कर्बला
पहला अंक
पहला दृश्य
[समय-नौ बजे रात्रि, यज़ीद, ज़ुहाक, शम्स और कई दरबारी बैठे हुए हैं, और शराब की सुराही और प्याला रखा हुआ है।]
यज़ीद—नगर में मेरी ख़िलाफ़त का ढिंढोरा पीट दिया गया?
ज़ुहाक—कोई गली, कूचा, नाका, सड़क, मस्जिद, बाज़ार, ख़ानक़ाह ऐसा नहीं है, जहाँ हमारे ढिंढोरे की आवाज़ न पहुँची हो। यह आवाज़ वायुमंडल को चीरती हुई हिजाज़, यमन, इराक, मक्का-मदीना में गूँज रही है। और उसे सुनकर शत्रुओं के दिल दहल उठे हैं।
यज़ीद—नक़्क़ारची को ख़िलअत दिया जाय।
ज़ुहाक—बहुत खूब अमीर !
यज़ीद—मेरी बैयत लेने के लिए सबको हुक्म दे दिया गया?
ज़ुहाक—अमीर के हुक्म देने की ज़रूरत न थी। कल सूर्योदय से पहले सारा शाम बैयत लेने को हाज़िर हो जायगा।
यज़ीद—(शराब का प्याला पीकर) नबी ने शराब को हराम कहा है। यह इस अमृत-रस के साथ कितना घोर अन्याय है! उस समय के लिए यह निषेध सर्वथा उचित था, क्योंकि उन दिनों किसी को यह आनन्द भोगने का अवकाश न था। पर अब वह हालत नहीं है। तख्त पर बैठे हुए ख़लीफ़ा के लिए ऐसी नियामत हराम समझने से तो यह कहीं अच्छा है कि वह ख़लीफ़ा ही न रहे। क्यों ज़ुहाक, कोई क़ासिद मदीने भेजा गया?
ज़ुहाक—अमीर के हुक्म का इन्तज़ार था।
यज़ीद—ज़ुहाक, क़सम है अल्लाह की; मैं इस विलम्ब को कभी क्षमा नहीं कर सकता। फ़ौरन् क़ासिद भेजो, और वलाद को सख्त ताक़ीद लिखो कि वह हुसैन से मेरे नाम पर बैयत ले। अगर वह इनकार करें, तो उन्हें क़त्ल कर दे। इसमें ज़रा भी देर न होनी चाहिए।
ज़ुहाक—या मौला! मेरी तो अर्ज़ है कि हुसैन क़बूल भी कर लें तो भी उनका ज़िन्दा रहना अबूसिफ़ियान के ख़ानदान के लिए उतना ही घातक है, जितना किसी सर्प को मारकर उसके बच्चे को पालना। हुसैन ज़रूर दावा करेंगे।
यज़ीद—जुहाक, क्या तुम समझते हो कि हुसैन कभी मेरी बैयत क़बूल कर सकता है? यह मुहाल है, असम्भव है। हुसैन कभी मेरी बैयत न लेगा, चाहे उसकी बोटियाँ काट-काटकर कौवों को खिला दी जायें। अगर तक़दीर पलट सकती है, अगर दरिया का बहाव पलट सकता है, अगर समय की गति रुक सकती है, तो हुसैन भी मेरे नाम पर बैयत ले सकता है। मगर बैयत ले चुकने के बाद मुमकिन है, तक़दीर पलट जाय, दरिया का बहाव पलट जाय, समय की गति रुक जाय, पर हुसैन दावा नहीं कर सकता। उससे बैयत लेने का मतलब ही यही है कि उसे इस जहान से रुख़सत कर दिया जाय। हुसैन ही मेरा दुश्मन है। मुझे और किसी का खौफ नहीं, मैं सारी दुनिया की फ़ौजों से नहीं डरता, मैं डरता हूँ इसी निहत्थे हुसैन से। (प्याला भरकर पी जाता है) इसी हुसैन ने मेरी नींद, मेरा आराम हराम कर रखा है। अबूसिफ़ियान की सन्तान हाशिम के बेटों के सामने सिर न झुकायेगी। ख़िलाफ़त को मुल्लाओं के हाथों में फिर न जाने देंगे। इन्होंने छोटे-बड़े की तमीज़ उठा दी। हर एक दहक़ान समझता है कि मैं ख़िलाफ़त की मसनद पर बैठने लायक़ हूँ, और अमीरों के दस्तरख़ान पर खाने का मुझे हक़ है। मेरे मरहूम बाप ने इस भ्रान्ति को बहुत कुछ मिटाया, और आज ख़लीफ़ा शान व शौकत में दुनिया के किसी ताजदार से शर्मिन्दा नहीं हो सकता। जूते सीनेवाले और रूखी रोटियाँ खाकर खुदा का शुक्रिया अदा करनेवाले ख़लीफ़ों के दिन गये।
ज़ुहाक—खुदा न करे, वह दिन फिर आये।
अब्दुशम्स—इन हाशिमियों से हमें उस्मान के खून का बदला लेना है।
यज़ीद—ख़ज़ाना खोल दो, और रियाया का दिल अपनी मुट्ठी में कर लो। रुपया खुदा के ख़ौफ को दिल से दूर कर देता है। सारे शहर की दावत करो। कोई मुज़ायका नहीं, अगर ख़ज़ाना ख़ाली हो जाय। हर एक सिपाही को निहाल कर दी। और, अगर इतनी रियायतें करने पर भी कोई तुमसे खिंचा रहे, तो उसे क़त्ल कर दो। मुझे इस वक़्त रुपए की ताक़त से धर्म और भक्ति को जीतना है।
यज़ीद—हिन्दा, तुमने इस वक़्त कैसे तकलीफ़ की?
हिन्दा—या अमीर! मैं आपकी ख़िदमत में सिर्फ़ इसलिए हाज़िर हुई हूँ कि आपको इस इरादे से बाज़ रखूँ। आपको अमीर मुआविया की क़सम, अपने दीन को, अपनी नजात को, अपने ईमान को यों न ख़राब कीजिए। जिस नबी से आपने इस्लाम की रोशनी पायी, जिसकी ज़ात से आपको यह रुतबा मिला, जिसने आपकी आत्मा को अपने उपदेशों से जगाया, जिसने आपको अज्ञान के गढ़े से निकालकर आफ़ताब के पहलू में बिठा दिया, उसी खुदा के भेजे हुए बुजुर्ग के नवासे का खून बहाने के लिए आप आमादा हैं!
