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कायाकल्प अध्याय 21 / 53

विषय-सूची

  1. 1 अध्याय 1
  2. 2 अध्याय 2
  3. 3 अध्याय 3
  4. 4 अध्याय 4
  5. 5 अध्याय 5
  6. 6 अध्याय 6
  7. 7 अध्याय 7
  8. 8 अध्याय 8
  9. 9 अध्याय 9
  10. 10 अध्याय 11
  11. 11 अध्याय 12
  12. 12 अध्याय 13
  13. 13 अध्याय 14
  14. 14 अध्याय 15
  15. 15 अध्याय 16
  16. 16 अध्याय 17
  17. 17 अध्याय 18
  18. 18 अध्याय 20
  19. 19 अध्याय 22
  20. 20 अध्याय 23
  21. 21 अध्याय 24
  22. 22 अध्याय 26
  23. 23 अध्याय 27
  24. 24 अध्याय 28
  25. 25 अध्याय 29
  26. 26 अध्याय 30
  27. 27 अध्याय 31
  28. 28 अध्याय 32
  29. 29 अध्याय 33
  30. 30 अध्याय 34
  31. 31 अध्याय 35
  32. 32 अध्याय 36
  33. 33 अध्याय 37
  34. 34 अध्याय 38
  35. 35 अध्याय 39
  36. 36 अध्याय 40
  37. 37 अध्याय 41
  38. 38 अध्याय 42
  39. 39 अध्याय 43
  40. 40 अध्याय 44
  41. 41 अध्याय 45
  42. 42 अध्याय 46
  43. 43 अध्याय 47
  44. 44 अध्याय 48
  45. 45 अध्याय 49
  46. 46 अध्याय 50
  47. 47 अध्याय 51
  48. 48 अध्याय 52
  49. 49 अध्याय 53
  50. 50 अध्याय 54
  51. 51 अध्याय 55
  52. 52 अध्याय 56
  53. 53 अध्याय 57

कायाकल्प

अध्याय 24

रेलवे स्टेशन पर कहीं तिल रखने की जगह न थी। अन्दर का चबूतरा और बाहर का सहन सब आदमियों से खचाखच भरे थे। चबूतरे पर विद्यालयों के छात्र थे, रंग-बिरंग की वर्दियाँ पहने हुए, और सेवा समितियों के सेवक, रंग-बिरंग की झण्डियाँ लिये हुए। मनोरमा नगर की कई महिलाओं के साथ अञ्चल में फूल भरे सेवकों के बीच में खड़ी थी। उसका एक एक अंग आनंद से पुलकित हो रहा था। बरामदे में राजा विशालसिंह, उनके मुख्य कर्मचारी चौर शहर के रईस और नेता जमा थे। मुशी वज्रधर इधर उधर पैंतरे बदलते और लोगों को सावधान रहने की ताकीद करते-फिरते थे। कोई घबराहट की बात नहीं, कोई तमाशा नहीं, वह भी तुम्हारे ही जैसा दो हाय और दो पैर का आदमी है। आयेगा, अब देख लेना, धक्कमधक्का करने की जरूरत नहीं। दीवान हरिसेवकसिंह सशंक नेत्रों से सरकारी सिपाहियों को देख रहे थे और बार-बार राजा साहब के कान में कुछ कहते थे; अनिष्ट भय से उनके प्राण सूखे हुए थे। स्टेशन के वाहर हाथी, घोड़े, वग्घियाँ, मोटर पैर जमाये खड़ी थी। जगदीशपुर का बंड बड़े मनोहर स्वरों में विजय गान कर रहा था। बार-बार सहयो कठों से हर्प-ध्वनि निकलती थो, जिससे स्टेशन की दीवार हिल जाती थीं। थोड़ी देर क लिए लोग व्यक्तिगत चिन्तायो अोर कठिनाइयों को भूलकर राष्ट्रीयता के नशे में झूम रहे थे।

