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कर्बला अध्याय 5 / 7

विषय-सूची

  1. 1 भूमिका
  2. 2 नाटक के पात्र
  3. 3 पहला अंक
  4. 4 दूसरा अंक
  5. 5 तीसरा अंक
  6. 6 चौथा अंक
  7. 7 पाँचवाँ अंक

कर्बला

तीसरा अंक

पहला दृश्य

[ दोपहर का समय। रेगिस्तान में हुसैन के क़ाफ़िले का पड़ाव। बगूले उड़ रहे हैं। हुसैन असगर को गोद में लिये अपने ख़ेमे के द्वार पर खड़े हैं। ]

हुसैन---( मन में ) उफ़ , यह गर्मी। निगाहें जलती हैं। पत्थर की चट्टानों से चिनगारियाँ निकल रही हैं। झीलें, कुएँ, सब सूखे पड़े हुए हैं, गोया इन्हें गर्मी ने जला दिया हो। हवा से बदन झुलसा जाता है। बच्चों के चेहरे कैसे सँवला गये हैं। यह सफ़ेदी, यह रेगिस्तान, इसकी कहीं हद भी है या नहीं! जिन लोगों ने प्यास के मारे होक-होककर पानी पी लिया है, उनके कलेजे में दर्द हो रहा है। अब तक कूफ़ा से कोई क़ासिद नहीं आया। खुदा जाने, मुस्लिम का क्या हाल हुआ। करीने से ऐसा मालूम होता है कि इराकवालों ने उनसे दग़ा की, और उनको शहीद कर दिया, वरना यह ख़ामोशी क्यों? अगर वह जन्नत को सिधारे हैं, तो तेरे लिए भी दूसरा रास्ता नहीं है। शहादत मेरा इन्तज़ार कर रही है। कोई मुझसे मिलने आ रहा है।

[ फ़र्जूक़ का प्रवेश। ]

फ॰---अस्सलामअलेक। या हज़रत हुसैन, मैंने बहुत चाहा कि मक्के ही में आपकी ज़ियारत करूँ, लेकिन अफ़सोस, मेरी कोशिश बेकार हुई।

हुसैन---अगर इराक से आये हो, तो वहाँ की क्या ख़बर है?

फ॰---या हज़रत! वहाँ की ख़बरें वे ही हैं, जो आपको मालूम हैं। लोगों के दिल आपके साथ हैं, क्योंकि आप हक़ पर हैं। और उनकी तलवारें यज़ीद के साथ हैं, क्योंकि उसके पास दौलत है।

हुसैन---और मेरे भाई मुस्लिम की भी कुछ खबर लाये हो?

क॰---उनकी रूह जन्नत में है, और सिर क़िले की दीवार पर।

मातम है कई दिन से मुसलमानों के घर में; / ख़न्दक़ में है लाश उनकी व सिर क़िले की दर में।

हुसैन---( सीने पर हाथ रखकर ) आह! मुस्लिम, वही हुआ, जिसका मुझे खौफ़ था। अब तक तुम्हें कफ़न भी नसीब नहीं हुआ। क्या तुम्हारी नेकनीयती का यही सिला था? अाह! तुम इतने दिनों तक मेरे साथ रहे, पर मैंने तुम्हारी क़द्र न जानी। मैंने तुम्हारे ऊपर जुल्म किया, मैंने जान-बूझकर तुम्हारी जान ली। मेरे अज़ीज़ और दोस्त सब-के-सब मुझे कूफ़ावालों से होशियार कर रहे थे, पर मैंने किसी की न सुनी, और तुम्हें हाथ से खोया। मैं उनके बेटों को और उनकी बीवी को कौन मुँह दिखाऊँगा।

[ मुस्लिम की लड़की फ़ातिमा आती है। ] आओ बेटी, बैठो, मेरी गोद में चली आओ। कुछ खाया कि नहीं?

फ़ातिमा---बुआ ने शहद और रोटी तो दी थी। चचाजान, अब हम लोग कै दिन में अब्बा के पास पहुँचेंगे? पाँच-छह दिन तो हो गये!

हुसैन---( दिल में ) अाह! कलेजा मुँह को आता है। इस सवाल का क्या जवाब दूँ। कैसे कह दूँ कि अब तेरे अब्बा जन्नत में मिलेंगे। (प्रकट) बेटी, खुदा की जब मरज़ी होगी।

अली---अहा! तुम अब्बाजान की गोद में बैठ गयी। उतरिए चटपट।

फ़ातिमा---तुम मेरे अब्बाजान की गोद में बैठोगे, तो मैं भी उतार दूँगी।

हुसैन---बेटी, मैं ही तुम्हारा अब्बाजान हूँ। तुम बैठी रहो। इसे बकने दो।

फ़ातिमा---आप मेरी तरफ़ देखकर आँखों में आँसू क्यों भरे हुए हैं? आप मेरा इतना प्यार क्यों कर रहे हैं? आप यह क्यों कहते हैं कि मैं ही अब्बाजान हूँ? ऐसी बातें तो यतीमों से की जाती हैं।

हुसैन--( रोकर ) बेटी, तेरे अब्बा को ख़ुदा ने बुला लिया।

[ फ़ातिमा रोती हुई अपनी मा के पास जाती है। औरतें रोने लगती हैं। ]

जैनब---( बाहर आकर ) भैया, यह क्या ग़ज़ब हो गया?

हुसैन---बहन, क्या कहूँ, सितम टूट पड़ा। मुस्लिम तो शहीद हो गये। कूफ़ावालों ने दग़ा की।

जैनब---तो ऐसे दग़ाबाजों से मदद की क्या उम्मीद हो सकती है? मैं तुमसे मिन्नत करती हूँ कि यहीं से वापस चलो। कूफ़ावालों ने कभी वफा नहीं की।

[ मुस्लिम के बेटे अब्दुल्ला का प्रवेश। ]

अब्दुल्ला---फूफीजान, अब तो अगर तक़दीर भी रास्ते में खड़ी हो जाय, तो भी मेरे क़दम पीछे न हटेंगे। तुफ़् है मुझ पर, अगर अपने बाप का बदला न लूँ! हाय वह इन्सान, जिसने कभी किसी से बदी नहीं की, जो रहम और मुरौवत का पुतला था, जो दिल का इतना साफ़ था कि उसे किसी पर शुबहा न होता था, इतनी बेदरदी से क़त्ल किया जाय!