यज़ीद—हिन्दा, ख़ामोश रहो।
हिन्दा—कैसे ख़ामोश रहूँ। आपको अपनी आँखों से जहन्नुम के ग़ार में गिरते देखकर ख़ामोश नहीं रह सकती। आपको मालूम नहीं कि रसूल की, आत्मा स्वर्ग में बैठी हुई आपके इस अन्याय को देखकर आपको लानत दे रही होगी। और, हिसाब के दिन आप अपना मुँह उन्हें न दिखा सकेंगे। क्या आप नहीं जानते, आप अपनी नजात का दरवाजा बन्द कर रहे हैं।
यज़ीद—हिन्दा, ये मज़हब की बातें मज़हब के लिए हैं, दुनिया के लिए नहीं। मेरे दादा ने इस्लाम इसलिए क़बूल किया था कि इससे उन्हें दौलत और इज़्ज़त हाथ आती थी। नजात के लिए वह इस्लाम पर ईमान नहीं लाये थे, और न मैं ही इस्लाम को नजात का ज़ामिन समझने को तैयार हूँ।
हिन्दा-अमीर, खुदा के लिए यह कुवाक्य मुँह से न निकालो । आपको मालम है, इस्लाम ने अरब से अधर्म के अंधेरे को कितनी आसानी से दूर कर दिया। अकेले एक आदमी ने काफिरों का निशान मिटा दिया। क्या खुदा की मर्जी बिना यह बात हो सकती थी ? कभी नहीं । तुम्हें मालूम है कि । रसूल हुसैन को कितना प्यार करते थे ? हुसैन को वह कन्धों पर बिठाते और अपनी नूरानी डाढ़ी को उनके हाथों से नुचवाते थे । जिस माथे को तुम अपने पैरों पर झुकाना चाहते हो, उसके रसूल बोसे लेते थे। हुसैन से दुश्मनी करके तुम अपने हक़ में काँटे बो रहे हो । खिलाफ़त उसकी है, जिसे पंच दे, यह किसी की मीरास नहीं है । तुम खुद मदीने जाओ, और देखो, कौम किस पर खिलाफत का बार रखती है। उसके हाथों पर बैयत लो। अगर कौम तुमको इस रुतबे पर बैठा दे, तो मदीने में रहकर शौक से इस्लाम की खिदमत करो। मगर खुदा के वास्ते यह हंगामा न उठाओ (जाती है)।
यजीद-सरजून रूमी को बुला लो।
यजीद-आपने वालिद मरहूम की खिदमत जितनी वफादारी के साथ की, उसके लिए मैं आपका शुक्रगुजार हूँ। मगर इस वक्त मुझे आपकी पहले से कहीं ज्यादा ज़रूरत है । बसरे की सूबेदारी के लिए आप किसे तजवीज़ करते हैं।
रूमी-खुदा अमीर को सलामत रखे । मेरे खयाल में अब्दुल्लाह बिनज़ियाद से ज्यादा लायक आदमी आपको मुश्किल से मिलेगा। ज़ियाद ने अमीर मुआबिया की जो ख़िदमत की, वह मिटाई नहीं जा सकती। अन्दुल्लाह उसी बाप का बेटा और खानदान का उतना ही सच्चा गुलाम है। उसके पास फौरन् कासिद भेज दीजिए।
यजीद-मुझे ज़ियाद के बेटे से शिकायत है कि उसने बसरेवालों के इरादों की मुझे इत्तिला नहीं दी। और, मुझे यकीन है कि बसरे- वाले मुझसे बग़ावत कर जायेंगे।
रूमी-या अमीर, आपका ज़ियाद पर शक करना बेजा है। आपके मददगार आपके पास खुद बखुद न आयेंगे। वह तलाश करने से, मिन्नत करने से, रियायत करने से आयेंगे । आप-ही-आप वे लोग आयेंगे, जो आपकी जात से खुद फायदा उठाना चाहते हैं। इस मनसब के लिए ज़ियाद से बेहतर आदमी आपको न मिलेगा।
यजीद-सोचूँगा । (शराब का प्याला) जुहाक ! कोई गीत तो सुनाओ, जिसकी मिठास उस फ़िक्र को मिटा दे, जो इस वक्त मेरे दिल और जिगर पर पत्थर की चट्टान की तरह रखा हुआ है।
जुहाक-जैसा हुक्म, ( डफ़ बजाकर गाता है)
दूसरा दृश्य
वलीद-(स्वगत) मरवान कितना खुदग़रज़ आदमी है । मेरा मातहत होकर भी मुझ पर रोब जमाना चाहता है। उसकी मरज़ी पर चलता, तो आज सारा मदीना मेरा दुश्मन होता। उसने रसूल के खानदान से हमेशा दुश्मनी की है।
क़ासिद-या अमीर, यह खलीफ़ा यज़ीद का खत है।
वलीद-(घबराकर) ख़लीफ़ा यज़ीद ! अमीर मुआविया को क्या । हुआ?
क़ासिद-आपको पूरी कैफियत इस खत से मालूम होगी।
वलीद-(खत पढ़कर) अमीर मुबाबिया की रूह को खुदा जन्नत में दाखिल करे । मगर समझ में नहीं आता कि यजीद क्योंकर खलीफा हुए। कौम के नेताओं की कोई मजलिस नहीं हुई, और किसी ने उनके हाथ पर बैयत नहीं ली । मदीने भर में यह खबर फैलेगी, तो ग़ज़ब हो जायगा । हुसैन यज़ीद को कभी न खलीफ़ा मानेंगे।
क़ासिद-(दूसरा खत देकर) हुजूर, इसे भी देख लें। "वलीद, हाकिम मदीना को ताकीद की जाती है कि इस खत को देखते ही हुसैन से मेरे नाम पर बैयत लें । अगर हुसैन बैयत न लें, तो उन्हें क़त्ल कर दें, और उनका सिर मेरे पास भेज दें।"
क़ासिद-मुझे क्या हुक्म होता है ?
वलीद-तुम जाकर बाहर ठहरो । (दिल में) खुदा वह दिन न लाये कि मुझे रसूल के नवासे के साथ यह घृणित व्यवहार करना पड़े। वलीद इतना बेदीन नहीं है । खुदा रसूल को इतना नहीं भूला है। मेरे हाथ गिर पड़ें इसके पहले कि मेरी तलवार हुसैन की गरदन पर पड़े। काश, मुझे मालूम होता कि अमीर मुबाबिया की मौत इतनी नज़दीक है, और उसकी आंखें बन्द होते ही मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा, तो पहले ही इस्तीफा देकर चला जाता । मरवान को सूरत देखने को जी नहीं चाहता, मगर इस वक्त उसकी मर्जी के खिलाफ काम करना अपनी मौत को बुलाना है। वह रत्ती-रत्ती खबर यजीद के पास भेजेगा। उसके सामने मेरी कुछ भी न सुनी जायगी। ऐसा अफ़सर, जो मातहतों से डरे,-मातहत से भी बदतर है । जिस वज़ीर का गुलाम बादशाह का विश्वासपात्र हो, उसके लिए जंगल में ऊँट चराना इससे हजार दर्जे बेहतर है कि वह वजीर की मसनद पर बैठे।
गुलाम-अमीर क्या हुक्म फर्माते हैं ?
वलीद-जाकर मरवान को बुला ला।
गुलाम-जो हुक्म ।
वलीद-(दिल में) हुसैन कितना नेक आदमी है। उसकी जबान से कभी किसी की बुराई नहीं सुनी। उसने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। उससे मैं क्योंकर बैयत लूँगा।
मर०-इतनी रात गये मुझे अाप न बुलाया करें। मेरी जान इतनी सस्ती नहीं है कि बागियों को इस पर छिपकर हमला करने का मौका दिया जाय।
वलीद-तुम्हारा बर्ताव ही क्यों ऐसा हो कि तुम्हारे ऊपर किसी कातिल को तलवार उठे। अभी अभी कासिद मुबाबिया की खबर लाया है, और यजीद का यह खत भी आया है । मुझे तुमसे इसकी बाबत सलाह लेनी है ।
मर०—(खत पढ़कर) आह ! मुबाबिया, तुमने बेवक्त वफ़ात पायी । तुम्हारा नाम तारीख में हमेशा रोशन रहेगा । तुम्हारी नेकियों को याद करके लोग बहुत दिनों तक रोयेंगे । यजीद ने खिलाफ़त अपने हाथ में ले ली, यह बहुत ही मुनासिब हुआ। मेरे खयाल में हुसैन को इसी वक्त बुलाना चाहिए ।
वलीद-तुम्हारे खयाल में वह बैयत ले लेंगे ?