ठोक दस बजे गाड़ी दूर से धुवाँ उड़ाती हुई दिखाई दो। अब तक लोग अपनी जगह पर कायदे के साथ खड़े थे; लेकिन गाड़ी के पाते ही सारी व्यवस्था हवा हो गयी। 'पोछेवाले श्रागे या पहुंचे, आगेवाले पीछे पड़ गये, झण्डियाँ रक्षास्त्र का काम करने लगों और फूलो की टोकरियाँ ढालो का। मुशी वज्रधर बहुत चीखे चिल्लाये, लेकिन कौन सुनता है। हाँ, मनोरमा के सामने मैदान साफ था। दीवान साहब ने तुरन्त सैनिको को उसके सामने से भीड़ हटाते रहने के लिए बुला लिया था। गाड़ी पाकर रुकी और चक्रधर उतर पढे। मनोरमा भी अनुराग से उन्मत्त होकर चली; लेकिन तीन-चार पग चली थी कि एक बात ध्यान में पायी। ठिठक गयी और एक स्त्री की प्राड़ से चक्रघर को देखा, एक रक्त-हीन, मलीन-मुख, क्षीण-मूर्ति सिर झुकाये खड़ी थी, मानो जमीन पर पैर रखते डर रहो है कि कहीं गिर न पड़े। मनोरमा का हृदय मसोस उठा, आँखों से नाँसुओं की धारा बहने लगी, अञ्चल के फूल अञ्चल ही में रह गये। उधर चक्रघर पर फूलों की वर्षा हो रही थी, इधर मनोरमा की आँखो से मोतियों की। सेवा-समिति का मगल गान समाप्त हुया, तो राजा साहब ने आगे बढ़कर नगर के नेताओं की ओर से उनका स्वागत किया। सब लोग उनसे गले मिले और जुलूस सजाया जाने लगा। मुशी वज्रधर जुलूस के प्रबन्ध में इतने व्यस्त थे कि चक्रधर की उन्हे सुघि ही न थी। चक्रधर स्टेशन के बाहर पाये और यह तैयारियाँ देखीं, तो बोले -ग्राप लोग मेरा इतना सम्मान करके मुझे लजित कर रहे हैं। राष्ट्रीय सम्मान किसी महान् राष्ट्रीय उद्योग का पुरस्कार होना चाहिए। मैं इसके सर्वथा अयोग्य हूँ। मुझे सम्मानित करके आप लोग सम्मान का महत्व खो रहे हैं! मुझ जैसों के लिए इस धूम-धाम की नरूरत नहीं। मुझे तमाशा न बनाइये।

सयोग से मुशोजी वहाँ खड़े थे। ये बातें सुनी, तो बिगड़कर बोले--तमाशा नदी बनना था, तो दूसरों के लिए प्राण देने का क्यों तैयार हुए थे? लोग दस पाँच हजार खर्च करके जन्म भर के लिए राय बहादुर' और 'साँ बहादुर' हो जाते हैं। तुम दूसरों के लिए इतनो मुसीबतें झेलकर यह सम्मान पा रहे हो, तो इसमें मरने को क्या बात है, भला! देखता तो हूँ कि कोई एक छोटा-मोटा व्याख्यान दे देता है, तो पनो में देसता है कि मेरी तारीफ हो रही है या नहीं। अगर दुर्भाग्य से कही सम्पादक ने उसकी प्रशसा न को, तो जामे से बाहर हो जाता है, और तुम दम पाँच हाथी-घोड़े देखकर घरमा गये। श्रादमो को जत प्ररने हाय है। तुम्हीं अमनो इज्जत न करोगे, ता दूसरे क्या करने लगे। आदमी कोई काम करता है, तो सए के लिए या नाम लिए।

अगर दो में से एक भी हाथ न पाये, तो वह काम करना ही व्यर्थ है।

यह कहकर उन्होंने चक्रधर को छाती से लगा लिया। चक्रधर का रक्त हीन मुख लज्जा से आरक्त हो गया। यह सोचकर शरमाये कि ये लोग अपने मन में पिताजी को हँसी उड़ा रहे होंगे। और कुछ आपत्ति करने का साहस न हुआ। चुपके से राजा साहब की दुकड़ी पर आ बैठे। जुलूस चला। आगे-आगे पाँच हाथी थे, जिन पर नौबत बज रही थी। उनके पीछे कोतल घोड़ों की लम्बी कतार थी, जिन पर बैंड का दल था। बैंड के पीछे जगदीशपुर के सैनिक चार-चार की कतार में कदम मिलाये चल रहे थे। फिर क्रम से आर्य महिला-मंडल, खिलाफत, सेवा-समिति और स्काउटों के दल थे। उनके पीछे चक्रधर की जोड़ी थी, जिसमें राजा साहब मनोरमा के साथ बैठे हुए थे। इसके बाद तरह तरह की चौकियाँ थीं, जिनके द्वारा राजनैतिक समस्याओं का चित्रण किया गया था। फिर भाँति-भाँति की गायन मंडलियाँ थी, जिनमें कोई ढोल मजीरे पर राजनैतिक गीत गाती थीं, कोई डण्डे बजा-बजाकर राष्ट्रीय 'हर गंगा' सुना रही थीं, और दो चार सजन 'चने जोर गरम और चूरन अमलवेत' की वाणियों का पाठ कर रहे थे। सबके पीछे बग्घियों, मोटरों और बसों की कतारें थीं। अन्त में जनता का समूह था।

