कायाकल्प
अध्याय 18
चक्रघर को जेल में पहुँचकर ऐसा मालूम हुआ कि वह एक नयी दुनिया में आ गये, जहाँ मनुष्य-ही-मनुष्य हैं, ईश्वर नहीं। उन्हें ईश्वर के दिये हुए वायु और प्रकाश के मुश्किल से दर्शन होते थे। मनुष्य के रचे हुए संसार में मनुष्यत्व की कितनी हत्या हो सकती है, इसका उज्ज्वल प्रमाण सामने था। भोजन ऐसा मिलता था, जिसे शायद कुत्ते भी सूंघकर छोड़ देते। वस्त्र ऐसे, जिन्हें कोई भिखारी भी पैरों से ठुकरा देता,और परिश्रम इतना करना पड़ता था निवना बैल भी न कर सके। जेल शासन का विभाग नहीं, पाशविक व्यवसाय है, आदमियों से जबरदस्ती काम लेने का बहाना, अत्याचार करते और बात हँसी में उड़ा देते। एक कहता—लो धन्नासिंह, अब हम लोग बैकुण्ठ चलेंगे, कोई डर नहीं है, भगवान् क्षमा कर ही देंगे, वहाँ खूब जलसा रहेगा। दूसरा कहता—धन्नासिंह, मैं तुझे न जाने दूँगा, ऊपर से ऐसा ढकेलूँगा कि हड्डियाँ टूट जायँगी। भगवान् से कह दूँगा कि ऐसे पापी को बैकुण्ठ में रखोगे, तो तुम्हारे नरक में स्यार लोटेंगे। तीसरा कहता—यार, वहाँ गाँजा मिलेगा कि नहीं? अगर गाँजे को तरसना पड़ा, तो बैकुण्ठ ही किस काम का। बैकुण्ठ तो जब जानें कि वहाँ ताड़ी और शराब की नदियाँ बहती हों। चौथा कहता—अजी यहाँ से बोरियों गाँजा और चरस लेते चलेंगे, वहाँ के रखवाले क्या घूस न खाते होंगे? उन्हें भी कुछ दे दिलाकर काम निकाल लेंगे। जब यहाँ जुटा लिया, तो वहाँ भी जुटा ही लेंगे। पर ऐसी अभक्तिपूर्ण आलोचनाएँ सुनकर भी चक्रधर हताश न होते। शनैः शनैः उनकी भक्ति चेतना स्वयं दृढ़ होती जाती थी। भक्ति की ऐसी शिक्षा उन्हें कदाचित् और कहीं न मिल सकती।
बलवान् आत्माएँ प्रतिकूल दशाओं ही में उत्पन्न होती हैं। कठिन परिस्थिति में उनका धैर्य और साहस, उनकी सहृदयता और सहिष्णुता, उनकी बुद्धि और प्रतिभा अपना मौलिक रूप दिखाती हैं। आत्मोन्नति के लिए कठिनाइयों से बढ़कर कोई विद्यालय नहीं, कठिनाइयों ही में ईश्वर के दर्शन होते हैं और हमारी उच्चतम शक्तियाँ विकास पाती हैं। जिसने कठिनाइयों का अनुभव नहीं किया, उसका चरित्र बालू की भीत है, जो वर्षा के पहले ही झोंके में गिर पड़ती है। उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। महान् आत्माएँ कठिनाइयों का स्वागत करती हैं, उनसे घबराती नहीं, क्योंकि यहाँ आत्मोत्कर्ष के जितने मौके मिलते हैं, उतने और किसी दशा में नहीं मिल सकते। चक्रधर इस परिस्थिति को एक शिक्षार्थी की दृष्टि से देखते थे और विचलित न होते थे। उन्हें विश्वास था कि प्रकृति उन्हीं प्राणियों को परीक्षा में डालती है, जिनके द्वारा उसे संसार में कोई महान् उद्देश्य पूरा कराना होता है।
इस भाँति कई महीने गुजर गये। एक दिन सन्ध्या-समय चक्रधर दिन-भर के कठिन श्रम के बाद बैठे सन्ध्या कर रहे थे कि कई कैदी आपस में बातें करते हुए निकले—आज इस दारोगा की खबर लेनी चाहिए। जब देखो, गालियाँ दिया करता है, सीधे मुँह तो बात ही नहीं करता। बात बात पर मारने दौड़ता है। हम भी तो आदमी हैं। कहाँ तक सहें! अब आता ही होगा। ऐसा मारो कि जन्म-भर को दाग हो जाय! यही न होगा कि साल दो साल की मीयाद और बढ़ जायगी, बचा की आदत तो छूट जायगी। चक्रधर इस तरह की बातें अक्सर सुनते रहते थे, इसलिए उन्होंने इस पर कुछ विशेष ध्यान न दिया मगर भोजन करने के समय ज्योंही दारोगा साहब आकर खड़े हुए और एक कैदी को देर में आने के लिए मारने दौड़े कि कई कैदी चारों तरफ से दौड़ पड़े और 'मारो मारो' का शोर मच गया। दारोगाजी को सिट्टी पिट्टी भूल गयी। कहीं भागने का रास्ता नहीं, कोई मददगार नहीं। चारों तरफ दीन नेत्रों से देखा, जैसे कोई बकरा भेड़ियों के बीच में फँस गया हो। सहसा धन्नासिंह ने आगे बढ़कर दारोगाजी की गरदन पकड़ी और इतनी जोर से दबायी कि उनकी आँखें बाहर निकल आयी। चक्रधर ने देखा, अब अनर्थ हुआ चाहता है, तो तीर की तरह झपटे, कैदियों के बीच में घुसकर धन्नासिंह का हाथ पकड़ लिया और बोले—हट जाओ, क्या करते हो?
धन्नासिंह का हाथ ढीला पड़ गया, लेकिन अभी तक उसने गरदन न छोड़ी।
चक्रधर—छोड़ो ईश्वर के लिए।
धन्नासिंह—जाओ भी, बड़े ईश्वर की पूँछ बने हो। जब यह रोज गालियाँ देता है, बात बात पर हंटर जमाता है, तब ईश्वर कहाँ सोया रहता है, जो इस घड़ी जाग उठा। हट जाओ सामने से, नहीं तो सारा बाबूपन निकाल दूँगा। पहले इससे पूछो, अब तो किसी को गालियाँ न देगा, मारने तो न दौड़ेगा?