[ अब्बास का प्रवेश। ]

अब्बास---बेशक, अब कूफ़ावालों को उनकी दग़ा की सज़ा दिये बगैर लौट जाना ऐसी ज़िल्लत है, जिससे हमारी गर्दन हमेशा झुकी रहेगी। खुदा को जो कुछ मंजूर है, वह होगा। हम सब शहीद हो जायँ, रसूल के खानदान का निशान मिट जाय, पर यहाँ से लौटकर हम दुनिया को अपने ऊपर हँसने का मौक़ा न देंगे। मुझे यकीन है कि यह शरारत कूफ़ा के रईसों और सरदारों की है, जिन्हें ज़ियाद के वादों ने दीवाना बना रखा है। आप जिस वक्त कूफ़ा में कदम रखेंगे, रियाया अपने सरदारों से मुँह फेरकर आपके क़दमों पर झुकेगी। और, वह दिन दूर नहीं, जब यज़ीद का नापाक सिर उसके तन से जुदा होगा। आप ख़ुदा का नाम लेकर ख़ेमे उखड़वाइए। अब देर करने का मौका नहीं है। हक़ के लिए शहीद होना वह मौत है, जिसके लिए फ़रिश्तों की रूहें तड़पती हैं।

जैनब--–भैया, मैं तुझ पर सदक़े। घर वापस चलो।

हुसैन---आह! अब यहाँ से वापस होना मेरे अख्त़ियार की बात नहीं है। मुझे दूर से दुश्मन की फ़ौज का ग़ुबार नज़र आ रहा है। पुश्त की तरफ़ भी दुश्मन ने रास्ता रोक रखा है। दाहने-बायें कोसों तक बस्ती का निशान नहीं। हम अब कूफ़ा के सिवा कहीं नहीं जा सकते। कूफ़ा में हमें तख़्त नसीब हो या तख़्ता, हमारे लिए कोई दूसरा मुक़ाम नहीं है। अब्बास, जाकर मेरे साथियों से कह दो, मैं उन्हें ख़ुशी से इजाज़त देता हूँ, जहाँ जिसका जी चाहे, चला जाय। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। चलो, हम लोग ख़ेमे उखाड़ें।

दूसरा दृश्य

[ सन्ध्या का समय। हुसैन का क़ाफ़िला रेगिस्तान में चला जा रहा है। ]

अब्बास---अल्लाहोअकबर! वह कूफ़ा के दरख़्त नज़र आने लगे।

हबीब---अभी कूफ़ा दूर है। कोई दूसरा गाँव होगा।

अब्बास---रसूल पाक की क़सम, फ़ौज है। भालों की नोंकें साफ़ नज़र आ रही हैं।

हुसैन---हाँ, फ़ौज ही है। दुश्मनों ने कूफ़े से हमारी दावत का यह सामान भेजा है। यहीं, उस टीले के क़रीब, खेमे लगा दो। अजब नहीं कि इसी मैदान में क़िस्मतों का फ़ैसला हो।

[ क़ाफ़िला रुक जाता है। खेमे गड़ने लगते हैं। बेगमें ऊँटों से उतरती हैं। दुश्मन की फ़ौज क़रीब आ जाती है। ]

अब्बास---ख़बरदार, कोई एक क़दम आगे न रखे। यहाँ हज़रत हुसैन के खेमे हैं।

अली अक॰---अभी जाकर इन बेअदबों की तंबीह करता हूँ।

हुसैन---अब्बास, पूछो, ये लोग कौन हैं, और क्या चाहते हैं?

अब्बास---( फौज से ) तुम्हारा सरदार कौन है?

हुर---( सामने आकर ) मेरा नाम हुर है। हज़रत हुसैन का गुलाम हूँ।

अब्बास---दोस्त दुश्मन बनकर आये, तो वह भी दुश्मन है।

हुर---या हज़रत, हाकिम के हुक्म से मजबूर हूँ, बैयत से मजबूर हूँ, नमक की क़ैद से मजबूर हूँ, लेकिन दिल हुसैन ही का ग़ुलाम है।

हुसैन--–( अब्बास से ) भाई, आने दो, इसकी बातों में सचाई की बू अाती है।

हुर---या हज़रत, अापको कूफ़ावालों ने दग़ा दी है!ज़ियाद और यज़ीद दोनो अापको क़त्ल करने की तैयारियाँ कर रहे हैं। चारो तरफ़ से फ़ौजें जमा की जा रही हैं। कूफ़ा के सरदार आपसे जंग करने के लिए तैयार बैठे हैं।

हुसैन---पहले यह बतलाओ कि तुम्हारे सिपाही क्यों इतने निढाल और परेशान हो रहे हैं?

हुर---या हज़रत, क्या अर्ज़ करूँ। तीन पहर से पानी का एक बूँद न मिला। प्यास के मारे सबों के दम लबों पर आ रहे हैं।

हुसैन---( अब्बास से ) भैया, प्यासों की प्यास बुझानी एक सौ नमाजों से ज़्यादा सबाब का काम है। तुम्हारे पास पानी हो, तो इन्हें पिला दो। क्या हुआ, अगर मेरे ये दुश्मन हैं, हैं तो मुसलमान---मेरे नाना के नाम पर मरनेवाले!

अब्बास---या हज़रत, आपके साथ बच्चे हैं, औरतें हैं, और पानी यहाँ उनका है।

हुसैन---इन्हें पानी पिला दो, मेरे बच्चों का ख़ुदा है।

[ अब्बास, अली अकबर, हबीब पानी की मशकें लाकर सिपाहियों को पानी पिलाते हैं। ]

अब्बास---हुर, अब यह बतलाओ कि तुम हमसे सुलह करना चाहते हो या जंग?

हुर---हज़रत, मुझे आपसे न जंग का हुक्म दिया गया है,न सुलह का। मैं सिर्फ इसलिए भेजा गया हूँ कि हज़रत को ज़ियाद के पास ले जाऊँ, और किसी दूसरी तरफ़ न जाने दूँ।

अब्बास---इसके मानी यह हैं कि तुम जंग करना चाहते हो। हम किसी ख़लीफ़ा या आमिल के हुक्म के पाबन्द नहीं हैं कि किसी ख़ास तरफ़ जायँ। मुल्क ख़ुदा का है। हम आज़ादी से जहाँ चाहेंगे, जायँगे। अगर हमको कोई रोकेगा, तो उसे काँटों की तरह रास्ते से हटा देंगे।

हुसैन---नमाज़ का वक्त आ गया। पहले नमाज़ अदा कर लें, उसके बाद और बातें होंगी। हुर, तुम मेरे साथ नमाज़ पढ़ोगे या अपनी फ़ौज के साथ?

