कायाकल्प
अध्याय 20
मिस्टर जिम ने दूसरे दिन हुक्म दिया कि चक्रधर को जेल से निकालकर शहर के बड़े अस्पताल में रखा जाय। वह उन जिद्दी आदमियों में न थे, जो मार खाकर भी बेहयाई करते हैं। सवेरे परवाना पहुँचा। राजा साहब भी तड़के ही उठकर जेल पहुँचे। मनोरमा वहाँ पहले ही से मौजूद थी; लेकिन चक्रधर ने साफ कह दिया—मैं यहीं रहना चाहता हूँ। मुझे और कहीं भेजने की जरूरत नहीं।
दारोगा—आप कुछ सिड़ी तो नहीं हो गये हैं? कितनी कोशिश से तो राजा साहब ने यह हुक्म दिलाया, और आप सुनते ही नहीं? क्यों जान देने पर तुले हो? यहाँ इलाज-विलाज खाक न होगा।
चक्रधर—कई आदमियों को मुझसे भी ज्यादा चोट आयी है। मेरा मरना-जीना उन्हीं के साथ होगा। उनके लिए ईश्वर है, तो मेरे लिए भी ईश्वर है।
दारोगा ने बहुत समझाया, राजा साहब ने भी समझाया, मनोरमा ने रो-रोकर मिन्नतें कीं; लेकिन चक्रधर किसी तरह राजी न हुए। तहसीलदार साहब को अन्दर आने की आज्ञा न मिली; लेकिन शायद उनके समझाने का भी कुछ असर न होता। दोपहर तक सिरमगजन करने के बाद लोग निराश होकर लौटे।
मुंशीजी ने कहा—दिल नहीं मानता, पर जी यही चाहता है कि इस लौंडे का मुँह न देखूँ!
राजा—इसने बात ही क्या थी। मेरी सारी दौड़-धूप मिट्टी में मिल गयी।
मनोरमा कुछ न बोली। चक्रधर जो कुछ कहते या करते थे, उसे उचित जान पड़ता था। भक्त को आलोचना से प्रेम नहीं। चक्रधर का यह विशाल त्याग उसके हृदय में खटकता था; पर उसकी आत्मा को मुग्ध कर रहा था। उसकी आँखें गर्व से मतवाली हो रही थीं।
मिस्टर जिम को यह खबर मिली, तो तिलमिला उठे, मानो किसी रईस ने एक भिखारी को पैसे जमीन पर फेंककर अपनी राह ली हो। कीर्ति का इच्छुक जब दान करता है, तो चाहता है कि नाम हो, यश मिले। दान का अपमान उससे नहीं सहा जाता। जिम ने समझा था कि चक्रधर की आत्मा का मैंने दमन कर दिया। अब उसे मालूम हुआ कि मैं धोखे में था। वह आत्मा अभी तक मस्तक उठाये उसकी ओर ताक रही थी। जिम ने मन में ठान लिया था कि मै उसे कुचलकर छोड़ूँगा।
चक्रधर दो महीने अस्पताल में पड़े रहे। दवा दर्पन तो जैसी हुई, वही जानते होंगे, लेकिन जनता की दुआओं में जरूर असर था। हजारों आदमी नित्य उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते थे और मनोरमा को तो दान, व्रत और तप के सिवा और कोई काम न था। जिन बातों को वह पहले ढकोसला समझती थी, उन्हीं बातों में अब उसकी आत्मा को शान्ति मिलती थी। पहली बार उसे प्रार्थना शक्ति का विश्वास हुआ। कमजोरी ही में हम लकड़ी का सहारा लेते हैं।
चक्रधर तो अस्पताल में पड़े थे, इधर उन पर नया अभियोग चलाने की तैयारियाँ हो रही थीं। ज्योंही वह चलने-फिरने लगे, उन पर मुकद्दमा चलने लगा। जेल के भीतर ही इजलास होने लगा। ठाकुर गुरुसेवकसिंह आजकल डिप्टी मैजिस्ट्रट थे। उन्हीं को यह मुकद्दमा सिपुर्द किया गया।
हमारे ठाकुर साहब बड़े जोशीले आदमी थे। यह जितने जोश से किसानों का संगठन करते थे, अब उतने ही जोश से कैदियों को सजाएँ भी देते थे। पहले उन्होंने निश्चय किया था कि सेवा-कार्य में ही अपना जीवन बिता दूँगा, लेकिन चक्रधर की दशा देखकर आँखें खुल गयीं। समझ गये कि इन परिस्थितियों में सेवा कार्य टेढ़ी खीर है। जीवन का उद्देश्य यही तो नहीं है कि हमेशा एक पैर जेल में रहे, हमेशा प्राण सूली पर रहे, खुफिया पुलिस हमेशा ताक में बैठी रहे, भगवद्गीता का पाठ करना मुश्किल हो जाय। यह तो न स्वार्थ है, न परमार्थ, केवल आग में कूदना है, तलवार पर गरदन रखना है। सेवा कार्य को दूर से सलाम किया और सरकार के सेवक बन बैठे। खानदान अच्छा था ही, सिफारिश भी काफी थी, जगह मिलने में कोई कठिनाई न हुई। अब वह बड़े ठाट से रहते थे। रहन-सहन भी बदल डाला, खान-पान भी बदल डाला। उस समाज में घुल-मिल गये, जिसकी वाणी में, वेश में, व्यवहार में पराधीनता का चोखा रङ्ग चढ़ा होता है। उन्हें लोग अब 'साहब' कहते हैं। 'साहब' हैं भी पूरे 'साहब', बल्कि 'साहबों' से भी दो अंगुल ऊँचे। किसी को छोड़ना तो जानते ही नहीं। कानून की मंशा चाहे कुछ हो, कड़ी-से-कड़ी सजा देना उनका काम है। उनका नाम सुनकर बदमाशों की नानी मर जाती है। विधाताओं को उन पर जितना विश्वास है, उतना और किसी हाकिम पर नहीं है, इसी लिए यह मुकदमा उनके इजलास में भेजा गया है।
ठाकुर साहब सरकारी काम में जरा भी रू-रियायत न करते थे; लेकिन यह मुकदमा पाकर वह धर्म-संकट में पड़ गये। धन्नासिंह और अन्य अपराधियों के विषय में तो कोई चिन्ता न थी, उनकी मीआद बढ़ा सकते थे, काल-कोठरी में डाल सकते थे, सेशन-सिपुर्द कर सकते थे; पर चक्रधर को क्या करें। अगर सजा देते हैं, तो जनता में मुँह दिखाने लायक नहीं रहते। मनोरमा तो शायद उनका मुँह भी न देखे। छोड़ते हैं, तो अपने समाज में तिरस्कार होता है, क्योंकि वहाँ सभी चक्रधर से खार खाये बैठे थे। ठाकुर साहब के कानों में किसी ने यह बात भी डाल दी थी कि इसी मुकदमे पर तुम्हारे भविष्य का बहुत कुछ दार-मदार है।
मुकदमे को पेश हुए आज तीसरा दिन था। गुरुसेवक बरामदे में बैठे सावन की रिम-झिम वर्षा का आनन्द उठा रहे थे। आकाश में मेघों की घुड़दौड़-सी हो रही थी। घुड़दौड़ नहीं, संग्राम था। एक दल आगे वेग से भागा चला जाता था और उसके पीछे विजेताओं का काला दल तोपें दागता, भाले चमकाता, गम्भीर भाव से बढ़ रहा था, मानो भगोड़ों का पीछा करना अपनी शान के खिलाफ समझता हो।
सहसा मनोरमा मोटर से उतरकर उनके समीप ही कुरसी पर बैठ गयी!
