चन्द्रकान्ता सन्तति
पहला भाग
१
नौगढ़ के राजा सुरेन्द्रसिंह के लड़के वीरेन्द्रसिंह की शादी विजयगढ़ के महाराज जयसिंह की लड़की चन्द्रकान्ता के साथ हो गई। बारात वाले दिन तेजसिंह की आखिरी दिल्लगी के सबब चुनार के महाराज शिवदत्त को मशालची बनना पड़ा। बहुतों की यह राय हुई कि महाराज शिवदत्त का दिल अभी तक साफ नहीं हुआ, इसलिए अब इनको कैद ही में रखना मुनासिब है, मगर महाराज सुरेन्द्रसिंह ने इस बात को नापसन्द करके कहा कि "महाराज शिवदत्त को हम छोड़ चुके हैं। इस वक्त जो तेजसिंह से उनकी लड़ाई हो गई, यह हमारे साथ वैर रखने का सबूत नहीं हो सकता। आखिर महाराज शिवदत्त क्षत्रिय हैं, जब तेजसिंह उनकी सूरत बना बेइज्जती करने पर उतारू हो गए तो यह देखकर भी वह कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? मैं यह भी नहीं कह सकता कि महाराज शिवदत्त का दिल हम लोगों की तरफ से बिल्कुल साफ हो गया क्योंकि अगर उनका दिल साफ ही हो जाता तो इस बात को छिप कर देखने के लिए आने की जरूरत क्या थी? तो भी यह समझ कर कि तेजसिंह के साथ इनकी यह लड़ाई हमारी दुश्मनी के सबब नहीं कही जा सकती, हम फिर इनको छोड़ देते हैं। अगर अब भी ये हमारे साथ दुश्मनी करेंगे तो क्या हर्ज है! ये भी मर्द हैं और हम भी मर्द हैं। देखा जाएगा।"
महाराज शिवदत्त फिर छूट कर न मालूम कहाँ चले गए। वीरेन्द्रसिंह की शादी होने के बाद महाराज सुरेन्द्रसिंह और जयसिंह की राय से चपला की शादी तेजसिंह के साथ और चम्पा की शादी देवीसिंह के साथ की गई। चम्पा दूर के नाते में चपला की बहिन होती थी।
बाकी सब ऐयारों की शादी हो चुकी थी। उन लोगों की घर-गृहस्थी चुनार ही में थी, अदल-बदल करने की जरूरत न पड़ी, क्योंकि शादी होने की थोड़े ही दिन बाद बड़ी धूमधाम के साथ कुँअर वीरेन्द्रसिंह चुनार के गद्दी पर बैठाए गए और कुँअर छोड़ राजा कहलाने लगे। तेजसिंह उनके राज-दीवान मुकर्रर हुए और इसलिए सब ऐयारों को भी चुनार ही में रहना पड़ा।
सुरेन्द्रसिंह अपने लड़के को आँखों के सामने से हटाना नहीं चाहते थे, लाचार होकर नौगढ़ की गद्दी फतहसिंह के सुपुर्द कर वे भी चुनार ही में रहने लगे, मगर राज्य का काम बिल्कुल वीरेन्द्रसिंह के जिम्मे था, हाँ, कभी-कभी राय दे देते थे। तेजसिंह के साथ जीतसिंह भी बड़ी आजादी के साथ चुनार में रहने लगे। महाराज सुरेन्द्रसिंह और जीतसिंह में बहुत मुहब्बत थी और वह मुहब्बत दिन-दिन बढ़ती गई। असल में जीतसिंह इसी लायक थे कि उनकी जितनी भी कदर की जाती थोड़ी थी। शादी के दो बरस बाद चन्द्रकान्ता को लड़का पैदा हुआ। उसी साल चपला और चम्पा को भी लड़का पैदा हुआ। इसके तीन बरस बाद चन्द्रकान्ता ने दूसरे लड़के का मुख देखा। चन्द्रकान्ता के बड़े लड़के का नाम इन्द्रजीतसिंह, छोटे का नाम आनन्दसिंह तथा चपला के लड़के का नाम भैरोंसिंह और चम्पा के लड़के का नाम तारासिंह रखा गया।
जब ये चारों लड़के कुछ बड़े और बातचीत करने लायक हुए तब इनके लिखने-पढ़ने और तालीम का इन्तजाम किया गया और राजा सुरेन्द्रसिंह ने इन चारों लड़कों को जीतसिंह की शागिर्दी और हिफाजत में छोड़ दिया।
भैरोंसिंह और तारासिंह ऐयारी के फन में बड़े तेज और चालाक निकले। इनकी ऐयारी का इम्तिहान बराबर लिया जाता था। जीतसिंह का हुक्म था कि भैरोंसिंह और तारासिंह सारे ऐयारों को, बल्कि अपने बाप तक को, धोखा देने की कोशिश करें और इसी तरह पन्नालाल वगैरह ऐयार भी उन दोनों लड़कों को भुलावा दिया करें। धीरे-धीरे ये दोनों लड़के इतने तेज और चालाक हो गए कि पन्नालाल वगैरह की ऐयारी इनके सामने दब गई।
भैरोंसिंह और तारासिंह इन दोनों में ज्यादा चालाक कौन था, इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, आगे मौका पड़ने पर आप ही मालूम हो जाएगा, हाँ इतना कह देना जरूरी है कि भैरोंसिंह को इन्द्रजीतसिंह के साथ और तारासिंह को आनन्दसिंह के साथ ज्यादा मुहब्बत थी।
चारों लड़के होशियार हुए अर्थात् इन्द्रजीतसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह की उम्र अट्ठारह वर्ष की और आनन्दसिंह की उम्र पन्द्रह वर्ष की हुई। इतने दिनों तक चुनार राज्य में बराबर शान्ति रही, बल्कि पिछली तकलीफें और महाराज शिवदत्त की शैतानी एक स्वप्न की तरह सभी के दिल में रह गई।
इन्द्रजीतसिंह को शिकार का बहुत शौक था। जहाँ तक बन पड़ता, वे रोज शिकार खेला करते। एक दिन किसी बनरखे ने हाजिर होकर बयान किया कि इन दिनों फलाँ जंगल की शोभा खूब बढ़ी-चढ़ी है और शिकार के जानवर भी इतने आये हुए हैं कि अगर वहाँ महीना-भर टिक कर शिकार खेला जाय, तो भी न घटे और कोई दिन खाली न जाय। यह सुनकर दोनों भाई बहुत खुश हुए। अपने बाप राजा वीरेन्द्रसिंह से शिकार खेलने की इजाजत मांगी और कहा कि "हम लोगों का इरादा आठ दिन तक जंगल में रह कर शिकार खेलने का है।" इसके जवाब में राजा वीरेन्द्रसिंह ने कहा कि "इतने दिनों तक जंगल में रह कर शिकार खेलने का हुक्म मैं नहीं दे सकता-अपने दादा से पूछो, अगर वे हुक्म दें तो कोई हर्ज नहीं।"
यह सुनकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने अपने दादा महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास जाकर अपना मतलब अर्ज किया। उन्होंने खुशी से मंजूर किया और हुक्म दिया कि शिकारगाह में इन दोनों के लिए खेमा खड़ा किया जाय और जब तक ये शिकारगाह में रहें, पाँच सौ फौज बराबर इनके साथ रहे।
शिकार खेलने का हुक्म पाकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह बहुत खुश हुए और अपने दोनों ऐयार भैरोंसिंह और तारासिंह को साथ लेकर पाँच सौ फौज के साथ चुनार से रवाना हुए।
चुनार से पाँच कोस दक्षिण एक घने और भयानक जंगल में पहुँच कर उन्होंने डेरा डाला। दिन थोड़ा बाकी रह गया, इसलिए यह राय ठहरी कि आज आराम करें, कल सवेरे शिकार का बन्दोबस्त किया जाय मगर बनरखों को शेर का पता लगाने के लिए आज ही कह दिया जाएगा। भैंसा बाँधने की कोई जरूरत नहीं, शेर का शिकार पैदल ही किया जाएगा।
दूसरे दिन सवेरे बनरखों ने हाजिर होकर उनसे अर्ज किया कि इस जंगल में शेर तो हैं मगर रात हो जाने के सबब हम लोग उन्हें अपनी आँखों न देख सके, अगर आज के दिन शिकार न खेला जाय तो हम लोग देखकर उनका पता दे सकेंगे। आज के दिन भी शिकार खेलना बन्द रखा गया। पहर-भर दिन बाकी रहते इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह घोड़ों पर सवार हो अपने दोनों ऐयारों को साथ लेकर घूमने और दिल बहलाने के लिए डेरे से बाहर निकले और टहलते हुए दूर तक चले गए।
ये लोग धीरे-धीरे टहलते और बातें करते जा रहे थे कि बाईं तरफ से शेर के गरजने की आवाज आई जिसे सुनते ही चारों अटक गये और घूम कर उस तरफ देखने लगे जिधर से आवाज आई थी।
लगभग दो सौ गज की दूरी पर एक साधु शेर पर सवार जाता दिखाई पड़ा जिसकी लम्बी-लम्बी और घनी जटाएं पीछे की तरफ लटक रही थीं—एक हाथ में त्रिशूल दूसरे में शंख लिए हुए था। इसकी सवारी का शेर बहुत बड़ा था और उसकी गर्दन के बाल जमीन तक लटक रहे थे।
इसके आठ-दस हाथ पीछे एक शेर और जा रहा था जिसकी पीठ पर आदमी के बदले बोझ लदा हुआ नजर आया। शायद यह असबाब उन्हीं शेर पर सवार महात्मा का हो।
शाम हो जाने के सबब से साधु की सूरत साफ मालूम न पड़ी तो भी उसे देख इन चारों को बड़ा ताज्जुब हुआ और कई तरह की बातें सोचने लगे।
इन्द्रजीतसिंह-इस तरह शेर पर सवार होकर घूमना मुश्किल है।
आनन्दसिंह-कोई अच्छे महात्मा मालूम होते हैं।
भैरोंसिंह-पीछे वाले शेर को देखिए जिस पर असबाब लदा हुआ है, किस तरह भेड़ की तरह सिर नीचा किये जा रहा है।
तारासिंह-शेरों को वश में कर लिया है।
इन्द्रजीतसिंह-जी चाहता है उनके पास चल कर दर्शन करें।
आनन्दसिंह-अच्छी बात है। चलिए, पास से देखें, कैसा शेर है।
तारासिंह-बिना पास गए महात्मा और पाखण्डी में भेद न मालूम होगा।
भैरोंसिंह-शाम तो हो गई है, खैर चलिए, आगे से बढ़ कर रोकें।
आनन्द सिंह-आगे से चल कर रोकने से बुरा न मानें।
भैरोंसिंह-हम ऐयारों का पेशा ही ऐसा है कि पहले तो उनका साधु होना ही विश्वास नहीं करते!
इन्द्रजीतसिंह-आप लोगों की क्या बात है जिनकी मूंछ हमेशा ही मुड़ी रहती हैं। खैर, चलिए तो सही।
भैरोंसिंह-चलिए।
चारों आदमी आगे घूम कर बाबाजी के सामने गए जो शेर पर सवार जा रहे थे। इन लोगों को अपने पास आते देख बाबाजी रुक गए। पहले तो इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के घोड़े शेरों को देख कर अड़े, मगर फिर ललकारने से आगे बढ़े। थोड़ी दूर जाकर दोनों भाई घोड़ों के ऊपर से उतर पड़े, भैरोंसिंह और तारासिंह ने दोनों घोड़ों को पेड़ से बांध दिया, इसके बाद पैदल ही चारों आदमी महात्मा से पास पहुंचे।
बाबाजी-(दूर ही से) आओ राजकुमार इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह! कहो, कुशल तो है?
इन्द्रजीतसिंह-(प्रणाम करके) आपकी कृपा से सब मंगल है।
बाबाजी–(भैरोंसिंह और तारासिंह की तरफ देखकर) कहो भैरों और तारा, अच्छे हो?
दोनों-(हाथ जोड़ कर) आपकी दया से!
बाबाजी-राजकुमार, मैं खुद तुम लोगों के पास जाने को था, क्योंकि तुमने शेर का शिकार करने के लिए इस जंगल में डेरा डाला है। मैं गिरनार जा रहा हूँ, घूमता-फिरता इस जंगल में भी आ पहुँचा। यह जंगल अच्छा मालूम होता है इसलिए दो-तीन दिन तक यहां रहने का विचार है, कोई अच्छी जगह देख कर धूनी लगाऊँगा। मेरे साथ सवारी और असबाब लादने के कई शेर हैं, इसलिए कहता हूँ कि धोखे में मेरे किसी शेर को मत मारना, नहीं तो मुश्किल होगी। सैकड़ों शेर पहुंच कर तुम्हारे लश्कर में हलचल मचा डालेंगे और बहुतों की जान जाएगी। तुम प्रतापी राजा सुरेन्द्रसिंह के लड़के हो, इसलिए तुम्हें पहले ही से समझा देना मुनासिब है, जिसमें किसी तरह का दुख न हो।
इन्द्रजीतसिंह-महाराज, मैं कैसे जानूँगा कि यह आपका शेर है? ऐसा ही है, तो शिकार नहीं खेलूँगा।
बाबाजी-नहीं, तुम शिकार खेलो, मगर मेरे शेरों को मत मारो!
इन्द्रजीतसिंह-मगर यह कैसे मालूम होगा कि फलां शेर आपका है?
बाबाजी-देखो, मैं अपने शेरों को बुलाता हूँ, पहचान लो।
बाबाजी ने शंख बजाया। भारी शंख की आवाज चारों तरफ जंगल में गूंज गई और हर तरफ से गुर्राहट की आवाज आने लगी। थोड़ी ही देर में इधर-उधर से दौड़ते हुए पाँच शेर और आ पहुँचे। ये चारों दिलावर और बहादुर थे, अगर कोई दूसरा होता तो डर से उसकी जान निकल जाती। इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के घोड़े शेरों को देख कर उछलने-कूदने लगे, मगर रेशम की मजबूत बागडोर से बँधे हुए थे इससे भाग न सके। इन शेरों ने आकर बड़ी ऊधम मचाई-इन्द्रजीतसिंह वगैरह को देख कर गरजने-कूदने और उछलने लगे, मगर बाबाजी के डाँटते ही सब ठंडे हो सिर नीचा कर भेड़-बकरी की तरह खड़े हो गए।
बाबाजी-देखो इन शेरों को पहचान लो, अभी दो-चार और हैं, मालूम होता हैं उन्होंने शंख की आवाज नहीं सुनी। खैर, अभी तो मैं इसी जंगल में हूँ, उन बाकी शेरों को भी दिखला दूंगा-कल भर शिकार और बन्द रखो।
भैरोंसिंह-फिर आपसे मुलाकात कहाँ होगी? आपकी धूनी किस जगह लगेगी?
बाबाजी-मुझे तो यही जगह आनन्द की मालूम होती है। कल इसी जगह आना, मुलाकात होगी।
बाबाजी शेर से नीचे उतर पड़े और जितने शेर उस जगह आए थे, वे सब बाबाजी के चारों तरफ घूमने तथा मुहब्बत से उनके बदन को चाटने और सूँघने लगे।
ये चारों आदमी थोड़ी देर तक वहाँ और अटकने के बाद बाबाजी से विदा हो खेमे में आये।
जब सन्नाटा हुआ तो भैरोंसिंह ने इन्द्रजीतसिंह से कहा-"मेरे दिमाग में इस समय बहुत-सी बातें घूम रही हैं। मैं चाहता हूँ कि हम लोग चारों आदमी एक जगह बैठ कमेटी कर कुछ राय पक्की करें।"
इन्द्रजीतसिंह ने कहा-"अच्छा, आनन्द और तारा को भी इसी जगह बुला लो।"
भैरोंसिंह गये और आनन्दसिंह तथा तारासिंह को उसी जगह बुला लाए। उसवक्त सिवाय इन चारों के उस खेमे में और कोई न रहा। भैरोंसिंह ने अपने दिल का हाल कहा, जिसे सभी ने बड़े गौर से सुना। इसके बाद पहर भर तक कमेटी करके निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।
यह कमेटी कैसी हुई, भैरोंसिंह का क्या इरादा हुआ और उन्होंने क्या निश्चय किया तथा रात-भर ये लोग क्या करते रहे, इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, समय पर सब खुल जाएगा।
सवेरा होते ही चारों आदमी खेमे के बाहर हुए और अपनी फौज के सरदार कंचनसिंह को बुलाकर कुछ समझा कर बाबाजी की तरफ रवाना हुए। जब लश्कर से दूर निकल गए, आनन्दसिंह, भैरोंसिंह और तारासिंह तो तेजी के साथ चुनार की तरफ रवाना हुए और इन्द्रजीतसिंह अकेले बाबाजी से मिलने गए।
बाबाजी शेरों के बीच धूनी रमाये बैठे थे। दो शेर उनके चारों तरफ घूम-घूम कर पहरा दे रहे थे। इन्द्रजीतसिंह ने पहुँच कर प्रणाम किया और बाबाजी ने आशीर्वाद देकर बैठने के लिए कहा।
इन्द्रजीतसिंह ने बनिस्बत कल के आज दो शेर और ज्यादा देखे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद बातचीत होने लगी।
बाबाजी-कहो इन्द्रजीतसिंह, तुम्हारे भाई और ऐयार कहाँ रह गए? वे क्यों नहीं आए?
इन्द्रजीतसिंह-हमारे छोटे भाई आनन्दसिंह को बुखार आ गया, इस सबब से वह नहीं आ सका। उसी की हिफाजत में दोनों ऐयारों को छोड़ मैं अकेला आपके दर्शन को आया हूँ।
बाबाजी-अच्छा क्या हर्ज है, आज शाम तक वह अच्छे हो जाएंगे। कहो आज कल तुम्हारे राज्य में कुशल तो है?
इन्द्रजीतसिंह-आपकी कृपा से सब आनन्द है।
बाबाजी–बेचारे वीरेन्द्रसिंह ने भी बड़ा कष्ट पाया! खैर जो हो, दुनिया में उनका नाम रह जाएगा। इस हजार वर्ष के अन्दर कोई ऐसा राजा नहीं हुआ जिसने तिलिस्म तोड़ा हो। एक और तिलिस्म है, असल में वही भारी और तारीफ के लायक है।
इन्द्रजीतसिंह-पिताजी तो कहते हैं कि वह तिलिस्म तेरे हाथ से टूटेगा।
बाबाजी–हाँ ऐसा ही होगा, वह जरूर तुम्हारे हाथ से फतह होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।
इन्द्रजीतसिंह-देखें, कब तक ऐसा होता है, उसकी ताली का तो कहीं पता ही नहीं लगता।
बाबाजी-ईश्वर चाहेगा तो एक ही दो दिन में तुम उस तिलिस्म को तोड़ने में हाथ लगा दोगे, उस तिलिस्म की ताली मैं हूँ, कई पुश्तों से हम लोग उस तिलिस्म के दरोगा होते चले आए हैं। मेरे परदादा, दादा और बाप उसी तिलिस्म के दरोगा थे, जब मेरे पिता का देहान्त होने लगा तब उन्होंने उसकी ताली मेरे सुपुर्द कर मुझे उसका दरोगा मुकर्रर कर दिया। अब वक्त आ गया है कि मैं उसकी ताली तुम्हारे हवाले करूँ क्योंकि वह तिलिस्म तुम्हारे नाम पर बांधा गया है और सिवाय तुम्हारे कोई दूसरा उसका मालिक नहीं बन सकता।
इन्द्रजीतसिंह-तो अब देर क्या है?
बाबाजी—कुछ नहीं, कल से तुम उसके तोड़ने में हाथ लगा दो, मगर एक बात तुम्हारे फायदे की हम कहते हैं।
इन्द्रजीतसिंह-वह क्या?
बाबाजी-तुम उसके तोड़ने में अपने भाई आनन्द को भी शरीक कर लो, ऐसा करने से दौलत भी दूनी मिलेगी और नाम भी दोनों भाइयों का दुनिया में हमेशा के लिए बना रहेगा।
इन्द्रजीतसिंह-उसकी तो तबीयत ही ठीक नहीं!
बाबाजी—क्या हर्ज है! तुम अभी जाकर जिस तरह बने, उसे मेरे पास ले आओ, मैं बात की बात में उसको चंगा कर दूंगा। आज ही तुम लोग मेरे साथ चलो, जिसमें कल तिलिस्म टूटने में हाथ लग जाय, नहीं तो साल भर फिर मौका न मिलेगा।
इन्द्रजीतसिंह-बाबाजी, असल बात यह है कि मैं अपने भाई की बढ़ती नहीं चाहता। मुझे यह मंजूर नहीं कि मेरे साथ उसका भी नाम हो।
बाबाजी-नहीं-नहीं, तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए, दुनिया में भाई से बढ़ के कोई रत्न नहीं है।
इन्द्रजीतसिंह-जी हाँ, दुनिया में भाई से बढ़ के रत्न नहीं, तो भाई से बढ़ के कोई दुश्मन भी नहीं, यह बात मेरे दिल में ऐसी बैठ गयी है कि उसके हटाने के लिए ब्रह्मा भी आकर समझावें-बुझावें, तो भी कुछ नतीजा न निकलेगा।
बाबाजी-बिना उसको साथ लिए तुम तिलिस्म नहीं तोड़ सकते।
इन्द्रजीतसिंह-(हाथ जोड़कर) बस, तो जाने दीजिए। माफ कीजिये, मुझे तिलिस्म तोड़ने की जरूरत नहीं!
बाबाजी-क्या तुम्हें इतनी जिद है?
इन्द्रजीतसिंह-मैं कह जो चुका कि ब्रह्मा भी मेरी राय नहीं पलट सकते।
बाबाजी–खैर, तब तुम्हीं चलो, मगर इसी वक्त चलना होगा।
इन्द्रजीतसिंह-हाँ-हाँ, मैं तैयार हूँ, अभी चलिए।
बाबाजी उसी समय उठ खड़े हुए। अपनी गठड़ी-मुटड़ी बाँध एक शेर पर लाद दिया तथा दूसरे पर आप सवार हो गये। इसके बाद एक शेर की तरफ देखकर कहा, "बच्चा गंगाराम, यहाँ तो आओ!" वह शेर तुरन्त इनके पास आया। बाबाजी ने इन्द्रजीतसिंह से कहा, "तुम इस पर सवार हो लो।" इन्द्रजीतसिंह कूदकर सवार हो गये और बाबाजी के साथ-साथ दक्षिण का रास्ता लिया। बाबाजी के साथी शेर भी कोई आगे कोई पीछे, कोई बायें कोई दायें हो बाबाजी के साथ जाने लगे।
सब शेर तो पीछे रह गये, मगर दो शेर जिन पर बाबाजी और इन्द्रजीतसिंह सवार थे, आगे निकल गये। दोपहर तक दोनों चलते गये। जब दिन ढलने लगा, बाबाजी ने इन्द्रजीतसिंह से कहा, "यहाँ ठहर कर कुछ खा-पी लेना चाहिए।" इसके जवाब में कुमार बोले, "बाबाजी, खाने-पीने की कोई जरूरत नहीं। आप महात्मा ही ठहरे, मुझे कोई भूख नहीं है, फिर अटकने की क्या जरूरत है? जिस काम में पड़े, उसमें सुस्ती करना ठीक नहीं!"
बाबाजी ने कहा, "शाबाश, तुम बड़े बहादुर हो। अगर तुम्हारा दिल इतना मजबूत न होता तो तिलिस्म तुम्हारे ही हाथ से टूटेगा, ऐसा बड़े लोग न कह जाते, खैर चलो।"
कुछ दिन बाकी रहा जब ये दोनों एक पहाड़ी के नीचे पहुँचे। बाबाजी ने शंख बजाया, थोड़ी ही देर में चारों तरफ से सैकड़ों पहाड़ी लुटेरे हाथ में बरछे लिए आते दिखाई पड़े और ऐसे ही बीस-पच्चीस आदमियों को साथ लिए पूरब की तरफ से आता हुआ राजा शिवदत्त नजर पड़ा, जिसे देखते ही इन्द्रजीतसिंह ने ऊँची आवाज में कहा, "इनको मैं पहचान गया, यही महाराज शिवदत्त हैं। इनकी तस्वीर मेरे कमरे में लटकी हुई है। दादाजी ने इनकी तस्वीर मुझे दिखा कर कहा था कि हमारे सबसे भारी दुश्मन यही महाराज शिवदत्त हैं। ओफ-ओह, हकीकत में बाबाजी ऐयार ही निकले, जो सोचा था वही हुआ! खैर क्या हर्ज है। इन्द्रजीतसिंह को गिरफ्तार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है!"
शिवदत्त-(पास पहुँचकर) मेरा आधा कलेजा तो ठंडा हुआ, मगर अफसोस, तुम दोनों भाई हाथ न आये।
इन्द्रजीतसिंह-जी, इस भरोसे न रहियेगा कि इन्द्रजीतसिंह को फाँस लिया। उनकी तरफ बुरी निगाह से देखना भी बहुत खतरे का काम है!
ग्रन्थकर्ता-भला इसमें भी कोई शक है!