मर०-गैरमुमकिन । उनसे बैयत लेना उन्हें कत्ल करने को कहना है। मगर अभी मुनाबिया के मरने की खबर मशहूर न होनी चाहिए।
वलीद-इस मामले पर गौर करो।
मर०-गौर की ज़रूरत नहीं, मैं आपकी जगह होता, तो बैयत का जिक्र ही न करता । फ़ौरन क़त्ल कर डालता । हुसैन के जिन्दा रहते हुए यज़ीद को कभी इतमीनान नहीं हो सकता । याद रखिए कि मुआबिया के मरने की खबर फैल गयी, तो न हमारी जान सलामत रहेगी न आपकी । हुसैन से आपका कितना ही दोस्ताना हो, लेकिन वही हुसैन आपका जानी दुश्मन हो जायगा।
वलीद-तुम्हें उम्मीद है कि वह इस वक्त यहाँ आयेंगे ? उन्हें शुबहा हो जायगा।
मर०-आपके ऊपर हुसैन का इतना भरोसा है, तो इस वक्त भी चले आयंगे । मगर आपकी तलवार तेज़ और खून गर्म रहना चाहिए। यही कारगुज़ारी का मौका है । अगर हम लोगों ने इस मौके पर यज़ीद की मदद की, तो कोई शक नहीं कि हमारे इकबाल का सितारा रोशन हो जायगा।
वलीद-मरवान, मैं यज़ीद का गुलाम नहीं, खलीफ़ा का नौकर हूँ, और खलीफ़ा वही है, जिसे कौम चुनकर मसनद पर बिठा दे । मैं अपने दीन और ईमान का खून करने से यह कहीं बेहतर समझता हूँ कि कुरान पाक की नकल करके ज़िन्दगी बसर करूँ ।
मर०-या अमीर, मैं आपको यज़ीद के गुस्से से होशियार किये देता हूँ। मेरी और आपकी भलाई इसी में है कि यज़ीद का हुक्म बजा लायें । हमारा काम उनकी बन्दगी करना है, आप दुबिधा में न पड़ें। इसी वक्त हुसैन को बुला भेजें।
गुलाम -या अमीर,क्या हुक्म
मर०-जाकर हुसैन बिन अली को बुला ला। दौड़ते जाना,और कहना कि अमीर आपके इन्तजार में बैठे हैं।
तीसरा दृश्य
हुसैन-मैं जब खयाल करता हूँ कि नाना मरहूम ने तनहा बड़े-बड़े सरकश बादशाहों को पस्त कर दिया,और इतनी शानदार खिलाफ़त कायम कर दी, तो मुझे यकीन हो जाता है कि उन पर खुदा का साया था। खुदा की मदद के बगैर कोई इन्सान यह काम न कर सकता था। सिकन्दर की बादशाहत उसके मरते ही मिट गयी, कैसर की बादशाहत उसकी ज़िन्दगी के बाद बहुत थोड़े दिनों तक कायम रही, उन पर खुदा का साया न था, वह अपनी हवस की धुन में कौमों को फतह करते हैं। नाना ने इस्लाम के लिए झंडा बलंद किया, इसी से वह कामयाब हुए।
अब्बास-इसमें किसको शक सकता है कि वह खुदा के भेजे हुए थे। खुदा की पनाह,जिस वक्त हज़रत ने इस्लाम की आवाज़ उठाई थी,इस मुल्क में अज्ञान का कितना गहरा अन्धकार छाया हुआ था। खुदा की ही आवाज थी,जो उनके दिल में बैठी हुई बोल रही थी,जो कानों में पड़ते ही दिलों में उतर जाती थी। दूसरे मज़हबवाले कहते हैं,इस्लाम ने,तलवार की ताकत से अपना प्रचार किया। काश,उन्होंने हज़रत की अवाज़ा सुनी होती! मेरा तो दावा है कि कुरान में एक आयत भी ऐसी नहीं है,जिसकी मंशा तलवार से इस्लाम को फैलाना हो।
हुसैन-मगर कितने अफसोस की बात है कि अभी से क़ौम ने उनकी नसीहतों को भूलना शुरू किया,और वह नापाक,जो उनकी मसनद पर बैठा हुआ है,आज खुले बन्दों शराब पीता है।
गुलाम-नबी के बेटे पर खुदा की रहमत हो। अमीर ने आपको किसी बहुत ज़रूरी काम के लिए तलब किया है।
अब्बास-यह वक्त वलीद के दरबार का नहीं है।
गुलाम-हुजूर, कोई खास काम है।
हुसैन–अच्छा, तू जा। हम घर जाने लगेंगे, तो उधर से होते हुए जायगे।
अब्बास-भाईजान! मुझे तो इस बेवक्त की तलबी से घबराहट हो गयी है। यह वक्त वलीद के इजलास का नहीं है। मुझे दाल में कुछ काला नज़र आता है। आप कुछ कयास कर सकते हैं कि किस लिए बुलाया होगा।
हुसैन-मेरा दिल तो गवाही देता है कि मुआबिया ने वफात पायी ।
अब्बास-तो वलीद ने आपको इसलिए बुलाया होगा कि आपसे यज़ीद की वैयत ले।
हुसैन-मैं यज़ीद की बैयत क्यों करने लगा। मुआबिया ने भैया इमाम हसन के साथ कसम खाकर शर्त की थी कि वह अपने मरने के बाद अपनी औलाद में से किसी को खलीफा न बनायेगा। हसन के बाद खिलाफत पर मेरा हक है। अगर मुबाबिया मर गया है,और यज़ीद को खलीफा बनाया गया है,तो उसने मेरे साथ और इस्लाम के साथ दग़ा की है। यज़ीद शराबी है,बदकार है,झूठा है, बेदीन है,कुत्तों को गोद में लेकर बैठता है। मेरी जान भी जाय,तो क्या,पर मैं उसकी बैयत न अख्तियार करूँगा। अब्बास [-मामला नाजुक है। यज़ीद की जात से कोई बात बईद नहीं। काश,हमें मुबाबिया की बीमारी और मौत की खबर पहले ही मिल गयी होती!
गुलाम-हुजूर तशरीफ़ नहीं लाये,अमीर आपके इन्तजार में बैठे
हुसैन-तुफ़ है तुझ पर! तू वहाँ पर गया भी कि रास्ते से ही लौट आया? चल,मैं अभी आता हूँ। तू फिर आना।
गुलाम-हुजूर,अमीर से जाकर जब मैंने कहा कि वह अभी आते हैं,तो वह चुप हो गये,लेकिन मरवान ने कहा कि वह कभी न आयेंगे,आपसे दावा कर रहे हैं। इस पर अमीर उनसे बहुत नाराज हुए,और कहा -हुसैन कौल के पक्के हैं,जो कहते हैं,उसे पूरा करते हैं।
हुसैन-वलीद शरीफ़ आदमी है । तुम जानो, हम अभी आते हैं।
अब्बास-आप जायेंगे ?
हुसैन-जब तक कोई सबब न हो,किसी की नीयत पर शुबहा करना मुनासिब नहीं।
अब्बास-भैया,मेरी जान आप पर फ़िदा हो। मुझे डर है कि कहीं वह आपको कैद न कर ले।
हुसैन–वलीद पर मुझे एतवार है। अबूसिफ़ियान की औलाद होने पर भी वह शरीफ और दीनदार है।
अब्बास-आप एतबार करें,लेकिन मैं आपको वहाँ जाने की हरगिज़ सलाह न दूँगा। इस सन्नाटे में अगर उसने कोई दगा की,तो कोई फ़र्याद भी न सुनेगा। आपको मालूम है कि मरवान कितना दगाबाज़ और हरामकार है। मैं उसके साये से भी भागता हूँ। जब तक आप मुझे इतमीनान न दिला दीजिएगा कि दुश्मन वहाँ आपका बाल बाँका न कर सकेगा,मैं आपका दामन न छोडूंगा।
हुसैन-अब्बास,तुम मेरी तरफ़ से बेफ़िक्र रहो। मुझे हक़ पर इतना यकीन है,और मुझमें हक़ की इतनी ताकत है कि वलीद तो क्या,यज़ीद की सारी फ़ौज भी मुझे कुछ नुकसान नहीं पहुँचा सकती। यकीन है कि मेरी एक आवाज पर हज़ारों खुदा के बन्दे और रसूल के नाम पर मिटनेवाले दौड़ पड़ेंगे। और अगर कोई मेरी आवाज़ न सुने, तो भी मेरे बाजुत्रों में इतना बल है कि मैं अकेले उनमें से एक सौ को जमीन पर सुला सकता हूँ। हैदर का बेटा ऐसे गीदड़ों से नहीं डर सकता । आओ,जरा नाना के कब्र की जियारत कर लें।
[ दोनों हज़रत मुहम्मद की कब्र के सामने खड़े हो जाते हैं,हाथ बांधकर दुआ पढ़ते हैं,और मस्जिद से निकलकर घर की तरफ़ चलते हैं।]
चौथा दृश्य
[वलीद का दरबार। वलीद और मरवान बैठे हुए हैं। रात का समय ]
मर०-अब तक नहीं आये! मैंने आपसे कहा कि वह हरगिज़ न आयेंगे।
वलीद-आयेंगे, और ज़रूर आयेंगे। मुझे उनके कौल पर पूरा भरोसा है।
मर०-कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि उन्हें अमीर की वफ़ात की खबर लग गयी हो, और वह अपने साथियों को जमा करके हमसे जंग करने या रहे हों।
[हुसैन का प्रवेश। वलीद सम्मान के भाव से खड़ा हो जाता है, और दरवाजे पर आकर हाथ मिलाता है। मरवान अपनी जगह पर बैठा रहता है।]
हुसैन-खुदा की तुम पर रहमत हो। (मरवान को बैठे देखकर) मेल फूट से और प्रेम द्वेष से बहुत अच्छा है। मुझे क्यों याद किया ?