गुरुसेवक ने पूछा—कहाँ से आ रही हो?
मनोरमा—घर ही से आ रही हूँ। जेलवाले मुकदमे में क्या हो रहा है?
गुरुसेवक—अभी तो कुछ नहीं हुआ। गवाहों के बयान हो रहे हैं।
मनोरमा—बाबूजी पर जुर्म साबित हो गया?
गुरुसेवक—हो भी गया और नहीं भी हुआ।
मनोरमा—मैं नहीं समझी।
गुरुसेवक—इसका मतलब यह है कि जुर्म का साबित होना या न होना दोनों बराबर है, और मुझे मुलजिमों को सजा करनी पड़ेगी। अगर बरी कर दें, तो सरकार अपील करके उन्हें फिर सजा दिला देगी। हाँ, मैं बदनाम हो जाऊँगा। मेरे लिए यह आत्म-बलिदान का प्रश्न है। सारी देवता-मण्डली मुझ पर कुपित हो जायगी।
मनोरमा—तुम्हारी आत्मा क्या कहती है?
गुरुसेवक—मेरी आत्मा क्या कहेगी? मौन है।
मनोरमा—मैं यह न मानूँगी। आत्मा कुछ न कुछ जरूर कहती है, अगर उससे पूछा जाय। कोई माने या न माने, यह उसका अख्तियार है। तुम्हारी आत्मा भी अवश्य तुम्हें सलाह दे रही होगी और उसकी सलाह मानना तुम्हारा धर्म है। बाबूजी के लिए सजा का दो-एक साल बढ़ जाना कोई बात नहीं, वह निरपराध हैं और यह विश्वास उन्हें तस्कीन देने को काफी है; लेकिन तुम कहीं के न रहोगे। तुम्हारे देवता तुमसे भले ही सन्तुष्ट हो जायँ, पर तुम्हारी आत्मा का सर्वनाश हो जायगा।
गुरुसेवक—चक्रधर बिलकुल बेकसूर तो नहीं हैं। पहले पहल जेल के दारोगा पर वही गर्म पड़े थे। वह उस वक्त जब्त कर जाते, तो यह फिसाद न खड़ा होता। यह अपराध उनके सिर से कैसे दूर होगा?
मनोरमा––आपके कहने का यह मतलब है कि वह गालियाँ खाकर चुप रह जाते? क्यों?
गुरुसेवक––जब उन्हें मालूम था कि मेरे बिगड़ने से उपद्रव की सम्भावना है, तो मेरे खयाल में उन्हें चुप ही रह जाना चाहिए था।
मनोरमा––और मैं कहती हूँ कि उन्होंने जो कुछ किया, वही उनका धर्म था। आत्मसम्मान की रक्षा हमारा सबसे पहला धर्म है। आत्मा की हत्या करके अगर स्वर्ग भी मिले, तो वह नरक है। आपको अपने फैसले में साफ-साफ लिखना चाहिए कि बाबूजी बेकसूर हैं। आपको सिफारिश करनी चाहिए कि एक महान् संकट में, अपने प्राणों को हथेली पर लेकर, जेल के कर्मचारियों की जान बचाने के बदले में उनकी मीआद घटा दी जाय सरकार अपील करे, इससे आपको कोई प्रयोजन नहीं। आपका कर्तव्य वही है, जो मैं कह रही हूँ।
गुरुसेवक ने अपनी नीचता को मुसकराहट से छिपाकर कहा––आग में कूद पड़ूँ?
मनोरमा––धर्म की रक्षा के लिए आग में कूद पड़ना कोई नयी बात नहीं है। आखिर आपको किस बात का डर है? यही न, कि आपसे आपके अफसर नाराज हो जायँगे। आप शायद डरते हों कि कहीं आप अलग न कर दिये जाय। इसकी जरा भी चिन्ता न कीजिए। मैं आशा करती हूँ मुझे विश्वास है कि आपका नुकसान न होने पायेगा।
गुरुसेवक अपनी स्वार्थपरता पर झेंपते हुए बोले––नौकरी की मुझे परवा नहीं है, मनोरमा! मैं इन लोगों के कमीनेपन से डरता हूँ। इनको फौरन खयाल होगा कि मैं भी उसी टुकड़ी में मिला हुआ हूँ, और आश्चर्य नहीं कि मैं भी किसी जुर्म में फाँस दिया जाऊँ। मुझे इनके साथ मिलने-जुलने से इनकी नीचता का कई बार अनुभव हो चुका है। इनमें उदारता और सज्जनता नाम को भी नहीं होती। बस, अपने मतलब के यार हैं। इनका धर्म, इनकी राजनीति, इनका न्याय, इनकी सभ्यता केवल एक शब्द में आ जाती है, और वह शब्द है-'स्वार्थ'। मैं सब कुछ सह सकता हूँ, जेल के कष्ट नहीं सह सकता। जानता हूँ, यह मेरी कमजोरी है, पर क्या करूँ? मुझमें तो इतना साहस नहीं।
मनोरमा––भैयाजी, आपकी यह सारी शंकाएँ निर्मल हैं। मैं आपका जरा भी नुकसान न होने दूंगी। गवाहों के बयान हो गये कि नहीं? गुरुसेवक हाँ, हो गये। अब तो केवल फैसला सुनाना है।
मनोरमा––तो लिखिए, लाऊँ कलम-दावात?
गुरुसेवक––लिख लूँगा, जल्दी क्या है?
