←

परीक्षा गुरु अध्याय 16 / 42

विषय-सूची

  1. 1 निवेदन
  2. 2 प्रकरण १: सौदागर की दुकान
  3. 3 प्रकरण २: अकाल में अधिकमास
  4. 4 प्रकरण ३: संगति का फल
  5. 5 प्रकरण ४: मित्रमिलाप
  6. 6 प्रकरण ५: विषयासक्त
  7. 7 प्रकरण ६: भले बुरे की पहचान
  8. 8 प्रकरण ७: सावधानी (होशियारी)
  9. 9 प्रकरण ८: सबमें हाँ (!)
  10. 10 प्रकरण ९: सभासद
  11. 11 प्रकरण १०: प्रबंध (इन्तजाम)
  12. 12 प्रकरण ११: सज्जनता
  13. 13 प्रकरण १२: सुख दुःख
  14. 14 प्रकरण १३: बिगाड़ का मूल, विवाद
  15. 15 प्रकरण १४: पत्रव्यवहार
  16. 16 प्रकरण १५: प्रिय अथवा पिय्?
  17. 17 प्रकरण १६: सुरा (शराब)
  18. 18 प्रकरण १७: स्वतन्त्रता और स्वेच्छाचार
  19. 19 प्रकरण १८: क्षमा
  20. 20 प्रकरण १९: स्वतन्त्रता
  21. 21 प्रकरण २०: कृतज्ञता
  22. 22 प्रकरण २१: पतिब्रता
  23. 23 प्रकरण २२: संशय
  24. 24 प्रकरण २३: प्रामाणिकता
  25. 25 प्रकरण २४: हाथसै पैदा करनेवाले और पोतड़ों के अमीर
  26. 26 प्रकरण २५: साहसी पुरुष
  27. 27 प्रकरण २६: दिवाला
  28. 28 प्रकरण २७: लोक चर्चा (अफ़वाह)
  29. 29 प्रकरण २८: फूटका काला मुँह
  30. 30 प्रकरण २९: बातचीत
  31. 31 प्रकरण ३०: नैराश्य (नाउम्मेदी)
  32. 32 प्रकरण ३१: चालाक की चूक
  33. 33 प्रकरण ३२: अदालत
  34. 34 प्रकरण ३३: मित्रपरीक्षा
  35. 35 प्रकरण ३४: हीनप्रभा (बदरोबी)
  36. 36 प्रकरण ३५: स्तुति निन्दाका भेद
  37. 37 प्रकरण ३६: धोखेकी टट्टी
  38. 38 प्रकरण ३७: बिपत्तमैं धैर्य
  39. 39 प्रकरण ३८: सच्ची प्रीति
  40. 40 प्रकरण ३९: प्रेत भय
  41. 41 प्रकरण ४०: सुधरने की रीति
  42. 42 प्रकरण ४१: सुखकी परमावधि

परीक्षा गुरु

प्रकरण १५: प्रिय अथवा पिय्?

दमयन्ति बिलपतहुती बनमें अहि भय पाइ

अहिबध बधिक अधिक भयो ताहूते दुखदाइ.

करनी चाहिये जिससे कुछ लाभ हो” मुन्शी चुन्नीलाल ने कहा.

"आप हुक्म दें तो मैं कुछ अर्ज़ करूँ?" बिहारी बाबू बहुत दिन से अवसर देख रहे थे वह धीरे से पूछने लगे.

"अच्छा कहो” मुन्शी चुन्नीलाल ने मदनमोहन के कहने से पहले ही कह दिया.

"भोजला पहाड़ी पर एक बड़े धनवान जागीरदार रहते हैं. उनको ताश खेलने का बड़ा व्यसन है. वह सदा बाज़ी बद कर खेलते हैं और मुझको इस खेल के पत्ते ऐसी राह से लगाने आते हैं कि जब खेलें तब अपनी ही जीत हो. मैंने उनको कितनी ही बार हरा दिया इसलिये अब वह मुझको नहीं पतियाते परंतु आप चाहें तो मैं वह खेल आप को सिखा दूं फिर आप उनसे निधड़क खेलें, आप हार जायेंगे तो वह रकम मैं दूँगा और जीतें तो उसमें से मुझको आधी ही दें” बिहारी बाबू ने जुए का नाम छिपाकर मदनमोहन को आसामी बनाने के वास्ते कहा.

