परीक्षा गुरु
प्रकरण १२: सुख दुःख
आत्मा को आधार अरु साक्षी आत्मा जान
निज आत्मा को भूलहू करिये नहिं अपमान
"सुख दु:ख तो बहुधा आदमी की मानसिक वृत्तियों और शरीर की शक्ति के आधीन है. एक बात से एक मनुष्य को अत्यंत दुःख और क्लेश होता है वही बात दूसरे को खेल तमाशे की सी लगती है इसलिये सुख दु:ख होने का कोई नियम नहीं मालूम होता” मुन्शी चुन्नीलाल ने कहा.
आत्मैव ह्यत्मन: साक्षी गति रात्मा तथात्मन:
भाव संस्था:स्वमात्मनं नृणां साक्षिण मुत्तमम्॥
मेरे जान तो मनुष्य जिस बात को मन सै चाहता है उस्का पूरा होना ही सुख का कारण है और उस्मैं हर्ज पड़ने ही सै दुःख होता है" मास्टर शिंभूदयाल ने कहा.
"तो अनेक बार आदमी अनुचित काम कर के दु:ख मैं फंस जाता है और अपने किये पर पछताता है इस्का क्या कारण? असल बात यह है कि जिस्समय मनुष्य के मन मैं जो वृत्ति प्रबल होती है वह उसी के अनुसार काम किया चाहता है और दूरअंदेशी की सब बातों को सहसा भूल जाता है परंतु जब वो बेग घटता है तबियत ठिकानें आती है तो वो अपनी भूल का पछतावा करता है और न्याय वृत्ति प्रबल हुई तो सब के साम्हने अपनी भूल अंगीकार कर कै उस्के सुधारने का उद्योग करता है पर निकृष्ट प्रवृत्ति प्रबल हुई तो छल कर के उस्को छिपाया चाहता है अथवा अपनी भूल दूसरे के सिर रक्खा चाहता है और एक अपराध छिपाने के लिये दूसरा अपराध करता है परंतु अनुचित कर्म्म सै आत्मग्लानि और उचित कर्म्म सै आत्मप्रसाद हुए बिना सर्वथा नहीं रहता" लाला ब्रजकिशोर बोले.
"अपना मन मारने से किसी को खुशी क्यों कर हो सकती है?" लाला मदनमोहन आश्चर्य से कहने लगे.
जगमै पावत सोय+" जो लोग ईश्वर के बांधे हुए नियमों के अनुसार सदा सत्कर्म करते रहते हैं उनको आत्मप्रसाद का सच्चा सुख मिलता है उनका मन विकसित पुष्पों के समान सदा कर प्रफुल्लित रहता है जो लोग कह सकते हैं कि हम अपनी सामर्थ्य भर ईश्वर के नियमों का प्रतिपालन करते हैं, यथा शक्ति परोपकार करते हैं, सब लोगों के साथ अनीत छोड़कर नीतिपूर्वक सुहृद्भाव रखते हैं, "अतिशय भक्ति और विश्वास पूर्वक ईश्वर की शरणागति हो रहे हैं वही सच्चे सुखी हैं. वह अपने निर्मल चरित्रों को बारम्बार याद करके परम सन्तोष पाते हैं, यद्यपि उनका सत्कर्म मनुष्य मात्र न जानते हों इसी तरह किसी के मुख से एक बार भी अपने सुयश सुनने की सम्भावना न हो, तथापि वह अपने कर्तव्य काम में अपने को कृतकार्य देख कर अद्वितीय सुख पाते हैं उचित रीति से निष्प्रयोजन होकर किसी दुखिया का दुःख मिटाने को, किसी मूर्ख को ज्ञानोपदेश करने की एक-एक बात याद आने से उनको जो सुख मिलता है वह किसी को बड़े से बड़ा राज मिलने पर भी नहीं मिल सकता. उनका मन पक्षपात रहित होकर सबके हितसाधन में लगा रहता है इसका कारण वह सब के प्यारे होने चाहिये. परंतु मूर्ख जलन से, हठ से, स्वार्थपरता से अथवा उनका भाव जाने बिना उनसे द्वेष करे, उनका बिगाड़ करना चाहें तो क्या कर सकते हैं? उनका सर्वस्व नष्ट हो जाय तो भी वह नहीं घबराते; उनके हृदय में जो धर्म का ख़ज़ाना इकट्ठा हो रहा
यस्य वांगमनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा॥
सनै सर्व मवाप्नोति वेदान्तोपगतम्फलम्।।
है उसके छूने की किसको सामर्थ्य है? आपने सुना होगा कि:"महाराज रामचन्द्रजी को राजतिलक के समय चौदह वर्ष का वनवास हुआ उस समय उनके मुख पर उदासी के बदले प्रसन्नता चमकने लगी.
