कर्बला
दूसरा अंक
पहला दृश्य
[ हुसैन का क़ाफ़िला मक्का के निकट पहुँचता है। मक्का की पहाड़ियाँ नज़र आ रही हैं। लोग काबा की मसजिद के द्वार पर हुसैन का स्वागत करने को खड़े हैं। ]
हुसैन---यह लो, मक्का शरीफ़ आ गया। यही वह पाक मुक़ाम है, जहाँ रसूल ने दुनिया में कदम रखे। ये पहाड़ियाँ रसूल के सिजदों से पाक और उनके आँसुओं से रोशन हो गयी हैं। अब्बास, काबा को देखकर मेरे दिल में अजीब-सी धड़कन हो रही है, जैसे कोई ग़रीब मुसाफ़िर एक मुद्दत के बाद अपने वतन में दाखिल हो।
[ सब लोग घोड़ों से उतर पड़ते हैं। ]
जुबेर---आइए हज़रत हुसैन, हमारे शहर को अपने क़दमों से रोशन कीजिए।
[ हुसैन सबसे गले मिलते हैं । ]
हुसैन---मैं इस मेहमानेवाजी के लिए आपका मशकर हूँ।
जुबेर---हमारी जानें आप पर निसार हों। आपको देखकर हमारी आँखों में नूर आ गया है, और हमारे कलेजे ठंडे हो गये हैं। खुदा गवाह है, अापने रसूल पाक ही का हुलिया पाया है। आइए, काबा हाथ फैलाये आपका इन्तज़ार कर रहा है।
[ सब लोग मस्जिद में दाखिल होत हैं। स्त्रियाँ हरम में जाती हैं। ]
अली असग़र---अब्बा, इन पहाड़ों पर से तो हमारा घर दिखाई देता होगा?
हुसैन---नहीं बेटा, हम लोग घर से बहुत दूर आ गये हैं। तुमने कुछ नाश्ता नहीं किया?
अली अस॰--मुझे भूख नहीं है। पहले मालूम होती थी, लेकिन अब ग़ायब हो गयी है।
हुसैन---तो तुम यहीं रहो कि तुम्हें भूख ही न लगे।
हबीब--या हज़रत, आप भी जरा आराम फ़रमा लें। हमारी बहुत दिनों से तमन्ना है कि आपके पीछे खड़े होकर नमाज़ पढ़ें।
[ जुबेर और अब्बास को छोड़कर सब लोग वज़ू करने चले जाते हैं। ]
हुसैन--–क्यों जुबेर, यहाँ के लोगों के क्या ख़यालात हैं?
जुबेर---कुछ न पूछिए, मुझे यहाँ की कैफ़ियत बयान करते शरम आती है। यों ज़ाहिर में तो सब-के-सब आप पर निसार होने के लिए क़सम खायेंगे, बैंयत लेने को भी तैयार नज़र आयेंगे, मगर दिल किसी का भी साफ नहीं।
हुसैन---क्या दग़ा का अंदेशा है?
जुबेर---यह तो मैं नहीं कह सकता, क्योंकि कोई ऐसी बात देखने में नहीं आयी, लेकिन इधर-उधर की बातों से पता चलता है कि इनकी नीयत साफ़ नहीं। अजब नहीं कि यज़ीद दौलत और जागीर का लालच देकर इन्हें मिला ले। उस वक़्त यह ज़रूर आपके साथ दगा कर जायँगे। मैं तो आपको यही सलाह दूँगा कि आप मदीने वापस जायँ।
हुसैन---मुझे तो इनकी तरफ़ से दग़ा का गुमान नहीं होता। दग़ा में एक झिझक होती है, जो यहाँ किसी के चेहरे पर नज़र नहीं आती। दग़ा उसी तरह शक पैदा कर देती है, जैसे हमदर्दी एतबार पैदा करती है।
जुबेर---मगर आपको यह भी तो मालूम होगा कि दग़ा गिरगिट की तरह कभी अपने असली रंग में नहीं दिखाई देती। वह हाथों का बोसा लेती है, पैरों-तले आँखें बिछाती है, और बातों से शकर बरसाती है।
अब्बास---दोस्त बनकर सलाह देती है, खुद किनारे पर रहती है, पर दूसरों को दरिया में ढकेल देती है। आप हँसती है, पर दूसरों को रुलाती है, और अपनी सूरत को हमेशा ज़ाहिद के लिबास में छिपाये रहती है।
जुबेर---खुदा पाक की क़सम, आप मेरी तरफ इशारा कर रहे हैं। अगर आप जानते कि मैं हज़रत हुसैन की कितनी इज़्ज़त करता हूँ, तो मुझ पर दग़ा का शक न करते। अगर मैं यज़ीद का दोस्त होता, तो अब तक दौलत से मालामाल हो जाता। अगर खुद बैयत की नीयत रखता, तो अब तक खामोश न बैठा रहता। आप मुझ पर यह शुबहा करके बड़ा सितम कर रहे हैं।
हुसैन---अब्बास, मुझे तुम्हारी बातें सुनकर बड़ी शर्म आती है। जुबेर सबसे अलग-बिलग रहते हैं। किसी के बीच में नहीं पड़ते। एकान्त में बैठनेवाले आदमियों पर अक्सर लोग शुबहा करने लगते हैं। तुम्हें शायद यह नहीं मालूम है कि दग़ा गोशे से सोहबत को कहीं ज़्यादा पसन्द करती है।
[ हबीब का प्रवेश ]
हबीब---या हज़रत, मुझे अभी मालूम हुआ कि आपके यहाँ तशरीफ़ लाने की खबर यज़ीद के पास भेज दी गयी है,और मरवान यहाँ का नाज़िम बनाकर भेजा जा रहा है।
हुसैन---मालूम होता है, मरवान हमारी जान लेकर ही छोड़ेगा। शायद हम ज़मीन के परदे में चले जाएँ, तो वहाँ भी हमें आराम न लेने देगा।
अब्बास---यहाँ उसे उसकी शामत ला रही है। कलाम पाक की क़सम, वह यहाँ से जान सलामत न ले जायगा। काबा में खून बहाना हराम ही क्यों न हो, पर ऐसे रूह-स्याह का खून यहाँ भी हलाल है।
हबीब---वलीद माजूल कर दिया गया। यहाँ का आलिम मदीने जा रहा है।
हुसैन---वलीद के माजूली का मुझे सख़्त अफसोस है। वह इस्लाम का सच्चा दोस्त था। मैं पहले ही समझ गया था कि ऐसे नेक और दीनदार आदमी के लिए यज़ीद के दरबार में जगह नहीं है। अब्बास, वलीद की माजूली मेरी शहादत की दलील है।
हबीब---यह भी सुना गया है कि यज़ीद ने अपने बेटे को, जो आपका खैरख़्वाह है, नज़रबन्द कर दिया है। उसने खुल्लमखुल्ला यज़ीद की बेइन्साफी का एतराज किया था। यहाँ तक कहा था कि ख़िलाफ़त पर तुम्हारा कोई हक नहीं है। यज़ीद यह सुनकर आगबबूला हो गया। उसे क़त्ल करना चाहता था, लेकिन रूमी ने बचा लिया।
अब्बास---ऐसे ज़ालिम का कत्ल कर देना ऐन सबाब है।
हुसैन---अब्बास, यह खुदा की मंशा की दूसरी दलील है। यह उसकी बदनसीबी है कि तक़दीर ने उसे मेरी शहादत का वसीला बनाया है। अपने बेटे को कैद करने से किसी को खुशी नहीं हो सकती। जो आदमी अपने बेटे की ज़बान से अपनी तौहीन सुने, उससे ज़्यादा बदनसीब दुनिया में और कौन होगा।
जुबेर---मेरे खयाल में अगर आप कूफ़े की तरफ़ जायँ, तो वहाँ आपको मददगारों की कमी न रहेगी।
हबीब---या हज़रत, मैं कूफ़ा के क़रीब का रहनेवाला हूँ, और कूफ़ियों की आदत से खूब वाकिफ़ हूँ। दग़ा उनकी खमीर में मिली हुई है। आप उनसे बचे रहिएगा। वह आपके पास अपनी बैयत के पैग़ाम भेजेंगे। उनके क़ासिद-पर-क़ासिद आयेंगे, और आपको चैन न लेने देंगे। उनके खतों से ऐसा मालूम होगा कि सारा मुल्क आप पर फ़िदा होने के लिए तैयार है। पर आप उनकी बातों में हर्गिज़ न आइएगा। भूलकर भी कूफ़ा की तरफ़ रुख न कीजिएगा। मेरी आपसे यही अर्ज़ है कि काबा से बाहर क़दम न रखिएगा, जब तक आप यहाँ रहेगे, आप सब बलाओं से बचे रहेंगे। कूफ़ा-वाले वफ़ादारी से उतना ही महरूम हैं, जैसे चिड़िया दूध से।
हुसैन---मैं कूफ़ावालों से खूब वाक़िफ़ हूँ। तुमने और भी ख़बरदार कर दिया, इसके लिए मैं तुम्हारा मशकूर हूँ।
हबीब---मैं यही अर्ज़ करने के लिए आपकी खिदमत में हाज़िर हुआ हूँ। अगर वे लोग रोते हुए आकर आपके पैरों पर गिर पड़ें, तो भी आप उन्हें ठुकरा दीजिएगा। इसमें शक नहीं कि वे दिलेर हैं, दीनदार हैं, मेहमानेवाज़ हैं, पर दौलत के गुलाम हैं। इस ऐब ने उनकी सारी खूबियों पर परदा डाल दिया है। वज़ीफ़े और जाग़ीर के लालच और वज़ीफ़े तथा जागीर की ज़ब्ती का खौफ़ उनसे ऐसे कौल करा सकता है, जिसकी इन्सान से उम्मीद नहीं की जा सकती।
हुसैन----हबीब, मैं तुम्हारी सलाह को हमेशा याद रखूँगा।
जुबेर---हबीब, तुमने कूफ़ियों के बारे में जो कुछ कहा, वह बहुत कुछ दुरुस्त है, लेकिन तुम हज़रत हुसैन के दोस्त हो, तुमसे कहने में कोई खौफ़ नहीं कि मक्कावाले भी इस मामले में कूफ़ावालों ही के भाई-बंद हैं। इनके क़ौल और फ़ेल का भी कोई एतबार नहीं। कूफ़ की आबादी ज़्यादा है, वे अगर दिल से किसी बात पर आ जायँ, तो यज़ीद के दाँत खट्टे कर सकते हैं। मक्का की थोड़ी-सी आबादी अगर वफ़ादार भी रहे, तो उससे भलाई की कोई उम्मीद नहीं हो सकती। शाम की दो हज़ार फ़ौज इन्हें घेर लेने को काफ़ी है। भलाई या बुराई किसी ख़ास मुल्क या क़ौम का हिस्सा नहीं होती। वही सिपाह जो एक बार मैदान में दिलेरी के जौहर दिखाती है, दूसरी बार दुश्मन को देखते ही भाग खड़ी होती है। इसमें सिपाह की खता नहीं। उसके फ़ेल की ज़िम्मेदारी उसके सरदार पर है। वह अगर दिलेर है, तो सिपाह में दिलेरी की रूह फूँक सकता है; कम-हिम्मत है, तो सिपाह की हिम्मत को भी पस्त कर देगा। आप रसूल के बेटे हैं, आपको भी खुदा ने वही अक़्ल और कमाल अता किया है। यह क्योकर मुमकिन है कि आपकी साहबत का उन पर असर न पड़े। कूफ़ा तो क्या, आप हक़ को भी हक़ के रास्ते पर ला सकते हैं। मेरे खयाल में आपको किसी से बदगुमान होने की ज़रूरत नहीं।
अब्बास---जुबेर, सलाह कितनी ही माकूल हो, लेकिन उसमें ग़रज़ की बू आते ही उसकी मंशा फ़ौत हो जाती है।
हुसैन---अगर तुम्हारा इरादा यहाँ लोगों से बैयत लेने का हो, तो शौक़ से लो, मैं ज़रा भी दखल न दूँगा।
जुबेर---या हज़रत, मेरा खुदा गवाह है कि मैं आपके मुकाबले में अपने को खिलाफ़त के लायक नही समझता। मैं यज़ीद की बैयत न करूँगा, लेकिन खुदा मुझे नजात न दे,अगर मेरे दिल में आपका मुकाबला करने का ख़याल भी आया हो।
हबीब---या इमाम, अगर तकलीफ न हो, तो सहन में तशरीफ़ लाइए। अज़ान हो चुकी। लोग आपकी राह देख रहे हैं।
[ सब लोग नमाज पढ़ने जाते हैं। ]
दूसरा दृश्य
[ यज़ीद़ का दरबार--यज़ीद, जुहाक, मुआबिया, रूमी, हुर और अन्य समासद बैठे हुए हैं। दो वेश्याएं शराब पिला रही हैं। ]
यज़ीद---तुममें से कोई बता सकता है, जन्नत कहाँ है?
हुर---रसूल ने तो चौथे आसमान पर फ़रमाया है।
शम्स---मैं चौथे-पाँचवें आसमान का क़ायल नहीं। खुदा का फ़ज़्ल और करम ही जन्नत है।
रूमी---खुदा की निगाह कोई क़बरिस्तान नहीं है कि वहाँ मुर्दे दफ़न हों। जन्नत वहीं होगी, जहाँ लाशें दफ़न की जाती होंगी।
यजीद---उस्ताद, तुम भी चूक गये, फिर ज़ोर लगाना। अब की ज़ुहाक़ की बारी है। कहिए शेख़जी, जन्नत कहाँ है?
ज़ुहाक़---बतलाऊँ? इस शराब के प्याले में।
यज़ीद---पते पर पहुँचे, पर अभी कुछ कसर है। ज़रा और ज़ोर लगाओ।
जहान---उस प्याले में जो किसी नाज़नीन के हाथ से मिले।
यज़ीद---लाना हाथ। बस वही जन्नत है। मए-गुलफ़ाम हो, और किसी नाज़नीन का पंजए-मरजान हो। इस एक जन्नत पर रसूल की हज़ारों जन्नतें कुरबान हैं। अच्छा, अब बताओ, दोज़ख कहाँ है?
हुर---या खलीफ़ा आपको दीन-हक़ की तौहीन मुनासिब नहीं।
यज़ीद---हुर, तुमने सारा मजा किरकिरा कर दिया। आँखों की क़सम है, तुम मेरी मजलिस में बैठने के क़ाबिल नहीं हो। सारा मज़ा खाक में मिला दिया। यज़ीद के सामने दीन का नाम लेना मना है। दीन उन मुल्लाओं के लिए है, जो मस्जिदों में पड़े हुए गोश्त की हड्डियों को तरसते हैं, दीन उनके लिए है, जो मुसीबतों के सबब से ज़िन्दगी से बेज़ार हैं, जो मुहताज हैं, बेबस हैं, भूखों मरते हैं, जो ग़ुलाम हैं, दुर्रे खाते हैं। दीन बूढ़े मरदों के लिए, रॉड औरतों के लिए, दिवालिए सौदागरों के लिए है। इस ख़याल से उनके आँसू पुँछते हैं, दिल को तसकीन होती है। बादशाहों के लिए दीन नहीं है। उनकी नजात रसूल और खुदा के निगाह-करम की मुहताज नहीं। उनकी नजात उनके हाथों में है। दोस्तो, बतलाना हमारा पीर कौन है?
जुहाक़---पीर मुगाँ (साक़ी)।
यज़ीद---लाना हाथ। हमारा पीर साक़ी है, जिसके दस्तेकरम से हमें यह नियामत मयस्सर हुई है। अच्छा, कौन मेरे सवाल का जवाब देता है, दोज़ख कहाँ है?
सम्स---किसी सूदख़ोर की तोंद में।
यज़ीद---बिल्कुल ग़लत।
रूमी---ख़लीफ़ा के गुस्से में।
यज़ीद---(मुस्किराकर) इनाम के क़ाबिल जवाब है, मगर ग़लत।
कीस---किसी मुल्ला की नमाज में, जो जमीन पर माथा रगड़ते हुए ताकता रहता है कि कहीं से रोटियाँ पा रही हैं या नहीं।
यजीद---वल्ला, खूब जवाब है, मगर ग़लत।
जुहाक़---किसी नाज़नीन के रूठने में।
यज़ीद---ठीक, ठीक, बिल्कुल ठीक। लाना हाथ। दिल खुश हो गया---(वेश्याओं से) नरगिस, इस जवाब की दाद दो, जुहरा, शेखजी के हाथों मे बोसा दो। वह गीत गाओ, जिसमें शराब की बू हो, शराब का नशा हो, शराब की गर्मी हो।
नरगिस---आज खलीफ़ा से कोई बड़ा इनाम लूँगी।
[ गाती है ] / हाँ खुले साक़ी दरे - मैख़ाना आज, / ख़ैर हो, भर दे मेरा पैमाना आज। / नाज़ करता झूमता मस्ताना वार, / अब आता है, सूए-मैख़ाना आज। / बोसए-लब हुस्न के सदक़े में दे, / औ बुते तरसा हमें तरसा न आज। / इश्के-चश्मे-मस्त का देखो असर, / पाँव पड़ता है मेरा मस्ताना आज।
मेरे सीरो की इलाही ख़ैर हो, / है बहुत मुज़तर दिले दीवाना आज। / मुहतसिब का डर नहीं 'बिस्मिल' तुम्हें, / सूए-मस्जिद जाते हो रंदाना आज। / [एक क़ासिद का प्रवेश।]
क़ासिद—अस्सलाम अलेक या इमाम, बिन ज़ियाद ने मुझे कूफ़ा से आपकी ख़िदमत में भेजा है।
यज़ीद—ख़त लाया है?
क़ासिद—ख़त इस ख़ौफ़ से नहीं लाया कि कहीं रास्ते में बाग़ियों के हाथों में गिरफ़्तार न हो जाऊँ।
यज़ीद—क्या पैग़ाम लाया है?
