया कि मुझे कैद क्यों किया था। खैर, जो भी हो, इस समय तो मैं आखिरी दम का इन्तजार कर रही हूँ और सब तरफ से मोह-माया को छोड़ ईश्वर से लौ लगाने का उद्योग कर रही हूँ। मैं समझ गई हूँ कि तुम मुझे लेने के लिए आये हो। मगर दया करके मुझे इसी जगह रहने दो और इधर-उधर कहीं मत ले जाओ, क्योंकि इस समय मैं किसी अपने को देख मायामोह में आत्मा को फंसाना नहीं चाहती और न गंगाजी का सम्बन्ध छोड़ कर दूसरी किसी जगह मरना ही पसन्द करती हूं, यहाँ यों भी अगर गंगाजी में फेंक दी जाऊँगी, तो मेरी सद्गति हो जायगी, बस यही आखिरी प्रार्थना है। एक बात और भी है कि मेरे लिए दारोगा साहब को किसी तरह की तकलीफ न देना और ऐसा करना जिसमें इनकी जरा बेइज्जती न हो, यह मेरी वसीयत है और यही मेरी आरजू है। अब श्रीगंगाजी को छुड़ाकर मुझे नरक में मत डालो।" इतना कह सरयू कुछ देर को चुप हो गई और मुझे उसकी अवस्था पर रुलाई आने लगी। मैं और भी कुछ देर तक उसके पास बैठा रहा और धीरे-धीरे बातें भी होती रहीं। मगर जो कुछ उसने कहा उसका तत्त्व यही था कि मुझे यहाँ से मत हटाओ और दारोगा को कुछ तकलीफ मत दो। उस समय मेरे दिल में यही बात आई कि इन्द्रदेव को इस बात की इत्तिला दे देनी चाहिए। वह जैसी आज्ञा देंगे किया जायगा। मगर अपना यह विचार मैंने दारोगा से नहीं कहा क्योंकि उसे मैं इन्द्रदेव की तरफ से बेफिक्र कर चुका था और कह चुका था कि सरयू और इन्दिरा के साथ जो कुछ बर्ताव तुमने किया है, उसकी इत्तिला मैं इन्द्रदेव को न दूंगा, दूसरे को कसूरवार ठहराकर तुम्हारा नाम बचा जाऊँगा। अतः मैं सरयू से दूसरे दिन मिलने का वायदा करके वहाँ से उठा और अपने डेरे पर चला आया। यद्यपि रात बहुत कम बाकी रह गई थी, परन्तु मैंने उसी समय अपने एक खास आदमी को पत्र देकर इन्द्रदेव के पास रवाना कर दिया और ताकीद कर दी कि एक घोड़ा किराये का लेकर दौड़ा-दौड़ चला जाय और जहाँ तक हो सके पत्र का जवाब लेकर जल्द ही लौट आवे। दूसरे दिन आधी रात जाते-जाते तक वह आदमी लौट आया और उसने इन्द्रदेव का पत्र मेरे हाथ में दिया, लिफाफा खोल कर मैंने पढ़ा। उसमें यह लिखा हुआ था ——
"तुम्हारा पत्र पढ़ने से कलेजा हिल गया। सच तो यह है कि दुनिया में मुझ-सा बदनसीब भी कोई न होगा! खैर, परमेश्वर की मर्जी ही ऐसी है तो मैं क्या कर सकता हूँ। दारोगा के बारे में मैंने जो प्रतिज्ञा तुमसे की है, उसे झूठ न होने दूंगा। मैं अपने कलेजे पर पत्थर रख कर सब कुछ सहूँगा। मगर वहाँ जाकर बेचारी सरयू को अपना मुंह न दिखाऊँगा और न दारोगा से मिलकर उसके दिल में किसी तरह का शक ही आने दूंगा। हाँ, अगर सरयू की जान बचती नजर आवे या इस बीमारी से बच जाय तो उसे जिस तरह मुनासिब समझना मेरे पास पहुंचा देना और अगर वह मर जाय तो मेरी जगह तुम बैठे ही हो, उसकी अन्त्येष्टि क्रिया अपनी हिम्मत के मुताबिक करके मेरे पास आना। मेरी तबीयत अब दुनिया से हट गई, बस, इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहना चाहता। हाँ, यदि कुछ कहना होगा तो तुमसे मुलाकात होने पर कहूँगा। आगे जो ईश्वर की मर्जी।
इस चिट्ठी को पढ़कर मैं बहुत देर तक रोता और अफसोस करता रहा। इसके बाद उठकर दारोगा के मकान की तरफ रवाना हुआ। मगर आज भी अपने बचाव का पूरा-पूरा इन्तजाम करता गया। मुलाकात होने पर दारोगा ने कल से ज्यादा खातिरदारी के साथ मुझे बैठाया और देर तक बातचीत करता रहा। मगर जब मैं सरयू के पास गया तो उसकी हालत कल से ज्यादा खराब देखने में आई, अर्थात् आज उसमें बोलने की भी ताकत न थी। मुख्तसिर यह है कि तीसरे दिन बेहोश और चौथे दिन आधी रात के समय मैंने सरयू को मुर्दा पाया। उस समय मेरी क्या हालत थी, सो मैं बयान नहीं कर सकता। अस्तु, उस समय जो कुछ करना उचित था और मैं कर सकता था, उसे सवेरा होने के पहले ही करके छुट्टी किया, अपने खयाल से सरयू के शरीर की दाह-क्रिया इत्यादि करके पंचतत्व में मिला दिया और इस बात की इत्तिला इन्द्रदेव को दे दी। इसके बाद इन्दिरा के लिए अपने अड्डे पर गया और वहाँ उसे न पाकर बड़ा ताज्जुब हुआ। पूछने पर मेरे आदमियों ने जवाब दिया कि "हम लोगों को कुछ भी खबर नहीं कि वह कब और कहाँ भाग गई।" इस बात से मुझे सन्तोष न हुआ। मैंने अपने आदमियों को सख्त सजा दी और बराबर इन्दिरा का पता लगाता रहा। अब सरयू के मिल जाने से मालूम हुआ कि उस दिन मेरी कम्बख्त आँखों ने मेरे साथ दगा की और दारोगा के मकान में बीमार सरयू को मैं पहचान न सका। मेरी आँखों के सामने सरयू मर चुकी थी और मैंने खुद अपने हाथ से इन्द्रदेव को यह समाचार लिखा था, इसलिए उन्हें किसी तरह का शक न हुआ और सरयू तथा इन्दिरा के गम में ये दीवाने से हो गये, हर तरह के चैन और आराम को इन्होंने इस्तीफा दे दिया और उदासीन हो एक प्रकार से साधू ही बन बैठे। मुझसे भी मुहब्बत कम कर दी और शहर का रहना छोड़ अपने तिलिस्म के अन्दर चले गये और उसी में रहने लगे, मगर न मालूम क्या सोचकर इन्होंने मुझे वहाँ का रास्ता न बताया। मुझ पर भी इस मामले का बड़ा असर पड़ा क्योंकि ये सब बातें मेरी ही नालायकी के सबब से हुई थीं। अतएव मैंने उदासीन हो रणधीरसिंहजी की नौकरी छोड़ दी और अपने बाल-बच्चों तथा स्त्री को भी उन्हीं के यहां छोड़, बिना किसी को कुछ कहे जंगल और पहाड़ का रास्ता लिया। उधर एक और स्त्री से मैंने शादी कर ली थी जिससे नानक पैदा हुआ है। उधर भी कई ऐसे मामले हो गये जिनसे मैं बहुत उदास और परेशान हो रहा था, उसका हाल नानक की जुबानी तेजसिंह को मालूम ही हो चुका है। बल्कि आप लोगों ने भी तो सुना ही होगा। अस्तु, हर तरह से अपने को नालायक समझकर मैं निकल भागा और फिर मुद्दत तक अपना मुंह किसी को न दिखाया। इधर जब जमाने ने पलटा खाया तब मैं कमलिनीजी से जा मिला। उन दिनों मेरे दिल में विश्वास हो गया था कि इन्द्रदेव मुझसे रंज हैं। अतः मैंने इनसे भी मिलना-जुलना छोड़ दिया, बल्कि यों कहना चाहिए कि हमारी इतनी पुरानी दोस्ती का उन दिनों अन्त हो गया था।
इन्द्रदेव —— बेशक, यही बात थी। स्त्री के मरने की खबर सुन कर मुझे बड़ा ही रंज हुआ। मुझे कुछ तो भूतनाथ की जुबानी और कुछ तहकीकात करने पर मालूम ही हो चुका था कि मेरी लड़की और स्त्री इसी की बदौलत जहन्नुम चली गई। अस्तु, मैंने भूतनाथ की दोस्ती को तिलांजलि दे दी और मिलना-जुलना बिल्कुल बन्द कर दिया मगर इससे कहा कुछ भी नहीं क्योंकि मैं अपनी जुबान से दारोगा को माफ कर चुका था। इसके अतिरिक्त इसने मुझ पर कुछ अहसान भी जरूर ही किये थे, उनका भी मुझे खयाल था। अस्तु मैंने कुछ कहा तो नहीं, मगर इसकी तरफ से दिल हटा लिया और फिर अपना कोई भेद भी इसको नहीं बताया। कभी-कभी इसके साथ इधर-उधर की मुलाकात हो जाती थी, क्योंकि इसे मैंने अपने मकान का तिलिस्मी रास्ता नहीं दिखाया था। अगर यह कभी मेरे मकान पर आया भी तो अपनी आँखों पर पट्टी बांध कर। यही सबब था कि इसे लक्ष्मीदेवी का हाल मालूम न हुआ। लक्ष्मीदेवी के बारे में भी मैं इसे कसूरवार समझता था और मुझे यह भी विश्वास था कि यह अपना बहुत-सा भेद मुझसे छिपाता है और वास्तव में छिपाता भी था।
भूतनाथ—(इन्द्रदेव से) नहीं, सो बात तो नहीं है, मेरे कृपालु मित्र!.
इन्द्रजीतसिंह -अगर यह बात नहीं है तो कलमदान, जिसे तुम आखिरी मर्तबे इन्दिरा के साथ दारोगा के यहाँ से उठा लाये और मुझे दे गये थे, मेरे यहाँ से कैसे गायब हो गया?
भूतनाथ-(मुस्करा कर) आपके किस मकान में से वह कलमदान गायव हो गया था?
इन्द्रजीतसिंह-काशीजी वाले मकान में से। उसी दिन तुम मुझसे मिलने के लिए वहाँ आये थे और उसी दिन वह कलमदान गायब हो गया।
भूतनाथ-ठीक है, तो उस कलमदान को चुराने वाला मैं नहीं हूं, बल्कि मेरा लड़का नानक है। मैं तो यों भी अगर जरूरत होती तो आपसे वह कलमदान मांग सकता था। दारोगा की आज्ञानुसार लाड़िली ने रामभोली बनकर नानक को धोखा दिया और अ के यहाँ से कलमदान चुरवा मंगवाया।
गोपालसिंह-हाँ ठीक है, इस बात को तो मैं भी सकारूँगा क्योंकि मुझे इसका असल हाल मालूम है। बेशक इसी ढंग से वह कलमदान वहाँ पहुंचा था और अन्त में बड़ी मुश्किल से वह उस समय मेरे हाथ लगा, जब मैं कृष्ण जिन्न बन कर रोहतासगढ़ पहुंचा था। नानक को विश्वास है कि लाड़िली ने रामभोली बनकर उसे धोखा दिया था,मगर वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। वह एक दूसरी ही ऐयारा थी जो रामभोली बनी थी,लाड़िली ने तो केवल एक ही दिन या दो दिन रामभोली का रूप धरा था।
जीतसिंह-(राजा गोपालसिंह से) वह कलमदान आपको कहाँ से मिल गया? दारोगा ने तो उसे बड़ी ही हिफाजत से रखा होगा!
गोपालसिंह-बेशक ऐसा ही है। मगर भूतनाथ की बदौलत वह मुझे सहज ही में मिल गया। ऐसी-ऐसी चीजों को दारोगा बहुत गुप्त रीति से अपने अजायबघर में रखता था, जिसकी ताली मायारानी से लेकर भूतनाथ ने मुझे दी थी। उस अजायबघर का भेद मेरे पिता और उस दारोगा के सिवाय कोई नहीं जानता था। मेरे पिता ही ने
दारोगा को वहाँ का मालिक बना दिया था। जब भूतनाथ ने उसकी ताली मुझे दी, तब मुझे भी वहां का पूरा-पूरा हाल मालूम हुआ।
जीतसिंह-(भूतनाथ से) खैर, यह बताओ कि मनोरमा और नागर का तुमसे क्या सम्बन्ध था?
यह सवाल सुनकर भूतनाथ सन्न हो गया और सिर झुकाकर कुछ सोचने लगा। उस समय गोपालसिंह ने उसकी मदद की और जीतसिंह की तरफ देख कर कहा, “इस सवाल को छोड़ दीजिए, क्योंकि वह जमाना भूतनाथ का बहुत ही बुरा तथा ऐयाशी का था। इसके अतिरिक्त जिस तरह राजा वीरेन्द्रसिंहजी ने रोहतासगढ़ के तहखाने में भूतनाथ का कसूर माफ किया था, उसी तरह कमलिनी ने भी इसका वह कसूर कसम खिलाकर माफ किया और साथ ही उन ऐबों को छिपाने का बन्दोबस्त कर दिया है।"
इसके जवाब में जीतसिंह ने कहा, "खैर, जाने दो, देखा जायेगा।"
गोपालसिंह-जब से भूतनाथ ने कमलिनी का साथ किया है, तब से इसने (भूतनाथ ने) जो-जो काम किये हैं, उन पर ध्यान देने से आश्चर्य होता है।वास्तव में इसने ऐसे काम किये हैं, जिनकी ऐसे समय हमें सख्त जरूरत थी। मगर इसका लड़का नानक तो बिल्कुल ही बोदा और खुदगर्ज निकला। न तो कमलिनी के साथ मिल कर उसने कोई तारीफ का काम किया और न अपने बाप ही को किसी तरह की मदद दी।
भूतनाथ-बेशक ऐसा ही है, मैंने कई दफा उसे समझाया, मगर
सुरेन्द्र सिंह- (गोपाल से) अच्छा, अजायबघर में क्या बात है जिससे ऐसा अनूठा नाम उसका रखा गया? अब तो तुम्हें उसका पूरा-पूरा हाल मालूम हो ही गया होगा।
गोपालसिंह-जी हाँ। एक किताब है जिसे 'ताली' के नाम से सम्बोधित करते हैं। उसके पढ़ने से वहां का कुल हाल मालूम होता है। वह बड़ी हिफाजत और तमाशे की जगह थी और कुछ है भी, क्योंकि अब उसका काफी हिस्सा मायारानी की बदौलत बर्बाद हो गया।
जीतसिंह-उस किताब (ताली) की बदौलत मायारानी को भी वहां का हाल मालूम हो गया होगा?
गोपालसिंह-कुछ-कुछ, क्योंकि उस किताब की भाषा वह अच्छी तरह समझ नहीं सकती थी। इसके अतिरिक्त उस अजायबघर का जमानिया के तिलिस्म से भी सम्बन्ध है। इसलिए कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को वहां का हाल मुझसे भी ज्यादा मालूम हुआ होगा।
जीतसिंह-ठीक है, (सुरेन्द्र सिंह की तरफ देख कर) आज यद्यपि बहुत-सी नई बातें मालूम हुई हैं। परन्तु फिर भी जब तक दोनों कुमार यहाँ न आ जायेंगे तत्र तक बहुत-सी बातों का पता न लगेगा।
सुरेन्द्र सिंह–सो तो होगा ही, परन्तु इस समय हम केवल भूतनाथ के मामले को तय करना चाहते हैं। जहाँ तक मालूम हुआ है भूतनाथ ने हम लोगों के साथ सिवाय भलाई के बुराई कुछ भी नहीं की। अगर उसने बुराई की तो इन्द्रदेव के साथ या कुछ गोपालसिंह के साथ, सो भी उस जमाने में जब इनसे और हमसे कुछ सम्बन्ध नहीं था।
आज ईश्वर की कृपा से ये लोग हमारे साथ हैं, बल्कि हमारे अंग हैं। इससे कहा भी जा सकता है कि भूतनाथ हमारा ही कसूरवार है। मगर फिर भी हम इसके कसूरों की माफी का अख्तियार इन्हीं दोनों अर्थात् गोपालसिंह और इन्द्रदेव को देते हैं। ये दोनों अगर भूतनाथ का कसूर माफ कर दें तो हम इस बात को खुशी से मंजूर कर लेंगे। हाँ,लोग यह कह सकते हैं कि इस माफी देने में बलभद्रसिंह को भी शरीक करना चाहिए था। मगर हम इस बात को जरूरी नहीं समझते, क्योंकि इस समय बलभद्रसिंह को कैद से छुड़ा कर भूतनाथ ने उन पर बल्कि सच तो ये है कि हम लोगों पर भी बहुत बड़ा अहसान किया है, इसलिए अगर बलभद्र सिंह को इससे कुछ रंज हो तो भी माफी देने में वे कुछ उज्र नहीं कर सकते।
गोपालसिंह-इसी तरह हम दोनों को भी माफी देने में किसी तरह का उज्र न होना चाहिए। इस समय भूतनाथ ने मेरी बहुत बड़ी मदद की है और मेरे साथ मिल कर ऐसे अनूठे काम किये हैं कि जिनकी तारीफ सहज में नहीं हो सकती। इस हमदर्दी और मदद के सामने उन कसूरों की कुछ भी हकीकत नहीं, अतः मैं इससे बहुत प्रसन्न हूँ और सच्चे दिल से इसे माफी देता हूं।
इन्द्रदेव-माफी देनी ही चाहिए! जब आप माफी दे चुके तो मैं भी दे चुका!ईश्वर भूतनाथ पर कृपा करें, जिससे अपनी नेकनामी बढ़ाने का शौक इसके दिल में दिन-दिन तरक्की करता रहे। सच बात तो यह है कि कमलिनी की बदौलत इस समय हम लोगों को यह शुभ दिन देखने में आया और जब कमलिनी ने इससे प्रसन्न हो इसके कसूर माफ कर दिए तो हम लोगों को बाल-बराबर भी उज्र नहीं हो सकता।
जीतसिंह-बेशक, बेशक!
सुरेन्द्रसिंह-इसमें कुछ भी शक नहीं! (भूतनाथ की तरफ देख कर) अच्छा, भूतनाथ, तुम्हारा सब कसूर माफ किया जाता है। इन दिनों हम लोगों के साथ तुमने जो-जो नेकियां की हैं उनके बदले में हम तुम पर भरोसा करके तुम्हें अपना ऐयार बनाते हैं।
इतना कहकर सुरेन्द्र सिंह उठ बैठे और अपने सिरहाने के नीचे से अपना खास बेशकीमत खंजर निकालकर भूतनाथ की तरफ बढ़ाया। भूतनाथ खड़ा हो गया और झुककर सलाम करने के बाद खंजर ले लिया और इसके बाद जीतसिंह, गोपालसिंह और इन्द्रदेव को भी सलाम किया। जीतसिंह ने अपना खास ऐयारी का बटुआ भूतनाथ को दिया। गोपालसिंह ने वह तिलिस्मी तमंचा, जिससे आखिरी वक्त मायारानी ने काम लिया था और जो इस समय उनके पास था, गोली बनाने की तरकीब सहित भूतनाथ को दिया और इन्द्रदेव ने यह कहकर उसे गले से लगा लिया कि “मुझ फकीर के पास इससे बढ़कर और कोई चीज नहीं है कि मैं फिर तुम्हें अपना भाई बना कर ईश्वर से प्रार्थना करूं कि अब इस नाते में किसी तरह का फर्क न पड़ने पावे।"
इसके बाद दोनों आदमी अपनी-अपनी जगह पर बैठ गये और भूतनाथ ने हाथ जोड़कर सुरेन्द्रसिंह से कहा, "आज मैं समझता हूँ कि मुझ-सा खुशनसीब इस दुनिया में दूसरा कोई भी नहीं है। बदनसीबी के चक्कर में पड़कर मैं वर्षों परेशान रहा, तरह-तरह की तकलीफें उठाई, पहाड़-पहाड़ और जंगल-जंगल मारा फिरा, साथ ही इसके पैदा भी बहुत किया और बिगाड़ा भी बहुत, परन्तु सच्चा सुख नाम मात्र के लिए एक दिन भी न मिला और न किसी को मुंह दिखाने की अभिलाषा ही रह गई। अन्त में न मालूम किस जन्म का पुण्य सहायक हुआ जिसने मेरे रास्ते को बदल दिया और जिसकी बदौलत आज मैं इस दर्जे को पहुँचा। अब मुझे किसी बात की परवाह न रही। आज तक जो मुझसे दुश्मनी रखते थे, कल से वे मेरी खुशामद करेंगे, क्योंकि दुनिया का कायदा ही ऐसा है। महाराज इस बात का भी निश्चय रखें कि उस पीतल की सन्दूकड़ी से महाराज या महाराज के पक्षपातियों का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, जो नकली बलभद्रसिंह की गठरी में से निकली है और जिसके बयान ही से मेरे रोंगटे खड़े होते हैं। मैं उस भेद को भी महाराज से छिपाना नहीं चाहता, हाँ, यह अच्छा है कि सर्वसाधारण में वह भेद न फैलने पाये। मैंने उसका कुछ हाल देवी सिंह से कह दिया है, आशा है कि वे महाराज से जरूर अर्ज करेंगे।
जीतसिंह--खैर, उसके लिए तुम चिन्ता न करो, जैसा होगा देखा जायेगा। अब अपने डेरे पर जाकर आराम करो, महाराज भी आज रात भर जागते ही रहे हैं।
गोपालसिंह--जी हाँ, अब तो नाममात्र को रात बच गई होगी।
इतना कहकर राजा गोपालसिंह उठ खड़े हुए और सबको साथ लिए हुए कमरे के बाहर चले गये।
३
इस समय रात बहुत कम बाकी थी और सुबह की सफेदी आसमान पर फैलना ही चाहती थी। और लोग तो अपने-अपने ठिकाने चले गए और दोनों नकाबपोशों ने भी अपने घर का रास्ता लिया, मगर भूतनाथ सीधे देवीसिंह के डेरे पर चला गया। दरवाजे पर ही पहरेवाले की जुबानी मालूम हुआ कि वे सोये हैं परन्तु देवीसिंह को न मालूम किस तरह भूतनाथ के आने की आहट मिल गई (शायद जागते हों)अतः वे तुरन्त बाहर निकल आए और भूतनाथ का हाथ पकड़कर कमरे के अन्दर ले गए। इस समय वहाँ केवल एक शमादान की मद्धिम रोशनी हो रही थी, दोनों आदमी फर्श पर बैठ गए और यों बातचीत होने लगी-
देवीसिंह–कहो, इस समय तुम्हारा आना कैसे हुआ? क्या कोई नई बात हुई?