दारोगा—कसम कुरान की, जो कभी मेरे मुँह से गाली का एक हरफ भी निकले।
धन्नासिंह—कान पकड़ो।
दारोगा—कान पकड़ता हूँ।
धन्नासिंह—जाओ बचा, भले का मुँह देखकर उठे थे, नहीं तो आज जान न बचती, यहाँ कौन कोई रोनेवाला बैठा हुआ है।
चक्रधर—दारोगाजी, कहीं ऐसा न कीजिएगा कि जाकर वहाँ से सिपाहियों को चढ़ा लाइए और इन गरीबों को भुनवा डालिए।
दारोगा—लाहौल विला कूवत! इतना कमीना नहीं हूँ।
दारोगा चलने लगे, तो धन्नासिंह ने कहा—मियाँ, गारद सारद बुलायी, तो तुम्हारे हक में बुरा होगा, समझाये देते हैं। हमको क्या, न जीने की खुशी है, न मरने का रञ्ज, लेकिन तुम्हारे नाम को कोई रोनेवाला न रहेगा।
दारोगाजी तो यहाँ से जान बचाकर भागे, लेकिन दफ्तर में जाते ही गारद के सिपाहियों को ललकारा, हाकिम जिला को टेलीफोन किया और खुद बन्दूक लेकर समर के लिए तैयार हुए। दम के दम में सिपाहियों का दल संगीने चढ़ाये आ पहुँचा और लपककर भीतर घुस पड़ा। पीछे-पीछे दारोगाजी भी दौड़े। कैदी चारों ओर से घिर गये।
चक्रधर पर चारों ओर से बौछार पड़ने लगी।
धन्नासिंह—अब कहो, भगतजी, छुड़वा तो दिया, जाकर समझाते क्यों नहीं? गोली चली तो?
एक कैदी—गोली चली, तो पहले इन्हीं की चटनी की जायगी।
चक्रधर—तुम लोग अब भी शान्त रहोगे, तो गोली न चलेगी। मैं इसका जिम्मा लेता हूँ।
धन्नासिंह—तुम उन सबों से मिले हुए हो। हमें फँसाने के लिए यह ढोंग रचा है।
दूसरा कैदी—दगाबाज है, मार के गिरा दो।
चक्रधर—मुझे मारने से अगर तुम्हारी भलाई होती हो, तो यही सही।
तीसरा कैदी—तुम जैसे सीधे आप हो, वैसे ही सबको समझते हो, लेकिन तुम्हारे कारन इम लोग सेंत-मेंत में पिटे कि नहीं?
धन्नासिंह—सीधा नहीं, उनसे मिला हुआ है। भगत सभी दिल के मैले होते हैं। कितनों को देख चुका।
तीसरा कैदी—तुम्हारी ऐसी-तैसी, तुम्हें फाँसी दिला कर इन्हें राज ही तो मिल जायगा। छोटा मुँह, बड़ी बात!
चक्रधर ने आगे बढ़कर कहा—दारोगाजी, आखिर आप क्या चाहते हैं? इन गरीबों को क्यों घेर रखा है?
दारोगा ने सिपाहियों की आड़ से कहा—यही उन सब बदमाशों का सरगना है। खुदा जाने किस हिकमत से उन सबों को मिलाये हुए है। इसे गिरफ्तार कर लो। बाकी जितने हैं, उन्हें खूब मारो, मारते-मारते हलवा निकाल लो सुअर के बच्चों का। इनकी इतनी हिम्मत कि मेरे साथ गुस्ताखी करें।
चक्रधर—आपको कैदियों को मारने का कोई मजाज नहीं है।
धन्नासिंह—जबान सँभाल के दारोगाजी!
दारोगा—मारो इन सूअरों को।
सिपाही कैदियों पर टूट पड़े और उन्हें बन्दूकों के कुन्दों से मारना शुरू किया। चक्रधर ने देखा कि मामला संगीन हुआ चाहता है, तो बाले—दारोगाजी, खुदा के वास्ते यह गजब न कीजिए।
कैदियों में खलबली पड़ गयी। कुछ इधर-उधर से फावड़े, कुदालें और पत्थर ला लाकर लड़ने पर तैयार हो गये। मौका नाजुक था। चक्रधर ने बड़ी दीनता से कहा—मैं आपको फिर समझाता हूँ।
दारोगा—चुप रह सूअर का बच्चा!
इतना सुनना था कि चक्रधर बाज की तरह लपककर दारोगाजी पर झपटे। कैदियों पर कुन्दों की मार पड़नी शुरू हो गयी थी। चक्रधर को बढ़ते देखकर उन सबों ने पत्थरों की वर्षा करनी शुरू की। भीषण संग्राम होने लगा।
एकाएक चक्रधर ठिठक गये। ध्यान आ गया, स्थिति और भयंकर हो जायगी, अभी सिपाही बन्दूक चलाना शुरू कर देंगे, लाशों के ढेर लग जायँगे। अगर हिंसक भावों को दबाने का कोई मौका हो सकता है, तो वह यही मौका है। ललकार कर बोले—पत्थर न फेंको, पत्थर न फेंको! सिपाहियों के हाथों से बन्दूक छीन लो।
सिपाहियों ने संगीनें चढ़ानी चाहीं; लेकिन उन्हें इसका मौका न मिल सका। एकएक सिपाही पर दस दस कैदी टूट पड़े और दम के दम में उनकी बन्दूक छीन ली। सिपाहियों ने रोब के बल पर आक्रमण किया था। उन्हें विश्वास था कि कुन्दों की मार पड़ते ही कैदी भाग जायँगे। अब उन्हें मालूम हुआ कि हम धोखे में थे। फिर वे एक साथ में नहीं, उधर-उधर बिखरे खड़े थे। इससे उनकी शक्ति और भी कम हो गयी थी। उन पर आगे पीछे, दायें-बायें चारों तरफ से चोट पड़ सकती थी। संगीनें चढ़ाकर भी वे किसी तरह न बच सकते थे। कैदियों में पिल पड़ना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। उनके ऐसे हाथ-पाँव फूले, होश ऐसे गायब हुए कि कुछ निश्चय न कर सके कि इस समय क्या करना चाहिए। कैदियों ने तुरन्त उनकी मुश्कें चढ़ा दीं और बन्दूक ले-लेकर उनके सिर पर खड़े हो गये। यह सब कुछ पाँच मिनट में हो गया। ऐसा दाँव पड़ा कि वही लोग जो जरा देर पहले हेकड़ी जताते थे, कैदियों को पाँव की धूल समझते थे, अब उन्हीं कैदियों के सामने खड़े दया प्रार्थना कर रहे थे, घिघियाते थे, मत्थे टेकते थे और रोते थे। दारोगाजी की सूरत तो तसवीर खींचने योग्य थी। चेहरा फक, हवाइयाँ उड़ी हुईं, थर-थर काँप रहे थे कि देखें, जान बचती है या नहीं।
कैदियों ने देखा, इस वक्त हमारा राज्य है, तो पुराने बदले चुकाने पर तैयार हो गये। धन्नासिंह लपका हुआ दारोगा के पास आया और जोर से एक धक्का देकर बोला—क्यों खाँ साहब, उखाड़ लूँ डाढ़ी के एक-एक बाल?
चक्रधर—धन्नासिंह हट जाओ।
धन्नासिंह—मरना तो है ही, अब इन्हें क्यों छोड़ें?
