कर्बला
चौथा अंक
पहला दृश्य
[ प्रातःकाल का समय। ज़ियाद फ़र्श पर बैठा हुआ सोच रहा है। ]
ज़ियाद---( स्वगत ) उस वफ़ादारी की क्या क़ीमत है, जो महज़ ज़बान तक महदूद रहे? कूफ़ा के सभी सरदार, जो मुस्लिम बिन अकील से जंग करते वक्त ख़म ठोक रहे थे, अब हुसैन बिन अली से जंग करते वक्त बग़लें झाँक रहे हैं। कोई इस मुहिम को अंजाम देने का बीड़ा नहीं उठाता। अाक़बत और नजात की आड़ में सब-के-सब पनाह ले रहे हैं। क्या अक़्ल है, जो दुनिया को अक़बा की ख़याली नियामतों पर क़ुरबान कर देती है। मजहब! तेरे नाम पर कितनी हिमाकतें सबाब समझी जाती हैं, तूने इन्सान को कितना बातिलपरस्त, कितना कमहिम्मत बना दिया है!
[ उमर साद का प्रवेश। ]
साद---अस्सलामअलेक। या अमीर, आपने क्यों याद फ़रमाया?
ज़ियाद---तुमसे एक खास मामले में सलाह लेनी है। तुम्हें मालूम है, 'रै' कितना ज़रखेज़, आबाद और सेहतपरवर सूबा है?
साद---खूब जानता हूँ हुज़ूर, वहाँ कुछ दिनों रहा हूँ, सारा सूबा मेवे के बाग़ों और पहाड़ी चश्मों से गुलजार बना हुआ है। बाशिन्दे निहायत खलीक़ और मिलनसार। बीमार आदमी वहाँ जाकर तवाना हो जाता है।
ज़ियाद---मेरी तजवीज़ है कि तुम्हें उस सूबे का आमिल बनाऊँ। मंजूर करोगे?
साद---( बन्दगी कर के ) सिर और आँखों से। इस क़द्रदानी के लिए क़यामत तक शुक्रगुज़ार रहूँगा।
ज़ियाद---माक़ूल सालाना मुशाहरे के अलावा तुम्हें घोड़े, नौकर, ग़ुलाम सरकार की तरफ़ से मिलेंगे।
साद---ऐन बन्दानेवाज़ी है। खुदा आपको हमेशा खुशखुर्रम रखे।
ज़ियाद---तो मैं मुंशी को हुक्म देता हूँ कि तुम्हारे नाम फ़रमान जारी कर दे, और तुम वहाँ जाकर काम सँभालो।
साद---ग़ुलाम हमेशा आपका मशकूर रहेगा।
ज़ियाद---मुझे यकीन है, तुम उतने ही कारगुज़ार और वफ़ादार साबित होगे, जैसी मुझे तुम्हारी ज़ात से उम्मीद है।
[ मीर मुंशी को बुलाता है, वह साद के नाम का फ़रमान लिखता है। ]
साद---( फरमान लेकर ) तो मैं कल चला जाऊँ?
ज़ियाद---नहीं-नहीं, इतनी जल्द नहीं। वहाँ जाने के पहले तुम्हें अपनी वफ़ादारी का सबूत देना पड़ेगा। इतना ऊँचा मंसब उसी को दिया जा सकता है, जो हमारा एतबार हासिल कर सके। यह किसी बड़ी खिदमत का सिला होगा।
साद---मैं हरएक ख़िदमत के लिए दिलोजान से हाजिर हूँ। जिस मुहिम को और कोई अंजाम न दे सकता हो, उस पर मुझे भेज दीजिए। ख़ुदा ने चाहा, तो कामयाब होकर आऊँगा।
ज़ियाद---बेशक-बेशक, मुझे तुम्हारी ज़ात से ऐसी ही उम्मीद है। तुम्हें मालूम है, हुसैन बिन अली कूफ़े की तरफ़ आ रहे हैं। हमको उनकी तरफ से बहुत अंदेशा है। तुमको उनसे जंग करने के लिए जाना होगा। उधर से हमें बेफ़िक्र करके फिर 'रै' की हुकूमत पर जाना।
साद---या अमीर, आप मुझे इस मुहिम पर जाने से मुआफ़ रखें, इसके सिवा आप जो हुक्म देंगे, उसकी तामील में मुझे ज़रा भी उज्र न होगा।
ज़ियाद--क्यों, हुसैन से जंग करने में तुम्हें क्या उज्र है?
साद---आपका गुलाम हूँ, लेकिन हुसैन के मुकाबले से मुझे मुआफ़ रखें, तो आपका हमेशा एहसान मानूँगा।
ज़ियाद---बेहतर है, तुम्हारी जगह किसी और को भेजूँगा। फ़रमान वापस देकर घर बैठ जाओ। 'रै' का इलाक़ा उसी आदमी का हक़ है, जो इस मुहिम को अंजाम दे। मौत के बग़ैर जन्नत नसीब नहीं हो सकती। जो आदमी एक पैर दीन की किश्ती में रखता है, दूसरा पैर दुनिया की किश्ती में, उसे कभी साहिल पर पहुँचना नसीब न होगा।
साद---( दिल में ) एक तरफ़ 'रै' का इलाक़ा है, दूसरी तरफ़ नजात; एक तरफ दौलत और हुकूमत है, दूसरी तरफ़ लानत और अज़ाब! खुदा! मेरी तकदीर में क्या लिखा है। (प्रकट) या अमीर, मुझे एक दिन की मुहलत दीजिए। मैं कल इस मामले पर ग़ौर करके आपको जवाब दूँगा।
ज़ियाद---अच्छी बात है। सोच लो।
[ दोनो चले जाते हैं। ]
दूसरा दृश्य
[ प्रातःकाल का समय। साद का मकान। साद बैठा हुआ है। ]
साद---( मन में ) यार-दोस्त, अपने-बेगाने, अज़ीज, सब मुझे हुसैन के मुक़ाबले पर जाने से मना करते हैं। बीबी कहती है, अगर तेरे पास दुनिया में कुछ भी बाक़ी न रहे, तो इससे बेहतर है कि तू हुसैन का ख़ून अपनी गर्दन पर ले। आज मैंने ज़ियाद को जवाब देने का वादा किया है। सारी रात सोचते गुज़र गयी, और अभी तक कुछ फ़ैसला न कर सका। अजीब दोफ़स्ले में पड़ा हुआ हूँ। अपना दिल भी हुसैन के क़त्ल पर अमादा नहीं होता। गो मैंने यज़ीद के हाथों पर बैयत की पर हुसैन से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है। कितना दीनदार, कितना बेलोस आदमी है। हमी ने उन्हें यहाँ बुलाया, बार-बार खत और क़ासिद भेजे, और आज जब वह यहाँ हमारी मदद करने आ रहे हैं, तो हम उनकी जान लेने पर तैयार हैं। हाय ख़ुदग़रज़ी! तेरा बुरा हो, तेरे सामने दीन-ईमान, नेक-बद की तरफ़ से आँखें बन्द हो जाती हैं। कितना गुनाहे-अज़ीम है। अपने रसूल के नेवासे की गर्दन पर तलवार चलाना! खुदा न करे, मैं इतना गुमराह हो जाऊँ। 'रै' का सूबा कितना ज़रखेज़ है। वहाँ थोड़े दिन भी रह गया, तो माला-माल हो जाऊँगा। कितनी शान से बसर होगी। तुफ़् है मुझ पर, जो अपनी शान और हुकूमत के लिए बड़े-से-बड़े गुनाह करने का इरादा कर रहा हूँ। नहीं, मुझसे यह फेल न होगा। रै' जन्नत ही सही, पर फ़र्ज़ेदे-रसूल का ख़ून करके मुझे जन्नत में जाना भी मंजूर नहीं।
[ ज़ियाद का प्रवेश। ]
साद---अस्सलामअलेक। अमीर ज़ियाद, मैं तो खुद ही हाज़िर होनेवाला था। अापने नाहक तकलीफ़ की।
ज़ियाद---शहर का दौरा करने निकला था। बाग़ियों पर इस वक्त बहुत सख्त निगाह रखने की ज़रूरत है। मुझे मालूम हुआ है कि हबीब, जहीर, अब्दुल्लाह वग़ैरह छिपकर हुसैन के लश्कर में दाखिल हो गये हैं। इसकी रोक-थाम न की गयी, तो बाग़ी शेर हो जायँगे। हुसैन के साथ आदमी थोड़े हैं, पर मुझे ताज्जुब न होगा, अगर यहाँ आते-आते उसके साथ आधा शहर हो जाय। शेर पिंजरे में भी हो, तो भी उससे डरना चाहिए। रसूल का नाती फ़ौज का मुहताज नहीं रह सकता। कहो, तुमने क्या फ़ैसला किया? मैं अब ज्यादा इन्तज़ार नहीं कर सकता।
साद---या अमीर, हुसैन के मुक़ाबले के लिए न तो अपना दिल ही गवाही देता है, और न घर वालों की सलाह होती है। आपने मुझे 'रै' की निजामत अता की है, इसके लिए आपको अपना मुरब्बी समझता हूँ। मगर कले-हुसैन के वास्ते मुझे न भेजिए।
ज़ियाद---साद, दुनिया में कोई खुशी बग़ैर तकलीफ़ के नहीं हासिल होती। शहद के साथ मक्खी के डंक का ज़हर भी है। तुम शहद का मज़ा उठाना चाहते हो, मगर डंक की तकलीफ़ नहीं उठाना चाहते। बिला मौत की तकलीफ़ उठाये जन्नत में जाना चाहते हो। तुम्हें मजबूर नहीं करता। इस इनाम पर हुसैन से जंग करने के लिए आदमियों की कमी नहीं है। मुझे फ़रमान वापस दे दो, और आराम से घर बैठकर रसूल और खुदा की इबादत करो।
साद---या अमीर! सोचिए, इस हालत में मेरी कितनी बदनामी होगी। सारे शहर में खबर फैल गयी कि मैं 'रै' का नाज़िम बनाया गया हूँ। मेरे
यार-दोस्त मुझे मुबारकबाद दे चुके। अब जो मुझसे फ़रमान ले लिया जायगा, तो लोग दिल में क्या कहेंगे?