वलीद-इस तकलीफ़ के लिए माफ कीजिए,आपको यह सुनकर अफसोस होगा कि अमीर मुआबिया ने वफ़ात पायी।
मर०-और खलीफ़ा यजीद ने हुक्म दिया है कि आपसे उनके नाम की बैयत ली जाय।
हुसैन-मेरे नज़दीक यह मुनासिब नहीं है कि मुझ जैसा आदमी छुपे-छुपे बैयत ले। यह न मेरे लिए मुनासिब है और न यजीद के लिए काफ़ी। बेहतर है,आप एक आम जलसा करें,और शहर के सब रईसों और आलियों को बुलाकर यज़ीद की बैयत का सवाल पेश करें। मैं भी उन लोगों के साथ रहूँगा,और उस वक्त सबसे पहले जवाब देनेवाला मैं हूँगा।
वलीद-मुझे आपकी यह सलाह माकूल मालूम होती है। बेशक, आपके बैयत लेने से वह नतीजा न निकलेगा,जो यजीद की मंशा है। कोई कहेगा कि आपने बैयत ली,और कोई कहेगा कि नहीं। और इसकी तसदीक करने में बहुत वक़्त लगेगा। तो जलसा करूँ ?
मर०–अमीर,मैं आपको खबरदार किये देता हूँ कि इनकी बातों में न आइए। बगैर बैयत लिये इन्हें यहाँ से न जाने दीजिए,वरना आप इनसे उस वक्त तक बैयत न ले सकेंगे, जब तक खून की नदी न बहेगी। यह चिनगारी की तरह उड़कर सारी खिलाफत में आग लगा देंगे।
वलीद-मरवान,मैं तुमसे मिन्नत करता हूँ,चुप रहो।
मर०-हुसैन,मैं खुदा को गवाह करके कहता हूँ कि मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ। मेरी दोस्ताना सलाह यह है कि आप यजीद की बैयत मंजूर कर लीजिए,ताकि आपको कोई नुकसान न पहुँचे। आपस का फ़साद मिट जाय,और हजारों खुदा के बन्दों की जान बच जायँ। खलीना आपके बैयत की खबर सुनकर बेहद खुश होंगे,और आपके साथ ऐसे सलूक करेंगे कि खिलाफ़त में कोई आदमी आपकी बराबरी न कर सकेगा। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपकी जागीरें और वज़ीफ़ दोचंद करा दूंगा,और आप मदीनेमे इज्जत के साथ रसूल के क़दमो से लगे हुए दीन और दुनिया में सुर्खरू होकर जिन्दगी बसर करेंगे।
हुसैन-बस करो मरवान,मैं तुम्हारी दोस्ताना सलाह सुनने के लिए नहीं आया हूँ। तुमने कभी अपनी दोस्ती का सबूत नहीं दिया, और इस मौके पर मैं तुम्हारी सलाह को दोस्ताना न समझकर दगा समढूं,तो मेरा दिल और मेरा खुदा मुझसे नाखुश न होगा। आज इस्लाम इतना कमज़ोर हो गया है कि रसूल का बेटा यज़ीद की बैयत लेने के लिए मजबूर हो!
मर०-उनकी बैयत से आपको क्या एतराज है ?
हुसैन-इसलिए कि वह शराबी,झूठा,दगाबाज़,हरामकार और जालिम है। वह दीन के आलिमों की तौहीन करता है। जहाँ जाता है, एक गधे पर एक बन्दर को आलिमों के कपड़े पहनाकर साथ ले जाता है। मैं ऐसे आदमी की बैयत अख्तियार नहीं कर सकता।
मर०-या अमीर,आप इनसे बैयत लेंगे या नहीं ?
हुसैन–मेरी बैयत किसी के अख्तियार में नहीं है।
मर०-कसम खुदा की,आप बैयत कबूल किये बिना नहीं जा सकते । मैं तुम्हें यहीं कत्ल कर डालूँगा (तलवार खींचकर बढ़ता है)।
हुसैन-(डपटकर) तू मुझे कत्ल करेगा,तुझमें इतनी हिम्मत नहीं है! दूर रह। एक कदम भी आगे रखा,तो तेरा नापाक सर ज़मीन पर होगा।
[अब्बास तीस सशस्त्र आदमियों के साथ तलवार खींचे हुए घुस आते हैं ।]
अब्बास-(मरवान की तरफ झपटकर) मलऊन,यह ले;तेरे लिए दोज़ख का दरवाजा खुला हुआ है।
हुसैन–(मरवान के सामने खड़े होकर) अब्बास,तलवार म्यान में करो। मेरी लड़ाई मरवान से नहीं,यज़ीद से है। मैं खुश हूँ कि यह अपने आका का ऐसा वफ़ादार खादिम है।
अब्बास-इस मरदूद की इतनी हिम्मत कि आपके मुबारक जिस्म पर हाथ उठाये! कसम खुदा की,इसका खून पी जाऊँगा।
हुसैन-मेरे देखते ही नहीं, मुसलमान पर मुसलमान का खून हराम है।
वलीद-(हुसैन से) मैं सख्त नादिम हूँ कि मेरे सामने श्रापकी तौहीन हुई। खुदा इसका अज़ाब मुझे दे।
हुसैन-वलीद, मेरी तकदीर में अभी बड़ी-बड़ी सख्तियाँ झेलनी बदी हैं। यह उस मार्के की तमहीद है,जो पेश आनेवाला है। हम और तुम शायद फिर न मिलें,इसलिए रुखसत। मैं तुम्हारी मुरौवत और भलमनसी को कभी न भूलूँगा। मेरी तुमसे सिर्फ इतनी अर्ज़ है कि मेरे यहाँ से जाने में ज़रा भी रोक-टोक न करना।
[ दोनों गले मिल कर विदा होते हैं। अब्बास और तीस आदमी नाहर चले जाते हैं।
मर०-वलीद,तुम्हारी बदौलत मुझे यह ज़िल्लत हुई।
वलीद-तुम नाशुक्र हो। मेरी बदौलत तुम्हारी जान बच गयी;वरना तुम्हारी लाश फर्श पर तड़पती हुई नज़र आती।
मर०-तुमने यज़ीद की खिलाफत यज़ीद से छीनकर हुसैन को दे दी। तुमने अबूसिफ़ियान की औलाद होकर उसके खानदान से दुश्मनी की। तुम खुदा की दरगाह में उस कत्ल और खून के ज़िम्मेदार होगे,जो आज की गफलत या नरमी का नतीजा होगा।
पाँचवाँ दृश्य
[समय-आधी रात। हुसैन और अब्बास मस्जिद के सहन में बैठे हुए हैं।
अब्बास-बड़ी खैरियत हुई,वरना मलऊन ने दुश्मनों का काम ही तमाम कर दिया था।
हुसैन-तुम लोगों की जतन बड़े मौके पर काम आयी। मुझे गुमान न था कि यह सब मेरे साथ इतनी दग़ा करेंगे। मगर यह जो कुछ हुआ,आग चलकर इससे भी ज्यादा होगा। मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि हमें अब चैन से बैठना नसीब न होगा। मेरा भी वही हाल होनेवाला है,जो भैया इमाम हसन का हुआ।
अब्बास-खुदा न करे,खुदा न करे!
हुसैन-अब मदीने में हम लोगों का रहना कांटे पर पाँव रखना है । भैया,शायद नबियों की औलाद शहीद होने ही के लिए पैदा होती है। शायद नबियों को भी होनहार की खबर नहीं होती;नहीं तो क्या नाना के मसनद पर वे लोग बैठते,जो इस्लाम के दुश्मन हैं,और जिन्होंने सिर्फ अपनी गरज पूरी करने के लिए इस्लाम का स्वांग भरा है। मैं रसूल ही से पूछता हूँ कि वह मुझे क्या हुक्म देते हैं? मदीने ही में रहूँ या कहीं और चला नाऊँ? (हज़रत मुहम्मद की का पर जाकर) ऐ खुदा,यह तेरे रसूल मुहम्मद की खाक है,और मैं उनकी बेटी का बेटा हूँ। तू मेरे दिल का हाल जानता है। मैंने तेरी और तेरे रसूल की मर्जी पर हमेशा चलने की कोशिश की है। मुझ पर रहम कर ााााााााााााााााााााााााााााााााााााााााााााााााााआर उस पाक नबी के नाते, जो इस कब्र में सोया हुआ है, मुझे हिदायत कर कि इस वक्त मैं क्या करूं ?