"जीतेंगे तो चौथाई देंगे परंतु हारने के लिये रकम पहले जमा करा दो” मुन्शी चुन्नीलाल लाला मदनमोहन की तरफ़ से मामला करने लगे.

“हारने के लिये पहले पाँच सौ की थैली अपने पास रख लीजिये परंतु जीत में आधा हिस्सा लूंगा” बिहारी बाबू हुज्जत करने लगे.

"नही, जो चुन्नीलाल ने कह दिया वह हो चुक, उससे अधिक हम कुछ न देंगे” लाला मदनमोहन ने कहा.

हुए परंतु सौभाग्यवश उस समय बाबू बैजनाथ आ गए इसलिए सब काम जहां का तहां अटक गया.

“बिहारी बाबू के किस बात का मामला हो रहा है?” बाबू बैजनाथ ने पहुँचते ही पूछा.

“कुछ नहीं, यह तो ताश के खेल का ज़िक्र था” मुन्शी चुन्नीलाल ने साधारण रीति से कहा.

बिहारी बाबू कहते हैं कि “मैं पत्ते लगाने सिखा दूँ जिस तरह पत्ते लगाकर आप एक धनवान जागीरदार से ताश खेलें और बाज़ी बद लें. जो हारेंगे तो सब नुक्सान मैं दूंगा, और जीतेंगे तो उसमें से चौथाई ही मैं लूंगा” लाला मदनमोहन ने भोले भाव से सच्चा वृत्तान्त कह दिया.

नाम से तार आप के पास आ गया और आपने रुपये उसको दे दिये, परंतु वह तार उन्हीं के किसी साथी ने आप के आढ़तिये के नाम से आपको दे दिया था इसलिये यह भेद खुला उस समय शाहज़ादे का पता न लगा! एक बार एक मामला कराने वाला एक मामला आप के पास लाया था जब उसने कहा था कि “सरकार में रसद के लिये लकड़ियों की ख़रीद है और तहसीलमे में ढाई मन का भाव है. मैं सरकारी हुक्म आप को दिखा दूंगा आप चार मन के भाव में मेरी मारफत एक जंगलवाले की लकड़ी लेनी कर लें" यह कहकर उसने तहसील से निर्खनामे की दस्तख़ती नक़ल लाकर आपको दिखा दी पर उस भाव में सरकार की कुछ ख़रीददारी न थी! इनके सिवाय जिस तरह बहुत से रसायनी तरह-तरह का धोखा देकर सीधे आदमियों को ठगते फिरते हैं इसी तरह यह भी जुआरी बनानें की एक चाल है, जिस काम में वे लागत और बेमेंहनत बहुत से फायदा दिखाई दे उसमें बहुधा कुछ न कुछ धोकेबाज़ी होती है ऐसे मामले वाले ऊपर से सब्जबाग दिखाकर भीतर कुछ न कुछ चोरी जरूर रखते हैं”

के समय मनुष्य की नीयत ठिकानें नहीं रहती परंतु जुए के लेन-देन बाबत अदालत की डिग्री का डर नहीं है तो भी जुआरी अपना सब माल अस्बाब बेचकर लेनदारों की कौड़ी-कौड़ी चुका देता है. उसके पास रुपया हो तो वह उसे लुटाने में हाथ नहीं रोकता और अपने काम में ऐसा निमग्न हो जाता है कि उसे खाने-पीने तक की याद नहीं रहती, उसके पास फूटी कौड़ी न रहे तो भी वह भूखों नहीं मरता. फडपर जाते ही जीते जुआरी दो-चार गंडे देकर उसका काम अच्छी तरह चला देते हैं.”

"राम! राम! दिवाली पर क्या? समझदार तो स्वप्न में भी जुए के पास नहीं जाते. जुए से व्यापार का क्या संबंध? उसकी कुछ सूरत मिलती है तो बदनी से मिलती है पर उसको जुए से अलग कौन समझता है? उसको प्रतिष्ठित साहूकार कब करते हैं? सरकार में उसकी धुनाई कहां होती है? निरी बातों का जमा ख़र्च व्यापार में सर्वथा नहीं गिना जाता, व्यापार के तत्व ही जुदे हैं, भविष्यत काल की अवस्था पर दृष्टि पहुंचाना, परता लाना, माल का ख़रीदना, बेचना या दिसावर को बीजक भेजकर माल मंगाना और माल भेजकर बदला भुगताना व्यापार है परंतु जुए में यह बातें कहां? जुआ तो सब अधर्मों की जड़ है. मनु और विदुर जी एक स्वर से कहते हैं "सुनो पुरातन बात, जुआ कलह को मूल है॥ हांसीहूं मैं तात, तासों नहीं खेलैं चतुर॥” बाबू बैजनाथ ने कहा.