ज़ियाद---यह सवाल तो तुम्हें अपने दिल से पूछना चाहिए।
साद---या अमीर, मुझे कुछ और मुहलत दीजिए।
ज़ियाद---तुम इस तरह टाल-मटोल करके देर करना चाहते हो। कलाम पाक की क़सम है, अब मैं तुम्हारे साथ ज़्यादा सख्ती से पेश आऊँगा। अगर शाम को हुसैन से जंग करने के लिए तैयार होकर न आये, तो तेरी जायदाद ज़ब्त कर लूँगा, तेरा घर लुटवा दूँगा, यह मकान पामाल हो जायगा, और तेरी जान की भो ख़ैरियत नहीं ( ज़ियाद का प्रस्थान )।
साद---( दिल में ) मालूम होता है, मेरी तक़दीर में रूस्याह होना ही लिखा है। अब महज़ 'रै' की निज़ामत का सवाल नहीं है। अब अपनी जायदाद और जान का सवाल है। इस ज़ालिम ने हानी को कितनी बेरहमी से क़त्ल किया। कसीर को भी अपनी अईनपरवरी की गिराँ क़ीमत देनी पड़ी। शहरवालों ने ज़बान तक न हिलायी। वह तो महज़ हुसैन के अजीज़ थे। यह मामला उससे कहीं नाजुक है। ज़ियाद बरहम हो जायगा, तो जो कुछ न कर गुजरे, वह थोड़ा हैं। मैं 'रै' को ईमान पर क़ुरबान कर सकता हूँ, पर जान और जायदाद को नहीं क़ुरबान कर सकता। काश मुझमें हानी और कसीर की-सी हिम्मत होती।
[ शिमर का प्रवेश। ]
शिमर---अस्सलामअलेक। साद, किस फ़िक्र में बैठे हो, ज़ियाद को तुमने क्या जवाब दिया?
साद---दिल हुसैन के मुक़ाबले पर राजी नहीं होता।
शिमर---सरवत और दौलत हासिल करने का ऐसा सुनहरा मौक़ा फिर हाथ न आयेगा। ऐसे मौक़े जिन्दगी में बार-बार नहीं आते।
साद---नजात कैसे होगी?
शिमर---ख़ुदा रहीम है, करीम है, उसकी ज़ात से कुछ वईद नहीं। गुनाहों को माफ़ न करता, तो रहीम क्यों कहलाता? हम गुनाह न करें, तो वह माफ क्या करेगा?
साद---खुदा ऐसे बड़े गुनाह को माफ़ न करेगा।
शिमर---अगर खुदा को ज़ात से यह एतक़ाद उठ जाय, तो मैं आज मुसलमान न रहूँ। यह रोज़ा और नमाज़, या ज़कात और खैरात, किस मर्ज़ की दवा है, अगर हमारे गुनाहों को भी माफ़ न करा सके।
साद---रसूल ख़ुदा को क्या मुँह दिखाऊँगा?
शिमर---साद, तुम समझते हो, हम अपनी मरज़ी के मुख्तार हैं, यक़ीदा बातिल है। सब-के-सब हुक्म के बन्दे हैं। उसकी मरज़ी के बग़ैर हम अपनी उँगली को भी नहीं हिला सकते। सबाब और अज़ाब का यहाँ सवाल ही नहीं रहता। अक़्लमंद आदमी उधार के लिए नक़द को नहीं छोड़ता। ताखीर मत करो, वरना फिर हाथ मलागे।
[ शिमर चला जाता है। ]
साद---( दिल में ) शिमर ने बहुत माक़ूल बातें कहीं। बेशक ख़ुदा अपने बन्दों के गुनाहों को माफ़ करेगा, वरना हिसाब के दिन दोज़ख मे गुनहगारों के खड़े होने की जगह भी न मिलेगी। मैं ज़ाहिद न सही, लेकिन मुझे तो खुदा के सामने नदामत से गर्दन झुकाने की कोई वजह नहीं है। बेशक खुदा की यही मरज़ी है कि हुसैन के मुकाबले पर मैं जाऊँ, वरना ज़ियाद यह तजवीज़ ही क्यों करता। जब खुदा की यही मरजी है, तो मुझे सिर झुकाने के सिवा और क्या चारा है। अब जो होना हो, सो हो---आग में कूद पड़ा, जलूँ या बचूँ।
[ ग़ुलाम को बुलाकर ज़ियाद के नाम अपनी मंजूरी का ख़त लिखता है। ]
ग़ुलाम---शायद हुजूर ने 'रै' की निज़ामत कबूल कर ली?
साद---जा, तुझे इन बातों से क्या मतलब।
ग़ुलाम---मैं पहले ही से जानता था कि आप यही फ़ैसला करेंगे।
साद---तुझे क्योंकर इसका इल्म था?
ग़ुलाम---मै ख़ुद इस मंसब को न छोड़ता, चाहे इसके लिए कितना ही ज़ुल्म करना पड़ता।
साद---( दिल में ) ज़ालिम कैसी पते की बात कहता है।
[ ग़ुलाम चला जाता है, और साद गाने लगता है। ]
कोई तुमसे जुदा दर्दे-जुदाई लेके बैठा है, / वह अपने घर में अब अपनी कमाई लेके बैठा है। / जिगर, दिल, जान, ईमाँ अब कहाँ तक नाम ले कोई, / वह ज़ालिम सैकड़ों चीजें पराई लेके बैठा है। / ख़ुदा ही है मेरी तोबा का, जब साक़ी कहे मुझसे--- / अरे, पी भी, कहाँ की पारसाई लेके बैठा है। / तेरे काटे शबे-ग़म मेरी बरसों से नहीं कटती , / तो फिर तू ऐ खुदा नाहक खुदाई लेके बैठा है। / कहूँ कुछ मैं, तो वह मुँह फेरकर कहता है औरों से- / खुदा जाने, यह कब की आशनाई लेके बैठा है। / अमल कुछ चल गया है शौक़ पर जाहिद का ऐ यारो, / कि मस्जिद में पुरानी एक चटाई लेके बैठा है।
तीसरा दृश्य
[ केरात-नदी के किनारे साद का लश्कर पड़ा हुआ है। केरात से दो मील के फासले पर कर्बला के मैदान में हुसैन का लश्कर है। केरात और हुसैन के लश्कर के बीच में साद ने एक लश्कर को नदी के पानी को रोकने के लिए पहरा बैठा दिया है। प्रातःकाल का समय। शिमर और साद ख़ेमे में बैठे हुए हैं। ]
साद---मेरा दिल अभी तक हुसैन से जंग करने को तैयार नहीं होता। चाहता हूँ, किसी तरीक़े से सुलह हो जाय, मगर तीन क़ासिदों में से एक भी मेरे ख़त का जवाब न ला सका। एक तो हज़रत हुसैन के पास जा ही न सका, दूसरा शर्म के मारे रास्ते ही से किसी तरफ़ खिसक गया, और तीसरे ने जाकर हुसैन की बैयत अख़्तयार कर ली। अब और क़ासिदों को भेजते हुए डरता हूँ कि इनका भी वही हाल न हो।
शिमर---ज़ियाद को ये बातें मालूम होंगी, तो आपसे सख्त नाराज़ होगा।
साद---मुझे बार-बार यही खयाल पाता है कि हुसैन यहाँ जंग के इरादे से नहीं, महज़ हम लोगों के बुलाने से आये हैं। उन्हें बुलाकर उनसे दग़ा करना इन्सानियत के खिलाफ़ मालूम होता है।
शिमर---मुझे खौफ है कि आपके ताख़ीर से नाराज़ होकर ज़ियाद आपको वापस न बुला ले। फिर उसके ग़ुस्से से ख़ुदा ही बचाये। ज़ियाद ने कितनी सख्त ताकीद की थी कि हुसैन के लश्कर को पानी का एक बूँद भी न मिले। वहाँ उनके आदमी दरिया से पानी ले जाते हैं, कुएँ खोदते हैं। इधर से कोई रोक-टोक नहीं होती। क्या आप समझते है कि ज़ियाद से ये बातें छिपी होंगी?
साद---मालूम नहीं, कौन उसके पास ये सब खबरें भेजता रहता है?
शिमर---उसने यहाँ अपने कितने ही गोइंदे बिठा रखे है जो दम-दम की खबरें भेज देते हैं।
[ एक क़ासिद का प्रवेश। ]
क़ासिद---अस्सलामअलेक बिन साद। अमीर का हुक्मनामा लाया हूँ।
[ साद को ज़ियाद का ख़त देता है। ]
साद---( खत पढ़कर ) तुम बाहर बैठो, इसका जवाब दिया जायगा। ( क़ासिद चला जाता है ) इसमें भी वही ताक़ीद है कि हुसैन को पानी मत लेने दो, जंग करने में एक लहमे की देर न करो। देखिए, लिखते हैं--"हुसैन से जंग करने के लिए अब कोई बहाना नहीं रहा। फ़ौज की कमी की शिकायत थी, सो वह भी नहीं रही। अब मेरे पास २२ हजार सवार और पैदल मौजूद हैं।"
शिमर---बेशक उनका लिखना वाजिब है। मैं जाकर सख़्त हुक्म देता हूँ कि हुसैन के लश्कर की एक चिड़िया भी दरिया के किनारे न आने पाये। आप जंग का हुक्म दे दें।
साद---आपको मालूम है, २२ हज़ार आदमियों में कितने अज़ाब के खौफ़ से भाग गये, और रोज़ भागते जाते हैं
शिमर---इसी लिए तो और भी ज़रूरी है कि जंग शुरू कर दी जाय, वरना रफ्ता-रफ्ता यह सारी फ़ौज बादलों की तरह ग़ायब हो जायगी। पर मैंने सुना है, ज़ियाद ने उन सब आदमियों को गिरफ्तार कर लिया है, और बहुत जल्द वे सब फ़ौज़ में आ जायँगे। यह हुक्म भी जारी कर दिया है कि जो आदमी फ़ौज से भागेगा, उसकी जायदाद छीन ली जायगी, और उसे ख़ानदान के साथ जलावतन कर दिया जायगा। इस हुक्म का लोगों पर अच्छा असर पड़ा है। अब उम्मीद नहीं कि भागने की कोई हिम्मत करे। मुझे यह भी खबर मिली है कि ज़ियाद ने कई आदमियों को क़त्ल करा दिया है।
[ एक और क़ासिद का प्रवेश। ]
क़ासिद---अस्सलामअलेक बिन साद। हज़रत हुसैन ने यह खत भेजा है, और उसका जवाब तलब किया है ( साद को ख़त देता है )।
साद---( खत पढ़कर ) बाहर जाकर बैठो। अभी जवाब मिलेगा।
शिमर---( खत पर झुककर ) इसमें क्या लिखा है?
