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परीक्षा गुरु अध्याय 12 / 42

विषय-सूची

  1. 1 निवेदन
  2. 2 प्रकरण १: सौदागर की दुकान
  3. 3 प्रकरण २: अकाल में अधिकमास
  4. 4 प्रकरण ३: संगति का फल
  5. 5 प्रकरण ४: मित्रमिलाप
  6. 6 प्रकरण ५: विषयासक्त
  7. 7 प्रकरण ६: भले बुरे की पहचान
  8. 8 प्रकरण ७: सावधानी (होशियारी)
  9. 9 प्रकरण ८: सबमें हाँ (!)
  10. 10 प्रकरण ९: सभासद
  11. 11 प्रकरण १०: प्रबंध (इन्तजाम)
  12. 12 प्रकरण ११: सज्जनता
  13. 13 प्रकरण १२: सुख दुःख
  14. 14 प्रकरण १३: बिगाड़ का मूल, विवाद
  15. 15 प्रकरण १४: पत्रव्यवहार
  16. 16 प्रकरण १५: प्रिय अथवा पिय्?
  17. 17 प्रकरण १६: सुरा (शराब)
  18. 18 प्रकरण १७: स्वतन्त्रता और स्वेच्छाचार
  19. 19 प्रकरण १८: क्षमा
  20. 20 प्रकरण १९: स्वतन्त्रता
  21. 21 प्रकरण २०: कृतज्ञता
  22. 22 प्रकरण २१: पतिब्रता
  23. 23 प्रकरण २२: संशय
  24. 24 प्रकरण २३: प्रामाणिकता
  25. 25 प्रकरण २४: हाथसै पैदा करनेवाले और पोतड़ों के अमीर
  26. 26 प्रकरण २५: साहसी पुरुष
  27. 27 प्रकरण २६: दिवाला
  28. 28 प्रकरण २७: लोक चर्चा (अफ़वाह)
  29. 29 प्रकरण २८: फूटका काला मुँह
  30. 30 प्रकरण २९: बातचीत
  31. 31 प्रकरण ३०: नैराश्य (नाउम्मेदी)
  32. 32 प्रकरण ३१: चालाक की चूक
  33. 33 प्रकरण ३२: अदालत
  34. 34 प्रकरण ३३: मित्रपरीक्षा
  35. 35 प्रकरण ३४: हीनप्रभा (बदरोबी)
  36. 36 प्रकरण ३५: स्तुति निन्दाका भेद
  37. 37 प्रकरण ३६: धोखेकी टट्टी
  38. 38 प्रकरण ३७: बिपत्तमैं धैर्य
  39. 39 प्रकरण ३८: सच्ची प्रीति
  40. 40 प्रकरण ३९: प्रेत भय
  41. 41 प्रकरण ४०: सुधरने की रीति
  42. 42 प्रकरण ४१: सुखकी परमावधि

परीक्षा गुरु

प्रकरण ११: सज्जनता

सज्जनता न मिलै किये जतन करो किन कोय

ज्यों कर फार निहारिये लोचन बड़ो न होय

नया आदमी शामिल हो जाय तो कुछ दिल के अभ्यास से अच्छी तरह वाकिफ हो सकता है, चार बराबर वालों से बात चीत करने में अपने विचार स्वत: सुधर जाते हैं और आज कल के सुधरे विचार जानने का सीधा रास्ता तो इससे बढ़ कर और कोई नहीं है” मुंशी चुन्नीलाल ने कहा.

"जिस तरह समुद्र में नौका चलाने वाले केवट समुद्र की गहराई नहीं जान सकते इसी तरह संसार में साधारण रीति से मिलने भेंटने वाले इधर उधर की निरर्थक बातों से कुछ फायदा नहीं उठा सकते. बाहर की सज धज और ज़ाहिर की बनावट से सच्ची सज्जनता का कुछ संबंध नहीं है वह तो दरिद्री-धनवान और पूर्व विद्वान का भेद-भाव छोड़ कर सदा मन की निर्मलता के साथ रहती है और जिस जगह रहती है उसको सदा प्रकाशित रखती है" लाला ब्रजकिशोर ने कहा.