भूतनाथ-बेशक नई बात हुई और वह इतनी खुशी की हुई है जिसके योग्य मैं नहीं था।
देवीसिंह—(ताज्जुब से) वह क्या?
भूतनाथ-आज महाराज ने मुझे अपना ऐयार बना लिया और इस इज्जत के लिए मुझ अपना खंजर भी बख्शा है।
इतना कहकर भूतनाथ ने महाराज का दिया हुआ बंजर और जीतसिंह तथा गोपालसिंह का दिया हुआ बटुआ और तमंचा देवीसिंह को दिखाया और कहा, "इसी बात की मुबारकबाद देने के लिए मैं आया हूँ कि तुम्हारा एक नालायक दोस्त इस दर्जे को पहुँच गया।"
देवीसिंह-(प्रसन्न होकर और भूतनाथ को गले से लगाकर) बेशक यह बड़ी खुशी की बात है, ऐसी अवस्था में तुम्हें अपने पुराने मालिक रणधीरसिंह को भी सलाम करने के लिए जाना चाहिए।
भूतनाथ-जरूर जाऊँगा!
देवीसिंह-यह कार्रवाई कब हुई?
भूतनाध-अभी थोड़ी ही देर पहले हुई। मैं इस समय महाराज के पास से ही चला आ रहा हूँ। इतना कहकर भूतनाथ ने आज की रात का कुल हाल देवीसिंह से बयान किया।इसके बाद भूतनाथ और देवीसिंह में देर तक बातचीत होती रही, और जब दिन अच्छी तरह निकल आया, तब दोनों ऐयार वहाँ से उठे और स्नान-संध्या की फिक्र में लगे।
जरूरी कामों से निश्चिन्ती पा और स्नान-पूजा से निवृत्त होकर भूतनाथ अपने पुराने मालिक रणधीरसिंह के पास चला गया। बेशक उसके दिल में इस बात का खुटका लगा हुआ था कि उसका पुराना मालिक उसे देखकर प्रसन्न न होगा, बल्कि सामना होने पर भी कुछ देर तक उसके दिल में इस बात का गुमान बना रहा, मगर जिस समय भूतनाथ ने अपना खुलासा हाल बयान किया, उस समय बहुत परेशान रणधीरसिंह को और प्रसन्न पाया। रणधीरसिंह ने उसको खिलअत और इनाम भी दिया और बहुत देर तक उससे तरह-तरह की बातें करते रहे।
४
यह बात तो तय पा चुकी थी कि सब कामों के पहले कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की शादी हो जानी चाहिए, अतः इसी खयाल से जीतसिंह शादी के इन्तजाम में जी-जान से कोशिश कर रहे हैं और इस बात की खबर पाकर सभी प्रसन्न हो रहे हैं कि आज दोनों कुमार आ जायेंगे और शीघ्र ही उनकी शादी भी हो जायेगी। महाराज की आज्ञानुसार जीतसिंह मुलाकात करने के बाद इस बात का फैसला भी कर आये कि किशोरी के साथ-ही-साथ कामिनी का भी कन्यादान रणधीरसिंह ही करेंगे। साथ ही इसके रणधीरसिंह की यह बात भी जीतसिंह ने मंजूर कर ली कि इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के आने के पहले किशोरी और कामिनी उनके (रणधीरसिंह के) खेमे में पहुंचा दी जायेंगी। आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् किशोरी और कामिनी बड़ी हिफाजत के साथ रणधीरसिंह के खेमे में पहुँचा दी गई और बहुत से फौजी सिपाहियों के साथ पन्नालाल, रामनारायण, चुन्नीलाल और पण्डित बद्रीनाथ ऐयार खास उनकी हिफाजत के लिए छोड़ दिए गए।
आज कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के आने की उम्मीद में लोग खुशी-खुशी तरह-तरह के चर्चे कर रहे हैं। आज ही के दिन आने के लिए दोनों कुमारों ने चिट्ठी लिखी थी, इसलिए आज उनके दादा-दादी, मां-बाप, दोस्तों और प्रेमियों को भी उम्मीद हो रही है कि उनकी तरसती हुई आँखें ठण्डी होंगी, और जुदाई के सदमों से मुरझाया हुआ दिल हरा होगा। अलहकार और खैरख्वाह लोग जरूरी कामों को भी छोड़कर तिलिस्मी इमारत में इकट्ठे हो रहे हैं। इसी तरह हर एक अदना और आला दोनों कुमारों के आने की उम्मीद में खुश हो रहा है। गरीबों और मोहताजों की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं, उन्हें इस बात का पूरा विश्वास हो रहा है कि अब उनका दारिद्र्य दूर हो जायगा!
दो पहर दिन ढलने के बाद दोनों नकाबपोश भी आकर हाजिर हो गए हैं, केवल वे ही नहीं, बल्कि उनके साथ और भी कई नकाबपोश हैं, जिनके बारे में लोग तरह-तरह के चर्चे कर रहे हैं और साथ ही यह भी कह रहे हैं कि "जिस समय ये नकाबपोश लोग अपने चेहरों से नकाबें हटायेंगे, उस समय जरूर कोई-न-कोई अनूठी घटना देखने-सुनने में आयेगी।"
नकाबपोशों की जुबानी यह तो मालूम हो ही चुका था कि दोनों कुमार उसी पत्थर वाले तिलिस्मी चबूतरे के अन्दर से प्रकट होंगे जिस पर पत्थर का आदमी सोया हुआ है, इसलिए इस समय महाराज, राजासाहब और सलाहकार लोग उसी दालान में इकट्ठे हो रहे हैं, और वह दालान भी सज-सजाकर लोगों के बैठने के लायक बना दिया गया है।
तीन पहर दिन बीत जाने पर तिलिस्मी चबूतरे के अन्दर से कुछ विचित्र ही ढंग के बाजे की आवाज आने लगी जोकि भारी मगर सुरीली थी और जिसके सबब से लोगों का ध्यान उसकी तरफ खिंचा। महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, तेजसिंह और गोपालसिंह तथा दोनों नकाबपोश उठकर उस चबूतरे के पास गये। ये लोग बड़े गौर से उस चबूतरे की अवस्था पर ध्यान देते रहे, क्योंकि इस बात का पूरा गुमान था कि पहले की तरह आज भी उस चबूतरे का अगला हिस्सा किवाड़ के पल्ले की तरह खुलकर जमीन के साथ लग जायेगा। आखिर ऐसा ही हुआ अर्थात् जिस तरह बलभद्रसिंह के आने और जाने के वक्त उस चबूतरे का अगला हिस्सा खुल गया था, उसी तरह इस समय भी वह किवाड़ के पल्ले की तरह धीरे-धीरे खुलकर जमीन के साथ लग गया और उसके अन्दर से कुंअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह बाहर निकलकर महाराज सुरेन्द्रसिंह के पैरों पर गिर पड़े। उन्होंने बड़े प्रेम से उठाकर छाती से लगा लिया। इसके बाद दोनों कुमारों ने अपने पिता के चरण छूए, फिर जीतसिंहजी और तेजसिंह को प्रणाम करने के बाद राजा लसिंह से मिले। इसके बाद नकाबपोशों, ऐयारों व दोस्तों से भी मुलाकात की।
बन्दोबस्त पहले से हो चुका था और इशारा भी बंधा हुआ था, अतएव जिस समय दोनों कुमार महाराज के चरणों पर गिरे उसी समय फाटक पर से बाजों की आवाज आने लगी जिससे बाहर वालों को भी मालूम हो गया कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह आ गये।
इस समय की खुशी का हाल लिखना हमारी ताकतसे बाहर है। हाँ, इसका अन्दाज पाठक स्वयं कर सकते हैं कि जब दोनों कुमार मिलने के लिए महल के अन्दर गए तो औरतों में खुशी का दरिया कितने जोश के साथ उमड़ा होगा। महल के अन्दर दोनों कुमारों का इन्तजार बनिस्बत बाहर से ज्यादा होगा, यह सोचकर ही महाराज ने दोनों कुमारों को ज्यादा देर तक बाहर रोकना मुनासिब न समझकर शीघ्र ही महल में जाने की आज्ञा दी, और दोनों कुमार भी खुशी-खुशी महल के अन्दर जाकर सबसे मिले। उनकी माँ और दादी की बढ़ती हुई खुशी का तो आज अन्दाज करना ही कठिन है, जिन्होंने लड़कों की जुदाई तथा रंज और नाउम्मीदी के साथ-ही-साथ तरह-तरह की खबरों से पहुंची हुई चोटों को अपने नाजुक कलेजों पर झेलकर और देवताओं की मिन्नतें मान-मानकर आज का दिन देखने के लिए अपनी नन्ही-सी जान को बचाकर रखा था। अगर उन्हें समय और नीति पर विशेष ध्वान न रहता तो आज घण्टों तक अपने बच्चों को कलेजे से अलग करके बातचीत करने और महल के बाहर जाने का मौका न देतीं।
दोनों कुमार खुशी-खुशी सबसे मिले। एक-एक करके सबसे कुशल-मंगल पूछा,कमलिनी और लाड़िली से भी चार आँखें हुईं, मगर वहाँ किशोरी और कामिनी की सुरत दिखाई न पड़ी, जिनके बारे में सुन चुके थे कि महल के अन्दर पहुंच चुकी हैं। इस सबब से उनके दिल को जो कुछ तकलीफ हुई उसका अन्दाज औरों को तो नहीं, मगर कुछ-कुछ कमलिनी और लाड़िली को मिल गया और उन्होंने बात-ही-बात में इस भेद को खुलवाकर कुमारों की तसल्ली करवा दी।
थोड़ी देर तक दोनों भाई महल के अन्दर रहे, और इस बीच में बाहर से कई दफे तलबी का सन्देश पहुँचा, अतः पुनः मिलने का वादा करके वहाँ से उठकर वह बाहर की तरफ रवाना हुए और उस आलीशान कमरे में पहुंचे, जिसमें कई खास-खास आदमियों और आपस वालों के साथ महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह उनका इन्तजार कर रहे थे। इस समय इस कमरे में यद्यपि राजा गोपालसिंह, नकाबपोश लोग, जीतसिंह, तेजसिंह, भूतनाथ और ऐयार लोग भी उपस्थित थे, मगर कोई आदमी ऐसा न था, जिसके सामने भेद की बातें करने में किसी तरह का संकोच हो। दोनों कुमार इशारा पाकर अपने दादा साहब के बगल में बैठ गए और धीरे-धीरे बातचीत होने लगी।
सुरेन्द्रसिंह-(दोनों कुमारों की तरफ देखकर) भैरोंसिंह और तारासिंह तुम्हारे पास गये थे, उन दोनों को कहाँ छोड़ा?
इन्द्रजीतसिंह-(मुस्कराते हुए) जी वे दोनों तो हम लोगों के आने से पहले ही से हजूर में हाजिर हैं!
सुरेन्द्रसिंह-(ताज्जुब से चारों तरफ देखकर) कहाँ?
महाराज के साथ-ही-साथ और लोगों ने भी ताज्जुब के साथ एक-दूसरे पर निगाह डाली।
इन्द्रजीतसिंह-(दोनों सरदार नकाबपोशों की तरफ बताकर जिनके साथ और भी कई नकाबपोश थे) रामसिंह और लक्ष्मणसिंह का काम आज वे ही दोनों पूरा कर
इतना सुनते ही दोनों नकाबपोशों ने अपने-अपने चेहरे पर से नकाबें हटा दी, और उनके बदले में भैरोंसिंह तथा तारासिंह दिखाई देने लगे। इस जादू के से मामले को देखकर सबकी विचित्र अवस्था हो गई और सब ताज्जुब में आकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह की तो और ही अवस्था हो रही थी। बड़े जोरों के साथ कलेजा उछलने लगा और वे कुछ बातें उन्हें याद आ गईं जो नकाबपोशों के मकान में जाकर देखी-सुनी थीं और वे दोनों ही ताज्जुब के साथ गौर करने लगे।
सुरेन्द्रसिंह-(दोनों कुमारों से) जब भैरोंसिंह और तारासिंह तुम्हारे पास नहीं गये और यहाँ मौजूद थे, तब भी तो रामसिंह और लक्ष्मणसिंह कई दफे आये थे,उस समय इस विचित्र पर्दे (नकाब)के अन्दर कौन छिपा हुआ था?
इन्द्रजीतसिंह-(और सब नकाबपोशों की तरफ बताकर) कई दफे इन लोगों में से बारी-बारी से समयानुसार और कई दफे स्वयं हम दोनों भाई इसी पोशाक और नकाब को पहनकर हाजिर हुए थे।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह की इस बात ने इन लोगों को और भी ताज्जुब में डाल दिया और सब कोई हैरानी के साथ उनकी तरफ देखने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह की तो बात ही निराली थी, इनको तो विश्वास हो गया कि नकाबपोशों की टोह में जिस मकान के अन्दर हम लोग गए थे, उस मालिक ये ही दोनों हैं, इन्हीं दोनों की मर्जी से हम लोग गिरफ्तार हुए थे, और इन्हीं दोनों के सामने पेश किए गए थे। देवीसिंह यद्यपि अपने दिल को बार-बार समझा-बुझाकर सम्हालते थे, मगर इस बात का खयाल हो ही जाता था कि अपने ही लोगों ने मेरी बेइज्जती की, और मेरे ही लड़के ने इस काम में शरीक होकर मेरे साथ दगा की। मगर देखना चाहिए, इन सब बातों का भेद, सबब और नतीजा क्या खुलता है।
भूतनाथ इस सोच में घड़ी-घड़ी सिर झुका लेता था कि मेरे पुराने ऐब, जिन्हें मैं बड़ी कोशिश से छिपा रहा था, अब छिपे न रहे, क्योंकि इन नकाबपोशों को मेरा रत्ती-रत्ती हाल मालूम है, और दोनों कुमार इन सबके मालिक और मुखिया हैं, अतः इनसे कोई बात छिपी न रह गई होगी। इसके अतिरिक्त मैं अपनी आँखों से देख चुका हूँ, कि मुझसे बदला लेने की नीयत रखने वाला मेरा दुश्मन उस विचित्र तस्वीर को लिए हुए इनके सामने हाजिर हुआ था और मेरा लड़का हरनामसिंह भी वहां मौजूद था। यद्यपि इस बात की आशा नहीं हो सकती कि ये दोनों कुमार मुझे जलील और बे-आबरू करेंगे, मगर फिर भी शर्मिन्दगी मेरा पल्ला नहीं छोड़ती। इत्तिफाक की बात है कि जिस तरह मेरी स्त्री और लड़के ने इस मामले में शरीक होकर मुझे छकाया है, उसी तरह देवीसिंह की स्त्री-लड़के ने उनके दिल में भी चुटकी ली है।
देवीसिंह और भूतनाथ की तरह हमारे और ऐयारों के दिलों में भी करीब-करीब इसी ढंग की बातें पैदा हो रही थीं, और इन सब भेदों को जानने के लिए वे बनिस्बत पहले के अब और ज्यादा बेचैन हो रहे थे, तथा यही हाल हमारे महाराज सुरेन्द्रसिंह और गोपालसिंह वगैरह का भी था।
कुछ देर तक ताज्जुब के साथ सन्नाटा रहा, और इसके बाद पुनः महाराज ने दोनों कुमारों की तरफ देखकर कहासुरेन्द्रसिंह-ताज्जुब की बात है कि तुम दोनों भाई यहाँ आकर भी अपने को छिपाये रहे!
इन्द्रजीतसिंह—(हाथ जोड़कर) मैं यहाँ हाजिर होकर पहले ही अर्ज कर चुका था कि "हम लोगों का भेद जानने के लिए उद्योग न किया जाये, हम लोग मौका पाकर स्वयं अपने को प्रकट कर देंगे।" इसके अतिरिक्त तिलिस्मी नियमों के अनुसार तब तक हम दोनों भाई प्रकट नहीं हो सकते थे, जब तक कि अपना सारा काम पूरा करके इसी तिलिस्मी चबूतरे की राह से तिलिस्म के बाहर नहीं निकल आते। साथ ही इसके हम लोगों की यह भी इच्छा थी कि जब तक निश्चिन्त होकर खुले तौर पर यहाँ न आ जायें,तब तक कैदियों के मुकदमे का फैसला न होने पाये, क्योंकि इस तिलिस्म के अन्दर जाने के बाद हम लोगों को बहुत से नए-नए भेद मालूम हुए हैं जो(नकाबपोशों की तरफ इशारा करके)इन लोगों से सम्बन्ध रखते हैं, और जिनका आपसे अर्ज करना बहुत जरूरी था।
सुरेन्द्रसिंह-(मुस्कराते हुए और नकाबपोशों की तरफ देखकर) अब तो इन लोगों को भी अपने चेहरों से नकाबें उतार देनी चाहिए। हम समझते हैं इस समय इन लोगों का चेहरा साफ होगा।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह का इशारा पाकर उन नकाबपोशों ने भी अपने-अपने चेहरे से नकाबें हटा दी, और खड़े होकर अदब के साथ महाराज को सलाम किया। ये नकाबपोश गिनती में पांच थे और इन्हीं पांचों में इस समय वे दोनों सूरतें भी दिखाई पड़ीं,जो यहाँ दरबार में पहले दिखाई पड़ चुकी थी, या जिन्हें देखकर दारोगा और बेगम के छक्के
अब सबका ध्यान उन पांचों नकाबपोशों की तरफ खिंच गया, हाल जानने के लिए लोग पहले ही से बेचैन हो रहे थे, क्योंकि इन्होंने कैदियों के मामले,में कुछ विचित्र ढंग की कैफियत और उलझन पैदा कर दी थी। यद्यपि कह सकते हैं कि यहाँ पर इन पाँचों को पहचानने वाला कोई न था, मगर भूतनाथ और राजा गोपालसिंह बड़े गौर से उनकी तरफ देखकर अपने हाफजे (स्मरणशक्ति)पर जोर दे रहे थे, और उम्मीद करते थे कि इन्हें हम पहचान लेंगे।
सुरेन्द्रसिंह- (गोपालसिंह की तरफ देखकर)केवल हम लोग नहीं बल्कि हजारों आदमी इनका हाल जानने के लिए बेताब हो रहे हैं, अतः ऐसा करना चाहिए कि एक साथ ही इनका हाल मालूम हो जाये।
गोपालसिंह-मेरी भी यही राय है।
एक नकाबपोश-कैदियों के सामने ही हम लोगों का किस्सा सुना जाये तो ठीक है, क्योंकि ऐसा होने ही से महाराज का विचार पूरा होगा। इसके अतिरिक्त हम लोगों के किस्से में वही कैदी हामी भरेंगे, और कई अधूरी बातों को पूरा करके महाराज का शक दूर करेंगे, जिन्हें हम लोग भी नहीं जानते, और जिनके लिए महाराज भी छूट गए थे। निका असल उत्सुक होंगे।
इन्द्रजीतसिंह-(सुरेन्द्रसिंह से) बेशक ऐसा ही है। यद्यपि हम दोनों भाई इन लोगों का किस्सा सुन चुके हैं, मगर कई भेदों का पता नहीं लगा, जिनके जाने बिना जी बेचैन हो रहा है, और उनका मालूम होना कैदियों की इच्छा पर निर्भर है।
सुरेन्द्रसिंह--(कुछ सोचकर) खैर, ऐसा ही किया जायेगा।
इसके बाद उन लोगों में दूसरे तरह की बातचीत होने लगी, जिसके लिखने की कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। इसके घण्टे भर बाद यह दरबार बर्खास्त हुआ और सब कोई अपने-अपने स्थान पर चले गए।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह का दिल किशोरी को देखने के लिए बेताब हो रहा था। उन्हें विश्वास था कि यहां पहुंचकर उससे अच्छी तरह मुलाकात होगी और बहुत दिनों का अरमान-भरा दिल उसकी सोहबत से तस्कीन पाकर पुनः उसके कब्जे में आ जायेगा मगर ऐसा नहीं हुआ अर्थात् कुमार के आने से पहले ही वह अपने नाना के डेरे में भेज दी गई, और उनका अरमान-भरा दिल उसी तरह तड़पता रह गया। यद्यपि उन्हें इस बात का भी विश्वास था कि अब उनकी शादी किशोरी के साथ बहुत जल्द होने वाली है, मगर फिर भी उनका मनचला दिल जिसे उनके कब्जे के बाहर हुए मुद्दत हो चुकी थी, इन चापलूसियों को कब मानता था! इसी तरह कमलिनी से भी मीठी-मीठी बातें करने के लिए वे कम बेताब न थे, मगर बड़ों का लिहाज उन्हें इस बात की इजाजत नहीं देता था कि उससे एकान्त में मुलाकात करें, यद्यपि वे ऐसा करते तो कोई हर्ज की बात न थी। मगर इसलिए कि उसके साथ भी शादी होने की उम्मीद थी, शर्म और लिहाज के फेर में पड़े हुए थे। परन्तु कमलिनी को इस बात का सोच-विचार कुछ भी न था। हम इसका सबब भी बयान नहीं कर सकते, हाँ, इतना कहेंगे कि जिस कमरे में कुंअर इन्द्रजीतसिंह का डेरा था उसी के पीछे वाले कमरे में कमलिनी का डेरा था, और उस कमरे से कुँअर इन्द्रजीतसिंह के कमरे के आने-जाने के लिए एक छोटा-सा दरवाजा भी था जो इस समय भीतर की तरफ से अर्थात् कमलिनी की तरफ से बन्द था और कुमार को इस बात की कुछ भी खबर न थी।
रात पहर भर से ज्यादा जा चुकी थी। कुंअर इन्द्रजीतसिंह अपने पलंग पर लेटे हुए किशोरी और कमलिनी के विषय में तरह-तरह की बातें सोच रहे थे। उनके पास कोई दूसरा आदमी न था और एक तरह पर सन्नाटा छाया हुआ था, यकायक पीछे वाले कमरे का (जिसमें कमलिनी का डेरा था)दरवाजा खुला और अन्दर से एक लौंडी आती हुई दिखाई पड़ी।
कुमार ने चौंककर उसकी तरफ देखा और उसने हाथ जोड़कर अर्ज किया,"कमलिनीजी आपसे मिलना चाहती हैं, आज्ञा हो तो स्वयं यहाँ आवें या आप ही वहाँ
कुमार--वे कहां हैं?
