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कर्बला अध्याय 7 / 7

विषय-सूची

  1. 1 भूमिका
  2. 2 नाटक के पात्र
  3. 3 पहला अंक
  4. 4 दूसरा अंक
  5. 5 तीसरा अंक
  6. 6 चौथा अंक
  7. 7 पाँचवाँ अंक

कर्बला

पाँचवाँ अंक

पहला दृश्य

[ समय ९ बजे दिन। दोनों फ़ौजें लड़ाई के लिए तैयार हैं। ]

हुर---या हज़रत, मुझे मैदान में जाने की इजाज़त मिले। अब शहादत का शौक़ रोके नहीं रुकता।

हुसैन---वाह, अभी आये हो, और अभी चले जाओगे। यह मेहमाँन ने वाज़ी का दस्तूर नहीं कि हम तुम्हें आते-ही-आते रुखसत कर दें।

हुर---या फ़र्ज़न्दे-रसूल, मैं आपका मेहमान नहीं, ग़ुलाम हूँ। अापके क़दमों पर निसार होने के लिए आया हूँ।

हुसैन---( हुर के गले मिलकर आँखों में आँसू भरे हुए ) अगर तुम्हारी इसी मे खुशी है, तो जाओ, खुदा को सौंपा।

दुनिया के शहीदों में तेरा नाम हो भाई , / उक़बा में तुझे राहतोआराम हो भाई।

[ हुर मैदान की तरफ़ चलते हैं, हुसैन ख़ेमे के दरवाज़े तक उन्हें पहुँचाने आते हैं। ख़ेमे से निकलते हुए हुर हुसैन के कदमों को बोसा देते हैं, और चले जाते हैं। ]

हुर---( मैदान में जाकर )

ग़ुलाम हज़रते शब्बीर रन में आता है, / वही जो दीं का है बंदा, वह मेरा आक़ा है। / वह आये ठोंक के खम, जिसकी मौत आयी है, / उसी का पीने को खूँ मेरी तेग़ आयी है।

[ सफ़वान उधर से झूमता हुआ आता है। ]

हुर---सफ़वान, कितनी शर्म की बात है कि तुम फ़र्ज़न्दे-रसूल से जंग करने आये हो?

सफ़वान---हम सिपाहियों को माल, दौलत, जागीर और रुतबा चाहिए, हमें दीन और आक़बत से क्या काम? सँभल जाओ।

[ दोनो पहलवानों में चोटें चलने लगती हैं। ]

अब्बास---वह मारा। सफ़वान का सीना टूट गया, ज़मीन पर तड़पने लगा।

हबीब---सफ़वान के तीनों भाई दौड़े चले आते हैं।

अब्बास---वाह मेरे शेर! एक को तलवार से लिया, दूसरा भी गिरा, और तीसरा भागा जाता है।

हबीब---या ख़ुदा, खैर कर, हुर का घोड़ा गिर गया।

हुसैन---फ़ौरन् एक घोड़ा भेजो।

[ एक आदमी हुर के पास घोड़ा लेकर जाता है। ]

अब्बास---यह पीरानासाली और यह दिलेरी! ऐसा बहादुर अाज तक नज़र से नहीं गुज़रा। तलवार बिजली की तरह कौंध रही है।

हुसैन---देखो, दुश्मन का लश्कर कैसा पीछे हटा जाता है। मरनेवाले के सामने खड़ा होना आसान नहीं है। दिलेरी की इन्तहा है।

अब्बास---अफ़सोस, अब हाथ नहीं उठते। तीरों से सारा बदन चलनी हो गया।

शिमर---तीरों की बारिश करो, मार लो। हैफ़ है तुम पर कि एक आदमी से इतने ख़ायफ़ हो। वह गिरा, काट लो सिर और हुसैन की फ़ौज में फेक दो।

[ कई आदमी हुर के सिर को काटने को चलते हैं कि हुसैन मैदान की तरफ दौड़ते हैं। ]

एक---वह हुसैन दौड़े चले आते हैं। भागो, नहीं तो जान न बचेगी।

हुसैन---( हुर की लाश से लिपटकर )

टुकड़े हैं बदन, ज़ख़्म बहुत खाये हैं भाई, / हो होश में आ लाश पै हम आये हैं भाई।

[ हुर आँखें खोलकर देखते हैं, और अपना सिर उनकी गोद में रख देते हैं। ]

हुर-या हज़रत, आपके कदमों पर निसार हो गया। ज़िन्दगी ठिकाने लगी।

तकिया तेरे जानू का मयस्सर हुआ आक़ा, / जर्रा था यह अब महरे-मुनौवर हुआ आका।

हुसैन---हाय! मेरा जाँबाज़ रफ़ीक़ दुनिया से रुख़सत हो गया। यह वह दिलावर था, जिसने हक़ पर अपने रुतबा और दौलत को निसार कर दिया, जिसने दीन के लिए दुनिया को लात मार दी। ये हक़ पर जान देनेवाले हैं, जिन्होंने इस्लाम के नाम को रोशन किया है, और हमेशा रोशन रक्खेंगे। जा मुहम्मद के प्यारे, जन्नत तेरे लिए हाथ फैलाये हुए है। जा, और हयात अब्दी के लुत्फ़ उठा। मेरे नाना से कह दीजियो कि हुसैन भी जल्द ही तुम्हारी ख़िदमत में हाज़िर होनेवाला है, और तुम्हारे सारे कुनबे को साथ लिये हुए। क़ाबिल ताज़ीम हैं वे माताएँ, जो ऐसे बेटे पैदा करती हैं!

दूसरा दृश्य

[ समर---भूमि। साद की तरफ़ से दो पहलवान आते हैं---यसार और सालिम। ]

यसार---( ललकारकर ) कौन निकलता है, हुर का साथ देने के लिए? चला आये, जिसे मौत का मज़ा चखना हो। हम वह हैं, जिनकी तलवार से क़ज़ा को रूह भी क़ज़ा होती है।

[ अब्दुल्लाह कलवी हुसैन के लश्कर से निकलते हैं। ]

यसार---तू कौन है?

अब्दुल्लाह---मैं अब्दुल्लाह बिन कमीर कलवी हूँ, जिसकी तलवार हमेशा बेदीनों के खून की प्यासी रहती है।

यसार---तेरे मुकाबले में तलवार उठाते हमें शर्म आती है। जाकर हबीब या ज़हीर को भेज।

अब्दुल्ला---तू उन सरदाराने-फ़ौज से क्या लड़ेगा, जिनकी ज़िन्दगी ज़ियाद की गुलामी में गुज़री। तुझे उन रईसों को ललकारते हुए शर्म भी नहीं आती। तुझ-जैसों के लिए मैं ही काफ़ी हूँ।

[ यसार तल़वार लेकर झपटता है। अब्दुल्लाह एक ही वार में उसका काम तमाम कर देते हैं। तब सालिम उन पर टूट पड़ता है। अब्दुल्लाह की पाँचों उँगलियाँ कट जाती हैं, तलवार ज़मीन पर गिर पड़ती है। वह बायें हाथ में नेज़ा ले लेते हैं, और सालिम के सीने में नेज़ा चुभा देते हैं। वह भी गिर पड़ता है। ज़ियाद की फ़ौज से निकलकर लोग अब्दुल्लाह को घेर लेते हैं। इधर से क़मर लकड़ी लेकर दौड़ती है। ]

क़मर---मेरी जान तुम पर फ़िदा हो, रसूल के नेवासे के लिए लड़ते-लड़ते जान दे दो। मैं भी तुम्हारी मदद को आयी।

अब्दुल्लाह---नहीं-नहीं, क़मर, मेरे लिए तुम्हारी दुआ काफ़ी है; इधर मत आओ।

कमर---मैं इन शैतानों को लकड़ी से मारकर गिरा दूँगी। एक के लिए दो भेजे, जब दोनों जहन्नुम पहुँच गये, तो सारी फ़ौज निकल पड़ी। कह कौन-सी ज़ंग है?