मनोरमा––मैं बिना लिखवाये यहाँ से जाऊँगी ही नहीं। यही इरादा करके आज आयी हूँ।
गुरुसेवक––जरा घर में जाकर लोगों से मिल आओ। शिकायत करती थी कि बीबी अभी से हमें भूल गयीं।
मनोरमा––टालमटोल न कीजिए। मैं सब सामान यहीं लाये देती हूँ। आपको इसी वक्त लिखना पड़ेगा।
गुरुसेवक––तो तुम कब तक बैठी रहोगी? फैसला लिखना कोई मुंह का कौर थोड़े ही है।
मनोरमा––आधी रात तक खत्म हो जायगा? आज न होगा, कल होगा। मैं फैसला पढ़कर ही यहाँ से जाऊँगी। तुम दिल से चक्रधर को निर्दोष मानते हो, केवल स्वार्थ और भय तुम्हें दुविधा में डाले हुए हैं। मैं देखना चाहती हूँ कि तुम कहाँ तक सत्य का निर्वाह करते हो।
सहसा दूसरी मोटर आ पहुँची। इस पर राजा साहब बैठे हुए थे? गुरुसेवक बड़े तपाक से उन्हें लेने दौड़े। राजा ने उनकी ओर विशेष ध्यान न दिया। मनोरमा के पास आकर बोले––तुम्हारे घर से चला आ रहा हूँ। वहाँ पूछा तो मालूम हुआ––कहीं गयी हो; पर यह किसी को न मालूम था कि कहाँ। वहाँ से पार्क गया, पार्क से चौक पहुँचा, सारे जमाने की खाक छानता हुआ यहाँ पहुँचा हूँ। मैं कितनी बार कह चुका हूँ कि घर से चला करो, तो जरा बतला दिया करो।
मनोरमा––मैने समझा था, आपके पाने के वक्त तक लौट आऊँगी।
राजा––खैर, अभी कुछ ऐसी देर नहीं हुई। कहिए, डिप्टी साहब, मिजाज तो अच्छे हैं? कभी कभी भूलकर हमारी तरफ भी आ जाया कीजिए। (मनोरमा से) चलो, नहीं तो शायद जोर से पानी आ जाय।
मनोरमा––मैं तो आज न जाऊँगी।
राजा––नहीं नहीं, ऐसा न हो। वे लोग हमारी राह देख रहे होंगे।
मनोरमा––मेरा तो जाने को जी नहीं चाहता।
राजा––तुम्हारे बगैर सारा मजा किरकिरा हो जायगा, और मुझे बहुत लज्जित होना पड़ेगा। मैं तुम्हें जबरदस्ती ले जाऊँगा।
यह कहकर राजा साहब ने मनोरमा का हाथ आहिस्ता से पकड़ लिया और उसे मोटर की तरफ खींचा। मनोरमा ने एक झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया और त्योरियाँ बदलकर बोली––एक बार कह दिया कि मैं न जाऊँगी।
राजा––आखिर क्यों?
मनोरमा––अपनी इच्छा!
गुरुसेवक––हुजूर, यह मुझसे जबरदस्ती जेलवाले मुकदमे का फैसला लिखाने बैठी हुई है। कहती हैं––बिना लिखवाये न जाऊँगी।
गुरूसेवक ने तो यह बात दिल्लगी से कही थी, पर समायोचित बात उनके मुंह से कम निकलती थी। मनोरमा का मुँह लाल हो गया। समझी कि यह मुझे राजा साहब के सम्मुख गिराना चाहते हैं। तनकर बोली––हाँ, इसी लिए बैठी हूँ, तो फिर? आपको यह कहते हुए शर्म आनी चाहिए थी। एक निरपराध आदमी को आपके हाथों स्वार्थमय अन्याय से बचाने के लिए मेरी निगरानी की जरूरत है। क्या यह आपके लिए शर्म की बात नहीं है? अगर मैं समझती कि आप निष्पक्ष होकर फैसला करेंगे, तो मेरे बैठने की क्यों जरूरत होती। आप मेरे भाई हैं, इसलिए मैं आपसे सत्याग्रह कर रही हूँ। आपकी जगह कोई दूसरा आदमी बाबूजी पर जान-बूझकर ऐसा घोर अन्याय करता, तो शायद मेरा वश चलता तो उसके हाथ कटवा लेती। चक्रधर की मेरे दिल में जितनी इज्जत है, उसका आप लोग अनुमान नहीं कर सकते।
एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। गुरुसेवक का मुँह नन्हा सा हो गया, और राजा साहब तो मानो रो दिये। आखिर चुपचाप अपनी मोटर की ओर चले। जब वह मोटर पर बैठ गये, तो मनोरमा भी धीरे से उनके पास आयी और स्नेह सिंचित नेत्रों से देखकर बोली––मैं कल आपके साथ अवश्य चलूँगी।
राजा ने सड़क की ओर ताकते हुए कहा––जैसी तुम्हारी खुशी।
मनोरमा––अगर इस मामले में सच्चा फैसला करने के लिए भैयाजी पर हाकिम की अकृपा हुई, तो आपको भैयाजी के लिए कुछ फिक्र करनी पड़ेगी।
राजा––देखी जायगी।
मनोरमा तनकर बोली––क्या कहा?
राजा––कुछ तो नहीं।
मनोरमा––भैयाजी को रियासत में जगह देनी होगी।
राजा––तो दे देना, मैं रोकता कब हूँ?
मनोरमा––कल चार बजे आने की कृपा कीजिएगा। मुझे आपके साथ आज न चलने का बड़ा दुःख है, पर मजबूर हूँ। मैं चली जाऊंगी, तो भैयाजी कुछ का कुछ कर बैठेंगे। आप नाराज तो नहीं हैं।
यह कहते-कहते मनोरमा की आँखें सजल हो गयीं। राजा ने मन्त्र मुग्ध नेत्रों से उसकी ओर ताका और गद्गद् होकर बोले––तुम इसकी जरा भी चिन्ता न करो। तुम्हारा इशारा काफी है। लो, अब खुश होकर मुसकरा दो। देखो, वह हँसी आयी! मनोरमा मुसकरा पड़ी। पानी में कमल खिल गया। राजा साहब ने उससे हाथ मिलाया और चले गये। तब मनोरमा आकर अपनी कुरसी पर बैठ गयी।
इस समय गुरुसेवक की दशा उस आदमी की-सी थी, जिसके सामने कोई महात्मा धूनी रमाये बैठे हो, और बगल में कोई विहसित, विकसित रमणी मधुर संगीत अलाप रही हो। उसका मन तो संगीत की ओर आकर्षित होता है, लेकिन लज्जावश उधर न देखकर वह जाता है और महात्मा के चरणों पर सिर झुका देता है।
मनोरमा कुरसी पर बैठी उनकी ओर इस तरह ताक रही थी, मानो किसी बालक ने अपनी कागज की नाव लहरों में डाल दी हो और उसको लहरों के साथ हिलते हुए बहते देखने में मग्न हो। नाव कभी झोंके खाती है, कभी लहरों के साथ बहती है और कभी डगमगाने लगती है। बालक का हृदय भी उसी भाँति कभी उछलता है, कभी घबराता है और कभी बैठ जाता है।
कुरसी पर बैठे-बैठे मनोरमा को एक झपकी आ गयी। सावन भादों की ठण्ढी हवा निद्रामय होती है। उसका मन स्वप्न साम्राज्य में जा पहुँचा। क्या देखती है कि उसके बचपन के दिन हैं। वह अपने द्वार पर सहेलियों के साथ गुड़ियाँ खेल रही हैं। सहसा एक ज्योतिषी पगड़ी बाँधे, पोथी पत्रे बगल में दबाये आता है। सब लड़कियाँ अपनी गुड़ियों का हाथ दिखाने के लिए दौड़ी हुई ज्योतिषी के पास जाती हैं। ज्योतिषी गुड़ियों के हाथ देखने लगता है। न-जाने कैसे गुड़ियों के हाथ लड़कियो के हाथ बन जाते है। ज्योतिषी एक बालिका का हाथ देखकर कहता है––तेरा विवाह एक बड़े भारी अफसर से होगा। बालिका हँसती हुई अपने घर चली जाती है; तब ज्योतिषी दूसरी बालिका का हाथ देखकर कहता है––तेरा विवाह एक बड़े सेठ से होगा। तू पालकी में बैठकर चलेगी। वह बालिका भी खुश होकर घर चली जाती है। तब मनोरमा की बारी आती है। ज्योतिषी उसका हाथ देखकर चिन्ता में डूब नाते हैं और अन्त में संदिग्ध स्वर में कहते हैं––तेरे भाग्य में जो कुछ लिखा है, तू उसके विरुद्ध करेगी और दुःख उठायेगी। यह कहकर वह चल पड़ते हैं; पर मनोरमा उनका हाथ पकड़ कर कहती है––आपने मुझे तो कुछ नहीं बताया। मुझे उसी तरह बता दीजिए, जैसे आपने मेरी सहेलियों को बताया है। ज्योतिषी झुँझलाकर कहते हैं। तू प्रेम को छोड़कर धन के पीछे दौड़ेगी; पर तेरा उद्धार प्रेम ही से होगा। यह कहकर ज्योतिषीजी अन्तर्धान हो गये और मनोरमा खड़ी रोती रह गयी।
यही विचित्र दृश्य देखते-देखते मनोरमा की आँखें खुल गयी। उसकी आँखों में अभी तक आँसू बह रहे थे। सामने उसकी भावज खड़ी कह रही थी––घर में चलो, बीवी! मुझसे क्यों इतना भागती हो? क्या मैं कुछ छीन लूँगी? और गुरूसेवक लैम्प के सामने बैठे तजबीज़ लिख रहे थे। मनोरमा ने भावज से पूछा––भाभी, क्या मैं सो गयी थी? अभी तो शाम हुई है।
गुरुसेवक ने कहा––शाम नहीं हुई है, बारह बज रहे हैं।
मनोरमा––तो आपने तजवीज़ लिख डाली होगी?