हुर---या हज़रत, आपके पीछे खड़े होकर नमाज़ अदा करने का सबाब न छोड़ेंगा, चाहे मेरी फ़ौज मुझसे जुदा क्यों न हो जाय।

तीसरा दृश्य

[ सन्ध्या का समय---नसीमा बगीचे में बैठी आहिस्ता-आहिस्ता गा रही है। ] / दफ़्न करने ले चले थे जब मेरे घर से मुझे, / काश तुम भी झाँक लेते रौज़ने घर से मुझे। / साँस पूरी हो चुकी दुनिया से रुख़सत हो चुका, / तुम अब आये हो उठाने मेरे बिस्तर से मुझे! / क्यों उठाता है मुझे मेरी तमन्ना को निकाल, / तेरे दर तक खींच लायी थी यही घर से मुझे। / हिज्र की शब कुछ यही मूनिस था मेरा ऐ कज़ा- / एक ज़रा रो लेने दे मिल-मिल के बिस्तर से मुझे। / याद है तस्कीन अब तक वह ज़माना याद है, / जब छुड़ाया था फ़लक ने मेरे दिलवर से मुझे। / [ वहब का प्रवेश---नसीमा चुप हो जाती है। ]

वहब---ख़ामोश क्यों हो गयीं? यही सुनकर मैं आया था।

नसीमा---मेरा गाना मेरा ख़याल है, तनहाई का मूनिस। अपना दर्द क्यों सुनाऊँ, जब कोई सुनना न चाहे।

वहब---नसीमा, शिक़वे करने का हक़ मेरा है, तुम इसे ज़बरदस्ती छीन लेती हो।

नसीमा---तुम मेरे हो, तुम्हारा सब-कुछ मेरा है, पर मुझे इसका यक़ीन नहीं आता। मुझे हरदम यही अन्देशा रहता है कि तुम मुझे भूल जाओगे, तुम्हारा दिल मुझसे बेज़ार हो जायगा, मुझसे बेएतनाई करने लगोगे। यह ख़याल दिल से नहीं निकलता। बहुत चाहती हूँ कि निकल जाय, पर वह किसी पानी से भीगी हुई बिल्ली की तरह नहीं निकलता। तब मैं रोने लगती हूँ, और ग़मनाक ख़याल मुझे चारों तरफ से घेर लेते हैं। तुमने न-जाने मुझ पर कौन-सा जादू कर दिया है कि मैं अपनी नहीं रही। मुझे ऐसा गुमान होता है कि हमारी बहार थोड़े ही दिनों की मेहमान है। मैं तुमसे इल्तजा करती हूँ कि मेरी तरफ़ से निगाहें न मोटी करना, वरना मेरा दिल पाश-पाश हो जायगा। मुझे यहाँ आने के पहले कभी न मालूम हुअा था कि मेरा दिल इतना नाज़ुक है।

वहब---मेरी कैफ़ियत इससे ठीक उल्टी है। मेरे दिल में एक नयी क़ूवत आ गयी है, मुझे खयाल होता है कि अब दुनिया की कोई फ़िक्र, कोई तर्ग़ीब, कोई आरजू मेरे दिल पर फ़तह नहीं पा सकती। ऐसी कोई ताकत नहीं है, जिसका मै मुक़ाबला न कर सकूँ। तुमने मेरे दिल की क़ूवत सौगुनी कर दी। यहाँ तक कि अब मुझे मौत का भी ग़म नहीं है। मुहब्बत ने मुझे दिलेर, बेखौफ़, मज़बूत बना दिया है, मुझे तो ऐसा गुमान होता है कि मुहब्बत क़ूवते-दिल की कीमिया है।

नसीमा---वहब, इन बातों से वहशत हो रही है, शायद हमारी तबाही के सामान हो रहे हैं। वहब, मैं तुम्हें न जाने दूँगी, कलाम पाक की क़सम, कहीं न जाने दूँगी। मुझे इसकी फ़िक्र नहीं कि कौन ख़लीफ़ा होता है और कौन अमीर। मुझे माल व जर की, इलाके व जागीर की मुतलक़ परवा नहीं। मैं तुम्हें चाहती हूँ, सिर्फ़ तुम्हें।

[ कमर का प्रवेश। ]

क़मर---वहब, देख, दरवाज़े पर ज़ालिम ज़ियाद के सिपाही क्या ग़ज़ब कर रहे हैं। तेरे वालिद को गिरफ्तार कर लिया है, और जामा मस्जिद की तरफ़ खींचे लिये जाते हैं।

नसीमा---हाय सितम, इसी लिए तो मुझे वहशत हो रही थी।

[ वहब उठ खड़ा होता है। नसीमा उसका हाथ पकड़ लेती है। ]

वहब---नसीमा, मैं अभी लौटा आता हूँ, तुम घबराओ नहीं।

नसीमा---नहीं-नहीं, तुम यहाँ मुझे जिन्दा छोड़कर नहीं जा सकते। मैं ज़ियाद को जानती हूँ, तुमको भी जानती हूँ। ज़ियाद के सामने जाकर फिर तुम नहीं लौट सकते।

क़मर---बेटा, अगर नसीमा तुझे नहीं जाने देती, तो मत जा। मगर याद रख, तेरे चेहरे पर हमेशा के लिए स्याही का दाग़ लग जायगा। ख़ुद जाती हूँ। नसीमा, शायद हमारी-तुम्हारी फिर मुलाक़ात न हो, यह आखिरी मुलाक़ात है। रुख़सत। वहब, घर-बार तुझे सौंपा, खुदा तुझे नेकी की तौफ़ीक़ दे, तेरी उम्र दराज़ हो।

वहब---अम्मा, मैं भी चलता हूँ।

कमर--नहीं, तुझ पर अपनी बीवी का हक़ सबसे ज्यादा है।

वहब---नसीमा, खुदा के लिए....। नसीमा नहीं। मेरे प्यारे आक़ा, मुझे ज़िन्दा छोड़कर नहीं!