चक्रधर—हम कहते हैं, हट जाओ, नहीं तो अच्छा न होगा।
धन्नासिंह—अच्छा हो चाहे बुरा, हमारे साथ इन लोगों ने जो सलूक किये हैं, उसका मजा चखाये बिना न छोड़ेंगे।
एक कैदी—हमारी जान तो जाती ही है, पर इन लोगों को तो न छोड़ेंगे।
दूसरा कैदी—एक-एक की हड्डियाँ तोड़ दो। दो-दो, चार-चार साल और सही। अभी कौन सुख भोगरहे हैं, जो सजा को डरें। आखिर घूम-घाम के यहीं तो फिर आना है।
चक्रधर—मेरे देखते तो यह अनर्थ न होने पायेगा। हाँ, मर जाऊँ तो जो चाहे करना!
धन्नासिंह—अगर ऐसे बड़े धर्मात्मा हो, तो इनको क्यों नहीं समझाया? देखते नहीं हो, कितनी साँसत होती है। तुम्हीं कौन बचे हुए हो। कुत्तों को भी मारते दया आती है। क्या हम कुत्तों से भी गये बीते हैं।
इतने में सदर फाटक पर शोर मचा। जिला-मैजिस्ट्रेट मिस्टर जिम सशस्त्र पुलिस के सिपाहियों और अफसरों के साथ आ पहुँचे थे। दारोगाजी ने अन्दर आते वक्त किवाड़ बन्द कर लिये थे, जिसमें कोई कैदी भागने न पाये। यह शोर सुनते ही चक्रधर समझ गया कि पुलिस आ गयी। बोले—अरे भाई, क्यों अपनी जान के दुश्मन हुए हो? बन्दूकें रख दो और फौरन् जाकर किवाड़ खोल दो। पुलिस आ गयी।
धन्नासिंह-कोई चिन्ता नहीं। हम भी इन लोगों का वारा-न्यारा किये डालते हैं। मरते ही हैं, तो दो चार को मार के मरें।
कैदियों ने फौरन् संगीने चढ़ायीं और सबसे पहले धन्नासिंह दारोगाजी पर झपटा। करीब था कि संगीन की नोंक उनके सीने में चुभे कि चक्रधर यह कहते हुए 'धन्नासिंह, ईश्वर के लिए.' दारोगाजी के सामने आकर खड़े हो गये। धन्नासिंह वार कर चुका था। चक्रधर के कन्धे पर संगीन का भरपूर हाथ पड़ा। आधी संगीन धँस गयी। दाहिने हाथ से कन्धे को पकड़कर बैठ गये। कैदियों ने उन्हें गिरते देखा, तो होश उड़ गये। आ-आकर उनके चारों तरफ खड़े हो गये। घोर अनर्थ की आशंका ने उन्हें स्तंभित कर दिया। भगत को चोट आ गयी—ये शब्द उनकी पशु-वृत्तियों को दबा बैठे। धन्नासिंह ने बन्दूक फेंक दी और फूट-फूटकर रोने लगा। मैंने भगत के प्राण लिये! जिस भगत ने गरीबों की रक्षा करने के लिए सजा पायी, जो हमेशा उनके लिए अफसरों से लड़ने को तैयार रहता था, जो नित्य उन्हें अच्छे रास्ते पर ले जाने की चेष्टा करता था, जो उनके बुरे व्यवहारों को हँस-हँसकर सह लेता था, वही भगत आज धन्नासिंह के हाथ जख्मी पड़ा है। धन्नासिंह को कई कैदी पकड़े हुए हैं। ग्लानि के आवेश में वह बार-बार चाहता है कि अपने को उनके हाथों से छुड़ाकर वही संगीन अपनी छाती में चुभा ले; लेकिन कैदियों ने इतने जोर से उसे जकड़ रखा है कि उसका कुछ बस नहीं चलता।
दारोगा ने मौका पाया तो सदर फाटक की तरफ दौड़े कि उसे खोल दूँ। धन्नासिंह ने देखा कि यह हजरत, जो सारे फिसाद की जड़ हैं, बेदाग बचे जाते हैं, तो उसकी हिंसक वृत्तियों ने इतना जोर मारा कि एक ही झटके में वह कैदियों के हाथों से मुक्त हो गया और बन्दूक उठाकर उनके पीछे दौड़ा। चक्रधर के खून का बदला लेना जरूरी था। करीब था कि दारोगाजी पर फिर वार पड़े कि चक्रधर फिर सँभलकर उठे और एक हाथ से अपना कन्धा पकड़े, लड़खड़ाते हुए चले। धन्नासिंह ने उन्हें आते देखा, तो उसके पाँव रुक गये। भगत अभी जीते हैं, इसकी उसे इतनी खुशी हुई कि वह बन्दूक फेंककर पीछे की ओर चला और उनके चरणों पर सिर रखकर रोने लगा। ऐसी सच्ची खुशी उसे अपने जीवन में कभी न हुई थी!
चक्रधर ने कहा—सिपाहियों को छोड़ दो।
धन्नासिंह—बहुत अच्छा, भैया? तुम्हारा जी कैसा है?
चक्रधर—देखना चाहिए, बचता हूँ या नहीं।
धन्नासिंह—दरोगा के बच जाने का कलंक रह गया।
सहसा मिस्टर जिम सशस्त्र पुलिस के साथ जेल में दाखिल हुए। उन्हें देखते ही सारे कैदी भर से भागे। केवल दो आदमी चक्रधर के पास खड़े रहे। धन्नासिह उनमें एक था। सिपाहियों ने भी छूटते ही अपनी अपनी बन्दूकें सँभाली और एक कतार में खड़े हो गये।
जिम—वेल दारोगा, क्या हाल है?
दारोगा—हुजूर के अकबाल से फतह हो गयी। कैदी भाग गये।
जिम—यह कौन आदमी पड़ा है?
दारोगा—इसी ने हम लोगों की मदद की है, हुजूर। चक्रधर नाम है।
जिम—अच्छा! यह चक्रधर है, जो बगावत के मामले में हमारे इजलास से सजा पाया था।
दारोगा—जी हाँ, हुजूर! अभी उसी की बदौलत हमारी जान बची। जो जख्म उसके कन्धे में है, यह शायद इस वक्त मेरे सीने में होता।
जिम—इसने कैदियों को भड़काया होगा?
