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परीक्षा गुरु अध्याय 8 / 42

विषय-सूची

  1. 1 निवेदन
  2. 2 प्रकरण १: सौदागर की दुकान
  3. 3 प्रकरण २: अकाल में अधिकमास
  4. 4 प्रकरण ३: संगति का फल
  5. 5 प्रकरण ४: मित्रमिलाप
  6. 6 प्रकरण ५: विषयासक्त
  7. 7 प्रकरण ६: भले बुरे की पहचान
  8. 8 प्रकरण ७: सावधानी (होशियारी)
  9. 9 प्रकरण ८: सबमें हाँ (!)
  10. 10 प्रकरण ९: सभासद
  11. 11 प्रकरण १०: प्रबंध (इन्तजाम)
  12. 12 प्रकरण ११: सज्जनता
  13. 13 प्रकरण १२: सुख दुःख
  14. 14 प्रकरण १३: बिगाड़ का मूल, विवाद
  15. 15 प्रकरण १४: पत्रव्यवहार
  16. 16 प्रकरण १५: प्रिय अथवा पिय्?
  17. 17 प्रकरण १६: सुरा (शराब)
  18. 18 प्रकरण १७: स्वतन्त्रता और स्वेच्छाचार
  19. 19 प्रकरण १८: क्षमा
  20. 20 प्रकरण १९: स्वतन्त्रता
  21. 21 प्रकरण २०: कृतज्ञता
  22. 22 प्रकरण २१: पतिब्रता
  23. 23 प्रकरण २२: संशय
  24. 24 प्रकरण २३: प्रामाणिकता
  25. 25 प्रकरण २४: हाथसै पैदा करनेवाले और पोतड़ों के अमीर
  26. 26 प्रकरण २५: साहसी पुरुष
  27. 27 प्रकरण २६: दिवाला
  28. 28 प्रकरण २७: लोक चर्चा (अफ़वाह)
  29. 29 प्रकरण २८: फूटका काला मुँह
  30. 30 प्रकरण २९: बातचीत
  31. 31 प्रकरण ३०: नैराश्य (नाउम्मेदी)
  32. 32 प्रकरण ३१: चालाक की चूक
  33. 33 प्रकरण ३२: अदालत
  34. 34 प्रकरण ३३: मित्रपरीक्षा
  35. 35 प्रकरण ३४: हीनप्रभा (बदरोबी)
  36. 36 प्रकरण ३५: स्तुति निन्दाका भेद
  37. 37 प्रकरण ३६: धोखेकी टट्टी
  38. 38 प्रकरण ३७: बिपत्तमैं धैर्य
  39. 39 प्रकरण ३८: सच्ची प्रीति
  40. 40 प्रकरण ३९: प्रेत भय
  41. 41 प्रकरण ४०: सुधरने की रीति
  42. 42 प्रकरण ४१: सुखकी परमावधि

परीक्षा गुरु

प्रकरण ७: सावधानी (होशियारी)

सब भूतनको तत्व लख कर्म योग पहिचान॥

मनुजनके यत्नहिं लखहिं सो पंडित गुणवान॥

“यहां तो आप अपने कहने पर खुद ही पक्के न रहें, आप ने केलीप्स और डिओन का दृष्टांत देकर यह बात साबित की थी कि किसी की जहिरी बातों से उसकी परीक्षा नहीं हो सकती परन्तु अंत में आप ने उसी के कामों से उसको पहचानने की राय बतलाई” बाबू बैजनाथ ने कहा.

न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाण मिति में मति:॥

अन्तेष्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते॥

तत्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञ: सर्वकर्मणाम्॥

“मैंनें केलीप्स के दृष्टांत में पिछले कामों से पहली बातों का भेद खोल कर उसका निज स्वभाव बता दिया था इसी तरह समय पाकर हर आदमी के कामों से मन की वृत्तियों पर निगाह कर के उसकी भलाई बुराई पहचानने की राह बतलाई तो इससे पहली बातों से क्या विरोध हुआ?” लाला ब्रजकिशोर पूछने लगे.

"अच्छा! जब आप के निकट मनुष्य की परीक्षा बहुत दिनों में उसके कामों से हो सकती है तो पहले कैसा बरताव रखें? क्या उसकी परीक्षा न हो जब तक उसको अपने पास न आने दें?” लाला मदनमोहन ने पूछा.