क़ासिद—बिन ज़ियाद ने गुज़ारिश की है कि यहाँ के लोग हुज़ूर की बैयत क़बूल नहीं करते, और बग़ावत पर आमादा हैं। हुसैन बिन अली को अपनी बैयत लेने को बुला रहे हैं। तीन क़ासिद जा चुके हैं, मगर अभी तक हुसैन आने पर रज़ामन्द नहीं हुए, अब शहर के कई रऊसा ख़ुद जा रहे है।
यज़ीद—बिन जिय़ाद से कहो, जो आदमी मेरी बैयत न मंज़ूर करे, उसे क़त्ल कर दे। मुझसे पूछने की ज़रूरत नहीं।
रूमी—दुश्मन के साथ मुतलक़ रियायत की ज़रूरत नहीं। ज़ियाद को चाहिए कि तलवार का इस्तेमाल करने में दरेग़ न करे।
हुर—मुझे ख़ौफ़ है कि बग़ावत हो जायगी।
रूमी—सज़ा और सख़्ती यही हुकूमत के दो गुर हैं। मेरी उम्र बादशाहत के इन्तज़ाम ही में गुज़री है, इससे बेहतर और कारगर कोई तदबीर न नज़र आयी। ख़ुदा को भी अपना निज़ाम क़ायम रखने के लिए दोज़ख़ की ज़रूरत पड़ी। दोज़ख़ का ख़ौफ़ ही दुनिया को आबाद रखे हुए है। उसका रहम और इन्साफ़ फ़क़ीरों और बेकसों की तसकीन के लिए है। ख़ौफ़ ही सल्तनत की बुनियाद है। नरमी से सल्तनत का वक़ार मिट जाता है, लोग सरकश हो जाते हैं, फ़साद का बाज़ार गर्म हो जाता है। ज़ियाद से कहना, क़त्ल करो और इस तरह क़त्ल करो कि देखनेवालों के दिल थर्रा जायँ। तीरों से छिदवानो, कुत्तों से नुचवाओ, ज़िन्दा खाल खिंचवाओ, लाल लोहे से दाग़ दो। जो हुसैन का नाम ले, उसकी ज़बान तालू से खींच ली जाय। वह सज़ा सज़ा नहीं, जो सख़्त न हो।
यज़ीद---मैं इस हुक्म की ताईद करता हूँ। जा, और फिर ऐसी छोटी-छोटी बातों के लिए मेरे अाराम में बाधा न डालना।
[ क़ासिद का प्रस्थान। ] हुसैन का कूफ़ा आना मेरे लिए मौत के आने से कम नहीं। क़सम है आँखों की, वह कूफ़ा न आने पायेगा, अगर मेरा बस है।
शम्स---ताज्जुब यही है कि कूफ़ावालों ने तीन क़ासिद भेजे, और हुसैन जाने पर राज़ी नहीं हुए।
यज़दी---तैयारियाँ कर रहा होगा। वलीद अगर मेरे चचा का बेटा न होता, तो मैं अपने हाथों से उसकी आँखें निकाल लेता। उसने जान-बूझकर हुसैन को मक्का जाने दिया। मदीना ही में क़त्ल कर देता, तो मुझे आज इतनी परेशानी क्यों होती। कौन जाकर उसे गिरफ़्तार कर सकता है?
हुर---मैं इस ख़िदमत के लिए हाज़िर हूँ।
यज़ीद-अगर तुम यह काम पूरा कर दिखाओ, तो इसके सिले में मैं तुम्हें एक सूबा दूँगा, जिस पर जन्नत भी फ़िदा हो। मेरी फ़ौज से एक हजार चुने हुए आदमी ले लो, और जब आफताब निकले, तो तुम्हें यहाँ से बीस फ़र्सख़ पर देखें।
हुर---इंशाअल्लाह!
यज़ीद---जैसे शिकारी शिकार की तलाश करता है, उसी तरह हुसैन की तलाश करना। बीहड़ रास्ते, अँधेरी घाटियाँ, घने जंगल, रेतीले मैदान, सब छान डालना। दिन की फ़िक्र नहीं, पर रात को अपनी आँखों से नींद को यों भगा देना, जैसे कोई दीनदार आदमी अपने दरवाज़े से कुत्ते को भगाता है।
हुर---हक्म की तामील करूँगा। ( स्वगत ) यज़ीद बदकार है, बेदीन है, शराबी है; मगर ख़िलाफ़त को सँभाले हुए तो है। हुसैन की बैयत मुसलमानों में दुश्मनी पैदा कर देगी, ख़ून का दरिया बहा देगी, और खिलाफत का निशान मिटा देगी। ख़िलाफ़त क़ायम करना व देखना मेरा पहला फ़र्ज़ है। ख़लीफ़ा कौन और कैसा हो, यह बाद को देखा जायगा।
[ हुर का प्रस्थान ]
यज़ीद---नरगिस, रंदों में एक जाहिद था, वह खिसका, अब कोई मस्त करनेवाली ग़ज़ल गाओ। काश सल्तनत की फ़िक्र न होती, तो तुम्हारे हाथों शराब के प्याले पीता उम्र गुज़ार देता।
नर॰---खौफ़ से काँपती हुई बुलबुल मस्ताना ग़ज़लें नहीं गा सकती। शाख पर है, तो उड़ जायगी, क़फ़स में है, तो मर जायगी। मैंने खौफ़ से गुलशन को आबाद होते नहीं, वीरान होते देखा है। मेरा वतन कूफ़ा है, और मैं कूफ़ियों को खूब जानती हूँ। उन पर सख्तियाँ करके आप हुसैन को बुला रहे हैं। हुसैन कूफ़े में दाखिल हो गये, तो फिर आप हमेशा के लिए इराक़ से हाथ धो बैठेंगे। कूफ़ावाले रियायतों से, जागीरों से, वज़ीफ़ों से, थपकियों से काबू में आ सकते हैं, सख्ती से नहीं। अगर एतबार न हो, तो मुझ पर अपनी ताकत आजमा लो। अगर तुम्हारी दसों उँगलियाँ दस तलवारें हो जायें, तो भी आप मेरे मुँह से एक सुर भी नहीं निकलवा सकते। कूफ़ा मुसीबत में मुब्तिला है, मैं यहाँ नहीं रह सकती।
[ प्रस्थान ]
तीसरा दृश्य
[ कूफ़ा की अदालत---काज़ी और अमले बैठे हुए हैं। क़ाज़ी के सिर पर अमामा है, बदन पर कबा, कमर में कमरबंद, सिपाही नीचे कुरते पहने हुए हैं। अदालत से कुछ दूर पर एक मस्जिद है। मुकद्दमे पेश हो रहे हैं। कई आदमी एक शरीफ़ आदमी की मुश्के कसे लाते हैं। ]
क़ाज़ी---इसने क्या ख़ता की है?
ए॰ आ॰---हुज़ूर, यह आदमी मस्जिद में खड़ा लोगों से कह रहा था कि किसी को फ़ौज में न दाख़िल होना चाहिए।
क़ाज़ी---गवाह है?
ए॰ सि॰---हुज़ूर, मैंने अपने कानों सुना है।
क़ाज़ी---इसे ले जाकर क़त्ल कर दो।
मुल॰---हुज़ूर, बिल्कुल बेगुनाह हूँ। ये दोनो सिपाही मेरी दूकान से कपड़े उठाये लेते थे। मैंने छीन लिया, इस पर इन्होंने मुझे पकड़ लिया। हुज़ूर मेरे पड़ोस के दूकानदारों से पूछ लें।बेगुनाह मारा जा रहा हूँ। मेरे बाल-बच्चे तबाह हो जायँगे।
क़ाज़ी---इसे यहाँ से हटाओ।
मुल॰---( चिल्लाकर ) या रसूल, तुम क़यामत के लिए मेरा और इस क़ातिल का फ़ैसला करना।
[ दोनो सिपाही उसे ले जाते हैं। मस्जिद की तरफ़ से आवाज़ आती है---] "या खुदा हम बेकस तेरी बारगाह में फ़रियाद करने आये हैं। हमें ज़ालिम के फन्दे से आज़ाद कर।"
[ चार सिपाही १५-२० आदमियों की मुश्कें कसेकोड़े मारते हुए लाते हैं।]
क़ाज़ी---इन पर क्या इलज़ाम है?
ए॰ सि॰---हुज़ूर, ये उन आदमियों में हैं, जिन्होंने हुसैन के पास क़ासिद भेजे थे।
क़ाज़ी॰---संगीन जुर्म है। कोई गवाह?
ए॰ सि॰---हुज़ूर , कोई गवाह नहीं मिलता। शहरवालों के डर के मारे कोई गवाही देने पर राज़ी नहीं होता।
क़ा॰---इन्हें हिरासत में रखो, और जब गवाह मिल जायँ, तो फिर पेश करो।
[ सिपाही उन आदमियों को ले जाते हैं। फिर दो सिपाही एक औरत की दोनो कलाइयाँ बाँधे हुए लाते हैं। ]
का॰---इस पर क्या इलज़ाम है?
ए॰ सि॰---हुज़ूर, जब हम लोग उन मुलज़िमों को गिरफ्तार कर रहे थे, जो अभी गये हैं, तो इसने ख़लीफ़ा को जालिम कहा था।
क़ा॰---गवाह?
ए॰ औरत---हुज़ूर, खुदा इसका मुँह न दिखाए, बड़ी बदज़बान है।
क़ा॰---इसका मकान ज़ब्त कर लो, और इसके सर के बाल नोच लो।
मु॰ औ॰---खुदाबंद, मेरी आँखें फूट जायँ, जो मैंने किसी को कुछ कहा हो। यह औरत मेरी सौत है। इसने डाह से मुझे फँसा दिया है। खुदा गवाह है कि मैं बेक़सूर हूँ।
क़ा॰---इसे फौरन् ले जाओ।
एक युवक---( रोता हुआ ) या काजी, मेरी मा पर इतना ज़ुल्म न कीजिए। आप भी तो किसी मा के बच्चे हैं। अगर कोई आपकी मा के बाल नोचवाता, तो आपके दिल पर क्या गुजरती?
क़ा॰---इस मलऊन को पकड़कर दो सौ दुर्रे लगाओ।
[ कई सिपाही आदमियों के गोल को बाँधे हुए लाते हैं। ]
क़ा॰---इन्होंने खुदा के किस हुक्म को तोड़ा है?
ए॰ सि॰---हुज़ूर, ये सब आदमी सामनेवाली मस्जिद में खड़े होकर रो रहे थे।
क़ा॰---रोना कुफ्र है। इन सबों की आँखें फोड़ डाली जायँ।
[ सैकड़ों आदमी मस्जिद की तरफ़ से तलवारें और माले लिये दौड़े आते हैं, और अदालत को घेर लेते हैं। ]
सुलेमान---क़त्ल कर दो इस मरदूद मक्कार को, जो अदालत के मसनद पर बैठा हुअा अदालत का खून कर रहा है।
मूसा---नहीं, पकड़ लो। इसे ज़िन्दा जलायेंगे।
[ कई आदमी क़ाज़ी पर टूट पड़ते हैं। ]
क़ा॰---शरा के मुताबिक़ मुसलमान पर मुसलमान का खून हराम है।
सुले॰---तू मुसलमान नहीं है! इन सिपाहियों में से एक भी न जाने पाये।
ए॰ सि॰---या सुलेमान, हमारी क्या ख़ता है? जिस आक़ा के ग़ुलाम हैं, उसका हुक्म न मानें, तो रोटियाँ क्योंकर चलें?
मू॰---जिस पेट के लिए तुम्हें खुदा के बन्दों को ईज़ा पहुँचानी पड़े, उसको चाक कर देना चाहिए।
[ सिपाहियों और बाग़ियों में लड़ाई होने लगती है। ]
सुले॰---भाइयो, आपने इन ज़ालिमों के साथ वही सलूक किया, जो वाजिब था, मगर भूल न जाइए कि ज़ियाद इसकी इत्तिला यज़ीद को ज़रूर देगा, और हमें कुचलने के लिए शाम से फ़ौज आयेगी। आप लोग उसका मुक़ाबला करने को तैयार हैं?
एक आवाज़---अगर तैयार नहीं हैं, तो हो जायँगे।
सुले॰---हमने अभी तक यज़ीद की बैयत नहीं क़बूल की, और न करेंगे। इमाम हुसैन की ख़िदमत में बार-बार क़ासिद भेजे गये, मगर वह तशरीफ़ नहीं लाये। ऐसी हालत में हमें क्या करना चाहिए?
हानी---हममें से चन्द ख़ास आदमी खुद जायँ, और उन्हें साथ लायें।
मुख़्तार---हम लोगों ने रसूल की औलाद के साथ बार-बार ऐसी दग़ा की है कि हमारा एतबार उठ गया। मुझे खौफ़ है कि हज़रत हुसैन यहाँ हर्गिज़ न आयेंगे।
सुले॰--–एक बार अाख़िरी कोशिश करना हमारा फ़र्ज़ है हम लोग चलकर उनसे अर्ज़ करें कि हम क़त्ल किये जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं, हमारी औरतों की आबरू भी सलामत नहीं। हमारी मुसीबत की कहानी सुनकर हुसैन को ज़रूर तरस आयेगा, उनका दिल इतना सख़्त नहीं हो सकता।
मुख़्तार---मगर वह तुम्हारी मुसीबतों पर तरस खाकर आये, और तुमने उनकी मदद न की, तो सब-के-सब रूस्याह कहलाओगे। हमने पहले जो दग़ाएँ की हैं, उनका फल पा रहे हैं, और फिर वही हरक़त की, तो हम दुनिया और दीन में कहीं भी मुँह न दिखा सकेंगे। खूब सोच लो, खीर तक तुम अपने ईरादे पर क़ायम रह सकोगे? अगर तुम्हारा दिल हामी भरे, तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि उन्हें खींच लाऊँगा। लेकिन अगर तुम्हारे दिल कच्चे हैं, तुम अपनी जानें निसार करने को तैयार नहीं हो, अगर तुम्हें खौफ़ है कि तुम लालच के शिकार बन जाओगे, तो तुम उन्हें मक्के में पड़ा रहने दो।
हज्जाज़---खुदा की क़सम, हम उनके पैरों पर अपनी जानें निछावर कर देंगे।
हारिस---हम अपनी बदनामी के दाग़ मिटा देंगे।
मुख़्तार---खुदा को हाज़िर जानकर वादा करो कि अपने कौल पर क़ायम रहोगे। कई आदमी एक साथ---अल्लाहोअकबर! हम हुसैन पर फ़िदा हो जायँगे।
सुले॰---तो मैं उनकी ख़िदमत में ख़त लिखता हूँ।
[ ख़त लिखता है। ]
हज्जाज़---इतना ज़रूर लिख देना कि हम आपके नाना मुहम्मद मुस्तफ़ा का वास्ता देकर आपसे अर्ज़ करते हैं कि हमारे ऊपर रहम कीजिए।
हारिस---यह और लिख देना कि हम बेशुमार अर्ज़ियाँ आपकी ख़िदमत में भेज चुके, और आप तशरीफ़ न लाये। अगर आप अब भी न आये, तो हम कल क़यामत के रोज़ रसूल के हज़ूर में आपका दामन पकड़ेंगे।
हज्जाज़---और कहेंगे, या खुदा, हुसैन ने हम पर जुल्म किया था। क्योंकि हम पर ज़ुल्म होते देखकर वह ख़ामोश बैठे रहे, तो उस वक्त आप क्या जवाब देंगे, और रसूल को क्या मुँह दिखायेंगे।
कीस---मेरे क़बीले में एक हज़ार जवान हैं, जो हुसैन के इन्तज़ार में बैठे हुए हैं।
हज्जाज़---शायद शाम तक ज़ियाद कुछ अादमी जमा कर ले।
हारिस---अभी वह ख़ामोश रहेगा। यज़ीद की फौज आ जायगी, तब हमारे ऊपर हमला करेगा।
शिमर---क्यों न लगे हाथ उसका भी ख़ातमा कर दें, क़िस्सा पाक हो?
हारिस---वाह, अब तक वह यहाँ बैठा होगा।
सुले॰---मैंने सारी दास्तान लिख दी। कौन इस ख़त को ले जायगा?
शिमर---मैं हाज़िर हूँ।
सुले॰---किसके पास ऐसी साँड़नी है, जो थकना न जानती हो, जो इस तरह दौड़ सकती हो, जैसे ज़ियाद लूट के माल की तरफ़?
एक युवक---मेरे पास ऐसी साँड़नी है, जो तीन दिन में इस ख़त का जवाब ला सकती है। यह ख़िदमत बजा लाने का हक़ मेरा है, क्योंकि मुझसे ज़्यादा मज़लूम और कोई न होगा, जिसकी मा के बाल क़ाज़ी के हुक्म से अभी-अभी नोचे गये हैं।
सुले॰--–बेशक, तुम्हारा हक़ सबसे ज़्यादा है। यह ख़त लो, और इसके पहले कि हमारा पसीना ठंडा हो, मक्का की तरफ़ रवाना हो जाओ।
[ युवक चना जाता है। ] आइए, हम लोग मस्जिद में नमाज़ अदा कर लें। खत का जवाब तीन दिन में आयेगा। हज़रत हुसैन के आने में अभी एक महीने की देर है। ज़ियाद भी शायद उसके पहले नहीं लौट सकता। ये दिन हमें अपनी तैयारियों में सर्फ़ करने चाहिए, क्योंकि यज़ीद की ख़िलाफ़त का फ़ैसला कूफ़ा में होगा। या तो वह ख़िलाफ़त के मसनद पर बैठेगा, या जाहिलों की इबादत का मज़ार बनेगा। अगर कूफ़ा ने ख़िलाफ़त को नबी के ख़ानदान में वापस कर दिया, तो उसका नाम हमेशा रोशन रहेगा।
[ सब जाते हैं। ]
चौथा दृश्य
[ स्थान---काबा, मरदाना बैठक। हुसैन, जुबेर, अब्बास, मुस्लिम, अली असग़र अादि बैठे दिखाई देते हैं। ]
हुसैन---यह पाँचवीं सफ़ारत है। एक हज़ार से ज़्यादा ख़्तूत आ चुके हैं। उन पर दस्तख़त करनेवालों की तादाद पन्द्रह हज़ार से कम नहीं है।
मु॰—और सभी बड़े-बड़े क़बीलों के सरदार हैं। सुलेमान, हारिस, हज्जाज़, शिमर, मुख़्तार, हानी, ये मामली आदमी नहीं हैं।
जुबेर—मैं तो अर्ज़ कर चुका कि मुसल्लम इराक़ आपकी बैयत क़बूल करने के लिए बेक़रार है।
हुसैन—मुझे तो अभी तक उनकी बातों पर एतबार नहीं होता। ख़ुदा जाने, क्यों मेरे दिल में उनकी तरफ़ से दग़ा का शुबहा घुसा हुआ है। मुझे हबीब की बातें नहीं भूलतीं, जो उसने चलते-चलते कही थीं।
मु॰—गुस्ताख़ी तो है, पर आपका उन पर शक करना बेजा है। आख़िर आप उनकी वफ़ादारी का और क्या सबूत चाहते हैं? वे क़समें खाते हैं, वादे करते हैं, साफ़ लिखते हैं कि आपकी मदद के लिए बीस हज़ार सूरमा तैयार बैठे हुए हैं। अब और क्या चाहिए?
जुबेर—कम-से-कम मैं तो ऐसे सबूत पाकर पल की भी देर न करता।
अब्बास—मुझे तो इन कूफ़ियों पर उस वक़्त भी एतबार न आयेगा, अगर उनके बीसों हज़ार आदमी यहाँ आकर आपकी बैयत की क़सम खा लें। अगर वह क़ुरान शरीफ़ हाथ में लेकर क़समें खायें, तो भी मैं उनसे दूर भागूँ।
[तारिक आता है।]
तारिक—अस्सलाम अलेक या हुसैन।
हुसैन—ख़ुदा तुम पर रहमत करे। कहाँ से आ रहे हो?