गुरुसेवक––बस, जरा देर में खत्म हुई जाती है।
मनोरमा ने काँपते हुए स्वर में कहा––आप यह तजवीज़ फाड़ डालिए।
गुरुसेवक ने बड़ी-बड़ी आँखें करके पूछा––क्यों, फाड़ क्यों डालूँ?
मनोरमा––यों ही! आपने इस मुकदमे का जिक्र ऐने बेमौके कर दिया कि राजा साहब नाराज हो गये होंगे। मुझे चक्रधर से कुछ रिश्वत तो लेनी नहीं है। वह तीन वर्ष की जगह तीस वर्ष क्यों न जेल में पढ़े रहें। पुण्य और पाप आपके सिर। मुझसे कोई मतलब नहीं।
गुरुसेवक नहीं मनोरमा, मैं अब यह तजवीज़ नहीं फाड़ सकता। बात यह है कि मैंने पहले ही से दिल में एक बात स्थिर कर ली थी, और सारी शहादतें मुझे उसी रंग में रंगी नजर आती थीं। सत्य की मैंने तलाश न की थी, तो सत्य मिलता कैसे? अब मालूम हुआ कि पक्षपात क्योंकर लोगों की घाँखों पर परदा डाल देता है। अब जो सत्य की इच्छा से बयानों को देखता हूँ, तो स्पष्ट मालूम होता है कि चक्रधर बिलकुल निर्दोष हैं। जान-बूझकर अन्याय न करूँगा।
मनोरमा––आपने राजा साहब की त्योरियाँ देखीं?
गुरुसेवक––हाँ, खूब देखों, पर उनकी अप्रसन्नता के भय से अपनी तजवीज़ नहीं फाड़ सकता। यह पहली तजवीज़ है, जो मैने पक्षपात-रहित होकर लिखी है और जितना संतोष आज मुझे अपने फैसले पर है, उतना और कभी न हुआ था। अब तो कोई लाख रुपये भी दे, तो भी इसे न फाड़ूँ।
मनोरमा–– अच्छा, तो लाइए, मैं फाड़ दूं।
गुरुसेवक––नहीं मनोरमा, औंघते हुए आदमी को मत ठेलो, नहीं तो फिर वह इतने जोर से गिरेगा कि उसकी आत्मा तक चूर-चूर हो जायगी। मुझे तो विश्वास है कि इस तजवीज़ से चक्रधर की पहली सजा भी घट जायगी। शायद सत्य कलम को भी तेज कर देता है। मैं इन तीन घण्टों में बिना चाय का एक प्याला पिये ४० पृष्ठ लिख गया, नहीं तो हर दस मिनट में चाय पीनी ही पढ़ती थी। बिना चाय की मदद के कलम ही न चलती थी।
मनोरमा–– लेकिन मेरे सिर इसका एहसान न होगा?
गुरुसेवक––सचाई आप ही अपना इनाम है, यह पुरानी कहावत है। सत्य से आत्मा भी बलवान हो जाती है। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, अब मुझे ज़रा भी भय नहीं है।
मनोरमा––अच्छा, अब मैं जाऊँगी। लालाजी घबरा रहे होंगे।
मामी––हाँ-हाँ; जरूर जाओ, वहाँ माताजी के स्तनों में दूध उतर आया होगा। यहाँ कौन अपना बैठा हुआ है?
मनोरमा––भाभी, लौंगी अम्माँ को तुम जितना नीच समझती हो, उतनी नीच नहीं हैं। तुम लोगों के लिए वह अब भी रोया करती हैं।
भाभी––अब बहुत बखान न करो, जी जलता है। वह तो मरती भी हो, तो भी देखने न जाऊँ। किसी दूसरे घर में होती, तो अभी तक बरतन माँजती होती। यहाँ आकर रानी बन गयी। लो उठा चला, आज तुम्हारा गाना सुनूँगी। बहुत दिनों के बाद पंजे में आयी हो। मनोरमा घर न जा सकी। भोजन करके भावज के साथ लेटी। बड़ी रात तक दोनों में बातें होती रहीं। आखिर भाभी को नींद आ गयी, पर मनोरमा की आँखों में नींद कहाँ। वह तो पहले ही सो चुकी थी। वही स्वप्न उसके मस्तिष्क में चक्कर लगा रहा फायाकल्प ] १६९ क्या यही है कि राजा साहब से क्या वह प्रेम को छोड़कर धन था। वह वार वार सोचती थी, इस स्वप्न का आशय विवाह करके वह सचमुच अपना भाग्य पलट रही है? के पीछे दौड़ी जा रही है? वह प्रेम कहाँ है, जिसे उसने छोड़ दिया है। उसने तो उसे पाया ही नहीं। वह जानती है कि उसे कहाँ पा सकती है; पर पाये कैसे? वह वस्तु तो उसके हाथ से निकल गयी। वह मन में कहने लगी- बाबूजी, तुमने कभी मेरी श्रोर श्राँख उठाकर देखा है? नहीं, मुझे इसकी लालसा रद्द हो गयी। तुम दूसरों के लिए नरना जानते हो, अपने लिए जीना भी नहीं जानते। तुमने एक बार मुझे इशारा भी कर दिया होता, तो मै दौड़कर तुम्हारे चरणों में लिपट नाती। इस धन-दौलत पर लात मार देती, इस बन्धन को कच्चे धागे की भाँति तोड़ देती; लेकिन तुम इतने विद्वान् होकर भी इतने सरल हृदय हो! इतने अनुरक्त होकर भी इतने विरक्त! तुम समझते हो, मैं तुम्हारे मन का हाल नहीं जानती? मैं सब जानती हूँ, एक एक अक्षर जानती हूँ, लेकिन क्या करूँ? मैंने अपने मन के भाव उससे अधिक प्रकट कर दिये थे, जितना मेरे लिए उचित था। मैंने वेशर्मी तक की; लेकिन तुमने मुझे न समझा, या समझने की चेष्टा ही न की। व तो भाग्य मुझे उसी ओर लिये जा रहा है, जिधर मेरी चिता बनी हुई है। उसी चिता पर बैठने जाती हूँ। यही हृदय- दाह मेरी चिता होगी और यही स्वप्न सन्देश मेरे जीवन का आधार होगा। प्रेम से मैं वंचित हो गयी और यत्र मुझे सेवा ही से अपना जीवन सफल करना होगा। यह स्वप्न नहीं, ग्राकाशवाणी है। अभागिनी इससे अधिक और क्या मिलापा रख सकती है? यही सोचते-सोचते वह लेटे-लेटे यह गीत गाने लगीकरूँ क्या, प्रेम-समुद्र स्नेह सिन्धु में मग्न हुई मैं, हाथ न श्राये तुम जीवन धन, करूँ क्या, प्रेम-समुद्र पार! लहरें रही हिलोर, पाया कहीं न छोर! पार! झूम-झूमकर जब इठलायो सुरभित स्निग्ध समोर, नभ मण्डल में लगा विचरने मेरा हृदय अधीर। करूँ क्या, प्रेम- समुद्र पार!