अब्बास-भैया,अब यहाँ से चलो। घर के लोग घबरा रहे होंगे।
हुसैन-नहीं अब्बास,अब मैं लौटकर घर न जाऊँगा। अभी मैंने ख्वाब देखा कि नाना पाये हैं,और मुझे छातो से लगाकर कहते हैं- "बहुत थोड़े दिनों में तू ऐसे आदमियों के हाथों शहीद होगा, जो अपने को मुसलमान कहते होंगे,और मुसलमान न होंगे। मैंने तेरी शहादत के लिए कर्बला का मैदान चुना है,उस वक्त तू प्यासा होगा,पर तेरे दुश्मन तुझे एक बूंद पानी भी न देंगे। तुम्हारे लिए यहाँ बहुत ऊँचा रुतबा रखा गया है,पर वह रुतबा शहादत के बगैर हासिल नहीं हो सकता।" यह कहकर नाना गायब हो गये।
अब्बास-(रोकर) भैया, हाय भैया, यह ख्वाब है या पेशीनगोई ?
मुह --हुसैन,तुमने क्या फैसला किया ?
हुसैन-खुदा की मर्जी है कि मैं कत्ल किया जाऊँ।
मुह०-खुदा की मर्जी खुदा ही जानता है। मेरी सलाह तो यह है कि तुम किसी दूसरे शहर में चले जाओ,और वहाँ से अपने क्रासिदों को उस जवार में भेजो। अगर लोग तुम्हारी बैयत मंजूर कर लें,तो खुदा का शुक्र करना,वरना यों भी तुम्हारी आबरू कायम रहेगी। मुझे खौफ़ यही है कि कहीं तुम ऐसो जगह न जा फँसो,जहाँ कुछ लोग तुम्हारे दोस्त हों,और कुछ तुम्हारे दुश्मन। कोई चोट बग़ली घूसों की तरह नहीं होती,कोई साँप इतना कातिल नहीं होता,जितना आस्तीन का,कोई कान इतना तेज़ नहीं होता,जितना दीवार का, और कोई दुश्मन इतना खौफ़नाक नहीं होता,जितनी दगा। इनसे हमेशा बचते रहना। ,
हुसैन-आप मुझे कहाँ जाने की सलाह देते हैं ?
मुह०-मेरे खयाल में मक्का से बेहतर कोई जगह नहीं है। अगर क़ौम ने तुम्हारी बैयत मंजूर की,तो पूछना ही क्या? वरना पहाड़ियों की घाटियाँ तुम्हारे लिए किलों का काम देंगी,और थोड़े-से मददगारों के साथ तुम आजादी से ज़िन्दगी बसर करोगे। खुदा चाहेगा,तो लोग बहुत जल्द यज़ीद से बेज़ार होकर तुम्हारी पनाह में आयेंगे।
हुसैन-अज़ीज़ों को यहाँ छोड़ दूँ ?
मुह०-हरगिज़ नहीं। सबको अपने साथ ले जाओ। हुसैन यहाँ की हालात से मुझे जल्द-जल्द इत्तिला देते रहिएगा।
मुह०-इसका इतमीनान रखो।
अब्बास-भैया,अब तो घर चलिए,क्या सारी रात जागते रहिएगा ?
हुसैन-अब्बास, मैं पहले ही कह चुका कि लौटकर घर न जाऊँगा।
अब्बास-अगर आपकी इजाजत हो,तो मैं भी कुछ अर्ज करूँ। आप मुझे अपना सच्चा दोस्त समझते हैं या नहीं ?
हुसैन-खुदा पाक की कसम,तुमसे ज्यादा सच्चा दोस्त दुनिया में नहीं है।
अब्बास-क्यों न आप इस वक्त यजीद की बैयत मंजूर कर लीजिए ? खुदा कारसाज़ है,मुमकिन है,थोड़े दिनो में यजीद खुद ही मर जाय,तो आपको खिलाफत आप-ही-आप मिल जायगी। जिस तरह आपने मुआबिया के जमाने में सब किया,उसी तरह यज़ीद के जमाने को भी सब के साथ काट दीजिए। यह भी मुमकिन है कि थोड़े ही दिनों में यज़ीद के जुल्म से तंग आकर लोग बगावत कर बैठे,और आपके लिए मौका निकल आये। सब सारी मुश्किलों को आसान कर देता है।
हुसैन-अब्बास,यह क्या कहते हो ? अगर मैं खौफ़ से यजीद की बैयत कबूल कर लूँ,तो इस्लाम का मुझसे बड़ा दुश्मन और कोई न होगा। मैं रसूल को,वालिद को,भैया हसन को क्या मुँह दिखाऊँगा। अब्बाजान ने शहीद होना कबूल किया,पर मुत्राबिया की बैयत न मंजूर की। भैया ने भी मुबाबिया की बैयत को हराम समझा,तो मैं क्यों खानदान में दाग़ लगाऊँ। इज़्ज़त की मौत बेइज़्ज़ती की ज़िन्दगी से कहीं अच्छी है।
अब्बास-(विस्मित होकर) खुदा की कसम,यह हुसैन की आवाज़ नहीं,रसूल की आवाज़ है,और ये बातें हुसैन की नहीं,अली की हैं । भैया! आपको खुदा ने अक्ल दी है,मैं तो आपका खादिम हूँ, मेरी बातें आपको नागवार हुई हो,तो माफ़ करना।
हुसैन–(अब्बास को छाती से लगाकर) अब्बास, मेरा खुदा मुझसे नाराज़ हो जाय,अगर मैं तुमसे ज़रा भी मलाल रखूं। तुमने मुझे जो सलाह दी,वह मेरी भलाई के लिए दी। इसमें मुझे ज़रा भी शक नहीं,मगर तुम इस मुग़ालते मे हो कि यज़ीद के दिल की आग मेरे बैयत ही से ठंडी हो जायगी। हालाँकि यजीद ने मुझे कत्ल करने का यह हीला निकाला है। अगर वह जानता कि मैं बैयत ले लूँगा,तो वह कोई और ही तदबीर सोचता।
अब्बास -अगर उसकी यह नीयत है,तो कलाम पाक की कसम, मैं आपके पसीने की जगह अपना खून बहा दूंगा,और आपसे आगे बढ़कर इतनी तलवारें चलाऊँगा कि मेरे दोनो हाथ कटकर गिर जायें।
जैनब-अब्बास,बातें न करो। (हुसैन से) भैया,मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप यह इरादा तर्क कर दीजिए,और मदीने में रसूल की कब्र से लगे हुए ज़िन्दगी बसर कीजिए,और अपनी गरदन पर इस्लाम की तबाही का इलज़ाम न लीजिए।
हुसैन-जैनब,ऐसी बातों पर तुफ़ है। जब तक ज़मीन और पासमान कायम है,मैं यजीद की बैयत नहीं मंजूर कर सकता। क्या तुम समझती हो कि में ग़लती पर हूँ ?
जैनब- नहीं भैया,आप ग़लती पर नहीं हैं। अल्लाहताला अपने रसूल के बेटे को ग़लत रास्ते पर नहीं ले जा सकता,मगर आप जानते हैं कि जमाने का रंग बदला हुआ है। ऐसा न हो,लोग आपके खिलाफ उठ खड़े हों।
हुसैन-बहन,इन्सान सारी दुनिया के ताने बरदाश्त कर सकता है, पर अपने ईमान का नहीं। अगर तुम्हारा यह खयाल है कि मेरे बैयत न लेने से इस्लाम में तफ़ा पड़ जायगा,तो यह समझ लो कि इत्तफाक कितनी ही अच्छी चीज़ हो,लेकिन रास्ती उससे कहीं अच्छी है। रास्ती को छोड़कर मेल को कायम रखना वैसा ही है,जैसे जान निकल जाने के बाद जिस्म कायम रखना। रास्ती कौम की जान है,उसे छोड़कर कोई कौम बहुत दिनों तक जिन्दा नहीं रह सकती। इस बारे में मैं अपनी राय कायम कर चुका, अब तुम लोग मुझे रुखसत करो। जिस तरह मेरी बैयत से इस्लाम का वकार मिट जायगा, उसी तरह मेरी शहादत से उसका वकार कायम रहेगा। मैं इस्लाम की हुरमत पर निसार हो जाऊँगा।
शहर०-(रोकर) क्या आप हमें अपने कदमों से जुदा करना चाहते हैं ?
अली अकबर-अब्बाजान,अगर शहीद ही होना है,तो हम भी वह दर्जा क्यों न हासिल करें ?