“नहीं, केवल संदेह से किसी को बुरा समझना, अथवा किसी का अपमान करना सर्वथा अनुचित है परंतु किसी की झूठी बातों में आकर ठगा जाना भी मूर्खता से खाली नहीं.” लाला ब्रजकिशोर कहने लगे महाभारत में कहा है "मन न भरे पतियाहु जिन पतियायेहु अति नाहि॥ भेदी सों भय होत ही जर उखरे छिन माहिं।" इसका कारण जब तक मनुष्य की परीक्षा न हो साधारण बातों में उसके जाहिरी बरताव पर दृष्टि रखनी चाहिये. परंतु जोखों के काम में उसे सावधान रहना चाहिये उसका दोष प्रगट होने पर उसको छोड़ने में संकोच न हो इस लिये अपना भेदी बना कर, उसका अहसान उठाकर, अथवा किसी तरह की लिखावट और जुबान से उसके बसवर्ती होकर अपनी स्वतंत्रता न खोवे यद्यपि किसी-किसी के विचार में

"न विश्वसैदविश्वस्ते विश्वस्ते नाति विश्वसेत्॥

विश्वासाद् भयमुत्पन्न सूलान्यपि निकृन्तति॥"

छल, बल की प्रतिज्ञाओं का निबाहना आवश्यक नहीं है परंतु प्रतिज्ञा भंग करने की अपेक्षा पहले विचार कर प्रतिज्ञा करना हर भांत अच्छा है”

“ऐसी सावधानी तो केवल आप लोगों ही से हो सकती है जो दिन रात इन्हीं बातों के चारा विचार में लगे हैं” लाला मदनमोहन ने हंसकर कहा.

स्पति को फ़ायदा पहुँचाता है इसी तरह अच्छे आदमी दुष्कर्म से बचते हैं परंतु सावधानी का योग मिले बिना हीरा की तरह कीमती नहीं हो सकते।"

"मुझे तो यह बातें मन:कल्पित मालूम होती हैं क्योंकि संसार के बरताव से इसकी कुछ बिध नहीं मिती संसार में धनवान् कुपढ, दृरिद्री, पंडित, पापी सुखी,धर्मात्मा दुखी असावधान अधिकारी सावधान आज्ञाकारी भी देखने में आते हैं” मास्टर शिंभूदयाल ने कहा.

से किसी कायम मुकाम(प्रतिनिधि) वगैरह की सहायता पाकर उसके ठीक-ठीक काम चलने का बानक बन जाता है जिसे वह नियम निभे जाते हैं परंतु ईश्वर के नियम मनुष्य से किसी तरह नहीं टूट सकते.”

“मनुष्य क्या मैं तो जानता हूं ईश्वर से भी नहीं टूट सकते” बाबू बैजनाथ ने कहा.

की सूधी राह से निकल आने पर अपने आप निरर्थक हो जाती है और संसार के सब कामों का संबन्ध परस्पर ऐसा मिला रहता है कि एक की उन्नति, अवनति का असर दूसरों पर तत्काल हो जाता है इस कारण एक सावधानी बिना मन की वृत्तियों के ठीक होने पर भी जमाने के पीछे रह जाने से कभी-कभी अपने आप अवनति हो जाती है और इन्हीं कारणों से कहीं-कहीं प्रकृति के विपरीत भाव दिखाई देता है।"

"इससे तो यह बात निकली की हिन्दुस्तान इस समय कोई सावधान नहीं है” मुन्शी चुन्नीलाल ने कहा.