हुक्काम के इशारों पर नाचनेवाले गुरुसेवकसिंह ने जब चक्रधर को जेल के दंगे के इलजाम से बरी कर दिया, तो अधिकारी मण्डल में सनसनी - सी फैल गयी। गुरुसेवक से ऐसे फैसले की किसी को आशा न थी। फैसला क्या था, मान-पत्र था, जिसका एक- एक शब्द वात्सल्य के रस में शराबोर था। जनता में धूम मच गयी। ऐसे न्यायप्रिय और सत्यवादी प्राणी विरले ही होते हैं, सबके मुँह से यहीं बात निकलती थी। शहर के कितने ही आदमी तो गुरुसेवक के दर्शनों को आये और यह कहते हुए लौटे कि यह हाकिम नहीं, साक्षात् देवता हैं। अधिकारियों ने सोचा था, चक्रधर को ४-५ साल जेल में सड़ायेंगे, लेकिन अब तो लूटा ही उखड़ गया, उछले किस बिरते पर? चक्रधर इस इलजाम से बरी ही न हुए, बल्कि उनकी पहली सजा भी एक साल घटा दी गयी। मिस्टर जिम तो ऐसा जामे से बाहर हुए कि बस चलता, तो गुरुसेवक को गोली मार देते। और कुछ न कर सके, तो चक्रधर को तीसरे ही दिन आगरे भेज दिया। लेकिन ईश्वर न करे कि किसी पर हाकिमों की टेढ़ी निगाह हो। चक्रधर की मीआद घटा टी गयी, लेकिन कर्मचारियों को सख्त ताक़ीद कर दी गयी थी कि कोई क़ैदी उनसे बोलने तक न पाये, कोई उनके कमरे के द्वार तक भी न जाने पाये, यहाँ तक कि कोई कर्मचारी भी उनसे न बोले। साल भर में दस साल की क़ैद का मजा चखाने की हिकमत सोच निकाली गयी। मजा यह कि इस धुन में चक्रधर को कोई काम भी न दिया गया। बस, आठों पहर उसी चार हाथ लम्बी और तीन हाथ चौड़ी कोठरी में पड़े रही। जेल के विधाताओं में चाहे जितने अवगुण हो, पर वे मनोविज्ञान के पण्डित होते हैं। किस दण्ड से आत्मा को अधिक से अधिक कष्ट हो सकता है, इसका उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान होता है। मनुष्य के लिए बेकारी से बड़ा और कोई कष्ट नहीं है, इसे वे खूब जानते हैं। चक्रधर के कमरे का द्वार दिन में केवल दो बार खुलता था। बार्डर खाना रखकर किवाड़ बन्द कर देता था। आह! कालकोठरी तू मानवी पशुता की सबसे क्रूर लीला, सबसे उज्ज्वल कीर्ति है। तू वह जादू है, जो मनुष्य को आँखें रहते अन्धा, कान रहते बहरा, जीभ रहते गंगा बना देती है। कहाँ है सूर्य की वे किरणें, जिन्हें देखकर आँखो को अपने होने का विश्वास हो, कहाँ है वह वाणी, जो कानों को जगाये? गन्ध है, किन्तु ज्ञान तो भिन्नता में है। जहाँ दुर्गन्ध के सिवा और कुछ नहीं, वहाँ गन्ध-शान कैसे हो, बस, शून्य है, अन्धकार है। वहाँ पंच-भूतों का अस्तित्व ही नहीं। कदाचित् ब्रह्मा ने इस अवस्था की कल्पना ही न की होगी, कदाचित् उनमें यह सामर्थ्य ही न थी। मनुष्य की आविष्कार-शक्ति कितनी विलक्षण है। धन्य हो देवता, धन्य हो।
चक्रधर के विचार और भाव इतनी जल्द बदलते रहते थे कि कभी-कभी उन्हें भ्रम होने लगता था कि मैं पागल तो नहीं हुआ जा रहा हूँ? कभी सोचते-ईश्वर ने ऐसी सृष्टि की रचना ही क्यों की, जहाँ इतना स्वार्थ, द्वेष और अन्याय है? क्या ऐसी पृथ्वी न बन सकती थी, जहाँ सभी मनुष्य, सभी जातियाँ प्रेम और आनन्द के साथ संसार में रहतीं? यह कौन-सा इन्साफ है कि कोई तो दुनिया के मजे उड़ाये, कोई धक्के खाये, एक जाति दूसरी का रक्त चूसे और मछों पर ताव दे। दूसरी कुचली जाय और दाने को तरसे? ऐसा अन्यायमय संसार ईश्वर की सृष्टि नहीं हो सकता। पूर्व-संसार का सिद्धान्त ढोंग मालूम होता है, जो लोगों ने दुखियों और दुर्बलों के आँसू पोछने के लिए गढ़ लिए हैं। दो चार दिन यही संशय उनके मन को मथा करता। फिर एकाएक विचार-धारा पलट जाती। अन्धकार में प्रकाश की ज्योति फैल जाती, काँटों की जगह फूल नजर आने लगते। पराधीनता एक ईश्वर-विधान का रूप धारण कर लेती, जिसमें विकास और जागृति का मंत्र छिपा हुया है। नहीं, पराधीनता दण्ड नहीं है, यह शिक्षा– लय है, जो हमें स्वराज्य के सिद्धान्त सिखाता है, हमारे पुराने कुसंस्कारों को मिटाता है, हमारी मुंदी हुई आँखें खोलता है। इसके लिए ईश्वर का गिला करने की जरूरत नहीं। हमें उनको धन्यवाद देना चाहिए। अन्त को इस अन्तर्द्वन्द्व में उनकी आत्मा ने विजय पायी। सारी मन की अशान्ति, क्रोध और हिंसात्मक वृत्तियाँ उसी विजय में मग्न हो गयी। मन पर आत्मा का राज्य हो गया। इसको परवा न रही कि ताजी हवा मिलती है या नहीं, भोजन कैसा मिलता है, कपड़े कितने मैले हैं, उनमे कितने चिलवे पड़े हुए हैं कि खुजाते-खुजाते देह में दिदोरे पड़ जाते हैं। इन कष्टों की ओर उनका ध्यान ही न जाता। मन अन्तर्जगत् की सैर करने लगा। यह नयी दुनिया, जिसका अभी तक चक्रधर को बहुत कम ज्ञान था, इस लोक से कहीं ज्यादा पवित्र, उज्ज्वल और शान्तिमय थी। यहाँ रवि की मधुर प्रभात किरणों में, इन्दु की मनोहर छटा में, वायु के कोमल संगीत में, आकाश की निर्मल नीलिमा में, एक