२
इस जगह पर थोड़ा-सा हाल महाराज शिवदत्त का भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है। महाराज शिवदत्त को हर तरह से कुँअर वीरेद्रसिंह के मुकाबले में हार माननी पड़ी। लाचार उसने शहर छोड़ दिया और अपने कई पुराने खैरख्वाहों को साथ ले चुनार के दक्खिन की तरफ रवाना हुआ।
चुनार से थोड़ा ही दूर दक्खिन में लम्बा-चौड़ा घना जंगल है। यह विंध्य के पहाड़ी जंगल का सिलसिला राबर्ट्सगंज, सरगुजा और सिंगरौली होता हुआ सैकड़ों कोस तक चला गया है जिसमें बड़े-बड़े पहाड़, घाटियाँ, दरें और खोह पड़ते हैं। बीच में दो-दो चार-चार कोस के फासले पर गाँव भी आबाद हैं। कहीं-कहीं पहाड़ों पर पुराने जमाने के टूटे-फूटे आलीशान किले अभी तक दिखाई पड़ते हैं। चुनार से आठ-दस कोस दक्षिण अहरौरा के पास पहाड़ पर पुराने जमाने के एक बर्बाद किले के निशान आज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता है। गौर करने से यह मालूम होता है कि जब यह किला दुरुस्त होगा तो तीन कोस से ज्यादे लम्बी-चौड़ी जमीन इसने घेरी होगी, आखिर में यह किला काशी के मशहू राजा चेतसिंह के अधिकार में था। इन्हीं जंगलों में अपनी रानी और कई खैरख्वाहों को मय उनकी औरतों और बाल-बच्चों के साथ लिए घूमते-फिरते महाराज शिवदत्त ने चुनार से लगभग पचास कोस दूर जाकर एक हरी-भरी मुहावनी पहाड़ी के ऊपर के एक पुराने टूटे हुए मजबूत किले में डेरा डाला और उसका नाम शिवदत्तगढ़ रखा जिसमें उस वक्त भी कई कमरे और दालान रहने लायक थे। यह छोटी पहाड़ी अपने चारों तरफ के ऊँचे पहाड़ों के बीच में इस तरह छिपी और दबी हुई थी कि यकायक किसी का यहाँ पहुँचना और कुछ पता लगाना मुश्किल था।
इस वक्त महाराज शिवदत्त के साथ सिर्फ बीस आदमी थे जिनमें तीन मुसलमान ऐयार थे जो शायद नाजिम और अहमद के रिश्तेदारों में से थे और यह समझ कर महाराज शिवदत्त के साथ हो गये थे कि इनके साथ मिले रहने से कभी-न-कभी राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला लेने का मौका मिल ही जायगा, दूसरे सिवाय शिवदत्त के और कोई इस लायक नजर भी न आता था जो इन बेईमानों को ऐयारी के लिए अपने साथ रखता। नीचे लिखे नामों से तीनों ऐयार पुकारे जाते थे—बाकरअली, खुदाबख्श और यारअली। इन सब ऐयारों और साथियों ने रुपये-पैसे से भी जहाँ तक बन पड़ा, महाराज शिवदत्त की मदद की।
राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ से शिवदत्त का दिल साफ न हुआ, मगर मौका न मिलने के सबब मुद्दत तक उसे चुपचाप बैठे रहना पड़ा। अपनी चालाकी और होशियारी से वह पहाड़ी भील और खरवार इत्यादि जाति के आदमियों का राजा बन बैठा और उनसे मालगुजारी में गल्ला घी शहद और बहुत-सी जंगली चीजें वसूल करने और उन्हीं लोगों की मार्फत शहर में भेजवा और विकवाकर रुपया बटोरने लगा। उन्हीं लोगों को होशियार करके थोड़ी-बहुत फौज भी उसने बना ली। धीरे-धीरे वे पहाड़ी जाति के लोग भी होशियार हो गये और खुद शहर में जाकर गल्ला वगैरह वेच रूपये इकट्ठा करने लगे। शिवदत्तगढ़ भी अच्छी तरह आबाद हो गया।
इधर बाकरअली वगैरह ऐयारों ने भी अपने कुछ साथियों को, जो चुनार से इनके साथ आये थे, ऐयारी के फन में खूब होशियार किया। इस बीच में एक लड़का और उसके बाद लड़की भी महाराज शिवदत्त के घर पैदा हुई। मौका पाकर अपने बहुत-से आदमियों और ऐयारों को साथ ले वह शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला और राजा वीरेन्द्रसिंह से बदला लेने की फिक्र में कई महीने तक घूमता रहा। अब महाराज शिवदत्त का इतना ही मुख्तसिर हाल लिखकर हम इस बयान को समाप्त करते हैं और फिर इन्द्रजीतसिंह के किस्से को छेड़ते हैं।
इन्द्रजीतसिंह के गिरफ्तार होने के बाद उन बनावटी शेरों ने भी अपनी हालत बदली और असली सूरत के ऐयार बन बैठे जिनमें यारअली, बाकरअली और खुदाबख्श मुखिया थे। महाराज शिवदत्त बहुत ही खुश हुआ और समझा कि अब मेरा जमाना फिरा, ईश्वर चाहेगा तो मैं फिर चुनार की गद्दी पाऊँगा और अपने दुश्मनों से पूरा बदला लूँगा।
इन्द्रजीतसिंह को कैद कर वह शिवदत्तगढ़ को ले गया। सभी को ताज्जुब हुआ कि कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने गिरफ्तार होते समय कुछ उत्पात न मचाया, किसी पर गुस्सा न निकाला, किसी पर हरबा न उठाया, यहाँ तक कि आँखों से रंज, अफसोस या क्रोध भी जाहिर न होने दिया। हकीकत में यह ताज्जुब की बात थी भी कि बहादुर वीरेन्द्रसिंह का शेरदिल लड़का ऐसी हालत में चुप रह जाय और बिना हुज्जत किये बेड़ी पहन ले, मगर नहीं, इसका कोई सबब जरूर है जो आगे चलकर मालूम होगा।
३
चुनारगढ़ किले के अन्दर एक कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह, वीरेन्द्रसिंह, जीतसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह बैठे हुए कुछ बातें कर रहे हैं।
जीतसिंह-भैरों ने बड़ी होशियारी का काम किया कि अपने को इन्द्रजीतसिंह की सूरत बना शिवदत्त के ऐयारों के हाथ फँसाया।
सुरेन्द्रसिंह-शिवदत्त के ऐयारों ने चालाकी तो की थी मगर...
वीरेन्द्रसिंह-बाबाजी शेर पर सवार हो सिद्ध तो बने लेकिन अपना काम सिद्ध न कर सके।
इन्द्रजीतसिंह-मगर जैसे हो, भैरोंसिंह को अब बहुत जल्द छुड़ाना चाहिए।
जीतसिंह-कुमार, घबराओ मत। तुम्हारे दोस्त को किसी तरह की तकलीफ नहीं हो सकती, लेकिन अभी उसका शिवदत्त के यहाँ फँसे ही रहना मुनासिब है। वह बेवकूफ नहीं है, विना मदद के आप ही छूटकर आ सकता है जिस पर पन्नालाल, रामनारायण, चुन्नीलाल, बद्रीनाथ और योतिषीजी उसकी मदद को भेजे ही गये हैं। देखो तो क्या होता है! इतने दिनों तक चुपचाप बैठे रहकर शिवदत्त ने फिर अपनी खराबी कराने पर कमर बाँधी है।
देवीसिंह-कुमारों के साथ जो फौज शिकारगाह में गयी है, उसके लिए अब क्या हुक्म होता है?
जीतसिंह-अभी शिकारगाह से डेरा उठाना मुनासिब नहीं। (तेजसिंह की तरफ देखकर) क्यों तेज?
तेजसिंह-(हाथ जोड़कर) जी हाँ, शिकारगाह में डेरा कायम रहने से हम लोग बड़ी खूबसूरती और दिल्लगी से अपना काम निकाल सकेंगे।
सुरेन्द्रसिंह-कोई ऐयार शिवदत्तगढ़ से लौटे तो कुछ हाल-चाल मालूम हो।
तेजसिंह-कल तो नहीं, मगर परसों तक कोई-न-कोई जरूर आयेगा। पहर भर से ज्यादे देर तक बातचीत होती रही। कुल वात को खोलना हम मुनासिब नहीं समझते बल्कि आखिरी बात का पता तो हमें भी न लगा जो मजलिस उठने के बाद जीतसिंह ने अकेले में तेजसिंह को समझायी थी। खैर, जाने दीजिए, जो होगा देखा जायगा, जल्दी क्या है।
गंगा के किनारे ऊँची बारहदरी में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह दोनों भाई बैठे जल की कैफियत देख रहे हैं। बरसात का मौसम है, गंगा खूब बढ़ी हुई हैं, किले के नीचे जल पहुँचा है, छोटी-छोटी लहरें दीवारों में टक्कर मार रही हैं, अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा जल में पड़ कर लहरों की शोभा दूनी बढ़ा रही है, सन्नाटे का आलम है, इस बारहदरी में सिवाय इन दोनों भाइयों के कोई तीसरा दिखाई नहीं देता।
इन्द्रजीतसिंह-अभी जल कुछ और बढ़ेगा।
आनन्दसिंह-जी हाँ, पिछले साल तो गंगा आज से कहीं ज्यादा बढ़ी हुई थीं, जब दादाजी ने हम लोगों को तैरकर पार जाने के लिए कहा था।
इन्द्रजीतसिंह-उस दिन भी खूब ही दिल्लगी हुई, भैरोंसिंह सभी में तेज रहा, बद्रीनाथ ने कितना ही चाहा कि उसके आगे निकल जाय, मगर न हो सका।
आनन्दसिंह-हम दोनों भी कोस भर दूर तक उस किश्ती के साथ ही गए जो हम लोगों की हिफाजत के लिए संग गयी थी।
इन्द्रजीतसिंह-बस वही तो हम लोगों का आखिरी इम्तिहान रहा, फिर तब से जल में तैरने की नौबत ही कहाँ आयी।
आनन्दसिंह-कल तो मैंने दादाजी से कहा था कि आजकल गंगाजी खूब बढ़ी हुई हैं, तैरने को जी चाहता है।
इन्द्रजीतसिंह-तब क्या बोले?
आनन्दसिंह–कहने लगे कि बस, अब तुम लोगों का तैरना मुनासिब नहीं है, हँसी होगी। तैरना भी एक इल्म है जिसमें तुम लोग होशियार हो चुके। अब क्या जरूरत है? ऐसा ही जी चाहे तो किश्ती पर सवार होकर जाओ, सैर करो।
इन्द्रजीतसिंह-उन्होंने बहुत ठीक कहा, चलो किश्ती पर थोड़ी दूर घूम आयें। बातचीत हो ही रही थी कि चोबदार ने आकर अर्ज किया, "एक बहुत बूढ़ा जवहरी हाजिर है, दर्शन करना चाहता है।"
आनन्दसिंह—यह कौन-सा वक्त है?
चोबदार—(हाथ जोड़कर) ताबेदार ने तो चाहा था कि इस समय उसे बिदा करे मगर यह खयाल करके ऐसा करने का हौसला न पड़ा कि एक तो लड़कपन ही से वह इस दरबार का नमकख्वार है और महाराज की भी उस पर निगाह रहती है, दूसरे अस्सी वर्ष का बुड्ढा है, तीसरे वह कहता है कि अभी इस शहर में पहुँचा हूँ, महाराज का तो दर्शन कर चुका हूँ, सरकार के भी दर्शन हो जायें तब आराम से सराय में डेरा डालूं और हमेशा से उसका यही दस्तूर भी है।
इन्द्रजीतसिंह-अगर ऐसा है तो उसे आने ही देना मुनासिब है।
आनन्दसिंह-अब आज किश्ती पर सैर करने का रंग नजर नहीं आता।
इन्द्रजीतसिंह—क्या हर्ज है, कल सही।
चोबदार सलाम करके चला गया और थोड़ी देर में सौदागर को लेकर हाजिर हुआ। हकीकत में वह सौदागर बहुत ही बुड्ढा था, रेयासत और शराफत उसके चेहरे से बरसती थी। आते ही सलाम करके उसने दोनों भाइयों को दो अंगूठियाँ दी और कबूल होने के बाद इशारा पाकर जमीन पर बैठ गया।
इस बुड्ढे जवहरी की इज्जत की गयी, मिजाज का हाल तथा सफर की कैफियत पूछने के बाद डेरे पर जाकर आराम करने और कल फिर हाजिर होने का हुक्म हुआ, सौदागर सलाम करके चला गया।
सौदागर ने जो दो अंगूठियाँ दोनों भाइयों को नजर दी थीं उनमें आनन्दसिंह की अंगूठी पर निहायत खुशंरंग मानिक जड़ा हुआ था और इन्द्रजीतसिंह की अंगूठी पर सिर्फ एक छोटी-सी तस्वीर थी जिसे कल फिर एक दफे निगाह भरकर इन्द्रजीतसिंह ने देखा और कुछ सोच चुप ही रहे।
एकान्त होने पर रात को शमादान की रोशनी में फिर उस अंगूठी को देखा जिसमें नगीने की जगह एक कमसिन हसीन औरत की तस्वीर जड़ी हुई थी। चाहे यह तस्वीर कितनी ही छोटी क्यों न हो मगर मुसौवर ने गजब की सफाई इसमें खर्च की थी। इसे देखते-देखते एक मरतबे तो इन्द्रजीतसिंह की यह हालत हो गई कि अपने को और उस औरत की तस्वीर को भूल गए, मालूम हुआ कि स्वयं वह नाजनीन इनके सामने बैठी है और यह उससे कुछ कहना चाहते हैं, मगर उसके हुस्न के रुआब में आकर चुप रह जाते हैं। यकायक यह चौंक पड़े और अपनी बेवकूफी पर अफसोस करने लगे, लेकिन इससे क्या होता है? उस तस्वीर ने तो एक ही सायत में इनके लड़कपन को धूल में मिला दिया और नौजवानी की दीवानी सूरत इनके सामने खड़ी कर दी। थोड़ी देर पहले सवारी शिकार कसरत वगैरह के पेचीले कायदे दिमाग में घूम रहे थे, अब ये एक दूसरी ही उलझन में फंस गये और दिमाग किसी अद्वितीय रत्न के मिलने की फिक्र में गोते खाने लगा। महाराज शिवदत्त की तरफ से अब क्या ऐयारी होती है, भैरोंसिंह क्योंकर और कब कैद से छूटते हैं, देखें, बद्रीनाथ वगैरह शिवदत्तगढ़ में जाकर क्या करते हैं, अब शिकार खेलने की नौबत कब तक आती है, एक ही तीर में शेर को गिरा देने का मौका कब मिलता है, किश्ती पर सवार हो दरिया की सैर करने कब जाना चाहिए इत्यादि खयालों को भूल गए। अब तो यह फिक्र पैदा हुई कि सौदागर को यह अंगूठी क्योंकर हाथ लगी? यह तस्वीर खयाली है या असल में किसी ऐसी की है जो इस दुनिया में मौजूद है? क्या सौदागर उसका पता-ठिकाना जानता होगा? खूबसूरती की इतनी ही हद है या और भी कुछ है? नजाकत, सुडौली और सफाई वगैरह का खजाना यही है या कोई और? इसकी मुहब्बत के दरिया में हमारा बेड़ा क्योंकर पार होगा?
कुअर इन्द्रजीतसिंह ने आज बहाना करना भी सीख लिया और घड़ी भर में ही उस्ताद हो गए। पेट फूला है, भोजन न करेंगे, सिर में दर्द है, किसी का बोलना बुरा मालूम होता है, सन्नाटा हो तो शायद नींद आए, इत्यादि बहानों से उन्होंने अपनी जान बचाई और तमाम रात चारपाई पर करवटें बदल-बदल कर इस फिक्र में काटी कि सवेरा हो तो सौदागर को बुला कर कुछ पूछे।
सवेरे उठते ही जवहरी को हाजिर करने का हुक्म दिया, मगर घण्टे-भर के बाद चोवदार ने वापस आकर अर्ज किया कि सराय में सौदागर का पता नहीं लगता।
इन्द्रजीतसिंह-उसने अपना डेरा कहाँ पर बतलाया था?
चोबदार-तावेदार को तो उसकी जुबानी यही मालूम हुआ था कि सराय में उतरेगा, मगर वहाँ दरियाफ्त करने से मालूम हुआ कि कोई सौदागर नहीं आया।
इन्द्रजीतसिंह-किसी दूसरी जगह उतरा होगा, पता लगाओ।
"बहुत खूब" कह कर चोबदार तो चला गया मगर इन्द्रजीतसिंह कुछ तरद्दुद में पड़ गये। सिर नीचा करके सोच रहे थे कि किसी के पैर की आहट ने चौंका दिया, सिर उठा कर देखा तो कुँअर आनन्दसिंह थे।
आनन्दसिंह–स्नान का समय तो हो गया।
इन्द्रजीतसिंह–हाँ, आज कुछ देर हो गई।
आनन्दसिंह-तबीयत कुछ सुस्त मालूम होती है?
इन्द्रजीतसिंह-रात भर सिर में दर्द था।
आनन्दसिंह-अब कैसा है?
इन्द्रजीतसिंह–अब तो ठीक है।
आनन्दसिंह-कल कुछ झलक सी मालूम पड़ी थी कि उस अंगूठी में कोई तस्वीर जड़ी हुई है जो उस जौहरी ने नजर की थी।
इन्द्रजीतसिंह-हाँ, थी तो।
आनन्दसिंह-कैसी तस्वीर है?
इन्द्रजीतसिंह-न मालूम वह अंगूठी कहाँ रख दी कि मिलती ही नहीं। मैंने भी सोचा था कि दिन को अच्छी तरह देखूगा, मगर...
ग्रन्थकर्ता-सच है, इसकी गवाही तो मैं भी दूंगा!
अगर भेद खुल जाने का डर न होता तो कुँअर इन्द्रजीतसिंह सिवा 'ओफ' करने और लम्बी-लम्बी साँसे लेने के कोई दूसरा काम न करते मगर क्या करें लाचारी से सभी मामूली काम और अपने दादा के साथ बैठकर भोजन भी करना पड़ा, हाँ शाम को इनकी बेचैनी बहुत बढ़ गई जब सुना कि तमाम शहर छान डालने पर भी उस जवहरी का कहीं पता न लगा और यह भी मालूम हुआ कि उस जवहरी ने बिलकुल झूठ कहा था कि महाराज का दर्शन कर आया हूँ, अब कुमार के दर्शन हो जायँ तब आराम से सराय में डेरा डालूँ। वह वास्तव में महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह से नहीं मिला था।
तीसरे दिन इनको बहुत ही उदास देख आनन्दसिंह ने किश्ती पर सवार होकर गंगाजी की सैर करने और दिल बहलाने के लिए जिद की, लाचार उनकी बात माननी ही पड़ी।
एक छोटी-सी खूबसूरत और तेज जाने वाली किश्ती पर सवार हो इन्द्रजीतसिंह ने चाहा कि किसी को साथ न ले जायें सिर्फ दोनों भाई ही सवार हों और खे कर दरिया की सैर करें। किसकी मजाल थी जो इनकी बात काटता, मगर एक पुराने खिदमतगार ने जिसने कि वीरेन्द्रसिंह को गोद में खिलाया था और अब इन दोनों के साथ रहता था ऐसा करने से रोका और जब दोनों भाइयों ने न माना तो वह खुद किश्ती पर सवार हो गया। पुराना नौकर होने के खयाल से दोनों भाई कुछ न बोले, लाचार साथ ले जाना ही पड़ा।
आनन्दसिंह-किश्ती को धारा में ले जाकर बहाव पर छोड़ दीजिये। फिर खे कर ले आवेंगे।
इन्द्रजीतसिंह-अच्छी बात है।
सिर्फ दो घण्टे दिन बाकी था जब दोनों भाई किश्ती पर सवार हो दरिया की सैर करने को गए क्योंकि लौटते समय चाँदनी रात का भी आनन्द लेना मंजूर था।
चुनार से दो कोस पश्चिम गंगा के किनारे पर एक छोटा-सा जंगल था। जब किश्ती उसके पास पहुंची, वंशी की और साथ ही गाने की बारीक सुरीली आवाज इन लोगों के कानों में पड़ी। संगी एक ऐसी चीज है कि हर एक के दिल को चाहे वह कैसा ही नासमझ क्यों न हो अपनी तरफ खींच लेती है, यहाँ तक कि जानवर भी इसके वश में होकर अपने को भूल जाता है। दो-तीन दिन से कुँअर इन्द्रजीतसिंह का दिल चुटीला हो रहा था, दरिया की बहार देखना तो दूर रहा, इन्हें अपने तन-बदन की भी सुध न थी। ये तो अपनी प्यारी तस्वीर की में सिर धुन झुकाए बैठे कुछ इनके हिसाब चारों तरफ सन्नाटा था, मगर इस सुरीली आवाज ने इनकी गर्दन घुमा दी और उस तरफ देखने को मजबूर किया जिधर से वह आ रही थी।
किनारे की तरफ देखने से यह तो मालूम न हुआ कि वंशी बजाने या गाने वाला कौन है मगर इस बात का अन्दाज जरूर मिल गया कि वे लोग बहुत दूर नहीं हैं जिनके गाने की आवाज सुनने वालों पर जादू का सा असर कर रही है। इन्द्रजीतसिंह-आहा, क्या सुरीली आवाज है!
आनन्दसिंह-दूसरी आवाज भी आई। बेशक कई औरतें मिल कर गा-बजा रही हैं।
इन्द्रजीतसिंह-(किश्ती का मुँह किनारे की तरफ फेर कर) ताज्जुब है कि इन लोगों ने गाने-बजाने और दिल बहलाने के लिए ऐसी जगह पसन्द की। जरा देखना चाहिए।
आनन्दसिंह-क्या हर्ज है, चलिए।
बूढ़े खिदमतगार ने किनारे पर किश्ती लगाने और उतरने के लिए मना किया और बहुत समझाया मगर इन दोनों ने न माना। किश्ती किनारे लगाई और उतर कर उस तरफ चले जिधर से आवाज आ रही थी। जंगल में थोड़ी ही दूर जाकर दस-पन्द्रह सोच रहे थे, नौजवान औरतों का एक झुंड नजर पड़ा जो रंग-बिरंगी पोशाक और कीमती जेवरों से अपने हुस्न को दूना किए ऊँचे पेड़ से लटकते हुए एक झूले को झुला रही थीं। कोई वंशी कोई मृदंगी बजाती, कोई हाथ से ताल दे-देकर गा रही थी। उस हिंडोले पर सिर्फ एक ही औरत गंगा की तरफ रुख किए बैठी थी। ऐसा मालूम होता था मानो परियाँ साक्षात् किसी देवकन्या को झूला झुला और गा-बजा कर इसलिए प्रसन्न कर रही हैं कि खूबसूरती बढ़ने और नौजवानी के स्थिर रहने का वरदान पावें। मगर नहीं, उनके भी दिल की दिल ही में रही और कुंअर इन्द्रजीतसिंह तथा आनन्दसिंह को आते देख हिंडोले पर बैठी हुई नाजनीन को अकेली छोड़ न जाने क्यों भाग ही जाना पड़ा।
आनन्दसिंह-भैया, वे सब तो भाग गईं!
इन्द्रजीतसिंह–हाँ, मैं इस हिंडोले पास जाता हूँ, तुम देखो कि वे औरतें किधर गईं?
आनन्दसिंह-बहुत अच्छा।
चाहे जो हो मगर कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने उसे पहचान ही लिया जो हिंडोले पर अकेली रह गई थी। भला यह क्यों न पहचानते? जवहरी की नजर दी हुई अँगूठी पर उसकी तस्वीर देख चुके थे, इनके दिल में उसकी तस्वीर खुद गई थी, अब तो मुँहमाँगी मुराद पाई, जिसके लिए अपने को मिटाना मंजूर था, उसे बिना परिश्रम पाया, फिर क्या चाहिए?
आनन्दसिंह पता लगाने के लिए उन औरतों के पीछे गए, मगर वे ऐसा भागी कि झलक तक दिखाई न दी, लाचार आधे घण्टे तक हैरान होकर फिर उस हिंडोले के पास पहुँचे, हिंडोले पर बैठी हुई औरत को कौन कहे अपने भाई को भी वहाँ न पाया। घबरा कर इधर-उधर ढूँढ़ने और पुकारने लगे, यहाँ तक कि रात हो गई और यह सोच कर किश्ती के पास पहुँचे कि शायद वहाँ चले गये हों, लेकिन वहाँ भी सिवाय उस बूढ़े खिदमतगार के किसी दूसरे को न देखा। जी बेचैन हो गया, खिदमतगार को सब हाल बताकर बोले, "जब तक अपने प्यारे भाई का पता न लगा लूंगा घर न जाऊँगा, तू जाकर यहाँ का हाल सब को खबर कर दे।"
खिदमतगार ने हर तरह से आनन्दसिंह को समझाया और घर चलने के लिए कहा मगर कुछ फायदा न निकला। लाचार उसने किश्ती उसी जगह छोड़ी और पैदल रोता-कलपता किले की तरफ रवाना हुआ। क्योंकि यहाँ जो कुछ हो चुका था, उसका हाल राजा वीरेन्द्रसिंह से कहना भी उसने आवश्यक समझा।
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खिदमतगार ने किले में पहुँच कर और यह सुन कर कि इस समय दोनों एक ही जगह बैठे हैं कुँअर इन्द्रजीतसिंह के गायब होने का हाल और सबब जो कुंअर आनन्दसिंह की जुबानी सुना था, महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह के पास होकर अर्ज किया। इस खबर के सुनते ही उन दोनों के कलेजे में चोट सी लगी। थोड़ी देर तक घबराहट सबब कुछ सोच न सके कि क्या करना चाहिए। रात भी एक पहर से ज्यादा जा चुकी थी। आखिर जीतसिंह, तेजसिंह और देवी सिंह को बुला कर खिदमतगार की जुबानी जो कुछ सुना था कहा और पूछा कि अब क्या करना चाहिए?
तेजसिंह-उरा जंगल में इतनी औरतों का इकट्ठे होकर गाना-बजाना और इस तरह धोखा देना बेसबब नहीं है।
सुरेन्द्रसिंह-जब से शिवदत्त के उभरने की खबर सुनी है, एक खटका सा बना रहता है। मैं समझता हूँ यह भी उसी की शैतानी है।
वीरेन्द्रसिंह-दोनों लड़के ऐसे कमजोर भी तो नहीं हैं कि जिसका जी चाहे, उन्हें पकड़ ले।
सुरेन्द्रसिंह-ठीक है मगर आनन्दसिंह का भी वहाँ रह जाना बुरा ही हुआ।
तेजसिंह-बेचारा खिदमतगार जबर्दस्ती साथ हो गया था, नहीं तो पता भी न लगता कि दोनों कहाँ चले गये। खैर, उनके बारे में जो कुछ सोचना है सोचिये मगर मुझे जल्द इजाजत दीजिये कि हजार सिपाहियों को साथ लेकर वहाँ जाऊँ और इसी वक्त उस छोटे से जंगल को चारों तरफ से घेर लूं, फिर जो कुछ होगा देखा जायगा।
सुरेन्द्रसिंह—(जीतसिंह से) क्या राय है?