लौंडी-(पिछले कमरे की तरफ बताकर) इसी कमरे में तो उनका डेरा है।
कुमार-(ताज्जुब से) इसी कमरे में! मुझे इस बात की कुछ भी खबर न थी। अच्छा मैं स्वयं चलता हूँ, तू इस कमरे का दरवाजा बन्द कर दे।
आज्ञा पाते ही लौंडी ने कुमार के कमरे का दरवाजा बन्द कर दिया जिसमें बाहर से कोई यकायक आ न जाय। इसके बाद इशारा पाकर लौंडी कमलिनी के कमरे की तरफ रवाना हुई और कुमार उसके पीछे-पीछे चले। चौखट के अन्दर पैर रखते ही कुमार की निगाह कमलिनी पर पड़ी और वे भौचक्के से होकर उसकी सूरत देखने लगे।
इस समय कमलिनी की सुन्दरता बनिस्बत पहले के बहुत ही बढ़ी-चढ़ी देखने में आई। पहले जिन दिनों कुमार ने कमलिनी की सूरत देखी थी, उन दिनों वह बिल्कुल उदासीन और मामूली ढंग पर रहा करती थी। मायारानी के झगड़े की बदौलत उसकी जान जोखिम में पड़ी हुई थी और इस कारण से दिमाग को एक पल के लिए भी छुट्टी नहीं मिलती थी। इन्हीं सब कारणों से उसके शरीर और चेहरे की रौनक में भी बहुत बड़ा फर्क पड़ गया था, तिस पर भी वह कुमार की सच्ची निगाह में एक ही दिखाई देती थी। फिर आज उसकी खुशी और खूबसूरती का क्या कहना है जब कि ईश्वर की कृपा से वह अपने तमाम दुश्मनों पर फतह पा चुकी है, तर दुदों के बोझ से हलकी हो चुकी है और मनमानी उम्मीदों के साथ अपने को बनाने-सँवारने का भी मुनासिब मौका उसे मिल गया है! यही सबब है कि इस समय वह रानियों की सी पोशाक और सजावट में दिखाई देती है।
कमलिनी की इस समय की खूबसूरती ने कुमार पर बहुत बड़ा असर किया और बनिस्बत पहले के इस समय बहुत ज्यादा कुमार के दिल पर अपना अधिकार जमा लिया,कुमार को देखते ही कमलिनी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुमार ने आगे बढ़कर बड़े प्रेम से उसका हाथ पकड़कर पूछा, "कहो, अच्छी तो हो?"
"अब भी अच्छी न होऊँगी!" कहकर मुस्कुराती हुई कमलिनी ने कुमार को ले जाकर एक ऊँची गद्दी पर बैठाया और आप भी उनके पास बैठकर यों बातचीत करने लगी।
कमलिनी-कहिये, तिलिस्म के अन्दर आपको किसी तरह की तकलीफ तो नहीं नहीं हुई
इन्द्रजीतसिंह-ईश्वर की कृपा से हम लोग कुशलपूर्वक यहाँ तक चले आये और अब तुम्हें धन्यवाद देते हैं, क्योंकि यह सब बातें हमें तुम्हारी ही बदौलत नसीब हुई हैं। अगर तुम मदद न करतीं तो न मालूम हम लोगों की क्या दशा होती! हमारे साथ तुमने जो कुछ उपकार किया है, उसका बदला चुकाना मेरी सामर्थ्य के बाहर है, सिवाय इसके मैं क्या कह सकता हूँ कि मेरी (अपनी छाती पर हाथ रख के) यह जान और शरीर तुम्हारा है।
कमलिनी-(मुस्कुरा कर) अब कृपा कर इन सब बातों को तो रहने दीजिए, क्योंकि इस समय मैंने इसलिए आपको तकलीफ नहीं दी है कि अपनी बढ़ाई सुनूं या आप पर अपना अधिकार जमाऊँ।
इन्द्रजीतसिंह--अधिकार तो तुमने उसी दिन मुझ पर जमा लिया जिस दिन ऐयार के हाथ से मेरी जान बचाई और मुझसे तलवार की लड़ाई लड़कर यह भी दिखा दिया कि मैं तुमसे ताकत में कम नहीं हूँ।
कमलिनी- (हँसकर) क्या खूब! मैं और आपका मुकाबला करूं!आपने मुझे भी क्या कोई पहलवान समझ लिया है?
इन्द्रजीतसिंह-आखिर बात क्या थी जो उस दिन मैं तुमसे हार गया था?
कमलिनी-आपको उस बेहोशी की दवा ने कमजोर और खराब कर दिया था जो एक अनाड़ी ऐयार की बनाई हुई थी। उस समय केवल आपको चैतन्य करने के लिए मैं लड़ पड़ी थी, नहीं तो कहाँ मैं और कहाँ आप!
इन्द्रजीतसिंह-खैर, ऐसा ही होगा। मगर इसमें तो कोई शक नहीं कि तुमने मेरी जान बचाई, केवल उसी दफे नहीं बल्कि उसके बाद भी कई दफे।
कमलिनी-छोड़िए भी, अव इन सब बातों को जाने दीजिये, मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहती। हाँ, यह बतलाइये कि तिलिस्म के अन्दर आपने क्या-क्या देखा, और क्या-क्या किया?
इन्द्रजीतसिंह- मैं सब हाल तुमसे कहूँगा, बल्कि उन नकाबपोशों की कैफियत भी तुमसे बयान करूंगा जो मुझे तिलिस्म के अन्दर कैद मिले और जिनका हाल अभी तक मैंने किसी से बयान नहीं किया। मगर तुम यह सब हाल अपनी जुबान से किसी से न कहना।
कमलिनी-बहुत खूब।
इसके बाद कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपना कुल हाल कमलिनी से बयान किया।और कमलिनी ने भी अपना पिछला किस्सा और उसी के साथ-साथ भूतनाथ, नानक तथा तारा वगैरह का हाल बयान किया जो कुमार को मालूम न था। इसके बाद पुनः उन।दोनों में यों बातचीत होने लगी-
इन्द्रजीतसिंह-आज तुम्हारी जुबानी बहुत-सी ऐसी बातें मालूम हुई हैं जिनके विषय में मैं कुछ भी नहीं जानता था।
कमलिनी-इसी तरह आपकी जुबानी उन नकाबपोशों का हाल सुनकर मेरी अजीब हालत हो रही है, क्या करूँ, आपने मना कर दिया है कि किसी से इस बात का जिक्र न करना, नहीं तो अपने सुयोग्य पति से उनके विषय में
इन्द्रजीतसिंह-(चौंककर) हैं! क्या तुम्हारी शादी हो गई?
कमलिनी—(कुमार के चेहरे का रंग उड़ा हुआ देख मुस्कुराकर) मैं अपने उस तालाब वाले मकान में अर्ज कर चुकी थी कि मेरी शादी बहुत जल्द होने वाली है!
इन्द्रजीतसिंह- (लम्बी सांस लेकर) हाँ, मुझे याद है, मगर यह उम्मीद न थी कि वह इतनी जल्दी हो जायगी।
कमलिनी-तो क्या आप मुझे हमेशा कुँआरी ही देखना पसन्द करते थे?
इन्द्रजीतसिंह-नहीं, ऐसा तो नहीं है, मगर
कमलिनी -मगर क्या? कहिए-कहिए, रुके क्यों?
इन्द्रजीतसिंह-यही कि मुझसे पूछ तो लिया होता।
कमलिनी-क्या खूब! आपने क्या मुझसे पूछकर इन्द्रानी के साथ शादी की थी जो मैं आपसे पूछ लेती!
इतना कहकर कमलिनी हँस पड़ी और कुमार ने शरमाकर सिर झुका लिया। मगर इस समय कुमार के चेहरे से भी मालूम होता था कि उन्हें हद दर्जे का रंज है और कलेजे में बेहिसाब तकलीफ हो रही है।
कुमार—(कमलिनी के पास से कुछ खिसककर) मुझे विश्वास था कि जन्म-भर तुमसे हँसने-बोलने का मौका मिलेगा।
कमलिनी-मेरे दिल में भी यही बात बैठी हुई थी और यही तय करके मैंने शादी की है कि आपसे कभी अलग होने की नौबत न आवे। मगर आप हट क्यों गये? आइये-आइये, जिस जगह बैठे थे, वहीं बैठिए।
कुमार-नहीं-नहीं, पराई स्त्री के साथ एकान्त में बैठना ही धर्म के विरुद्ध है न कि साथ सटकर, मगर आश्चर्य है कि तुम्हें इस बात का कुछ भी खयाल नहीं है! मुझे विश्वास था कि तुमसे कभी कोई काम धर्म के विरुद्ध न हो सकेगा।
कमलिनी–मुझमें आपने कौन-सी बात धर्म-विरुद्ध पाई?
कुमार—यही कि तुम इस तरह एकान्त में बैठकर मुझसे बातें कर रही हो इससे भी बढ़कर वह बात जो अभी तुमने अपनी जुबान से कबूल की है कि 'तुमसे कभी अलग न होऊँगी'। क्या यह धर्म-विरुद्ध नहीं है? क्या तुम्हारा पति इस बात को जानकर भी तुम्हें पतिव्रता कहेगा?
कमलिनी-कहेगा, और जरूर कहेगा। अगर न कहे तो इसमें उसकी भूल है। उसे निश्चय है और आप सच समझिये कि कमलिनी प्राण दे देना स्वीकार करेगी, परन्तु धर्म-विरुद्ध पथ पर चलना कदापि नहीं। आपको मेरी नीयत पर ध्यान देना चाहिए। दिल्लगी की बातों पर नहीं, क्योंकि मैं ऐयार भी हूँ। यदि मेरा पति इस समय यहाँ आ जाय तो आपको मालूम हो जाय कि मुझ पर वह जरा भी शक नहीं करता और मेरा इस तरह बैठना उसे कुछ भी नहीं अखरता।
कुमार—(कुछ सोचकर) ताज्जुब है!
कमलिनी-अभी क्या, आगे आपको और भी ताज्जुब होगा। इतना कहकर कमलिनी ने कुमार की कलाई पकड़ ली और अपनी तरफ खींचकर कहा, "पहले आप अपनी जगह पर आकर बैठ जाइये तब मुझसे बात कीजिए।"
कुमार-नहीं-नहीं कमलिनी, तुम्हें ऐसा उचित नहीं है। दुनिया में धर्म से बढ़कर और कोई वस्तु नहीं है। अतएव तुम्हें भी धर्म पर ध्यान रखना चाहिए। अब तुम स्वतन्त्र नहीं हो, पराये की स्त्री हो।
कमलिनी-यह सच है, परन्तु मैं आपसे पूछती हूँ कि यदि मेरी शादी आपके साथ होती तो क्या मैं आनन्दसिंह से हँसने-बोलने या दिल्लगी करने लायक न रहती?
कुमार—बेशक, उस हालत में तुम आनन्द से हँस-बोल और दिल्लगी भी कर सकती थीं, क्योंकि यह बात हम लोगों में लौकिक व्यवहार के ढंग पर प्रचलित है।
कमलिनी–बस, तो मैं आपसे भी उसी तरह हँस-बोल सकती हूँ और ऐसा करने के लिए मेरे पति ने मुझे आज्ञा भी दे दी है, मैं उनका पत्र आपको दिखा सकती हूँ इसलिए कि मेरा-आपका नाता ही ऐसा है, एक नहीं बल्कि तीन-तीन नाते हैं।
इन्द्रजीतसिंह–सो कैसे?
कमलिनी-सुनिये, मैं कहती हूँ। एक तो मैं किशोरी को अपनी बहिन समझती हूँ अतएव आप मेरे बहनोई हुए, कहिए कि हाँ।
कुमार —— यह कोई बात नहीं है, क्योंकि अभी किशोरी की शादी मेरे साथ नहीं हुई है।
कमलिनी –– खैर, जाने दीजिये। मैं दूसरा और तीसरा नाता बताती हूँ। जिनके साथ मेरी शादी हुई है, वे राजा गोपालसिंह के भाई हैं। इसके अतिरिक्त लक्ष्मीदेवी की मैं छोटी बहिन हूं अतएव आपकी साली भी हुई।
कुमार —— (कुछ सोचकर) हां, इस बात से तो मैं कायल हुआ। मगर तुम्हारी नीयत में किसी तरह फर्क न आना चाहिए।
कमलिनी —— इससे आप बेफिक्र रहिये। मैं अपना धर्म किसी तरह नहीं बिगाड़ सकती और न दुनिया में कोई ऐसा पैदा हुआ है जो मेरी नीयत बिगाड़ सके, आइए अब तो अपने ठिकाने पर बैठ जाइए।
लाचार कुंअर इन्द्रजीतसिंह अपने ठिकाने आ बैठे और पुनः बातचीत करने लगे, मगर उदास बहुत थे और यह बात उनके चेहरे से जाहिर हो रही थी।
यकायक कमलिनी ने मसखरेपन के साथ हँस दिया जिससे कुमार को खयाल हो गया कि इसने जो कुछ कहा सब झूठ और केवल दिल्लगी के लिए था। मगर साथ ही इसके उनके दिल का खुटका साफ नहीं हुआ।
कमलिनी -- अच्छा आप यह बताइए कि तिलिस्म की कैफियत देखने के लिए राजा साहब तिलिस्म के अन्दर जायेंगे या नहीं?
कुमार -- जरूर जायेंगे।
कमलिनी —— कब?
कुमार —— सो मैं ठीक नहीं कह सकता, शायद कल या परसों ही जायें। कहते थे कि तिलिस्म के अन्दर चलकर उसे देखने का इरादा है। इसके जवाब में भाई गोपालसिंह ने कहा कि कि जरूर और जल्द चलकर देखना चाहिए।
कमलिनी —— तो क्या हम लोगों को साथ ले जायेंगे?
कुमार —— सो मैं कैसे कहूँ? तुम गोपाल भाई से कहो, वह इसका बन्दोबस्त जरूर कर देंगे, मुझे तो कुछ शर्म मालूम होगी।
कमलिनी —— सो तो ठीक है, अच्छा, मैं कल उनसे कहूँगी।
कुमार ——- मगर तुम लोगों के साथ किशोरी भी अगर तिलिस्म के अन्दर जाकर वहाँ की कैफियत न देखेगी तो मुझे इस बात का रंज जरूर होगा।
कमलिनी —— बात तो वाजिब है, मगर वह इस मकान में तभी आवेगी जब उनकी शादी आपके साथ हो जायगी और इसीलिए वह अपने नाना के डेरे में भेज दी गई हैं। खैर, तो आप इस मामले को तब तक के लिए टाल दीजिए जब तक आपकी शादी न हो जाय।
कुमार —— मैं भी यही उचित समझता हूँ, अगर महाराज मान जायें तो।
कमलिनी —— या आप हम लोगों को फिर दूसरी दफे ले जायेगा।
कुमार -- हाँ, य. भी हो सकता है। अबकी दफे का वहाँ जाना महाराज की इच्छा पर ही छोड़ देना चाहिए, वे जिसे चाहें ले जायें।
कमलिनी -- बेशक, ऐसा ही ठीक होगा। अब तिलिस्म के अन्दर जाने में आपत्ति ही काहे की है, जब और जितनी दफे आप चाहेंगे हम लोगों को ले जायेंगे।
कुमार -- नहीं, सो बात ठीक नहीं। वहुत सी जगहें ऐसी हैं जहाँ सैकड़ों दफे जाने में भी कोई हर्ज नहीं है, मगर बहुत-सी जगहें तिलिस्म टूट जाने पर भी नाजुक हालत में बनी हुई हैं और जहाँ बार-बार जाना कठिन है, तथापि मैं तुम लोगों को वहाँ की सैर जरूर कराऊँगा।
कमलिनी–मैं समझती हूँ कि मेरे उस तालाब वाले तिलिस्मी मकान के नीचे भी कोई तिलिस्म जरूर है। उस खून से लिखी हुई तिलिस्मी किताब का मजमून पूरी तरह से मेरी समझ में नहीं आता था, तथापि इस ढंग की बातों पर कुछ शक जरूर होता था।
कुमार -- तुम्हारा ख्याल बहुत ठीक है, हम दोनों भाइयों को खून ने लिखी उस तिलिस्मी किताब के पढ़ने से बहुत ज्यादा हाल मालूम हुआ है, इसके अतिरिक्त मुझे तुम्हारा वह स्थान भी ज्यादा पसन्द है और पहले भी मैं (जब तुम्हारे पास वहाँ था) यह विचार कर चुका था कि 'सब कामों से निश्चिन्त होकर कुछ दिनों के लिए जरूर यहाँ डेरा जमाऊँगा, परन्तु अब मेरा वह विचार कुछ काम नहीं दे सकता।
कमलिनी -- सो क्यों?
कुमार -- इसलिए कि अगर तुम्हारी बातें ठीक हैं, तो अब वह स्थान तुम्हारे पति के अधिकार में होगा।
कमलिनी -- (मुस्कुराकर) तो क्या हर्ज है, मैं उनसे कहकर आपको दिला दूंगी।
कुमार -- मैं किसी से भीख मांगना पसन्द नहीं करता और न उनसे लड़कर वह स्थान छीन लेना ही मुझे मंजूर होगा। कमलिनी, सच तो ये है कि तुमने मुझे धोखा दिया और बहुत बड़ा धोखा दिया! मुझे तुमसे यह उम्मीद न थी। (कुछ सोचकर) एक दफे तुम मुझसे फिर कह दो कि सचमुच शादी हो गई।
इसके जवाब में कमलिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली, "हाँ, हो गई।"
कुमार -- मेरे सिर पर हाथ रखकर कसम खाओ।
कमलिनी —— (कुमार के पैरों पर हाथ रख के) आपसे मैं कसम खाकर कहती हूं कि मेरी शादी हो गई।
हम लिख नहीं सकते कि इस समय कुमार के दिल की कैसी बुरी हालत थी, रंज और अफसोस से उनका दिल बैठा जाता था और कमलिनी हँस-हँसकर चुटकियाँ लेती थी। बड़ी मुश्किल से कुमार थोड़ी देर तक और उसके पास बैठे और फिर उठकर लम्बी साँसें लेते हुए अपने कमरे में चले गए। रात भर उन्हें नींद न आई।
५
महाराज की आज्ञानुसार कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के विवाह की तैयारी बड़ी धूमधाम से हो रही है। यहां से चुनार तक की सड़कें दोनों तरफ जाफरी वाली टट्टियों से सजाई हैं, जिन पर रोशनी की जायेगी और जिनके बीच में थोड़ी-थोड़ी दूर पर बड़े फाटक बने हुए हैं और उन पर नौबतखाने का इन्तजाम किया गया है। टट्टियों के दोनों तरफ बाजार बसाया जायेगा, जिसकी तैयारी कारिन्दे लोग बड़ी खूबी और मुस्तैदी के साथ कर रहे हैं। इसी तरह और भी तरह-तरह के तमाशों का इन्तजाम बीच-बीच में हो रहा है, जिसके सबब से बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ होने की उम्मीद है और अभी से तमाशबीनों का जमावड़ा भी हो रहा है। रोशनी के साथ-साथ आतिशबाजी के इन्तजाम में भी बड़ी सरगर्मी दिखाई जा रही है, कोशिश हो रही है कि उम्दा से उम्दा तथा अनूठी आतिशबाजी का तमाशा लोगों को दिखाया जाये। इसी तरह और भी कई तरह के खेल-तमाशे और नाच इत्यादि का बन्दोबस्त हो रहा है, मगर इस समय हम इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है क्योंकि हम अपने पाठकों को उस तिलिस्मी मकान की तरफ ले चलना चाहते हैं, जहां भूतनाथ और देवीसिंह ने नकाबपोशों के फेर में पड़कर शर्मिन्दगी उठाई थी और जहाँ इस समय दोनों कुमार अपने दादा, पिता तथा और सब आपस वालों को तिलिस्मी तमाशा दिखाने के लिए ले जा रहे हैं।
सुबह का सुहावना समय है और ठंडी हवा चल रही है। जंगली फूलों की खुशबू से मस्त सुन्दर-सुन्दर रंग-बिरंगी खूबसूरत चिड़ियाएं हमारे सर्वगुण-सम्पन्न मुसाफिरों को मुबारकबाद दे रही हैं, जो तिलिस्म की सैर करने की नीयत से मीठी-मीठी बातें करते हुए जा रहे हैं।
घोड़े पर सवार महाराज सुरेन्द्रसिंह, राजा वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, गोपालसिंह, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा पैदल तेजसिंह, देवीसिंह, भूतनाथ, पंडित बद्रीनाथ, रामनारायण, पन्नालाल वगैरह अपने ऐयार लोग जा रहे थे। तिलिस्म के अन्दर मिले हुए कैदी अर्थात् नकाबपोश लोग तथा भैरोंसिंह और तारासिंह इस समय साथ न थे।इस समय देवीसिंह से ज्यादा भूतनाथ का कलेजा उछल रहा था और वह अपनी स्त्री का असली भेद जानने के लिए बेताब हो रहा है। जब से उसे इस बात का पता लगा कि वे दोनों सरदार नकाबपोश यही दोनों कुमार हैं तथा उस विचित्र मकान के मालिक भी यही हैं, तब से उसके दिल का खुटका कुछ कम तो हो गया, मगर खुलासा हाल जानने और पूछने का मौका न मिलने के सबब उसकी बेचैनी दूर नहीं हुई थी। वह यह भी जानना चाहता था कि अब उसकी स्त्री तथा लड़का हरनामसिंह किस फिक्र में हैं। इस समय जब वह फिर उसी ठिकाने जा रहा था, जहाँ अपनी स्त्री की बदौलत गिरफ्तार होकर अपने लड़के का विचित्र हाल देखा था, तब उसका दिल और बेचैन हो उठा था मगर साथ ही इसके उसे इस बात की भी उम्मीद हो रही थी कि अब उसे उसकी स्त्री का हाल मालूम हो जायेगा या कुछ पूछने का मौका ही मिलेगा।
ये लोग धीरे-धीरे बातचीत करते हुए उसी खोह या सुरंग की तरफ जा रहे थे।दिन पहर भर से ज्यादा न चढ़ा होगा, जब ये लोग उस ठिकाने पहुंच गए। महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह वगैरह घोड़ों पर से नीचे उतर पड़े, साईसों ने घोड़े थाम लिए और इसके बाद उन सभी ने सुरंग के अन्दर पैर रखा। इस सुरंग वाले रास्ते का कुछ खुलासा हाल हम इस सन्तति के उन्नीसवें भाग में लिख आये हैं, जब भूतनाथ यहाँ आया था, अब उसे पुनः दोहराने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती। हाँ, इतना लिख देना जरूरी जान पड़ता है कि दोनों कुमारों ने सभी को यह बात समझा दी कि यह रास्ता बन्द क्योंकर हो सकता है। बन्द होने का स्थान वही चबूतरा था जो सुरंग के बीच में पड़ता था।
जिस समय ये लोग सुरंग तय करके मैदान में पहुँचे, सामने वही छोटा बँगला दिखाई दिया, जिसका हाल हम पहले लिख चुके हैं। इस समय उस बँगले के आगे वाले दालान में दो नकाबपोश औरतें हाथ में तीर-कमान लिए टहलती पहरा दे रही थीं जिन्हें देखते ही खास करके भूतनाथ और देवीसिंह को बड़ा ताज्जुब हुआ और उनके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं। भूतनाथ का इशारा पाकर देवीसिंह ने कुंअर इन्द्र-जीतसिंह से पूछा, "ये दोनों नकाबपोश औरतें कौन हैं जो पहरा दे रही हैं?' इसके जवाब में कुमार तो चुप रह गए, मगर महाराज सुरेन्द्रसिंह ने कहा, "इसके जानने की तुम लोगों को क्या जल्दी पड़ी हुई है? जो कोई होंगी, सब मालूम ही हो जायेगा!"