साद---( खत को बन्द करके ) कुछ नहीं, यही लिखा है कि मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।
शिमर---यह उनकी नयी चाल है। कलाम पाक की क़सम, आप उनकी दरख़्वास्त मानकर पछतायेंगे। आपको फ़ौज में फिर आना नसीब न होगा।
साद---क्या तुम्हारा यह मतलब है कि हुसैन मुझसे दग़ा करेंगे? अली का बेटा दग़ा नहीं कर सकता।
शिमर---यह मेरा मतलब नहीं। यहाँ से बच निकलने की कोई तजबीज़ पेश करनी चाहते होगे। उनकी ज़बान में जादू का असर है, ऐसा न हो कि वह आपको चकमा दें। क्या हर्ज है अगर मैं भी आपके साथ चलूँ?
साद---मैं समझता हूँ कि मैं अपने दीन और दुनिया की हिफ़ाजत ख़ुद कर सकता हूँ। मुझे तुम्हारी मदद की ज़रूरत नहीं।
शिमर---आपको अख़्तियार है। कम-से-कम मेरी इतनी सलाह तो मान ही लीजिएगा कि अपने साथ थोड़े-से चुने हुए आदमी लेते जाइएगा।
साद---यह मेरा जाती मामला है, जैसा मुनासिब समझूँगा, करूँगा।
[ क़ासिद को बुलाकर ख़त का जवाब देता है। ]
शिमर---रात का वक्त लिखा है न?
साद---इतना तो तुम्हें ख़ुद समझ लेना चाहिए था।
शिमर---( जाने के लिए खड़ा होकर ) मेरी बात का ज़रूर ख़याल रखिएगा। ( दिल में ) इसके अंदाज़ से मालूम होता है कि हुसैन की बातों में आ जायगा। ज़ियाद के पास खुद जाकर यह क़िस्सा कहूँ।
साद---( दिल में ) ख़ुदा तुझसे समझे ज़ालिम! तू ज़ियाद से भी दो अंगुल बढ़ा हुआ है। शायद मेरा यह क़यास ग़लत नहीं है कि तू ही ज़ियाद को यहाँ के हालात की इत्तिला देता है। हुसैन दग़ा करेंगे! हुसैन दग़ा करनेवालों में नहीं, दग़ा का शिकार होनेवालों में हैं।
[ उठकर अन्दर चला जाता है। ]
चौथा दृश्य
[ हुसैन के हरम की औरतें बैठी हुई बातें कर रही हैं। शाम का वक्त। ]
सुगरा---अम्मा, बड़ी प्यास लगी है।
अली असग़र---पानी, बुआ, पानी।
हफ़ां---कुरबान गयी, बेटे, कितना पानी पियोगे? अभी लायी।
[ मशकों को जाकर देखती है, और छाती पीटती लौटती है। ] ऐ क़ुरबान गयी बीबी, कहीं एक बूँद पानी नहीं। बच्चों को क्या पिलाऊँ!
जैनब---क्या बिलकुल पानी ग़ायब हो गया?
हफ़ां---ऐ क़ुरबान गयी बीबी, सारे मटके और मशकें खाली पड़ी हुई है।
जैनब---ग़ज़ब हो गया। नदी तो बन्द ही थी, अब ज़ालिम कुएँ भी नहीं खोदने देते।
असग़र---पानी, बुआ, पानी।
शहरबानू---या ख़ुदा! किस अज़ाब में फँसे। इन नन्हों को कैसे समझाऊँ!
हफ़ां-बीबी, क़ुरबान जाऊँ! मैं जाकर दरिया से पानी लाती हूँ। कौन मुआ रोकेगा, मुँह झुलस दूँ उसका। क्या मेरे लाल प्यासों तड़पेंगे, जब दरिया में पानी भरा हुआ है?
जैनब---तू नहीं जानती, साढ़े छह हज़ार जवान दरिया का पानी रोकने के लिए तैनात हैं?
हफ़ां---ऐ क़ुरबान जाऊँ बीबी, कौन मुझसे बोलेगा, झाडूँ न मारूँगी। रसूल के बेटे प्यासे रहेंगे?
[ हफ़ां एक मशक लेकर दरिया की तरफ़ जाती है, और थोड़ी देर बाद लौट आती है, सिर के बाल चुने हुए, कपड़े फटे हुए, मशक नदारद। रोती हुई ज़मीन पर बैठ जाती है। ]
जैनब---क्या हुआ हंफ़ा? यह तेरी क्या हालत है?
हंफ़ा---बीबी, खुदा का अज़ाब इन रूस्याहों पर नाज़िल हो। ज़ालिम ने मुझे रोक लिया, मेरी मशक छीन ली, और एक कुत्ते को मुझ पर छोड़ दिया। भागते-भागते किसी तरह यहाँ तक पहुँची। हाय! इन मूज़ियों पर आसमान भी नहीं फट पड़ता। इतनी दुर्गति कभी न हुई थी।
[ रोती है। ]
हुसैन--–( अन्दर जाकर ) हंफ़ा, क्यों रोती है? अरे, यह तेरे कपड़े किसने फाड़े?
जैनब---बेचारी शामत की मारी पानी लाने गयी थी। बच्चे प्यास से तड़प रहे थे। ज़ालिमों ने नीमजान कर दिया।
हुसैन---हंफ़ा मत रोओ। रसूल के क़दमों की कसम, अभी उन ज़ालिमों का सिर तेरे पैरों पर होगा, जिनके बेरहम हाथों ने तेरी बेहुरमती की, चाहे मेरे सारे रफ़ीक़, मेरे सारे अज़ीज़ और मैं खुद क्यों न मर जाऊँ। औरत की बेहुरमती का बदला खून है, चाहे वह ग़ुलाम और बेकस ही क्यों न हो। उन मलजनों को दिखा दूँगा कि मुझे अपनी लौंडी की आबरू अपने हरम से कम प्यारी नहीं है।
[ तलवार हाथ में लेकर बाहर जाते हैं, पर हंफ़ा उनके पैरों को पकड़ लेती है। ]
हंफ़ा---मेरे अाक़ा, मेरी जान आप पर फ़िदा हो। मैं अपना बदला दुनिया में नहीं, अक़बे में लेना चाहती हूँ, जहाँ की आग कहीं ज्यादा तेज़, जहाँ की सज़ाएँ यहाँ से कहीं ज्यादा दिल हिलानेवाली होंगी। मैं नहीं चाहती कि आपकी तलवार से क़त्ल होकर वह अज़ाब से छूट जाय।
हुसैन---हंफ़ा, यह सब उसके लिए है, जो दुनिया में अपना बदला न ले सके। अगर मेरे पास एक लाख आदमी होते, तो तेरी बेइज़्ज़ती का बदला लेने के लिए मैं उन्हें क़ुरबान कर देता, उन बहत्तर आदमियों की हकीकत ही क्या है। मेरे पैरों को छोड़ दे, ऐसा न हो कि मेरा ग़ुस्सा आग बनकर मुझको जलाकर खाक कर दे।
हंफ़ा---( दिल में ) काश इस वक़्त वे ज़ालिम यहाँ होते और देखते कि जिसे उन्होंने कुत्तों से नुचवाया था, उसकी अली के बेटे की निगाहों में कितनी इज़्ज़त है। नहीं, मेरे मौला, मैं दुश्मनों को इतनी अच्छी मौत नहीं देना चाहती। मैं उन्हें जहन्नुम की आग में जलाना चाहती.....
[ अली अकबर का प्रवेश। ]
अली अक॰---अब्बाजान, साद अपनी फ़ौज से निकलकर आया है, और आपसे मिलना चाहता है।
हुसैन---हाँ, मैंने इसी वक्त उसे बुलाया था। पहले उससे हंफ़ा को सतानेवालों के खून का मुआविज़ा लेना है।
[ हुसैन और अली अकबर बाहर आते हैं। ]
अली अक॰---या हज़रत, मैं भी आपके साथ रहूँगा।
अब्बास---मैं भी।
हुसैन---नहीं, मैंने उनसे तनहा मिलने का वादा किया है। तुम्हारे साथ रहने से मेरी बात में फ़र्क़ अायेगा।
अली अक॰---वह तो अपने साथ एक सौ जवानों से ज़्यादा लाया है, जो चन्द क़दमों के फ़ासले पर खड़े हैं। हम अापको तनहा न जाने देंगे।
अब्बास---साद की शराफ़त पर मुझे भरोसा नहीं है।
हुसैन---मैं उसे इतना कमीना नहीं समझता कि मेरे साथ दग़ा करे। खैर, चलो अगर उसे कोई एतराज़ न होगा, तो वहाँ मौजूद रहना। उसे भी अपने साथ दो आदमियों को रखने की आज़ादी होगी।
[ तीनो आदमी शस्त्र से सुसज्जित होकर चलते हैं। परदा बदलता है। दोनों फ़ौजों के बीच में हुसैन और साद खड़े हैं। हुसैन के साथ अकबर और अब्बास हैं, साद के साथ उसका बेटा और गुलाम। ]
साद---अस्सलामअलेक। या फ़र्ज़न्दे-रसूल, आपने मुझे अपनी खिदमत में हाज़िर होने का मौका दिया, इसके लिए आपका मशकूर हूँ। मुझे क्या इर्शाद है?