जलूस नदेसर, चेतगंज, दशाश्वमेध और चौक होता हुया दोपहर होते-होते कबीर चौरे पर पहुंचा। यहाँ मुंशीजी के मकान के सामने एक बहुत बड़ा शामियाना तना हुआ था। निश्चय हुआ था कि यहीं सभा हो और चक्रधर को अभिनन्दन पत्र दिया जाय। मनोरमा स्वयं पत्र पढ़कर सुनानेवाली थी, लेकिन जब लोग आ आकर पडाल में बैठे और मनोरमा अभिनन्दन पढ़ने को खड़ी हुई, तो उसके मुंह से एक शब्द न निकला। आज एक सप्ताह से उसने जी तोड़कर स्वागत की तैयारियाँ की थीं, दिन को दिन और रात को रात न समझा था, रियासत के कर्मचारी दौड़ते दौड़ते तंग आ गये थे। काशी-जैसे उत्साह-हीन नगर में ऐसे जुलूस का प्रबन्ध करना आसान काम न था। विशेष करके चौकियों और गायन मण्डलियों की आयोजना करने में उसे बहुत कष्ट उठाने पड़े थे और कई मण्डलियों को दूसरे शहरों से बुलाना पड़ा था! उसकी श्रमशीलता और उत्साह देख देखकर लोगों को आश्चर्य होता था, लेकिन जब वह शुभ-अवसर पाया कि वह अपनी दौड़-धूप का मनमाना पुरस्कार ले, तो उसकी वाणी धोखा दे गयी। फिटन में वह चक्रधर के सम्मुख बैठी थी। राजा साहब चक्रधर से जेल के सम्बन्ध में बातें करते रहे, पर मनोरमा वहाँ भी चुप ही रही। चक्रधर ने उसकी आशा के प्रतिकूल उससे कुछ न पूछा। यह अगर उसका तिरस्कार नहीं तो क्या था? हाँ, यह मेरा तिरस्कार है। यह समझते हैं, मैंने विलास के लिए विवाह किया है। इन्हे कैसे अपने मन की व्यथा समझाऊँ कि यह विवाह नहीं, प्रेम को बलि-वेदी है।

मनोरमा को असमंजस में देखकर राना साहब ऊपर आ खड़े हुए और उसे धीरे से कुरसी पर बिठाकर बोले––सज्जनों, रानीजी के भाषण में आपको जो रस मिलता, वह मेरी बातों में कहाँ! कोयल के स्थान पर कौआ खड़ा हो गया है, शहनाई को जगह नृसिंह ने ले ली है। आप लोगों को ज्ञात न होगा कि पूज्यवर बाबू चक्रधर रानी साहबा के गुरु रह चुके हैं, और वह उन्हें अब भी उसी भाव से देखती हैं। अपने गुरु का सम्मान करना शिष्य का धर्म है; किन्तु रानी साहबा का कोमल हृदय इस समय नाना प्रकार के आवेगों से इतना भरा हुआ है कि वाणी के लिए जगह ही नहीं रही। इसके लिए वह क्षम्य हैं। बाबू साहब ने जिस धैर्य और साहस से दोनों की रक्षा की, वह आप लोग जानते ही है। जेल में भी नापने निकिता से अपने कर्तव्य का पालन किया। आपका मन दया और प्रेम का सागर है। जिस अवस्था में और युवक धन की उपासना करते हैं, आपने धर्म और जाति प्रेम को उपासना है। मैं भी आपका पुराना भक्त हूँ।

एक सज्जन ने टोका––आप ही ने तो उन्हें सजा दिलायी थी?

राजा––हाँ, मैं इसे स्वीकार करता हूँ। राज्य के मद में कुछ दिनों के लिए मैं अपने को भूल गया था। कौन है, जो प्रभुता पाकर फूल न उठा हो। यह मानवीय स्वभाव है और आशा है आप लोग मुझे क्षमा करेंगे।

राजा साहब बोल ही रहे थे कि मनोरमा पण्डाल से निकल पायी और मोटर पर बैठकर राज्य भवन चली गयी। रास्ते भर वह रोती रही। उसका मन चक्रधर से एकान्त मैं बातें करने के लिए विकल हो रहा था। वह उन्हे समझाना चाहती थी कि मैं तिरस्कार योग्य नहीं, दया के योग्य हूँ। तुम मुझे विलासिनी समझ रहे हो, यह तुम्हारा अन्याय है। और किस प्रकार में तुम्हारी सेवा करती? मुझमे बुद्धि बल न था; धन बल न था, विद्या-बल न था, केवल रूप-चल था, और वह मैंने तुम्हें अर्पण कर दिया। फिर भी तुम मेरा तिरस्कार करते हो!