इस जवाब ने देवीसिंह और भूतनाथ को देर तक के लिए चुप कर दिया और विश्वास दिला दिया कि महाराज को इनका हाल जरूर मालूम है। जब उन औरतों ने इन सभी को पहचाना और अपनी तरफ आते देखा, तो बैंगले के अन्दर घुसकर गायब हो गईं, तब तक ये लोग भी उस दालान में जा पहुँचे। इस जर भी यह बँगला उसी हालत में था जैसा कि भूतनाथ और देवीसिंह ने देखा था।
हम पहले लिख चुके हैं और अब भी लिखते हैं कि यह बंगला जैसा बाहर से सादा और साधारण मालूम होता था वैसा अन्दर से न था और यह बात दालान में पहुंचने के साथ ही सभी को मालूम हो गई। दालान की दीवारों में निहायत खूबसूरत और आलादर्जे की कारीगरी का नमूना दिखाने वाली तस्वीरों को देखकर सब कोई दंग हो गए और मुसौवर के हाथों की तारीफ करने लगे। ये तस्वीरें एक निहायत आलीशान इमारत की थीं और उसके ऊपर बड़े-बड़े हरफों में यह लिखा हुआ था-
"यह तिलिस्म चुनारगढ़ के पास ही एक निहायत खूबसूरत जंगल में कायम किया गया है, जिसे महाराज सुरेन्द्रसिंह के लड़के वीरेन्द्रसिंह तोड़ेंगे।"
इस तस्वीर को देखते ही सभी को विश्वास हो गया कि वह तिलिस्मी खंडहर जिसमें तिलिस्मी बगुला था और जिस पर इस समय निहायत आलीशान इमारत बनी हुई है पहले इसी शक्ल-सूरत में था, जिसे जमाने के हेर-फेर ने अच्छी तरह बर्वाद करके उजाड़ और भयानक बना दिया। इमारत की उस बड़ी और पूरी तस्वीर के नीचे उसके भीतर वाले छोटे-छोटे टुकड़े भी बनाकर दिखलाए गए थे और उस बगुले की तस्वीर भी बनी हुई थी जिसे राजा वीरेन्द्रसिंह ने बखूबी पहचान लिया और कहा, "बेशक अपने जमाने में वह बहुत अच्छी इमारत थी।"
सुरेन्द्रसिंह-यद्यपि आजकल जो इमारत तिलिस्मी खंडहर पर बनी है और जिसके बनवाने में जीतसिंह ने अपनी तबीयतदारी और कारीगरी का अच्छा नमूना दिखाया है, बुरी नहीं है, मगर हमें इस पहली इमारत का ढंग कुछ अनूठा और सुन्दर मालूम पड़ता है।
जीतसिंह-बेशक ऐसा ही है। यदि इस तस्वीर को मैं पहले देखे हुए होता तो जरूर इसी ढंग की इमारत बनवाता।
वीरेन्द्रसिंह-और ऐसा होने से वह तिलिस्म एक दफे नया मालूम पड़ता।
इन्द्रजीतसिंह--यह नारगढ़ वाला तिलिस्म साधारण नहीं बल्कि बहुत बड़ा है। नौगढ़, विजयगढ़ और जमानिया तक इसकी शाखा फैली हुई है। इस बँगले को इस बहुत बड़े और फैले तिलिस्म का 'केन्द्र' समझना चाहिए, बल्कि ऐसा भी कह सकते हैं कि यह बंगला तिलिस्म का नमूना है।
थोड़ी देर तक दालान में खड़े इसी किस्म की बातें होती रहीं और इसके बाद सभी को साथ लिए हुए दोनों कुमार बँगले के अन्दर रवाना हुए।
सदर दरवाजे का पर्दा उठाकर अन्दर जाते ही ये लोग एक गोल कमरे में पहुंचे,जो भूतनाथ और देवीसिंह का देखा हुआ था। इस गोल और गुम्बददार खूबसूरत कमरे की दीवारों पर जंगलों, पहाड़ों और रोहतासगढ़ की तस्वीरें बनी हुई थीं। घड़ी-घड़ी तारीफ न करके एक ही दफे लिख देना ठीक होगा कि इस बँगले में जितनी तस्वीरें देखने में आईं, सभी आला दर्जे की कारीगरी का नमूना थीं और यही मालूम होता था कि आज ही बनकर तैयार हुई हैं। इस रोहतासगढ़ की तस्वीर को देखकर सब कोई बड़े प्रसन्न हुए और राजा वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह की तरफ देखकर कहा, "रोहतासगढ़ किले और पहाड़ी की बहुत ठीक और साफ तस्वीर बनी हुई है।"
तेजसिंह-जंगल भी उसी ढंग का बना हुआ है, कहीं-कहीं से ही फर्क मालूम पड़ता है, नहीं तो बाज जगहें तो ऐसी बनी हुई हैं जैसी मैंने अपनी आँखों से देखी हैं।(उँगली का इशारा करके) देखिये यह वही कब्रिस्तान है जिस राह से हम लोग रोहतासगढ़ के तहखाने में घुसे थे। हाँ, यह देखिए, बारीफ हरफों में लिखा हआ भी है-"तहखाने में जाने का बाहरी फाटक।"
इन्द्रजीतसिंह--इस तस्वीर को अगर गौर से देखेंगे तो वहाँ का बहुत ज्यादा हाल मालूम होगा। जिस जमाने में यह इमारत तैयार हुई थी, उस जमाने में वहां की और उसके चारों तरफ की जैसी अवस्था थी, वैसी ही इस तस्वीर में दिखाई है,आज चाहे कुछ फर्क पड़ गया हो!
तेजसिंह-बेशक ऐसा ही है।
इन्द्रजीतसिंह-इसके अतिरिक्त एक और ताज्जुब की बात अर्ज करूंगा।
वीरेन्द्रसिंह-वह क्या?
इन्द्रजीतसिंह-इसी दीवार में से वहाँ (रोहतासगढ़) जाने का रास्ता भी है!
सुरेन्द्रसिंह-वाह-वाह! क्या तुम इस रास्ते को खोल भी सकते हो?
इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, हम लोग इसमें बहुत दूर तक जाकर घूम आये हैं।
सुरेन्द्रसिंह --यह भेद तुम्हें क्योंकर मालूम हुआ?
इन्द्रजीतसिंह--उसी 'रिक्तगन्थ' की बदौलत हम दोनों भाइयों को इन सब जगहों का हाल और भेद पूरा-पूरा मालूम हो चुका है। यदि आज्ञा हो तो दरवाजा खोलकर मैं आपको रोहतासगढ़ के तहखाने में ले जा सकता हूँ। वहाँ के तहखाने में भी एक छोटा-सा तिलिस्म है, जो इसी बड़े तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है और हम लोग उसे खोल या तोड़ भी सकते हैं परन्तु अभी तक ऐसा करने का इरादा नहीं किया।
सुरेन्द्रसिंह--उस रोहतासगढ़ वाले तिलिस्म के अन्दर क्या चीज है?
इन्द्रजीतसिंह-उसमें केवल अनूठे अद्भुत आश्चर्य गुण वाले हर्षे रखे हुए हैं,उन्हीं हरबों पर वह तिलिस्म बँधा है। जैसा तिलिस्मी खंजर हम लोगों के पास है या जैसे तिलिस्मी जिरह-बख्तर और हरबों की बदौलत राजा गोपालसिंह ने कृष्ण जिन्न का रूप धरा था, वैसे हरबों और असबाबों का तो वहां ढेर लगा हुआ है, हाँ, खजाना वहाँ कुछ भी नहीं है
सुरेन्द्रसिंह-ऐसे अनूठे हर्के खजाने से क्या कम हैं?
जीतसिंह–वेशक! (इन्द्रजीतसिंह से) जिस हिस्से को तुम दोनों भाइयों ने तोड़ा है, उसमें भी तो ऐसे अनूठे हरबे होंगे?
इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, मगर बहुत कम हैं।
वीरेन्द्रसिंह--अच्छा यदि ईश्वर की कृपा हुई तो फिर किसी मौके पर इस रास्ते से रोहतासगढ़ जाने का इरादा करेंगे। (मकान की सजावट और परदों की तरफ देखकर) क्या यह सब सामान, कन्दील, पर्दे और बिछावन वगैरह तुम लोग तिलिस्म के अन्दर से लाए थे?
इन्द्रजीतसिंह-जी नहीं, जब हम लोग यहां आए, तो इस बंगले को इसी तरह सजा-सजाया पाया और तीन-चार आदमियों को भी देखा जो इस बंगले की हिफाजत और मेरे आने का इन्तजार कर रहे थे।
सुरेन्द्रसिंह-(ताज्जुब से) वे लोग कौन थे और अब कहां हैं?
इन्द्रजीतसिंह--दरियाफ्त करने पर मालूम हुआ कि वे लोग इन्द्रदेव के मुलाजिम थे, जो इस समय अपने मालिक के पास चले गए हैं। इस तिलिस्म का दारोगा असल इन्द्रदेव है, और आज के पहले भी इसी के बुजुर्ग लोग दारोगा होते आए हैं।
सुरेन्द्रसिंह-यह तुमने बड़ी खुशी की बात सुनाई, मगर अफसोस यह है कि इन्द्रदेव ने हमें इन बातों की कुछ भी ख़बर न की। आनन्दसिंह-अगर इन्द्रदेव ने इन सब बातों को आपसे छिपाया, तो यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है, तिलिस्मी कायदे के मुताबिक ऐसा होना ही चाहिए था।
सुरेन्द्रसिंह --ठीक है, तो मालूम होता है कि यह सब सामान तुम्हारी खातिर-दारी के लिए इन्द्रदेव की आज्ञानुसार किया गया है।
आनन्दसिंह-जी हाँ, उसके आदमियों की जबानी मैंने भी यही सुना है।
इसके बाद बड़ी देर तक ये लोग इन तस्वीरों को देखते और ताज्जुब भरी बातें करते रहे और फिर आगे की तरफ बढ़े। जब पहले भूतनाथ और देवीसिंह यहाँ आये थे, तब हम लिख चुके हैं कि इस कमरे में सदर दरवाजे के अतिरिक्त और भी तीन दरवाजे थे—इत्यादि। अतः उन दोनों ऐयारों की तरह इस समय भी सभी को साथ लिए हुए दोनों कुमार दाहिनी तरफ वाले दरवाजे के अन्दर गए, और घूमते हुए उसी बहुत बड़े और आलीशान कमरे में पहुँचे, जिसमें पहले भूतनाथ और देवी सिंह ने पहुंच कर आश्चर्य-भरा तमाशा देखा था।
इस आलीशान कमरे की तस्वीरें खूबी और खूबसूरती में संब तस्वीरों से बढ़ी-चढ़ी थी तथा दीवारों पर जंगल, मैदान पहाड़, खोह, दरे, झरने, शिकारगाह तथा शहरपनाह, किले, मोर्चे और लड़ाई इत्यादि की बहुत तस्वीरें बनी हुई थीं, जिन्हें सब कोई गौर और ताज्जुब के साथ देखने लगे।
सुरेन्द्रसिंह-(किले की तरफ इशारा करके) यह तो चुनारगढ़ की तस्वीर है।
इन्द्रजीतसिंह—जी हाँ, (उँगली का इशारा करके) और यह जमानिया के किले तथा खास बाग की तस्वीर है। इसी दीवार में से वहाँ जाने का भी रास्ता है। महाराज सूर्यकान्त के जमाने में उनके शिकारगाह और जंगल की यह सूरत थी।
वीरेन्द्रसिंह-और यह लड़ाई की तस्वीर कैसी है? इसका क्या मतलब है?
इन्द्रजीतसिंह-इन तस्वीरों में बड़ी कारीगरी खर्च की गई है। महाराज सूर्य-कान्त ने अपनी फौज को जिस तरह की कवायद और व्यूह-रचना इत्यादि का ढंग सिखाया था वे सब बातें इन तस्वीरों में भरी हुई हैं। एक तरकीब करने से ये सब तस्वीरें चलती-फिरती और काम करती नजर आएँगी और साथ ही इसके फौजी बाजा भी बजता हुआ सुनाई देगा अर्थात् इन तस्वीरों में जितने बाजे वाले हैं वे सब भी अपना-अपना काम करते हुए मालूम पड़ेंगे, परन्तु इस फौजी तमाशे का आनन्द रात को मालूम पड़ेगा, दिन को नहीं। इन्हीं तस्वीरों के कारण इस कमरे का नाम 'व्यूह-मण्डल' रक्खा गया है, वह देखिए ऊपर की तरफ बड़े हरफों में लिखा हुआ है।
सुरेन्द्रसिंह--यह बहुत अच्छी कारीगरी है। इस तमाशे को हम जरूर देखेंगे बल्कि और भी कई आदमियों को दिखाएंगे।
इन्द्रदेव-बहुत अच्छा, रात हो जाने पर मैं इसका बन्दोबस्त करूँगा, तब तक आप और चीजों को देखें।
ये लोग जिस दरवाजे से इस कमरे में आये थे, उसके अतिरिक्त एक दरवाजा और भी था जिस राह से सभी को लिए दोनों कुमार दूसरे कमरे में पहुँचे। इस कमरे की दीवार बिल्कुल साफ थी अर्थात् उस पर किसी तरह की तस्वीर बनी हुई न थी। कमरे के बीचोंबीच दो चबूतरे संगमरमर के बने हुए थे जिसमें एक तो खाली था और दूसरे चबूतरे के ऊपर सफेद पत्थर की एक खूबसूरत पुतली बैठी हुई थी। इस जगह पर ठहर कर कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपने दादा और पिता की तरफ देखा और कहा,"नकाबपोशों की जुबानी हम लोगों का तिलिस्मी हाल जो कुछ आपने सुना है, वह तो याद ही होगा, अतः हम लोग पहली दफा तिलिस्म से बाहर निकलकर जिस सुहावनी घाटी में पहुंचे थे वह यही स्थान है।' इसी चबूतरे के अन्दर से हम लोग बाहर हुए थे।उस 'रिक्तगंथ' की बदौलत हम दोनों भाई यहाँ तक तो पहुँच गए मगर उसके बाद इस चबूतरे ले तिलिस्म को खोल न सके, हाँ इतना जरूर है कि उस'रिक्तगंथ' की बदौलत इस चबूतरे में से (जिस पर एक पुतली बैठी हुई थी उसकी तरफ इशारा करके) एक दूसरी किताब हाथ लगी जिसकी बदौलत हम लोगों ने उस चबूतरे वाले तिलिस्म को खोला और उसी राह से आपकी सेवा में जा पहुंचे।
"आप सुन चुके हैं कि जब हम दोनों भाई राजा गोपालसिंह को मायारानी की कैद से छुड़ा कर जमानिया के खास बाग वाले देवमन्दिर में गये थे तब वहाँ पहले आनन्द-सिंह तिलिस्म के फन्दे में फंस गये थे, उन्हें छुड़ाने के लिए जब मैं भी उसी गड़हे या कुएँ में कूद पड़ा तो चलता-चलता एक दूसरे बाग में पहुँचा जिसके बीचोंबीच में एक मन्दिर था। उस मन्दिर वाले तिलिस्म को जब मैंने तोड़ा तो वहाँ एक पुतली के अन्दर कोई चमकती हुई चीज मुझे मिली।"
वीरेन्द्रसिंह–हाँ, हमें याद है, उस मूरत को तुमने उखाड़ कर किसी कोठरी के अन्दर फेंक दिया था और वह फूट कर चूने की कली की तरह हो गई थी। उसी पेट में से...
इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ।
सुरेन्द्रसिंह-तो वह चमकती हुई चीज क्या थी और वह कहाँ है? इन्द्रजीतसिंह-वह हीरे की बनी हुई एक चाबी थी जो अभी तक मेरे पास मौजूद है, (जेब में से निकाल कर और महाराज को दिखा कर) देखिये, यही ताली इस पुतली के पेट में लगती है।
सभी ने उस चाबी को गौर से देखा और इन्द्रजीतसिंह ने सभी के देखते-देखते उस चबूतरे पर बैठी हुई पुतली की नाभि में वह ताली लगाई। उसका पेट छोटी आलमारी के पल्ले की तरह खुल गया।
इन्द्रजीतसिंह -बस इसी में से वह किताब मेरे हाथ लगी जिसकी बदौलत वह चबूतरे वाला तिलिस्म खोला।
सुरेन्द्रसिंह-अब वह किताब कहाँ है?
इन्द्रजीतसिंह-आनन्दसिंह के पास मौजूद है।
इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह की तरफ देखा और उन्होंने एक छोटी-सी किताब, जिसके अक्षर बहुत बारीक थे, महाराज के हाथ में दे दी।यह किताब भोजपत्र की थी जिसे महाराज ने बड़े गौर से देखा और दो-तीन जगहों से कुछ पढ़ कर आनन्दसिंह के हाथ में देते हुए कहा, "इसे निश्चिन्ती में एक दफा पढ़ेंगे।"
इन्द्रजीतसिंह—यह पुतलीवाला चबूतरा उस तिलिस्म में घुसने का दरवाजा है।
इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने उस पुतली के पेट में (जो खुल गया था)
डाल के कोई पेंच घुमाया जिससे चबूतरे के दाहिनी तरफ वाली दीवार किवाड़ के पल्ले की तरह धीरे-धीरे खुलं कर जमीन के साथ सट गई और नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं। इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर हाथ में लिया और उसका कब्जा दबा कर रोशनी करते हुए चबूतरे के अन्दर घुसे तथा सभी को अपने पीछे आने के लिए कहा। सभी के पीछे आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर की रोशनी करते हुए चबूतरे के अन्दर घुसे। लगभग पन्द्रह-बीस चक्करदार सीढ़ियों के नीचे उतरने के बाद ये लोग एक बहुत बड़े कमरे में पहुंचे जिसमें सोने-चांदी के सैकड़ों बड़े-बड़े हण्डे, अशफियों और जवाहिरात से भरे हुए पड़े थे जिन्हें सभी ने बड़े गौर और ताज्जुब के साथ देखा और महाराज ने कहा, "इस खजाने का अन्दाज करना भी मुश्किल है।"
इन्द्रजीतसिंह-जो कुछ खजाना इस तिलिस्म के अन्दर मैंने देखा और पाया है उसका यह पासंगा भी नहीं है। उसे बहुत जल्द ऐयार लोग आपके पास पहुँचावेंगे। उन्हीं के साथ-साथ कई चीजें दिल्लगी की भी हैं जिसमें एक चीज वह भी है जिसकी बदौलत हम लोग एक दफा हँसते-हँसते दीवार अन्दर कूद पड़े थे और मायारानी के हाथ में गिरफ्तार हो गए थे।
जीतसिंह-(ताज्जुब से) हाँ! अगर वह चीज शीघ्र बाहर निकाल ली जाय तो (सुरेन्द्रसिंह से) कुमारों की शादी में सर्वसाधारण को भी उसका तमाशा दिखाया जा सकता है।
सुरेन्द्रसिंह-बहुत अच्छी बात है, ऐसा ही होगा।
इन्द्रजीतसिंह-इस तिलिस्म में घुसने के पहले ही मैंने सभी का साथ छोड़ दिया अर्थात् नकाबपोशों को (कैदियों को) बाहर ही छोड़कर केवल हम दोनों भाई ही इसके अन्दर घुसे और काम करते हुए धीरे-धीरे आपकी सेवा में जा पहुंचे।
सुरेन्द्रसिंह-तो शायद उसी तरह हम लोग भी यह सब तमाशा देखते हुए उसी चबूतरे की राह बाहर निकलेंगे?