"आप वृथा तेज़ होते हैं मैं खुद जुए का तरफदार नहीं हूं.

द्यूतमेत्तपुराकल्पे दृष्टं बैरकरम् महत॥

तस्मात् द्यूतन्नसेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान्।

परंतु विवाद के समय अच्छी-अच्छी युक्तियों से अपना पक्ष प्रबल करना चाहिये. क्रोध करके गाली देने से जय नहीं होती. आपकी दृष्टि में मैं झूठा हूं परंतु मेरी सदुक्तियों को आप झूठा नहीं ठहरा सकते. मुझपर पर किसी तरह का दोषारोपण किया जाय तो उसको युक्तिपूर्वक साबित करना चाहिये और, और बातों में मेरी भूल निकालने से क्या वह दोष साबित हो जायगा?”

"जुए का नुक्सान साबित करने के लिये विशेष परिश्रम नहीं करना पडे़गा. देखो नल और युधिष्ठिरादि की बर्बादी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है” बाबू बैजनाथ बोले.

“मैं आप से कुछ अर्ज नहीं कर सकता परंतु-" “बसजी! रहने दो बाबू साहब कुछ तुम से बहस करने के लिये इस समय यहां नहीं आए" यह कहकर लाला मदनमोहन बाबू बैजनाथ को अलग ले गए और हरकिशोर की तकरार का सब वृतान्त थोडे़ में उन्हें सुना दिया.

“मैं पहले हरकिशोर को अच्छा आदमी समझता था परंतु कुछ दिन से उसकी चाल बिल्कुल बिगड़ गई. उसको आपकी प्रतिष्ठा का बिल्कुल विचार नहीं रहा और आज तो उसने ऐसी ढिठाई की कि उसको अवश्य दंड होना चाहिये था सो अच्छा हुआ कि वह अपने आप यहां सें चला गया. उसके चले जाने से उसके सब हक़ जाते रहे. अब कुछ दिन धक्के खाने से उसकी अकल अपने आप ठिकानें आ जायेगी."

“क्या होगा? उसके पास सबूत क्या है? उसका गवाह कौन है? वह नालिश करेगा तो हम कानूनी पाइन्ट से उसको पलट देंगे परंतु हम जानते हैं कि यहां तक नौबत न पहुंचेगी अच्छा! उस्के पास आप की कोई सनद है?"

“कोई नहीं!"

“तो फिर आप क्यों डरते हैं? वह आप का क्या कर सकता है?"

"सच है उसको रुपये की गर्ज होगी तो वह नाक रगड़ता आप चला आयेगा. हम उसके नीचे नहीं दबे वही कुछ हमारे नीचे दब रहा है।"

"आप इस विषय में बिल्कुल निश्चिन्त रहें"

“मुझको थोड़ा सा खटका लाला ब्रजकिशोर की तरफ़ का है यह हर बात में मेरा गला घोंटते हैं और मुझको तोते की तरह पिंजरे में बंद रखना चाहते हैं।"

"वकीलों की चाल ऐसी ही होती है वह प्रथम धरती आकाश के कुल्लाबे मिलाकर अपनी योग्यता जताते हैं फिर दूसरे को तरह-तरह का डर दिखाकर अपने अधीन बनाते हैं और अंत में आप उसके घरबार के मालिक बन बैठते हैं परन्तु चाहे जैसा फ़ायदा हो मैं तो ऐसी परतन्त्रता से रहने को अच्छा नहीं समझता."

"मेरा भी यही विचार है मैं ज्यों-ज्यों दबता हूं वह ज्यादा दबाते जाते हैं इसलिये अब मैं नहीं दबा चाहता."

आपके घर के टुकडे़ खा-खा कर बड़े हुए थे वह दिन भूल गए?"

लाला मदनमोहन ने बाबू बैजनाथ की नेक सलाहों का बहुत उपकार माना और वह लाला मदनमोहन से रुखसत होकर अपने घर गए.

"आपको दबने की क्या ज़रूरत है? जबतक आप इनको मुँहतोड़ जवाब न देंगे यह सीधे न होंगे. लाला ब्रजकिशोर