मनोरमा ने दिन तो किसी तरह काटा, पर शाम को वह अधीर हो गयी। तुरंत चक्रधर के मकान पर जा पहुँची। देखा, तो वह अकेले द्वार पर टहल रहे थे। शामियाना उखाड़ लिया गया था। कुरसियाँ, मेजें, दरिया, गमले, सब वापस किये जा चुके थे। मिलनेवालो का तांता टूट चुका था। मनोरमा को इस समय बड़ी लजा आयी। न-जाने यह अपने मन में पया समझ रहे होंगे। अगर छिपकर लौटना सम्भव होता, तो वह अवश्य लौट पड़ती। मुझे अभी न पाना चाहिए था। दो चार दिन में मुलाकात हो ही जाती। नाहक इतनी जल्दी की; पर अब पछताने से क्या होता था? चक्रधर ने उसे देख लिया योर समीप आकर प्रसन्न भाव से बोले––मै तो स्वयं आपकी सेवा में आनेवाला था। आपने व्यर्थ कट किया।

मनोरमा––मैने सोचा, चलकर देख लूँ यहाँ का सामान भेज दिया गया है या नहीं? आइये, सैर कर आयें। अकेले जाने का जी नहीं चाहता। आप बहुत दुबले हो रहे हैं। कोई शिकायत तो नहीं है न?

चक्रधर––नहीं, मैं बिलकुल अच्छा हूँ, कोई शिकायत नहीं है। जेल में कोई कष्ट न था, बल्कि सच पूछिए तो मुझे वहाँ बहुत आराम था। मुझे अपनी कोटरी से इतना प्रेम हो गया था कि उसे छोड़ते हुए दुःख होता था। आपकी तबीयत अब कैसी है?

पड़ता है, जिसके बगैर राजनीतिक सफलता हो ही नहीं सकती। मैं उस गलती में न पढ़ूँगा।

मनोरमा––आप बहाने बता कर मुझे टालना चाहते हैं, नहीं तो मोटर पर तो आदमी रोजाना एक सौ मील आ-जा सकता है। कोई मुश्किल बात नहीं।

चक्रधर––उड़न-खटोले पर बैठकर संगठन नहीं किया जा सकता। जरूरत है जनता में जागृति फैलाने की, उनमे उत्साह और आत्मबल का संचार करने की। चलती गाड़ी से यह उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो सकता।

मनोरमा––अच्छा, तो मै आपके साथ देहातों में घूमूँगी। इसमें तो आपको आपत्ति नहीं है?

चक्रधर––नहीं मनोरमा, तुम्हारा कोमल शरीर उन कठिनाइयों को न सह सकेगा। तुम्हारे हाथ में ईश्वर ने एक बड़ी रियासत की बागडोर दे दी है। तुम्हारे लिए इतना ही काफी है कि अपनी प्रजा को सुखी और सन्तुष्ट रखने की चेष्टा करो। यह छोटा काम नहीं है।

मनोरमा––मैं अकेली कुछ न कर सकेंगी। आपके इशारे पर सब कुछ कर सकती हूँ। आपसे अलग रहकर मेरे किये कुछ भी न होगा! कम-से-कम आप इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने कामों में मुझसे धन की सहायता लेते रहें। ज्यादा तो नहीं, पाँच हजार रुपए में प्रति मास आपकी भेंट कर सकती हूँ, आप जैसे चाहे उसका उपयोग करें। मेरे सन्तोष के लिए इतना ही काफी है कि वे आपके हाथों खर्च हों। मैं कीर्ति की भूखी नहीं। केवल आपकी सेवा करना चाहती हूँ। इससे मुझे वंचित न कीजिये। आप में न जाने वह कौन सी शक्ति है, जिसने मुझे वशीभूत कर लिया है। मैं न कुछ सोच सकती हूँ, न समझ सकती हूँ, केवल आपकी अनुगामिनी बन सकती हूँ।

यह कहते कहते मनोरमा को आँखें सजल हो गयीं। उसने मुँह फेरकर आँसू पोछ डाले और फिर बोली––पाप मुझे दिल में जो चाहें, समझे; मै इस समय आपसे सब कुछ कह दूंगी। मैं हृदय में आप हो की उपासना करती हूँ। मेरा मन क्या चाहता है, यह मैं स्वयं नहीं जानती; अगर कुछ-कुछ जानती भी हूँ तो कह नहीं सकती। हाँ, इतना कह सकती हूँ कि जब मैने देखा कि आपको परोपकार-कामनाएँ धन के बिना निष्फल हुई जाती है, जो कि आपके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है, तो मैंने उसी बाधा को हटाने के लिए यह बेड़ी अपने पैरों में डाली। मैं जो कुछ कह रही हूँ, इसका एक-एक अन्तर सत्य है। मैं यह नहीं कहती कि मुझे धन से घृणा है। नहीं, मैं दरिद्रता को संसार की विपत्तियों में सबसे दुःखदायी समझती हूँ। लेकिन मेरी सुख लालसा किसी भले घर में शान्त हो सकती थी। उसके लिए मुझे जगदीशपुर की रानी बनने की जरूरत न थी। मैंने केवल आपकी इच्छा के सामने सिर मुकाया है, और मेरे जीवन को सफल करना अब आपके हाथ है।

चक्रधर ये बातें सुनकर मर्माहत-से हो गये। उफ! यहाँ तक नौबत पहुँच गयी!

