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कायाकल्प अध्याय 40 / 53

विषय-सूची

  1. 1 अध्याय 1
  2. 2 अध्याय 2
  3. 3 अध्याय 3
  4. 4 अध्याय 4
  5. 5 अध्याय 5
  6. 6 अध्याय 6
  7. 7 अध्याय 7
  8. 8 अध्याय 8
  9. 9 अध्याय 9
  10. 10 अध्याय 11
  11. 11 अध्याय 12
  12. 12 अध्याय 13
  13. 13 अध्याय 14
  14. 14 अध्याय 15
  15. 15 अध्याय 16
  16. 16 अध्याय 17
  17. 17 अध्याय 18
  18. 18 अध्याय 20
  19. 19 अध्याय 22
  20. 20 अध्याय 23
  21. 21 अध्याय 24
  22. 22 अध्याय 26
  23. 23 अध्याय 27
  24. 24 अध्याय 28
  25. 25 अध्याय 29
  26. 26 अध्याय 30
  27. 27 अध्याय 31
  28. 28 अध्याय 32
  29. 29 अध्याय 33
  30. 30 अध्याय 34
  31. 31 अध्याय 35
  32. 32 अध्याय 36
  33. 33 अध्याय 37
  34. 34 अध्याय 38
  35. 35 अध्याय 39
  36. 36 अध्याय 40
  37. 37 अध्याय 41
  38. 38 अध्याय 42
  39. 39 अध्याय 43
  40. 40 अध्याय 44
  41. 41 अध्याय 45
  42. 42 अध्याय 46
  43. 43 अध्याय 47
  44. 44 अध्याय 48
  45. 45 अध्याय 49
  46. 46 अध्याय 50
  47. 47 अध्याय 51
  48. 48 अध्याय 52
  49. 49 अध्याय 53
  50. 50 अध्याय 54
  51. 51 अध्याय 55
  52. 52 अध्याय 56
  53. 53 अध्याय 57

कायाकल्प

अध्याय 44

शङ्खधर को होश आया, तो अपने को मन्दिर के बरामदे में चक्रधर की गोद में पड़ा हुआ पाया। चक्रधर चिन्तित नेत्रों से उसके मुँह की ओर ताक रहे थे। गाँव के कई आदमी पास-पास खड़े पंखा झल रहे थे। आह! आज कितने दिनों के बाद शंखधर को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है! वह पिता की गोद में लेटा हुआ है! आकाश के निवासियों, तुम पुष्य की वर्षा क्यों नहीं करते?

शङ्खधर ने फिर आँखें बन्द कर लीं। उसकी चिर-सन्तप्त आत्मा एक अलौकिक शीतलता, एक अपूर्व तृप्ति, एक स्वर्गीय आनन्द का अनुभव कर रही थी। इस अपार सुख को वह इतनी जल्द न छोड़ना चाहता था। उसे अपनी वियोगिनी माता की याद आयी। वह उस दिन का स्वप्न देखने लगा, जब वह अपनी माता को भी इस परम आनन्द का अनुभव करायेगा, उसका जीवन सफल करेगा।

चक्रधर ने स्नेह-मधुर स्वर में पूछा—क्यों बेटा, अब कैसी तबीयत है?

कितने स्नेह-मधुर शब्द थे! किसी के कानों ने कभी इतने कोमल शब्द सुने हैं? भगवान् इन्द्र भी आकर उससे बोलते, तो क्या वह इतना गौरवान्वित हो सकता था?

'क्यों बेटा, कैसी तबीयत है'—वह इसका क्या जवाब दे? अगर कहता है—अब मैं अच्छा हूँ, तो इस सुख से वंचित होना पड़ेगा। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। देना भी चाहता, तो उसके मुँह से शब्द न निकलते। उसका जी चाहा, इन चरणों पर सिर रखकर खूब रोये। इससे बढ़कर और किसी सुख की वह कल्पना ही न कर सकता था। संसार की कोई वस्तु कभी इतनी सुन्दर थी? वायु और प्रकाश, वृक्ष और वन, पृथ्वी और पर्वत कभी इतने प्यारे न लगते थे। उनकी छटा ही कुछ और हो गयी यो; उनमें कितना वात्सल्य था, कितनी आत्मीयता!