हुसैन--–मैंने तुम्हें यह तसफ़िया करने के लिए तकलीफ़ दी है कि आख़िर तुम मुझसे क्या चाहते हो? तुम्हारे वालिद रसूल पाक के रफ़ीक़ों में थे, और अगर बाप की तबीयत का असर कुछ बेटे पर पड़ता है, तो मुझे उम्मीद है कि तुममें इन्सानियत का जौहर मौजूद है। क्या नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ।
साद---आप रसूल पाक के नेवासे हैं।
हुसैन---और यह जानकर भी तुम मुझसे जंग करने आये हो, क्या तुम्हें ख़ुदा का ज़रा भी खौफ़ नहीं है? तुममे ज़रा भी इन्साफ़ नहीं है कि तुम मुझसे जंग करने आये हो, जो तुम्हारे ही भाइयों की दग़ा का शिकार बनकर यहाँ आ फँसा है, और अब यहाँ से वापस जाना चाहता है। क्यों ऐसा काम करते हो, जिसके लिए तुम्हें दुनिया में रुसवाई और अक़बा में रूस्याही हासिल हो?
साद---या हज़रत, मैं क्या करूँ। ख़ुदा जानता है कि मैं कितनी मजबूरी की हालत में यहाँ आया हूँ।
हुसैन--–साद, कोई इन्सान आज तक वह काम करने पर मजबूर नहीं हुआ, जो उसे पसन्द न आया हो। तुमको यकीन है कि मेरे क़त्ल के सिले में तुम्हारी जागीर बढ़ेगी, 'रै' की हुकूमत हाथ आयेगी, दौलत हासिल होगी। लेकिन साद, हराम की दौलत ने बहुत दिनों तक किसी के साथ दोस्ती नहीं की, और न वह तुम्हारे लिए अपनी पुरानी आदत छोड़ेगी। हविस को छोड़ो, और मुझे अपने घर जाने दो।
साद---फिर तो मेरी ज़िन्दगी के दिन उँगलियों पर गिने जा सकते हैं।
हुसैन---अगर यह खौफ़ है, तो मैं तुम्हें अपने साथ ले जा सकता हूँ।
साद---या हज़रत, ज़ालिम मेरे मकान बरबाद कर देंगे, जो शहर में अपना सानी नहीं रखते।
हुसैन---सुभानल्लाह! तुमने वह बात मुँह से निकाली, जो तुम्हारी शान से बईद है। अगर हक़ पर कायम रहने की सज़ा में तुम्हारा मकान बरबाद किया जाय, तो ऐसा बड़ा नुकसान नहीं। हक़ के लिए लोगों ने इससे कहीं बड़े नुक़सान उठाये हैं, यहाँ तक कि जान से भी दरेग़ नहीं किया। मैं वादा करता हूँ कि मैं तुम्हें उससे अच्छा मकान बनवा दूँगा।
साद---या हज़रत, मेरे पास बड़ी ज़रखेज़ और आबाद जागीरें हैं, जो ज़ब्त कर ली जायँगी, और मेरी औलाद उनसे महरूम रह जायगी।
हुसैन---मैं हिजाज में तुम्हें उनसे ज़्यादा ज़रखेज़ और आबाद जागीरें दूँगा। इसका इतमीनान रखो कि मेरी ज़ात से तुम्हें कोई नुक़सान न पहुँचेगा।
साद---या हज़रत, आप पर मेरी जान निसार हो, मेरे साथ २२ हज़ार सवार और पैदल हैं। ज़ियाद ने उनके सरदारों से बड़े-बड़े वादे कर रखे हैं, मैं अगर आपकी तरफ़ आ भी जाऊँ, तो वे आपसे ज़रूर जंग करेंगे। इसी लिए मुनासिब यही है कि आप जो शर्तें पसन्द फ़रमायें, मैं ज़ियाद को लिख भेजूँ। मैं अपने ख़त में सुलह पर ज़ोर दूँगा, और मुझे यकीन है कि ज़ियाद मेरी तजवीज़ मंजूर कर लेगा।
हुसैन---खुदा तुम्हें इसका सबाब अाक़बत में देगा। मेरी पहली शर्त यह है कि मुझे मक्का लौटने दिया जाय, अगर यह न मंज़ूर हो, तो सरहदों की तरफ़ जाकर अमन से ज़िन्दगी बसर करने को राजी हूँ, अगर यह भी मंज़ूर न हो तो मुझे यज़ीद ही के पास जाने दिया जाय, और सबसे बड़ी शर्त यह है कि जब तक मैं यहाँ हूँ मुझे दरिया से पानी लेने की पूरी आजादी हासिल हो। मैं यज़ीद की बैयत किसी हालत से न क़बूल करूँगा, और तुमने मेरी वापसी की यह शर्त क़ायम न की, तो हम यहाँ शहीद हो जाना ही पसन्द करेंगे। लेकिन अग़र यह मंशा है कि मुझे क़त्ल ही कर दिया जाय, तो मैं अपनी जान को गिराँ-से-गिराँ क़ीमत पर बेचूँगा।
साद---हज़रत आपकी शर्ते बहुत माक़ूल हैं।
हुसैन---मैं तुम्हारे जवाब का कब तक इन्तज़ार करूँ?
साद---सुबह आफ़ताब की रोशनी के साथ मेरा क़ासिद आपकी खिदमत में हाज़िर होगा।
[ दोनों आदमी अपनी-अपनी फ़ौज की तरफ़ लौटते हैं। ]
पाँचवाँ दृश्य
[ ८ बजे रात का समय। ज़ियाद की ख़ास बैठक। शिमर और ज़ियाद बातें कर रहे हैं। ]
ज़ियाद---क्या कहते हो। मैंने सख्त ताक़ीद कर दी थी कि दरिया पर हुसैन का कोई आदमी न आने पाये।
शिमर---वजा है। मगर मैं तो हुसैन के आदमियों को दरिया से पानी लाते बराबर देखता रहा हूँ; और, शायद मेरा दरिया की हिफ़ाज़त के लिए अपनी ज़िम्मेदारी पर हुक्म जारी करना साद को बुरा लगा।
ज़ियाद---साद पर मुझे इतमीनान है। मुमकिन है, उसे लोगों को प्यासों मरते देखकर रहम आ गया हो, और हक़ तो यह है कि शायद मैं भी मौक़े पर इतना बेरहम नहीं हो सकता। इससे यह नहीं साबित होता कि साद की नीयत डाँवाडोल हो रही है।
शिमर---मैं साद की शिकायतें करने के लिए आपकी ख़िदमत में नहीं हाज़िर हुअा हूँ, सिर्फ़ वहाँ की हालत अर्ज़ करनी थी। हुसैन ने अाज साद को मुलाकात करने को भी तो बुलाया है। देखिए, क्या बातें होती हैं।
ज़ियाद---क्या? हुसैन से मुलाक़ातें भी कर रहा है? तुम साबित कर सकते हो?
शिमर---हुज़ूर, मेरे सबूत की ज़रूरत नहीं। उनका क़ासिद आता ही होगा।
साद---क्या कई बार मुलाक़ातें हुई हैं?
शिमर---अाज की मुलाक़ात का तो मुझे इल्म है, पर शायद और भी मुलाक़ातें तनहाई में हुई हैं।
ज़ियाद---कोई और आदमी साथ नहीं रहा?
शिमर---मैंने खुद साथ चलना चाहा था, पर मेरी अर्ज़ क़बूल न हुई।
ज़ियाद---कलाम पाक की क़सम, मैं इसे बर्दाश्त न कर सकता। मैंने उसे हुसैन से जंग करने को भेजा है, मसालहत करने के लिए नहीं। मैं उससे इसका जवाब तलब करूँगा।
शिमर---हुज़ूर ने उनके साथ जो सलूक किये हैं, और इस काम के लिए जो सिला तजवीज़ किया है, वह तो किसी दुश्मन को भी आपका दोस्त बना देता। मगर अपना-अपना मिज़ाज ही तो है।
[ एक क़ासिद का प्रवेश। ]
क़ासिद---अस्सलामअलेक। या अमीर, उमर बिन साद का ख़त लाया हूँ।
[ ज़ियाद को खत देता है, और ज़ियाद उसे पढ़ने लगता है। क़ासिद बाहर चला जाता है। ]
ज़ियाद---इस मसलहत का नतीजा तो अच्छा निकला। हुसैन वापस जाने को रज़ामंद हैं, और साद ने इसकी ताईद करते हुए लिखा है कि उनकी जानिब से किसी ख़तरे का अंदेशा नहीं। ख़लीफ़ा यज़ीद की मंशा भी यही है। साद ने ख़ूब किया कि बग़ैर जंग के फतह हासिल कर ली।
शिमर---बेशक बड़ी शानदार फ़तह है!
ज़ियाद---क्यों, यह फ़तह नहीं है! तंग क्यों करते हो?
शिमर---जिसे आप फ़तह समझ रहे हैं, वह फ़तह नहीं, आपकी शिकस्त है। ऐसी शिकस्त, जो आपको फिर पनपने न देगी। आग फूस में पड़कर उतनी खौफ़नाक नहीं हो सकती, जितने इस मुहासिरे से निकलकर हुसैन हो जायँगे। शेर किसी शिकार के पीछे दौड़ता हुआ बस्ती में आ गया है। उसे आप घेरकर मार सकते हैं, लेकिन एक बार वह फिर जंगल में पहुँच जाय, तो कौन है, जो उसके पंजों के सामने जाने की हिम्मत कर सके। कर्बला से निकलकर हुसैन वह दरिया होंगे, जो बाँध को तोड़कर बाहर निकल आया हो, और आपकी हालत उसी टूटे हुए बाँध की-सी होगी।
ज़ियाद---हाँ, इसमें तो कोई शक नहीं कि अगर वह निकलकर हिजाज और यमन चले जायँ, तो शायद ख़लीफ़ा यज़ीद की ख़िलाफ़त डगमगा जाय। मगर एक शर्त यह भी तो है कि उन्हें यज़ीद के पास जाने दिया जाय। इसमें हमें क्या उज्र हो सकता है?