तारिक—कूफ़ा के मज़लूमों ने अपनी फ़रियाद सुनाने के लिए आपकी ख़िदमत में भेजा है। आफ़ताब डूबते चला था, और आफ़ताब डूबते आया हूँ, और आफ़ताब निकलने के पहले यहाँ से जाना है।
मु॰—हवा पर आये हो या तख़्तए-सुलेमान पर? क़सम है पाक रसूल की कि मैं उस घोड़े के लिए पाँच हज़ार दीनार पेश कर सकता हूँ।
तारिक—हुज़ूर, घोड़ी नहीं, साँड़नी है, जो सफ़र में खाना और थकना नहीं जानती।
[हुसैन के हाथ में ख़त देता है।]
हुसैन—(ख़त पढ़कर) आह, कितना दर्द भरा हुआ ख़त है। ज़ालिमों ने दिल निकालकर रख दिया। यह कितना ग़ज़ब का जुमला है कि अगरअाप न आयेंगे, तो हम अाक़बत में आपसे इन्साफ़ का दावा करेंगे। आह! उन्होंने नाना का वास्ता दिया है। मैं नाना के नाम पर अपनी जान को यों फ़िदा कर सकता हूँ, जैसे कोई हरीस अपना ईमान फ़िदा कर देता है। इतना जुल्म! इतनी सख़्ती! दिन दहाड़े लूट!! दिन दहाड़े औरतों की बेआबरूई! ज़रा-ज़रा-सी बातों पर लोगों का क़त्ल किया जाना! अब्बास, अब मुझे सब्र की ताब नहीं है। मैं अपने बैयत के लिए हर्गिज़ न जाता, पर मुसीबतज़दों की हिमायत के लिए न जाऊँ, यह मेरी गै़रत गवारा नहीं करती।
मु॰---या बिरादर, आप इसका कुछ ग़म न करें, मैं इसी क़ासिद के साथ वहाँ जाऊँगा, और वहाँ की कैफ़ियत की इत्रिला दूँगा। मेरा खत देखकर आप मुनासिब फ़ैसला कीजिएगा।
हुसैन---तब तक यज़ीद उन ग़रीबों पर खुदा जाने क्या-क्या सितम ढाये। उसका अज़ाब मेरी गर्दन पर होगा। सोचो, जब क़यामत के दिन वे लोग फ़रियादी होंगे, तो मैं नाना को क्या मुँह दिखाऊँगा। वह जब मुझसे पूछेगे कि तुझे जान इतनी प्यारी थी कि तूने मेरे बंदों पर ज़ुल्म होते देखे, और खामोश बैठा रहा, उस वक्त़ मैं उन्हें क्या जवाब दूँगा। मुस्लिम, मेरा जी चाहता है कि मैं भी तुम्हारे साथ चलूँ।
मु॰---मुझे तो इसका यकीन है कि सुलेमान-जैसा आदमी कभी दग़ा नहीं कर सकता।
जुबेर---हर्गिज़ नहीं।
मु॰-पर मैं यही मुनासिब समझता हूँ कि पहले वहाँ जाकर अपना इतमीनान कर लूँ।
हुसैन---बच्चों को ग़ैब का इल्म होता है। इसका फ़ैसला अली असग़र पर छोड़ दिया जाय। क्यों बेटा, मैं भी मुस्लिम के साथ जाऊँ, या उनके ख़त का इन्तज़ार करूँ?
अली अस॰---नहीं अब्बाजान, अभी मुस्लिम चचा ही को जाने दीजिए। आप चलेंगे, तो कई दिन तैयारियों में लग जायेंगे। ऐसा न हो, इतने दिनों में वे बेचारे निराश हो जायँ।
अब्बास-बेटा, तेरी उम्र दराज़ हो। तूने ख़ूब फ़ैसला किया। खुदा तुझे बुरी नज़र से बचाये।
हुसैन---अच्छी बात है, मुस्लिम, तुम सवेरे रवाना हो जाओ। अपने साथ पाँच ग़ुलाम लेते जाओ। रास्ते शायद इनकी ज़रूरत पड़े। मैं कूफ़ावालों के नाम यह खत लिख देता हूँ, उन्हें दिखा देना। इंशा अल्लाह, हम तुमसे जल्दी ही मिलेंगे। वहाँ बड़ी एहतियात से काम लेना, अपने को छिपाये रखना, और किसी ऐसे आदमी के घर उतरना, जो सबसे ज्यादा एतबार के लायक़ हो। मेरे पास एक खत रोज़ाना भेजना।
मु॰---खुदा से दुआ कीजिए कि वह मेरी हिदायत करे। मैं बड़ी भारी ज़िम्मेदारी लेकर जा रहा हूँ। सुबह की नमाज़ पढ़कर मैं रवाना हो जाऊँगा। तब तक तारिक की साँड़नी भी आराम कर लेगी।
[ हुसैन ख़त लिखकर मुस्लिम को देते हैं। मुस्लिम दरवाजे की तरफ़ चलते हैं। ]
हुसैन---( मुस्लिम के साथ दरवाज़े तक आकर ) रात तो अँधेरी है।
मु॰---उम्मीद की रोशनी तो दिल में है।
हुसैन--–( मुस्लिम से बग़लगीर होकर) अच्छा भैया, जाओ। मेरा दिल तुम्हारे साथ रहेगा। जो कुछ होनेवाला है, जानता हूँ। इसकी ख़बर मिल चुकी है। तक़दीर से कोई चारा नहीं, नहीं जानता, यह तक़दीर क्या है! अगर खुदा का हुक्म है, तो छुपकर, सूरत बदलकर, दगाबाज़ों की तरह क्यों आती है। खुदा क्या साफ़ और खुले हुए अल्फ़ाज़ में अपना हुक्म नहीं भेजता। अपने बेकस बच्चों का शिकार टट्टी की आड़ से क्यों करता है? जाओ, कहता हूँ, पर जी चाहता है, न जाने दूँ। काश, तुम कह देते कि मैं न जाऊँगा। मगर तक़दीर ने तुम्हारी ज़बान बन्द कर रखी है। अच्छा, रुखसत। उम्मीद है कि अल्लाह हम दोनों को एक साथ शहादत का दर्ज़ा देगा।
[ मुस्लिम बाहर चला जाता है। हुसैन आँखें पोछते हुए हरम में दाखिल होते हैं। ]
जैनब–--भैया, आज फिर कोई क़ासिद अाया था क्या?
हुसैन---हाँ जैनब, आया था। यज़ीद कूफ़ावालों पर बड़ा ज़ुल्म कर रहा है। मेरा वहाँ जाना लाजिमी है। अभी तो, मैंने मुस्लिम को वहाँ भेज दिया है, पर खुद भी बहुत जल्द जाना चाहता हूँ।
जैनब---आपने एकाएक क्यों अपनी राय बदल दी! कम-से-कम मुस्लिम के खत के आने का तो इन्तज़ार कीजिए। मैं तो आपको हर्गिज़ न जाने दूँगी। अापका वह ख़्वाब याद है, जो आपने रसूल की क़ब्र पर देखा था?
हुसैन---हाँ जैनब, खूब याद है, और इसी वजह से मैं जाने की जल्दी कर रहा हूँ। उस ख़्वाब ने मेरी तक़दीर को मेरे सामने खोलकर रख दिया। तकदीर से बचने की भी कोई तदबीर है? खुदा का हुक्म भी टल सकता है? ख़िलाफ़त की तमन्ना को दिल से मिटा सकता हूँ, पर ग़ैरत को तो नहीं मिटा सकता, बेकसों की इमदाद से तो मुँह नहीं मोड़ सकता।
शहर॰---आप जो कुछ करते हैं, उसमें खुदा और तक़दीर को क्यों खींच लाते हैं। जब आपको मालूम है कि कूफ़ा में लोग आपके साथ दग़ा करेंगे, तो वहाँ जाइए ही क्यों। तक़दीर आपको खींच तो न ले जायगी? बेकसों की इमदाद ज़रूर अापका और आप ही का नहीं, हरएक इन्सान का फ़र्ज़ है, लेकिन आपके कुनबे की भी तो कोई ख़बर लेनेवाला हो? इन्सान पर दुनिया से पहले खानदान का हक़ होता है।
हुसैन---ज़रा इस खत को पढ़ लो, और तब कहो कि मैंने जो फ़ैसला किया है, वह मुनासिब है या नहीं। ( शहरबानू के हाथ में ख़त देकर ) देखा! इससे क्या साबित होता है? लेकिन जितने आदमियों ने इस पर दस्तखत किये हैं, उसके आधे भी मेरे साथ हो जायँगे, तो मैं यज़ीद का काफ़िया तंग कर दूँगा। इस्लाम की खिलाफ़त इतना अाला रुतबा है कि उसकी कोशिश में जान दे देना भी जिल्लत नहीं। जब मेरे हाथों में एक स्याहकार वेदीन आदमी को सज़ा देने का मौका आया है, तो उससे फ़ायदा न उठाना परले सिरे की पस्तहिम्मती है। घर में आग लगते देखकर उसमें कूद पड़ना नादानी है, लेकिन पानी मिल रहा हो, तो उससे आग को न बुझाना उससे भी बड़ी नादानी है।
सकीना---मगर अब्बाजान, अब तो मुहर्रम का महीना आ रहा है। 'फूफीजान की बहुत दिनों से आरजू थी कि इस महीने में यहाँ रहतीं।
हुसैन---तुम लोगों को ले जाने का मेरा इरादा नहीं है।
जैनब--–भैया, ऐसा भी हो सकता है कि आप वहाँ जायँ, और हम यहाँ रहें! खुदा जाने, कैसी पड़े, कैसी न पड़े।
सकीना---अब्बाजान दिल्लगी करते हैं, और आप लोग सच समझ गयीं।
कुलसूम---और कोई चले, चाहे न चले, मैं तो ज़रूर ही जाऊँगी। मेरे दिल से लगी हुई है कि एक बार यज़ीद को खूब आड़े हाथों लेती।
सकीना---मै अपनी फ़तह का कसीदा लिखने के लिए बेताब हूँ।
शहर॰---आप समझते हैं कि हमारे साथ रहने से आपको तरद्दुद होगा, पर मैं पूछती हूँ, आपको वहाँ फँसाकर दुश्मनों ने इधर हमला कर दिया, तो हमारी हिफ़ाजत की फ़िक्र आपको चैन लेने देगी?
जैनब---असग़र हुड़क-हुड़ककर जान दे देगा।
सकीना---हम अपने ऊपर इस बदनामी का दाग़ नहीं लगा सकती कि रसूल के बेटों ने तो इस्लाम की हिमायत में जान दी, और बेटियाँ हरम में बैठी रहीं।
हुसैन--–( स्वगत ) शहरबानू ने मार्के की बात कही, अगर दुश्मनों ने हरम पर हमला कर दिया, तो हम वहाँ बैठे-बैठे क्या करेंगे। इन्हें यहाँ छोड़ देना अपने क़िले की दीवार में शिग़ाफ़ कर देने से कम ख़तरनाक नहीं। ( प्रकट ) नहीं, मैं तुम लोगों पर ज़ब्र नहीं करता, अगर चलना चाहती हो, शौक़ से चलो।
पाँचवाँ दृश्य
[ यज़ीद का दरबार। मुआबिया बेड़ियाँ पहने हुए बैठा हुआ है। चार ग़ुलाम नंगी तलवारें लिये उनके चारों तरफ़ खड़े हैं। यज़ीद के तख़्त के क़रीब सरजून रूमी बैठा हुआ है। ]
मुआ॰---( दिल में ) नबी की औलाद पर यह ज़ुल्म? मुझी से तो इसका बदला लिया जायगा। बाप का क़र्ज़ बेटे ही को तो अदा करना पड़ता है! मगर मेरे खून से इस ज़ुल्म का दाग़ न मिटेगा। हर्गिज़ नहीं, इस खाऩदान का निशान मिट जायगा। कोई फ़ातिहा पढ़नेवाला भी न रहेगा। आह! नबी की औलाद पर यह ज़ुल्म! जिनके क़दमों की ख़ाक आँखों में लगानी चाहिए थी उनके तबाही के सामान है। ऐ रसूल पाक, ( प्रकट ) आप जानते है, मौलाना रूमी, कि वालिद का मुझे कब तक इन्तज़ार करना पड़ेगा?
रूमी---आते ही होंगे। ज़ियाद से कुछ बातें हो रही हैं।
मुआ॰---वालिद मुझसे चाहते है कि मैं इस मार्के में शरीक हो जाऊँ, लेकिन अगर ज़ालिमो के हाथ से अख्तियार छीनने के लिए, हक़ की हिमायत के लिए यह पहलू अख्तियार किया जाता, तो सबसे पहले मेरी तलवार म्यान से निकलती, सबसे पहले मैं ज़िहाद का झंडा उठाता, पर हक़ का खून करने के लिए मेरी तलवार कभी बाहर न निकलेगी, और मेरी ज़बान उस वक्त तक मलामत करती रहेगी, जब तक वह तालू से खींच न ली जाय। नबी की मसनद पर, जिसने दुनिया को हिदायत का चिराग़ दिखलाया, जिसने इस्लामी क़ौम की बुनियाद डाली, उस शख़्स को बैठने का मजाज़ नहीं है, जो दीन को पैरो-तले कुचलता हो, जो इन्सानियत के नाम को दाग़ लगाता हो, चाहे वह मेरा बाप ही क्यों न हो। इस्लाम का खलीफ़ा उसे होना चाहिए, जिस पर इन्सानियत को ग़रूर हो, जो दीनदार हो, हक़परस्त हो, बेदार हो, बेलौस हो, दूसरों के लिए नमूना हो, जो ताक़त से नहीं, फौज़ से नहीं, अपने कमाल से, अपने सिफ़ात से दूसरों पर अपना वक़ार जमाए।
[ यज़ीज, जुहाक, ज़ियाद, शरीक, शम्स आदि आते हैं। ]
यज़ीद---आप लोग देखिए, यह मेरा सपूत बेटा है, जो अपने बाप को कुत्ते से भी ज्यादा नापाक समझता है। मेरी फूलों को सेज में यही एक काँटा है, मेरे नियामतों के थाल में यही एक मक्खी है। आप लोग इसे समझाएँ, इसे कायल करें; इसी लिए मैंने इसे यहाँ बुलाया है। इसको समझाइए कि खलीफ़ा के लिए दीनदारी से ज़्यादा मुल्कदारी की ज़रूरत है। दीन मुल्लाओं के लिए है, बादशाहों के लिए नहीं। दीनदारी और मुल्कदारी
दो अलग-अलग चीज़े हैं, और एक ही ज़ात में दोनों का मेल मुमकिन नहीं।
मुआ॰---अगर हुकूमत करने के लिए दीन और हक़ का खून करना ज़रूरी है, तो मैं गदागरी करने को उससे बेहतर समझता हूँ। मुल्कदारी की मंशा इन्साफ़ और सच्चाई की हिफ़ाज़त करना है, उसका खून करना नहीं।
यज़ीद---आप लोग सुनते हैं इसकी बातें। यह मुझे मुल्कदारी का सबक़ सिखा रहा है। इसके सिर से अभी सौदा नहीं उतरा। इसे फिर वहीं ले जाओ। ऐसे आदमी को आज़ाद रखना ख़तरनाक है, चाहे वह तख़्त का वारिस ही क्यों न हो। बाज़ हालतें ऐसी होती है, जब इन्सान को अपने ही से बचाना जरूरी होता है। दीवाने को न रोको, तो वह अपना गोश्त काट खाता है। ( ग़ुलाम मुबाबिया को ले जाते हैं ) ज़ियाद, अब तुम अपनी दास्तान कहो। जब तक तुम मुझे इसका यक़ीन न दिला दोगे कि तुम कूफ़ा से अपनी जान के खौफ़ से नहीं, मेरे फ़ायदे के ख़याल से आये हो, मैं तुम्हें मुआफ़ न करूँगा। ऐसे नाज़ुक मौके पर जब शहर में बग़ावत का हंगामा गर्म हो, सल्तनत के हरएक मुलाज़िम का---चाहे वह सूबे का अामिल हो या शाही
महल का दरबान---यही फ़र्ज़ है कि वह अपनी जगह पर आखिर कब तक खड़ा रहे, चाहे उसका जिस्म तीरों से छलनी क्यों न हो जाय।
ज़ियाद---या खलीफ़ा, मैं अपने फ़र्ज़ से वाक़िफ़ हूँ, पर मैं सिर्फ़ यह अर्ज़ करने के लिए हाज़िर हुअा हूँ कि इस वक़्त रियाया पर सख्ती करने से हालत और भी नाज़ुक हो जायगी। जब सल्तनत को किसी दूसरे मुद्दई का खौफ हो, तो बादशाह को रियाया के साथ नरमी का , बर्ताव करके उसे अपना दोस्त बना लेना मुनासिब है। बिगड़ी हुई रियाया तिनके की तरह है, जो एक चिनगारी से जल उठती है। मेरी अर्ज़ है कि हमें इस वक्त रियाया का दिल अपने हाथ में कर लेना चाहिए, उसकी गरदने एहसानों से दबा देनी चाहिए, ताकि वह सिर न उठा सके।
यज़ीद---मेरी फ़ौज बागियों का सिर कुचलने के लिए काफ़ी है।
रूमी---नाजुक मौके पर अगर कोई चीज़ सल्तनत को बचा सकती है, तो वह सख़्ती है। शायद और किसी हालत में सख्ती की इतनी ज़्यादा ज़रूरत नहीं होती।
जुहाक---बादशाह की रियाया उसकी ज़ौजा की तरह है। ज़ौजा पर हम निसार होते हैं, उसके तलवे सुहलाते हैं, उसकी बलाएँ लेते हैं, लेकिन जब उसे किसी रक़ीब से मुख़ातिब होते देखते हैं, तो उस वक्त उसकी बलाएँ नहीं लेते। हमारी तलवार म्यान से निकल आती है, और या तो रक़ीब की गरदन पर गिरती है या बीवी की गरदन पर, या दोनो की गरदनों पर।
रूमी---बेशक, कूफ़ा को कुचल दो, कूफ़ा का कोफ़्त कर दो।
यज़ीद---कूफ़ा को कोफ्त में डाल दो। यहाँ से जाते-ही-जाते फ़ौजी कानून जारी कर दो। एक हज़ार आदमियों को तैयार रखो। जो आदमी ज़रा भी गर्म हो, उसे फ़ौरन् क़त्ल कर दो। सरदारों को एकबारगी गिरफ़्तार कर लो, फ़ौज को रोज़ाना शहर में गश्त करने का हुक्म दो, सबकी ज़बान बन्द कर दो, यहाँ तक कि कोई शायर शेर न पढ़ने पाये, मस्जिदों में खुतबे न होने पायें, मक़तबों में कोई लड़का न जाने पाये। रईसों को खूब ज़लील करो। जिल्लत सबसे बड़ी सजा है!