[ क़मर चली जाती है। वहब सिर थामकर बैठ जाता है। ]

नसीमा---प्यारे, तुम्हारी मुहब्बत की ख़तावार हूँ, जो सज़ा चाहे दो। मुहब्बत खुदग़रज़ होती है। मैं अपने चमन को हवा के झोकों से बचाना चाहती हूँ। काश तक़दीर ने मुझे इस गुलज़ार में न बिठाया होता, मैंने चमन में अपना घोसला न बनाया होता, तो आज बर्क और सैयाद का इतना खौफ़ क्यों होता! मेरी बदौलत तुम्हें यह नदामत उठानी पड़ी, काश मैं मर जाती!

[ नसीमा वहब के पैरों पर सिर रख देती है। ]

चौथा दृश्य

[ आधी रात का समय। अब्बास हुसैन के ख़ेमे के सामने खड़े पहरा दे रहे हैं। हुर आहिस्ता से आकर ख़ेमे के करीब खड़ा हो जाता है। ]

हुर---( दिल में ) खुदा को क्या मुँह दिखाऊँगा? किस मुँह से रसूल के सामने जाऊँगा? आह गुलामी, तेरा बुरा हो। जिस बुज़ुर्ग ने हमें ईमान की रोशनी दी, खुदा की इबादत सिखायी, इन्सान बनाया, उसी के बेटे से जंग करना मेरे लिए कितनी शर्म की बात है। यह मुझसे न होगा। मैं जानता हूँ, यज़ाद मेरे ख़ून का प्यासा हो जायगा, मेरी जागीरें छीन ली जायँगी, मेरे लड़के रोटियों के मुहूताज़ हो जायँगे, मगर दुनिया खोकर रसूल की निगाह का हक़दार हो जाऊँगा। मुझे न मालूम था कि यज़ीद की बैयत लेकर मैं अपनी आक़बत बिगाड़ने पर मजबूर किया जाऊँगा। अब यह जान हज़रत हुसैन पर निसार है। जो होना है, हो। यज़ीद की खिलाफ़त पर कोई हक़ नहीं। मैंने उसकी बैयत लेने में ख़ास ग़लती की। उसके हुक्म की पाबन्दा मुझ पर फ़र्ज़ नहीं। ख़ुदा के दरबार में मै इसके लिए गुनहगार न ठहरूँगा।

[ आगे बढ़ता है। ]

अब्बास---कौन है? ख़बरदार, एक क़दम आगे न बढ़े, वरना लाश ज़मीन पर होगी।

हुर---या हज़रत, आपका ग़ुलाम हुर हूँ। हज़रत हुसैन की खिदमत मे कुछ अर्ज़ करना चाहता हूँ।

अब्बास---इस वक्त वह आराम फ़रमा रहे हैं।

हुर---मेरा उनसे इसी वक्त मिलना ज़रूरी है।

अब्बास---( दिल में ) दग़ा का अन्देशा तो नहीं मालूम होता। मैं भी इसके साथ चलता हूँ। ज़रा भी हाथ-पाँव हिलाया कि सिर उड़ा दूँगा। (प्रकट) अच्छा, आओ।

[ अब्बास ख़ेमे से बाहर हुसैन को बुला लाते हैं। ]

हुर---या हज़रत, मुआफ़ कीजिएगा। मैंने आपको नावक्त तक़लीफ़ दी। मैं यह अर्ज़ करने आया हूँ कि आप कूफ़ा की तरफ न जायँ। रात का वक्त है, मेरी फ़ौज सो रही है, आप किसी दूसरी तरफ़ चले जायँ। मेरी यह अर्ज़ क़बूल कीजिए।

हुसैन--–हुर, यह अपनी जान बचाने का मौक़ा नहीं है, इस्लाम की आबरू को कायम रखने का सवाल है।

हुसैन---आप यमन की तरफ चले जायँ, तो वहाँ आपको काफ़ी मदद मिलेगी। मैंने सुना है, सुलेमान और मुख़तार वहाँ आपकी मदद के लिए फ़ौज जमा कर रहे हैं।

हुसैन--–हुर, जिस लालच ने कूफ़ा के रईसों को मुझसे फेर दिया, क्या वह यमन में अपना असर न दिखाएगा? इन्सान की गफ़लत सब जगह एक-सी होती है। मेरे लिए कूफ़ा के सिवा दूसरा रास्ता नहीं है। अगर तुम न जाने दोगे, तो ज़बर्दस्ती जाऊँगा। यह जानता हूँ कि वहीं मुझे शहादत नसीब होगी। इसकी खबर मुझे नाना की ज़बान मुबारक से मिल चुकी है। क्या खौफ़ से शहादत के रुतबे को छोड़ दूँ?

हुर---अगर आप जाना ही चाहते हैं, तो मस्तूरात को वापस कर दीजिए।

हुसैन---हाय, ऐसा मुमकिन होता, तो मुझसे ज्यादा खुश कोई न होता। मगर इनमें से कोई भी मेरा साथ छोड़ने पर तैयार नहीं है।

[ किसी तरफ़ से ॐ ॐ की आवाज आ रही है। ]

योगी---हज़रत, यह आवाज़ कहाँ से आ रही है? इसे सुनकर दिल पर रोब तारी हो रहा है।

[ एक योगी भभूत रमाये, जटा बढ़ाये, मृग-चर्म कंधे पर रखे हुए आते हैं। ]

योगी---भगवन्! मैं उस स्थान को जाना चाहता हूँ, जहाँ महर्षि मुहम्मद की समाधि है।

हुसैन---तुम कौन हो? यह कैसी शक्ल बना रक्खी है?