शिमर---अगर बाज़ कबूतर के क़रीब पहुँच जाय, तो दुनिया की कोई फ़ौज उसे बाज़ के चंगुल से नहीं बचा सकती। हुसैन अपने बाप के बेटे हैं। ख़लीफ़ा उनकी दलीलों से पेश नहीं पा सकते। कोई अजब नहीं कि अपनी अक्ल के ज़ोर से अाज का क़ैदी कल का ख़लीफ़ा हो और ख़लीफ़ा को उलटे उसकी बैयत क़बूल करनी पड़े।
ज़ियाद---तुम्हारा यह ख़याल भी बहुत सही है। काश मुझे तुम्हारी वफ़ादारी का इतना इल्म पहले होता, तो तुम्हीं फ़ौज के सिपहसालार होते।
शिमर---काश साद ने मेरी बातें इतनी क़द्रदानी से सुनी होतीं, तो मुझे यहाँ आने और आपको तकलीफ़ देने की ज़रूरत ही न पड़ती।
ज़ियाद---तुम सुबह चले जाओ, और साद से कहो कि फ़ौरन् जंग शुरू करे।
शिमर---हुजूर को जो हुक्म देना हो, खत के जरिए दें। मातहत के ज़रिए उसके अफ़सर को हुक्म देना अफ़सर को मातहत के खून का प्यासा बनाना है।
ज़ियाद---बेहतर, मैं खत ही लिख देता हूँ।
[ ज़ियाद खत लिखकर शिमर को देता है। ]
शिमर---इसमें हुजूर ने ऐसा कोई कलमा तो नहीं लिखा, जिसमें साद को शुबहा हो कि मेरे इशारे से लिखा गया है?
ज़ियाद---मुतलक़ नहीं। हाँ, यह अलबत्ता लिख दिया है कि अगर तूने सिरताबी की, तो तेरी जगह शिमर लश्कर का सरदार होगा।
शिमर---हुजूर की क़द्रदानी की कहाँ तक तारीफ़ करूँ।
ज़ियाद---इसकी ज़रूरत नहीं। अगर साद मेरे हुक्म की तामील करे, तो बेहतर, नहीं तो वह माजूल होगा, और तुम लश्कर के सरदार होगे। पहला काम जो तुम करोगे, वह साद का सिर क़लम करके मेरे पास भेजना होगा। यही तुम्हारी बहाली की बिस्मिल्लाह होगी।
शिमर---( उठकर ) आदाब बजा लाता हूँ।
[ शिमर बाहर चला जाता है, और ज़ियाद मकान में आराम करने जाता है। ]
छठा दृश्य
[ प्रातःकाल। शाम का लश्कर। हुर और साद घोड़ों पर सवार फ़ौज का मुआयना कर रहे हैं। ]
हुर---अभी तक ज़ियाद ने आपके ख़त का जवाब नहीं दिया?
साद---उस के इन्तज़ार मे रात-भर आँखें नहीं लगी। जब किसी की आहट मिलती थी, तो गुमान होता था कि क़ासिद है। मुझे तो यक़ीन है कि अमीर ज़ियाद मेरी तजवीज़ मजूर कर लेंगे।
हुर---काश ऐसा होता! अगर जंग की नौबत आयी, तो फ़ौज के कितने ही सिपाही लड़ने से इनकार कर देगे।
[ सामने से शिमर घोड़ा दौड़ाता हुआ आता है। ]
साद---लो, क़ासिद भी आ गया। ख़ुदा करे, अच्छी ख़बर लाया हो। अरे, यह तो शिमर है।
हुर---हाँ, शिमर, ही है । ख़ुदा ख़ैर करे, जब यह ख़ुद जियाद के पास गया था, तो मुझे आपकी तजवीज के मंजूर होने में बहुत शक है।
शिमर---( करीब आकर ) अस्सलामअलेक। मैं कल एक ज़रूरत से मकान चला गया। अमीर जियाद को ख़बर हो गयी, उसने मुझे बुलाया, और आपको यह खत दिया।
[ खत साद को देता है। साद ख़त पढ़कर जेब में रख लेता है, और एक लम्बी साँस लेता है। ]
साद---शिमर, मैंने समझा था, तुम सुलह की ख़बर लाते होगे।
शिमर---आपकी समझ की ग़लती थी। आपको मालूम है कि अमीर ज़ियाद एक बार फ़ैसला करके फिर उसे नहीं बदलते। आपकी क्या मंशा है?
साद---मजबूरन् हुक्म को तामील करूँगा।
शिमर---तो मैं फौजों को तैयार होने का हुक्म देता हूँ?
साद---जैसा मुनासिब समझो।
[ शिमर फ़ौज़ की तरफ़ चला जाता है। ]
हुर---खुदा सब कुछ करे, इन्सान का बातिन स्याह न बनाये।
साद---यह सब इन्हीं हजरत की कारगुजारी है। ज़ियाद मेरी तरफ़ से कभी इतने बदग़ुमान न थे।
हुर---मुझे तो फ़र्ज़न्दे-रसूल से लड़ने के ख़याल ही से वहशत होती है।
साद---हुर, तुम सच कहते हो। मुझे यकीन है कि उनसे जो लड़ेगा, उसकी जगह जहन्नुम में है। मगर मजबूर हूँ, 'रे' की परवा न करूँ, तो भी घर की तरफ से बेफ़िक्र तो नहीं हो सकता। अफ़सोस, मैं हविस के हाथों तबाह हुअा। काश मेरा दिल इतना मजबूत होता कि 'रे' की निज़ामत पर लट्टू न हो जाता, तो आज मैं फ़र्ज़न्दे-रसूल के मुक़ाबले पर न खड़ा होता । हुर, क्या इस जंग के बाद किसी तरह मग़फ़ हो सकती है?
हुर---फ़र्ज़न्दे रसूल के खून का दाग़ कैसे धुलेगा?
साद---हुर, मैं इतने रोजे रक्खूँगा कि मेरा जिस्म घुल जाय, इतनी नमाज़े अदा करूँगा कि आज तक किसी ने न की होंगी। रै' की सारी आमदनी खैरात कर दूँगा। पियादा पा हज करूँगा, और रसूल पाक की क़ब्र पर बैठकर रोऊँगा, गुनहगारों की ख़ताएँ मुआफ़ करूँगा, और एक चींटी को भी ईज़ा न पहुँचाऊँगा। हाय! ज़ालिम शिमर सोचने का मौक़ा भी नहीं देना चाहता। फ़ौज़ें तैयार हो रही हैं। क़ीस, हज्जाज, शीस, अशअस अपने-अपने आदमियों को स़फ़ों में खड़े करने लगे। वह लो, नक्क़ारे पर चोट भी पड़ गयी।
हुर---मैं भी जाता हूँ, अपने आदमियों को सँभालूँ।
[ आहिस्ता-आहिस्ता जाता है। ]
साद---ऐ खुदा! बहुत बेहतर होता कि तूने मुझे शिमर की तरह स्याह बातिन बनाया होता कि अज़ाब और सबाब की कशमकश से आज़ाद हो जाता, या हानी और कसीर का-सा दिल दिया होता कि अपने को ग़ैर पर कुरबान कर देता। कमज़ोर इन्सान भी जानता है कि मुझे क्या करना चाहिए, और क्या नहीं कर सकता। वह ग़ुलाम से भी बदतर है, जिसका अपनी मर्ज़ी पर कोई अधिकार नहीं। मेरे क़बीलेवालों ने भी सफ़बंदी शुरू कर दी। मुझे भी अब जाकर अपनी जगह पर सबसे आगे चलना चाहिए, और वही करना चाहिए, जो शिमर कराये, क्योंकि अब मैं फ़ौज का सरदार नहीं हूँ, शिमर है।
[ आहिस्ता-आहिस्ता जाकर फ़ौज के सामने खड़ा हो जाता है। ]
शिमर---( उच्च स्वर से ) ऐ ख़िलाफ़त को ज़िन्दा रखने के लिए अपने तई क़ुरबान करनेवाले बहादुरो, ख़ुदा का नाम लेकर क़दम आगे बढ़ाओ। दुश्मन तुम्हारे सामने है। वह हमारे रसूल पाक का नेवासा है, और उस रिश्ते से हम सब ताजीम से उसके आगे सिर झुकाते हैं। लेकिन जो आदमी हिर्स का इतना बन्दा है कि रसूल पाक के हुक्म का, जो उन्होंने ख़िलाफ़त को अब तक कायम रखने के लिए दिया था, पैरों-तले कुचलता है, और जो क़ौम की बैयत की परवा न करके अपने विरासत के हक़ के लिए ख़िलाफ़त को खाक में मिला देना चाहे, वह रसूल का नेवासा होते हुए भी मुसलमान नहीं है। हमारी निगाहों में रसूल के हुक्म की इज़्ज़त उसके नेवासे की इज़्ज़त से कहीं ज्यादा है। हमारा फ़र्ज़ है कि हमने जिस खलीफ़ा की बैयत क़बूल की है, उसे ऐसे हमलों से बचायें, जो हिर्स को पूरा करने के लिए दाद के नाम पर किये जाते हैं। चलो, फ़र्ज़ के मैदान में क़दम बढ़ाओ।
[ नक्क़ारे पर चोब पड़ती है, और पूरा लश्कर हुसैन के पड़ाव की तरफ़ बढ़ता है। साद आगे क़दम बढ़ाता हुआ हुसैन के खेमे के क़रीब पहुँच जाता है। ]
अब्बास---( हुसैन के खेमे से निकलकर ) साद! यह दग़ा! हम तुम्हारे जवाब का इन्तजार कर रहे हैं, और तुम हमारे ऊपर हमला कर रहे हो? क्या यही आईने-ज़ंग है?