मुस्लिम-या अमीर,हम आपके कदमों पर निसार होना ही अपनी जिन्दगी का हासिल समझते हैं। आप न ले जायँगे,तो हम जबरन् आपके साथ चलेंगे।
अली असगर-अब्बा,मैं आपके पीछे खड़ा होकर नमाज़ पढ़ता था। आप यहाँ छोड़ देंगे,तो मैं नमाज़ कैसे पहुँगा ?
जैनब–भैया,क्या कोई उम्मीद नहीं है ? क्या मदीने में रसूल के बेटे पर हाथ रखनेवाला,रसूल की बेटियों की हुरमत पर जान देनेवाला,हक पर सिर कटानेवाला कोई नहीं है ? इसी शहर से वह नूर फैला,जिससे सारा जहान रोशन हो गया। क्या वह हक़ की रोशनी इतनी जल्द गायब हो गयी ? आप यहीं से हिजाज और यमन की तरफ कासिदों को क्यों नहीं रवाना फरमाते।
हुसैन-अफ़सोस है जैनब,खुदा को कुछ और ही मंजूर है। मदीने में हमारे लिए अब अमन नहीं है। यहाँ अगर हम अाजादी से खड़े हैं,तो यह वलीद की शराफ़त है। वरना यजीद की फ़ौजों ने हमको घेर लिया होता। आज मुझे सुबह होते-होते यहाँ से निकल जाना चाहिए। यज़ीद को मेरे अज़ीज़ो से दुश्मनी नहीं, उसे ख़ोफ़ सिर्फ़ मेरा है। तुम लोग मुझे यहाँ से रुखसत करो। मुझे यक़ीन है कि यज़ीद तुम लोगों को तंग न करेगा। उसके दिल में चाहे न हो, मगर मुसलमानों के दिल में गैरत बाक़ी है। वह रसूल की बहू-बेटियों की आबरू लुटते देखेंगे, तो उनका खून ज़रूर गर्म हो जायगा।
जैनब–--भैया, यह हर्गिज़ न होगा। हम भी आपके साथ चलेंगी। अगर इस्लाम का बेटा अपनी दिलेरी से इस्लाम का वक़ार क़ायम रखेगा, तो हम अपने सब्र से, ज़ब्त से और बरदाश्त से उसकी शान निभायेंगे। हम पर जिहाद हराम है, लेकिन हम मौका पड़ने पर मरना जानती हैं। रसूल पाक की क़सम, आप हमारी आँखों में आँसू न देखेंगे, हमारे लबों से फ़रियाद न सुनेंगे, और हमारे दिलों से आह न निकलेगी। आप हक़ पर जान देकर इस्लाम की आबरू रखना चाहते है, तो हम भी एक बेदीन और बदकार की हिमायत मे रहकर इस्लाम के नाम पर दाग़ लगाना नहीं चाहतीं।
[ सिपाहियों का एक दस्ता सड़क पर आता दिखाई पड़ता है। ]
हुसैन---अब्बास, यज़ीद के आदमी हैं। वलीद ने भी दग़ा दी। आह, हमारे हाथों में तलवार भी नहीं। ऐ ख़ुदा, मदद!
अब्बास---कलाम पाक की क़सम, ये मरदूद आपके क़रीब न आने पायेंगे।
जैनब--–भैया, तुम सामने से हट जाओ।
हुसैन---जैनब, घबराओ मत, आज मैं दिखा दूँगा कि अली का बेटा कितनी दिलेरी से जान देता है।
[ अब्बास बाहर निकलकर फ़ौज के सरदार से ] ऐ सरदार, किसकी बदनसीबी है कि तू उसके नज़दीक जा रहा है।
सर॰---या हज़रत, हमें शहर में गश्त लगाने का हुक्म हुआ है कि कहीं बाग़ी तो जमा नहीं हो रहे हैं।
हुसैन--–अब देर करने का मौक़ा नहीं। चलूँ, अम्माजान से रुख़सत हो लूँ। ( फ़ातिमा की कब्र पर जाकर ) ऐ मादरे-जहान, तेरा बदनसीब बेटा, जिसे तूने गोद में प्यार से खिलाया था,जिसे तूने सीने से दूध पिलाया था-आज तुझसे रुखसत हो रहा है,और फिर शायद उसे तेरी ज़यारत नसीब न हो (रोते हैं)।
सब०-ऐ अमीर,आप हमें अपने कदमों से क्यों जुदा करते हैं। हम आपका दामन न छोड़ेंगे। आपके कदमों से लगे हुए गुरबत की खाक छानना इससे कहीं अच्छा है कि एक बदकार और ज़ालिम खलीफ़ा की सख्तियाँ झेलें। आप नबी के खानदान के आफ़ताब हैं । उसकी रोशनी से दूर होकर हम इस अँधेरे में खौफनाक जानवरों से क्योंकर अपनी जान बचा सकेंगे। कौन हमे हक और दीन की राह सुझायेगा ? कौन हमें अपनी नसीहतों का अमृत पिलायेगा ? हमें अपने कदमों से जुदा न कीजिए।
हुसैन-मेरे प्यारे दोस्तो,मैं यहाँ से खुद नहीं जा रहा हूँ। मुझे तकदीर लिये जा रही है। मुझे वह दर्दनाक नज़ारा देखने की ताब नहीं है कि मदीने की गलियां इस्लाम और रसूल के दोस्तों के खून से रंगी जायें। मैं प्यारे मदीने को उस तबाही और खून से बचाना चाहता हूँ। तुम्हें मेरी यही आखिरी सलाह है कि इस्लाम की हुरमत कायम रखना,जर लिए अपनी कौम और अपनी मिल्लत से बेवफ़ाई न करना,खुदा के नज़दीक इससे बड़ा गुनाह नहीं है।शा- यद हमें फिर मदीने के दर्शन न हों,शायद फिर हम इन सूरतों को न देख सकें;हाँ,शायद फिर हमें उन बुजुर्गों की सूरत देखनी नसीब न हो,जो हमारे नाना के शरीक और हमदर्द रहे,जिनमें से कितनों ही ने मुझे गोद में खिलाया है। भाइयो,मेरी ज़बान में इतनी ताकत नहीं है कि उस रंज और ग़म को ज़ाहिर कर सकूँ ,जो मेरे सीने में दरिया की लहरों की तरह उठ रहा है। मदीने की खाक से जुड़ा होते हुए जिगर के टुकड़े हुए जाते हैं। आपसे जुदा होते आँखों में अँधेरा छा जाता है,मगर मजबूर हूँ। खुदा की और रसूल की यही मंशा है कि इस्लाम का पौधा मेरे माल और खून से सींचा जाय,रसूल की खेती रसूल की औलाद के खून से हरी हो,और मुझे उनके सामने सिर झुकाने के सिवा और कोई चारा नहीं।
नागरिक-या अमीर,हमें अपने कदमों से जुदा न कीजिए। हाय अमीर,हाय रसूल के बेटे,हम किसका मुँह देखकर जियेंगे ? हम क्योंकर सब करें,अगर आज न रोयें,तो फिर किस दिन के लिए आँसुत्रों को उठा रखें! से ज़्यादा मातम का और कौन दिन होगा ?