योगी--साधु हूँ। उस देश से आ रहा हूँ, जहाँ प्रथम ओंकार-ध्वनि की सृष्टि हुई थी। महर्षि मुहम्मद ने उसी ध्वनि से संपूर्ण जगत् को निनादित कर दिया है। उनके अद्वैतवाद ने भारत के समाधि-मग्न ऋषियों को भी जागृति प्रदान कर दी है। उसी महात्मा की समाधि का दर्शन करने के लिए मैं भारत से अाया हूँ, कृपा कर मुझे मार्ग बता दीजिए।

हुसैन---आइए, ख़ुशनसीब कि अापकी ज़ियारत हुई। रात का वक्त है, अँधेरा छाया हुआ है। इस वक्त यहीं अाराम कीजिए। सुबह मैं आपके, साथ अपना एक आदमी भेज दूँगा।

योगी---( ग़ौर से हुसैन के चेहरे को देखकर ) नहीं महात्मन् , मेरा व्रत है कि उस पावन भूमि का दर्शन किये बिना कहीं विश्राम न करूँगा। प्रभो आपके मुख़ारविंद पर भी मुझे उसी महर्षि के तेज का प्रतिबिंब दिखायी देता है। आप उनके आत्मीय हैं?

हुसैन---जी हाँ, उनका नेवासा हूँ। मगर अापने नाना को तो देखा ही नहीं, फिर आपको कैसे मालूम हुआ कि मेरी सूरत उनसे मिलती है?

योगी---( हँसकर ) भगवन्! मैंने उनका स्थूल शरीर नहीं देखा, पर उनके अात्मशरीर का दर्शन किया है। आत्मा द्वारा उनकी पवित्र वार्ता सुनी है। मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ कि आपमें वही पवित्र आत्मा अवतरित हुई है। आज्ञा दीजिए, आपके चरण रज से अपने मस्तक को पवित्र करूँ।

हुसैन---( पैरों को हटाकर ) नहीं-नहीं, मैं इन्सान हूँ, और रसूल पाक की हिदायत है कि इन्सान को इन्सान की इबादत वाजिब नहीं।

योगी---धन्य है! मनुष्य के ब्रह्मत्व का कितना उच्च आदर्श है! वह ज्ञान-ज्योति, जो इस देश से उद्भासित हुई है, एक दिन समस्त भूमंडल को आलोकित करेगी, और देश-देशांतरों में सत्य और न्याय का मुख उज्ज्वल करेगी। हाँ, इस महर्षि की सन्तान न्याय-गौरव का पालन करेगी। अब मुझे आज्ञा दीजिए, आपके दर्शनों से कृतार्थ हो गया।

[ योगी चला जाता है। ]

हुसैन---अब मुझे अपने मरने का ग़म नहीं रहा। मेरे नाना की उम्मत हक़ और इन्साफ़ की हिमायत करेगी। शायद इसी लिए रसूल ने अपनी औलाद को हक़ पर क़ुरबान करने का फ़ैसला किया है। हुर, तुमने इस फ़क़ीर की पेशगोई सुनी?

हुर---या हज़रत, अापका रुतबा अाज जैसा समझा है, ऐसा कभी न समझा था। हुजूर रसूल पाक से मेरे हक़ में दुआ करें कि मुझ रूहस्याह के गुनाह मुआफ करे।

[ चला जाता है। ]

हुसैन--–अब्बास, अब हमें कूफ़ावालों को अपने पहुँचने की इत्तिला देनी चाहिए।

अब्बास-वजा है।

हुसैन---कौन जा सकता है?

अब्बास---सैदावी को भेज दूँ?

हुसैन---बहुत अच्छी बात है।

[ अब्बास सैदावी को बुला खाते हैं। ]

अब्बास---सैदावी, तुम्हें हमारे पहुँचने की खबर लेकर क़ूफ़ा जाना पड़ेगा। यह कहने की ज़रूरत नहीं कि यह बड़े खतरे का काम है।

सैदावी---या हज़रत, जब आपकी मुझ पर निगाह है, तो फिर ख़ौफ़ किस बात की।

हुसैन---शाबाश, यह खत लो, और वहाँ किसी ऐसे सरदार को देना, जो रसूल का सच्चा बंदा हो। जाओ, खुदा तुम्हें ख़ैरियत से ले जाय।

[ सैदावी जाता है। ]

हुसैन---( दिल में ) सैदावी, जाते हो, मगर मुझे शक है कि तुम जिन्दा लौटोगे! तुमने, जिसे न दीन की हिफ़ाज़त का ख़याल है, न हक़ का, जिसे दुश्मनों ने चारों तरफ से घेर नहीं रखा है, जिसको शहीद करने के लिए फौजें नहीं जमा की जा रही हैं, जो दुनिया में आराम से ज़िन्दगी बसर कर सकता है, महज़ वफ़ादारी का हक़ अदा करने के लिए जान-बूझकर मौत के मुँह में क़दम रक्खा है, तो मैं मौत से क्यों डरूँ।

[ गाते हैं। ] / मौत का क्या उसको ग़म है, जो मुसल्माँ हो गया; / जिसकी नीयत नेक है, जो सिद्क इमाँ हो गया। / कब दिलेरों को सताए फ़िक्र ज़र और ख़ौफ़ का; / अज़्म सादिक उसका है, जो पाक दामाँ हो गया। / क्यों नदामत हो मुझे, दुनिया में गर ज़िन्दा रहा; / जाय ग़म क्या है, जो नज़रे-तेग बुर्रा हो गया। / हो अदू दुनिया में रुसवा, आख़िरत में ग़म नसीब; / मुनहरिफ़ दीं से हुआ, औ' नंग-दौराँ हो गया।

पाँचवाँ दृश्य

[ रात का समय। हुसैन अपने ख़ेमे में सोये हुए हैं। वह चौंक पड़ते हैं, और लेटे हुए, चौकन्नी आँखों से, इधर-उधर ताकते हैं। ]

हुसैन---( दिल में ) यहाँ तो कोई नज़र नहीं आता। मैं हूँ, शमा है, और मेरा धड़कता हुआ दिल है। फिर मैंने आवाज़ किसकी सुनी! सिर में कैसा चक्कर आ रहा है। ज़रूर कोई था। ख्वाब पर हक़ीक़त का धोखा नहीं हो सकता । ख़्वाब के अादमी शबनम के परदे में ढकी हुई तसवीरों की तरह होते हैं। ख़्वाब की आवाजें ज़मीन के नीचे से निकलनेवाली आवाज़ों की तरह मालूम होती हैं। उनमें यह बात कहाँ! देखूँ, कोई बाहर तो खड़ा नहीं है। ( खे़मे से बाहर निकलकर ) उफ़् , कितनी गहरी तारीकी है, गोया मेरी आँखों ने कभी रोशनी देखी ही नहीं। कैसा गहरा सन्नाटा है, गोया सुनने की ताक़त ही से महरूम हूँ। गोया यह दुनिया अभी-अभी अदम के ग़ार से निकली है (प्रकट) कोई है?