अब्दुल्लाह---मैं एक ही हाथ से इन सबको मार गिराऊँगा। तुम खेमे में जाकर बैठो।

क़मर---मैं जब तक ज़िन्दा हूँ, तुम्हारा साथ न छोडूँगी। तुम्हारे साथ ही रसूल पाक की ख़िदमत में हाज़िर हूँगी।

हुसैन---(क़मर से) ऐ नेक खातून, तुझ पर अल्लाह ताला रहम करे। तुम वहाँ जाअोगी, तो यहाँ मस्तूरात को खबर कौन लेगा? औरतों को जिहाद करना मना है। लौट आअो, और देखो तुम्हारा जाँबाज़ शौहर एक हाथ से कितने आदमियों का मुक़ाबला कर रहा है। अाफ़रीं है तुम पर, मेरे शेर! तुमने अपने रसूल की जो खिदमत की है, उसे हम कभी न भूलेंगे। खुदा तुम्हें उसकी जज़ा देगा। आह! ज़ालिमों ने तीर मारकर ग़रीब को गिरा दिया! खुदा उसे जन्नत दे। क़मर―या हज़रत, इसका ग़म नहीं। वह आप पर निसार हो गये, इससे बेहतर और कौन-सी मौत हो सकती थी। काश मैं भी उनके साथ चली जाती। मेरे जाँबाज़ ! सच्चे दिलावर, जा, और जन्नत में आराम कर। तू वह था, जिसने कभी सायल को नहीं फेरा, जिसकी नीयत कभी खराब और निगाह कभी बुरी नहीं हुई। जा, और जन्नत में आराम कर। हुसैन―क़मर सब्र करो कि इसके सिवा कोई चारा नहीं है। क़मर―मुझे उनके मरने का ग़म नहीं है। मैं खुश हूँ कि उन्होंने हक़ पर जान दी। इस वक्त अगर मेरे सौ बेटे होते, तो मैं इसी तरह उन्हें भी आपके क़दमों पर निसार कर देती। काश वहब इतना ज़नपरस्त न होता.... वहब―अस्सलामअलेक या हज़रत हुसैन। क़मर―(वहब को गले लगाकर) ज़रा देर पहले ही क्यों न आ गये बेटा कि अपने बाप का आखिरी दीदार कर लेते। नसीमा कहाँ है? वहब―यहीं खेमों के पीछे खड़ी है। क़मर―मैं अभी तुम्हारा ही ज़िक्र कर रही थी। क्यों बेटा, अपने बाप का नाम रोशन न करोगे? मेरा तुम्हारे ऊपर बड़ा हक़ है। तुम मेरे जिगर का खून पीकर पले हो। मेरा दूध हलाल न करोगे? मेरी तमन्ना है कि हुसैन पर अपनी जान निसार करो, ताकि दुनिया में क़मर का नाम क़मर की तरह चमके, जिसका शौहर और बेटा, दोनों ही हक पर शहीद हुए। वहब―अम्माजान, मेरी भी दिली तमन्ना यह थी और है। मैं अपने बाप के नाम को दाग़ नहीं लगाना चाहता, मगर नसीमा को क्या करूँ? उसकी मुसीबतों का खयाल हिम्मत को पस्त कर देता है। जाता हूँ, अगर उसने इजाज़त दे दी, तो मेरे लिए इससे बढ़कर खुशी नहीं हो सकती। क़मर―बेटा, तुम उसकी आदत से वाक़िफ़ होकर फिर उसी से पूछने जाते हो। इसके मानी इसके सिवा और कुछ नहीं है कि तुम खुद मैदान में जाते हुए डरते हो।

नसीमा---काश ज़रा देर क़ब्ल पा जाते, तो अब्बाजान की आखिरी दुआएँ मिल जातीं।।

वहब---हमारी बदनसीबी!

नसीमा---मैं जानती हूँ, तुम हमेशा के लिए खैरबाद कहने आये हो। जाओ प्यारे, और एक सपूत बेटे की तरह अपने वालिद का नाम रोशन करो। काश औरतों पर ज़िहाद हराम न होता, तो मैं भी तुम्हारे ही साथ अपने को हक की हिमायत में निसार कर देती। जब से मैंने फ़र्ज़न्दे-रसूल की पाक सूरत देखी है, मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि मेरा दिल रोशन हो गया है, और उस रोशनी में ज़िन्दगी की तमन्नाएँ और ख़्वाहिशें नज़र से मिटती जाती हैं। जाओ प्यारे, जाओ, और हक़ पर क़ुरबान हो जाओ। नसीमा जब तक जियेगी, तुम्हारे मज़ार पर फ़ातिहा और दरूद पड़ेगी। जाओ, जन्नत में मुझे भूल न जाना। मैंने हवस के दाम में फँसकर तुम्हें फर्ज़ के रास्ते से हटा दिया था। रसूल पाक से कहना, मेरा गुनाह मुआफ़ करें। जाओ, इन अाँसुओं का ख़याल न करो, वरना ये आँसू तुम्हारे जोश को बुझा देंगे। मैं अभी बहुत दिन तक रोऊँगी, तुम इसका ग़म न करना। जाओ, तुम्हें खुदा को सौंपा--आह! दिल फटा जाता है। कैसे सब्र करूँ?

[ वहब आँसू पोंछता हुआ बाहर जाता है। ]

क़मर---( अन्दर आकर ) बेटी, तुझे गले से लगा लूँ, और तुझ पर अपनी जान फ़िदा, तूने खानदान की आबरू रख ली।

नसीमा---अम्माजान, रसूल पाक ने अगर कोई बेइन्साफ़ी की, तो वह यही है कि औरतों पर जिहाद हराम कर दिया, वरना इस वक्त मैं वहब के पहलू में होती। देखिए, दुश्मन उन पर चारों तरफ़ से कितनी बेदी से नेज़े और तीर फेंक रहे हैं। किसी की हिम्मत नहीं है कि उनके सामने ख़म ठोककर आये। आह! देखिए, उनके हाथ कितनी तेज़ी से चल रहे हैं। जिस पर उनका एक हाथ पड़ जाता है, वह फिर नहीं उठता, दुश्मन भागे जाते हैं। हा बुज़दिलो, नामर्दो! वह इधर चले आ रहे हैं, बदन ख़ून से तर है, सिर पर भी ज़ख्म लगे हैं।

[ वहब आकर ख़ेमे के सामने खड़ा हो जाता है। ]

वहब---अम्माजान, मुझसे राज़ी हुई?

क़मर---बेटा, तुझ पर हज़ार जान से निसार हूँ। तुमने बाप का नाम रोशन कर दिया, लेकिन मैं चाहती हूँ कि जब तक तेरे हाथों में ताक़त है, तब तक दुश्मनों को आराम न लेने दे।

वहब---( स्वगत ) आह! हक़ पर जान देना भी उतना आसान नहीं है, जितना लोग ख़याल करते हैं। ( प्रकट ) अम्मा, यही मेरा भी इरादा है, लेकिन नसीमा के आँसुओं की याद मुझे खींच लायी।

[ कमर चली जाती है। ] नसीमा, तुम्हें आखिरी बार देखने की तमन्ना मैदान से खींच लायी। सनम का पुजारी सनम ही पर क़ुर्बान हो सकता है, दीन और ईमान, हक़ और इन्साफ़, ये सब उसकी नज़रों में खिलौने की तरह लगते हैं। मुहब्बत दुनिया की सबसे मज़बूत बेड़ी है, सबसे सख़्त ज़ंजीर। ( चौंककर ) कोई पहलवान मैदान में आकर ललकार रहा है। हाय! लानत हो उन पर, जो हक़ को पामाल करके हज़ारों को नामुराद मरने पर मजबूर करते हैं। नसीमा, हमेशा के लिए रुख़सत! मेरी तरफ़ एक बार मुहब्बत की निगाहों से देख लो, उनमें मुहब्बत का ऐसा जाम हो कि उसका नशा मेरे सिर से क़यामत तक न उतरे।