जीतसिंह--मगर क्या उन चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा न देखिएगा?
सुरेन्द्रसिंह--हाँ, ठीक है, उस तमाशे को तो जरूर देखेंगे।
इन्द्रजीत सिंह--तो अब यहाँ से लौट चलना चाहिए, क्योंकि इस कमरे के आगे बढ़कर फिर आज ही लौट आना कठिन है, इसके अतिरिक्त अब दिन भी थोड़ा ही रह गया है, संध्या-वन्दन और भोजन इत्यादि के लिए भी कुछ समय चाहिए और फिर उन तस्वीरों का तमाशा भी कम-से-कम चार-पांच घण्टे में पूरा होगा।
सुरेन्द्रसिंह-क्या हर्ज है, लौट चलो।
महाराज की आज्ञानुसार सब कोई वहाँ से लौटे और घूमते हुए बँगले के बाहर निकल आये, देखा तो वास्तव में दिन बहुत कम रह गया था।
६
रात आधे घण्टे से कुछ ज्यादा जा चुकी थी जब सब कोई अपने जरूरी कामों से निश्चिन्त हो बंगले के अन्दर घुसे और घूमते-फिरते उसी चलती-फिरती तस्वीरों वाले कमरे में पहुंचे। इस समय बँगले के अन्दर हर एक कमरे में रोशनी बखूबी हो रही थी जिसके विषय में भूतनाथ और देवीसिंह ने ताज्जुब के साथ खयाल किया कि यह काम बेशक उन्हीं लोगों का होगा जिन्हें यहाँ पहुँचने के साथ ही हम लोगों ने पहरा देते देखा था या जो हम लोगों को देखते ही बँगले के अन्दर घुसकर गायब हो गए थे। ताज्जुब है कि महाराज को तथा और लोगों को भी उनके विषय में कुछ खयाल नहीं है और न कोई पूछता ही है कि वे कौन थे और कहां गए, मगर हमारा दिल उनका हाल जाने बिना बेचैन हो रहा है।
चलती-फिरती तस्वीरों वाले कमरे में फर्श बिछा हुआ था और गद्दी लगी हुई थी जिस पर सब कोई कायदे से अपने-अपने ठिकाने पर बैठ गए और इसके बाद इन्द्रजीत-सिंह की आज्ञानुसार रोशनी गुल कर दी गई। कमरे में बिल्कुल अन्धकार छा गया, यह नहीं मालूम होता था कि कौन क्या कर रहा है, खास करके इन्द्रजीतसिंह की तरफ लोगों का ध्यान था जो इस तमाशे को दिखाने वाले थे, मगर कोई कह नहीं सकता था कि वह क्या कर रहे हैं।
थोड़ी ही देर बाद चारों तरफ की दीवारें चमकने लगीं और उन पर की कुल तस्वीरें बहुत साफ और बनिस्वत पहले के अच्छी तरह पर दिखाई देने लगी। पहले तो वे तस्वीरें केवल चित्रकारी ही मालूम पड़ती थीं परन्तु अब सचमुच की बातें दिखाई देने लगीं। मालूम होता था कि जैसे हम बहुत दूर से सच्चे किले, पहाड़, जंगल, मैदान,आदमी, जानवर और फौज इत्यादि को देख रहे हैं। सब कोई बड़े ताज्जुब के साथ इस कैफियत को देख रहे थे कि यकायक बाजे की आवाज कान में आई। उस समय सभी का ध्यान जमानिया के किले की तस्वीर पर जा पड़ा, जिधर से बाजे की आवाज आ रही थी। देखा कि-
एक बहुत बड़े मैदान में बेहिसाब फौज खड़ी है जिसके आमने-सामने दो हिस्से हैं मानो दो फौजें लड़ने के लिए तैयार खड़ी हैं। पैदल और सवार दोनों तरह की फौजें हैं तथा तोप इत्यादि और भी जो कुछ सामान फौज में होना चाहिए, सब मौजूद है। इन दोनों फौजों में एक की पोशाक सुर्ख और दूसरे की आसमानी थी। वाजे की आवज केवल सुर्ख वर्दी वाली फौज में से आ रही थी बल्कि बाजे वाले अपना काम करते हुए साफ दिखाई दे रहे थे। यकायक सुर्ख वर्दी वाली फौज हिलती हुई दिखाई पड़ी। गौर करने पर मालूम हुआ कि सिपाहियों का मुंह घूम गया है और वे दाहिनी तरफ वाली एक पहाड़ी की तरफ तेजी के साथ बाजे की गत पर पैर रखते हुए जा रहे हैं। जैसे-जैसे फौज दूर होती जाती, वैसे ही वैसे बाजे की आवाज भी दूर होती जाती थी। देखते-ही-देखते वह फौज मानो कोसों दूर निकल गई और एक पहाड़ी के पीछे की तरफ जाकर आँखों की ओट हो गई। अब यह मैदान ज्यादा खुलासा दिखाई देने लगा। जितनी जगह दोनों फौजों से भरी थी, वह एक फौज के हिस्से में रह गई। अब दूसरी अर्थात् आसमानी वर्दी वाली फौज में से बाजे की आवाज आने लगी और सवार तथा पैदल भी चलते हुए दिखाई देने लगे। एक सवार हाथ में झंडा लिए तेजी के साथ घोड़ा दौड़ा कर मैदान में आ खड़ा हुआ और झंडे के इशारे से फौज को कवायद कराने लगा। यह
कवायद घण्टे भर तक होती रही और इस बीच में आला दर्जे की होशियारी, चालाकी,मुस्तैदी, सफाई और बहादुरी दिखाई दी जिससे सब कोई बहुत ही खुश हुए और महाराज बोले, "बेशक फौज को ऐसा ही तैयार करना चाहिए।"कवायद खतम करने के बाद बाजा बन्द हुआ और वह फौज एक तरफ को रवाना हुई, मगर थोड़ी ही दूर गई होगी कि उस लाल वर्दी वाली फौज ने यकायक पहाड़ी के पीछे से निकल कर इस फौज पर धावा मारा। इस कैफियत को देखते ही आसमानी वर्दी वाली फौज के अफसर होशियार हो गए, झंडे का इशारा पाते ही बाजा पुनःबजने लगा, और फौजी सिपाही लड़ने के लिए तैयार हो गये। इस बीच में वह फौज भी आ पहुंची और दोनों में घमासान लड़ाई होने लगी।
इस कैफियत को देखकर महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, जीतसिंह,तेजसिंह वगैरह तथा ऐयार लोग हैरान हो गए और हद से ज्यादा ताज्जुब करने लगे। लड़ाई के फन की ऐसी कोई बात नहीं बच गई थी जो इसमें न दिखाई पड़ी हो। कई तरह की घुसबन्दी और किलेबन्दी के साथ ही साथ घुड़सवारों की कारीगरी ने सभी को सकते में डाल दिया और सभी के मुंह से बार-बार 'वाह-वाह' की आवाज निकलती रही। यह तमाशा कई घण्टे में खत्म हुआ और इसके बाद एकदम से अन्धकार हो गया,उस समय इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर की रोशनी की और देवीसिंह ने इशारा पाकर कमरे में रोणनी कर दी जो पहले बुझा दी गई थी।
इस समय रात थोड़ी-सी बच गई थी जो सभी ने सोकर बिता दी, मगर स्वप्न में भी इसी तरह के खेल-तमाशे देखते रहे। जब सब की आँखें खुली तो दिन घण्टे भर से ज्यादा चढ़ चुका था। घबड़ा कर सब कोई उठ खड़े हुए और कमरे के बाहर निकल कर जरूरी कामों से छुट्टी पाने का बन्दोबस्त करने लगे। इस समय जिन चीजों की सभी को जरूरत पड़ी वे सब चीजें वहाँ मौजूद पाई गईं, मगर उन दोनों स्त्रियों पर किसी की निगाह न पड़ी जिन्हें यहाँ आने के साथ ही सभी ने देखा था।
७
जरूरी कामों से छुट्टी पाकर ऐयारों ने रसोई बनाई, क्योंकि इस बंगले में खाने-पीने की सभी चीजें मौजूद थीं और सभी ने खुशी-खुशी भोजन किया। इसके बाद सब कोई उसी कमरे में आ बैठे जिसमें रात को चलती-फिरती तस्वीरों का तमाशा देखा था। इस समय भी सभी की निगाहें ताज्जुब के साथ उन्हीं तस्वीरों पर पड़ रही थीं।
सुरेन्द्रसिंह --- मैं बहुत गौर कर चुका मगर अभी तक समझ में न आया कि इन तस्वीरों में किस तरह की कारीगरी खर्च की गई है जो ऐसा तमाशा दिखाती हैं। अगर मैं अपनी आँखों से इस तमाशे को देखे हुए न होता और कोई गैर आदमी मेरे सामने ऐसे तमाशे का जिक्र करता तो मैं उसे पागल ही समझता, मगर अब स्वयं देख लेने पर भी विश्वास नहीं होता कि दीवार पर लिखी तस्वीरें इस तरह काम करेंगी।
जीतसिंह --- बेशक ऐसी ही बात है। इतना देखकर भी किसी के सामने यह कहने का हौसला न होगा कि मैंने ऐसा तमाशा देखा था और सुनने वाला भी कभी विश्वास न करेगा।
ज्योतिषीजी --- आखिर यह एक तिलिस्म ही है, इसमें सभी बातें आश्चर्य की ही दिखायी देती हैं।
जीतसिंह --– चाहे यह तिलिस्म हो मगर इसके बनाने वाले तो आदमी ही थे। जो बात मनुष्य के किये नहीं हो सकती वह तिलिस्म में भी नहीं दिखाई दे सकती।
गोपालसिंह --- आपका कहना बहुत ठीक है, तिलिस्म की बातें चाहे कैसा ही ताज्जुब पैदा करने वाली क्यों न हों मगर गौर करने से उनकी कारीगरी का पता लग ही जायगा। आपने बहुत ठीक कहा, आखिर तिलिस्म के बनानेवाले भी तो मनुष्य ही थे!
वीरेन्द्रसिंह --- जब तक समझ में न आवे तब तक उसे चाहे कोई जादू कहे या करामात कहे मगर हम लोग सिवाय कारीगरी के कुछ भी नहीं कह सकते और पता लगाने तथा भेद मालूम हो जाने पर यह बात सिद्ध हो ही जाती है। इन चित्रों की कारीगरी पर भी अगर गौर किया जायगा तो कुछ न कुछ पता लग ही जायगा। ताज्जुब नहीं कि इन्द्रजीतसिंह को इसका भेद मालूम हो।
सुरेन्द्रसिंह --- बेशक इन्द्रजीत को इसका भेद मालूम होगा ही। (इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर) तुमने किस तरकीब से इन तस्वीरों को चलाया था?
इन्द्रजीतसिंह --- (मुस्कुराते हुए) मैं आपसे अर्ज करूँगा और यह भी बताऊंगा कि इसमें भेद क्या है। मालूम हो जाने पर आप इसे एक साधारण बात ही समझेंगे। पहली दफा जब मैंने इस तमाशे को देखा था, तो मुझे भी बड़ा ही ताज्जुब पैदा हुआ था, मगर तिलिस्मी किताब की मदद से जब मैं इस दीवार के अन्दर पहुँचा तो सब भेद खुल गया।
सुरेन्द्रसिंह --- (खुश होकर) तब तो हम लोग बेकार ही परेशान हो रहे हैं और इतना सोच-विचार कर रहे हैं। तुम अब तक चुप क्यों थे?
गोपालसिंह --- ऐयारों की तबीयत देख रहे थे।
सुरेन्द्रसिंह --- खैर बताओ तो सही कि इसमें क्या कारीगरी है?
इतना सुनते ही इन्द्रजीतसिंह उठ कर उस दीवार के पास चले गये और सुरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर बोले, "आप जरा तकलीफ कीजिए तो मैं इस भेद को भी समझा दूं!"
महाराज सुरेन्द्रसिंह उठकर कुमार के पास चले गये और उनके पीछे-पीछे और लोग भी वहाँ जाकर खड़े हो गये। इन्द्रजीतसिंह ने दीवार पर हाथ फेरकर सुरेन्द्रसिंह से कहा, "देखिये, असल में इस दीवार पर किसी तरह की चित्रकारी या तस्वीर नहीं है, दीवार साफ है और वास्तव में शीशे की है, तस्वीरें जो दिखाई देती हैं वे इसके अन्दर और दीवार से अलग हैं।"
कुमार की बात सुनकर सभी ने ताज्जुब के साथ उस दीदार पर हाथ फेरा और जीतसिंह ने खुश होकर कहा-"ठीक है, अब हम इस कारीगरी को समझ गए! ये तस्वीरें अलग-अलग किसी धातु के टुकड़ों पर बनी हुई हैं और ताज्जुब नहीं कि तार या कमानी पर जड़ी हों, किसी तरह की शक्ति पाकर उस तार या कमानी में हरकत होती है और उस समय ये तस्वीरें चलती हुई दिखाई देती हैं।"
इन्द्रजीतसिंह --- बेशक यही बात है, देखिये, अब मैं इन्हें फिर चलाकर आपको दिखाता हूँ और इसके बाद दीवार के अन्दर ले चलकर सब भ्रम दूर कर दूंगा।
इस दीवार में जिस जगह जमानिया के किले की तस्वीर बनी थी, उसी जगह किले के तुर्ज के ठिकाने पर कई सूराख भी दिखाये गये थे जिनमें से एक छेद (सूराख) वास्तव में सच्चा था पर वह केवल इतना ही लम्बा-चौड़ा था कि एक मामूली खंजर का कुछ हिस्सा उसके अन्दर जा सकता था इन्द्रजीतसिंह ने कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल कर उसके अन्दर डाल दिया और महाराज सुरेन्द्रसिंह तथा जीतसिंह की तरफ देखकर कहा "इस दीवार के अन्दर जो पुर्जे बने हैं, वे बिजली का असर पहुँचने ही से चलनेफिरने या हिलने लगते हैं। इस तिलिस्मी खंजर में आप जानते ही हैं कि पूरे दर्जे की बिजली भरी हुई है, अस्तु, उन पुों के साथ इनका संयोग होने ही से काम हो जाता है।
इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह चुपचाप खड़े हो गये और सभी ने बड़े गौर से उन तस्वीरों को देखना शुरू किया बल्कि महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्र सिंह, जीतसिंह, तेजसिंह और राजा गोपालसिंह ने तो कई तस्वीरों के ऊपर हाथ भी रख दिया। इतने ही में दीवार चमकने लगी और इसके बाद तस्वीरों ने वही रंगत पैदा की जो हम ऊपर के बयान में लिख आये हैं। महाराज और राजा गोपालसिंह वगैरह ने जो अपना हाथ तस्वीरों पर रख दिया था वह ज्यों का त्यों बना रहा और तस्वीरें उनके हाथों के नीचे से निकलकर इधर-उधर आने-जाने लगी जिसका असर उनके हाथों पर कुछ भी नहीं होता था। इस सबब से सभी को निश्चय हो गया कि उन तस्वीरों का इस दीवार के साथ कोई सम्बन्ध नहीं। इस बीच में कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अपना तिलिस्मी खंजर दीवार के अन्दर से खींच लिया। उसी समय दीवार का चमकना बन्द हो गया और तस्वीरें जहाँ की तहाँ खड़ी हो गई अर्थात् जो जितनी चल चुकी थीं, उतनी ही चलकर रुक गई। दीवार पर गौर करने से मालूम होता था कि तस्वीरें पहले ढंग की नहीं बल्कि दूसरे ही ढंग की बनी हुई हैं।
जीतसिंह --- यह भी बड़े मजे की बात है, लोगों को तस्वीरों के विषय में धोखा देने और ताज्जुब में डालने के लिए इससे बढ़कर कोई खेल नहीं हो सकता।
तेजसिंह --- जी हाँ, एक दिन में पचासों तरह की तस्वीरें इस दीवार पर लोगों को दिखा सकते हैं, पता लगना तो दूर रहा गुमान भी नहीं हो सकता कि यह क्या मामला है और ऐसी अनूठी तस्वीरें नित्य क्यों बन जाती हैं।
सुरेन्द्रसिंह --- बेशक यह खेल मुझे बहुत अच्छा माल्म हुआ। परन्तु अब इन तस्वीरों को ठीक अपने ठिकाने पर पहुँचाकर छोड़ देना चाहिए।
"बहुत अच्छा" कहकर इन्द्रजीतसिंह आगे बढ़ गये और पुनः तिलिस्मी खंजर उसी सूराख में डाल दिया जिससे उसी तरह दीवार चमकने और तस्वीरें चलने लगीं। ताज्जुब के साथ लोग उसका तमाशा देखते रहे। कई घण्टे के बाद जब तस्वीरों की यह लीला समाप्त हुई और एक विचित्र ढंग के खटके की आवाज आई, तब इन्द्रजीतसिंह ने दीवार के अन्दर से तिलिस्मी खंजर निकाल लिया और दीवार का चमकना भी बन्द हो गया।
इस तमाशे से छुट्टी पाकर महाराज सुरेन्द्र सिंह ने इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कहा, "अब हम लोगों को इस दीवार के अन्दर ले चलो।"
इन्द्रजीतसिंह --- जो आज्ञा, पहले बाहर से जांच कर आप अन्दाजा कर लें कि यह दीवार कितनी मोटी है।
सुरेन्द्रसिंह --- इसका अन्दाज हमें मिल चुका है, दूसरे कमरे में जाने के लिए इसी दीवार में जो दरवाजा है उसकी मोटाई से पता लग जाता है जिस पर हमने गौर किया है।
इन्द्रजीतसिंह --- अच्छा तो अब एक दफे आप पुनः उसी दूसरे कमरे में चलें क्यों कि इस दीवार के अन्दर जाने का रास्ता उधर ही से है।
इन्द्रजीतसिंह की बात सुनकर महाराज सुरेन्द्रसिंह तथा और सब लोग उठ खड़े हुए और कुमार के साथ-साथ पुनः उसी कमरे में गए जिसमें दो चबूतरे बने हुए थे।
इस कमरे में तस्वीर वाले कमरे की तरफ जो दीवार थी, उसमें एक आलमारी का निशान दिखाई दे रहा था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक खूटी गड़ी हुई थी जिसे इन्द्रजीतसिंह ने उमेठना शुरू किया। तीस-पैंतीस दफे उमेठ कर अलग हो गए और दूर खड़े होकर उस निशान की तरफ देखने लगे। थोड़ी देर बाद वह आलमारी हिलती हुई मालूम पड़ी और फिर यकायक उसके दोनों पल्ले दरवाजे की तरह खुल गए। साथ ही उसके अन्दर से दो औरतें निकलती हुई दिखाई पड़ी जिनमें एक तो भूतनाथ की स्त्री थी और दूसरी देवीसिंह की स्त्री चम्पा। दोनों औरतों पर निगाह पड़ते ही भूतनाथ और देवीसिंह चमक उठे और उनके ताज्जुब की कोई हद न रही, साथ ही इसके दोनों ऐयारों को क्रोध भी चढ़ आया और लाल-लाल आँखें करके उन औरतों की तरफ देखने लगे। उन्हीं के साथ-ही-साथ और लोगों ने भी ताज्जुब के साथ उन औरतों को देखा।
इस समय उन दोनों औरतों का चेहरा नकाब से खाली था, मगर भूतनाथ और देवीसिंह के चेहरे पर निगाह पड़ते ही उन दोनों ने आँचल से अपना चेहरा छिपा लिया और पलट कर पुनः उसी आलमारी के अन्दर जा लोगों की निगाह से गायब हो गईं। उनकी इस करतूत ने भूतनाथ और देवीसिंह के क्रोध को और भी बढ़ा दिया।
८
अब हम पीछे की तरफ लौटते हैं और पुनः उस दिन का हाल लिखते हैं जिस दिन महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह वगैरह तिलिस्मी तमाशा देखने के लिए रवाना हुए हैं। हम ऊपर के बयान में लिख आये हैं कि उस समय महाराज और कुमार लोगों के साथ भैरोंसिंह और तारासिंह न थे, अर्थात् वे दोनों घर पर ही रह गए थे, अतः इस समय उन्हीं दोनों का हाल लिखना बहुत जरूरी हो गया है।
महाराज सुरेन्द्र सिंह, वीरेन्द्रसिंह, कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह वगैरह के पचले जाने के बाद भैरोंसिंह अपनी मां से मिलने के लिए तारासिंह को साथ लिए हुए महल में गये। उस समय चपला अपनी प्यारी सखी चम्पा के कमरे में बैठी हुई धीरे-धीरे कुछ बातें कर रही थी जो भैरोंसिंह और तारासिंह को आते देख चुप हो गई और इन दोनों की तरफ देखकर वोली, "क्या महाराज तिलिस्मी तमाशा देखने के लिए गए?"