[ अली अकबर का प्रवेश। ]

अली०---हाज़िर हूँ अब्बाजान, क्या इरशाद है?

हुसैन--–यहाँ से अभी कोई सवार तो नहीं ग़ुज़रा?

अली०---अगर मेरे होश-हवास वजा हैं, ता इधर कोई जानदार नहीं ग़ुज़रा।

हुसैन---ताज्जुब है, अभी लेटा हुआ था, और जहाँ तक मुझे याद है, मेरी पलकें तक नहीं झपकी, पर मैंने देखा, एक आदमी मुश्की घोड़े पर सवार सामने खड़े होकर मुझसे कह रहा है कि 'ऐ हुसैन! इराक़ जाने की जल्दी कर रहे हो, और मौत तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ी जा रही है।' बेटा, मालूम हो रहा है, मेरी मौत क़रीब है!

अली०---बाबा, क्या हम हक़ पर नहीं हैं?

हुसैन----बेशक, हम हक़ पर हैं, और हक़ हमारे साथ है।

अली०---अगर हम हक़ पर हैं, तो मौत का क्या डर। क्या परवा, अगर हम मौत की तरफ़ जायँ या मौत हमारी तरफ़ आये।

हुसैन---बेटा, तुमने दिल खुश कर दिया। खुदा तुमको वह सबसे बड़ा इनाम दे, जो बाप बेटे को दे सकता है।

[ जहीर, हबीब, अब्दुल्ला, कलबी और उसकी स्त्री का प्रवेश। ]

अली०---कौन इधर से जा रहा है?

ज़हीर---हम मुसाफ़िर हैं। ये ख़ेमे क्या हज़रत हुसैन के हैं?

अली०---हाँ।

ज़हीर---खुदा का शुक्र है कि हम मंज़िल मक़सूद पर पहुँच गये। हम उन्हीं की ज़ियारत के लिए कूफ़ा से आ रहे हैं।

हुसैन---जिसके लिए आप कूफ़ा से आ रहे हैं, वह खुद आपसे मिलने के लिए कूफ़ा जा रहा है। मैं ही हुसैन बिन अली हूँ।

जहीर---हमारे ज़हे-नसीब कि आपकी ज़ियारत हुई। हम सब-के-सब अापके ग़ुलाम हैं। कूफ़ा में इस वक्त दर व दीवार आपके दुश्मन हो रहे हैं। आप उधर क़स्द न फ़रमायें। हम इसी लिए चले आये हैं कि वहाँ रहकर अापकी कुछ ख़िदमत नहीं कर सकते। हमने हज़रत मुस्लिम के क़त्ल का खूनी नज़ारा देखा है, हानी को क़त्ल होते देखा है, और ग़रीब तौआ की बोटियाँ कटते देखी हैं। जो लोग आपकी दोस्ती का दम भरते थे, वे अाज ज़ियाद के दाहने बाजू बने हुए है।

हुसैन---ख़ुदा उन्हें नेक रास्ते पर लाये। तक़दीर मुझे कूफ़ा लिये जाती है, और अब कोई ताक़त मुझे वहाँ जाने से रोक नहीं सकती। आप लोग चलकर आराम फ़रमायें। कल का दिन मुबारक होगा, क्योंकि मैं उस मुक़ाम पर पहुँच जाऊँगा, जहाँ शहादत मेरे इन्तज़ार में खड़ी है।

[ सब जाते हैं। ]

छठा दृश्य

[ कर्बला का मैदान। एक तरफ़ केरात नदी लहरें मार रही है। हुसैन मैदान में खड़े हैं। अब्बास और अली अकबर भी उनके साथ हैं। ]

अली अकबर---दरिया के किनारे ख़ेमे लगाये जायँ, वहां ठंडी हवा आयेगी।

अब्बास---बड़ी फ़िज़ा की जगह है।

हुसैन---( आँखों में आँसू भरे हुए ) भाई, लहराते हुए दरिया को देख-कर ख़ुद-ब-ख़ुद दिल भरा आता है। मुझे ख़ूब याद है कि इसी जगह एक बार वालिद मरहूम की फ़ौज उतरी थी। बाबा बहुत ग़मगीन थे। उनकी आँखों से आँसू न थमते थे। न खाना खाते थे, न सोते थे। मैंने पूछा---या हज़रत, आप क्यों इस क़दर बेताब हैं? मुझे छाती से लपटाकर बोले---बेटा, तू मेरे बाद एक दिन यहाँ आयेगा, उस दिन तुझे मेरे रोने का सबब मालूम होगा। अाज मुझे उनकी वह बात याद आती है। उनका रोना बेसबब नहीं था। इसी जगह हमारे ख़ून बहाये जायँगे, इसी जगह हमारी बहनें और बेटियाँ क़ैद की जायँगी, इसी जगह हमारे आदमी क़त्ल होंगे और हम ज़िल्लत उठायेंगे। ख़ुदा की क़सम, इसी जगह मेरी गरदन की रगें कटेंगी, और मेरी दाढ़ी खून में रंगी जायँ। इसी जगह का वादा मेरे नाना से अल्लाहताला ने किया है, और उसका वादा तक़दीर की तहरीर है।

[गाते हैं।] / देगा जगह कोई मेरे मुश्ते-ग़ुबार को, / बैठेगा कौन लेके किसी बेकरार को। / दर सैकड़ों कफ़स में हैं, फिर भी असीर हूँ, / कैसा मकाँ मिला है ग़रीबे-दयार को। / दिल-सोज़ कौन है , जो ज़माने के जुल्म से / देखे मेरी बुझी हुई शमए-मज़ार को। / आख़िर है दास्तान शबे-ग़म कि याद मर्ग / करता है वद दीदए-अख़्तर शुमार को। / आवाज़ए-चमन की उमीद और मेरे बाद--- / चुप कर दिया फ़लक ने ज़बाने-बहार को। / राहत कहाँ नसीब कि सहराए-ग़म की धूप---

देती है आग हर शजरे सायादार को। / खुद आसमाँ को नक़्शे-वफ़ा से है दुश्मनी / तुम क्यों मिटा रहे हो निशाने-मज़ार को। / इस हादिसे से क़ब्ल कि मैं फिर कुछ न कह सकूँ, / सुन लो बयान हालेदिले-बेकरार को। / [ जेनब खेमे से बाहर निकल आती है। ]

जैनब--–भैया, यह कौन-सा सहरा है कि इसे देखकर खौफ़ से कलेजा मुँह को आ रहा है। बानू बहुत घबराई हुई हैं, और असग़र छाती से मुँह नहीं लगाता।

हुसैन--–बहन! यही कर्बला का मैदान है।

जैनब---( दोनो हाथों से सिर पीटकर ) भैया, मेरी आँखों के तारे, तुम पर मेरी जान निसार हो। हमें तक़दीर ने यहाँ कहाँ लाके छोड़ा, क्यों कहीं और नहीं चलते?