वक्तृता की जिसमें अपने मरने के लिये अपने सिवाय किसी को दोष न दिया वह बोली कि “इंग्लैंड की गद्दी पर बैठने के वास्ते उद्योग करने का दोष मुझ पर कोई नहीं लगावेगा परंतु इतना दोष अवश्य लगावेगा कि "वह औरों के कहनें से गद्दी पर क्यों बैठी? उसने जो भूल की वह लोभ के कारण नहीं केवल बड़ों के आज्ञवर्ती होकर की थी, सो यह करना मेरा फर्ज था परन्तु किसी तरह करो जिसके साथ मैंने अनुचित व्यवहार किया उसके साथ मैं प्रसन्नता से अपने प्राण देने को तैयार हूँ” यह कहकर उसने बड़े धैर्य से अपनी जान दी.
"दुखिया अपने मन को धैर्य देने के लिये चाहे जैसे समझा करें परन्तु साधारण रीति तो यह है कि उचित उपाय से हो अथवा अनुचित उपाय से हो जो अपना काम निकालता है वही सुखी समझा जाता है. आप विचार कर देखेंगे तो मालूम हो जायगा कि आज भूमंडल में जितने अमीर और रईस दिखाई देते हैं उनके बड़ों में से बहुतों ने अनुचित कर्म करके यह वैभव पाया होगा" मुन्शी चुन्नीलाल ने कहा.
कभी अनुचित कर्म करने से सच्चा सुख नहीं मिलता प्रथम तो मनु महाराज और लोमश ऋषि एक स्वर से कहते हैं कि कर अधर्म पहले बढ़त सुख पावत बहुत भांत॥ शत्रु न जय कर आप पुन मूलसहित बिनसात॥” फिर जिस तरह सत्कर्म का फल
अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति॥
तत: सपत्नाम् जयतिस मुलस्तूविनस्यति
वर्धत्य धर्मेंण नरस्ततो भद्राणि पश्यति॥
तत: मपत्नान् जयति समूलस्तू विनश्यति॥
आत्म प्रसाद है इसी तरह दुष्कर्म का फल आत्मग्लानि, आंतरिक दुःख अथवा पछतावा हुए बिना सर्वथा नहीं रहता मनुस्मृति में लिखा है "पापी समुझत पाप कर काहू देख्यो नाहिं॥ पैसुर अरुनिज आत्मा निस दिन देखत जाहिं॥+" लाला ब्रजकिशोर कहने लगे "जिस समय कोई निकृष्ट प्रवृत्ति अत्यंत प्रबल होकर धर्म प्रवृत्ति की रोक नहीं मानती उस समय हम उसकी इच्छा पूरी करने के लिये पाप करते हैं परन्तु उस काम से निवृत्ति होते ही हमारे मन में अत्यंत ग्लानि होती है. हमारी आत्मा हमको धिक्कारती है और लोक परलोक के भय से चित्त बिकल रहता है जिसने अपने अधर्म से किसी का सुख हर लिया है अथवा स्वार्थपरता के बसवर्ती होकर उपकार के बदले अपकार किया है, अथवा छल-बल से किसी का धर्म भ्रष्ट कर दिया है, जो अपने मन में समझता है कि मुझसे फलाने का सत्यानाश हुआ, अथवा मेरे कारण फलाने के निर्मल कुल में कलंक लगा, अथवा संसार में दुःख के सोते इतने अधिक हुए मैं उत्पन्न न हुआ होता तो पृथ्वी पर इतना पाप कम होता, केवल इन बातों की याद उसके हृदय विदीर्ण करने के लिये बहुत है और जो मनुष्य ऐसी अवस्था में भी अपने मन का समाधान रख सके, उसको मैं वज्रहृदय समझता हूँ जिसने किसी निर्धन मनुष्य के साथ छल अथवा विश्वासघात कर के उसकी अत्यंत दुर्दशा की है उसकी आत्म ग्लानि और आंतरिक दुःख का वर्णन कौन कर सकता है? अनेक प्रकार के भोगविलास करनेवालों को भी समय पाकर अवश्य
+ मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश् यतीतिन:॥
पछतावा होता है, जो लोग कुछ काल श्रद्धा और यत्नपूर्वक धर्म का आनंद लेकर इस दलदल में फसते हैं उनसे आत्मग्लानि और आंतरिक दाह का क्लेश पूछना चाहिये."