"तो क्या लोगों के साथ आदर सत्कार से मिलना जुलना और उनका यथोचित शिष्टाचार करना सज्जनता नहीं है?" लाला मदनमोहन ने पूछा.

बहुत से राजकुमारों को बड़ी जोखों के काम उठाने पड़ेंगे और तुम्हारी कर्तव्यता पर हज़ारों लाखों मनुष्यों के सुख-दुःख का बल्कि जीने मरने का आधार रहेगा. तुम बड़े कुलीन हो और बड़े विभववान हो. फ्रेंच भाषा में एक कहावत है कि जो अपने सत्कुल का अभिमान रखता हो उसको उचित है कि अपने सत्कर्मों से अपना वचन प्रमाणिक कर दे. तुम जानते हो कि अंग्रेज लोग बड़े-बड़े खिताबों के बदले सज्जन (Gentleman) जैसे साधारण शब्दों को अधिक प्रिय समझते हैं इस शब्द का साधारण अर्थ ये है कि मर्यादाशील, नम्र और सुधरे विचार का मनुष्य हो, निस्सन्देह ये गुण यहांँ के बहुत से अमीरों में हैं परंतु इसके अर्थपर अच्छी तरह दृष्टि की जाय तो इसका आशय बहुत गंभीर मालूम देता है. जिस मनुष्य की मर्यादा, नम्रता और सुधरे विचार केवल लोगों को दिखाने के लिये न हों बल्कि मन से हो अथवा जो सच्चा प्रतिष्ठित, सच्चा वीर और पक्षपात रहित न्यायपरायण हो, जो अपने शरीर को सुख देने के लिये नहीं बल्कि धर्म में औरों के हक़ में अपना कर्त्तव्य सम्पादन करने के लिये जीता हो, अथवा जिसका आशय अच्छा हो जो दुष्कर्मो से सदैव बचता हो वह सच्चा सज्जन है"

“निस्सन्देह सज्जनता का यह कल्पित चित्र अति विचित्र है परन्तु ऐसा मनुष्य पृथ्वी पर तो कभी कोई काहे को उत्पन्न हुआ होगा" मास्टर शिंभूदयाल ने कहा.

प्रकृति के अनुसार और मनुष्यों के स्वभाव का अनुमान करते हैं परंतु दरअसल उनमें बड़ा अंतर है" लाला ब्रजकिशोर कहने लगे देखो:एथेन्स का निवासी आरिस्टाईडीज एक बार दो मनुष्यों का इन्साफ करने बैठा तब उनमें से एक ने कहा कि “प्रतिपक्षी ने आप को भी प्रथम बहुत दुख दिया है।" आरिस्टाइडीज ने जवाब दिया कि "मित्र! इसने तुमको दु:ख दिया हो वह बताओ क्योंकि इस समय मैं अपना नहीं; तुम्हारा इन्साफ़ करता हूं।”

जवाब है" निदान प्लाटीनियस के समझाने से राजसभा का मन फिर गया और उसने उन्हें कैद से छोड़ दिया.