दारोगा—नहीं हुजूर, इसने तो कैदियों को समझा बुझाकर ठण्डा किया।
जिम—तुम कुछ नहीं समझता। यह लोग पहले कैदियों को भड़काता है, फिर उनकी तरफ से हाकिम लोगों से लड़ता है, जिसमें कैदी समझे कि यह हमारी तरफ से लड़ रहा है। यह कैदियों को मिलाने का हिकमत है। वह कैदियों को मिलाकर जेल का काम बन्द कर देना चाहता है।
दारोगा—देखने में तो हुजूर, बहुत सीधा मालूम होता है, दिल का हाल खुदा जाने।
जिम—खुदा के जानने से कुछ नहीं होगा, तुमको जानना चाहिए। तुमको हर एक कैदी पर निगाह रखनी चाहिए। यही तुम्हारा काम है। यह आदमी कैदियों से मजहब की बात चीत तो नहीं करता।
दारोगा—मजहबी बातें तो बहुत करता है, हुजूर! इसी से कैदियों ने उसे 'भगत' का लकब दे दिया है।
जिम—ओह! तब तो यह बहुत ही खतरनाक आदमी है। मजहबवाले आदमी पर बहुत कड़ी निगाह रखनी चाहिए। कोई पढ़ा लिखा आदमी दिल से मजहब को नहीं मानता। मजहब पढ़े लिखे आदमियों के लिये नहीं है। उनके लिए तो Ethics काफी है। जब कोई पढ़ा-लिखा आदमी मजहब की बात चीत करे, तो फौरन् समझ लो कि वह कोई साजिश करना चाहता है। Religion (धर्म) के साथ Politics (राजनीति) बहुत खतरनाक हो जाता है। यह आदमी कैदियों से बड़ी हमदर्दी करता होगा?
दारोगा—जी हाँ, हमेशा!
जिम—सरकारी हुक्म को खूब मानता होगा?
दारोगा—जी हाँ, हमेशा।
जिम—कभी कोई शिकायत न करता होगा? कड़े-से कड़े काम खुशी से करता होगा?
दारोगा—जी हाँ, शिकायत नहीं करता। ऐसा बेजबान आदमी तो मैंने कभी देखा ही नहीं।
जिम—ऐसा आदमी निहायत खौफनाक होता है। उस पर कभी एतबार नहीं करना चाहिए। हम इस पर मुकदमा चलायेगा। इसको बहुत कड़ी सजा देगा। सिपाहियों को दफ्तर में बुलाओ। हम सबका बयान लिखेगा।
दारोगा—हुजूर, पहले उसे डाक्टर साहब को तो दिखा लूँ। ऐसा न हो कि मर जाय, गुलाम को दाग लगे।
जिम—वह मरेगा नहीं। ऐसा खौफनाक आदमी कभी नहीं मरता, और मर भी जायगा, तो हमारा कोई नुकसान नहीं।
दूसरे दिन प्रातःकाल लौंगी ने पंडित की रट लगायी और दीवान साहब को विवश होकर मुंशी वज्रधर के पास जाना पड़ा।
वज्रधर सारी कथा सुनकर बोले—आपने यह बुरा रोग पाल रखा है। एक बार डाँटकर कह दीजिए—चुपचाप बैठी रह, तुझे इन बातों से क्या मतलब? फिर देखूँ वह कैसे बोलती है!
दीवान—भई, इतनी हिम्मत मुझमें नहीं है। वह कभी जरा रूठ जाती है, तो मेरे हाथ-पाँव फूल जाते हैं। मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकता कि बिना उसके मैं जिन्दा कैसे रहूँगा। मैं तो उससे बिना पूछे भोजन भी नहीं कर सकता। वह मेरे घर की लक्ष्मी है। आपकी किसी ज्योतिषी से जान पहचान है?
मुंशी—जान-पहचान तो बहुतों से है, लेकिन देखना तो यह है कि काम किससे निकल सकता है। कोई सच्चा आदमी तो यह स्वाँग भरने न जायगा। कोई पण्डित बनाना पड़ेगा।
दीवान—यह तो बड़ी मुश्किल हुई।
मुंशी—मुश्किल क्या हुई। मैं अभी बनाये देता हूँ। ऐसा पण्डित बना दूँ कि कोई भाँप न सके। इन बातों में क्या रखा है?
यह कहकर मुन्शीजीने झिनकू को बुलाया। वह एक ही छँटा हुआ था। फौरन तैयार हो गया। घर जाकर माथे पर तिलक लगाया, गले में रामनामी चादर डाली, सिर पर एक टोपी रखी और एक बस्ता बगल में दबाये आ पहुँचा। मुन्शीनी उसे देखकर बोले—यार, जरा-सी कसर रह गयी। तोंद के बगैर पण्डित कुछ जँचता नहीं। लोग यही समझते हैं कि इनको तर माल नहीं मिलते, जभी तो ताँत हो रहे हैं। तोंदल आदमी की शान ही और होती है, चाहे पण्डित बने, चाहे सेठ, चाहे तहसीलदार ही क्यों न बन जाय। उसे सब कुछ भला मालूम होता है। मैं तोंदल होता तो अब तक न जाने किस ओहदे पर होता। सच पूछो, तो तोंद न रहने ही के कारण अफसरों पर मेरा रोब न जमा। बहुत घी-दूध खाया, पर तकदीर में बड़ा आदमी होना न बदा था, तोंद न निकली, न निकली। तोंद बना लो, नहीं तो उल्लू बनाकर निकाल दिये जाओगे, या किसी तोंदूमल को पकड़ो।
झिनकू—सरकार, तोंद होती, तो आज मारा-मारा क्यों फिरता? मुझे भी न लोग झिनकू उस्ताद कहते! कभी तबला न होता तो तोंद ही बना देता, मगर तोंद न रहने में कोई हरज नहीं है, यहाँ कई पण्डित बिना तोंद के भी हैं।
मुन्शी—कोई बड़ा पण्डित भी है बिना तोंद का?
मुन्शी—नहीं सरकार, कोई बड़ा पण्डित तो नहीं है। तोंद के बिना कोई बड़ा हो कैसे जायगा? कहिये तो कुछ कपड़े लपेटूँ?
मुन्शी—तुम तो कपड़े लपेटकर पिंडरोगी से मालूम होगे। तकदीर पेट पर सबसे ज्यादा चमकती है, इसमें शक नहीं, लेकिन और अंगों पर भी तो कुछ-न-कुछ असर होता ही है। यह राग न चलेगा, भाई किसी और को फाँसो।
झिनकू—सरकार, अगर मालकिन को खुश न कर दूँ, तो नाक काट लीजिएगा। कोई अनाड़ी थोड़े ही हूँ!
खैर, तोनों आदमी मोटर पर बैठे और एक क्षण में घर जा पहुँचे। दीवान साहब ने जाकर कहा—पण्डितजी आ गये; बड़ी मुश्किल से आये हैं।
इतने में मुंशीजी भी आ पहुँचे और बोले—कोई नया आसन बिछाइएगा। कुरसी पर नहीं बैठते। आज न जाने क्या समझकर इस वक्त आ गये, नहीं तो दोपहर के पहले कोई लाख रुपए भी दे तो नहीं जाते।
पण्डितजी बड़े गर्व के साथ मोटर से उतरे और जाकर आसन पर बैठे। लौंगी ने उनकी ओर ध्यान से देखा और तीव्र स्वर में बोली—आप जोतसी हैं? ऐसी ही सूरत होती है जोतसियों की? मुझे तो कोई भाँड से मालूम होते हो! मुंशीजी ने दाँतों तले जबान दबा ली, दीवान साहब ने छाती पर हाथ रखा और छिनकू के चेहरे पर तो मुर्दनी छा गयी। कुछ जवाब ही देते न बन पड़ा। आखिर मुंशीजी बोले—यह क्या गजब करती हो, लौंगी रानी! अपने घर बुलाकर महात्माओं की यही इज्जत की जाती है?