[ एक क़ासिद आता है। ]
शम्स---कहाँ से आते हो?
क़ासिद---ख़लीफ़ा पर मेरा सलाम हो, मुझे मक्का के अमीर ने आपकी खिदमत में यह अर्ज़ करने को भेजा है कि हुसैन का चचेरा भाई मुस्लिम कूफ़ा की तरफ रवाना हो गया है। यज़ीद:---कोई खत भी लाया है?
क़ासिद---आमिल ने खत इसलिए नहीं दिया की कहीं मुझे दुश्मन गिरफ़्तार न कर लें।
यज़ीद---जियाद, तुम इसी वक्त कूफ़ा चले जाओ। तुम्हें मेरे सबसे तेज़ घोड़े को ले जाने का अख्तियार है। अगर मेरा क़ाबू होता, तो तुम्हें हवा के घोड़े पर सवार करता।
जिय़ाद---ख़लीफ़ा पर मेरी जान निसार हो, मुझे इस मुहिम पर जाने से मुआफ़ रखिए। जुहाक या शम्स को तैनात फ़रमाएँ।
यज़ीद---इसके मानी यह हैं कि मैं अपनी एक आँख फोड़ लूँ।
रूमी---आखिर तुम क्या चाहते हो?
जिय़ाद---मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है कि इस मौक़े पर रियाया के साथ मुलायमियत का बर्ताव किया जाय, सरदारों को जागीरें दी जायँ, उनके वज़ीफ़े बढ़ाये जायँ, यतीमों और बेवाओं की परवरिश का इंतजाम किया जाय। मैंने कूफ़ावालों की खसलत का गौर से मुताला किया है, वे हयादार नहीं हैं, दिलेर नहीं हैं, दीनदार नहीं हैं। चंद खास आदमियों को छोड़कर सब-के-सब लोभी और ख़ुदग़रज़ हैं, बात पर अड़ना नहीं जानते, शान पर मरना नहीं जानते, थोड़े-से फ़ायदे के लिए भाई-भाई का गला काटने पर आमादा हो जाते हैं। कुत्तों को भगाने के लिए लाठी से ज़्यादा अासान हड्डी का एक टुकड़ा होता है। सब-के-सब उस पर टूट पड़ते और एक-दूसरे को भंभोड़ खाते हैं। ख़लीफ़ा का खज़ाना दस-बीस हजार दीनारों के निकल जाने से खाली न हो जायगा, पर एक क़ौम हमारे हाथ आ जायगी। सख़्ती कमज़ारों के हक़ में वही काम करती है, जो ऐंठन तिनकों के साथ। हम ऐंठन के बदले हवा के एक झोंके से तिनकों को बिखेर सकते हैं। फ़ौज से फ़ौज कुचली जा सकती है, एक क़ौम नहीं।
रूमी---मैं तो हमेशा सख़्ती का हामी रहा, और रहूँगा।
शरीक---कामिल हकीम वह है, जो मरीज़ के मिज़ाज के मुताबिक दवा मे तबदीली करता रहे। आपने उस हकीम का क़िस्सा नहीं सुना, जो हमेशा फ़्सद खोलने की तजवीज़ किया करता था। एक बार एक दीवाने का फ़्सद खोलने गया। दीवाने ने हकीम की गरदन इतने ज़ोर से दबायी कि हकीम साहब की ज़बान बाहर निकल आयी। मुल्कदारी के आईन मौक़े और ज़रूरत के मुताबिक बदलते रहते हैं।
यज़ीद---ज़ियाद, मैं इस मुअामले मे तुम्हें मुख्तार बनाता हूँ। मुझे भी कुछ कुछ अंदेशा हो रहा है कि कहीं हुसैन के वादे कूफ़ावालों को लुभा न लें। तुम जो मुनासिब समझो, करो, लेकिन याद रक्खो, अगर कूफ़ा गया, तो तुम्हारी जान उसके साथ जायगी। यह शर्त मंजूर है?
जिय़ाद---मंजूर है।
यज़ीद---हुर को ताक़ीद कर दो कि बहुत नमाज़ न पढ़े, और मुस्लिम को इस तरह तलाश करे, जैसे कोई बख़ील अपनी खोयी मुर्ग़ो को तलाश करता है। तुम्हारी नरमी कमजारों की नरमी नहीं होनी चाहिए, जिसे खुशामद कहते हैं। उसमें हुकूमत की शान क़ायम रहनी चाहिए। बस, जानो।
[ ज़ियाद शरीक और क़ासिद चले जाते हैं। ]
जुहाक---नरगिस का बुलाओ, ज़रा ग़म ग़लत करे। ( गुलाब के हाथ से शराब का प्याला लेकर ) यह मेरी फ़तह का जाम है।
रूमी---मुबारक हो, ( दिल में ) ज़ियाद तुम्हें डुबा देगा, तब नरमा का मज़ा मालूम होगा।
[ नरगिस ज़ुहाक की पीठ पर बैठी हुई आती है। ]
यज़ीद---शाबाश नरगिस, शाबाश, क्या खूब खच्चर है। इसकी काई तशबीह ( उपमा ) देना शम्स।
शम्स---मुर्ग़ के सिर पर ताज है।
रूमी---लीद पर मक्खी बैठी हुई है।
नरगिस---( गर्दन पर से कूदकर ) लाहौल-बिला-कूवत।
यज़ीद---वल्लाह, इस तशबीह से दिल खुश हो गया। नरगिस, बस इसी बात पर एक मस्ताना ग़ज़ल सुनाया। खुदा तुम्हारे दीवानों को तुम पर निसार करे।
नरगिस गाती है---
शबे-वस्ल वह रूठ जाना किसी का, / वह रूठे को अपने मनाना किसी का। / कोई दिल को देखे न तिरछी नज़र से , / ख़ता कर न जाये निशाना किसी का। / अभी थाम लोगे तुम अपने जिगर को, / सुनो तो सुनाएँ, फ़िसाना किसी का। / ज़रा देख ले चल के सैयाद तू भी, / कि उठता है अब आब-दाना किसी का। / वह कुछ सोचकर हो लिये उसके पीछे, / जनाजा हुआ जब रवाना किसी का।
बुरा वक़्त जिस वक्त आता है 'बिस्मिल', / नहीं साथ देता ज़माना किसी का।
[ परदा गिरता है। ]
छठा दृश्य
[संध्या का समय। सूर्यास्त हो चुका है। कूफ़ा का शहर---कई सारवान ऊँट का गल्ला लिये दाख़िल हो रहे हैं। ]
पहला---यार, गलियो से चलना, नहीं तो किसी सिपाही की नज़र पड़ जाय, तो महीनों बेगार झेलनी पड़े।
दूसरा--–हाँ-हाँ, वे बला के मूज़ो है। कुछ लादने को नहीं होता, तो यों ही बैठ जाते हैं, और दस-बीस कोस का चक्कर लगाकर लौट आते हैं। ऐसा अंधेर पहले कभी न होता था। मजूरी तो भाड़ मे गयी, ऊपर से लात और गालियाँ खाओ।
तीसरा---यह सब महज़ पैसे आँटने के हथकंडे हैं। न-जाने कहाँ के कुत्ते अाके सिपाह में दाखिल हो गये। छोटे-बडे एक ही रंग में रँगे हुए हैं।
चौथा---अमीर के पास फ़रियाद लेकर जाओ, तो उलटे और बौछार पड़ती है। अजीब मुसीबत का सामना है। हज़रत हुसैन जब तक न आयेंगे, हमारे सिर से यह बला न टलेगी।
[ मुस्लिम पीछे से आते हैं। ]
मु॰---क्यों यारो, इस शहर में कोई ख़ुदा का बंदा ऐसा है, जिसके यहाँ मुसाफिरों को ठहरने की जगह मिल जाय?
पहला--–यहाँ के रईसों की कुछ न पूछो। कहने को दो-चार बड़े आदमी हैं, मगर किसी के यहाँ पूरी मजूरी नहीं मिलती। हाँ, ज़रा गालियाँ कम देते हैं।
मु॰---सारे शहर में एक भी सच्चा मुसलमान नहीं है?
दूसरा---जनाब, यहाँ कोई शहर के क़ाज़ी तो हैं नहीं, हाँ, मुख्तार की निस्बत सुनते हैं कि बड़े दीनदार आदमी हैं। हैसियत तो ऐसी नहीं, मगर ख़ुदा ने हिम्मत दी है। कोई ग़रीब चला जाय, तो भूखों न लौटेगा।
तीसरा---सुना है, उनकी जागीर जब्त कर ली गयी है।
मु॰---यह क्यों?
तीसरा---इसी लिए कि उन्होंने अब तक यज़ीद की बैयत नहीं ली।
मु॰---तुममें से मुझे कोई उनके घर तक पहुँचा सकता है?
चौथा---जनाब, यह ऊँटनियों के दुहने का वक़्त है; हमें फुरसत नहीं। सीधे चले जाइए, आगे लाल मस्जिद मिलेगी, वहीं उनका मकान है।
मु॰---खुदा तुम पर रहमत करे। अब चला जाऊँगा।
[ परदा बदलता है। मस्जिद के क़रीब मुख़्तार का मकान ]
मु॰---( एक बुड्ढे से ) यही मुख़्तार का मकान है न?
बुड्ढा---जी हाँ, ग़रीब ही का नाम मुख़्तार है। आइए, कहाँ से तशरीफ़ ला रहे हैं?
मु॰---मक्केशरीफ़ से।
मुख॰---( मुस्लिम के गले से लिपटकर ) मुआफ़ कीजिएगा। बुढ़ापे की बीनाई शराबी की तोबा की तरह कमज़ोर होती है। आज बड़ा मुबारक दिन है। बारे हज़रत ने हमारी फरियाद सुन ली खैरियत से हैं न?
मु॰---( घोड़े से उतरकर ) जी हाँ, सब ख़ुदा का फ़ज़ल है।
मुख॰---खुदा जानता है, आपको देखकर आँखें शाद हो गयीं। हज़रत का इरादा कब तक आने का है?
मु॰---( खत निकालकर मुख़्तार को देते हैं ) इसमें उन्होंने सब कुछ मुफ़स्सल लिख दिया है।
मुख॰---( ख़त को छाती और आँख से लगाकर पढ़ता है ) ख़ुशनसीब कि हज़रत के क़दमों से यह शहर पाक होगा। मेरी बैयत हाज़िर है, और मेरे दोस्तों को तरफ़ से भी कोई अंदेशा नहीं। गुलाम―जनाब ने क्यों याद फ़रमाया? मुख़०―देखो, इसी वक्त़ हारिस, हज्जाज, सुलेमान, शिमर, क़ीस, शैस और हानी के मकान पर जाओ, और मेरा यह रुक्क़ा दिखाकर जवाब लाओ। पहले मुझे ऐसा मालूम होता था कि हज़रत का कोई क़ासिद आयेगा, तो मैं शायद दीवाना हो जाऊँगा, पर इस वक्त़ आपको सामने देखकर भी ख़ामोश बैठा हुआ हूँ। किसी शायर ने सच कहा है―‘जो मज़ा इन्तजा़र में देखा, वह नहीं वस्ले-यार में देखा।’ जन्नत का ख़याल कितना दिलफ़रेब है, पर शायद उसमें दाख़िल होने पर इतनी खुशी न रहे। आइए, नमाज़ अदा कर लें। इसके बाद कुछ आराम फ़रमा लीजिए। फिर दम मारने की फ़ुरसत न मिलेगी।
[दोनो मकान के अन्दर चले जाते हैं। परदा बदलता है। मुस्लिम और मुख़्तार बैठे हुए हैं। मु०―कितने आदमी बैयत लेने के लिये तैयार हैं? मुख़०―देखिए, सब अभी आ जाते हैं। अगर यज़ीद की जानिब से ज़ुल्म और सख्ती इसी तरह होती रही, तो हमारे मददगारों की तादाद दिन-दिन बढ़ती जायगी। लेकिन कहीं उसने दिलजोई शुरू कर दी, तो हमें इतनी आसानी से कामयाबी न होगी। सुले०―अस्सलामअलेक हज़रत मुस्लिम, आपको देखकर आँखें रोशन हो गयीं; मेरे कब़ीले के सौ आदमी बैयत लेने को हाज़िर हैं। और सब-के-सब अपनी बात पर मिटनेवाले आदमी हैं। मु०―आपको खुदा नजात दे। इन आदमियों से कहिए, कल जामा मस्जिद मे जमा हों। आपका ख़त पढ़कर भैया को बहुत रंज हुआ। उन्होंने तो फैसला कर लिया था कि रसूल के मजा़र पर बैठे हुए ज़िन्दगी गुज़ार दें, पर आपके आखिरी ख़त ने उन्हें बेक़रार कर दिया। सायल की हिमायत से वह कभी मुँह नहीं मोड़ सकते।
[ शैस, क़ीस, शिमर, साद और हज्जाज का प्रवेश। ]
शैस॰---अस्सलामअलेक हज़रत, आपको देखकर जिगर ठंढा हो गया।
क़ीस---अस्सलामअलेक, आपके क़दमों से हमारे वीरान घर आबाद हो गये।
हज्जाज---अस्सलामअलेक,अापको देखकर हमारे मुर्दा तन में जान आ गयी।
मु॰---( सबसे गले मिलकर ) हज़रत इमाम ने मुझे यह ख़त देकर आपकी खिदमत में भेजा है।
[ शिमर ख़त लेकर ऊँची आवाज़ से पढ़ता है, और सब लोग सिर झुकाये सुनते हैं। ]
शैस---हमारे ज़हे-नसीब, मैं तो अभी दस्तरख़्वान पर था। खबर पाते ही आपकी ज़ियारत करने दौड़ा।
हज्जाज---मैं तो अभी-अभी बसरे से लौटा हूँ, दम भी न मारने पाया था कि आपके तशरीफ़ लाने की खबर पायी। मेरे क़बीले के बहुत-से आदमी बैयत लेने को बाहर खडे हैं।
मु॰---उन्हें कल जामा मस्जिद में बुलाइए।
शिमर---वह कौन-सा दिन होगा कि मलऊन यज़ीद के जुल्म से नजात होगी।
शैस---हज़रत हुसैन ने हम गरीबों की आवाज सुन ली। अब हमारे बुरे दिन न रहेंगे।
क़ीस---हमारीकिस्मत के सितारे अब रोशन होंगे। मेरी दिली तमन्ना है कि जियाद का सिर अपने पैरों के नीचे देखूँ।
शिमर---मैंने तो मिन्नत मानी है कि मलऊन ज़ियाद के मुँह में कालिख लगाकर सारे शहर में फिराऊँ।
क़ीस---मैं तो यज़ीद की नाक काटकर उसकी हथेली पर रख देना चाहता हूँ।
[ हानी, कसीर और अशअस का प्रवेश। ]
हानी---या बिरादर हुसैन, आप पर खुदा की रहमत हो।
क़ीस---अल्लाहताला आप पर साया रखे। हम सब आपकी राह देख रहे थे।
मु॰---भाई साहब ने मुझे यह खत देकर आपकी तसकीन के लिए भेजा है।
[ हानी ख़त लेकर आँखों से लगाता है, और आँखों में ऐनक लगाकर पढ़ता है। ]
शिमर---अब ज़ियाद की ख़बर लूँगा।
क़ीस---मैं तो यज़ीद की आँखों में मिर्च डालकर उसका तड़पना देखूँगा।
मु॰---आप लोग भी कल अपने क़बीलेवालों को जामा मस्जिद में बुलायें। कल तीन-चार हज़ार आदमी आ जायँगे?
शैस---खुदा झूठ न बुलवाये, तो इसके दसगुने हो जायँगे?
हानी---नबी की औलाद की शान ही और है। वह हुस्न, वह इखलाक, वह शराफ़त कहीं नज़र ही नहीं आती।
क़ीस---यज़ीद को देखो, खासा हब्शी मालूम होता है।
हज्जाज---ज़ियाद तो खासा सारवान है।
मु॰---तो कल शाम को जामा मस्जिद में आने की ठहरी।
शिमर---तो हम लोग चलकर अपने क़बीलों को तैयार करें, ताकि जो लोग इस वक्त यहाँ न हों, वे भी आ जायँ।
[ सब लोग चले जाते है। ]
मु॰---( दिल में ) ये सब कूफ़ा के नामी सरदार हैं। हमारी फ़तह ज़रूर होगी; और एक बार तक़दीर को जक उठानी पडेगी। बीस हज़ार आदमियों की बैयत मिल गयी, तो फिर हुसैन को ख़िलाफ़त की मसनद पर बैठने से कौन रोक सकता है, जरूर बैठेंगे।
सातवाँ दृश्य
[ क़ूफा के चौक में कई दूकानदार बातें कर रहे हैं। ]
पहला---सुना, आज हज़रत हुसैन तशरीफ़ लानेवाले हैं।
दूसरा---हाँ, कल मुख़्तार के मकान पर बड़ा जमघट था। मक्का से कोई साहब उनके आने की खबर लाये हैं।
तीसरा---खुदा करे, जल्द आवें। किसी तरह इन ज़ालिमों से पीछा छूटे। मैंने बैयत तो यज़ीद की ले ली है, लेकिन हज़रत अायँगे, तो फ़ौरन् फिर जाऊँगा।
चौथा---लोग कहते थे, बड़े धूमधाम से आ रहे हैं। पैदल और सवार फौजें हैं। खेमे वग़ै रह ऊँटों पर लदे हुए हैं।
पहला---दूकान बढ़ाओ, हम लोग भी चलें। तक़दीर में जो कुछ बिकना था, बिक चुका। आक़बत की भी तो कुछ फ़िक्र करनी चाहिए। ( चौंककर ) अरे! ये बाजे की आवाज़ें कहाँ से आ रही है?
दूसरा---आ गये शायद।
[ सब दौड़ते हैं। ज़ियाद का जलूस सामने से आता है। ज़ियाद मिंबर पर खड़ा हो जाता है। ]
कई आवाज़ें---मुबारक हो, मुबारक हो, या हज़रत हुसैन!
ज़ियाद---दोस्तो, मैं हुसैन नहीं हूँ। हुसैन का अदना ग़ुलाम रसूल पाक के क़दमों पर निसार होनेवाला आपका नाचीज़ खादिम बिनज़ियाद हूँ।
एक आवाज़---ज़ियाद है, मलऊन ज़ियाद है।
दूसरा---गिरा दो मिंबर पर से; उतार दो मरदूद को।
तीसरा---लगा दो तीर का निशाना। ज़ालिम की ज़बान बन्द हो जाय।
चौथा---खामोश, खामोश। सुनो, क्या कहता है?