विचित्र ही आनन्द था। वह किसी समाधिस्थ योगी की भँति घण्टों इस अन्तर्लोक में विचरते रहते। शारीरिक कष्टों से अब उन्हें विराग-सा होने लगा। उनकी ओर ध्यान देना वह तुच्छ समझते थे। कभी-कभी वह गाते। मनोरंजन के लिए कई खेल निकाले। अँधेरे में अपनी लुटिया लुढ़का देते और उसे एक ही खोज में उठा लाने की चेष्टा करते। अगर उन्हें किसी चीज़ की जरूरत मालूम होती, तो वह प्रकाश था। इसलिए नहीं कि वह अन्धकार से ऊब गये थे; बल्कि इसीलिए कि वह अपने मन में उमड़नेवाले भावों को लिखना चाहते थे। लिखने की सामग्रियों के लिए उनका मन तड़पकर रह जाता। धीरे-धीरे उन्हें प्रकाश की भी जरूरत न रही। उन्हें ऐसा विश्वास होने लगा कि मैं अँधेरे में भी लिख सकता हूँ। यही न होगा कि पंक्तियाँ सीधी न होगी; पर पंक्तियों को दूर-दूर रखकर और शब्दों को अलग-अलग लिखकर वह इस मुश्किल को आसान कर सकते थे। सोचते, कभी यहाँ से बाहर निकलने पर उस लिखावट का पढ़ने में कितना आनन्द आयेगा, कितना मनोरंजन होगा! लेकिन लिखने का सामान कहाँ। बस, यही एक ऐसी चीज थी, जिसके लिए यह कभी-कभी विकल हो जाते थे। विचार को ऐसे अथाह सागर में डूबने का मौका फिर न मिलेगा और ये मोती फिर हाथ न पायेंगे। लेकिन कैसे मिले।
चक्रधर के पास कभी कभी एक बूढ़ा बार्डर भोजन लाया करता था। वह बहुत ही हँसमुख आदमी था। चक्रधर को प्रसन्नमुख देखकर दोचार बातें कर लेता था। आह! उससे बातें करने के लिए चक्रधर लालायित रहते थे। उससे उन्हें बन्धुत्व-सा हो गया था। वह कई बार पूछ चुका था कि बाबूजी चरस-तम्बाखू की इच्छा हो, तो हमसे कहना। चक्रधर को खयाल आया, क्यों न उससे एक पेंसिल और थोड़े से कागज के लिए कहूँ। इस उपकार का बदला कभी मौका मिला तो चुका दूंगा। कई दिनों तक तो वह इसी संकोच में पड़े रहे कि उससे कहूँ या नहीं। आखिर एक दिन उनसे न रह गया, पूछ ही बैठे––क्यों जमादार, यहाँ कहाँ कागज पेंसिल तो मिलेगी? बूढ़ा वार्डर उनकी पूर्व कथा सुन चुका था, कुछ लिहाज करता था। मालूम नहीं किस देवता के आशीर्वाद से उसमें इतनी इन्सानियत बच रही थी। और जितने बार्डर भोजन लाते, वे या तो चक्रधर को अनायास दो-चार ऐंडी बैंड़ी सुना देते, या चुपके से खाना रखकर चले जाते। चक्रधर को चरित्र ज्ञान प्राप्त करने का यह बहुत ही अच्छा अवसर मिलता था। बूढ़े वार्डर ने सतर्क भाव से कहा––मिलने को तो मिल जायगा, पर किसी ने देख लिया, तो क्या होगा?
इस वाक्य ने चक्रधर को संभाल लिया। उनकी विवेक-बुद्धि, जो क्षण भर के लिए मोह में फँस गयी थी, नाग उठी। बोले––नहीं, मैं योंही पूछता था। यह कहते कहते लज्जा से उनकी जबान बन्द हो गयी। जरा-सी बात के लिए इतना पतन!
इसके बाद उस बार्डर ने फिर कई बार पूछा––कहो तो पिंसिन कागद ला दूँ, मगर चक्रधर ने हर दफ़ा यही कहा––मुझे जरूरत नहीं।
बाबू यशोदानन्दन को ज्योंही मालूम हुआ कि चक्रधर आगरा जेल में आ गये हैं, वह उनसे मिलने की कई बार चेष्टा कर चुके थे, पर आज्ञा न मिलती थी। साधारणतः कैदियों को छठे महीने अपने घर के किसी प्राणी से मिलने की आज्ञा मिल जाती थी। चक्रधर के साथ इतनी रिवायत भी न की गयी थी, पर यशोदानन्दन अवसर पड़ने पर खुशामद भी कर सकते थे। अपना सारा जोर लगाकर अन्त में उन्होंने आज्ञा प्राप्त कर ही ली-अपने लिए नहीं, अहल्या के लिए। उस विरहिणी की दशा दिनों दिन खराब हो जाती थी। जब से चक्रधर ने जेल में कदम रखा, उसी दिन से वह भी कैदियों की सी जिन्दगी बसर करने लगी। चक्रधर जेल में भी स्वतन्त्र थे, वह भाग्य को अपने पैरों पर झुका सकते थे। अहल्या घर में भी कैद थी, वह भाग्य पर विजय न पा सकती थी। वह केवल एक बार बहुत थोड़ा-सा खाती और वह भी रूखा-सूखा। वह चक्रधर को अपना पति समझती थी। पति को ऐसी कठिन तपस्या देखकर उसे आप ही आप बनाव-शृङ्गार से, खाने पीने से, हँसने बोलने से अरुचि होती थी। कहाँ पुस्तकों पर जान देती थी, कहाँ अब उनकी ओर ऑख उठाकर न देखती। चारपाई पर सोना भी छोड़ दिया था। केवल जमीन पर एक कम्बल बिछाकर पड़ रहती। बैसाख जेठ की गरमी का क्या पूछना, घर की दीवारें तवे की तरह तपती है। घर भाड़ सा मालूम होता है। रात को खुले मैदान में भी मुश्किल से नींद आती है, लेकिन अहल्या ने सारी गरमी एक छोटी-सी बन्द कोठरी में सोकर काट दी। माघ पूस की सरदी का क्या पूछना। प्राण तक कांपते हैं। लिहाफ के बाहर मुँह निकालना मुश्किल होता है। पानी पीने से जूड़ी-सी चढ आती है। लोग आग पर पतंगों की भाँति गिरते हैं, लेकिन अहल्या के लिए वही कोठरी की जमीन थी और एक फटा हुआ कम्बल। सारा घर समझाता था––क्यों इस तरह प्राण देती हो? तुम्हारे प्राण देने से चक्रधर का कुछ उपकार होता, तो एक बात भी थी। व्यर्थ काया को क्यों कष्ट