मैंने इसका सर्वनाश कर दिया! हा विधि! तेरी लीला कितनी विषम है! वह इसलिए उससे दूर भागे थे कि वह उसे अपने साथ दरिद्रता के काँटों में घसीटना न चाहते थे। उन्होंने समझा था, उनके हट जाने से मनोरमा उन्हें भूल जायगी और अपने इच्छानुकूल विवाह करके सुख से जीवन व्यतीत करेगी।

उन्हें क्या मालूम था कि उनके हट जाने का यह भीषण परिणाम होगा और वह राजा विशालसिंह के हाथों में जा पड़ेगी। उन्हें वह बात याद पायी, वो एक बार उन्होंने विनोद भाव से कही थी––तुम रानी होकर मुझे भूल जाओगी। उसका जो उत्तर मनोरमा ने दिया था, उसे याद करके चक्रधर एक बार काँप उठे। उन शब्दों में इतना दृढ़ सकल्प था! इसकी वह उस समय कल्पना भी न कर सकते थे। चक्रधर मन में बहुत ही क्षुब्ध हुए। उनके हृदय में एक साथ ही करुणा, भक्ति, विस्मय और शोक के भाव उत्पन्न हो गये। प्रबल उत्कण्ठा हुई कि इसी क्षण इसके चरणों पर सिर रख दें और रोयें। वह अपने को धिक्कारने लगे। मनोरमा को इस दशा में लाने का, उसके जीवन की अभिलाषाओं को नष्ट करने का भार उनके सिवा और किस पर था।

सहसा मनोरमा ने फिर कहा––आप मन में मेरा तिरस्कार तो नहीं कर रहे हैं?

चक्रधर लज्जित होकर बोले––नहीं मनोरमा, तुमने मेरे हित के लिए जो त्याग किया है, उसका दुनिया चाहे तिरस्कार करे, मेरी दृष्टि में तो वह आत्म-बलिदान से कम नहीं; लेकिन क्षमा करना, तुमने पात्र का विचार नहीं किया। तुमने कुत्ते के गले में मोतियों की माला डाल दी। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, अभी तुमने मेरा असली रूप नहीं देखा। देखकर शायद घृणा करने लगो! तुमने मेरा जीवन सफल करने के लिए अपने ऊपर जो अन्याय किया है, उसका अनुमान करके ही मेरा मस्तिष्क चक्कर खान लगता है। इससे तो यह कहीं अच्छा था कि मेरा जीवन नष्ट हो जाता, मेरे सारे मंसूबे धूल में मिल जाते। मुझ जैसे क्षुद्र प्राणी के लिए तुम्हें अपने ऊपर यह अत्याचार न करना चाहिए था। अब तो मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि मुझे अपने व्रत पर हद रहने की शक्ति प्रदान करें। वह अवसर कभी न आये कि तुम्हें अपने इस विश्वास और असाधारण त्याग पर पछताना पड़े। अगर वह अवसर आना तो मैं वह दिन देखने के लिए जीवित न रहँ। तुमसे भी मैं एक अनुरोध कर क्षमा चाहता हूँ। तुमने अपनी इच्छा से त्याग का जीवन स्वीकार किया है। ३० आदेश का सदैव पालन करना। राजा साहब के प्रति एक पल के लिए भी तुम्हारे मन में अश्रद्धा का भाव न पाने आये। अगर ऐसा हुआ, तो तुम्हारा यह निष्फल हो जायगा।

मनोरमा कुछ देर तक मौन रहने के बाद बोली––बाबूजी, तुम्हारा हृदय भी कठोर है।

चक्रधर ने विस्मित होकर मनोरमा की ओर देखा, मानो इसका आशय समझ में न आया हो।

नमाज की जगह देवताओं की दुर्गति। ख्वाजा साहब ने फतवा दिया-जो मुसलमान किसी हिन्दू औरत को निकाल ले जाय, उसे एक हजार हजों का सवाब होगा। यशोदानन्दन ने काशी के पण्डितों की व्यवस्था मँगवायी कि एक मुसलमान का वध एक लाख गौ-दानो से श्रेष्ठ है।