ज़ियाद---अगर आप समझते हैं कि मैं ज़ालिम हूँ, तो बेशक, मुझे तीर का निशाना बनाइए, पत्थरों से मारिए, क़त्ल कीजिए, हाजिर हूँ। ज़ालिम गर्दनज़दनी है, और जो ज़ुल्म बर्दाश्त करे, वह बेग़ैरत है। मुझे गुरूर है कि आपमें ग़ैरत है, जोश है।
कई आवाजें---सुनो-सुनो, खामोश।
ज़ियाद---हाँ, मैं ग़ैरत से, ग़ुरूर से नहीं डरता, क्योंकि यही वह ताक़त है, जो किसी कौम को ज़ालिम के हाथ से बचा सकती है। ख़ुदा के लिए उस जुल्म क नाकदरी न कीजिए, जिसने आपकी ग़ैरत को जगाया। यही मेरी मंशा थी, यही यज़ीद की मंशा थी, और ख़ुदा का शुक्र कि हमारी तमन्ना पूरी हुई। अब हमें यक़ीन हो गया कि हम अापके ऊपर भरोसा कर सकते हैं। ज़ालिम उस्ताद की भी कभी-कभी ज़रूरत होती है। हज़रत हुसैन-जैसा पाक-नीयत, दीनदार बुज़ुर्ग आपको यह सबक न दे सकता था। यह हम-जैसे कमीना, खुदग़रज आदमियों ही का काम था। लेकिन अगर हमारी नीयत खराब होती, तो आप आज मुझे यहाँ खड़े होकर उन रियायतों का ऐलान करते न देखते, जो मैं अभी-अभी करनेवाला हूँ। इन ऐलानों से आप पर मेरे क़ौल की सच्चाई रोशन हो जायगी।।
कई आवाजें---खामोश-खामोश, सुनो-सुनो।
ज़ियाद---खलीफ़ा यज़ीद का हुक्म है कि कूफ़ा और बसरा का हरएक बालिग़ मर्द पाँच सौ दिरहम सालाना खज़ाने से पाये।
बहुत-सी आवाजें---सुभानअल्लाह, सुभानअल्लाह
ज़ियाद---और कूफ़ा व बसरे की हरएक बालिग़ औरत दो सो दिरहम पाये, जब तक उसका निकाह न हो।
बहुत-सी आवाजे---सुभानअल्लाह, सुभानअल्लाह
ज़ियाद---और हरएक बेवा को सौ दिरहम सालाना मिलें, जब तक उसकी आँखें बन्द न हो जायँ, या वह दूसरा निकाह न कर ले।
बहुत-सी आ॰---सुभानअल्लाह, सुभानअल्लाह
ज़ियाद---यह मेरे हाथ में खलीफ़ा का फ़रमान है। देखिए, जिसे यक़ीन न हो। हरएक यतीम को बालिग़ होने तक सौ दिरहम सालाना मुक़र्रर किया गया है। हरएक जवान मर्द और औरत को शादी के वक्त एक हजार दिरहम एकमुश्त खर्च के लिए दिया जायगा।
बहुत-सी आवाजें---खुदा खलीफ़ा यज़ीद को सलामत रखे। कितनी फ़ैयाज़ी की है।
ज़ियाद---अभी और सुनिए, तब फ़ैसला कीजिए कि यज़ीद ज़ालिम है या रियाया-परवर? उसका हुक्म है कि हरएक क़बीले के सरदार को दरिया के किनारे की उतनी ज़मीन अता की जाय, जितनी दूर उसका तीर जा सके।
बहुत-सी आवाजें---हम यज़ीद की बैयत मंजूर करते हैं। यज़ीद हमारा ख़लीफ़ाहै।
ज़ियाद---नहीं, यज़ीद, बैयत के लिए आपको रिश्वत नहीं देता। बैयत अापके अख्त़ियार में है, जिसे जो चाहे, दीजिए। यज़ीद हुसैन से दुश्मनी करना नहीं चाहता। उसका हुक्म है कि नदियों के घाट काम हसूल मुआफ़ कर दिया जाय।
बहुत-सी आवाजें---हम यज़ीद को अपना ख़लीफ़ा तसलीम करते हैं।
ज़ियाद---नहीं-नहीं, यज़ीद कभी हुसैन के हक़ को जायल न करेगा। हुसैन मालिक हैं, फ़ाजिल हैं, आबिद हैं, ज़ाहिद हैं, यज़ीद को इसमें से कोई सिफ़त रखने का दावा नहीं। यज़ीद में अगर कोई सिफ़त है, तो यह कि वह ज़ुल्म करना जानता है, खासकर नाजुक वक्त पर, जब माल और जान की हिफ़ाजत करनेवाला कोई न हो, जब सब अपने हक़ और दावे पेश करने में मसरूफ़ हों।
बहुत-सी आवाजें---ज़ालिम यज़ीद ही हमारा अमीर है। हम दिल से उसकी बैयत क़बूल करते हैं।
ज़ियाद---सोचिए, और ग़ौर से सोचिए। अगर ख़िलाफ़त के दूसरे दावेदारों की तरह यज़ीद भी किसी गोशे में बैठे हुए बैयत की फ़िक्र करते, तो अाज मुल्क की क्या हालत होती? अापकी जान व माल की हिफ़ाज़त कौन करता? कौन मुल्क को बाहर के हमलों से और अन्दर की लड़ाइयों से बचाता? कौन सड़कों और बन्दरगाहों को डाकुओं से महफ़ूज़ रखता? कौन क़ौम की बहू-बेटियों की हुरमत का ज़िम्मेदार होता? जिस एक आदमी की ज़ात से क़ौम और मुल्क को नाजुक मौके पर इतने फ़ायदे पहँचे हों, और जिसने खलीफ़ा चुने जाने का इन्तज़ार न करके ये बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियाँ सिर पर ले ली हों, क्या वह इसी क़ाबिल है कि उसे मलऊन और मरदूद कहा जाय, उसे सरे बाज़ार गालियाँ दी जाय?
एक आवाज---हम बहुत नादिम हैं। खुदा हमारा गुनाह मुआफ करे।
शिमर---हमने खलीफ़ा यज़ीद के साथ बड़ी बेइन्साफी की है।
ज़ियाद---हाँ, आपने ज़रूर बेइन्सानी की है। मैं यह बिला ख़ौफ़ कहता हूँ, ऐसा आदमी इससे कहीं अच्छे बर्ताव के लायक़ था। हुसैन की इज़्ज़त यज़ीद के और मेरे दिल में उससे ज़रा भी कम नहीं है, जितनी और किसी के दिल में होगी। अगर आप उन्हें अपना ख़लीफ़ा तसलीम करते हैं, तो मुबारक हो। हम खुश, हमारा ख़ुदा खुश। यज़ीद सबसे पहले उनकी बैयत मंजूर करेगा, उसके बाद मैं हूँगा। रसूल पाक ने ख़िलाफ़त के लिए इन्तख़ाब की शर्त लगा दी है। मगर हुसैन के लिए इसकी क़ैद नहीं।
क़ीस---है। यह कैद सब के लिए एकसाँ है।
ज़ियाद---अगर है, तो इन्तख़ाब का इससे बेहतर और कौन मौक़ा होगा। आप अपनी रजा और रग़बत से किसी का लिहाज़ और मुरौवत किये बग़ैर जिसे चाहे ख़लीफा तसलीम कर लें। मैं कसरत राय को मानकर यज़ीद को इसकी इत्तिला दे दूँगा।
एक तरफ़ से---हम यज़ीद को खलीफ़ा मानते हैं।
दूसरी तरफ़ से---हम यज़ीद की बैयत क़बूल करते हैं।
तीसरी तरफ से---यज़ीद, यज़ीद, यज़ीद।
ज़ियाद---खामोश, हुसैन को कौन ख़लीफ़ा मानता है!
[ कोई आवाज़ नहीं आती ]
ज़ियाद---आप जानते हैं, यज़ीद आबिद नहीं।
कई आवाजें---हमें आबिद की ज़रूरत नहीं।
ज़ियाद---यज़ीद आलिम नहीं, फाज़िल नहीं, हाफ़िज़ नहीं।
कई आवाजें---हमें आलिम-फाज़िल की ज़रूरत नहीं।
हज्जाज---कितना फ़ैयाज़ है।
शिमर---किसी खलीफ़ा ने इतनी फ़ैयाजी नहीं की।
शीस---आबिद कभी फ़ैयाज़ नहीं होता।
अशअस---अजी, कुछ न पूछो, मस्जिदों के मुल्लाओं को देखो, रोटियों पर जान देते हैं।
ज़ियाद---अच्छा, यज़ीद को आपने अपना ख़लीफ़ा तो मान लिया, लेकिन हेजाज, मिस्र, यमन के लोग किसी और को ख़लीफ़ा मान लें तो?
ब॰ आ॰---हम ख़लीफ़ा यज़ीद के लिए जान दे देंगे।
ज़ियाद---बहुत मुमकिन है कि हज़रत हुसैन ही को वे लोग अपना ख़लीफ़ा बनायें, तो आप अपना क़ौल निभायेंगे?
ब॰ आ॰---निभायेंगे। यज़ीद के सिवा और कोई ख़लीफ़ा नहीं हो सकता।
ज़ियाद---मैंने सुना है, हज़रत हुसैन ने अपने चचेरे भाई मुस्लिम को आपकी बैयत लेने के लिए भेजा है। और, शायद खुद भी आ रहे हैं। यज़ीद को गोशे में बैठकर ख़ुदा की याद करना इससे कहीं अच्छा मालूम होगा कि वह इस्लाम में निफ़ाक़ की आग भड़कायें। अभी मौका है, आप लोग खूब ग़ौर कर लें।
शिमर---हमने ख़ूब गौर कर लिया है।
हज्जाज---हुसैन को न-जाने क्यों ख़िलाफ़त की हवस है। बैठे हुए ख़ुदा की इबादत क्यों नहीं करते?
क़ीस---हुसैन मदीनावालों के साथ जो सलूक करेंगे, वह कभी हमारे साथ नहीं कर सकते।
शीस---उनका अाना बला का अाना है।
ज़ियाद---अगर आप चाहते हैं कि मुल्क में अमन रहे, तो ख़बरदार इस वक्त एक आदमी भी जामा मस्जिद में न जाय। हुसैन आयें हमारे सिर-आँखों पर। हम उनकी ताज़ीम करेंगे, उनकी ख़िदमत करेंगे, लेकिन उन्हें ख़िलाफ़त का दावा पेश करते देखेंगे, तो मुल्क में अमन रखने के लिए हमें आपकी मदद की ज़रूरत होगी। यही आपकी आज़माइश का वक्त होगा, और इसी में पूरा उतरने पर इस्लाम की ज़िन्दगी का दार-मदार है।
[ मिंबर पर से उतर आता है। ]
शीस---बड़ी ग़लती हुई कि हुसैन को ख़त लिखा।
शिमर-मैं तो अब जामा मस्जिद न जाऊँगा।
क़ीस---यहाँ कौन जाता है।
शीस---काश, इन्हीं रियायतों का चंद रोज़ पहले एलान कर दिया गया होता, तो खत लिखने की नौबत ही क्यों आती?
शिमर---दीन को फ़िक्र मोटे आदमी करें, यहाँ दुनिया की फ़िक्र का है।
[ सब जाते हैं। ]
आठवाँ दृश्य
[ नौ बजे रात का समय। कूफ़ा की जामा मस्जिद। मुस्लिम, मुख़तार, सुलेमान और हानी बैठे हुए हैं। कुछ अादमी द्वार पर बैठे हुए हैं। ]
सुले॰---अब तक लोग नहीं आये?
हानी---अब आने की कम उम्मीद है।
मुख---आज ज़ियाद का लौटना सितम हो गया। उसने लोगों को वादों के सब्ज़ बाग़ दिखाये होंगे।
सुले॰---इसी को तो सियासत का आईन कहते हैं।
मु॰---इन ज़ालिमों ने सियासत को ईमान से बिलकुल जुदा कर दिया है। दूसरे ख़लीफ़ों ने इन दोनो को मिलाया था। सियासत को दग़ा से पाक कर दिया था।
मुख॰---हज़रत मुस्लिम, अब आप अपनी तक़रीर शुरू कीजिए, शायद लोग जमा हो जायँ।
[ मुस्लिम मिंबर पर चढ़कर व्याख्यान देते हैं। ] "शुक्र है उस पाक खुदा का, जिसने हमें आज दीन इस्लाम के लिए एक ऐसे बुज़र्ग को ख़लीफ़ा चुनने का मौका दिया है, जो इस्लाम का सच्चा दोस्त ........"
[ बहुत-से आदमी मस्जिद में घुस पड़ते हैं। ]
पहला---बस हज़रत मुस्लिम, ज़बान बन्द कीजिए।
दूसरा---जनाब, आप चुपके से मदीने की राह लें। यज़ीद हमारे खलीफ़ा हैं, और ज़ियाद हमारा इमाम है। ---मुझे मालूम है कि ज़ियाद ने आज तुम्हारी पीठ पर ख़ूब हाथ फेरे हैं, और हरी-हरी घास दिखायी है, पर याद रखो, घास के नीचे जाल बिछा हुआ है।
[ बहार से ईंट और पत्थर की वर्षा होने लगती है। ]
एक आ०---मारो-मारो, यह क़ौम का दुश्मन है।
सुले०---ज़ालिमो, यह ख़ुदा का घर है। इसकी हुरमत का तो ख़याल रखो।
दू०---ख़ुदा का घर नहीं, इस्लाम के दुश्मनों का अड्डा है।
तीसरा---मारो-मारो, अभी तक इसकी ज़बान बन्द नहीं हुई।
[ सुलेमान ज़ख़्मी होकर गिर पड़ते हैं। मुस्लिम बाहर आकर कहते हैं ] "ऐ बदनसाब क़ौम, अगररातू इतनी जल्द रसूल की नसीहतों को भूल सकती है, और तुझ मे नेक व बद की तमीज़ नहीं रही, अगर तू इतनी जल्द जुल्म और ज़िल्लत को भूल सकती है, तो तू दुनिया में कभी सुर्ख़रू न होगी।"
एक आ०---इस्लाम का दुश्मन है।
दूसरा---नहीं-नहीं, हज़रत हुसैन के चचेरे भाई हैं। इनकी तौहीन मत करो।
तीसरा---इन्हें पकड़कर शहर की किसी अँधेरी गली में छोड़ दो। हम इनके खून से हाथ न रँगेंगे।
[ कई आदमी मुस्लिम पर टूट पड़ते, और उन्हें खींचते हुए ले जाते हैं, और साथ ही परदा भी बदलता है। ]
मुस०---( दिल में ) ज़ालिमों ने कहाँ लाकर छोड़ दिया। कुछ नहीं सूझता। रास्ता नहीं मालूम। कहाँ जाऊँ? कोई आदमी नज़र नहीं आता कि उससे रास्ता पूछूँ!
[ हानी आता हुआ दिखायी देता है। ]
मु०---ऐ ख़ुदा के नेक बन्दे, मुझे यहाँ से निकलने का रास्ता बता दो।
हानी---हजरत मुस्लिम! क्या अभी आप यहीं खड़े हैं?
मु०---आप हैं, हानी? रसूल पाक की क़सम, इस वक्त तन में जान पड़ गयी। मुझे तो कई आदमियों ने पकड़ लिया, और यहाँ छोड़कर चल दिये।
हानी---वे मेरे ही आदमी थे। मैंने वहाँ की हालत देखी, तो आपको वहाँ से हटा देना मुनासिब समझा। मैंने उन्हे तो ताक़ीद की थी कि आपको मेरे घर पहुँचा दें।
मु॰---पहले आपके आदमी होंगे, अब नहीं हैं। ज़ियाद की तक़रीर ने उन पर भी असर किया है।
हानी---खैर, कोई मुज़ायका नहीं, मेरा मकान क़रीब है; अाइए। हम सियासत के मैदान में ज़ियाद से नीचा खा गये। उसने यह ख़बर मशहूर कर दी है कि हुसैन अा रहे हैं। इस हीले से लोग जमा हो गये, और उसे उनको फरेब देने का मौक़ा मिल गया।
मु॰---मुझे तो अब चारो तरफ़ अँधेरा ही-अँधेरा नज़र आता है।
हानी---ज़ियाद की तक़रीर ने सूरत बदल दी। जिन आदमियों ने हज़रत के पास ख़त भेजने पर ज़ोर दिया था, वे भी फ़रेब मे आ गये।
[ सुलेमान और मुख़्तार आते हैं। सुलेमान के सिर में पट्टी बँधी हुई है। ]
मुख॰---शुक्र है, आप ख़ैरियत से पहुँच गये। ज़ियाद के आदमी आपको तलाश करते फिरते है।
मु॰---हानी, ऐसी हालत में यहाँ रहकर मैं आपको खतरे में नहीं डालना चाहता। मुझे रुखसत कीजिए। रात को किसी मस्जिद में पड़ रहूँगा।
हानी---मुअाज़ अल्लाह, यह आप क्या फ़रमाते हैं! यह आपका घर है। मैं और मेरा सब कुछ हज़रत हुसैन के क़दमों पर निसार है।
[ शरीक का प्रवेश। ]
शरीक---अस्सलामअलेक या हज़रत मुस्लिम, मैं भी हुसैन के ग़ुलामों में हूँ।
हानी---हज़रत मुस्लिम, आपने शरीक का नाम सुना होगा। आप हज़रत अली के पुराने ख़ादिम हैं, और उनको शान में कई क़सीदे लिख चुके हैं।
मुस॰---( शरीक से गले मिलकर ) ऐसा कौन बदनसीब होगा, जिससे आपका कलाम न देखा गया हो।
शरीक---मैं हज़रत का ख़ादिम और नबी का गुलाम हूँ। बसरेवालों को फ़रियाद लेकर यज़ीद के पास गया था। वहाँ मालूम हुआ कि आप मक्का से रवाना हो गये हैं। मैं ज़ियाद के साथ ही इधर चल पड़ा कि शायद अापकी कुछ ख़िदमत कर सकूँ। यज़ीद ने अब सख़्ती की जगह नरमी और रियायत से काम लेना शुरू किया है। और, आज ज़ियाद की तक़दीर का असर देखकर मुझे यक़ीन हो गया है कि यहाँ के लोग हज़रत हुसैन से ज़रूर दग़ा कर जायँगे। हमे भी फ़रेब का जवाब फ़रेब ही से देना लाज़िम है।
मु॰---क्योंकर?