नसीमा---मेरी जान, आह! दिल निकला जाता है....।

[ वहब मैदान की तरफ चला जाता है। ] खुदा! काश मुझे मौत आ जाती कि यह दिलख़राश नज़्ज़ारा आँखों से न देखना पड़ता। मेरा जवान दिलेर जाँबाज़ शौहर मौत के मुँह में चला जा रहा है, और मैं बैठी देख रही हूँ। ज़मीन, तू क्यों नहीं फट जाती कि मैं उसमें समा जाऊँ! बिजली, आसमान से गिरकर क्यों मेरा खातमा नहीं कर देती! वह देव उन पर तलवार लिये झपटा, या खुदा, मुझ नामुराद पर रहम कर। दूर हो ज़ालिम, सीधा जहन्नुम को चला जा। अब कोई आगे नहीं आता। वह मलऊन शिमर अपनी जमैयत लिये उनकी तरफ़ दौड़ा अाता है। हाय! ज़ालिमों ने घेर लिया। ख़ुदा, तू यह बेइन्साफ़ी देख रहा है, और इन मूज़ियों पर अपना क़हर नहीं नाज़िल करता। एक के लिए एक काफी है, फ़ौज भेज देना कौन-सा आईने-जंग है। हाय! हाय ख़ुदा, ग़ज़ब हो गया। अब नहीं देखा जाता---

[ छाती पीटकर रोने लगती है। शिमर वहब का सिर काटकर फेंक देता है, कमर दौड़कर सिर को गोद में उठा लेती है, और उसे आँखों से लगाती है। ]

कम़र---मेरे सपूत बेटे, मुबारक है यह घड़ी कि मैं तुझे अपनी आँखों से हक़ पर शहीद होते देख रही हूँ। आज तू मेरे क़र्ज से अदा हो गया, आज मेरी मुराद पूरी हुई, आज मेरी ज़िन्दगी सफल हो गयी, मैं अपनी सारी तकलीफ का सिला पा गयी। खुदा तुझे शहीदों के पहलू में जगह दे। नसीमा, मेरी जान, आज तूने सच्चा सोहाग पाया है, जो क़यामत तक तुझे सुहागिन बनाये रखेगा। अब हूरें तेरे तलुओं तले आँखें बिछायेंगी, और फ़रिश्ते तेरे क़दमों की खाक का सुरमा बनायेंगे।

[ वहब का सिर नसीमा की गोद में रख देती है, नसीमा सिर को गोद में रखे हुए बैन करके रोती है। ]

काजल बना-बनाके तेरी ख़ाके-दर को मैं, / रोशन करूँगी अपनी सवादे-नज़र को मैं। / आँसू भी खुश्क हो गये, अल्लाह रे सोज़े-ग़म, / क्योंकर बुझाऊँ आतिशे-दाग़े-ज़िगर को मैं। / तेरे सिवा है कौन, जो बेकस की ले ख़बर, / आती न तेरे दर पर, तो जाती किधर को मैं? / तलवार कह रही है जवानाने-कौम से--- / मुद्दत से ढूँढ़ती हूँ तुम्हारी क़मर को मैं। / बाज़ आयी मैं दुआ ही से, यारब कि कब तलक, / करती फिरूँ तलाश जहाँ में असर को मैं। / गर तेरी ख़ाके-दर से न मिलता यह इफ़्तख़ार, / करती न यों बुलन्द कमी अपने सिर को मैं।

हाय प्यारे! तुम कितने बेवफ़ा हो, मुझे अकेले छोड़कर चले जाते हो! लो, मैं भी आती हूँ! इतनी जल्दी नहीं, ज़रा ठहरो।

[ साहसराय का प्रवेश। ]

साहस़राय---सती, तुम्हें नमस्कार करता हूँ।

नसीमा---साहब, आप ख़ूब आये। आपका शुक्रिया तहे-दिल से शुक्रिया! अापने ही मुझे आज इस दरजे पर पहुँचाया। अापके वतन में औरतें अपने शौहरों के बाद जिन्दा नहीं रहतीं। वे बड़ी खुशनसीब होती हैं।

साहस॰---सती, हम लोगों को आशीर्वाद दो।

नसीमा---( हँसकर ) यह दरजा! अल्लाह रे मैं, यह वहब की बदौलत, उसकी शहादत के तुफैल, खुदा, तुझसे मेरी दुअा है, मेरी क़ौम में कभी शहीदों की कमी न रहे, कभी वह दिन न आये कि हक़ को जाँबाजों की जरूरत हो, और उस पर सिर कटानेवाले न मिलें। इस्लाम, मेरा प्यारा इस्लाम शहीदों से सदा मालामाल रहे! ( अपने दामन से एक सलाई निकालकर वहब के खून में डुबाती है ) क्यों साहसराय, तुम्हारे यहाँ सती के जिस्म से भाग निकलती है, और वह उसमें जल जाती है। क्या बिला आग के जान नहीं निकलती?

साहस॰---नसीमा, तू देवी है। ऐसी देवियों के दर्शन दुर्लभ होते हैं। आकाश के देवता तुझ पर पुष्प-वर्षा कर रहे हैं।

[ नसीमा आँखों में सलाई फेर लेती है, और एक आह के साथ उसकी जान निकल जाती है। ]

तीसरा दृश्य

[ दोपहर का समय। हज़रत हुसैन अब्बास के साथ ख़ेमे के दरवाज़े पर खड़े मैदाने-जंग की तरफ़ ताक रहे हैं। ]

हुसैन---कैसे-कैसे जाँबाज़ दोस्त रुखसत हो गये, और होते जा रहे हैं। प्यास से कलेजे मुँह को आ रहे हैं, और ये ज़ालिम नमाज़ तक की मुहलत नहीं देते। आह! जहीर का-सा दीनदार उठ गया, मुस्लिम बिन ऊसजा इस अालमेतईफ़ी में भी कितने जोश से लड़े। किस-किसका नाम गिनाऊँ?

अब्बास---या हजरत, मुझे अंदेशा हो रहा है कि शिमर क़ोई नया सितम ढाने की तैयारियां कर रहा है। यह देखिए, वह सिपाहियों की एक बड़ी जमैयत लिये इधर चला आता है।

हबीब---( ज़ोर से ) शिमर! खबरदार, अगर इधर एक क़दम बढ़ाया, तो तेरी लाश पर कुत्ते रोवेंगे। तुझे शर्म नहीं पाती ज़ालिम कि अहलेबैत के खेमों पर हमला करना चाहता है।

शिमर---हम इस हमले से जंग का फ़ैसला कर देना चाहते हैं। जवानो, तीर बरसाओ।

हुसैन--–अफ़सोस, घोड़े मरे जा रहे हैं! घुटने टेककर बैठ जाओ, और तीरों का जवाब दो। खुदा ही हमारा वाली और हाफ़िज़ है।

शिमर---बढ़ो-बढ़ो, एक आन में फैसला हुअा जाता है।

सिपाही---देखते नहीं हो, हमारी सफें ख़ाली होती जाती हैं? यह तीर है, या खुदा का ग़जब। हम आदमियों से लड़ने आये हैं, देवों से नहीं।

शिमर---लकड़ियाँ जलाओ, फ़ौरन् इन खेमों पर आग के अंगारे फेको, जलते हुए कुंदे फेको, जलाकर ख़ाक स्याह कर दो।

[ आग की बारिश होने लगती है। औरतें ख़ेमे से चिल्लाती हुई बाहर निकल आती हैं। ]

जैनब---तुफ् है तुझ पर ज़ालिम, मर्दों से नहीं, औरतों पर अपनी दिलेरी दिखाता है।

हसैन---साद! यह क्या सितम है? तुम लोगों का दुश्मन मैं हूँ। मुझसे लड़ो, खेमों में औरतों और बच्चों के सिवा कोई मर्द नहीं है। वे ग़रीब निकलकर भाग न सकीं, तो हम उधर चले जायँगे, तुमसे लड़ न सकेंगे। अफ़सोस है कि इतनी जमैयत के होते हुए भी तुम यह विदअतें कर रहे हो।

शिमर--–फेको अँगारे। मुझे दोज़ख़ में जलना नसीब हो, अगर मैं इन सब खेमों को जला न डालूँ।

शीस---शिमर, यह तुम्हारी हरकत आईने-जंग के खिलाफ है। हिसाब के दिन तुम्हीं इसके ज़िम्मेदार होगे।

कीस---रोको अपने आदमियों को।

शिमर---मैं अपने फ़ैल का मुख़्तार हूँ। आग बरसाओ, लगा दो आग।

शीस---साद, खुदा को क्या मुँह दिखाओगे?