हुसैन-(मुहम्मद की कब्र पर जाकर) ऐ रसूल-खुदा,रुखसत। आपका नवासा मुसीबत में गिरफ्तार है। उसका बेड़ा पार कीजिए। सब लोग मुझे छोड़ के पहले ही सिधारे,मिलता नहीं आराम नवासे को तुम्हारे। खादिम को कोई अमन की अब जा नहीं मिलती; राहत कोई साइत मेरे मौला,नहीं मिलती। दुख कौन-सा और कौन-सी ईज़ा नहीं मिलती;हैं आप जहाँ,राह वह मुझको नहीं मिलती। दुनिया में मुझे कोई नहीं और ठिकाना;आज आखिरी रुखसत को गुलाम आया है नाना! बच जाऊँ जो पास अपने बुला लीजिए नाना,तुरबत में नवासे को छिपा लीजिए नाना! सुन लीजिए शब्बीर की रुखसत है बिरादर;हज़रत को तो पहलू हुआ अम्मा का मयस्सर। कबे भी जुदा होंगी यहाँ अब तो हमारी; देखें हमें ले जाय कहाँ खाक हमारी। मैं नहीं चाहता कि मेरे साथ एक चिउँटी की भी जान खतरे में पड़े। हमारे अजीज़ों से,अपनी मस्तूरात से,अपने दोस्तों से यही सवाल है कि मेरे लिए ज़रा भी ग़म न करो,मैं वहीं जाता हूँ,जहाँ खुदा की मर्जी लिये जाती है।
अब्बास-या हज़रत,खुदा के लिए हमारे ऊपर यह सितम न कीजिए। हम जीते-जी कभी आपसे जुदा न होंगे। जैनब भैया,मेरी जान तुम पर फ़िदा हो। अगर औरतों को तुमने छोड़ दिया,तो लौटकर उन्हें जीता न पाओगे। तुम्हारी तीनो फूल-सी बेटियाँ ग़म से मुरझाई जा रही हैं। शहरबानू का हाल देख ही रहे हो। तुम्हारे बगैर मदीना सूना हो जायगा,और घर की दीवारें हमें फाड़ खायेंगी। हमारे ऊपर इस बदनामी का दाग़ न लगायो कि मुसीबत में रसूल की बेटियों ने अपने सरदार से बेवफ़ाई की। तुम्हारे साथ के नाके यहाँ के मीठे स्लुक़मों से ज्यादा मीठे मालूम होंगे। जिस्म को तकलीफ़ होगी, पर दिल को तो इतमीनान रहेगा।
अली अक०-अब्बा,मैं इस मुसीबत का सारा मज़ा आपको अकेले न उठाने दूंगा। इसमें मेरा भी हिस्सा है। कौन हमारे नेज़ों की चमक देखेगा ? किसे हम अपनी दिलेरी के जौहर दिखायेंगे? नहीं,हम यह ग़म की दावत आपको अकेले न खाने देंगे।
अली अस०-अब्बा,मुझे अपने आगे घोड़ों पर बिठाकर रास मेरे हाथों में दे दीजिएगा। मैं उसे ऐसा दौड़ाऊँगा कि हवा भी हमारी गर्द को न पहुंचेगी।
हुसैन-हाय,अगर मेरी तकदीर की मंशा है कि मेरे जिगर के टुकड़े मेरी आँखों के सामने तड़पें,तो मेरा क्या बस है। अगर खुदा को यही मंजूर है कि मेरा बाग़ मेरी नज़रों के सामने उजाड़ा जाय, तो मेरा क्या चारा है। खुदा,गवाह रहना कि इस्लाम की इज्जत पर रसूल की औलाद कितनी बेदरदी से क़ुरबान की जा रही है!
छठा दृश्य
[समय -सन्ध्या। कूफा शहर का एक मकान।अब्दुल्लाह,कमर,वहब बातें कर रहे हैं।]
अब्दु०-बड़ा ग़ज़ब हो रहा है। शामो फ़ौज के सिपाही शहरवालों
को पकड़-पकड़ ज़ियाद के पास ले जा रहे हैं,और वहाँ जबरन् उनसे बैयत ली जा रही है।
क़मर-तो लोग क्यों उसकी बैयत कबूल करते हैं ?
अब्दु०-न करें,तो क्या करें। अमीरों और रईसों को तो जागीर और मनसब की हवस ने फोड़ लिया। बेचारे ग़रीब क्या करें। नहीं बैयत लेते,तो मारे जाते हैं,शहरबदर किये जाते हैं। जिन गिने-गिनाये रईसों ने बैयत नहीं ली,उन पर भी सख्ती करने की तैयारियां हो रही हैं। मगर ज़ियाद चाहता है कि कूफ़ावाले आपस ही मे लड़ जायँ । इसी लिए उसने अब तक कोई सख्ती नहीं की है।
कमर-यज़ीद को खिलाफत का कोई हक्क तो है नहीं,महज़ तलवार का जोर है। शरा के मुताबिक हमारे ख़लीफ़ा हुसैन हैं।
अब्दु०-वह तो ज़ाहिर ही है,मगर यहाँ के लोगों को तो जानते हो न। पहले तो ऐसा शोर मचायेगे,गोया जान देने पर आमादा हैं, पर ज़रा किसी ने लालच दिखलाया,और सारा शोर ठंडा हो गया । गिने हुए आदमियों को छोड़कर सभी बैयत ले रहे हैं।
क्रमर-तो फिर हमारे ऊपर भी तो वही मुसीबत आनी है ?
अब्दु०-इसी फ्रिक्र में तो पड़ा हुआ हूँ। कुछ सूझता ही नहीं।
क़मर-सूझना ही क्या है। यज़ीद की बैयत हर्गिज़ मत कबूल करो ।
अब्दु०-अपनी खुशी की बात नहीं है।
क्रमर-क्या होगा?
अब्दु०-वज़ीफ़ा बन्द हो जायगा।
कमर-ईमान के सामने वजीफे की कोई हस्ती नहीं।
अब्दु०-जागीर ज्यादा नहीं,तो परवरिश तो हो ही जाती है। वह फ़ौरन् छिन जायगी। कितनी मेहनत से हमने मेवों का बाग़ लगाया है। यह कब गवारा होगा कि हमारी मेहनत का फल दूसरे खायँ। कलाम पाक की कसम,मेरे बाग़ पर बड़ों-बड़ों को रश्क है।
कमर-बाग़ के लिए ईमान बेचना पड़े,तो बाग की तरफ आँख उठाकर देखना भी गुनाह है।
अब्दु०––कमर, मामला इतना आसान नहीं है, जितना तुमने समझ रखा है। जायदाद के लिए इन्सान अपनी जान देता है, भाई-भाई दुश्मन हो जाते हैं, बाप-बेटों में, मियाँ-बीबी में तिफ़ाक़ पड़ जाता है। अगर उसे लोग इतनी आसानी से छोड़ सकते, तो दुनिया जन्नत बन जाती।
कम––यह सही है, मगर ईमान के मुकाबले जायदाद ही की नहीं,ज़िन्दगी की भी कोई हस्ती नहीं । दुनिया की चीजें एक दिन छूट जायँगी, मगर ईमान तो हमेशा साथ रहेगा।
अब्दु०––शहरब होना पड़ा, तो यह मकान हाथ से निकल जायगा। अभी पिछले साल बनकर तैयार हुआ है। देहातों में, जंगलों में बदुओं की तरह मारे-मारे घूमना पड़ेगा। क्या जलावतनी कोई मामूली चीज़ है?
कमर––दीन के लिए लोगों ने सल्तनतें तर्क कर दी हैं, सिर कटाये हैं, और हँसते-हँसते सूलियों पर चढ़ गये हैं। दीन की दुनिया पर हमेशा जीत रही है, और रहेगी।
अब्दु०––वहब, अपनी अम्माजान की बातें सुन रहे हो?
वहब––जी हाँ, सुन रहा हूँ, और दिल में फ्रनु कर रहा हूँ कि मैं ऐसी दीन-परवर मा का बेटा हूँ । मैं आपसे सच अर्ज़ करता हूँ कि कीस, हजार, हुर, अशअरा-जैसे रऊसा को बैयत कबूल करते देखकर मैं भी नीम राजी हा गया था, पर आपकी बातों ने हिम्मत मज़बूत कर दी। अब मैं सब कुछ झेलने को तैयार हूँ।
अब्दु०––वहब, दीन हम बूढ़ों के लिए है, जिन्होंने दुनिया के मज़े उठा लिये। जवानों के लिए दुनिया है। तुम अभी शादी करके लौटे हो, बहू की चूड़ियाँ भी मैली नहीं हुई। जानते हो, वह एक रईस की बेटी है, नाज़ों में पली है, क्या उसे भो खानावीरानी की मुसीबतों में डालना चाहते हो? हम और कमर तो हज करने चले जायँगे। तुम मेरी जायदाद के वारिस हो, मुझे यह तसकीन रहेगा कि मेरी मिहनत रायगा नहीं हुई। तुमने मा की नसीहत पर अमल किया, तो मुझे बेहद सदमा होगा। पहले जाकर नसीमा से पूछो तो?
