परीक्षा गुरु
लाला श्रीनिवासदास
हिन्दी का पहला आधुनिक उपन्यास
- मुफ़्त
- मुफ़्त
- सिर्फ़ पढ़ने के लिए
- अध्याय
- 42
- अध्याय
- मिनट
- ~355
- मिनट
- पहली बार छपी
- 1882
- हिंदी
इस किताब के बारे में
दिल्ली के एक रईस लाला मदनमोहन की कहानी, जिसे चापलूस दोस्त लूटते हैं और एक सच्चा मित्र ब्रजकिशोर बचाने की कोशिश करता है। 1882 में छपा यह उपन्यास हिन्दी का पहला आधुनिक उपन्यास माना जाता है। पूरे 41 प्रकरण।
लेखक: लाला श्रीनिवासदास (1851–1887)
विषय-सूची
- 1 निवेदन
- 2 प्रकरण १: सौदागर की दुकान
- 3 प्रकरण २: अकाल में अधिकमास
- 4 प्रकरण ३: संगति का फल
- 5 प्रकरण ४: मित्रमिलाप
- 6 प्रकरण ५: विषयासक्त
- 7 प्रकरण ६: भले बुरे की पहचान
- 8 प्रकरण ७: सावधानी (होशियारी)
- 9 प्रकरण ८: सबमें हाँ (!)
- 10 प्रकरण ९: सभासद
- 11 प्रकरण १०: प्रबंध (इन्तजाम)
- 12 प्रकरण ११: सज्जनता
- 13 प्रकरण १२: सुख दुःख
- 14 प्रकरण १३: बिगाड़ का मूल, विवाद
- 15 प्रकरण १४: पत्रव्यवहार
- 16 प्रकरण १५: प्रिय अथवा पिय्?
- 17 प्रकरण १६: सुरा (शराब)
- 18 प्रकरण १७: स्वतन्त्रता और स्वेच्छाचार
- 19 प्रकरण १८: क्षमा
- 20 प्रकरण १९: स्वतन्त्रता
- 21 प्रकरण २०: कृतज्ञता
- 22 प्रकरण २१: पतिब्रता
- 23 प्रकरण २२: संशय
- 24 प्रकरण २३: प्रामाणिकता
- 25 प्रकरण २४: हाथसै पैदा करनेवाले और पोतड़ों के अमीर
- 26 प्रकरण २५: साहसी पुरुष
- 27 प्रकरण २६: दिवाला
- 28 प्रकरण २७: लोक चर्चा (अफ़वाह)
- 29 प्रकरण २८: फूटका काला मुँह
- 30 प्रकरण २९: बातचीत
- 31 प्रकरण ३०: नैराश्य (नाउम्मेदी)
- 32 प्रकरण ३१: चालाक की चूक
- 33 प्रकरण ३२: अदालत
- 34 प्रकरण ३३: मित्रपरीक्षा
- 35 प्रकरण ३४: हीनप्रभा (बदरोबी)
- 36 प्रकरण ३५: स्तुति निन्दाका भेद
- 37 प्रकरण ३६: धोखेकी टट्टी
- 38 प्रकरण ३७: बिपत्तमैं धैर्य
- 39 प्रकरण ३८: सच्ची प्रीति
- 40 प्रकरण ३९: प्रेत भय
- 41 प्रकरण ४०: सुधरने की रीति
- 42 प्रकरण ४१: सुखकी परमावधि
यह किताब मुफ़्त क्यों है
- लेखक का निधन 1887 में हुआ (36 वर्ष की उम्र में); भारत में लेखक की मृत्यु के 60 साल बाद (1948 से) कॉपीराइट ख़त्म।
- First published in 1882; the author died in 1887, so the book was certainly published before 1931 and is public domain in the United States. The scanned edition is a later reprint of the same text; only the author’s own text is used here.
- स्रोत: हिन्दी विकिस्रोत (Hindi Wikisource) — द्वितीय बार, कलकत्ता पुस्तक भण्डार / मारवाड़ी ट्रेडर्स एसोसियेशन, कलकत्ता का स्कैन
- लेखक की भाषा और वर्तनी 1882 की है, जैसी छपी थी वैसी ही रखी गई है (जैसे “भाषामैं”, “इस्सै”)। सभी 41 प्रकरण और लेखक का “निवेदन” शामिल हैं। संपादकों की जीवनी और पन्नों के नीचे के संस्कृत उद्धरणों वाली टिप्पणियाँ शामिल नहीं की गईं।