"मेसीडोन के बादशाह पीरस ने रोम के कैदियों को छोड़ा उस समय फ्रेबीशियस नामी एक रोमी सरदार को एकांत में ले जा कर कहा “मैं जानता हूं कि तुम जैसा वीर, गुणवान स्वतंत्र और सच्चा मनुष्य रोम के राज्यभर में दूसरा नहीं है जिसपर तुम ऐसे दरिद्री बन रहे हो. यह बड़े खेद की बात है! सच्ची योग्यता की कदर करना राजाओं का प्रथम कर्तव्य है इस लिये मैं तुमको तुम्हारी पदवी के लायक धनवान बनाया चाहता हूं परंतु मैं इसमें तुम्हारे ऊपर कुछ उपकार नहीं करता अथवा इसके बदले तुम से कोई अनुचित काम नहीं लिया चाहता. मेरी केवल इतनी प्रार्थना है कि उचित रीति अपना कर्तव्य सम्पादन किये पीछे न्याय पूर्वक मेरी सहायता हो सके तो करना.” फेब्रीशियस ने उत्तर दिया कि "निस्संदेह मैं धनवान नहीं हूं.मैं एक छोटे से मकान में रहता हूं और ज़मीन का एक छोटासा क्रिता मेरे पास है, परंतु ये मेरी जरूरत के लिये बहुत है और जरूरत से ज्यादा लेकर मुझको क्या करना है? मेरे सुख में किसी तरह का अंतर नहीं आता मेरी इज्जत और धनवानों से बढ़कर है, मेरी नेकी मेरा धन है मैं चाहता तो अबतक बहुत सी दौलत इकट्ठी कर लेता, परंतु दौलत की अपेक्षा मुझको अपनी इज्जत प्यारी है इसलिये तुम अपनी दौलत अपने पास रखो और मेरी इज्जत मेरे पास रहने दो."

को हथियार बंद होकर हाजिर होने का हुक्म दिया पर नोशेरवां इस हुक्म से हाजिर न हुआ इसलिये ख़ज़ान्ची ने क्रोध करके सब सेना को उल्टा फेर दिया और दूसरी बार भी ऐसा ही हुआ तब तीसरी बार ख़ज़ांची ने डोंडी पिटवाकर नोशेरवां को हाजिर होने का हुक्म दिया. नोशेरवां उस हुक्म के अनुसार हाजिर हुआ परंतु उसकी हथियारबंदी ठीक न थी, खजांची ने पूछा “तुम्हारे धनुष की फाल्तू प्रत्यंचा कहां है?” नोशेरवां ने कहा “महलों में भूल आया” खजांची ने कहा “अच्छा! अभी जाकर ले आओ” इसपर नोशेरवां महलों में जाकर प्रत्यंचा ले आया तब सब की तनख्वाह बँटी परंतु नोशेरवां खजान्ची के इस अपक्षपात काम से ऐसा प्रसन्न हुआ कि उसे निहाल कर दिया. इस प्रकार सच्ची सज्जनता के इतिहास में सैकड़ों दृष्टांत मिलते हैं परंतु समुद्र में गोता लगाए बिना मोती नहीं मिलता॥"

"आप बार-बार सच्ची सज्जनता कहते हैं सो क्या सज्जनता सज्जनता में भी कुछ भेदभाव है?” लाला मदनमोहन ने पूछा.

जाती है ऊपर दिखाने वाले लोग अपना निज स्वभाव छिपा कर सज्जन बनने के लिये सच्चे सज्जनों के स्वभाव की नकल करते हैं परंतु परीक्षा के समय उनकी कलई तत्काल खुल जाती है, उनके मन में विकास के बदले संकुचित भाव, सादगी के बदले बनावट धर्म प्रवृत्ति के बदले स्वार्थपरता और धैर्य के बदले घबराट इत्यादि प्रगट दिखने लगते हैं उनका सब सद्भभाव अपने किसी गूढ़ प्रयोजन के लिये हुआ करता है परंतु उनके मन को सच्चा सुख इसलिए सर्वथा नहीं मिल सकता.”

“हां सज्जनता के दो भेद हैं एक स्वभाविक होती है जिस का वर्णन मैं अब तक करता चला आया हूं. दूसरी ऊपर से दिखाने की होती है जो बहुधा बड़े आदमियों में और उनके पास रहने वालों में पाई जाती है. बड़े आदमियों के लिये वह सज्जनता सुन्दर वस्त्रों के समान समझनी चाहिए जिसको वह बाहर जाते बार पहन जाते हैं और घर में आते ही उतार देते हैं, स्वाभाविक सज्जनता स्वच्छ स्वर्ण के अनुसार है जिसको चाहे जैसे तपाओ-गलाओ परंतु उसमें कुछ अंतर नहीं आता. ऊपर से दिखानेवालों की सज्जनता गिल्टी के समान है जो रगड़ लगते ही उतर