वहब--मुझे अपने ईमान के मामले में किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं। मुझे यकीन है कि खिलाफ़त के हक़दार हज़रत हुसैन हैं । यज़ीद की बैयत कभी न क़बूल करूँगा,जायदाद रहे या न रहे, जान रहे या न रहे ।
क़मर--बेटा,तेरी मा तुझ पर फ़िदा हो,तेरी बातों ने दिल खुश कर दिया । आज मेरी-जैसी खुशनसीब मा दुनिया में न होगी। मगर बेटा,तुम्हारे अब्बाजान ठीक कहते हैं,नसीमा से पूछ लो, देखो,वह क्या कहती है। मैं नहीं चाहती कि हम लोगों की दीन-परवरी के बाइस उसे तकलीफ हो,और जंगलों की खाक छाननी पड़े । उसकी दिलजोई करना तुम्हारा फ़र्ज़ है।
वहब--आप फ़रमाती हैं,तो मैं उससे भी पूछ लूँगा । मगर मैं साफ कहे देता हूँ कि मैं उसकी रजा का गुलाम न बनूंगा । अगर उसे दोन के मुकाबले में ऐश व आराम ज़्यादा पसन्द है,तो शौक से रहे, लेकिन मैं बैयत की जिल्लत न उठाऊँगा।
[दरवाज़ा खोलकर बाहर चला जाता है।]
सातवाँ दृश्य
[अरब का एक गाँव-एक विशाल मन्दिर बना हुआ है,वालाब है,जिसके पक्के घाट बने हुए हैं,मनोहर बागीचा,मोर,हरिण,गाय आदि पशु-पक्षी इधर-उधर विचर रहे हैं। साहसराय और उनके बन्धु तालाब के किनारे सन्ध्या-हवन,ईश्वर-प्रार्थना कर रहे हैं।]
गाना-स्तुति आखरेश अनंत विधाता हो,मंगलमय मोदप्रदाता हो
मय-मंजन शिव जन त्राता हो,अविनाशी अद्भुत ज्ञाता हो । तेरा ही एक सहारा हो, हरि,धर्म प्राण से प्यारा हो । वल,वीर्य,पराक्रम त्वेष रहे,सद्धर्म धरा पर शेष रहे ; श्रुति भानु एकता वेश रहे,धन,ज्ञान,कलायुत देश रहे सर्वत्र प्रेम की धारा हो, हरि,धर्म प्राण से प्यारा हो ।
भारत तन-मन-धन सारा हो,उसकी सेवा सब द्वारा हो । निज मान समान दुलारा हो,सबकी आँखों का तारा हो । जीवन सर्वस्वहमारा हो, हरि,धर्म प्राण से प्यारा हो ।
[साहसराय प्रार्थना करते हैं] भगवन्,हमें शक्ति प्रदान कीजिए कि सदैव अपने व्रत का पालन करें। अश्वत्थामा की सन्तान का निरन्तर सेवा-मार्ग का अवलम्बन करें,उनका रक्त सदैव दीनों की रक्षा में बहता रहे,उनके सिर सदैव न्याय और सत्य पर बलिदान होते रहें। और प्रभो! वह दिन आये कि हम प्रायश्चित-संस्कार से मुक्त होकर तपोभूमि भारत को प्रयाण करें,और ऋषियों के सेवा-सत्कार में मग्न होकर अपना जीवन सफल करें । हे नाथ,हमें सद्बुद्धि दीजिए कि निरन्तर कर्म-पथ पर स्थिर रहें,और उस कलंक-कालिमा को,जो हमारे आदि पुरुष ने हमारे मुख पर लगा दी है,अपनी सुकीर्ति से धोकर अपना मुख उज्ज्वल करें । जब हम स्वदेश-यात्रा करें,तो हमारे मुख पर आत्मगौरव का प्रकाश हो,हमारे स्वदेश-बन्धु सहर्ष हमारा स्वागत करें,और हम वहाँ पतित बनकर नहीं,समाज के प्रतिष्ठित अंग बनकर जीवन व्यतीत करें।
[सेवक का प्रवेश]
सेवक--दीनानाथ,समाचार आया है,अमीर आबिया के बेटे यज़ीद ने खिलाफ़त पर अधिकार कर लिया।
साहस०--यजीद ने खिलाफ़त पर अधिकार कर लिया ! यह कैसे ? उसका खिलाफत पर क्या स्वत्व था ? खिलाफ़त तो हजरत अली के बेटे इमाम हुसैन को मिलनी चाहिए थी ।
हरजसराय-हाँ,हक़ तो हुसैन ही का है। मुबाबिया से पहले इसी शर्त पर सन्धि हुई थी।
सिहदत्त-यज़ीद की शरारत है। मुझे मालूम है,वह अभिमानी, तामसी और विलास-भोगी मनुष्य। विषय-वासना में मग्न रहता है । हम ऐसे दुर्जन की खिलाफ़त कदापि स्वीकार नहीं कर सकते।
पुण्यराय-(सेवक से) कुछ मालूम हुआ हुसैन क्या कर रहे हैं ?
सेवक-दीनबन्धु,वह मदीना से भागकर मक्का चले गये हैं।
सिंह०-यह उनकी भूल है,तुरन्त मदीनावासियों को संगठित करके यजीद के नाज़िम का वध कर देना चाहिए था,इसके पश्चात् अपनी खिलाफत की घोषणा कर देनी थी। मदीना को छोड़कर उन्होंने अपनी निर्बलता स्वीकार कर ली।
रामसिंह-हुसैन धर्मनिष्ठ पुरुष हैं। अपने बंधुत्रों का रक्त नहीं बहाना चाहते।
ध्रुवदत्त-जीव-हिंसा महापाप है। धर्मात्मा पुरुष कितने ही संकट में पड़े,किन्तु अहिंसा-व्रत को नहीं त्याग सकता
भीरुदत्त-न्याय-रक्षा के लिए हिंसा करना पाप नहीं। जीव-हिंसा न्याय- हिंसा से अच्छी है।
साहस०-अगर वास्तव में यजीद ने खिलाफत का अपहरण कर लिया है,तो हमें अपने व्रत के अनुसार न्याय-पक्ष ग्रहण करना पड़ेगा। यजीद शक्तिशाली है,इसमें सन्देह नहीं, पर हम न्याय-व्रत का उल्लंघन नहीं कर सकते। हमें उसके पास दूत भेजकर इसका निश्चय कर लेना चाहिए कि हमें किस पथ का अनुसरण करना उचित है।
सिंहदत्त -जब यह सिद्ध है कि उसने अन्याय किया, तो उसके पास दूत भेजकर विलम्ब क्यों किया जाय। हमें तुरन्त उससे संग्राम करना चाहिए। अन्याय को भी अपने पक्ष का समर्थन करने के लिए युक्तियों का अभाव नहीं होता।
हरजसराय-मैं पूछता हूँ,अभी समर की बात ही क्यों की जाय। राजनीति के तीनों सिद्धान्तों की परीक्षा कर लेने के पश्चात् ही शस्त्र ग्रहण करना चाहिए। विशेषकर इस समय हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हम आत्मगौरव की दुहाई देते हुए रणक्षेत्र में कूद पड़ें। शस्त्र-ग्रहण सर्वदा अंतिम उपाय होना चाहिए।
सिंहदत्त---धन आत्मा की रक्षा के लिए ही है।
हरजसराय---आत्मा बहुत ही व्यापक शब्द है। धन केवल धर्म की रक्षा के लिए है।
रामसिंह---धर्म की रक्षा रक्त से नहीं होती; शील, विनय, सदुपदेश, सहानुभूति, सेवा ये सब उसके परीक्षित साधन हैं, और हमें स्वयं इन साधनों की सफलता का अनुभव हो चुका है।
सिंहदत्त---राजनीति के क्षेत्र में ये साधन उसी समय सफल होते हैं, जब शस्त्र उनके सहायक हों, अन्यथा युद्धलाभ से अधिक उनका मूल्य नहीं होता।
साहसराय---हमारा कर्त्तव्य अपनी वीरता का प्रदर्शन अथवा राज्य-प्रबन्ध की निपुणता दिखाना नहीं है, न हमारा अभीष्ट अहिंसा-व्रत का पालन करना है। हमने केवल अन्याय को दमन करने का व्रत धारण किया है, चाहे उसके लिए किसी उपाय का अवलम्बन करना पड़े। इसलिए सबसे पहले हमें दूतों द्वारा यज़ीद के मनोभाव का परिचय प्राप्त करना चाहिए। उसके पश्चात् हमें निश्चय करना होगा कि हमारा कर्तव्य क्या है। मैं रामसिंह और भीरुदत्त से अनुरोध करता हूँ कि ये आज ही शाम को यात्रा पर अग्रसर हो जायँ।