चक्रधर ने फिर पूछा—क्यों बेटा कैसी तबीअत है?

शंखधर ने कातर-स्वर से कहा—अब तो अच्छा हूँ। आप ही का नाम बाब भगवानदास है?

चक्रधर—हाँ, मुझी को भगवानदास कहते हैं।

शंखधर—मैं आप ही के दर्शनों के लिए आया हूँ। बहुत दूर से आया हूँ। मैंने बेंदों में आपकी खबर पायी थी। वहाँ मालूम हुआ कि आप साईंगंज चले गये हैं। वहाँ से साईंगंज चला। सारी रात चलता रहा; पर साईंगंज न मिला। एक दूसरे गाँव में जा पहुँचा, वह जो पर्वत के ऊपर बसा हुआ है। वहाँ मालूम हुआ कि मैं रास्ता भूल गया था। उसी वक्त इधर चला।

चक्रधर—रात को कहीं ठहरे नहीं?

शंखधर—यही भय था कि शायद आप कहीं और आगे न बढ़ जायँ।

चक्रधर—कुछ भोजन भी न किया होगा?

शंखधर—भोजन की तो ऐसी इच्छा न थी। आपके दर्शन हुए, मैं कृतार्थ हो गया। अब मेरे संकट कट जायँगे। मैं आपका यश सुनकर आया हूँ। आप ही मेरा उद्धार कर सकते हैं।

चक्रधर—बेटा, संकट काटने वाला ईश्वर है, मैं तो उनका क्षुद्र सेवक हूँ, लेकिन पहले कुछ भोजन कर लो और आराम से सो रहो। मुझे कई रोगियों को देखने जाना है। मैं शाम को लौटूँगा, तो तुमसे बातें होंगी। क्या कहूँ, मेरे कारण तुम्हें इतना कष्ट उठाना पड़ा।

शंखधर ने मन में कहा—इस परम आनन्द के लिए मैं क्या नहीं सह सकता था! अगर मुझे मालूम हो जाता कि अग्नि-कुण्ड में जाने से आपके दर्शन होंगे, तो क्या मैं एक क्षण का भी विलम्ब करता। कदापि नहीं। प्रकट में उसने कहा—मुझे तो यह स्वर्ग-यात्रा-सी मालूम होती थी। भूख, प्यास, थकान कुछ भी नहीं थी।

चक्रधर का चित्त अस्थिर हो गया। उस युवक के रूप और वाणी में न-जाने कौन-सी बात थी, जो उनके मन में उससे बात चीत करने की प्रबल इच्छा हो रही थी। रोगियों को देखने न जाना चाहते थे, मन बहाना खोजने लगा। रोगियों को दवा तो दे ही आया हूँ, उनकी चेष्टा भी कुछ ऐसी चिन्ताजनक नहीं, जाना व्यर्थ है। जरा पूछना चाहिये कि यह युवक कौन है? क्यों मुझसे मिलने के लिए इतना उत्सुक है। कितना सुशील बालक है! इसकी वाणी में कितना विनय है और स्वरूप तो देवकुमारों का-सा है। किसी उच्च-कुल का युवक है।

लेकिन फिर उन्होंने सोचा—मेरे न जाने से रोगियों को कितनी निराशा होगी! कौन जाने, उनकी दशा बिगड़ गयी हो। जाना ही चाहिए। तब तक यह बालक भी तो आराम कर लेगा। बेचारा सारी रात चलता रहा। मैं जानता, तो बेंदों में टिक गया होता।