साद---हज़रत, कलाम पाक को क़सम, मैं दग़ा के इरादे से नहीं आया। ( ज़ियाद का ख़त अब्बास के हाथ में देकर ) यह देखिए, और मेरे साथ इन्साफ़ कीजिए। मैं इस वक्त नाम के लिए फ़ौज का सरदार हूँ। अख़्तयार शिमर के हाथों में है।
अब्बास---( ख़त पढ़कर ) आखिर तुम दुनिया की तरफ़ झुके। याद रक्खा, खुदा को दरगाह में शिमर नहीं, तुम ख़तावार सभझे जाओगे।
साद---या हज़रत, यह जानता हूँ, पर ज़ियाद के ग़ुस्से का मुक़ाबला नहीं कर सकता। वह बिल्ली है, मैं चूहा हूँ; वह बाज़ है, मैं कबूतर हूँ। वह एक इशारे से मेरे ख़ानदान का निशान मिटा सकता है। अपनी हिफ़ाज़त की फिक्र ने मुझे मजबूर कर दिया है, मेरे दीन और ईमान को फ़ना कर दिया है।
अब्बास---खुलासा यह है कि तुम हमारा मुहासिरा करना चाहते हो। ठहरो, मैं जाकर भाई साहब को इत्तिला दे दूँ।
[ अब्बास हुसैन के खेमे की तरफ़ जाते हैं। ]
शिमर---( साद के पास आकर ) क्या अब कोई दूसरी चाल चलने की सोच रहे हैं?
साद---नहीं, हज़रत हुसैन को हमारी आमद और मंशा की इत्तिला देने गये है।
शिमर---यह मौक़े को हमारे हाथों से छीनने का हीला है। शायद कबीलों से इमदाद तलब करने का क़स्द कर रहे हैं। एक दिन की देर भी उन्हें मौक़े का बादशाह बना सकती है।
[ अब्बास खेमे से वापस आते हैं। ]
अब्बास---मैंने हज़रत हुसैन को तुम्हारा पैग़ाम दिया। हज़रत को इसका बेहद सदमा है कि उनकी कोई शर्त मंजूर नहीं की गयी। सुलह की इससे ज़्यादा कोशिश उनके इमकान में न थी। गोकि हम सब जंग के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्होंने एक दिन की मुहलत माँगी है कि दुआ और नमाज़ में गुजारें। सुबह को हमें ख़ुदा का जो हुक्म होगा, उसकी तामील करेंगे।
साद---इसका जवाब मैं अपनी फ़ौज के दूसरे सरदारों से मशविरा करके दूँगा।
[ अब्बास अपने खेमों की तरफ़ जाते हैं, और हुर, हज्जाज, अशअस, क़ीस सब साद के पास आकर खड़े हो जाते हैं। ]
साद---शिमर, तुम्हारी इस मामले में क्या सलाह है?
शिमर---यह उनकी हीलेबाज़ी है। आइन्दा आप अमीर हैं, जो जी चाहे, करें।
साद---( दूसरे सरदारों से मुख़ातिब होकर ) हजरत हुसैन ने एक दिन की मुहलत की दरख़्वास्त की है, आप लोगों की क्या सलाह है?
शिमर---इसका आप लोग ख़याल रखिएगा कि यह मुहलत आफ़त के मीज़ान को पलट सकती है।
हुर---मुहलत के मंजूर करने में पसोपेश का कोई मौक़ा नहीं।
हज्जाज---हुसैन अगर काफ़िर होते, और मुहलत की दरख़्वास्त करते, तो भी उसको क़बूल करना लाज़िम था।
क़ीस---बहुत मुमकिन है, वह कल तक आपस में सलाह करके य़जीद की बैयत क़बूल कर लें, तो नाहक़ खूँरेजी क्यों हो।
शिमर---और अगर शाम तक बनी, असद और दूसरे क़बीले उनकी मदद के लिए आ जायँ, तो?
शीस---हज़रत हुसैन ने अभी तक किसी क़बीले से इमदाद नहीं तलब की है, वरना हम इतने इतमीनान से यहाँ न खड़े होते।
साद---बनी और असद ही नहीं, अगर इराक़ के सारे क़बीले अा जायँ, तब भी हम आज उन्हें जंग के लिए मजबूर नहीं कर सकते। यह इन्सानियत के खिलाफ़ है। मेरा यही फ़ैसला है। आइन्दा आप लोगों को अख्तियार है।
[ साद गुस्से में भरा हुआ वहाँ से चला जाता है। ]
शिमर---क्या आप लोगों की यही मर्ज़ी है कि आज जंग मुल्तवी की जाय?
हुर---यहाँ जितने असहाब मौजूद हैं, सब अपनी रायें दे चुके, अमीरे-लश्कर भी चला गया। ऐसी हालत में मुहलत के सिवा और हो ही क्या सकता है। अगर आप अपनी जिम्मेदारी पर जंग करना चाहते हैं, तो शौक़ से कीजिए।
[ हुर, हज्जाज वग़ैरह भी चले जाते हैं। ]
शिमर---( दिल में ) कौन कहता है कि हुसैन के साथ दग़ा की गयी? यहाँ सब-के-सब हुसैन के दोस्त हैं। इस फ़ौज में रहने से कहीं यह बेहतर था कि सब-के-सब हुसैन की फ़ौज में होते। तब भी उनकी इतनी मदद न कर सकते। मुझे जरा भी ताज्जुब न होगा, अगर कल सब लोग हथियार रखकर हुसैन के क़दमों पर गिर पड़ें। ज़ियाद को इस मुहलत की भी इत्तिला तो दे ही हूँ।
[ साद का क़ासिद मुहलत का पैग़ाम लेकर हुसैन के लश्कर की तरफ़ आता है। शिमर अपने ख़ेमे की तरफ़ जाता है। ]
सातवाँ दृश्य
[ समय ८ बजे रात। हुसैन एक कुर्सी पर मैदान में बैठे हुए हैं। उनके दोस्त और अज़ीज़ सब फ़र्श पर बैठे हुए हैं। शमा जल रही है। ]
हुसन---शुक्र है खुदाए-पाक का, जिसने हमें ईमान की रोशनी अता की, ताकि हम नेक को क़बूल करें, और बद से बचें। मेरे सामने इस वक्त मेरे बेटे और भतीजे, भाई और भांजे, दोस्त और रफ़ीक़, सब जमा हैं। मैं सबके लिए ख़ुदा से दुआ करता हूँ। मुझे इसका फ्रख़ है कि उसने मुझे ऐसे सआदतमंद अज़ीज़ और ऐसे जाँनिसार दोस्त अता किये आपने दोस्ती का हक़ पूरी तरह अदा कर दिया, आपने साबित कर दिया कि हक़ के सामने आप जान और माल की कोई हक़ीक़त नहीं समझते। इस्लाम की तारीख़ में आपका नाम हमेशा रोशन रहेगा। मेरा दिल इस ख़याल से पाश-पाश हुअा जाता है कि कल मेरे बायस वे लोग, जिन्हें ज़िन्दा हिम्मत चाहिए, जिनका हक़ है ज़िन्दा रहना, जिनको अभी ज़िन्दगी में बहुत कुछ करना बाकी है, शहीद हो जायँगे। मुझे सच्ची खुशी होगी, अगर तुम लोग मेरे दिल का यह बोझ हल्का कर दोगे। मैं बड़ी खुशी से हरएक को इजाज़त देता हूँ कि उसका जहाँ जी चाहे, चला जाय। मेरा किसी पर कोई हक़ नहीं है। नहीं, मैं तुमसे इल्तमास करता हूँ, इसे क़बूल करो। तुमसे किसी की दुश्मनी नहीं हुई है, जहाँ जाओगे, लोग तुम्हारी इज़्ज़त करेंगे। तुम ज़िन्दा शहीद हो जाओगे, जो मरकर शहादत का दर्जा पाने से इज़्ज़त की बात नहीं। दुश्मन को सिर्फ़ मेरे खून की प्यास है, मैं ही उसके रास्ते का पत्थर हूँ। अगर हक़ और इन्साफ को सिर्फ़ मेरे ख़ून से आसूदगी हो जाय, तो उसके लिए और खून क्यों बहाया जाय? साद से एक शब की मुहलत माँगने में यही मेरा खयाल था। यह देखो, मैं यह शमा ठंढी किये देता हूँ, जिसमें किसी की हिजाब न हो।
[ सब लोग रोने लगते हैं, और कोई अपनी जगह से नहीं हिलता। ]
अब्बास---या हज़रत, अगर आप हमें मारकर भगायें तो भी हम नहीं जा सकते। खुदा वह दिन न दिखाये कि हम आपसे जुदा हों। आपकी शफ़क़त के साये में पल-कर अब हम सोच ही नहीं सकते कि आपके बग़ैर हम क्या करेंगे, कैसे रहेंगे।
अली अकबर---अब्बाजान, यह आप क्या फ़रमाते हैं? हम आपके क़दमों पर निसार होने के लिए आये हैं। आपको यहाँ तनहा छोड़कर जाना तो क्या, महज उसके खयाल से रूह को नफ़रत होती है।
हबीब---खुदा की क़सम, आपको उस वक्त तक नहीं छोड़ सकते, जब तक दुश्मनों के सीने में अपनी तेज बर्छियाँ न चुभा लें। अगर मेरे पास तलवार भी न होती, तो मैं आपकी हिमायत पत्थरों से करता।
अब्दुल्लाह कलवी---अगर मुझे इसका यक़ीन हो जाय कि मैं आपकी हिमायत में जिन्दा जलाया जाऊँगा, और फिर ज़िन्दा होकर जलाया जाऊँगा। और यह अमल सत्तर बार होता रहेगा, तो भी मैं आपसे जुदा नहीं हो सकता। आपके क़दमों पर निसार होने से जो रुतबा हासिल होगा, वह ऐसी-ऐसी बेशुमार ज़िन्दगियों से भी नहीं हासिल हो सकता।
ज़हीर---हज़रत, आपने ज़बाने-मुबारक से ये बातें निकालकर मेरी जितनी दिलशिकनी की है, उसका काफ़ी इज़हार नहीं कर सकता। अगर हमारे दिल दुनिया की हविस से मग़लूब भी हो जायँ, तो हमारे क़दम किसी दूसरी तरफ़ जाने से गुरेज़ करेंगे। क्या आप हमें दुनिया में कस्याह और बेग़ैरत बनाकर ज़िन्दा रखना चाहते हैं?