लौंगी—लाला, तुमने बहुत दिनों तहसीलदारी की है, तो मैंने भी धूप में बाल नहीं पकाये है। एक बहुरूपिये को लाकर खड़ा कर दिया, ऊपर से कहते हैं, जोतसी है! ऐसी ही सूरत होती है जोतसी की? मालूम होता है, महीनों से दाने की सूरत नहीं देखी। मुझे क्रोध तो इन पर (दीवान) आता है, तुम्हें क्या कहूँ?
झिनकू—माता, तूने मेरा बड़ा अपमान किया है। अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहरूँगा। तुमको इसका फल मिलेगा, अवश्य मिलेगा।
लौंगी—लो, बस, चले ही जाओ मेरे घर से! धूर्त, पाखण्डी कहीं का। बड़ा जोतसी है, तो बता मेरी उम्र कितनी है? लाला, अगर तुम्हें धन का लोभ हो, तो जितना चाहो, मुझसे ले जाओ। मेरी बिटिया को कुएँ में न ढकेलो। क्यों उसके दुश्मन बने हुए हो? जो कुछ कर रहे हो उसका सारा दोष तुम्हारे ही सिर जायगा। तुम इतना भी नहीं समझते कि बूढ़े आदमी के साथ कोई लड़की कैसे सुख से रह सकती है! धन से बूढ़े जवान तो नहीं हो जाते।
झिनकू—माताजी, राजा साहब की आयु, ज्योतिष विद्या के अनुसार..
लौंगी—तू फिर बोला, चुपका खड़ा क्यों नहीं रहता?
झिनकू—दीवान साहब, अब मैं नहीं ठहर सकता।
लौंगी—क्यों, ठहरोगे क्यों नहीं? दच्छिना तो लेते जाओ।
यह कहते हुए लौंगी ने कोठरी में जाकर कजलौटे से काजल निकाला और तुरन्त बाहर आ, एक हाथ से झिनकू को पकड़, दूसरे से उसके मुँह पर काजल पोत दिया। बहुत उछले-कूदे, बहुत फड़फड़ाये; पर लौंगी ने जौं भर भी न हिलने दिया, मानो बाज ने कबूतर को दबोच लिया हो। दीवान साहब अब अपनी हँसी न रोक सके। मारे हँसी के मुँह से बात न निकलती थी। मुंशीजी अभी तक झिनकू की विद्या का राग अलाप रहे थे और लौंगी झिनकू को दबोचे हुए चिल्ला रही थी—थोड़ा चूना लाओ, तो इसे पूरी दच्छिना दे दूँ! मेरे धन्य भाग्य कि आज जोतसीजी के दर्शन हुए।
आखिर मुंशीजी को गुस्सा आ गया। उन्होने लौंगी का हाथ पकड़ककर चाहा कि झिनकू का गला छुड़ा दें। लौंगी ने झिनकू को तो न छोड़ा, एक हाथ से तो उसकी गरदन पकड़े हुए थी, दूसरे हाथ से मुंशीजी की गरदन पकड़ ली और बोली—मुझसे जोर दिखाते हो, लाला? बड़े मर्द हो, तो छुड़ा लो गरदन। बहुत दूध घी बेगार में लिया होगा। देखें, वह जोर कहाँ है।
दीवान—मुंशीजी, आप खड़े क्या हैं, छुड़ा लीजिए गरदन।
मुंशी—मेरी यह साँसत हो रही है और आप खड़े हँस रहे हैं!
दीवान—तो क्या कर सकता हूँ। आप भी तो देवनी से जोर आजमाने चले थे। आज आपको मालूम हो जायगा कि मैं इससे क्यों इतना दबता हूँ।
लौंगी—जोतसीजी, अपनी विद्या का जोर क्यों नहीं लगाते? क्यों रे, अब तो कभी जोतसी न बनेगा?
झिनकू—नहीं माताजी, बड़ा अपराध हुआ, क्षमा कीजिए।
लौंगी ने दीवान साहब की ओर सरोष नेत्रों से देखकर कहा—मुझसे यह चाल चली जाती है, क्यों! लड़की को राजा से ब्याहकर तुम्हारा मरतबा बढ़ जायगा, क्यों? धन और मरतबा सन्तान से भी ज्यादा प्यारा है, क्यों? लगा दो आग घर में। घोंट दो लड़की का गला। अभी मर जायगी, मगर जन्म-भर के दुःख से तो छूट जायगी। धन और मरतबा अपने पौरुख से मिलता है। लड़की बेचकर धन नहीं कमाया जाता। यह नीचों का काम है, भलेमानसों का नहीं। मैं तुम्हें इतना स्वार्थी न समझती थी, लाला साहब। तुम्हारे मरने के दिन आ गये हैं, क्यों पाप की गठरी लादते हो? मगर तुम्हें समझाने से क्या होगा। इसी पाखण्ड में तुम्हारी उम्र कट गयी, अब क्या सँभलोगे! मरती बार भी पाप करना बदा था। क्या करते। और तुम भी सुन लो, जोतसीजी! अब कभी भूल कर भी यह स्वाँग न भरना। धोखा देकर पेट पालने से मर जाना अच्छा है। जाओ।
यह कहकर लौंगी ने दोनों आदमियों को छोड़ दिया। झिनकू तो बगटुट भागा; लेकिन मुंशीजी वहीं सिर झुकाये खड़े रहे। जरा देर के बाद बोले—दीवान साहब, अगर आप की मरजी हो, तो मैं जाकर राजा साहब से कह दूँ कि दीवान साहब को मंजूर नहीं है।
दीवान—अब भी आप मुझसे पूछ रहे हैं? क्या अभी कुछ और साँसत कराना चाहते हैं?