भैरोंसिंह -- हाँ, अभी थोड़ी ही देर हुई है कि वे लोग उसी पहाड़ी की तरफ रवाना हो गए।
चपला-(चम्पा से) तो अब तुम्हें भी तैयार हो जाना पड़ेगा।
चम्पा-जरूर, मगर तुम भी क्यों नहीं चलती?
चपला- जी तो मेरा यही चाहता है मगर मामा साहब की आज्ञा हो तब तो!
चम्पा -जहाँ तक मैं खयाल करती हूँ, वे कभी इनकार न करेंगे।बहिन, जब से मुझे यह मालूम हुआ कि इन्द्रदेव तुम्हारे मामा होते हैं तब से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।
चपला--मगर मेरी खुशी का तुम अन्दाजा नहीं कर सकती, खैर, इस समय असल काम की तरफ ध्यान देना चाहिए। (भैरोंसिंह और तारासिंह की तरफ देखकर) कहो, तुम लोग इस समय यहाँ कैसे आये?तारासिंह-(चपला के हाथ में एक पुर्जा देकर) जो कुछ है, इसी से मालूम हो जायगा।
चपला ने तारासिंह के हाथ से पुर्जा लेकर पढ़ा और फिर चम्पा के हाथ में देकर कहा, "अच्छा, जाओ कह दो कि हम लोगों के लिए किसी तरह का तर दुद न करें, मैं अभी जाकर कमलिनी और लक्ष्मीदेवी से मुलाकात करके सब वातें तय कर लेती हूँ।" "बहुत अच्छा" कहकर भैरोंसिंह और तारासिंह वहाँ से रवाना हुए और इन्द्रदेव डरे की तरफ चले गये।
जिस समय महाराज सुरेन्द्रसिंह वगैहर तिलिस्मी कैफियत देखने के लिए रवाना हुए हैं उसके दो या तीन घड़ी बाद घोड़े पर सवार इन्द्रदेव भी अपने चेहरे पर नकाब डाले उसी पहाड़ी की तरफ रवाना हुए मगर वे अकेले न थे, बल्कि और भी तीन नकाबपोश उनके साथ थे। जब ये चारों आदमी उस पहाड़ी के पास पहुंच गए तो कुछ देर के लिए रुके और आपस में यों बातचीत करने लगे-
इन्द्रदेव-ताज्जुब है कि अभी तक हमारे आदमी लोग यहां नहीं पहुंचे।
दूसरा-और जब तक वे लोग न आवेंगे तब तक हमें यहाँ अटकना पड़ेगा।
इन्द्रदेव-बेशक!
तीसरा-व्यर्थ यहाँ अटके रहना तो अच्छा न होगा।
इन्द्रदेव-तब क्या किया जाय?
तीसरा-आप लोग जल्दी से वहाँ पहुँचकर अपना काम कीजिये और मुझे अकेले इसी जगह छोड़ दीजिए, मैं आपके आदमियों का इन्तजार करूँगा और जब वे आ जायेंगे तो सब चीजें लिए आपके पास पहुँच जाऊँगा।
इन्द्रदेव-अच्छी बात है, मगर उन सब चीजों को क्या तुम अकेले उठा लोगे?
तीसरा-उन सब चीजों की क्या हकीकत है, कहिए तो आपके आदमियों को भी उन चीजों के साथ पीठ पर लाद कर लेता आऊँ।
इन्द्रदेव-शाबाश! अच्छा रास्ता तो न भूलोगे?
तीसरा-कदापि नहीं, अगर मेरी आँखों पर पट्टी बाँध कर भी आप वहाँ तक ले गये होते तब भी मैं रास्ता न भूलता और टटोलता हुआ वहाँ तक पहुंच ही जाता।
इन्द्रदेव-(हँस कर) बेशक तुम्हारी चालाकी के आगे यह कोई कठिन काम नहीं है। अच्छा हम लोग जाते हैं, तुम सब चीजें लेकर हमारे आदमियों को फौरन वापस कर देना।
इतना कह कर इन्द्रदेव ने उस तीसरे नकाबपोश को उसी जगह छोड़ा और दो नकाबपोशों को साथ लिए हुए आगे की तरफ बढ़े।
जिस सुरंग की राह से राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह उस तिलिस्मी बँगले में गये थे उससे लगभग आध कोस उत्तर को हटकर और भी एक सुरंग का छोटा सा मुहाना था जिसका बाहरी हिस्सा जंगली लताओं और बेलों से बहुत ही छिपा हुआ था। इन्द्रदेव दोनों नकाबपोशों को साथ लिए तथा पेड़ों की आड़ देकर चलते हुए इसी दूसरी सुरंग के मुहाने पर पहुंचे और जंगली लताओं को हटा कर बड़ी होशियारी से इस सुरंग के अन्दर घुस गये।
९
देवीसिंह को चम्पा की सचाई पर भरोसा था और वह उसे बहुत ही नेक तथा पतिव्रता भी समझते थे, जिस पर चम्पा ने देवीसिंह के चरणों की कसम खाकर विश्वास दिला दिया था कि वह नकाबपोशों के घर में नहीं गई और कोई सबब न था कि देवीसिंह चम्पा की बात झूठ समझते। इस जगह यद्यपि देवीसिंह पुनः चम्पा को देखकर क्रोध में आ गये थे, मगर तुरन्त ही नीचे लिखी बातें विचार कर ठण्डे हो गये और सोचने लगे-
"क्या मुझे पहचानने में धोखा हुआ? नहीं-नहीं, मेरी आँखें ऐसी गन्दी नहीं है। तो क्या वास्तव में वह चम्पा ही थी जिसे अभी मैंने देखा या पहले भी देखा था!
यह भी नहीं हो सकता! चम्पा जैसी नेक औरत कसम खाकर मुझसे झूठ भी नहीं बोल सकती। हाँ, उसने क्या कसम खाई थी? यही कि "मैं आपके चरणों की कसम खाकर कहती हूँ कि मुझे कुछ भी याद नहीं कि आप कव की बात कर रहे हैं।" ये ही उसके शब्द हैं, मगर यह कसम तो ठीक नहीं। यहां आने के बारे में उसने कसम नहीं खाई बल्कि अपनी याद के बारे में कसम खाई है, जिसे ठीक नहीं भी कह सकते। तो क्या उसने वास्तव में मुझे भूलभुलैये में डाल रक्खा हैं? खैर यदि ऐसा भी हो तो मुझे रंज न होना चाहिए क्योंकि वह नेक है। यदि ऐसा किया भी होगा तो किसी अच्छे ही मतलब से किया होगा या फिर कुमारों की आज्ञा से किया होगा।'
ऐसी बातों को सोचकर देवीसिंह ने अपने क्रोध को ठण्डा किया, मगर भूतनाथ की बेचैनी दूर नहीं हुई।
वे दोनों औरतें जब आलमारी के अन्दर घुसकर गायब हो गई तब हमारे दोनों कुमार तथा महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह ने भी उसके अन्दर पैर रक्खा। दरवाजे के साथ दाहिनी तरफ एक तहखाने के अन्दर जाने का रास्ता था जिसके बारे में दरियाफ्त करने पर इन्द्रजीतसिंह ने बयान किया कि “यह जमानिया जाने का रास्ता है, तहखाने में उतर जाने के बाद एक सुरंग मिलेगी जो बराबर जमानिया तक चली गई है।" इन्द्रजीतसिंह की बात सुनकर देवीसिंह और भूतनाथ को विश्वास हो गया कि दोनों औरतें इसी तहखाने में उतर गई हैं जिससे उन्हें भागने के लिए काफी जगह मिल सकती है। भूतनाथ ने देवीसिंह की तरफ देखकर इशारे से कहा कि "इस तहखाने में चलना चाहिए।" मगर जवाब में देवीसिंह ने इशारे से ही इनकार करके अपनी लापरवाही जाहिर कर दी।
उस दीवार के अन्दर इतनी जगह न थी कि सब कोई एक साथ ही जाकर वहाँ की कैफियत देख सकते, अतएव दो-तीन दफे करके सब कोई उसके अन्दर गये और उन सब पुरजों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए जिनके सहारे वे तस्वीरें चलती-फिरती और काम करती थीं। जब सब लोग उस कैफियत को देख चुके तब उस दीवार का दरवाजा बंद कर दिया गय।।
इस काम से छुट्टी पाकर सब लोग इन्द्रजीत सिंह की इच्छानुसार उस चबूतरे के पास आए जिस पर सुफेद पत्थर की खूबसूरत पुतली बैठी हुई थी। इन्द्रजीतसिंह ने सुरेन्द्र सिंह की तरफ देखकर कहा, "यदि आज्ञा हो तो मैं इस दरवाजे को खोलूं और आपको तिलिस्म के अन्दर ले चलू।"
सुरेन्द्र सिंह--हम भी यही चाहते हैं कि अब तिलिस्म के अन्दर चलकर वहाँ की कैफियत देखें, मगर यह तो बताओ कि जब इस चबूतरे के अन्दर जाने के बाद हम यह तिलिस्म देखते हुए चुनारगढ़ वाले तिलिस्म की तरफ रवाना होंगे, तो वहां पहुंचने में कितनी देर लगेगी?
इन्द्रजीतसिंह--कम-से-कम बारह घण्टे। तमाशा देखने के सबब से यदि इससे ज्यादा देर हो जाय तो भी कोई ताज्जब नहीं।
सुरेन्द्र सिंह--रात हो जाने के सबब किसी तरह का हर्ज तो न होगा?
इन्द्रजीतसिंह-कुछ भी नहीं! रात-भर बराबर तमाशा देखते हुए हम लोग चले जा सकते हैं।
सुरेन्द्र सिंह-खैर, तब तो कोई हर्ज नहीं।
इन्द्रजीतसिंह ने पुतली वाले चबूतरे का दरवाजा उसी ढंग से खोला जैसे पहले खोल चुके थे और सभी को लिए हुए नीचे वाले तहखाने में पहुंचे, जिसमें बड़े-बड़े हण्डे अफियों और जवाहरात से भरे हुए रखे थे।
इस कमरे में दो दरवाजे भी थे जिनमें से एक तो खुला हुआ था और दूसरा बन्द। खुले हुए दरवाजे के बारे में दरियाफ्त करने पर कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने बयान किया कि यह रास्ता जमानिया को गया है और हम दोनों भाई तिलिस्म तोड़ते हुए इसी राह से आये हैं। यहाँ से बहुत दूर पर एक स्थान है जिसका नाम तिलिस्मी किताब में 'ब्रह्म-मण्डल' लिखा हुआ है, उस जगह से भी मुझे एक छोटी-सी किताब मिली थी जिसमें इस विचित्र बँगले का पूरा हाल लिखा हुआ था कि तिलिस्म (चुनारगढ़ वाला) तोड़ने वाले के लिए क्या-क्या जरूरी है। उस किताब को चुनारगढ़ तिलिस्म की चाबी कहें तो अनुचित न होगा। वह किताब इस समय मौजूद नहीं है क्योंकि पढ़ने के बाद वह तिलिस्म तोड़ने के काम में खर्च कर दी गई। उस स्थान (ब्रह्म-मण्डल) में बहुत-सी तस्वीरें देखने योग्य हैं और वहां की सैर करके भी आप बहुत प्रसन्न होंगे।"
सुरेन्द्र सिंह-हम जरूर उस स्थान को देखेंगे, मगर अभी नहीं। हाँ, और यह दूसरा दरवाजा जो बन्द है, कहाँ जाने के लिए है?
इन्द्रजीतसिंह--यही चुनारगढ़ वाले तिलिस्म में जाने का रास्ता है। इस समय यही दरवाजा खोला जायगा और हम लोग इसी राह से जायंगे।
सुरेन्द्रसिंह-खैर, तो अब इसे खोलना चाहिए।
पाठक, आपको इस सन्तति के पढ़ने से मालूम होता ही होगा कि अब यह उपन्यास समाप्ति की तरफ चला जा रहा है। हमारे लिखने के लिए अब सिर्फ दो बातें रह गई हैं, एक तो इस चुनारनगढ़ वाले तिलिस्म की कैफियत और दूसरे दुष्ट कैदियों का मुकदमा, जिसके साथ बचे-बचाये भेद भी खुल जायेंगे। हमारे पाठकों में से बहुत से ऐसे हैं जिनकी रुचि अब तिलिस्मी तमाशे की तरफ कम झुकती है परन्तु उन पाठकों की संख्या बहुत ज्यादा है जो तिलिस्म के तमाशे को पसन्द करते हैं और उसकी अवस्था विस्तार के साथ दिखाने अथवा लिखने के लिए बराबर जोर दे रहे हैं। इस उपन्यास में जो कुछ तिलिस्मी बातें लिखी गई हैं यद्यपि वे असम्भव नहीं और विज्ञान-वेत्ता अथवा साइंस जानने वाले जरूर कहेंगे कि 'हाँ ऐसी चीजें तैयार हो सकती हैं।' तथापि बहुत से अनजान आदमी ऐसे भी हैं जो इसे बिल्कुल खेल ही समझते हैं और कई इसकी देखा-देखी अपनी लिखी अनूठी किताबों में असम्भव बातें लिखकर तिलिस्म के नाम को बदनाम भी करने लग गये हैं, इसलिए हमारा ध्यान अब तिलिस्म लिखने की तरफ नहीं झुकता मगर क्या किया जाय लाचारी है, एक तो पाठकों की रुचि की तरफ ध्यान देना पड़ता है दूसरे चुनारगढ़ के चबूतरे वाले तिलिस्म की कैफियत लिखे बिना भीकाम नहीं चलता जिसे इस उपन्यास की बुनियाद ही कहना चाहिए और जिसके लिए चन्द्रकान्ता उपन्यास में वादा कर चुके हैं। अतः इस जगह चुनारगढ़ के चबूतरे वाले तिलिस्म की कैफियत लिखकर इस पक्ष को पूरा करते हैं, तब उसके बाद दोनों कुमारों की शादी और कैदियों के मामले की तरफ ध्यान देकर इस उपन्यास को पूरा करेंगे।
महाराज की आज्ञानुसार इन्द्रजीतसिंह दरवाजा खोलने के लिए तैयार हो गये। इस दरवाजे के ऊपर वाले महराब में किसी धातु के तीन मोर बने हुए थे जो हरदम हिला ही करते थे। कुमार ने उन तीनों मोरों की गर्दन घुमाकर एक में मिला दी, उसी समय दरवाजा भी खुल गया और कुमार ने सभी को अन्दर जाने के लिए कहा। जब सब उसके अन्दर चले गये, तब कुमार ने भी उन मोरों को छोड़ दिया और दरवाजे के अन्दर जाकर महाराज से कहा, "यह दरवाजा इसी ढंग से खुलता है, मगर इसके बन्द करने की कोई तरकीब नहीं है, थोड़ी देर में आप से आप बन्द हो जायगा। देखिए,तरफ भी दरवाजे के ऊपर वाले महराब में उसी तरह के मोर बने हुए हैं अतएव इधर से भी दरवाजा खोलने के समय वही तरकीब करनी होगी।"
दरवाजे के अन्दर जाने के बाद तिलिस्मी खंजर से रोशनी करने की जरूरत न रही क्योंकि यहाँ की छत में कई सूराख ऐसे बने हुए थे जिनमें से रोशनी बखूबी आ रही थी और आगे की तरफ निगाह दौड़ाने से यह भी मालूम होता था कि थोड़ी दूर जाने के बाद हम लोग मैदान में पहुंच जायेंगे जहाँ से खुला आसमान बखूबी दिखाई देगा, अतः तिलिस्मी खंजर की रोशनी बन्द कर दी गई और दोनों कुमारों के पीछे-पीछे सब कोई आगे की तरफ बड़े। लगभग डेढ़ सौ कदम तक जाने के बाद एक खुला हुआ दरवाजा मिला जिसमें चौखट या किवाड़ कुछ भी न था। इस दरवाजे के बाहर होने पर सभी ने अपने को संगमर्मर के छोटे से एक दालान में पाया और आगे की तरफ छोटा-सा बाग देखा जिसकी रविशें निहायत खूबसूरत स्याह और सुफेद पत्थरों से बनी हुई थीं मगर पेड़ों की किस्म में से केवल कुछ जंगली पौधों और लताओं की हरियाली मात्र ही बाग का नाम चरितार्थ करने के लिए दिखाई दे रही थी। इस बाग के चारों तरफ चार दालान चार ढंग के बने हुए थे और बीच में छोटे-छोटे कई चबूतरे और नहर की तौर पर सुन्दर और पतली नालियां बनी हुई थीं जिनमें पहाड़ से गिरते हुए झरने का साफ जल बहकर वहाँ के पेड़ों को तरी पहुंचा रहा था और देखने में भी बहुत भला मालूम होता था। मैदान में से निकलकर और आँख उठाकर देखने पर बाग के चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे हरे-भरे पहाड़ दिखाई दे रहे थे और वे इस बात की गवाही दे रहे थे कि यह बाग पहाड़ी की तराई अथवा घाटी में इस ढंग से बना हुआ है कि बाहर से किसी आदमी की इसके अन्दर आने की हिम्मत नहीं हो सकती और न कोई इसके अन्दर से निकलकर बाहर ही जा सकता है।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने महाराज सुरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर कहा, "उस चबूतरे वाले तिलिस्म के दो दर्जे हैं, एक तो यही बाग है और दूसरा उस चबूतरे के पास पहुंचने पर मिलेगा। इस बाग में आप जितने खूबसूरत चबूतरे देख रहे हैं सभी के अन्दर बेअन्दाज दौलत भरी पड़ी है। जिस समय हम दोनों यहाँ आये थे इन चबूतरों का छूना बल्कि इनके पास पहुंचना भी कठिन हो रहा था। (एक चबूतरे के पास ले जाकर) देखिये, चबूतरे के बगल में नीचे की तरफ कड़ी लगी हुई है और इसके साथ नथी हुई जो बारीक जंजीर है वह (हाथ का इशारा करके) इस तरफ एक कुएं में गिरी हुई है। इसी तरह हरएक चबूतरे में कड़ी और जंजीर लगी हुई है जो सब उसी कुएँ में जाकर इकट्ठी हुई हैं। मैं नहीं कह सकता कि उस कुएं के अन्दर क्या है, मगर उसकी तासीर यह थी कि इन चबूतरों को कोई छू नहीं सकता था। इसके अतिरिक्त आपको यह सुनकर ताज्चुब होगा कि उस चुनार वाले तिलिस्मी चबूतरे में भी जिस पर पत्थर का (असल में किसी धातु का) आदमी सोया हुआ है, एक जंजीर लगी हुई है और वह जंजीर भी भीतर-ही-भीतर यहाँ तक आकर उसी कुएं में गिरी हुई है जिसमें वे सब जंजीरें इकट्ठी हुई हैं, बस यही और इतना ही यहाँ का तिलिस्म है। इसके अतिरिक्त दरवाजों को छिपाने के सिवाय और कुछ भी नहीं है। हम दोनों भाइयों को तिलिस्मी किताब की बदौलत यह सब हाल मालूम हो चुका था, अतएव जब हम दोनों भाई यहाँ आए थे तो इन चबूतरों से बिल्कुल हटे रहते थे। पहला काम हम लोगों ने जो किया वह यही था कि ये नालियां जो पानी से भरी और बहती हुई आप देख रहे हैं, जिस पहाड़ी झरने की बदौलत लबालब हो रही हैं उसमें से एक नई नाली खोदकर उसका पानी उसी कुएँ में गिरा दिया जिसमें सब जंजीरें इकट्ठी ई हैं क्योंकि वह चश्मा भी उस कुएँ के पास ही है और अभी तक उसका पानी उस कुएँ में बराबर गिर रहा है। जब उस चश्मे का पानी (कई घण्टे तक) कुएं के अन्दर गिरा-तब इन चबूतरों का तिलिस्मी असर जाता रहा और ये छूने के लायक हुए मानो उस कुएँ में बिजली की आग भरी हुई थी जो पानी गिरने से ठंडी हो गई। हम दोनों भाइयों ने तिलिस्मी खंजर से सब जंजीरों को काट-काट इन चबूतरों का और उस चुनारगढ़ वाले तिलिस्मी चबूतरे का भी सम्बन्ध उस कुएँ से छुड़ा दिया, इसके बाद इन चबूतरों को खोलकर देखा और मालूम किया कि इनके अन्दर क्या है। अब आपकी आज्ञा होगी तो ऐयार लोग इस दौलत को चुनारगढ़ या जहाँ आप कहेंगे, वहाँ पहुँचा देंगे।"
इसके बाद इन्द्र जीतसिंह ने महाराज की आज्ञानुसार उन चबूतरों का ऊपरी हिस्सा, जो सन्दूक के पल्ले की तरह खुलता था, खोल-खोलकर दिखाया। महाराज तथा और सब कोई यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए कि उनमें बेहिसाब धन-दौलत और जेवरों के अतिरिक्त बहुत-सी अनमोल चीजें भी भरी हुई हैं जिनमें से दो चीजें महाराज ने बहुत पसन्द कीं। एक तो जड़ाऊ सिंहासन जिसमें अनमोल हीरे और माणिक विचित्र ढंग से जड़े हुए थे और दूसरा किसी धातु का बना हुआ एक चन्द्रमा था। इस चन्द्रमा में दो पल्ले थे, जब दोनों पल्ले एक साथ मिला दिये जाते तो उसमें से चन्द्रमा की तरह साफ और निर्मल तथा बहुत दूर तक फैलने वाली रोशनी पैदा होती थी।
उन चबूतरों के अन्दर की चीजों को देखते-ही-देखते तमाम दिन बीत गया। उस समय कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने महाराज की तरफ देखकर कहा, "इस बाग में इन चबूतरों के सिवाय और कोई चीज देखने योग्य नहीं है और अब रात भी हो गई है, इसलिए यद्यपि आगे की तरफ जाने में कोई हर्ज तो नहीं है, मगर आज की रात इसी बाग में ठहर जाते तो अच्छा था।"
भूतनाथ--क्या आज की रात भूखे-प्यासे ही बितानी पड़ेगी?