जीतसिंह-तेज ठीक कहता है, इसे अभी जाना चाहिए। हुक्म पाते ही तेजसिंह दीवानखाने के ऊपर बुर्ज पर चढ़ गए, जहाँ बड़ा-सा नक्कारा और उसके पास ही एक भारी चोब इसलिए रक्खा हुआ था कि वक्त-बे-वक्त कोई जरूरत आ पड़े और फौज को तुरन्त तैयार करना हो, तो इस नक्कारे पर चोब मारी जाय। इसकी आवाज भी निराले ढंग की थी जो किसी नक्कारे की आवाज से मिलती न थी और इसके बजाने के लिए तेजसिंह ने कई इशारे भी मुकर्रर किये
तेजसिंह ने चोब उठा कर जोर से एक दफा नक्कारे पर मारा जिसकी आवाज तमाम शहर में बल्कि दूर-दूर तक गूंज गई। चाहे इसका सबब किसी शहर वाले की समझ में न आया हो मगर सेनापति समझ गया कि इसी वक्त हजार फौजी सिपाहियों की जरूरत है जिसका इन्तजाम उसने बहुत जल्द किया।
तेजसिंह अपने सामान से तैयार हो किले के बाहर निकले और हजार सिपाही तथा बहुत से मशालचियों को साथ ले उस छोटे से जंगल की तरफ रवाना होकर बहुत जल्दी ही वहाँ जा पहुँचे।
थोड़ी-थोड़ी दूर पर पहरा मुकर्रर करके चारों तरफ से उस जंगल को घेर लिया। इन्द्रजीतसिंह तो गायब हो ही चुके थे, आनन्दसिंह के मिलने की बहुत तरकीब की गई मगर उनका भी पता न लगा। तरदुद में रात बिताई, सवेरा होते ही तेजसिंह ने हुक्म दिया कि एक तरफ से इस जंगल को तेजी के साथ काटना शुरू करो जिसमें दिन भर में तमाम जंगल साफ हो जाय।
उसी समय महाराज सुरेन्द्र सिंह और जीतसिंह भी वहाँ आ पहुंचे। जंगल का काटना इन्होंने भी पसन्द किया और बोले कि 'बहुत अच्छा होगा, अगर हम लोग इस जंगल से एकदम ही निश्चिन्त हो जायें।"
इस छोटे जंगल को काटते देर ही कितनी लगनी थी, जिस पर महाराज की मुस्तैदी के सबब यहाँ कोई भी ऐसा नजर नहीं आता था जो पेड़ों की कटाई में न लगा हो। दोपहर होते-होते जंगल कट के साफ हो गया, मगर किसी का कुछ पता न लगा यहाँ तक कि इन्द्रजीतसिंह की तरह आनन्दसिंह के भी गायब हो जाने का निश्चय करना पड़ा। हाँ, इस जंगल के अन्त में एक कमसिन नौजवान हसीन और बेशकीमती गहने-कपड़े से सजी हुई औरत की लाश पाई गई जिसके सिर का पता न था।
यह लाश महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास लाई गई। अब सब की परेशानी और बढ़ गई और तरह-तरह के खयाल पैदा होने लगे। लाचार उस लाश को साथ लेकर शहर की तरफ लौटे। जीतसिंह ने कहा, "हम लोग जाते हैं, तारासिंह को भेज सब ऐयारों को जो शिवदत्त की फिक्र में गए हुए हैं बुलवा कर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह की तलाश में भेजेंगे, मगर तुम इसी वक्त उनकी खोज में जहाँ तुम्हारा दिल गवाही दे, जाओ।"
तेजसिंह अपने सामान से तैयार ही थे। उसी वक्त सलाम करके एक तरफ को रवाना हो गए, और महाराज रूमाल से आँखों को पोंछते हुए चुनार की तरफ बिदा हुए।
उदास हो पोतों की जुदाई से दुःखी महाराज सुरेन्द्रसिंह घर पहुँचे। दोनों लड़कों के गायब होने का हाल चन्द्रकान्ता ने भी सुना। वह बेचारी दुनिया के दुःख-सुख को अच्छी तरह समझ चुकी थी, इसलिए कलेजा मसोसकर रह गई। जाहिर में रोना-चिल्लाना उसने पसन्द न किया, मगर ऐसा करने से उसके नाजुक दिल पर और भी सदमा पहुँचा, घड़ी भर में ही उसकी सूरत बदल गई। चपला और चम्पा को चन्द्रकान्ता से कितनी मुहब्बत थी इसको आप लोग खूब जानते हैं, लिखने की कोई जरूरत नहीं।दोनों लड़कों के गायब होने का गम इन दोनों को चन्द्रकान्ता से ज्यादा हुआ और दोनों ने निश्चय कर लिया कि मौका पाकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का पता लगाने की कोशिश करेंगी।
महाराज सुरेन्द्रसिंह के आने की खबर पाकर वीरेन्द्रसिंह मिलने के लिए उनके पास गए। देवीसिंह भी वहाँ मौजूद थे। वीरेन्द्रसिंह के सामने ही महाराज ने सब हाल देवीसिंह से कहकर पूछा कि "अब क्या करना चाहिए?"
देवीसिंह-मैं पहले तो उस लाश को देखना चाहता हूँ जो उस जंगल में पाई गई थी।
सुरेन्द्रसिंह-हाँ, तुम उसे जरूर देखो।
जीतसिंह-(चोबदार से) उस लाश को, जो जंगल में पाई गई थी, इसी जगह लाने के लिए कहो।
"बहुत अच्छा" कहकर चोबदार बाहर चला गया, मगर थोड़ी ही देर में वापस आकर बोला, "महाराज के साथ आते-आते न मालूम वह लाश कहाँ गुम हो गई। कई आदमी उसकी खोज में परेशान हैं मगर पता लगता!"
वीरेन्द्रसिंह-अब फिर हम लोगों को होशियारी से रहने का जमाना आ गया।
जब हजारों आदमियों के बीच से लाश गुम हो गई तो मालूम होता है अभी बहुत कुछ उपद्रव होने वाला है।
जीतसिंह-मैंने तो समझा था कि अब जो कुछ थोड़ी-सी उम्र रह गई है आराम से कटेगी, मगर नहीं, ऐसी उम्मीद किसी को कुछ भी न रखनी चाहिए।
सुरेन्द्रसिंह-खैर, जो होगा देखा जायगा, इस समय क्या करना मुनासिब है, इसे सोचो।
जीतसिंह-मेरा विचार था कि तारासिंह को बद्रीनाथ वगैरह के पास भेजते जिसमें वे लोग भैरोंसिंह को छुड़ाकर और किसी कार्रवाई में न फँसें और सीधे यहाँ चले आवें, मगर ऐसा करने को भी जी नहीं चाहता। आज भर आप और सब्र करें, अच्छी तरह सोच कर कल मैं अपनी राय दूँगा।
५
पण्डित बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण, चुन्नीलाल और जगन्नाथ ज्योतिषी भैरोंसिंह ऐयार को छुड़ाने के लिए शिवदत्तगढ़ की तरफ गए। हुक्म के मुताबिक कंचनसिंह सेनापति ने शेर वाले बाबाजी के पीछे जासूस भेज कर पता लगा लिया था कि भैरोंसिंह ऐयार शिवदत्तगढ़ किले के अन्दर पहुँचाए गए हैं। इसलिए इन ऐयारों का पता लगाने की जरूरत न पड़ी, सीधे शिवदत्तगढ़ पहुँचे और अपनी-अपनी सूरत बदल कर शहर में घूमने लगे। पाँचों ने एक-दूसरे का साथ छोड़ दिया, मगर यह ठीक कर लिया था कि सब लोग घूम-फिर कर फलाँ जगह इकट्ठे हो जायेंगे।
दिन-भर घूम-फिर कर भैरोंसिंह का पता लगाने के बाद सब ऐयार शहर के बाहर एक पहाड़ी पर इकट्ठे हुए और रात-भर सलाह करके राय कायम करने में काटी, दूसरे दिन ये लोग फिर सूरत बदल-बदलकर शिवदत्तगढ़ में पहुँचे। रामनारायण और चुन्नीलाल ने अपनी सूरत। उसी जगह के चोबदारों की सी बनाई और वहाँ पहुँचे जहाँ भैरोंसिंह कैद थे। कई दिनों तक कैद रहने के सबब उन्होंने अपने को जाहिर कर दिया था और असली सूरत में एक कोठरी के अन्दर, जिसके तीन तरफ लोहे का जंगला लगा हुआ था, बन्द थे। उसी कोठरी के बगल में उसी तरह की कोठरी और थी जिसमें गद्दी लगाए बूढ़ा दारोगा बैठा था और कई सिपाही नंगी तलवार लिए घूम-घूम कर पहरा दे रहे थे। रामनारायण और चुन्नीलाल उस कोठरी के दरवाजे पर जाकर खड़े हुए और बूढ़े दारोगा से बात-चीत करने लगे।
रामनारायण-आपको महाराज ने याद किया है।
बूढ़ा-क्यों, क्या काम है? भीतर आओ, बैठो, चलते हैं।
रामनारायण और चुन्नीलाल कोठरी के अन्दर गए और बोले-
रामनारायण-मालूम नहीं, क्यों बुलाया है, मगर ताकीद की है कि जल्द बुला लाओ।
बूढ़ा-अभी घंटा-भर भी नहीं हुआ जब किसी ने आ के कहा था कि महाराज खुद आने वाले हैं, क्या वह बात झूठ थी?
रामनारायण–हाँ, महाराज आने वाले थे, मगर अब न आवेंगे।
बूढ़ा—अच्छा, आप दोनों आदमी इसी जगह बैठे और कैदी की हिफाजत करें। मैं जाता हूँ।
रामनारायण-बहुत अच्छा।
रामनारायण और चुन्नीलाल को कोठरी के अन्दर बैठा कर बूढ़ा दारोगा बाहर आया और चालाकी से झट उस कोठरी का दरवाजा बन्द करके बाहर से बोला, "बन्दगी! मैं दोनों को पहचान गया कि ऐयार हो! कहिये, अब हमारी कैद में आप फंसे या नहीं? मैंने भी क्या मजे में पता लगा लिया। पूछा कि अभी तो मालूम हुआ था कि महाराज खुद आने वाले हैं, आपने भी झट कबूल कर लिया और कहा कि 'हाँ आने वाले थे मगर अब न आवेंगे।' यह न समझे कि मैं को देता हूँ। इसी अक्ल पर ऐयारी करते हो? खैर, आप लोग भी इसी कैदखाने की हवा खाइये और जान लीजिए कि मैं बाकरअली ऐयार आप जैसेलोगों को मजा चखाने के लिए ही इस जगह बैठाया गया हूँ।"
बूढ़े की बात सुन रामनारायण और चुन्नीलाल चुप हो गए, बल्कि शरमा कर सिर नीचा कर लिया। बूढ़ा दारोगा वहाँ से रवाना हुआ और शिवदत्त के पास पहुँच इन दोनों ऐयारों के गिरफ्तार करने का हाल कहा। महाराज ने खुश होकर बाकरअली को इनाम दिया और खुशी-खुशी खुद रामनारायण और चुन्नीलाल को देखने आये।
बद्रीनाथ, पन्नालाल और ज्योतिषीजी को भी यह मालूम हो गया कि हमारे साथियों में से दो ऐयार पकड़े गए। अब तो एक की जगह तीन आदमियों के छुड़ाने के फिक्र करनी पड़ी।
कुछ रात गए ये तीनों ऐयार घूम फिर कर शहर के बाहर की तरफ जा रहे थे कि पीछे से काले कपड़े से अपना तमाम बदन छिपाये एक आदमी लपकता हुआ उनके पास आया और लपेटा हुआ एक छोटा-सा कागज उनके सामने फेंक और अपने साथ आने के लिए हाथ से इशारा करके तेजी से आगे बढ़ा।
बद्रीनाथ ने उस पुर्जे को उठा कर सड़क के किनारे एक बनिये की दुकान पर जलते हुए चिराग की रोशनी में पढ़ा, सिर्फ इतना ही लिखा था-"भैरोंसिंह"। बद्रीनाथ समझ गए कि भैरोंसिंह किसी तरकीब से निकल भागा है और यही जा रहा है। बद्रीनाथ ने भैरोंसिंह के हाथ का लिखा भी पहचाना।
भैरोंसिंह पुर्जा फेंककर इन तीनों को हाथ के इशारे से बुला गया था और दस-बारह कदम आगे बढ़कर अब इन लोगों के आने की राह देख रहा था।
बद्रीनाथ वगैरह खुश होकर आगे बढ़े और उस जगह पहुँचे जहाँ भैरोंसिंह काले कपड़े से बदन को छिपाये सड़क के किनारे आड़ देकर खड़ा था। बातचीत करने का मौका न था, आगे-आगे भैरोंसिंह और पीछे-पीछे बद्रीनाथ, पन्नालाल और ज्योतिषीजी तेजी से कदम बढ़ाते शहर के बाहर हो गये।
रात अँधेरी थी। मैदान में जाकर भैरोंसिंह ने काला कपड़ा उतार दिया। इन तीनों ने चन्द्रमा की रोशनी में भैरोंसिंह को पहचाना-खुश होकर बारी-बारी से तीनों ने उसे गले लगाया और तब एक पत्थर की चट्टान पर बैठकर बातचीत करने लगे।
बद्रीनाथ-भैरोंसिंह, इस वक्त तुम्हें देखकर तबीयत बहुत ही खुश हुई!
भैरोंसिंह-मैं तो किसी तरह छूट आया, मगर रामनारायण और चुन्नीलाल बेढब जा फँसे हैं।
ज्योतिषी-उन दोनों ने भी क्या यही धोखा खाया?
भैरोंसिह-मैं उनके छुड़ाने की भी फिक्र कर रहा हूँ।
पन्नालाल-वह क्या?
भैरोंसिंह-सो सब कहने-सुनने का मौका तो रात-भर है मगर इस समय मुझे भूख बड़े जोर से लगी है, कुछ हो तो खिलाओ।
बद्रीनाथ-दो-चार पेड़े हैं, जी चाहे तो खा लो।
भैरोंसिंह-इन दो-चार पेड़ों से क्या होगा? खैर, पानी का तो बन्दोबस्त होना चाहिए।
बद्रीनाथ-फिर क्या करना चाहिए?
भैरोंसिंह-(हाथ से इशारा करके) वह देखो, शहर के किनारे जो चिराग जल रहा है अभी देखते आये हैं कि वह हलवाई की दूकान है और वह ताजी पूरियाँ बना रहा है, बल्कि पानी भी उसी हलवाई से मिल जायगा।
पन्नालाल-अच्छा, मैं जाता हूँ।
भैरोंसिंह-हम लोग भी साथ चलते हैं, सब का इकट्ठा ही रहना ठीक है। कहीं ऐसा न हो कि आप फंस जायें और हम लोग राह ही देखते रहें।
पन्नालाल-फंसना क्या खिलवाड़ हो गया!
भैरोंसिंह-खैर हर्ज ही क्या है अगर हम लोग साथ चलें? तीन आदमी किनारे खड़े हो जायंगे, एक आदमी आगे बढ़कर सौदा ले लेगा।
बद्रीनाथ-हाँ-हाँ, यही ठीक होगा, चलो, हम लोग एक साथ चलें।
चारों ऐयार एक साथ वहाँ से रवाना हुए और उस हलवाई के पास पहुँचे, जिसकी अकेली दूकान शहर के किनारे पर थी। बद्रीनाथ, ज्योतिषीजी और भैरोंसिंह कुछ इधर ही खड़े रहे और पन्नालाल सौदा खरीदने दुकान पर गये। जाने के पहले ही भैरोंसिंह ने कहा, "मिट्टी के बर्तन में पानी भी देने का इकरार हलवाई से पहले कर लेना नहीं तो पीछे हुज्जत करेगा।"
पन्नालाल हलवाई की दूकान पर गये और दो सेर पूरी तथा सेर भर मिठाई मांगी। हलवाई ने खुद पूछा-"पानी भी चाहिए या नहीं?"
पन्नालाल-हाँ-हाँ, पानी जरूर देना होगा।
हलवाई-कोई बर्तन है?
पन्नालाल-बर्तन तो है, मगर छोटा है। तुम्ही किसी मिट्टी के ठिलिए में जल दे दो।
हलवाई-एक घड़ा जल के लिए आठ आने और देने पड़ेंगे।
पन्नालाल-इतना अन्धेर! खैर, हम देंगे।
पूरी, मिठाई और एक घड़ा जल लेकर चारों ऐयार वहाँ से चले मगर यह खबर किसी को भी न थी कि कुछ दूर पीछे दो आदमी साथ लिए छिपता हुआ हलवाई भी आ रहा है। मैदान में एक बड़े पत्थर की चट्टान पर बैठ चारों ने भोजन किया जल पिया और हाथ-मुंह धो निश्चिन्त हो धीरे-धीरे आपस में बातचीत करने लगे। आधा घंटा भी न बीता होगा कि चारों बेहोश होकर चट्टान पर लेट गये। तभी दोनों आदमियों को साथ लिए हलवाई इनकी खोपड़ी पर आ मौजूद हुआ।
हलवाई के साथ आये दोनों आदमियों ने बद्रीनाथ, ज्योतिषीजी और पन्नालाल की मुश्कें कस डालीं और कुछ सुंघाकर भैरोंसिंह को होश में लाकर बोले, "वाह जी अजायबसिंह! आपकी चालाकी तो खूब काम कर गयी! अब तो शिवदत्तगढ़ में आए हुए पाँचों नालायक हमारे हाथ फँसे! महाराज से सबसे ज्यादे इनाम पाने का काम तो आप ही ने किया!"
६
बहुत-सी तकलीफें उठाकर महाराज सुरेन्द्रसिंह और वीरेन्द्रसिंह तथा इन्हीं की बदौलत चन्द्रकान्ता, चपला, चम्पा, तेजसिंह और देवीसिंह वगैरह ने थोड़े दिन खूब सुख लूटा मगर अब वह जमाना न रहा। सच है, सुख और दुख का पहरा बराबर बदलता रहता है। खुशी के दिन वात की बात में निकल गये, कुछ मालूम न पड़ा, यहाँ तक कि मुझे भी कोई बात उन लोगों की लिखने लायक न मिली, लेकिन अब उन लोगों को मुसीबत की घड़ी काटे नहीं कटती। कौन जानता था कि गया-गुजरा शिवदत्त फिर बला की तरह निकल आयेगा? किसे खबर थी कि बेचारी चन्द्रकान्ता की गोद से पले-पलाये दोनों होनहार लड़के यों अलग कर दिये जायेंगे? कौन साफ कह सकता था कि इन लोगों की वंशावली और राज्य में जितनी तरक्की होगी, यकायक उतनी ही ज्यादा आफतें आ पड़ेंगी? खैर बुशी के दिन तो उन्होंने काटे, अब मुसीबत की घड़ी कौन झेले? हाँ, बेचारे जगन्नाथ ज्योतिषी ने इतना जरूर कह दिया था कि वीरेन्द्रसिंह के राज्य और वंश की बहुत-कुछ तरक्की होगी, मगर मुसीबत को लिए हुए। खैर, आगे जो कुछ होगा देखा जायेगा, पर इस समय तो सबके सब तर दुद में पड़े हैं। देखिए, अपने एकान्त के कमरे में महाराज सुरेन्द्रसिंह कैसी चिन्ता में बैठे हैं और बाईं तरफ गद्दी का कोना दबाये राजा वीरेन्द्रसिंह अपने सामने बैठे हुए जीतसिंह की सूरत किस बेचैनी से देख रहे हैं। दोनों बाप-बेटा अर्थात देवीसिंह और तारासिंह अपने पास ऊपर के दर्जे पर बैठे हुए बुजुर्ग और गुरु के समान जीतसिंह की तरफ झुके हुए इस उम्मीद में बैठे हैं कि देखें, अब आखिरी हुक्म क्या होता है। सिवाय इन लोगों इस कमरे में और कोई भी नहीं है, एकदम सन्नाटा छाया हुआ है। न मालूम इसके पहले क्या-क्या बातें हो चुकी हैं, मगर इस वक्त तो महाराज सुरेन्द्रसिंह ने यह सन्नाटा सिर्फ इतना ही कहके तोड़ा, "खैर, चम्पा और चपला की बात मान लेनी चाहिए।"
जीतसिंह-जो मर्जी, मगर देवीसिंह के लिए क्या हुक्म होता है?
सुरेन्द्रसिंह और तो कुछ नहीं सिर्फ इतना ही खयाल है कि चुनार की हिफाजत ऐसे वक्त क्योंकर होगी?
जीतसिंह-मैं समझता हूँ कि यहाँ की हिफाजत के लिए तारा बहुत है और फिर वक्त पड़ने पर इस बुढ़ौती में भी मैं कुछ कर गुजरूँगा।
सुरेन्द्रसिंह—(कुछ मुस्कुराकर और उम्मीद भरी निगाहों से जीत सिंह की तरफ देखकर) खैर, जो मुनासिब समझो।
जीतसिंह—(देवीसिंह से) लीजिए साहब, अब आपको भी पुरानी कसर निकालने का मौका दिया जाता है, देखें, आप क्या करते हैं। ईश्वर इस मुस्तैदी को पूरा करें। इतना सुनते ही देवीसिंह उठ खड़े हुए और सलाम कर कमरे के बाहर चले गये।
७
अपने भाई इन्द्रजीतसिंह की जुदाई से व्याकुल हो उसी समय आनन्दसिंह उस जंगल के बाहर हुए और मैदान में खड़े हो इधर-उधर निगाह दौड़ाने लगे। पश्चिम की तरफ दो औरतें घोड़ों पर सवार धीरे-धीरे जाती हुई दिखाई पीं। ये तेजी के साथ उस तरफ बढ़े, और उन दोनों के पास पहुँचने की उम्मीद में दो कोस तक पीछा किये चले गये मगर उम्मीद पूरी न हुई, क्योंकि पहाड़ी के नीचे पहुंचकर वे दोनों रुकी और अपने पीछे आते हुए आनन्दसिंह की तरफ देख घोड़ों को एकदम तेज कर पहाड़ी की बगल से घुमाती हुई गायब हो गयीं।
खूब खिली हुई चाँदनी रात होने के सबब से आनन्दसिंह को ये दोनों औरतें दिखाई पड़ीं और इन्होंने इतनी हिम्मत भी की, पर पहाड़ी के पास पहुंचते ही उन दोनों के भाग जाने से इनको बड़ा ही रंज हुआ। खड़े होकर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। इनको हैरान और सोचते हुए छोड़कर निर्दयी चन्द्रमा ने भी धीरे-धीरे अपने घर का रास्ता लिया और अपने दुश्मन को जाते देख मौका पाकर अँधेरे ने चारों तरफ हुकूमत जमाई। आनन्दसिंह और भी दुःखी हुए। क्या करें? कहाँ जायें? किससे पूछे कि इन्द्रजीतसिंह को कौन ले गया?
दूर से एक रोशनी दिखाई पड़ी। गौर करने से मालूम हुआ कि किसी झोंपड़ी के आगे आग जल रही है। आनन्दसिंह उसी तरफ चले और थोड़ी ही देर में कुटी के पास पहुँचकर देखा कि पत्तों की बनाई हुई हरी झोंपड़ी के आगे आठ-दस आदमी जमीन पर फर्श बिछाये बैठे हैं जो कि दाढ़ी और पहरावे से साफ मुसलमान मालूम पड़ते हैं। बीच में दो मोमी शमादान जल रहे हैं। एक आदमी फारसी के शेर पढ़कर सुना रहा है, और बाकी सब 'वाह-वाह' की धुन लड़ा रहे हैं। एक तरफ आग जल रही है और दो-तीन आदमी कुछ खाने की चीजें पका रहे हैं। आनन्दसिंह फर्श के पास जाकर खड़े हो गये।
आनन्दसिंह को देखते ही सबके सब उठ खड़े हुए और बड़ी इज्जत से उनको फर्श पर बैठाया। उस आदमी ने जो फारसी के शेर पढ़-पढ़कर सुना रहा था, खड़े हो रँगीली भाषा में कहा, "खुदा का शुक्र है कि शाहजादे-चुनार ने इस मजलिस में पहुँच-कर हम लोगों की इज्जत को 'फल्के-हफ्तुम' तक पहुँचाया। इस बियाबान जंगल में हम लोग क्या खातिर कर सकते हैं सिवाय इससे कि इनके कदमों को अपनी आँखों पर जगह दें और इत्र व इलायची पेश करें!"
केवल इतना ही कहकर इत्रदान और इलायची की डिब्बी उनके आगे ले गया। पढ़े-लिखे भले आदमियों की खातिर जरूरी समझकर आनन्दसिंह ने इत्रसूंघा और इलायची ले लीं। इससे बाद इनसे इजाजत लेकर वह फिर फारसी कविता पढ़ने लगा। दूसरे आदमियों ने दो-एक तकिये इनके अगल-बगल में रख दिये।
इत्र की विचित्र खुशबू ने इनको मस्त कर दिया, इनकी पलकें भारी हो गयीं और बेहोशी ने धीरे-धीरे अपना असर जमा कर इनको फर्श पर सुला दिया। दूसरे दिन दोपहर को आँख खुलने पर इन्होंने अपने को एक दूसरे ही मकान में मसहरी पर पड़े हुए पाया। घबराकर उठ बैठे और इधर-उधर देखने लगे।
पाँच कमसिन और खूबसूरत औरतें सामने खड़ी दिखाई दीं, जिनमें से एक सरदारिन की तरह कुछ आगे बढ़ी हुई थी। उसके हुस्न और अदा को देख आनन्दसिंह दंग हो गये। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों और बाँकी चितवन ने उन्हें आपे से बाहर कर दिया, उसकी जरा-सी हंसी ने इनके दिल पर बिजली गिराई, और आगे बढ़ हाथ जोड़ इस कहने ने तो और भी सितम ढाया कि-"क्या आप मुझसे खफा हैं?"
आनन्दसिंह भाई की जुदाई, रात की बात, ऐयारों के धोखे में पड़ना, सब-कुछ बिलकुल भूल गये और उसकी मुहब्बत में चूर होकर बोले-"तुम्हारी-सी परीजमाल से और रंज!"
वह औरत पलंग पर बैठ गयी और आनन्दसिंह के गले में हाथ डाल के बोली, "खुदा की कसम खाकर कहती हूँ कि सालभर से आपके इश्क ने मुझे बेकार कर दिया। सिवाय आपके ध्यान के खाने-पीने की बिलकुल सुध नहीं रहती, मगर मौका न मिलने से लाचार थी।"
आनन्दसिंह-(चौंककर) हैं! क्या तुम मुसलमान हो जो खुदा की कसम खाती हो?
औरत-(हँसकर) हाँ, क्या मुसलमान बुरे होते हैं?
आनन्दसिंह यह कहकर उठ खड़े हुए–"अफसोस अगर तुम मुसलमान न होती तो मैं तुम्हें जी-जान से प्यार करता, मगर एक औरत के लिए अपना मजहब नहीं बिगाड़ सकता।"
औरत—(हाथ थामकर) देखो बेमुरौवती मत करो! मैं सच कहती हूँ कि अब तुम्हारी जुदाई मुझसे न सही जायगी!
आनन्दसिंह-मैं भी सच कहता हूँ कि मुझसे किसी तरह की उम्मीद मत रखना।
औरत-(भौहें सिकोड़कर) क्या यह बात दिल से कहते हो?
आनन्दसिंह–हाँ, बल्कि कसम खाकर!
औरत-पछताओगे और मुझ-सी चाहने वाली कभी न पाओगे।
आनन्दसिंह—(अपना हाथ छुड़ाकर) लानत है ऐसी चाहत पर!
औरत-तो तुम यहाँ से चले जाओगे?
आनन्दसिंह-जरूर!