मुंशी—साँसत तो मेरी यह क्या करती, मैंने औरत समझकर छोड़ दिया।
दीवान—आप आज जाके साफ-साफ कह दीजिएगा।
लौंगी—क्या साफ साफ कह दीजिएगा? अब क्या साफ-साफ कहलाते हो? किसी को खाने का नेवता न दो, तो वह बुरा न मानेगा, लेकिन नेवता देकर अपने द्वार से भगा दो, तो तुम्हारी जान का दुश्मन हो जायगा। अब साफ-साफ कहने का अवसर नहीं रहा। जब नेवता दे चुके, तब तो खिलाना ही पड़ेगा, चाहें लोटा-थाली बेचकर ही क्यों न खिलाओ। कहके मुकरने से बैर हो जायगा।
दीवान—बैर की चिन्ता नहीं। नौकरी की मैं परवा नहीं करता।
लौंगी—हाँ, तुमने तो कारूँ का खजाना घर में गाड़ रखा है। इन बातों से अब काम न चलेगा। अब तो जो होनी थी, हो चुकी। राम का नाम लेकर ब्याह करो। पुरोहित को बुलाकर साइत-सगुन पूछ ताछ लो और लगन भेज दो। एक ही लड़की है, दिल खोलकर काम करो।
मुंशीजी को अपनी साँसत का पुरस्कार मिल गया। मारे खुशी के बगलें बजाने लगे। विरोध की अन्तिम क्रिया हो गयी।
आज ही से विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। दीवान साहब स्वभाव के कृपण थे, कम-से-कम खर्च में काम निकालना चाहते थे, लेकिन लौंगी के आगे उनकी एक न चलती थी। उसके पास रुपए न जाने कहाँ से निकलते आते थे, मानो किसी रसिक के प्रेमोद्गार हों। तीन महीने तैयारियों में गुजर गये। विवाह का मुहूर्त निकट आ गया।
सहसा एक दिन शाम को खबर मिली कि जेल में दंगा हो गया और चक्रधर के कन्धे में गहरा घाव लगा है। बचना मुश्किल है।
मनोरमा के विवाह की तैयारियाँ तो हो ही रही थीं और यों भी देखने में वह बहुत खुश नजर आती थी; पर उसका हृदय सदैव रोता रहता था। कोई अज्ञात भय, कोई अलक्षित वेदना, कोई अतृप्त कामना, कोई गुप्त चिन्ता, हृदय को मथा करती थी। अन्धों की भाँति इधर-उधर टटोलती थी; पर न चलने का मार्ग मिलता था, न विश्राम का आधार। उसने मन में एक बात निश्चय की थी और उसो में सन्तुष्ट रहना चाहती थी; लेकिन कभी-कभी वह जीवन इतना शून्य, इतना अँधेरा, इतना नीरस मालूम होता कि घंटों वह मूर्छित-सी बैठी रहती, मानों कहीं कुछ नहीं है, अनन्त आकाश में केवल वही अकेली है।
यह भयानक समाचार सुनते ही मनोरमा को हौलदिल-सा हो गया। आकर लौंगी से बोली—लौंगी अम्माँ, मैं क्या करूँ? बाबूजी को देखे बिना अब नहीं रहा जाता। क्यों अम्माँ, घाव अच्छा हो जायगा न?
लौंगी ने करुण नेत्रों से देखकर कहा—अच्छा क्यों न होगा, बेटी! भगवान् चाहेंगे, तो जल्द अच्छा हो जायगा।
लौंगी मनोरमा के मनोभावों को जानती थी। उसने सोचा, इस अबला को कितना दुःख है! मन ही मन तिलमिलाकर रह गयी। हाय! चारे पर गिरनेवाली चिड़िया को मोती चुगाने की चेष्टा की जा रही है। तड़प-तड़पकर पिंजड़े में प्राण देने के सिवा वह और क्या करेगी! मोती में चमक है, वह अनमोल है, लेकिन उसे कोई खा तो नहीं सकता। उसे गले में बाँध लेने से क्षुधा तो न मिटेगी।
मनोरमा ने फिर पूछा—भगवान् सज्जन लोगों को क्यों इतना कष्ट देते हैं, अम्माँ? बाबूजी का सा सज्जन दूसरा कौन होगा। उनको भगवान् इतना कष्ट दे रहे हैं! मुझे कभी कुछ नहीं होता, कभी सिर भी नहीं दुखता। मुझे क्यों कभी कुछ नहीं होता, अम्माँ?
लौंगी—तुम्हारे दुश्मन को कुछ हो बेटी, तुम तो कभी घड़ी-भर चैन न पाती थीं। तुम्हें गोद में लिये रात-भर भगवान् का नाम लिया करती थी।
सहसा मनोरमा के मन में एक बात आयी। उसने बाहर आकर मोटर तैयार करायी और दम-के-दम में राज भवन की ओर चली। राजा साहब इसी तरफ आ रहे थे। मनोरमा को देखा, तो चौंके। मनोरमा घबरायी हुई थी।
राजा—तुमने क्यों कष्ट किया? मैं तो आ रहा था।
मनोरमा—आपको जेल के दंगे की खबर मिली?
राजा—हाँ, मुन्शी वज्रधर अभी कहते थे।
मनोरमा—मेरे बाबूजी को गहरा घाव लगा है।
राजा—हाँ, यह भी सुना।
मनोरमा—तब भी आपने उन्हें जेल से बाहर अस्पताल में लाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की? आपका हृदय बड़ा कठोर है।
राजा ने कुछ चिढ़कर कहा—तुम्हारे-जैसा उदार हृदय कहाँ से लाऊँ।
मनोरमा—मुझसे माँग क्यों नहीं लेते? बाबूजी को बहुत गहरा घाव लगा है, और अगर यत्न न किया गया, तो उनका बचना कठिन है। जेल में जैसा इलाज होगा, आप जानते ही हैं। न कोई आगे, न कोई पीछे, न मित्र, न बन्धु। आप साहब को एक खत लिखिए कि बाबूजी को अस्पताल में लाया जाय।
राजा—साहब मानेंगे?
मनोरमा—इतनी जरा-सी बात न मानेंगे?
राजा—न-जाने दिल में क्या सोचें।
मनोरमा—आपको अगर बहुत मानसिक कष्ट हो रहा हो, तो रहने दीजिए। मैं खुद साहब से मिल लूँगी।
राजा साहब यह तिरस्कार सुनकर काँप उठे। कातर होकर बोले—मुझे किस बात का कष्ट होगा। अभी जाता हूँ।
मनोरमा—लौटिएगा कब तक?
राजा—कह नहीं सकता।
यह कहकर राजा साहब मोटर पर ना बैठे और शोफर से मिस्टर जिम के बँगले पर चलने को कहा। मनोरमा की निष्ठुरता से उनका चित्त बहुत खिन्न था। मेरे आराम और तकलीफ का इसे जरा भी खयाल नहीं। चक्रधर से न जाने क्यों इतना स्नेह है। कहीं उससे प्रेम तो नहीं करती? नहीं, यह बात नहीं। सरल हृदय बालिका है। ये कौशल क्या जाने। चक्रधर आदमी ही ऐसा है कि दूसरों को उससे मुहब्बत हो जाती है। जवानी में सहृदयता कुछ अधिक होती ही है। कोई मायाविनी स्त्री होती, तो मुझसे अपने मनोभावों को गुप्त रखती। जो कुछ करना होता, चुपके चुपके करती; पर इसके निश्छल हृदय में कपट कहाँ। जो कुछ कहती है, मुझी से कहती है; जो कष्ट होता है, मुझी को सुनाती है। मुझ पर पूरा विश्वास करती है। ईश्वर करे साहब से मुलाकात हो जाय और वह मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लें! जिस वक्त मैं आकर यह शुभ समाचार कहूँगा, कितनी खुश होगी।
यह सोचते हुए राजा साहब मिस्टर जिम के बँगले पर पहुँचे। शाम हो गयी थी। साहब बहादुर सैर करने जा रहे थे। उनके बँगले में वह ताजगी और सफाई थी कि राजा साहब का चित्त प्रसन्न हो गया। उनके यहाँ दर्जनों माली थे, पर बाग इतना हरा-भरा न रहता था। यहाँ की हवा में आनन्द था। इकबाल हाथ बाँधे हुए खड़ा मालूम होता था। नौकर-चाकर कितने सलीकेदार थे, घोड़े कितने समझदार, पौधे कितने सुन्दर, यहाँ तक कि कुत्तों के चेहरे पर भी इकबाल की आभा झलक रही थी।
राजा साहब को देखते ही जिम साहब ने हाथ मिलाया और पूछा—आपने जेल में दंगे का हाल सुना?