देते हो? इसका उसके पास यही जवाब था––मुझे जरा भी कष्ट नहीं। आप लोगों को न जाने कैसे मैदान में गरमी लगती है, मुझे तो कोठरी में खूब नींद आती है। आप लोगों को न जाने कैसे सरदी लगती है, मुझे तो कम्बल में ऐसी गहरी नींद आती है कि एक बार भी आँख नहीं खुलती। ईश्वर में पहले भी उसकी भक्ति कम न थी, अब तो उसकी धर्मनिष्ठा और भी बढ़ गयी। प्रार्थना में इतनी शान्ति है, इसका उसे पहले अनुमान न था। जब वह हाथ जोड़कर ऑखे बन्द करके ईश्वर से प्रार्थना करती, तो उसे ऐसा मालूम होता कि चक्रधर स्वयं मेरे सामने खड़े हैं। एकाग्रता और निरन्तर ध्यान से उसकी आत्मा दिव्य होती जाती थी। इच्छाएँ आपही-आप गायब हो गयीं। चित्त की वृत्ति ही बदल गयी। उसे अनुभव होता था कि मेरी प्रार्थनाएँ उस मातृ-स्नेह पूर्ण अञ्चल की भाँति, जो बालक को ढक लेता है, चक्रधर की रक्षा करती रहती हैं।
जिस दिन अहल्या को मालूम हुआ कि चक्रधर से मिलने की आज्ञा मिल गयी है, उसे आनन्द के बदले भय होने लगा––वह न जाने कितने दुर्बल हो गये होंगे, न-जाने उनकी सूरत कैसी बदल गयी होगी। कौन जाने, हृदय बदल गया हो। यह भी शंका होती थी कि कहीं मुझे उनके सामने जाते ही मूर्छा न आ जाय, कहों में चिल्लाकर रोने न लगूँ। अपने दिल को बार-बार मजबूत करती थी।
प्रातःकाल उसने उठकर स्नान किया और बड़ी देर तक बैठी वन्दना करती रही। माघ का महीना था, आकाश में बादल छाये हुए थे, इतना कुहरा पड़ रहा था कि सामने की चीज़ न सूझती थी। सरदी के मारे लोगों का बुरा हाल था। घरों को मेहरियाँ अँगीठियाँ लिये ताप रही थी, धन्धा करने कौन जाय। मजदूरी का फाका करना मंजूर था; पर काम पर जाना मुश्किल मालुम होता था। दूकानदारों को दूकान की परवा न थी, बैठे आग तापते थे; यमुना में नित्य स्नान करनेवाले भक्त-जन भी आज तट पर नजर न आते थे। सड़कों पर, बाजार में, गलियों में, सन्नाटा छाया हुआ था। ऐसा हो कोई विपत्ति का मारा दूकानदार था, जिसने दूकान खोली हो। बस, अगर चलते-फिरते नजर आते थे, तो वे दफ्तरों के बाबू थे, जो सरदी से सिकुहे, जेब में हाथ डाले, कमर टेढ़ी किये, लपके चले जाते थे। अहल्या इसी वक्त यशोदानन्दनजी के साथ गाड़ी में बैठकर जेल चली। उसे उल्लास न था, आनन्द न था, शंका और भय से दिल काँप रहा था, मानो कोई अपने रोगी मित्र को देखने जा रहे हो। जेल में पहुँचते ही एक औरत ने उसकी तलाशी ली और उसे पास के एक कमरे में ले गयी, जहाँ एक टाट का टुकड़ा पड़ा था। उसने अहल्या को उस टाट पर बैठने का इशारा किया। तब एक कुरसी मँगवाकर आप उस पर बैठ गयी और चौकीदार से कहा––अब यहाँ सब ठीक है, कैदी को लाओ।
अहल्या का कलेजा धड़क रहा था। उस स्त्री को अपने समीप बैठे देखकर उसे कुछ ढाँढस हो रहा था, नहीं तो शायद वह चक्रधर को देखते ही उनके पैरों से लिपट जाती। सिर झुकाये बैठी यी कि चक्रधर दो चौकीदारों के साथ कमरे में आये। उनके सिर पर कनटोप था और देह पर एक आधी आस्तीन का कुरता; पर मुख पर आत्मबल की ज्योति झलक रहो थी। उनका रंग पीला पड़ गया या, दाढ़ी के बाल बड़े हुए थे और आँखें भीतर को घुसी हुई थीं, पर मुख पर एक हल्की सी मुसकराहट खेल रही थी। अहल्या उन्हें देखकर चौंक पड़ी, उसकी आँखो से वे अख्तियार आँसू निकल आये। शायद कहीं और देखती तो पहचान भी न सकती। घबरायी सी उठकर खड़ी हो गयी। अब दो-के दोनों खड़े हैं, दोनों के मन में हजारों बातें हैं, उद्गार पर उद्गार उठते हैं, दोनों एक दूसरे को कनखियों में देखते हैं, जिनमें प्रेम, आकांक्षा और उत्सुकता की लहरें-सी उठ रही हैं, पर किसी के मुंह से शब्द नहीं निकलता। अहल्या सोचती है, क्या पूछूँ, इनका एक-एक अग अपनी दशा आप सुना रहा है। उसकी आँखों में बार-बार आँसू उमड़ पाते हैं, पर पी जाती है। चक्रधर भी यही सोचते हैं, क्या पूछूँ, इसका एक-एक अग इसकी तपस्या और वेदना की कथा सुना रहा है। बार-बार ठंढी साँसे खीचते हैं, पर मुँह नहीं खुलता। वह माधुर्य कहाँ है, जिस पर ऊषा की लालिमा बलि जाती थी? वह चपलता कहाँ है, वह सहास छवि कहाँ है, जो मुखमण्डल को बलाएँ लेती थी। मालूम होता है, बरसों की रोगिणी है। आह! मेरे ही कारण इसकी नयह दशा हुई है। अगर कुछ दिन और इसी तरह घुली, तो शायद प्राण ही बचें। किन शब्दों में दिलासा दूं, क्या कहकर समझाऊँ।
इसी असमंजस और कण्ठावरोध की दशा में खड़े खडे दोनों को १० मिनट हो गये। शायद उन्हें खयाल ही न रहा कि मुलाकात का समय केवल २० मिनट है। यहाँ तक कि उस लेडी को उनकी दशा पर दया पायी, घड़ी देखकर बोली––तुम लोग यों ही कब तक खड़े रहोगे? दस मिनट गुजर गये, केवल दस मिनट और बाकी हैं।
चक्रधर मानो समाधि से जाग उठे। बोले––अहल्या, तुम इतनी दुबली क्यों हो? बीमार हो क्या?