एक आदमी पानी लाया। शंखधर ने मुँह-हाथ धोया और चाहता था कि खाली पेट पानी पी ले, लेकिन चक्रधर ने मना किया—हाँ हाँ यह क्या? अभी पानी न पियो। रात-भर कुछ खाया नहीं और पानी पीने लगे। आओ, कुछ भोजन कर लो।

शङ्खधर—बड़ी प्यास लगी है।

चक्रधर—पानी कहीं भागा तो नहीं जाता। कुछ खाकर पीना, और वह भी इतना नहीं कि पेट में पानी डोलने लगे।

शङ्खधर—दो ही घूँट पी लूँ। नहीं रहा जाता।

चक्रधर ने आकर उसके हाथ से लोटा छीन लिया और कठोर स्वर में कहा—अभी तुम एक बूँद भी पानी नहीं पी सकते। क्या जान देने पर उतारू हो गये हो?

शंखधर को इस भर्त्सना में जो आनन्द मिल रहा था, वह कभी माता की प्रेम भरी बातों में भी न मिला था। पाँच वर्ष हुए; तब से वह अपने मन की करता आया है। वह जो पाता है, खाती है; जब चादता है, पानी पीता है, जहाँ जगह पाता है, पड़ रहता है। किसी को इसकी कुछ परवा नहीं होती। लोटा हाथ से न छीना गया होता, तो वह बिना दो-चार घुड़कियाँ खाये न मानता।

मन्दिर के पीछे छोटा सा बाग और कुआँ था। वहीं एक वृक्ष के नीचे चक्रधर की रसोई बनी थी। चक्रधर अपना भोजन आप पकाते थे, बर्तन भी आप ही धोते थे, पानी भी खुद खींचते थे। शंखधर उनके साथ भोजन करने गया, तो देखा कि रसोई में पूरी, मिठाई, दूध, दही, सब कुछ है। उसकी राल टपकने लगी। इन पदार्थों का स्वाद चखे हुए उसे एक युग बीत गया था; मगर उसे कितना श्राश्चर्य हुआ, जब उसने देखा कि ये सारे पदार्थ उसीके लिए मँगवाये गये हैं। चक्रधर ने उसके लिए खाना एक पत्तल में रख दिया और आप कुछ मोटी रोटियाँ और भाजी लेकर बैठे, जो खुद उन्होंने बनायी थी।

शङ्खधर ने कहा—आप तो सब मुझी को दिये जाते है, अपने लिए कुछ रखा ही नहीं।

चक्रधर—मेरे लिए तो यह रोटियाँ है। मेरा भोजन यही है।

शङ्खधर-तो फिर मुझे भी रोटियाँ ही दीजिए।

चक्रधर—मैं तो बेटा, रोटियों के सिवा और कुछ नहीं खाता। मेरी पाचन शक्ति अच्छी नहीं है। दिन में एक बार खा लिया करता हूँ।

शङ्खधर—मेरा भोजन तो थोड़ा-सा सत्तू या चबेना है। मैंने तो बरसों से इन चीजों की सूरत तक नहीं देखी। अगर आप न आयँगे, तो मैं भी न खाऊँगा।

आखिर शङ्खधर के आग्रह से चक्रधर को अपना नियम तोड़ना पड़ा। सोलह वषों का पाला हुआ नियम, जिसे बड़े-बड़े रईसों और राजाओं का भक्तिमय आग्रह भी न तोड़ सका था, आज इस अपरिचित बालक ने तोड़ दिया। उन्होंने मनाकर कहा—भाई, तुम बड़े जिद्दी मालूम होते हो। अच्छा, लो, मैं भी खाता हूँ। अब तो खाओगे, या अब भी नहीं?

उन्होंने सब चीजों में से जरा-जरा-सा निकालकर अपनी पत्तल में रख लिया और बाकी चीजें शङ्खघर के आगे रख दीं। शङ्खधर ने अब भी भोजन में हाथ नहीं लगाया।

चक्रधर ने पूछा—अब क्या बैठे हो, खाते क्यों नहीं? तुम्हारे मन की बात हो गयी? या अब भी कुछ बाकी है?