औरत-मुमकिन नहीं।
आनन्दसिंह ह—क्या मजाल कि तुम मुझको रोको।
औरत-ऐसा खयाल भी न करना।
"देखें, मुझे कौन रोकता है!" कहकर आनन्दसिंह उस कमरे के बाहर हुए और उसी कमरे की एक खिड़की, जो दीवार में लगी हुई थी, खोल वे औरतें वहाँ से निकल गयीं।
आनन्दसिंह इस उम्मीद में चारों तरफ घूमने लगे कि कहीं रास्ता मिले तो बाहर हो जायें मगर उनकी उम्मीद किसी तरह पूरी न हुई।
यह मकान बहुत लम्बा-चौड़ा न था। सिवाय इस कमरे और एक सहन के और कोई जगह इसमें न थी। चारों तरफ ऊँची-ऊँची दीवारों के सिवाय बाहर जाने के लिए कहीं कोई दरवाजा न था। हर तरह से लाचार और दुखी हो फिर उसी पलंग पर आ लेटे और सोचने लगे-
"अब क्या करना चाहिए! इस कम्बख्त से किस तरह जान बचे? यह तो हो ही नहीं सकता कि मैं इसे चाहूँ या प्यार करूँ। राम-राम, मुसलमानिन और इश्क! यह तो सपने में भी नहीं होने का। तब फिर क्या करूँ? लाचारी है, जब किसी तरह छुट्टी न देखूगा तो इस खंजर से जो मेरी कमर में है अपनी जान दे दूंगा।"
कमर से खंजर निकालना चाहा, देखा कमर खाली है। फिर सोचने लगे-
"गजब हो गया, इस हरामजादी ने तो मुझे किसी लायक न रखा। अगर कोई दुश्मन आ जाय तो मैं क्या कर सकूँ? बेहया अगर मेरे पास आवे तो गला दबाकर मार डालूँ। नहीं, नहीं, वीर-पुत्र होकर स्त्री पर हाथ उठाना! यह मुझसे न होगा, तब क्या भूखे-प्यासे जान दे देनी पड़ेगी? मुसलमानिन के घर में अन्न-जल कैसे ग्रहण करूँ! हाँ, ठीक है, एक सूरत निकल सकती है। (दीवार की तरफ देखकर) इसी खिड़की से वे लोग बाहर निकल गयी हैं। अब की अगर यह खिड़की खुले और वह कमरे में आवे तो मैं जबर्दस्ती इसी राह से बाहर हो जाऊँगा।"
भूखे-प्यासे दिन बीत गया, अँधेरा हुआ चाहता था कि वही छोटी-सी खिड़की खुली और चारों औरतों को साथ लिए वह पिशाची आ मौजूद हुई। एक औरत हाथ में रोशनी, दूसरी पानी, तीसरी तरह-तरह की मिठाइयों से भरा चाँदी का थाल उठाये और चौथी पान का जड़ाऊ डिब्बा लिए साथ मौजूद थी।
आनन्दसिंह पलंग से उठ खड़े हुए और बाहर निकल जाने की उम्मीद में उस खिड़की के अन्दर घुसे। उन औरतों ने इन्हें बिलकुल न रोका क्योंकि वे जानती थी कि सिर्फ इस खिड़की ही के पार चले जाने से उनका काम न चलेगा।
खिड़की पार तो हो गये मगर आगे अंधेरा था। इस छोटी-सी कोठरी में चारों तरफ घूमे मगर रास्ता न मिला। हाँ, एक तरफ बन्द दरवाजा मालूम हुआ जो किसी तरह खुल न सकता था, लाचार फिर उसी कमरे में लौट आये।
उस औरत ने हँसकर कहा, "मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि आप मुझसे अलग नहीं हो सकते। खुदा ने मेरे ही लिए आपको पैदा किया है। अफसोस कि आप मेरी तरफ खयाल नहीं करते और मुफ्त में अपनी जान गंवाते हैं! बैठिये, खाइये, पीजिए, आनन्द लीजिये, किस सोच में पड़े हैं!"
आनन्द-मैं तेरा छुआ खाऊँ?
औरत—क्यों, क्या हर्ज है? खुदा सबका है, उसी ने हमको भी पैदा किया, आपको भी पैदा किया। जब एक ही बाप के सब लड़के हैं तो आपस में छूत कैसी!
आनन्दसिंह—(चिढ़कर) खुदा ने हाथी भी पैदा किया, गदहा भी पैदा किया, कुत्ता भी पैदा किया, सूअर भी पैदा किया, मुर्गा भी पैदा किया—जब एक ही बाप के सब लड़के हैं तो परहेज काहे का!
औरत-खैर खुशी आपकी, न मानियेगा पछताइयेगा, अफसोस कीजियेगा और आखिर झख मार फिर वही कीजियेगा जो मैं कहती हूँ। भूखे-प्यासे जान देना मुश्किल बात है—लो, मैं जाती हूँ।
खाने-पीने का सामान और रोशनी वहीं छोड़ चारों लौंडियाँ उस खिड़की के अंदर घुस गयीं। आनन्दसिंह ने चाहा कि जब यह शैतान खिड़की के अन्दर जाय तो मैं भी जबर्दस्ती साथ हो लूँ-या तो पार ही हो जाऊँगा या इसे भी न जाने दूँगा, मगर उनका यह ढंग भी न लगा।
वह मदमाती औरत खिड़की के अन्दर की तरफ पैर लटका कर बैठ गयी और इनसे बात करने लगी।
औरत-अच्छा, आप मुझसे शादी न करें इसी तरह मुहब्बत रखें।
आनन्दसिंह-कभी नहीं, चाहे जो हो।
औरत-(हाथ का इशारा करके) अच्छा, उस औरत से शादी करेंगे जो आपके पीछे खड़ी है? वह तो हिन्दुआनी है!
"मेरे पीछे दूसरी औरत कहाँ से आई!" ताज्जुब से पीछे फिर आनन्दसिंह ने देखा। उस नालायक को मौका मिला, खिड़की के अन्दर हो झट किवाड़ बन्द कर दिया।
आनन्दसिंह पूरा धोखा खा गए, हर तरह से हिम्मत टूट गई–लाचार फिर उसी पलंग पर लेट गये। भूख से आँखें निकली आती थीं, खाने-पीने का सामान मौजूद था मगर वह जहर से भी कई दर्जे बढ़ के था। दिल में समझ लिया कि अब जान गई। कभी उठते, कभी बैठते, कभी दालान के बाहर निकल कर टहलते, आधी रात जाते-जाते भूख की कमजोरी ने उन्हें चलने-फिरने लायक न रखा, फिर पलंग पर आकर लेट गये, और ईश्वर को याद करने लगे।
यकायक बाहर धमाके की आवाज आई, जैसे कोई कमरे की छत पर से कूदा हो। आनन्दसिंह उठ बैठे और दरवाजे की तरफ देखने लगे।
सामने से एक आदमी वहाँ आता हुआ दिखाई पड़ा, जिसकी उम्र लगभग चालीस वर्ष होगी। सिपाहियाना पोशाक पहने, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये, कमर में नीमचा खंजर और ऊपर से कमन्द लपेटे, बगल में मुसाफिरी का झोला, हाथ में दूध से भरा लोटा लिए आनन्दसिंह के सामने आ खड़ा हुआ और बोला-
"अफसोस, आप राजकुमार होकर वह काम करना चाहते हैं जो ऐयारों-जासूसों या अदने सिपाहियों के करने लायक हो! नतीजा यह निकला कि इस चाण्डालिन के यहाँ फँसना पड़ा। इस मकान में आए आपको कै दिन हुए? घबराइये मत, मैं आपका दोस्त हूँ, दुश्मन नहीं!
इस सिपाही को देख आनन्दसिंह ताज्जुब में आ गए और सोचने लगे कि यह कौन है जो ऐसे वक्त में मेरी मदद को पहुँचा! खैर, जो भी हो, बेशक यह हमारा खैरख्वाह है, बदख्वाह नहीं।
आनन्दसिंह-जहाँ तक खयाल करता हूँ, यहाँ आये दूसरा दिन है।
सिपाही-कुछ अन्न-जल तो न लिया होगा!
आनन्दसिंह-कुछ नहीं।
सिपाही-हाय! राजा वीरेन्द्रसिंह के प्यारे लड़के की यह दशा! लीजिए, मैं आपको खाने-पीने के लिए देता हूँ!
आनन्दसिंह-पहले मुझे मालूम होना चाहिए कि आपकी जाति उत्तम है और मुझे धोखा देकर अधर्मी करने की नीयत नहीं है।
सिपाही–(दाँत के नीचे जुबान दबाकर) राम-राम! ऐसा स्वप्न में भी खयाल न कीजिएगा कि मैं धोखा देकर आपको अजाति करूँगा। मैंने पहले ही सोचा था कि आप शक करेंगे, इसीलिए ऐसी चीजें लाया हूँ जिनके खाने-पीने में आप उज्र न करें। पलंग पर से उठिए, बाहर आइए।
आनन्दसिंह उसके साथ बाहर गए। सिपाही ने लोटा जमीन पर रख दिया और झोले में से कुछ मेवा निकाल उनके हाथ में देकर बोला, "लीजिए इसे खाइए और (लोटे की तरफ इशारा करके) यह दूध है, पीजिए।"
आनन्दसिंह की जान-में-जान आ गई, प्यास और भूख से दम निकला जाता था, ऐसे समय में थोड़े मेवे और दूध का मिल जाना क्या थोड़ी खुशी की बात है? मेवा खाया, दूख पीया, जी ठिकाने हुआ, इसके बाद उस सिपाही को धन्यवाद देकर बोले, "अब मुझे किसी तरह इस मकान के बाहर कीजिए।"
सिपाही-मैं आपको इस मकान के बाहर ले चलूंगा मगर इसकी मजदूरी भी तो मुझे मिलनी चाहिए।
आनन्दसिंह-जो कहिये, दूँगा।
सिपाही-आपके पास क्या है जो मुझे देंगे?
आनन्दसिंह-इस वक्त भी हजारों रुपये का माल मेरे बदन पर है।
सिपाही-मैं यह सब-कुछ नहीं चाहता।
आनन्दसिंह-फिर?
सिपाही-उसी कम्बख्त के बदन पर जो कुछ जेवर हैं वे मुझे दीजिए और एक हजार अशर्फी।
आनन्दसिंह—यह कैसे हो सकेगा? वह तो यहाँ मौजूद नहीं है और हजार अशर्फी भी कहाँ से आवें?
सिपाही-उसी से लेकर दीजिए।
आनन्दसिंह-क्या वह मेरे कहने से देगी?
सिपाही—(हँसकर) वह तो आपके लिए जान देने को तैयार है। इतनी रकम की क्या बिसात है।
आनन्दसिंह-तो क्या आज मुझे यहाँ से न छुड़ावेंगे?
सिपाही-नहीं, मगर आप कोई चिन्ता न करें, आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, कल जब वह राँड आवे तो उससे कहिए कि तुमसे मुहब्बत तब करूँगा, जब अपने बदन का कुल जेवर और एक हजार अशर्फी यहाँ रख दो, उसके दूसरे दिन आओ तो जो कहोगी मैं मानूंगा। वह तुरन्त अशर्फी मँगा देगी और कुछ जेवर भी उतारकर देगी। नालायक बड़ी मालदार है, उसे कम न समझिये।
आनन्दसिंह-खैर, जो कहोगे करूँगा।
सिपाही-जब तक आप यह न करेंगे मैं आपको इस कैद से न छुडाऊँगा। आप यह न सोचिए कि उसे धोखा देकर या जबर्दस्ती उस राह से चले जायेंगे जिधर से वह आती-जाती है। यह कभी नहीं हो सकेगा, उसके आने-जाने के लिए कई रास्ते हैं।
आनन्दसिंह-अगर वह तीन-चार दिन न आवे तब?
सिपाही—क्या हर्ज है, मैं आपकी बराबर ही सुध लेता रहूंगा और खाने-पीने को पहुँचाया करूँगा।
आनन्दसिंह–अच्छा, ऐसा ही सही।
वह सिपाही कमन्द लगाकर छत पर चढ़ा और दीवार फांद मकान के बाहर हो गया।
थोड़ी रात बच गई थी जो आनन्दसिंह ने इसी सोच-विचार में काटी कि यह कौन है जो ऐसे वक्त में मेरी मदद को पहुँचा। इसे लालच बहुत है। कोई ऐयार मालूम पड़ता है। ऐयारों का जितना ज्यादे खर्च होता है, उतना ही लालच भी करते हैं। खैर, कोई हो, अब तो जो कुछ उसने कहा है, करना ही पड़ेगा।
रात बीत गई, सवेरा हुआ। वह औरत फिर उन्हीं चारों लौंडियों को लिए आ पहुँची। देखा कि आनन्दसिंह पलंग पर पड़े हैं और खाने-पीने का सामान ज्यों-का-त्यों उसी जगह रखा है जहाँ वह रख गई थी।
औरत-आप क्यों जिद करके भूखे-प्यासे अपनी जान देते हैं।
आनन्दसिंह-इसी तरह मर जाऊँगा, मगर तुमसे मुहब्बत न करूँगा, हाँ अगर एक बात मेरी मानो तो तुम्हारा कहा करूँ।
औरत-(खुश होकर और उनके पास बैठ कर) जो कहो मैं करने को तैयार हूँ, मगर मुझसे जिद न करो।
आनन्दसिंह-अपने बदन पर से कुल जेवर उतार दो और एक हजार अशर्फी मँगा दो।
औरत-(आनन्दसिंह के गले में हाथ डालकर) बस इतने ही के लिए? लो, मैं अभी देती हूँ!
एक हजार अशर्फी लाने के लिए उसने दो लौंडियों को कहा और अपने बदन से कुल जेवर उतार दिए। थोड़ी ही देर में वे दोनों लौंडियाँ अशर्फियों का तोड़ा लिए आ मौजूद हुईं।
औरत-लीजिये, अब आप खुश हुए? अब तो उज्र नहीं?
आनन्दसिंह-नहीं, मगर एक दिन की और मोहलत माँगता हूँ! कल इसी वक्त तुम आओ, मैं तुम्हारा हो जाऊँगा।
औरत-अब यह नया ढकोसला क्या निकाला? आज भी भूखे-प्यासे काटोगे तो तुम्हारी क्या दशा होगी?
आनन्दसिंह-इसकी फिक्र न करो, मुझे कई दिनों तक भूखे-प्यासे रहने की आदत है।
औरत–लाचारी है, खैर यह भी सही, ठहरिये, मैं आती हूँ।
इतना कहकर आनन्दसिंह को उसी जगह छोड़ चारों लौंडियों को साथ ले वह कमरे के बाहर चली गई। घण्टा भर बीतने पर भी वह न लौटी तो आनन्दसिंह उठे और कमरे के बाहर जा उसे ढूंढ़ने लगे मगर कहीं पता न लगा। बाहर की दीवार में छोटी-छोटी दो आलमारियाँ लगी हुई दिखाई दीं। अन्दाज कर लिया कि शायद उस खिड़की की तरह यह भी बाहर जाने का कोई रास्ता हो और इधर ही से वे लोग निकल गई हों।
सोच और फिक्र में तमाम दिन बिताया, पहर रात जाते-जाते कल की तरह वही सिपाही फिर पहुंचा और मेवा-दूध आनन्दसिंह को दिया।
आनन्दसिंह-लीजिए, आपकी फर्माइश तैयार है।
सिपाही-तो बस अब आप भी इस मकान के बाहर चलिये। एक रोज के कष्ट में इतनी रकम हाथ आई। क्या बुरा हुआ?
सब-कुछ सामान अपने कब्जे में करने के बाद सिपाही कमरे के बाहर निकला और सहन में पहुँच कमन्द के जरिये से आनन्दसिंह को मकान के बाहर निकालने के बाद आप भी बाहर हो गया। मैदान की हवा लगने से आनन्दसिंह का जी ठिकाने हुआ। समझे कि अब जान बची। बाहर से देखने पर मालूम हुआ कि यह मकान एक पहाड़ी के अन्दर है, कारीगरों ने पत्थर तोड़कर इसे तैयार किया है। इस मकान के अगल-बगल में कई सुरंगें भी दिखाई पड़ी।
आनन्दसिंह को लिए हुए वह सिपाही कुछ दूर चला गया जहाँ कसे-कसाये दो घोड़े पेड़ से बँधे थे। बोला, "लीजिये, एक पर आप सवार होइये दूसरे पर मैं चढ़ता हूँ, चलिए, आपको घर तक पहुँचा आऊँ।"
आनन्दसिंह-चुनार यहाँ से कितनी दूर और किस तरफ है?
सिपाही-चुनार यहाँ से बीस कोस है। चलिये, मैं आपके साथ चलता हूँ। इन घोड़ों में इतनी ताकत है कि सवेरा होते-होते हम लोगों को चुनार पहुँचा दें। आप घर चलिये, इन्द्रजीतसिंह के लिए कुछ फिक्र न कीजिये, उनका पता भी बहुत जल्द ही लग जायेगा, आपके ऐयार लोग उनकी खोज में निकले हुए हैं।
आनन्दसिंह-ये घोड़े कहाँ से लाये?
सिपाही-कहीं से चुरा लाए, इसका कौन ठिकाना है?
आनन्दसिंह-खैर यह तो बताओ तुम कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है?
सिपाही-यह मैं नहीं बता सकता और न आपको इसके बारे में कुछ पूछना मुनासिब ही है!
आनन्दसिंह-खैर, अगर कहने में कुछ हर्ज है तो...
आनन्दसिंह अपना पूरा मतलब कहने भी न पाये थे कि कोई चौंकाने वाली चीज इन्हें नजर आई। स्याह कपड़ा पहने हुए किसी को अपनी तरफ आते देखा। सिपाही और आनन्दसिंह दोनों एक पेड़ की आड़ में हो गये, और वह आदमी इनके पास ही से कुछ बड़बड़ाता हुआ निकल गया, जिसे यह गुमान भी न था कि इस जगह पर कोई छिपा हुआ मुझे देख रहा है।
उसकी बड़बड़ाहट इन दोनों ने सुनी, वह कहता जाता था-"अब मेरा कलेजा ठण्डा हुआ, अब मैं घर जाकर बेशक सुख की नींद सोऊँगी और उस हरामजादे की लाश को गीदड़ और कौए कल दिन भर में खा जायेंगे, जिसने मुझे औरत जानकर दबाना चाहा था और यह न समझा था कि इस औरत का दिल हजार मर्दो से भी बढ़कर है!"
आनन्दसिंह और सिपाही दोनों उसकी तरफ टकटकी लगाये देखते रहे जिसकी बकवाद से मालूम हो गया था कि कोई औरत है, वह देखते-देखते नजरों से गायब हो गई।
सिपाही-बेशक इसने कोई खून किया है।
आनन्दसिंह-और वह भी इसी जगह कहीं पास ही में, खोजने से जरूर पता लगेगा।
दोनों आदमी इधर-उधर ढूंढ़ने लगे, बहुत तकलीफ करने की नौबत न आई और दस ही कदम पर एक तड़पती हुई लाश पर इन दोनों की नजर पड़ी।
सिपाही ने अपने बगल से एक थैली निकाली और चकमक पत्थर से आग झाड़ मोमबत्ती जला उस तड़पती लाश को देखा। मालूम हुआ कि किसी ने कटार या खञ्जर इसके कलेजे के पार कर दिया है, खून बराबर बह रहा है, जख्मी पैर पटकता और बोलने की कोशिश करता है मगर बोला नहीं जाता।
सिपाही ने अपनी थैली से एक छोटी बोतल निकाली जिसमें किसी तरह का अर्क भरा हुआ था। इसमें से थोड़ा अर्क जख्मी के मुह में डाला। गले के नीचे उतरते ही उसमें कुछ बोलने की ताकत आई और बहुत ही धीमी आवाज से उसने नीचे लिखे हुएकई टूटे-फूटे शब्द अपने मुंह से निकालने के साथ ही दम तोड़ दिया-.
"ओफ...सोस, यह खूबसूरत पिशाची...तेजसिंह की...जान...मेरी तरह...उसके फन्दे में...हाय! "इन्द्रजीतसिंह को!!"
उस बेचारे मरने वाले के मुंह से निकले हुए ये दो-चार शब्द कसे ही बेजोड़ क्यों न हों, मगर इन दोनों सुनने वालों के दिलों को तड़पा देने के लिए बहुत काफी थे। आनन्दसिंह से ज्यादा उस सिपाही को बेचैनी हुई जो अपने में बहुत कुछ कर गुजरने की कुदरत रखता था और जानता था कि इस वक्त अगर कोई हाथ कुंअर इन्द्रजीतसिंह और तेजसिंह की मदद को बढ़ सकता है तो वह सिर्फ मेरा ही हाथ है।
सिपाही-कुमार, अब आप घर जाइए। इन टूटी-फूटी बेजोड़ मगर मतलब से भरी बातों की जो इस मरने वाले के मुँह से अनायास निकल पड़ी हैं सुनकर निश्चय हो गया कि आपके बड़े भाई और ऐयारों के सिरताज तेजसिंह किसी आफत में जो बहुत जल्द तबाह कर देने की कुदरत रखती है, फँस गये हैं। ऐसी हालत में मैं जो बहुत कुछ कर गुजरने का हौसला रखता हूं किसी तरह नहीं अटक सकता और मेरा मतलब तभी सिद्ध होगा जब उस औरत को खोज निकालूंगा जो अभी यह आफत कर गई और आगे कई तरह के फसाद करने वाली है।
आनन्दसिंह-तुम्हारा कहना बहुत सही है, मगर क्या तुम कह सकते हो कि ऐसी खबर पाकर मैं चुपचाप घर चले जाना पसन्द करूँगा और जान से ज्यादे प्यारों की मदद से जी चुराऊँगा?
सिपाही—(कुछ सोच कर) अच्छा, तो ज्यादा बात करने का मौका नहीं है, चलिए। हाँ, सुनिये तो, आपके पास कोई हर्बा तो है नहीं! काम पड़ने पर क्या कर सकेंगे? मेरे पास एक खंजर और एक नीमचा है, दोनों में जो चाहें, एक आप ले लें।
आनन्दसिंह-बस, नीमचा मेरे हवाले कीजिए और चलिये।
आनन्दसिंह ने नीमचा अपनी कमर में लगाया और सिपाही के साथ पैदल ही उस तरफ को बढ़ चले जिधर वह खूनी औरत बकती हुई चली गई थी।
ये दोनों ठीक उसी रास्ते की पगडण्डी पकड़े हुए थे जिस पर वह औरत गई थी। थोड़ी-थोड़ी दूर पर साँस रोक कर इधर-उधर की आहट लेते, जब कुछ मालूम न होता तो फिर तेजी के साथ बढ़ते चले जाते।
कोस भर के बाद पहाड़ी उतरने की नौबत पहुँची। वहाँ ये दोनों फिर रुके और चारों तरफ देखने लगे। छोटी-सी घंटी बजाने की आवाज आई। घंटी किसी खोह या गड़हे के अन्दर बजाई गई थी जो वहाँ से बहुत करीब था जहाँ ये दोनों बहादुर खड़े हो इधर-उधर देख रहे थे।
ये दोनों उसी तरफ मुड़े जिधर से घंटी की आवाज आई थी। फिर आवाज आई, अब तो ये दोनों उस खोह के मुंह पर पहुँच गये जो पहाड़ी की कुछ ढाल उतर कर पगडंडी के रास्ते से बाईं तरफ हट कर थी और जिसके अन्दर से घंटी की आवाज आई थी। बेधड़क दोनों आदमी खोह के अन्दर घुस गये। अब फिर एक बार घंटी बजने की आवाज आई और साथ ही एक रोशनी भी चमकती हुई दिखाई दी जिसकी वजह से उस खोह का रास्ता साफ मालूम होने लगा, बल्कि उन दोनों ने देखा कि कुछ दूर आगे एक औरत खड़ी है जो रोशनी होते ही बाईं तरफ हट कर किसी दूसरे गड़हे में उतर गई जिसका रास्ता बहुत छोटा बल्कि एक ही आदमी के जाने लायक था। इन दोनों को विश्वास हो गया कि यह वही औरत है जिसकी खोज में हम लोग इधर आये हैं।
रोशनी गायब हो गई मगर अन्दाज से टटोलते हुए ये दोनों भी उस गड़हे के मुँह पर पहुँच गये जिसमें वह औरत उतर गई थी। उस पर एक पत्थर अटकाया हुआ था लेकिन उस अनगढ़ पत्थर के अगल-बगल छोटे-छोटे ऐसे कई सूराख थे जिनके जरिये से गड़हे के अन्दर का हाल ये दोनों बखूबी देख सकते थे।
दोनों उसी जगह बैठ गये और सूराखों की राह से अन्दर का हाल देखने लगे। भीतर रोशनी बखूबी थी। सामने की तरफ चट्टान पर बैठी वही औरत दिखाई पड़ी जिसने अभी तक अपने मुंह से नकाब नहीं उतारी थी और थकावट के सबब लम्बी साँस ले रही थी। उसके पास ही एक कमसिन खूबसूरत हब्शी छोकरी बड़ा-सा छुरा हाथ में लिए खड़ी थी, दूसरी तरफ एक बदसूरत हब्शी कुदाल से जमीन खोद रहा था। बीच में छत के सहारे एक उल्टी लाश लटक रही थी, एक तरफ कोने में जल से भरा हुआ मिट्टी का घड़ा, एक लोटा और कुछ खाने का सामान पड़ा हुआ था। उस गड़हे में इतना ही कुछ था जो लिख चुके हैं।
कुछ देर बाद उस औरत ने अपने मुँह से नकाब को उतार दिया। अहा, क्या खूबसूरत गुलाब-सा चेहरा है मगर गुस्से से आँखें ऐसी सुर्ख और भयानक हो रही हैं कि देखने से डर मालूम पड़ता है। वह औरत उठ खड़ी हुई और अपने पास वाली छोकरी के हाथ से छुरा ले उस लटकती हुई लाश के पास पहुंची और दो अंगुल गहरी एक लकीर उसकी पीठ पर खींची।
हाय-हाय, ऐसी हसीन और इतनी संगदिली! इतनी बेदर्दी! अभी-अभी एक खून किये चली आती है और यहाँ पहुँच कर फिर अपने राक्षसीपन का नमूना दिखला रही है! वह लाश किसकी है? कहीं यह भी कोई चुनार का खैरख्वाह या हमारे उपन्यास का पात्र न हो।
पीठ पर जख्म खाते ही लाश फड़की। अब हुआ कि वह मुर्दा नहीं है कोई जीता आदमी तफलीफ देने के लिए लटकाया गया है। जख्म खाकर लटका हुआ वह आदमी तड़पा और आह भर कर बोला-
"हाय, मुझे क्यों तकलीफ देती हो, मैं कुछ नहीं जानता!"