हबीब---दोस्त, टूट पड़ो शिमर पर, बाज की तरह टूट पड़ो। नामूसे-हुसैन पर निसार हो जाओ। एकबारगी नेजों का वार करो।

[ हबीब और उनके साथ दस आदमी नेज़े लेकर शिमर पर टूट पड़ते हैं। शिमर भागता है, और उसकी फ़ौज भी भाग जाती है। ]

हुसैन---हबीब, तुमने अाज अहलेबैत की आबरू रख ली। खुदा तुम्हें इसकी जज़ा दे।

हबीब---या मौला, दुश्मन दो-चार लहमों के लिए हट गया है, नमाज़ का वक्त आ गया है, हमारी तमन्ना है कि आपके साथ आख़िरी नमाज़ पढ़ लें। शायद फिर यह मौक़ा न मिले।

हुसैन---खुदा तुम पर रहम करे, अजान दो। ऐ साद, क्या तू इस्लाम की शरियत को भी भूल गया? क्या इतनी मुहलत न देगा कि नमाज़ पढ़ कर जंग की जाय?

शिमर---ख़ुदा पाक की क़सम, हर्गिज नहीं। तुम बेनमाज़ क़त्ल किये जाअोगे। शरियत बाग़ियों के लिए नहीं है।

हबीब---या मौला, अाप नमाज अदा फ़रमायें, इस मूज़ी को बकने दें। इसकी इतनी मजाल नहीं है कि नमाज में मुख़िल हो।

[ लोग नमाज पढ़ने लगते हैं। साहसराय और उनके सातो भाई हुसैन की पुश्त पर खड़े शिमर के तीरों से उनको बचाते रहते हैं। नमाज़ खत्म हो जाती है। ]

हुसैन---दोस्तो, मेरे प्यारे ग़मगुसारो, यह नमाज़ इस्लाम की तारीख़ मे यादगार रहेगी। अगर ख़ुदा के इन दिलेर बन्दों ने, हमारे पुश्त पर खड़े होकर, हमें दुश्मनों के तीरों से न बचाया होता, तो हमारी नमाज़ हर्गिज़ न पूरी होती। ऐ हक़परस्तो, हम तुम्हें सलाम करते हैं। अगर्चे तुम मोमिन नहीं हो, लेकिन जिस मजहब के पैरों ऐसे हक़परवर, ऐसे इन्साफ़ पर जान देनेवाले, ज़िन्दगी को इस तरह नाचीज़ समझनेवाले, मजलूमों की हिमायत में सिर कटानेवाले हों, वह सच्चा और मिनजानिब खुदा है। वह मजहब दुनिया में हमेशा क़ायम रहे, और नूरे-इस्लाम के साथ उसकी रोशनी भी चारो तरफ़ फैले।

साहसराय---भगवन्, अापने हमारे प्रति जो शुभेच्छाएँ प्रकट की हैं, उनके लिए हम अापके कृतज्ञ हैं। मेरी भी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जब कभी इस्लाम को हमारे रक्त की आवश्यकता हो, तो हमारी जाति में अपना वक्ष खोल देनेवालों की कमी न रहे। अब मुझे आज्ञा हो कि चलकर अपने प्रायश्चित की क्रिया पूरी करूँ।

हुसैन---नहीं, मेरे दोस्तो, जब तक हम बाक़ी हैं, अपने मेहमानों को मैदान में न जाने देंगे।

साहस---हज़रत, हम आपके मेहमान नहीं, सेवक हैं। सत्य और न्याय पर मरना ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य है। यह हमारा कर्तव्य-मात्र है, किसी पर एहसान नहीं।

हुसैन---आह! किस मुँह से कहूँ कि जाइए। ख़ुदा करे, इस मैदान में हमारे और आपन से जिस इमारत की बुनियाद पड़ी है, वह जमाने की नज़र से हमेशा महफूज़ रहे, वह कभी वीरान न हो, उसमें से हमेशा नग़मे की सदाएँ बुलन्द हों, और आफ़ताब की किरणें हमेशा उस पर चमकती रहें।

[ सातों भाई गाते हुए मैदान में जाते हैं। ] / जय भारत, जय भारत, जय मम प्राणपते! / भाल विशाल चमत्कृत सित हिमगिरि राजै, / परसत बाल प्रभाकर हेम प्रभा ब्राजै। जय भारत.... / ऋषि-मुनि पुण्य तपोनिधि तेज-पुंजधारी, / सब विधि अधम अविद्या भव-मय-तमहारी। जय भारत.... / जय जय वेद चतुर्मुख अखिल भेद-ज्ञाता , / सुविमल शांति सुधा-निधि मुद-मंगलदाता। जय भारत....

जय जय विश्व-विदांवर जय विश्रुतनामी, / जय जय धर्म-धुरंधर जय श्रुति-पथगामी। जय भारत.... / अजित अजेय अलौकिक अतुलित बलधामा , / पूरन प्रम-पयोनिधि शुभ गुन-गन-ग्रामा। जय भारत.... / हे प्रिय पूज्य परम मन नमो-नमो देवा , / बिनवत अधम पापि जन ग्रहन करहु सेवा। जय भारत....

अब्बास---ग़जब के जाँबाज हैं। अब मुझ पर यह हक़ीक़त खुली कि इस्लाम के दायरे के बाहर भी इस्लाम है। ये सचमुच मुसलमान हैं, और रसूल पाक ऐसे आदमियों की शफ़ाअत न करें, मुमकिन नहीं।

हुसैन---कितनी दिलेरी से लड़ रहे हैं!

अब्बास---फौज में बेखौफ घुसे जाते हैं। ऐसी बेजिगरी से किसी को मौत के मुँह में जाते नहीं देखा।

अली अकबर---ऐसे पाँच सौ आदमी भी हमारे साथ होते, तो मैदान हमारा था।

हुसैन---आह! वह साहसराय घोड़े से गिरे। मक्कार शिमर ने पीछे से वार किया। इस्लाम को बदनाम करनेवाला, मूज़ी!

अब्बास---वह दूसरा भाई भी गिरा।

हुसैन---इनके रिवाज के मुताबिक लाशों को जलाना होगा। चिता तैयार कराओ।

अली अक०---तीसरा भाई भी मारा गया।

अब्बास---जालिमों ने चारों तरफ़ से घेर लिया, मगर किस ग़ज़ब के तीरन्दाज़ हैं। तीर से शोला-सा निकलता है।

अली अक०---अल्लाह, उनके तीरों से भाग निकल रही है। कोहराम मच गया, साही जमैयत परेशान होकर भागी जा रही है।

अब्बास---चारों सूरमा दुश्मन के ख़ेम़ो की तरफ़ जा रहे हैं। फौज़ काई की तरह फटती जाती है। वह ख़ेमों से शोले निकलने लगे!

अली अक०---या खुदा, चारों देखते-देखते ग़ायब हो गये।

हुसैन---शायद उनके सामने कोई खंदक खोदी गयी है।

अब्बास---जी हाँ, यही मेरा भी ख़याल है।

हुसैन---चिताएँ तैयार कराओ। अगर फ़रेब न किया जाता, तो ये सारी फौज को खाक कर देते। तीर हैं या मोजज़ा।

अब्बास---ख़ुदा के ऐसे बन्दे भी हैं, जो बिला ग़रज़ हक़ पर सिर कटाते हैं।

हुसैन---ये उस पाक मुल्क के रहनेवाले हैं, जहाँ सबसे पहले तौहीद की सदा उठी थी! खुदा से मेरी दुआ है कि इन्हें शहीदों में ऊँचा रुतबा दे। वह चिता में शोले उठे! ऐ खुदा, यह सोज़ इस्लाम के दिल से कभी न मिटे, इस क़ौम के लिए हमारे दिलेर हमेशा अपना खून बहाते रहें, यह बीज, जो आज आग में बोया गया है, कयामत तक फलता रहे।

चौथा दृश्य

[ जैनब अपने ख़ेमे में बैठी हुई है। शाम का वक़्त। ]

जैनब---(स्वगत) अब्बास और अली अकबर के सिवा अब भैया के कोई रफ़ीक़ बानी नहीं रहा। सब लोग उन पर निसार हो गये। हाय, कासिम-सा जवान, मुस्लिम के बेटे, अब्बास के भाई, भैया इमाम हसन के चारों बेटे, सब दाग़ दिये गये। देखते-देखते हरा-भरा बाग़ वीरान हो गया, गुलज़ार बस्ती उजड़ गयी। सभी माताओं के कलेजे ठंडे हुए। बापों के दिल