शंखधर—आपने तो केवल उलाहना छुड़ाया है। लाइए मैं परस दूँ।

चक्रधर—अगर तुम इस तरह जिद करोगे, तो मैं तुम्हारी दवा न करूँगा। अपने साथ रखूँगा भी नहीं।

शङ्खधर—मुझे क्या, न दवा कीजिएगा, तो यहीं पड़ा पड़ा मर जाऊँगा। कौन कोई रोनेवाला बैठा हुआ है?

यह कहते-कहते शंखधर की आँखें सजल हो गयीं। चक्रधर ने विकल होकर कहा—अच्छा लाओ, तुम्हीं अपने हाथ से दे दो। अपशब्द क्यों मुँह से निकालते हो? लाओ, कितना देते हो? अब से मैं तुम्हें अलग भोजन मँगवा दिया करूँगा।

शङ्खधर ने सभी चीजों में से आधी से अधिक उनके सामने रख दी, और आप एक पंखा लेकर उन्हें झलने लगा। चक्रधर ने वात्सल्यपूर्ण कठोरता से कहा—मालूम होता है, आज तुम मुझे बीमार करोगे। भला, इतनी चीजें मैं खा सकूँगा?

शङ्खधर—इसीलिए तो मैंने थोड़ी-थोड़ी दी हैं।

चक्रधर—यह थोड़ी थोड़ी हैं। तो क्या तुम सब की-सब मेरे ही पेट में ठूँस देना चाहते हो? अब भी बैठोगे या नहीं? मुझ पंखे की जरूरत नहीं।

शङ्खधर—आप खायँ, मैं पीछे से खा लूँगा।

चक्रधर—भाई, तुम विचित्र जीव हो। तीन दिन के भूखे हो और मुझसे कहते हो, आप खाइए, मैं फिर खा लूँगा।

शङ्खधर—मैं तो आपका जूठन खाऊँगा।

उसकी आँखें फिर सजल हो गयीं! चक्रधर ने तिरस्कार के भाव से कहा—क्यों भाई, मेरा जूठन क्यों खाओगे? अब तो सब बातें तुम्हारे ही मन की हो रही हैं।

शङ्खधर—मेरी बहुत दिनों से यही आकांक्षा थी। जब से आपकी कीर्ति सुनी, तभी से यह अवसर खोज रहा था।

चक्रधर—तुम न आप खाओगे, न मुझे खाने दोगे।

शङ्खधर—मैं तो आपका जूठन ही खाऊँगा।

चक्रधर को फिर हार माननी पड़ी। वह एकान्तवासी, संयमी व्रतधारी योगी आज इस अपरिचित दीन बालक के दुराग्रहों को किसी भाँति न टाल सकता था।

शङ्खधर को आज खड़े होकर पंखा झलने में जो आनन्द, जो आत्मोल्लास, जो गर्व हो रहा था, उसका कौन अनुमान कर सकता है। इस आनन्द के सामने वह त्रिलोक के राज्य पर भी लात मार सकता था। आज उसे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि अपने पूज्य पिता की कुछ सेवा कर सके। कठिन तपस्या के बाद आज उसे यह सेवा वरदान मिला है। उससे बढ़कर सुखी और कौन हो सकता है। आज उसे अपना जीवन सार्थक मालूम हो रहा है—वह जीवन, जिसका अब तक कोई उद्देश्य न था। आनन्द के आँसू उसकी आँखों से बहने लगे।

चक्रधर जब भोजन करके उठ गये, तो उसने उसी पत्तल में अपनी पत्तल की चीजें डाल लीं और और भोजन करने बैठा। ओह! इस भोजन में कितना स्वाद था। क्या सुधा में इतना स्वाद हो सकता है? उसने आज से कई साल पहले उत्तम से-उत्तम पदार्थ खाये थे; लेकिन उनमें यह अलौकिक स्वाद कहाँ था?