अहल्या ने सिसकियों को दबाकर कहा––नहीं तो, मैं बिलकुल अच्छी हूँ। आप अलबत्ता इतने दुबले हो गये हैं कि पहचाने नहीं जाते।
चक्रधर––खैर, मेरे दुबले होने के तो कारण हैं, लेकिन तुम क्यों ऐसी घुली ना रही हो? कम-से-कम अपने को इतना तो बनाये रखो कि जब मैं छूटकर आऊँ, तो मेरी कुछ मदद कर सको। अपने लिये नहीं, तो मेरे लिए तो तुम्हें अपनी रक्षा करनी ही चाहिए। अगर तुमने इसी भाँति घुल घुलकर प्राण दे दिये, तो शायद जेल से मेरी भी लाश ही निकले। तुम्हें वचन देना पड़ेगा कि तुम अबसे अपनी ज्यादा फिक्र रखोगी। मेरी ओर से तुम निश्चिन्त रहो। मुझे यहाँ कोई तकलीफ नहीं है। बड़ी शान्ति से दिन कट रहे हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि मेरे आत्म-सुधार के लिए इस तपस्या की बड़ी जरूरत थी। मैंने अँधेरी कोठरी में जो कुछ पाया, वह पहले प्रकाश में रहकर न पाया था। मुझे अगर उसी कोठरी में सारा जीवन बिताना पड़े, तो भी मैं न घबराऊँगा। हमारे साधु सन्त अपनी इच्छा से जीवन-पर्यन्त कठिन से कठिन तपस्या करते हैं। मेरी तपस्या उनसे कहीं सरस और सुसाध्य है। अगर दूसरों ने मुझे इस संयम का अवसर दिया, तो मैं उनसे बुरा क्यों मानू? मुझे तो उनका उपकार मानना चाहिए।
मुझे वास्तव में इस संयम को बड़ी जरूरत थी, नहीं तो मेरे मन की चंचलता मुझे न जाने कहाँ ले जाती। प्रकृति सदैव हमारी कमी को पूरी करती रहती है, यह बात अब तक मेरी समझ में न पायी थी। अब तक मैं दूसरों का उपकार करने का स्वप्न देखा करता था। अब ज्ञात हुआ कि अपना उपकार ही दूसरों का उपकार है। जो अपना उपकार नहीं कर सकता, वह दूसरों का उपकार क्या करेगा। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, यहाँ बड़े आराम से हूँ और इस परीक्षा में पढ़ने से प्रसन्न हूँ। बाबूजी तो कुशल से हैं?
अहल्या––हाँ, आपको बराबर याद किया करते हैं। मेरे साथ वह भी आये हैं; पर यहाँ न याने पाये। अम्माँ और बाबूजी में कई महीनों से खटपट है। वह कहती है, बहुत दिन तो समाज को चिन्ता में दुबले हुए, अब आराम से घर बैठो, क्या तुम्हीं ने समाज का ठीका ले लिया है? बाबूजी कहते हैं, यह काम तो उसी दिन छोड़ूँगा, जिस दिन प्राण शरीर को छोड़ देगा। बेचारे बराबर दौड़ते रहते हैं। एक दिन भी आराम से बैठना नसीब नहीं होता। तार से बुलावे आते रहते हैं। फुरसत मिलती है, तो लिखते हैं। न-जाने ऐसी क्या हवा बदल गयी है कि नित्य कहीं-न-कहीं से उपद्रव की खबर आती रहती है। आजकल स्वास्थ्य भी बिगड़ गया है; पर आराम करने की तो उन्होंने कसम खा ली है। बूढे ख्वाजा महमूद से न-जाने किस बात पर अनबन हो गयी है। आपके चले जाने के बाद कई महीने तक खूब मेल रहा, लेकिन अब फिर वही हाल है।
अहल्या ने ये बातें महत्व को समझकर न कहीं बल्कि इसलिए कि वह चक्रधर का ध्यान अपनी तरफ से हटा देना चाहती थी। चक्रधर विरक्त से होकर बोले––दोनों आदमी फिर धर्मान्धता के चक्कर में पड़ गये होंगे। जब तक हम सच्चे धर्म का अर्थ न समझेगे, हमारी यही दशा रहेगी। मुश्किल यह है कि जिन महान् पुरुषों से अच्छी धर्मनिष्ठा की आशा की जाती है, वे अपने अशिक्षित भाइयों से भी बढ़कर उद्दण्ड हो जाते हैं। मैं तो नीति ही का धर्म समझता हूँ और सभी सम्प्रदायों की नीति एक-सी है। नगर अंतर है तो बहुत थोड़ा। हिन्द, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सभी सत्कर्म और सद्विचार की शिक्षा देते हैं। हमें कृष्ण, राम, ईसा मुहम्मद, बुद्ध सभी महात्माओं का समान आदर करना चाहिए। ये मानव जाति के निर्माता है। जो इसमें से किसी का अनादर करता है, या उनकी तुलना करने बैठता है, वह अपनी मूर्खता का परिचय देता है। बुरे हिन्दू से अच्छा मुसलमान उतना ही अच्छा है, जितना बुरे मुसलमान से अच्छा हिन्दू। देखना यह चाहिए कि वह कैसा आदमी है, न कि यह कि वह किस धर्म का आदमी है। संसार का भावी धर्म सत्य, न्याय और प्रेम के आधार पर बनेगा। हम अगर संसार में जीवित रहना है, तो अपने हृदय में इन्हीं भावों का सञ्चार करना पड़ेगा। मेरे घर का तो कोई समाचार न मिला होगा?
अहल्या––मिला क्यों नहीं, बाबूजी हाल ही में काशी गये। जगदीशपुर के साहब ने आपके पिताजी को ५०) मासिक बाँध दिया है इससे अब उनका वन का नहीं है। आपकी माताजी अलबत्ता रोया करती हैं! छोटी रानी साहबा की आपके घर-वालों पर विशेष कृपादृष्टि है।
चक्रधर ने विस्मित होकर पूछा––छोटी रानी साहबा कौन?
अहल्या––रानी मनोरमा, जिनसे अभी थोड़े हो दिन हुए, राजा साहब का विवाह हुआ है।
चक्रधर––तो मनोरमा का विवाह राजा साहब से हो गया?
अहल्या––यही तो बाबूजी कहते थे।
चक्रधर––तुम्हें खूब याद है, भूल तो नहीं रही हो?
अहल्या-खूब याद है, इतनी जल्द भूल जाऊँगी!
चक्रधर––यह तो बड़ी दिल्लगी हुई, मनोरमा का विवाह विशालसिंह के साथ? मुझे तो अब भी विश्वास नहीं पाता। बाबूजी ने नाम बताने में गलती को होगी।
अहल्या––बाबूजी को स्वयं आश्चर्य हो रहा था। काशी में भी लोगों को बड़ा आश्चर्य है। मनोरमा ने अपनी खुशी से विवाह किया है, कोई दबाव न था। मनोरमा किसी से दबनेवाली है ही नहीं। सुनती हूँ, राजा साहब बिलकुल उनकी मुट्ठी में हैं। जो कुछ वह करती हैं, वही होता है। राजा साहब तो काठ के पुतले बने हुए हैं। बाबूजी चन्दा माँगने गये थे, तो रानीजी ही ने पाँच हजार दिये। बहुत प्रसन्न मालूम होती थीं।
सहसा लेडी ने कहा––वक्त पूरा हो गया। बार्डर, इन्हें अन्दर ले जाओ।
चक्रधर क्षण-भर भी और न ठहरे। अहल्या को तृष्णापूर्ण नेत्रों से देखते हुए चले गये। अहल्या ने सजल नेत्रों से उन्हें प्रणाम किया और उनके जाते ही फूट-फूटकर रोने लगी।