इन्द्रजीतसिंह--(मुस्कुराते हुए) प्यासे तो नहीं कह सकते, क्योंकि पानी का चश्मा बह रहा है जितना चाहो पी सकते हो, मगर खाने के नाम पर तब तक कुछ नहीं मिल सकता जब तक कि हम चुनारगढ़ वाले तिलिस्मी चबूतरे से बाहर न हो जायें।
जीतसिंह--खैर, कोई चिन्ता नहीं, ऐयारों के बटुए खाली न होंगे, कुछ-न-कुछ खाने की चीजें उनमे जरूर होंगी।
सुरेन्द्र सिंह--अच्छा, अब जरूरी कामों से छुट्टी पाकर किसी दालान में आराम करने का बन्दोबस्त करना चाहिए।
महाराज की आज्ञानुसार सब कोई जरूरी कामों से निपटने की फिक्र में लगे और इसके बाद एक दालान में आराम करने के लिए बैठ गये। खास-खास लोगों के लिए ऐयारों ने अपने सामान में से बिस्तरे का इन्तजाम कर दिया।
१०
यह दालान जिसमें इस समय महाराज सुरेद्रसिंह वगैरह आराम कर रहे हैं,बनिस्बत उस दालान के, जिसमें ये लोग पहले-पहल पहुंचे थे, वड़ा और खूबसूरत बना हुआ था। तीन तरफ दीवार थी और बाग की तरफ तेरह खम्भे और महराब लगे हुए थे जिससे इसे वारहदरी भी कह सकते हैं। इसकी कुर्सी लगभग ढाई हाथ के ऊँची थी और इसके ऊपर चढ़ने के लिए पांच सीढ़ियाँ बनी हुई थी। बारहदरी के आगे की तरफ कुछ सहन छूटा हुआ था जिसकी जमीन (फर्श) संगमर्मर और संगमूसा के चौखूटे पत्थरों से बनी हुई थी। बारहदरी की छत में मीनाकारी का काम किया हुआ था और तीनों तरफ की दीवारों में कई आलमारियाँ भी थीं।
रात पहर भर से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। इस बारहदरी में, जिसमें सब कोई आराम कर रहे थे, एक आलमारी की कार्निस के ऊपर मोमबत्ती जल रही थी जो देवी-सिंह ने अपने ऐयारी के बटुए में से निकालकर जलाई थी। किसी को नींद नहीं आयी थी बल्कि सब लग बैठे हुए आपस में बातें कर रहे थे। महाराज सुरेन्द्रसिंह बाग की तरफ मुंह किए बैठे थे और उन्हें सामने की पहाड़ी का आधा हिस्सा भी, जिस पर इस समय अन्धकार की बारीक चादर पड़ी हुई थी, दिखाई दे रहा था। उस पहाड़ी पर यकायक मशाल की रोशनी देखकर महाराज चौके और सभी को उस तरफ देखने का इशारा किया।
सभी ने उस रोशनी की तरफ ध्यान दिया और दोनों कुमार ताज्जुब के साथ सोचने लगे कि यह क्या मामला है? इस तिलिस्म में हमारे सिवाय किसी गैर आदमी का आना कठिन ही नहीं बल्कि एकदम असम्भव है, तब फिर यह मशाल की रोशनी कैसी! खाली रोशनी ही नहीं, बल्कि उसके पास चार-पांच आदमी भी दिखाई देते हैं।
हाँ, यह नहीं जान पड़ता कि वे सब औरत हैं या मर्द।
और लोगों के विचार भी दोनों कुमारों की ही तरह के थे और मशाल के साथ कई आदमियों को देखकर सभी ताज्जुब कर रहे थे। यकायक वह रोणनी गायब हो गई और आदमी दिखाई देने से रह गये, मगर थोड़ी ही देर बाद वह रोशनी फिर दिखाई दी। अबकी दफे रोशनी और भी नीचे की तरफ थी और उसके साथ के आदमी साफ-साफ दिखाई देते थे।
गोपालसिंह--(इन्द्रजीतसिंह से) मैं समझता था कि आप दोनों भाइयों के सिवाय कोई गैर आदमी इस तिलिस्म में नहीं आ सकता।
इन्द्रजीतसिंह--मेरा भी यही खयाल था मगर क्या आप भी यहाँ तक नहीं आ सकते? आप तो तिलिस्म के राजा हैं।
गोपालसिंह--हाँ मैं आ तो सकता हूँ मगर सीधी राह से और अपने को बचाते हुए, वे काम मैं नहीं कर सकता जो आप कर सकते हैं। परन्तु आश्चर्य तो यह है कि वे लोग पहाड़ पर से आते हुए दिखाई दे रहे हैं जहाँ से आने का कोई रास्ता ही नहीं है। तिलिस्म बनाने वालों ने इस बात को जरूर अच्छी तरह विचार लिया होगा।
इन्द्रजीतसिंह--बेशक ऐसा ही है, मगर यहाँ पर क्या समझा जाय? मेरा खयाल है कि थोड़ी ही देर में वे लोग इस बाग में आ पहुँचेंगे।
गोपालसिंह--बेशक ऐसा ही होगा। (रुककर) देखिए, रोशनी फिर गायब हो ग़ई, शायद वे लोग किसी गुफा में घुस गये। कुछ देर तक सन्नाटा रहा और सब कोई बड़े गौर से उसी तरफ देखते रहे। इसके बाद यकायक बाग के पश्चिम तरफ वाले दालान में रोशनी मालूम होने लगी जो उस दालान के ठीक सामने था जिसमें हमारे महाराज तथा ऐयार लोग टिके हुए थे, मगर पेड़ों के सबब से साफ नहीं दिखाई देता था कि दालान में कितने आदमी आए हैं और क्या कर रहे हैं। जब सभी को निश्चय हो गया कि वे लोग धीरे-धीरे पहाड़ों के नीचे उतरकर बाग के दालान या बारहदरी में आ गए हैं तब महाराज सुरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह को हुक्म दिया कि जाकर देखो और पता लगाओ कि वे लोग कौन हैं और वहाँ क्या कर रहे हैं।
गोपालसिंह--(महाराज से) तेजसिंहजी का वहाँ जाना उचित न होगा क्योंकि यह तिलिस्म का मामला है और यहां की बातों से ये बिल्कुल बेखबर है, यदि आज्ञा हो तो कुंअर इन्द्रजीतसिंह को साथ लेकर मैं जाऊँ।
महाराज–-ठीक है, अच्छा तुम्हीं दोनों आदमी जाकर देखो, क्या मामला है।
कुंअर इन्द्रजीतसिंह और राजा गोपालसिंह वहाँ से उठे और धीरे-धीरे तथा पेड़ों की आड़ में अपने को छिपाते हुए उस दालान की तरफ रवाना हुए जिसमें रोशनी दिखाई दे रही थी, यहाँ तक कि उस दालान अथवा बारहदरी के बहुत पास पहुंच गये और एक पेड़ की आड़ में खड़े होकर गौर से देखने लगे।
इस दालान में उन्हें पन्द्रह आदमी दिखाई दिए, जिनके विषय में यह जानना कठिन था कि वे मर्द हैं या औरत, क्योंकि सभी की पोशाक एक ही रंग-ढंग की तथा सभी के चेहरे पर नकाब पड़ी हुई थी। इन्हीं पन्द्रह आदमियों में से दो आदमी मशीन का काम दे रहे थे। जिस तरह उनकी पोशाक खूबसूरत और बेशकीमत थी, उसी मशाल भी सुनहरी तथा जड़ाऊ काम की दिखाई दे रही थी और उसके सिरे की त बिजली की तरह रोशनी हो रही थी, इसके अतिरिक्त उनके हाथ में तेल की कुप्पी न थी और इस बात का कुछ पता नहीं लगता था कि इस मशाल की रोशनी का सबब क्या है।
राजा गोपालसिंह और इन्द्रजीतसिंह ने देखा कि वे लोग शीघ्रता के साथ उस दालान के सजाने और फर्श वगैरह के ठीक करने का इन्तजाम कर रहे हैं। बारहदरी के दाहिनी तरफ एक खुला हुआ दरवाजा है, जिसके अन्दर वे लोग बार-बार जाते हैं और जिस चीज की जरूरत समझते हैं, ले आते हैं। यद्यपि उन सभी की पोशाक एक ही ढंग की है और इसलिए बड़ाई-छुटाई का पता लगाना कठिन है, तथापि उन सभी में से एक आदमी ऐसा है, जो स्वयं कोई काम नहीं करता और एक किनारे कुर्सी पर बैठा हुआ अपने साथियों से काम ले रहा है। उसके हाथ मे एक विचित्र ढंग की छड़ी दिखाई दे रही है जिसके मुठे पर निहायत खूबसूरत और कुछ बड़ा हिरन बना हुआ है। देखते-ही-देखते थोड़ी देर में बारहदरी सज कर तैयार हो गई और कन्दीलों की रोशनी से जगमगाने लगी। उस समय वह नकाबपोश जो कुर्सी पर बैठा था और जिसे हम उस मण्डली का सरदार भी कह सकते हैं, अपने साथियों से कुछ कह-सुन कर बारहदरी के नीचे उतर आया और धीरे-धीरे उधर रवाना हुआ जिधर महाराज सुरेन्द्रसिंह वगैरह टिके हुए थे।
यह कैफियत देख कर राजा गोपालसिंह और इन्द्रजीतसिंह जो छिपे सब तमाशा देख रहे थे वहाँ से लौटे और शीघ्र ही महाराज के पास पहुंच कर जो कुछ देखा था,संक्षेप में सब वयान किया। उसी समय एक आदमी आता हुआ दिखाई दिया। सभी का ध्यान उसी तरफ चला गया और इन्द्रजीतसिंह तथा राजा गोपालसिंह ने समझा कि यहवही नकाबपोशों का सरदार होगा जिसे अभी हम उस बारहदरी में देख आये हैं और जो हमारे देखते-देखते वहाँ से रवाना हो गया था। मगर जब पास आया तो सभी का भ्रम जाता रहा और एकाएक इन्द्रदेव पर निगाह पड़ते ही सब कोई चौंक पड़े। राजा गोपाल-सिंह और इन्द्रजीत सिंह को इस बात का भी शक हुआ कि वह नकाबपोशों का सरदार शायद इन्द्रदेव ही हो, मगर यह देख कर उन्हें ताज्जुब मालूम हुआ कि इन्द्र देव उस (नकाबपोशों की-सी) पोशाक में न था, जैसा कि उस बारहदरी में देखा था, बल्कि वह अपनी मामूली दरबारी पोशाक में था।
इन्द्रदेव ने वहाँ पहुँचकर महाराज सुरेन्द्र सिंह, वीरेन्द्र सिंह, जीतसिंह, तेजसिंह,राजा गोपालसिंह तथा दोनों कुमारों को अदब के साथ झुक कर सलाम किया और इसके बाद बाकी ऐयारों से भी "जय माया की" कहा।
सुरेन्द्र सिंह--इन्द्रदेव, जब से हमने इन्द्रजीतसिंह की जुबानी यह सुना है कि इस तिलिस्म के दारोगा तुम हो, तब से हम बहुत ही खुश हैं। मगर ताज्जुब होता था कि तुमने इस बात की हमें कुछ भी खबर नहीं की और न हमारे साथ ग्रहां आये हो। अब यकायक इस समय यहाँ पर तुम्हें देख कर हमारी खुशी और भी ज्यादा हो गई। आओ, हमारे पास बैठ जाओ और यह कहो कि हम लोगों के साथ तुम यहाँ क्यों नहीं आये?
इन्द्रदेव--(बैठ कर) आशा है कि महाराज मेरा वह कसूर माफ करेंगे। मुझे कई जरूरी काम करने थे, जिनके लिए अपने ढंग पर अकेले आना पड़ा। बेशक मैं इस तिलिस्म का दरोगा हूँ और इसीलिए अपने को बड़ा ही खुशकिस्मत समझता हूँ कि ईश्वर ने इस तिलिस्म को आप ऐसे प्रतापी राजा के हाथ में सौंपा है। यद्यपि आपके फर्मा-बर्दार और होनहार पोतों ने इस तिलिस्म को फतह किया है और इस सवब से वे इसके मालिक हुए हैं, तथापि इस तिलिस्म का सच्चा आनन्द और तमाशा दिखाना मेरा ही काम है, यह मेरे सिवाय किसी दूसरे के किए नहीं हो सकता जो काम कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का था, उसे ये कर चुके अर्थात् तिलिस्म तोड़ चुके और जो कुछ इन्हें मालूम होना था, हो चुका। परन्तु उन बातों, भेदों और स्थानों का पता इन्हें नहीं लग सकता, जो मेरे हाथ में हैं और जिसके सबब से मैं इस तिलिस्म का दारोगा कहलाता हूँ। तिलिस्म बनाने वालों ने तिलिस्म के सम्बन्ध में दो किताबें लिखी थीं जिनमें से वे एक तो दारोगा के सुपुर्द कर गये और दूसरी तिलिस्म तोड़ने वाले के लिए छिपा कर रख गये जो कि अब दोनों कुमारों के हाथ लगी या कदाचित इनके अतिरिक्त और भी कोई किताब उन्होंने लिखी हो तो उसका हाल मैं नहीं जानता। हाँ, जो किताव दारोगा के सुपुर्द कर गये थे, वह वसीयतनामे के तौर पर पुश्त-दर-पुश्त से हमारे कब्जे में चली आ रही है और आजकल मेरे पास मौजूद है। यह मैं जरूर कहूँगा कि तिलिस्म में बहुत से मुकाम ऐसे हैं जहां दोनों कुमारों का जाना तो असम्भव ही है, परन्तु तिलिस्म टूटने के पहले मैं भी नहीं जा सकता था। हाँ, अब मैं वहाँ बखूबी जा सकता हूँ। आज मैं इसीलिए इस तिलिस्म के अन्दर-ही-अन्दर आपके पास आया हूँ कि इस तिलिस्म का पूरा-पूरा तमाशा आपको दिखाऊँ। जिसे कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह नहीं दिखा सकते। परन्तु इन कामों के पहले मैं महाराज से एक चीज मांगता हूँ जिसके बिना मेरा काम नहीं चल सकता।
महाराज--वह क्या?
इन्द्रदेव--जब तक इस तिलिस्म में आप लोगों के साथ हूँ, तब तक अदब-लिहाज और कायदे की पाबन्दी से माफ रखा जाऊँ!
महाराज--इन्द्रदेव, हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। जब तक तिलिस्म में हम लोगों के साथ हो, तभी तक के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए हमने इन बातों से तुम्हें छुट्टी दी। तुम विश्वास रखो कि हमारे बाल-बच्चे और सच्चे साथी भी हमारी इस बात का पूरा-पूरा लिहाज रखेंगे।
यह सुनते ही इन्द्रदेव ने उठकर महाराज को सलाम किया और फिर बैठ कर कहा, "अब आज्ञा हो तो खाने-पीने का सामान जो आप लोगों के लिए लाया हूँ, हाजिर करूँ।"
महाराज-अच्छी बात है लाओ, क्योंकि हमारे साथियों में से कई ऐसे हैं जो भूख के मारे बेताब हो रहे होंगे।
तेजसिंह--मगर इन्द्रदेव, तुमने इस बात का परिचय तो दिया ही नहीं कि तुम वास्तव में इन्द्रदेव ही हो या कोई और?
इन्द्रदेव-(मुस्करा कर) मेरे सिवाय कोई गैर यहाँ आ नहीं सकता।
तेजसिंह-तथापि-'चिलेण्डोला'।
इन्द्रदेव-'चक्रधर'।
वीरेन्द्र सिंह-मैं एक बात और पूछना चाहता हूँ।
इन्द्रदेव -आज्ञा!
वीरेन्द्रसिंह-वह स्थान कैसा है, जहाँ तुम रहा करते हो और जहाँ मायारानी अपने दारोगा को लेकर तुम्हारे पास गई थी?
इन्द्रदेव-वह स्थान तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है और यहाँ से थोड़ी ही दूर पर है। मैं स्वयं आप लोगों को ले चल कर वहां की सैर कराऊँगा। इसके अतिरिक्त अभी मुझे बहुत-सी बातें कहनी हैं, पहले आप लोग भोजन इत्यादि से छुट्टी पा लें।
तेजसिंह-हम लोग अभी मशाल की रोशनी में क्या आप ही लोगों को पहाड़ से उतरते देख रहे थे?
इन्द्रदेव--जी हाँ, मैं एक निराले ही रास्ते से यहाँ आया हूँ। आप लोग बेशक ताज्जुब करते होंगे कि पहाड़ से कौन उतर रहा है। परन्तु मैं अकेला ही नहीं आया हूँ। बल्कि कई तमाशे भी अपने साथ लाया हूँ, मगर उनके जिक्र का अभी मौका नहीं है।
इतना कह कर इन्द्रदेव उठ खड़ा हुआ और देखते-देखते दूसरी तरफ चला गया,मगर अपनी इस बात से कि-"कई तमाशे भी अपने साथ लाया हूँ" कइयों को ताज्जुब और घबराहट में डाल गया।
११
थोड़ी ही देर बाद इन्द्रदेव फिर वहां आया। अबकी दफे उसके साथ कई नकाबपोश भी थे, जो अपने हाथ में तरह-तरह की खाने-पीने की चीजें लिए हुए थे। एक के हाथ में जल था। जल से जमीन धोई गई और खाने-पीने की चीजें वहाँ रख कर वे नकाबपोश लौट गये तथा पुनः कई जरूरी चीजें लेकर आ पहुँचे। इन्तजाम ठीक हो जाने पर इन्द्रदेव ने कायदे के साथ सभी को भोजन कराया और इस काम से छुट्टी मिलने पर उस बारहदरी में चलने के लिए अर्ज किया, जिसे उसने यहां पहुंच कर सजाया था और जिसका हाल ऊपर के बयान में लिख चुके हैं।
वास्तव में यह बारहदरी बड़ी खूबी के साथ सजाई गई थी। यहां सभी के लिए कायदे के साथ बैठने और आराम करने का सामान मौजूद था। जिसे देख कर महाराज बहुत प्रसन्न हुए और इन्द्रदेव की तरफ देख कर बोले,"क्या यह सब सामान इसी बाग में मौजूद था?"
इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, केवल इतना ही नहीं बल्कि इस बाग में जितनी इमारतें हैं, उन सभी को सजाने और दुरुस्त करने के लिए यहाँ काफी सामान है, इसके अतिरिक्त यहाँ से मेरा मकान बहुत नजदीक है। इसलिए जिस चीज की भी जरूरत हो, मैं बहुत जल्द ला सकता हूँ। (कुछ देर सोच कर और हाथ जोड़ कर) मैं एक और भी जरूरी बात अर्ज करना चाहता हूँ।
महाराज--वह क्या?
इन्द्रजीतसिंह-यह तिलिस्म आप ही के बुजुर्गों की बदौलत बना है और उन्हीं की आज्ञानुसार जब से यह तिलिस्म तैयार हुआ है, तभी से मेरे बुजुर्ग लोग इसके दारोगा होते आये हैं। अब मेरे जमाने में इस तिलिस्म की किस्मत ने पलटा खाया है। यद्यपि कुमार इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने इस तिलिस्म तोड़ा या फतह किया है और इसमें की बेहिसाब दौलत के मालिक हुए हैं तथापि यह तिलिस्म अभी दौलत से खाली नहीं हुआ है और न ऐसा खुल ही गया है कि ऐरे-गैरे जिसका जी चाहे इसमें घुस आयें। हाँ यदि आज्ञा हो तो दोनों कुमारों के हाथ से मैं इसके बचे-बचाये हिस्से को भी तुड़वा सकता हूँ, क्योंकि यह काम इस तिलिस्म के दारोगा का अर्थात् मेरा है, मगर मैं चाहता हूँ कि बड़े लोगों की इस कीर्ति को एकदम से मटियामेट न करके भविष्य के लिए भी कुछ छोड़ देना चाहिए। आज्ञा पाने पर मैं इस तिलिस्म की पूरी सैर कराऊँगा और तब अर्ज करूँगा कि बुजुर्गों की आज्ञानुसार इस दास ने भी जहाँ तक हो सका इस तिलिस्म की खिदमत की, अब महाराज को अख्तियार है कि मुझसे हिसाब-किताब समझ कर आइन्दा के लिए जिसे चाहें, यहाँ का दारोगा मुकर्रर करें।
महाराज--इन्द्रदेव, मैं तुमसे और तुम्हारे कामों से बहुत ही प्रसन्न हूँ। मगर मैं यह नहीं चाहता कि तुम मुझे बातों के जाल में फंसा कर बेवकूफ बनाओ और यह कहो कि "भविष्य के लिए किसी दूसरे को यहाँ का दारोगा मुकर्रर कर लो।" जो कुछ तुमने राय दी है वह बहुत ठीक है अर्थात् इस तिलिस्म के बचे-बचाये स्थानों को छोड़ देना चाहिए जिसमें कि बड़े लोगों का नाम-निशान बना रहे। मगर यहाँ के दारोगा की पदवी सिवाय तुम्हारे खानदान के कोई दूसरा कब पा सकता है? वस दया करके इस ढंग की बातों को छोड़ दो और जो कुछ खुशी-खुशी कर रहे हो, सो करो।
इन्द्रजीतसिंह-(अदब के साथ सलाम करके) जो आज्ञा! मैं एक बात और भी निवेदन करना चाहता हूँ।
महाराज--वह क्या?