बाग़-बाग़ हुए। मैं ही बदनसीब नामुराद रह गयी। खुदा ने मुझे भी दो बेटे दिये हैं, पर जब वे काम ही न आये, तो उनको देखकर जिगर क्या ठंडा हो। इससे तो यही बेहतर होता कि मैं बाँझ ही रहती। तब यह बेवफ़ाई का दाग़ तो माथे पर न लगता। हुसैन ने इन लड़कों को अपने लड़के की तरह समझा, लड़कों को तरह पाला, पर वे इस मुसीबत में, तारीकी में, साए की तरह साथ छोड़े देते हैं, दग़ा कर रहे हैं। हाँ, यह दग़ा नहीं तो और क्या है? आखिर भैया अपने दिल में क्या समझ रहे होंगे। कहीं यह ख़याल न करते हों कि मैंने ही उन्हें मैदान में जाने से मना कर दिया है। यह ख़याल न पैदा हो कि मैं उनके साथ अपनी ग़रज़ निकालने के लिए ज़मानासाज़ी कर रही थी। आह! उन्हें क्योंकर अपना दिल खोलकर दिखा दूँ कि वह उनके लिए कितना बेकरार है। पर अपने लड़कों पर क़ाबू नहीं। जाओ, जैसे तुमने मेरे मुँह में कालिख लगायी है, मैं भी तुम्हें दूध न बख्शूँगी। ये इतने कमहिम्मत कैसे हो गये? जिनका नाना रण में तूफ़ान पैदा कर देता था, जिनके बाप की ललकार सुनकर दुश्मनों के कलेजे दहल जाते थे, वे ही लड़के इतने बोदे, पस्तहिम्मत हों। यह मेरी तक़दीर की ख़राबी है, और क्या! जब रण में जाना ही नहीं, तो वे हथियार से सजकर क्यों मुझे जलाते हैं। भैया को कौन मुँह दिखाऊँगी, उनके सामने आँखें कैसे उठाऊँगी!

[ दोनो लड़कों का प्रवेश। ]

औम---अम्माजान, आप हमारा फ़ैसला कर दीजिए। मैं पहले रण में जाता हूँ, पर यह मुझे जाने नहीं देता, कहता है, पहले मैं जाऊँगा। सुबह से यही बहस छिड़ी हुई है, किसी तरह छोड़ता ही नहीं। बताओ, बड़े भाई के होते हुए छोटा भाई शहीद हो, यह कहाँ का इन्साफ़ है?

मुहम्मद---तो अम्माजान, यह कहाँ का इन्साफ़ है कि बड़ा भाई तो मरने जाय, और छोटा भाई बैठे उसकी लाश पर मातम करे। अम्मा, आप चाहे खुश हों या नाराज़, यह तो मुझसे न होगा। शायद इनका यह ख्याल हो कि मैं जंग के क़ाबिल नहीं हूँ। छोटा हूँ, क्या जवाब दूँ, लेकिन खुदा चाहेगा, तो----

एक हमले में गर हम न उलट दें सफ़े-लश्कर, / फिर दूध न अपना हमें तुम बख़्शयो मादर! / शह के क़दमे-पाक पै सिर देके फिरेंगे, / या रण से सिरे शिम्रोउमर लेके फिरेंगे।

अम्माजान, आप न मेरी खातिर कीजिए न इनकी, इन्साफ़ से फ़रमाइए, पहले किसको जाने का हक है?

जैनब---अच्छा, तुम लोगों के रण में न जाने का यह मतलब था! मैं कुछ और समझ रही थी। प्यारो, तुम्हारी माँ ने तुम्हारी दिलेरी पर शक किया, इसे माफ करो। मालूम नहीं, मुझे क्या हो गया था कि मेरे दिल में तुम्हारी तरफ़ से ऐसे बसबसे पैदा हुए। लो, मैं झगड़ा चुकाये देती हूँ। तुम दोनों खुदा का नाम लेकर साथ-साथ सिधारो, और दिखा दो कि तुम किसी से शब्बीर की उलफ़त में कम नहीं हो। मेरी और मेरे ख़ानदान की आबरू तुम्हारे हाथ है।

शेरों के लिए नंग है तलवार से डरना, / मैदान में तन-तनके सिपर सीनों को करना। / हर ज़ख़्म पै दम उलफ़ते-शब्बीर का भरना, / क़ुरबान गयी जीने से, बेहतर है यह मरना। / दुनिया में भला इज़्ज़ते-इस्लाम तो रह जाय, / तुम जीते रहो, या न रहो, नाम तो रह जाय। / नाना की तरह कौन बग़ा करता है देखूँ? / सिर कौन हज़ारों के जुदा करता है देखूँ? / हक़ कौन बहुत माँ का अदा करता है देखूँ! / एक-एक सफ़े-जंग में क्या करता है देखूँ? / दिखलाइयो हाथों से सफ़ाई का तमाशा, / मैं परदे से देखूँगी लड़ाई का तमाशा।

यह तो मैं जानती हूँ कि तुम नाम करोगे, पर कमसिन बहुत हो, इसलिए समझाती हूँ। जाओ, तुम्हें खुदा को सौंपा।

[ दोनो मैदान की तरफ़ जाकर लड़ते हैं, और जैनब परदे की आड़ से देखती है। शहरबानू का प्रवेश। ]

शहरबानू---है-है, बहन, यह तुमने क्या सितम किया?इन नन्हें-नन्हें बच्चों को रण में झोंक दिया। अभी तो अली अकबर बैठा ही हुआ है, अब्बास मौजूद ही है, ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी?

जैनब---वे किसी के रोके रुकते थे? कल ही से हथियार सजे मुंतज़िर बैठे थे। रात-भर तलवारें साफ की गयी हैं। और, यहाँ आये ही किस लिए थे। ज़िन्दगी बाक़ी है, तो दोनो फिर आयेंगे। मर जाने का ग़म नहीं, अाखिर किस दिन काम आते। जिहाद में छोटे-बड़े की तमीज़ नहीं रहती। मैं रसूल पाक को कौन मुँह दिखाती?

शहरबानू---देखो, हाय-हाय, दोनो को दुश्मनों ने किस तरह घेर रखा है। कोई जाकर बेचारों को फेर भी नहीं लेता। शब्बीर भी बैठे तमाशा देख रहे हैं, यह नहीं कि किसी को भेज दूँ। हैं तो ज़रा-ज़रा से, पर कैसे मछलियों की तरह चमकते फिरते हैं! खैर, अच्छा हुआ, अब्बास दौड़े जा रहे हैं।

[ अब्बास का मैदान की तरफ़ दौड़े हुए आना। ]

जैनब---( खेमे से निकलकर ) अब्बास, तुम्हें रसूल पाक की क़सम है, जो उन्हें लौटाने जाअो। हाँ, उनका दिल बढ़ाते जाओ। क्या मुझे शहादत के सवाब में कुछ भी देने का इरादा नहीं है? भैया तो इतने खुदग़रज़ कभी न थे!

[ दोनों भाई मारे जाते हैं। हुसैन और अब्बास उनकी लाश उठाने जाते हैं, और जैनब एक आह भरकर बेहोश हो जाती। ]

पाँचवाँ दृश्य

[ १२ बजे रात का समय। लड़ाई ज़रा देर के लिए बन्द है। दुश्मन की फ़ौज गाफ़िल है। दरिया का किनारा। अब्बास हाथों में मशक लिये दरिया के किनारे खड़े हैं। ]

अब्बास---( दिल में ) हम दरिया से इतने क़रीब हैं। इतनी ही दूर पर यह दरिया मौज़े मार रहा है, पर हम पानी के एक-एक बूँद को तरसते हैं। दो दिन से किसी के मुँह में पानी का क़तरा नहीं गया, बच्चे वगैरह पानी के लिए बिलबिला रहे हैं, औरतों के लब खुश्क हुए जाते हैं, खुद हज़रत हुसैन का बुरा हाल हो रहा है। मगर कोई अपनी तकलीफ़ किसी से नहीं कहता। बेचारी सकीना तड़प रही थी। काश ये ज़ालिम इसी तरह ग़ाफ़िल पड़े रहते, और मैं मशक लिये हुए बचकर निकल जाता! जी चाहता है, दरिया-का-दरिया पी जाऊँ, पर गैरत गवारा नहीं करती कि घर के सब आदमी तो प्यासों मर रहे हों, और मैं यहाँ अपनी प्यास बुझाऊँ। घोड़े ने भी पानी में मुँह नहीं डाला। वफ़ादार जानवर! तू हैवान होकर इतना गैरतमंद है, मैं इन्सान, होकर बेग़ैरत हो जाऊँ।

[ दरिया से पानी लेकर घाट पर चढ़ते हैं। ]

एक सिपाही---यह कौन पानी लिये जाता है?