औरत-नहीं, तुझे बताना ही होगा! तू खूब जानता है! (पीठ पर फिर गहरी छुरी चला कर) बता, बता!
उल्टा आदमी-हाय, मुझे एक ही दफे क्यों नहीं मार डालती? मैं किसी का हाल क्या जानूं, मुझे इन्द्रजीतसिंह से क्या वास्ता?
औरत-(फिर छुरी से काट कर) मैं खूब जानती हूँ, तू बड़ा पाजी है; तुझे सब कुछ मालूम है। बता, नहीं तो गोश्त काट-काट कर जमीन पर गिरा दूँगी।
उल्टा आदमी-हाय, इन्द्रजीतसिंह की बदौलत मेरी यह दशा!
अभी तक कुँअर आनन्दसिंह और वह सिपाही छिपे-छिपे सब-कुछ देख रहे थे, मगर जब उस उल्टे टॅगे हुए आदमी के मुंह से यह निकला कि 'हाय, इन्द्रजीतसिंह की बदौलत मेरी यह दशा!' तब मारे गुस्से के उनकी आँखों में खून उतर आया। पत्थर हटा दोनों आदमी वेधड़क अन्दर चले गये और उस बेदर्द छुरी चलाने वाली औरत के सामने पहुँच आनन्दसिंह ने ललकारा—"खबरदार! रख दे छुरा हाथ से!"
औरत-(चौंक कर) हैं, तुम यहाँ क्यों चले आये? खैर, अगर आ ही गये तो चुपचाप खड़े होकर तमाशा देखो। यह न समझो कि तुम्हारे धमकाने से मैं डर जाऊँगी। (सिपाही की तरफ देख कर) तुम्हारी आँखों में भी क्या धूल पड़ गई है? अपने हाकिम को नहीं पहचानते?
सिपाही—(खूब गौर से देख कर) हाँ, ठीक है, तुम्हारी सभी बातें अनोखी होती है।
औरत-अच्छा तो आप दोनों आदमी यहाँ से जाइये और मेरे काम में हर्ज न डालिए।
सिपाही-(आनन्दसिंह से) चलिए, इन्हें छोड़ दीजिए। ये जो चाहें सो करें, आपको क्या?
आनन्दसिंह-(कमर से नीमचा निकाल कर) वाह, क्या कहना है! मैं बिना इस आदमी को छुड़ाये कब टलने वाला हूँ!
औरत-(हँस कर) मुँह धो रखिए!
बहादुर वीरेन्द्रसिंह के बहादुर लड़के आनन्दसिंह को ऐसी बातों के सुनने की ताब कहाँ थी? वह दो-चार आदमियों को समझते ही क्या थे? 'मुंह धो रखिए' इतना सुनते ही जोश चढ़ आया। उछल कर एक हाथ नीमचे का लगाया जिससे वह रस्सी कट गई जो उस आदमी के पैर से बँधी हुई थी और जिसके सहारे वह लटक रहा था, साथ ही फुर्ती से उस आदमी को सम्हाला और जोर से जमीन पर गिरने न दिया।
अब तो वह सिपाही भी आनन्दसिंह का दुश्मन बन बैठा और ललकार कर बोला, "यह क्या लड़कपन है?"
हम ऊपर लिख चुके हैं कि इस सुरंग में दो औरतें और एक हब्शी गुलाम हैं। अब वह सिपाही भी उनके साथ मिल गया और चारों ने आनन्दसिंह को पकड़ लिया, मगर वाह रे आनन्दसिंह! एक झटका दिया कि चारों दूर जा गिरे। इतने में बाहर से आवाज आई-
"आनन्दसिंह खबरदार! जो किया सो ठीक किया। अब आगे कुछ हौसला न करना, नहीं तो सजा पाओगे!!"
आनन्दसिंह ने घबरा कर बाहर की तरफ देखा तो एक योगिनी नजर पड़ी जो जटा बढ़ाये भस्म लगाये गेरुआ वस्त्र पहने दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में आग से भरा धधकता हुआ खप्पर, जिसमें कोई खुशबूदार चीज जल रही थी और बहुत धुआँ निकल रहा था, लिए हुए आ मौजूद हुई।
ताज्जुब में आकर सभी उसकी सुरत. देखने लगे। थोड़ी देर में उस खप्पर से निकला हुआ धुआँ सुरंग की कोठरी में भर गया और उसके असर से जितने वहाँ थे सभी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। बस, अकेली वही योगिनी होश में रही जिसने सभी को बेहोश देख कोने में पड़े हुए घड़े से जल निकाल खप्पर की आग बुझा दी।
८
अब थोड़ा-सा हाल शिवदत्तगढ़ का भी लिख देना मुनासिब मालूम होता है। यह हम पहले लिख चुके हैं कि महाराज शिवदत्त को एक लड़का और एक लड़की भी हुई थी। इस समय लड़के की उम्र जिसका नाम भीमसेन है अठारह वर्ष की हो गई थी, पर लड़की किशोरी की उम्र अभी पन्द्रह वर्ष से ज्यादा न होगी। इस समय बेचारी किशोरी शिवदत्तगढ़ में मौजूद नहीं है क्योंकि महाराज शिवदत्त ने रंज होकर उसे उसके ननिहाल भेज दिया है। रंज होने का कारण हम यहाँ पर नहीं लिखते, क्योंकि यह बहुत पेचीदा बात है, खुलते-खुलते खुल जायेगी।
भीमसेन शिवदत्तगढ़ में मौजूद है। उसे सिपहगिरी से बहुत शौक है, बदन में ताकत भी अच्छी है। तलवार खंजर नेजा तीर गदा इत्यादि चलाने में होशियार और राजकाज के मामले में भी तेज है मगर अपने पिता महाराज शिवदत्त की चाल को पसन्द नहीं करता, पर फिर भी महाराज शिवदत्त को उससे बहुत ही ज्यादा प्रेम है।
एक दिन भीमसेन मामूली तौर पर बीस हमजोलियों को साथ ले घोड़े पर सवार हो शिकार खेलने के लिए शिवदत्तगढ़ के बाहर निकला और एक ऐसे जंगल में गया जिसमें बनैले सूअर बहुत थे। उसका इरादा भी यही था कि घोड़ा दौड़ा कर बरछे से बनैले सूअर को मारे।
जंगल में घूमने-फिरने लगे। एक ताकतवर और मजबूत सूअर भीमसेन की बगल से होता हुआ पूरब की तरफ भागा। भीमसेन ने भी उसके पीछे घोड़ा दौड़ाया, मगर वह बहुत तेजी के साथ भागा जा रहा था इसलिए बहुत दूर निकल गया। उसके संगी-साथी सब पीछे छूट गए। यकायक भीमसेन देखा कि कि सामने की तरफ जिधर सुअर भागा जाता है, एक औरत घोड़े पर सवार हाथ में बरछी लिए इस ताक में खड़ी है कि सूअर पास आये तो बरछी से मार ले।
जब सूअर ऐसे ठिकाने पर पहुँचा जहाँ से वह औरत इतनी दूर रह गई जितनी दूर उसके पीछे भीमसेन था वह बाईं तरफ को मुड़ा और पहले से ज्यादा तेजी के साथ भागा। भीमसेन और वह औरत दोनों ही ने उसके पीछे घोड़ा फेंका मगर भीमसेन से पहले उस औरत ने पहुंच कर बरछी मारी जिसके लगते ही वह सूअर गिरा।
अपना शिकार एक औरत के हाथ से मरते देख भीमसेन को क्रोध चढ़ आया और आँखें लाल हो गईं। ललकार कर औरत से बोला-"तूने मेरे शिकार पर क्यों बरछी चलाई?"
औरत—क्या शिकार पर तुम्हारा नाम खुदा हुआ था?
भीमसेन—क्यों नहीं? मेरा जंगल, मेरा शिकार। इतनी देर से मैं इसके पीछे चला आ रहा हूँ!
औरत-वाह रे तेरा जंगल और वाह रे तेरा शिकार! तीन कोस से दौड़े चले आते हैं, एक सूअर न मारा गया। शर्म तो आती नहीं, उल्टे लाल आँखें कर मर्दानगी दिखा रहे हैं!
भीमसेन—क्या कहूँ, तेरी खूबसूरती पर रहम आता है, औरत समझ कर छोड़ देता हूँ, नहीं तो जरूर मजा चखा देता।
औरत-मैं भी छोकरा समझ कर छोड़ देती हूँ, नहीं तो दोनों कान पकड़ कर उखाड़ लेती!
भीमसेन–(दांत पीस कर) बस, अब सहा नहीं जाता। जुबान सम्हाल।
औरत-नहीं सहा जाता तो अपने हाथ से अपना मुँह पीट! यहाँ तो जुवान हमेशा योंही चलती रही है और चलती रहेगी!
इस औरत की खूबसूरती, सवारी का ढंग, बदन की सुडौली और फुर्ती यहाँ तक बढ़ी-चढ़ी थी कि आदमी घण्टों देखा करे और जी न भरे, मगर इसकी जली-कटी बातों ने भीमसेन को आपे से बाहर कर दिया। आखों के आगे अँधेरा छा गया, बिना कुछ सोचे-बिचारे उस औरत पर बरछी का वार किया। औरत ने बड़ी फुर्ती से बर्छी को ढाल पर रोका और हँस कर कहा, "कुछ और हौसला रखता हो तो दिखा!"
घण्टे भर तक दोनों में बरछी की लड़ाई हुई। इस समय अगर कोई इस फन का उस्ताद होता तो उस औरत की फुर्ती देख बेशक खुश हो जाता और 'वाह-वाह' या 'शाबाश' कहे बिना न रहता। आखिर उस औरत की बरछी जिसका फल जहर से बुझाया हुआ था भीमसेन की जाँघ में लगी जिसके लगते ही तमाम बदन में जहर फैल गया और वह बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ा।
९
भीमसेन के साथियों ने बहुत खोजा मगर भीमसेन का पता न लगा, लाचार कुछ रात जाते-जाते लौट आये और उसी समय महाराज शिवदत्त के पास जाकर अर्ज किया कि आज शिकार खेलने के लिए कुमार जंगल में गये थे, एक बनले सूअर के पीछे घोड़ा फेंकते हुए न मालूम कहाँ चले गये, बहुत तलाश किया मगर पता न लगा।
अपने लड़के के गायब होने का हाल सुन महाराज शिवदत्त बहुत घबरा गये। थोड़ी देर तक तो उन लोगों पर खफा होते रहे जो भीमसेन के साथ थे। आखिर कई जासूसों को बुला कर भीमसेन का पता लगाने के लिए चारों तरफ रवाना किया और ऐयारों को भी हर तरह की ताकीद की, मगर तीन दिन बीत लाने पर भी भीमसेन का पता न लगा।
एक दिन लड़के की जुदाई से व्याकुल हो अपने कमरे में अकेले बैठे तरह-तरह की बातें सोच रहे थे कि एक खास खिदमतगार ने वहाँ पहुँच अपने पैर की धमक से उन्हें चौंका दिया। जब वे उस खिदमतगार की तरफ देखने लगे तो उसने एक लिफाफा "चोबदार ने यह लिफाफा हुजूर में देने के लिए मुझे सौंपा है। उसी चोबदार की जुबानी मालूम हुआ कि कोई ऊपरी आदमी यह लिफाफा देकर चला गया, चोबदारों ने उसे रोकना चाहा था मगर वह फुर्ती से निकल गया।"
महाराज शिवदत्त ने वह लिफाफा लेकर खोला। अपने लड़के भीमसेन के हाथ का लेख पहचाना, बहुत खुश हुए, मगर चिट्ठी पढ़ लेने से तरदुद की निशानी उनके चेहरे पर झलकने लगी। चिट्ठी का मतलब यह था-
"यह जान कर आपको बहुत रंज होगा कि मुझे एक औरत ने बहादुरी से गिरफ्तार कर लिया, मगर क्या करूँ लाचार हूँ, इसका हाल हाजिर होने पर कर्ज करूँगा। इस समय मेरी छुट्टी तभी हो सकती है जब आप वीरेन्द्रसिंह के कुल ऐयारों को, जो आपके यहाँ कैद हैं, छोड़ दें और वे खुशी-राजी से अपने घर पहुँच जाएँ। मेरा पता लगाना व्यर्थ है, मैं बहुत ही बेढब जगह कैद किया गया हूँ।
चिट्ठी पढ़ कर महाराज शिवदत्त की अजब हालत हो गई। सोचने लगे, "क्या भीम को एक औरत ने पकड़ लिया? वह बड़ा होशियार ताकतवर और शस्त्र चलाने में निपुण था। नहीं-नहीं, उस औरत ने जरूर कोई धोखा दिया होगा! पर अब तो उन ऐयारों को छोड़ना ही पड़ेगा जो मेरी कैद में हैं! हाय, किस मुश्किल से ये ऐयार गरफ्तार हुए थे और अब क्या सहज ही में छूटे जाते हैं। खैर लाचारी है, क्या करें।"
बहुत देर तक सोच-विचार कर महाराज शिवदत्त ने बाकरअली ऐयार को बुला कर कहा, "वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों को छोड़ दो, जब तक वे अपने घर नहीं पहुँचते, हमारा लड़का एक औरत की कैद से नहीं छूटता।"
बाकरअली—(ताज्जुब से) यह क्या बात हुजूर ने कही? मेरी समझ में कुछ न आया!
शिवदत्तसिंह-भीमसेन को एक औरत ने गिरफ्तार कर लिया है। वह कहती है कि जब तक वीरेन्द्रसिंह के ऐयार न छोड़ दिए जायेंगे, तुम भी घर न जाने पाओगे।
बाकरअली—यह कैसे मालूम हुआ?
शिवदत्तसिंह—(चिट्ठी दिखा कर) यह देखो, खास भीमसेन के हाथ का लिखा हुआ है। इस चिट्ठी पर किसी तरह का शक नहीं हो सकता।
बाकरअली-(पढ़ कर) ठीक है। इतने दिनों तक कुमार का पता न लगना ही कहे देता था कि उन्हें किसी ने धोखा देकर फंसा लिया। अब यह भी मालूम हो गया कि किसी औरत ने मर्दों के कान काटे हैं।
शिवदत्तसिंह-ताज्जुब है, एक औरत ने बहादुरी से भीम को कैसे गिरफ्तार कर लिया! खैर, इसका खुलासा हाल तभी मालूम होगा जब भीम से मुलाकात होगी और जब तक वीरेन्द्रसिंह के ऐयार चुनार नहीं पहुँच जाते, भीम की सूरत देखने को तरसते रहेंगे। तुम जाके उन ऐयारों को अभी छोड़ दो, मगर यह मत कहना कि तुम लोग फलाँ वजह से छोड़े जाते हो, बल्कि यह कहना कि हमसे और वीरेन्द्रसिंह से सुलह हो गई, बस, तुम जल्द चुनार जाओ। ऐसा कहने से वे कहीं न रुक कर सीधे चुनार चले जाएँगे।
बाकरअली महाराज शिवदत्तसिंह के पास से उठा और वहाँ पहुँचा जहाँ बद्रीनाथ वगैरह ऐयार कैद थे। उसने सबको कैदखाने से बाहर किया और कहा-"अब आप लोगों से हमसे कोई दुश्मनी नहीं, आप लोग अपने घर जाइए, क्योंकि हमारे महाराज से और राजा वीरेन्द्रसिंह से सुलह हो गई।"
बद्रीनाथ-बहुत अच्छी बात है! बड़ी खुशी का मौका है। पर अगर आपका कहना ठीक है तो हमारे ऐयारी के बटुए और खंजर भी दे दीजिए।
वाकरअली–हाँ-हाँ, लीजिये, इसमें क्या उज्र है! अभी मँगाये देता हूँ बल्कि मैं खुद जाकर ले आता हूँ।
दो-तीन ऐयारों को साथ ले इन ऐयारों के बटुए वगैरह लेने के लिए वाकरअली अपने मकान की तरफ गया और इधर पंडित बद्रीनाथ तथा पन्नालाल वगैरह निराला पाकर आपस में बातें करने लगे।
पन्नालाल-क्यों यारो, यह क्या मामला है जो आज हम लोग छोड़े जाते हैं?
रामनारायण-सुलह वाली बात तो हमारी तबीयत में नहीं बैठती।
चुन्नीलाल-अजी कैसी सुलह और कहाँ का मेल! इसमें जरूर कोई दूसरा ही मामला है।
ज्योतिषी-बेशक शिवदत्त लाचार होकर हम लोगों को छोड़ रहा है।
बद्रीनाथ-क्यों साहब भैरोंसिंह, आप इस बारे में क्या सोचते हैं?
भैरोंसिंह-सोचेंगे क्या? असल जो बात है मैं समझ गया।
बद्रीनाथ-भला कहिये तो सही, क्या समझे!
भैरोंसिंह-इसमें कोई शक नहीं कि हमारे साथियों में से किसी ने यहाँ के किसी मुड्ड को पकड़ पाया है और इनको कहला भेजा है कि जब तक हमारे ऐयार चुनार न पहुँच जाएँगे उसको न छोड़ेंगे। बस, इसी से ये बातें बनाई जा रही हैं जिसमें हम लोग जल्दी चुनार पहुँचें।
बद्रीनाथ-शाबाश, बहुत ठीक सोचा। इसमें कोई शक नहीं। मैं समझता हूँ कि शिवदत्त की जोरू या लड़का या लड़की पकड़ी गई है तभी वह इतना कर रहा है, नहीं तो दूसरे की वह परवाह करने वाला नहीं है, जिस पर हम लोगों के मुकाबिले में।
भैरोंसिंह-बस-बस, यही बात है! और अब हम लोग सीधे चुनार क्यों जाने लगे, जब तक कुछ दक्षिणा न ले लें।
बद्रीनाथ–देखो तो, क्या दिल्लगी मचाता हूँ।
भैरोंसिंह-(हँस कर) मैं तो शिवदत्त से साफ कहूँगा कि मेरे पैरों में दर्द है, तीन महीने में भी चुनार नहीं पहुँच सकता, घोड़े पर सवार होना मुश्किल है, बैल की सवारी से कसम खा चुका हूँ, पालकी पर घायल बीमार या अमीर लोग चढ़ते हैं, बस बिना हाथी के मेरा काम नहीं चलता, सो भी बिना हौदे के चढ़ने की मुझे आदत नहीं। तेजसिंह दीवान का लड़का, बिना चाँदी-सोने के हौदे पर चढ़ नहीं सकता!
चुन्नीलाल-भाई बाकर ने मुझे बेढब छकाया है। मैं तो जब तक बाकर की आधा माशे नाक न ले लूँगा यहाँ से टलने वाला नहीं, चाहे जान रहे या जाय।
चुन्नीलाल की बात सुनकर सभी हँस पड़े और देर तक इसी तरह की बातचीत करते रहे, तब तक बाकरअली भी इन सबके बटुए और खंजर लिए हुए आ पहुँचा।
बाकरअली—लो साहबो, ये आपके बटुए और खंजर हाजिर हैं।
बद्रीनाथ-क्यों यार, कुछ चुराया तो नहीं! और तो खैर बस, मुझे अपनी अशर्फियों का धोखा है, हम लोगों के बटुए में खूब मजेदार चमकती हुई अशर्फियाँ थीं।
बाकरअली-अब लगे झूठ-मूठ का बखेड़ा मचाने।
रामनारायण—(मुँह बना कर) हैं, सच कहना! इन बातों से तो मालूम होता है कि अशर्फियाँ डकार गये! (पन्नालाल वगैरह की तरफ देख कर) लो भाइयो, अपनी चीजें देख लो।
पन्नालाल-देखें क्या? हम लोग जब चुनार से चले थे तो सौ-सौ अशर्फियाँ सब को खर्च के लिए मिली थीं। वे सब ज्यों-की-त्यों बटुए में मौजूद थीं।
भैरोंसिंह-भाई, मेरे पास तो अशर्फियाँ नहीं थीं, हाँ, एक छोटी-सी पोटली जवाहिरात की जरूर थी, सो गायब है। अब कहिए, इतनी बड़ी रकम छोड़कर कैसे चुनार जाऊँ?
बद्रीनाथ-अच्छी दिल्लगी है! दोनों राजाओं में सुलह हो गई और इस खुशी में लुट गए हम लोग! चलो, एक दफे महाराज शिवदत्त से अर्ज करें। अगर सुनेंगे तो बेहतर है, नहीं तो इसी जगह अपना गला काटकर रख जायेंगे, धनदौलत लुटा मैं कर चुनार जाना हमें मंजूर नहीं!
बाकरअली हैरान कि इन लोंगों ने अजब ऊधम मचा रक्खा है। कोई कहता है मेरी अशर्फियाँ गायब हैं, कोई कहता है मेरी जवाहिरात की पोटली गुम हो गई, कोई कहता है हम लुट गए, अब क्या किया जाय? हम तो इस फिक्र में हैं कि जिस तरह हो ये लोग जल्द चुनार पहुँचें जिसमें भीमसेन की जान बचे, मगर ये लोग तो खमीरी आटे की तरह फैले ही जाते हैं। खैर, एक दफे इनको धमकी देनी चाहिए।
बाकरअली–देखो, तुम लोग बदमाशी करोगे तो फिर कैद कर लिए जाओगे!
बद्रीनाथ-जी हाँ! मैं भी यही सोच रहा हूँ।
पन्नालाल-ठीक है, जरूर कैद कर लिए जायेंगे, क्योंकि अपनी जमा माँग रहे हैं। चुपचाप चले जायें तो बेहतर है, जिसमें बखूबी रकम पचा जाओ और कोई सुनने भी न पावे!
भैरोंसिंह—यह धमकी तो आप अपने घर में खर्च कीजियेगा। भलमनसी इसी में है कि हम लोगों की जमा बाएँ हाथ से रख दीजिये! और नहीं, तो चलिये राजा साहब के पास, जो कुछ होगा उन्हीं के सामने निपट लेंगे।
बाकरअली-अच्छी बात है, चलिये।
सब कोई-चलिये, चलिये!
यह मसखरों का झुण्ड बाकरअली के साथ महाराज शिवदत्त के पास पहुँचा।
बाकरअली–महाराज, देखिए, ये लोग झगड़ा मचाते हैं!
भैरोंसिंह-जी हाँ, कोई अपनी जमा माँगे तो कहिये, झगड़ा मचाते हैं।
शिवदत्तसिंह-क्या मामला है?
भैरोंसिंह–महाराज मुझसे सुनिये! जब से हमारे सरकार से और आपसे सुलह हो गई और हम लोग छोड़ दिये गए तो हम लोगों की वे चीजें भी मिल जानी चाहिए जो कैद होते समय जब्त कर ली गई थीं।
शिवदत्तसिंह—क्यों नहीं मिलेंगी?
भैरोंसिंह-ईश्वर आपको सलामत रक्खे! क्या इन्साफ किया है! आगे सुनिए, जब हम लोगों ने अपनी चीजें मियाँ बाकर से मांगी, तो बस बटुआ और खंजर तो दे दिया मगर बटुए में जो कुछ रकम थी, गायब कर गए। दो-दो चार-चार अशर्फियाँ और दस-दस बीस-बीस रुपये तो छोड़ दिये, बाकी अपनी कब्र में गाड़ आये! अब इन्साफ आपके हाथ है!
शिवदत्तसिंह-(बाकर से) क्यों जी, यह क्या मामला है?
बाकरअली–महाराज, ये सब झूठे हैं।
भैरोंसिंह-जी हाँ, हम सबके सब झूठे हैं और आप अकेले सच्चे हैं?
शिवदत्तसिंह–(भैरों से) खैर, जाने दो, तुम लोगों का जो कुछ गया है हमसे लेकर अपने घर जाओ, हम बाकर से समझ लेंगे।
भैरोंसिंह-महाराज, सौ-सौ अफियाँ तो इन लोगों की गई हैं और एक पोटली जवाहिरात की मेरी गई है। अब बहुत बखेड़ा कौन करे बस एक हजार अशर्फियाँ मँगवा दीजिये, तो हम लोग अपने घर का रास्ता लें। रकम तो ज्यादे गई है मगर आपका क्या कसूर!
बाकरअली-यारो, गजब मत करो!
भैरोंसिंह-हाँ साहब, हम लोग गजब करते हैं। खैर लीजिए, अब एक पैसा न माँगेंगे। जी में समझ लेंगे खैरात किया, अब चुनार भी न जायेंगे (उठना चाहता है)।
शिवदत्तसिंह-अजी, घबराते क्यों हो! जो कुछ तुमने कहा है वह हम देते हैं। (बाकर से) क्या तुम्हारी शामत आयी है!
महाराज शिवदत्त ने बाकरअली को ऐसी डाँट बताई कि बेचारा चुपके से जा खड़ा हुआ। हजार अशर्फियाँ मँगवा कर भैरोंसिंह के आगे रख दी गईं, ये लोग अपने अपने बटुए में रख उठ खड़े हुए, यह भी न पूछा कि तुम्हारा कौन कैद हो गया जिसके लिए इतना सह रहे हो? हाँ शिवदत्तगढ़ के बाहर होते-होते इन लोगों ने पता लगा ही लिया कि भीमसेन किसी ऐयार के पंजे में पड़ गया है।
शिवदत्तगढ़ के बाहर होकर सीधे चुनार का रास्ता लिया। दूसरे दिन शाम को जब चुनार पन्द्रह कोस बाकी रह गया, सामने से एक सवार तेज घोड़ा फेंकता हुआ इसी तरफ आता दिखाई पड़ा। पास आने पर भैरोंसिंह ने पहचाना कि शिवदत्त का लड़का भीमसेन है।
भीमसेन ने इन ऐयारों के पास पहुँच कर घोड़ा रोका और हँसकर भैरोंसिंह की तरफ देखा जिसे वह बखूबी पहचानता था।
भैरोंसिंह-क्यों आपको छुट्टी मिली? (अपने साथियों की तरफ देख कर) महाराज शिवदत्त के पुत्र कुमार भीमसेन यही हैं।
भीमसेन-आप ही लोगों की रिहाई पर मेरी छुट्टी बदी थी। आप लोग चले आये, तो मैं क्यों रोका जाता?
भैरोंसिंह-हमारे किस साथी ने आपको गिरफ्तार किया?