इन्द्रदेव-वह यह कि इस जगह से आप कृपा करके पहले मेरे स्थान को, जहाँ मै रहता हूँ, पवित्र कीजिये और तब तिलिस्म की सैर करते हुए अपने चुनार गढ़ वाले तिलिस्मी मकान में पहुँचिये। इसके अतिरिक्त इस तिलिस्म के अन्दर जो कुछ कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने पाया है अथवा वहाँ से जिन चीजों को निकाल कर चुनारगढ़ पहुँचाने की आवश्यकता है, उनकी फेहरिस्त मुझे मिल जाय और ठीक तौर पर बता दिया जाय कि कौन चीज कहाँ पर है तो उन्हें वहाँ से बाहर कर के आपके पास भेजने का बदोबस्त करूँ। यद्यपि यह काम भैरोंसिंह और तारासिंह भी कर सकते हैं,परन्तु जिस काम को मैं एक दिन में करूँगा, उसे वे चार दिन में भी पूरा न कर सकेंगे।जिस चीज को जिस राह से निकाल ले जाने में सुभीता देखुंगा, निकाल ले जाऊँगा।
महाराज--ठीक है, मैं भी इस बात को पसन्द करता हूँ और यह भी चाहता हूँ कि चुनार पहुँचने के पहले ही तुम्हारे विचित्र स्थान की सैर कर लूं। चीजों की फेहरिस्त और उनका पता इन्द्रजीतसिंह तुमको देंगे।
इतना कह कर महाराज ने इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कुमार ने उन सब चीजों का पता इन्द्रदेव को बताया जिन्हें बाहर निकाल कर घर पहुंचाने की आवश्यकता थी और साथ-ही-साथ अपना तिलिस्मी किस्सा भी जिसके कहने की जरूरत थी, इन्द्रदेव से बयान किया और बाद में दूसरी बातों का सिलसिला छिड़ा।
वीरेन्द्र सिंह--(इन्द्रदेव से) आपने कहा था कि "मैं कई तमाशे भी साथ लाया हूं" तो क्या वे तमाशे ढंके ही रह जायेंगे।
इन्द्रदेव--जी नहीं! आज्ञा हो तो अभी उन्हें पेश करूँ, परन्तु यदि आप मेरे मकान पर चल कर उन तमाशों को देखेंगे तो कुछ विशेष आनन्द मिलेगा।महाराज-यही सही, हम लोगअभी तुम्हारे मकान पर चलने के लिए तैयार हैं।
इन्द्रदेव--अब रात बहुत चली गई है, महाराज दो-चार घण्टे आराम कर लें,दिन-भर की हरारत मिट जाय, जब कुछ रात बाकी रह जायेगी, तो मैं जगा दूंगा और अपने मकान की तरफ ले चलूंगा।तब तक मैं अपने साथियों को वहाँ रवाना कर देता हूँ जिसमें आगे चल कर सभी को होशियार कर दें और महाराज के लिए हरएक तरह का सामान दुरुस्त हो जाय। इन्द्रदेव की बात को महाराज ने पसन्द करके सभी को आराम करने की आज्ञा दी और इन्द्रदेव भी वहाँ से बिदा होकर किसी दूसरी जगह चला गया।
इधर--उधर की बातचीत करते-करते महाराज को नींद आ गई। वीरेन्द्रसिंह,दोनों कुमार और राजा गोपालसिंह भी सो गये तथा और ऐयारों ने भी स्वप्न देखना आरम्भ किया। मगर भूतनाथ की आंखों में नींद का नाम-निशान भी न था और वह तमाम रात जागता ही रह गया।
जब रात घण्टे-भर से ज्यादा बाकी रह गई और सुबह को अठखेलियों के साथ चल कर खुशदिलों तथा नौजवानों के दिलों में गुदगुदी पैदा करने वाली ठंडी-ठंडी हवा ने खुशबूदार जंगली फूलों और लताओं से हाथापाई करके उनकी सम्पत्ति छीनना और अपने को खुशबूदार बनाना शुरू कर दिया तब इन्द्रदेव भी उस बारहदरी में आ पहुंचा और सभी को गहरी नींद में सोते देख जगाने का उद्योग करने लगा। इस बारहदरी के आगे को तरफ एक छोटा-सा सहन था जिसकी जमीन संगमूसा के स्याह और चौखूटे पत्थरों से मढ़ी हुई थी। इस सहन के दाहिने और बाएँ कोनों पर दो-तीन आदमी बखूबी बैठ सकते थे। इन्द्रदेव दाहिने तरफ वाले सिंहासन पर जाकर बैठ गया और उसके पायों को बारी-बारी से किसी हिसाब से घुमाने या उमेठने लगा। उसी समय सिंहासन के अन्दर से सरस और मधुर बाजे की आवाज आने लगी और थोड़ी ही देर बाद गाने की आवाज भी पैदा हुई। मालूम होता था कि कई नौजवान औरतें बड़ी खूबी के साथ गा रही हैं और कई आदमी पखावज-बीन-वंशी-मजीरा इत्यादि बजा कर उन्हें मदद पहुंचा रहे हैं। यह आवाज धीरे-धीरे बढ़ने और फैलने लगी, यहाँ तक कि उस बारहदरी में सोने वाले सभी लोगों को जगा दिया अर्थात् सब कोई चौंक कर उठ बैठे और ताज्जुब के साथ इधर-उधर देखने लगे। केवल इतने ही से बेचैनी दूर न हुई और सब कोई बारहदरी से बाहर निकल कर सहन में चले आये, उसी समय इन्द्रदेव ने सामने आकर महाराज को सलाम किया।
महाराज--यह तो मालूम हो गया कि यह सब तुम्हारी कारीगरी का नतीजा है, मगर बताओ तो सही कि यह गाने-बजाने की आवाज कहाँ से आ रही है?
इन्द्रदेव--आइये, मैं बताता हूँ। महाराज को जगाने ही के लिए यह तरकीब की गई थी, क्योंकि अब यहाँ से रवाना होने का समय हो गया है, और विलम्ब न करना चाहिए
इतना कहकर इन्द्रदेव सभी को उस सिंहासन के पास ले गया जिसमें से गाने की आवाज आ रही थी। और उसका असल भेद समझाकर बोला, "इसमें मौके पर हर एक रागिनी पैदा हो सकती है।"
इस अनूठे गाने-बजाने से महाराज बहुत प्रसन्न हुए और इसके बाद सभी को लिए हुए इन्द्रदेव के मकान की तरफ रवाना हुए।
उस बारहदरी की बगल में ही एक कोठरी थी जिसमें सभी को साथ लिए हुए इन्द्रदेव चला गया! इस समय इन्द्रदेव के पास तिलिस्मी खंजर था जिससे उसने हलकी रोशनी पैदा की और उसी के सहारे सभी को लिए हुए आगे की तरफ बढ़ा।
उस कोठरी में जाने के बाद पहले सभी को एक छोटे से तहखाने में उतरना पड़ा,वहाँ सभी ने लाल रंग की एक समाधि देखी जिसके बारे में दरियाफ्त करने पर इन्द्रदेव ने कहा कि यह समाधि नहीं है, सुरंग का दरवाजा है। इन्द्रदेव उस समाधि के पास बैठ गया और कोई ऐसी तरकीब की कि जिससे वह बीचोंबीच से खुल गई और नीचे उतरने के लिए चार-पांच सीढ़ियाँ दिखाई दीं। इन्द्रदेव के कहे मुताबिक सब कोई नीचे उतर गये और इसके बाद सीधी सुरंग में चलने लगे। सुरंग की हालत और ऊँची-नीची जमीन से साफ-साफ मालूम होता था कि वह पहाड़ काटकर बनाई हुई है और सब लोग ऊँचे की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। हमारे मुसाफिरों को दो-ढाई घड़ी के लगभग चलना पड़ा और तब इन्द्रदेव ने ठहरने के लिए कहा, क्योंकि यहाँ पर सुरंग खत्म हो चुकी थी और सामने एक बन्द दरवाजा दिखाई दे रहा था। इन्द्रदेव ने ताली लगाकर ताला खोला और सभी को साथ लिए हुए उसके अन्दर गया। सभी ने अपने को एक सुन्दर कमरे में पाया और जब इस कमरे के बाहर हुए तब मालूम हुआ कि सवेरा हो चुका है।
यह इन्द्रदेव का वही मकान है जिसमें बुड्ढे दारोगा के साथ मदद पाने की उम्मीद में मायारानी गई थी। इस सुन्दर और सुहावने स्थान का हाल हम पहले लिख चुके हैं, इसलिए अब पुनः बयान करने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती।
इन्द्रदेव सभी को लिए हुए पुनः अपने छोटे से बगीचे में गया, वहाँ चारों तरफ की सुन्दर छटा दिखाई दे रही थी और खुशबूदार ठण्डी-ठण्डी हवा दिल और दिमाग के साथ दोस्ती का हक अदा कर रही थी।
महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह तथा दोनों कुमारों को यह स्थान बहुब ही पसन्द आया और बार-बार इसकी तारीफ करने लगे। यद्यपि इस बगीचे में सभी के लायक दर्जे-बदर्जे कुर्सियाँ बिछी हुई थीं, मगर किसी का जी बैठने को नहीं चाहता था। सब कोई घूम-घूमकर यहाँ का आनन्द लेना चाहते थे और ले रहे थे, मगर इस बीच में एक ऐसा मामला हो गया जिसने भूतनाथ और देवीसिंह दोनों ही को चौंका दिया। एक आदमी जल से जरा हुआ चाँदी का घड़ा और सोने की झारी लेकर आया और संगमरमर की चौकी पर, जो बगीचे में पड़ी हुई थी, रखकर लौट चला। इसी आदमी को देखकर भूतनाथ और देवीसिंह चौंके थे, क्योंकि यह वही आदमी था जिसे ये दोनों ऐयार नकाबपोशों के मकान में देख चुके थे। इसी आदमी ने नकाबपोशों के सामने एक तस्वीर पेश की की थी और कहा था कि "कृपानाथ, बस मैं इसी का दावा भूतनाथ पर करूँगा।"]
केवल इतना ही नहीं, भूतनाथ ने वहाँ से थोड़ी दूर पर एक झाड़ी में अपनी स्त्री को भी फूल तोड़ते देखा और धीरे-से देवीसिंह को छेड़कर कहा, "वह देखिये मेरी स्त्री भी वहाँ मौजूद है, ताज्जुब नहीं कि आपकी चम्मा भी कहीं घूम रही हो।"
१२
यद्यपि भूतनाथ को तरवुदों से छुट्टी मिल चुकी थी, यद्यपि उसका कसूर माफ हो चुका था, और वह महाराज के खास ऐयारों में मिला लिया गया था, मगर इस जगह उस आदमी को, जिसने नकाबपोशों के मकान में तस्वीर पेश की और साथ उस पर दावा करना चाहा था, देखकर उसकी अवस्था फिर बिगड़ गई और साथ ही इसके अपनी स्त्री को भी वहाँ काम करते हुए देखकर उसे क्रोध चढ़ आया।
जब वह आदमी पानी का घड़ा और झारी रखकर लौट चला, तब इन्द्रदेव ने उसे पुकारकर कहा, "अर्जन, जरा वह तस्वीर भी तो ले आओ जिसे बार-बार तुम दिखाया करते हो और जो हमारे दोस्त भूतनाथ को डराने और धमकाने के लिए एक औजार के तौर पर तुम्हारे पास रखी हुई है।"
इस नाम ने भूतनाथ के कलेजे को और भी हिला दिया। वास्तव में उस आदमी का यही नाम था और इस खयाल ने तो उसे और भी बदहवास कर दिया कि अब वह तस्वीर लेकर आयेगा।
इस समय सब कोई बाग में टहल रहे थे और इसलिए एक-दूसरे से कुछ दूर हो रहे थे। भूतनाथ बढ़कर देवीसिंह के पास चला गया और उनका हाथ पकड़कर धीरे से बोला, "देखा, इन्द्रदेव का रंग-ढंग?"
देवीसिंह --(धीरे-से) मैं सब देख और समझ रहा हुँ, मगर तुम घबराओ नहीं।
भूतनाथ-मालूम होता है कि इन्द्रदेव का दिल अभी तक मेरी तरफ से साफ
नहीं हुआ।
देवीसिंह--शायद ऐसा ही हो, मगर इन्द्रदेव से ऐसी उम्मीद नहीं हो सकती,मेरा दिल इसे कबूल नहीं करता। मगर भूतनाथ, तुम भी अजीब सिड़ी हो।
भूतनाथ—-सो क्यों?
देवीसिंह—-यही कि नकाबपोशों का पीछा करके तुमने कैसे-कैसे तमाशे देखे और तुम्हें विश्वास भी हो गया कि इन नकाबपशों से तुम्हारा कोई भेद छिपा नहीं है, फिर अन्त में यह भी मालूम हो गया कि उन नकाबपोशों के सरदार कुंअर इन्दद्रजीतसिंह और आनन्दसिंह थे, फिर इन दोनों से भी अब कोई बात छिपी नहीं रही।
भूतनाथ--बेशक ऐसा ही है।
देवीसिंह--तो फिर अब क्यों तुम्हारा दम बेकार ही घुटा जाता है? अब तुम्हें किसका डर रह गया?
भूतनाथ-कहते तो ठीक हो। खैर, कोई चिन्ता नहीं, जो कुछ होगा, सो देखा जायगा।
देवीसिंह--बल्कि तुम्हें यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि दोनों कुमारों को तुम्हारे भेदों का पता कैसे लगा। ताज्जुब नहीं, अब वे सब बातें खुलना चाहती हों।
भूतनाथ--शायद ऐसा ही हो, मगर मेरी स्त्री के बारे में तुम भी क्या खयाल करते हो?
देवीसिंह--इस बारे में मेरा-तुम्हारा मामला एक-सा ही रहा है, अब इस विषय में मैं कुछ भी नहीं कह सकता। वह देखो, इन्द्रदेव, तेजसिंह के पास चला गया है और तुम्हारी स्त्री की तरफ इशारा करके कुछ कह रहा है। तेजसिंह अलग हों तो मैं उनसे कुछ पूछू! यहाँ की छटा ने तो लोगों का दिल ऐसा लुभा लिया है कि सभी ने एक-दूसरे का साथ ही छोड़ दिया।(चौंककर) लो देखो, तुम्हारा लड़का नानक भी तो आ पहुँचा, उसके हाथ में भी कोई तस्वीर मालूम पड़ती है, अर्जुन भी उसी के साथ है।
भूतनाथ--(ताज्जुब से) आश्चर्य की बात है! नानक और अर्जुन का साथ कैसे हुआ? और नानक यहाँ आया ही क्यों? क्या अपनी मां के साथ आया है? क्या सपूत छोकरे ने भी मेरी तरफ से आँखें फेर ली हैं? ओफ, यह तिलिस्मी जमीन तो मेरे लिए भयानक सिद्ध हो रही है, अच्छा-खासा तिलिस्म मुझे दिखाई दे रहा है। जिन पर मुझे विश्वास था, जिनका मुझे भरोसा था, जो मेरी इज्जत करते थे, यहाँ उन्हीं को मैं अपना विपक्षी पाता हूँ और कोई मुझसे बात तक करना पसन्द नहीं करते।
नानक और और अर्जुन भूतनाथ और देवीसिंह ताज्जुब के साथ देख रहे थे,नानक ने भी भूतनाथ को देखा, मगर दूर ही से प्रणाम करके रह गया, पास न आया और और अर्जुन को लिए सीधे इन्द्रदेव की तरफ चला गया जो तेजसिंह से बातें कर रहे थे। इस समय आज्ञानुसार अर्जुन अपने हाथ में एक तस्वीर लिए हुए था और नानक के हाथ में भी एक तस्वीर थी।
नानक और अर्जुन को अपने पास आते देख इन्द्रदेव ने हाथ के इशारे से उन्हें दूर ही खड़े रहने के लिए कहा और उन्होंने भी ऐसा ही किया। कुछ देर तक और भी इन्द्रदेव, तेजसिंह के साथ बातें करता रहा, इसके बाद इशारे से अर्जुन और नानक को अपने पास बुलाया और जर वे दोनों पास आ गये तो कुछ कह-सुनकर बिदा किया।
भूतनाथ यह सब तमाशा देखकर ताज्जुब कर रहा था। अर्जुन और नानक को बिदा करने के बाद तेजसिंह को साथ लिए हुए इन्द्रदेव महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास गया जो एक सुन्दर चट्टान पर खड़े-खड़े ढलवां जमीन और पहाड़ी पर से नीचे की तरफ गिरते हुए सुन्दर झरने की शोभा देख रहे थे और वीरेन्द्रसिह भी उन्हीं के पास खड़े थे। वहाँ भी कुछ देर तक इन्द्रदेव ने महाराज से बातचीत की और इसके बाद चारों आदमी लौटकर बगीचे में चले आये। महाराज को बगीचे में आते देख और सब लोग भी जो इधर-उधर फैले हुए तमाशा देख रहे थे, बगीचे में आकर इकट्ठे हो गए और अब मानो महाराज का यह एक छोटा-सा दरबार बगीचे में ही लग गया।
वीरेन्द्रसिंह-(इन्द्रदेव से) हाँ, तो अब वे तमाशे कब देखने में आवेंगे जो आप अपने साथ तिलिस्म में लेते गये थे?
इन्द्रदेव--जब आज्ञा हो तभी दिखाये जायें।
वीरेन्द्रसिंह--हम लोग तो देखने के लिए तैयार बैठे हैं।
जीतसिंह--मगर पहले यह मालूम हो जाना चाहिए कि उनके देखने में जितना समय लगेगा, अगर थोड़ी देर का काम हो तो अभी देख लिया जाय।
इन्द्रदेव--जी, वह थोड़ी देर का काम तो नहीं है। इससे यही बेहतर होगा कि पहले जरूरी कामों से छुट्टी पाकर स्नान-ध्यान तथा भोजन इत्यादि से निवृत्त हो लें।
महाराज--हमारी भी यही राय है।
महाराज का मतलब समझ कर सब कोई उठ खड़े हुए और जरूरी कामों से छुट्टी पाने की फिक्र में लगे। महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह तथा और भी सब कोई
इन्द्रदेव के उचित प्रबन्ध को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। किसी को किसी तरह की तकलीफ न हुई और न कोई चीज मांगने की जरूरत ही पड़ी। इन्द्रदेव के ऐयार और कई खिदमतगार आकर मौजूद हो गये और बात की बात में सब सामान ठीक हो गया।
स्नान तथा संध्या-पूजा इत्यादि से छुट्टी पाकर सभी ने भोजन किया और इसके बाद इन्द्रदेव ने (बँगले के अन्दर) एक बहुत बड़े और सजे हुए कमरे में सभी को बैठाया जहाँ सभी के योग्य दर्जे-ब-दर्जे बैठने का इन्तजाम किया गया था। एक ऊंची गद्दी पर महाराज सुरेन्द्रसिंह और उनके दाईं तरफ वीरेन्द्रसिंह, गोपालसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, पण्डित बद्रीनाथ, रामनारायण, पन्नालाल तथा भूतनाथ वगैरह बैठे।
कुछ देर तक इधर-उधर की बातचीत होती रही। इसके बाद इन्द्रदेव ने हाथ जोड़कर पूछा-"अब यदि आज्ञा हो तो तमाशों को...
महाराज--हाँ-हाँ, अब तो हम लोग हर तरह से निश्चिन्त हैं।
सलाम करके इन्द्रदेव कमरे के बाहर चला गया और घड़ी भर तक लौट के नहीं आया, इसके बाद जब आया तो चुपचाप अपने स्थान पर आकर बैठ गया। सब कोई (भूतनाथ, पन्नालाल वगैरह) ताज्जुब के साथ उसका मुंह देख रहे थे कि इतने में ही सामने वाले दरवाजे का परदा हटा और नानक कमरे के अन्दर आता हुआ दिखाई दिया, नानक ने बड़े अदब के साथ महाराज को सलाम किया और इन्द्रदेव का इशारा पाकर एक किनारे बैठ गया। इस समय नानक के हाथ में एक बहुत बड़ी मगर लपेटी हुई तस्वीर थी जो कि उसने अपने बगल में लगा रखी थी।
नानक के बाद हाथ में तस्वीर लिए अर्जुन भी पहुंचा और महाराज को सलाम कर नानक के पास बैठ गया। उसी समय कमला का भाई अथवा भूतनाथ का लड़का हरनामसिंह दिखाई दिया, वह भी महाराज को प्रणाम करके अर्जुन के बगल में बैठ गया,हरनामसिंह के हाथ में एक छोटी-सी सन्दूकड़ी थी जिसे उसने अपने सामने रख लिया।
इसके बाद नकाब पहने हुए तीन औरतें कमरे के अन्दर आईं और अदब के साथ महाराज को सलाम करती हुई दूसरे दरवाजे से कमरे के बाहर निकल गईं।
इस समय भूतनाथ और देवीसिंह के दिल की क्या हालत थी, सो वे ही जानते होंगे। उन्हें इस बात का तो विश्वास ही था कि इन औरतों में एक तो भूतनाथ की स्त्री और दूसरी चम्पा जरूर है, मगर तीसरी औरत के बारे में कुछ भी नहीं कह सकते थे।
महाराज--(इन्द्रदेव से) इन औरतों में भूतनाथ की स्त्री और चम्पा जरूर होगी?
इन्द्रदेव--(हाथ जोड़कर) जी हाँ कृपानाथ।
महाराज--और तीसरी औरत कौन है?
इन्द्रदेव--तीसरी एक बहुत ही गरीब, नेक, सीधी और जमाने की सताई हुई औरत है जिसे देखकर और जिसका हाल सुनकर महाराज को भी बड़ी ही दया आयेगी। यह वह औरत है जिसे मरे हुए एक जमाना हो गया, मगर अब उसे विचित्र ढंग से पैदा होते देख लोगों को बड़ा ही ताज्जुब होगा।
महाराज--आखिर वह औरत है कौन?
इन्देव--बेचारी दुःखिनी कमला की माँ, यानी भूतनाथ की पहली स्त्री।
यह सुनते ही भूतनाथ चिल्ला उठा और उसने बड़ी मुश्किल से अपने को बेहोश होने से रोका।