राजा—जी हाँ! सुनकर बड़ा अफसोस हुआ।
जिम—सब उसी का शरारत है, उसी बागी नौजवान का।
राजा—हुजूर का मतलब चक्रधर से है?
जिम—हाँ, उसी से! बहुत ही खौफनाक आदमी है। उसी ने कैदियों को भड़काया है।
राजा—लेकिन अब तो उसको अपने किये की सजा मिल गयी। अगर बच भी गया तो महीनों चारपाई से न उठेगा।
जिम—ऐसे आदमी के लिए इतनी ही सजा काफी नहीं। हम उस पर मुकदमा चलायेगा।
राजा—मैंने सुना है कि उसके कन्धे में गहरा जख्म है और आपसे यह अर्ज करता हूँ कि उसे शहर के बड़े अस्पताल में रखा जाय, जहाँ उसका अच्छा इलाज हो सके। आपकी इतनी कृपा हो जाय, तो उस गरीब की जान बच जाय और सारे जिले में आपका नाम हो जाय। मैं इसका जिम्मा ले सकता हूँ कि अस्पताल में उसकी पूरी निगरानी रखी जायगी।
जिम—हम एक बागी के साथ कोई रियायत नहीं कर सकता। आप जानता है, मुगलों या मरहटों का राज होता, तो ऐसे आदमी को क्या सजा मिलता? उसका खाल खींच लिया जाता, या उसके दोनों हाथ काट लिये जाते। हम अपने दुश्मन को कोई रियायत नहीं कर सकता।
राजा—हुजूर, दुश्मनों के साथ रियायत करना उनको सबसे बड़ी सजा देना है। आप जिस पर दया करें, वह कभी आपसे दुश्मनी नहीं कर सकता। वह अपने किये पर लज्जित होगा और सदैव के लिये आपका भक्त हो जायगा।
जिम—राजा साहब, आप समझता नहीं। ऐसा सलूक उस आदमी के साथ किया जाता है, जिसमें कुछ आदमियत बाकी रह गया हो। बागी का दिल बालू का मैदान है। उसमें पानी की एक बूँद भी नहीं होती, और न उसे पानी से सींचा जा सकता है। आदमी में जितना धर्म और शराफत है, उसके मिट जाने पर वह बागी हो जाता है। उसे भलमनसी से आप नहीं जीत सकता।
राजा साहब को आशा थी कि साहब मेरी बात आसानी से मान लेंगे। साहब के पास वह रोज ही कोई-न-कोई तोहफा भेजते रहते थे। उनकी जिद पर चिढ़कर बोले—जब मैं आपको विश्वास दिला रहा हूँ कि उस पर अस्पताल में काफी निगरानी रखी जायगी, तो आपको मेरी अर्ज मानने में क्या आपत्ति है?
जिम ने मुस्कराकर कहा—यह जरूरी नहीं कि मैं आपसे अपनी पालिसी बयान करूँ।
राजा—मैं उसकी जमानत करने को तैयार हूँ।
जिम—(हँसकर) आप उसकी जवान की जमानत तो नहीं कर सकते? हजारों आदमी उसे देखने को रोज आयेगा। आप उन्हें रोक तो नहीं सकते? गँवार लोग यही समझेगा कि सरकार इस आदमी पर बड़ा जुल्म कर रही है। उसे देख-देखकर लोग भड़केगा। इसको आप कैसे रोक सकते हैं?
राजा साहब के जी में आया कि इसी वक्त यहाँ से चल दूँ और फिर इसका मुँह न देखूँ। पर खयाल किया, मनोरमा बैठी मेरी राह देख रही होगी। यह खबर सुनकर उसे कितनी निराशा होगी। ईश्वर! इस निर्दयी के हृदय में थोड़ी-सी दया डाल दो। बोले—आप यह हुक्म दे सकते हैं कि उनके निकट सम्बन्धियों के सिवा कोई उनके पास न जाने पाये?
जिम—मेरे हुक्म में इतनी ताकत नहीं है कि वह अस्पताल को जेल बना दे।
यह कहते-कहते मिस्टर जिम फिटिन पर बैठे और सैर करने चल दिये।
राजा साहब को एक क्षण के लिए मनोरमा पर क्रोध आ गया। उसी के कारण मैं यह अपमान सह रहा हूँ। नहीं तो मुझे क्या गरज पड़ी थी कि इसकी इतनी खुशामद करता। जाकर कहे देता हूँ कि साहब नहीं मानते, मैं क्या करूँ? मगर उसके आँसुओं के भय ने फिर कातर कर दिया। आह! उसका कोमल हृदय टूट जायगा। आँखों में आँसू की झड़ी लग जायगी। नहीं, मैं अभी इसका पिण्ड न छोडूँगा। मेरा अपमान हो, इसकी चिन्ता नहीं। लेकिन उसे दुख न हो।
थोड़ी देर तक तो राजा साहब बाग में टहलते रहे। फिर मोटर पर जा बैठे और वटे-भर इधर-उधर घूमते रहे। ८ बजे वह लौटकर आये, तो मालूम हुआ, अभी साहब नहीं पाये। फिर लोटे, इसी तरह वह घण्टे घण्टे भर के बाद वह तीन बार पाये, मगर साहब बहादुर अभी तक न लौटे थे।
सोचने लगे, इतनी रात गये अगर मुलाकात हो भी गयी, तो बात-चीत करने का मौका कहाँ। शराब के नशे में चूर होगा। आते ही आते सोने चला जायगा। मगर कम-से-कम मुझे देखकर इतना तो समझ जायगा कि वह वेचारे अभी तक खडे हैं। शायद दया श्रा जाय।
एक बजे के करीब बग्यो की आवाज पायी। राजा साहब मोटर से उतरकर खडे हा गये। जिम भो फिटिन से उतरा। नशे से आँखे सुर्ख थी। लड़खड़ाता हुआ चल रहा था। राजा को देखते ही बोला-श्रो, श्रो, तुम यहाँ क्यों खड़ा है? बाग जायो अभी जानो, वागो।
राजा-हुजूर मैं हूँ राजा विशालसिंह।
जिम-श्रो! डैम राजा, अबी निकल जायो। तुम भी वागी है। तुम बागी का सिफारिश करता है. वागी को पनाह देता है। सरकार का दोस्त बनता है! अबी निकल जायो। राजा और रैयत सब एक है। हम किसी पर भरोसा नहीं करता। हमको अपने जोर का भरोसा है। राजा का काम बागियों को पकड़वाना, उनका पता लगाना है। उनका सिफारिश करना नहीं। अबी निकल जायो।
यह कहकर वह राजा साहब की ओर झपटा। राजा साहब बहुत हो बलवान् मनुष्य थे। वह ऐसे-ऐसे दो को अकेले काफी थे; लेकिन परिणाम के भय ने उन्हे पगु बना दिया था। एक चूंसा भो लगाया और ५ करोड़ रुपये की जायदाद हाथ से निकली। वह चूसा बहुत मेहगा पड़ेगा। परिस्थिति भी उनके प्रतिकूल थीं। इतनी रात को उसके बंगले पर ग्राना इस बात का सबूत समझा जायगा कि उनकी नीयत अच्छी नहीं थी। दीन-माव से बोले-साहब, इतना जुल्म न कीजिए। इसका जरा भी खयाल न कीजिएगा कि मैं शाम से अब तक आपके दरवाजे पर खड़ा हूँ? कहिए तो आपके पैरों प:। जो कहिए करने को हाजिर हूँ। मेरो अर्ज कबूल कीजिए।
जिम-कबो नइ होगा, कवो नई होगा। तुम मतलब का आदमी है। हम तुम्हारी चालों को खूब समझता है।
राजा-इतना तो आप कर ही सकते हैं कि मै उनका इलाज करने के लिए अपना डाक्टर जेल के अन्दर भेज दिया करूं?