होली के दिन थे। गलियों में गुलाल के छींटे उड़ रहे थे। इतने जोश से कभी होली न मनायी गयी थी। वे नयी रोशनी के हिन्दू भक्त, जो रग को भूखा मेङिया समझते थे या पागल गीदड़, आज जीते-जागते इन्द्र-धनुष बने हुए थे। सयोग से एक मियाँ साहब मुर्गी हाथ में लटकाये कहीं से चले जा रहे थे। उनके कपड़े पर दो चार छीटे पड़ गये। बस, गजब ही तो हो गया, आफत ही तो आ गयो। सीधे जामे मसजिद पहुँचे और मीनार पर चढकर बाँग दी-'ऐ उम्मते रसूल! आज एक काफिर के हाथों मेरे दीन का खून हुया है। उसके छीटे मेरे कपड़ों पर पड़े हुए हैं। या तो काफिरों से इस खून का बदला लो. या मैं मीनार से गिरकर नबी की खिदमत में फरियाद सुनाने जाऊँ। बोलो, क्या मजूर है? शाम तक मुझे इसका जवाब न मिला, तो तुम्हें मेरी लाश मसजिद के नीचे नजर आयेगी।'

मुसलमानों ने जब ललकार सुनी और उनकी त्योरियाँ बदल गयीं। दीन का जोश सिर पर सवार हो गया। शाम होते-होते दस हजार आदमी सिरों से कफन लपेटे, तल वारै लिये, जामे मसजिद के सामने आकर दीन के खून का बदला लेने के लिए जमा हो गये।

सारे शहर में तहलका मच गया। हिन्दुओं के होश उड़ गये। होली का नशा हिरन हो गया। पिचकारियाँ छोड़ छोड़ लोगों ने लाठियाँ सॅमाली, लेकिन यहाँ कोई जामे मसजिद न थी, न वह ललकार, न वह दीन का जोश। सबको अपनी-अपनी पड़ी हुई थी।

बाबू यशोदानन्दन कभी इस अफसर के पास जाते, कभी उस अफसर के। लखनऊ तार भेजे, दिल्ली तार भेजे, मुसलिम नेताओं के नाम तार भेजे, लेकिन कोई फल न निकला। इतनी जल्द कोई इन्तजाम न हो सकता था। अगर वह यही समय हिन्दुओं को सगठित करने में लगाते, तो शायद बराबर का जोड़ हो जाता, लेकिन वह हुक्काम पर आशा लगाये बैठे रहे। और अन्त में जब वह निराश होकर उठे, तो मुसलिम वीर धावा बोल चुके थे। वे 'अली! अली।' का शोर मचाते चले जाते थे कि बाबू साहब सामने नजर आ गये। फिर क्या था। सैकड़ों आदमी, 'मारो!' कहते हुए लपके। बाबू साहब ने पिस्तौल निकाली और शत्रुओं के सामने खड़े हो गये। सवाल जवाब कौन करता। उन पर चारों तरफ से वार होने लगे।

पिस्तौल चलाने की नौबत भी न आयी, यही सोचते खड़े रह गये कि समझाने से ये लोग शान्त हो जायँ, तो क्यों किसी की जान लूँ। अहिंसा के आदर्श ने हिंसा का हथियार हाथ में होने पर भी उनका दामन न छोड़ा।

यह आहुति पाकर अग्नि और भी भड़की। खून का मजा पाकर लोगों का जोश हो गया। अब फतह का दरवाजा खुला हुआ था। हिन्दू मुहल्लों में द्वार बन्द हो। बेचारे कोठरियों में बैठे जान की खैर मना रहे थे, देवताओं से विनती कर रहे कि यह संकट हरो। रास्ते में जो हिन्दू-मिला वह पिटा, घर लुटने लगे। 'हाय-हाय' का शोर मच गया। दीन के नाम पर ऐसे ऐसे कर्म होने लगे, जिन पर पशुओं को भी लज्जा आती, पिशाचों के भी रोयें खड़े हो जाते।

लेकिन बाबू यशोदानन्दन के मरने की खबर पाते ही सेवादल के युवकों का खून खौल उठा। आसन पर चोट-पहुँचते ही अड़ियल टट्टू और गरियाल बैल भी सॅभल जाते हैं। घोड़ा कनौतियाँ खड़ी करता है, बैल उठ बैठता है। यशोदानन्दन का खून हिन्दुओं के लिए आसन की चोट थी। सेवा-दल के दो सौ युवक तलवार लेकर निकल पड़े और मुसलमान मुहल्लों में घुसे। दो-चार पिस्तौल और बन्दूकें भी खोज निकाली गयीं। हिन्दू मुहल्लों में जो कुछ मुसलमान कर रहे थे, मुसलमान मुहल्लो में वही हिन्दू करने लगे। अहिंसा ने हिंसा के आगे सिर झुका दिया। वे ही सेवा-व्रतधारी युवक, जो दीनों पर जान देते थे, अनाथों को गले लगाते थे और रोगियों की सुश्रुषा करते थे, इस समय निर्दयता के पुतले बने हुए थे। पाशविक वृत्तियों ने कोमल वृत्तियों का संहार कर दिया था। उन्हें न तो दीनों पर दया आती थी, न अनाथों पर। हँस हँसकर भाले और छुरे चलाते थे, मानों लड़के गुड़ियाँ पीट रहे हों। उचित तो यह था कि दोनों दलों के योद्धा आमने-सामने खड़े हो जाते और खूब दिल के अरमान निकालते; लेकिन कायरों की वीरता और वीरो की वीरता में बड़ा अन्तर है।