शरीक---इसकी आसान तरकीब है। मैं ज़ियाद को अपनी बीमारी की खबर दूँगा। वह यहाँ मेरी मिज़ाज-पुरसी करने ज़रूर अावेगा, आप उसे कत्ल कर दीजिए।
मु॰---अल्लाहताला ने फ़रमाया है कि मुसलमान को मुसलमान का ख़ून करना जायज़ नहीं।
शरीक---मगर अल्लाहताला ने यह भी तो फ़रमाया है कि बेदीन को अमन देना साँप का पालना है।
मु॰---पर मेरी इन्सानियत इसकी इजाजत नहीं देती।
शरीक---बेदीन को क़त्ल करना ऐन सबाब है। ज़िहाद में इन्सानियत को दखल नहीं, हक़ का रास्ता डाकुओं और लुटेरों से खाली नहीं है। और उनका खौफ़ है, तो इस रास्ते पर क़दम ही न रखना चाहिए। आप इस मसले को सोचिए।
[ बाहर से आदमियों का एक गिरोह हानी का दरवाज़ा तोड़कर अन्दर घुस जाता है।]
एक आ॰---इन्हीं ने हुसैन को खत लिखा था। पकड़ लो इन्हें।
मु॰---( सामने आकर ) यहाँ से चले जाओ।
दू॰ आ॰---यही हज़रत मुस्लिम हैं। इन्हें गिरफ़्तार कर लो।
मु॰---हाँ, मैं ही मुस्लिम हूँ। मैं ही तुम्हारा ख़तावार हूँ। अगर चाहते हो, तो मुझे क़त्ल करो। ( कमर से तलवार फेककर ) यह लो, अब तुम्हें मुझसे कोई खौफ़ नहीं है। अगर तुम्हारा ख़लीफ़ा मेरे ख़ून से खुश हो, तो उसे खुश करो। मगर खुदा के लिए हुसैन को लिख दो कि आप यहाँ न आयें। उन्हें ख़िलाफ़त की हवस नहीं है। उनका मंशा सिर्फ़ आपकी हिमायत करना था। वह आप पर अपनी जान निसार करना चाहते थे। उनके पास फ़ौज नहीं थी, हथियार नहीं थे, महज़ आपके लिए अपनी जान दे देने का जोश था, इसी लिए उन्होंने अपने गोशे को छोड़ना मंज़ूर किया। अब आपको उनकी ज़रूरत नहीं है, तो उन्हें मना कर दीजिए कि यहाँ मत आओ। उन्हें बुलाकर शहीद कर देने से आपको नदामत और अफ़सोस के सिवा और कुछ हाथ न आयेगा। उनकी जान लेनी मुश्किल नहीं; यहाँ की कैफ़ियत देखकर वह इस सदमे से खुद ही मर जायँगे। वह इसे अापका क़सूर नहीं, अपना क़सूर समझेंगे कि वही उम्मत, जो मेरे नाना पर जान देती थी, अगर आज मेरे खून की प्यासी हो रही है, तो यह मेरी ख़ता है। यह ग़म उनका काम तमाम कर देगा। आपका और आपके अमीर का मंशा खुद-ब-खुद पूरा हो जावेगा। बोलो, मंजूर है? उन्हें लिख दूँ कि अापने जिनकी हिमायत के लिए शहीद होना क़बूल किया था, वह अब आपको शहीद करने की फ़िक्र में हैं। आप इधर रुख़ न कीजिए।
[ कोई नहीं बोलता। ]
मु॰---ख़ामोशी नीम रज़ा है। आप कहते है कि यह कैफ़ियत उन्हें लिख दी जाय।
कई आवाज़ें---नहीं, नहीं, इसकी ज़रूरत नहीं।
मु॰---तो क्या आप यहीं उनकी लाश को अपनी आँखों के सामने तड़फ्ती देखना चाहते हैं।
एक आ॰---मुआज़अल्लाह, हम हज़रत हुसैन के क़ातिल न होंगे।
मु॰---ऐसा न कहिए, वरना रसूल को जन्नत मे भी तकलीफ़ होगी। आप अपनी ख़रज़ के ग़ुलाम हैं, दौलत के ग़ुलाम हैं। रसूल ने आपको हमेशा सब्र और सन्तोष की हिदायत की। आप जानते हैं, वह खुद कितनी सादगी से ज़िन्दगी बसर करते थे। आपको पहले ख़लीफ़ा का हाल मालूम है, हज़रत फ़ारूक के हालात से भी आप वाक़िफ़ हैं। अफ़सोस! आप उस उसूल को भूल गये, जो तवहीद के बाद इस्लाम का सबसे पाक उसूल है, वरना आप वसीक़ों और जागीरों के जाल में न फँस जाते। अापने एक पल के लिए भी ख़याल नहीं किया कि वे ज़ागीरें और वसीक़े किसके घर से आयेंगे। दूसरों से, जो कई पुश्तों से अपनी ज़मीन पर क़ाबिज़ हैं, वे ज़मीनें छीनकर अापको दी जायँगी। दूसरों से जबरन् रुपए वसूल करके आपको वसीक़े दिये जायँगे। आपको ख़ुश करने के लिए दूसरों को तबाह करने का बहाना हाथ आ जायगा। आप अपने भाइयों के हक़ छीनकर अपनी हवस की प्यास बुझाना चाहते हैं। यह दीन-परवरी नहीं है, यह भाई-बंदी नहीं है, इसका कुछ और ही नाम है।
कई आवाजें---नहीं-नहीं, हम हराम का माल नहीं चाहते।
मु॰---मैं यज़ीद का दुश्मन नहीं हूँ, मैं ज़ियाद का दुश्मन नहीं हूँ; मैं इस्लाम का दोस्त हूँ। जो आदमी इस्लाम को पैरों से कुचलता है, चाहे वह यज़ीद हो, ज़ियाद हो, या ख़ुद हुसैन हो, उसका दुश्मन हूँ। जो शख़्स कुरान की और रसूल की तौहीन करता है, वह मेरा दुश्मन है।
कई आ॰---हम भी उसके दुश्मन हैं। वह मुसलमान नहीं, काफ़िर है।
मु॰---बेशक, और कोई मुसलमान---अगर वह मुसलमान है, काफ़िर को ख़लीफ़ा न तस्लीम करेगा, चाहे वह उसका दामन हीरे व जवाहिर से भर दे।
कई आ॰---बेशक, बेशक।
मु॰---उससे एक सच्चा दीनदार आदमी कहीं अच्छा ख़लीफ़ा होगा, चाहे वह चिथड़े ही पहने हुए हो।
कई आ॰---बेशक, बेशक।
मु॰---तो आप तस्लीम करते हैं कि ख़लीफ़ा उसे होना चाहिए, जो इस्लाम का सच्चा पैरो हो। वह नहीं, जो एक का घर लूटकर दूसरे का दिल भरता हो।
कई आ॰--–बेशक, बेशक।
मु०---किसी मुसलमान के लिए इससे बड़ी शरम की बात नहीं हो सकती कि वह किसी को महज़ दौलत या हुकूमत की बदौलत अपना इमाम समझे। इमाम के लिए सबसे बड़ी शर्त क्या है? इस्लाम का सच्चा पैरो होना। इस्लाम ने दौलत को हमेशा हक़ीर समझा है। वह इस्लाम की मौत का दिन होगा, जब वह दौलत के सामने सिर झुकायेगा। ख़ुदा हमको और आपको वह दिन देखने के लिए ज़िन्दा न रखे। हमारा दुनिया से मिट जाना इससे कहीं अच्छा है। तुम्हारा फ़र्ज़ है कि बैयत लेने से पहले तहक़ीक़ कर लो, जिसे तुम ख़लीफ़ा बना रहे हो, वह रसूल की हिदायतों पर अमल करता है या नहीं। तहकीक़ करो, वह शराब तो नहीं पीता।
कई आ॰---क्या ख़लीफ़ा यज़ीद शराब पीते हैं?
मुस०---यह तहक़ीक़ करना तुम्हारा काम है। जाँच करो कि तुम्हारा खलीफ़ा ज़नाकार तो नहीं।
कई आ०---क्या यज़ीद ज़नाकार है?
मु०---यह जाँच करना तुम्हारा काम है। दर्याफ्त करो कि वह नमाज़ पढ़ता है, रोज़े रखता है, आलिमों की इज़्ज़त करता है, खज़ाने का बेजा इस्तेमाल तो नहीं करता? अगर इन बातों की जाँच किये बगैर तुम महज़ जागीरों और वसीकों की उम्मीद पर किसी की बैयत क़बूल करते हो, तो तुम क़यामत के रोज़ खुदा के सामने शर्मिन्दा होगे। जब वह पूछेगा कि तुमने इन्तख़ाब के हक़ का क्यों बेजा इस्तेमाल किया, तो तुम उसे क्या जवाब दोगे? जब रसूल तुम्हारा दामन पकड़कर पूछेंगे कि तुमने उसी अमानत को, जो मैंने तुम्हें दी थी, क्यों मिटा दिया, तो तुम उन्हें कौन-सा मुँह दिखाओगे?
कई आ०--–हमें ज़ियाद ने धोखा दिया। हम यज़ीद की बैयत से इनकार करते हैं।
मु०---पहले खूब जाँच लो। मैं किसी पर इलज़ाम नहीं लगाता। कौन खड़ा होकर कह सकता है कि यज़ीद इन बुराइयों से पाक है।
कई आ०---हम जाँच कर चुके।
मु०---तो तुम्हें किसकी बैयत मंजूर है?
शोर---हुसैन की! रसूल के भवासे की।
मुस०---उनके बारे में तुमने उन बातों की जाँच कर ली? तुम्हें यकीन है कि हुसैन उन बुराइयों से पाक हैं?
कई आ०---हमने जाँच कर ली। हुसैन मे कोई बुराई नहीं। हम हुसेन को अपना ख़लीफ़ा तसलीम करते हैं। ज़ियाद ने हमें गुमराह कर दिया था।
एक आ०---पहले ज़ियाद को क़त्ल कर दो।
दू० आ०---बेशक, उसी ने हमें गुमराह किया था।
मु०---नहीं तुम्हें रसूल का वास्ता है। मोमिन पर मोमिन का ख़ून हराम है।
[ सब आदमी वहीं बैठ जाते हैं, और मुस्लिम के हाथों पर हुसैन की बैयत करते हैं। ]
नवाँ दृश्य
[ दोपहर का समय। हानी का मकान। शरीक एक चारपाई पर पड़े हुए हैं। सामने ताक़ पर शीशियाँ और दवा के प्याले रखे हुए हैं। मुस्लिम और हानी फर्श पर बैठे हुए हैं। ]
शरीक---ज़ियाद अब अाता ही होगा। मुस्लिम, तलवार को तेज़ रखना।
हानी---मैं खुद उसे क़त्ल करता, पर जईफ़ी ने हाथों में क़ूवत बाकी नहीं रखी।
शरीक---इसमें पसोपेश की मुतलक़ ज़रूरत नहीं। हक़ की हिमायत के लिए, इस्लाम की हिमायत के लिए, क़ौम की हिमायत के लिए अगर ख़ून का दरिया बहा दिया जाय, तो उसमे फरिश्ते वजू करेंगे, औलिया की रूहें उसमें नहायेंगी। जो हाथ हक़ की हिमायत में न उठे, वह अन्धी आँखों से, बुझे हुए चिराग़ से, दिन के चाँद से भी ज़्यादा बेकार है। इस्लाम की ख़िदमत का इससे बेहतर मौक़ा आपको फिर न मिलेगा। शायद फिर कभी किसी को न मिलेगा। कूफ़ा और बसल पर कब्जा करके आप यज़ीद की बड़ी-सेबड़ी फ़ौज का मुक़ाबला कर सकते हैं। यज़ीद की ख़िलाफ़त इस्लाम को दुनियादारी और ग़ुलामी की तरफ़ ले जायगी और हुसैन की ख़िलाफ़त हक़ और सच्चाई की तरफ़। क्या यह आपको मंजूर है कि यज़ीद के हाथों इस्लाम तबाह हो जाय?
[ज़ियाद आता है, और मुस्लिम बग़ल की कोठरी में छिप जाते हैं।]
ज़ियाद—अस्सलामअलेक, या शरीक, तुम्हारी हालत तो बहुत ख़राब नज़र आती हैं।
हानी—कल से आँखें नहीं खोली। सारी रात कराहते गुज़री है।
शरीक—खुदा फ़रमाता है—हक़ के वास्ते जो तलवार उठाता है, उसके लिए जन्नत का दरवाज़ा खुला हुआ है।
ज़ियाद—शरीक, शरीक! कैसी तबियत है?
शरीक—शौक़ कहता था कि हाँ, हसरत यह कहती थी, नहीं; :::मैं इधर मुश्किल में था, क़ातिल उधर मुश्किल में था।
हानी—आँखें खोलो। अमीर तुम्हारी मुलाक़ात को आये हैं।
शरीक—सल्ब की क़ूबत तड़पने की, तड़पता किस तरह; :::एक दिल में, दूसरा ख़ंजर क़फ़े क़ातिल में था।
ज़ियाद—क्या रात भी यही इनकी हालत थी?
हानी—जी हाँ, यों ही बकते रहे।
शरीक—गले पर छुरी क्यों नहीं फेर देते, :::हक़ीक़त पर अपनी नज़र करनेवाले।
ज़ियाद—किसी हकीम को बुलाना चाहिए।
शरीक—कौन आया है, ज़ियाद! :::हुजूमे-आरज़ू से बढ़ गईं बेताबियाँ दिल की: :::अरे ओ छिपनेवाले, यह हिजाबे जाँ सिताँ कब तक।
ज़ियाद—तुम्हारे घरवालों को ख़बर दी जाय?
शरीक—मैं यहीं मरूँगा, मैं यहीं मरूँगा। :::मेरी खुशी पर आसमाँ हँसता है, और हँसे न क्यो; :::बैठा हूँ जाके चैन से दोस्त की बज़्मे-नाज़ में।
ज़ियाद---खुदा किसी ग़रीब को बेवतनी में मरीज़ न बनाये। हानी, मैंने सुना है, मुस्लिम मक्के से यहाँ आये हैं। ख़लीफ़ा ने मुझे सख़्त ताक़ीद की है कि उन्हें गिरफ़्तार कर लूँ। आप शहर के रईस हैं, उनका कुछ सुराग़ मिले, तो मुझे इत्तिला दीजिएगा। मुझे आपके ऊपर पूरा भरोसा है। आप समझ सकते हैं कि उनके आने से मुल्क मे कितना शोर-शर पैदा होगा। क़सम है कलाम पाक की, इस वक़्त जो उनका सुराग़ लगा दे, उसका दामन जवाहरात से भर दूँ। मैं इसी फिक्र में जाता हूँ। आप भी तलाश में रहिए।
[ चला जाता है। ]
शरीक---हज़रत मुस्लिम, आपसे आज जो ग़लती हुई है, उस पर आप मरते दम तक पछतायेंगे, और आपके बाद मुसलमान क़ौम इसका ख़मियाज़ा उठायेगी। तुम क़यास नहीं कर सकते कि तुमने इस्लाम को आज कितना बड़ा नुकसान पहुँचाया है। शायद खुदा को यही मंजूर है कि रसूल का लगाया हुअा बाग़ यज़ीद के हाथों बरबाद हो जाय।
मुस०---शरीक, मैंने कभी दग़ा नहीं की, और मुझे यक़ीन है कि हजरत हुसैन मेरी इस हरकत को कभी पसन्द न करते। इस्लाम का दरख़्त हक़ के बीज से उगा है। दग़ा से उसकी आबपाशी करने मे अन्देशा है कि कहीं दरख़्त सूख न जाय। हक़ पर कायम रहते हुए अगर इस्लाम का नामो-निशान दुनिया से मिट जाय, तो भी इससे कहीं बेहतर है कि उसे ज़िन्दा रहने के लिए दग़ा का सहारा लेना पड़े। (हानी से ) भाई साहब को इत्तिला दे दूँ कि यहाँ १८ हज़ार आदमियों ने आपकी बैयत कबूल कर ली है!
हानी---ज़रूर। मेरा गुलाम इस ख़िदमत के लिए हाज़िर है।
मु०---( दिल में ) यह ग़ैरमुमकिन है कि इतने आदमी बैयत लेकर फिर उसे तोड़ दें। कल मुझे चारो तरफ़ अँधेरा-ही-अँधेरा नज़र आता था। आज चारो तरफ़ रोशनी नज़र आती है। मेरी ही तहरीक पर हुसैन यहाँ आने के लिए राजी हुए। खुदा का हज़ार शुक्र है कि मेरा दावा सही निकला और मेरी उम्मीद पूरी हुई।
दसवाँ दृश्य
[ सन्ध्या का समय। ज़ियाद का दरबार ]
ज़ियाद---तुम लोगों में ऐसा एक आदमी भी नहीं है, जो मुस्लिम का सुराग़ लगा सके। मैं वादा करता हूँ कि पाँच हज़ार दीनार उसकी नज़र करूँगा।
एक दर०---हुजूर, कहीं सुराग़ नहीं मिलता। इतना पता तो मिलता है कि कई हज़ार आदमियों ने उनके हाथ पर हुसैन की बैयत की है। पर वे कहाँ ठहरे हैं, इसका पता नहीं चलता।
[ मुअक्किल का प्रवेश। ]
मु०---हुज़ूर को खुदा सलामत रखे, एक ख़ुशख़बरी लाया हूँ। अपना ऊँट लेकर शहर के बाहर चारा काटने गया था कि एक आदमी को बड़ी तेज़ी के साँड़नी पर जाते देखा। मैंने पहचान लिया, वह साँड़नी हानी की थी। उनकी ख़िदमत में कई साल रह चुका हूँ। शक हुआ कि यह आदमी उधर कहाँ जा रहा है। उसे एक हीले से रोककर पकड़ लिया। जब मारने की धमकी दी, तो उसने क़बूल किया कि मुस्लिम का ख़त लेकर मक्के जा रहा हूँ। मैंने वह ख़त उससे छीन लिया, यह हाज़िर है। हुक्म हो, तो क़ासिद को पेश करूँ।
ज़ियाद---( खत पढ़कर ) क़सम खुदा की, मैं मुस्लिम को ज़िन्दा न छोडूँगा। मैं यहाँ मौजूद रहूँ, और १८ हज़ार आदमी हुसैन की बैयत क़बूल कर लें। ( कासिद से ) तू किसका नौकर है?
क़ासिद---अपने आक़ा का।
ज़ियाद---तेरा आक़ा कौन है?
क़ासिद---जिसने मुझे मिस्रियों के हाथ से ख़रीदा था।
ज़ियाद---किसने तुझे खरीदा?
क़ासिद---जिसने रुपए दिये।
ज़ियाद---किसने रुपए दिये?
क़ासिद---मेरे आक़ा ने।
ज़ियाद---तेरा अाक़ा कहाँ रहता है?
क़ासिद---अपने घर में।
ज़ियाद---उसका घर कहाँ है?