हुसैन---बहन, कहाँ जाऊँ? चारों तरफ़ से नाके बंद हैं। ज़ियाद का हुक्म है कि मेरा लश्कर यहीं उतरे। मजबूर हूँ, लड़ाई में बहस नहीं करना चाहता।

जैनब---हाय भैया! यह बड़ी मनहूस जगह है। मुझे लड़कपन से यहाँ की ख़बर है। हाय भैया, इस जगह तुम मुझसे बिछुड़ जाओगे। मैं बैठी देखूँगी, और तुम बर्छियाँ खाअोगे। मुझे मदीने भी न पहुँचा सकोगे? रसूल की औलाद यहीं तबाह होगी, उनकी नामूस यहीं लुटेगी। हाय तकदीर!

इस दश्त में तुम मुझसे बिछुड़ जाओगे भाई, / गर खाक भी छानूँ, तो न हाथ आवेगा भाई। / बहनों को मदीने में न पहुँचाओगे भाई, / मैं देखूँगी, और बरछियाँ तुम खाओगे भाई। / औलाद से बानू की यह छूटने की जगह है, / नामूसे-नबी की यही लुटने की जगह है। / [ बेहोश हो जाती है। लोग पानी के छींटे देते हैं। ]

अली० अक०---या हज़रत, खेमे कहाँ लगाये जायँ?

अब्बास---मेरी सलाह तो है कि दरिया के किनारे लगें।

हुसैन---नहीं भैया, दुश्मन हमें दरिया के किनारे न उतरने देंगे। इसी मैदान में ख़ेमे लगाओ, खुदा यहाँ भी है, और वहाँ भी। उसकी मर्जी पूरी होकर रहेगी।

[ जैनब को औरतें उठाकर खेमे में ले जाती हैं। ]

बानू---हाय-हाय! बाजीजान को क्या हो गया। या खुदा, हम मुसीबत के मारे हुए हैं, हमारे हाल पर रहम कर!

हुसैन---बानू, यह मेरी बहन नहीं, मा है। अगर इस्लाम में बुतपरस्ती हराम न होती, तो मैं इसकी इबादत करता। यह मेरे ख़ानदान का रोशन सितारा है। मुझ-सा खुशनसीब भाई दुनिया में और कौन होगा, जिसे ख़ुदा ने ऐसी बहन अता की। ( जैनब के मुँह पर पानी के छींटे देते हैं। )

सातवाँ दृश्य

[ नसीमा अपने कमरे में अकेली बैठी हुई है---समय १२ बजे रात का। ]

नसीमा---( दिल में ) वह अब तक नहीं आये। गुलाम को उन्हें साथ लाने के लिए भेजा, वह भी वहीं का हो रहा। ख़ुदा करे, वह आते हों। दुनिया में होते हुए हमारे ऊपर मुल्क की हालत का असर न पड़े। मुहल्ले में आग लगी हो, तो अपना दरवाज़ा बन्द करके बैठ रहना खतरे से नहीं बचा सकता। मैंने अपने तई इन झगड़ों से कितना बचाया था, यहाँ तक कि अब्बाजान और अम्मा जब यज़ीद की बैयत न क़बूल करने के जुर्म में जला-वतन कर दिये गये, तब भी मैं अपना दरवाज़ा बन्द किये बैठी रही, पर कोई तदबीर कारगर न हुई। बैयत की बला फिर गले पड़ी। वहब मेरे लिए सब कुछ करने को तैयार है। वह यज़ीद की बैयत भी कबूल कर लेता, चाहे उसके दिल को कितना ही सदमा हो। पर जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर अब मेरा दिल भी यज़ीद की बैयत की तरफ मायल नहीं होता, उससे नफ़रत होती है। मुस्लिम कितनी बेदरदी से क़त्ल किये गये, हानी को ज़ालिम ने किस बुरी तरह क़त्ल कराया। यह सब देखकर, अगर यज़ीद की बैयत क़बूल कर लूँ, तो शायद मेरा ज़मीर मुझे कभी मुआफ न करेगा। हमेशा पहलू में खलिश होती रहेगी। आह! इस खलिश को भी सह सकती हूँ, पर वहब की रूहानी कोफ्त अब नहीं सही जाती। मैंने उन पर बहुत जुल्म किये। अब उनकी मुहब्बत की जंजीर को और न खींचूँगी। जिस दिन से अब्बा और अम्मा निकाले गये हैं, मैंने वहब को कभी दिल से ख़ुश नहीं देखा। उनकी वह ज़िन्दादिली ग़ायब हो गयी। यों वह अब भी मेरे साथ हँसते हैं, गाते हैं, पर मैं जानता हूँ यह मेरी दिलजोई है। मैं उन्हें जब अकेले बैठे देखती हूँ, तो वह उदास और बेचैन नज़र आते हैं....वह आ गये, चलूँ, दरवाज़ा खोल दूँ।

[ जाकर दरवाज़ा खोल देती है। वहब अन्दर दाखिल होता है। ]

नसीमा---तुम आ गये, वरना मैं ख़ुद अाती। तबियत बहुत घबरा रही थी। गुलाम कहाँ रह गया?

वहब---क़त्ल कर दिया गया। नसीमा, मैंने किसी को इतनी दिलेरी से जान देते नहीं देखा। इतनी लापरवाही से कोई कुत्ते के सामने लुक़मा भी न फेंकता होगा। मैं तो समझता हूँ, वह कोई औलिया था।

नसीमा---हाय, मेरे वफ़ादार और ग़रीब सालिम! खुदा तुझे जन्नत नसीब करे। जालिमों ने उसे क्यों क़त्ल किया?