सहसा खबर उड़ी कि यशोदानन्दन के घर में आग लगा दी गयी है और दूसरे घरों में भी भाग लगायी जा रही है। सेवादल वालों के कान खड़े हुए। यहाँ उनकी पैशाचिकता ने भी हार मान ली। तय हो गया कि अब या तो वे ही रहेंगे, या हमी रहेंगे। दोनो अब इस शहर में नहीं रह सकते। अब निपट ही लेना चाहिए, जिसमें हमेशा के लिए बाधा दूर हो जाय। दो-ढाई हजार आदमियों का दल डबल मार्च करता हुआ उस स्थान को चला, जहाँ यह बढ़वानल दहक रहा था। मिनटों की राह पलों में कटी। रास्ते में सन्नाटा था। दूर ही से ज्वाला-शिखर आसमान से बातें करते दिखायी दिया। चाल और भी तेज की और एक क्षण में लोग अग्नि-कुण्ड के सामने जा पहुँचे। देखा, तो वहाँ किसी मुसलमान का पता नहीं आग लगी है। लेकिन बाहर की ओर। अन्दर जाकर देखा तो घर खाली पड़ा हुआ था। बागेश्वरी एक कोठरी में द्वार बन्द किये बैठी थी। इन्हे देखते हो वह रोती हुई बाहर निकल आयी और बोली––दाय मेरी अहल्या! अरे दौड़ो, उसे ढूँढों, पापियों ने न-जाने उसकी क्या दुर्गति को। हाय! मेरी बची!

एक युवक ने पूछा––क्या अहल्या को उठा ले गये?

बागेश्वरी––हाँ भैया! उठा ले गये। मना कर रही थी कि एरी बाहर मत निकल; अगर मरेंगे तो साथ ही मरेंगे, लेकिन न मानी। ज्याही दुष्टों ने घर में कदम रखा, बाहर निकलकर उन्हें समझाने लगी। हाय! उसकी बातों को न भूलूँगी।आप तो गये ही थे, उसका भी सर्वनाश किया। नित्य समझाती रही, इन झगड़ों में न पड़ो। न मुसलमानों के लिए दुनिया में कोई दूमरा ठोर-ठिकाना है, न हिन्दुओं के लिए। दोनों इसी देश में रहेंगे और इसी देश में मरेंगे। फिर आपस में क्यों लड़े मरते हो, क्यों एक दूसरे को निगल जाने पर तुले हुए हो? न तुम्हारे निगले वे निगले जायेंगे, न उनके निगले तुम निगले जानोगे, मिल-जुलकर रहो, उन्हें बड़े होकर रहने दो, तुम छोटे ही होकर रहो, मगर मेरी कौन सुनता है। स्त्रियाँ तो पागल हो जाती है, यों ही भूँका करती हैं। मान गये होते, तो आज क्यों यह उपद्रव होता। आप जान से गये, बच्ची भी हर ली गयी, और न जाने क्या होना है। जलने दो घर, घर लेकर क्या करना है, तुम जाकर मेरी बच्ची को तलाश करो। जाकर ख्वाजा महमूद से कहो, उनका पता लगायें। हाय! एक दिन वह था कि दोनों आदमियों में दाँत कटी रोटी थी। ख्वाजा साहब उनके साथ प्रयाग गये थे और अहल्या को उन्होंने पाया था। आज यह हाल है! कहना, तुम्हें लाज नहीं आती? जिस लड़की को बेटी बनाकर मेरी गोद में सौंपा था, जिसके विवाह में पाँच हजार खर्च करनेवाले थे, उसकी उन्हीं के पिछल गुओं के हाथों यह दुर्गति। हमसे अब उनकी क्या दुश्मनी। उनका दुश्मन तो परलोक सिधारा! हाय भगवान। बहुत से आदमी मत जाओ। चार आदमी काफी हैं। उनकी लाश भी ढूँ ढों। कही आस ही पास होगी। घर से निकलते ही तो दुष्टों से उनका सामना हो गया था।