सिद---जहाँ उसके बुज़ुर्गों ने बनवाया था।
ज़ियाद---क़सम खुदा की, तू एक ही शैतान है। मैं जानता हूँ कि तुझ-आदमियो के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए। ( जल्लाद से ) इसे ले जाकर क़त्ल कर दे।
मुअ०---हुज़ूर, मैं खूब पहचानता हूँ कि यह साँड़नी हानी की है।
ज़ियाद---अगर तू मुस्लिम का सुराग़ लगा दे, तो तुझे आज़ाद कर दूँ, और पाँच हज़ार दीनार इनाम दूँ।
मु०---( दिल में ) ये बड़े-बड़े हाकिम बड़ी-बड़ी थैलियाँ हड़प करने ही के लिए हैं। अक्ल ख़ाक नहीं होती। जब साँड़नी मौजूद है, तो उसके मालिक का पता लगाना क्या मुश्किल है? अाज किसी भले आदमी का मुँह देखा था। चलकर साँड़नी पर बैठ जाता हूँ, और उसकी नकेल छोड़ देता हूँ। अाप ही अपने घर पहुँच जायगी। वहीं मुस्लिम का पता लग जायगा।
[ चला जाता है। ]
ज़ियाद---( दिल में ) अगर यह साँड़नी हानी की है, तो साफ़ ज़ाहिर है कि वह भी इस साज़िश में शरीक है। मैं अब तक उसे अपना दोस्त समझता था। ख़ुदा, कुछ नहीं मालूम होता कि कौन मेरा दोस्त है, और कौन दुश्मन। मैं अभी उसके घर गया था। अगर शरीक भी हानी का मददगार है, तो यही कहना पड़ेगा कि दुनिया में किसी पर भी एतबार नहीं किया जा सकता।
ग्यारहवाँ दृश्य
[ १० बजे रात का समय। ज़ियाद के महल के सामने सड़क पर सुलेमान मुख़तार और हानी चले आ रहे हैं। ]
सुले०---ज़ियाद के बर्ताव में अब कितना फ़र्क़ नज़र आता है। मुख०―हाँ, वरना हमें मशविरा देने के लिए क्यों बुलाता। हानी०―मुझे तो खौफ़ है कि उसे मुस्लिम की बैयत लेने की खबर मिल गयी है। कहीं उसकी नीयत खराब न हो। मुख०―शक और एतबार साथ-साथ नहीं होता। वरना वह आज आपके घर न जाता। हानी०―उस वक्त भी शायद भेद लेने ही के इरादे से गया हो। मुझसे ग़लती हुई कि अपने क़बीले के कुछ आदमियों को साथ न लाया, तलवार भी नहीं ली। सुले०―यह आपका बहम है। ज़ियाद―अस्सलामअलेक। आइए, आप लोगों से एक खास मुआमले में सलाह लेनी है। क्यों शेख हानी, आपके साथ खलीफ़ा यज़ीद ने जो रियायतें कीं, क्या उनका यह बदला होना चाहिए था कि आप मुस्लिम को अपने घर में ठहराये, और लोगों को हुसैन की बैयत करने पर आमादा करें? हम आपका रुतबा और इज़्ज़त बढ़ाते हैं,और आप हमारी जड़ खोदने की फ़िक्र में हैं? हानी―या अमीर, खुदा जानता है, मैंने मुस्लिम को खुद नहीं बुलाया, वह रात को मेरे घर आये, और मेरी पनाह चाही। यह इन्सानियत के खिलाफ़ था कि मैं उन्हें घर से निकाल देता। आप खुद सोच सकते हैं कि इसमें मेरी क्या खता थी। ज़ियाद―तुम्हें मालूम था कि हुसैन खलीफ़ा यज़ीद के दुश्मन हैं। हानी―अगर मेरा दुश्मन भी मेरी पनाह में आता, तो मैं दरवाज़ा न बन्द करता। ज़ियाद―अगर तुम अपनी खैरियत चाहते हो, तो मुस्लिम को मेरे हवाले कर दो। वरना कलाम पाक की क़सम, तुम फिर आफ़ताब की रोशनी न देखोगे। हानी―या अमीर, अगर आप मेरे जिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर डालें, और उन टुकड़ों को आग में जला डाले तो भी मैं मुस्लिम को आपके हवाले न करूँगा। मुरौवत इसे कभी क़बूल नहीं करती कि अपनी पनाह में अानेवाले आदमी को दुश्मन के हवाले किया जायं। यह शराफ़त के खिलाफ़ है। अरब की आन के ख़िलाफ़ है। अगर मैं ऐसा करूँ, तो अपनी ही निगाह में गिर जाऊँगा। मेरे मुँह पर हमेशा के लिए स्याही का दाग़ लग जायगा। और, आनेवाली नस्लें मेरे नाम पर लानत करेंगी।
क़ीस---( हानी को किनारे ले जाकर ) हानी, सोचो, इसका अंजाम क्या होगा? तुम पर, तुम्हारे खानदान पर, तुम्हारे क़बीले पर अाफ़त आ जायगी। इतने आदमियों को क़ुरबान करके एक आदमी की जान बचाना कहाँ की दानाई है?
हानी---क्रीस, तुम्हारे मुँह से ये बातें ज़ेबा नहीं। मैं हुसैन के चचेरे भाई के साथ कभी दग़ा न करूँगा, चाहे मेरा सारा ख़ानदान क़त्ल कर दिया जाय।
ज़ियाद----शायद तुम अपनी ज़िन्दगी से वेज़ार हो गये हो।
हानी---आप मुझे अपने मकान पर बुलाकर मुझे क़त्ल की धमकी दे रहे हैं। मैं कहता हूँ कि मेरा एक क़तरा खून इस आलीशान इमारत को हिला देगा। हानी बेकस, बेज़ार और बेमददगार नहीं है।
ज़ियाद---( हानी के मुँह पर सौटे से मारकर ) ख़लीफफ़ा का नायब किसी के मुँह से अपनी तौहीन न सुनेगा, चाहे वह दस हज़ार क़बीले का सरदार क्यों न हो।
हानी---( नाक से ख़ून पोंछते हुए ) ज़ालिम! तुझे शर्म नहीं आती कि तू एक निहत्थे अादमी पर वार कर रहा है। काश मैं जानता कि तू दग़ा करेगा, तो तू यों न बैठा रहता।
सुले०---ज़ियाद! मै तुम्हें ख़बरदार किये देता हूँ कि अगर हानी को क़ैद किया, तो तू भी सलामत न बचेगा।
[ ज़ियाद सुलेमान को मारने उठता है, लेकिन हज्जाज उसे रोक लेता है। ]
ज़ियाद---तुम लोग बैठे मुँह क्या ताक रहे हो, पकड़ लो इस बुड्ढे को।
[ बाहर की तरफ़ शोर मचता है। ] यह शोर कैसा है?
क़ीस---( खिड़की से बाहर की तरफ़ झाँककर ) बाग़ियों की एक फ़ौज इस तरफ़ बढ़ती चली आ रही है।
ज़ियाद---कितने आदमी होंगे?
क़ीस---क़सम खुदा की, दस हज़ार से कम नहीं हैं।
ज़ियाद---( सिपाही को बुलाकर ) हानी को ले जाओ और उस कोठरी में बंद कर दो, जहाँ कभी आफ़ताब की किरणें नहीं पहुँचतीं।
सुले०---ज़ियाद, मैं तुझे खबरदार किये देता हूँ, कि तुझे ख़ुद न उसी कोठरी में क़ैद होना पड़े।
[ सुलेमान और मुख़तार बाहर चले जाते हैं। ]
क़ीस---बागियों की एक फ़ौज बड़ी तेज़ी से बढ़ती चली आ रही है। बीस हज़ार से कम न होगी। मुस्लिम झंडा लिये हुए सबके आगे हैं।
ज़ियाद---दरवाज़े बन्द कर लो। अपनी-अपनी तलवारें लेकर तैयार हो जाओ। क़सम ख़ुदा की, मैं इस बग़ावत का मुक़ाबला ज़बान से करूँगा। ( छत पर चढ़कर बागियों से पूछता है ) तुम लोग क्यों शोर मचाते हो?
एक आ०---हम तुझसे हानी के ख़ून का बदला लेने आये है।
ज़ियाद---क़लाम पाक की क़सम, जीते-जागते आदमी के ख़ून का बदला आज तक कभी किसी ने न लिया। अगर मैं झूठा हूँ, तो तुम्हारे शहर का काज़ी तो झूठ न बोलेगा। ( क़ाज़ी नीचे से बुलाकर ) बाग़ियों से कह दो, हानी ज़िन्दा है।
क़ाज़ी---या अमीर! मैं हानी को जब तक अपनी आँखों से न देख लूँ, मेरी ज़बान से यह तसदीक़ न होगी।
ज़ियाद---क़लाम पाक की कसम, मैं तमाम मुल्लाओं को वासिल जहन्नुम कर दूँगा। जा देख आ, जल्दी कर।
[ काज़ी नीचे जाता है, और क्षण-भर में लौट आता है। ]
क़ाज़ी---ऐ कूफ़ा के बाशिन्दो! मैं ईमान की रू से तसदीक़ करता हूँ कि शेख हानी ज़िन्दा हैं। हाँ, उनकी नाक से ख़ून जारी है। मु०―बढ़े चलो। महल पर चढ़ जाओ। क्या कहा, जीने नहीं हैं? जवाँमरदों को कभी ज़ीने का मुहताज नहीं देखा। तुम आप जीने बन जाओ। जियाद―(दिल में) ज़ालिम एक-दूसरों के कन्धों पर चढ़ रहे हैं। (प्रकट) दोस्तो, यह हंगामा किस लिए है? मैं हुसैन का दुश्मन नहीं हूँ, मुस्लिम का दुश्मन नहीं हूँ। अगर तुमने हुसैन की बैयत क़बूल की है, तो मुबारक हो। वह शौक़ से आयें। मैं यज़ीद का गुलाम नहीं हूँ। जिसे क़ौम खलीफ़ा बनाये, उसका ग़ुलाम हूँ, लेकिन इसका तसफ़िया हंगामे से न होगा, इस मकान को पस्त करने से न होगा, अगर ऐसा हो, तो सबसे पहले इस पर मेरा हाथ उठेगा। मुझे क़त्ल करने से भी फ़ैसला न होगा, अगर ऐसा हो, तो मैं अपने हाथो अपना सिर क़लम करने को तैयार हूँ। इसका फ़ैसला आपस की सलाह से होगा। मु०―ठहरो, बस, थोड़ी कसर और है। ऊपर पहुँचे कि तुम्हारी फ़तह है। सुले०―ऐं! ये लोग भागे कहाँ जाते हैं? ठहरो-ठहरो, क्या बात है? एक सि०―देखिए, क़ीस कुछ कह रहा है। क़ीस―(खिड़की से सिर निकालकर) भाइयो, हम और तुम एक शहर के रहनेवाले हैं। क्या तुम हमारे खून से अपनी तलवारों की प्यास बुझाओगे? तुम में कितने ही मेरे साथ खेले हुए हैं। क्या यह मुनासिब है कि हम एक दूसरे का खून बहायें? हम लोगों ने दौलत के लालच से, रुतबे के लालच से और हुकूमत के लालच से यज़ीद की बैयत नहीं क़बूल की है, बल्कि महज़ इसलिए कि कूफ़ा की गलियों में खून के नाले न बहें। कई आ०―हम ज़ियाद से लड़ना चाहते हैं, अपने भाइयों से नहीं।
मु०―ठहरो-ठहरो। इस दग़ाबाज़ की बातों में न आओं। सुले०―अफ़सोस, कोई नहीं सुनता। सब भागे चले जाते हैं। वह कौन बदनसीब है, जिसके आदमी इतनी आसानी से बहकाये जा सकते हैं। ―मेरी नादानी थी कि इन पर एतबार किया। सुले०―मैं हज़रत हुसैन को कौन मुँह दिखाऊँगा। ऐसे लोग दग़ा देते जा रहे हैं, जिनको मैं तक़दीर से ज्यादा अटल समझता था। कीस गया, हज्जाज गया, हारिस गया, शीश ने दग़ा दी, अशअस ने दग़ा दी। जितने अपने थे, सब बेगाने हो गये।
मुख॰---अब हमारे साथ कुल तीस आदमी और रह गये। ( यज़ीद के सिपाही महल से निकलते हैं ) ख़ुदा, इन मूज़ियों से बचाओ। हज़रत मुस्लिम, मुझे अब कोई ऐसा मकान नज़र नहीं आता, जहाँ आपकी हिफ़ाज़त कर सकूँ। मुझे यहाँ की मिट्टी से भी दग़ा की बूआ रही है।
कसीर---ग़रीब का मकान हाज़िर है।
मुख०---अच्छी बात है। हज़रत मुस्लिम, आप इनके साथ जायँ। हमें रुखसत कीजिए। हम दो-चार ऐसे आदमियों का रहना ज़रूरी है, जो हज़रत हुसैन पर अपनी जान निसार कर सकें। हमे अपनी जान प्यारी नहीं, लेकिन हुसैन की ख़ातिर उसक़ी हिफ़ाज़त करनी पडेगी।
[ वे दोनो एक गली में गायब हो जाते हैं। ]
बारहवाँ दृश्य
[ ९ बजे रात का समय। मुस्लिम एक अँधेरी गली में खड़े हैं। थोड़ी दूर पर एक चिराग़ जल रहा है। तौआ अपने मकान के दरवाज़े पर बैठी हुई है। ]
मुस्लिम---(स्वगत) उफ़्! इतनी गरमी मालूम होती है कि बदन का ख़ून आग हो गया। दिन-भर गुज़र गया, कहीं पानी का एक बूंद भी न नसीब हुअा। एक दिन, सिर्फ़ एक दिन पहले २० हज़ार आदमियों ने मेरे हाथों पर हुसैन की बैयत ली थी। आज किसी से एक बूँद पानी माँगते हुए ख़ौफ़ होता है कि कहीं गिरफ्तार न हो जाऊँ। साए पर दुश्मन का गुमान होता है। ख़ुदा से अब मेरी यही दुआ है कि हुसैन मक्के से न चले हों। आह कसीर! खुदा तुम्हें जन्नत मे जगह दे। कितना दिलेर, कितना जाँबाज़! दोस्त की हिमायत का पाक फ़र्ज़ इतनी जवाँमरदी से किसने पूरा किया होगा! तुम दोनो बाप और बेटे इस दग़ा और फ़रेब की दुनिया में रहने के लायक न थे। तुम्हारी मज़ार पर हूरें फ़ातिहा पढ़ने आयेंगी। आह! अब प्यास के मारे नहीं रहा जाता। दुश्मन की तलवार से मरना इतना ख़ौफ़नाक नहीं है, जितना प्यास से तड़प-तड़पकर मरना। चिराग़ नज़र आता है। वहाँ चलकर पानी माँगूँ, शायद मिल जाय। (प्रकट) ऐ नेक बीबी, मेरा प्यास के मारे बुरा हाल है, थोंड़ा-सा पानी पिला दो।
तौआ---अाओ, बैठो, पानी लाती हूँ।
[ वह पानी लाती है, और मुस्लिम पीकर दीवार से लगकर बैठते हैं। ]
तौआ---ऐ ख़ुदा के बन्दे, क्या तूने पानी नहीं पिया?
मु०---पी चुका।
तौआ---तो अब घर जाओ? यहाँ अकेले खड़ा रहना मुनासिब नहीं है। ज़ियाद के सिपाही चक्कर लगा रहे हैं, ऐसा न हो, तुम्हें शुबहे में पकड़ लें।
मु०---चला जाऊँगा।
तौआ---हाँ बेटा, ज़माना खराब है, अपने घर चले जाओ।
मु०---चला जाऊँगा।
तौआ---रात गुज़रती जाती है। तुम चले जाओ, तो मैं दरवाज़ा बन्द कर लूँ।
मु०---चला जाऊँगा।
तौआ---सुभानअल्लाह! तुम भी अजीब आदमी हो। मैं तुमसे बार-बार घर जाने को कहती हूँ, और तुम उठते ही नहीं। मुझे तुम्हारा यहाँ पड़ा रहना पसन्द नहीं। कहीं कोई वारदात हो जाय, तो मैं ख़ुदा के दरगाह में गुनहगार बनूँ।
मु०---ऐ नेक बीबी, जिसका यहाँ घर ही न हो, वह किसके घर चला जाय। जिसके लिए घरों के दरवाज़े नहीं, सड़कें बन्द हो गयी हों, उसका कहाँ ठिकाना है। अगर तुम्हारे घर में जगह और दिल में दर्द हो, तो मुझे पनाह दो। शायद मैं कभी इस नेकी का बदला दे सकूँ।
तौआ---तुम कौन हो?
मु०---मैं वही बदनसीब आदमी हूँ, जिसकी आज घर-घर तलाश हो रही है। मेरा नाम मुस्लिम है।
तौआ---या हज़रत, तुम पर मेरी जान फ़िदा हो। जब तक तौआ ज़िन्दा है, आपको किसी दूसरे घर जाने की ज़रूरत नहीं है। ख़ुशनसीब कि मरने के वक्त आपकी ज़ियारत हुई। मैं ज़ियाद से क्यों डरूँ? जिसके लिए मौत के सिवा और कोई आरज़ू नहीं। अाइए, आपको अपने मकान के दूसरे हिस्से में ठहरा दूँ, जहाँ किसी का गुज़र नहीं हो सकता। [ मुस्लिम तौआ के साथ जाते हैं। ] यहाँ आप आराम कीजिए, मैं खाना लाती हूँ।
[ बलाल का प्रवेश। ]
बलाल---अम्मा, अाज ज़ियाद ने लोगों की ख़ताएँ माफ़ कर दी, सबको तसल्ली दी, और इतमीनान दिलाया कि तुम्हारे साथ कोई सख़्ती न की जायगी। हज़रत मुस्लिम का न-जाने क्या हाल हुअा।
तौआ---जो हुसैन का दुश्मन है, उसके क़ौल का क्या एतबार।
बलाल---नहीं अम्मा, छोटे-बड़े खातिर से पेश आये। उसकी बातें ऐसी होती हैं कि एक-एक लफ्ज़ दिल में चुभ जाता है। हज़रत मुस्लिम का बचना अब मुझे भी मुश्किल जान पड़ता है। अब ख़याल होता है, उनके यहाँ आने से हम लोगों में निफ़ाक़ पैदा हो गया। ज़ियाद ने वादा किया है कि जो उन्हें गिरफ्तार करा देगा, उसे बहुत कुछ इनाम-एकराम मिलेगा।
तौआ---बेटा, कहीं तेरी नीयत तो नहीं बदल गयी। ख़ुदा की क़सम, तुझे कभी दूध न बख़्शूँगी।
बलाल---अम्मा, ख़ुदा न करे, मेरी नीयत में फ़र्क आये। मैं तो सिर्फ बात कह रहा था। आज सारा शहर ज़ियाद को दुआएँ दे रहा है।
[ तौआ प्याले में खाना लेकर मुस्लिम को दे आती है। ]
बलाल---हज़रत हुसैन तशरीफ़ न लायें, तो अच्छा हो। मुझे खौफ़ है कि लोग उनके साथ दग़ा करेंगे।
तौआ---ऐसी बातें मुँह से न निकाल। मुँह-हाथ धो ले। क्या तुझे भूख नहीं लगी, या ज़ियाद ने दावत कर दी?