अली असगर---आप तो मुझे शरीक किये बग़ैर कभी कोई चीज़ न खाते थे, क्या जन्नत के मजे अकेले उठाइएगा? शमा जलवा दीजिए हमें इस तारीकी में आप नज़र नहीं आते।
हुसैन---आह! काश रसूले-पाक अाज ज़िन्दा होते और देखते कि उनकी औलाद और उनकी उम्मत हक़ पर कितने शौक़ से फ़िदा होती है! ख़ुदा से मेरी यही इल्तजा है कि इस्लाम में हक़ पर शहीद होनेवालों की कभी कमी न रहे। असग़र, बेटा अाओ, तुम्हारे बाप की जान पर फ़िदा हो, हम-तुम साथ-साथ जन्नत के मेवे खायेंगे। दोस्तो, आओ, नमाज़ पढ़ लें। शायद यह हमारी आख़िरी नमाज़ हो।
[ सब लोग नमाज़ पढ़ने लगते हैं। ]
आठवाँ दृश्य
[ प्रातःकाल हुसैन के लश्कर में जंग की तैयारियां हो रही हैं। ]
अब्बास---खेमे एक दूसरे से मिला दिये गये, और उनके चारों तरफ़ खंदकें खोद डाली गयीं, उनमें लकड़ियाँ भर दी गयीं, नक्क़ारा बजवा दूँ?
हुसैन---नहीं, अभी नहीं। मैं जंग में पहले क़दम नहीं बढ़ाना चाहता। मैं एक बार फिर सुलह की तहरीक करूँगा। अभी तक मैंने शाम के लश्कर से कोई तकरीर नहीं की, सरदारों ही से काम निकालने की कोशिश करता रहा। अब मैं जवानों से रूबरू बातें करना चाहता हूँ। कह दो, साँडनी तैयार करे।
अब्बास---जैसा इर्शाद।
हुसैन---( दुआ करते हुए ) ऐ ख़ुदा! तू ही डूबती हुई किश्तियों को पार लगानेवाला है। मुझे तेरी ही पनाह है, तेरा ही भरोसा है; जिस रंज से दिल कमज़ोर हो, उसमें तेरी ही मदद माँगता हूँ; जो आफ़त किसी तरह सिर से न टले, जिसमें दोस्तों से काम न निकले, जहाँ कोई हीला न हो, वहाँ तू ही मेरा मददगार है।
[ खेमे से बाहर निकलते हैं। हबीब और ज़हीर आपस में नेज़ेबाज़ी का अभ्यास कर रहे हैं। ]
हबीब---या हज़रत, खुदा से मेरी यही दुआ है कि यह नेज़ा साद के जिगर में चुभ जाय, और 'रै' की सूबेदारी का अरमान उसके ख़ून के रास्ते निकल जाय।
जहीर---उसे सूबेदारी जरूर मिलेगी। जहन्नुम की या 'रै' की, इसका फ़ैसला मेरी तलवार करेगी।
हबीब---वाह! वह मेरा शिकार है, उधर निगाहें न उठाइएगा। आपके लिए मैंने शिमर को छोड़ दिया।
जहीर---बखुदा, वह मेरे म़ुकाबिले आये, तो मैं उसकी नाक काटकर छोड़ दूँ। ऐसे बदनीयत आदमी के लिए जहन्नुम से ज्यादा तकलीफ़ दुनिया ही में है।
अब्बास---और मेरे लिए कौन-सा शिकार तजवीज़ किया?
हबीब---आपके लिए ज़ियाद हाज़िर है।
हुसैन---और मेरे लिए? क्या मैं ताकता ही रहूँगा?
ज़हीर---आपको कोई शिकार न मिलेगा।
हुसैन--–मेरे साथ यह ज़्यादती क्यों?
ज़हीर---इसलिए कि अाप भी शिकारियों की जेल में आ जायँगे, तो जन्नत की नियामतों में भी साझा बँटायेंगे। आपके लिए रसूले-पाक की क़ुर्बत कानी है। जन्नत की नियामतों में हम आपको शरीकध नहीं करना चाहते।
हुसैन--–मैं जरा साद के लश्कर से बातें करके आ जाऊँ, तो इसका फ़ैसला हो।
हबीब---उन गुमराहों की फ़रमाइश करना बेकार है। उनके दिल इतने सख़्त हो गये हैं कि उन पर कोई तक़रीर असर नहीं कर सकती।
हुसैन--–ताहम कोशिश करना मेरा फ़र्ज़ है।
[ परदा बदलता है। हुसैन अपनी साँडनी पर साद की फ़ौज के सामने खड़े हैं। ]
हुसैन---ऐ लोगो, कूफ़ा और शाम के दिलेर जवानो और सरदारो! मेरी बात सुनो, जल्दी न करो। मुसलमान अपने भाई की गर्दन पर तलवार चलाने मे जितनी देर करे, ऐन सवाब है। मैं उस वक्त तक खूँरेजी नहीं करना चाहता, जब तक तुम्हें इतना न समझा लूँ, जितना मुझ पर वाजिब है। मैं ख़ुदा और इन्सान, दोनों ही के नज़दीक इस जंग की जिम्मेदारी से पाक रहना चाहता हूँ, जहाँ भाई की तलवार भाई की गर्दन पर होगी । तुम्हें मालूम है, मैं यहाँ क्यों अाया? क्या मैंने इराक़ या शाम पर फ़ौजकशी की? मेरे अज़ीज़ दोस्त और अहलेबैत अगर फ़ौज कहे जा सकते हों, तो बेशक मैंने फौजकशी की। सुनो, और इन्साफ़ करो, अगर तुम्हें खुदा का खौफ़ और ईमान का लिहाज़ है कि मैं यहाँ तुम्हारे ही सरदारों के बुलाने से अाया। मैंने अहद कर लिया था कि मैं दुनिया के झगड़ों से अलग रहकर ख़ुदा की इबादत में अपनी ज़िन्दगी के बचे हुए दिन गुज़ारूँगा। मगर तुम्हारी ही फ़रियाद ने मुझे अपने गोशे से निकाला, रसूल की उम्मत की फ़रियाद सुनकर मैं कानों में उँगली न डाल सका। अगर इस हिमायत की सजा क़त्ल है, तो यह सिर हाजिर है; शौक़ से क़त्ल करो। मैं हज्जाज से पूछता हूँ---क्या तुमने मुझे खत नहीं लिखे थे?
हज्जाज---मैंने आपको कोई खत नहीं लिखा।
हुसैन---क़ीस, तुम्हें भी खत लिखने से इनकार है?
क़ीस---मैंने कब आपसे फ़रियाद की थी?
हुसैन---और शिमर, तुमने तो दस्तखत किया था?
शिमर---सरासर ग़लत है, झूठ है।
हुसैन---खुदा गवाह है कि मैं अपनी ज़िन्दगी में कभी झूठ नहीं बोला, लेकिन आज यह दाग़ भी लगा।
क़ीस----आप यज़ीद की बैयत क्यों नहीं कर लेते कि इस्लाम हमेशा के लिए फ़ितना और फ़साद से पाक हो जाय?
हुसैन---क्या इसके सिवा मसालहत की और कोई सूरत नहीं है?
शिमर---नहीं, और कोई दूसरी सूरत नहीं है?
हुसैन---तो इस शर्त पर सुलह करना मेरे लिए ग़ैरमुमकिन है। खुदा की क़सम में ज़लील होकर तुम्हारे सामने सिर न झुकाऊँगा, और न खौफ़ मुझे यजीद की बैयत क़बूल करने पर मजबूर कर सकता है। अब तुम्हें अख्तियार है। हम भी जंग के लिए तैयार हैं।
शिमर---पहला तीर चलाने का सवाब मेरा है।
[ हुसैन पर तीर चलाता है। ] किसी तरफ़ से आवाज़ आती है---जहन्नुम में जाने का फ़ख भी पहले तुझी को होगा।
[ हुसैन ऊँटनी को अपनी फ़ौज की तरफ़ फेर देते हैं। हुर अपनी फ़ौज से निकलकर आहिस्ता-आहिस्ता हुसैन के पीछे चलते हैं। ]
शिमर---वल्लाह, हुर, तुम्हारा इस तरह अाहिस्ता-आहिस्ता अपने तई तौल-तौलकर चलना मेरे दिल में शुबहा पैदा कर रहा है। मैंने तुमको कभी लड़ाई में इस तरह काँपते हुए चलते नहीं देखा।
हुर---अपने को जन्नत और जहन्नुम के लिए तौल रहा हूँ, और हक़ यह है कि मैं जन्नत के मुकाबले में किसी चीज़ को नहीं समझता, चाहे कोई मार ही क्यों न डाले। ( घोड़े को एक एँड लगाकर हुसैन के पास पहुँच जाते हैं ] ऐ फ़र्ज़न्दे-रसूल! मैं भी आपका हमराह हूँ। खुदाबंद मुझे आप पर फिद़ा करे, मैं वही हूँ, जिसने आपको रास्ते से वापस करने की कोशिश की थी। खुदा की क़सम, मुझे उम्मीद न थी कि ये लोग आपके साथ यह बर्ताव करेंगे, और सुलह की कोई शर्त न क़बूल करेंगे, वरना मैं आपको इधर आने ही न देता, जब तक आप मेरे सिर पर न आते। अब इधर से मायूस होकर अापकी खिदमत में हाजिर हुआ हूँ कि आपकी मदद करते हुए अपने तई अापके कदमों पर निसार कर दूँ। क्या आपके नज़दीक मेरी तौबा क़बूल होगी।
हुसैन---खुदा से मेरी दुअा है कि वह तुम्हारी तौबा क़बूल करे।
हुर---अब मुझे मालूम हो गया कि मैं यज़ीद से अपनी बैयत वापस लेने में कोई गुनाह नहीं कर रहा हूँ।
[ दोनो चले जाते हैं। तीरों की वर्षा होने लगती है। ]
नवाँ दृश्य
[ शाम का वक्त। कूफ़ा का एक गाँव। नसीमा ख़जूर के बाग़ में ज़मीन पर बैठी हुई गाती है। ] / दबे हुओं को दबाती है ऐ ज़मीने-लहद, / यह जानती हूँ कि दम जिस्म नातवाँ में नहीं। / कफ़स में जी नहीं लगता है आह फिर भी मेरा, / यह जानती हूँ कि तिनका भी आशियाँ में नहीं। / उजाड़ दे कोई या फूँक दे उसे बिजली, / यह जानती हूँ कि रहना अब आशियाँ में नहीं। / खुद अपने दिल से मेरा हाल पूछ लो सारा, / मेरी ज़बाँ से मज़ा मेरी दास्ताँ में नहीं। / करेंगे आज से हम ज़ब्त, चाहे जो कुछ हो, / यह क्या किलब पे फ़ुग़ाँ और असर फ़ग़ाँ में नहीं। / ख़याल करके खुद अपने किये को रोता हूँ, / तबाहियों के सिवा कुछ मेरे मकाँ में नहीं।
[ वहब का प्रवेश ]
नसीमा---बड़ी देर की। अकेले बैठे-बैठे जी उकता गया। कुछ उन लोगों की खबर मिली?