बागेश्वरी तो यह विलाप कर रही थी, बाहर अग्नि को शान्त करने का यत्न किया जा रहा था, लेकिन पानी के छींटे उस पर तेल का काम करते थे। बारे फायर-इञ्जिन समय पर आ पहुंचा और अग्नि का वेग कम हुआ। फिर भी लपटें किसी साँप की तरह जरा देर के लिए छिपकर फिर किसी दूसरी जगह ना पहुँचती थीं। सन्ध्या समय जाकर आग बुझी।

उघर लोग ख्वाजा साहब के पास पहुंचे, तो क्या देखते हैं कि मुंशी यशोदानन्दन की लाश रखी हुई है और ख्वाजा साहब बैठे रो रहे हैं। इन लोगों को देखते ही बोले—तुम समझते होगे, यह मेरा दुश्मन था। खुदा जानता है, मुझे अपना भाई और वेटा भी इससे ज्यादा अजीन नहीं। अगर मुझ पर किसी कातिल का हाथ उठता तो यशोदा उस वार को अपनी गर्दन पर रोक लेता। शायद मैं भी उसे खतरे में देखकर अपनी जान की परवा न करता। फिर भी हम दोनों की जिन्दगी के आखिरी साल मैदानबाजी में गुजरे और आज उसका यह अजाम हुआ। खुदा गवाह है, मैंने हमेशा इत्तहाद की कोशिश की। अब भी मेरा यह ईमान है कि इत्तहाद ही से इस बदनसीब कौम की नजात होगी। यशोदा भी इत्तहाद का उतना ही हामी था, जितना मैं। शायद मुझसे भी ज्यादा, लेकिन खुदा जाने वह कौन सी ताकत थी, जो हम दोनों को बरसरेजग रखती थी। हम दोनों दिल से मेल करना चाहते थे; पर हमारी मरजी के खिलाफ कोई गैबी ताकत हमको लङती रहती थी। आप लोग नहीं जानते हो, मेरी इससे कितनी गहरी दोस्ती थी। हम दोनों एक ही मकतब में पढे, एक ही स्कूल में तालीम पायी, एक ही मैदान में खेले। यह मेरे घर पर आता था, मेरी अम्माँजान इसको मुझसे ज्यादा चाहती थी, इसकी अम्माँजान मुझे इससे ज्यादा। उस जमाने की तसवीर आज आँखों के सामने फिर रही है। कौन जानता था, उस दोस्ती का यह अजाम होगा। यह मेरा प्यारा यशोदा है, जिसकी गरदन में वाहें डालकर मै बागों की सैर किया करता था। हमारी सारी दुश्मनो पसे-पुश्त होती थी। रूबरू मारे शर्म के हमारी आँखें ही न उठती थीं। आह! काश मालूम हो जाता कि किस बेरहम ने मुझ पर यह कातिल वार किया! खुदा जानता है, इन कमजोर हाथों से उसकी गर्दन मरोड़ देता।

एक युवक-हम लोग लाश को क्रिया-कर्म के लिए ले जाना चाहते हैं।

ख्वाजा-ले जाओ भई, ले जाओ; मै भो साथ चलूँगा। मेरे कन्धा देने में कोई हरज है! इतनी रियायत तो मेरे साथ करनी ही पड़ेगी। मैं पहले मरता, तो यशोदा सिर पर खाक उड़ाता हुआ मेरी मजार तक जरूर जाता।

युवक-अहल्या को भी लोग उठा ले गये। माताजी ने आपसे ..

ख्वाजा--क्या अहल्या। मेरी अहल्या को! कब?

युवक-आज ही। घर में आग लगाने से पहले।

ख्वाजा-कलामे मजीद की कसम, जब तक अहल्या का पता न लूँगा, मुझे -दाना पानी हराम है। तुम लोग लाश ले जायो, मै अभी आता हूँ। सारे शहर को खाक छान डालूँगा, एक एक घर में जाकर देखूँगा; अगर किसी वेदीन बदमाश ने मार नहीं डाला है, तो जरूर खोज निकालूँगा। हाय मेरी बच्ची! उसे मैने मेले में पाया था। खड़ी रो रही थी! कैसी भोली-भोली, प्यारी-प्यारी बच्ची यो! मैंने उसे छाती से लगा लिया था और लाकर भाभी की गोद में डाल दिया था। कितनी वातमीज, वाशकर, हसीन लड़की थी। तुम लोग लाश को ले जाओ, मैं शहर का चक्कर लगाता हुआ जमुना किनारे आऊंँगा। भाभी से मेरी तरफ से अर्ज कर देना मुझमे मलाल न रखें। यशोदा नहीं हैं, लेकिन महमूद है। जब तक उसके दम में दम है, उन्हें कोई तकलीफ न होगी। कह देना, महमूद या तो अहल्या को खोज निकालेगा, या मुँह में कालिख लगाकर ढूब मरेगा।

यह कहकर ख्वाजा साहब उठ खड़े हुए, लकड़ी उठायी और बाहर निकल गये।