अब्बास---( ख़ामोश )

कई आदमी---क्या कोई पानी ले रहा है? कौन है? खड़ा रह।

[ कई सिपाही अब्बास को घेर लेते हैं। ]

एक---यह तो हुसैन के लश्कर का आदमी है---क्यों जी, तुम्हारा क्या नाम है?

अब्बास---मैं हज़रत हुसैन का भाई अब्बास हूँ।

कई आदमी---छीन लो मशक।

अब्बास---इतना आसान न समझा। एक-एक बूँद पानी के लिए एक-एक सिर देना पड़ेगा। पानी इतना महँगा कभी न बिका होगा।

[ अब्बास तलवार खींचकर। दुश्मनों पर झपट पड़ते हैं, और उनके घेरे से निकाल जाने की कोशिश करते हैं। शिमर दौड़ा हुआ आता है। ]

शिमर---ख़बरदार, ख़बरदार, चारों तरफ से घेर लो, मशक में नेज़े मारो, मशक में।

अब्बास---अरे ज़ालिम, बेदर्द! तू मुसलमान होकर नबी की औलाद पर इतनी सख्तियाँ कर रहा है। बच्चे प्यासों तड़प रहे हैं, हज़रत हुसैन का बुरा हाल हो रहा है, अोर तुझे ज़रा भी दर्द नहीं आता।

शिमर---खलीफ़ा से बगावत करनेवाला मुसलमान मुसलमान नहीं, और न उसके साथ कोई रियायत की जा सकती है। दिलेरो, बस जंग का इसी दम खातमा है। अब्बास का लिया, फिर वहाँ हुसैन के सिवा और कोई बाकी न रहेगा।

[ सिपाही अब्बास पर नेज़े चलाते हैं, और अब्बास नेज़ों को तलवार से काट देते हैं। साद का प्रवेश। ]

साद---ठहरो-ठहरो! दुश्मन को दोस्त बना लेने में जितना फ़ायदा है, उतना कत्ल करने में नहीं। अब्बास, मैं आपसे कुछ अर्ज़ करना चाहता हूँ। एक दम के लिए तलवार रोक दीजिए। तनी हुई तलवार मसालहत की ज़बान बन्द कर देती है।

अब्बास---मसालहत की गुफ़्तगू अगर करनी है, तो हज़रत हुसैन के पास क्यों नहीं जाते। हालाँकि अब वह कुछ न सुनेंगे। दो भाँजे, दो भतीजे मारे जा चुके, कितने ही अहबाब शहीद हो चुके, वह खुद ज़िन्दगी से बेज़ार हैं, मरने पर कमर बाँध चुके हैं।

साद---तो ऐसी हालत में आपको अपनी जान की और भी क़द्र करनी चाहिए। दुनिया मे अली की कोई निशानी तो रहे। ख़ानदान का नाम तो न मिटे।

अब्बास---भाई के बाद जीना बेकार है।

साद---

माबेन लहद साथ बिरादर नहीं जाता, / भाई कोई भाई के लिए मर नहीं जाता।

अब्बास---

भाई के लिए जी से गुज़र जाता है भाई, / जाता है बिरादर भी, जिधर जाता है भाई। / क्या भाई हो तेग़ों में, तो डर जाता है भाई? / आँच पाती है भाई पै, तो मर जाता है भाई।

साद---आपसे तो खलीफा को कोई दुश्मनी नहीं, आप उनकी बैयत कबूल कर लें, तो आपकी हर तरह भलाई होगी। आप जो रुतबा चाहेंगे, वह आपको मिल जायगा, और आप हज़रत अली के जाँनशीन समझे जायँगे।

अब्बास---जब हुसैन-जैसे सुलहपसन्द आदमी ने---जिसने कभी ग़ुस्से को पास नहीं आने दिया, जिसने जंग पर कभी सबक़त नहीं की, जिसने आज भी मुझसे ताकीद कर दी कि राह न मिले, तो दरिया पर न जाना---तुम्हारी बात नहीं मानी, तो मैं, जो इन औसाफ़ में से एक भी नहीं रखता, क्योंकर तुम्हारी बातें मानूँगा।

साद---तुम्हें अख्तियार है।

शिमर---टूट पड़ो, टूट पड़ो!

[ एक सिपाही पीछे से आकर एक तलवार मारता है, जिससे अब्बास का दाहिना हाथ कट जाता है अब्बास बाये हाथ में तलवार ले लेते हैं। ]

शिमर---अभी एक हाथ बाकी है, जा उसे गिरा दे, उसे एक लाख दीनार इनाम मिलेगा।

[ चारो तरफ़ से ज़ख्मी सिपाहियों की आहें सुनायी दे रही हैं। अब्बास सफ़ों को चीरते, सिपाहियों को गिराते हुसैन के खेमे के सामने पहुँच जाते हैं। इतने में एक सिपाही तलवार से उनका बायाँ हाथ भी गिरा देता है। शिमर उनकी छाती में भाला चुभा देता है। अब्बास मशक को दाँतों से पकड़ लेते हैं। तब सिर पर एक गुर्ज पड़ता है, और अब्बास घोड़े से गिर पड़ते हैं। ]

अब्बास---(चिल्लाकर) भैया, तुम्हारा ग़ुलाम अब जाता है---उसका आखिरी सलाम क़बूल करो।

[ हुसैन खेमे से बाहर निकल दौड़ते हुए आते हैं, और अब्बास के पास पहुँचकर उन्हें गोद में उठा लेते हैं। ]

हुसैन---आह! मेरे प्यारे भाई, मेरे क़बूते-बाज़, तुम्हारी मौत ने कमर तोड़ दी। हाय! अब कोई सहारा नहीं रहा। तुम्हें अपने पहलू में देखते हुए मुझे वह भरोसा होता था, जो बच्चे को अपनी माँ की गोद में होता है। तुम मेरे पुश्तेपनाह थे। हाय! अब किसे देखकर दिल को ढाढ़स होगा। आह! अगर तुम्हें इतनी जल्द रुख़सत होना था, तो पहले मुझी को क्यों न मर जाने दिया? आह! अब तक मैंने तुम्हें इस तरह बचाया था, जैसे कोई आँधी में चिराग़ को बचाता है। पर क़ज़ा से कुछ बस न चला। हाय! मैं खुद क्यों न पानी लेने गया? हाय, अब खैर, भैया, इतनी तस्कीन है कि फिर हमसे-तुमसे जल्द मुलाक़ात होगी, और फिर हम क़यामत तक न जुदा होंगे।

छठा दृश्य

[ दोपहर का समय। हुसैन अपने खेमे में खड़े हैं, जैनब, कुलसूम, सकीना, शहरबानू, सब उन्हें घेरे हुए हैं। ]

हुसैन---जैनब, अब्बास के बाद अली अकबर से दिल को तस्कीन देता था। अब किसे देखकर दिल को ढाढस दूँ? हाय! मेरा जवान बेटा प्यासों तड़प-तड़पकर मर गया! किस शान से मैदान की तरफ़ गया था। कितना हँसमुख, कितना हिम्मत का धनी! जैनब, मैंने उसे कभी उदास नहीं देखा, हमेशा मुस्कराता रहता था। ऐ आँखो! अगर रोयीं, तो तुम्हें निकालकर फेक दूँगा। खुदा की मर्ज़ी में रोना कैसा। मालूम होता है, सारी क़ुदरत मुझे तबाह करने पर तुली हुई है। यह धूप कि उसकी तरफ़ ताकने ही से आँखें जलने लगती हैं। यह जलता हुअा बालू, ये लू के झुलसानेवाले झोंके, और यह प्यास! यों ज़िन्दा जलना तीरों और भालों के ज़ख़्मों से कहीं ज्यादा सख़्त है।

[ अली असगर अाता है, और बेहोश होकर गिर पड़ता है। ]

शहरबानू---हाय, मेरे बच्चे को क्या हुअा!