बलाल---ख़ुदा मुझे उसकी दावत से बचाये। खाना ला।
[ तौबा उसके सामने खाना रख देती है, और फिर प्याले में कुछ लेकर मुस्लिम को दे आती है। ]
बलाल---यह पिछवाड़े की तरफ़ बार-बार क्यों जा रही हो अम्मा?
तौआ---कुछ नहीं बेटा! यों ही एक ज़रूरत से चली गयी थी।
बलाल---हज़रत मुस्लिम पर न जाने क्या गुज़री।
[ खाना खाकर चारपाई पर लेटता है, तौआ बिस्तर लेकर मुस्लिम की चारपाई पर बिछा आती है। ]
बलाल---अम्मा, फिर तुम उधर गयीं, और कुछ लेकर गयीं। आखिर माजरा क्या है? कोई मेहमान तो नहीं आया है?
तौआ---बेटा, मेहमान अाता, तो क्या उसके लिए यहाँ जगह थी?
बलाल---मगर कोई-न-कोई बात है ज़रूर। क्या मुझसे भी छिपाने की ज़रूरत है?
तौआ---तू सो जा, तुझसे क्या।
बलाल---जब तक बतला न दोगी, तब तक मैं न सोऊँगा।
तौआ---किसी से कहेगा तो नहीं?
बलाल---तुम्हें मुझ पर भी एतबार नहीं?
तौआ---क़सम खा।
बलाल---खुदा की क़सम है, जो किसी से कहूँ।
तौआ---( बलाल के कान में ) हज़रत मुस्लिम हैं।
बलाल---अम्मा, ज़ियाद को ख़बर मिल गयी, तो हम तबाह हो जायेंगे।
तौआ---खबर कैसे हो जायगी। मैं तो कहूँगी नहीं। हाँ तेरे दिल की नहीं जानती। करती क्या, एक तो मुसाफ़िर, दूसरे हुसैन के भाई। घर में जगह न होती, तो दिल मे बैठा लेती।
बलाल---( दिल में ) अम्मा ने मुझे यह राज़ बता दिया, बड़ी ग़लती की। मैंने ज़िद करके पूछा, मुझसे ग़लती हुई। दिल पर क्योंकर क़ाबू रख सकता हूँ। एक वार से बादशाहत मिलती हो, तो ऐसा कौन हाथ है, जो न उठ जायगा। एक बात से दौलत मिलती हो, ज़िन्दगी के सारे हौसिले पूरे होते हों, तो वह कौन ज़ुबान है, जो चुप रह जायगी। ऐ दिल, गुमराह न हो, तूने सख़्त कसमें खायी है। लानत का तौक़ गले में न डाल। लेकिन होगा तो वही, जो मुक़द्दर में है। अगर मुस्लिम की तक़दीर में बचना लिखा है, तो बचेंगे, चाहे सारी दुनिया दुश्मन हो जाय। मरना लिखा है, तो मरेंगे चाहे सारी दुनिया उन्हें बचाये।
[ उठकर तौआ की चारपाई की तरफ़ देखता है, और चुपके-से दरवाज़ा खोलकर चला जाता है। ]
तौआ---( चौंककर उठ बैठती है ) अाह! ज़ालिम, मा से भी दग़ा की। तुझे यह भी शर्म न आयी कि हुसैन का भाई मेरे मकान में गिरफ़्तार हो। आक़बत के दिन ख़ुदा को कौन-सा मुँह दिखायेगा। एक कसीर था कि अपनी और अपने बेटे की जान अपने मेहमान पर निसार कर दी, और एक बदनसीब मैं हूँ कि मेरा बेटा उसी मेहमान को दुश्मनों के हवाले करने जा रहा है!
[ बाहर शोर सुनायी देता है। मुस्लिम तौआ के कमरे में आते हैं। ]
मु०---तौआ, यह शोर कैसा है?
तौआ---या हज़रत! क्या बताऊँ, मेरा बेटा मुझसे दग़ा कर गया। वह बुरी सायत थी कि मैंने अपने घर में आपको पनाह दी। काश अगर मैंने उस वक्त बेमुरौवती की होती, तो आप इस खतरे में न पड़ते। अगर कभी किसी मा को बेटा जनने पर अफ़सोस हुअा है, तो वह बदनसीब मा मैं हूँ। अगर जानती कि यह यों दग़ा करेगा, तो ज़च्चेखाने ही में उसका गला घोंट देती।
मु॰---नेक बीबी, शरमिन्दा न हो। तेरे बेटे की ख़ता नहीं, सब कुछ वही हो रहा है, जो तक़दीर में था, और जिसकी मुझे ख़बर थी। लेकिन दुनिया में रहकर इन्साफ़, इज़्ज़त और ईमान के लिए प्राण देना हरएक सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ है। ख़ुदा नबियों के हाथों हिदायत के बीज बोता है, और शहीदों के खून से उसे सींचता है। शहादत वह अाला-से-अाला रुतबा है, जो खुदा इन्सान को दे सकता है। मुझे अफ़सोस सिर्फ़ यह है, कि जो बात एक दिन पहले होनी चाहिए थी, वह अाज दो ख़ुदा के बंदों का खून बहाने के बाद हो रही है।
[ ज़ियाद के आदमी बाहर से तौआ के घर में आग लगा देते हैं, और मुस्लिम बाहर निकलकर दुश्मनों पर टूट पड़ते हैं। ]
एक सिपाही---तलवार क्या है, बिजली है। ख़ुदा बचाये।
[ मुस्लिम का हाथ पकड़ता है, और वहीं गिर पड़ता है। ]
दूसरा सिपाही---अब इधर चला, जैसे कोई मस्त शेर डकारता हुआ चला आता हो। बन्दा तो घर की राह लेता है, कौन जान दे।
[ भागता है। ]
तीसरा सिपाही---अर...र...र...या हज़रत मैं ग़रीब मुसाफ़िर हूँ, देखने आया था कि यहाँ क्या हो रहा है।
[ मुस्लिम का हाथ पकड़ता है, और वहीं गिर पड़ता है ]
चौथा सिपाही---जहन्नुम मे जाय ऐसी नौकरी। आदमी आदमी से लड़ता है कि देव से। या हज़रत, मैं सिपाही नहीं हूँ, मैं तो हुज़ूर के हाथों पर बैयत करने आया था।
[ मुस्लिम का हाथ पकड़ता है, और वहीं गिर पड़ता है। ]
पाँचवाँ सिपाही---किधर से भागें,कहीं जगह नहीं मिलती। या हज़रत, अपनी बूढ़ी मा का अकेला लड़का हूँ। जान बख़्श दें, तो हुजूर की जूतियाँ सीधी करूँगा।
[ तलवार पड़ते ही गिर पड़ता है। सिपाहियों में भगदड़ पड़ जाती है। ]
क़ीस---जवानो, हिम्मत न हारो। तुम तीन सौ हो। कितनी शर्म की बात है कि एक आदमी से इतना डर रहे हो।
एक सिपाही---बड़े बहादुर हो, तो तुम्हीं क्यों नहीं उससे लड़ आते? दुम दबाये पीछे क्यों खड़े हो? क्या तुम्हीं को अपनी जान प्यारी है?
क़ीस---हज़रत मुस्लिम, अमीर ज़ियाद का हुक्म है कि अगर आप हथियार रख दें, तो आपको पनाह दी जाय। ( सिपाहियों से ) तुम सब छतों पर चढ़ जाओ, और ऊपर से पत्थर फेको।
मु०---ऐ खुदा और रसूल के दुश्मन, मुझे तेरी पनाह की ज़रूरत नहीं है। मैं यहाँ तुझसे पनाह माँगने नहीं आया हूँ, तुझे सच्चाई के रास्ते पर लाने आया हूँ।( एक पत्थर सिर पर आता है ) ऐ गुमराहो! क्या तुमने इस्लाम से मुँह फेरकर शराफ़त और इन्सानियत से भी मुँह फेर लिया। क्या तुम्हें शर्म नहीं आती कि तुम अपने रसूल पाक के अज़ीज़ पर पत्थर फेक रहे हो। हमारे साथ तुम्हारा यह कमीनापन!
[ तलवार लेकर टूट पड़ते हैं। ]
कूचे में रास्ती के हम अब गदा हुए हैं, / क्या ख़ौफ़ मौत का है, हक़ पर फ़िदा हुए हैं। / ईमाँ है अपना मुस्लिम मकरोदग़ा से नफ़रत, / दुनिया से फेरकर मुँह नक़शे-वफ़ा हुए हैं। / क्या उनपे हाथ उठाऊँ जो मौत से हैं ख़ायफ़, / जो राहे-हक़ से फिरकर सरफ़े-दग़ा हुए हैं। / दुनिया में आके इक दिन हर शख्स को है मरना, / जन्नत है उनकी, जो याँ वक-़ेज़फ़ा हुए हैं।
क़ीस---कलामे पाक की क़सम, हम आपसे फ़रेब न करेंगे। अगर हम आपसे झूठ बोलें, तो हमारी नजात न हो।
मु॰---वल्लाह! मुझे ज़िन्दा गिरफ्तार करके ज़ियाद के तानों का निशाना न बना सकेगा।
क़ीस---( आहिस्ते से ) यह शेर इस तरह काबू में न आयगा। इसका सामना करना मौत का लुक़मा बनना है। यहाँ गहरा गड्ढा खोदो। जब तक वह औरों को गिराता हुअा अाये, तब तक गड्ढा तैयार हो जाना चाहिए। यहाँ अँधेरा है, वह जोश में इधर आते ही गिर जायगा।
एक सि॰---ज़ियाद पर लानत हो, जिसने हमें शेर से लड़ने के लिए भेजा। या हज़रत, रहम, रहम!
सि॰---ख़ुदा खैर करे। क्या जानता था, यहाँ मौत का सामना करना पड़ेगा। बाल-बच्चों की खबर लेनेवाला कोई नहीं।
[ मुस्लिम गड्ढे में गिर पड़ते हैं। ]
मु॰---जालिमो, आखिर तुमने दग़ा की!
क़ीस---पकड़ लो, पकड़ लो, निकलने न पाये। खबरदार, क़त्ल न करना; ज़िन्दा पकड़ लो।
अशअस---तलवार का हक़दार मैं हूँ।
क़ीस---जिर्रह मेरा हिस्सा है।
अश॰---ख़ोद उतार लो, साद को देंगे।
मु॰---प्यास! बड़े ज़ोरों की प्यास है। ख़ुदा के लिए एक घूँट पानी पिला दो।
क़ीस---अब जहन्नुम के सिवा यहाँ पानी का एक क़तरा भी न मिलेगा।
मुस॰---तुफ़ है तुझ पर ज़ालिम, तुझे शरीफ़ों की तरह ज़बह करने की भी तमीज़ नहीं। मरनेवालों से ऐसी दिल-ख़राश बातें की जाती हैं? अफ़सोस।
अश॰---अब अफ़सोस करने से क्या फ़ायदा। यह तुम्हारे फे़ल का नतीजा है।
मु॰---अाह! मैं अपने लिए अफ़सोस नहीं करता। रोता हूँ हुसैन के लिए, जिसे मैंने तुम्हारी मदद के लिए आमादा किया। जो मेरी ही मिन्नतों से अपने गोशे पर निकलने को राज़ी हुआ। जब कि खानदान के सभी आदमी तुम्हारी दग़ाबाज़ी का खौफ़ दिला रहे थे, मैंने ही उन्हें यहाँ आने पर मजबूर किया। रोता हूँ कि जिस दग़ा ने मुझे तबाह किया, वह उन्हें और उनके साथ उनके खानदान को भी तबाह कर देगी। क्या तुम्हारे ख़याल में यह रोने की बात नहीं है? तुमसे कुछ सवाल करूँ?
अश॰---हुसैन की बैयत के सिवा और जो सवाल चाहे कर सकते हो।
मु॰---हुसैन को मेरी मौत की इत्तिला दे देना।
अश॰---मंज़ूर है।
[ कई सिपाही मुस्लिम को रस्सियों से बाँधकर ले जाते हैं। ]
तेरहवाँ दृश्य
[ प्रातःकाल का समय। ज़ियाद का दरबार। मुस्लिम को कई आदमी मुश्क कसे लाते हैं। ]
मु॰---मेरा उस पर सलाम है, जो हिदायत पर चलता है, अाक़बत से डरता है, और सच्चे बादशाह की बन्दगी करता है।
चोबदार---मुस्लिम! अमीर को सलाम करो।
मु॰---चुप रह! अमीर, मेरा मालिक, मेरा अाक़ा, मेरा इमाम हुसैन है।
ज़ियाद---तुमने कूफ़ा में आकर कानून के मुताबिक़ क़ायम की हुई बादशाहत को उखाड़ने की कोशिश की, बाग़ियों को भड़काया, और रियासत में निफ़ाक़ पैदा किया।
मु॰---कूफ़ा कानून के मुताबिक़ न कोई सल्तनत कायम थी, न है। मैं उस शख्स का क़ासिद हूँ, जो चुनाव के क़ानून से, विरासत के क़ानून से और लियाक़त से अमीर है। कूफ़ावालों ने ख़ुद उसे अमीर बनाया। अगर तुमने लोगों के साथ इन्साफ़ किया होता, तो बेशक, तुम्हारा हुक्म जायज़ था। रियाया की मर्ज़ी और सब हक़ों को मिटा देती है। मगर तुमने लोगों पर वे ज़ल्म किये कि कै़सर ने भी न किये थे। बेगुनाहों को सजाएँ दीं, जुरमाने के हीले से उनकी दौलत लूटी, अमन रखने के हीले से उनके सरदारों को क़त्ल किया। ऐसे ज़ालिम हाकिम का, चाहे वह किसी हक़ के बिना पर हुकूमत करता हो, हुकूमत करने का कोई हक़ नहीं रहता, क्योंकि हैवानी ताकत कोई हक़ नहीं है। ऐसी हुकूमत को मिटाना हर सच्चे आदमी का फ़र्ज़ है। और, जो इस फ़र्ज़ से खौफ़ या लालच के कारण मुँह मोड़ता है, वह इन्सान और खुदा, दोनो ही की निगाहों में गुनहगार है। मैंने अपने मक़दूर-भर रियाया को तेरे पंजे से छुड़ाने की कोशिश की, और मौक़ा पाऊँगा, तो फिर करूँगा।
ज़ियाद---वल्लाह, तू फिर इसका मौक़ा न पायेगा। तूने बग़ावत की है। बग़ावत की सज़ा क़त्ल है। और, दूसरे बाग़ियों की इबरत के लिए मैं तुझे इस तरह क़त्ल कराऊँगा, जैसे कोई अब तक न किया गया होगा।
मु॰---बेशक। यह लियाक़त तुझी में है।
ज़ियाद॰---इस गुस्ताख को ले जाओ, और सबसे ऊँची छत पर क़त्ल करो।
मु॰---साद, तुमको मालूम है कि तुम मेरे कराबतमन्द हो?
साद॰---मालूम है।
मु॰---मैं तुमसे कुछ वसीयत करना चाहता हूँ।
साद॰---शौक़ से करो।
मु॰---मैंने यहाँ कई आदमियों से क़र्ज़ लेकर अपनी ज़रूरतों पर खर्च किया था। इस काग़ज़ पर उनके नाम और रक़में दर्ज हैं। तुम मेरा घोडा और मेरे हथियार बेचकर यह कर्ज़ अदा कर देना, वरना हिसाब के दिन मुझे इन आदमियों से शर्मिन्दा होना होगा।
साद॰---इसका इतमीनान रखिए।
मु॰---मेरी लाश को दफ़न करा देना।
साद॰---यह मेरे इमकान में नहीं है।
[ जल्लाद आकर मुस्लिम को ले जाता है। ]
अश॰---या अमीर, मुस्लिम क़त्ल हुए। अब बग़ावत का कोई अन्देशा नहीं। अब आप हानी की जानबख़्शी कीजिए।
ज़ियाद---कलाम पाक की क़सम, अगर मेरी नजात भी होती हो, तो हानी को नहीं छोड़ सकता।
अश॰---लोग बिगड़ खड़े हों, तो?
ज़ियाद॰---जब क़ौम के सरदार मेरे तरफ़दार हैं, तो रियाया की तरफ़ से कोई अन्देशा नहीं। ( जल्लाद को बुलाकर ) तूने मुस्लिम को क़त्ल किया?
जल्लाद---अमीर के हुक्म की तामील हो गयी। ख़ुदावन्द किसी को इतनी दिलेरी से जान देते नहीं देखा। पहले नमाज़ पढ़ी, तब मुझसे मुस्किराकर कहा---'तू अपना काम कर'।
ज़ियाद---तूने उसे नमाज़ क्यों पढ़ने दिया? किसके हुक्म से?
जल्लाद॰---ग़रीबपरवर, आखिर नमाज़ के रोकने का अज़ाब जल्लादों के लिए भी भारी है, जिस्म को सिर से अलग कर देना इतना बड़ा गुनाह नहीं है, जितना किसी को ख़ुदा की इबादत से रोकना।
ज़ियाद---चुप रह नामाक़ूल। तू क्या जानता है, किसको क्या सज़ा देनी चाहिए। ग़ैरतमन्दों के लिए रूहानी ज़िल्लत क़त्ल से कहीं ज़्यादा तकलीफ़ देती है। खैर, अब हानी को ले जा, और चौराहे पर क़त्ल कर डाल।
एक आ॰---खुदावन्द, यह ख़िदमत मुझे सुपुर्द हो।
ज़ियाद॰---तू कौन है?
आ॰---हानी का ग़ुलाम हूँ। मुझ पर उसने इतने ज़ुल्म किये हैं कि मैं उसके खून का प्यासा हो गया हूँ। आपकी निगाह हो जाय, तो मेरी पुरानी अारज़ू पूरी हो। मैं इस तरह क़त्ल करूँगा कि देखनेवाले आँखें बन्द कर लेंगे।
ज़ियाद---कलाम पाक की क़सम, तेरा सवाल ज़रूर पूरा करूँगा।
[ गुलाम हानी को पकड़े हुए ले जाता है। कई सिपाही तलवारें लिये साथ-साथ जाते हैं। ]
ग़ुलाम---( हानी से ) मेरे प्यारे आक़ा, मैंने ज़िन्दगी-भर अापका नमक खाया, कितनी ही ख़ताएँ की, पर आपने कभी कड़ी निगाहों से नहीं देखा। अब आपके जिस्म पर किसी बेदर्द क़ातिल का हाथ पड़े, यह मैं नहीं देख सकता। मैं इस हालात में भी आपकी ख़िदमत करना चाहता हूँ। मैं आपकी रूह को इस जिस्म की क़ैद से इस तरह आज़ाद करूँगा कि ज़रा भी तकलीफ़ न हो। खुदा आपको जन्नत दे, और ख़ता माफ़ करे।