चक्रधर हाथ मुँह धोकर गद्गद् कण्ठ से बोले—तुमने आज मेरे दो नियम भंग कर दिये। बिना जाने-बुझे किसी को मेहमान बना लेने का यही फल होता है। अब मैं आज कहीं न जाऊँगा। तुम भोजन कर लो और मुझसे जो कुछ कहना हो कहो। मैं ऐसे जिद्दी लड़के को अपने साथ और न रखूँगा। तुम्हारा घर कहाँ है? यहाँ से कितनी दूर है?

शंखधर—मेरे तो कोई घर ही नहीं।

चक्रधर—माता-पिता तो होंगे? वह किस गाँव में रहते हैं?

शंखधर—यह मुझे कुछ नहीं मालूम। पिताजी तो मेरे बचपन ही में घर से चले गये और माताजी का पाँच साल से मुझे कोई समाचार नहीं मिला।

चक्रधर को ऐसा मालूम हुआ, मानो पृथ्वी नीचे खिसकी जा रही है, मानों वह जल में बहे जा रहे हैं। पिता बचपन ही में घर से चले गये और माताजी का पाँच साल से कुछ समाचार नहीं मिला? भगवान्, क्या यह वही नन्हा-सा बालक है! वही, जिसे अपने हृदय से निकालने की चेष्टा करते हुए आज १६ वर्षों से अधिक हो गये!

उन्होंने हृदय को सँभालते हुए पूछा—तुम पाँच साल तक कहाँ रहे बेटा, जो घर नहीं गये?

शंखधर—पिताजी को खोजने निकला था और जब तक वह न मिलेंगे, लौटकर घर न जाऊँगा।

चक्रधर को ऐसा मालूम हुआ मानो पृथ्वी डगमगा रही है, मानो समस्त ब्रह्माण्ड एक प्रयलकारी भूचाल से आन्दोलित हो रहा है। वह सायबान के स्तम्भ के सहारे बैठ गये और एक ऐसे स्वर में बोले, जो आशा और भय के वेगों को दबाने के कारण क्षीण हो गया था। यह प्रश्न न था; बल्कि एक जानी हुई बात का समर्थन मात्र था। तुम्हारा नाम क्या है बेटा? इस प्रश्न का उत्तर क्या वही होगा, जिसकी सम्भावना चक्रधर को विकल और पराभूत कर रही थीं? संसार में क्या ऐसा एक ही बालक है, जिसे उसका बाप बचपन में छोड़कर चला गया हो? क्या ऐसा एक ही किशोर है, जो अपने बाप को खोजने निकला हो? यदि उसका उत्तर वही हुआ, जिसका उन्हें भय था, तो वह क्या करेंगे? उनके सामने एक कठिन समस्या उपस्थित हो गयी। वह धड़कते हुए हृदय से उत्तर की ओर कान लगाये थे, जैसे कोई अपराधी अपना कर्म-दण्ड सुनने के लिए न्यायाधीश की ओर कान लगाये खड़ा हो।

शंखधर ने जवाब दिया—मेरा तो नाम शंखधरसिंह है।

चक्रधर—और तुम्हारे पिता का क्या नाम है?

शंखधर—मुंशी चक्रधर कहते हैं।

चक्रधर—घर कहाँ है?

शंखधर—जगदीशपुर!

सर्वनाश! चक्रधर को ऐसा ज्ञात हुआ कि उनकी देह से प्राण निकल गये है, मानो उनके चारों ओर शून्य है। 'शंखधर!' बस, यही एक शब्द उस प्रशस्त शून्य में किसी पक्षी की भाँति चक्कर लगा रहा था। 'शङ्खधर।' यही एक स्मृति थी, जो उस प्राण शून्य दशा में चेतना को संस्कारों में बाँधे हुई थी।