भीमसेन-सो मुझे मालूम नहीं, शिकार खेलते समय घोड़े पर सवार एक औरत ने पहुँच कर नेजे से मुझे जख्मी किया। जब मैं बेहोश हो गया तो मुश्कें बाँध एक खोह में ले गई और इलाज करके आराम किया। आगे का हाल आप जानते ही हैं, मुझे यह न मालूम हुआ कि वह औरत कौन थी मगर इसमें शक नहीं कि थी वह औरत ही।
भैरोंसिंह-खैर, अब आप अपने घर जाइये, मगर देखिए आपके पिता ने व्यर्थ लोगों से वैर बाँध रक्खा है। जब वे राजकुमार वीरेन्द्रसिंह के कैदी हो गये थे उस वक्त हमारे महाराज सुरेन्द्र सिंह ने उन्हें बहुत तरह से समझा कर कहा था कि आप हम लोगों से वैर छोड़ चुनार में रहें, हम चुनार की गद्दी आपको फेर देते हैं। उस समय तो हजरत को फकीरी सूझी थी, योगाभ्यास की धुन में प्राण की जगह बुद्धि को ब्रह्माण्ड में चढ़ा ले गये थे लेकिन अब फिर गुदगुदी मालूम होने लगी। खैर, हमें क्या, उनकी किस्मत में जन्म-भर दुःख ही भोगना बदा है तो कोई क्या करे! इतना भी नहीं सोचते कि जब चुनार के मालिक थे तब तो कुंअर वीरेन्द्रसिंह से जीते नहीं, अब न मालूम क्या साहब, हम कर लेंगे!
भीमसेन-मैं सच कहता हूँ कि उनकी बातें मुझे पसन्द नहीं मगर क्या करूँ, पिता के विरुद्ध होना धर्म नहीं।
भैरोंसिंह-ईश्वर करे, इसी तरह आपकी धर्म में बुद्धि बनी रहे, अच्छा जाइये।
भीममेन ने अपने घर का रास्ता लिया और हमारे चोखे ऐयारों ने चुनार की सड़क नापी।
१०
अब हम अपने पाठकों को फिर उसी खोह में ले चलते हैं जिसमें कुँअर आनन्दसिंह को बेहोश छोड़ आये हैं अथवा जिस खोह में अपनी जान बचानेवाले सिपाही के साथ पहुँच कर उन्होंने एक औरत को छुरे से लाश काटते देखा था और योगिनी ने पहुँच कर सब को बेहोश कर दिया था।
थोड़ी देर के बाद आनन्दसिंह को छोड़ योगिनी बाकी सब लोगों को कुछ सुँघा कर होश में लाई। बेहोश आनन्दसिंह उठाकर एक किनारे रख दिए गए और फिर वही काम अर्थात् लटकते हुए आदमी को छुरे से काट-काट कर पूछना कि 'इन्द्रजीतसिंह के बारे में जो कुछ जानता है बता' जारी हुआ। सिपाही ने भी उन लोगों का साथ दिया। मगर वह आदमी भी कितना जिद्दी था! बदन के टुकड़े-टुकड़े हो गए, मगर जब तक होश में रहा यही कहता गया कि हम कुछ नहीं जानते। हब्शी ने पहले ही से कब्र खोद रखी थी, दम निकल जाने पर वह आदमी उसी में गाड़ दिया गया।
इस काम से छुट्टी पा योगिनी ने सिपाही की तरफ देख कर कहा, "बाहर जंगल से लकड़ी काट काम चलाने लायक एक छोटी-सी डोली बना लो, उस पर आनन्दसिंह को रख तुम और हब्शी मिल कर उठा ले जाओ, चुनार के किले के पास इनको रख देना जिसमें होश आने पर अपने पार पहुँच जायँ, तकलीफ न हो, बल्कि होश में लाने की तरकीब करके तब तुम इनसे अलग होना और जहाँ जी चाहे, चले जाना। हम लोगों से अगर मिलने की जरूरत हो तो इसो जगह आना।"
सिपाही-मेरी भी यही राय थी। आनन्दसिंह को तकलीफ क्यों होने लगी; क्या मुझको इसका खयाल नहीं है!
योगिनी-क्यों नहीं, बल्कि मुझसे ज्यादे होगा। अच्छा, तुम जाओ, जिस तरह बने इस काम को कर लो, हम लोग अब अपने काम पर जाती हैं। (दूसरी औरत की तरफ देखकर जिसने छुरी से उस लाश को काटा था) चलो बहिन, चलें, इस छोकरी को इसी जगह छोड़ दो, मजे में रहेगी, फिर पूछा जायगा।
इन दोनों औरतों का अभी वहुत-कुछ हाल हमें लिखना है इसलिए जब तक इन दोनों का असल भेद और नाम न मालूम हो जाय, तब तक पाटकों के समझने के लिए कोई फर्जी नाम जरूर रख देना चाहिए। एक का नाम तो योगिनी रख ही दिया गया, दूसरी का वनचरी समझ लीजिए। योगिनी और वनचरी दोनों खोह के बाहर निकली और कुछ दक्खिन झुकते हुए पूरब का रास्ता लिया। इस समय रात बीत चुकी थी और सुबह की सुफेदी के साथ लुपलुपाते हुए दो-चार तारे आसमान पर दिखाई दे रहे थे।
पहर दिन चढ़े तक ये दोनों बराबर चलती गईं, जब धूप कुछ कड़ी हुई, जंगल में एक जगह वेल के पेड़ों की घनी छाँह देखकर वहाँ टिक गई जिसके पास ही पानी का झरना बह रहा था। दोनों ने कमर से बटुआ खोला और कुछ मेवा निकाल कर खाने तथा पानी पीने के बाद जमीन पर नरम-नरम पत्ते बिछा कर सो रहीं।
ये दोनों तमाम रात की जगी हुई थीं, लेटते ही नींद आ गई। दोपहर तक खूब सोईं। जब पहर दिन बाकी रहा उठ बैठी और चश्मे के पानी से हाथ-मुँह धो फिर चल पड़ीं। इस तरह मौके-मौके पर टिकती हुई ये दोनों कई दिन तक बराबर चलती गई। एक दिन आधी रात तक बराबर चलते जाने के बाद एक तालाब के किनारे पहुँचीं जो बगल वाली पहाड़ी के नीचे सटा हुआ था।
इस लम्बे-चौड़े संगीन और निहायत खूबसूरत तालाब के चारों तरफ पत्थर की सीढ़ियाँ और छोटी-छोटी बारहदरियाँ इस तौर पर बनी हुई थीं जो बिल्कुल जल के किनारे ही पड़ती थीं। तालाब के ऊपर भी चारों तरफ पत्थर का फर्श और बैठने के लिए हर एक तरफ सिंहासन की तरह चार-चार चबूतरे निहायत खूबसूरत मौजूद थे। ताज्जुब की बात यह थी कि इस तालाब के बीच का जाट लकड़ी की जगह पीतल का इतना मोटा बना हुआ था कि दोनों तरफ दो आदमी खड़े होकर हाथ नहीं मिला सकते थे। जाट के ऊपर लोहे के एक बदसूरत आदमी का चेहरा उठाया हुआ था।
तालाब के ऊपर चारों तरफ बड़े-बड़े सायेदार दरख्त ऐसे घने लगे थे कि सभी की डालियाँ आपस में गुँथ रही थीं। दोनों उस तालाब पर खड़े होकर उसकी शोभा देखने लगीं। थोड़ी देर बाद दोनों एक चबूतरे पर बैठ गई, मगर मुंह तालाब ही थीं। यकायक जाट के पास का पानी खलबलाया और एक आदमी तैरता हुआ जल के ऊपर दिखाई दिया। इन दोनों की टकटकी उसी तरफ बँध गई, वह आदमी किनारे आया और ऊपर की सीढ़ी पर खड़ा हो चारों तरफ देखने लगा। अब मालूम हो गया कि वह औरत है। योगिनी और वनचरी ने चबूतरे के नीचे होकर अपने को छिपा लिया मगर उस औरत की तरफ बराबर देखती रहीं।
उस औरत की उम्र वहुत कम मालूम होती थी जो अभी-अभी तालाब से बाहर हो इधर-उधर सन्नाटा देख हवा में अपनी धोती सुखा रही थी। थोड़ी ही देर में साड़ी मुख गयी जिसे पहन कर उसने एक तरफ का रास्ता लिया।
मालूम होता है योगिनी और वनचरी इसी की ताक में बैठी थीं क्योंकि जैसे ही वह औरत वहाँ से चल खड़ी हुई, वैसे ही ये दोनों उस पर लपकी और जबरदस्ती गिरफ्तार कर लेना चाहा, मगर वह कमसिन औरत इन दोनों को अपनी तरफ आते देख और इन दोनों के मुकाबले अपनी जीत न समझ कर लौट पड़ी और फुर्ती के साथ उन दरख्तों में से एक पर चढ़ गई जो उस तालाब के चारों तरफ लगे हुए थे। योगिनी और वनचरी दोनों उस दरख्त के नीचे पहुँची, योगिनी खड़ी रही और वनचरी उसे की तरफ किये पकड़ने के लिए ऊपर चढ़ी।
हम ऊपर लिख आये हैं कि यह दरख्त इतने पास-पास लगे हुए थे कि सभी की डालियाँ आपस में गुँथ रही थीं। वनचरी को पेड़ पर चढ़ते देख वह जलचरी ऊपर ही ऊपर दूसरे पेड़ पर कूद गई। यह देखकर योगिनी ने उसके आगे वाले तीसरे पेड़ को जा घेरा, जिसमें वह बीच में फंसी रह जाय और आगे न जाने पावे, मगर यह चालाकी भी न चली। जब उस औरत ने अपने बगल वाले पेड़ को दुश्मनों से घिरा हुआ पाया, पेड़ के नीचे उतर आई लौर तालाब की सीढ़ियों को तै करते हुए धम्म से जल में कूद पड़ी। योगिनी और वनचरी भी साथ ही पेड़ से उतरी और उसके पीछे जाकर इन दोनों ने भी अपने को जल में डाल दिया।
११
सूर्य भगवान अस्त होने के लिए जल्दी कर रहे हैं। शाम की ठण्डी हवा अपनी चाल दिखा रही है। आसमान साफ है क्योंकि अभी-अभी पानी बरस चुका है और पछवा हवा ने रूई के पहल की तरह जमे हुए बादलों को तूम-तूम कर उड़ा दिया है। अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा ने आसमान पर अपना पूरा दखल जमा लिया है और निकले हुए इन्द्रधनुष पर जिला दे उसके रंगदार जौहर को अच्छी तरह उभाड़ रक्खा है। बाग की रविशों पर जिन पर कुदरती भिश्ती अभी घंटा भर पहले ही छिड़काव कर गया है, घूम-घूम कर देखने से धुले-धुलाये रंग-बिरंगे पत्तों की कैफियत और उन सफेद कलियों की बहार दिल और जिगर को क्या ही ताकत दे रही है जिनके एक तरफ का रंग तो असली, मगर दूसरा हिस्सा अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा पड़ने से ठीक सुनहला हो रहा है। उस तरफ से आये हुए खूशबू के झपेटे कहे देते हैं कि अभी तक तो आप दृष्टान्त ही में अनहोनी समझ कर कहा-सुना करते थे, मगर आज 'सोने और सुगन्ध' वाली कहावत देखिए अपनी आँखों के सामने मौजूद ये अधखिली कलियाँ सच किए देती हैं। चमेली की टट्टियों में नाजुक-नाजुक सफेद फूल तो खिले हुए हैं ही, मगर कहीं-कहीं पत्तियों में से छन कर आई हुई सूर्य की आखिरी किरणें धोखे में डालती हैं। यह समझ कर कि आज इन्हीं सुफेद चमेलियों में जर्द चमेली भी खिली हुई है, शौक भरा हाथ बिना बढ़े नहीं रहता। सामने की बनाई हुई सब्जी जिसकी दूब सावधानी से काट कर मालियों ने सब्ज मखमली फर्श का नमूना दिखला दिया है, आँखों को क्या ही तरावट दे रही है। देखिये उसी के चारों तरफ सजे हुए गमलों में खुशरंग पत्तों वाले छोटे जंगली पौधे अपने हुस्न और जमाल के घमंड में पैसे ऐंठे जाते हैं। इनस भी रविशों और क्यारियों के किनारे गुलमेंहदी के पेड़ ठीक पल्टनों की कतार की तरह खड़े दिखाई देते हैं, क्योंकि छुटपने ही से उनकी फैली हुई डालियाँ काटकर मालियों ने मनमानी सूरतें बना डाली हैं। कहने ही को सूरजमुखी का फूल सूर्य की तरफ घूमा रहता है मगर नहीं, यहाँ तो देखिये सामने सूर्यमुखी के कितने ही पेड़ लगे हैं जिनके बड़े-बड़े फूल अस्त होते हुए दिवाकर की तरफ पीठ किए हसरत-भरी निगाहों से देखती हुई उस हसीन नाजनीन के अलौकिक रूप की छटा देख रहे हैं जो उस बाग के बीचोंबीच बने हुए कमरे की छत पर खड़ी उसी तरफ देख रही है जिधर सूर्य भगवान अस्त होते दिख रहे हैं। उधर ही से बाग में आने का रास्ता है। मालूम होता है वह किसी आने वाले की राह देख रही है, तभी तो सूर्य की किरणों को सह कर भी एकटक उधर ही ध्यान लगाये है।
इस कमसिन परीजमाल का चेहरा पसीने से भर गया मगर किसी आने वाले की सूरत न देख पड़ी। घबरा कर बायें हाथ अर्थात् दक्खिन तरफ मुड़ी और उस बनावटी छोटे से पहाड़ को देखकर दिल बहलाना चाहा जिसमें रंग-बिरंगे खुशनुमा पत्तों वाले करोटन, कौलियस, बरबीना, बिगूनिया, मौस इत्यादि पहाड़ों पर के छोटे-छोटे पौधे बहुत ही कारीगरी से लगाये हुए थे, और बीच में मौके-मौके से घुमा-फिरा कर पेड़ों को तरी पहुँचाने और पहाड़ी की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए नहर काटी हुई थी, ऊपर ढाँचा खड़ा करके निहायत खूबसूरत रेशमी जाल इसलिए डाला हुआ था कि हर तरह की बोलियों से दिल खुश करने वाली उन रंग-बिरंगी नाजुक चिड़ियों के उड़ जाने का खौफ न रहे जो उनके अन्दर छोड़ी हुई हैं और इस समय शाम होते देख अपने घोंसलों में, जो पत्तों के गुच्छों में बनाए हैं, जा बैठने के लिए उतावली हो रही हैं।
हाय, इस पहाड़ी की खूबसूरती से भी उसका परेशान और किसी की जुदाई में व्याकुल दिल न बहला, लाचार छत के ऊपर की तरफ खड़ी हो उन तरह-तरह के नक्शों वाली क्यारियों को देख अपने घबड़ाये हुए दिल को फुसलाना चाहा, जिनमें नीले, पीले, हरे, लाल, चौरंगे नाजुक मौसमी फूलों के छोटे-छोटे तख्ते सजाये हुए थे, जिनके देखने से वेशकीमत गलीचे का गुमान हो रहा था और उसी के बीच में एक चक्करदार फव्वारा छूट रहा था जिसकी बारीक धारों का जाल दूर-दूर तक फैल रहा था। रंग-बिरंगी तितलियाँ उड़-उड़कर उन रंगीन फूलों पर इस तरह वैठती थीं कि फूलों में और उनमें बिल्कुल फर्क नहीं मालूम पड़ता था, जब तक वे फिर से उड़कर किसी दूसरे फूलों के गुच्छे पर न जा बैठतीं।
इन फूलों और फव्वारों के छींटों ने भी उसके मन की कली न खिलाई, लाचार वह पूरब तरफ आई और अपनी उन सखियों की कार्रवाई देखने लगी जो चुन-चुन कर खुशबूदार फूलों के गजरों और गुच्छों के बनाने में अपने नाजुक हाथों को तकलीफ दे रही थीं। कोई अंगूर की टट्टियों में घुसकर लाल पके हुए अंगूरों की ताक में थी, कोई पके हुए आम तोड़ने की धुन में उन पेड़ों की डालियों तक लग्घे पहुँचा रही थी जिनके नीचे चारों तरफ गड्ढे खुदवा कर इसलिए जल से भरवा दिये गये थे कि पेड़ से गिरे हुए आम चुटीले न होने पावें।
अब सूर्य की लालिमा बिल्कुल जाती रही और धीरे-धीरे अँधेरा होने लगा। वह बेचारी किसी तरह अपने दिल को न बहला सकी, बल्कि अँधेरे में बाग के चारों तरफ के बड़े-बड़े पेड़ों की सूरत डरावनी मालूम होने लगी, दिल की धड़कन बढ़ती ही गई, लाचार वह छत के नीचे उतर आई और एक सजे-सजाये कमरे में चली गई।
इस कमरे की सजावट मुख्त सिर ही थी, एक झाड़ और दस-बारह हाँडियाँ छत से लटक रही थीं, चारों तरफ दुशाखी दीवारगीरों में मोमबत्तियाँ जल रही थीं, जमीन पर फर्श बिछा हुआ था और एक तरफ गद्दी लगी हुई थी जिसके आगे दो फर्शी झाड़ अपनी चमक-दमक दिखा रहे थे, उनके बगल ही में एक मसहरी थी जिस पर थोड़े से खुशबूदार फूल और दो-तीन गजरे दिखाई दे रहे थे। अच्छे-अच्छे कपड़ों और गहनों से दिमागदार बनी हुई दस-बारह कमसिन छोकरियाँ भी इधर-उधर घूम-घूमकर ताखों (आलों) पर रक्खे हुए गुलदस्तों में फूलों के गुच्छे सजा रही थीं।
वह नाजनीन जिसका नाम किशोरी था कमरे में आई मगर गद्दी पर न बैठ कर मसहरी पर जा लेटी और आँचल से मुंह ढाँप न मालूम क्या सोचने लगी। उन्हीं छोकरियों में से एक पंखा झलने लगी, वाकी अपनी मालिक को उदास देख सुस्त खड़ी हो गई मगर निगाहें सभी की मसहरी की तरफ ही थीं।
थोड़ी देर तक इस कमरे में सन्नाटा रहा, इसके बाद किसी आने वाले की आहट मालूम हुई। सभी की निगाह सदर दरवाजे की तरफ घूम गई। किशोरी ने भी मुँह फेरा और उसी तरह देखने लगी। एक नौजवान लड़का सिपाहियाना ठाठ से उस कमरे में आ पहुँचा जिसे देखते ही किशोरी घबरा कर उठ बैठी और बोली-
"कमला, मैं कब से राह देख रही हूँ! तैने इतने दिन क्यों लगाये?"
पाठक समझ गये होंगे कि यह सिपाहियाना ठाठ से आने वाला नौजवान लड़का असल में मर्द नहीं है बल्कि कमला के नाम से पुकारी जाने वाली कोई ऐयारा है।
कमला—यही सोच के मैं चली आई कि तुम घबरा रही होगी, नहीं तो दो दिन का काम और था।
किशोरी-क्या अभी पूरा हाल मालूम नहीं हुआ?
कमला-नहीं।
किशोरी-चुनार में तो हलचल खूब मची होगी!
कमला-इसका क्या पूछना है! मुझे भी जो कुछ थोड़ा-बहुत हाल मिला, वह चुनार ही में।
किशोरी-अच्छा, क्या मालूम हुआ?
कमला–बूढ़े सौदागर की सूरत बना जब मैं तुम्हारी तस्वीर से जड़ी अँगूठी दे आई, उसी समय से उनकी सूरत-शक्ल, बातचीत और हाल-चाल में फर्क पड़ गया, दूसरे दिन मेरी (सौदागर की) बहुत खोज की गयी।
किशोरी-इसमें कोई शक नहीं कि मेरी आह ने अपना असर किया! हाँ, फिर क्या हुआ?
कमला-उसके दूसरे या तीसरे दिन उन्हें उदास देख आनन्दसिंह किश्ती पर हवा खिलाने ले गये, साथ में एक बूढ़ा नौकर भी था। बहाव की तरफ कोस डेढ़ कोस जाने के बाद किनारे के जंगल से गाने-बजाने की आवाज आई। उन्होंने किश्ती किनारे लगाई और उतरकर देखने लगे। वहाँ तुम्हारी सूरत बन माधवी ने पहले ही जाल फैला रखा था, यहाँ तक कि उसने अपना मतलब साध लिया और न मालूम किस ढंग से उन्हें लेकर गायब हो गई। उस बूढ़े नौकर की जुबानी जे उनके साथ गया था मालूम हुआ कि माधवी के साथ कई औरतें भी थीं जो इन दोनों भाइयों को देखते ही भागीं। आनन्दसिंह उन औरतों के पीछे लपके लेकिन वे भुलावा देकर निकल गयीं और आनन्दसिंह ने लौटकर आने पर अपने भाई को भी न पाया, तब गंगा किनारे पहुँच डोंगी पर बैठे हुए खिदमतगार से सब हाल कहा।
किशोरी—यह कैसे मालूम हुआ कि माधवी ने मेरी सुरत बनाकर उन्हें धोखा दिया?
कमला-लौटती समय जब मैं उस जंगल के कुछ इधर निकल आई, जो अब बिलकुल साफ हो गया है, तो जमीन पर पड़ी हुई एक जड़ाऊ 'कँगनी' नजर आई। उठाकर देखा। मैं उस कँगनी को खूब पहचानती थी, कई दफे माधवी के हाथ में देख चुकी थी, बस मुझे पूरा यकीन हो गया कि यह काम इसी का है, आखिर उसके घर पहुँची और उसकी हमजोलियों की बातचीत से निश्चय कर लिया।
किशोरी-देखो, राँड ने मेरे ही साथ दगाबाजी की!
कमला-कैसी कुछ!
किशोरी-तो इन्द्रजीतसिंह अब उसी के घर में होंगे?
कमला-नहीं, अगर वहाँ होते तो क्या मैं इस तरह खाली लौट आती?
किशोरी–फिर उन्हें कहाँ रखा है?
कमला-इसका पता नहीं लगा। मैंने चाहा था कि खोज लगाऊँ मगर तुम्हारी तरफ खयाल करके दौड़ी आई।
किशोरी—(ऊँची साँस लेकर) हाय, उस शैतान की बच्ची ने मेरा ध्यान उनके दिल से निकाल दिया होगा! इतना कह किशोरी रोने लगी, यहाँ तक कि हिचकी बंध गयी। कमला ने उसे बहुत समझाया और कसम खाकर कहा कि मैं अन्न उसी दिन खाऊँगी, जिस दिन इन्द्रजीतसिंह को तुम्हारे पास ला बैठाऊँगी।
पाठक इस बात के जानने की इच्छा रखते होंगे कि यह किशोरी कौन है? इस का नाम हम पहले लिख आये हैं और अब फिर कहे देते हैं कि यह महाराज शिवदत्त की लड़की है, मगर यह किसी दूसरे मौके से मालूम होगा कि किशोरी शिवदत्तगढ़ से बाहर क्यों कर दी गयी या बाप का घर छोड़ अपने ननिहाल में क्यों दिखाई देती है।
थोड़ी देर सन्नाटा रहने बाद फिर किशोरी और कमला में बातचीत होने लगी।
किशोरी–कमला, तू अकेली क्या कर सकेगी?
कमला—मैं तो वह कर सकूँगी जो चपला और चम्पा के किये भी न हो सकेगा।
किशोरी-तो क्या आज तू फिर जायगी?
कमला-हाँ जरूर जाऊँगी, मगर दो-एक बातों का फैसला आज ही तुमसे कर लूँगी, नहीं तो पीछे बदनामी देने को तैयार होओगी।
किशोरी–बहिन, ऐसी क्या बात है जो मैं तुझी पर बदनामी देने पर उतारू हो जाऊंगी? एक तू ही तो मेरी दुःख-सुख की साथी है।
कमला-यह सब सच है, मगर आपस का मामला बहुत टेढ़ा होता है।
किशोरी-खैर, कुछ कह तो सही!
कमला-कुंअर इन्द्रजीतसिंह को तुम चाहती हो, इसी सबब से उनके कुटुम्ब भर की भलाई तुम अपना धर्म समझती हो, मगर तुम्हारे पिता से और उस घराने से पूरा बैर बंध रहा है, ताज्जुब नहीं कि तुम्हारी और इन्द्रजोतसिंह की भलाई करते-करते मेरे सबब से तुम्हारे पिता को तकलीफ पहुँचे, मगर ऐसा हुआ तो बेशक तुम्हें रंज होगा।
किशोरी-इन बातों को न सोच! मैंने तो उसी दिन अपने घर को इस्तीफा दे दिया जिस दिन पिता ने मुझे निकाल बाहर किया, अगर ननिहाल में मेरा ठिकाना न होता या मेरे नाना का उनको खौफ न होता तो शायद वे उसी दिन मुझे वैकुण्ठ पहुँचा देते। अब मुझे उस घर से रत्ती भर मुहब्बत नहीं है। पर बहन, तूने यह बड़ा काम किया कि उस दुष्टा को वहां से निकाल लाई और मेरे हवाले किया। जब मैं गम की मारी घबड़ा जाती हूँ तभी उस पर दिल का बुखार निकालती हूँ जिससे कुछ ढाढ़स हो जाती है।
कमला-मुझे तो अभी तक उसके ऊपर गुस्सा निकालने का मौका ही न मिला, कहो तो आज चलते-चलाते मैं भी कुछ बुखार निकाल लूँ?
किशोरी-क्या हर्ज है, ले आ।
कमला तभी कमरे के बाहर चली गयी। उसके पीछे आधे घंटे तक किशोरी को चुपचाप कुछ सोचने का मौका मिला। उसकी सहेलियाँ वहाँ मौजूद थीं मगर किसी को बोलने का हौसला नहीं पड़ा।
आधे घण्टे बाद कमला एक कैदी औरत को लिए हुए फिर उस कमरे में दाखिल हुई।
इस औरत की उम्र तीस वर्ष से कम न होगी, चेहरे-मोहरे और रंगत से दुरुस्त थी, कह सकते हैं कि अगर इसे अच्छे कपड़े और गहने पहनाये जायें तो बेशक हसीनों की पंक्ति में बैठाने लायक हो, पर न मालूम इसकी ऐसी दुर्दशा क्यों कर रखी है और किस कसूर पर कैदी बना डाला है।
इस औरत को देखते ही किशोरी का चेहरा लाल हो गया और मारे गुस्से के तमाम बदन थर-थर काँपने लगा। कमला ने उसकी यह दशा देख अपने काम में जल्दी की और उन सहेलियों में से जो उस कमरे में मौजूद सब कुछ देख रही थीं एक की तरफ कुछ इशारा करके हाथ बढ़ाया। वह दूसरे कमरे में चली गई और एक बेंत लाकर उसने कमला के हाथ में दे दिया।
कई औरतों ने मिलकर उस कैदी औरत के हाथ-पैर एक साथ ही मजबूत बाँ और उसे गेंद की तरह लुढ़का दिया।
यहाँ तक तो किशोरी चुपचाप देखती रही, मगर जब कमला कमर कसकर, बेंत लेकर खड़ी हो गई तो किशोरी का कोमल कलेजा दहल गया और इसके आगे जो कुछ होने वाला था उसे देखने की ताब न लाकर वह दो सहेलियों को साथ ले कमरे के बाहर निकल बाग की रविशों पर टहलने लगी।
किशोरी चाहे बाहर चली गई, मगर कमरे के अन्दर से आती हुई चिल्लाने की आवाज बराबर उसके कानों में पड़ती रही। थोड़ी देर बाद ही कमला किशोरी के पास पहुँची जो अभी तक बाग में टहल रही थी।
किशोरी–कहो, उसने कुछ बताया या नहीं?