हुसैन---( असग़र को गोद में उठाकर ) आह! यह फूल पानी के बग़ैर मुरझाया जा रहा है। खुदा, इस रंज में अगर मेरी ज़बान से तेरी शान में कोई बेअदबी हो जाय, तो माफ़ कीजियो, मैं अपने होश में नहीं हूँ। एक कटोरे पानी के लिए इस वक्त मैं जन्नत से हाथ धोने को तैयार हूँ। ( असग़र को गोद में लिये खेमे से बाहर आकर ) ऐ ज़ालिम क़ौ, अगर तुम्हारे ख़याल में मैं गुनहगार हूँ, तो इस बच्चे ने तो कोई ख़ता नहीं की है, इसे एक घूँट पानी पिला दो। मैं तुम्हारे नबी का नेवासा हूँ, अगर इसमें तुम्हें शक है, तो काबा का बेकस मुसाफ़िर तो हूँ। इसमें भी अगर तुम्हें ताम्मुल हो, तो मुसलमान तो हूँ। यह भी नहीं, तो अल्लाह का एक नाचीज़ बंदा तो हूँ। क्या मेरे मरते हुए बच्चे पर तुम्हें इतना रहम भी नहीं आता?

मैं यह नहीं कहता हूँ कि पानी मुझे ला दो, / तुम आनके चिल्लू से इसे आब पिला दो। / मरता है यह मरते हुए बच्चे को जिला दो, / लिल्लाह, कलेजे की मेरी आग बुझा दो। / जब मुँह मेरा तकता है यह हसरत की नज़र से, / ऐ ज़ालिमो, उठता है धुआँ मेरे ज़िगर से।

[ शिमर एक तीर मारता है, जो असग़र के गले को छेदता हुआ हुसैन के बाजू में चुभ जाता है। हुसैन जल्दी से तीर को निकालते हैं, और तीर निकलते ही असग़र की जान निकल जाती है। हुसैन असग़र को लिये फिर खेमे में आते हैं। ]

शहरबानू---हाय मेरा फूल-सा बच्चा!

हुसैन---हमेशा के लिए इसकी प्यास बुझ गयी। ( ख़ून से चिल्लू भरकर आसमान की तरफ़ उछालते हुए ) इन सब आफ़तों का गवाह खुदा है। अब कौन है, जो ज़ालिमों से इस ख़ून का बदला ले?

[ सज्जाद चारपाई से उठकर, लड़खड़ाते हुए, मैदान की तरफ़ चलते हैं। ]

जैनब---अरे बेटा, तुममें तो खड़े होने की भी ताब नहीं, महीनों से आँखें नहीं खोलीं, तुम कहाँ जाते हो?

सज्जाद---बिस्तर पर मरने से मैदान में मरना अच्छा है। जब सब जन्नत पहुँच चुके, तो मैं यहाँ क्यों पड़ा रहूँ?

हुसैन-बेटा, खुदा के लिए बाप के ऊपर रहम करो, वापस आओ। रसूल की तुम्ही एक निशानी हो। तुम्हारे ही ऊपर औरतों की हिफ़ाज़त का बार है। आह! और कौन है, जो इस फ़र्ज़ को अदा करे! तुम्हीं मेरे जाँनशीन हो, इन सबको तुम्हारे हवाले करता हूँ। खुदा हाफ़िज़! ऐ जैनब, ऐ कुलसुम, ऐ सकीना, तुम लोगों पर मेरा सलाम हो कि यह आख़िरी मुलाकात है।

[ जैनब रोती हुई हुसैन से लिपट जाती है। ]

सकीना---अब किसका मुँह देखकर जिऊँगी?

हुसैन---जैनब!

मरकर भी न भूलूँगा मैं एहसान तुम्हारे; / बेटों को भला कौन बहन भाई पै वारे। / प्यार न किया उनको, जो थे जान से प्यारे, / बस, मा की मुहब्बत के ये अंदाज़ हैं सारे। / फ़ाके में हमें बर्छियाँ खाने की रज़ा दो।; / बस, अब यही उल्फ़त है कि जाने की रज़ा दो।

हमशीर का ग़म है किसी भाई को गवारा? / मजबूर है, लेकिन असद अल्लाह का प्यारा। / रंज और मुसीबत से कलेजा है दो पारा; / किससे कहूँ, जैसा मुझे सदमा है तुम्हारा। / इस घर की तबाही के लिए रोता है शब्बीर; / तुम छुटती नहीं मा से जुदा होता है शब्बीर।

[ हाथ उठाकर दुआ करते हैं। ]

या रब, है यह सादात का घर तेरे हवाले; / राँड़ हैं कई ख़स्ता जिगर तेरे हवाले। / बेकस का है बीमार, पिसर तेरे हवाले; / सब हैं मेरे दरिया के गुहर तेरे हवाले।

[ मैदान की तरफ़ जाते हैं। ]

शिमर---( फौज से ) खबरदार, खबरदार, हुसैन आये। सब-के-सब सँभल जाओ, और समझ लो, अब मैदान तुम्हारा है।

[ हुसैन फ़ौज के सामने खड़े होकर कहते हैं: ] / बेटा हूँ अली का व नेवासा रसूल का। / मा ऐसी कि सब जिसकी शफ़ाअत के हैं मुहताज, / बाप ऐसा, सनमख़ानों को जिसने किया ताराज। बेटा हूँ.... / लड़ने को अगर हैदर सफ़दर न निकलते, / बुत घर से खुदा के कभी बाहर न निकलते। बेटा हूँ.... / किस ज़ंग में सीने को सिपर करके न आये? / किस फ़ौज की सफ़ ज़ेर व जबर करके न आये? बेटा हूँ... / हम पाक न करते, तो जहाँ पाक न होता, / कुछ खाक की दुनिया में सिवा खाक न होता। बेटा हूँ.... / यह शोर अज़ाँ का सहरोशाम कहाँ था? / हम अर्श पै जब थे, तो यह इस्लाम कहाँ था? बेटा हूँ.... / लाज़िम है कि सादात की इमदाद करो तुम, / ऐ ज़ालिमो, इस घर को न बरबाद करो तुम! बेटा हूँ ...

[ फौज पर टूट पड़ते हैं। ]

शिमर---अरे नामर्दो, क्यों भागे जाते हो, कोई शेर नहीं है, जो सबको खा जायगा।

एक सिपाही---ज़रा सामने आकर देखो, तो मालूम हो। पीछे खड़े-खड़े क्या बहादुरी बघारते हो?

दूसरा---अरे, फिर इधर आ रहे हैं! ख़ुदा, बचाना।

तीसरा---उन पर तलवार चलाने को तो हाथ ही नहीं उठते। उनकी सूरत देखते ही कलेजा थर्रा जाता है।

चौथा---मैं तो हवा में तीर छोडता हूँ, कौन जाने, कहीं मेरे ही तीर से। शहीद हो जायँ तो आक़बत में कौन मुँह दिखाऊँगा।

पाँचवाँ---मैं भी हवा ही में छोड़ता हूँ।

शिमर---तुफ़् है तुम पर, डूब मरो नामर्दो घेरकर नेज़ों से क्यों नहीं वार करते?

साद---( शिमर से ) हमारे लिए उन्हें घेरना उतना ही मुश्किल है, जितना चूहों के लिए बिल्ली का। उनके सामने कौन है, जिसके क़दम रुकें? वह यों ही कल करते-करते खुद प्यास और थकान से बेदम हो जायँगे।

शिमर---( तीर चलाकर ) क्यों भागते हो? क्यों अपने मुँह में कालिख लगाते हो? दुनिया क्या कहेगी, इसकी भी तुम्हें शर्म नहीं?

कीस---सारी फ़ौज दहल गयी, उसको खड़ा रखना मुश्किल है।

शीस---अली के सिवा और किसी का यह दम-ख़म नहीं देखा।

शिमर---( तीर चलाकर ) सफ़ों को खूब फैला दी, ताकि दौड़ते-दौड़ते गिर पड़ें।

हुसैन--–साद और शिमर, मैं तुम्हें फिर मौक़ा देता हूँ, मुझे लौट जाने दो, क्यों इन ग़रीबों की जान के दुश्मन हो रहे हो? तुम्हारा मैदान खाली हो गया। तुम्हीं सामने आ जाओ, जंग का फ़ैसला हो जाय।

साद---शिमर, जाते हो?