जिम--यो डैमिट! बक बक मत करो, सुअर अभी निकल जायो, नहीं तो हम ठोकर मारेगा।
अब राजा साहब से नन्त न हुआ। क्रोध ने नारी चिन्ताओं को, सारी कमजोरियों को निगल लिया। राज्य रहे या जाय, वला से! जिम ने ठोकर चलायी ही थी कि राजा साहब ने उसकी कमर पकटकर इतने जोर से पटका कि वह चारो खाने चित्त जमीन पर गिर पड़ा। फिर उठना चाहता था कि राजा साहब उसकी छाती पर चढ़ बैठे और उसका गला जोर से दबाया। कौड़ी-सी आँखें निकल आयीं। मुँह से फिचकुर बहने लगा। सारा नशा, सारा क्रोध, सारा रोब, सारा अभिमान, रफू-चक्कर हो गया।
राजा ने गला छोड़कर कहा—गला घोंट दूँगा, इस फेर में मत रहना। कच्चा ही चबा जाऊँगा। चपरासी या अहलकार नहीं हूँ कि तुम्हारी ठोकरें सह लूँगा।
जिम—राजा साहब, आप सचमुच नाराज हो गया। मैं तो आपसे दिल्लगी करता था। आप तो पहलवान है। आप दिल्लगी में बुरा मान गया।
राजा—बिलकुल नहीं। मैं दिल्लगी कर रहा हूँ। अब तो आप फिर मेरे साथ दिल्लगी न करेंगे?
जिम—कबी नईं, कबी नईं।
राजा—मैंने जो अर्ज की थी, वह आप मानेंगे या नहीं?
जिम—मानेंगे, मानेंगे, हम सुबह होते ही हुक्म देगा।
राजा—दगा तो न करोगे?
जिम—कबी नईं, कबी नईं। आप भी किसी से यह बात न कहना।
राजा—दगा की, तो इसी तरह फिर पटकूँगा, याद रखना। यह कहकर राजा साहब मिस्टर जिम को छोड़ कर उठ गये। जिम भी गर्द झाड़कर उठा और राजा साहब से बड़े तपाक के साथ हाथ मिलाकर उन्हें रुखसत किया। जरा भी शोर गुल न हुआ। जिम साहब के साईस के सिवा और किसी ने यह मल्लयुद्ध नहीं देखा था, और उसकी मारे डर के बोलने की हिम्मत न पड़ी।
राजा साहब दिल में सोचते जाते थे कि देखें वादा पूरा करता है या मुकर जाता है। कहीं कल कोई शरारत न करे। उँह, देखी जायगी। इस वक्त तो ऐसी पटकनी दी है कि बचा याद करते होंगे। यह सब वादे के तो सच्चे होते हैं। सुबह को दखूँगा। अगर हुक्म न दिया, तो फिर जाऊँगा। इतना डर तो उसे भी होगा कि मैंने दगा की, तो वह भी कलई खोल देगा। सज्जनता से तो नहीं, पर इस भय से जरूर वादा करेगा। मनोरमा अपने घर चली गयी होगी। तड़के ही जाकर उसे यह खबर सुनाऊँगा। खिल उठेगी। आह! उस वक्त उसकी छवि देखने ही योग्य होगी।
राजा साहब घर पहुँचे, तो डेढ़ बज गया था, पर अभी तक सोता न पड़ा था। नौकर-चाकर उनकी राह देख रहे थे। राजा साहब मोटर से उतरकर ज्योंही बरामदे में पहुँचे, तो देखा मनोरमा खड़ी है। राजा साहब ने विस्मित होकर पूछा—क्या तुम घर नहीं गयीं? तब से यहीं हो? रात तो बहुत बीत गयी।
मनोरमा—एक किताब पढ़ रही थी। क्या हुआ?
राजा—कमरे में चलो, बताता हूँ।
राजा साहब ने सारी कथा आदि से अन्त तक बड़े गर्व के साथ खूब नमक लगाकर बयान की। मनोरमा तन्मय होकर सुनती रही। ज्यों-ज्यों वह यह यह वृत्तान्त सुनती थी, उसका मन राजा साहब की ओर खिंचा जाता था। मेरे लिए उन्होंने इतना कष्ट, इतना अपमान सहा। जब वृत्तान्त समाप्त हुआ, तो वह प्रेम और भक्ति से गद्गद् होकर राजा साहब के पैरों पर गिर पड़ी और काँपती हुई आवाज से बोली—मैं आपका यह एहसान कभी न भूलूँगी।
आज ज्ञातरूप से उसके हृदय में प्रेम का अंकुर पहली बार जमा। वह एक उपासक की भाँति अपने उपास्य देव के लिए बाग में फूल तोड़ने आयी थी; पर बाग की शोभा देखकर उस पर मुग्ध हो गयी। फूल लेकर चली, तो बाग की सुरम्य छटा उसकी आँखों में समायी हुई थी। उसके रोम रोम से यही ध्वनि निकलती थी—आपका एहसान कभी न भूलूँगी। स्तुति के शब्द उसके मुँह तक आकर रह गये।
वह घर चली, तो चारो ओर अंधकार और सन्नाटा था; पर उसके हृदय में प्रकाश फैला हुआ था और प्रकाश में संगीत की मधुर ध्वनि प्रवाहित हो रही थी। एक क्षण के लिए वह चक्रधर की दशा भी भूल गयी, जैसे मिठाई हाथ में लेकर बालक अपने छिदे हुए कान की पीड़ा भूल जाता है।