कमला—कुछ नहीं, खैर कहाँ जाती है, आज नहीं कल, कल नहीं परसों, आखिर बतावेगी ही। अब मुझे रुखसत करो क्योंकि बहुत-कुछ काम करना है!
किशोरी–अक्छा जा, मैं भी अब घर जाती हूँ, नहीं तो नानी इसी जगह पहुँचकर रंज होने लगेंगी। (कमला के गले मिलकर) देख अब मैं तेरे ही भरोसे पर जी रही हूँ!
कमला-जब तक दम में दम है तब तक तेरे काम से बाहर नहीं हूँ।
कमला वहाँ से रवाना हुई। उसके जाने के बाद किशोरी भी अपनी सखियों को साथ ले वहाँ से चली और थोड़ी ही दूर पर एक बड़ी हवेली के अन्दर जा पहुँची।
१२
अब हम आपको एक दूसरी सरजमीन पर ले चलकर एक-दूसरे ही रमणीक स्थान की सैर कराते हैं, इसके साथ-ही-साथ बड़े-बड़े ताज्जुब के खेल और अद्भुत बातों को दिखाकर अपने किस्से का सिलसिला दुरुस्त करना चाहते हैं। मगर यहाँ एक जरूरी बात लिख देने की इच्छा होती है जिसके जानने से आगे चलकर आपको कुछ ज्यादा आनन्द मिलेगा।
इस जगह बहुत-सी अद्भुत बातों को पढ़कर आप ऐसा न समझ लें कि यह तिलिस्म है और इसमें ऐसी बातें हुआ ही करती हैं, बल्कि उसे दुरुस्त और होने वाली समझकर खूब गौर करें क्योंकि अभी यह पहला ही हिस्सा है। इस सन्तति के चार हिस्सों में तो हम तिलिस्म का नाम भी न लेंगे, आगे चलकर देखा जायगा।
आप ध्यान कर लें कि एक अच्छे रमणीक स्थान में पहुँचकर सैर कर रहे हैं। यह जमीन जो लगभग हजार गज के चौड़ी और इतनी ही लम्बी होगी, चारों तरफ की चार खूबसूरत पहाड़ियों से घिरी हुई है। बीच की सब्जी और गुलबूटों की बहार देखने ही लायक है। इस कुदरती बगीचे में जंगली फूलों के पेड़ ज्यादे दिखाई देते हैं, उन्हीं में मिले-जुले गुलाबों के पेड़ भी बेशुमार हैं और कोई भी ऐसा नहीं कि जिनमें सुन्दर कलियाँ और फूल न दिखाई देते हों। बीच में बड़े-बड़े तीन झरने भी खूबसूरती से बह रहे हैं। बरसात का मौसम है, चारों तरफ से पहाड़ों पर से गिरा हुआ जल इन झरनों में जोश मार रहा है। पूरब तरफ पहाड़ी के नीचे पहुँचकर ये तीनों झरने एक हो गए हैं और अन्दाज से ज्यादे आया हुआ जल गड़हे में गिरकर न मालूम कहाँ निकल जाता है। यहाँ की आबहवा ऐसी उत्तम है कि अगर वर्षों का बीमार भी आवे तो दो दिन में तन्दुरुस्त है। जाय और यहाँ की सैर से कभी जी न घबराये।
बीचोंबीच में एक आलीशान इमारत बनी हुई है, मगर चाहे उसमें हर तरह की सफाई क्यों न हो फिर भी वह किसी पुराने जमाने की मालूम होती है। उसी इमारत के सामने एक छोटी-सी खूबसूरत बावली बनी हुई है जिसके चारों तरफ की जमीन कुछ ज्यादा खूबसूरत मालूम होती है और फूल-पत्ते भी मौके से लगाए हुए हैं।
यह इमारत सुनसान और उदास नहीं है, इसमें पन्द्रह-बीस नौजवान खूबसूरत औरतों का डेरा है। देखिए इस शाम के सुहावने समय में वे सब घर से निकलकर चारों तरफ मैदान में घूम-घूमकर जिन्दगी का मजा ले रही हैं। सभी खुश, सभी की मस्तानी चाल, सभी फूलों को तोड़-तोड़कर आपस में गेंदबाजी कर रही हैं। हमारे नौजवान नायक कुँअर इन्द्रजीतसिंह भी एक हसीन नाजनीन के हाथ में हाथ दिये बावली के पूरब की तरफ टहल रहे हैं, बात-बात में हँसी-दिल्लगी हो रही है, दीन-दुनिया की सुध भूले हुए हैं।
लीजिए वे दोनों थककर बावली के किनारे एक खूबसूरत संगमरमर की चट्टान पर बैठ गये और बातचीत होने लगी-
इन्द्रजीतसिंह-माधवी, मेरा शक किसी तरह नहीं जाता। क्या सचमुच तुम वही हो जो उस दिन गंगा-किनारे जंगल में झूला झूल रही थीं?
माधवी-आप रोज मुझसे यही सवाल करते हैं और मैं कसम खाकर इसका जवाब दे चुको हूँ, मगर अफसोस कि मेरी बात पर विश्वास नहीं करते।
इन्द्रजीतसिंह-(अँगूठी की तरफ देखकर) इस तस्वीर से तो कुछ फर्क मालूम होता है।
माधवी-यह दोष मुसीवर का है।
इन्द्रजीतसिंह-खैर जो हो, फिर भी तुमने मुझे अपने वश में कर रखा है।
माधवी-जी हाँ ठीक है, मुझसे मिलने का उद्योग तो आप ही ने किया था!
इन्द्रजीतसिंह-अगर मैं उद्योग न करता तो क्या तुम मुझे जबर्दस्ती ले आती?
माधवी-खैर, जाने दीजिए, मैं कबूल करती हूँ कि आपने मेरे ऊपर अहसान किया, बस!
इन्द्रजीतसिंह-(हँसकर) वेशक तुम्हारे ऊपर अहसान किया कि दिल और जान तुम्हारे हवाले किये।
माधवी—(शरमा कर और सिर नीचा करके) बस रहने दीजिये, ज्यादे सफाई न दीजिये!
इन्द्रजीतसिंह-अच्छा इन बातों छोड़ो और अपने वादे को याद करो! आज कौन दिन है? बस, आज तुम्हारा पूरा हाल सुने बिना न मानूंगा चाहे जो हो, मगर देखो, फिर उन भारी कसमों की याद दिलाता हूँ जो मैं कई दफे तुम्हें दे चुका, मुझसे झूठ कभी न बोलना, नहीं तो अफसोस करोगी।
माधवी-(कुछ देर तक सोचकर) अच्छा, आज भर मुझे और माफ कीजिए, आपसे बढ़कर मैं दुनिया में किसी को नहीं समझती और आप ही की शपथ खाकर कहती हूँ कि कल जो पूछेंगे सब ठीक-ठीक कह दूँगी, कुछ न छिपाऊँगी। (आसमान की तरफ देखकर) अब समय हो गया, मुझे दो घण्टे की फुरसत दीजिए।
इन्द्रजीतसिंह-(लम्बी साँस लेकर) खैर कल ही सही, जाओ मगर दो घण्टे से ज्यादा न लगाना।
माधवी उठी और मकान के अन्दर चली गयी। उसके जाने के बाद इन्द्रजीतसिंह अकेले रह गये और सोचने लगे कि यह माधवी कौन है? इसका कोई बड़ा बुजुर्ग भी है या नहीं! यह अपना हाल क्यों छिपाती है! सुबह-शाम दो-दो तीन-तीन घंटे के लिए कहाँ और किससे मिलने जाती है? इसमें तो कोई शक नहीं कि यह मुझसे मुहब्बत करती है मगर ताज्जुब है कि मुझे यहाँ क्यों कैद कर रखा है। चाहे यह सर-जमीन कैसी ही सुंदर और दिल लुभाने वाली क्यों न हो, फिर भी मेरी तबीयत यहाँ से उचाट हो रही है। क्या करें कोई तरकीब नहीं सूझती, बाहर का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। यह तो मुमकिन ही नहीं कि पहाड़ चढ़कर कोई पार हो जाय, और यह भी दिल नहीं कबूल करता कि इसे किसी तरह रंज करूँ, और अपना मतलब निकालूँ, क्योंकि मैं अपनी जान इस पर न्यौछावर कर चुका हूँ।
ऐसी-ऐसी बहुत-सी बातों को सोचते इनका जी बेचैन हो गया, घबड़ा कर उठ खड़े हुए और इधर-उधर टहलकर दिल बहलाने लगे। चश्मे का जल निहायत साफ था, बीच की छोटी-छोटी खुशरंग कंकरियाँ और तेजी के साथ दौड़ती हुई मछलियाँ साफ दिखाई पड़ती थीं, इसी की कैफियत देखते किनारे-किनारे जाकर दूर निकल गए और वहाँ पहुँचे जहाँ तीनों चश्मों का संगम हो गया था, और अन्दाज से ज्यादा आया हुआ जल पहाड़ी के नीचे एक गड़हे में गिर रहा था।
एक बारीक आवाज इनके कान में आयी। सिर उठाकर पहाड़ की तरफ देखने लगे। ऊपर पन्द्रह-बीस गज की दूरी पर एक औरत दिखाई पड़ी जिसे अब तक इन्होंने इस हाते के अन्दर कभी नहीं देखा था। उस औरत ने हाथ के इशारे से ठहरने के लिए कहा तथा ढोकों की आड़ में जहाँ तक बन पड़ा, अपने को छिपाती हुई नीचे उतर आई और आड़ देकर इन्द्रजीतसिंह के पास इस तरह खड़ी हो गयी जिसमें उन नौजवान छोकरियों में से कोई इसे देखने न पावे जो यहाँ की रहने वालियाँ चारों तरफ घूमकर चुहलबाजी में दिल बहला रही हैं और जिनका कुछ हाल हम ऊपर लिख आये हैं।
उस औरत ने एक लपेटा हुआ कागज इन्द्रजीतसिंह के हाथ में दिया। इन्होंने कुछ पूछना चाहा मगर उसने यह कहकर कुमार का मुंह बन्द कर दिया कि "बस जो कुछ है इसी चिट्ठी से आपको मालूम हो जायेगा, मैं जबानी कुछ कहना नहीं चाहती और न यहाँ ठहरने का मौका है, क्योंकि कोई देख लेगा, तो हम आप दोनों ऐसी आफत में फँस जायेंगे कि जिससे छुटकारा मुश्किल होगा। मैं उसी की लौंडी हूँ जिसने यह चिट्ठी आपके पास भेजी है!"
उसकी बात का इन्द्रजीतसिंह क्या जवाब देंगे, इसका इन्तजार न करके वह औरत पहाड़ी पर चढ़ गई और चालीस-पचास हाथ जा एक गड़हे में घुसकर न मालूम कहाँ लोप हो गई। इन्द्रजीतसिंह ताज्जुब में आकर खड़े आधी घड़ी तक उस तरफ देखते रहे, मगर फिर वह नजर न आई, लाचार इन्होंने कागज खोला और बड़े गौर से पढ़ने लगे, यह लिखा था-
"हाय, मैंने तस्वीर बनकर अपने को आपके हाथ में सौंपा, मगर आपने मेरी कुछ भी खबर न ली, बल्कि एक दूसरी ही औरत के फन्दे में फंस गये, जिसने मेरी सूरत बना आपको पूरा धोखा दिया। सच है, वह परीजमाल जब आपके बगल में बैठी है तो फिर मेरी सुध क्यों आने लगी!
"आपको मेरी ही कसम है, पढ़ने के बाद इस चिट्ठी के इतने टुकड़े कर डालिये कि एक अक्षर भी दुरुस्त न बचने पावे।
इस चिट्ठी के पढ़ते ही कुमार के कलेजे में एक धड़कन-सी पैदा हुई। घबड़ा कर एक चट्टान पर बैठ गये, और सोचने लगे-"मैंने पहले ही कहा था कि इस तस्वीर से उसकी सूरत नहीं मिलती। चाहे यह कितनी ही हसीन और खूबसूरत क्यों न हो, मगर मैंने तो अपने को उसी के हाथ बेच डाला है, जिसकी तस्वीर खुशकिस्मती से अब तक मेरे हाथ में मौजूद है। तब क्या करना चाहिए? यकायक इससे तकरार करना भी मुनासिब नहीं। अगर यह इसी जगह मुझे छोड़ कर चली जाये और अपनी सहेलियों को भी लेती जाये तो मैं क्या करूँगा? घबड़ाकर सिवाय प्राण दे देने के और क्या कर सकता हूँ, क्योंकि यहाँ से निकलने का रास्ता मालूम नहीं। यह भी नहीं हो सकता कि इन दोनों पहाड़ियों पर चढ़कर पार हो जाऊँ, क्योंकि सिवाय ऊँची सीधी चट्टानों के चढ़ने लायक रास्ता कहीं भी नहीं मालूम पड़ता। खैर जो हो, आज मैं जरूर उसके दिल में कुछ खुटका पैदा करूँगा। नहीं-नहीं आज भर और चुप रहना चाहिए, कल उसने अपना हाल कहने का वादा किया ही है आखिर कुछ-न-कुछ झूठ जरूर कहेगी, बस उसी समय टोकूँगा। एक बात और है। (कुछ रुक कर) अच्छा देखा जायेगा। यह औरत जो मुझे चिट्ठी दे गई है यहाँ किस तरह पहुँची? (पहाड़ी की तरफ देखकर) जितनी दूर ऊँचे उसे मैंने देखा था वहाँ तक तो चढ़ जाने का रास्ता मालूम होता है, शायद इतनी दूर तक लोगों की आमदरफ्त होती होगी। खैर ऊपर चलकर देखू तो सही कि बाहर निकल जाने के लिए कोई सुरंग तो नहीं है।"
इन्द्रजीतसिंह उस पहाड़ी पर वहाँ तक चढ़ गये जहाँ वह औरत नजर पड़ी थी। ढूँढ़ने से एक सुरंग ऐसी नजर आई, जिसमें आदमी बखूबी घुस सकता था। इन्हें विश्वास हो गया कि इसी राह से वह आई थी और बेशक हम भी इसी राह से बाहर हो जायेंगे। खुशी-खुशी उस सुरंग में घुसे। दस-बारह कदम अँधेरे में गए होंगे, कि पैर के नीचे जल मालूम पड़ा। ज्यों-ज्यों आगे जाते थे, जल ज्यादा जान पड़ता था, मगर यह भी हौसला किये बराबर चले ही गये। जब गले बराबर जल में जा पहुँचे और मालूम हुआ कि आगे उपर चट्टान जल के साथ मिली हुई है, तैर कर भी कोई नहीं जा सकता और रास्ता बिल्कुल नीचे की तरफ झुकता अर्थात ढलवां ही मिलता जाता है, तो लाचार होकर लौट आए मगर इन्हें विश्वास हो गया कि वह औरत जरूर इसी राह से आई थी, क्योंकि उसे गीले कपड़े पहने इन्होंने देखा भी था।
वे औरतें जो पहाड़ी के बीच वाले दिलचस्प मैदान में घूम रही थीं इन्द्रजीतसिंह को कहीं न देख घबरा गई और दौड़ती हुई उस हवेली के अन्दर पहुँची, जिसका जिक्र हम ऊपर कर आये हैं। तमाम मकान छान डाला, जब पता न लगा तो उन्हीं में से एक बोली, "बस अब सुरंग के पास चलना चाहिए, जरूर उसी जगह होंगे।" आखिर वे सब औरतें वहाँ पहुँची, जहाँ सुरंग के बाहर निकल कर गीले कपड़े पहने इन्द्रजीतसिंह खड़े कुछ सोच रहे थे।
इन्द्रजीतसिंह को सोच-विचार करते और सुरंग में आते-जाते दो घण्टे लग गये। रात हो गई थी, चन्द्रमा पहले ही से निकला हुए थे, जिसकी चांदनी ने दिलचस्प जमीन पर फैलकर अजीब समां जमा रखा था। दो घण्टे बीत जाने पर माधवी भी लौट आयी थी मगर उस मकान में या उसके चारों तरफ अपनी किसी लौंडी या सहेली को न देख घबरा गई और उस समय तो उसका कलेजा और भी दहलने लगा, जब उसने देखा कि अभी तक घर में चिराग तक नहीं जला। उसने भी इधर-उधर ढूंढ़ना नापसन्द किया, और सीधे उसी सुरंग के पास पहुँची। अपनी सब सखियों और लौंडियों को भी वहाँ पाया और यह भी देखा कि इन्द्रजीतसिंह गीले कपड़े पहने सुरंग के मुहाने से नीचे की तरफ आ रहे हैं।
क्रोध में भरी माधवी ने अपनी सखियों की तरफ देख कर धीरे से कहा, "लानत है तुम लोगों की गफलत पर। इसीलिए तुम हरामखोरिनों को मैंने यहाँ रखा था!" गुस्सा ज्यादा चढ़ आया था, और हो कांप रहे थे इससे कुछ और ज्यादा न कह सकी, फिर भी इन्द्रजीतसिंह के नीचे आने तक बड़ी कोशिश से माधवी ने अपने गुस्से को पचाया और बनावटी तौर पर हँसकर इन्द्रजीतसिंह से पूछा, "क्या आप उस नहर के अन्दर गये थे?"
इन्द्रजीतसिंह-हाँ।
माधवी-भला यह कौन-सी नादानी थी! न मालूम इसके अन्दर कितने कीड़े-मकोड़े और बिच्छू होंगे। हम लोगों को तो डर के मारे कभी यहाँ खड़े होने का भी हौसला नहीं पड़ता।
इन्द्रजीतसिंह-घूमते-फिरते चश्मे का तमाशा देखते यहाँ तक आ पहुँचे, जी में आया कि देखें यह गुफा कितनी दूर तक चली गई है। जब अन्दर गये तो पानी में भींग कर लौटना पड़ा।
माधवी-खैर चलिए, कपड़े बदलिए।
कुँअर इन्द्रजीतसिंह का खयाल और भी मजबूत हो गया। वह सोचने लगे कि इस सुरंग में जरूर कोई भेद है, तभी तो सब घबड़ाई हुई यहाँ आ जमा हुईं।
इन्द्रजीतसिंह आजतमाम रात सोच-विचार में पड़े रहे। इनके रंग-ढंग से माधवी का भी माथा ठनका और वह भी रात भर चारों तरफ खयाल दौड़ाती रही।
१३
दूसरे दिन खा-पीकर निश्चिन्त होने बाद दोपहर को जब दोनों एकान्त में बैठे, तो इन्द्रजीतसिंह ने माधवी से कहा-
"अब मुझसे सब नहीं हो सकता, आज तुम्हारा ठीक-ठीक हाल सुने बिना कभी न मानूँगा ओर इससे बढ़कर निश्चिन्ती का समय भी दूसरा न मिलेगा।"
माधवी-जी हाँ, आज मैं जरूर अपना हाल कहूँगी।
इन्द्रजीतसिंह-तो बस कह चलो, अब देर काहे की है? पहले यह बताओ कि तुम्हारे मां-बाप कहाँ हैं और यह सरजमीन किस इलाके में हैं जिसके अन्दर मैं बेहोश करके लाया गया?
माधवी-यह इलाका गयाजी का है, यहाँ के राजा की मैं लड़की हूँ, इस समय मैं खुद मालिक हूँ, माँ-बाप को मरे पाँच वर्ष हो गये।
इन्द्रजीतसिंह-ओफ-ओह, तो मैं गयाजी के इलाके में आ पहुँचा! (कुछ सोचकर) तो तुम मेरे लिए चुनार गई थीं?
माधवी-जी हाँ, मैं चुनार गई थी और यह अँगूठी, जो आपके हाथ में है, सौदागर की मार्फत मैंने ही आपके पास भेजी थी।
इन्द्रजीतसिंह-हाँ ठीक है। तो मालूम पड़ता है, किशोरी भी तुम्हारा ही नाम है?
किशोरी के नाम ने माधवी को चौंका दिया और घबराहट में डाल दिया। मालूम हुआ जैसे उसकी छाती में किसी ने बड़े जोर से मुक्का मारा हो। फौरन उसका खयाल उस सुरंग पर गया जिसके अन्दर से गीले कपड़े पहने हुए इन्द्रजीतसिंह निकले थे। वह सोचने लगी, "इनका उस सुरंग के अन्दर जाना बेसबब नहीं था, या तो कोई मेरा दुश्मन आ पहुँचा या फिर मेरी सखियों में से किसी ने भंडा फोड़ा।" उसी वक्त से इन्द्रजीतसिंह का खौफ भी उसके कलेजे में बैठ गया और वह इतना घबराई कि किसी तरह अपने को सम्हाल न सकी, बहाना करके उनके पास से उठ खड़ी हुई और बाहर दालान में जाकर टहलने लगी।
इन्द्रजीतसिंह भी चेहरे के चढ़ाव-उतार से उसके चित्त का भाव समझ गये, और बहाना करके बाहर जाते समय उसे रोकना मुनासिब न समझ कर चुप रहे।
आधे घण्टे तक माधवी उस दालान में टहलती रही, जब उसका जी कुछ ठिकाने हुआ तब उसने टहलना बन्द किया और एक दूसरे कमरे में चली गई जिसमें उसकी दो सखियों का डेरा था जिन्हें वह जान से ज्यादा मानती थी और जिनका बहुत कुछ भरोसा भी रखती थी। ये दोनों सखियाँ भी जिनका नाम ललिता और तिलोत्तमा था उसे बहुत चाहती थीं और ऐयारी विद्या को भी अच्छी तरह जानती थीं।
माधवी को कुसमय आते देख उसकी दोनों सखियाँ जो इस वक्त पलंग पर लेटी हुई कुछ बातें कर नही थीं, घबराकर उठ बैठी और तिलोत्तमा ने आगे बढ़ कर पूछा, "बहिन, क्या है जो इस वक्त यहाँ आई हो? तुम्हारे चेहरे पर तरवुद की निशानी पाई जाती है!"
माधवी-क्या कहूँ बहिन, इस समय वह बात हुई जिसकी कभी उम्मीद न थी!
ललिता-सो क्या, कुछ कहो तो!
माधवी-चलो बैठो, कहती हूँ, इसीलिए तो आई हूँ।
बैठने के बाद कुछ देर तक तो माधवी चुप रही, इसके बाद इन्द्रजीतसिंह से जो कुछ बातचीत हुई थी कहकर बोली, "इसमें कोई शक नही कि किशोरी का कोई दूत यहाँ आ पहुँचा और उसी ने यह सब भेद खोला है। मैं तो उसी समय खटकी थी जब उनको गीले कपड़े पहने सुरंग के मुंह पर देखा था। बड़ी ही मुश्किल हुई, मैं इनको यहाँ से बाहर अपने महल में भी नहीं ले जा सकती, क्योंकि वह चाण्डाल सुनेगा तो पूरी दुर्गत कर डालेगा, और मैं उस पर किसी तरह का दबाव भी नहीं डाल सकती, क्योंकि राज्य का काम बिल्कुल उसी के हाथ में है, जब चाहे चौपट कर डाले! जब राज्य ही नष्ट हुआ तो फिर यह सुख कहाँ? अभी तक तो इन्द्रजीतसिंह का हाल उसे बिल्कुल नहीं मालूम है मगर अब क्या होगा सो नहीं कह सकती!"
माधवी घण्टे भर तक अपनी चालाक सखियों से राय मिलाती रही, आखिर जो कुछ करना था उसे निश्चय कर वहाँ से उठी और उस कमरे में पहुँची जिसमें इन्द्रजीतसिंह को छोड़ आई थी।
जब तक माधवी अपनी सखियों के साथ बैठी बातचीत करती रही, तब तक हमारे इन्द्रजीत सिंह भी अपने ध्यान में डूबे रहे। अब माधवी के साथ उन्हें कैसा बर्ताव करना चाहिए और किस चालाकी से अपना पल्ला छुड़ाना चाहिए सो सब उन्होंने सोच लिया और उसी ढंग पर चलने लगे।
जब माधवी इन्द्रजीत के पास आई तो उन्होंने पूछा, "क्यों, एकदम घबड़ा कर कहाँ चली गई थीं?"
माधवी-न मालूम क्यों जी मिचला गया था, इसीलिए दौड़ी चली गई। कुछ गरमी भी मालूम होने लगी, जाकर एक के की, तब होश ठिकाने हुए।
इन्द्रजीतसिंह-अब तबीयत कैसी है?
माधवी-अब तो अच्छी है।
इसके बाद इन्द्रजीतसिंह ने कुछ छेड़-छाड़ न की और हंसी-खुशी में दिन बिता दिया, क्योंकि जो कुछ करना था वह तो दिल में था। जाहिर में तकरार कर माधवी के दिल में शक पैदा करना मुनासिब न समझा।
माधवी का तो मामूल ही था कि वह शाम को चिराग जले बाद इन्द्रजीतसिंह पूछ कर दो घण्टे के लिए न मालूम किस राह से कहीं जाया करती थी। आज भी अपने वक्त पर उसने जाने का इरादा किया और इन्द्रजीतसिंह से छुट्टी माँगी।
इन्द्रजीतसिंह—न मालूम क्यों तुमसे कुछ ऐसी मोहब्बत हो गई है कि एक पल को भी आँखों के सामने से दूर जाने देने को जी नहीं चाहता। मुझे उम्मीद है कि तुम मेरी बात मान लोगी और कहीं जाने का इरादा न करोगी माधवी (खुश होकर) शुक्र है कि आपको मेरा इतना ध्यान है। अगर ऐसी मर्जी है तो मैं बहुत जल्द लौट आऊँगी!
इन्द्रजीतसिंह—आज तो नहीं जाने देंगे। अहा, देखो कैसी घटा उठी आ रही है, वाह, इस समय भी तुम्हारे जी में कुछ रस नहीं पैदा होता!