शिमर---क्यों न जाऊँगा, यहाँ जान देने नहीं आया हूँ।

साद---मैं जाऊँ भी तो लड़ नहीं सकता।

[ हुसैन दरिया की तरफ़ जाते हैं। ]

शिमर---अब और भी ग़ज़ब हो गया, पानी पीकर लौटे, तो ख़ुदा जाने, क्या करेंगे। हज्जाज को ताकीद करनी चाहिए कि दरिया का रास्ता न दे। ( हज्जाज को बुलाकर ) हज्जाज, हुसैन को हर्गिज़ दरिया की तरफ़ न जाने देना।

हज्जाज---( स्वगत ) यह अज़ाब क्यों अपने सिर लूँ। मुझे भी तो रसूल से क़यामत में काम पड़ेगा ( प्रकट ) जी हाँ, आदमियों को जमा कर रहा हूँ।

[ हुसैन घोड़े की बाग ढीली कर देते हैं, पर वह पानी की तरफ़ गर्दन नहीं बढ़ाता, मुँह फेरकर हुसैन की रकाब को खींचता है। ]

हुसैन---आह! मेरे प्यारे बेज़बान दोस्त! तू हैवान होकर अाक़ा का इतना लिहाज़ करता है, ये इन्सान होकर अपने रसूल के बेटे के ख़ून के प्यासे हो रहे हैं। मैं तब तक पानी न पिऊँगा, जब तक तू न पियेगा ( पानी पीना चाहते हैं )।

हज्जाज---हुसैन, तुम यहाँ पानी पी रहे हो, और लश्कर खेमों में घुसी जाती है।

हुसैन---तू सच कहता है?

हज्जाज---यकीन न आये, तो जाकर देख आओ।

हुसैन--–( स्वगत ) इस बेकली की हालत में कोई मुझसे दग़ा नहीं कर सकता। मरते हुए आदमी से दग़ा करके कोई क्यों अपनी इज़्ज़त से हाथ धोयेगा। ( घोड़े को फेर देते हैं और दौड़ाते हुए खेमे की तरफ़ आते हैं ) ओह! इन्सान उससे कहीं ज़्यादा कमीना और कोरबातिन है, जितना मैं समझता था। इस आख़िरी वक्त में मुझसे दग़ा की, और महज़ इसलिए कि मैं पानी न पी सकूँ।

[ फिर मैदान में आकर लश्कर पर टूट पड़ते हैं, सिपाही इधर-उधर भागने लगते हैं। ]

शिमर---( तीर चलाकर ) तुम मेरे ही हाथों मरोगे।

[ तीर हुसैन के मुँह में लगता है, और वह घोड़े से गिर पड़ते हैं। ] फिर सँभलकर उठते हैं, और तलवार चलाने लगते हैं।]

साद—शिमर, तुम्हारे सिपाही हुसैन के खेमों की तरफ जा रहे हैं, यह मुनासिब नहीं है।

शिमर—औरतों की हिफाजत करना हमारा काम नहीं है ।

हुसैन—(दाढ़ी से वन पोंछते हुए) साद, अगर तुम्हें दोन का खौफ.नहीं है, तो इन्सान ता हो, तुम्हारे भी तो बाल-बच्चे हैं । इन बदमाशों को मेरे खेमों में आने से क्यों नहीं रोकते ?

साद—आपके खेमों मे कोई न जा सकेगा, जब तक मैं ज़िन्दा हूँ ।

[खेमों के सामने जाकर खड़ा हो जाता है। ]

जैनब—( बाहर निकलकर ) क्यों साद ! हुसैन इस बेकसी से मारेजायँ, और तुम खड़े देखते रहो ? माल और दुनिया तुम्हें इतनी प्यारी है ?

[साद मुँह फेरकर रोने लगता है। ]

शिमर—तुफ है तुम पर ऐ जवानी ! एक प्यादा भी तुमसे नहीं मारा जाता ! तुम अब नाहक डरते हो । हुसैन में अब जान नहीं है, उनके हाथ नहीं उठते, पैर थर्रा रहे हैं, आँखें झपकी जाती हैं, फिर भी तुम उनको शेर समझ रहे हो।

हुसैन—(दिल में ) मालूम नहीं, मैंने कितने श्रादमियों को मारा, और अब भी मार सकता हूँ, पर हैं तो ये मेरे नाना ही की उम्मत, हैं तो सब मुसलमान, फिर इन्हें मारूँ, तो किस लिए ? अब कोन है, जिस के लिए ज़िन्दा रहूँ ? हाय, अकबर ! किससे कहें, जो खूने जिगर हमने पिया है, बाद ऐसे पिसर के भी कहीं बाप जिया है । हाय अब्बास !

खुश हूँगा मैं, आगे जो अलम लेके बढ़ोगे। / क्या भाई के पीछे न नमाज़ आज पढ़ोगे?

लड़ते-लड़ते शाम हो गयी, हाथ नहीं उठते। आखिरी नमाज़ पढ़ लूँ। काश नमाज़ पढ़ते हुए सिर कट जाता, तो कितना अच्छा होता!

[ हुसैन नमाज़ में झुक जाते हैं, असअस पीछे से आकर उनके कंधे पर तलवार मारता है। क़ीस दूसरे कंधे पर तलवार चलाता है। हुसैन उठते हैं, फिर गिर पड़ते हैं, फ़ौज़ में सन्नाटा छा जाता है। सब-के-सब अाकर उन्हें घेर लेते हैं। ]

शिमर---ख़लीफ़ा यज़ीद ने हुसैन का सिर माँगा था, कौन यह फ़ख़ हासिल करना चाहता है।

[ एक सिपाही आगे बढ़कर तलवार चलाता है। मुस्लिम को छोटी लड़की दौड़ी हुई ख़ेमे से आती है; और हुसैन की पीठ पर हाथ रख देती है। ]

नसीमा---ओ ख़बीस, क्या तू मेरे चाचा को कत्ल करेगा?

[ तलवार नसीमा के दोनों हाथों पर पड़ती है, और हाथ कट जाते हैं। शीस तलवार लेकर आगे बढ़ता है, हुसैन का मुँह देखते ही तलवार उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है। ]

शिमर---क्यों, तलवार क्यों डाल दी?

शीस---उन्होंने जब आँखें खोल कर मुझे देखा, तो मालूम हुआ कि रसूल की आँखें है। मेरे होश उड़ गये।

क़ीस---मैं जाता हूँ।

[ तलवार लेकर जाता है, तलवार हाथ से गिर पड़ती है, और उल्टे कदम काँपता हुआ लौट आता है। ]

शिमर---क्यों, तुम्हें क्या हो गया?

क़ीस---यह हुसैन नहीं, खुद रसूल पाक हैं। रोब से मेरे होश ग़ायब हो गये। या ख़ुदा, जहन्नुम की अाग में न डालियो।

शिमर—इनकी मौत मेरे हाथों लिखी हुई है । तुम सब दिल दे कच्चे हो।

[तलवार लेकर हुसैन के सीने पर चढ़ बैठता है।]

हुसैन—(-आँखें खोलते हैं, और उसकी तरफ़ ताकते हैं।)

शिमर—मैं उन बुज़दिलों में नहीं हूँ, जो तुम्हारी निगाहों से दहल उठे थे।

हुसैन—तू कौन है ?

शिमर—मेरा नाम शिमर है ।

हुसैन—मुझे पहचानता है ?

शिमर—खूब पहचानता हूँ, तुम अली और फातिमा के बेटे औ। मुहम्मद के नेवासे हो।

हुसैन—यह जानकर भी तू मुझे कत्ल करता है ?

शिमर—मुझे जन्नत से जागीरें ज्यादा प्यारी हैं।

[तलवार मारता है, हुसैन का सिर जुदा हो जाता है।]

साद—(रोता हुआ ) शिमर, जियाद से कह देना, मुझे 'रे' की जागीर से माफ करें। शायद अब भी नजात हो जाय ।

[अग्ने सीने में नेज़ा चुमा लेता है, और बेजान होकर गिर पड़ता है फौज के कितने ही सिपाही हाथों से मुँह छिपाकर रोने लगते हैं । बमों से रोने की आवाजें आने लगती हैं।]