वहब---हाँ नसीमा, मिली। तभी तो देर हुई। तुम्हारा ख़याल सही निकला। हज़रत हुसैन के साथ हैं।
नसीमा---क्या हज़रत हुसैन की फ़ौज आ गयी?
वहब---कैसी फ़ौज? कुल बूढ़े, जवान और बच्चे मिलाकर ७२ आदमी हैं। दस-पाँच आदमी कूफ़ा से भी आ गये हैं। कर्बला के बेपनाह मैदान में उनके खेमे पड़े हुए हैं। ज़ालिम ज़ियाद ने बीस-पच्चीस हज़ार आदमियों से उन्हें घेर रखा है। न कहीं जाने देता है, न कोई बात मानता है, यहाँ तक कि दरिया से पानी भी नहीं लाने देता। पाँच हज़ार जवान दरिया की हिफ़ाजत के लिए तैनात कर दिये हैं। शायद कल तक जंग शुरू हो जाय।
नसीमा---मुट्ठी-भर आदमियों के लिए २०-२५ हज़ार सिपाही! कितना ग़ज़ब है! ऐसा ग़ुस्सा आता है, ज़ियाद को पाऊँ, तो सिर कुचल दूँ।
वहब---बस, उसको यही ज़िद है कि यज़ीद की बैयत क़बूल करो। हज़रत हुसैन कहते हैं, यह मुझसे न होगा।
नसीमा---हजरत हुसैन नबी के बेटे हैं, क़ौल पर जान देते हैं। मैं होती, तो ज़ियाद को ऐसा जुल देती कि वह भी याद करता। कहती–--हाँ मुझे बैयत क़बूल है। वहाँ से जाकर बड़ी फ़ौज जमा करती, और यजीद के दाँत खट्टे कर देती। रसूल पाक को शरा में ऐसी अाफ़तों के लिए कुछ रियायत रखनी चाहिए थी। तो क्या हज़रत की फ़ौज में बड़ी घबराहट है?
वहब---मुतलक नहीं, नसीमा। सब लोग शहादत के शौक़ से मतवाले हो रहे हैं। सबसे ज्यादा तक़लीफ पानी की है। ज़रा-ज़रा-से बच्चे प्यासे तड़प रहे हैं।
नसीमा----आह जालिम! तुझसे खुदा समझे।
वहब---नसीमा, मुझे रुख़सत करो। अब दिल नहीं मानता। मैं भी हजरत हुसैन के क़दमों पर निसार होने जाता हूँ। आओ, गले मिल ले। शायद फिर मुलाकात न हो।
नसीमा---हाय वहब! क्या मुझे छोड़ जाओगे? मैं भी चलूँगी।
वहब---नहीं नसीमा, उस लू के झोंकों में यह फूल मुरझा जायगा। ( नसीमा को गले लगाकर ) फिर दिल कमज़ोर हुअा जाता है। सारी राह कम्बख़्त को समझाता आया था। नसीमा, तुम मुझे दुत्कार दो, हाँ, दुत्कार दो। खुदा, तूने मुहब्बत को नाहक़ पैदा किया।
नसीमा---( रोकर ) वहब, यह फूल किस काम आयेगा? कौन इसको सूँघेगा, कौन इसे दिल से लगायेगा! मैं भी हज़रत जैनब के क़दमों पर निसार हूँगी।
वहब---वह प्यास की शिद्दत, वह गरमी की तकलीफ़, वह हंगामे, कैसे ले जाऊँ?
नसीमा---जिन तकलीफ़ों को सैदानियाँ झेल सकती हैं, झेल सकूँगी? हीले मत करो वहब, मैं तुम्हें तनहा न जाने दूँगी।
वहब---नसीमा, तुम्हें निगाहों से देखते हुए मेरे क़दम मैदान की तरफ़ न उठेंगे।
नसीमा---( वहब के कन्धे पर सिर रखकर ) प्यारे! क्यों किसी ऐसी जगह नहीं चलते, जहाँ एक गोशे में बैठकर इस ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठायें। तुम चले जाओगे, खुदा न ख़्वास्ता दुश्मनों को कुछ हो गया, तो मेरी ज़िन्दगी रोते ही गुज़रेगी। क्या हमारी ज़िन्दगी रोने ही के लिए है? मेरा दिल अभी दुनिया की लज़्ज़तों का भूखा है। जन्नत की खुशियों की उम्मीद पर इस ज़िन्दगी को कुर्बान नहीं करते बनता। हज़रत हुसैन की फ़तह तो होने से रही। पच्चीस हज़ार के सामने जैसे सौ, वैसे ही एक सौ एक।
वहब---आह नसीमा! तुमने दिल के सबसे नाजुक हिस्से पर निशाना मारा। मेरी भी यही दिली तमन्ना है कि हम किसी अाफ़ियत के गोशे में बैठकर ज़िन्दगी की बहार लूटें। पर ज़ालिम की यह बेदर्दी देखकर खून मे जोश आ जाता है, और दिल बेअख्तियार यही चाहता है कि चलकर हज़रत हुसैन की हिमायत में शहीद हो जाऊँ। जो आदमी अपनी आँखों से जुल्म होते देखकर ज़ालिम का हाथ नहीं रोकता, वह भी खुदा की निगाहों में ज़ालिम का शरीक है।
नसीमा---मैं अपनी आँखें तुम पर सदक़े करूँ, मुझे अजाब व सबाब के मुख़मसों में मत डालो। सोचो, क्या यह सितम नहीं है कि हमारी ज़िन्दगी की बहार इतनी जल्द रुखसत हो जाय? अभी मेरे उरूसी कपड़े भी नहीं मैले हुए, हिना का रंग भी नहीं फीका पड़ा, तुम्हें मुझ पर ज़रा भी तर्स नहीं अाता? क्या ये आँखें रोने के लिए बनायी गयी हैं? क्या ये हाथ दिल को दबाने के लिए बनाये गये हैं? यही मेरी ज़िन्दगी का अंजाम है?
[ वहब के गले में हाथ डाल देती है। ]
वहब---( स्वगत ) खुदा, सँभालियो, अब तेरा ही भरोसा है। यह आशिक़ की दिल बहलानेवाली इल्तजा नहीं, माशूक़ का ईमान ग़ारत करने वाला तक़ाज़ा है।
[ साहसराय की सेना सामने से चली आ रही है। ]
नसीमा---अरे! यह फौज कहाँ से आ रही है? सिपाहियों का ऐसा अनोखा लिबास तो कहीं नहीं देखा। इनके माथों पर ये लाल-लाल बेल-बूटे कैसे बने हैं! क़सम है इन आँखों की, ऐसे सजीले, ऐसे हसीन जवान आज तक मेरी नज़र से नहीं गुजरे।
वहब---मैं जाकर पूछता हूँ, कौन लोग हैं। ( आगे बढ़कर एक सिपाही से पूछता है ) ऐ जवानो! तुम फ़रिश्ते हो या इन्सान? अरब में तो हमने ऐसे अादमी नहीं देखे। तुम्हारे चेहरों से जलाल बरस रहा है। इधर कहाँ जा रहे हो?
सिपाही---तुमने सुल्तान साहसराय का नाम सुना है? हम उन्हीं के सेवक हैं, और हज़रत हुसैन की सहायता करने जा रहे हैं, जो इस वक्त कर्बला के मैदान में घिरे हुए हैं। तुमने यज़ीद की बैयत ली है या नहीं?
वहब---मैं उस ज़ालिम की बैयत क्यों क़बूल करने लगा था।
सिपाही---तो आश्चर्य है तुम हज़रत हुसैन की फ़ौज में क्यों नहीं हो। तुम सूरत से मनचले जवान मालूम होते हो, फिर यह कायरता कैसी?
वहब---( शरमाते हुए ) हम वहीं जा रहे हैं।
सिपाही---तो फिर आओ, साथ चलें।
वहब---मेरे साथ मस्तूरात भी हैं। तुम लोग बढ़ो, हम भी आते हैं।
[ फ़ौज चली जाती है। ]
नसीमा---वह साहसराय कौन है?
वहब---यह तो नहीं कह सकता, पर इतना कह सकता हूँ कि ऐसा हक़-परस्त, दिलेर, इन्साफ़ पर निसार होनेवाला आदमी दुनिया में न होगा। बेकसों की हिमायत में कभी उसे पीछे क़दम हटाते नहीं देखा। मालूम नहीं, किस मज़हब का आदमी है, पर जिस मज़हब और जिस क़ौम में ऐसी पाक रूहें पैदा हों, वह दुनिया के लिए बरकत है।
नसीमा---इनके भी बाल-बच्चे होंगे?
वहब---बहुत बड़ा खानदान है। सात तो भाई ही हैं।
नसीमा---और मुसलमान न होते हुए भी ये लोग हज़रत हुसैन को इमदाद के लिए जा रहे हैं?
वहब---हाँ, और क्या!
नसीमा---तों हमारे लिए कितनी शर्म की बात है कि हम यों पहलूतिहीं करें।
वहब---प्यारी नसीमा, चले चलेंगे। दो-चार दिन तो ज़िन्दगी की बहार लूट लें।
नसीमा---नहीं वहब, एक लहमे की भी देर न करो। खुदा हमें जन्नत में फिर मिलायेगा, और तब हम अब्द तक ज़िन्दगी की बहार लूटेंगे।
वहब---नसीमा, अाज और सब्र करो।
नसीमा---एक लहमा भी नहीं। वहब, मुझे अब इम्तहान में न डालो। साँडनी लाओ, फौरन चलो।