“नहीं यह बात हरगिज नहीं है, परंतु सावधानी का फल प्रसंग के अनुसार अलग-अलग होता है" लाला ब्रजकिशोर कहने लगे “तुम अच्छी तरह विचार कर देखोगे तो मालूम हो जायगा कि हरेक समाज का मुखिया कोई निरा विद्वान् अथवा धनवान नहीं होता, बल्कि बहुधा सावधान मनुष्य होता है और जो खुशी बड़े-बड़े राजाओं को अपने बराबर वालों में प्रतिष्ठा लाभ से होती है वह एक ग़रीब से ग़रीब लकडहारे को भी अपने बराबर वालों में इज्जत मिलने से होती है और उन्नति का प्रसंग हो तो वह धीरे-धीरे उन्नति भी करता जाता है परंतु इन दोनों की उन्नति का फल बराबर नहीं होता क्योंकि दोनों को उन्नति करने के साधन एक-से नहीं मिलते. मनुष्य जिन कामों में सदैव लगा रहता है अथवा जिन बातों का बार-बार अनुभव करता है बहुधा उन्हीं कामों में उसकी बुद्धि दौड़ती है और किसी सावधान मनुष्य की बुद्धि किसी अनूठे कामों में दौडी भी तो उसे काम में लाने के लिये बहुत कर के मौका नहीं मिलता. देश की उन्नति-अवनति का आधार वहां के निवासियों की प्रकृति पर है. सब देशों मैं सावधान और असावधान मनुष्य रहते हैं परन्तु जिस देश के बहुत मनुष्य सावधान और उद्योगी होते हैं उस्की उन्नति होती जाती है और जिस देश मैं असावधान और कमकस विशेष होते हैं उस्की अवनति होती जाती है. हिन्दुस्थान मैं इस समय और देशों की अपेक्षा सच्चे सावधान बहुत कम हैं और जो हैं वे द्रव्य की असंगति सै, अथवा द्रव्यवानों की अज्ञानता सै, अथवा उपयोगी पदार्थों की अप्राप्तिसै, अथवा नई,नई युक्तियों के अनुभव करने की कठिनाईयों से, निरर्थक से हो रहे हैं और उन्की सावधानता बनके फूलोंकी तरह कुछ उपयोग किये बिना बृथा नष्ट हो जाती है परंतु हिन्दुस्थान मैं इस समय कोई सावधान न हो यह बात हरगिज़ नहीं है"

"मेरे जान तो आजकल हिन्दुस्थान मैं बराबर उन्नति होती जाती है. जगह, जगह पढ़ने लिखने की चर्चा सुनाई देती है, और लोग अपना हक़ पहचान्ने लगे हैं" बाबू बैजनाथनें कहा.

हूँ कि जिन मनुष्यों की जो वृत्तियां प्रबल होती हैं वह उनको खींच-खांचकर उसी तरफ ले जाती हैं सो देख लीजिये कि हिन्दुस्तान में इतने दिन से देशोन्नति की चर्चा हो रही है परन्तु अबतक कुछ उन्नति नहीं हुई और फ्रांस वालों को जर्मनी वालों से हारे अभी पूरे दस वर्ष नहीं हुए जिसमें फ्रान्स वालों ने सच्ची सावधानी के कारण ऐसी उन्नति कर ली कि वे आज सब सुधरी हुई बिलायतों में आगे दिखाई देते हैं.”

“अच्छा! आपके निकट सावधानी की पहचान क्या है? लाला मदनमोहन ने पूछा.

वर्तमान प्रकाश पर न भूलना परिणाम पर दृष्टि करना सावधानी का साधारण काम है और इसी से सावधानता पहचानी जाती है.”

“आपने अपनी सावधानता जताने के लिये इतना परिश्रम करके सावधानी का वर्णन किया इस लिये मैं आपका बहुत उपकार मानता हूं” लाला मदनमोहन ने हंस कर कहा.

“वाजबी बात कहने पर मुझको आप से ये तो उम्मीद ही थी.” लाला ब्रजकिशोर ने जवाब दिया, और लाला मदनमोहन से रुखसत होकर अपने मकान को रवाना हुए.

"सुनिये” लाला ब्रजकिशोर कहने लगे जिस तरह पांच- सात गोलियां बराबर-बराबर चुन दी जाये और उनमें से सिरे की एक गोली को हाथ से धक्का दे दिया जाय तो हाथ का बल, पृथ्वी की आकर्षणशक्ति, हवा आदि सब कार्य कारणों के ठीक-ठीक जानने से आपस में टकरा कर अन्त की गोली कितनी दूर लुढ़केगी इसका अन्दाज हो सकता है इसी तरह मनुष्यों की प्रकृति और पदार्थों की जुदी-जुदी शक्ति का परस्पर संबन्ध विचार कर दूर और पास की हरेक बात का ठीक परिणाम समझ लेना पूरी सावधानी है परन्तु इन बातों को जानने के लिये अभी बहुत से साधनों की कसर है और किसी समय यह सब साधन पाकर एक मनुष्य बहुत दूर-दूर की बातों का ठीक परिणाम निकाल सकें यह बात असंभव मालूम होती है तथापि अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो मनुष्य इस राह पर चले वह अपने समाज में साधारण रीति से सावधान समझा जाता है. एक मोमबत्ती एक तरफ से जलती हो और दूसरी दोनों तरफ जलती हो तो उसके