इस समय इन्द्रजीतसिंह ने दो-एक बातें जिस ढंग से माधवी से की इसके पहले नहीं की थी इसलिए उसके जी की कली खिली जाती थी, मगर वह ऐसे फेर में पड़ी हुई थी कि जी ही जानता होगा, न तो इन्द्रजीतसिंह को नाखुश करना चाहती थी और न अपने मामूली काम में ही बाधा डालने की ताकत रखती थी। आखिर कुछ सोच-विचार कर इस समय इन्द्रजीतसिंह का हुक्म मानना ही उसने मुनासिब समझा और हँसी-खुशी में दिल बहलाया। आज चारपाई पर लेटे हुए इन्द्रजीतसिंह के पास रह कर उनको अपने जाल में फंसाने के लिए उसने क्या-क्या काम किए, इसे हम अपनी सीधी-सादी लेखनी से लिखना पसन्द नहीं करते, हमारे मनचले पाठक बिना समझे भी न रहेंगे। माधवी को इस बात का बिल्कुल खयाल न था कि शादी होने पर ही किसी से हँसना-बोलना मुनासिब है। वह जी का आ जाना ही शादी समझती थी। चाहे वह अभी तक कुँआरी ही क्यों न हो मगर मेरा जी नहीं चाहता कि मैं उसे कुँआरी लिखूँ, क्योंकि उसकी चाल-चलन ठीक न थी। यह सभी कोई जानते हैं कि खराब चाल-चलन रहने का नतीजा बहुत बुरा होता है मगर माधवी के दिल में इसका गुमान भी न था।
इन्द्रजीतसिंह के रोकने से माधवी अपने मामूली तौर पर जहाँ वह रोज जाती थी आज न गई मगर इस सबब से आज उसका जी बेचैन था। आधी रात के बाद जब इन्द्रजीतसिंह गहरी नींद में सो रहे थे, वह अपनी चारपाई से उठी और जहाँ रोज जाती थी चली गई, हाँ आने में उसे आज बहुत देर लगी। इसी बीच में इन्द्रजीतसिंह की आँख खुली और माधवी का पलंग खाली देखकर उन्हें निश्चय हो गया कि आज भी वह अपने मामूली ठिकाने पर जरूर गई।
वह कौन ऐसी जगह है जहाँ बिना गये माधवी का जी नहीं मानता और ऐसा करने से वह एक दिन भी अपने को क्यों नहीं रोक सकती? इसी सोच-विचार में इन्द्रजीतसिंह को फिर नींद न आई और वह बराबर जागते ही रह गये। जब माधवी आई तब वह जाग रहे थे, मगर इस तरह खुर्राटे लेने लगे कि माधवी को उनके जागते रहने का जरा भी गुमान न हुआ।
इसी सोच-विचार और दाँव-घात में कई दिन और बीत गये और इन्द्रजीतसिंह ने उसका शाम का जाना बिल्कुल रोक दिया। वह अब भी आधी रात को बराबर जाया करती और सुबह होने के पहले ही लौट आती।
एक दिन रात को इन्द्रजीतसिंह खूब होशियार रहे और किसी तरह अपनी आँखों में नींद को न आने दिया, एक बारीक कपड़े से मुंह ढंके चारपाई पर लेटे धीरे-धीरे खर्राटे लेते रहे।
आधी रात के बाद माधवी अपने पलंग पर से उठी और धीरे-धीरे इन्द्रजीतसिंह के पास आकर कुछ देर तक देखती रही। जब उसे निश्चय हो गया कि वह सो रहे हैं तब उसने अपने आँचल के साथ बँधी ताली से एक आलमारी खोली और उसमें से एक लम्बी चाभी निकाल फिर इन्द्रजीत के पास आई तथा कुछ देर तक खड़ी रह कर वह सो रहे हैं इस बात का निश्चय कर लिया। इसके बाद उसने वह शमादान गुलकर दिया जो एक तरफ खूबसूरत चौकी के ऊपर जल रहा था।
माधवी की यह सब कार्रवाई इन्द्रजीतसिंह देख रहे थे। जब उसने शमादान गुल किया और कमरे के बाहर जाने लगी वह अपनी चारपाई से उठ खड़े हुए और दबे कदम तथा अपने को हर तरह से छिपाये हुए उसके पीछे रवाना हुए।
सोने वाले कमरे से बाहर निकल माधवी एक दूसरी कोठरी के पास पहुँची और उसी चाभी से जो उसने आलमारी में से निकाली थी उस कोठरी का ताला खोला, मगर अन्दर जाकर फिर बन्द कर लिया। कुँअर इन्द्रजीतसिंह इससे ज्यादा कुछ न देख सके और अफसोस करते हुए उसी कमरे की तरफ लौटे जिसमें उनका पलंग था।
अभी कमरे के दरवाजे तक पहुँचे भी न थे कि पीछे से किसी ने उनके मोढ़े पर हाथ रक्खा। वे चौंके और पीछे फिर कर देखने लगे। एक औरत नजर पड़ी मगर उसे किसी तरह पहचान न सके। उस औरत ने हाथ के इशारे से उन्हें मैदान की तरफ चलने के लिए कहा और इन्द्रजीतसिंह भी बेखटके उसके पीछे मैदान में दूर तक चले गये। वह औरत एक जगह खड़ी हो गई और बोली, "क्या तुम मुझे पहचान सकते हो?" इसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने कहा, "नहीं, तुम्हारी सी काली औरत तो आज तक मैंने देखी ही नहीं!"
समय अच्छा था, आसमान पर बादल के टुकड़े इधर-उधर घूम रहे थे, चन्द्रमा निकला हुआ था जो कभी-कभी बादलों में छिप जाता और थोड़ी ही देर में फिर साफ दिखाई देता था। वह औरत बहुत ही काली थी और उसके कपड़े भी गीले थे। इन्द्रजीतसिंह उसे पहचान न सके, तब उसने अपना बाजू खोला और एक जख्म का दाग उन्हें दिखा कर फिर पूछा, "क्या अब भी तुम मुझे नहीं पहचान सकते?"
इन्द्रजीतसिंह-(खुश होकर) क्या मैं तुम्हें चाची कहकर पुकार सकता हूँ?
औरत–हाँ, बेशक पुकार सकते हो।
इन्द्रजीतसिंह-अब मेरी जान बची, अब मैं समझा कि यहाँ से निकल सकूँगा।
औरत—अब तो तुम यहाँ से बखूबी निकल जा सकते हो क्योंकि जिस राह से माधवी जाती है वह तुमने देख ही लिया है और अब उस जगह को भी बखूबी जान गये होगे जहाँ वह ताली रखती है, मगर खाली निकल भागने में मजा नहीं है। मैं चाहती हूँ कि इसके साथ ही कुछ फायदा भी हो। आखिर मेरा यहाँ आना ही किस काम का होगा और उस मेहनत का नतीजा भी क्या निकलेगा जो तुम्हारा पता लगाने के लिए हम लोगों ने की है? सिवाय इसके तुम यह भी क्यों कर जान सकते हो कि माधवी कहाँ जाती है या क्या करती है?
इन्द्रजीतसिंह-हाँ बेशक, इस तरह तो सिवाय निकल भागने के और कोई फायदा नहीं हो सकता, फिर जो हुक्म करो, मैं तैयार हूँ।
औरत-जब माधवी उस राह से बाहर जाय, तो उसके पीछे हो जाने से उसका सब हाल मालूम होगा और हमारा काम भी निकलेगा।
इन्द्रजीतसिंह-मगर यह कैसे हो सकेगा? वह तो कोठरी के अन्दर जाते ही ताला बन्द कर लेती है।
औरत–हाँ सो ठीक है, मगर तुमने देखा होगा कि उस दरवाजे के बीचोंबीच में ताला जड़ा है जिसे खोल कर वह अन्दर गई और फिर उसी ताले को भीतर से बन्द कर लिया।
इन्द्रजीतसिंह-मैंने अच्छी तरह खयाल नहीं किया।
औरत-मैं बखूबी देख चुकी हूँ, उस ताले में बाहर-भीतर दोनों तरफ से ताली लगती है।
इन्द्रजीतसिंह-खैर, इससे मतलब?
औरत-मतलब यह है कि अगर इसी तरह की एक ताली हमारे पास भी हो, तो उसके पीछे जाने का अच्छा मौका मिले।
इन्द्रजीतसिंह-अगर ऐसा हो तो क्या बात!
औरत-यह कोई बड़ी बात नहीं है, जहाँ पर वह ताली रखती है वह जगह तो तुम्हें मालूम ही होगी?
इन्द्रजीतसिंह-हाँ, मालूम है।
औरत-बस तो मुझे वह जगह बता दो और तुम आराम करो। मैं कल आकर उस ताली का साँचा ले जाऊँगी और परसों उसी तरह की दूसरी ताली बना लाऊँगी।
जहाँ ताली रहती थी उस जगह का पता पूछ कर वह काली औरत चली गई और इन्द्रजीतसिंह अपने पलंग पर जा कर सो रहे।
१४
इन्द्रजीतसिंह ने दूसरे दिन पुनः मामूली समय पर माधवी को जाने नहीं दिया, आधी रात तक हँसी-दिल्लगी ही में काटी। इसके बाद दोनों अपने-अपने पलंग पर सो रहे। कुमार को तो खुटका लगा ही हुआ था कि आज वह काली औरत आवेगी इसलिए उन्हें नींद न आई, बारीक चादर से मुंह ढाँके पड़े रहे, मगर माधवो थोड़ी ही देर में सो गई।
वह काली औरत भी अपने मौके पर आ पहुँची। पहले तो उसने दरवाजे पर खड़े होकर झाँका, जब सन्नाटा मालूम हुआ तो अन्दर चली आई और दरवाजा धीरे-से बन्द कर लिया। इन्द्रजीतसिंह उठ बैठे। उसने अपने मुँह पर उँगली रख चुप रहने का इशारा किया और माधवी के पास पहुँच कर उसे देखा। मालूम हुआ कि वह अच्छी तरह सो रही है।
काली औरत ने अपने बटुए में से बेहोशी की बुकनी निकाली और धीरे से माधवी को सुँघा दिया। थोड़ी देर तक खड़ी रहने के बाद माधवी की नब्ज देखी, जब विश्वास हो गया कि वह बेहोश हो गई तब उसके आँचल ले ताली खोल ली और आलमारी में से सुरंग (जिस राह से माधवी आती-जाती थी) की ताली निकाल मोम पर उसका साँचा लिया और फिर उसी तरह ताली अलमारी में रख ताला बन्द कर अलमारी की ताली पुनः माधवी के आँचल में बाँध इन्द्रजीतसिंह के पास आकर बोली, "मैं साँचा ले चुकी, अब जाती हूँ, कल दूसरी ताली बना कर लाऊँगी, तुम माधवी को रात भर इसी तरह बेहोश पड़ी रहने दो। आज वह अपने ठिकाने न जा सको, इसीलिए सवेरे देखना कैसा घबराती है।"
सवेरे को कुछ दिन चढ़े माधवी की आँख खुली, घबरा कर उठ बैठी। उसने अपने दिल का भाव बहुत-कुछ छिपाया मगर उसके चेहरे पर बदहवासी बनी रही जिससे इन्द्रजीतसिंह समझ गए कि रात इसकी आँख न खुली और मामूली जगह पर न जा सकी इसका इसे बहुत रंज है। दूसरे दिन आधी रात बीतने पर इन्द्रजीतसिंह को सोता समझ माधवी अपने पलंग पर से उठी, शमादान बुझा कर आलमारी में से ताली निकाली और कमरे के बाहर हो उसी कोठरी के पास पहुँची, ताला खोल अन्दर गई और भीतर से फिर ताला बन्द कर लिया। इन्द्रजीतसिंह भी छिपे हुए माधवी के साथ ही साथ कमरे के बाहर निकले थे, जब वह कोठरी के अन्दर चली गई तो यह इधर-उधर देखने लगे, उस काली औरत को भी पास ही मौजूद पाया।
माधवी के जाने के आधी घड़ी बाद काली औरत ने उसी नई ताली से कोठरी का दरवाजा खोला जो बमूजिव साँचे के आज वह बना कर लाई थी। इन्द्रजीतसिंह को साथ ले अन्दर जाकर फिर वह ताला बन्द कर दिया। भीतर बिल्कुल अँधेरा था इसलिए काली औरत को अपने बटुए से सामान निकाल मोमबत्ती जलानी पड़ी, जिससे मालूम हुआ कि इस छोटी-सी कोठरी में केवल बीस-पचीस सीढ़ियाँ नीचे उतरने के लिए बनी हैं, अगर बिना रोशनी किए ये दोनों आगे बढ़ते तो बेशक नीचे गिर कर अपने सिर मुँह या पैर से हाथ धोते।
दोनों नीचे उतरे, वहाँ एक बन्द दरवाजा और मिला, वह भी उसी ताली से खुल गया। अब एक बहुत लम्बी सुरंग में दूर तक जाने की नौबत पहुँची। गौर करने से साफ मालूम होता था कि यह सुरंग पहाड़ी के नीचे-नीचे तैयार की गई है, क्योंकि चारों तरफ सिवाय पत्थर के ईंट, चूना या लकड़ी दिखाई नहीं पड़ती थी। यह सुरंग अन्दाज में दो सौ गज लम्बी होगी। इसे तै करने के बाद फिर बन्द दरवाजा मिला। उसे खोलने पर यहाँ भी ऊपर चढ़ने के लिए वैसी ही सीढ़ियाँ मिली जैसी शुरू में पहली कोठरी खोलने पर मिली थीं। काली औरत समझ गई कि अब यह मुरंग खतम हो गई और इम कोठरी का दरवाजा खुलने से हम लोग जरूर किसी मकान या कमरे में पहुँचेंगे इसलिए उसने कोठरी को अच्छी तरह देख-भालकर मोमबत्ती गुल कर दी।
हम ऊपर लिख आये हैं और फिर याद दिलाते हैं कि सुरंग में जितने दरवाजे हैं सभी में इसी किस्म के ताले लगे हैं जिनमें बाहर-भीतर दोनों तरफ से चाबी लगती है, इस हिसाब से ताला लगाने का मूराख इस पार से उस पार तक ठहरा, अगर दरवाजे के उस तरफ अँधेरा न हो तो उस सूराख में आंख लगा कर उधर की चीज बखूबी देखने आ सकती है।
जब काली औरत मोमबत्ती गुल कर चुकी तो उसी ताली के सूराख से आती हुई एक बारीक रोशनी कोठरी के अन्दर मालूम पड़ी। उस ऐयारा ने सूराख में आँख लगा के देखा, एक बहुत बड़ा आलीशान कमरा बड़े तकल्लुफ से सजा हुआ नजर पड़ा, उसी कमरे में बेशकीमत मसहरी पर एक अधेड़ आदमी के पास बैठी कुछ बातचीत और हँसी-दिल्लगी करती हुई माधवी भी दिखाई पड़ी। अब विश्वास हो गया कि इसी से मिलने के लिए माधवी रोज आया करती है। इस मर्द में किसी तरह की खूबसूरती न थी तिस पर भी माधवी न मालूम इसकी किस खूबी पर जी-जान से मर रही थी और यहाँ आने में अगर इन्द्रजीतसिंह विघ्न डालते थे तो क्यों इतना परेशान हो जाती थी।
उस काली औरत ने इन्द्रजीतसिंह को भी उधर का हाल देखने के लिए कहा। कुमार बहुत देर तक देखते रहे। उन दोनों में क्या बातचीत हो रही थी, सो तो मालूम न हुआ मगर उनके हाव-भाव में मुहब्बत की निशानी पाई जाती थी। थोड़ी देर के बाद दोनों पलंग पर सो रहे। उसी समय कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने चाहा कि ताला खोल कर उस कमरे में पहुंचे और दोनों नालायकों को कुछ सजा दें, मगर काली औरत ने ऐसा करने से उन्हें रोका और कहा, "खबरदार, ऐसा इरादा भी न करना, नहीं तो हमारा बना-बनाया खेल बिगड़ जायेगा और बड़े-बड़े हौसलों के पहाड़ मिट्टी में मिल जायेंगे, बस, इस समय वापस चलने के और कुछ मुनासिब नहीं है।
काली औरत ने जो कुछ कहा, लाचार इन्द्रजीतसिंह को मानना और वहाँ से लौटना ही पड़ा। उसी तरह ताला खोलते और बन्द करते, बराबर चले आये और उस कमरे के दरवाजे पर पहुँचे, जिसमें इन्द्रजीतसिंह सोया करते थे। कमरे के अन्दर न जाकर काली औरत इन्द्रजीतसिंह को मैदान में ले गई और नहर के किनारे पर स्थित पत्थर की चट्टान पर बैठने के बाद दोनों में यों बातचीत होने लगी-
इन्द्रजीतसिंह-तुमने उस कमरे में जाने से व्यर्थ ही मुझे रोक दिया।
औरत-ऐसा करने के क्या फायदा होता? यह कोई गरीब कंगाल का घर नहीं है। बल्कि ऐसे की अमलदारी है, जिसके यहाँ हजारों बहादुर और एक-से-एक लड़ाके मौजूद हैं, क्या बिना गिरफ्तार हुए तुम निकल जाते? कभी नहीं। तुम्हारा यह सोचना भी ठीक नहीं है कि जिस राह से मैं आती-जाती हूँ उसी राह से तुम भी इस सरजमीन के बाहर हो जाओगे क्योंकि वह राह सिर्फ हम लोगों के आने-जाने लायक है, तुम उससे किसी तरह नहीं जा सकते फिर जान-बूझ। कर अपने को आफत में फँसाना कौन बुद्धिमानी थी!
इन्द्रजीतसिंह-क्या जिस राह से तुम आती-जाती हो, उससे मैं नहीं जा सकता?
औरत-कभी नहीं, इसका खयाल भी न करना।
इन्द्रजीतसिंह-सो क्यों?
औरत-इसका सबब भी जल्दी ही मालूम हो जायेगा।
इन्द्रजीतसिंह-खैर, तो अब क्या करना चाहिए?
औरत-अब तुम्हें सब्र करके दस-पन्द्रह दिन और यहीं रहना मुनासिब है।
इन्द्रजीतसिंह-अब मैं किस तरह उस बदकारा के साथ रह सकूँगा?
औरत-जिस तरह भी हो सके।
इन्द्रजीतसिंह-खैर, फिर इसके बाद क्या होगा?
औरत-इसके बाद यह होगा कि तुम सहज ही में सिर्फ इस खोह के बाहर ही न हो जाओगे, बल्कि एकदम से यहाँ का राज्य ही तुम्हारे कब्जे में आ जायेगा।
इन्द्रजीतसिंह-क्या वह कोई राजा था, जिसके पास माधवी बैठी थी?
औरत-नहीं, यह राज्य माधवी का है और वह इसका दीवान था।
इन्द्रजीतसिंह-माधवी तो अपने राज्य को कुछ भी नहीं देखती!
औरत-अगर वह इस लायक होती तो दीवान की खुशामद क्यों करती!
इन्द्रजीतसिंह–इस हिसाब से तो दीवान ही को राजा कहना चाहिए।
औरत-बेशक!
इन्द्रजीतसिंह-खैर, अब तुम क्या करोगी?
औरत-इसके बताने की अभी कोई जरूरत नहीं, दस-बारह दिन बाद मैं तुमसे मिलूंगी और जो कुछ इतने दिनों में कर सकूँगी, उसका हाल कहूँगी। बस, अब मैं जाती हूँ। अपने दिल को जिस तरह हो सके, सम्हालो और माधवी पर किसी तरह यह मत जाहिर होने दो कि उसका भेद तुम पर खुल गया या तुम उससे कुछ रंज हो, इसके बाद देखना कि इतना बड़ा राज्य कैसे सहज ही में हाथ लगता है जिसका मिलना हजारों सिर कटने पर भी मुश्किल है।
इन्द्रजीतसिंह-खैर, यह तमाशा भी जरूर ही देखने लायक होगा।
औरत-अगर बन पड़ा तो इस वायदे के बीच मैं एक-दो दफे आकर तुम्हारी सुध ले जाऊँगी।
इन्द्रजीतसिंह-जहाँ तक हो सके, जरूर आना।
इसके बाद वह काली औरत चली गई और इन्द्रजीतसिंह अपने कमरे में आकर सो रहे।
पाठक समझते होंगे कि इस काली औरत या इन्द्रजीतसिंह ने जो कुछ किया या कहा-सुना, किसीको मालूम नहीं हुआ, मगर नहीं, वह भेद उसी वक्त खुल गया और काली औरत के काम में बाधा डालने वाला भी तभी पैदा हो गया। बल्कि, उसने उसी वक्त से छिपे-छिपे अपनी कार्रवाई भी शुरू कर दी, जिसका हाल माधवी तक को मालूम न हो सका।
१५
जब इस जगह थोड़ा-सा हाल इस राज्य का और साथ ही इसके माधवी का भी लिख देना जरूरी है।
किशोरी की माँ अर्थात् शिवदत्त की रानी दो बहिनें थीं। एक जिसका नाम कलावती था शिवदत्त के साथ ब्याही थी, और दूसरी मायावती गया के राजा चन्द्रदत्त से ब्याही थी। इसी मायावती की लड़की यह माधवी थी जिसका हाल हम ऊपर लिख आये हैं।
माधवी को दो वर्ष की छोड़ कर उसकी माँ मर गई थी, मगर माधवी का बाप चन्द्रदत्त होशियार होने पर माधवी को गद्दी देकर मरा था। अब आप समझ गये होंगे कि माधवी और किशोरी दोनों आपस में मौसेरी बहिनें थीं।
माधवी का बाप चन्द्रदत्त बहुत ही शौकीन और ऐयाश आदमी था। अपनी रानी को जान से ज्यादा मानता था। खास राजधानी गयाजी छोड़ कर प्रायः राजगृह में रहा करता था जो गया से दो मंजिल पर एक बड़ा भारी मशहूर तीर्थ है। यह दिलचस्प और खुशनुमा पहाड़ी उसे कुछ ऐसी भायी कि साल में दस महीने इसी जगह रहा करता था। एक आलीशान मकान भी बनवा लिया। यह खुशनुमा और दिलचस्प जमीन, जिसमें कुमार इन्द्रजीतसिंह बेबस पड़े हैं कुदरती तौर पर पहले ही की बनी हुई थी मगर इसमें आने-जाने का रास्ता और यह मकान चन्द्रदत्त ही ने बनवाया था।
माधवी के माँ-बाप दोनों ही शौकीन थे। माधवी को अच्छी शिक्षा देने का उन लोगों को जरा भी ध्यान न था। वह दिन-रात लाड़-प्यार ही में पला करती थी और एक खूबसूरत और चंचल दाई की गोद में रह कर अच्छी बातों के बदले हाव-भाव ही सीखने में खुश रहती थी। इसी सबब से इसका मिजाज लड़कपन ही से खराब हो गया था। बच्चों की तालीम पर यदि उनके माँ-बाप ध्यान न दे सकें तो मुनासिब है कि उन्हें किसी ज्यादा उम्र वाली और नेकचलन दाई की गोद में दे दें, मगर माधवी के माँ-बाप को इसका कुछ भी खयाल न था और आखिर इसका नतीजा बहुत ही बुरा निकला।
माधवी के समय में इस राज्य में तीन आदमी मुखिया थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि इस राज्य का आन्तद ये तीन ले रहे थे और तीनों दोस्त एक-दिल हो रहे थे। इनमें से एक तो दीवान अग्निदत्त था, दूसरा कुबेरसिंह सेनापति और तीसरा धर्मसिंह जो शहर की कोतवाली करता था।
अब हम अपने किस्से की तरफ झुकते हैं और उस तालाब पर पहुँचते हैं जिसमें एक नौजवान औरत को पकड़ने के लिए योगिनी और वनचरी कूदी थीं। आज इस तालाब पर हम अपने कई ऐयारों को देखते हैं जो आपस में बातचीत और सलाह करके कोई भारी आफत मचाने की तरकीब जमा रहे हैं।
पण्डित बद्रीनाथ, भैरोंसिंह और तारासिंह तालाब के ऊपर पत्थर के चबूतरे पर बैठे यों बातचीत कर रहे हैं-
भैरोंसिंह-कुमार को यहाँ से निकाल ले जाना तो कोई बड़ी बात नहीं है।
तारा-मगर उन्हें भी तो कुछ सजा देनी चाहिए जिनकी बदौलत कुमार इतने दिनों से तकलीफ उठा रहे हैं।
भैरोंसिंह-जरूर, बिना सजा दिए जी कब मानेगा।
बद्रीनाथ–जहाँ तक हम समझते हैं, कल वाली राय बहुत अच्छी है।
भैरोसिंह-उससे बढ़ कर कोई राय नहीं हो सकती। ये लोग भी क्या कहेंगे कि किसी से काम पड़ा था।
बद्रीनाथ—यहाँ तो बस ललिता और तिलोत्तमा ही शैतानी की जड़ हैं। सुनते हैं उनकी ऐयारी भी बहुत बढ़ी-चढ़ी है।
तारा-पहले उन्हीं दोनों की खबर ली जायेगी।
भैरोसिंह-नहीं-नहीं, इसकी कोई जरूरत नहीं। उन्हें गिरफ्तार किये बिना ही हमारा काम चल जायेगा, व्यर्थ कई दिन बर्बाद करने का मौका नहीं है।
तारा–हाँ, यह ठीक है। हमें उन की इतनी जरूरत भी नहीं है और क्या ठिकाना जब तक हम लोग अपना काम करें तब तक वे चाची के फंदे में आ फँसें।
भैरोंसिंह-बेशक ऐसा ही होगा, क्योंकि उन्होंने कहा भी था कि तुम लोग इस काम को करो, तब तक बन पड़ेगा तो मैं ललिता और तिलोत्तमा को भी फँसा लूँगी।
बद्रीनाथ-खैर, जो होगा, देखा जायेगा। अब हम लोग अपने काम में क्यों देर कर रहे हैं?
भैरोंसिंह-देर की जरूरत क्या है उठिए, हाँ, पहले अपना-अपना शिकार बाँट लीजिए।
बद्रीनाथ-दीवान साहब को मेरे लिए छोड़िए।
भैरोंसिंह-हाँ, आपका-उनका वजन बराबर है। अच्छा, मैं सेनापति की खबर लूँगा।
तारा-तो वह चाण्डाल कोतवाल मेरे बाँटे पड़ा! खैर, यही सही।
भैरोंसिंह-अच्छा, अब यहाँ से चलो। ये तीनों ऐयार वहाँ से उठे ही थे कि दाहिनी तरफ से छींक की आवाज आई।
बद्रीनाथ-धत्तेरे की, क्या तेरे छींकने का कोई दूसरा समय न था?
तारा-क्या आप छींक से डर गए?
बद्रीनाज—मैं छींक से नहीं डरा, मगर छींकने वाले से जी खटकता है।
भैरोंसिंह-हमारे काम में विघ्न पड़ता दिखाई देता है।
बद्रीनाथ-इस दुष्ट को पकड़ना चाहिए, बेशक यह चुपके-चुपके हमारी बाते सुनता रहा।
तारा-छींक नहीं, बदमाशी है!
बद्रीनाथ ने इधर-उधर बहुत ढूँढ़ा, मगर छींकने वाले का पता न लगा। लाचार तरद्दुद ही में तीनों वहाँ से रवाना हुए।