"टर्की का खलीफा मन्तासर अपने बाप को मरवाकर उसके महल का कीमती सामान देख रहा था उस समय एक उम्दा तस्वीर पर उसकी दृष्टि पड़ी जिसमें एक शुशोभित तरुण पुरुष घोड़े पर सवार था और रत्नजड़ित ‘ताज’ उसके सिर पर शोभायमान था. उसके आस-पास फारसी में बहुत-सी इबारत लिखी थी। ख़लीफ़ा ने एक मुन्शी को बुला कर वह इबारत पढ़वाई उसमें लिखा था कि "मैं सीरोज़ खुसरो का बेटा हूं. मैंने अपने बाप का ताज लेने के वास्ते उसे मरवा डाला पर उसके पीछे वह ताज मैं सिर्फ छह महीने अपने सिर पर रख सका.” यह बात सुनते ही ख़लीफ़ा मौन्तासर के दिल पर चोट लगी और अपने आंतरिक दु:ख वह केवल तीन दिन राज कर के मर गया.”
"यह आत्मग्लानि अथवा आंतरिक क्लेश किसी नए पंछी को जाल में फसने से भले ही होता हो, पराने खिलाड़ियों को तो इसकी ख़बर भी नहीं होती. संसार में इस समय ऐसे बहुत लोग मौजूद हैं जो दूसरे के प्राण लेकर हाथ भी नहीं धोते.” मास्टर शिंभूदयाल ने कहा.
है" लाला ब्रजकिशोर कहने लगे “जैसै दुर्गंध में रहने वाले मनुष्यों के मस्तक में दुर्गंध समा जाती है तब उनको वह दुर्गंध नहीं मालूम होती अथवा बार-बार तरवार को पत्थर पर मारने से उसकी धार अपने आप भोंटी होती जाती है इसी तरह ऐसे मनुष्यों के मन से अभ्यासवस अधर्म की ग्लानि निकल कर उनके मन पर निकृष्ट प्रवृत्तियों का पूरा अधिकार हो जाता है. विदुरजी कहते हैं "तासों पाप न करत बुध किये बुद्धि को नाश॥ बुद्धि नासते बहुरि नर पापै करत प्रकाश॥ यह अवस्था बड़ी भयंकर है और सन्निपात के समान इससे आरोग्य होने की आशा बहुत कम रहती है. ऐसी अवस्था में निस्संदेह शिंभूदयाल के कहने मूजब उनको अनुचित रीति से अपनी इच्छा पूरी करने में सिवाय आनन्द के कुछ पछतावा नहीं होता परन्तु उनको पछतावा हो या न हो ईश्वर के नियमानुसार उन्हें अपने पापों का फल अवश्य भोगना पड़ता है. मनुस्मृति में लिखा है “वेद, यज्ञ, तप, नियम अरु बहुत भांति के दान॥ दुष्ट हृदय को जगत में करत न कुछ कल्यान॥+” ऐसे मनुष्यों को समाज की तरफ़ से, राज की तरफ से अथवा ईश्वर की तरफ से अवश्य दंड मिलता है और बहुधा वह अपना प्राण देकर उससे छुट्टी पाते
पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणं पुनः पुनः।।
वेदात्यागश्चयज्ञाथ नियमाश्च तपांसिच॥
नविप्रभावदुष्टस्य सिद्धि गच्छन्ति कर्हिचित्।।
+ अकस्मा देव कुप्यंति प्रसीदंत्यंनिमित्तज्ञ:॥
हैं इसलिये सुख-दुःख का आधार इच्छा फल की प्राप्ति पर नहीं बल्कि सत्कर्म और दुष्कर्म पर है.
इस तरह पर अनेक प्रकार की बातचीत करते हुए लाला मदनमोहन की बग्गी मकान पर लौट आई और लाला ब्रजकिशोर वहां से रुखसत होकर अपने घर गए.
शीलमेतदसाधूनामभ्रं पारिप्लवं यथा.