वहब---अाह! मेरे ही कारण उस ग़रीब की जान गयी। जामा मस्जिद में हज़ारों आदमी जमा थे। खबर है, और तहक़ीक़ खबर है कि हज़रत हुसैन मक्के से बैयत लेने आ रहे हैं। जालिमों के होश उड़े हुए हैं। जो पहले बच रहे थे, उनसे अब यज़ीद की खिलाफ़त का हलफ़ लिया जा रहा है। ज़ियाद ने जब मुझसे हलफ़ लेने को कहा, तो मैं राज़ी हो गया। इनकार करता, तो उसी वक्त क़ैदखाने मे डाल दिया जाता। ज़ियाद ने खुश होकर मेरी तारीफ़ की, और यज़ीद के हामियों की सफ़ में ऊँचे दरजे पर बिठाया, जागीर में इज़ाफ़ा किया, और कोई मनसब भी देना चाहते हैं। उसकी मंशा यह भी है कि सब हामियों को एक सफ़ में बिठाकर एकबारगी सबसे हलफ़ ले लिया जाय। इसी लिए मुझे देर हो रही थी। इसी असना में सालिम पहुँचा, और मुझे यज़ीदवालों की सफ़ में बैठे देखकर मुझसे बदजबानी करने लगा। मुझे दगाबाज़, ज़मानासाज़ बेशर्म, खुदा जाने, क्या-क्या कहा, और उसी जोश में यज़ीद और ज़ियाद, दोनो ही की शान में बेअदबी की। मुझे ताना देता हुआ बोला, मैं आज तुम्हारे नमक की क़ैद से आजाद हो गया। मुझे कल होना मंजूर है, मगर ऐसे आदमी की गुलामी मंजूर नहीं, जो ख़ुद दूसरों का गुलाम है। ज़ियाद ने हुक्म दिया---इस बदमाश की गर्दन मार दो। और जल्लादों ने वहीं सहन में उसको क़त्ल कर डाला। हाय! मेरी आँखों के सामने उसकी जान ली गयी, और मैं उसके हक़ में ज़बान तक न खोल सका, उसकी तड़पती हुई लाश मेरी आँखों के सामने घसीटकर कुत्तों के आगे डाल दी गयी, और मेरे खून में जोश न आया। अाफ़ियत बड़े महँगे दामों मिलती है।

नसीमा---बेशक, महँगे दाम हैं। तुमने अभी बैयत तो नहीं ली?

वहब---अभी नहीं, बहुत देर हो गयी, लोगों की तादाद बढ़ती जाती थी। आखिर अाज हलफ़ लेना मुल्तवी किया गया। कल फिर सबकी तलबी है।

नसीमा---तुम इन जालिमों की बैयत हर्गिज न लेना।

वहब---नहीं नसीमा, अब उसका मौक़ा निकल गया।

नसीमा---मैं तुमसे मिन्नत करती हूँ, हर्गिज न लेना।

वहब---तुम मेरी दिलजोई के लिए अपने ऊपर जब्र कर रही हो।

नसीमा---नहीं वहब, अगर तुम दिल से भी बैयत क़बूल करनी चाहो, तो मैं खुश न हूँगी। मैं भी इन्सान हूँ वहब, निरी भेड़ नहीं हूँ। मेरे दिल के जजबात मुर्दा नहीं हुए हैं। मैं तुम्हे इन जालिमों के सामने सिर न झुकाने दूँगी।

वहब---जानती हो, नतीजा क्या होगा?

नसीमा---जानती हूँ। जागीर जब्त हो जायगी, वजीफ़ा बंद हो जायगा, जलावतन कर दिये जायँगे। मैं तुम्हारे साथ ये सारी अाफ़तें झेल लूँगी।

वहब---और अगर जालिमों ने इतने ही पर बस न की?

नसीमा---अाह वहब, अगर यह होना है, तो खुदा के लिए इसी वक्त यहाँ से चले चलो। किसी सामान की जरूरत नहीं। इसी तरह, इन्हीं पाँवों चलो। यहाँ से दूर, कसी दरख़्त के साए में बैठकर दिन काट दूँगी, पर इन जालिमों की खुशामद न करूँगी।

वहब---( नसीमा को गले लगाकर ) नसीमा, मेरी जान तुझ पर फ़िदा हो। जालिमों की सख़्ती मेरे हक़ में अकसीर हो गयी। अब उस ज़ुल्म से मुझे कोई शिकायत नहीं। हमारे जिस्म बारहा गले मिल चुके हैं, अाज हमारी रूहें गले मिली हैं, मगर इस वक्त नाके बन्द होंगे।

नसीमा---जालिमों के नौकर बहुत ईमानदार नहीं होते। मैं उसे ५० दीनार दूँगी, और वही हमें अपने घोड़े पर सवार कराके शहर के बाहर पहुँचा देगा।

वहब---सोच लो, बाग़ियों के साथ किसी क़िस्म की रू-रियायत नहीं हो सकती। उनकी एक ही सजा है, और वह है क़त्ल।

नसीमा---वहब, इन्सान के दिल की क़ैफ़ियत हमेशा एक-सी नहीं रहती। केचुए से डरनेवाला आदमी साँप की गर्दन पकड़ लेता है। ऐश के बन्दे गुदड़ियों में मस्त हो जाते हैं। मैंने समझा था, जो खतरा है, घोंसले से बाहर निकलने में; है अन्दर बैठे रहने में अाराम-ही-अाराम है। पर अब मालूम हुआ कि सैयाद के हाथ घोंसले के अन्दर भी पहुँच जाते हैं। हमारी नजात जमाने से भागने में नहीं, उसका मुक़ाबला करने में है। तुम्हारी सोहबत ने, मुल्क की हालत ने, क़ौम के रईसों और अमीरों की पस्ती ने, मुझ पर रोशन कर दिया कि यहाँ इतमीनान के मानी ईमान-फ़रोशी और आफ़ियत के मानी हककुशी हैं। ईमान और हक़ की हिफ़ाजत असली आफ़ियत और इतमीनान है। शायर ने खूब कहा है---

लुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने में, / कुछ अगर है, तो यही खूने-जिगर पीने में।

वहब---मुअाफ़ करो नसीमा, मैंने तुम्हें पहचानने में ग़लती की। चलो, सफ़र का सामान करें।